Book Title: Agam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 05 Sthanakvasi
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: A B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
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प्रमेयचन्द्रिकाटीका श.६ उ.१० सू.१ अन्यतीथिकमतनिरूपणम् २०५ उपदंसित्तए' सर्वलोकेऽपि च सर्वजीवानां न शक्नुयात् कोऽपि पुरुषः सुखं पा, तदेव पूर्वोक्तं सुखं दुःखं वा यावत्-उपदर्शयितुम् , यावत्करणात् 'कोलास्थिकमात्रमपि, निष्पावमात्रमपि, कलायमात्रमपि, माषमात्रमपि, मुद्गमात्रमपि, यूकामात्रमपि, लिक्षामात्रमपि, अभिनिवर्त्य' इति संग्राह्यम् । गौतमस्तत्र कारणं पृच्छति-से केणणं?' तत् केनार्थेन ? केन कारणेन हे भदन्त ! उक्तरीत्या मोच्यते? भगवानाह-'गोयमा ! अयं णं जंबुद्दीवे दीवे, जाव-विसेसाहिए परिक्खेवेणं पण्णत्ते' हे गौतम ! अयं खलु जम्बूद्वीपो द्वीपः यावत्-परिक्षेपेण परिधिना विशेषाधिकः प्रज्ञप्तः, यावत्करणात् 'सव्वदीवसमुहाणं सन्चन्मणो चक्किया' समस्तलोक में भी सब जीवों के कोइ सुख अथवा दुःख को बाहर निकाल करके दिखलाने के लिये समर्थ नहीं है। यहां यावत् शन्द से 'कोलास्थिकमात्रमपि, निष्पावमात्रमपि, कलायमात्रमपि, माषमात्रमपि, मुद्गमात्रमपि, यूकामात्रमपि, लिक्षामाश्रमपि अभिनिर्वत्य' इस पूर्वोक्त पाठ का संग्रह हुआ है। अब गौतम इस विषय में कारण जानने की इच्छा से प्रभु से पूछते हैं कि 'से केणटेणं' हे भदन्त ! ऐसा आप जो कहते हैं सो इसमें क्या हेतु है-इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं कि-गोयमा' हे गौतम ! 'अयं गं जंबुद्दीवे दीवे जाव विसेसाहिए परिक्खेवेणं पण्णत्ता' यह जो जम्बूदीप नाम का द्वीप है कि जो परिधि से विशेषाधिक कहा गया है -अर्थात् जिसकी परिधि कुछ विशेषाधिक है ऐसे पीछे आये हुए पाठ से इस परिधि का प्रमाण व्यक्त किया जा चुका है-इसी पाठ को स्पष्ट समझने के लिये यहाँ यावत् पद से 'सव्वदीवसमुदाणं सव्व उवदंसित्तए णो चक्किया' समस्त साना समस्त वान सुप अथवा हमने એરના ઠળિયા આદિના જેટલું પણ બહાર કાઢીને બતાવવાને કોઈ સમર્થ નથી. અહીં जाव (यावत्) पयो कोलस्थिकमात्रमपि, निष्पावमात्रमपि, कलायमात्रमपि, मात्रमात्रमपि, मुद्गमात्रमपि युकामात्रमपि, लिक्षामात्रमपि अभिनिर्वत्य' આ પૂર્વોક્ત સૂત્રપાઠ ગ્રહણ કરી છે.
गौतम स्वामीनी प्रश्न-से केणट्रेणं? महन्त ! मेधुं भा५ AR छ ? गौतम स्वामीन न rain मापता महावीर प्रभु छ- 'अयं गं 'जंबुद्दीचे दीये जाव पिसेसाहिए परिक्खेषेणं पण्णात्ता' या सूत्रमा 'जाव' પદથી જે સૂરપાઠ ગ્રહણ કરાય છે તે પૂર્વોકત તમસ્કાય પ્રકરણમાં આપવામાં આવેલ છે. આ સૂત્રપાઠ બૂદીપની વિશાળતા બતાવે છે. તે સૂવપાઠ નીચે પ્રમાણે છે
શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૫