Book Title: Agam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 05 Sthanakvasi
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: A B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
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अमेयचन्द्रिकाटीका श.७ उ.३ २.५ वेदनानिजेरास्वरूपनिरूपणम् ४६५ निर्जरा उच्यते, किंवा या निर्जरा भवति सा एव वेदना उच्यते ? भगवानाह- 'गोयमा ! णो इणढे समढे' हे गौतम ! नायमर्थः समर्थः वेदना एव निर्जरा न भवति, न वा निर्जरा एव वेदना भवति । गौतमस्तत्र हेतुं पृच्छति- 'से केण?णं भंते ! एवं वुचइ-जा वेयणा न सा निजरा, जा निजरा न सा वेयणा?' हे भदन्त ! तत् केनाथेन कथं तावत - एकमुच्यते यत्-या वेदना न सा निर्जरा, या निर्जरा न सा वेदना वा भवति? भगवानाह- 'गोयमा! कम्मवेयणा, णो कम्मनिजरा' हे गौतम! वेदना पर उनकी वेदनाके विषय में कथन किया है इसमें गौतमने प्रभु से ऐसा पूछा है कि-'से पूर्ण भंते ! जा वेयणा सा निजरा, जा निज्जरा सा वेयणा' हे भदन्त ! क्या यहनिश्चित है कि जो वेदना होती है, वही निर्जरा कहलाती है ? या जो निर्जरा होती है वही वेदना कहलाती है ? इसके उत्तर में प्रभु उनसे कहते हैं कि-'गोयमा णो इणहे समढे' हे गौतम । यह अर्थ समर्थ नहीं है-अर्थात् न वेदना निर्जरारूप होती है ओर न निर्जरा वेदनारूप ही होती है गौतम इस विषयमें कारण जाननेकी इच्छा से प्रभुसे पूछते हैं कि-'से केणटुंणं भंते ! एवं वुच्चइ, जा वेयणा न सा निजरा, जा निज्जरा न सा वेयणा' हे भदन्त ! ऐसा आप किस कारणसे कहते हैं कि जो वेदना है वह निर्जरा रूप नहीं होती है। और जो निर्जरा है वह वेदनारूप नहीं होती है । इसके उत्तरमें प्रभु उनसे कहते हैं 'गोयमा' हे गौतम ! 'कम्म કથન કર્યું છે- આ વિષયને અનુલક્ષીને ગૌતમ સ્વામી મહાવીર પ્રભુને આ પ્રમાણે IR पूछे - 'से गृण भंते ! जा वेयणा सा निज्जरा, जा निज्जरा सा वेयणा? હે ભદન્ત ! શું એ વાત ખરી છે કે જીવ દ્વારા જે વેદન કરાય છે તે વેદનને જ નિર્જરા કહે છે અને જે નિજા થાય છે તેને જ વેદના કહે છે? તેને ઉત્તર આપતા મહાવીર प्रभु ४ छ- 'गोयमा! जो इणट्रे समटे । गौतम ! मे पात २२ नथा. એટલે કે વેદના નિજ શરૂ હોતી નથી અને નિજ વેદનારૂપ રહેતી નથી તેનું કારણ જાણવાની જિજ્ઞાસાથી ગૌતમ સ્વામી મહાવીર પ્રભુને એવો પ્રશ્ન પૂછે છે કે'से केणटेणं भंते ! एवं वुच्चइ, जा वेयणा न सा निज्जरा, जानिज्जरा न सा वेयणा?' 3 महन्त! मा५ । पारणे । । २ वना छ त નિરારૂપ નથી, અને જે નિર્જરા છે તે વેદનારૂપ હેતી નથી ?
तेन त्तर भारत मडावी२ नु छ - 'गोयमा ! कम्मवेयणा णो कम्म भिज्जेस गीतम! वहन ३५ होय छे अन नि नभ३५ हाय छे.
શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૫