Book Title: Agam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 05 Sthanakvasi
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: A B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
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भगवतीसूगे भदन्त ! किम् इगतान् पुद्गलान पर्यादाय विकुर्वति, तगठान् पुद्गलान् पर्याद य विकुर्वति, अन्यत्र गतान् पुद्गलान् पर्यादाय विकुर्वति ? गौतम ! न इहगतान् पुद्गलान पर्यादाय विकुर्वति, तत्रगतान् पुद्गलान् पर्यादाय विकुर्वति, न अन्यत्रगतान् पुद्गलान् पर्यादाय विकुर्वति । एवम् एतेन को ग्रहण करके एकवर्ण वाले तथा एक आकार वाले अपने शरीरकी विकुर्वणा कर सकता है क्या ? (हंता पभू) हां, गौतम ! कर सकता है। (से णं भंते ! किं इहगए पोग्गले परियाइत्ता विउव्वइ, तत्थगए पोग्गले परियाइत्ता विकुब्वइ, अन्नत्थगए पोग्गले परियाइत्ता विउव्वइ) हे भदन्त ! वह देव क्या यहां पर रहे पुदगलों को ग्रहण करके विकुर्वणा करता है ? कि तत्रगत-देवलोक में रहे हुए- पुद्गलों को ग्रहण करके विकुर्वणा करता है ? या अन्यत्रगत-कोई दूसरी जगह पर रहे हुए पुद्गलों को ग्रहण करके विकुर्वणा करता है ? (गोयमा) हे गौतम ! (णो इहगए पोग्गले परियाएत्ता विकुव्वइ, तत्थगए पोग्गले परियाइत्ता विकुम्वइ, णो अण्णत्थगए पोग्गले परियाइत्ता विउव्वई) इहगत-यहां पर रहे हुए- पुदूगलों को ग्रहण करके वह देव विकुर्वणा नहीं करता है किन्तु देवलोक में रहे हुए पुद्गलों को ग्रहण करके ही विकुर्वणा करता है। इस तरह से यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि वह देव अन्यत्रगत पुदगलों को ग्रहण करके विकुर्वणा नहीं करता है। (एवं एएणं गमेणं जाव एगवन्नं एगरूवं, ગ્રહણ કરીને એક વર્ણવાળા અન એક આકારવાળા પિતાના શરીરની વિમુર્વણુ કરી से छे मरे ? (हंता, पभू) &, गौतम! ४ श छे. (सेणं भंते ! किं इहगए पोग्गले परियाइत्ता विउनइ, तत्थगए पोग्गले परियाइत्ता विउव्वइ, अन्नत्थगए पोग्गले परियाइत्ता विउन्बइ ?) 3 सह-त! ते व शुमडी २ai પુદગલેને ગ્રહણ કરીને વિદુર્વણું કરે છે, કે ત્યાં દેવલોકમાં રહેલાં પુદગલેને ગ્રહણ કરીને વિદુર્વણુ કરે છે, કે અન્યત્ર (બીજી કઈ જગ્યાએ) રહેલાં પુદગલે ગ્રહણ કરીને विया ४२ छ ? (गोयमा!) 3 गौतम! (णो इहगए पोग्गले परियाहत्ता विकुच्चइ, तत्थगए पोग्गले परियाइत्ता विकुन्वइ, णो अण्णत्थगए पोग्गले परियाइत्ता विउन्नइ) मही २dai yाने अडशन विधु'। ४रतो નથી, કેઈ વચ્ચે રહેલાં પુદગલેને ગ્રહણ કરીને પણ વિષ્ણુર્વણ કરતો નથી, પરંતુ દેવલોકમાં २i yाने अ५ रीने व पि ३ छ. (एवं एएणं गमेणं जाव
શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૫