Book Title: Agam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 05 Sthanakvasi
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: A B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
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प्रमेयचन्द्रिका टीका श.७ उ. ३ सू. ५ वेदनानिर्जरास्वरूपनिरूपणम्
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छाया - अथ नूनं भदन्त ! या वेदना सा निर्जरा, या निर्जरा सा वेदना ? नायमर्थः समर्थः । तत् केनार्थेन भदन्त ! एवमुच्यते- या वेदना नसा निर्जरा, या निर्जरा न सा वेदना ? गौतम ! कर्मवेदना, नो कर्मनिर्जरा, तत् तेनार्थेन गौतम ! यावत्-न सा वेदना । नैरयिकाणां भदन्त ! वेदनानिर्जरावक्तव्यता
'से गृणं भंते !' इत्यादि ।
सूत्रार्थ - ( से णूणं भंते ! जा वेयणा सा निज्जरा, जा निज्जर सा वेणा ) हे भदन्त ! क्या यह बात निश्चित है कि जो वेदना है वह निर्जरा है और जो निर्जरा है वह वेदना है ? (गोयमा) है। गौतम ! (णो इण समट्ठे) ग्रह अर्थ समर्थ नहीं है । ( से केणद्वेणं भते ! एव बुच्चइ, जा वेयणा न सा निज्जरा, जा निज्जरा न सा वेणा ) हे भदन्त ! ऐसा आप किस कारणसे कहते हैं कि जो वेदना है वह निर्जरा नहीं है और जो निर्जरा है, वह वेदना नहीं है ? (गोयमा) हे गौतम! ( कम्मवेयणा, णोकम्मनिज्जरा से तेणद्वेणं गोयमा ! जाव न सा वेयणा) वेदना कर्मरूप होती है ओर निर्जरा नोकर्मरूप होती है ! इसलिये हे गौतम ! यावत् वह वेदना नहीं है ऐसा मैंने कहा है । (नेरइयाणं भंते ! जा वेयणा सा निज्जरा, વેદના નિજરા વતવ્યતા—
'से शृणं भंते!' इत्याहि
सा
सूत्रार्थ - ( से णूणं भंते ! जा वेयणा सा निज्जरा, या निज्जरा वेणा ?) बेलहन्त! शुं मे वात तो निश्चित छेडे ने वेहना छे, न निराछे, અને જે નિરા છે એ જ વેદના છે ? એટલે કે શુ વેદના નિરારૂપ હાય છે અને निर्भरा बेहनाइय होय छे ? (गोयमा !) हे गौतम! ( णो इणट्ट समट्ठे ) तारी मान्यता साथी नथी. ( से केणणं भंते ! एवं बुच्चइ, जा वेयणा न सा निज्जरा जा निज्जरा न सा वेयणा ?) हे महन्त साथ शा भरणे भेतुं उही छ। ऐ वेदना निरा३य होती नथी भने निर्भरा बेहनाइय होती नथी ? (गोयमा !) हे गौतम! (कम्मवेयणा णो कम्मनिज्जरा-से तेणट्टेणं गोयमा ! जाव न सा वेयणा ) वेहना ४३य होय છે અને નિર્જરા નાક રૂપ હોય છે. હે ગૌતમ ! તે કારણે મેં એવું કહ્યુ છે કે વેદના નિરારૂપ હોતી નથી અને નિર્જરા વેદનારૂપ હોતી નથી.
શ્રી ભગવતી સૂત્ર : પ