Book Title: Agam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 05 Sthanakvasi
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: A B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti

View full book text
Previous | Next

Page 762
________________ भगवतीसूत्रे ७४४ श्रुत्वा च दृष्ट्वा च बहुजना अन्योन्यस्य एवम् आख्याति, यावत्-अरूपयति, एवं खलु देवानुप्रियाः ! बहवो मनुष्याः यावत् उपपत्तारो भवन्ति ॥सू. ४॥ अन्यतीथिकवक्तव्यतां दूषयितुमुपंक्रमते-'बहुजणे णं' इत्यादि । टीका-'बहुजणे णं भंते ! अन्नमन्नस्स एवमाइक्खइ जाव-परूवेई' गौतमः ! पृच्छति-हे भदन्त ! बहुजनः खलु अन्योन्यं परस्परम् एवं वक्ष्यमाणप्रकारेण आख्याति-कथयति यावत्-भाषते, प्रज्ञापयति, प्ररूपयति-'एवं खलु बहवं मणुस्सा अन्नयरे उच्चावएमु संगामेसु' एवं खलु उक्तरीत्या बहवो मनुष्या अन्यतरेषु अन्यतमेषु उच्चावचेषु अनेकप्रकारकेषु संग्रामेषु युद्धेषु देवाणुभागं सुणित्ता य पासित्ता य बहुजणो अन्नमन्नस्स एवं आइक्खइ, जाव परूवेह, एवं स्खलु देवाणुप्पिया ! बहवे मणुस्सा जाव उववत्तारा भवंति) इसके बाद उस नागपौत्र वरुण की उस दिव्य देवर्द्धि को, दिव्य देवद्युति को, दिव्यदेवानुभाव को सुनकर एवं देखकर अनेक मनुष्यों ने आपस में ऐसा कहा यावत् प्ररूपणा की कि हे देवानुप्रिय ! अनेक मनुष्य यावत् देवलोकमें उत्पन्न होते हैं। टीकार्थ-सूत्रकारने इस सूत्रद्वारा अन्यतीर्थिकजनोंकी वक्तव्यताको दूषित किया है सो गौतमने उनसे ऐसा ही पूछा है कि 'बहुजणे णं भंते ! अन्नमन्नस्स एवमाइक्खइ जाव परूवेइ' हे भदन्त ! अनेक जन जो आपसमें एक दूसरेसे ऐसा कहते हैं यावत् भाषण करते हैं, प्रज्ञापना करते हैं, प्ररूपणा करते हैं कि 'एवं खलु बहवे मणुस्सा दिव्व देवज्जुई, दिव्यं देवाणुभागं सुणित्ता य पासित्ता य बहुजणो अन्न मन्नस्स एवं आइक्खइ जाव परूवेइ, एवं खलु देवाणुप्पिया ! बहवे मणुस्सा जाव उववत्तारो भवति) त्या२६ ते नागपौत्र १२नी हि वद्धिने, हिव्य દેવઘુતિને, અને દિવ્ય દેવપ્રભાવને સાંભળીને અને જેઈને અનેક માણસો એક બીજાને આ પ્રમાણે કહેવા લાગ્યા, અને પ્રરૂપણ કરવા લાગ્યા કે “હે દેવાનુપ્રિયે ! અનેક મનુષ્ય પ્રત્યાખ્યાનાદિ દ્વારા દેવલેકમાં ઉત્પન્ન થાય છે. માત્ર યુદ્ધમાં મરવાથી જ કેઈ દેવગતિમાં ઉત્પન્ન થતું નથી.' ટીકાથ– સૂત્રકારે આ સૂત્રધારા અન્ય તીર્થિકોની માન્યતાનું ખંડન કર્યું છેगौतम स्वामी महावीर प्रभुने सेवा प्रश्न पूछे छे ?- (बहजणेण भते! अन्नमन्नस्स एवमाइक्खइ जाव परूवेइ) मन्त! घl at मे भी सा પ્રમાણે કહે છે, વિશેષરૂપે પ્રતિપાદન કરે છે, પ્રજ્ઞાપના કરે છે અને પ્રરૂપણ કરે છે કે શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૫

Loading...

Page Navigation
1 ... 760 761 762 763 764 765 766 767 768 769 770 771 772 773 774 775 776 777 778 779 780 781 782 783 784 785 786 787 788 789 790 791 792 793 794 795 796 797 798 799 800 801 802 803 804 805 806 807 808 809 810 811 812 813 814 815 816 817 818 819 820 821 822 823 824 825 826 827 828 829 830 831 832 833 834 835 836 837 838 839 840 841 842 843 844 845 846 847 848 849 850 851 852 853 854 855 856 857 858 859 860 861 862 863 864 865 866