Book Title: Agam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 05 Sthanakvasi
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: A B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
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चन्द्रिका टीका श. ७ उ. ७ . २ कामभोग निरूपणम्
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यावत् - भोगिनोऽपि । नैरयिकाः खलु भदन्त ! किं कामिनः, भोगिनः ? एवमेव । एवम् असुरकुमारा यावत् - स्तनितकुमाराः । पृथिवीकायिकानां पृच्छा ? गौतम ! पृथिवीकायिकाः नो कामिनः, भोगिनः । तत्केनार्थेन यावत् - भोगिनः ? गौतम ! स्पर्शेन्द्रियं प्रतीत्य, तत् तेनार्थेन यावत् - भोगिनः । एवं यावत् - वनस्पतिकायिकाः । द्वीन्द्रियाः एवमेव नवरं - जिह्वेन्द्रिय- स्पर्शेन्द्रिये प्रतीत्य भोगिनः । त्रीन्द्रिया अपि एवमेव नवरं घ्राणेन्द्रिय - जिड्वेन्द्रियहैं । इस कारण हे गौतम ! मैंने ऐसा कहा है कि जीव कामी भी हैं और भोगी भी हैं । 'नेरहया णं भंते ! किं कामी भोगी ? हे भदन्त | नारकजीव क्या कामी हैं या भोगी हैं ? [ एवं चेव एवं जाव धणियकुमारा ] हे गौतम ! जैसा पहिले कहा है वैसा ही जानना चाहिये इसी तरह से यावत् स्तनितकुमारों के भी जानना चाहिये | (पुढविकाइयाणं पुच्छा) हे भदन्त ! पृथिवीकायिक क्या कामी हैं कि भोगी हैं ? [पुढविकाइया णो कामी, भोगी] हे गौतम ! पृथिवीकायिक कामी नहीं हैं भोगी हैं [ से केणट्टेणं जाव भोगी ] हे भदन्त ! ऐसा आप किस कारण से कहते हैं कि पृथिवीकायिक कामी नहीं हैं, भोगी हैं ? [गोयमा ! फासिंदियं पडुच्च से तेणद्वेणं जाव भोगी] हे गौतम! स्पर्शन इन्द्रिय को आश्रित करके मैंने ऐसा कहा है कि पृथिवीकायिक कामी नहीं हैं भोगी हैं । [ एवं जाव वणस्सइ काइया, बेइंदिया एवं चेव, नवरं जिब्भिदियफासिंदियाई पडुच्च भोगी ] ભાગી કહેવાય છે. હે ગૌતમ ! તે કારણે મેં એવું કહ્યું છે કે જીવા કામી પણ હોય છે, मने लोगी पशु होय. (नेरइयाणं भंते ! किं कामी, भोगी ?) डे लहन्त ! नार हैं। शुं अभी होय छे ! लोगी होय छे ? ( एवं चेव एवं जाव थणियकुमारा) હે ગૌતમ ! તેમના વિષયમાં પણ સામાન્ય વેાના જેવું જ કથન સમજવું સ્તનિતકુમાર सुधीना हेवाना विषयभां यशु मे उथन सभवं. (पुढविकाइयाणं पुच्छा) हे लहन्त ! पृथ्वीभयि । अभी छे, लोगी छे ? (पुढ विकाइया णो कामी, भोगी) हे गौतम! पृथ्वी अयि । अभी नथी, पशु तेयो लोगी छे. ( से केणणं जाव भोगी ? ) હે ભદન્ત ! આપ શા કારણે એવું કહેા છે કે પૃથ્વીકાયિકા કામી હાતા નથી પણ लोगी होय छे ? ( गोयमा ! फासिंदिय पडुच्च - से तेणद्वेणं जाव भोगी ) હે ગૌતમ ! પૃથ્વીકાયિકામાં સ્પર્શેન્દ્રિયને સદૂભાવ હોય છે. હે ગૌતમ! સ્પર્શેન્દ્રિયના સદ્ભાવની અપેક્ષાએ મેં એવું કહ્યું છે કે પૃથ્વીકાયિકા કામી નથી, પણ ભેગી છે. ( एवं जाव ण सड़काइया, बेइंदिया एवं चेव, णवरं जिन्भिदियफासिंदिय
શ્રી ભગવતી સૂત્ર : પ