Book Title: Agam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 05 Sthanakvasi
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: A B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti

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Page 786
________________ - ७६८ भगवतीसूत्रे 'जाइं णं भंते ! मम पियवालवयंसस्स वरुणस्स णागणतुयस्स सीलाई, वयाई, गुणाई, वेरमणाई, पञ्चक्खाण-पोसहोववासाई' हे भदन्त ! यानि खलु मम प्रियबालवयस्यस्यम्बालमित्रस्य वरुणस्य नागनप्तकस्य शीलानि फलानपेक्षशुभक्रियामवृत्तिरूपाणि, व्रतानि स्थूलपाणातिपाविरमणाधणुव्रतानि, गुणाः उत्तरगुणाः, विरमणानिरागद्वेषनिवृत्तिरूपाणि, प्रत्याख्यान-पोषधोपवासाः सन्ति 'ताई णं ममं पि भवंतु त्ति कटु सन्नाहपढें मुयइ' तानि खलु शीलादीनि ममापि भवन्तु इति कृत्वा सन्नाहपढें मुञ्चति, 'मुइत्ता सल्लुद्धरणं करेइ' मुक्त्वा सन्नाहपट्ट परित्यज्य शल्योद्धरणं शल्यनिष्काशनं करोति, 'सल्लुद्धरणं करेता आणुपुवीए कालगए' शल्योद्धरणं कृत्वा आनुपूर्व्या अनुक्रमेण की ओर कर लिया तथा पर्यङ्कासन लगाकर दोनों हाथोंको जोडकर उसने उस कृत अंजलि को मस्तक पर इधरसे उधर घुमाकर इस प्रकारके पाठका उच्चारण किया 'जइ णं भंते ! मम पियबालवयंसस्स वरुणस्स णागणत्तुयस्स' सीलाई, वयाई, गुणाई वेरमणाई पञ्चक्खाणपोसहोववासाइं, हे भदन्त ! मेरे प्रिय बालसखावरुण नागपौत्रके जो फलानपेक्ष शुभक्रिया प्रवृत्तिरूप शील, स्थूलपाणातिपात विरमण आदिरूप अणुव्रत, उत्तरगुणरूप गुण, रागद्वेषनिवृत्तिरूप विरमण, प्रत्याख्यानपोषधोपवास हैं 'ताई णं ममं पि भवंतु' वे सब मुझे भी हों त्तिक? सन्नाहपट्ट मुयइ' ऐसा कहकर उसने अपने शरीरपर धारण किये हुए कवचको दूर कर दिया 'मुइत्ता सल्लुद्धरणं करेइ' कवचको शरीरसे उतार कर फिर उसने शल्यको दूर किया 'सल्लुद्धरणं करेत्ता સંથારાને આસને બેસીને, પૂર્વ દિશા તરફ મુખ કરીને, અને પર્યકાસન વાળીને બન્ને હાથ જોડીને મસ્તક પર ત્રણવાર તેમને ઘુમાવીને, તેમણે આ પ્રકારના પાઠનું ઉચ્ચારણ प्रयु"-- जइ ‘णं भंते ! मम पियबालबय सस्स वरुणस्स णागणतुयस्स सीलाई, वयाई, गुणाई, वेरमगाई, पच्चकखागपोसहोववासाई' के महन्त ! भार (प्रय બાળસખા, નાગપત્ર વરુણનું જે ફલાપેક્ષ (ફળની અપેક્ષા વિનાનું) શુભ ક્રિયા પ્રવૃત્તિરૂપ શીલ છે, રપૂલ પ્રાણાતિપાત વિરમણ આદિરૂપ જે અણુવ્રત છે, ઉત્તરગુણરૂપ જે ગુણ છે, रागद्वेष निवृत्ति३५ जे पिरमाणु छ, भने प्रत्याभ्यान-पोषधोपवास छ, 'ताइ णं मम पि भवतु' ते समस्त Aail भा२२ ६३२॥ ५४] अ था. "त्ति कट्ट सन्नाहपह Tags આમ કહીને તેણે પોતાના શરીર ઉપર ધારણ કરેલું બખતર ઉતારી નાખ્યું. 'महत्ता सल्लुधरणं करेइ' ममतरने |ढी नाभीन तेथे शरीरमाथी मा३५ सपने શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૫

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