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નમો અરિહંતાણં
નમો સિદ્ધાણં નમો આયરિયાણં નમો ઉવજઝાયાણં નમો લોએ સવ્વ સાહૂણે એસો પંચ નમુકકારો સવ પાવપ્પણાસણો મંગલાણં ચ સવ્વસિં પઢમં હવઈ મંગલ
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જિનાગમ પ્રકાશન યોજના પ. પૂ. આચાર્યશ્રી ઘાંસીલાલજી મહારાજ સાહેબ
કૃત વ્યાખ્યા સહિત
DVD No. 2 (Full Edition)
:: યોજનાના આયોજક ::
શ્રી ચંદ્ર પી. દોશી – પીએચ.ડી. website : www.jainagam.com
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YAK SUT
SUTRAM
AVASH
આવશ્યકસૂત્રમ્
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શ્રી આવશ્યક સૂત્રમ
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ચંદ્રકાંત પ્રભુદાસ દોશ
પ્રભુદાસ દેરી
બાદી શેરી માં ની વા, રાજકોટ, (યુ.રા.'
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जैनाचार्य - जैनधर्मदिवाकर - पूज्यश्री - घासीलालजी - महाराज - विरचितया मुनितोषण्याख्यया व्याख्यया समलङ्कृतं हिन्दीगुर्जर भाषानुवाद सहितम् ।
आवश्यकसूत्रम् । AVASHYAKASUTRAM
नियोजक :
संस्कृत - प्राकृतज्ञ - जैनागमनिष्णात - प्रियव्याख्यानि -
पण्डितमुनिश्री - कन्हैयालालजी महाराजः ।
प्रकाशक:
अ. भा. श्वे. स्था. जैनशास्त्रद्धारसमितिप्रमुखः श्रेष्ठि श्री शान्तिलाल - मङ्गलदासभाई - महोदयः मु. राजकोट (सौराष्ट्र )
द्वितीयं संस्करणम् - १०००
मूल्यम् - रू. ७–८–०
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: પ્રા પ્તિ સ્થા ન : શ્રી. અ. ભા. છે. સ્થાનકવાસી જે ન શાસ્ત્ર દ્ધા ૨ સમિતિ ગ્રીન લેજ પાસે, રાજકોટ.
બીજી આવૃત્તિ : પ્રત ૧૦૦૦ વીર સંવત : ૨૪૮૪ વિક્રમ સંવત : ૨૦૧૪ ઈસ્વી સન : ૧૯૫૮
મુદ્રક : અને મુદ્રણસ્થાન: જયંતિલાલ દેવચંદ મહેતા જ ય ભા ૨ ત પ્રેસ, ગ ૨ ડી આ 5 વા રે ડ શાક મારકીટ પાસે, રાજકેટ.
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प्राक्कथन
रोग से आक्रान्त मनुष्य के लिये जैसे औषध सेवन नितान्त आवश्यक है, उसी प्रकार भवरोग से संतप्त प्राणियों के लिये सामायिक आदि क्रियायें आवश्यक हैं । क्यों कि बिना इनके आत्मामें निर्मलता नहीं आ सकती, और अनिर्मल आत्मा कभी भी भवरोग से मुक्त नहीं हो सकता ।
ये सामायिक आदि मनुष्यों के लिये अवश्यकर्तव्य होने के कारण आवश्यक कहलाते हैं, और इनका ग्रथन इस आगममें किया गया है अतः यह आगम भी 'आवश्यक ' कहलाता है 1
इस आवश्यक सूत्र ' की परमोपयोगिता देखकर पूज्यश्री घासीलालजी म. सा. ने इस पर, संस्कृतमें विस्तृत प्रस्तावना सहित मुनितोषणी' नामक टीका लिखी है । यह टीका अत्यन्त सरल होने के कारण साधारण संस्कृतज्ञों के लिये भी सुबोध है । सर्वसाधारण के लाभार्थ इस टीकाका हिन्दी और गुजराती भाषा में अनुवाद भी किया गया है । इस लिये सभी वर्ग के जिज्ञासुओं के लिये यह उपादेय है ।
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इस आवश्यकसूत्र की प्रथम आवृत्तिका प्रकाशन श्री श्वे. स्था. जैन शास्त्रोद्धार समिति (राजकोट ) ने सन् १९५१ ई. में किया था । प्रथम आवृत्ति की सभी प्रतियाँ वितरित हो चुकी हैं, अतः इस सूत्र की यह द्वितीय आवृत्ति प्रकाशित की गयी है । आत्मार्थी जन इससे पूर्णतया लाभ उठावें यही हमारी आकाक्षा है |
निवेदक मगनलाल छगनलाल शेठ
मानद मंत्री,
श्री. अ. भा. श्वे. स्था. जैन शा. समिति राजकोट.
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એક અપીલ
આપ ગચ્છપતિ હા......કે સંઘપતિ હે. સાધુ મહાત્મા હૈ......કે શ્રાવક હા.
પરંતુ...
આ શુભકામાં મદદ કરવાની આપની ચાસ ફરજ છે. કારણ કે આપણી સમાજના ઉત્થાનના આવા ભગીરથ કા'માં આપને જેટલા વધુ સહકાર મળશે તેટલુ કાર્ય વ્હેલુ પૂર્ણ થશે.
ઘડી ઘડી આવા સતને ભેટો થવા દુ ભ છે.
૩૨ સૂત્રો જલ્દીથી તૈયાર કરાવી લેવાય તેની કાળજી રાખવાની છે. અને તેથીજ આપશ્રીને અપીલ કરવામાં આવી છે.
સમગ્ર સમાજનું કાર્ય થતું હોય ત્યાં સાંપ્રદાયકશ્રાદ કે પ્રાંતવાદ નજ હોવા જોઇએ.
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રૂા. ૧૦,૦૦૦ આપનાર આધ સુરીશ્રી,
સમિતિના પ્રમુખ દાનવીર શેઠશ્રી
છે ાં તિ લાલ મ ગ ળ સ
અ મ દ વા દ.
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શ્રી-વધમાન-શ્રમણ-સંઘના આચાર્યશ્રી પૂજ્ય આત્મારામજી મહારાજશ્રીએ
આ પે લ
સ — તિ ૫ ત્ર
ઉપરાંત પૂજ્ય શ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજ-રચિત
બીજા સૂની ટીકા માટે તેઓશ્રીના મંતવ્ય
તે મ જ
અન્ય મહાત્માઓ, મહાસતીજીએ, અદ્યતન-પદ્ધતિવાળા કોલેજના પ્રોફેસરે
તે મ જ
શાસ શ્રાવકેના અભિપ્રા.
ઠે. ગ્રીન લેજ પાસે છે.
ગરેડીયા કુવારેડ } રાજકોટ : સૌરાષ્ટ્ર
શ્રી અખિલ ભારત છે. સ્થા. જેન
શાસ્ત્રોદ્ધાર સમિતિ.
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(श्री दशवकालिकमूत्रका सम्मतिपत्र.)
॥ श्रीवीरगौतमाय नमः ॥
सम्मति-पत्रम्.
मए पंडियमुणि-हेमचंदेण य पंडिय-मूलचन्दवासवारापत्ता पंडिय-रयण-मुणि-घासीलालेण विरइया सक्कय-हिंदी-भाषाहिं जुत्ता सिरि-दसवेयालिय-नाम सुत्तस्स आयारमणिमंजूसा वित्ती अवलोइया, इमा मणोहरा अत्थि, एत्थ सदाणं अइसयजुत्तो अत्थो वण्णिओ विउजणाणं पाययजणाण य परमोवयारिया इमा वित्ती दीसह ! आयारविसए वित्तीकत्तारेण अइसयपुब्बं उल्लेहो कडो, तहा अहिंसाए सरूवं जे जहा-तहा न जाणंति तेसिं इमाए वित्तीए परमलाहो भविस्सइ, कत्तुणा पत्तेयविसयाणं फुडस्वेण वण्णणं कडं, तहा मुणिणो अरहत्ता इमाए वित्तीए अवलोयणाओ अइसयजुत्ता सिज्झइ ! सक्कयछाया सुत्तपथाणं पयच्छेओ य सुबोहदायगो अत्थि, पत्तेयजिण्णासुणो इमा वित्ती दहव्वा । अम्हाणं समाजे एरिसविज-मुणिरयणाणं सम्भावो समाजस्स अहोभग्गं अत्थि, किं ? उत्तविजमुणिरयणाणं कारणाओ जो अम्हाणं समाजो सुत्तप्पाओ, अम्हकेरं साहिच्चं च लुत्तप्पायं अत्थि तेसिं पुणोवि उदओ भविस्सह जस्स कारणाओ भवियप्पा मोक्खस्स जोग्गो भवित्ता पुणो निव्वाणं पाविहिइ अओहं आयारमणि-मंजूसाए कत्तुणो पुणो . पुणो धन्नवायं देमि-॥
वि. सं. १९९० फाल्गुनशुक्लत्रयोदशी मङ्गले (अलवर स्टेट) ।
उवज्झाय-जइण-मुणी,आयारामो
(पचनईओ)
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३
जैनागमवेत्ता जैनधर्मदिवाकर उपाध्याय श्री १००८ श्री आत्मारामजी महाराज तथा न्याय व्याकरण के ज्ञाता परम पण्डित मुनिश्री १००७ श्री हेमचंद्रजी महाराज, इन दोनों महात्माओंका दिया हुआ श्री उपासकदशाङ्ग सूत्रका प्रमाण पत्र निम्न प्रकार हैसम्मइवत्तं
सिरि-वीरनिव्वाण-संवच्छर २४५८ आसोई ( पुण्णमासी) १५ सुकवारी लुडियाणाओ |
मए मुणिहेमचंदेण य पंडियरयणमुणिसिरि- घासीलालविणिम्मिया सिरिउवा - सगमुत्तस्स अगारधम्मसंजीवणीनामिया वित्ती पंडियमूलचन्दवासाओ अज्जोवंतं सुया, समीईणं, इयं वित्ती जहाणामं तहा गुणेवि धारेड, सच्चं, अगाराणं तु इमा जीवण (संजमजीवण) दाई एव अस्थि । वित्तिकत्चुणा मूलसूत्तस्स भावो उज्जुसेलीओ फुडीओ, अहय उवासयस्स सामण्णविसेसधम्मो, णयसियत्रायत्राओ, कम्मपुरिसहवाओ, प्रमणोवासयस्स धम्मदत्ता य, इच्चाइविसया असि फुडरीइओ वणिया, जेण कणो पडिडाए सुदुरपयारेण परिचय होइ, तह इइहासदिडिओवि सिरिसमणस्स भगवओ महावीरस्स समए वट्टमाण-भर सम्स य कचुणा विसयपयारेण चित्तं चित्तितं पुणो सकयपाठीणं, वट्टमाणकार्य हिन्दीणामियाए भासाए भासीणं य परमोवयारो कडो, उमेण करुणो अरिहत्ता दीसर, कत्तुणो एयं कज्जं परमप्पसंसणिज्जमस्थि । पत्ते यजणस्स मज्झत्थभात्राओ अम्स सुत्तस्स अवलोयणमईत्र लाहपर्य, अविउ सावयस्स तु ( उ ) इमं सत्थं सव्वम्समेत्र अस्थि, अओ कत्तुणो अणेrकोडीसो धन्नवाओ अस्थि, जेहिं, अञ्चंत परिस्समेण जइणजणतोवरि असीमोवया कडो, अहय सावयस्स बारस नियमा उ पत्तेयजणम्स पढणिज्जा अस्थि, जेसिं पहावओ वा गहणाओं आया निव्वाणाहिगारी भवइ, तहा भवियन्वयात्राओ पुरिसक्कार परकमवाओ य अवस्समेत्र दंसणिज्जो, किंबहुणा इमीसे वित्तीए पत्तेयविसयस्स फुडसदेहिं वण्णणं कथं, जइ अन्नोत्रि एवं अम्हाणं पसृत्तप्पाए समाजे विज्जं भवेज्जा तया नाणस्स चरित्तस्स तहा संघस्स य खिष्पं उदयो भविस्सइ, एवं हं मन्ने ॥
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भवईओउवज्झाय - जइणमुणि- आयाराम, - पंचनईओ,
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सम्मतिपत्र
(भाषान्तर)
श्री वीर निर्वाण सं० २४५८ आसोज
शुक्ला (पूर्णिमा) १५ शुक्रवार लुधियाना मैंने और पंडितमुनि हेमजन्दजीने पंउितरत्नमुनिश्री घासीलालजीकी रची हुई उपासकदशांग सूत्रकी गृहस्थधर्मसंजीवनी नामक टीका पंडित मूलचन्द्रजी व्याससे आद्योपान्त सुनी है । यह वृत्ति यथानाम तथागुणवाली-अच्छी बनी-है। सच यह गृहस्थोंके तो जीवनदात्रीसंयमरूप जीवनको देनेवाली-ही है। टीकाकारने मूलसूत्र के भावको सरल रीतिसे वर्णन किया है, तथा श्रावकका सामान्य धर्म क्या है ?
और विशेष धर्म क्या है ? इसका खुलासा इस टीकामें अच्छे ढंगसे बतलाया है। स्याद्वादका स्वरूप कर्म-पुरुषार्थ-वाद और प्रावकको धर्मके अन्दर दृढ़ता किस प्रकार रखना, इत्यादि विषयोंका निरूपण इसमें भलीभाँति किया है। इससे टीकाकारकी प्रतिभा खूब झलकती है । ऐतिहासिक दृष्टिसे श्रमण भगवान् महावीरके समय जैनधर्म किस जाहोजलाली पर था? और वर्तमान समय जैन धर्म किस स्थितिमें पहुंचा है ? इस विषयका तो ठीक चित्र ही चित्रित कर दिया है ! फिर संस्कृत जाननेवालोंको तथा हिन्दीभाषाके जाननेवालोंको भी पुरा लाभ होगा, क्योंकि टीका संस्कृत है उसकी सरल हिन्दी करदी गई है । इसके पढनेसे कर्ताकी योग्यताका पता लगता है कि वृत्तिकारने समझानेका कैसा अच्छा प्रयत्न किया है। टीकाकारका यह कार्य परम प्रशंसनीय है। इस सूत्रको भध्यस्थ भावसे पढने वालोंको परम लाभकी प्राप्ति होगी। क्या कहें श्रावकों (गृहस्थों) का - तो यह सूत्र सर्वस्व ही है, अतः टीकाकारको कोटिशः धन्यवाद दिया जाता है, जिन्होंने अत्यन्त परिश्रमसे जैन जनताके ऊपर असीम उपकार किया है। इसमें श्रावकके बारह नियम प्रत्येक पुरुषके पढने योग्य हैं, जिनके प्रभावसे अथवा यथायोग्य ग्रहण करनेसे आत्मा मोक्षका अधिकारी होता है। तथा भवितव्यतावाद और पुरुषकार
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पराक्रमवाद हरएकको अवश्य देखना चाहिये। कहांतक कहें इस टीकामें प्रत्येक विषय सम्यक प्रकारसे बताये गये हैं। हमारी सुप्तप्राय (सोई हुईसी) समाजमें अगर आप जैसे योग्य विद्वान् फिर भी कोई होंगे तो ज्ञान चारित्र तथा श्रीसंघका शीघ्र उदय होगा, ऐसा मानता हूँ
आपका उपाध्याय जैनमुनि आत्माराम पंजाबी.
इसी प्रकार लाहोरमें विराजते हुए पण्डितवर्य विद्वान् मुनिश्री १००८ श्री भागचन्दजी महाराज तथा पं. मुनिश्री त्रिलोकचन्दजी महाराजके दिये हुए, श्री उपाशकदशाङ्ग सूत्रके प्रमाणपत्रका हिन्दी सारांश निम्न प्रकार है
श्री श्री स्वामी घासीलालजी महाराज कृत श्री उपासकदशाङ्ग सूत्रकी संस्कृत टीका व भाषाका अवलोकन किया, यह टीका अतिरमणीय व मनोरञ्जक है, इसे आपने बड़े परिश्रम व पुरुषार्थसे तैयार किया है सो आप धन्यवादके पात्र हैं। आप जैसे व्यक्तियोकी समाजमें पूर्ण आवश्यकता है। आपकी इस लेग्वनीस समाजके विद्वान् साधुवर्ग पढकर पूर्ण लाभ उठावेंगे, टीकाके पढनेसे हमको अत्यानन्द हुवा, और मनमें ऐसे विनार उत्पन्न हुए कि हमारी समाजमें भी ऐसे २ सुयोग्य रत्न उत्पन्न होने लगे-यह एक हमारे लिये बड़े गौरवकी बात है।
वि. सं. १०८० मा. आश्विन कृष्णा १३ वार भौम लाहोर.
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श्री ज्ञाताधर्मकथाङ्ग भूत्र की 'अनगार धर्माऽमृतवर्षिणी' टीका पर जैनदिवाकर साहित्यरत्न जैनागमरत्नाकर परमपूज्य श्रद्धेय जैनाचार्य श्री आत्मारामजी महाराजका सम्मतिपत्र
लुधियाना, ता. ४-८-५१. मैंने आचार्यश्री घासीलालजी म. द्वारा निर्मित 'अनगार-धर्माऽमृत-वर्षिणी' टीका वाले श्री ज्ञाताधर्मकथाङ्ग सूत्रका मुनि श्री रत्नचन्द्रजीसे आद्योपान्त श्रवण किया । ___ यह निःसन्देह कहना पड़ता है कि यह टीका आचार्यश्री घासीलालजी
म. ने बड़े परिश्रम से लिखी है। इसमें प्रत्येक शब्दका प्रामाणिक अर्थ • और कठिन स्थलों पर सार-पूर्ण विवेचन आदि कई एक विशेषतायें हैं । मूल स्थलोंको सरल बनाने में काफी प्रयत्न किया गया है, इससे साधारण तथा असाधारण सभी संस्कृतज्ञ पाठकों को लाभ होगा ऐसा मेरा विचार है। __ मैं स्वाध्यायप्रेमी सज्जनों से यह आशा करूँगा कि वे वृत्तिकारके परिश्रम को सफल बनाकर शास्त्रमें दीगई अनमोल शिक्षायों से अपने जीवनको शिक्षित करते हुए परमसाध्य मोक्षको प्राप्त करेंगे । श्रीमान्जी जयवीर
आपकी सेवामें पोष्ट द्वारा पुस्तक भेज रहे हैं और इसपर आचार्यश्रीजी की जो सम्मति है वह इस पत्रके साथ भेज रहे हैं पहुचने पर समाचार देवें ।
श्री आचार्यश्री आत्मारामजी म. ठाने ६ सुख शान्तिसे विराजते हैं। पूज्य श्री घासीलालजी म. सा. ठाने ४ को हमारी ओरसे वन्दना अर्जकर सुखशाता पूछे ।
पूज्य श्री घासीलालजी म.जी का लिखा हुआ (विपाकसूत्र) महाराजश्रीजी देखना चाहते हैं इसलिये १ काँपी आप भेजने की कृपा करें; फिर आपको वापिस भेज देवेंगे। आपके पास नहीं हो तो जहां से मिले वहांसे १ काँपी जरूर भिजवाने का कष्ट करें, उत्तर जल्द देनेकी कृपा करें। योग्य सेवा लिखते रहें । लुधियाना ता. ४-८-५१
निवेदक प्यारेलाल जैन
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जैनागमवारिधि - जैनधर्मदिवाकर - उपाध्याय - पण्डित - मुनि श्री आत्मारामजी महाराज ( पंजाब ) का आचाराङ्गसूत्र की आचारचिन्तामणि टीका पर सम्मति - पत्र |
मैंने पूज्य आचार्यवर्य श्रीघासीलालजी (महाराज) की बनाई हुई श्रीमद् आचाराङ्गसूत्र के प्रथम अध्ययन की आचारचिन्तामणि टीका सम्पूर्ण उपयोगपूर्वक सुनी।
यह टीका - न्याय सिद्धान्त से युक्त, व्याकरण के नियम से निबद्ध है । तथा इसमें प्रसंङ्ग २ पर क्रम से अन्य सिद्धान्त का संग्रह भी उचित रूप से मालूम होता है ।
टीकाकारने अन्य सभी विषय सम्यक् प्रकार से स्पष्ट किये हैं, तथा प्रौढ विषयों का विशेषरूप से संस्कृत भाषा में स्पष्टतापूर्वक प्रतिपादन अधिक मनोरंजक है, एतदर्थ आचार्य महोदय धन्यवाद के पात्र हैं ।
मैं आशा करता हूँ कि जिज्ञासु महोदय इसका भलीभाँति पठन द्वारा जैनागम - सिद्धान्तरूप अमृत पी पी कर मन को हर्षित करेंगे, और इसके मनन से दक्ष जन चार अनुयोगों का स्वरूपज्ञान पावेंगे । तथा आचार्यवर्य इसी प्रकार दूसरे भी जैनागमों के विशद विवेचन द्वारा श्वेताम्बर - स्थानकवासी समाज पर महान उपकार कर यशस्वी बनेंगे ।
}
वि.सं. २००२ मृगसर सुदि १
जैन मुनि - उपाध्याय आत्माराम लुधियाना (पंजाब) शुभमस्तु ॥
-::
बीकानेरवाळा समाजभूषण शास्त्रज्ञ भेरुदानजी शेठिआनो अभिप्राय
आप जो शास्त्रका कार्य कर रहे हैं यह बडा उपकारका कार्य है । इससे जैनजनता को काफी लाभ पहुँचेगा.
( ता. २८ - ३ - ५६ ना पत्रमांथी)
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॥ श्रीः॥ जैनागमवारिधि- जैनधर्मदिवाकर-जैनाचार्य-पूज्य-श्री आत्मारामजीमहाराजनां पश्चनद-(पंजाब)स्थानामनुत्तरोपपातिकसूत्राणा
मर्थबोधिनीनामकटीकायामिदम्
सम्मतिपत्रम्. आचार्यवयः श्री घासीलालमुनिभिः सङ्कलिता अनुत्तरोपपातिकमूत्राणामर्थबोधिनीनाम्नी संस्कृतवृत्तिरुपयोगपूर्वकं सकलाऽपि स्वशिष्यमुखेनाऽश्रावि मया, इयं हि वृत्तिर्मुनिवरस्य वैदुष्यं प्रकटयति । श्रीमद्भिर्मुनिभिः सूत्राणामर्थान् स्पष्टयितुं यः प्रयत्नो व्यधायि तदर्थमनेकशो धन्यवादानहन्ति ते । यथा चेयं वृत्तिः सरला सुबोधिनी च तथा सारवत्यपि । अस्याः स्वाध्यायेन निर्वाणपदममीप्सुभिनिर्वाणपदमनुसरद्भिर्ज्ञान-दर्शन-चारित्रेषु प्रयतमानैमुनिभिः श्रावकैश्च ज्ञानदर्शन-चारित्राणि सम्यक् सम्प्राप्याऽन्येऽप्यास्मानस्तत्र प्रवर्तयिष्यन्ते । ___ आशासे श्रीमदाशुकविर्मुनिवरो गीर्वाणवाणीजुषां विदुषां मनस्तोषाय जैनागममूत्राणां सारावबोधाय च अन्येषामपि जैनागमानामित्थं सरलाः मुस्पष्टाश्च वृत्तीविधाय तांस्तान् सूत्रग्रन्थान् देवगिरा सुस्पष्टयिष्यति ।
अन्ते च "मुनिवरस्य परिश्रमं सफलयितुं सरलां सुबोधिनी चेमां भूत्रवृत्ति स्वाध्यायेन सनाथयिष्यन्त्यवश्यं सुयोग्या हसनिभाः पाठकाः ।" इत्याशास्तेविक्रमाब्द २००२ ॥ श्रावणकृष्णा पतिपदा
उपाध्याय आत्मारामो जैनमुनिः । लुधियाना. ऐसेही:
मध्यभारत सैलाना-निवासी श्रीमान् रतनलालजी डोसी श्रमणोपासक जैन लिखते हैं कि :
श्रीमान की की हुई टीकावाला उपासकदशांग सेवक के दृष्टिगत हुवा, सेवक अभी उसका मनन कर रहा है यह ग्रन्थ सर्वांगसुन्दर एवम् उच्चकोटि का उपकारक है।
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निरयावलिकासूत्रका सम्मतिपत्र.
आगमवारिधिं सर्वतन्त्रस्त्रतन्त्र - जैनाचार्य - पूज्यश्री आत्मारामजी महाराजकी तरफ का आया हुवा सम्मतिपत्र
लुधियाना. ता. ११ नवम्बर ४८
श्रीयुत गुलाबचन्दजी पानाचंदजी । सादर जयजिनेन्द्र ॥
पत्र आपका मिला ! निरयावलिका विषय पूज्यश्रीजीका स्वास्थ्य ठीक न होने से उनके शिष्य पं. श्री हेमचन्द्रजी महाराजने सम्मति पत्र लिख दिया है आपको भेज रहे हैं ! कृपया एक कोपी निरयावलिका की और भेज दीजिये और कोई योग्य सेवा कार्य लिखते रहें ? !
भवदीय. गुजरमल- बलवंतराय जैन
॥ सम्मतिः ॥
(लेखक जैनमुनि पं. श्री हेमचन्द्रजी महाराज) सुन्दरबोधिनीटीकया समलङ्कृतं हिन्दी - गुर्जर भाषानुवादसहितं च श्रीनिरयावलिकासूत्रं मेधाविनामल्पमेधसां चोपकारकं भविष्यतीति सुदृढं मेऽभिमतम्, संस्कृतटीकेयं सरला सुबोधा सुललिता चात एव अन्वर्थनाम्नी चाप्यस्ति । सुविशदत्वात् सुगमत्वात् प्रत्येकदुर्बोधपदव्याख्यायुतत्वाच्च टीकेषा संस्कृतसाधारणज्ञानवतामप्युपयोगिनी भाविनीत्यभिप्रेमि । हिन्दी - गुर्जर भाषानुवादावपि एतद्भाषाविज्ञानां महीयसे लाभाय भवेतामिति सम्यक् संभावयामि ।
जैनाचार्य - जैनधर्मदिवाकर पूज्यश्री घासीलालजी महाराजानां परि श्रमोऽयं प्रशंसनीयो धन्यवादाहश्च ते मुनिसत्तमाः । एवमेव श्रीसमीर मल्लजी - श्री कन्हैयालालजी मुनिवरेण्ययोर्नियोजनकार्यमपि श्लाध्यं, तावपि च मुनिवरौ धन्यवादाह स्तः ।
सुन्दर प्रस्तावनाविषयानुक्रमादिना समलङ्कृते सूत्ररत्नेऽस्मिन् यदि शब्दकोषोऽपि दत्तः स्यात्तर्हि वरतरं स्यात् । यतोऽस्यावश्यकतां सवऽप्यवेषकविद्वांसोऽनुभवन्ति ।
पाठका : सूत्रस्यास्याध्ययनाध्यापनेन लेखकनियोजक महोदयानां परिश्रमं सफलयिष्यन्तीत्याशास्महे । इति ।
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श्री उपासकदशाङ्ग सूत्र परत्वे जैन समाजना अग्रगण्य जैनधर्मभूषण महान विद्वान संतोए तेमज विद्वान श्रावकोए सम्मतिओ समपी छे
तेमना नामो नीचे प्रमाणे छे. (१) लुधियाना- सम्बत् १९८९, आश्विन पूर्णिमा का पत्र, श्रुतज्ञान के
भंडार आगमरनाकर जैनधर्मदिवाकर श्री १००८ श्री उपाध्याय श्री आत्मारामजी महाराज, तथा न्यायव्याकरणवेना श्री १००७ तच्छिष्य
श्री मुनि हेमचन्दजी महाराज. (२) लाहौर-वि० सं० १९८९ आश्विन वदि १३ का पत्र, पण्डित रत्न श्री
१००८ श्री भागचन्दजी महाराज तथा तच्छिष्य पण्डित रत्न श्री १००७
श्री त्रिलोकचंदजी महाराज. (३) खिचन से ता. ९-११-३६ का पत्र, क्रियापात्र स्थविर श्री १००८
श्री भारतरत्र श्री समरथमलजी महाराज. (४) वालाचोर-ता. १४-११-३६ का पत्र, परम प्रसिद्ध भारतरत्न श्री
१००८ श्री शतावधानीजी श्री रतनचन्दजी महाराज. (५) बम्बई-ता. १६-११-३६ का पत्र, प्रसिद्ध कवीन्द्र श्री १००८ श्री
कवि नानचन्द्रजी महाराज. (६) आगरा-ता. १८-११-३६, जगत् वल्लभ श्री १००८ श्री जैन दिवाकर
श्री चौथमलजी महाराज, गुणवन्त गणीजी श्री १००७ श्री साहित्यप्रेमी
श्री प्यारचन्दजी महाराज. (७) हैद्राबाद (दक्षिण) ता. २५-११-३६ का पत्र, स्थिवरपदभूषित
भाग्यवान पुरुष श्री ताराचन्दजी महाराज तथा प्रसिद्ध वक्ता श्री १००७
श्री सोभागमलजी महाराज. (८) जयपुर-ता. २६-११-३६ का पत्र, संप्रदाय के गौरवर्धक शांत
स्वभावी श्री १००८ श्री पूज्य श्री खूबचन्दजी महाराज. (९) अम्बाला-ता. २९-११-३६ का पत्र, परम प्रतापी पंजाब केशरी श्री
१००८ श्री पूज्य श्री रामजी महाराज.
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(१०) सेलाना-ता. २९-११-३६ का पत्र, शास्त्रों के ज्ञाता श्रीमान्
रतनलालजी डोसी. खीचन-ता. ९-११-३६ का पत्र, पंडितरत्न न्यायतीर्थ सुश्रावक श्रीयुत् माधवलालजी.
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___ ता. २५-११-३६ सादर जय जिनेन्द्र ___आपका भेजा हुवा उपासक दशांग सूत्र तथा पत्र मिला यहां विराजित प्रवर्तक वयोवृद्ध श्री १००८ श्री ताराचंदजी महाराज पण्डित श्री किशनलालजी महाराज आदि ठाणा १४ शुग्व शांती में विराजमान हैं
आपके वहां विराजित जैनशास्त्राचार्य पूज्यपाद श्री १००८ श्री घासीलालजी महाराज आदि ठाणा नव से हमारी बन्दना अर्ज कर सुख शांति पूछे आपने उपासकदशांग सूत्र के विषय में यहां विराजित मुनिवरों की सम्मती मंगाई उसके विषय में वक्ता श्री सोभागमलजी महाराज ने फरमाया है कि वर्तमान में स्थानकवासी समाज में अनेकानेक विद्वान मुनि महाराज मौजूद हैं मगर जैनशास्त्र की वृत्ति रचने का साहस जैसा घासीलालजी महाराज ने किया है वैसा अन्य ने किया हो ऐसा नजर नहीं आता दमरा यह शास्त्र अत्यन्त उपयोगी तो यों हैं संस्कृत प्राकृत हिन्दी और गुजराती भाषा होने से चारों भाषा वाले एक ही पुस्तक से लाभ उठा सकते हैं जैन समाज में ऐसे विद्वानों का गौरव बढे यही शुभ कामना है आशा है कि स्थानकवासी संघ विद्वानों की कदर करना सीखेगा। योग्य लिखें शेष शुभ
भवदीय
जमनालाल रामलाल कीमती आगरा से:
श्री जैनदिवाकर प्रसिद्धवक्ता जगढवल्लभ मुनि श्री चोथमलजी महाराज व पंडितरत्न सुव्याख्यानी गणीजी श्री प्यारचन्द जी महारज ने इस पुस्तक को अतीव पसन्द की है।
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श्रीमान न्यायतीर्थ पण्डित
माधवलालजी खीचन से लिखते हैं किःउन पंडितरत्न महाभाग्यवंत पुरुषों के सामने उनकी अगाधतत्त्वगवेषणा के विषय में मैं नगण्य क्या सम्मति दे सकता हूं।
परन्तु :
मेरे दो मित्रों ने जिन्होंने इसको कुछ पढा है बहुत सराहना की है वास्तव में ऐसे उत्तम व सबके समझाने योग्य ग्रन्थों की बहुत आवश्यकता है और इस समाज का तो एसा ग्रन्थ ही गौरव बढा सकते हैं-ये दोनों ग्रन्थ वास्तव में अनुपम है ऐसे ग्रन्थरत्नों के सुप्रकाश से यह समाज अमावास्या के घोर अन्धकार में दीपावली का अनुभव करती हूई महावीर के अमूल्य वचनों का पान करती हुई अपनी उन्नति में अग्रसर होती रहेगी।
ता. २९-११-३६
अम्बाला (पंजाब) पत्र आपका मिला श्री श्री १००८ पंजाब केशरी पूज्य श्री काशीरामजी महाराज की सेवा में पढ कर सुना दिया। आपकी भेजी हुई उपासकदशाङ्ग सूत्र तथा गृहिधर्मकल्पतरु की एक प्रति भी प्राप्त हुई। दोनों पुस्तकें अति उपयोगी तथा अत्यधिक परिश्रम से लिखी हुई हैं, ऐसे ग्रन्थरत्रों के प्रकाशित करवाये की बडी आवश्यकता है। इन पुस्तकों से जैन तथा अजैन सबका उपकार हो सकता है। आपका यह पुरुषार्थ सराहनीय है।
आपका
शशिभूषण शास्त्री अध्यापक जैन हाई स्कूल
अम्बाला शहर.
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१३
शान्त स्वभावी वैराग्य मूर्ति तस्त्र वारिधि, धैर्यवान श्री जैनाचार्य पूज्यवर श्री श्री १००८ श्री खूबचन्दजी महाराज साहेबने सूत्र श्री उपासक दशाङ्गजी को देखा । आपने फरमाया कि पण्डित मुनि घासीलालजी महाराज ने उपासक दशाङ्ग सूत्रकी टीका लिखने में बडा ही परिश्रम किया है । इस समय इस प्रकार प्रत्येक सूत्रोंकी संशोधक पूर्वक सरल टीका और शुद्ध हिन्दी अनुवाद होने से भगवान निग्रन्थों के प्रवचनों के अपूर्व रस का लाभ मिल शकता है.
बालाचोर से भारतरत्न शतावधानी पंडित मुनि श्री १००८ श्री रतनचन्दजी महाराज फरमाते हैं कि :
उत्तरोत्तर जोतां मूल मूत्रनी संस्कृतटीकाओ रचत्रामां टीकाकारे स्तुत्य प्रयास कर्यो छे, जे स्थानकवासी समाज माटे मगरूरी लेवा जेतुं छे, वली करांचीना श्री संघे सारा कागलमां अने सारा टाइपमां पुस्तक छपात्री प्रगट कयूँ छे जे एक प्रकारनी साहित्य सेवा बजावी छे.
बम्बई शहर में विराजमान कवि मुनि श्री नानचन्दजी महाराजने फरमाया है कि पुस्तक सुन्दर प्रयास अच्छा 1
खीचन से स्थविर क्रिया पात्र मुनि श्री रतनचन्दजी महाराज और पंडितरत्न मुनि सम्रथमलजी महाराज श्री फरमाते हैं कि - विद्वान महात्मा पुरुषोंका प्रयत्न सराहनीय है क्या जैनागम श्रीमद् उपासक दशाङ्ग सूत्र की टीका, एवं उसकी सरल सुबोधनी शुद्ध हिन्दी भाषा बडी ही सुन्दरता से लिखी है ।
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श्री वीतरागाय नमः ॥ श्री श्री श्री १००८ जैनधर्म दिवाकर जैनागमरत्नाकर श्रीमज्जैनाचार्य श्री पूज्य घासीलालजी महाराज चरणवन्दन स्वीकार हो ।
अपरश्च समाचार यह है कि आपके भेजे हुए ९ शास्त्र मास्टर सोभालालजी के द्वारा प्राप्त हुए, एतदर्थ धन्यवाद! आपश्रीजीने तो ऐसा कार्य किया है जो कि हजारों वर्षों से किसी भी स्थानकवासी जैनाचार्य ने नहीं किया । ___आपने स्थानकवासीजैनसमाज के ऊपर जो उपकार किया है वह कदापि भुलाया नहीं जा सकता और नहीं भुलाया जा सकेगा।
हम तीनो मुनि भगवान महावीर से अथवा शासनदेव से प्रार्थना करते हैं कि आपकी इस वज्रमयी लेखनी को उत्तरोत्तर शक्ति प्रदान करें ता कि आप जैन समाज के ऊपर और भी उपकार करते रहें और आप चिरञ्जीव हों।
हम आप के मुनि तीन उदेपुर.
मुनि सत्येन्द्रदेव-मुनि लखपतराय-मुनि पद्मसेन
इतवारी बाजार
नागपुर ता. १९-१२-५६ प्रखर विद्वान जैनाचार्य मुनिराज श्री घासीलालजी महाराजद्वारा जो आगमोद्धार हुआ और हो रहा है सचमुच महाराजश्री का यह स्तुत्य कार्य है। हमने प्रचारकजी के द्वारा नौ सूत्रों का सेट देखा और कइ मार्मिक स्थलोंको पढा, पढ़ कर विद्वान मुनिराजश्री की शुद्ध श्रद्धा तथा लेखनीके प्रति हार्दिक प्रसन्नता फूट पडी।।
वास्तव में मुनिराज श्री जैन समाज पर ही नहीं इतर समाज पर भी महा उपकार कर रहे हैं । ज्ञान किसी एक समाज का नहीं होता वह सभी समाज की अनमोल निधि है जिसे कठिन परिश्रम से तैयार कर जनता के सम्मुख रक्खा जा रहा है जिसका एक एक सेट हर शहर गांव और घर धर में होना आवश्यक है।
साहित्यरत्न मोहनमुनि सोहनमुनि जैन.
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શ્રી દશવૈકાલિક સૂત્રનું સમ્મતિ પત્ર.
શ્રમણ સંઘના મહાન આચાર્ય આગમ વારિધિ સર્વતન્ન સ્વતંત્ર જૈનાચાર્ય પૂજ્યશ્રી આત્મારામજી મહારાજે આપેલા સમ્મતિ પત્રને ગુજરાતી અનુવાદ.
મેં તથા પંડિત મુનિ હેમચંદ્રજીએ પંડિત મૂલચંદ વ્યાસ (નાર માવાહ વાહ્યા) દ્વારા મળેલી પંડિત રત્ન શ્રી. ઘાસીલાલજી મુનિ વિરચિત સંસ્કૃત અને હિન્દી ભાષા સહિત શ્રી દશવૈકાલિક સૂત્રની આચાર મણિમંજૂષા ટીકાનું અવકન કર્યું. આ ટીકા સુંદર બની છે. તેમાં પ્રત્યેક શબ્દનો અર્થ સારી રીતે વિશેષ ભાવ લઈને સમજાવવામાં આવેલ છે.
તેથી વિદ્વાનો અને સાધારણ બુદ્ધિવાળાઓ માટે પરમ ઉપકાર કરવાવાળી છે. ટીકાકારે મુનિના આચાર વિષયને સારે ઉલેખ કરેલ છે. જે આધુનિક મતાવલંબી અહિંસાના સ્વરૂપને નથી જાણતા, દયામાં પાપ સમજે છે તેમને માટે “અહિંસા શું વસ્તુ છે તેનું સારી રીતે પ્રતિપાદન કરેલ છે. વૃત્તિકારે સૂત્રના પ્રત્યેક વિષયને સારી રીતે સમજાવેલ છે. આ વૃત્તિના અવકનથી વૃત્તિકારની અતિશય ગ્યતા સિદ્ધ થાય છે.
આ વૃત્તિમાં એક બીજી વિશેષતા એ છે કે મૂલ સૂત્રની સંસ્કૃત છાયા હેવાથી સૂત્ર, સૂત્રનાં પદ અને પદયછેદ સુબોધ દાયક બનેલ છે.
પ્રત્યેક જીજ્ઞાસુએ આ ટીકાનું અવલોકન અવશ્ય કરવું જોઇએ. વધારે શું કહેવું. અમારી સમાજમાં આવા પ્રકારના વિદ્વાન મુનિ રત્નનું હોવું એ સમાજનું અહોભાગ્ય છે. આવા વિદ્વાન મુનિ રત્નના કારણે સુપ્તપ્રાય સુતેલે સમાજ અને લુપ્તપ્રાય એટલે લેપ પામેલું સાહિત્ય એ બંનેને ફરીથી ઉદય થશે. જેનાથી ભાવિતાત્મા મેક્ષ યોગ્ય બનશે અને નિર્વાણ પદને પામશે આ માટે અમે વૃત્તિકારને વારંવાર ધન્યવાદ આપીએ છીએ.
વિક્રમ સંવત ૧૯૦ ફલગુન શુકલ. | ઈઈ
તેરસ મંગળવાર (અલવર સ્ટેટ)
ઇવજઝાય જઈણ સુણી આયારામે પંચનઈઓ
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શ્રમણ સંઘના પ્રચાર મંત્રી પંજાબ કેશરી મહારાજ શ્રી પ્રેમચંદજી મહારાજ જેઓશ્રી રાજકેટમાં પધારેલા હતા ત્યારે તેના તરફથી શાસ્ત્રોને માટે મળેલ અભિપ્રાય.
શાદ્ધાર સમિતિ તરફથી પૂજ્યપાદ શાસ્ત્ર વારિધિ પંડિતરાજ સ્વામીશ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજ દ્વારા શાસ્ત્રોદ્ધારનું જે કાર્ય થઇ રહ્યું છે તે કાર્ય જેન સમાજ તેમાં ખાસ કરીને સ્થાનકવાસી જૈન સમાજને માટે મૂળભૂત મૌલિક સંસ્કૃતિની જડને મજબુત કરવાવાળું છે.
એટલા ખાતર આ કાર્ય અતિ પ્રશંસનીય છે માટે દરેક વ્યકિતએ તેમાં યથાશકિત ભેગ દેવાની ખાસ આવશ્યકતા છે અને તેથી એ ભગીરથ કાર્ય જલ્દીથી જલ્દી સંપૂર્ણપણે પાર પાડી શકાય અને જનતા શ્રુતજ્ઞાનનો લાભ મેળવી શકે.
દરીયાપુરી સંપ્રદાયના પૂજ્ય આચાર્ય શ્રી ઈશ્વરલાલજી મહારાજ સાહેબના
સૂત્રે સંબંધે વિચારે
નમામિ વીર ગિરી સાર ધીરે પૂજ્ય પાદ જ્ઞાન પ્રવરશ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજ તથા પંડિતશ્રી કનૈયાલાલજી મહારાજ આદિ થાણુ છની સેવામાં
અમદાવાદ શાહપુર ઉપાશ્રયથી મુનિ દયાનંદજીના ૧૦૮ પ્રણિપાત.
આપ સર્વે થાણુઓ સુખ સમાધિમાં હશે નિરંતર ધર્મધ્યાન ધર્મારાધનમાં લીન હશે.
સૂત્ર પ્રકાશન કાર્ય ત્વરીત થાય એવી ભાવના છે દશવૈકાલિક તથા આચારાંગ એક એક ભાગ અહીં છે ટીકા ખૂબ સુંદર, સરળ અને પંડિતજનેને સુપ્રિય થઈ પડે તેવી છે. સાથે સાથે ટકા વીનાના મુળ અને અર્થ સાથે પ્રકાશન થાય તે શ્રાવકગણ તેનો વિશેષ લાભ લઈ શકે અત્રે પૂજ્ય આચાર્ય ગુરુદેવને આંખે મોતીયે ઉતરાવ્યું છે અને સારું છે એજ. આસો સુદ ૧૦, મંગળવાર તા. ૨૫-૧૦-૫૫
પુનઃ પુનઃ શાતા ઈચ્છતે, દયા મુનિના પ્રણિપાત
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દરીયાપુરી સંપ્રદાયના પડિત રત્ન ભાઈચંદજી મહારાજના અભિપ્રાય
શ્રી
રાણપુર તા. ૧૯-૧૨-૧૯૫૫
પૂજ્યપાદ જ્ઞાનપ્રવર પંડિતરત્ન પૂજ્ય શ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજ આદિમુનિવરોની સેવામાં. આપ સર્વ સુખ સમાત્રીમાં હશે.
સૂત્ર પ્રકાશનનું કામ સુંદર થઇ રહ્યું છે તે જાણી અત્યંત આનંદ. આપના પ્રકાશીત થયેલાં કેટલાંક સત્ર જોયાં. સુદર અને સરલ સિદ્ધાંતના ન્યાયને પુષ્ટિ કરતી ટીકા પડિતરત્નને સુપ્રિય થઇ પડે તેવી છે. સૂત્ર પ્રકાશનનું કામ ત્વરિત પૂર્ણ થાય અને ભાવિ આત્માઅને આત્મકલ્યાણ કરવામાં સાધનભૂત થાય એજ અભ્યર્થના.
લી. પંડિતરત્ન બાળબ્રહ્મચારી પૂ. શ્રી ભાઇચંદ મહારાજની આજ્ઞાનુસાર શાન્તિમુનિના પાયવદન સ્વીકારશે.
તા. ૧૧-૫-૫૬
વીરમગામ
ગચ્છાધિપતિ પૂજ્ય મહારાજ શ્રી જ્ઞાનચંદ્રજી મહારાજના સંપ્રદાયના આત્માર્થી, ક્રિયાપાત્ર, પંડિતરત્ન, મુનિશ્રી સમરથમલજી મહારાજને અભિપ્રાય,
ખીચનથી આવેલ તા. ૧૧-૨-૫૬ના પત્રથી ઉપ્રિત.
પૂજય આચાર્ય ઘાસીલાલજી મહારાજના હસ્તક જે સૂત્રાનું લખાણ સુંદર અને સરળ ભાષામાં થાય છે. તે સાહિત્ય, પડિત મુનિશ્રી સમરથમલજી મહારાજ, સમય આછા મળવાને કારણે સંપૂર્ણ જોઇ શકયા નથી. છતાં જેટલું સાહિત્ય તૈયુ છે, તે બહુ જ સારૂં અને મનન સાથે લખાયેલુ છે. તે લખાણુ શાસ્ર આજ્ઞાને અનુરૂપ લાગે છે આ સાહિત્ય દરેક શ્રદ્ધાળુ જીવાને વાંચવા યેાગ્ય છે. આમાં સ્થાનકવાસી સમાજની શ્રદ્ધા, પ્રરુપણા અને ફરસણાની દઢતા અચાર્ય શ્રી અપૂર્વ પરિશ્રમ લઇ સમાજ ઉપર મહાન ઉપકાર કરે છે.
શાસ્રાનુકુળ છે.
લી. કીશનલાલ પૃથ્વીરાજ માલુ મુ.ખીચન.
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લીંબડી સંપ્રદાયના સદાનંદી મુનિશ્રી છોટાલાલજી
મહારાજના અભિપ્રાય
શ્રી વીતરાગદેવે-જ્ઞાનપ્રચારને તીર્થકર નામ ગાત્ર બાંધવાનું નિમિત્ત કહેલ છે. જ્ઞાન પ્રચાર કરનાર, કરવામાં સહાય કરનાર; અને તેને અનુમોદન આપનાર જ્ઞાનાવણિય કર્મને ક્ષય કરી-કેવળ જ્ઞાનને પ્રાપ્ત કરી પરમપદનાં અધિકારી બને છે. શાસ્ત્રજ્ઞ–પરમ શાન્ત, અને અપ્રમાદિ પૂજ્યશ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજ પોતે અવિશ્રાન્તપણે જ્ઞાનની ઉપાસના અને તેની પ્રભાવના અનેક વિકટ પ્રસંગમાં પણ કરી રહ્યા છે. તે માટે તેઓશ્રી અનેકશઃ ધન્યવાદના અધિકારી છે. વંદનિય છેતેમની જ્ઞાન પ્રભાવનાની ધગશ ઘણું પ્રમાદિઓને અનુકરણીય છે. જેમ પૂજ્યશ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજ પિતે જ્ઞાનપ્રચાર માટે અવિશ્રાન્ત પ્રયત્ન કરે છે. તેમજ શાસ્ત્રોદ્ધાર સમિતિના કાર્યવાહકો પણ એમાં સહાય કરીને જે પવિત્ર સેવા કરી રહેલ છે. તે પણ ખરેખર ધન્યવાદના પૂર્ણ અધિકારી છે.
એ સમિતિના કાર્યકરોને મારી એક સૂચના છે કે :
શાસ્ત્રોદ્ધારક પ્રવર પંડિત અપ્રમાદિ સંત ઘાસીલાલજી મહારાજ જે શાસ્ત્રોદ્ધારનું કામ કરી રહેલ છે. તેમાં સહાય કરવા માટે-પંડિત વિગેરેના માટે જે ખર્ચો થઈ રહેલ છે. તેને પહોંચી વળવા માટે સારું સરખું ફંડ જોઈએ. એના માટે મારી એ સૂચના છે કે:- શાસ્ત્રોદ્ધાર સમિતિના મુખ્ય કાર્યવાહકે,–જે બની શકે તે પ્રમુખ પોતે અને બીજા બે ત્રણ જણાએ ગુજરાત, સૌરાષ્ટ્ર અને કચ્છમાં પ્રવાસ કરી મેમ્બર બનાવે અને આર્થિક સહાય મેળવે.
જે કે અત્યારની પરિસ્થિતિ વિષમ છે. વ્યાપારીઓ, ધંધાદારીઓને પિતાના વ્યવહાર સાચવવા પણ મુશ્કેલ બન્યા છે. છતાં જે સંભાવિત ગૃહ પ્રવાસે નીકળે તે જરૂરી કાર્ય સફળ કરે એવી મને શ્રદ્ધા છે.
આર્થિક અનુકુળતા થવાથી શાસ્ત્રોદ્ધારનું કામ પણ વધુ સરલતાથી થઈ શકે. પૂજ્યશ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજ જ્યાં સુધી આ તરફ વિચરે છે ત્યાં સુધીમાં એમની જ્ઞાન કિતનો જેટલો લાભ લેવાય તેટલે લઈ લે. કદાચ સૌરાષ્ટ્રમાં વધુ વખત રહેવાથી તેમને હવે બહાર વિહરવાની ઈચ્છા થતી હોય તો શાન્તિભાઈ શેઠ જેવાએ વિનંતી કરી અમદાવાદ પધરાવવા. અને ત્યાં-અનુકુળતા મુજબ બે-ત્રણ વર્ષની સ્થિરતા કરાવીને તેમની પાસે શાસ્ત્રોદ્ધારનું કામ પૂર્ણ કરાવી લેવું જોઈએ.
થોડા વખતમાં જામજોધપુરમાં શાસ્ત્રોદ્ધાર કમીટી મળવાની છે. તે વખતે ઉપરની સૂચના વિચારાય તે ઠીક.
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ફરી શાસ્ત્રોદ્ધારક પૂજ્યશ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજને એમની આ સેવા અને પરમ કલ્યાણકારક પ્રવૃત્તિને માટે વારંવાર અભિનંદન છે, શાસનનાયક દેવ તેમના શરિરાદીને સશકત અને દીર્ઘાયુ રાખી સમાજ ધર્માંની વધુ ને વધુ સેવા કરી શકે. ૐ અસ્તુ.
ચાતુર્માસ સ્થળ. લીમડી
સાં. ૨૦૧૦ શ્રાવણુ વદ ૧૩. ગુરૂ.
}
શ્રી વર્ધમાન સંપ્રદાયના પૂજ્ય શ્રી પુનમચંદ્રજી મહારાજના અભિપ્રાય
તા. ૨૨-૪-૫૬ રવિવાર
મહાવીર જયંતિ
લિ. સદાનંદી જૈનમુનિ છે.ટાલાલજી
શાસ્ત્ર વિશારદ પૂજ્ય આચાર્ય મહારાજ શ્રી ધાસીલાલજી મહારાજશ્રીએ જૈન આગમા ઉપર જે સંસ્કૃત ટીકા વગેરે રચેલ છે. તે માટે તેઓશ્રી ધન્યવાદને પાત્ર છે. તેમણે આગમા ઉપરની સ્વતંત્ર ટીકા રચીને સ્થાનકવાસી જૈન સમાજનું ગૌરવ વધાર્યુ. છે. આગમા ઉપરની તેમની સ ંસ્કૃત ટીકા ભાષા અને ભાવની દૃષ્ટિએ ઘણીજ સુંદર છે. સ ંસ્કૃત રચના માધુ તેમજ અલંકાર વગેરે ગુણેાથી યુકત છે. વિદ્વાન એ તેમજ જૈન સમાજના આચાર્યાં, ઉપાધ્યાયે વગેરે એ શાસ્ત્રો ઉપર રચેલી આ સ ંસ્કૃત રચનાની કદર કરવી જોઈએ અને દરેક પ્રકારના સહકાર આપવા જોઇએ. આવા મહાન કાર્યમાં પડિતરત્ન પૂજ્ય શ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજ જે પ્રયત્ન કરી રહ્યા છે તે અલોકિક છે. તેમનું આગમ ઉપરની સંસ્કૃત ટીકા વગેરે રચવાનું ભગીરથ કાર્ય શીઘ્ર સફળ થાય એજ શુભેચ્છા સાથે.
અમદાવાદ
મુનિ પૂર્ણચંદ્રજી
}
ખભાત સ`પ્રદાયના મહાસતી શારદાબાઈ સ્વામીના અભિપ્રાય
લખતર તા. ૨૫-૪-૫૬
શ્રીમાન શેઠ શાંતીલાલભાઈ મંગળદાસભાઈ
પ્રમુખ સાહેબ અખિલ ભારત વે. સ્થા. જૈન શાસ્ત્રોદ્ધાર સમિતિ
સુા. અમદાવાદ
અમે અત્રે દેવગુરૂની કૃપાએ સુખરૂપ છીએ. વિ.માં આપની સમિતિ દ્વારા પૂજ્ય આચાર્ય મહારાજ શ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજ સાહેબ જે સૂત્રાનું કાર્ય કરે છે તે પૈકીનાં સૂત્રેામાંથી ઉપાસક દશાંગ સૂત્ર, આચારાંગ સૂત્ર, અનુત્તર પપાતિક સૂત્ર,
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દશવૈકાલિક સૂત્ર વિગેરે અત્રે જેમાં તે સૂત્રે સંસ્કૃત હિન્દી અને ગુજરાતી ભાષાએમાં હેવાને કારણે વિદ્વાન અને સામાન્ય જનેને ઘણુંજ લાભદાયિક છે. તે વાંચન ઘણું જ સુંદર અને મને રંજન છે. આ કાર્યમાં પૂજ્ય આચાર્યશ્રી જે અઘાત પુરુષાર્થે કાર્ય કરે છે તે માટે વારંવાર ધન્યવાદને પાત્ર છે. આ સત્રથી સમાજને ઘણું લાભનું કારણ છે.
હંસ સમાન બુદ્ધીવાળા આત્માઓ વપરના ભેદથી નિખાલસ ભાવનાએ અવલોકન કરશે તે આ સાહિત્ય સ્થાનકવાસી સમાજ માટે અપૂર્વ અને ગૌરવ લેવા જેવું છે. માટે દરેક ભવ્ય આત્માઓને સૂચન કરું છું કે આ સૂત્રે પિતાપિતાના ઘરમાં વસાવાની સુંદર તકને ચૂકશે નહિ. કારણ આવા શુદ્ધ પવિત્ર અને સ્વપરંપરા ને પુષ્ટીરૂપ સૂત્રે મળવાં બહુ મુશ્કેલ છે. આ કાર્યને આપશ્રી ત્થા સમિતિના અન્ય " કાર્યકરે જે શ્રમ લઈ રહ્યા છે તેમાં મહાન નિજેરાનું કારણ જવામાં આવે છે તે બદલ ધન્યવાદ. એજ
લી. શારદાબાઈ સ્વામી
ખંભાત સંપ્રદાય.
બરવાળા સંપ્રદાયના વિદુષી મહાસતીજી મેંઘીબાઈ સ્વામીને અભિપ્રાય
ધંધુકા તા. ૨૭-૧-૫૬ શ્રીમાન શેઠ શાન્તીલાલ મંગળદાસભાઈ પ્રમુખ અ૦ ભા . સ્થા. જૈનશાસ્ત્રોદ્ધાર સમિતિ મા. રાજકેટ.
અત્રે બિરાજતા ગુરુ ગુરુના ભંડાર મહાસતીજી વિદુષી મધીબાઈ સ્વામી તથા હીરાબાઈ સ્વામી આદિ ઠાણા બને સુખશાતામાં બિરાજે છે. આપને સૂચન છે કે અપ્રમત અવસ્થામાં રહી નિવૃત્તિ ભાવને મેળવી ધર્મધ્યાન કરશેજી એજ આશા છે.
વિશેષમાં અમને પૂજ્ય આચાર્ય મહારાજ શ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજના રચેલાં સૂત્રો ભાઈ પોપટ ધનજીભાઈ તરફથી ભેટ તરીકે મળેલાં તે સૂત્રે તમામ આઘોઉપાન વાંચ્યાં મનન કર્યા અને વિચાર્યા છે તે સૂત્ર સ્થાનકવાસી સમાજને અને વીતરાગ માર્ગની પૂબજ ઉન્મત્ત બનાવનાર છે. તેમાં આપણી શ્રદ્ધા એટલી ન્યાય રૂપથી ભરેલી છે તે આપણા સમાજ માટે ગૌરવ લેવા જેવું છે. હંસ સમાન
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આત્માઓ જ્ઞાન ઝરણાથી આત્મરૂપ વાડીને વિકસીત કરશે. ધન્ય છે આપને અને સમિતિના કાર્યકરને જે સમાજ ઉત્થાન માટે કેઈની પણ પરવા કર્યા વગર જ્ઞાનનું દાન ભવ્ય આત્માઓને આપવા નિમિત્તરૂપ થઈ રહ્યા છે. આવા સમર્થ વિદ્વાન પાસેથી સંપૂર્ણ કાર્ય પુરૂં કરાવશે તેવી આશા છે.
એજ લિ. બરવાળા સંપ્રદાયના વિદુષી
મહાસતીજી મોંઘીબાઈ સ્વામી ના ફરમાનથી લી. ડીદાસ ગણેસભાઈ-ધંધુકા
સ્થાનકવાસી જૈન સંઘના પ્રમુખ.
* અધતન પદ્ધતિને અ૫નાવનાર વડોદરા કલેજના એક વિદ્વાન
પ્રોફેસરને અભિપ્રાય. સ્થાનકવાસી સંપ્રદાયના મુનિશ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજ જેનશાસ્ત્રોના સંસ્કૃત ટીકાબદ્ધ, ગુજરાતીમાં અને હિન્દીમાં ભાષાંતરે કરવાના ઘણા વિકટ કાર્યમાં વ્યાપ્ત થયેલા છે. શાસ્ત્રો પૈકી જે શાસ્ત્ર પ્રસિદ્ધ થયાં છે તે હું જોઈ શક છું, મુનિશ્રી પિતે સંસ્કૃત, અર્ધમાગધી હિન્દી ભાષાઓના નિષ્ણાત છે, એ એમને ટુકે પરિચય કરતાં સહજ જણાઈ આવે છે. શાસ્ત્રોનું સંપાદન કરવામાં તેમને પિતાના, શિષ્યવર્ગને અને વિશેષમાં ત્રણ પંડિતેને સહકાર મળે છે, તે જોઈ મને આનંદ થયે. સ્થાનકવાસી સંપ્રદાયના અગ્રેસરેએ પંડિતેને સહકાર મેળવી આપી મુનિશ્રીના કાર્યને સરળ અને શિષ્ટ બનાવ્યું છે. સ્થાનકવાસી સમાજમાં વિદ્વતા ઘણી એ છી છે. તે દિગંબર, મૂર્તિપૂજક શ્વેતાંબર વગેરે જૈનદર્શનના પ્રતિનિધિઓના ઘણા સમયથી પરિચયમાં આવતાં હું વિરોધના ભય વગર, કહી શકું. પૂ. મહારાજને આ પ્રયાસ સ્થાનકવાસી સંપ્રદાયમાં પ્રથમ છે એવી મારી માન્યતા છે. સંસ્કૃત સ્પષ્ટીકરણ સારાં આપવામાં આવ્યાં છે. ભાષા શુદ્ધ છે એમ હું ચેકસ કહી શકું છું. ગુજરાતી ભાષાંતરે પણ શુદ્ધ અને સરળ થયેલાં છે. મને વિશ્વાસ છે કે મહારાજ શ્રીને આ સ્તુત્ય પ્રયાસને જૈનસમાજ ઉત્તેજન આપશે અને શાસ્ત્રોના ભાષાંતરને વાચનાલયમાં અને કુટુંબમાં વસાવી શકાય તે પ્રમાણે વ્યવસ્થા કરશે. પ્રતાપગંજ, વડોદરા
કામદાર કેશવલાલ હિમતરામ, તા. ૨૭–૨–૧૯૫૬
એમ. એ.
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મુંબઇની બે કલેજેના પ્રોફેસરેને અભિપ્રાય.
મુંબઈ તા. ૩૧-૩-૫૬ શ્રીમાન શેઠ શાંતીલાલ મંગળદાસ પ્રમુખ શ્રી અખિલ ભારત છે. સ્થા. જેને શ્રાદ્ધાર સમિતિ, રાજકેટ.
પૂજ્યાચાર્ય શ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજે તૈયાર કરેલા આચારાંગ, દશવૈકાલિક આવશ્યક, ઉપાસકદશાંગ વગેરે સૂત્રે અમે જોયા. આ સત્ર ઉપર સંસ્કૃતમાં ટીકા આપવામાં આવી છે અને સાથે સાથે હિન્દી અને ગુજરાતી ભાષાંતર પણ આપવામાં આવ્યાં છે, સંસ્કૃત ટીકા અને ગુજરાતી તથા હિન્દી ભાષાંતરે જોતાં આચાર્યશ્રીના
આ ત્રણે ભાષા પરના એકસરખા અસાધારણ પ્રભુત્વની સચોટ અને સુરેખ છાપ પડે • છે. આ સત્ર ગ્રંથોમાં પાને પાને પ્રગટ થતી આચાર્યશ્રીની અપ્રતિમ વિદ્વતા મુગ્ધ
કરી દે તેવી છે. ગુજરાતી તથા હિન્દીમાં થયેલા ભાષાંતરમાં ભાષાની શુદ્ધિ અને સરળતા ખેંધપાત્ર છે. એથી વિદ્વજન અને સાધારણ માણસ ઉભયને સંતોષ આપે એવી એમની લેખિનીની પ્રતીતિ થાય છે. ૩૨ સૂત્રોમાંથી હજુ ૧૩ સૂત્રે પ્રગટ થયાં છે. બીજાં ૭ સત્રે લખાઈને તૈયાર થઈ ગયાં છે. આ બધાં જ સૂત્રે જ્યારે એમને હાથે તૈયાર થઈને પ્રગટ થશે ત્યારે જૈન સૂત્ર-સાહિત્યમાં અમૂલ્ય સંપત્તિરૂપ ગણાશે એમાં સંશય નથી. આચાર્યશ્રી આ મહાન કાર્યને જેને સમાજને વિશેષત: સ્થાનકવાસી સમાજને સંપૂર્ણ સહકાર સાંપડી રહેશે એવી અમે આશા રાખીએ છીએ.
છે. રમણલાલ ચીમનલાલ શાહ
સેંટ ઝેવિયર્સ કોલેજ, મુંબઈ. છે. તારા રમણલાલ શાહ
સેટ્ટીયા કલેજ, મુંબઈ,
રાજકેટની ધર્મેન્દ્રસિંહજી કેલેજના પ્રોફેસર સાહેબને અભિપ્રાય.
જય મહાલ
જાગનાથ પ્લેટ
રાજકોટ, તા. ૧૮-૪-૫૬ પૂજ્યાચાર્ય પં. મુનિ શ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજ આજે જૈન સમાજ માટે એક એવા કાર્યમાં વ્યાપ્ત થએલા છે કે જે સમાજ માટે બહુ ઉપયેગી થઈ પડશે. મુનિશ્રીએ તૈયાર કરેલાં આચારાંગ, દશવૈકાલિક, શ્રી વિપાકત વિ. મેં જોયાં.
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આ સૂત્રે જતાં પહેલી જ નજરે મહારાજશ્રીને સંસ્કૃત, અર્ધમાગધી, હિન્દી તથા ગુજરાતી ભાષાઓ ઉપરને અસાધારણ કાબુ જણાઈ આવે છે. એક પણ ભાષા મહારાજશ્રીથી અજાણ નથી. આપણે જાણીએ છીએ કે એ સૂત્રે ઉચ્ચ અને પ્રથમ કેટિના છે. તેની વસ્તુ ગંભીર, વ્યાપક અને જીવનને તલસ્પર્શી છે. આટલા ગહન અને સર્વગ્રાહ્ય સૂત્રોનું ભાષાંતર પૂ. ઘાસીલાલજી મહારાજ જેવા ઉચ્ચ કેટિને મુનિરાજને હાથે થાય છે તે આપણા અહેભાગ્ય છે. યંત્રવાદ અને ભૌતિકવાદના આ જમાનામાં જ્યારે ધર્મભાવના ઓસરતી જાય છે એવે વખતે આવા તત્ત્વજ્ઞાન આધ્યાત્મિકતાથી ભરેલાં સૂત્રનું સરળ ભાષામાં ભાષાંતર દરેક જીજ્ઞાસુ, મુમુક્ષુ અને સાધકને માર્ગદર્શક થઈ પડે તેમ છે. જૈન અને જૈનેતર, વિદ્વાન અને સાધારણ માણસ, સાધુ અને શ્રાવક દરેકને સમજણ પડે તેવી સ્પષ્ટ, સરળ અને શુદ્ધ ભાષામાં સૂત્રો લખવામાં આવ્યા છે. મહારાજશ્રીને જ્યારે જોઈએ ત્યારે તેમના આ કાર્યમાં સંકળાયેલા જોઈએ છીએ. એ ઉપરથી મુનિશ્રીના પરિશ્રમ અને ધગશની કલ્પના કરી શકાય તેમ છે. તેમનું જીવન સૂત્રોમાં વણાઈ ગયું છે.
| મુનિશ્રીના આ અસાધારણ કાર્યમાં પિતાના શિખેને તથા પંડિતેને સહકાર મળે છે. મને આશા છે કે જે દરેક મુમુક્ષુ આ પુસ્તકને પિતાના ઘરમાં વસાવશે અને પોતાના જીવનને સાચા સુખને માગે વાળશે તે મહારાજશ્રીએ ઉઠાવેલે શ્રમ સંપૂર્ણ પણે સફળ થશે.
છે. રસિકલાલ કસ્તુરચંદ ગાંધી
એમ. એ. એલ. એલ. બી.
ધર્મેન્દ્રસિંહજી કેલેજ રાજકેટ (સૌરાષ્ટ્ર)
મુંબઈ અને ઘાટકોપરમાં મળેલી સભાએ ભિનાસર કેન્ફરન્સ તથા
સાધુ સંમેલનમાં મોકલાવેલ ઠરાવ.
હાલ જે વખતે શ્રી વેતાંબર સ્થાનકવાસી જૈન સંઘ માટે આગમ-સંશોધન અને સ્વતંત્ર ટીકાવાળા શાસ્ત્રોદ્ધારની અતિ આવશ્યકતા છે અને જે મહાનુભાવોએ આ વાત દીર્ધ દ્રષ્ટિથી પહેલી પોતાના મગજમાં લઈ તે પાર પાડવા મહેનત લઈ રહ્યા છે તેવા મુનિ મહારાજ પંડિતરત્ન શ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજ કે જેઓને સાદડી અધિવેશનમાં સર્વાનુમતે સાહિત્ય મંત્રી નીમ્યા છે તેઓશ્રીની દેખરેખ નીચે આ ભા. વે. સ્થા. જૈન શાસ્ત્રોદ્ધાર સમિતિ જે એક મેટી વગવાળી કમિટી છે તેની મારફતે કામ થઈ રહ્યું છે જેને પ્રધાનાચાર્યશ્રી તથા પ્રચાર મંત્રીશ્રી
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તથા અનેક અનુભવી મહાનુભાવેએ પિતાની પસંદગીની મહોર છાપ આપી છે અને છેલામાં છેલલા વડોદરા યુનિવસીટીના પ્રેકેસર કેશવલાલ કામદાર એમ. એ. એ પિતાનું સવિસ્તર પ્રમાણપત્ર આપ્યું છે તે શાસ્ત્રોદ્ધાર કમિટીના કામને આ સંમેલન તથા કેન્ફરન્સ હાર્દિક અભિનંદન આપે છે. અને તેમના કામને જ્યાં જ્યાં અને જે જે જરૂર પડે-પંડિતની અને નાણાંની–પિતાની પાસેના ફંડમાંથી અને જાહેર જનતા પાસેથી મદદ મળે તેવી ઈચ્છા ધરાવે છે.
આ શાસ્ત્રો અને ટીકાઓને જ્યારે આટલી બધી પ્રશંસાપૂર્વક પસંદગી મળી છે ત્યારે તે કામને મદદ કરવાની આ કેન્ફરન્સ પિતાની ફરજ માને છે અને જે કાંઈ ત્રુટી હોય તે પં. ૨. શ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજની સાનિધ્યમાં જઈ. બતાવીને સુધારવા પ્રયત્ન કરે. આ કામને ટલે ચઢાવવા જેવું કંઈ પણ કામ સત્તા ઉપરના અધીકારીઓના વાણી કે વર્તનથી ન થાય તે જેવા પ્રમુખ સાહેબને ભલામણ કરે છે.
(સ્થા. જૈન પત્ર તા. ૪-૫-૫૬)
સ્વતંત્ર વિચારક અને નિડર લેખક જૈન સિદ્ધાંતના તંત્રીશ્રી
શેઠ નગીનદાસ ગીરધરલાલને અભિપ્રાય શ્રી સ્થાનકવાસી શાસ્ત્રોદ્ધાર સમિતિ સ્થાપીને પૂ. શ્રી. ઘાસીલાલજી મહારાજને સૌરાષ્ટ્રમાં લાવી તેમની પાસે બત્રીસ સૂત્ર તૈયાર કરવાની હિલચાલ ચાલતી હતી ત્યારે તે હિલચાલ કરનાર શાસ્ત્રજ્ઞ શેઠ શ્રી દામોદરદાસભાઈ સાથે મારે પત્રવ્યવહાર ચાલેલે ત્યારે શેઠ શ્રી દામોદરદાસભાઈએ તેમનાં એક પત્રમાં મને લખેલું કે
“આપણું સૂત્રોના મૂળ પાઠ તપાસી શુદ્ધ કરી સંસ્કૃત સાથે તૈયાર કરી શકે તેવા સ્થાનકવાસી સંપ્રદાયમાં મુનિશ્રી ઘાસીલાલજી મ. સિવાય મને કોઈ વિશેષ વિદ્વાન મુનિ જેવામાં આવતા નથી. લાંબી તપાસને અંતે મેં મુનિ શ્રી
ઘાસીલાલજીને પસંદ કરેલા છે.” શેઠ શ્રી દામોદરદાસભાઈ પિતે વિદ્વાન હતા. શાસ્ત્રજ્ઞ હતા તેમ વિચારક પણ હતા. શ્રાવક તેમજ મુનિઓ પણ તેમની પાસેથી શીક્ષા વાંચના લેતા, તેમ જ્ઞાન ચર્ચા પણ કરતા. એવા વિદ્વાન શેઠશ્રીની પસંદગી યથાર્થ જ હેય એમાં
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નવાઈ નથી. અને પૂ. શ્રી ઘાસીલાલજીના બનાવેલાં સૂત્રે જોતાં સૌ કોઈને ખાત્રી થાય તેમ છે કે દાબેદરદાસભાઈએ તેમજ સ્થાનકવાસી સમાજે જેવી આશા શ્રી વાસીલાલજી મ. પાસેથી રાખેલી તે બરાબર ફળીભૂત થયેલ છે.
શ્રી વર્ધમાન શ્રમણસંધના આચાર્ય શ્રી આત્મારામજી મહારાજ શ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજના સુત્રે માટે ખાસ પ્રશંસા કરી અનુમતિ આપેલ છે તે ઉપરથી જ શ્રી ઘાસીલાલજી મ. ના સૂત્રેની ઉપગિતાની ખાત્રી થશે.
આ સત્રે વિધાથીને, અભ્યાસીને તેમજ સામાન્ય વાંચકને સર્વને એક સરખી રીતે ઉપયોગી થઈ પડે છેવિદ્યાથીને તેમજ અભ્યાસીને મૂળ તથા સંસ્કૃત ટીકા વિશેષ કરીને ઉપયોગી થાય તેમ છે ત્યારે સામાન્ય હિન્દી વાંચકને હિન્દી અનુવાદ અને ગુજરાતી વાંચકને ગુજરાતી અનુવાદથી આખું સૂત્ર સરળતાથી સમજાય જાય છે.
કેટલાકને એ ભ્રમ છે કે સત્રો વાંચવાનું આપણું કામ નહિ, સૂત્ર આપણને સમજાય નહિ. આ ભ્રમ તન ખેટો છે. બીજા કેઈપણ શાસ્ત્રીય પુસ્તક કરતાં સૂત્ર સામાન્ય વાંચકને પણ ઘણી સરળતાથી સમજાઈ જાય છે. સામાન્ય માણસ પણ સમજી શકે તેટલા માટે જ ભ. મહાવીરે તે વખતથી લેક ભાષામાં (અર્ધ માગધી ભાષામાં) સૂત્રે બનાવેલાં છે. એટલે સૂત્ર વાંચવા તેમજ સમજવામાં ઘણું સરળ છે.
માટે કઈ પણ વાંચકને એને ભ્રમ હેય તે તે કાઢી નાંખવે. અને ધર્મનું તેમજ ધર્મના સિદ્ધાંતનું સાચું જ્ઞાન મેળવવા માટે સૂત્રે વાંચવાને ચૂકવું નહિ એટલું જ નહિ પણ જરૂરથી પહેલાં સૂત્રજ વાંચવા.
સ્થાનકવાસીઓમાં આ શ્રી સ્થા. જૈન શાસ્ત્રોદ્ધાર સમિતિએ જે કામ કર્યું છે અને કરી રહી છે તેવું કંઈ પણ સંસ્થાએ આજ સુધી કર્યું નથી. સ્થા. જૈન શાસ્ત્રોદ્ધાર સમિતિના છેલા રિપોર્ટ પ્રમાણે બીજા છ સત્ર લખાયેલ પડયાં છે, બે સૂત્ર-અનુગદ્વાર અને ઠાણાંગ સત્ર-લખાય છે તે પણ થોડા વખતમાં તૈયાર થઈ જશે. તે પછી બાકીના સુત્રે હાથ ધરવામાં આવશે.
તૈયાર સૂત્રો જલ્દી છપાઈ જાય એમ ઇચ્છીએ છીએ અને સ્થા. બંધુઓ સમિતિને ઉત્તેજન અને સહાયતા આપીને તેમનાં સુત્રે ઘરમાં વસાવે એમ ઇચ્છીએ છીએ.
જૈન સિદ્ધાન્ત” પત્ર - મે ૧૯૫૫.
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શ્રુત ભકિત (પૂ. આચાર્ય શ્રી ઈશ્વરલાલજી મ. સા. ની આજ્ઞા અનુસાર લખનાર) દસં. ના જૈન મુનિ શ્રી દયાનંદજી મહારાજ
તા. ૨૩-૬-૫૬ શાહપુર, અમદાવાદ આજે લગભગ ૨૦ વર્ષથી શ્રદ્ધેય પરમપૂજ્ય, જ્ઞાન દિવાકર પં. મુનિશ્રી ઘાસીલાલજી મ. ચરમ તીર્થકર ભગવાન મહાવીરના અનુત્તર અનુપમ ન્યાય યુકત, પૂર્વાપર અવિરોધ, સ્વપર કલ્યાણકારક, ચરમ શીતળ વાણીના ઘાતક એવા શ્રી જિનાગમ પર પ્રકાશ પાડે છે. તેઓશ્રી પ્રાચીન, પોર્વાત્ય સંસકૃતાદિ અનેક ભાષાના પ્રખર પંડિત છે અને જિન વાણીને પ્રકાશ સંસ્કૃત, ગુજરાતી અને હિન્દીમાં મૂળ શબ્દાર્થ, ટીકા, વિસ્તૃત વિવરણ સાથે પ્રકાશમાં લાવે છે એ જૈન સમાજ માટે અતિ ગોરવ અને આનંદને વિષય છે.
ભ૦ મહાવીર અત્યારે આપણી પાસે વિદ્યમાન નથી. પરંતુ તેમની વાણી રૂપે અક્ષરદેહ ગણધર મહારાજેએ શ્રત પરંપરાએ સાચવી રાખે. શ્રુત પરંપરાથી સચવાતું જ્ઞાન જ્યારે વિસ્મૃત થવાને સમય ઉપસ્થિત થવા લાગે ત્યારે શ્રી દેવદ્ધિગણિ ક્ષમાશ્રમણે વલભીપુર-વળામાં તે આગમેને પુસ્તક રૂપે આરૂઢ કર્યો. આજે આ સિદ્ધાંતે આપણી પાસે છે. તે અર્ધ માગધી પાલી ભાષામાં છે. અત્યારે આ ભાષા ભગવાનની, દેવેની તથા જનગણની ધર્મ ભાષા છે. તેને આપણુ પ્રમાણે અને શ્રમણીઓ તથા મુમુક્ષુ શ્રાવક શ્રાવિકાઓ મુખપાઠ કરે છે, પરંતુ તેને અર્થ અને ભાવ ઘણું ચેડાએ સમજે છે. [, જિનાગમ એ આપણાં શ્રદ્ધેય પવિત્ર ધર્મસ છે. એ આપણી આખે છે. તેને અભ્યાસ કરે એ આપષ્ઠી સૌની-જેમ માત્રની ફરજ છે. તેને સત્ય સ્વરૂપે સમજાવવા માટે આપણાં સદભાગ્યે જ્ઞાન દિવાકર શ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજે સત્સંકલ્પ કર્યો છે. અને તે લિખિત સત્રને પ્રગટાવી શાસ્ત્રોદ્ધાર સમિતી દ્વારા જ્ઞાન પરબ વહેતી કરી છે. આવા અનુપમ કાર્યમાં સકળ જૈનેને સહકાર અવશ્ય હો ઘટે અને તેને વધારેમાં વધારે પ્રચાર થાય તે માટે પ્રયત્ન કરવા ઘટે.
ભ. મહાવીરને ગણધર ગોતમ પૂછે છે કે હે ભગવાન, સુત્રની આરાધના કરવાથી શું ફળ પ્રાપ્ત થાય છે? ભગવાન તેને પ્રતિ ઉત્તર આપે છે કે શ્રુતની આરાધનાથી જીના અજ્ઞાનને નાશ થાય છે. અને તેઓ સંસારના કલેથી નિવૃત્તિ મેળવે છે. અને સંસાર કલેશેથી નિવૃત્તિ અને અજ્ઞાનને નાશ થતાં મેક્ષ ફળની પ્રાપ્તિ થાય છે.
આવા જ્ઞાન કાર્યમાં મૂર્તિપૂજક જેને, દિગંબરે અને અન્ય ધમીએ હજારે અને લાખો રૂપીયા ખચે છે. હિન્દુ ધર્મમાં પવિત્ર મનાતા ગ્રંથ ગીતાના સેંકડો નહિ પણ હજારે ટીકા થે દુનિયાની લગભગ સર્વ ભાષાઓમાં પ્રગટ થયા છે. ઈસાઈ ધર્મના પ્રચારકે તેમના પવિત્ર ધર્મગ્રન્થ બાઈબલના પ્રચારાર્થે તેનું જગતની સર્વ ભાષામાં ભાષાંતર કરી, તેને પડતર કરતાં પણ ઘણી ઓછી કિંમતે વેચી ધર્મ
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સૂત્રોને પ્રચાર કરે છે. મુસ્લીમ લેકે પણ તેમના પવિત્ર મનાતા ગ્રન્થ કુરાનનું પણ અનેક ભાષાઓમાં ભાષાંતર કરી સમાજમાં પ્રચાર કરે છે. આપણે પૈસા પરને મેહ ઉતારી ભગવાનના સિદ્ધાંતને પ્રચાર કરવા માટે તન, મન, ધન સમર્પણ કરવાં જોઈએ. અને સૂત્ર પ્રકાશનના કાર્યને વધુ ને વધુ વેગ મળે તે માટે સક્રિય પ્રયત્ન કરવા જોઈએ આવા પવિત્ર કાર્યમાં સાંપ્રદાયિક મતભેદે સૌએ ભૂલી જવા જોઈએ અને શુદ્ધ આશયથી થતા શુદ્ધ કાર્યને અપનાવી લેવું જોઈએ. સમિતિના નિયમાનુસાર રૂ. ૨૫૧] ભરી સમિતિના સભ્ય બનવું જોઈએ. ધાર્મિક અનેક ખાતાંઓના મુકાબલે સૂત્ર પ્રકાશનનું-જ્ઞાન પ્રચારનું આ ખાતું સર્વશ્રેષ્ઠ ગણાવું જોઈએ.
આ કાર્યને વેગ આપવાની સાથે સાથે એ આગમ-ભગવાનની એ મહાવાણીનું પાન કરવા પણ આપણે હરહંમેશ તત્પર રહેવું જોઈએ જેથી પરમ શાન્તિ અને જીવન સિદ્ધિ મેળવી શકાય.
- (સ્થા. જૈન. તા. ૫-૭-૫૬)
શ્રી. અ. ભા. ૨. સ્થા. જૈન શાસ્ત્રોદ્ધાર સમિતિના પ્રમુખશ્રી વગેરે.
રાણપુર પરમ પવિત્ર સૌરાષ્ટ્રની પુણ્ય ભૂમિ પર જ્યારથી શાન્ત-શાસ્ત્રવિશારદ અપ્રમાદિ પૂજ્ય આચાર્ય મહારાજ શ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજનાં પુનિત પગલાં થયા છે ત્યારથી ઘણા લાંબા કાળથી લાગુ પડેલ જ્ઞાનાવરણિય કર્મનાં પડળ ઉતારવાને શુભ પ્રયાસ થઈ રહ્યો છે. અને જે પ્રવચનની પ્રભાવના તેઓશ્રી કરી રહ્યા છે તે અનંત ઉપકારક કાર્યમાં તમે જે અપૂર્વ સહાય આપી રહ્યા છે તે માટે તમે સર્વને ધન્ય છે અને એ શુભ પ્રવૃત્તિના શુભ પરિણામને જનતા લાભ લે છે અને તે સમજાય છે કે સાધુજી છઠે ગુણસ્થાનકે હોય છે. પણ પૂજ્ય શ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજ તે બહુધા સાતમેં અપ્રમત ગુણસ્થાનકે જ રહે છે. એવા અપ્રમત માત્ર પાંચ-સાત સાધુએ. જે સ્થાનકવાસી જૈન સમાજમાં હોય તે સમાજનું શ્રેય થતાં જરાએ વાર ન લાગે. સમાજાકાશમાં સ્થા. જૈન સંપ્રદાયને દિવ્ય પ્રભાકર જળહળી નીકળે. પ...ણ દિન......
શ્રી શાસ્ત્રોદ્ધાર સમિતિને મારી એક નમ્ર સૂચના છે કે-પૂજ્યશ્રીની વૃદ્ધાવસ્થા છે, અને કાર્યપ્રણાલિકા યુવાનને શરમાવે તેવી છે. તેમને ગામોગામ વિહાર કરવા અને શાસ્ત્રોદ્ધારનું કાર્ય કરવું તેમાં ઘણી શારીરિક-માનસિક અને વ્યવહારિક મુશ્કેલી વેઠવી પડે છે. તે કઈ યોગ્ય સ્થળ કે જ્યાંના શ્રાવકે ભકિતવાળા હોય. વાડાના રાગના વિષધી અલીપ્ત હોય એવા કેઈ સ્થળે શાસ્ત્રોદ્ધારનું કાર્ય પૂર્ણ થાય ત્યાં સુધી સ્થીરતા કરી શકે એના માટે પ્રબંધ કરવું જોઈએ. બીજા કોઈ એવા સ્થળની અનુકુળતા ન મળે તે છેવટ અમદાવાદમાં યોગ્ય સ્થળે રહેવાની સગવડતા કરી અપાય તે વધુ સારૂં હારી આ સૂચના પર ધ્યાન આપવા ફરી યાદ આપું છું. ફરીવાર પૂજ્ય આચાર્યશ્રીને અને તેમના સત્કાર્યને સહાયકને મારા અભિનંદન પાઠવું છું તે સ્વીકારશોજી.
લિ. સદાનંદી જેનમુનિ છોટાલાલ છ.
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“ જૈન સિદ્ધાંતના ” તત્રીશ્રીના અભિપ્રાય.
સ્થાનકવાસીઓમાં પ્રમાણભૂત સૂત્ર બહાર પાડનારી આ એકની એક સંસ્થા છે. અને એના આ છેલ્લા રિપેા ઉપરથી જણાય છે કે તેણે ઘણી સારી પ્રગતિ કરી છે તે સેઇ આનંદ થાય છે.
મૂળ પાઠ, ટીકા, હિન્દી તથા ગુજરાતી અનુવાદ સહિત સૂત્રા બહાર પાડવાં એ કાંઇ સહેલું કામ નથી. એ એક મહાભારત કામ છે. અને તે કામ આ શાસ્ત્રોદ્ધાર સિમિત ઘણી સફળતાથી પાર પાડી રહી છે તે સ્થાનકવાસી સમાજ માટે ઘણા ગૌરવના વિષય છે અને સમિતિ ધન્યવાદને પાત્ર છે.
સમિતિ તરફથી નવ સૂત્રા બહાર પડી ચૂકયાં છે, હાલમાં ત્રણ સૂત્ર છપાય છે. • નવ સૂત્રા લખાઈ ગયાં છે અને જંબુદ્વીપ પ્રજ્ઞપ્તિ તથા નદીસૂત્ર તૈયાર થઈ રહ્યાં છે.
હાલમાં મંત્રી શ્રી સાકરચંદ્ર ભાઈચંદ સમિતિના કામમાં જ તેમના આખા વખત ગાળે છે અને સમિતિના કામકાજને ઘણા વેગ આપી રહ્યા છે. તેમની ખત માટે ધન્યવાદ.
અને આ મહાભારત કામના મુખ્ય કાર્યકર્તા તેા છે વયેવૃદ્ધ પડિત મુનિશ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજ, મૂળ પાઠનું શેાધન તથા સંસ્કૃત ટીકા તેઓશ્રી જ તૈયાર કરે છે. મુનિશ્રીનેા આ ઉપકાર આખાય સ્થા. જૈન સમાજ ઉપર ઘણું! મહાન છે. એ ઉપકારના બદલે તા વાળી શકાય તેમજ નથી.
પરંતુ આ સમિતિના મેમ્બર બની, તેના બહાર પડેલાં સૂત્રેા ઘરમાં વસાવી તેનું અધ્યયન કરવામાં આવે તેા જ મહારાજશ્રીનું થાડું ઋણ અદા કર્યું ગણાય.
ભગવાને કહ્યું છે કે પઢમં નાળ તો ત્યા પહેલુ' જ્ઞાન પછી દયા, દયા ધર્મને યથા સમજવા હાય તા ભગવાનની વાણીરૂપ આપણા સત્રા વાંચવાં જોઇએ તેનું અધ્યયન કરવું જોઈએ અને તેના ભાવાર્થ યથાર્થ સમજવા જોઇએ.
એટલા માટે આ શાસ્રોદ્ધારસમિતિના સર્વ સૂત્રેા દરેક સ્થા. જૈને પેાતાના ઘરમાં વસાવવાંજ જોઇએ સ` ધજ્ઞાન આપણા સૂત્રામાંજ સમાયેલુ છે અને સૂત્ર સહેલાઇથી વાંચીને સમજી શકાય છે, માટે દરેક સ્થા. જૈન આ સૂત્ર વાંચે એ ખાસ જરૂરનું છે.
“ જૈન સિદ્ધાંત ” ડીસેમ્બર- ૫૬
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શ્રી ઉપાશક દશાંગ સૂત્રને માટે અભિપ્રાય. મળ સત્ર તથા પૂ. મુનિશ્રી ઘાસીલાલજીએ બનાવેલ સંસ્કૃત છાયા તથા ટકા અને હિંદી તથા ગુજરાતી-અનુવાદ સહિત.
પ્રકાશક- અ. ભા. ૨. સ્થાનકવાસી જૈન શાસ્ત્રોદ્ધાર સમિતિ, ગરેડીઆ કુવા રેડ, ગ્રીન લેજ પાસે, રાજકોટ (સૌરાષ્ટ્ર) પૃષ્ઠ ૬૧૬ બીજી આવૃત્તિ બેવડું (મ) કદ. પાકું પઠું. જેકેટ સાથે સને ૧૫૬ કિંમત ૮-૮-૦
આપણા મૂળ બાર અંગ સૂત્રમાંનું ઉપાશકદશાંગ એ સાતમું અંગ સૂત્ર છે. એમાં ભગવાન મહાવીરના દશ ઉપાસકે શ્રાવકનાં જીવનચરિત્ર આપેલાં છે તેમાં પહેલું ચરિત્ર આનંદ શ્રાવકનું આવે છે.
આનંદ શ્રાવકે જેન ધર્મ અંગીકાર કર્યો અને બારવ્રત ભગવાન મહાવીર પાસે અંગીકાર કરી પ્રતિજ્ઞા (પ્રત્યાખ્યાન) લીધાં તેનું સવિસ્તર વર્ણન આવે છે. તેની અંતર્ગત અનેક વિષયે જેવા કે, અભિગમ, કાલેકસ્વરૂપ, નવતત્વ, નરક દેવલોક વગેરેનું વર્ણન પણ આવે છે.
આનંદ શ્રાવકે બાર વ્રત લીધા તે બારે વ્રતની વિગત અતિચારની વિગત વગેરે બધું આપેલું છે. તે જ પ્રમાણે બીજા નવ શ્રાવકેની પણ વિગત આપેલ છે.
આનંદ શ્રાવકની પ્રતિજ્ઞામાં મદિંત જે શબ્દ આવે છે. મર્તિપૂજકે મૂર્તિપૂજા સિદ્ધ કરવા માટે તેનો અર્થ અરિહંતનું ચિત્ય (પ્રતિમા) એ કરે છે. પણ તે અર્થ તદન ખૂટે છે. અને તે જગ્યાએ આગળ પાછળના સંબંધ પ્રમાણે તેના એ ખોટો અર્થ બંધ બેસતું જ નથી તે મુનિશ્રી ઘાસીલાલજીએ તેમની ટીકામાં અનેક રીતે પ્રમાણે આપી સાબિત કરેલ છે અને પરિવંત રેવા ને અર્થ સાધુ થાય છે તે બતાવી આપેલ છે.
આ પ્રમાણે આ સૂત્રમાંથી શ્રાવકના શુદ્ધ ધર્મની માહિતી મળે છે તે ઉપરાંત તે શ્રાવકની અદ્ધિ, રહેઠાણુ, નગરી વગેરેના વર્ણન ઉપરથી તે વખતની સામાજિક સ્થિતિ, રીતરિવાજ રાજવ્યવસ્થા વગેરે બાબતોની માહિતી મળે છે.
એટલે આ સૂત્ર દરેક શ્રાવકે અવશ્ય વાંચવું જોઈએ એટલું જ નહિ પણ વારંવાર અધ્યયન કરવા માટે ઘરમાં વસાવવું જોઈએ.
પુસ્તકની શરૂઆતમાં વદ્ધમાન શ્રમણ સંધના આચાર્યશ્રી આત્મારામજી મહારાજનું સંમતિ પત્ર તથા બીજા સાધુઓ તેમજ શ્રાવકના સંમતિ પત્રે આપેલા છે, તે સૂત્રની પ્રમાણભૂતતાની ખાત્રી આપે છે.
“જેન સિદ્ધાંત જન્યુઆરી, ૫૭
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એકડે સર્ટીફીકેટ ઉપરાંત હાલમાં મળેલા
કેટલાક તાજા અભિપ્રાય શા સ્ત્રી દ્વાર ના કાર્યને વેગ આપો
તંત્રીસ્થાનેથી (જેનજાતિ) તા. ૧૫-૯-૫૭ પૂજ્ય શ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજ ઠાણા ૪ હાલમાં અમદાવાદ મુકામે સરસપુરના સ્થા. જૈન ઉપાશ્રયમાં બિરાજમાન છે. તેઓશ્રી શાસ્ત્રોદ્ધારનું કાર્ય ખૂબ જ ખંત અને ઉત્સાહથી વૃદ્ધ વયે પણ કરી રહ્યા છે. તેઓશ્રી વૃદ્ધ છે છતાં પણ આખે દિવસ શાસ્ત્રની ટીકાઓ લખી રહ્યા છે. આજ સુધીમાં તેમણે લગભગ ૨૦ જેટલાં શાસ્ત્રોની ટીકાઓ લખી નાખી છે અને બાકીનાં સૂત્રેની ટીકા . જેમ બને તેમ જલદી પૂર્ણ કરવી તેવા મને રથ સેવી રહેલ છે. સ્થા. જૈન સમાજમાં શાસ્ત્રો ઉપર સંસ્કૃત ટીકા લખવાને આ પ્રથમ જ પ્રયાસ છે અને તે પ્રયાસ સંપૂર્ણ બને એવી અમે શાસનદેવ પ્રત્યે પ્રાર્થના કરીએ છીએ. આજ સુધી ઘણુ મુનિવરોએ શાસ્ત્રોનું કામ શરૂ કરેલ છે પણ કોઈએ પૂર્ણ કરેલ નથી. પૂજ્યશ્રી અમુલખઋષીજી મહારાજે બત્રીસે શાસ્ત્રો ઉપર હિન્દી અનુવાદ કરેલ અને સંપૂર્ણ બનેલ. ત્યારબાદ આચાર્ય શ્રી આત્મારામજી મહારાજશ્રીએ હિન્દી ટીકા કેટલાક શાસ્ત્રો ઉપર લખેલ પણ ઘણાં શાસ્ત્રો બાકી રહી ગયાં. પૂજ્ય હસ્તિમલજી મહારાજે એક બે શાસ્ત્રો ઉપરની ટીકાઓના અનુવાદ કરેલ. પૂજય શ્રી જવાહિરલાલ મહારાજશ્રીએ સૂયગડાંગ સૂત્ર ટીકા સહિત હિન્દી અનુવાદ સાથે કરેલ. શ્રી સૌભાગ્યમલજી મહારાજે આચારાંગની હિન્દી ટીકા લખેલ. પણ સંપૂર્ણ શાસ્ત્રો ઉપર સંસ્કૃત ટીકા હજી સુધી સ્થા. જૈન સાધુઓ તરફથી થયેલ નથી.
જ્યારે પૂજ્યશ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજશ્રીએ ૨૦ શાસ્ત્રો ઉપર સંસ્કૃત ટીકા તેને હિન્દી ગુજરાતી અનુવાદ કરાવેલ છે આથી હવે આશા બંધાય છે કે તેઓશ્રી બત્રીસે બત્રીસ શાસ્ત્રો ઉપર સંસકૃત ટીકા લખવામાં સફળ થશે અને શાસ્ત્રોદ્ધાર સમિતિએ આજ સુધી ૧૦ થી ૧૨ શાસ્ત્રો છપાવી પણ દીધાં છે અને હજી પણ તે શાસ્ત્રો વિશેષ જલદી છપાય તે માટે શાસ્ત્રોદ્ધાર સમિતિ સંપૂર્ણ પ્રયત્ન કરી રહેલ છે તે ધન્યવાદને પાત્ર છે.
જેને શાસ્ત્રોદ્ધાર સમિતિના રૂ. ૨૫૧ ભરીને લાઈફ મેમ્બર થનારને શાસ્ત્રો તમામ, શાસ્ત્રોદ્ધાર સમિતિ તરફથી ભેટ મળે છે. આ રીતે એક પંથ અને દે કાજ. બન્ને રીતે લાભ થાય તેમ છે. રૂ. ૨૫૧ માં ૫૦૦ રૂપિયાની કિંમતના શાસ્ત્રો મળે એ પણ મોટે લાભ છે અને પ્રવચનની પ્રભાવના કરવાને ધર્મલાભ પણ મળે છે.
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૩
આ સાલે પૂજ્યશ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજના સુશિષ્ય ૫. મુનિશ્રી કન્ફયાવાલજી મહારાજ મલાડ મુકામે ચાતુર્માસ બિરાજે છે અને તેઓ શ્રી શાસ્ત્રોના મેમ્બર કરવા માટે અથાગ પ્રયત્ન કરીને પ્રવચનની સેવા બજાવી રહ્યા છે. અને અત્યાર સુધીમાં મુંબઈ તેમજ પરાઓના લગભગ ૪૦ જેટલા ગૃહસ્થ લાઈફ મેમ્બર બની ગયા છે અને મુંબઈમાં લગભગ ૩૦૦ જેટલા મેમ્બરે થાય તે ઈચ્છવા યેચ છે. શ્રીમંત ગૃહસ્થ હજાર રૂપિયા પિતાના ઘર ખર્ચમાં તેમજ મેજશેખના કામમાં તેમજ વ્યવહારિક કામમાં વાપરી રહ્યા છે તે આવા શાસ્ત્રોદ્ધાર જેવા પવિત્ર કાર્યમાં રૂપિયા વાપરશે તે ધર્મની સેવા કરી ગણાશે. અને બદલામાં ઉત્તમ આગમસાહિત્યની એક લાયબ્રેરી બની જશે. જેનું વાંચન કરવાથી આત્માને શાંતિ મળશે અને શાસ્ત્રજ્ઞા પ્રમાણે વર્તવાથી જીવન સફળ થશે.
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૩ર
શતાવધાની મુનિશ્રી જયંતિલાલજી મહારાજશ્રીને અમદાવાદને પત્ર “સ્થાનકવાસી જૈન” તા. ૫-૯-૫૭ના અંકમાં છપાએલ છે જે નીચે મુજબ છે.
સૂત્રેના મૂળ પાઠોમાં ફેરફાર હોઈ શકે ખરે?
તા. ૭-૮-૧૭ના રોજ અત્રે બિરાજતા શાસ્ત્રોદ્ધારક આચાર્ય મહારાજશ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજ પાસે, મારા ઉપર આવેલ એક પત્ર લઈને હું ગયું હતું, તે સમયે મારે પૂ. મ. સા. સાથે જે વાતચીત થઈ તે સમાજને જાણ કરવા સારૂ લખું છું.
શાસ્ત્રોનું કામ એક ગહન વસ્તુ છે. અપ્રમાદી થઈ તેમાં અવિરત પ્રયત્ન કરવા જોઈએ. સંપૂર્ણ શાસ્ત્રોનું જ્ઞાન તેમજ દરેક પ્રકારની ખાસ ભાષાનું જ્ઞાન હેય તેજ આગમ દ્વારકનું કાર્ય સફળતાથી થાય છે. આ પ્રકારને પ્રયત્ન હાલ અમદાવાદ ખાતે સરસપુર જેને સ્થાનકમાં બિરાજતા પૂજ્ય શ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજ કરી રહ્યા છે. શાસ્ત્ર લેખનનું આ કાર્ય થઈ રહ્યું છે, તેમાં અનેક વ્યકિતઓને અનેક પ્રકારની શંકાઓ થાય છે તેમાં શાસ્ત્રોના મૂળ પાઠમાં ફેરફાર થાય છે? કરવામાં આવે છે? એ પ્રશ્ન પણ કેટલાકને થાય છે અને તે પ્રશ્ન થાય તે સ્વાભાવિક છે, કેમકે અમુક મુનિરાજે તરફથી પ્રગટ થયેલ સૂત્રના મૂળ પાઠમાં ફેરફાર થયેલા છે. જેથી આ કાર્યમાં પણ સમાજને શંકા થાય.
પણ ખરી રીતે જોતાં, અત્યારે જે શાદ્ધારનું કામ ચાલી રહ્યું છે તે વિષે સમાજને ખાત્રી આપવામાં આવે છે કે, શાસ્ત્રોદ્ધાર સમિતિ તરફથી અત્યાર સુધીમાં પ્રગટ થયેલાં આગમના મૂળ પાઠમાં જરાપણ ફેરફાર કરવામાં આવેલ નથી અને ભવિષ્યમાં જે સૂત્રે પ્રગટ થશે તેમાં ફેરફાર થશે નહિ તેની સમાજ નોંધ લે.
હતા.
શતાવધાની શ્રી જયંત મુનિ-અમદાવાદ
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23
“શ્રી અખિલ ભારત શ્વેતામ્બર સ્થાનવાસી જૈન શાસ્ત્રોદ્ધાર સમિતિને ટુંક પરિચય
સ્થાનકવાસી સમાજની આ એકને એક સંસ્થા છે કે જે અત્યાર સુધીમાં તેર સૂત્રે પાર બહાર પાડી દીધાં છે. સાત સૂત્ર છપાય છે અને બીજા કેટલાક ૫વા માટે તૈયાર થઈ ચૂક્યા છે.
આ પ્રમાણે આ સંસ્થાએ મહાન પ્રગતિ સાધી છે તેને ટુંક પરિચય આ પત્રિકામાં આપેલ છે તે વાંચી જઈ સવ રૂા. જેન ભાઈબહેનેએ આ સંસ્થાને યથાશક્તિ મદદ કરી તેના કાર્યને હજુ વિશેષ વેગવાન બનાવવાની જરૂર છે.
ખી વડે વાગે છે એમ સ્થા. કેન્ફરન્સ જેમ ખોટાં બણગાં કુંકનારી સંસ્થાને કઈ કિંમત નથી, ત્યારે નક્કર કામ કરનારી આ શાસ્ત્રોદ્વાર સમિતિને દરેક પ્રકારે ઉત્તેજન આપવાને દરેક સ્થાનકવાય જેનને અનિવાર્ય ફરજ છે.
અને આ સર્વ સૂત્ર તૈયાર કસ્નાર પૂન્ય મુનિશ્રી ઘસલાલજી મહારાજને સ્થાનકવાસી સમાજ ઉપર વો મહાન ઉપકાર છે. એવુ હોવા છતાં તેઓશ્રી જે મસ્ત તૈયાર કરાવે છે તેનું કામ હજુ સુધી ખાન કેઇએ કર્યું ની અને બીજું કંઈ કરી શળે કે નહિ તે પણ શંકાર્યું છે. ન મુનિના આ મહાન ઉન્ને કિંચિત બદલા સમાજે આ શાસ્ત્રોદ્ધાર સમિતિને બને શકતી ડાય કરીને વાળવાને છે. સ્થાનકવાસ સમજ સાનને કદર કરૂામાં પા હક ત્મ ના એને અમે આશા રાખીએ
“સિત ” પત્ર એકમર ૧૭
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૩૪
શ્રી દશવૈકાલિક તથા ઉપાસક દશાંગ સૂત્રો ગુજરાતી ભાષામાં અનુવાદ થયેલાં પૂજ્ય શ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજ વિરચિત શ્રી ઉપરોક્ત બે સૂત્રે જેન ધર્મ પાળતા દરેક ઘરમાં રહેવા જ જોઈએ. તે વાંચવાથી શ્રાવક ધમ અને શ્રમણ ધર્મના આચારનું જ્ઞાન પ્રાપ્ત થઈ શકે છે અને શ્રાવકે પિતાની નિરવદ્ય અને એષણિય સેવા શ્રમણ પ્રત્યે બજાવી શકે છે. વર્તમાનકાળે શ્રાવકમાં તે જ્ઞાન નહિ હોવાને લીધે અંધશ્રદ્ધાએ શ્રમણ વર્ગની વૈયાવચ્ચ તે કરી રહેલ છે. પરંતુ “કલ્પ શું અને અકલ્પ શું” એનું જ્ઞાન નહિ. હોવાને લીધે પિતે સાવધ સેવા અપી પિતાના સ્વાર્થને ખાતર શ્રમણ વર્ગને પિતાને સહાયક થવામાં ઘસડી રહ્યા છે અને શ્રમણ વર્ગની પ્રાય: કુસેવા કરી રહ્યા છે. તેમાંથી બચી લાભનું કારણ થાય અને શ્રમણને યથાતથ્ય સેવા આપી તેમને પણ જ્ઞાનદર્શન ચારિત્રની આરાધના કરવામાં સહાયક થઈ પિતાના જ્ઞાનદર્શન ચારિત્રની આરાધના કરી સુગતિ મેળવી શકે. શ્રમણની યથાતથ સેવા કરવી તે અવશ્ય ગૃહસ્થની ફરજ છે.
પૂજ્ય શ્રી ઘસીલાલજી મ. શાસ્ત્રોદ્ધાર અનુવાદન ત્રણ ભાષામાં રૂડી રીતે કરી રહ્યા છે અને રૂપીયા ૨૫૧ ભરી મેઅર થનારને રૂ. ૪૦૦-૫૦૦ લગભગ ની કીંમતના બત્રીસે આગ ફી મળી શકે છે તે તે રૂ. ૨૫૧ ભરી મેમ્બર થઈ બત્રીસે આગમે દરેક શ્રાવકઘરે મેળવવા જોઈએ. બત્રીસે શાસ્ત્રોના લગભગ ૪૮ પુસ્તકે મળશે. તે તે લાભ પોતાની નિર્જરા માટે પુન્યાનુંબંધી પુન્ય માટે જરૂર મેળવે. ઉપરોકત બંને સૂત્રોની કીંમત સમિતિ કંઈક ઓછી રાખે તે હરકોઈ ગામમાં શ્રીમંત હોય તે સૂત્ર લાવી અરધી કીંમતે, મફત અથવા પૂરી કીંમતે લેનારની સ્થિતિ જોઈ દરેક ઘરમાં વસાવી શકે.
એક ગૃહસ્થ
નેધ-ઉપરની સૂચનાને અમે આવકારીએ છીએ. આવાં સૂત્રે દરેક ઘરમાં વસાવવા યેચ તેમજ દરેક શ્રાવકે વાંચવા ગ્ય છે. તંત્રિ
“રત્નત” પત્ર તા. ૧-૧૦-૧૭
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પૂજ્ય આચાર્યશ્રી થાસીલાલજી મહારાજનાં બનાવેલાં સૂત્રા.
કાશ્મીર.....થી.....કન્યાકુમારી
તેમજ કરાંચી..... સુધી
દરેક સ્થળે હાંશથી વંચાય છે.
.....થી.....લકત્તા
કારણ કે આવી રીતે શાસ્રો તૈયાર કરવાનું અનેાખુ કા હજુ સુત્રો કાઇ કરી શકયું નથી.
*
શ્રી સ્થાનકવાસી જૈન સમાજ
ઉ ૫ રાં ત
શ્રી દેરાવાસી સપ્રદાચના મહાન આચાર્ય શ્રી રામવિજયસૂરીજી તથા અન્ય સુનિવરે એ
તેમજ
તેરાપથી મહાસભા કલકત્તાવાળાએ આ સૂત્ર અપનાવ્યાં છે.
દેશ-પરદેશના મેમ્બર સૂત્ર વાંચી જૈન ધર્માંના શ્રુતજ્ઞાનને અણુમેલે લાભ લઈ રહ્યા છે. હમણાંજ લંડનની ઈન્ડીઆ એડ્ડીસ લાઇબ્રેરીએ આ સૂત્રેા મગાવ્યા છે.
ઠે. ગ્રીન લેાજ પાસે, ગરેડીકુવા રોડ રાજકોટ.
આપ રૂપીઆ ૨૫૧-૦-૦ મેકલી મેમ્બર તરીકે નામ નાંધાવી હપ્તે હપ્તે લગભગ રૂપી પાંચસેા સુધીની કિંમતનાં શાઓ વિના મૂલ્યે મેળવી શકે છે.
વધુ વિગત માટે લખે :
મત્રિ
શ્રી અખિલ ભારત વે. સ્થા. જૈન શાસ્ત્રોદ્ધાર સમિતિ.
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आवश्यकसूत्रस्य विषयानुक्रमणिका
विषय
१
२
३ सामायिकम्
४ चतुर्विंशतिस्तवः
प्रस्तावना
नमस्कारमन्त्रव्याख्या
५ वन्दना
६ प्रतिक्रमणम्
७ कायोत्सर्गः
८ प्रत्याख्यानम्
९ हिन्दीपरिशिष्ट
१० गुजराती परिशिष्ट
इति
पृष्ठ
१ - ४०
४१- ६७
६८-११७
११८ - १४५
१४६-१५६
१५७-२८५
२८६-२९९
३००-३२२
३२३-३२८
३२९-३३५
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प्रस्तावना
१.-४०
॥ श्री वीतरागाय नमः ॥
जैनाचार्य-जैनधर्म-दिवाकर-पूज्यश्री-घासीलालजीमहाराजेन
आवश्यकमूत्रस्य मुनितोषण्याख्या व्याख्या वितन्यते
इह हि जन्मजरामरणाऽऽधिव्याधिजनितदुःख पटलसंकुले क्षणक्षणविलक्षणव्यवहारेऽनन्तविस्तारेऽसारेऽपि सारवदाभासमाने संसारे सर्व एव प्राणिनः सुखप्राप्तिं दुःखाभिहतिं च कामयमानाः संदरीदृश्यन्ते; किन्तु मुखदुःखोत्पत्तिकारणज्ञानमन्तरेण तन्न संभवत्यतो दुःख हेतुभूतान् 'मिथ्यात्वाऽविरति-कषाय-प्रमादा-ऽशुभयोग-हिंसाऽऽरम्भेा -राग-द्वेषप्रभृत्यन्तः-शत्रुसमूहान् _श्री आवश्यकसूत्र की मुनितोषणी नामकी व्याख्या की हिन्दी
प्रस्तावना जन्म-जरा-मरण-आधि-व्याधि के दुःखों से भरे हुए, प्रतिक्षण विलक्षण व्यवहार वाले, असार होने पर भी सार सहित मालूम होने वाले इस अनन्त संसार में, सब जीव सुख चाहते हैं और दुःख का नाश करना चाहते हैं। किन्तु जब तक सुख और दुःख के कारणों का ज्ञान न हो, तब तक सुख की प्राप्ति और दुःख का नाश नहीं हो सकता। इसलिये मिथ्यात्व, अविरति, कषाय, प्रमाद, अशुभ योग, हिंसा, आरम्भ, ईर्ष्या, राग, द्वेष आदि दुःखों के
प्रस्तावना ___ मा अभिस संसार, भ, ४२१, भ२६, माथि, भने व्याधि३५ था ભરેલે છે, પ્રતિક્ષણ ચલિત સ્વરૂપથી દૃશ્યમાન થાય છે, તે પણ આવા ક્ષણ ભંગુર જગતમાં સર્વ છે સુખની વાંચ્છના રાખે છે. અને દુ:ખના નાશની આકાંક્ષા ધરાવે છે.
પરંતુ જ્યાં સુધી વાસ્તવિક સુખ દુઃખનું મૂળ કારણ ન જણાય ત્યાં સુધી સુખની પ્રાપ્તિ અને દુઃખને નાશ થે અસંભવિત છે. એટલા માટે દુઃખના કારણભૂત મિથ્યાત્વ અવિરતિ (સાંસારિક સુખમાંથી ન નિવર્તવું) કષાય (ोध-भान-भाया-सोम ) प्रभात ( सभा मास २५ ) अशुभयोग (મન-વચન કાયાને ખોટી રીતે પ્રવર્તાવવા). હિંસા, આરંભ (પિતાના સુખ માટે
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आवश्यकसूत्रस्य सम्यग विज्ञाय तन्नाशे सत्येव दुःखाद्विमुक्तात्मानः सान्द्रानन्दसन्दोहसन्दानितां मोक्षलक्ष्मीमधिगन्तुमर्हन्ति । तदेव लक्ष्यीकृत्य समस्तजागतिकजन्तुजातहिताय परमकारुणिकेन वीतरागेण भगवता श्रीमहावीरेणाऽवितथपथभूताभ्यां सम्यग्ज्ञानक्रियाभ्यामेव सकलसुखनिदानमोक्षप्राप्तिः प्रतिपादिता ।।
सम्यग्ज्ञानं हि नाऽऽत्मशुद्धिमन्तरेण कदापि संभवति, आत्मशुद्धिश्च क्रियां विना सर्वथैवाऽसम्भविनी; नहयोषधिसेवनं विना रोगोषध्यादिज्ञानमात्रेणाऽऽकारण अन्तरंग शत्रुओं को भलीभाँति जानकर, नाश करने पर ही दुःख से छुटकारा पाने वाले अनन्त अविनाशी आत्मिक आनन्द युक्त-मोक्ष लक्ष्मी को प्राप्त होते हैं। इसी कारण समस्त संसारी, प्राणियों के हित के लिये, परम दयालु, वीतराग भगवान् श्री महावीर ने सम्यग्ज्ञान और सम्यक् क्रिया से ही मोक्ष की प्राप्ति होना बतलाया है।
सम्यगज्ञान आत्मा की शुद्धि के विना कदापि नहिं हो सकता, और आत्मा की शुद्धि विना क्रिया के बिलकुल असंभव है। विना औषध सेवन किये, केवल जान लेने से आरोग्य की प्राप्ति नहीं અન્ય જીવને હણવા) ઈર્ષ્યા, રાગ, દ્વેષ, આદિ અંતરંગ શત્રુઓને જાણી તેના નાશ કરવાથી જ અવિનાશી આત્મિક સુખની પ્રાપ્તિ થાય છે.
એટલા માટે સમસ્ત પ્રાણીઓના હિત માટે પરમકૃપાળુ મહાવીરદેવે સભ્યજ્ઞાન, અને સમ્યફ ક્રિયાથી મોક્ષની પ્રાપ્તિ બતાવી છે.
એકાંત જ્ઞાન કે એકાંત ક્રિયાથી મોક્ષની પ્રાપ્તિ થતી નથી. કષિ-મુનીमामे छ :
'ज्ञानयास्याम् मोक्षः' અથ–સમ્યફ જ્ઞાન અને ક્રિયાથી જ મોક્ષની પ્રાપ્તિ થઈ શકે છે.
જેમ ગાડીવાનને અમુક રસ્તાની માહીતી છે પણ જે તે રસ્તે બળદને દેરીને નહિ લઈ જાય છે તે સ્થળે ગાડીવાન પહોંચી શકતું નથી, તેવી રીતે મેક્ષરૂપી નગરમાં પહોંચવાને રસ્તે જાણે પણ તે ભણી તથારૂપ ક્રિયા ન થાય તે ઈચ્છિત સ્થળે પહોંચી શકાતું નથી. તેમ જ્ઞાન મેળવવા છતાં યથાયોગ્ય ક્રિયા ન થાય તે આત્મિક સુખની પ્રાપ્તિ થવી અશકય છે.
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मुनितोषिणी टीका
प्रस्तावना रोग्यलाभः; किन्तु रोगनिदानज्ञानपूर्वकनदीयौषधि सेवनेनैव, तथैव न क्रियां । विना ज्ञानमात्रेण पापक्षयः समस्ति भवितुम् ; अपितु ज्ञानपूर्वकक्रिययैवेति ।
किश्च मोक्षम्याव्यवहितकारणमपि क्रियैव, सत्यपि केवलज्ञाने पूर्णयथाख्यातचारित्ररूपक्रियाया अभावे मोक्षाभावात् , तद्भावे च तद्भावात् , अतः सम्यक्रचारित्ररूपायाः क्रियायाः सद्भाव एवाऽजितस्य कर्मणो निर्जरणसंभवेन हो सकती। हाँ, जब रोग के कारण का और औषध का ज्ञान हो जायगा तब यदि औषध का सेवन किया जाय तो रोग मिट सकता है। इसी प्रकार क्रिया के विना अकेले ज्ञान से ही कर्मों का क्षय नहीं हो सकता; बल्कि ज्ञानपूर्वक क्रिया से होता है।
दमरी बात यह है कि मोक्ष का अव्यवहित कारण क्रिया ही है, क्योंकी केवलज्ञान के हो जाने पर भी पूर्ण यथाख्यात चारित्र रूप क्रिया के अभाव से मोक्ष नहीं होजाता । जब पूर्ण यथाख्यात चारित्र हो जाता है तब तत्काल ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। अतः सम्यकचारित्र रूप क्रिया से ही पहले बंधे हुए कर्मों की निर्जरा होकर अन्त में समस्त
જેમ રોગનું નિદાન જાણ્યા પછી ઓષધનું યથાનિયમ સેવન ન થાય તે રોગ જીતે નથી, તેમ સાંસારિક દુ:ખનું કારણ સમ્યફ પ્રકારે જાણ્યા છતાં જે તે દુ:ખના નિવારણ રૂપ સુક્રિયા ન થાય તે દુ:ખને અંત આવતું નથી એટલા જ માટે જ્ઞાન અને ક્રિયા એ બન્નેની આવશ્યકતા છે. આ ઉભય પદને
भi knowledge and action नाले मन मेशन ४३ छे.
मान्ले श्रीय मो से छे 4 शान (Perfect knowledge પરફેકટ લેજ) થયા પછી પણ પૂર્ણ યથાખ્યાત (Perfect પરફેકટ) ચારિત્રના અભાવથી આત્મા સિદ્ધગતિને પામતે નથી.
સમ્યક ચારિત્ર એટલે સમ્યક ક્રિયારૂપ વહન. આ સમ્યફ ક્રિયારૂપ વનથી આત્મા પિતાના કર્મોની નિર્જરા (ટકા) કરે છે, આ નિર્જરા કરતાં કરતાં પિતાની શક્તિ વધારે પ્રમાણમાં કેળવે છે. આટલી શકિત કેળવતાં કેવળ જ્ઞાન થાય છે છતાં અમુક કર્મોની સત્તા રહી જવાથી, આત્માને તે કર્મોની નિર્જરા માટે ઘણું વધારે પ્રમાણમાં શકિત વધારવાની આવશ્યકતા જણાય છે. આવા પ્રકારની જેશબંધ ક્રિયારૂપ વહનને જેને શાસ્ત્રકારો “યથાખ્યાતચારિત્ર” ના
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आवश्यकमूत्रस्य कृत्स्नकर्मात्यन्तविमुक्तस्याऽऽत्मनोऽसङ्गतया अपगतलेपबन्धाऽलाबूवत् , बन्धच्छेदादेरण्डबीजवद् ऊर्ध्वगतिस्वभावादग्निशिखावच्च स्वयमेवाऽऽलोकान्तमूर्ध्वगमनमुपपद्यते ।
इत्थं चाभिनवपापकर्माऽसम्बन्धाय चिरकालप्रवृत्तमिथ्यावाऽविरतिकषाय-प्रमाद-योगादिजनितकर्मकलापपणाशाय च सम्यश्रद्धान-सम्यग्ज्ञानवद्भिरपि निरन्तरं सम्यक्चारित्राऽऽचारणपरायणैरेव भवितव्यमिति निर्णये तादृशचारित्रपवित्रकर्मपतिपादकमिदं- 'भावावश्यकमत्र' सादरमालोक्याऽनाकर्मोंसे सर्वथा छूट कर आत्मा निस्संग होने से, जिसका लेप पानी के योग से छट गया हो ऐसी लॅबी की तरह, बंध का विनाश हो जाने से एरण्ड के बीज की भाँति, ऊर्ध्वगमन करने का स्वभाव होने से अग्नि की लौ की नाई स्वयं ही लोक के अन्त तक ऊर्ध्वगमन करता है। इसलिये नवीन कर्मों का धन्ध रोकने के लिये तथा चिरकाल से लगे हुए मिथ्यात्व अविरति प्रमाद कषाय योग से उत्पन्न होने वाले कर्मों के समूह का नाश करने के लिये सम्यग्दृष्टि और सम्यग्ज्ञानी जनों को भी सम्यक चारित्र में परायण रहना चाहिए। यह निश्चय हो जाने पर इस प्रकार के चारित्ररूप पवित्र कर्तव्य को प्रतिपादन करने वाला यह 'आवश्यक' नामक शास्त्र आदर के साथ पढ कर शीघ्र ही
નામે ઓળખે છે. આ ક્રિયારૂપ વહન છેવટનું વહન છે, અને આ વહન પ્રાપ્ત થયે સર્વ કર્મને ક્ષય થવે જોઈએ, જે સર્વ કર્મને ક્ષય થયે અનંત આત્મિક સુખ इस छ.
જેમ લેપ લગાડેલ તુંબીપાત્ર પાણીના વેગથી લેપમાંથી મુક્ત થાય છે ને જેમ તે તુંબીપાત્ર પાણીની સપાટીએ તરે છે તેમ આત્મા કમરૂપી રજથી ચારિત્ર વડે મુક્ત થઈ સંસારની સપાટી પર રહે છે, જેને અંગ્રેજીમાં surface of the world (सरथ सोई घी १६६) ४ छे.
નવા કર્મોના બંધનની રૂકાવટ માટે અને લાંબા વખતથી વ્યાપ્ત એવા મિથ્યાત્વ અવિરતિ, પ્રમાદ, કષાય અને યોગથી ઉત્પન્ન થતા કર્મોના નાશને માટે સમ્યગૂ દૃષ્ટિ અને સમ્યફ જ્ઞાનીઓએ પણ સમ્યફ ચારિત્રમાં પરાયણ રહેવું જોઈએ.
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मुनितोषिणी टीका
प्रस्तावना
यासतो झटिति स्वकीयाऽवश्यकर्मणि विज्ञाते तदनुष्टानाय प्रवर्त्तितव्यमुभयलोकसाधनसामग्री संकलन चातुरीचणैर्विचक्षणैः ।
अस्मिन् शास्त्रे निम्नोक्ताः क्रियाः प्रतिपादिताः - (१) सामायिकम् (सावद्ययोगनिवृत्तिः ), (२) चतुर्विंशतिस्तत्रः ( २४ जिनस्तुतिः), (३) घन्दनम् (गुरुवन्दना ), (४) प्रतिक्रमणम् (प्रायश्चित्तम्), (५) कायोत्सर्ग :, (६) प्रत्याख्यानं च ।
या स्वाभीष्टाऽन्यानभीष्टभूता क्रिया सा सावधरूपत्वान्नाऽमन्दाऽऽनन्द सरलता पूर्वक आवश्यक क्रियाएँ जान कर इह - लोक-परलोक को साधन करने की सामग्री इकट्ठी करने में कुशलजनों को उनके अनुष्ठान करने में प्रवृत्ति करना चाहिए ।
इस शास्त्र में निम्न - कहीहुई क्रियाओं का प्रतिपादन किया गया है - (१) सामायिक (सावद्य योग की निवृत्ति) (२) चतुर्विंशति स्तव (२४ जिनस्तुति) (३) वन्दना (गुरुवन्दना) (४) प्रतिक्रमण (प्रायश्चित्त) (५) कायोत्सर्ग और (६) प्रत्याख्यान |
जो क्रिया अपने इष्ट और दूसरे के अनिष्ट के लिये की जाती है, वह सावग्ररूप होने से अनन्त अनुपम आत्मिक आनन्द ઉપરોક્ત નિશ્ચય એ ચારિત્રરૂપ પવિત્ર કર્તવ્યને પ્રતિપાદન કરવાવાળા આવશ્યક સૂત્રનું મ્યજ્ઞાની અને સમ્યક્દૃષ્ટિ જીવેએ સાદર પઠન કરવું જોઇએ, અને સૂત્રોકત ક્રિયાનું યથેાચિત અનુષ્ઠાન અવશ્ય થવુ જોઇએ.
સદરહુ શાસ્ત્રમાં નીચે પ્રમાણે ક્રિયાઓનું પ્રતિપાદન કર્યું છે. (૧) સામાયિક ( सावध अर्थनी निवृत्ति ) (२) यतुर्विंशतिस्तवन- २४ तिर्थ पुरोनी स्तुति (3) वहना ( गु३वा ) (४) प्रतिभथु=थ गमेस પાપરૂપ ક્રિયાઓને જોઇ જવી અને ક્રીથી તેવા પ્રકારની ક્રિયા નહિ કરવાનું પ્રતિબંધન કરવું અને થએલ પાપ બદલ હૃદય પૂર્વક પશ્ચાત્તાપ કરવા. (૫) કાર્યોત્સર્ગ ( કાયાને બ્યુલ્સ કરવા કાયાના અંગે પાંગને સ્થિર રાખવાની ક્રિયા, ) (૬) પ્રત્યાખ્યાન-( પચ્ચખાણુ-અમુક કાર્યાં કરવાની આંધી કરવી ).
ने ठिया पोताना दृष्ट અને અન્યના અનિષ્ટ માટે કરાય છે તે પાપકારી હોવાથી અનુપમ આત્મિક સુખ પ્રાપ્ત કરાવનારી નથી. પરંતુ આત્માને
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आवश्यकसूत्रस्य सन्दोहरांजननाय प्रभवति, प्रत्युताऽधोगतिनयनायैव जायते । या तु स्वकल्याणप्रार्थनपूर्वक-समस्तजन्तुजांतशाताभिलाषगर्भिता, मैत्री-प्रमोद-कारुण्य-माध्यस्थ्यभावनारूपजागरयोत्तरोत्तर-वैराग्यवृद्धिकारिणी, सैव निरवद्यरूपतया वास्तविकाऽऽत्मानन्दास्वादसम्पादिका भवतीत्यस्याः षडिधाऽऽवश्यकरूपक्रियायाः साधु-साध्वी-श्रावक-श्राविकाणामुभयकालमवश्यकरणीयस्वादिदं-' भावावश्यक 'मिति कथ्यते, यथोक्तम्को देने वाली नहीं, बल्कि अधोगति में लेजाने वाली है। जो अपने कल्याण की प्रार्थना के साथ समस्त प्राणियों के कल्याण की इच्छा से युक्त, मैत्री, प्रमोद, कारुण्य, माध्यस्थभावना-रूप जागृति से उत्तरोत्तर वैराग्य बढाने वाली होती है, वही क्रिया सच्चे सुख का आस्वादन करा सकती है। छह प्रकार की यह आवश्यक क्रिया साधु साध्वी श्रावक और श्राविका को दोनों समय अवश्य ही करने योग्य है, इसलिये इसे 'आवश्यक' कहते हैं। कहा भी हैઅધોગતિમાં વહન કરનારી છે.
- જે તેમજ પરકલ્યાણ કરવાના ઈરાદાપૂર્વક મૈત્રી, પ્રદ, કારુણ્ય અને માધ્યચ્ય ભાવનારૂપ ક્રિયાનું આચરણ કરવામાં આવે તે તે ભાવનાના પ્રસાદથી આત્મા ઉત્તરોત્તર વૈરાગ્યમય થાય છે, એટલું જ નહીં, પણ અતુલ્ય સુખને આસ્વાદન અંગીકાર કરી શકે છે. મહાત્માઓએ કહ્યું છે કે –
સર્વે મિત્રી ગુણિષ પ્રમોદ કિલશ્કેવું છેષ દયાપરત્વમ, માધ્યઐભાવ વિપરીતવૃત્તો, સદા મમાત્મા વિદધાતુ દેવ.
અર્થા-દરેક જી તરફ મિત્રીભાવ રાખવા, દરેક વ્યક્તિમાં ગુણ શોધીને તેની તરફ આનંદિત થવું, દુઃખી જી તરફ કૃપાદૃષ્ટિ રાખવી, વિપરીત આચરણ કરનારી વ્યકિતઓ તરફ મધ્યસ્થભાવે જેવું.
ઉપકત ચાર પ્રકારની ભાવના જે ક્રિયારૂપે અંગીકાર થાય તે શાશ્વત સુખ તરફ અનુક્રમે વહન થાય છે.
છ પ્રકારની આવશ્યક ક્રિયા સાધુ સાધ્વી, શ્રાવક અને શ્રાવિકાએ અવશ્ય આચરવા યોગ્ય છે, તે આવશ્યકતાને લઈ મજકુર સૂત્ર-સિદ્ધાંતને આપણે “આવશ્યક સૂત્ર” નામે ઓળખીએ છીએ.
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मुनितोषिणी टीका
प्रस्तावना " समणेण सावएण य, अबम्सकायचं हवइ जम्हा ।
अंतो अहोनिसम्स य. तम्हा 'आवस्मयं' नाम ॥१॥” इति ।
यच्च मूत्रमिदमावश्यकमित्याख्यायने. तत्प्रतिपाद्य-प्रतिपादकाऽभेदाऽभिमायादित्यवगन्तव्यम् । आवश्यकं हि नैवोपयोगमन्तरा केवलं शुकवद्-आरटयमानं सम्यक्तया फलपदंः किन्तु सोपयोगं म्वात्मनि नद्गत विषयपरिणमनपूर्वक विधीयमानं सल्लोकोनरफलप्रदमन एवेद-लोकोचरभावावश्यकमिति कथ्यते । यथोक्तं भगवता
"जण्णं इमे समणे वा समणी वा सावए वा साविया वा तच्चिने तम्मणे तल्लेस्से तदज्झवसिए ननिन्वझवसाणे तट्टोवउने नदप्पियकरणे नम्भावणाभाविए
समणेण सावएण य, अवम्मकायव्वं हवइ जम्हा । अंतो अहोनिसस्म य, तम्हा 'आवम्मयं' नाम ।
इन क्रियाओं को 'आवश्यक' कहने का कारण बतलाया जा चुका है । किन्तु इस मंत्र को भी आवश्यक कहते हैं । वह इमलिये कि यहाँ प्रतिपाद्य-जिसका प्रतिपादन किया जाय (आवश्यक), और प्रतिपादक (शास्त्र) के अभेद की विवक्षा है।
विना उपयोग लगाये तोतारटन्नी कर लेने से आवश्यक का वास्तविक फल नहीं होता. किन्तु उपयोग के माय, उनके विषय को आत्मा के साथ एकमेक करते हुए जो आवश्यक किया जाता है वही लोकोत्तर फल देने वाला लोकोत्तर भावावश्यक कहलाता है। भगवान् ने कहा है
"जण्णं इमे समणे वा समणी वा सावओ वा साविया वा
.: ५९ डिय. 3५.५१, १.२३.. . . . त पास्तવિક ફળ પ્રાપ્ત થઈ શકે છે બાકી “પડે. ૫.પરમ. રા.ર. તે સૂત્ર અનુસાર પિપટીઆ જ્ઞાનની માફક મુખધી છે.લી જવું. તેથી કંઇ અર્થ સરતું નથી. ઉપગ અને ભાવપૂર્વકજ અવશ્યક ક્રિય.એ.નું અ.ચરણ થાય તે.જ તેથી ઉપक्षित मानह प्र.11 बाय छे.
ભગવાને કહ્યું છે કે – २ .५ २.५५, श्र.१४ अ.पि. चित्ते. 1.नये, वेले, तय
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आवश्यकमुत्रस्य अण्णत्थ कत्थइ मणं अकरेमाणे उभओकालं आवस्सयं करेंति, सेत्तं लोगुत्तरियं भावावस्मयं ॥"
नन्वेवं तर्हि उपयोगादिकं विनाऽऽवश्यकं न कर्त्तव्यमिति नोद्भावनीयम् , वीतरागमार्गे क्रियाया विरक्ति (हिंसादित्याग) रूपत्वात् , सत्यौषधसेवनवदावश्यकं सर्वेषां कर्तव्यमेव, यथाऽयथाविधानमपि सेव्यमानं सत्यौषधमारोग्यायैव प्रभवति, तद्गत-पथ्याऽपथ्यादिविचारणा-तदनुकूलवर्तना-पूर्वकं सेव्यमानं तु तदेवौषधं समधिकगुणान् प्रदर्शयति । तचित्ते तम्मणे तल्लेस्से तदज्झवसिए तत्तिव्वझवसाणे तदहोवउत्ते तदप्पियकरणे तन्भावणाभाविए अण्णत्थ कत्थइ मणं अकरेमाणे उभओ कालं आवस्मयं करेंति, से तं लोगुत्तरियं भावावस्सयं ।”
___ यहाँ यह प्रश्न उठता है कि, यदि उपयोगपूर्वक आवश्यक करने से ही अलौकिक फल की प्राप्ति होती है, तो क्या विना उपयोग के आवश्यक करना ही नहीं चाहिए ? लेकिन बात ऐसी नहीं है। वीतराग के मार्ग में क्रियाएँ विरक्ति (हिंसा आदि के त्याग) रूप हैं, इसलिए सत्य औषध के समान उनका सेवन अवश्य करना चाहिए। बिना पथ्य के सत्य औषध का सेवन करने से कुछ न कुछ आरोग्य लाभ होता ही है। और यदि पथ्य अपथ्य का विचार रख कर उसके अनुसार प्रवृत्ति की जाय तो अधिक लाभ होता है। इसी प्रकार उपयोग पूर्वक आवश्यक करने से समस्त कर्मों की निर्जरा होती है, વસાએ તદુભાવે આવશ્યક ક્રિયા કરશે તે નિશ્ચયપણે લકત્તરભાવને પ્રાપ્ત કરશે.'
અહિ આ પ્રશ્ન ઉપસ્થિત થાય છે કે જે ઉપગ અને ભાવપૂર્વક આવશ્યક ક્રિયાઓ કરવામાં આવે તેજ અલોકિક ફળની પ્રાપ્તિ થાય છે, તે ફરી પ્રશ્ન થાય છે કે વિના ઉપયોગે આવશ્યક ક્રિયા ન કરવી? પ્રત્યુત્તરમાં જણાવે છે કે સાકર અંધારામાં ખાય તે પણ મિઠાશ આપે છે અને પ્રકાશમાં વિચાર કરીને આસ્વાદન લેતાં લેતાં તે સાકર ખવાય છે અને આનંદ અને શારીરિક વૃદ્ધિ થાય છે. આ ઉપરથી એમ સમજાય છે કે ઉપયોગ પૂર્વક સાકર ન ખવાય તે પણ તેને મીઠાશ ગુણ જાતું નથી. તેમજ આવશ્યક ક્રિયાઓ કદાચ ઉપયોગપૂર્વક ન કરવામાં આવે
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सुनियोषिणी टीका
उपयोगादिपूर्वकं हि क्रियाऽनुष्ठानं सर्वकर्मनिर्जराकरं भवति, यः कश्चिदुपयोगादिविरहितोऽपि क्रियानुष्ठाने प्रवृत्तस्तस्यापि यदा कदाचित्सम्यक्क्रियां विधानं कमपि दृष्ट्वा तीव्रवैराग्यप्राप्त्या यथार्थवैराग्यस्य क्षणमात्रमध्यवसायेन सर्वकर्मनिर्जरासं भवस्तस्मादावश्यकं करणीयमेव सर्वेषामिति निर्विवादम् ।
प्रस्तावना
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षडध्ययनात्मकस्याऽऽवश्यकस्य द्वितीयं नाम ' प्रतिक्रमण ' मित्यस्ति तत्र किं कारणम् ? उच्यते प्रतिक्रमणशब्दः प्रायश्चित्तपर्यायो वर्त्तते । प्रायश्चित्तं हि पापप्रक्षयस्य प्रधानकारणमस्ति यथा विविधोपस्कर परिष्कृतमपि व्यञ्जनादिकं और यदि उपयोग के बिना करे तो भी संभव है कि कभी दूसरों को सम्यक् प्रकार क्रिया करते देख कर उसे तीव्र वैराग्य की प्राप्ति हो जाय और तीव्र वैराग्य क्षण भर भी हृदयमें टिक जाय तो बेडा पार हुआ समझिए । इसलिये सभी को नित्य प्रति आवश्यक करना आवश्यक है ।
आवश्यक सूत्र के छह अध्ययन हैं । इसका दूसरा नाम प्रतिक्रमण है । इसका कारण यह है - प्रतिक्रमण का अर्थ है प्रायश्चित्त । प्रायश्चित्त पाप के प्रक्षय का प्रधान कारण है । यदि अनेक प्रकार के मसालों से युक्त भी व्यञ्जन (साग तथा दाल आदि) हैं; परन्तु उनमें लवण न होवे तो वे स्वादु नहीं होते, अपितु फीके लगते हैं । इसी તે પશુ તે ક્રિયાઓમાં રહેલ અહિંસા, સંવર, કાર્યાત્સ વંદન આદિ ગુણાના લાભ છે જ, પણ જો આવશ્યક ક્રિયાઓ ઉપયેગ અને ભાવપૂર્વક આચરવામાં આવે તે પ્રકાશમાં ખવાએલ સાકરની માક અલૌકિક અને અનુપમ આનંદ પ્રાપ્ત કરાવે છે અને સમસ્ત કર્મોની નિર્જરા થાય છે,
જો ક્રાઇ ઉપયાગ વગર ક્રિયા કરે તે પણ એવા સંભવ છે કે અન્યને રૂડા પ્રકારે ક્રિયા કરતા જોઇ તેને તીવ્ર વૈરાગ્યની પ્રાપ્તિ થાય અને એ તીવ્ર વૈરાગ્ય એક ક્ષણભર હૃદયમાં સ્થિર થાય તે ભવભ્રમણ ને અત આવે, એમ સમજવું; તેથી પ્રત્યેક ભભ્યને હુંમેશ આશ્યક કરવા જરૂરી છે.
આવશ્યક સૂત્રના છ અધ્યયન છે. તેનું ખીજું નામ છે; અને તેનું કારણ એ છે કે પ્રતિક્રમણના અર્થ પ્રાયશ્ચિત્ત છે, અને એટલે પાપને વિશેષ પ્રકારે ક્ષય કરવાનું મુખ્ય કારણ. જેમ વિવિધ મશાલાથી
પ્રતિક્રમણ્ પ્રાયશ્ચિત્ત
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आवश्यकसूत्रस्य लवणमन्तरेण न सुस्वादाई तथा तपश्चर्या-गुरुस्तुति-प्रत्याख्यानादिका सर्वाऽपि क्रिया प्रायश्चित्तं ( पश्चात्तापरूपं ) विना नैव नितान्तसुखफलं प्रापयितुं क्षमा, तद्विषयकं प्रतिक्रमणाख्यं चतुर्थमध्ययनमस्मिन्नस्तीत्यस्य शास्त्रस्य प्रतिक्रमण' मिति नामान्तरं जातम् ।
___यधपि संमृतिगर्तनिपतितानां प्राणिनां यदा तदा येन केन चित्पकारेण पापपङ्कलेपो दुर्निवार्यस्तथापि तस्य पापस्य तत्क्षणमेव पश्चात्तापेनाऽऽलोचना क्रियेत चेत्तदा भुक्ततत्क्षणवान्त विषवत् तदुदयेऽपि जीवः पापजनिततीव्रदुःखभाग् न भवेत् , तत्क्षणकृतप्रायश्चित्तेन दुःखनिदानकर्मणां प्रकृतिस्थित्यनुभाग-प्रदेशप्रकार तपश्चर्या, गुरुस्तुति, प्रत्याख्यान आदि समस्त क्रियाएँ प्रायश्चित्त (पाश्चात्ताप रूप) के बिना आत्मीय-आनन्दप्रद नहीं होती। यह पश्चात्ताप-प्रतिक्रमण इस शास्त्र में प्रतिपादित किया गया है, अतएव इस समूचे सूत्र का भी नाम प्रतिक्रमण पड गया है।
इस संसाररूपी खड्ढे में गिरे हए जीव कभी न कभी, किसी प्रकार पापकर्मरूपी कीचड में फंस ही जाते हैं। ऐसी अवस्था में यदि तत्काल ही उस पाप कर्म का पश्चात्ताप करके उसकी आलोचना कर ली जावे तो खाये हुए विष को तत्काल वमन कर देने की तरह उस पाप कर्म के उदय होने पर भी तीव्र दुःख नहीं भोगना पडता। क्योंकि तत्काल प्रायश्चित्त कर लेने से उसके अनुभाग ભરપુર શાક-દાળ નિમક (સમરસ) ના અભાવે સ્વાદિષ્ટ બનતું નથી અને નીરસ લાગે છે તેમ તપશ્ચર્યા, ગુરૂ સ્તુતિ, પરચખાણ વિગેરે ક્રિયાઓ પ્રાયશ્ચિત્ત વગર આત્મિક આનંદ આપનાર થઈ શકતી નથી. આ પ્રતિક્રમણનું આ શાસ્ત્રમાં પ્રતિપાદન કરવામાં આવે છે. એથી આ આખા સૂત્રનું નામ પ્રતિક્રમણ પડી ગયું છે.
આ સંસાર રૂપ ખાડામાં પડી ગએલ જીવ કયારે ન કયારે કઈને કઈ પાપકર્મ રૂપ કીચડમાં ફસાઈ જાય છે. એવી અવસ્થામાં જે તત્કાલ તે પાપકર્મનું પશ્ચાત્તાપ કરીને આલોચના કરવામાં આવે તે જેવી રીતે ખવાઈ ગયેલું ઝેરનું તરત વમન કરવામાં આવે છે, તેની વિઘાતક અસર થતી નથી તેવી રીતે તે પાપ કર્મને ઉદય ઉપસ્થિત થતાં તેનું તીવ્ર દુ:ખ ભેગવવું પડતું
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मुनितोषिणी टीका
प्रस्तावना बन्धेषु न्यूनत्व-शिथिलत्वसंभवात् । यथा तत्कालविरचितभित्त्यादीनां तद्गतसन्धिबन्धशिथिलीकरणे तत्पातने च नैव प्रयासबाहुल्यमपेक्ष्यते किन्तु कालपाचुर्ये सति तत्पातने तच्छिथिलीकरणे च प्रचुरपरिश्रमाऽपेक्षासम्भवस्तथैव दुःख हेतुभूतकर्मणां तदिवसे तत्क्षणे एव यदि पश्चात्तापः क्रियेत तर्हि नैव तानि भविष्यकाले स्वोदयेऽपि प्रभूतदुःखपदानि जायेरन् प्रत्युताऽऽत्मा लघुकर्मत्वात् ऊर्ध्वगामी सञ्जायेत । यथा मखलीपुत्रो गोशालकः पश्चात्तापप्रायश्चित्तेन स्वकृतघनकर्माणि क्षपयित्या द्वादशे देवलोके देवत्वमवाप, एवं प्रसन्नचन्द्रराजर्षिः सप्तमनरकप्रापकाणि कर्माणि बद्ध्वाऽपि पश्चात्तापेन घनघातककर्मविनाशनपूर्वकं बंध आदि में न्यूनता और शिथिलता हो जाती है । जैसे तत्काल बनाई हुई दीवार को ढीली करने या गिराने में अधिक परिश्रम नहीं करना पडता, किन्तु बहुत दिनों बाद उसे ढीली करने या गिराने में बहुत परिश्रम करना पडता है। वैसे ही दुःख के कारण भूत कर्म (कार्य) का उसी दिन, उसी क्षण ही पश्चात्ताप कर लिया जाय तो उसके उदय आने पर वह अधिक दुःखदायक नहीं होता, बल्कि आत्मा लघुकर्मी होकर ऊर्ध्वगामी बनता है। मंखलीपुत्र गोशालक पश्चात्ताप-प्रायश्चित्त करके, किये हुए घोर कर्मोंको पश्चात्तापसे नाश कर बाहरवें देवलोक में देव हुआ। राजऋषि प्रसन्नचन्द्र सातवें नरक में पहुँचानेवाले कर्मोको मन के परिणामोंसे बांध करके भी पश्चात्ताप के द्वारा घनघातिकर्मों નથી કારણકે પાપનું તાત્કાલિક પ્રાયશ્ચિત્ત કરવાથી તેના અનુભાગ-બંધ વગેરેમાં મંદતા આવી જાય છે. જેવી રીતે નવી ચણેલી દિવાલને તાત્કાલિક ઢીલી કરવામાં અને પાડવામાં વિશેષ પરિશ્રમની જરૂર પડતી નથી પરંતુ તૈયાર થયા બાદ ઘણુ દિવસો પછી તેને ઢીલી કરવા માટે અને પાડવા માટે ઘણોજ પરિશ્રમ કરવું પડે છે. એવી રીતે દુ:ખના કારણરૂપ થએલ પાપકર્મનું તેજ દિવસે તેજ ક્ષણે પ્રાયશ્ચિત્ત કરવામાં આવે છે તે પાપકર્મને ઉદયવિપાક આવ્યે ઉદય કે વિપાક વિશેષ પ્રમાણમાં દુ:ખદાયક બનતા નથી, પરંતુ આત્મા કર્મથી હળવે બની ઉચગતિ દેવગતિમાં જાય છે. મંખલીપુત્ર શાલક પિતે કરેલાં ઘોર પાપ કર્મોનું પ્રાયશ્ચિત્ત કરી પશ્ચાત્તાપથી પાપકર્મોના ઉદયને નાશ કરી બારમાં દેવલે કે દેવ થયા. રાજર્ષિ પ્રસન્નચંદ્ર મનના દુષ્ટ પરિણામે વડે સાતમી નરકે પહોંચાડનાર પાપ
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१२
आवश्यकमूत्रस्य
सद्यः
केवलाssलोकमासाद्य मोक्षमगच्छत्, तत एव पापप्रायश्चित्तस्य प्राधान्ये नाऽस्य नामापि ' तिक्रमण ' मिति जातम् ।
૬
नन्वेवं प्रतिमक्रणम्य ( षडावश्यकात्मकस्य ) पापनिवर्तकत्वे प्रमाणिते प्रतिक्रमणवेतृणां तन्नाशोपायज्ञातृत्वात्पापाचरणप्रवृत्तिर्न शङ्कावहा नापि परिहार्येति वेन्मैवम् - यथा कस्यचित्पार्श्वे विषापहरणौषधं वर्तते तेन किं विषं भक्ष्यते ? एवं वस्त्रधावनोपयोगिक्षारादिसामग्रीसद्भावेऽपि रजकः किं स्ववस्त्राणि पङ्कादिले पेन को नष्ट करके, केवलज्ञान पाए और मोक्ष को प्राप्त हुए । पाप के प्रायश्चित्त की प्रधानता के कारण इस शास्त्र का नाम 'प्रतिक्रमण' है ।
यदि कोई यह तर्क करने लगे कि जब छह अध्ययन रूप प्रतिक्रमण करने से ही पापों से छुटकारा मिल जाता है तो जो प्रतिक्रमण के जानने वाले हैं वे पापों में प्रवृत्ति करने से क्यों झिझकेगें और क्यों पापों का त्याग करेंगे ? क्योंकि उन्हें पापों से छुटकारा पाने का उपाय मालूम है, जब चाहेंगे तब प्रतिक्रमण करके उनसे छुट्टी पा लेंगे। ऐसा विचार करना भी ठीक नहीं है । क्योंकि जिसके पास विष उतारने की ओषधि होती है, वह जान-बूझकर कभी विष खाता है ? क्या कपडे साफ करने के लिये सावुन क्षार आदि पदार्थ जिनके पास मौजूद होते हैं, वे लोग कभी जान-बूझकर अपने कपडे कीचड में लथेड लेते हैं? क्या कोई समझदार કર્માં ખાંધેલ હતા છતાં પ્રાયશ્ચિત્ત દ્વારા તે સ` ઘનઘાતી કર્મોના નાશ કરી દેવળજ્ઞાન પ્રાપ્ત કરી મેક્ષ પ્રાપ્ત કર્યાં. પાપના પાયશ્ચિત્તની પ્રધાનતાના કારણે આ શાસ્ત્રનું નામ પ્રતિક્રમણ છે.
જો કાઈ એવા તર્ક ઉઠાવે કે જ્યારે છ અધ્યયન રૂપ પ્રતિક્રમણુ કરવાથી પાપમાંથી મુકત થાય છે. તે જે પ્રતિક્રમણ જાણનારા છે તે પાપમય પ્રવૃત્તિ કરવાથી શા માટે પાછા હઠે? અથવા પાપ કર્મોના ત્યાગ था भाटे १रे ? તેઓને તે પાપમાંથી મુકિત મેળવવાને ઉપાય હાથમાં છે, જ્યારે ઈચ્છા કરે ત્યારે પ્રતિક્રમણ કરી મુકિત મેળવી શકે. આવેા તર્ક ઉઠાવવા જેની પાસે ઝેર ઉતારવાની ઔષધિ છે તે જાણી બુઝીને ક્દી વળી જેએની પાસે કપડા સાફ કરવા માટે સાબુ, ક્ષાર વગેરે
ઠીક નથી; કારણ
કે
ઝેર પદાર્થા છે તે
ખાય छे ?
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तोषिणी टीका
प्रस्तावना
१३
मलिनीकरोति ? यद्वा गृहे बहव्यः सम्मार्जन्यः सन्तीतिकृत्वा किं बहिः प्रदेशादानीय धूल्यादिकं गृहे विक्षिप्यते ? अपितु न, किन्तु यदि प्रमादादिवशादनभिज्ञतया वा विषभक्षणादि कृतं भवेत्तर्हि तत्प्रयोगेण तन्निवारणमभिमतं विपश्चितां तदेव श्रेयस्करं च, अन्यथा तादृशानुचिताऽऽचरणविख्यापितमौर्यस्य निन्दा - दुःखादिभागित्वं समासादितं भवत्यतो नैवं भावनीयं जैनेन्द्रमवचनानुशीलनशीलैः।
तच्च प्रतिक्रमणं पञ्चधा भवति - (१) दैवसिकं, (२) रात्रिकं, (३) पाक्षिकं, (४) चातुर्मासिकं, (५) सांवत्सरिकं चेति ।
यह विचार करके कि घर में बहुतेरी संमार्जनियां- (बुआरियां) पडी हैं, बाहर से कूडा कचरा इकट्ठा करके घरमें फैलाता है ? नहीं, कदापि नहीं । हाँ, प्रमाद वंश या अनजान में विष का भक्षण हो जाय तो उस दवा का प्रयोग करके उसका प्रतिकार करना समझदारी है, और इसी में भलाई है । अन्यथा अपने अनुचित आचरण से मूर्खता प्रगट होगी और निन्दा तथा दुःख का पात्र बनना पडेगा । इसलिये जिनेन्द्र भगवान् के प्रवचन रूपी प्रशम - पीयूष (अमृत) के पिपासुओं को ऐसी भावना मन में न लानी चाहिए ।
प्रतिक्रमण पाँच प्रकार का है -१ दिवस सम्बन्धी २ - रात्रि सम्बन्धी ३ - पाक्षिक ( पखवाडा) सम्बन्धी ४ - चातुर्मास - सम्बन्धी ५ - संवत्सरશું જાણી જોઈને પોતાના કપડાં કાદવમાં નાખી ગ ંદા કરે છે? ઘરમાં સાફસુપ્રી કરવા માટે ઘણી સાવરણી છે એવા ખ્યાલ કાઇ સમજદાર મનુષ્ય કરી શું महारथी पोताना घरभां य है। ४२शे ? नहि, उद्यापि नहि. हा, કદાચ પ્રમાદથી અથવા અજ્ઞાન દશામાં વિષ ખાવામાં આવે તે તેના ઉતારના પ્રયાગ કરીને વિષના પ્રતિકાર કરવા; તેજ ખરી સમજ છે અને તેજ શિષ્ટ છે. આ સમજનું અનુસરણ ન કરે તે પેાતાના અયેાગ્ય આચરણથી પેતાની મૂર્ખાઇ બહાર આવે છે; અને પોતાને નિંદા અને દુઃખનું પાત્ર ખનવું પડે છે. માટેજ જીને ભગવાનના પ્રવચન રૂપ શાન્ત અમૃતના પાન કરનારાઓમાં આવી અશિષ્ટ ભાવના આવવી ન જોઇએ, આવે કુતર્ક આવવે ન જોઇએ.
રાહ
प्रतिऽभणु यांच प्रभारना छे: - ( १ ) दिवस - संधी (२) रात्रि - संधी (3) पाक्षि-संबंधी (४) यातुर्भास-संबंधी (4) संवत्सर-संबंधी हिवस हरम्यान
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आवश्यकमुत्रस्य नत्र दिवससंजातपापस्य दैवसिकेन, रात्रिसंजातपापस्य रात्रिकेण, एवं पक्ष-चतुर्मास-संवत्सरमजातपापस्य क्रमात् पाक्षिकेण चातुर्मासिकेन सांवत्सरिकेण पतिक्रमणेन शुद्धिविधातव्या भव्यभावनशीलैः ।
ननु प्रतिक्रमणस्य दैवसिक-रात्रिकोभयभेदेनैव सर्वपापप्रक्षयद्वारा शुद्धिसंभवः, प्रतिदिवससंजातपापस्य दिनान्ते दैवसिकेन, रात्रिकृतस्य च रात्र्यन्ते रात्रिकेण प्रतिक्रमणेन शुद्धिसंभवात् , किं पुनः पाक्षिक-चातुर्मासिक-सांवत्सरिकप्रतिक्रमणैः प्रयोजनम् ? इति चेदत्रोच्यते-लोके यथोभयकालं प्रतिदिवसमशनादिसम्बन्धी। दिन में लगे पापों की दैवसिक से, रात्रिमें लगे हुए पापों की
रात्रिक से, इसी प्रकार पक्ष, चतुर्मास और सम्वत्सर (वर्ष) में लगे हुए 'पापों की शुद्धि क्रमशः पाक्षिक चातुर्मासिक और सांवत्सरिक प्रतिक्रमण से भव्य जीवों को करनी चाहिए।
यहाँ यह प्रश्न होता है कि प्रतिक्रमण के दैवसिक और रात्रिक भेद ही ठीक हैं। इन्हीं के द्वारा समस्त पापों से छुटकारा पाया जा सकता है। दिनमें जो पाप लगेंगे उनकी दिन के अन्तमें किये जाने वाले देवसिक प्रतिक्रमण से और रात्रि में लगे हुए पापों की रात्रिके अन्त में किये जानेवाले रात्रिक प्रतिक्रमण से शुद्धि हो जाएगी। फिर पाक्षिक, चातुर्मासिक और सांवत्सरिक प्रतिक्रमणों की क्या आवश्यकता है? इमका समाधान यह है-कि जैसे लोकव्यवहार में प्रतिदिन दो बार भोजन बनाया जाता है, फिर भी त्योहार और उत्सव के समय ग्वीर, થએલાં પાપનું દેવસિકથી, રાત્રિમાં થએલા પાપનું રાત્રિથી, આ પ્રમાણે પખવાડિયા, ચાતુર્માસ અને સંવત્સર દરમ્યાન થએલા પાપની શુદ્ધિ અનુક્રમે પાક્ષિક ચાતુર્માસિક અને સાંવત્સરિક પ્રતિક્રમણથી ભવ્ય જીવેએ કરવી જોઈએ.
અહીં એક એવો પ્રશ્ન ઉઠે છે કે પ્રતિક્રમણના દેવસિક અને રાત્રિક ભેદ ગ્ય છે અને એનાથીજ સમગ્ર પાપોથી મુક્ત થઈ શકે છે. દિવસ દરમ્યાન જે પાપ થાય તેની શુદ્ધિ દિવસને અંતે દેવસિક પ્રતિક્રમણથી અને રાત્રિ દરમ્યાન થએલા પાપની શુદ્ધિ રાત્રિને અંતે રાત્રિક પ્રતિક્રમણથી થાય છે, તે પછી પાક્ષિક ચાતુર્માસિક અને સાંવત્સરિક પ્રતિક્રમણ કરવાની શી જરૂર છે ?
આ તર્કનું સમાધાન એ છે કે જેવી રીતે લેક વહેવારમાં બે વાર ભોજન
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मुनितोषिणी टीका प्रस्तावना
१५ सम्पादनेऽपि सर्वे पर्वमहोत्सवादितिथिषु ग्वण्ड वाद्यवृतपूग-ऽयूप-लपनश्रीप्रभृतीन् विशिष्टान् भोज्यपदार्थसंभारान् सम्पादयन्ति । यथा वा लोके लोका अनुदिनं भवनं संमार्जयन्तोऽपि दीपावल्यादिपर्वमु तत इनः कोणकादिगताऽज्ञातसकलावकरसंमार्जनेन सविशेषं गृहगतकचवरादिशुद्धिं विदधीति मुपमिद्धमेव, उक्तश्चात्र
"जह गेहं पइदिवस पि मोडियं, तहनि पक्ग्वगंधीमु ।
मोहिन्जइ सविसेमं. एवं इड यावि नायव्वं ।। १ ।।" घेवर, मालपुआ, लपसी आदि विशिष्ट पक्वान तैयार किये जाते हैं, अथवा जैसे लोग प्रतिदिन मकान की मफाई करते हैं तो भी दीपावली आदि त्योहारों पर अच्छी तरह कोने-आंतर तक झाड-वुहार कर सफाई करते हैं, वैसे ही दैवमिक और रात्रिक प्रतिक्रमण कर लेने पर भी अनाभोग-(अनजाने) लज्जा मन्दपरिणाम आदि कारगांसे या अज्ञान के कारण यदि पूरी शुद्धि न हो तो पाक्षिक आदि प्रतिक्रमणों में, लगे हुए उन-उन अतिचार-अनाचार का स्मरण करने से विरक्ति ( हिंसा आदि के त्याग ) की अधिक भावना होती है और भलीभांति पाप की शुद्धि हो जाती है। कहा भी है
"जह गेहं पइदिवसं पि मोहियं, नहवि पक्वमंधीसु । सोहिजड़ मविसेस, एवं इह यावि नायव्वं ॥ १ ॥" બનાવવામાં આવે છે તેમ છતાં પણ તહેવાર અને ઉત્સવના દિવસે ખીર મ. ૧. धुवा, १.५सी, भी55 वगेरे ५४१:न या२ ४२१.म. म.ये : मनवीन મનુષ્ય હમેશા પિતાના મકાનની સફાઈ રાખે છે તે પાગ ઢવ.ની વગેરે તહેવરે ઉપર વિશેષ પ્રકારે ખૂણે ખાંચેથી પણ સાફસુફી કરે છે, એવી જ રીતે દેવસિક અને રાત્રિક પ્રતિક્રમણ કરી લેતાં અજાણ પણે, શરમથી મંદ પારણામ આદિ કારણે.થી અથવા અજ્ઞાનથી જે પાપની પૂર્ણ થા ન હોય તે પાક્ષિક વગેરે પ્રતિક્રમમાં ભૂતકાળમાં લાગેલા અતિચાર અનાચાર (પાપ) ના સ્મરણ કરવાથી હિંસા વગેરેના ત્યાગની અધિક ભાવના જાગૃત થાય છે, અને સંપૂર્ણ પણે રૂડી રીતે પાપની શુદ્ધિ થાય છે. કહયું પણ છે–
"जह गई पड़दिवमंपि मोहियं, नहवि पग्वगंधीमु सोहिज्जइ मविमेमं, एवं इन यावि नायव्वं ।। १ ।।
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१६
आवश्यकमुत्रस्य
ऽपि
तथैव प्रतिवासरं दैवसिकरा त्रिकमतिक्रमणमुभयकालमावश्यक करणे अना भोगलज्जामन्दपरिणामादिकारणवशेनाऽनभिज्ञतया वा यदि सम्यक्शुद्धिर्न जायेत तदा तेन पाक्षिकादिषु तत्तदतिचारस्मरणेन समधिकवैराग्यभावना पुरस्सरा पापशुद्धिः समीचीना भवति, ततः पाक्षिकादिमतिक्रमणमपि करणीयमेवेति सिद्धम् ।
अस्तु तावत्, किन्तु सांवत्सरिकप्रतिक्रमणं यत्र कर्त्तव्यत्वेन विहितं तत्र किमन्यैर्देवसिकादिभिः प्रयोजनम् ? संवत्सरसञ्जातपापत्रातानां संवत्सरान्ते सांवत्सरिकम तिक्रमणेन क्षयः स्यादेवेति चेत्, उच्यते - दैवसिकादिप्रतिक्रमणविधानेन सद्यः - संलग्नमलमलिनसद्यो धौतवस्त्रवत्सद्यः कृतपापपरिशुद्धिः सद्य एव संजायते, तेन च चारित्रशुद्धिर्विशिष्टतरा भवति, कालातिक्रमे सति प्रतिक्रमणेन
अतः पाक्षिक आदि प्रतिक्रमण भी अवश्य करना चाहिये ।
प्रश्न- जब सांवत्सरिक प्रतिक्रमण करने का विधान कर दिया तो देवसिक आदि प्रतिक्रमण की क्या आवश्यकता है ? वर्ष भरमें जो पाप लगेंगे उनका वर्षके अन्तमें सांवत्सरिक प्रतिक्रमणसे क्षय हो ही जायगा ।
उत्तर - यह है कि जिस प्रकार कपडे पर लगे हुए दाग को तत्काल धोने से वह साफ हो जाता है उसी प्रकार देवसिकादि प्रतिक्रमण करनेसे लगे हुए पापकी तत्काल परिशुद्धि हो जाती है, जिससे चारित्रशुद्धि अत्यन्त विशिष्ट होती है। समय के बीत जाने पर जो प्रतिक्रमण किया जाय तो लगे हुए दोषों का विस्मरण हो जाना आदि अनेक दोषों का प्रसंग आता है; अतः ऊपर की ऊपर
માટે પાક્ષિક વગેરે પ્રતિક્રમણ્ણા અવશ્ય કરવાં જોઇએ.
પ્રશ્ન :– જ્યારે સાંવત્સરિક પ્રતિક્રમણ કરવાના નિર્દેશ કરવામાં આવ્યે છે ने તે પછી દેવસિક, રાત્રિક પ્રતિક્રમણ કરવાની શી જરૂર છે ? વર્ષ દરમ્યાન પાપે થાય તેનું નિવારણ વર્ષને અ ંતે સાંવત્સરિક પ્રતિક્રમણ કરવાથી થઈ જાય છે. ઉત્તર—એ છે કે:-જેવી રીતે કપડા ઉપર લાગેલા ડાઘને તત્કાલ ધેાઇ નાંખવાંથી તે કપડું સાક્ થઇ જાય છે, તે પ્રમાણે દૈવસિકાદિ પ્રતિક્રમણુ કરવાથી જે કેાઇ પાપ લાગેલાં હેાય તેની તત્કાલ શુદ્ધિ થઈ જાય છે. જેના વડે ચારિત્ર શુદ્ધિ અત્યન્ત વિશુદ્ધ થઇ જાય છે સમય વીતી ગયા પછી જો પ્રતિક્રમણુ કરવામાં આવે તે જે કાંઇ દાષા લાગેલા હેય તેનું વિસ્મરણ (ભૂલી જવું ) થવું આદિ
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नितोषणी टीका
कृतातीचारविस्मरणादिदोष बाहुल्यमसङ्गः, मेवानुष्ठेयम् । अन्यदपि श्रूयताम् -
प्रस्तावना
१७
ततः
देवसिकादिप्रतिक्रमणमवश्य
यथा कोऽपि मृदुल पल्लवित कलम्बः प्रचण्ड मार्तण्डाऽऽतपेन म्लानो न केवलमेकवारसलिलसिञ्चनेन किन्त्वनेकशः सलिलसेकेन पूर्वावस्थामानोति तथैवाऽत्राऽपि बोध्यम् । अन्यच्च
पूर्व तु आत्मसंयमे तीव्रोपयोगस्याऽखण्ड परिणत्याऽविचलावस्थया पापलेपोऽसंभाव्यः, यदि प्रमादादिना पापसंपर्कस्तदा तत्क्षण एवं पश्चात्तापादिना तस्य पाप की विशुद्धि के लिए दैवसिकादि प्रतिक्रमण अवश्य करना चाहिए । फिर भी उदाहरण यह है ।
जैसे लहलहाता हुआ पौधा धूपसे मुरझा जाय तो एक बार जल सींचने से ही हराभरा नहीं हो सकता ! बारम्बार जल सींचने की आवश्यकता होती है । इसी प्रकार व्रतरूपी पौधा अतिचाररूपी धूपसे मुरझा गया तो उसे पूर्वावस्थामें बारम्बार प्रतिकमणरूप जलसिञ्चन की आवश्यकता है अत एव दैवसिक रात्रिक आदि सभी प्रतिकमण करने योग्य हैं। अथवा
प्रथम तो चाहिए कि तीव्र उपयोग की अखंड परिणति और अविचल अवस्था द्वारा पापका लेप भी न लगने दें। यदि प्रमादाઅનેક દોષોના પ્રસંગ આવે છે. એ કારણથી ઉપર કહેવામાં આવેલા પાપની વિશુદ્ધિને માટે જૈવસિકાદિ પ્રતિક્રમણુ અવશ્ય કરવું જોઇએ. ફ્રી પણ સાંભળે !
જેવી રીતે લીલાછમ રહેલા ડવાએ (વૃક્ષના છેડવા) તાપથી તદ્દન સૂકાઇ જાય તો એક વખત પાણી સીંચન કરવાથી તે લીલાછમ જેવા થઇ શકતા નથી, પરન્તુ તે છેડવાઓને વારંવાર પાણીનુ સીંચન કરવાની આવશ્યક્તા રહે છે એ પ્રમાણે વ્રતરૂપી છોડ અતિચાર રૂપી તાપથી તદ્ન સૂકાઈ ગયા તે તેને પૂર્વ જે સ્થિતિમાં હતા તેવી સ્થિતિમાં લાવવા માટે વારંવાર પ્રતિક્રમણુ રૂપ પાણીનું સિંચન કરવાની આવશ્યકતા છે. એટલા માટે દૈસિક રાત્રિક આદિ સ પ્રતિક્રમણ કરવા ચેગ્ય છે. અથવા—
પ્રથમ તે ઇચ્છીએ કે તીવ્ર ઉપયેગની અખંડ પરિણતિ અને અવિચલ અવસ્થા દ્વારા પાપને લેપ પણ લાગવાજ નહિ દેવેા જોઇએ પરંતુ જો કે
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आवश्यकसूत्रस्य नाशो विधेयः। तत्क्षण एव पश्चात्तापाभावे दिवसान्ते राज्यन्ते पक्षान्ते चतुमासान्ते च क्रमेण प्रतिक्रमणेन पापक्षयो विधातव्यः। यदि च प्रगाढप्रमादादि. वशात् पूर्वोक्तसमयेषु पश्चात्तापादि समाचरितं न भवेत् तदा संवत्सरान्ते खवश्यमेव शुद्धान्तःकरणेन संवत्सरसमुद्भूतपापानि स्मारं स्मारं प्रतिक्रमणमवश्यमाचरणीयम्; अन्यथा पापानां वज्रले पायितत्वमेवाऽऽपद्येत । अत्र दृष्टान्तः
यथा केनचिन्नरेण ऋणविशोधनसमयो नियतीकृतो यथा-"अह-ममुकादिवश पापका संपर्क हो जाय तो उसी क्षण पश्चात्तापादि द्वारा उसका नाश कर देना चाहिये । अगर उस वक्त पश्चात्तापादि न
हो सका तो दिन, रात्रि, पक्ष, एवं चतुर्मास के अन्तमें अनुक्रम • से प्रतिक्रमण द्वारा पाप का क्षय कर देना जरूरी है, यदि प्रगाढ प्रमाद आदिके कारण पूर्वोक्त समय चूक गया हो अर्थात् पूर्वनिर्दिष्ट समयमें अतिचार शोधन नहीं किया गया हो तो संवत्सर (वर्ष) के अन्तमें तो मनुष्यको शुद्धअन्तःकरण हो कर वर्षभर के लगे हुए पापों को याद कर-कर के प्रतिक्रमण अवश्य करनाही चाहिये। ऐसा न किया जाय तो लग हुए पाप वज्रलेप जैसे हो जावेंगे, अर्थात् पाप से अपने को छुडाना मुश्किल पडेगा । इस पर दृष्टान्त कहते हैं
जैसे किसी मनुष्यने ऋण चुकाने के लिए पांच वार की પ્રમાદ આદિ દોષના વશ થવાથી પાપનો સંપર્ક થઈ જાય છે તે જ સમયે પશ્ચાત્તાપાદિ દ્વારા તેને નાશ કરી દેવે જોઈએ. અથવા તે તે સમયે પશ્ચાત્તાપાદિ ન કરી શકાય તે દિવસ, રાત્રિ, પક્ષ, એ પ્રમાણે ચતુર્માસના અન્તમાં અનુક્રમથી પ્રતિક્રમણ દ્વારા પાપ નાશ કરી દે જોઈએ, એ જરૂરી વસ્તુ છે.
જે વિશેષ, બલવાન પ્રમાદ આદિના કારણે આગળ જે સમય કહ્યો છે તે ભૂલી જવાય તે, અર્થાત આગળ કહેલા સમયે પ્રતિક્રમણની ક્રિયા નહિ બની શકે તે સંવત્સર (વર્ષના અંતમાં મનુષ્યએ શુદ્ધ અંત:કરણ થઈને એક વર્ષ સુધીમાં જે પાપ લાગેલા હોય તેને યાદ કરીને પ્રતિક્રમણ અવશ્ય કરવું જ જોઈએ. એ પ્રમાણે કરવામાં ન આવે તે લાગેલા પાપ વોલેપ જેવાં થઈ જશે, અર્થાતપાપથી પિતાને બચવાનું મુશ્કેલ થઈ પડશે. તે માટે દૃષ્ટાંત કહે છે કે –
માની લેશેકે કે મનુષ્યને અણ-દેણું-કરજ)ચૂકાવવા માટે પાંચ
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मुनितोषिणी टीका
प्रस्तावना मुकदिवसे एतावदेतावद्रव्यं दास्यामी"ति तेनाऽस्माद्ऋणदानदिवसात्परं पञ्चमे मासि सकुसीदसकलद्रव्यशोधनं भविष्यतीति, तत्राऽधमर्णस्य नायं भावस्तिष्ठति यदन्तिमसमये पूर्ण सत्येव मया सर्व प्रदेयमिति किन्तु यथाऽवसरं शीघ्रमेव ऋणविशोधनायां मया प्रयासः कर्तव्य इति, अतो यदि नियमितसमयात्मागेव ऋणं विशोध्येत तदाऽधमणस्य महती शोभा संजायते । प्रथमे नियतसमये ऋणविशोधने साधारणी शोभा, द्वितीये मध्यमा, तृतीये किश्चिदूना, चतुर्थे न्यूना, एवं पूर्ण पञ्चमे मासि तु सकुसीदं सर्व द्रव्यमवश्यमेव देयं येन व्यवहारो न त्रुटयेत। किन्तु पूर्णे ऽप्यवधौ यद्यधमर्णः साकल्येन ऋणं न परिशोधयेत् तदाऽवश्यं व्यव
------ - - - - - - - किश्तबन्दी कर दी कि- "मैं इतने इतने दिनोमें इतना इतना ऋण चुका कर इतने दिनोंमें ऊरिन हो जाऊँगा।" ऐसी दशामें किसी भले कर्जदार का यह भाव नहीं होता कि जब किश्तबन्दी का समय पूरा होगा तबही हम सब चुका देंगे, किन्तु जितना जल्दी हो सकता है पहली वार ही ऋण चुका देना चाहेगा, तो तदनुसार यदि नियमित किश्त के समयसे पहले ही ऋण पूरा चुका दे तो उसकी संसार में शोभा होती है। अगर दूसरी किम्त पर सब ऋण चुका दे तो कुछ कम शोभा होती है, एवं तीसरी किश्तपर चुकावे तो उससे कम, चोथीवारमें उससे भी कम शोभा होती है। आखिर पांचवीं वार चुकाना तो उसको बिलकुल लाजिमी है। यदि इस समयभी न चुकावेगा तो साख शोभामें हानि और
હપ્તાની મૂરત બાંધી દીધી કે – “હું અમુક દિવસોમાં અમુક-અમુક ચુકાવીને આટલા દિવસોમાં મુકત થઈ જઈશ” આવી સ્થિતિમાં કોઈ પણ સમજદાર દેણદારની એવી ભાવના થતી નથી કે જ્યારે મૂરત બંધીને સમય પૂરો થશે ત્યારે જ હું સર્વ પ્રકારનું કરજ ચૂકાવી આપીશ? પરંતુ જેટલું વહેલું કરજ ચૂકાવી શકાય તેટલી ઉતાવળથી કરજ ચૂકવવા બનતું કરશે તે સંસારમાં તેની શભા દેખાશે. અથવા તે બીજી મુદ્દત ઉપર તમામ કરજ ચૂકાવી આપશે તે પ્રથમ કરતાં શેભા શેડી ઓછી દેખાશે. ત્રીજી મુદત ઉપર ચૂકવશે તે બીજી કરતાં પણ શેભા ઓછી, ચેથી મૂદત પર ચૂકવશે તો તેથી પણ ઓછી શભા દેખાશે. છેવટે પાંચમી મૂદત પર કરજ ચકાવવું તે તે કરજદાર માટે એકદમ અ ગ્ય છે. તે પણ જે તે
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२०
आवश्यकमूत्रस्य हारस्त्रुट्येत प्रतिष्ठाहानिश्च जायेत, राजद्वारे सातिशयं दण्डनीयश्च भवेत् । एवं प्रतिक्रमणविषयेऽपि बोद्धव्यम् ।
___ ननु इयमावश्यकक्रिया श्रावकश्राविकाणां सर्वेषामेव करणीयेति तु युक्तम् गृहस्थत्वेन तेषां पापसंभवात् , जिनेन्द्रशासनप्रतिपालकानां साधूनां तु सर्वसावधयोगनिवृत्त्यभ्युपगमेन मनोवाकायप्रवृत्तयो विशुद्धा एव भवन्ति कथं पुनस्तेषां पापसंभवो येन दैवसिकादिप्रतिक्रमणैस्तेषामपि तच्छुद्धिः कर्त्तव्या भवेत् ? इति चेदत्रोच्यते
___यथा तालकनियन्त्रितकपाटावरुद्धगृहेऽपि येन केनचित्मकारेण रजःलोकनिन्दा होगी, तथा न्यायालयमें दण्ड पावेगा । यही बात प्रतिक्रमण के विषयमें समझना चाहिए।
प्रश्न यह है कि आवश्यक क्रिया सब श्रावक श्राविकाओं को तो करनी चाहिये, क्योंकि वे गृहस्थ हैं और गृहस्थ होने से पाप लगने की संभावना है। किन्तु जिनेन्द्र भगवान के शासन का पालन करने वाले साधु और साध्वी तो सावध के सर्वथा त्यागी होते हैं, उनके मन वचन और काय की प्रवृत्ति विशुद्ध ही होती है, इन्हें पाप कैसे लग सकता है कि जिसके कारण दैवसिक आदि प्रतिक्रमण करके उन्हें भी पाप की शुद्धि करना आवश्यक हो ?।
इसका समाधान यह है कि जैसे बिलकुल बन्द मकान में સમયે પણ કરજ ચૂકાવી નહિ શકે તે પ્રતિષ્ઠાની હાનિ સાથે લેકનિન્દા થશે તેમજ ન્યાયની અદાલતમાં દંડ થશે; એજ પ્રમાણે પ્રતિક્રમણના વિષયમાં સમજવું नये.
- આ આવશ્યક ક્રિયા સર્વ શ્રાવક શ્રાવિકાઓએ તે કરવી જ જોઈએ. કારણ કે તે ગૃહસ્થ છે, અને ગૃહસ્થ હોવાથી પાપ લાગવાને સંભવ છે, પરંતુ જિનેન્દ્ર ભગવાનના શાસનનું પાલન કરનારા સાધુ અને સાધ્વી તે સાવધના સર્વથા ત્યાગી હોય છે, તેમના મન, વચન અને કાયાની પ્રવૃત્તિ વિશુદ્ધજ હેય છે તેમને પાપ કેવી રીતે લાગી શકે છે? કે જે કારણથી દેવસિક આદિ પ્રતિકમણુ કરીને તેમણે પણ પાપની વિશુદ્ધિ કરવી જરૂરી હોય?
તેનું સમાધાન એ છે કે જે પ્રમાણે એકદમ બંધ કરેલા મકાનમાં પણ
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मुनितोषिणी टीका
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प्रवेशो जायत एव तथैवैतेषां सम्मति यथाख्यातचारित्रासंभवात् साधूनामपि प्रमादसंभवाच्च सूक्ष्मबादरातिचारसंभव एव एतदेवाऽभिप्रेत्य - 'प्रथमान्तिमजिनसाधूनामुभयकालं प्रतिक्रमणमवश्यमेव कर्त्तव्यमिति भगवताऽऽज्ञप्तम्, तथा चोक्तम्“सपडिकमणो धम्मो, पुरिमस्स य पच्छिमस्स य जिणस्स । मज्झिमयाण जिणाणं, कारणजाए पडिक्कमणं ॥ १ ॥ | " इति ।
( आव. नि. ) अपि च अतिचारसंभवाभावेऽपि प्रतिक्रमणकरणेन तज्जनिताऽऽत्मशुद्धेः प्राबल्यं त्ववश्यं संभवति तृतीयवैद्यौषधिवत्, यथा
प्रस्तावना
भी किसी न किसी प्रकार धूल घुस ही जाती है वैसे ही साधुओं के पूर्ण यथाख्यात चारित्र न हो सकने से और प्रमाद का अस्तित्व होने से सूक्ष्म या स्थूल अतिचार लग ही जाते हैं। इसी लिए जिनेश्वर भगवान की आज्ञा है कि- प्रथम और अन्तिम तीर्थकरों के साधुओं को उभयकाल प्रतिक्रमण अवश्य करना चाहिए ।
कहा भी है
सपडिक्कमणो धम्मो, पुरिमस्स य पच्छिमस्स य जिणस्स । मज्झिमयाण जिणाणं, कारणजाए पडिक्कमणं ॥१॥
(आ. नि. )
दूसरी बात यह है कि अतिचार न लगने पर भी प्रतिक्रमण करने से तज्जन्य आत्मशुद्धि की प्रबलता अवश्य होती है । तीसरे वैद्य की ફાઈને કોઈ પ્રકારે ધૂળ ઘુસી જાય છે. તેવીજ રીતે સાધુઓને પૂર્ણ રીતે યથાખ્યાત ચારિત્ર નહિ હાઈ શકવાથી અને પ્રમાદનું અસ્તિત્વ હોવાથી સૂક્ષ્મ અથવા સ્થૂલ અતિચાર લાગીજ જાય છે. એટલા માટે જિનેશ્વર ભગવાનની આજ્ઞા છે કે પ્રથમ અને અન્તિમ તીર્થંકરોના સાધુઓએ બન્ને સમય પ્રતિક્રમણ્ અવશ્ય કરવું જોઈએ –
अह्युं छे :
सपडिकमणो धम्मो, पुरिमस्स य पच्छिमस्स य जिणस्स । मज्झिमयाण जिणाणं, कारणजाए पडिकमणं ॥ १ ॥ (आ.नि.) ખીજી વાત એ છે કે: અતિચાર નહિ લાગે તે પણ પ્રતિક્રમણુ કરવાથી
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आवश्यकमुत्रस्य कश्चिन्नरपतिवैद्यान आहृय प्रोक्तवान्- “ यद् भवद्भिस्तथा विधीयतां यथा मम पाणप्रियस्यादितीयस्य तनयस्य शरीरे आयत्यां रोगस्पर्शोऽपि न संभवेत्" इत्याकर्ण्य तन्मध्यादेको वैद्यः समभ्यधात्- “मत्पार्चे एवंविधं रसायनं विद्यते यद् रोगसद्भावे सेवितं सत् तत्क्षणमेव तं नाशयति, रोगाभावे तत्सेवनं तु नूतनरोगोत्पत्तये जायते” इति । द्वितीयेनोक्तम्-"मदौषधं रोगसद्भावे तं विनाशयति, रोगाभावे तत्सेवने तु न कश्चिद्गुणं दोषं वा प्रदर्शयति"। तदनन्तरं तृतीयो वैद्यः सामोदमवादी-“हे राजन् ! अतिप्रशस्यमद्भुतं च मम रसायनं, नचैताग्रसायनमन्यत्र क्वाप्युपलभ्यते, यदिदं देहस्थितानातङ्कान् समूलं • औषधि की तरह । किसी एक राजाने वैद्यों को बुलाकर कहा-"आप लोग कोई ऐसा उपाय कीजिए कि मेरे प्राणोंसे भी प्यारे लडके को भविष्यमें रोग छ भी न सके।" राजाकी बात सुनकर एक वैद्य बोला"मेरे पास ऐसी दवा है कि रोग होने पर उसका सेवन किया जाय तो पलभरमें उम रोग को मिटा देती है, और रोग न होने पर सेवन किया जाय तो नवीन रोग उत्पन्न कर देती है।” दूसरे वैद्यने कहा"मेरे पास ऐसी दवा है कि-रोग हो तो उसे फौरन दवा देती है और रोग न हो तो न कुछ गुण करती है न अवगुण ।” इसके बाद तीसरे वैद्य प्रसन्नतासे बोले-"महाराज? मेरी दवा अति प्रशंसनीय તજજન્ય આત્મશુદ્ધિની પ્રબળતા અવશ્ય થાય છે. ત્રીજા વૈદ્યની ઓષધિ પ્રમાણે. ઉદાહરણનો ખુલાશો એ છે કે-કેઇ એક રાજાએ વેધોને બોલાવીને કહ્યું કે:આપ લેક કોઈ એ ઉપાય કરો કે મારા પ્રાણથી અધિક વ્હાલા પુત્રને ભવિષ્યમાં રોગ સ્પર્શ પણ ન કરી શકે? રાજાની આ પ્રમાણે વાત સાંભળીને એક વૈદ્ય બોલે કે-“મારી પાસે એવું રસાયણ છે કે-રોગ થાય છે તે રસાયણનું સેવન કરવામાં આવે તે એક પલમાં તે રસાયણ રોગને મટાડી શકે છે, અને પગ ન હોય છતાંય સેવન કરવામાં આવે તે નવે રેગ ઉત્પન્ન કરી આપે છે. બીજા વિશે કહ્યું કે-મારી પાસે એવી દવા છે કે રોગ હોય તે એકદમ તેને દબાવી દે છે, અને રોગ ન હોય અને દવાનો ઉપયોગ કરાય તે નથી ગુણ કરતી કે નથી અવગુણ કરતી. ત્યાર પછી ત્રીજા વૈધે પ્રસન્નતાથી કહ્યું કે મહારાજ ! મારી પાસે જે રસાયણ છે તે બહુજ વખાણવા યંગ્ય અને અદ્દભુત છે, આવું
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प्रस्तावना
मुनितोषिणी टीका
२३ नाशयति, रोगाभावेऽपि सेवितं सदाऽऽगन्तुकाऽऽतङ्कान निवारयति शरीरकान्ति संवर्द्धयति, रसायनस्यास्याऽपराप्यद्भुतचमत्कारजननी शक्तिर्विद्यते यदस्य सेवने पुना रोगशङ्काऽपि न संभवतीति"। राजा च तत्सर्व निशम्य तृतीयवैद्योपदिष्टमेवौषधं तनयाय प्रादापयत्। एवं साधुभिरप्यात्मनीनमेतादृशं क्रियौषधं सेवनीयं येन तद्गतकर्मरोगसंक्षयपूर्वकमागन्तुककर्मरोगावरोधपुरस्सरमात्मशुद्धिः संजायते । अनेन दैवसिकादिकमपि प्रतिक्रमणं साधूनामप्यवश्यमासेव्यम् , पापसद्भावे तत्क्षयस्य तदभावे चाऽऽत्मिकविशुद्धेरवश्यम्भावात् ।
और अद्भुत है। ऐसी दवा और कहीं नहीं मिल सकती। यह शारीरिक रोगोंको जडसे नष्ट कर देती है और रोग न होने पर आगे आने वाले रोगोंको रोकती है, तथा शरीर की कान्ति बढाती है। इसमें एक और चमत्कार यह है कि इसका सेवन कर लिया तो भविष्यमें आने वाले रोगों की आशंका ही नहीं रहती।" राजाने यह सब सुनकर तीसरे वैद्य की रसायन ही अपने लडके को दिलवाई।
साधुओंको भी ऐसी क्रिया रूपी औषध का सेवन करना चाहिये कि जिससे लगे हुए कर्मोंका नाश और आगामी कर्मोंका निरोध हो कर आत्मशुद्धि हो । अतएव साधुओंको दैवसिक आदि प्रतिक्रमण अवश्य करना चाहिए, क्योंकि इससे पाप लगने पर उसका नाश होता है और पाप न भी लगा हो तो आत्मशुद्वि अवश्य होती है। રસાયણ બીજે કઈ સ્થળે મળી શકતું નથી. આ રસાયણ શારીરિક રોગોને જડ-મૂળથી નષ્ટ કરી શકે છે અને રોગ ન હોય અને તે રસાયણને ઉપયોગ કરવામાં આવે તે બીજા રોગોને થતા અટકાવે છે તથા શરીરની કાન્તિ વધારે છે, અને તેમાં એક બીજો ચમત્કાર એ છે કે –તેનું સેવન કરવામાં આવે તે ભવિષ્યમાં રેગ થવાની શંકા રહેતી નથી. રાજાએ આ સર્વ વાત સાંભળી ત્રીજા વૈધની દવા (२साय) 0 पोताना पुत्रने भयावी.
સાધુઓએ પણ એવી ક્રિયારૂપી ઔષધીનું સેવન કરવું જોઈએ કે જેનાથી લાગેલા કર્મોને નાશ થાય અને આગામી કર્મોને નિરોધ (અટકાવ) થઈને આત્મશુદ્ધિ થાય. એટલા કારણથી સાધુઓએ દૈવસિક આદિ પ્રતિક્રમણ અવશ્ય કરવું જોઈએ, કારણકે પાપ લાગે તે પણ તેને નાશ થઈ જાય છે અને પાપ નહિ લાગ્યાં હોય તે આત્મશુદ્ધિ અવશ્ય થાય છે.
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आवश्यकमुत्रस्य
ननु पूर्वे यदभिहितम् - "साधु-साध्वी श्रावक-श्राविकाणामिदं षडध्ययनात्मकमावश्यकमवश्यं करणीय " मिति तद्व्रतिनामवतिनां वा ? इति जिज्ञासायां व्रत्यवति साधारण्येन सर्वेषामेव तेषां तत्करणीयमिति सिध्यति सूत्रे प्रतिपदोक्ततया ततन्नामाऽनुपादानात्. परं तदन्तर्वनि-प्रतिक्रमणाख्यं चतुर्थमध्ययनं तु व्रतसंलग्नाचारशुद्धिमंत्र प्रतिपादयति ततस्तत्करणमत्रतिनामयोग्यमेव, त्रतिष्वपि भिन्न २ व्रतधारिणो भवन्तीति कथं तेषामिदं संपूर्णमध्ययनं युज्यते ? इति चेद्, अत्रोच्यते - अवतिनो तिनो वा भवन्तु नाम तथाऽपि न कोऽपि दोषलेशः समुदेतुं क्षमः, अत्रतिनां तद्रहण तच्छ्रद्धाविपर्यासादिविषयक ः व्रतिनां गृहीतेषु तेषु संलग्नातिचारात्मकः अगृहीतानां चावशिष्टत्रतानां तद्ग्रहणप्रमाद तच्छ्रद्धाविपर्यासादिविषयकश्च पापपश्चातापः करणीय एव, श्रावकत्वेनैत्र तेषां तत्करणाधिकारात् ।
प्रश्न- आपने पहले कहा है कि यह षडध्ययनरूप आवश्यक साधु साध्वी श्रावक और श्राविकाओंको अवश्य करना चाहिए; क्योंकि सूत्रमें 'बनीको करना चाहिए या अवतीको ?' ऐसा विशेष कथन नहीं किया गया है, इससे मालूम होता है कि व्रती और अवती दोनोंको ही करना चाहिए; किन्तु इसमें चौधा अध्ययन प्रतिक्रमण का है वह व्रतोंमें लगे हुए अतिचारोंकी शुद्धि के लिए किया जाना है । ऐसी अवस्थामें अव्रती जीव प्रतिक्रमण करके शुद्धि किस की करेगा ! अब रहे व्रती सो उनमें भी कोई किसी व्रतका धारी होता है, कोई किसी व्रतका, उन सब के लिए एकही प्रतिक्रमण ( पूरा का पूरा ) कैसे उपयुक्त हो सकता है !
પ્રશ્ન—આપે પ્રથમ કહ્યું કે- અ. છ અધ્યયનરૂપ આવશ્યક સાધુ-સાધ્વી અને બ્ર.વક-શ્રાવિક.એ.એ અવશ્ય કરવાં જોઇએ; કારણ કે સૂત્રમાં વ્રતધારીઓને કરવા જોઇએ કે અત્રીએ ને ? એવું વિશેષ કધન કહેવામાં આવ્યું નથી, તેથી જાણી શકાય છે કે-ત્રતી અને અત્રતી સોએ અવચૂક કરવું જોઇએ; પરન્તુ તેમાં ચૈથુ અધ્યયન પ્રતિક્રમનું છે. તે ત્રતેમાં લાગેલા અતિચારોની શુદ્ધિને માટે ક્વેલ છે, એવી અવસ્થમાં અત્રતી જવે.એ પ્રતિક્રમણ કરવું' બ્ય છે, જ્યારે તેને તજ નથી તે! પ્રતિક્રમણ કરીને શુદ્ધિ કાની કરશે ? હવે વ્રતી વિષે કહેવાનું રઘુ તા તેમાં કેજી કયા વ્રતના ધારી અને કે કયા વ્રતના ધારી હોય છે, એ સર્વ માટે એકજ પ્રતિક્રમણ કેવી રીતે ઉપયેગી થઈ શકે?
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मुनितोषिणी टीका प्रस्तावना
२५ यथा न खलु कोऽपि "श्रावकोऽयम्" इति ज्ञात्वा अभक्ष्यमकल्प्यं वा किश्चिदपि वस्तु समर्पयति, श्रावककुलोत्पन्नत्वेनैव तम्याऽकल्प्यवस्तुनातत्यागित्वप्रसिद्धः. तथैवाऽत्रापि ज्ञातव्यम् ।
उत्तर-अवती हो या व्रती, प्रतिक्रमण सबको पूरा करना चाहिए इसमें कोई दोष नहीं आसकता; क्योंकि अव्रती प्रतिक्रमण करेगा तो प्रतिक्रमण का महत्त्व समझनेसे व्रत नहीं ग्रहण करनेका उसे पश्चात्ताप होगा तथा "व्रत ग्रहण करने की क्या जरूरत है ? इनमें क्या धरा है ?” इत्यादि मिथ्या श्रद्धा का पश्चात्ताप होगा, इससे अन्तःकरणमें निर्मलता आदि अनेक आत्मगुण प्रकट होंगे। इमलिए, तथा व्रतधारी को ग्रहण किये हुए व्रतों में लगनेवाले अतिचारोंका, तथा यदि उसने पूरे व्रत न लिये हों तो नहीं लिये हुए व्रतोंको ग्रहण करने में किये हुए प्रमाद और व्रत विषयक विपरीत श्रद्धा के विषयमें पश्चात्ताप होगा इमलिए व्रती या अव्रती मबको प्रतिक्रमण करना ही चाहिए; क्यों कि अवती भी श्रावक हैं और श्रावक होनेसे ही उन्हें प्रतिक्रमण करने का अधिकार हो ही जाता है ।
उत्तर-भवती (प्रत पा२६५ नल ३२ना२) डाय अया प्रती (व्रत ધારણ કરનાર) હેય એ સોએ પૂરેપૂરું પ્રતિક્રમણ કરવું જોઈએ, અને એ પ્રમાણે કરવામાં કઈ પ્રકારને દોષ આવી શકતું નથી. કારણ કે અત્રની પ્રતિક્રમણ કરશે તે પ્રતિક્રમણનું મહત્ત્વ સમજવાથી વ્રત ગ્રહણ નથી કરી શકે તેને પશ્ચાત્તાપ થશે તથા “ત્રત ગ્રહણ કરવાની શું જરૂર છે? તેમાં શું લાભ છે ?” વગેરે બેટી શ્રદ્ધાને પશ્ચાત્તાપ થશે અને તે પશ્ચાત્તાપ કરવાથી અંતઃકરણમાં નિર્મલતા આદિ અનેક આત્મગુણે પ્રગટ થશે, એ માટે તથા વ્રતધારીએ જે વ્રત ધારણ કરેલા હશે તે વ્રતમાં જે જે અતિચારો લાગી શકે છે તે અતિચારને તથા કદાચ પૂરા વતે ગ્રહણ નહિ કર્યા હોય તે આજ સુધી વ્રત-ગ્રહણ નહિ કરવામાં કહેલે જે પ્રમાદ તેમજ વ્રત વિશેની વિપરીત શ્રદ્ધા તે વિષે પશ્ચાત્તાપ થશે, એટલા માટે વ્રતી અથવા તે અગ્રતીએ પ્રતિક્રમણ કરવું જોઈએ. અAતી પણ શ્રાવક છે અને શ્રાવક હોવાથી જ તેને પ્રતિક્રમણ કરવાને અધિકાર મળી જ बनय छे.
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आवश्यक सूत्रस्य
यद्वा- “ अखण्डितं मूत्रमुच्चारणीय" मित्यनुशासनात्, सूत्रेऽक्षरमात्रस्यापि stagesधिकतया बोच्चारणे "हीणक्खरं अच्चक्खरं " इत्यादिना ज्ञानाऽऽशातनाssख्यापनाच्च मृत्रमखण्डमेव पठनीयम्, अन्यथा यद् यद् व्रतं गृहीतमस्ति तत्तद्विषयकपाठमेव तस्मान्निस्सार्य पठने तु हीनाक्षरात्यक्षराय नेक दोषाः संभवन्ति, सर्वेषां तादृशयोग्यताया असंभवात् । सत्यामपि योग्यतायामेवंकर णेऽन्येषामीदिसंभव: ' यदहमप्येवं कथं न करोमी' ति, तेन च यथोक्तमृत्रशैल्या विध्वंससंभवात् तत्तपाठवैषम्याच्चाऽतिशयेना तिचारसंभवस्तस्मात् सर्वैरखण्ड तयैव सूत्रोच्चारणं करणीयमिति सिद्धम् ।
.
"
अथवा शास्त्रों में कहा गया है कि- 'अखण्डितं सूत्रमुच्चारणीयम्' अर्थात् सूत्र अखण्डित बोलना चाहिए । इस कथन से यह सिद्ध है कि खण्डित सूत्र बोलना ठीक नहीं है । जिसने जो व्रत लिया है वह यदि उसी व्रतका पाठ निकाल कर पढे तो 'हीनाक्षर' 'अत्यक्षर' आदि बोलने के अनेक दोष लगेंगे। क्योंकि सबमें ऐसी योग्यता नहीं होती कि वे उस उस पाठ को शुद्ध रीति से निकाल कर पढ सकें। जिन थोडे से व्यक्तियों में ऐसी योग्यता है वे यदि ऐसा करेंगे तो दूसरे अज्ञ जन उनका अनुकरण करने लगेंगे । क्योंकि अधिकांश लोग अनुकरणप्रिय होते हैं । इससे उपरोक्त सूत्र - पठन-शैली में बहुत बाधा पहुँचेगी। अतएव श्रुतपठन के अतिचार टालने के लिये आवश्यकता है कि सूत्र अखण्डित पढा जाय ।
અથવા શાસ્ત્રોમાં કહેવુ છે કે:—
“अखण्डितं मृत्रच्चमुच्चारणीयम्” अर्थात् सूत्र मंडित मोसवु लेाभे-आ વાકયથી એ સિદ્ધ થાય છે કે ખાંડત સૂત્ર ખેલવું તે ઠીક નથી. જેણે જે વ્રત લીધું છે, ते लेोन व्रतने। या अढीने येतो " हीनाक्षर अत्यक्षर" माहि भने दोष લાગશે, કારણ કે સવમાં એવી યાગ્યતા નથી કે તે સ` પાઠને શુદ્ધ રીતે ઉચ્ચારણ કરી શકે. જે થાડીએક વ્યકિતઓમાં એવી યગ્યતા છે તે જો એ પ્રમાણે કરશે તે બીજા અજાણ્યા માણસે તેનું અનુકરણ કરવા લાગી જશે.
કારણ કે મોટા ભાગના માણુસાને અનુકરણ પ્રિય છે. તે કારણથી ઉપર કહેલ સૂત્ર-પઠન-શૈલીમાં બહુજ હરકત આવશે. એ કારણથી શ્રુત અભ્યાસના અતિચાર નિવારણ માટે જરૂર છે કે સૂત્ર અખંડિત વાંચવું.
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मुनितोषिणी टीका
प्रस्तावना अस्त्वेवं दोषपतिविधानं तथापि स्वाध्यायजन्यं ज्ञानावरणीयकर्मक्षयकरं महत्फलं स्ववतिनामप्यनिवार्यमेव । उक्तश्च उत्तराध्ययनमूत्रे
"सज्झाएणं भंते ! जीवे कि जणयइ ? गोयमा ! सज्झाएणं नाणावरणिज्जं कम्मं ख वेइ" इति । एवं चाऽवतिनामपि तत्कर्तुं युज्यत एवेत्यलम् ।
सामायिकम् (१) ननु ‘सामायिकाख्यमध्ययन'-मित्यत्र कः सामायिकशब्दार्थः ? समस्य-समभावस्य आयः लाभो यस्मिन् तत् समायं तदेव सामायिकम,
रही अव्रती जीवों की बात सो प्रतिक्रमण करने से उन्हें ज्ञानावरणीय कर्म का क्षयरूप स्वाध्यायजन्य महत्फल होगा ही। उत्तराध्ययन में कहा भी है-" सज्झाएणं भंते ! जीवे किं जणयइ ? गोयमा ! सज्झाएणं जीवे नाणावरणिज कम्मं खवेइ।" अर्थात्-श्री गौतमस्वामीने पूछा-"प्रभो! स्वाध्याय से जीव को क्या फल मिलता है ?" भगवान बोले-"गौतम ! स्वाध्याय से जीव ज्ञानावरणीय कर्म का क्षय करता है।" अतः प्रतिक्रमण अव्रती जीवों को भी करना ही चाहिए।
सामायिक (१) प्रश्न-सामायिकाध्ययन आप कहते हैं, सो 'सामायिक' शब्द का अर्थ क्या है ?
उत्तर-जिसमें सम-समताभाव का, आय-लाभ हो, उसे
હવે અવ્રતી ની વાત કહીએ તે તે પ્રતિક્રમણ કરવાથી તેને નાનાવરણીય કર્મના ક્ષયરૂપ સ્વાધ્યાયજન્ય મહાન ફળ થશેજ. ઉત્તરાધ્યયન सूत्रमा ध्यु छ :- "सज्झाएणं भंते ! जीवे किं जणयइ ? गोयमा ! सज्झाएणं जीवे नाणावरणिज्जं कम्मं खवेइ" अर्थात्-श्री गौतम स्वाभीमे पूछ्यु " प्रलो! સ્વાધ્યાયથી જીવેને શું ફળ મળે છે? ભગવાને કહ્યું કે ગૌતમ? સ્વાધ્યાયથી જીવ જ્ઞાનાવરણીય કર્મને ક્ષય કરે છે. આ કારણથી પ્રતિક્રમણ અવ્રતી જીએ પણ કરવું જ જોઈએ,
સામાયિક प्रश्न-समाध्यियन भा५ ४ा छ त 'सामायि' शहने अर्थ छ ? ઉત્તર–જેમાં સમ–સમતા ભાવને આય-લાભ હોય તેને સામાયિક કહે છે.
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आवश्यकमूत्रस्य अर्थात् प्राणिमात्रे समभावपूर्वकं सावधव्यापारविरतिसम्पादकम् , उक्तश्च"सामाइएणं भंते ! जीवे कि जणयइ ? सामाइएणं सावज्जजोगविरई जणयइ"
समभावेन चित्तस्थैर्य भवति, तस्मिंश्च सत्येव सकलाः क्रिया यथोक्तविधिना सम्पधन्ते, तस्मात् प्रथममिदं सामायिकाध्ययनमुपन्यस्तम् ।
चतुर्विंशतिस्तवः (२) तदनन्तरं चतुर्विंशतिजिनस्तुतिः कर्तव्या, सा च जीवस्य परमात्मनि सद्भक्तिं जनयति, तया च दर्शनशुद्धिः संजायते, उक्तश्चसमाय कहते हैं और उसीको सामायिक कहते हैं । अर्थात् प्राणीमात्र में समता धर कर समस्त सावद्य व्यापार का त्याग करना। कहा भी है-“सामाइएणं भंते ! जीवे किं जणयइ ? सामाइएणं सावजजोगविरई जणयह।" अर्थात् श्रीगौतम स्वामीने पूछा-प्रभो! सामायिकसे जीव को क्या फल होता है ! भगवान् ने उत्तर दिया'हे गौतम ! सामायिक से सावध योग की निवृत्ति होती है और समभाव उत्पन्न होता है, समभाव से चित्त में स्थिरता आती है, और चित्त की स्थिरता से ही समस्त क्रियाएँ विधि के अनुसार सम्पादित होती हैं। अतः पहले-पहल सामायिक अध्ययन कहा गया है।
चतुर्विंशतिस्तव (२) सामायिक के अनन्तर चौवीस जिनेन्द्रों की स्तुति करनी અર્થા-પ્રાણી માત્રમાં સમતાભાવ રાખીને સમસ્ત સાવદ્ય (પાપમય) વ્યાપારને ત્યાગ કરવે.
____ ५५ छ :- “सामाइएणं भंते ! जीवे किं जणयइ ? गोयमा! सामाइएणं सावज्जजोगविरई जणयइ"
અર્થ-શ્રી ગૌતમ ગણધરે પૂછયું કે હે પ્રભો! સામાયિક કરવાથી જીવને શું ફળ થાય છે? ભગવાને ઉત્તર આપ્યું કે હે ગૌતમ! સામાયિક કરવાથી સાવદ્ય યેગની નિવૃત્તિ થતા સમભાવ ઉત્પન્ન થાય છે અને સમભાવથી સાવદ્ય ક્રિયાની નિવૃત્તિ થાય છે, તેથી ચિત્તમાં સ્થિરતા આવે છે, અને ચિત્તની સ્થિરતાથી સમસ્ત ક્રિયાઓ વિધિ-અનુસાર પ્રાપ્ત થાય છે. એ કારણથી પ્રથમ સામાયિક અધ્યયન કહેલું છે.
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प्रस्तावना
मुनितोषिणी टीका
२९ "चउवीसत्थएणं भंते ! जीवे किं जणयइ ? गोयमा ! चउवीसत्थएणं दसणविसोहिं जणयइ ।” इति ।
दर्शनशुद्धथा च जीव आत्मस्वरूपं लभते, यथा भृङ्गगृहस्थितः कीटविशेषः स्वस्यौघदशायामपि तच्छन्ददृढसंस्कारेण भृङ्गतां प्रतिपद्यते तथैव जीवोऽपि भक्त्युद्रेकेण परम्परया शुद्धस्वरूपं लभतेऽतो द्वितीयमावश्यक चतुर्विंशतिस्तवारव्यमस्ति । २। चाहिये । इमसे वीतराग प्रभु में जीव की भक्ति होती है । भक्ति से दर्शन की विशुद्धि होती है।
. कहा भी है "चउवीसत्थएणं भंते ! जीवे कि जणयइ ? चउवीसत्थएणं दसणविसोहिंजणयह।"-अर्थात् श्री गौतम स्वामीने पूछाभगवन् ! चतुर्विशतिस्तव का जीव को क्या फल होता है ? भगवान् ने उत्तर दिया-दर्शनविशुद्धि होती है। दर्शनविशुद्धि से आत्मा को शुद्ध स्वरूप की प्राप्ति होती है। जैसे भौरे के घर में रहा हुआ कीडा अपनी ओघदशा में भी उसके शब्द के दृढ संस्कार से भौंरा बन जाता है, उसी प्रकार जीव चतुर्विशतिस्तव द्वारा परम्परा से अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त करता है। अतः दूसरा चतुर्विंशतिस्तव है।
यतुविशतिस्त५ (२) સામાયિક પછી વીસ જિનેન્દ્ર દેવેની સ્તુતિ કરવી જોઇએ, એ વડે વિતરાગ પ્રભુમાં જીવેને ભકિત થાય છે, અને ભકિતથી દર્શનની વિશુદ્ધિ થાય છે.
४घु ५५ छ :- चउग्रीसत्यएणं भंते ! जीवे किं जणयइ ? चउवीसस्थएणं दंसणविसोहि जणयइ । अर्थात श्री गौतम ५७यु-भगवन् ! यतुर्विशतित (સ્તવન) કરવાથી જીવને શું ફલ થાય છે? ભગવાને ઉત્તર આપે કે દર્શનવિશુદ્ધિ થાય છે. દર્શનવિશુદ્ધિથી આત્માને શુદ્ધ સ્વરૂપની પ્રાપ્તિ થાય છે. જેવી રીતે ભમરીનાં ઘરમાં રહેલે કીડો પિતાની ઓઘદશામાં પણ તેના શબ્દના દઢ સંસ્કારથી ભમરી બની જાય છે. જેને “કીટ ભંગી ન્યાય કહે છે' તે પ્રમાણે જીવ ચતુવિંશતિસ્તવથી પરમ્પરાથી પિતાના શુદ્ધ સ્વરૂપને પ્રાપ્ત કરે છે. તેથી બીજુ સ્થાન ચતુર્વિશતિસ્તવનું છે.
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आवश्यकमुत्रस्य
। वन्दनम् (३) पापपर्यालोचनं तु वन्दनपूर्वकं गुरुसमक्षमेव करणीयमिति तृतीयं वन्दनाख्यमध्ययनमुक्तम् । वन्दनकेन हि जीवस्योच्चगोत्रादिबन्धो जायते, तथोक्तम्
___ "वंदणएणं भंते ! जीवे कि जणयइ ? बंदणएणं जीवे नीयागोयं खवेइ उच्चागोयं कम्मं निबंधइ, सोहग्गं च णं अपडिहयआणाफलं निवत्तेड दाहिणभावं च णं जणयइ” इति वन्दनाख्यं तृतीयमध्ययनमुक्तम् ।
----- --- _वन्दना (३) पाप की आलोचना वन्दनापूर्वक गुरू के सामने ही करनी चाहिए, यह बात बताने के लिये तीसरा वन्दना नामक अध्ययन है। वन्दना से उच्च गोत्र का बन्ध तथा अन्यान्य फल होते है। कहा भी है-"वंदणएणं भंते ! जीवे किं जणयइ ? वंदणएणं जीवे नीयागोयं खवेइ उच्चागोयं कम्मं निबंधइ, सोहग्गं च णं अप्पडिहयं आणाफलं निवत्तेइ, दाहिणभावं च णं जणयइ" अर्थात् गौतमस्वामी ने पूछा-प्रभो ! वन्दना से जीव को क्या फल होता है ? भगवान् ने उत्तर दिया-वन्दना से नीच गोत्र का क्षय होता है, उच्च गोत्र का बन्ध होता है, सौभाग्य और अप्रतिहत आज्ञा फल को प्राप्त करता है, तथा दाक्षिण्य (अनुकूलता) की प्राप्ति होती है। यह तीसरा अध्ययन हुआ।
हना (3) પાપની આલોચના વંદનાપૂર્વક ગુરુની સમીપેજ કરવી જોઈએ, એ વાત બતાવવા માટે ત્રીજું વંદના નામક અધ્યયન છે. વંદના વડે કરીને ઉચ્ચગેત્રને બંધ તથા અન્યાન્ય ફળ પ્રાપ્ત થાય છે. કહ્યું છે કે –
वंदणएणं भंते ! जीवे किं जणयइ ? वंदणएणं जीवे नीयागोयं खवेइ उच्चागोयं कम्म निबन्धइ, सोहग्गं चणं अप्पडिहयं आणाफलं निवत्तेइ, दाहिणभावं चणं जणयई" અર્થત શ્રી ગૌતમ સ્વામીએ પૂછયું–હે પ્રભે? વંદના કરવાથી જીવને શું ફલ થાય છે? ભગવાને ઉત્તર આપ્ય-ગૌતમ ? વંદના કરવાથી નીચ નેત્રને ક્ષય થાય છે, અને ઉચ્ચ ગોત્રને બંધ થાય છે, સૌભાગ્ય અને અપ્રતિહત આજ્ઞા ફલને પ્રાપ્ત કરે છે તથા દાક્ષિણ્ય (અનુકૂલતા) ની પ્રાપ્તિ થાય છે. આ ત્રીજું અધ્યયન થયું.
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मुनितोषिणी टीका
प्रस्तावना
प्रतिक्रमणम् (४) वन्दनानन्तरं पापप्रायश्चितं कर्तव्यतयोल्लिखितं; दिवसे रात्रौ वा यथा कथञ्चित् कोऽप्यतिचारः संलग्नस्तत्प्रकाशन-तदनुतापन-तन्निन्दादिविधानेन प्रतिक्रमणं विधेयं भव्यैः, अनेन व्रतगतच्छिद्राच्छादनं जायते, तेनाऽऽगन्तुकाऽऽसवजलमात्मनि न प्रविशतीत्यादि बहुविधं फलं जीवो लभते, तथा चोक्तम्
___पडिक्कमणेणं भंते ! जीवे किं जणयइ ? पडिक्कमणेणं वयच्छिद्दाइं पिहेइ, पिहियवयच्छिद्दे पुण जीवे निरुद्धासवे असबलचरित्ते अट्ठसु पवयणमायासु
प्रतिक्रमण (४) . वन्दना के बाद प्रायश्चित्त करने का विधान किया गया है। दिन में या रात में किसी भी प्रकार जो कोई भी अतिचार लगा हो उसे प्रकट करके, उसका पश्चात्ताप करके तथा उसकी निन्दा आदि करके भव्य जीवों को प्रतिक्रमण करना चाहिये । प्रतिक्रमण करने से व्रतों में लगे हुए दोष मिट जाते हैं। आगे आने वाला आस्रव रूपी जल आत्मा रूपी नौका में प्रवेश नहीं कर पाता। इत्यादि अनेक लाभ होते हैं। कहा भी है-"पडिक्कमणेणं भंते ! जीवे किं जणयइ ? पडिक्कमणेणं वयच्छिद्दाई पिहेइ, पिहियवयच्छिद्दे पुण जीवे निरुद्धासवे, असबलचरित्ते अट्ठसु पवयणमायासु उवउत्ते अपुहत्ते सुप्पणिहिए विहरइ।"
प्रतिभा (४) વંદના પછી પ્રાયશ્ચિત્ત કરવાનું વિધાન કરેલું છે. દિવસમાં અથવા રાત્રીએ કઈ પણ પ્રકારને જે અતિચાર લાગ્યું હોય તે પ્રગટ કરીને તેને પશ્ચાત્તાપ કરીને તથા તેની નિંદા કરીને ભવ્ય છે એ પ્રતિક્રમણ કરવું જોઈએ. પ્રતિક્રમણ કરવાથી વ્રતમાં લાગેલા દેનું નિવારણ થાય છે, આગળ આવવાવાળા આસવરૂપી જલ આત્મારૂપી નૌકામાં પ્રવેશ કરવા પામતા નથી. ઇત્યાદિ અનેક લાભ થાય છે,
पडिक्कमणेणं भंते ! जीवे कि जणयइ ? पडिक्कमणेणं वयच्छिदाई पिहेइ, पिहियवयच्छिद्दे पुण जीवे निरुद्धासवे असबलचरित्ते, अट्टम पवयणमायासु उवउत्ते अपुहत्ते सुप्पणिहिए विहरइ ।
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३२
आवश्यकसूत्रस्य
उवउत्ते अपुहत्ते सुपणिहिए विहरइ" । तस्मादिदं प्रतिक्रमणाख्यं चतुर्थमावश्यकमभिहितम् ।
कायोत्सर्गः (५) पूर्व क्रियया मानसिकी वाचिकी च शुद्धिः सञ्जाता, तदनन्तरं कायिकी शुद्धिरावश्यकीति कायमर्थात्कायममत्वं त्यक्त्वाऽऽत्मन्येव रमणं जायते तेन
हे भदन्त ! प्रतिक्रमण करने से किस फल की प्राप्ति होती है ? हे गौतम !-प्रतिक्रमण, व्रतों के छिद्रों को रोकता है, व्रतों के छिद्र रुकजाने से जीव आस्रवरहित होता है, आस्रव रुक जाने से चारित्र निर्मल होता है, चारित्र निर्मल होने से अष्ट' प्रवचन माता में उपयोगवान् (समिति गुप्ति के आराधन में सावधान) होता है, जिससे संयम में तत्परता होती है, और मन, वचन, काया के योग असद्मार्ग से रुक जाते हैं; अतएव वह समाधिभावयुक्त हो कर विचरता है। ___यह प्रतिक्रमण नामक चौथा अध्ययन हुआ।
कायोत्सर्ग (५) पहले की क्रियाओं से मानसिक और वाचिक शुद्धि हुई। હે ભદન્ત ! પ્રતિક્રમણ કરવાથી કયા ફળની પ્રાપ્તિ થાય છે?
હે ગૌતમ? પ્રતિક્રમણ વ્રતનાં છિદ્રોને રોકે છે. વ્રતનાં છિદ્રો રોકાઈ જવાથી જીવ આસવરહિત થાય છે. આસવ રોકાઈ જવાથી ચારિત્ર નિર્મળ થાય છે. અને ચારિત્ર નિર્મળ હોવાથી આઠ પ્રવચનમાં ઉપયોગવાન (સમિતિ ગુપ્તિની આરાધનામાં સાવધાન) બને છે, તેથી સંયમમાં તત્પરતા વધે છે અને મન વચન કાયાના પેગ અસત્ય માર્ગથી રોકાઈ જાય છે. જેથી તે સમાધિભાવવાળો થઈ वियरे छे. આ પ્રતિક્રમણ નામનું એઠું અધ્યયન થયું.
अयोत्सर्ग પ્રથમની ક્રિયાઓ વડે માનસિક અને વાચિક શુદ્ધિ થઈ તેના પછી કાયિક શુદ્ધિ કરવી જરૂરની છે. કાયા ધર્મને આધાર તથા નિમિત્ત ત્યારે બની શકે
टि. १-पांच समिति और तीन गुप्ति मिलकर आठ प्रवचनमाता है।
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मुनितोषणी टीका
प्रस्तावना चातीतपत्युत्पन्नप्रायश्चित्तविशुद्धयादिभिः प्राणी सुखी भवति, उक्तश्चात्र
___“काउसग्गेणं भंते ! जीवे किं जणयइ ? काउसग्गेणं तीयपडप्पन्नपायच्छित्तं विसोहेइ, विसुदपायच्छित्ते य जीवे निव्वुयहियए ओहरियभरुन्चभारवहे पसत्यज्झाणोवगए मुहंसुहेणं विहरइ" ।
इत्यतोऽस्य पश्चमाध्ययनस्य 'कायोत्सर्ग' इति नाम ।। इसके पश्चात् कायिक शुद्धि करना आवश्यक है। काय धर्म का आधार और निमित्त तब ही बन सकता है जब उसमें आत्मीयताममता न रहे। शरीर में ममता न होने को ही कायोत्सर्ग कहते हैं। यह कायोत्सर्ग धर्मसाधक होने से कायिकशुद्धिरूप है। अतएव कांयिकशुद्धि करने के लिये कायोत्सर्ग नामक पाँचवाँ अध्ययन कहा गया है। इससे अतीत अनागत तथा वर्तमान-कालीन प्रायश्चित्त की विशुद्धि आदि होती है और इससे आत्मा सुखी होती है।
कहा भी है-" काउस्सग्गेणं भंते ! जीवे किं जणयइ ? काउसग्गेणं तीयपडुपन्नपायच्छित्तं विसोहेइ, विसुद्धपायच्छित्ते य जीवे निव्वुयहियए ओहरियभरुव्वभारवहे पसत्थज्झाणोवगए सुहंसुहेणं विहरह।"
हे भगवन् ! काउस्सग (कायोत्सर्ग) करने से किस फलकी प्राप्ति होती है ! हे गौतम ! कायोत्सर्ग से अतीत अनागत और છે કે-જ્યારે કાયામાં આત્મીયતા–મમતા ન રહે, એટલે કે શરીરમાં મમતારહિતપણું તેનેજ કાત્સર્ગ કહે છે. તે કાર્યોત્સર્ગ ધર્મસાધક હોવાથી તે કાયિક શુદ્ધિરૂપ છે. એટલા માટે કાયિક શુદ્ધિ કરવા અથે કાયોત્સર્ગ નામનું પાંચમું અધ્યયન કહ્યું છે. તેથી અતીત અનાગત અને વર્તમાન કાલની પ્રાયશ્ચિત્તવિશુદ્ધિ વગેરે થાય છે, અને તેથી આત્મા સુખી થાય છે.
__४थु ५५ छ :- "काउस्सग्गेणं भंते ! जीवे किं जणयइ? काउसग्गेणं बीयपडुपनपायच्छित्तं विसोहेइ, विमुद्धपायच्छित्ते य जीवे निव्वुयहियए मोहरियभरुचभारवहे पसस्थन्झाणोवगए मुहंमुहेणं विहरइ।"
હે ભગવાન! કાઉસગ્ગ (કાયેત્સર્ગ) કરવાથી કયા ફળની પ્રાપ્તિ થાય છે? હે ગૌતમ! કયેત્સર્ગથી અતીત અનાગત અને વર્તમાનમાં લાગેલા અતિચારની
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प्रत्याख्यानम् (६) प्रयाम्यानं नाम उच्चानिगेयः । मवाः क्रियाः म्बीकतावेनहि इच्छानिरोधोऽप्यवश्यं करणीयः । मुक्नांदिभूषणानामुन्चलीकग्गक्रियव प्रत्याम्न्यानमिदं वित्रियात्मकंगविष्कग्णाय प्रभवति. अतो यथावनि प्रन्यायानं करणीयमेव. आम्रवद्वारनिगेवादिविशिष्फलमतिपादकम् , उना
पञ्चक्माणणं मंते ! जीव किं. जगयड ? पञ्चक्खागं आमदाराई निझमा. पञ्चकवाण इच्छानिगई जबयइ. इच्छानिगेहगए नीचे मबदन्वेसु वर्तमान में लगे हुए अतिचारों की शुद्धि होती है और हृदय विशुद्ध होता है. हृदय विशुद्ध होने से आत्मा कर्मभार से हलका होकर प्रशम्नव्यानयुक्त बनता है. और ममाधिभावमें विचरण करता है।
प्रत्याख्यान (३) प्रत्याख्यान इच्छा के निगेध को कहते हैं। जब पूर्वोक्त सभी क्रियाएं स्वीकार करली नो इच्छा का भी निगेष अवश्य करना चाहिए। जैसे मफाई करने से मानेक आमृषण की उज्वलना बहती है, वैसे ही प्रत्याभ्यान से आत्मा में विशिष्ट शक्ति का प्रादुर्भाव होता है। अतएव आश्रव हार के निरोध आदि विशिष्ट फलको देने वाला प्रत्याभ्यान करना ही चाहिए। कहा भी है-" पबचानेणं भंते ! जीवे कि जणयह ? पच्चक्यालेणं आमवदाराई निम्भह, पचक्वाणेणं કૃદ્ધિ થાય છે અને વિશુદ્ધ બને છે. હૃદય વિશુદ્ધ થવાથી અમે કર્મભારથી લવે છે. પ્ર .ની બને છે અને સમ...વમાં વિચરણ કરે છે.
अत्याज्यान ( ७.न. ४२५. तन ...यान , श्या३ पूर्व ४ તમામ ક્રિય.એ.નો સ્વીકાર કરી લીધું. તે પછી ઇને. નિરોધ પણ અવશ્ય કરે છે. જેવી રીતે સફાઈ કરવાથી સેનાના અ.ભૂષણેની ઉજવAતા વધે છે, તેવી જ રીત પ્રત્યાખ્યાનથી અ.મામાં વિશિષ્ટ શકિત ઉત્પન્ન થાય છે. એટલા માટે આવદ્વારન. વિ અદિ વિશિષ્ટ ફળને આપવાવાળા પ્રત્યાખ્યાન શ્રતને કરવું જ
मे यु :- "पच्चकम्बाणणं मत: जीवे किं जनवड ? पच्चक्खाणेणं
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मुनितोषणी टीका
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प्रस्तावना
३५
इति षष्ठमाकं प्रत्याख्यानाख्यं समुपन्यस्तम् ।
एतद्धि षडध्ययनात्मक मात्रव्यकं ( प्रतिक्रमणं ) सर्वेषामुभयकालं करणीयमेत्र । तत्रापि माधृनामनित्रार्यतया कर्त्तव्यमेतत् । यथाऽनिम्त्रच्छवबेषु कालिमाषातशङ्का, धनिनां च लुष्टाकाव्यातङ्गो विशेषरूपेण जञ्जन्यते तथैव. शुद्धचारित्रइच्छानिगेहं जणयह. इच्छानि गेहगए णं जीवे मव्वदव्वेषु विणीयनव्हे सीभृए बिहरड |
..
हे भइन्न ! पचवाण ( प्रत्याख्यान ) करने से किस फल की प्राप्ति होती है । हे गौतम! प्रत्याख्यान करने से आम्रवद्वार रुक जाते हैं और इच्छा का निरोध होता है. इच्छा के निरोध से आहारादि में तृष्णा रुक जाती है. और तृष्णावरोध से आत्मा बाह्य तथा आभ्यन्तरिक सन्ताप से रहित होती है ।
यह प्रत्याख्यान नामक छड्डा आवश्यक हुआ ।
ये उहों आवश्यक यद्यपि सभी को उभय काल करना चाहिए, तो भी साधुओं के लिये उभय काल करना अनिवार्य हैं। जैसे अत्यन्त स्वच्छ कपडे पर धब्बा लगने की आशंका रहती है या धनवानों को लुटेरों का डर विशेष रूप से रहता है. उसी प्रकार
आसवदारा निरंभः पच्चवाणेणं इच्छानिरोडं जगह इच्छा निरोहगए गं जीवे सव्चव्वे वीणीयादे मीडभूए रिड. "
हे हन्तु ! पश्य (अन्य ज्यान) १२०. नी प्राप्ति धाय छे ? हे गोतम ! अन्य ध्यान ४२१.धी २५.१५.२ ६.४४ જય છે અને ઇચ્છનિષ થાય છે, ઇઇ.નિ.ધથી અહે.દિમાં વૃો રેકર્ડ જાય છે તેજ તૃષ્ણાવષથી
માત્મા બાહ્ય અભ્યન્તરિક સન્ન.પી રહિત થ જાય છે.
આ પ્રત્યાખ્યાન નામનું છઠ્ઠું અશ્યક પૂર્ણ થયું.
આ છ .વશ્યક એ કે સર્વને ઉત્તય કાળ કરવાં જોએ, તે પણ સાધુને માટે તે બન્ને કળ કરવું અનિવાય છે. જેમ કે સ્વચ્છ કપડાં ઉપર ડાઘ લાગવાની शंकरडे छे. अधव. तो धनननने ખારી જ્ઞાન આદિ ગુણેથી વિભૂષિત
नेवी ने शुद्ध यात्रि બહુજ રહે છે એ માટે
डरने लय विशेष અને પ.પને. નચ
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आवश्यकमूत्रस्य धारिणां ज्ञानादिगुणगणशालिनां साधूनां सातिशयं पापभयं जायते; अतस्तद्रक्षणोपायभूते कर्मणि तेषामवधानदानमावश्यकमित्यत्र तेषां प्रतिक्रमणविधिरुपदर्शितः, अतोऽस्य 'साधुपतिक्रमणं,-साध्वावश्यकं' चेति नामधेयं जातमिति ॥
अस्य हेतुमर्थ च सम्यगवगम्य स्वस्वपापानां संक्षयाय शैथिल्यापादनाय च सर्वेरेव भव्यभावनशीलैव्यैः प्रयतनीयं, यतो वीतरागप्रणीततया सर्वप्राणिनां तस्पालनं श्वोवसीयसाधायकमिति ।
____ इह खलु निखिले जगतीतले जीवो यदाऽधिकाऽधिकाऽऽधिव्याधिबाधाविकलान्तःकरणः 'त्रायस्व त्रायस्वे' -ति समाक्रोशन् शरणं गवेषयति,
शुद्ध-चारित्रधारी, ज्ञान आदि गुणों से विभूषित साधुओं को पापों • का बहुत डर रहता है। अतः उन्हें रोकने की क्रिया में साधुओं को
सावधान रहना बहुत आवश्यक है। प्रस्तुत सूत्र में साधुओं के प्रतिक्रमण की विधि बताई गई है, इसलिए इसका नाम 'साधुप्रतिक्रमण' और 'साधु-आवश्यक' है।
आवश्यक का हेतु और अर्थ सम्यक रीतिसे जानकर अपनेअपने पापों का क्षय करने अथवा शिथिल करने के लिए सभी भव्यप्राणियों को प्रयत्न करना चाहिए, क्यों कि यह प्रतिक्रमण वीतराग प्रणीत होने से सब प्राणियों को इस प्रतिक्रमण करने रूप वीतराग की आज्ञा का पालन करना कल्याण का साधक है।
जीव आधिव्याधि आदि बाधाओं से अत्यन्त व्याकुल हृदय होकर जब "बचाओ, बचाओ, रक्षा करो" इस प्रकार चिल्लाता પાપને રોકવાની ક્રિયામાં સાધુઓએ સાવધાન રહેવું ઘણું જ જરૂરી છે. પ્રસ્તુત સૂત્રમાં સાધુઓના પ્રતિક્રમણની વિધિ બતાવી છે. એટલા માટે તેનું નામ “સાધુप्रतिभए” भने “साधु-मावश्य" छे.
આવશ્યકને હેતુ અને અર્થ સમ્યફ રીતે જાણી કરીને પિતાના પાપને ક્ષય કરવા અથવા શિથિલ કરવા માટે સો ભવ્ય પ્રાણીઓએ પ્રયત્ન કરે જોઈએ, કારણ કે આ પ્રતિક્રમણ વીતરાગપ્રણીત હોવાથી સર્વ પ્રાણીઓએ આ પ્રતિક્રમણ રૂપ વીતરાગની આજ્ઞાનું પાલન કરવું તે કલ્યાણનું સાધન છે.
જીવ આધિ-વ્યાધિ આદિ બધી પીડાઓથી અત્યંત-વ્યાકુલ-હૃદય થઈને यारे या ! मया ! २६॥ ४२॥ !" मे प्रमाणे अय पामत। 4। समस्त संसा
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मुनितोषणी टीका
प्रस्तावना तदानीं धर्ममन्तरेण नान्यः कोऽपि तस्य शरणीभूय तदात्ति दूरयितुं प्रभवति । तस्मिंश्च क्षणे स पूर्वकृतातिचारादीनि स्मारं स्मारं बहुधा पश्चात्तापं विधत्ते ।
अङ्कुरतामापादितः कालान्तरेण दृढमूलश्च पापवृक्षः पश्चाद्दुरुत्पाटनीयो भवति, अतः पूर्व बीजमेव न वपनीयमिति प्रथमा बुद्धिमत्ता ।
यदि कथश्चिदुप्तमपि भवेत् तर्हि तत्क्षण एव तन्मूलोन्मूलनाय प्रयतनीयमिति द्वितीया ।
____ एवमपि नो चेत्तहि पश्चात्तापादिना तच्छैथिल्यं त्ववश्यं विधेयम् , येन प्रद्धोऽपि दुःखफलकः पापवृक्षो निस्सारत्वेन कालान्तरे दुःखलक्षणकटुफलं जनहुआ समस्त संसार में शरण खोजता है तब धर्म के मिवा और कोई भी शरण नहीं होता, न कोई उसकी चिल्लाहट मिटा सकता है। उस समय वह पहले किए हुए अतिचार आदि का स्मरण कर-करके अत्यन्त पश्चात्ताप करता है।
___अंकुरित हुआ तथा कुछ कालमें दृढ जडवाला होकर वह पापवृक्ष फिर बडे कष्टसे उखाडने योग्य होता है, इसलिए बीज न होना पहली श्रेणी की बुद्धिमत्ता है। यदि असावधानी से बोया गया हो तो तत्काल समूल उग्वाडने के लिए प्रयत्न करना दूसरे दर्जे की बुद्धिमत्ता है। यदि यह भी न हो सके तो पश्चात्ताप आदि करके उसे शिथिल तो अवश्य कर देना चाहिए, जिससे कि दुःखरूप फल देनेवाला पापवृक्ष निस्सार होजाने के कारण રમાં શરણને શોધે છે ત્યારે ધર્મ વિના બીજું કઈ શરણ નથી થતું. તેમજ તેના ભયને ધર્મ વિના કઈ મટાડી શકતું નથી. તે સમયે તેણે પ્રથમ કરેલા અતિચારે આદિનું સ્મરણ કરી કરીને અત્યન્ત પશ્ચાત્તાપ કરે છે.
અંકુરિત થયેલ તથા થોડા સમયમાં દઢમૂળવાળું બનીને તે પાપવૃક્ષ ફરીને મોટા કષ્ટથી ઉખડી શકે તેવું થઈ જાય છે, એટલા માટે પ્રથમ બીજરૂપે થવા ન દેવું તે પહેલી શ્રેણીની બુદ્ધિમત્તા છે. જે અસાવધાનતાથી બીજ વાવી દેવામાં આવ્યું હોય તે તત્કાલ મૂલસહિત ઉખેડી નાખવાને યત્ન કરે તે બીજી શ્રેણીની બુદ્ધિમત્તા છે. એ પ્રમાણે ન બની શકે તે પશ્ચાત્તાપ આદિ કરીને તે પાપને શિથિલ તે અવશ્ય કરવું જ જોઈએ કે જેથી કરીને દુ:ખરૂ૫ ફલ આપવાવાળું પાપવૃક્ષ
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३८
आवश्यकसूत्रस्य यितुं न प्रभवेत् प्रत्युत समूलं शीर्येत । एवं चाऽऽत्मनो निस्सहायाऽवस्था माभूदित्येतदर्थ प्रतिक्रमणंमेव शरणीकुर्वाणैः क्रियाऽऽचरणपरायणान्तःकरणैरवश्यं भवितव्यं भव्यैः, येन ऐहिकाऽऽमुष्मिकसुग्वान्यनुभवितुमर्हताऽधिगम्येत ।
प्रतिक्रमणाऽपरपर्यायमिदमावश्यकमवश्यमनुष्ठेयं निजव्रतमखण्डीकशुकामेन साधुना । अनुष्टानं चेदमितिकर्तव्यतापरिज्ञानमन्तरेणाऽसम्भवि, तच्च (इतिकर्तव्यतापरिज्ञानं ) गूढार्थकानां मूत्राणां सरलव्याख्ययैव सम्भवति सुकुमारमतीनामिदानीन्तनजनानाम् । दुःखरूपी कडुवा फल देने में समर्थ न हो सके, बल्कि शिथिल होता जाय।
__ आत्मा निस्सहाय न हो इसलिए प्रतिक्रमण की शरण में जानेवाले भव्यों को अन्तःकरणसे क्रिया करने में परायण अवश्य होना चाहिए, जिस से इस लोक और परलोक-सम्बन्धी सुखों की प्राप्ति हो सके।
यह प्रतिक्रमण, दूसरा नाम आवश्यक अपने व्रतों को अखण्डित रखने वाले साधु को अवश्य करना चाहिए। यह अनुष्ठान कर्त्तव्यज्ञान के विना नहीं हो सकता। आजकलके अल्पबुद्धिवालों को कर्त्तव्यज्ञान तब ही हो सकता है, जब गूढ अर्थवाले सूत्रों की सरल व्याख्या कर दी जाय। નિસાર થઈ જાય, જેથી દુ:ખ રૂપી કડવા ફળ આપવા સમર્થ થઈ શકે નહિ અને શિથિલ થઈ જાય.
આત્મા નિઃસહાય ન થઈ જાય એટલા માટે પ્રતિકમણનાં શરણમાં જવાવાળા ભવ્ય જીવેએ ક્રિયા કરવામાં પરાયણ અંત:કરણવાળા અવશ્ય થવું જોઈએ, જેથી આ લેક અને પરલેક સંબંધી સુખની પ્રાપ્તિ થઈ શકે.
આ પ્રતિક્રિમણ કે જેનું નામ આવશ્યક છે તેને પોતાના વ્રત રૂપ ગણીને અખંડિત વ્રત ધારણ કરવાવાળા સાધુઓએ અવશ્ય કરવું જોઈએ.
આ અનુષ્ઠાન કર્તવ્યજ્ઞાન વિના થઈ શકતું નથી. આજકાલના અ૯૫બુદ્ધિવાળાઓને કર્તવ્યજ્ઞાન ત્યારે જ થાય છે કે જ્યારે ગૂઢ અર્થવાળા સૂત્રની સરલ વ્યાખ્યા કરી આપવામાં આવે.
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मुनितोषणी टीका
३९
यद्यप्यस्य प्रतिक्रमणस्य भूयस्यो व्याख्या लोचनगोचरतामञ्चन्ति, किन्तु मृक्ष्मेक्षिकया निसमीक्षितासु तासु नैकाऽपि सरला मन्दमतिबोधजनिका च व्याख्या समुपलभ्यते, अतः कोमलबुद्धीनामनायामेन झटित्यर्थावबोधसंजननाय मया मूत्राऽऽशषाऽनुसन्धानपुरम्सरं मुनितोषणी ' - नामधेया टीकेयं विरचिता । एतस्यां प्रायो विषयास्तु प्रमाणी भूतेभ्यः शास्त्रेभ्यः संगृहीता एव, नासंगृह्य विषयान अद्यत्वे प्राचीनानां महर्षीणामभिप्रायं प्रकटीकर्तुं पटिष्ठः कोऽपि भूमिष्ठ उप
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प्रस्तावना
यद्यपि प्रतिक्रमण की बहुतेरी टीकाएँ ( व्याख्याएँ ) दृष्टिगोचर होती हैं, किन्तु उनमें मन्दमतिवाले भव्यों को बोध करानेवाली सरल व्याख्या कोई नहीं है; इसलिए कोमल बुद्धिवालों को विना विशेष परिश्रम के शीघ्र अर्थ-ज्ञान कराने के लिए मैंने सूत्रों का आशय ध्यानमें रखकर इस आवश्यक सूत्र की मुनितोषणी नामकी टीका बनाई है, इस टीकामें विषयों का संग्रह प्रामाणिक शास्त्रों से किया गया है, क्योंकी विना विषयों के संग्रह किये प्राचीन महर्षियोंका अभिप्राय प्रकट करने में आजकलके विद्वान्
જો પ્રતિક્રમણની ઘણીજ ટીકાળા ( વ્યાખ્યાઓ) તેવામાં આવે છે. પરન્તુ તે સ ટીકાઓમાં મઢમતિવાળા ભવ્ય જીવાને એક થઈ શકે તેવી સરલ વ્યાખ્યા કેઇ જોવામાં આાવતી નથી એવે મનમાં વિચ.ર કરીને કોમલબુદ્ધિવાળાઓને વિના વિશેષ પરિશ્રમે શીઘ્ર અનાન કરાવવા મે સૂત્રાના આશયને ધ્યાનમાં રાખીને આવશ્યક સૂત્રની મુનિતાષણી નામની
ટીકા બનાવી છે.
આ
શાસ્ત્રોમાંથી કરવામાં
આ ટીકામાં વિષયાના સંગ્રહ પ્રામાણિક આવ્યા છે; કારણ કે વિષયાના સગ્રહ કર્યા વિના પ્રાચીન મહર્ષિઓના અભિપ્રાયે
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४०
आवश्यकसूत्रस्य लभ्यते, तथापि यथाशक्ति पर्यालोच्य जैनागमसिद्धान्तानुसारेण कतिपये विषया अत्र स्पष्टीकृत्य प्रदर्शिताः सन्ति । समर्थ नहीं हो सकते ! तो भी कितनेक विषय अपनी शक्ति के अनुसार विचार कर जैनसिद्धान्तानुसार स्पष्ट कर के दिग्वलाए गये हैं।
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પ્રગટ કરવામાં આજકાલના વિદ્વાને સમર્થ થઈ શકતા નથી. તે પણ કેટલાક વિષય પોતાની શકિત-અનુસાર વિચાર કરી જેનસિદ્ધાંતાનુસાર સ્પષ્ટ કરીને બતાવ્યા છે.
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२ नमस्कारमन्त्रव्याख्या
४१- ६७
मुनितोषणी टीका
४१
यनमः ॥
॥ अथाऽऽवश्यकसूत्रं सटीकम् ॥ सिरिवद्धमाणदेवं, जिणणाहं कम्मपडलमलरहियं भीमभवगहणविन्भम,-भयत्तमणजीवमग्गणेयारं ॥१॥ लद्धिमंतं महातेयं, जिणसासणदीवयं । चउण्णाणसमावन्नं नच्चा गणहरं वरं
॥२॥ सदत्थसारसंजुत्तं, घासीलालो मुणी वई ।। वित्तिमावस्सयस्साहं, कुणेमि मुणितोसणिं ॥३॥
कर्ममलसे रहित, संसाररूप भयङ्कर अटवी में परिभ्रमण के भय से व्याकुल भव्य जीवों को मोक्षमार्ग पर लाने वाले जिनेश्वर श्री वर्द्धमान स्वामीको ॥ १॥ तथा-जिनशासनके प्रदीपक, चार ज्ञान के धारक, 'आमोसहि' आदि लब्धियों को धारण करने वाले, महा तेजस्वी, सर्वश्रेष्ठ श्री गणधर भगवान को नमस्कार करके ॥२॥ मैं घासीलाल मुनि आवश्यक सूत्र की शब्दार्थसारगर्भित मुनितोषणी नामक टीका को करता हूँ ॥३॥
કર્મમલ વિનાના, સંસારરૂપી ભયંકર અટવીમાં પરિભ્રમણ કરવાના ભયથી વ્યાકુલ ભવ્ય જેને મોક્ષમાર્ગમાં લાવવાવાળા જિનેશ્વર શ્રી વર્ધમાન સ્વામીને (१) तया निसनना प्रदी५४, या ज्ञानाने पा२६५ ४२११७, “आमोसहि" वगैरे લબ્ધિઓને ધારણ કરવાવાળા, મહાન તેજસ્વી સર્વશ્રેષ્ઠ શ્રી ગણધર ભગવાનને નમસ્કાર કરીને (૨) હું ઘાસીલાલ મુનિ આવશ્યકસૂત્રની શબ્દાર્થસારગર્ભિત भुनितोष नामनी 20t यथामुद्धिथी ४३ छु. (3)
। लब्धि स्पर्श करने से ही सब प्रकार की व्याधियों का दर हो जाना, इत्यादि प्रकार की आत्मशक्ति को लब्धि कहते हैं।
'लब्धि-स्पर्श ४२१॥ भात्री १२४ प्रा२ना शग २ ५४ જાય, આવા પ્રકારની આત્મશકિતને લબ્ધિ કહે છે.
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॥ छाया ॥
४२
आवश्यकभूत्रस्य इह षडध्ययनात्मकं श्रमणावश्यक प्रारीप्सित, यस्यादौ पञ्चनमस्कारात्मक मङ्गलं वक्ष्यमाणेभ्यो हेतुभ्यो नियमेन कर्त्तव्यमिति तदर्थ गुरोराज्ञा ग्रहीतव्या, सा च वन्दनापूर्विकैवेति प्रथमं गुरुवन्दनोच्यते
॥ मूलम् ॥ तिक्खुत्तो आयाहिणपयाहिणं वंदामि नमसामि सकारेमि सम्माणेमि कल्लाणं मंगलं देवयं चेइयं पज्जुवासामि मत्थएण वंदामि ॥ सू० १॥
त्रिः कृत्वा आदक्षिणप्रदक्षिणं वन्दे नमस्यामि सत्करोमि सम्मानयामि कल्याणं माल दैवतं चैत्यं पर्युपासे मस्तकेन वन्दे ।। मू० १॥
॥ टीका ॥ ति-त्रिः, त्रीन्। वारानित्यर्थः । आयाहिणपयाहिण अञ्जलिपुटं बवा तं बद्भाञ्जलिपुटं दक्षिणकर्णमूलत आरभ्य ललाटपदेशेन वामकर्णान्तिकेन चक्राकारं त्रिः परिभ्राम्य ललाटदेशे स्थापनरूपम् आदक्षिणपदक्षिणम् ।
___यहां पर छह अध्ययनवाला श्रमणावश्यक सूत्र प्रारम्भ करना है, जिसके आदि में आगे कहेजाने वाले हेतुओं से पंचनमस्काररूप मंगल करना जरूरी है, अतएव उसके लिए गुरु महाराजकी आज्ञा लेनी चाहिए, वह आज्ञा वन्दनापूर्वक ही ली जाती है, इसलिए पहले गुरुवन्दना कहते हैं
'तिक्खुत्तो' इत्यादि । हे गुरुमहाराज! मैं अञ्जलिपुटको तीन वार दाहिने हाथ की ओर से प्रारंभ करके फिर दाहिने हाथ की ओर तक घुमाकर अपने ललाट-प्रदेश पर रखता हुआ प्रदक्षिणा.
અહિં છ અધ્યયનવાળા શ્રમણવશ્યક સૂત્ર પ્રારંભ કરવું છે. જેની શરૂઆતમાં આગળ કહેવામાં આવનાર હતુઓથી પંચ-નમસ્કારરૂપ મંગલ કરવું જરૂરનું છે, તે માટે ગુરૂ મહારાજની આજ્ઞા લેવી જોઈએ. તે આજ્ઞા વંદનાપૂર્વક જ લેવાય છે, તે માટે પ્રથમ ગુરૂવંદના કહે છે.
'तिक्खुत्तो इत्यादि' २३ मारा ! सिटन (माया) मत જમણે હાથ તરફથી આરંભીને ફરી જમણા હાથ સુધી ફેરવીને પિતાના લલાટપ્રદેશ ઉપર રાખીને પ્રદક્ષિણાપૂર્વક સ્તુતિ કરું છું. ત્રણ વખત ઉઠી બેસી અને પાંચ અંગ
1-'द्वित्रिचतुर्यः सुच्' इति क्रियाऽभ्यात्तिगणने सुच् ।
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मुनितोषणी टीका 'खुत्तो'=कृस्वा' ।अथवा 'तिखुत्तो' इति पाठमाश्रित्य 'त्रि कृत्वः' २ इति संस्कृतम् , तथा च सति आदक्षिणप्रदक्षिणमिति क्रियाविशेषणतया समर्थनीयम् । 'वंदामि'= वन्दे वाचा स्तौमि रत्नाधिक, 'नमंसामि'-नमस्यामि-प्रणमामि-कायेन नम्रीभवामीत्यर्थः। “सक्कारेमि"-सत्करोमि अभ्युत्थानादिना, “सम्माणेमि"-सम्मानयामि वस्त्रभक्तादिना, कीदृशम् रत्नाधिकमित्याह-"कल्लाणं"-कल्याणम्-कल्यो मोक्षः कर्मजनितसकलोपाधिरहितत्वात् तम् आसमन्तान्नयतिप्रापयतीति, अथवा कल्येन ज्ञानदर्शनचारित्रलक्षणेनाऽऽरोग्येण आणयति-जीवयति-संसारमोहजालानलज्वालामालावलीढान् मूढान् प्राणिनः प्रशमयतीति वा कल्याणम्। “मंगलं" पूर्वक स्तुति करता हूँ, तीन वार उठ-बैठ पांच अंग झुका कर नमस्कार करता हूँ, अभ्युत्थान आदि से सत्कार करता हूँ, वस्त्र भक्त (अन्न) आदि से सम्मान करता हूँ, क्योंकि आप कल्याणस्वरूप है, अर्थात् कल्य-मोक्ष को देने वाले, अथवा कल्य-ज्ञानदर्शन चारित्ररूप आरोग्य से जन्मजरामरणसंताप-संतप्त भव्य जीवों को अपने सदुपदेशद्वारा शान्ति देने वाले हैं, और मङ्गलस्वरूप हैं; क्योंकि संसार के નમાવીને નમસ્કાર કરું છું. અલ્પત્થાન વિગેરેથી સત્કાર કરૂં છું. વસ્ત્ર ભક્ત (અન્ન) विगेरेथा सन्मान ४३ छु. २५४ मा५ च्या २१३५ छ।, अर्थात् कल्य-मोक्ष मा५पापा मा२ कल्य-ज्ञानशन यात्रि३५ मारोग्यथा, भ, ४२१, मृत्युना दु:मधी તપેલા ભવ્ય જીને પિતાના ઉપદેશદ્વારા શાંતિ આપવાવાળા છે, અને મંગળ
१ कृत्वे'-त्यस्य 'खुत्तो' इत्यार्षत्वात् । न च 'तिक्खुत्तो' इत्यस्य 'त्रि कृत्व' इति संस्कृतमिति वाच्यम् , सुजन्तात्कृत्वमुचो दुर्लभत्वात् । 'तिखुत्तो' इति पाठेऽपि द्वित्रिचतुर्थ्यः सुचा कृत्वमुचो बाधात् , उत्थितायाः प्रदक्षिणमित्यस्य सकर्मकक्रियाऽऽकाङ्क्षाया दुष्परिहरत्वाच्च । २- आर्षत्वात्कृत्वसुच एव समाधानात् ।
२–'चिती संज्ञाने' इति धातोः 'स्त्रियां क्तिन् ' (पा० ३।३। ९४) इति भावे क्तिन् ।
३-वर्णदृढादिस्वाहाह्मणादेराकृतिगणत्वाद्वा स्वार्थे ष्य' 'यस्येति च' (पा० ६।४। १४८) इतीकारलोपः, अत्र पक्षे 'चेइयं' इत्याषत्वात् । यद्वा 'चिञ् चयने' इत्यस्मादेव प्राग्वत् क्तिनादौ चैत्यमिति । धातूनामनेकार्थत्वाधोक्तोऽर्थः । दृष्टं हि परिचिनोतीत्यादौ चित्रो ज्ञानार्थकत्वम् । उपसर्गाणां घोतकत्वमभिप्रेत्य धातूनामेव तत्तदर्थप्रतिपादकत्वसिद्धान्तात् ।
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आवश्यक सूत्रस्य
मं=भवसम्बन्धि बन्धनं, तन्निबन्धनं दुःखं वा गालयति = नाशयतीति यद्वा मन्यते = प्राप्यते स्वर्गो मोक्षो वाऽनेनेति मङ्गः धर्मः तं लाति = गृह्णातीति मङ्गलः= श्रुतचारित्रधर्मधारकस्तम् । “देवयं” देवतैव दैवतं धर्मदेवमित्यर्थः । 'चेइयं ' चैत्यम्, चेतनं 'चित्तिः = सम्यग्ज्ञानम्, तदेव चैत्यम्" । चैत्यशब्दस्य ज्ञानार्थकत्वमुक्तं बोधप्राभृते कुन्दकुन्दस्वामिनाऽपि —
1
बुद्धं जं बोहतो, अप्पाणं वेइयाइ अण्णं च । पंचमहवयसुद्धं, णाणमयं जाण चेदिहरं ॥ इति । राजप्रश्नीयसूत्रे मलयगिरिभिरपि – “कल्लाणं मंगलं देवयं चेइयं " इत्यस्य व्याख्यायां-‘कल्याणं ' - कल्याणकारित्वात्, मंगलं - दुरितोपशमनकारित्वात्, दैवतं देवं त्रैलोक्याधिपतित्वात् चैत्यं - सुप्रशस्तमनोहेतुत्वा' - दिति । भागवते ठ चैत्यशब्देन न केवलं ज्ञानमेव, अपितु पूर्णज्ञानवानात्मा गृहीतोऽस्ति, तथाहि"अहङ्कारस्ततो रुद्रश्चित्तं चैत्यस्ततोऽभवत् ” (तृतीय स्कन्धे षड्विंशतितमे अध्याये श्लो. ६१) इति, विरारूपस्य ब्रह्मणो हृदयात्.... अहङ्कार उत्पन्नस्तस्माद्भुद्रस्तथा चित्तमुत्पन्नं, चिताच चैत्य इत्यर्थः । चैत्यः = क्षेत्रज्ञः, इति तट्टीकायां श्रीधरस्वामी । ' क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुष : ' इत्यमरः । एवमेवात्रैव स्कन्धेऽध्याये च (श्लो० ७० ) प्रोक्तम्-“चित्तेन हृदयं चैत्यः क्षेत्रज्ञः प्राविशद्यदा । त्रिराट् तदैव पुरुषः सलिलादुदतिष्ठत" इति तदस्यास्तीति चैत्यस्तं सम्यग्ज्ञानवन्तमित्यर्थः 1 चैत्यशब्दो नानार्थकः ः स चेहाऽप्रपञ्चितोऽपि प्रसङ्गादन्यत्र निरूपयिष्यते । ' पज्जुवासामि ' पर्युपासे =सविधि सेवे | " मत्थपण वंदामि' मस्तकेन = मस्तकं नमयिस्वेत्यर्थः, वन्दे = अभिवादये || मू० १ ॥
,
दुःखोंका अन्त करनेवाले हैं, अथवा मङ्ग-मोक्ष प्राप्ति के साधनभूत श्रुतचारितरूप धर्म को धारण करने वाले, एवं धर्मदेवस्वरूप है, और चैत्य अर्थात् ज्ञानवान् हैं, अतएव मनवचन काय से मैं आपकी सेवा तथा शिर झुकाकर वन्दना करता हूँ ।। सू० १ ॥
स्व३५ छो; अरण्य संसारना हुन संत साववावाजा छो. अथवा मंग=मोक्षપ્રાપ્તિના સાધનભૂત શ્રુત-ચારિત્રરૂપ ધર્મને ધારણ કરવાવાળા સ્વરૂપ છે, અને ચૈત્ય અર્થાત જ્ઞાનવાળા છે એટલે મન હું આપની સેવા અને મસ્તક નમાવીને વંદના કરૂ
એટલે કે ધર્મદેવ વચન અને કાયાથી છુ. (સૂ॰ ૧)
१ अर्श आदित्वादच् ।
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मुनितोषणी टीका
४५ इमां पट्टिकां त्रिरुच्चार्य त्रिर्वन्दनां च विधाय गुरोः सकाशात्सविनयं षडावश्यकाऽऽज्ञां याचेत, तदनु-"इच्छामिणं भंते ! तुम्भेहि अब्भणुन्नाए समाणे देवसियं पडिक्कमणं ठाएमि, देवसियनाणदंसणचरित्ततवअइयारचिंतणर्ट करेमि काउस्सग्गं" इति पट्टिकां पठित्वा नमस्कारमन्त्रोच्चारणपूर्वकमावश्यकं समारम्भणीयमिति नमस्कारमन्त्रमाह
॥ मूलम् ॥ णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहणं ॥ सू० २॥
॥ छाया ॥ ___ नमः अरिहद्भयः, नमः सिद्धेभ्यः, नमः आचार्येभ्यः, नम उपाध्यायेभ्यः, नमो लोके सर्वसाधुभ्यः ॥ सू० २॥
इस (तिक्खुत्तो के) पाठ को तीन बार पढकर एवं तीन वार ऊठ-बैठ कर पंचांग-नमन-पूर्वक वन्दना करके विनयपूर्वक गुरुसे आवश्यक-प्रतिक्रमण करने की आज्ञा मांगे। बादमें 'इच्छामि णं भंते' का पाठ पढकर पहले नमस्कार-मन्त्रोच्चारणपूर्वक आवश्यक का आरम्भ करना चाहिए, अतएव पहले नमस्कार मन्त्र कहते हैं
'नमो अरिहंताणं' चार घनघातिक कों का नाश करके अनन्त केवलज्ञान केवलदर्शन को प्राप्त करने वाले, अरिहन्त को नमस्कार हो । यहाँ नमः शब्द का अर्थ नमस्कार होता है, वह दो प्रकार का है-(१) द्रव्यनमस्कार और (२) भावनमस्कार । उनमें
આ તિવવૃત્તા ના પાઠને ત્રણ વખત ભણીને તથા ત્રણ વખત ઉઠી-બેસીને પંચાંગ નમનપૂર્વક વંદના કરીને વિનયપૂર્વક ગુરૂદેવ પાસેથી આવશ્યક–પ્રતિક્રમણ કરવાની भाज्ञा भinी. पछी 'इच्छामि गं भंते ना माने प्रथम नभ२४१२-मत्राच्या२९. પૂર્વક આવશ્યકને આરંભ કરે જોઈએ; એ માટે પ્રથમ નમસ્કાર મંત્ર કહે છે. 'नमो अरिहंताणं' यार धन-धाति भनिन उशने मनन्त ठेवणशान शनने प्रात ४२वावा॥ अति भावानने नमः॥२ याय. माहि नमः शहना अर्थ
१ महीभावार्थकात् नम्धातोरौणादिकेऽसिप्रत्यये 'स्वरादिनिपातमव्ययम्' (१-१-३७) इति पाणिनिवचनेनाव्ययत्वम् ।
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आवश्यकमूत्रस्य
॥ टीका ॥
' णमो अरिहंताणं, नमोऽरिहद्भयः = घनघातिककर्मचतुष्टयहन्तृभ्यः । अत्र 'नमः' शब्दस्य द्रव्य ( हस्तपादादिपञ्चाङ्ग ) - भाव (मानादि ) - सङ्कोचार्थकनिपातरूपत्वान्मानादित्यागपुरस्सरशुद्धमनः सन्निवेशपूर्वकः पञ्चाङ्गनमस्कारोऽस्त्वित्यर्थः । नमस्कार्यानाह - 'अरिहंताणं " इत्यादिना ।
'अरिहद्भयः ' अरीन् =ज्ञानावरणीय-दर्शनावरणीय - मोहनीयाऽन्तरारूपाणि घातिकर्माणि घ्नन्ति = नाशयन्तीत्यरिहन्तः तेभ्यः । ' अरहंताणं ' इतिपाठे 'अर्हद्भयः' इतिच्छाया, अत्र पक्षे त्रिकटभवपरम्पराऽटवी पर्यटन परिश्रान्तिनितान्तक्कान्तं प्राणिजातं निर्भयमार्गप्रदर्शनेन तदिष्टां निर्वृति (मोक्ष) - पुरीं नेतुं, यद्वा भव्यजन कर्तृकगुणवर्णनाऽभिवादनादेः सुरनिकरसम्पादिताऽशोकाद्यष्टक
द्रव्यनमस्कार दो हाथ दो घुटने एक शिर, इन पांच अंगों को झुकाना | भावनमस्कार-मान आदि का परित्याग करना ।
ज्ञानावरणीय दर्शनावरणीय मोहनीय और अन्तराय, इन घातिककर्मरूप शत्रुओं का नाश करने वाले, अथवा (अर्हद्भयः) भयङ्कर संसाररूप अटवी में वार वार भ्रमण करने से व्याकुल નમસ્કાર થાય છે તે બે પ્રકારના છે-(૧) દ્રવ્ય નમસ્કાર અને (ર) ભાવ નમસ્કાર. એમાં દ્રવ્યનમસ્કાર બે હાથ બેટી એક માથું આ પાંચે આંગાને ઝુકાવવાં, ભાવનમસ્કાર, માન વિગેરેને પરિત્યાગ કરવે.
જ્ઞાનાવરણીયદનાવરણીય મેહનીય
અને
અંતરાય
અથવા
આ ધાતિક ક રૂપ શત્રુએ ને उरवावाणा, નાથ ' अर्हद्भ्यः' लय ४२ સંસારરૂપ અટવીમાં વારંવાર ભ્રમણ કરવાથી વ્યાકુલ ભવ્યેાને નિયમા અતાવીને શિવપુરીમાં પહોંચાડવાવાળા, અથવા ભવ્ય લેકેથી કરાએલા ગુણવન અભિવાદન વિગેરેના તથા ઇંદ્રાદિક દેવતાઓએ કરેલા અષ્ટમહાપ્રાતિહાર્યાંથી
१ निरुक्तोक्तरीत्या सत्यादिशब्दवस्पृषोदरादित्वात्साधना बोध्या । उकंश्च" वर्णागमो वर्णविपर्ययश्च द्वौ चापरौ वर्णविकारनाशौ । धातोस्तदर्थातिशयेन योगस्तदुच्यते पञ्चविधं निरुक्तम्” इति, “यात्रतामेव धातूनां लिङ्गं रूढिगतं भवेत् । अर्थश्वाप्यमिधेयस्थ, - स्तावद्भिर्गुणविग्रहः" इति च ।
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मुनितोषणी टीका
४७ पातिहार्यरूपायाः सेवायाः शाश्वतिकनिरतिशयसुखस्य चाईन्ति योग्या भवन्तीत्यहन्तस्तेभ्यः । अथवा 'अरहद्भ्यः' इतिच्छाया, रागादिनिदानभूतप्रकृष्टविषयसंबन्धेऽपि वीतरागत्वादिरूपं भावं न रहन्ति न त्यजन्तीत्यरहन्तस्तेभ्य इत्यर्थः । 'अरुहंताणं' इति पाठे 'अरोद्धयःइतिच्छाया, इह पक्षे प्रक्षीणनिखिलकर्मबीजतया कदाऽप्यनुत्पद्यमानेभ्य इत्यर्थः, यदुक्तमौपपातिकमूत्रे-“बीयाणं* अग्गिदड्ढाणं, पुणरवि अंकुरुप्पत्ती ण भवइ, एवामेव सिद्धाणं कम्मबीए दबढे पुणरवि जम्मुप्पत्ती न भवइ" इति । भगवन्तोऽईन्तोऽपि हि सित्यप्तेजोवायुवनस्पतित्रसकायषट्कं भव्यों को निर्भय मार्ग बताकर शिवपुरी में पहुंचाने वाले, अथवा भव्यजनों से किये जानेवाले गुणवर्णन अभिवादन आदि के तथा इन्द्रादिक देवताओं से किये हुए अष्टमहाप्रातिहार्यों से युक्त और शाश्वतिक निरतिशय सुख को पानेवाले, या (अरहद्भ्यः )रागादिके कारणभूत प्रकृष्ट विषयों का संबन्ध रहते हुए भी वीतरागत्वरूप अपने स्वभाव को कभी नहीं छोडने वाले, अथवा (अरोहद्रथः) कर्मबीज के दग्ध होजाने के कारण फिर से कभी जन्म नहीं लेने वाले अरिहन्तों को नमस्कार हो। युत भने वलि निरतिशय सुमने मेगावा, अथवा (अरहद्भ्यः) शाहिना કારણથી ઉત્કૃષ્ટ વિષને સંબન્ધ રહેતા થકા પણ વીતરાગત્વ રૂપ પિતાના સ્વરૂપને ध्यारेय नहीं छोउना२, अथवा अरोहद्भ्यः भभी मजीवाना रणे शथी अर्थ વખત જન્મ નહિ લેવાવાળા અરિહંતેને નમસ્કાર હો.
अरिहंत भगवान स्वयं पटायनी २क्षा ४२ता ४२ता भीon'मा हण मा इण' આવા પ્રકારને ઉપદેશ દેવાવાળા તથા ભયંકર ભવપરંપરાથી ઉત્પન્ન થએલ
१ अशोकवृक्षः सुरपुष्पवृष्टिर्दिव्यध्वनिश्चामरमासनं च । __भामण्डलं दुन्दुभिरातपत्रं, सत्मातिहार्याणि जिनेश्वराणाम् ॥१॥ २ योग्यतार्थकादकर्मकात् 'अई' धातोर्लटः शत्रादेशः। ३ त्यागार्थक-'रह'-धातोः शत्रन्तस्य नया समासः।
४- प्रादुर्भावार्थकस्य रुहधातोः शत्रन्तस्य नत्रा समास आषत्वाद्गुणाभावश्च । व्याख्यानान्तराणि संभवन्स्यपि क्लिष्टत्वादनुपयुक्तत्वाञ्चोपेक्षितानि ।
* छाया-बीजानामग्निदग्धानां पुनरप्यङ्करोत्पत्तिर्न भवति, एवमेव सिद्धानां कर्मबीजे दग्धे पुनरपि जन्मोत्पत्तिनं भवति ।
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४८
आवश्यकभूत्रस्य रक्षन्तस्तदर्थ ‘मा हण मा हण' इत्यादिवाक्यैः सर्वानुपदिशन्ति भीष्ममवपरम्परोदूतमभूतभीतिभूमभीरुभूतोऽद्भुतानन्दसन्दोहकन्दलीयमानाऽपुनरावृत्तिविशिष्ट नितिपुर्यवितथपथं प्रदर्शयन्तीति चैषां नमस्करणीयत्वमईताम् ।
‘णमो सिद्धाणं' इति, नमः सिद्धभ्यः, असैत्सुः साधनीयाऽखिलकार्यसाधनेन परिनिष्ठितार्था अभूवन्निति, असेधिषुः शाश्वतिकतयाऽपवर्गम् अनन्तचतुष्टयरूपं मङ्गलं च पापनिति वा सिद्धाः ॥ सिदत्वं च सिद्वानां न दीपनिर्वाणवदभावरूपं किन्तु सद्भावस्वरूपमत एव चक्रवर्त्यादिमनुष्यानारभ्याऽनुत्तरविमानपर्यन्तैर्देवैरपि
अरिहन्त भगवान स्वयं षट्काय की रक्षा करते हुए दूसरों को 'माहण-मा हण' इस प्रकार का उपदेश देने वाले, तथा भयङ्कर भवपरम्परासे उत्पन्न महाभय के कारण व्याकुल भव्यों को अलौकिक आनन्द के मूलभूत, पुनरावृत्ति (आवागमन )-रहित मोक्षपुरी के पवित्र मार्ग को दिखलाने वाले हैं, अतएव ये नमस्कार के योग्य हैं (१)।
'नमो सिद्धाणं' समस्त कर्तव्यों की सिद्धि होने के कारण कृतकृत्य, तथा शाश्वतिक मोक्षसुख और अनन्तचतुष्टयरूप मङ्गल को प्राप्त हुए सिद्धों को नमस्कार हो।
सिद्धों का सिद्धत्व दीपक बुझ जाने की तरह अभावस्वरूप नहीं, किन्तु सद्भावस्वरूप है, अतएव मनुष्यों में चक्रवर्ती से लेकर મહાભયના કારણથી વ્યાકુલ ભવ્યેને અલૌકિક આનન્દના મૂળભૂત, પુનરાવૃત્તિ (આવાગમન)–રહિત એક્ષપુરીના પવિત્ર માર્ગને બતાવવાવાળા છે, એટલે એ નમસ્કાર કરવાને યોગ્ય છે.
__ नमो सिद्धाणं' स यी सिद्धि पाथी कृतकृत्य तथा ति भाक्षસુખ અથવા અનંત-ચતુષ્ટયરૂપ મંગલને પ્રાપ્ત કરેલા સિદ્ધોને નમસ્કાર છે.
સિદ્ધોનું સિદ્ધત્વ દીપકના ઠરી જવાની જેમ અભાવસ્વરૂપ નહિ પણ સદ્ભાવ - સ્વરૂપ છે. એટલા માટે મનુષ્યમાં ચક્રવત્તથી લઈને અનુત્તર વિમાન સુધી દેવતાએને પણ દુર્લભ તથા બીજા સુખની અપેક્ષાએ એના સુખ અનંત ગણુ છે, કારણ
१-'षिधु संराद्धौ' इत्यस्मादनिटो देवादिकात् , 'विध गत्याम्' इत्यस्मात्सेटो भौवादिकात् , 'षिधू शास्त्रे माङ्गल्ये च ' इत्यस्माद्वेटो भौवादिकाद्वा कर्तरि क्तः । व्युत्पत्यन्तराणि यथामत्यूहनीयानि ।
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मुनितोषणी टीका मुदुर्लभं सुखान्तरानन्तगुणितं भवति तेषां सुखं, सर्वकालसमयावच्छिन्नतया संभावितमनन्तवर्गवर्गवर्गितं लोकालोकाकाशयोरनन्तप्रदेशेषु परिपूर्णतयाऽनन्तमपि कदाचित्स्याद्देवादिसुखं, तथापि न जातु सिद्धसुखेन तुलाधृतं, तस्यापरिच्छि. अपरिमाणतया कचिदपि समावेशाभावात् । तच्चोक्तमौपपातिकमूत्रे
“णवि अस्थि माणुसाणं, तं सोक्खं णवि य सव्वदेवाणं। जं सिद्धाणं सोक्खं, अव्वाबाहं उवगयाणं ॥ १३ ॥ जं देवाणं सोखं, सव्वद्धापिडियं अणंतगुणं । ण य पावइ मुत्तिसुहं, गंताहिं वग्गवग्गूहि ॥ १४ ॥ सिद्धस्स सुहो रासी, सव्वद्धापिंडिओ जइ हवेजा । सोऽणंतवग्गभइओ सव्वागासे ण माइज्जा ॥१५॥” इति ।
अनुत्तर विमान पर्यन्त देवों को भी दुर्लभ, तथा अन्य सुखों की अपेक्षा इनका सुख अनन्त गुण है, कारण यह कि देवादिकों के सुख कदाचित् सर्वकाल में स्थायी अनन्त वर्गों के भी वर्गों से गुणित तथा लोक-अलोकरूप दोनों आकाशों के अनन्त प्रदेशों में भरपूर होकर अनन्त भी हो जाये तो भी सिद्धों के सुखों की बराबरी नहीं हो सकती, क्योंकि अपरिमित होने से सिद्गों के सुख अपार हैं। એ છે કે દેવાદિકના સુખે કદાચિત સર્વકાળમાં સ્થાયી અનંત વર્ગોના પણ વર્ગોથી ગુણિત તથા લેક-અલેકરૂપ બને આકાશના અનંત પ્રદેશોમાં ભરપૂર થઈને અનંત પણ થઈ જાય તે પણ સિદ્ધોનાં સુખની બરાબરી થઈ શકતી નથી, કારણ કે અપરિમિત હોવાથી સિદ્ધોનાં સુખ અપાર છે. * नाप्यस्ति मनुष्याणां तत्सौख्यं नापि च सर्वदेवानाम् ।
यत्सिद्वानां सौख्यम् , अव्याबाधमुपगतानाम् ॥१३॥ यदेवानां सौख्यं, सर्वाद्धापिण्डितमनन्तगुणम् । न च प्राप्नोति मुक्तिसुखं, अनन्ताभिर्वर्गवगिताभिः (अद्धाभिः) ॥१४॥ सिद्धस्य सौख्यराशिः, सर्वादापिण्डितो यदि भवेत् । सोऽनन्तवर्गभक्तः सर्वाकाशे न मायात् ॥ १५ ॥ इतिच्छाया।
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आवश्यकमूत्रस्य एतेनैव नमस्करणीयत्वमपि सिद्धानां सिद्धम् , अविनश्वरानन्तज्ञानदर्शनसुखवीर्याक्षयस्थितिप्रभृतिप्रगुणगुणगणगुम्फिताङ्गतया ध्यानादिवशाव्यात्मानन्दोद्रेकोद्भावकत्वेनोपकारित्वात् ।
णमो आयरियाणं' इति, नम आचार्येभ्यः, आसमन्तात् मर्यादया वा चर्यन्ते परिचर्यन्ते शिष्यादिभिरित्याचार्याः ।आचारं ज्ञानदर्शनचारित्रतपोवीर्यरूपं ग्राहयन्तीति, आचिन्वन्ति-बृहयन्ति शिष्याणां ज्ञानादीनीति, आचारयन्ति-सम्पादयन्ति शिष्यैरागमोक्तविधीनिति वाऽऽचार्याः । अथवा आमर्यादया चरन्ति= गच्छन्तीति, आचारैर्वा चरन्तीत्याचार्याः । यद्यपि शिल्पाचार्य-कलाचार्य
सिद्धों को इसलिये नमस्कार किया गया है कि ये अपने अविनाशी अनन्तज्ञान, अनन्तदर्शन, अनन्तसुख, अनन्तवीर्य, अनन्त अक्षय स्थान आदि उत्कृष्ट गुणोंसे आत्मानन्द के उद्भावक होकर भव्य जीवों के उपकारक हैं । (२)
'नमोआयरियाणं' आमर्यादापूर्वक शिष्यों से सेवित अथवा शिष्यों को ज्ञान दर्शन चारित्र तप तथा वीयरूप आचार की शिक्षा देनेवाले, या उनके ज्ञानादि आचार को बढानेवाले, अथवा ज्ञानाचार आदि की मर्यादामें चलनेवाले आचार्य को नमस्कार हो।
यों तो शिल्पाचार्य कलाचार्य और धर्माचार्य के भेदसे
સિદ્ધોને એટલા માટે નમસ્કાર કરવામાં આવેલ છે કે એ પિતાના અવિનાશી અનંતજ્ઞાન, અનંતદર્શન, અનંત સુખ, અનંતવીર્ય, અનંત અક્ષયસ્થાન વિગેરે ઉત્તમ ગુણેથી આત્મિક આનંદના ઉભાવક થઈને ભવ્ય છે માટે ઉપકારક છે.
(२) 'नमो आयरियाणं' 'आ'=भर्यापू शिष्याथी सेवामेता अथवा शिष्याने જ્ઞાન, દર્શન, ચારિત્ર, તપ તથા વીર્યરૂપ આચારની શિક્ષા દેવાવાળા અથવા તેમના જ્ઞાનાદિ આચારને વધારવાવાળા અથવા જ્ઞાનાચાર વિગેરેની મર્યાદામાં ચાલવાવાળા આચાર્યને નમસ્કાર થાય.
એમ તે શિલ્પાચાર્ય કલાચાર્ય અને ધર્માચાર્યના ભેદથી આચાર્યના १ आकुपसर्गपूर्वकात् चरधातोः कर्मणि ण्यत् उपधाद्धिः । २ सत्यादिशब्दवन्निरुक्तोक्तरीत्या पृषोदरादिपाठात्पदसिद्धिः । ३ आकुपसर्गपूर्वकात् चरधातो हुलकावर्तरि व्यस्मत्ययः ।
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मुनितोषणी टीका धर्माचार्यभेदेनाऽऽचार्यत्रैविध्यं तथाऽप्यईसिद्धसाहचर्यान्नमःपदसानिध्याचात्र धर्माचार्याणामेव ग्रहणम्। तत्त्वं च मुत्रार्थज्ञातृत्वार्थवाचकत्व-गच्छमेधीभूतत्व-गणचिन्तारहितत्व-स्त्रीकथा-राजकथा-देशकथा-भक्तकथा-सम्यक्त्वशैथिल्यकथावर्जकत्वं, तथा नवविधब्रह्मचर्यगुप्तिधारकत्व-पश्रेन्द्रियसंवरणकारकत्व-कषायचतुष्टयरहितत्व-पञ्चमहाव्रतोपेतस्व- पश्चविधाचारपालकत्व - पश्चसमितिसमितस्व-गुप्तित्रयगुप्तत्वरूपषत्रिंशद्गुणवत्वं, सारणा-वारणा-धारणा - नोदना-प्रतिनोदनावत्वं च । तत्र सारणा=विस्मृतसामाचारिकेभ्यो मुनिभ्यः, 'मुने ! भवतेदं आचार्य के तीन भेद हैं, तो भी 'अरिहंत' 'मिद्ध' तथा 'नमो' पद के माहचर्य से यहां पर धर्माचार्य का ही ग्रहण है। जो सूत्रार्थ को जाने, शिष्यों को प्रवचन का मर्म समझावे, गच्छमें मेढी (खलिहान का खंभा) समानहो, गण की चिन्ता से रहित हो, सम्यक्त्व को शिथिल करनेवाली कथा का वर्जन करे, तथा नौ वाड ब्रह्मचर्यधारण (१), पांच इन्द्रियों को जीतना (१४), चार कषायों का परित्याग (१८), पांच महाव्रतों (२३) और पांच आचारों का पालन (२८) पांच समिति (३३) और तीन गुप्तियों का धारण (३६), इन छत्तीस गुणों से तथा सारणा, वारणा, धारणा, चायणा, पडिचायणा से युक्त हो।
उनमें सारणा-प्रमादवश सामाचारीमें भूले हुए मुनिको ३ मे छ. तो पर 'अरिहंत' 'सिद्ध' तथा 'नमो' पहना सायर्यथी माडिया ધર્માચાર્યનું જ ગ્રહણ છે. જેઓ સૂત્રના અર્થને જાણે. શિષ્યને પ્રવચનનું રહસ્ય સમજાવે. ગરછમાં મેધિ સમાન, ગણની ચિંતાથી રહિત હોય. સમ્યકત્વ શિથિલ થાય એવી કથાનું વર્જન કરે તથા નવાવાડ બ્રહ્મચર્યનું પાલન, (૯) પાંચે ઈદ્રિને सतवी. (१४) यारे पायोनो त्याग. (१८) पाय मानतो (२३) तथा पांय मायानु पासन (२८) पांय समिति (33) भने ३ गुतिमान धारय ४२q. આ છત્રીસ (૩૬) ગુણેથી તથા સારણ, વારણું, ધારણા, ચોયણુ અને પડિચેયણાથી યુકત હોય.
તેમાં સારણ=પ્રમાદથી સામાચારીમાં ભૂલેલા મુનિને યોગ્ય જ્ઞાન આપવું. १ धर्माचार्यत्वम ,
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आवश्यकमृत्रस्य सम्यङ्नानुष्ठितमेवं कर्तव्य' - मित्यादिरीत्योपदेशदानम् । वारणा-कुसङ्गतिप्रभृतिपवृत्तशिष्यप्रतिषेधनम् ‘एवं न कदापि कर्तव्य'-मिति, इयंच द्विविधाद्रव्यतो भावतश्च, यथा कश्चित्मौढश्चिकित्सको 'विचिकित्सकान् कॉविद्रोगिणो वारयति-'युष्माभिरोषध्यनुकूलपथ्याहारादिना वत्तितव्यमितरथा रोगो दुधिकिस्सः स्या'-दिति, इमं चिकित्सकहितोपदेशं प्रेम्णा श्रुत्वा ये तथा पथ्येन वर्तन्ते ते ततो रोगान्मुक्त्वा मुखिनो भवन्ति, ये च जिहालोलुपिनो वैद्यवचनमनात्य यथारुचि विदधते ते तेनैवाऽपथ्यसेवनेन गददलितदेहा निरुपाया मृत्युमुखं प्रविशन्ति,
उचित शिक्षा देना। वारणा अकृत्य सेवनसे रोकना। यह दो • प्रकारकी है। (१) द्रव्यवारणा और (२) भाववारणा, उनमें द्रव्यवारणा जैसे-कोई वैद्य रोगी को कहता है-'अमुक दवामें अमुक अमुक वस्तु पथ्य है इसका सेवन करो और अमुक अमुक वस्तु कुपथ्य है इसे छोडो, नहीं तो रोग दूर नहीं होगा' इत्यादि, जो रोगी वैद्य के इस वचन को हितधुद्धि से सुनकर इसके अनुकूल पथ्य सेवन करता है वह उस रोग से मुक्त हो कर सुख को प्राप्त करता है, और जो वैद्य के वचन का अनादर कर अपनी इच्छासे वर्त्तता है वह नाना प्रकार के कष्टों को भोगता हुआ मृत्यु तक को भी प्राप्त हो जाता है। વારણ નહિ કરવા લાયક કામથી રેકવું. તે બે પ્રકારની છે. (૧) દ્રવ્યવારણ અને (२) आवारा.
દ્રવ્યવારણુ– જેમ કેઈ વેદ્ય રોગીને કહે કે “અમુક દવામાં અમુક વસ્તુ ખાવા લાયક છે તેનું સેવન કરે અને અમુક વસ્તુ ખાવા લાયક નથી તેથી તેને છે. નહિતર રેગ મટશે નહિ” વિગેરે, જે દર્દી વૈદ્યનું આ વચન હિત-બુદ્ધિથી સાંભળીને તેને અનુકૂળ યંગ્ય પધ્ધનું સેવન કરે છે તે તેના રેગથી છુટીને સુખ મેળવે છે, અથવા જે વૈદ્યનું વચન પાળ્યા વિના પિતાની મરજી પ્રમાણે વતે છે તે અનેક પ્રકારના દુઃખને ભગવતે થકે મૃત્યુ સુધી પહોંચી જાય છે.
१ वारणा। २ संशयालून् ।
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मुनितोषणी टीका
सैषा द्रव्यवारणा, भाववारणा तु दृष्टान्तस्यैवोपनयो यथा - काँश्चितकर्मरोगग्रस्ताँस्ततो मुक्तिकामान प्राणिन आचार्यवैद्यो वारयति - ' युष्माभिः सर्वदा प्रवचनौषधग्रहणपूर्वकं ज्ञानाचारादिपथ्य सेवक भवितव्यमितरथा प्रमादादिरोगोऽयं दुचिकित्सः स्यादिति तेषु ये तथा ज्ञानाचारादिपथ्यपालनेन वर्त्तन्ते ते तस्माद्रोगाद्विमुच्य सुखमश्नुत्रते, ये चेन्द्रियारामाः कामभोगादिरूपमपथ्यं न त्यजन्ति ते भूयो भूयो जन्म - जरा - मरणानि प्राप्नुवन्तीति । धारणा = विषयान्तर निवृत्तिपुरस्सरं मनसः संयममार्गे स्थिरीकरणम् । नोदना (चोयणा) = सामाचारीतो बहिः प्रवर्त्तमानानां सामाचारीं पालयितुं प्रवर्त्तना । प्रतिनोदना ( पडिचोयणा ) च
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भाववारणा-दृष्टान्त का उपनय स्वरूप है, जैसे कर्मरोग से पीडित मोक्षाभिलाषी प्राणियोंको आचार्यरूप वैद्य उपदेश देते हैं'इस प्रवचनरूप औषध में ज्ञानाचार आदि पथ्य है इस का सेवन करना चाहिये और विषय भोगादि कुपथ्य है उसे छोडना चाहिये, अन्यथा कर्मरोग का मिटना असम्भव है ' इत्यादि, जो इस वचन के अनुसार नियमसे चलता है वह उस कर्म रोग से मुक्त होकर शिवसुख को पाता है, और जो आचार्य के वचन का अनादर कर स्वच्छन्द प्रवृत्ति करता है वह नाना प्रकार के दुःखों को भोगता हुआ बारबार जन्म जरा मरण पाता है ।
धारणा - मनको अन्य २ विषयों से हटा कर संयम मार्ग में स्थिर करना | चोयणा = सामाचारी से बाहर प्रवृत्ति करने वालों को
ભાવવારણા—દૃષ્ટાંતનું ઉપનય સ્વરૂપ છે. જેવી રીતે કર્માંજન્ય રોગથી પીડિત મેક્ષાભિલાષી પ્રાણિઓને આચારૂપ વૈદ્ય ઉપદેશ આપે છે ‘આ પ્રવચનરૂપ ઓષધમાં જ્ઞાનાચાર આદિ પથ્ય છે તેનું સેવન કરવું જોઇએ અને વિષયોગ વિગેરે કુપ છે તેને ઠંાડી દેવાં જોઇએ. નહિંતર કજન્ય રોગ મટવા કઠિન છે'. ઇત્યાદિ. જે આ વચન અનુસારે નિયમથી ચાલે છે તે કરાગથી મુકત થઈને શિવસુખને પ્રાપ્ત કરે છે; અને જે આચાર્યના વચનને અનાદર કરીને સ્વચ્છન્દ પ્રવૃત્તિ કરે છે તે અનેક પ્રકારના દુ:ખાને ભેગવતા વારવાર જન્મ જરા અને મરણ પામે છે.
ધારણા=મનને બીજા-ખીજા વિષયેામાંથી હઠાવીને સ ંયમમાર્ગીમાં સ્થિર કરવું. ચેાયણા=સામાચારીથી બહાર પ્રવૃત્તિ કરવાવાળાને ફરીથી સામાચારીમાં પ્રવૃત્ત
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आवश्यक सूत्रस्य
पौनःपुन्येन सामाचारीस्खलितानां धिग्धिगित्यादिपरुष भर्त्सना पूर्व कम गाढमेरणा | आचार्यस्य 'गणी'- त्यपिं नाम, गणः = साधुसमुदायः सोऽस्यस्येति न्युरुपतेर्गणी, तस्य गणिनः सम्पदः प्रसङ्गतो लक्ष्यन्ते, ता अष्टौ - (१) आचारसम्पत्, (२) श्रुतसम्पत्, (३) शरीरसम्पत्, (४) वचनसम्पत्, (५) वाचनासम्पत्, (६) मति - सम्पत्, (७) प्रयोगसम्पत्, (८) संग्रहसम्पच्चेति । एता अपि प्रत्येकं चतुविधा, तथाहि - आचारसम्पच्चतुर्द्धा यथा – (१) संयमधुत्रयोगयुक्तस्त्रं, (२) जात्यादिमदरहितत्वम्, (३) अनियतविहारित्वं, (४) वृद्धवन्मनः काय निर्विकारत्वं चेति । फिर से सामाचारी में प्रवृत्त करना । पडिचायणा = बारबार सामाचारी से स्खलितों को रूक्ष वचनों से फटकार कर सामाचारी में प्रवृत्त
करना ।
आचार्य को गणी भी कहते हैं, उनकी आठ संपदाएँ हैं(१) आचारसम्पदा, (२) श्रुतसम्पदा, (३) शरीरसम्पदा, (४) वचन सम्पदा, (५) वाचनासम्पदा, (६) मतिसम्पदा, (७) प्रयोगसम्पदा (८) संग्रहसम्पदा ।
[१] आचारसम्पदा के चार भेद हैं-- (१) चारित्र में निरन्तर समाधियुक्त रहना, (२) जात्यादिमद का परित्याग (३) अप्रतिबन्धविहार, (४) वृद्ध के समान इन्द्रियादिविकार रहित होना ।
કરવા. ડિચાયણા= વારંવાર સામાચારીમાં ભૂલ કરનારને રૂક્ષ વચનોથી ફિટકારીને સામાચારીમાં પ્રવૃત્ત કરવા.
આચાર્યને ગણી પણ કહે છે, આચાર્ય'ની આ સંપદા છે. (૧) આચારसंयहा, (२) श्रुतसभ्यहा; (3) शरीरसं पहा, (४) वयनसंचहा, (4) वायनाअभ्यहा, (६) भतिसभ्यता, (७) प्रयोगसं पहा, (८) संग्रहसम्भ्यहा
(૧) આચારસભ્યદાના यार लेह छे- (१) शास्त्रिमां हमेशां समाधि(3) अप्रतिमन्ध-विहार, યુક્ત રહેવું. (૨) જાતિ વગેરેના મદને પરિત્યાગ, (४) वृद्ध समान इन्द्रियाहि-विहार-रहित थ.
१ ' गणी ' इत्यत्र गणशब्दात् ' अत इनिठनौ ' ( ५ । २ । १५ ) इति पाणिनिवचनेन मत्वर्थीय इनिः ।
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मुनितोषणी टीका श्रुतसम्पच्चतुर्दा यथा-(१) बहुश्रुतत्वं, (२) परिचितमत्रत्वं, (३) परिज्ञातोसर्गापवादत्वम् . (४) उदात्तानुदात्तायनुसन्धानपूर्वकयथोचितवर्णोच्चारयितृत्वं चेति । तत्र बहुश्रुतत्वं-यदा यावन्ति मूत्राणि तदा तावत्सर्वपरिज्ञातृत्वम् , परिचितमूत्रत्वं स्वनामादिवत्कदाप्यविस्मृतमूत्रत्वम् । शरीरसम्पच्चतर्दा यथा(१) समचतुरस्रसंस्थानत्वम् , (२) सम्पूर्णाङ्गोपाङ्गत्वम् , (३) प्रतिपूर्णन्द्रियस्वम् , (४) स्थिरसंहनत्वं चेति । वचनसम्पञ्चतुर्दा यथा-(१) आदेयवचनत्वं, (२) मधुरवचनत्वं, (३) मध्यस्थवचनत्वं, (४) स्फुटवचनत्वं चेति । वाचनासम्पच्चतुर्दा यथा-(१) पात्रकुपात्रविवेचकत्वं, (२) कृतपूर्वमूत्रार्थ
__ [२] श्रुतसम्पदा के चार भेद हैं- (१) जिस समय जितने सूत्र हों उन सब का ज्ञान रखना । (२) अपने नामकी तरह सूत्रों को कभी न भूलना। (३) उत्सर्ग अपवादका ज्ञान रग्वना । (४) उदात्त अनुदात्त आदि स्वरों के अनुसन्धान पूर्वक वर्णों का शुद्ध उच्चारण करना।
[३] शरीरसम्पदा के चार भेद- (१) समचोरस संस्थान का होना, (२) अंगउपांगों से अविकल होना, (३) सब इन्द्रियों से परिपूर्ण होना, (४) दृढ संहननका होना।
[४] वचनसम्पदा के चार भेद- (१) आदेय वचन होना, (२) मधुर वचन होना, (३) मध्यस्थ वचन होना, (४) स्फुट वचन होना।
[५] वाचना सम्पदा के चार भेद- (१) शिष्यों में पात्र
શ્રતસમ્પદાના ચાર ભેદ છે. (૧) જે સમયે જેટલા સૂત્ર હોય તે સર્વનું शान राम'; (२) पाताना नामनी म सूत्रीने ही ५७५ न भू (3) ઉત્સર્ગ–અપવાદનું જ્ઞાન રાખવું, (૪) ઉદાત્ત-અનુદાત્ત આદિ સ્વરેના અનુસંધાનપૂર્વક વણેને શુદ્ધ ઉરચાર કરે.
(3) शरीस पहाना या२ - (१) समयरस संस्थाननू डाj (२) 1-34iगोथा म१ि४८ ५y, (3) सब दियोथी परिपूर्ण पा. (४) १८સંવનનનું હોવું.
(४) पयनस पहाना यार से:- (१) माहेय वयन (२) मधुर वयन (3) मध्य२५ पयन, (४) २८ वयन
(५) पायनास-पहाना या२ - (1) शियोमा पात्र -पात्रपायानो
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परिषाकाय शिष्याय मृत्रार्थपदातृत्वं (३) सूत्राध्ययनार्थमुत्साहदातृत्वं (४) पूर्वापरार्थ सांगत्य निपुणत्वं चेति । मतिमम्पञ्चतुर्द्धा यथा - (१) अवग्रह: ( सामान्येन पदार्थ निर्णय:), (२) ईहा (विशेष विमर्श:), (३) अत्रायः (निश्वयः) (४) धारणा ( कालान्तरायात्रिस्मरणं) चेति । प्रयोगसम्पच्चतुर्द्धा यथा – (१) वादविषयकस्वसामर्थ्यज्ञानं, (२) परिषत्परिज्ञानं, (३) क्षेत्रपरिज्ञानं, (४) वस्तुपरिज्ञानं चेति । संग्रहसम्पञ्चतुर्द्धा यथा - (१) गणस्थबालवृद्धादिमुनिनिकुपात्र का विचार करना, (२) पूर्व पढाए हुए सूत्रार्थ का परिपाक होने पर आगे पढाना, (३) सूत्र पढनेके लिए उत्साह देना, (४) सूत्रार्थ की पूर्वापर संगति करने में निपुण होना । [६] मनिसम्पदा के चार भेद - (१) अवग्रह ( सामान्य रूपसे पदार्थों का निर्णय करना), (२) ईहा (विशेष रूप से जानना ), (३) अवाय (पदार्थ का ठीक निश्चय करना), (४) धारणा (कालान्तर में नहीं भूलना ) ।
[७] प्रयोगसम्पदा के चार भेद - (१) वादमें अपने सामर्थ्यका ज्ञान रखना, (२) परिषद् का ज्ञान रखना, (३) क्षेत्र का ज्ञान रखना, (४) राजा मन्त्री आदि का ज्ञान रखना ।
आवश्यकमुत्रस्य
[८] संग्रहसम्पदा के चार भेद - (१) गणमें रहे हुए बाल વિચાર કરવા, (૨) પ્રથમ ભણાવેલા સૂત્રનાં અર્થના પરિપાક થયા પછી આગળ અભ્યાસ કરાવવે; (૩) સૂત્રના અભ્યાસ કરવામાં ઉત્સાહ આપવા, (૪) સૂત્રાની પૂર્વાપર સ’ગતિ કરવામાં નિપુણ થવું.
(६) भतिसम्यहाना ચાર ભેદ.– (૧) અવગ્રહ “સામાન્ય રૂપથી પદાર્થાંના निक्षुय ४२ (२) 'डा-विशेष३पधी स्वु, (3) मवाय- पहार्थना निश्चय १२व। (४) धारणा अन्तरभां पशु लूझवु नहि.
ખરાખર
(૭) પ્રયોગ સસ્પદાના ચાર ભેદ. (૧) વાદ કરવા વખતે પોતાના સામર્થ્યનું ज्ञान रावु, (२) परिषहनु ज्ञान राजवं. (3) क्षेत्रनं ज्ञान राम (४) शब्द, मंत्री વગેરેનું જ્ઞાન રાખવું.
(८) संग्रह संयहाना ચાર ભેદ.- (૧) ગણુમાં રહેલા ખાલ-વૃદ્ધ
આદિ
१ - प्रयोगसम्पत् = वादमेधा ।
२ - वस्तुपरिज्ञानं= राजामात्यादिपरिज्ञानम् ।
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मुनितोषणी टीका
र्वाहयोग्य क्षेत्रादिनिरीक्षणविषया, (२) बालग्लानादियोग्यसंस्तारकादिव्यवस्थाकरणविषया, (३) यथाकालं स्वाध्यायाद्यनुष्ठानविषया, (४) यथायोग्यविनयविषया वेति । आसामष्टविध सम्पदां विस्तरतो व्याख्या मत्कृद्दशाश्रुतस्कन्धमुत्रस्य टीकायां विलोकनीया ।
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एत एवोक्तलक्षणा आचार्याः (१) प्रवचनप्रभाव कोपदेश-(२) वादाधिकरणकशाश्वतिकजय - (३) निमित्तज्ञान - ( ४ ) तपस्वित्वा - (५) ऽञ्जनसिद्धि - (६) लब्धिसिद्धि(७) कर्मसिद्धि - (८) विद्यासिद्धि - (९) मन्त्रसिद्धि--(१०) योगसिद्ध्या - (११) ssगमसिद्धि - (१२) युक्तिसिद्धय- (१३) ऽभिप्रायसिद्धि - (१४) गुणसिद्धय(१५) ऽर्थसिद्धि - (१६) कर्मक्षय सिद्धि - रूपैर्विशिष्टैः षोडशभिर्गुणैरप्युपलक्षिता
वृद्ध आदि मुनियोंके निर्वाहयोग्य क्षेत्र आदिका निरीक्षण करना, (२) बाल-ग्लान आदिके योग्य शय्या - संथारा आदि की व्यवस्था करना, (३) यथाकाल स्वाध्याय आदि करना, (४) यथायोग्य बडों का वन्दन आदि विनय करना ।
ये ही उक्तगुणसम्पन्न आचार्य जब - (१) प्रवचनप्रभावक उपदेश देना, (२) वादमें सदा जय, (३) निमित्तज्ञान, (४) तपस्या, (५) अञ्जनसिद्धि, (६) लब्धिसिद्धि, (७) कर्मसिद्धि, (८) विद्यासिद्धि, (९) मन्त्रसिद्धि, (१०) योगसिद्धि, (११) आगमसिद्धि, (१२) युक्तिसिद्धि, (१३) अभिप्रायसिद्धि, (१४) गुणसिद्धि, (१५) अर्थसिद्धि, (१६) कर्मक्षयसिद्धि; इन सोलह विशेष गुणों से युक्त होते हैं तब
સુનિયાના નિર્વાહ ચેાગ્ય ક્ષેત્ર આદિના તપાસ કરવા, (ર) ખાલ, ગ્લાન આદિના યોગ્ય શખ્યા સાંથારા આદિની વ્યવસ્થા કરવી; (૩) યથાસમય સ્વાધ્યાય : આદિ કરવા, (૪) મોટા હોય તેને યથાયેગ્ય વિનય અને વંદનાદિ કરવું.
ઉપર પ્રમાણે કહેલા ગુણુથી પૂર્ણ ઢાય તેવા આચાર્ય જ્યારે (૧) પ્રવચનપ્રભાવક ઉપદેશ આપે છે. (૨) વાદમાં વિજય મેળવે છે; (૩) નિમિત્તજ્ઞાન, (४) तपस्या, (५) नसिद्धि, (९) सम्धिसिद्धि, (७) उर्भ सिद्धि, (८) विद्यासिद्धि, (ङ) मंत्रसिद्धि, (१०) योगसिद्धि, (११) भागमसिद्धि, (१२) युक्तिसिद्धि (13) अभिप्रायसिद्धि, (१४) गुसुसिद्धि, (१८) अर्थसिद्धि (१९) भक्षयसिद्धि આ સેાળ વિશેષ ગુણૈાથી યુક્ત હાય છે ત્યારે તે “ યુગપ્રધાનાચાય ”
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आवश्यकमूत्रस्य भवन्ति, तदा युगप्रधानाचार्या उच्यन्ते । ते चाचार्या यथा तीव्रभानौ भानावस्तमिते प्रदीपो घटपटांदिपदार्थजातं स्वभासा भासयति तमश्च व्यपोहति तथा भगवति तीर्थकरे सिद्धगति संप्राप्ते भुवनत्रयस्य तत्त्वार्थप्रकाशनेन मिथ्यात्वादिकं निजप्रतिभया व्यपगमयन्तीत्यतो नमस्करणीयत्वमेषाम् ।
णमो उवज्झायाणं' इति 'नम उपाध्यायेभ्यः' उप-समीपम् एत्याधीयते येभ्यस्ते 'उपाध्यायाः। यद्वा उपस्य सामीप्यार्थकत्वादधीत्यस्य चाऽऽधिक्यार्थकत्वात् उप-समीपम् अधि आधिक्येन ईयते-माप्यते येषां ते तथा । अथवा उपाधीयते समीपावस्थानेन स्मर्यते सूत्रतो जिनभाषितं मुनिभिर्येभ्यस्ते. तथा । यं द्वादशाङ्गस्वरूपं स्वाध्यायमादावर्थतस्तीर्थकरा उपदिदिशुस्तदनु च सूत्रतो 'युगप्रधानाचार्य' कहलाते हैं।
जैसे तीव्र किरणोंवाले सूर्यके अस्त हो जाने पर दीपक अपने प्रकाश से घट-पट आदि पदार्थों को प्रकाशित करता और अन्धकार को हटाता है उसी तरह तीर्थकर भगवान के मोक्ष पधार जाने पर आचार्य महाराज तीनों लोक के जीवादि पदार्थोंका प्रकाश करते ( स्वरूप बताते) हुए मिथ्यात्व आदि को हटाते हैं। इसलिए उपकारी होने के कारण वे वन्दन करने योग्य हैं।
'नमो उबज्मायाणं'-समीपमें आये हुए मुनियों को अर्थरूपमें उपाय छे.
જેવી રીતે તીવ્ર કિરણોવાળે સૂર્ય અસ્ત પામી જાય છે. ત્યારે દીપક [4] પિતાના પ્રકાશથી ઘટ-પટ વગેરે પદાર્થોને પ્રકાશિત કરે છે અને અંધકારને દૂર કરે છે. તેવી રીતે તીર્થંકર ભગવાનના મોક્ષ ગયા પછી આચાર્ય મહારાજ ત્રણેય લેકના જીવાદિ પદાર્થોને પ્રકાશ કરીને સ્વિરૂપ બતાવીને મિથ્યાત્વ આદિને દૂર કરે છે. એટલા માટે ઉપકારી હોવાના કારણે તેઓ નમસ્કાર કરવા ગ્ય છે. _ 'नमो उवज्झायाणं' पाताना सभीपमा २२सा मुनिमाने अर्थ ३५मा तार्थ १- 'इङ् अध्ययने' अस्मात् 'इडश्च' (३।३।२१) इति वचनेनाऽऽपादाने घन् । २- 'यद्वा 'उपाध्यायाः' उपाऽधिपूर्वकात् ' इण् गतौ ' अस्मात् 'अकर्तरि च कारके संज्ञायाम् ' (६ । ४ । २८) इति वचनबलेन बाहुलकाद्वाऽधिकरणे घन । ३- अथवा 'इक् स्मरणे' अस्मात्पूर्वोक्तोपसर्गद्वयविशिष्टात्माग्वद् घञ् ।
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मुनितोषणी टीका गणधरास्तमेव परम्पराऽऽयातं शिष्यानध्यापयन्ति ये ते उपाध्याया उच्यन्ते इति सारः। अपिवा आधेः मनोव्यथाया आया लाभः आध्यायः, उपहतः नाशित आध्यायो यैस्ते उपाध्यायाः-प्रवचनतत्त्वोपदेशेन मुनिहृदयसन्तोषका इत्यर्थः, अतएव नमस्कारार्हाः, ज्ञानदर्शनचारित्रयुकत्वाच ।
णमो लोए सबसाहूणं' इति, नमो लोके सर्वसाधुभ्यः' । साधयन्ति साध्नुवन्ति वाऽभिलपितार्थ निर्वाणसाधकान् योगान्, यद्वा सम्यग्ज्ञानदर्शनचारित्ररूपरत्नत्रयबलेनाऽपवर्गमिति, अथवा निरुक्तव्युत्पत्त्या भूतेषु समतां ध्यायन्तीति दधत इति, मोक्षमार्ग प्रति गच्छतां सहायका भवन्तीति वा 'साधवः, अत्र 'सर्व' पदेन सार्द्धद्वीपद्वयरूपलोकस्था गृह्यन्ने, ते च ते साधवश्व, यद्वा तीर्थरों से उपदिष्ट और सूत्ररूपमें गणधरों से रचित परम्परा से प्राप्त द्वादशाङ्ग के पढाने वाले, अथवा प्रवचन का पाठ देकर आधिमनकी व्यथा के आय-प्राप्तिको उप-उपहत अर्थात् दूर करने वाले उपाध्याय को नमस्कार हो। ज्ञानदर्शनचारित्र से युक्त तथा सूत्र पढाने के कारण उपकारी होनेसे उपाध्याय नमस्कार के योग्य हैं।
__'नमो लोए सव्वसाहणं'-अभिलषित अर्थ को, निर्वाणसाधक योगों को अथवा सम्यग ज्ञान-दर्शन-चारित्ररूप रस्नों से मोक्षको साधनेवाले, अथवा सब प्राणियों पर समभाव रखनेवाले, या मोक्षाभिलाषी भव्यों के सहायक, तथा अढाई द्वीपरूप लोकमें रहनेवाले
કરેથી ઉપદેશાવેલા અને સૂત્રરૂપમાં ગણુધરેથી રચાયેલા પરમ્પરાથી પ્રાપ્ત દ્વાદશાંગ ને અભ્યાસ કરાવનારા, અથવા પ્રવચનને પાઠ આપીને આધિ=મનની વ્યથાના આય=પ્રાપ્તિને ઉપ=ઉપહત અર્થાત દૂર કરવાવાળા ઉપાધ્યાયને નમસ્કાર થાય. જ્ઞાન, દર્શન અને ચારિત્રથી યુકત તથા સૂત્રને અભ્યાસ કરાવવાના કારણે ઉપકારી હોવાથી ઉપાધ્યાય નમસ્કાર કરવા યોગ્ય છે.
'नमो लोए सन्चसाहूणं'-मनिषित मर्थने, निeals યેગોને, અથવા સમ્યફ જ્ઞાન દર્શન ચારિત્ર રૂપ રત્નથી મેને સાધવાવાળા અથવા સર્વ પ્રાણીઓ ઉપર સમભાવ રાખવાવાળા અથવા મેક્ષના અભિલાષી ભવ્ય જીને સહાયક તથા અઢી દ્વીપ-રૂપ લેકમાં રહેવાવાળા સર્વ १- 'साधवः' औणादिकप्रक्रियया पृषोदरादित्वाद्वा सन्दसिदिः ।
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भावश्यकमुत्रस्य 'सर्वम्य सर्वज्ञस्य (अईतः) साधवः सर्वसाधवः । अथवा प्राकृते सर्व-सार्वशब्दयोः 'सन्च' इतिरूपसत्त्वात् सावस्य-सर्वज्ञस्येत्यादि प्राग्वत् तेभ्य इत्यर्थः । साधवो हि शब्दरूपगन्धरसस्पर्शपञ्चककामगुणनिवृत्ता विशुद्धचारित्रेण विविधाभिग्रहादिनियमैश्च संयुक्ताः मोक्षगुणसाधका उपदेशद्वारा सर्वप्राणिहितकारिणश्च, अतएव नमस्कारार्हाः। आह-सूत्रप्रवृत्तिर्द्विधा संक्षेपतो विस्तरतो वा, संक्षेपतो यथा-सामायिकसूत्रम् , विस्तरतो यथा-द्वादशागणिपिटकः तत्रेदं नमस्कारात्मकं सूत्रं किं संक्षेपमधिकृत्य वर्त्तते विस्तरं वा ? नायं, तथा सति हि
सभी या सर्वज्ञ के साधुओं को नमस्कार हो।
शब्द-रूप-गन्ध-रस और स्पर्श, इन पांच कामगुणों से निवृत्त और विशुद्ध चारित्र तथा अनेक अभिग्रहों से युक्त, एवं आत्मकल्याण के लिये मोक्षगुण के साधक तथा उपदेश द्वारा प्राणी मात्र के हितकारी होने से साधु नमस्कार के योग्य है।
यहां प्रश्न उठता है कि-सूत्रकी प्रवृत्ति या तो संक्षेपसे होती है, जैसे-सामायिक-सूत्र, या विस्तार से-जैसे-द्वादशाङ्ग गणिपिटक, सो यह नमस्कार क्या संक्षेपसे किया गया है या विस्तारसे ? यदि कहें कि संक्षेपसे किया गया है तो सिद्ध भगवान् कृतकृत्य
અથવા સર્વજ્ઞના સાધુઓને નમસ્કાર કરું છું.
શબ્દ-રૂપ–ગન્ધ-રસ અને સ્પર્શ આ પાંચ કામગુણેથી નિવૃત્ત અને વિશુદ્ધ ચારિત્ર તથા અનેક અભિગ્રહથી યુકત એ પ્રમાણે આત્મકલ્યાણ માટે મેક્ષ ગુણના સાધક તથા ઉપદેશ દ્વારા પ્રાણી માત્રના હિતકારી હોવાથી સાધુ નમસ્કાર કરવા યોગ્ય છે.
અહિં એક પ્રશ્ન ઉઠે છે કે –સૂત્રની પ્રવૃત્તિ સંક્ષેપથી હોય છે, જેવી રીતેસામાયિક સૂત્ર. અથવા તે વિસ્તારથી-જેમ કે દ્વાદશાંગ ગણિપિટક, તે આ નમસ્કાર સંક્ષેપથી કહેવામાં આવ્યું છે કે વિસ્તારથી ? જે કહેશે કે સંક્ષેપથી કહેવામાં આવ્યું છે તે સિદ્ધ ભગવાન કૃતકૃત્ય થયેલા છે એટલા માટે સાધુ १- देवादिशब्दस्य देवदत्तादिपरत्ववत् "विनापि प्रत्ययं पूर्वोत्तपदयोर्वा लोपो वाच्यः” (३ । २।८८) इति कात्यायनवातिकानुशासनवलात् सर्वपदं सर्वज्ञपरं तेन सर्वस्य सर्वज्ञस्येत्यर्थः ।
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मुनितोषणी टीका ‘णमो सिद्धाणं णमो लोए सबसाहूणं' इत्युभयात्मक एव नमस्कार उच्येत न तु पञ्चविधात्मकः, साधुत्वावच्छिन्नतयाऽहंदाचार्यादीनां साधुष्वन्तर्भावात् , सिद्धानां च कृतकृत्यतया साधुग्रहणेनाऽग्रहणात् । न द्वितीयम् , एवं सति हि 'नमो उसभस्स' 'नमो अजिअस्स' इत्यायेकैकशो नामग्रहणपूर्वकमेवोक्तियुक्ता, ततश्च नमस्काराऽऽनन्त्यं प्राप्नोति, अर्हतां सिद्धानां च समयभेदेनाऽऽनन्त्यात्, एवमाचार्योपाध्यायसाधनामपीति सर्वथा पञ्चविधात्मको नमस्कारो न युज्यत इति, अत्रोच्यते-अहंदादिषु नियमेन साधुगुणसद्भावात्साधुत्वं, साधुषु स्वईत्त्वाहो चुके हैं। इसलिए साधु-पदसे ग्रहण नहीं होसकने के कारण 'नमो सिद्धाणं' और अरिहन्त आचार्य उपाध्यायों में साधुपन रहने के कारण 'नमो लोए सव्वसाहणं' इतना ही कहना आवश्यक था। यदि विस्तारसे किया गया मानें तो 'नमो उसभस्स' 'नमो अजिअस्स' इत्यादि प्रकार से सब तीर्थङ्कर अरिहन्तों का, तथा 'नमो एगसमयसिद्धाणं' 'नमो दुसमयसिद्धाणं' इत्यादि प्रकारसे यावत् संख्यात असंख्यात अनन्तसमय सिद्धों का एवं आचार्यादिकों का अलग २ नाम ग्रहण करने से अनन्त भेद हो जायँगे, अत एव यह पंच नमस्कार न संक्षेपसे कह सकते हैं और न विस्तारसे ।
उत्तर-माना कि अरिहन्त आचार्य आदि भी साधु हैं परन्तु सामान्यतया साधु शब्दसे नमस्कार करने पर सिर्फ साधुनमस्कारका ५४थी अड नडि थ६ शयाना २0 'नमो सिद्धाणं' भने भरित आया Gध्यायोमा साधुपा २ पाना ॥२णे 'नमो लोए सबसाहूणं' मेट ४३ १३ . ने तमे विस्तारथी ४२पामा मान्छे सेभ मानत 'नमो उसभस्स' 'नमोअजिअस्स' त्या प्राथी सती ४२ मरिडताना तथा 'नमोएगसमयसिद्धाणं' 'नमो दुसमयसिद्धाणं' त्या प्रारथी तमाम संध्यात असभ्यात अनन्तसमय સિદ્ધોના, એ પ્રમાણે આચાર્યાદિના જુદા-જુદા નામ ગ્રહણ કરવાથી અનંત ભેદ થઈ જશે. એ કારણથી આ પાંચ નમસ્કાર સંક્ષેપથી છે. અથવા તે વિસ્તારથી છે. એમ કહી શકાશે નહિ.
ઉત્તર–માની લે કે અરિહંત આચાર્ય આદિ પણ સાધુ છે, પરંતુ સામાન્ય રીતે સાધુ શબ્દથી નમસ્કાર કરવાથી માત્ર સાધુનમસકારનું જ ફળ થાય
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आवश्यकम्त्रस्य दयो भजनीयाः (कचित्संभवन्ति कचिन्न), इति सामान्यतः साधुशब्देन नमस्कारेऽहन्नमस्कारजन्यस्यं विशिष्टफलस्य प्राप्तिर्न जातु संभवति, नहि नरसामान्यनमस्कारेण राजादिनमस्कारजन्यं विशिष्टं फलं कचिदपि दृष्टचरम् । नरसामान्यग्रहणेन विशिष्टराजादिपरिज्ञानस्य तत्मसादस्य चैकान्तमसम्भवादिति सामान्यतो नमस्कारद्वैविध्यं विशिष्टफलानुत्पादकत्वादुपेक्ष्य पञ्चविधो नमस्कार आश्रित इति संक्षेपत एवायं नमस्कारों न विस्तरत इति ।
ही फल होता है, अरिहन्त आचार्य आदि के नमस्कार का नहीं, क्योंकि नमस्कार ऐसे शब्दों से किया जाता है जिनसे नमस्करणीयमें रहे हुए असाधारण गुणोंका बोध होसके, अरिहन्त आचार्य आदिमें रहे हुए गुणोंका बोध अरिहन्त आचार्य आदि शब्दों से ही होसकता है, साधुशब्दों से कदापि नहीं ! जैसे कोई यह जानकर कि राजा भी तो मनुष्य ही है, मनुष्य शब्दसे राजाको नमस्कार करना चाहे तो वह राजाके नमस्कार का फल नहीं प्राप्त कर सकता है, राजाके नमस्कारके लिए उसका परिचायक शब्द चाहिये, अत एव जितने शब्दों के विना विशेष-विशेष अवस्था में रहे हुए अरिहन्त सिद्ध आदिकों का ग्रहण होना असम्भव था, उतने शब्दोंका ग्रहण करने पर भी यह पंच नमस्कार संक्षेपसे ही है विस्तारसे नहीं।
છે-મળે છે. પણ આચાર્ય આદિના નમસ્કારનું ફળ મળતું નથી, કારણ કે – નમસ્કાર એવા શબ્દોથી કરવામાં આવે છે કે જેના વડે નમસ્કરણયમાં રહેલા અસાધારણ ગુણેને બંધ થઈ શકે. અરિહન્ત, આચાર્ય આદિમાં રહેલા ગુણને બંધ અરિહન્ત આચાર્ય વગેરે શબ્દથી જ થઈ શકે છે, પરંતુ સાધુ શબ્દથી કદાપિ થઈ શકશે નહિ. જેમ કે ઈ માને કે રાજા પણ મનુષ્ય છે. મનુષ્ય શબ્દથી રાજાને નમસ્કાર કરવા ઈચ્છા કરે તે તે માણસ રાજાને નમસ્કાર કરવાનું ફળ પ્રાપ્ત કરી શકશે નહિં. રાજાને નમસ્કાર કરવા માટે રાજાના નામને પરિચય કરાવનાર શબ્દને જ ઉપયોગ કરે જોઈએ. એ કારણથી જેટલા શબ્દો વિના વિશેષ-વિશેષ અવસ્થામાં રહેલા અરિહંત સિદ્ધ આદિ સોનું ગ્રહણ કરવું અસંભવ છે. એટલા શબ્દનું ગ્રહણ કરતાં છતાંય આ પંચનમસ્કાર સંક્ષેપથીજ છે, વિસ્તાस्थी नलि.
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मुनितोषणी टीका
आह—क्रम आनुपूर्वी, सा च द्विविधा-पूर्वानुपूर्वी पश्चादानुपूर्वी च, क्रमेण प्रथममारभ्यान्तानुधावनं पूर्वानुपूर्वी, व्युत्क्रमेणान्तमारभ्य प्रथमानुधावनं पश्चादानुपूर्वी, तत्रायमहदादिनमस्कारक्रमो न पूर्वान्वयी कृतसकलकृत्यानां 'सिद्धाणं णमोकार करेंति' (आचा० द्वि. श्रु. १५ भा. अ.) इत्यादिनाऽ हद्भिरपि नमस्कार्यतया सर्वाभ्य'हितत्वेन प्राक् प्रयोज्यानां सिद्धानामादावनभिधानात् । नापि पश्चादानुपूर्वी, तथा सति ह्यहंदादिपञ्चके सर्वाप्रधानभूतानादौ साधुम्तत उपाध्यायाँस्तत आचार्यास्ततोऽर्डतः प्रतिपाद्य सिद्धानां प्रतिपादनं युज्यते न तु यथोकं, तस्मान्नेयं पूर्वानुपूर्वी नापि पश्चानुपूर्वीति ।
प्रश्न-आनुपूर्वी (क्रम) दो प्रकार की है, एक पूर्वानुपूर्वी और दूसरी पश्चादानुपूर्वी, प्रधान क्रमको पूर्वानुपूर्वी कहते हैं और अप्रधान क्रमको पश्चादानुपूर्वी, उनमें यह नमस्कार यदि पूर्वानुपूर्वी से किया गया मानें तो 'अरिहंताणं' से पहले 'सिद्धाणं' कहना चाहिये; क्योंकि कृतकृत्य होने तथा अरिहन्तोंसे नमस्कार किये जाने के कारण सिद्ध भगवान अरिहन्तों से भी श्रेष्ठ हैं, यदि पश्चादानुपूर्वी से माने तो सब से प्रथम साधु, तब उपाध्याय, अनन्तर आचार्य, तदनन्तर अरिहन्त, बादमें सिद्ध को नमस्कार किया जाना चाहिये, न कि उक्त रीतिसे, अतः यह नमस्कार आनुपूर्वी (क्रम) से रहित है, इत्यादि।
प्रश्न-मानुपूची [भ] २ प्रजनी छ. म पूर्वानुपूची मने भी પશ્ચાદાનુપૂવ. પ્રધાન ક્રમને પૂર્વાનુપૂવ કહે છે, અને અપ્રધાન ક્રમને પશ્ચાદાનુપૂર્વ કહે છે, તેમાં આ નમકારેને જે પૂર્વાનુમૂવીથી કરેલા છે એમ માનશે તે અરિહંતા થી પહેલા નિદ્રા કહેવું જોઈએ. કારણ કે કૃતકૃત્ય થવાથી તેમજ અરિહન્તાએ તેમને નમસ્કાર કરેલા છે તે કારણથી સિદ્ધ ભગવાન અરિહન્તથી પણ શ્રેષ્ઠ છે. હવે જે પશ્ચાદાનુપૂવથી માનશે તે સૌથી પ્રથમ સાધુ, તે પછી ઉપાધ્યાય, અનન્તર આચાર્ય, ત્યાર પછી અરિહંત અને છેવટે સિદ્ધને નમસ્કાર કરવું જોઈએ. નહિ કે ઉપર પ્રથમ કહેવા પ્રમાણે. એ કારણથી આ નમસ્કાર-પદ્ધતિ भानुषी (भ)थी २हित छ. वगेरे. १-'अभ्यर्हितंच' इति (का.पा. १।४।१२) वचनेनाऽभ्यहितस्य पूर्वप्रयोगविधानात् ।
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आवश्यकमुत्रस्य
तत्रोच्यते— नमस्कारमृत्रमिदं नानुपूर्वीमतिर्त्तते पूर्वानुपूर्व्याः सद्भावात्, यदुक्तम्- ' अभ्यर्हितत्वेनादौ सिद्धाभिधानं युक्तम्' इति, तन्मन्दम्, अर्हदुपदेशेनैव सिद्धावरतामेव तदपेक्षयाऽप्यभ्यर्हितत्वात् कृतसकलकृत्यत्वस्य चो भयत्र साम्यात्, अर्हन्नमस्कार्यत्वं तु न हेतु:, यतो भूता भाविनश्वानन्ताः सिद्धा अपि कदाचिच्छद्मस्थावस्थायां कृतार्हन्नमस्कारा एव । छद्मस्थाः सन्तो भगवन्तोऽर्हन्तो नमस्कुर्वन्ति चेद्गुणाधिकान् सिद्धान्नमस्कुर्वन्तु नाम, नैतावता नः किञ्चिदाच्छिद्यते केवलोत्पत्तावे वाईन्समाप्तिस्तदानीमा सच्चात् । न हि वयं
उत्तर— नमस्कार करने वाले भव्यों के लिए सिद्धि भगवान की अपेक्षा व्यवहारनयसे अरिहन्त ही में प्रधानता है, कारण यह कि सिद्धों का भी ज्ञान भव्यों को अरिहन्तों के ही उपदेशसे होता है, साथ ही तीर्थप्रवर्त्तक होने से अपनी देशना द्वारा भव्यों को भवसमुद्र से पारकर सिद्धगति तक पहुँचानेवाले अरिहन्त ही हैं, रही बात कृतकृत्यता और अरिहन्त से सिद्धोंको नमस्कार किये जाने की, सो दोनों में बराबर है, क्योंकि अरिहन्तका भी कोई कर्तव्य बाकी नहीं रह पाया है और अनन्त सिद्धों में से भावी ( होनेवाले) सिद्ध भी छद्मस्थ अवस्था में अरिहन्तको नमस्कार करते ही हैं, अतएव छद्मस्थ अवस्थामें अरिहन्त सिद्धों को और भावि सिद्ध अरिहन्तों को नमस्कार करते हैं, क्योंकि उस अवस्थामें केवलज्ञान उत्पन्न न होने के कारण उनको अरिहन्त या सिद्ध शब्द से कह ही
ઉત્તર—નમસ્કાર કરવાવાળા ભવ્ય જીવેા માટે સિદ્ધ ભગવાનની અપેક્ષા વ્યવહારનયથી અરિહન્તની પ્રધાનતા છે. કારણ કે સિદ્ધોનું પણુ જ્ઞાન ભવ્ય જીવાને અહિન્તાના ઉપદેશથી થાય છે. તેમજ તીથ પ્રવર્તક હાવાથી પેાતાના ઉપદેશ દ્વારા ભવ્ય જીવને ભવ સમુદ્રથી પાર ઉતારીને સિદ્ધગતિ સુધી પહેાચાડનારા અરિહન્ત જ છે. હવે કૃતકૃત્યની અને અહિન્તા સિદ્ધોને નમસ્કાર કરે છે તે વિષેની વાત કરવી રહી. તે બન્નેમાં બરાબર છે; કારણ કે અરિહન્તને પણ કાઈ કબ્ય ખાકી રહ્યું નથી. અને અનન્ત સિદ્ધીમાંથી ભાવિમાં ધવાવાળા સિદ્ધ પણ છદ્મસ્થ અવસ્થામાં અરહિં તને નમસ્કાર કરે છે જ. એ કારણથી છદ્મસ્થાવસ્થામાં અહિન્ત સિદ્ધોને અને ભાવિ સિદ્ધો અરિહન્તાને નમસ્કાર કરે છે. કારણ કે તે અવસ્થામાં કેવલ
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छद्मस्थतीर्थङ्करादिक्रममपेक्षामहे, किं तर्हि ? समुत्पन्नज्ञानदर्शनधराऽर्हदादिक्रममेव, तस्मात्तीर्थमत्रर्त्तकत्वादेशनयाऽपारसंसारपारावारोत्तारणेन भव्येभ्यः सिद्धगतिप्रदत्वाच्चान्त एवाऽभ्यहन्तीत्येषामेव युक्तः प्रथमो नमस्कारः ।
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ननु तद्यचार्योपदेशतोऽपि
कदाचिद्भव्यैरर्हतामवगतेराचार्यादिरेव क्रम विधेयो नार्हदादिः, न च तथा विहितोऽस्ति, तस्माद् यो यस्योपदेशकस्तस्य तदपेक्षयाऽभ्यर्हितत्वेन प्रागुपादानमिति त्वदुक्तमयुक्तम्, तथा सति हि गौतमादिगणधरादिभिरर्हदेशनया सिद्धानां गौतमादिशिष्योपशिष्यादिभिश्च स्वस्वगुरूपदेशतः सिद्धादीनां परिज्ञानाद्गणधराणामर्हदादिस्तच्छिष्यादीनां चाऽऽचार्यादिः क्रम आपद्येतेति पूर्वपक्षिसमाक्षेपः ।
नहीं सकते हैं, इसलिये नमस्कार मन्त्र से कहे हुए अरिहन्त पद से केवली अरिहन्तोंका ही ग्रहण है, जो कि सिद्ध भगवानके स्वरूप का भी उपदेश देकर भव्यों के अत्यन्त उपकारी हैं, अतः यह नमस्कार पूर्वानुपूर्वी से किये जाने के कारण क्रमशून्य नहीं हैं ।
प्रश्न- - जैसे अरिहन्त के उपदेश से सिद्ध भगवानका ज्ञान भव्यों को होता है वैसेही आचार्य के उपदेशसे अरिहन्तोंका ज्ञान होना सम्भव है, ऐसी अवस्थामें अरिहन्नकी भी अपेक्षा आचार्य ही को प्रथम नमस्कार होना चाहिये; अतः उपदेशक के क्रमसे यह नमस्कार किया गया है, ऐसा कहना उचित नहीं ।
જ્ઞાન ઉત્પન્ન થયેલુ નથી તેથી તેઓને અરિહંત અથવા સિદ્ધ શબ્દથી કહી શકાય જ નહિ. એટલા માટે નમસ્કાર મંત્રમાં કહેલા અરિહન્ત પદથી કેવલી અરિહન્તાનું જ ગ્રહણ થઈ શકે, જે અરિહંત, સિદ્ધ ભગવાનના સ્વરૂપના ઉપદેશ આપીને ભવ્ય જીવને અત્યન્ત ઉપકારી છે. એ કારણથી આ નમસ્કાર પૂર્વાનુપૂર્વીથી કરવામાં આવ્યા छे. तेथी उमशून्य नथी,
પ્રશ્ન—જે પ્રમાણે અરિહન્તના ઉપદેશથી ભવ્ય જીવાને સિદ્ધ ભગવાનનું જ્ઞાન થાય છે; તેવીજ રીતે આચાર્યના ઉપદેશથી અરિહન્તાનું જ્ઞાન થવા સંભવ છે. એવી સ્થિતિમાં અરિહંતની અપેક્ષાએ પણ આચાર્યંને જ પ્રથમ નમસ્કાર થવા જોઈએ. એ કારણથી ઉપદેશકના ક્રમથી આ નમસ્કાર કરવામાં આવ્યા છે એમ કહેવું તે ચેગ્ય નથી.
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आवश्यकमूत्रस्य अत्राभिधीयते-योऽयमुपदेशक्रमोऽपेक्षितस्तत्र सर्वप्राथम्यमईतामेव, गणधरेभ्यो ह्यईतामेव प्रथममुपदेशः, तदितरे गुर्वाचार्यादयस्तु केवलमईदुपदिष्टस्यैवानुवदन्त इति यद्यपि तदुपदेशेन सिद्धादयो ज्ञायन्ते तथापि तस्मन्नुपदेशे ते न स्वतन्त्रा अपि खईदुपदेशाधीना एवेति प्रोक्तोऽईदादिक्रम इत्यास्तां विस्तरः।। इत्यं नमस्कृत्य तत्फलमाह
॥ मूलम् ॥ एसो पंचनमुक्कारो, सव्वपावप्पणासणो । मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं ॥१॥
॥ छाया ॥ एष पश्चनमस्कारः, सर्वपापप्रणाशनः । मङ्गलानां च सर्वेषां, प्रथमं भवति मङ्गलम् ॥१॥
(टीका) 'एसो'-एष-पागुक्तस्वरूपः 'पंचनमुक्कारो' पश्चनमस्कारः, पश्चानाम्-अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुरूपाणां परमेष्ठिनां 'नमस्कारः स्वनिष्ठा
उत्तर-आचार्य आदि का उपदेश गणधरों के प्रति अरिहन्त भगवानसे किये गये प्रथम उपदेश का ही अनुवाद है स्वतन्त्र नहीं, इसलिये आचार्य आदि के उपदेशसे जो अरिहन्तका ज्ञान होता है उसमें भी कारण अरिहन्त ही हैं, अत एव अरिहन्तको नमस्कार पहले किया गया है। अब नमस्कारका फल कहते हैं
'एसो' इत्यादि । यह पंचपरमेष्ठियोंका नमस्कार (अपनी
ઉત્તર-આચાર્ય આદિને ઉપદેશ ગણધરે પ્રતિ અરિહન્ત ભગવાને કરેલા પ્રથમ ઉપદેશને જ અનુવાદ છે, સ્વતંત્ર નથી. એ કારણથી આચાર્ય આદિના ઉપદેશથી જે અરિહન્તનું જ્ઞાન થાય છે. તેમાં પણ અરિહન્ત જ કારણ રૂપ છે એટલે અરિહન્તને પ્રથમ નમસ્કાર કરવામાં આવ્યા છે. હવે નમસ્કારનું ફળ કહે છે.
१- नमःपूर्वकात् कृधातो वे पत्र , 'साक्षात्मभृतीनि च' (१।४।७४) इति नमःशब्दस्य गतिसज्ञायां 'कुगतिमादयः' (२।२।१८) इति समासे 'नमस्पुरसोर्गत्योः ' (८ । ३ । ४०) इति नमःशब्दस्य विसर्गस्य सत्वम् ।
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पकृष्टत्वबोधनपूर्वकप रनिष्ठोत्कृष्टत्वप्रकारकज्ञानानुकूलः शिरोनमनादिलक्षणो व्यापारविशेषः । 'सव्वपावप्पणासणो' सर्वपापप्रणाशनः, सर्वाणि= निखिलानि अष्टावपीत्यर्थः, पं= पङ्किलमर्थान्मलिन भावमापयन्ति = प्रापयन्तीति, पे= पातालेsर्थान्नरकाद्यधोगतौ आपयन्ति = प्रापयन्तीति, पं=क्षेमम्, आ=समन्तात् पिबन्ति = शोषयन्तीति, नरकादिकुगतिषु जीवान् पातयन्तीति, कलुषतभावरजोभिरात्मानं 'पांशयन्ति = मलिनयन्तीति वा 'पापानि = ज्ञानावरणीयादिकर्माणि तेषां प्र=प्रकर्षेण नाशनः = विध्वंसकः, 'च' किञ्च, 'सव्वेसिं' सर्वेषां 'मंगलाणं' मङ्गलानां = द्रव्यभावभेदभिन्नानां निर्द्धारणे षष्ठी; तेन सर्वेषु मङ्गलेष्वित्यर्थः, ' पढमं ' प्रथमं = मुख्यमिति यावत् मङ्गलं ' हवइ' भवति - अस्तीत्यर्थः ॥ १ ॥ ॥ इति नमस्कारमन्त्रव्याख्या ॥
अपेक्षा अन्य को अन्तःकरण से उत्कृष्ट समझते हुए शिर आदि पांच अंगों को झुकाना ) आत्मा को मलिन करने वाले, अथवा नरकादि कुगति में पहुंचाने वाले, या आत्मकल्याण का नाश करनेवाले सब (आठों ) पापों (ज्ञानावरणीयादि कर्मों) का नाश करने वाला, तथा द्रव्य भावरूप सर्व मंगलों में श्रेष्ठ मंगलस्वरूप है ॥ १ ॥ ॥ इति नमस्कारमन्त्रव्याख्या ॥
'एसो' छत्याहि. આ પંચ-પરમેષ્ઠિ–નમસ્કાર ( પેાતાની અપેક્ષા અન્યને અન્તઃકરણથી उष्ट સમજીને મસ્તક આદિ પાંચે આંગાને નમાવવું), આત્માને મલિન કરવાવાળા અથવા નરાદિ કુગતિમાં લઈ नारा, અથવા આત્મકલ્યાણ નાશ ४२वावाजा सर्व (भाई) पाये। (ज्ञानावरीયાદિ કર્માં )ના નાશ કરનાર તથા द्रव्य-भाव-३५ सर्वभंगसोमां श्रेष्ठ मंगलસ્વરૂપ છે. ॥ ૧ ॥
॥ छति नभस्र-मंत्र-व्याच्या ॥
१ - पांशुः = धूलि: । ' पांशुर्ना न द्वयोरजः ' इत्यमरः, सोऽस्यास्तीति पांशुमान, पांशुमन्तं कुर्वन्ति पांशयन्ति, 'तत्करोति तदाचष्टे' इति णिचीष्ठवद्भावाद्विमन्तोर्लुगिति मतुपो लुक् ततष्टिलोपः ।
२ - पापशब्दस्य तज्जनके लक्षणयात्र कर्माष्टकपरत्वम् । ३- ' नाशनः ' नन्द्यादित्वात्कर्त्तरि ल्युः ।
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३ सामायिकम्
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आवश्यकसूत्रस्य
। अथ प्रथमाध्ययनम् । नह्यकृष्टायां भूमौ निपुणेन केनापि कृषीवलेन वीजमुप्यते इति हेतोः प्रोक्तेभ्यश्च हेतुभ्योऽहंदादिपञ्चकं नमस्कृत्य शिष्यः सामायिकं चिकीर्षन्नाह
॥ मूलम् ॥ करेमि भंते! सामाइयं, सव्वं सावजं जोगं पच्चक्खामि .जावज्जीवाए, तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न करेमि न कारवेमि करतंपि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते ! पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥सू० १॥
॥ छाया ॥ करोमि भदन्त ! सामायिक, सर्व सावधं योगं प्रत्याख्यामि यावज्जीवया, त्रिविधं त्रिविधेन मनसा वाचा कायेन न करोमि न कारयामि कुर्वन्तमप्यन्यं न समनुजानामि, तस्य भदन्त ! प्रतिक्रामामि निन्दामि गर्हामि आत्मानं व्युत्सृजामि ॥१॥
जैसे कोई भी चतुर किसान परत (विन-जोती) जमीनमें बीज नहीं बोता, और कोई यदि बोये भी तो वह बीज व्यर्थ जाता है, वैसेही पंचपरमेष्ठी-नमस्कार से हृदयक्षेत्र को पवित्र किये विना सामायिक सफल नहीं हो सकती ! अतएव शिष्य पहले नमस्कार करके सामायिक करता है
- જેમ કેઈ ચતુર ખેડુત ખેડ્યા વિનાની જમીનમાં બી વાવતે નથી અને વાવે તે તે બીજ નકામું જાય છે. તેમ પંચ-પરમેષ્ઠા–નમસ્કારથી હૃદયરૂપી જમીનને પવિત્ર કર્યા વિના સામાયિક સફળ નથી થઈ શકતી ! તેટલા માટે શિષ્ય પ્રથમ નમસ્કાર કરે છે,
१-प्राकृतशैल्या 'अत एत्सौ पुंसि, (८।४।२८७) इति प्राकृतसूत्रेणैकारादेशे 'भंते' इति सिद्धम् ।
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मुनितोषणी टीका
॥ टीका ॥
भन्दते = कल्याणं सुखं वा प्रापयतीति 'भदन्तः, यद्वा भवं = संसारमन्तयति = दूरीकरोतीति, २ अथवा भवस्य = संसारस्याऽन्तो = ऽवसानं येनेति "भवान्तः । यद्वा भयस्य = जन्मजरामरणरूपस्यान्तो=नाशो येनेन्त भयान्तः स एव भदन्त इति वा अपि वा भयं ददतीति भयदा भोगास्तानन्तयतीति भदन्तः, यद्वा दान्तं = दमितं भयं येन स भयदान्तः स एव 'भदन्तः । किंवा भान्ति = दीप्यन्ते समुल्लसन्तीत्यर्थात् स्वस्वविषयेष्विति भानि इन्द्रियाणि तानि दान्तानि येन स भदान्तः स एत्र ৺भदन्तः, अथ च भाति = सम्यग्ज्ञानदर्शनचारित्रैर्दीप्यते इति 'करेमि भंते' इत्यादि । हे भदन्त = कल्याण तथा सुखको देने वाले, अथवा हे भवान्त = संसार का अन्त करनेवाले, अथवा हे भयान्त = जन्मजरामरणरूप भय तथा इहलोकादि सात भयों का अन्त करनेवाले, अथवा हे भयदान्त = अर्थात् कामभोगों का नाश करनेवाले, या भगद=भयका दमन करनेवाले, अथवा हे भदान्त = भ - इन्द्रियगण, उसका दमन करनेवाले, अथवा हे भान्त=सम्यग्
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करेमि भंते धत्याहि. हे भदन्त = प्रत्याशु तथा सुमने हेवावाणा, अथवा हे भवान्त=संसार! अंत ४२वावाणा, अथवा हे भयान्त =न्भ ४। भ२५ ३५ ભય तथा सोहि सात लयनो मत २वावाणा, हे भयदान्त = अर्थात अभ ભાગોના નાશ કરવાવાળ, अथवा हे भदन्त = भ- भेटले इंद्रियगानुं हमन १ - 'भदन्तः ' - अन्तर्भावितण्यर्थात् 'भदि कल्याणे सुखे च' अस्मादौणादिकेऽन्तप्रत्यये पृषोदरादिपाठाद्वातून कारलोपः ।
२-भवान्तः (भदन्तः) 'कर्मण्यण् ' ( पा० ३।२।१ ) इत्यण्, शकन्ध्वादेराकृतिगणत्वात्पररूपे पृषोदरादिपाठाद्वस्य दः ।
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३- 'भवान्तः' – व्यधिकरणपदो बहुव्रीहिः पररूपादेशौ प्राग्वत् । ४ - 'भयान्तः' – पृषोदरादित्वात्सिद्धः ।
५- 'भयदान्तः' – कर्मण्यणन्तभधदान्तशब्दस्य पृषोदरादित्वाद् भदन्त इति । ६- 'यद्वा- 'भयदान्तः ' निष्ठान्तस्य परनिपात आहिताग्न्यादिपाठाद्, यलोपो ह्रस्वश्च पृषोदरादिकृतः ।
७- 'भदान्तः’— निष्ठान्तपरनिपातः प्राग्वत् पृषोदरादित्वादाकारस्य ह्रस्वः ।
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आवश्यकमुत्रस्य
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भान्तः स एव 'भदन्तः, ( एवं यथामति व्युत्पत्यन्तरेष्वपि निरुक्तोक्तशाकटायनादिमतिपादितरीत्या साधनमक्रिया बोद्धव्या । ) तत्सम्बोधने - हे भदन्त != हे भगवन ! अहं, समो= रागद्वेषरहितस्तस्याऽऽयो = गमनं प्रवृत्तिरिति यावत्, अथ वा समानां=सम्यग्ज्ञानादिरत्नत्रयस्य आयो = लाभः, यद्वा समानि = ज्ञानादीनि तेषु तैर्वा आयो=गमनम् अपि वा समो = रागद्वेषाग्रस्पृष्टान्तःकरणः = स्त्रत्रन्निखिलभूतदर्शी विशुद्ध आत्मा तुच्छितानल्प चिन्तामणिकल्पतरु कामधेनुभिर्गहन भव गहनपरिभ्रमणजसलेशक्लेशनाशकैर पूर्वैर्ज्ञान दर्शनादिभिः संवृतत्वात् तस्याऽऽयः =प्राप्तिःस्वात्मविशुद्धीकरणमिति भावत्, समायः स एव सामायिकं, तत् करोमि= ज्ञान दर्शन चारित्रसे देदीप्यमान ! भगवन् ! ( गुरुमहाराज ! ) मैं सम्यग्ज्ञान सम्यग्दर्शन सम्यक् चारित्ररूप रत्नत्रयकी प्राप्ति, अथवा रागद्वेषसे रहित, समस्त जीवों को अपने समान देखनेवाले तथा
४२वावाजा, अथवा हे मान्त = सभ्य ज्ञान दर्शन व्यास्त्रिथी सुशोभित है लगवन्! (गु३भड्डाરાજ !) હું સમ્યગજ્ઞાન, સમ્યગ્દર્શન અને સમ્યક્ત્ચારિત્ર રૂપ રત્નત્રયની પ્રાપ્તિ અથવા રાગ અને દ્વેષથી રહિત, દરેક પ્રાણીને મારી જેમ જોવાવાળા તથા ચિંતામણિ, १ - 'भान्तः ' - ' भा दीप्तौ' अस्मादौणादिकोऽन्तः प्रत्ययः, सिद्धिः पृषोदरादित्वादेव । २ - ' शैत्यं हि यत्सा प्रकृतिर्जलस्य' इत्यादिषु यथेच्छमुद्देश्यगतं विधेयगतं वा लिङ्गमादाय त्यदादिप्रयोगस्य सुप्रसिद्धत्वादत्र समायशब्दगतं पुंस्त्वमादाय 'स' इति । तदुक्तं - ' किं यत्तत्सास्नालाङ्गूलककुदखुरविषाण्यर्थरूपं स शब्दः ' इति पस्पशाह्निकभाष्यप्रतीकमादाय कैयटे - ' उद्दिश्यमानप्रतिनिर्दिश्यमानयोरेकत्वमापादयन्ति सर्वनामानि पर्यायेण तत्तलिङ्गमुपाददते इति कामचारतः स शब्द इति पुंल्लिङ्गेन निर्देश:' इति ।
३ - 'विनयादिभ्यष्ठक् (५ । ४ । ३४ ) इत्यत्रत्यगणे समायशब्दस्य पाठात्स्वार्थे ठक्, तस्येकादेशः कित्त्वादादिवृद्धिः । यत्तु कचिदुक्तं - ' विनयादिषु 'समय' शब्द एव पठ्यते न तु समायशब्दस्तस्मादत्रैकदेशविकृतस्याऽनन्यत्वात्समयशब्देन समायशब्दस्यापि ग्रहणम्' । यद्वा त्रिनयादेराकृतिगणत्वाद्वगिति' तदुभयमप्यसारम्, समयशब्दवत्समायशब्दस्यापि विनयादिगणे प्रतिपदोक्तपाठाद्विनयादेराकृतिगणत्वे प्रमाणाभावाच ।
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मुनितोषणी टीका
७१ समाचरामि । एवं प्रतिज्ञाय सामायिकविधिस्वरूपमाह-'सव्वं' इत्यादिना, न वदितुं योग्यम् अवद्यम्, अवधेनन्सकलतीर्थकरगणधरादिविगहितेन (पापेन) सह वर्तत इति सावधो निन्धः, युज्यत इति योजनमिति वा श्योगः= कायिक - वाचिक-मानसिकव्यापारः, तं सावधं योगं प्रत्याख्यामि चिन्तामणि कल्पवृक्ष कामधेनु स्पर्शमणि आदि से भी *उत्कृष्ट, संसाररूपी गहन वनमें भटकते हुए जीवों के सारे दुःखोंका नाश करने वाले सम्यग्ज्ञान दर्शन चारित्रसे युक्त आत्मस्वरूप की प्राप्तिरूप सामायिक करता हूँ। अत एव यावज्जीवन (जीवन भर के लिए) मैं सर्व सावद्य व्यापार का तीन करण तीन योग से त्याग કલ્પતરૂ, કામધેનુ, સ્પર્શમણિ વિગેરેથી પણ અતિશ્રેષ્ઠ જગતરૂપી ભયંકર અટવીમાં ભટકતા પ્રાણીઓના બધાં દુઃખેને નાશ કરનાર, સમ્યકજ્ઞાન-દર્શનચારિત્રથી યુકત આત્મસ્વરૂપની પ્રાપ્તિરૂપ સામાયિક કરું છું, એટલા માટે યાજજીવ (જિંદગીભર) હું દરેક સાવધ વ્યાપારને ત્રણ કરણ ત્રણ વેગથી ત્યાગ કરૂં છું.
_ *-समताभाव की प्राप्ति हुए विना रागद्वेषका क्षय नहीं होसकता, रागद्वेष का क्षय हुए विना केवलज्ञान केवलदर्शन की प्राप्ति नहीं होसकती, और केवलज्ञान केवलदर्शन की प्राप्ति हुए विना मुक्ति नहीं मिल सकती, इसलिए मोक्ष का मूल कारण सामायिक ही है; अतएव इसे केवल सांसारिक सुख के देनेवाले चिन्तामणि पारसमणि आदि से भी उत्तम कहा है ।
* સમતા ભાવની પ્રાપ્તિ વિના રાગદ્વેષને ક્ષય થતું નથી અને રાગદ્વેષના ક્ષય વિના કેવલજ્ઞાન કેવળદર્શનની પ્રાપ્તિ થતી નથી અને કેવળજ્ઞાન કેવળદનની પ્રાપ્તિ વિના મુકિત મળતી નથી. મોક્ષનું મૂળસાધન સામાયિક જ છે, એથી સામાયિક, કેવલ સાંસારિક સુખ આપનાર ચિન્તામણિ પારસમણિ આદિથી પણ ઉત્તમ કહેલ છે.
१- 'अवधम् - नशुपपदाद्वदेः 'वदः सुपि क्यप् च (३ । १ । १७६) इति प्राप्तौ यत्क्यपौ प्रवाध्य “ अवधपण्यवर्या गर्दापणितव्यानिरोधेषु (३।१। १०१) इतिनिपातनाद्गर्दायां यत् । यत्तु 'वदितुं योग्यं वद्यं, न नयमवद्य'-मिति व्याख्यानं तव्याकरणतत्त्वानवबोधमूलकमेव, नत्रुपपदादेव वदधातार्यत्मत्ययनिपातनस्य मागुक्तखात् ।
२- योगः-'युजिर योगे' अस्माद्धन् । ३- प्रत्याख्यामि प्रत्याभूर्वकस्य ख्या 'प्रकथने' इत्यस्य रूपम् ।
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आवश्यकमूत्रस्य सर्वथा परित्यजामीत्यर्थः। यद्वा प्रत्याचक्षे' इतिच्छाया, अस्याप्यर्थः प्राग्वदेव, केवलं धातुरेवातिरिच्यते-'चति व्यक्तायां वाची'-ति । कियत्कालार्थ प्रत्याख्यामी ? त्याह-यावज्जीवये'-ति, अत्र यावच्छब्दः परिमाणार्थको मर्यादार्थकोऽवधारणार्थकश्चाऽव्ययः। जीवनं जीवा,' तया जीवया' जीवामित्यर्थः, यावन्मम जीवनपरिमाणं तावत्पत्याख्यामीति जीवनं मर्यादीकत्यार्थान्न केवलं मरणकाल एवाऽपि तु ततः प्रागपि प्रत्याख्यामीति, जीवन एव न तु तदुत्तरार्थमपि प्रत्याख्यामीत्यर्थः । कीदृशं तं योगं प्रत्याख्यामी? त्याह'त्रिविध'-मिति-तिस्रो विधाः प्रकारा यस्य तं कृतकारितानुमतरूपं मनोवाकायव्यापारम् । तत्र कृतं स्वतन्त्रणाऽऽत्मना सम्पादितं, कारितम् अन्यद्वारा सम्पादितम् , अनुमतं सावद्यव्यापारमारभमाणस्य 'खया सम्यक् क्रियते, एवमेव क्रियता'-मित्यादिना, यद्वा चक्षुपा दृष्टस्यापि तूष्णीमवस्थानेन निषेधाधकरणात्मोत्साहितम् । त्रिविधेन प्रकारत्रयविशिष्टेन कारणभूतेन, केन तेने ?-त्याह'मनसा' वाचा कायेनेति । ननु त्रिविधेनेत्यनेन यत्पकारत्रयं गृह्यते तत् मनसेकरता हूँ। तीन करण ये हैं- कृत-कारित-अनुमोदित । कृत-अपनी इच्छासे स्वयं करना, कारित-दूसरे व्यक्ति से कराना, अनुमोदित-जो सावद्य व्यापार कर रहा हो उसे अच्छा समझना। तीन योग ये हैं-(१) मन, (२) वचन, (३) काय ।
प्रश्न-सूत्र में 'त्रिविधेन' (तीन प्रकार से) कहा ही है फिर ऋण ४२६५ मा - (१) त, (२) रित, (3) अनुमाहित. કૃત–પતાની ઈરછાથી પિતે કરવું. કારિત–બીજી વ્યક્તિ પાસે કરાવવું. અનુદિત-જે સાવદ્ય વ્યાપાર કરી રહ્યો હોય, તેને સારું જાણવું. त्रय यो। मा छ (१) भन, (२) १यन, (3) या. प्रश्न-सूत्रमा त्रिविधेन (aey ३) ४ छ, पछी मनसा=(भनथी),
१- जीवा-'जीव पाणधारणे' अस्मात् 'गुरोश्च हलः' (३।३।१०३) इति वचनेन स्त्रियामकारप्रत्यये स्त्रीत्वाट्टाप्, 'ईहा, ऊहा' इत्यादिवत् ।
२-'जीवया' - 'ततोऽन्यत्रापि दृश्यते' इति वचनबलाद्यावच्छब्दयोगे द्वितीयायाः प्राप्तावप्यार्षत्वात्तृतीया ।
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मुनितोषणी टीका त्यादिना प्रतिपदमेवोक्तम् , एवं सति त्रिविधेनेत्युपादानं पुनरुतं भवति । यद्वा त्रिविधेनेति विशेषणं मनसेत्यादेरेव संभवति, ततश्च त्रिविधेन मनसा, त्रिविधया वाचा, त्रिविधेन कायेनेत्यन्वये मनोवाकायानां प्रत्येकं त्रैविध्यं प्राप्नोति, तचानिष्टं, नयत्र मनादीनि प्रत्येकं त्रैविध्यमर्हन्ति किं तर्हि ? तद्वयापारा एवेति चेन्न, तदभावे हि मनसा वाचा कर्मणेत्येतावन्मात्रोक्तौ 'न करोमि न कारयामि कुर्वन्तमप्यन्यं न समनुजानामी'-त्यनेन सह " यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम्" (१।३।१०) इति वचनानुरोधेन “आद्यन्तौ टकितौ" (१।१ । ४६) इत्यादिवत् , “शत्रु मित्रं विपत्तिं च जय रञ्जय भञ्जये"--त्यादिवत् 'एचोऽय'मनसा' (मनसे) 'वाचा' (वचनसे) 'कायेन' (कायसे) कहने से पुनरुक्ति (कहे हुएको पुनः कहना) होती है। या (तीन प्रकारसे) यह विशेषण 'मन, वचन, काय' का ही होसकता है। यदि ऐसा मान लिया जाय तो इसका अर्थ होगा कि 'तीन प्रकारके काय से
आरम्भ न करें । अर्थात् मन वचन काय के तीन तीन भेद होंगे। ऐसा अर्थ शास्त्रविरुद्ध है, शास्त्रों में भगवानने मन आदि के तीन तीन भेद नहीं बताये हैं, किन्तु मन आदि के व्यापारों को तीन प्रकार का बताया है।
उत्तर-यह शंका ठीक नहीं है। यदि 'त्रिविधेन' न कहकर केवल 'मनसा वाचा कायेन' कह देते तो अर्थ ठीक नहीं बैठता, क्यों कि जैसे-कोई कहे कि 'हेय और उपादेयको त्यागो और वाचा (वयनथा) कायेन (आयाथी) ४उवाथी पुन३ति (४सार ५२१ ४) याय छे. આ “ત્રણ પ્રકારે એ વિશેષણ “મન, વચન, કાયાનું જ હોઈ શકે છે. જે એમ માનવામાં આવે તે એને અર્થ એ થશે કે “ત્રણ પ્રકારના મનથી, ત્રણ પ્રકારના વચનથી અને ત્રણ પ્રકારની કાયાથી આરંભ ન કરે. અર્થાત્ મન, વચન, કાયાના પણ ત્રણ ત્રણ ભેદ બનશે, એ અર્થ શાસ્ત્રવિરુદ્ધ છે. શાસ્ત્રમાં ભગવાને મન આદિના ત્રણ ભેદ બતાવ્યા નથી, પરંતુ મન આદિના વ્યાપારને તે ત્રણ પ્રકારના मताच्या छे.
उत्त२-मेश २०१२ नथी. त्रिविधेन न डीन व मनसा वाचा कायेन કહ્યું હેત તે અર્થ બરાબર બંધ બેસત નહિ; કારણ કે કેઈ જેમ કહે કે “હેય અને ઉપાદેયને ત્યાગ અને ગ્રહણ કરે” તે એ વાકયમાં ક્રમાનુસાર હેય’ની
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आवश्यकसूत्रस्य वायावः' (६ । १ । ७८ ) इत्यादिवद्वा क्रमिकान्वये 'मनसा न करोमि, वाचा न कारयामि, कायेन कुर्वन्तमप्यन्यं न समनुजानामी'-त्यनभीष्टोऽर्थ आपघेत, तद्वारणार्थ त्रिविधेनेत्युनो, तेन मनसा न करोमि न कारयामि कुर्वन्तमप्यन्यं न समनुजानामि, वाचा न करोमि न कारयामि कुर्वन्तमप्यन्यं न समनुजानामि, एवं कायेन न करोमि न कारयामि कुर्वन्तमप्यन्यं न समनुजानामीत्यर्थों भवति । यद्वा पूर्व सामान्यतस्त्रिविधेनेत्युक्त्वा केन त्रिविधेनेति जिज्ञासायां
--- - - ग्रहण करो।' तो इस वाक्य में क्रमसे 'हेय' के साथ 'त्यागो' का सम्बन्ध हो जाता है और 'उपादेय' के साथ 'ग्रहण करो' का। इसी प्रकार 'चोलपट्टा चद्दर पहनो, ओढो' कहने से यह अर्थ होता है कि 'चोलपट्टा पहनो और चद्दर ओढो', इसी प्रकार 'त्रिविधेन' (तीन प्रकार से) पद न रग्वते तो ऐसा अनिष्ट अर्थ हो जाता किमनसे न करे, वचनसे न करावे और कायसे अनुमोदना न करे। इस अनिष्ट अर्थ का परिहार करने के लिए 'त्रिविधेन' पद रखने से यह अर्थ हुआ कि-(१) मनसे न करूँ, (२) न कराऊँ (३) न करते हुए को भला जान । (४) वचन से न करूँ, (५) न कराऊँ, (६) न करते हुए को भला जान । (७) काय से न करूँ, (८) न कराऊ, (१) न करनेवाले को भला जान ।।
___ अथवा पहले सामान्यरूप से कहा है कि तीन प्रकार से न
સાથે “ત્યાગોને સંબંધ થઈ જાય છે અને “ઉપાદેયની સાથે “ગ્રહણ કરે ને. એજ રીતે “લપટ્ટો ચાદર પહેરે એ કહેવાથી એ અર્થ થાય છે કે ચલપટ્ટો पडे। भने या६२ सोती. से शते त्रिविधेन (वय ४३) २४ । सभ्यो रात તે એ અનિષ્ટ અર્થ થઈ જાત કે મનથી ન કરે, વચનથી ન કરાવે અને કાયાથી ન અનુમોદના કરો. અનિટ અર્થને પરિહાર કરવાને માટે ત્રિવિદેન શબ્દ मायो छ, सेम त्रिविधेन श६ मा५पाथी वो मय थयो 3-(१) भनथी न ४३, (२) न ४२६, (3) न ४२नारने म त), (४) पयनथी न ४३, (५) न ४२राj, (6) न ४२नारने म GALY', (७) याथी ४३, (८) न ४२j (6) ન કરનારને ભલે જાણું.
અથવા પહેલાં સામાન્ય રૂપે કહ્યું છે કે “ત્રણ પ્રકારે ન કરૂં પરંતુ તે ત્રણ
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सुनितोषणी टीका तस्पकारान् दर्शयितुं विशेषत आह-मनसेत्यादीति नास्ति पौनरुक्त्यम् । केचित्'मनसा वा वाचा वा कायेन वें'-ति विकल्पसंग्रहार्थ त्रिविधेनेत्युक्तमित्यूचिरे। न कारयामीत्यत्राऽन्येनेति शेषः पूरणीयः। न समनुजामि=नानुमन्ये । 'तस्येति तस्मात् सावधयोगादित्यर्थः। 'भंते' इति भदन्तेति सम्बोधनं प्राग्वदेव, पूर्वानुवृत्त्यैवार्थसिद्धौ पुनः ‘भंते' इत्युक्तिः प्रारम्भवत् पर्यवसानमपि गुर्वामन्त्रणपूर्वकमेव कर्त्तव्यमिति मूचनाय । यद्वा पुनरुच्चारणयत्नेनाऽनुत्तिरेव लभ्यते, करूँ, परन्तु वे तीन प्रकार कौन-कौनसे हैं ? ऐसी जिज्ञासा होने पर विशेषरूपसे बता दिया कि "मनसा वाचा कायेन" ये तीन प्रकार हैं, इसलिए पुनरुक्ति आदि कोई दोष नहीं है।
• अथवा मन, वचन और कायके निमित्तसे होनेवाले तीन भेदों का संग्रह करने के लिए 'त्रिविधेन' पद रखा है।
व्याकरण में 'भंते' शब्द अनेक प्रकार से सिद्ध होता है, इसलिए उसके अर्थ भी बहुतसे हैं। जैसे (१) कल्याण और सुखको देनेवाले, (२) संसार का अन्त करनेवाले, (३) जिनकी सेवा-भक्ति करने से संसारका अन्त हो जाता है वे, (४) जन्म-जरा मरणके भयका नाश करनेवाले-निर्भय, (५) भोगों को त्याग देनेवाले, (६) भय को दमन करनेवाले, (७) इन्द्रियोंका दमन करनेवाले, (८) सम्यगज्ञान, सम्यग्दर्शन, और सम्यकनारित्र से ४२ ४३॥ ४॥ छ ? सेवा शिसा यतi विशेष३५ तावी माध्यु मनसा वाचा જાન એ ત્રણ પ્રકાર છે. એથી કરીને પુનરૂકિત આદિ કઈ દોષ થતું નથી.
અથવા મન વચન અને કાયાના નિમિત્તે થનારા ત્રણ ભેદને સંગ્રહ ४२वाने भाटे त्रिविधेन शम् ॥ध्य छे.
વ્યાકરણમાં અંતે શબ્દ અનેક પ્રકારે સિદ્ધ થાય છે. તેથી એના અર્થ या छे; (१) ४८याय भने सुमने मापना२, (२) संसारने। अंत ४२ना२, (૩) જેની સેવાભકિત કરવાથી સંસારને અંત આવી જાય છે તે, (૪) જન્મ જરા મરણના ભયને નાશ કરનાર, (૫) ભેગેને ત્યાગ કરનાર, ભયનું દમન કરનારનિર્ભય, (૭) ઈદ્રિયેનું દમન કરનાર, (૮) સમ્યજ્ઞાન સમ્યગ્દર્શન અને સમ્યક
१- 'तस्येति तस्मात्' अत्राऽपादानस्य शेषत्वविवक्षया षष्ठी ।
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आवश्यकमत्रस्य
यतः केवलमनुत्तिमात्रेण न किमपि कार्य भवति किन्तूच्चारणादिप्रयत्नेनैव, तदन वैयाकरणैः-"अनुवर्तन्ते च नाम विधयो न चानुवर्तनादेव भवन्ति, किं तर्हि ? यत्नाद्भवन्ति, स चायं यत्नः पुनरुच्चारणम्" इति । अथवा स्वस्यापि भदन्तवादात्मन एवेदमामन्त्रणं सावधानीकरणाय । यद्वा भूयः सम्बोधनेन गुरुं पति भक्त्युदेकोऽभिव्यज्यते । प्रतिक्रामामिप्रतिनिवर्ते, पृथगभवामीति यावत् । यत्र कचिट्टीकासु 'पडिक्कमामि' इत्यस्य 'प्रतिक्रमामि' इतिच्छायोपलभ्यते सा प्रामादिक्येव “क्रमः परस्मैपदेषु" (७ । ३ । ७६) इति वचनबलेन क्रमेरुपधादीर्घस्य दुर्निवारत्वात् । निन्दामि-जुगुप्से । गर्ले-जुगुप्स इत्येवार्थः । ननु तर्हि निन्दागर्दयोः 'कुत्सा निन्दा च गर्हणा' इति कोषरीत्या पर्यायत्वेन पौनरुत्थं वज्रलेपायितमेवेति चेन्न, यतः स्वसाक्षिकी निन्दा, गुरुसाक्षिकी च गति परस्पर भवति भूयान् भेदः। यद्वा ‘निन्दा साधारणी कुत्सा, गर्दा सैवातिभूयसी'-ति परस्परमर्थभेदान्नास्ति पर्यायता, यथा-वृद्ध एव कोपः क्रोधो न साधारण इति को पक्रोधयोः पर्यायवाभावेन क्रुध्यर्थत्वाभावात्कुब्धातुयोगे चतुर्थी नेष्यते, तदुक्तं- 'क्रुधदुहेामयार्थानां यम्पति कोप (१ । ४ । ३७) इत्यत्र शब्देन्दुशेखरे नागेशेन-'नह्यकुपितः क्रुध्यतीति भाष्येण प्ररूढकोप एव क्रोध इति कुपेदीपनेवाले । इन सब को 'भंते' कहते हैं। इसी प्रकार और अर्थ भी समझने चाहिए । 'भदन्त' ! इस सम्बोधनसे यह प्रगट होता है कि समस्त क्रियाएँ गुरुमहाराज की साक्षीसे ही करनी चाहिए।
हे भगवन् ! मैं सावद्ययोगसे निवृत्त होता हूँ, निन्दा करता हूँ और गर्दा करता हूँ। कोशों में निन्दा और गर्दा शन्द का एक ही अर्थ है, इसलिए पुनरुक्ति होती है, ऐसा नहीं समझना चाहिए; क्यों कि निन्दा आत्मसाक्षी से होती है और गर्दा गुरु
ચારિત્રથી દીપ્તિમાન. એ બધાને મને કહે છે, એજ રીતે બીજા અર્થો પણ સમજી લેવા. “ ભદન્ત' એ સંબોધનથી એમ પ્રગટ થાય છે કે બધી ક્રિયાઓ ગુરૂમહારાજની સાક્ષીએ જ કરવી જોઈએ.
હે ભગવાન્ ! હું દંડથી નિવૃત્ત થાઉં છું, નિંદા કરું છું અને ગહ કરું છું. શબ્દકોશમાં “નિન્દા અને ગહ’ શબ્દને એક જ અર્થ છે, તેથી પુનકિત થાય છે, એમ ન સમજવું, કારણ કે નિંદા આત્મસાક્ષીએ થાય છે અને
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मुनितोषणी टीका स्तदर्थत्वाभावेन न तद्योग इदम्, कुप्यति कस्मै चिदित्याद्यसाध्वेवे'-ति। 'निन्दामि, गर्हामि' इत्यनयोस्तस्येत्यनेन प्रागुतन सम्बन्धस्तेन सावधयोगसम्बन्धिनी स्वसासिकी गुरुसाक्षिकी च निन्दा करोमीति निर्गलितोऽर्थः, तस्येत्यत्र सम्बन्धसामान्ये षष्ठयाः प्रागुक्तत्वात् । यद्वा 'आत्मान'-मित्यस्यैव मध्यमणिन्यायादेहलीदीपन्यायाद्वा व्युत्सृजामीत्यनेन निन्दामि, गर्हामि' इत्याभ्यां च सम्बन्धस्तेन सावधयोगकारिणमात्मानं जुगुप्से, व्युत्सृजामि=विविधभावनया विशिष्य वा परित्यजामीत्यर्थः ॥मू० १॥ साक्षी से होती है। अथवा निन्दा साधारण कुत्साको कहते हैं और गही अत्यन्त निन्दा को कहते हैं।
- इसका अर्थ यह होता है कि-हे भगवन् ! अतीत काल में सावध व्यापार करनेवाले आत्मा (आत्मपरिणति) को अनित्य आदि भावना भाकर त्यागता हूँ, निन्दा करता हूँ, गर्दी करता हूँ। जैसे घर की देहलीपर दीपक रखने से भीतर भी प्रकाश होता है और बाहर भी प्रकाश होता है, इसीको 'देहली-दीपक' न्याय कहते हैं, कहा भी है-'परै एक पद बीच में, दुहु दिस लागै सोय । सो है दीपक-देहरी, जानत है सब कोय ॥१॥ बीच में मणि जड देने से दोनों ओर मणिका प्रकाश होता है, यह 'मध्यमणि' न्याय कहलाता है, इसी प्रकार 'अप्पाणं' का दोनों के साथ सम्बन्ध होता है। अर्थात् सावध व्यापारवाली आत्मा को त्यागता हूँ और उसकी निन्दा करता हूँ तथा गर्दा करता हूँ॥सू० १॥ ગહ ગુરૂસાક્ષીએ થાય છે, અથવા નિંદા સાધારણ કત્સાને કહે છે અને ગહ અત્યંત નિદાને કહે છે.
આને અર્થ એ થાય છે કે હે ભગવન! અતીત કાળમાં દંડ (સાવદ્ય વ્યાપાર) કરનાર આત્મા (આત્મપરિણતિ) ને અનિત્ય આદિ ભાવના ભાવીને ત્યાગું છું, નિંદું છું, ગણું છું, જેમ ઘરની દેહેલી (ઉંબર) પર દી રાખવાથી અંદર પણ પ્રકાશ થાય છે અને બહાર પણ પ્રકાશ થાય છે તેને “દેહલી-દીપક ન્યાય” કહે છે. કહ્યું છે કે-પરે એક પદ બીચમેં, દુહ દિસ લાગે સેય. સે 3 h४-३७,' नत सम छोय. (1)' क्यमा भलि ही वाथी मे બાજુ મણિને પ્રકાશ થાય છે તેને “મધ્યમણિ-ન્યાય' કહે છે. એ જ રીતે
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आवश्यकमूत्रस्य साधोः सर्वविरतिरूपं सामायिकं यावज्जीवनं भवत्यवश्यकर्तव्यं तस्मिंश्च सति प्रमादादिनाऽतिचाराः सम्भवन्तीति सामायिकनिरूपणोत्तरमग्रे कायोत्सर्गपतिज्ञापूर्वकं शिष्यः प्रथमं दोषान् पर्यालोचयति
॥ मूलम् ॥ इच्छामि ठामि काउस्सग्गं जो मे देवसिओअईआरो को काइओ वाइओ माणसिओ उस्सुत्तो उम्मग्गो अकप्पोअकरणिजो दुज्झाओ दुविचिंतिओ अणायारो अणिच्छियव्वो असमणपाउगो नाणे तह दंसणे चरित्ते सुए सामाइए, तिण्हं गुत्तीणं, चउण्हं कसायाणं, पंचण्हं महव्वयाणं, छण्हं जीवनिकायाणं, सत्तण्हं पिंडेसणाणं, अहण्हं पवयणमाऊणं, नवण्हं बंभचेरगुत्तीणं, दसविहे समणधम्मे समणाणं जोगाणं जं खंडियं जं विराहियं तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ॥सू० २॥ ।
॥ छाया ॥ इच्छामि स्थातुं कायोत्सर्ग यो मया देवसिकोऽतीचारः कृतः कायिको वाचिको मानसिक उत्मत्र उन्मार्गोऽकल्पोऽकरणीयो दुर्ध्यातो दुर्विचिन्तितोऽनाचारोऽनेष्टव्योऽश्रमणप्रायोग्यो ज्ञाने तथा दर्शने चारित्रे श्रुते सामायिके, तिसृणां
___मुनियों की सर्वविरतिरूप सामायिक यावजीवन होती है, उसमें प्रमाद आदि से अतिचार की संभावना रहती है। अतएव सामायिक का निरूपण करके अब इसके आगे शिष्य कायोत्सर्गपूर्वक अतिचार की आलोचना करने के लिये प्रथम कायोत्सर्ग की प्रतिज्ञा करके दोषों की आलोचना करता है-'इच्छामि ठामि काउस्सग्गं' इत्यादि । મyri ને બેઉની સાથે સંબંધ થાય છે. અર્થાત સાવઘવ્યાપારવાળા આત્માને ત્યાગું છું અને તેની નિંદા કરું છું, તથા ગઈ કરૂં છું. (સૂ૦ ૧)
મુનિની સર્વવિરતિરૂપ સામાયિક યાવજછવ હોય છે. એમાં પ્રસાદ આદિથી અતિચારની સંભાવના રહે છે, એટલા માટે સામાયિક નિરૂપણ કરીને તે પછી શિખ્ય કાર્યોત્સર્ગપૂર્વક અતિચારની આચના કરવા માટે પ્રથમ योत्सना प्रतिज्ञा प्रशन होषानी भासायना ४२ छे इच्छामि ठामि काउस्सग्गं
विगेरे.
१- ‘लुम्पेरवश्यमः कृत्ये' इति मकारलोपः ।
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सुनितोषणी टीका
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गुप्तीनां चतुर्णां कषायाणां पञ्चानां महाव्रतानां षण्णां जीवनिकायानां, सप्तानां पिण्डैषणाना, - मष्टानां प्रवचनमातृणां, नवानां ब्रह्मचर्यगुप्तीनां दशविधे भ्रमणधर्मे श्रमणानां योगानां यत्खण्डितं यद्विराधितं तस्य मिथ्या मे दुष्कृतम् ॥ मु० २ ॥ ॥ टीका ॥
' 'ठामि ' स्थातुं चित्तैकाग्रतयेति शेषः, कर्तुमित्यर्थः । 'काउस्सग्गं ' कायोत्सर्ग, कायस्य= शरीरस्य उत्सर्ग = तदेकतानता पूर्वकैकदेशावस्थितिध्यानमौनव्यतिरिक्तयावत्क्रियाकलापसम्बन्धमधिकृत्य सर्वावेच्छेदेन परित्यागम् - अतिचारसंशुद्धये व्युत्सर्जनं, ममत्वापवर्जन वा 'इच्छामि = वाञ्छामि । तत्रादौ वक्ष्यमाणरीत्या दोषान् पर्यालोचयति - 'जो' इति । यः = कायोत्सर्गः मया = कर्तृभूतेन 'देविसओ' = दिवसेन निर्वृत्तो देवसिक दिवसपदं रात्रेरप्युपलक्षकं तेन
हे भदन्त ! मैं चित्तकी स्थिरता के साथ एक स्थान पर स्थिर रहकर ध्यान - मौन के सिवाय अन्य सभी व्यापारों का परित्यागरूप कायोत्सर्ग करता हूँ, परन्तु इसके पहले शिष्य अपने दोषों की आलोचना करता है- 'जो मे' इत्यादि । जो मुझसे प्रमादवश दिवससम्बन्धी तथा रात्रिसम्बन्धी संयममर्यादा का उल्लङ्घनरूप
હે ભદન્ત ! હું ચિત્તની સ્થિરતાની સાથે એક સ્થાન ઉપર સ્થિર થઇને ધ્યાન મૌન સિવાય અન્ય અધા કામેના ત્યાગરૂપ કાર્યોત્સર્ગ કરૂ છું, परंतु मेना पडेसां शिष्य पोताना होषोनी आसोयना पुरे छे. " जो मे प्रत्याहि " જો મારાથી આળસવશ દિવસસંબંધી તથા રાત્રિસંધી સમયમર્યાદાના
१ - 'ठामि' कर्त्तुमित्यर्थः । धातूनामनेकार्थत्वात् 'स्था' धातुः करोत्यर्थः, आर्षस्वाद् 'मिप्' प्रत्ययः तुमुन्नर्थः, आर्षेषु हि प्रयोगेषु बाहुलकेन सर्वे विधयो विकल्प्यन्ते यदुक्तम्- 'कचित्पत्तिः कचिदमवृत्तिः कचिद्विभाषा कचिदन्यदेव | विधेर्विधानं बहुधा समीक्ष्य, चतुर्विधं बाहुलकं वदन्ति " ॥ १॥ इति, किश्च - “सुप्तिङपग्रहलिङ्गनराणां, कालहलचस्वरकर्तृयङांच । व्यत्ययमिच्छति शास्त्रकृदेषां, सोऽपि च सिध्यति बाहुलकेन ||२||" इति, तत्र उपग्रहः = परस्मैपदाऽऽत्मनेपदे, नरः=प्रथमादिपुरुषत्रयम् । कालः = कालवाचकः प्रत्ययः । कर्तृशब्दः कारकत्वावच्छिन्नोपलक्षकस्तेन कारकवाचिनां कृत्तद्धितानां विपर्ययः । यङिति यङो यशब्दादारभ्य लिङ्याशिष्यङ्ङिति ङकारेण प्रत्याहारः । स्पष्टं शिष्टम् । २ “ तेन निर्वृत्तम् ” (५ । १ । ७८) इति ठक् ।
"
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आवश्यकमुत्रस्य दिवसकृतो रात्रिकृतश्चेत्यर्थः। 'अईआरो' अतिक्रम्य चारः चरणमतीचार:=संयममर्यादातो बहिःपवर्तनं-संयममर्यादामुल्लङ्घ्य गमनमिति यावत् , 'कओ' कृतो विहित इत्यर्थः । कीदृशः स देवसिकोऽतीचारः ? इत्यत आह'काइओ वाइओ माणसिओ' इति, काये भवः, काये जातः, कायेन निवृत्तो वा कायिकः । एवं वाचिको मानसिक इत्युभयत्रापि बोध्यम् , कायजातो वागजातो मनोजात इति निष्कर्षः । 'उस्सुत्तो' सूत्रमुच्छियोत्क्रम्य वा मुत्रार्श्व वा संजात उत्सूत्रः सूत्रोल्लङ्घनेन निष्पन्नोऽर्थात्तीर्थकरगणधराद्याप्तोपदिष्टप्रवचनपरित्यागेनोद्भूतः। अतएव 'उम्मग्गो' मार्गादुद्गत उन्मार्गः क्षायोपमिकभावपहाणपूर्वकोदयिकभावपोसंक्रमः ( क्रान्तः )। 'अप्पो' कल्पः करणचरणव्यापाररूप आचारः, न कल्पोऽकल्पः करणचरणापाररहित इत्यर्थः । यद्वा ' अकल्प्यः' इतिच्छाया तस्य कल्पयितुं योग्यः कल्प्यो मुनिधर्मः न कल्प्योऽकल्प्यो-मुन्याचारविशङ्कलितः अतएव 'अकरणिज्जो' अकरणीयः-मुनिभिरनाचरणीयः । उक्ताः कायिक-वाचिक-योरतीचारयोर्भेदाः, सम्पति मानसिकस्याऽतिचारस्य तानाहअतिचार किया गया हो, चाहे वह कायसम्बन्धी, वचनसम्बन्धी, मनसम्बन्धी, 'उम्सुत्तो' उत्सत्ररूप अर्थात् तीर्थङ्कर गणधर आदिके उपदिष्ट प्रवचनके विरुद्ध प्ररूपणादिरूप, 'उम्मग्गो'-उन्मार्गरूप अर्थात् क्षायोपशमिक भावका उल्लङ्घन करके औदयिक भावमें प्रवृत्ति प, 'अकप्पो'-अकल्प(ल्प्य) करणचरणरूप आचार रहित, 'अकरणिज्जो'अकरणीय अर्थात् मुनियोंके नहीं करने योग्य हो। ये सब ऊपर कहे हुए कायिक तथा वाचिक अतिचार हैं, अब मानसिक अतिचार ઉલંઘનરૂપ અતિચાર કરીયે હય, ચાહે તે એ શરીરસંબંધી વચનસંબંધી મનसंधी, उस्मुत्तो-उत्सूत्ररूप अर्थात् नी ४२ अपर विगेरे ७५६ट प्रयननी १३५ ५३५६६, उम्मग्गो उभाग३५ अर्थात् क्षायोपशम मार्नु घनशन सोय भावमा प्रवृत्ति३५, अकप्पो २१४६प्य, ४२६२२९४३५ यारहित मन अकरणिज्जो અકરણીય અર્થાત્ મુનિઓને નહિ કરવા લાયક હોય. ઉપર કહેલ એ બધા કાયિક તથા વાચિક અતિચાર છે. હવે માનસિક અતિચાર કહે છે
१ 'कायिकः । “तत्रभवः (४ । ३ । ५३) इति, “तत्रजातः" (४ । ३ । २५) इति, "तेन निवृत्तम् " (५ । १।७८) इति वा ठक् ।
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मुनितोषणी टीका
८१
दुन्झाओ ' - इत्यादिना, ' दुज्झाओ ' दुयतिः, दुष्टो दुःस्थो वा ध्यातो दुर्ध्यातः = त्रिरुद्धध्यानसंपन्नः कषायकलुषितान्तः करणैकाग्रताऽऽर्त्तरौद्ररूपः, यद्वा आर्षत्वादत्र भावे क्तः पुंस्त्वं च तेन दुष्टध्यानरूप इत्यर्थः, अत एव 'दुब्विचितिओ ' दुःखेन दृष्टो वा विचिन्तितो दुर्विचिन्तितः=अनवस्थितचित्ततया तत्त्वपरिभ्रंशनपूर्वकाऽशुभचिन्तनोपेतः, अतएव ' अणायारो' अनाचारः= संयममार्गेण प्रचलतां संयमिनामनाचरितव्यः । यतोऽनाचरितव्योऽतएव ' अणिच्छियन्त्रो ' अनेष्टव्यः = चेतसाऽपि लेशतोऽप्यनभिलषणीयः, यतश्चैत्रमतः ' असमणपाउरगो' न योग्योऽयोग्यः प्रकर्षेणाऽयोग्यः प्रायोग्यः श्रमणानां श्रमणैर्वा प्रायोग्यः = श्रमणमायोग्यः न श्रमणमायोग्योऽश्रमणपायोग्यः - श्रमणानामयोग्य इत्यर्थः, मुनिभिरननुष्ठेय इति यावत् । अत्र व्युत्क्रमव्याख्यानं तु सूत्रक्रमविरोधादनुभवविरोधाच्चो पेक्षितव्यमेव । किंकिविषयकोऽतिचारः ? ' नाणे ' इत्यादिना, 'नाणे ' ज्ञाने= पदार्थ परिबोधलक्षणे, 'दंसणे' दर्शने= मवचनाभिरोचनस्त्ररूपे, 'चरिते ' चारित्रे = आश्रवनिरोधरूपे 'नाणे ' इत्यादिषु वैषयिकाधारे सप्तमी, मोक्षे इच्छाऽस्तीत्यादिवत् तेन ज्ञानविषयको दर्शनविषयकचारित्रत्रिषयकश्चेति फलति । विशेषेणोच्यते - ' सुए ' इति, 'सुए ' श्रुते= मत्यादिज्ञानस्वरूपे, श्रुतग्रहणस्य मत्यादिज्ञानोपलक्षकत्वात् मत्यादिज्ञानविषयक इत्यर्थः, यद्वा ' सुए ' इत्यस्य श्रुते= धर्मेऽर्थाच्छास्त्रपठनादिरूप इत्येवार्थो न तु मत्यादिज्ञान इति, अतिचारयात्राकाले मृत्रपठनादिरूपः । अधुना चारित्रातिचार
इत्याह
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कहते हैं— 'दुज्झाओ' - दुर्ध्यानकषाययुक्त अन्तःकरण की एकाग्रतासे आर्सरौद्रध्यानरूप, 'दुव्विचितिओ' - दुर्विचिन्तित चित्त की असावधानता से वस्तु के अयथार्थ स्वरूपका चिन्तनरूप, 'अणायारो' - अनाचार - संयमियों को अनाचरणीय, 'अणिच्छियन्वो' - अनेष्टव्य-सर्वथा अवांछनीय तथा 'असमणपाउग्गो' - अश्रमणप्रायोग्य - साधुओं के आचरणके अयोग्य
આ
दुज्झाओ - दुर्ध्यान- षाययुक्त संतः उनी मेयताथी मार्त्तरौद्रध्यान३य दुविचितिओ - दुर्विचिन्तित - वित्तनी असावधानताथी वस्तुना अयथार्थ स्व३यमां चिंतन३५ अणायारो - अनावरणीय संयभियोने मनायरणीय अणिच्छियन्वो-अनेष्टव्यहमेशां नहि इच्छ्वायोज्य तथा असमण पाउग्गो - अश्रमणप्रायोग्य - साधुयना આચરણને અયેાગ્ય હાય તેમજ જ્ઞાનમાં, દેશનમાં, ચારિત્રમાં તથા વિશેષરૂપથી શ્રુત
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माह - ' सामाइए ' इति, सामायिके = सामायिकविषयकः, प्राग्व्याख्यातः सामायिकपदार्थः, अत्र सामायिकपदेन सम्यक्त्व सामायिक - चारित्रसामयिकयोर्ग्रहणं, तत्र वक्ष्यमाणरूपः शङ्कादिः सम्यक्त्व सामायिका तिचारविषयः, चारित्रसामायिकातिचारो भेदत्रयात्मक इति बोधयितुमाह - ' तिन्हं गुत्तीणं ' इति, तिसृणां गुप्तीनां, निर्द्धारणे षष्ठी, तेन तिसृणां गुप्तीनां मध्य इत्यर्थः, एवमग्रेऽपि, गुप्तिश्व मोक्षाभिलाषुकयोगनिरोधरूपा चण्डं कसायाणं ' चतुर्णां कषायाणां भवमहीरुहसेचकानां क्रोधमानादीनाम्, 'पंचण्डं महव्त्रयाणं ' पश्चानां महावतानां= प्राणातिपातमृषावादाऽदत्ताऽऽदानाद्यु परतिस्वरूपाणां, 'छण्हें जीवनिकायाणं ' षण्णां जीवनिकायानां = पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतित्रसकायिकानाम्, 'सत्तण्हं पिंडेसणाणं ' सप्तानां पिण्डेषणानामसंसृष्टाप्रभृतीनाम्, ताश्च यथा - १ असंसृष्टा २ संसृष्टा, ३ संसृष्टाऽसंसृष्टा, ४ अल्पलेपा, ५ अत्रगृहीता, ६ प्रगृहीता, ७ उज्झितधर्मिका चेति, आसां प्रत्येकं स्वरूपाण्याचाराङ्गमूत्रतो ज्ञेयानि । 'अहं पत्रयणमाऊणं ' अष्टानां प्रवचनमा तृणां = समितिपञ्चक- गुप्तित्रयरूपाणाम् । 'नवण्हं बंभचेरगुत्तीणं' नवानां ब्रह्मचर्यगुप्तीनां वसतिकथादिरूपाणाम् । एतदन्तानां सर्वेषां ' योऽतिचारः कृतः ' इति पूर्वेणान्वयः । ' दसविहे ' दशविधे समणधम्मे' श्रमणधर्मे क्षान्त्यादिरूपे ' समणाणं' श्रमणानां = श्रमणसम्बन्धिनां
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आवश्यकमुत्रस्य
हो, एवं ज्ञानमें, दर्शन में, चारित्रमें तथा विशेषरूप से श्रुतधर्म में, सम्यक्त्वरूप तथा चारित्ररूप सामायिकमें, तथा उसके भेदरूप योगनिरोधात्मक तीन गुप्तियों में, चार कषायों में, पांच महाव्रतों में, छह जीवनिकार्यों में, (१) असंसृष्टा, (२) संसृष्टा, (३) संसृष्टाऽसंसृष्टा, (४) अल्पलेपा, (५) अवगृहीता, (६) प्रगृहीता, तथा (७) उज्झितधर्मिका रूप सात पिंडैषणाओं में, पांचसमिति तीन गुप्तिरूप आठ प्रवचनमाताओं में, ब्रह्मचर्य की नौ वाडों में, दश प्रकार के श्रमणधर्म
ધમ માં, સમ્યકત્વરૂપ તથા ચારિત્રરૂપ સામાયિકમાં તથા એના ભેદરૂપ ચેનરોધાત્મક ત્રણ ગુપ્તિમાં, ચાર કષાયામાં, પાંચ મહાવ્રતામાં, છ જીવનિકાયામાં, (૧) અસંસૃષ્ટા (२) संसृष्टा (3) संसृष्टाऽसंसृष्टा (४) अस्यसेवा (4) भवगृहीता (६) प्रगृहीता (૭) ઉજિગતમિકારૂપ સાત પિંડષાઓમાં, પાંચસમિતિ ત્રણગુપ્તિરૂપ પ્રવચનમાતાઓમાં, બ્રહ્મચર્યની નવ વાડામાં, દશ પ્રકારના શ્રમણુધર્મોંની અંદર
આઠે
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मुनितोषणी टीका 'जोगाणं' योगानां व्यापाराणां श्रद्धान-प्ररूपण-स्पर्शनस्वरूपाणां श्रमणसम्बन्धिव्यापारमध्ये इत्यर्थः, 'ज' यत् ‘विराहियं' विराधितं सर्वतोभावेन खण्डितं स्वलितं, ' तस्स' तस्य वाचिकादिरूपस्य दैवसिकस्यातिचारस्य खण्डनस्य विराधनस्य च-तत्सम्बन्धीत्यर्थः, (यनदो नित्यसम्बन्धेन तस्स' इति तच्छन्देन प्रागुक्तानां यच्छन्दनिर्दिष्टानां सर्वेषां संग्रहात् , बहुषु पुस्तकेषु दृश्यमानं विपरीतव्याख्यानं मूत्राक्षराननुगुणलादपेक्ष्यमेव, नचैकेन तच्छब्देन 'जो मे देवसिओ' 'जं खंडियं' 'जं विराहियं' इति यच्छब्दत्रयस्याऽऽकाक्षा कथं पूर्यत ? पतियच्छब्दं तच्छब्दोपादानस्याऽऽवश्यकत्वात , अतएव यं यं कामयते कामं तं तमामोति लीलया' इत्यादौ तच्छब्दद्वयोपादानं संगच्छत इति वाच्यम् , बुद्धिविषयतावच्छेदकत्वोपलक्षितधर्मावच्छिन्ने नच्छन्दशनेः, प्रकृते च सर्वेषामेव यच्छब्दोपात्तानां तादृशधर्मावच्छिन्न ( बुद्धिविषय ) त्वात् , अतएव 'यघस्पा पतिजहि जगन्नाथ ? नम्रस्य तन्मे ' इत्यादौ यद्यदित्याभ्यां यच्छब्दाभ्यां येन केनचिद्रूपेण स्थितं सर्वात्मकं पापरूपं वस्तु विवक्षितं तथाभूतम्य तस्य तच्छ द्वेन परामर्शस्तस्मान्नात्र साकाङ्क्षत्वं दोष इत्युकं काव्यप्रकाश-रसगङ्गाधरसाहित्यदर्पणादिष्विति तत्रैव कणेहत्याऽवलोकनीयम् । ) 'दुक्कडं' दुष्कृतं पापम् , 'मि' मयि विषयसप्तमीयं तेन मद्विषय इत्यर्थः । 'मिच्छा' मिथ्या निष्फलम् अभावरूपमिति यावत्, भवत्विति शेषः। यत्तु 'मि' इत्यस्य 'मे' इतिच्छायया व्याख्यानं तद्वयाकरणविरोधात्सूत्रतात्पर्यविरोधाच्च हेयमेव ।
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के अन्दर श्रद्धाप्ररूपणा-स्पर्शनारूप श्रमणयोगों में से, जिस किसी की देशसे खण्डना या सर्वथा विराधना हुई हो उन सब पूर्वोक्त अतिचारों से मुझे लगा हुआ पाप निष्फल हो ॥
'मि' इसकी 'मे' ऐसी छाया करके जो व्याख्यान किया गया है वह व्याकरण तथा मूत्रतात्पर्य से विरुद्ध होने के कारण सर्वथा त्याज्य है। શ્રદ્ધા-પ્રરૂપણા-સ્પર્શનારૂપ શ્રમણોમાંથી જેની કેઈની દેશથી ખંડના અથવા સર્વથા વિરાધના થઈ હોય તે સર્વ પૂર્વે કહેલા અતિચારોથી મને લાગેલાં પાપ નિષ્ફળ થાય.
मि-सनी मे मेवी छाया शने व्याज्यान ४२ छ ते व्या४२५
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आवश्यकमूत्रस्य
केचित् ‘मिच्छामि' इति पदं 'मि' 'छा' 'मि' इत्येवं विभज्य प्रथमेन 'मि' इत्यनेन कायनम्रत्वं च, 'छा' इत्यनेनासंयमयोगरूपदोषच्छादनं, चरमेण 'मि' इत्यनेन 'चारित्ररूपमर्यादास्थितोऽह'-मित्येवरूपं, तथा 'दुक्कडं' इत्यत्र 'दु' इत्यनेन दुगुंछामि='दुष्कृतकर्मकारिणमात्मानं निन्दामि' इत्येवंरूपं 'क' इति वर्णन 'कृत'-मिति, 'ड' इति वर्णन 'उपशमेनातिक्रामामि' अर्थात् द्रव्यभावनम्रश्चारित्रमर्यादास्थितोऽहं दुष्कृतकर्मकारिणमात्मानं निन्दामि, कृतं च दुष्कृत कर्म उपशमेन परित्यजामीत्येनमर्थ व्याचक्षते 'प्रत्येकानतिरिक्तः समुदायः' इति न्यायेन पदस्यार्थवत्वे वर्णानामप्यर्थवत्ताऽङ्गीकारादितरथा पद
कई एक 'मिच्छामि' इस पदका 'मि' 'छा' 'मि' ऐसा पदच्छेद करके "'मि' कायिक और मानसिक अभिमानको छोडकर 'छा' असंयमरूप दोष को ढक कर 'मि' चारित्र की मर्यादा में रहा हुआ मैं, 'दु' 'क' 'डं - 'दु'सावद्यकारी आत्माकी निन्दा करता हूँ, 'क' किये हुए सावद्यकर्म को 'डं'=उपशमद्वारा त्यागता हूँ, अर्थात् द्रव्य-भावसे नम्र तथा चारित्रमर्यादा में स्थित होकर मैं सावद्य क्रियाकारी आत्मा की निन्दा करता हूँ और किये हुए दुष्कृत (पाप) को उपशमभावसे हटाता हूँ" इस प्रकार अर्थ करते हैं। ऐसा अर्थ करना कोई असंगत नहीं है। प्रत्युत सर्वथा उचित ही है, क्योंकि-'समुदाय प्रत्येक से भिन्न नहीं होता' इस न्याय से जब पद की सार्थकता स्वीकार की जाय तो प्रत्येक वर्ण की भी
तया सूत्रना तात्पर्यथा विदुख डावाने हो म त्यागय 2.21 "मिच्छामि" से पहमा “मि ‘छा' मि" से प्रभारी ५६२ ४ ४शने 'मि' यि भने मानसि भलिभानने छोडी "छा" असंयम३५ होषने ढहाने "मि" यात्रिनी भाडामा २७। हुँ 'दु' 'क' 'डं' “दु' सारी मामानी निहा ४३ छु. "क" ४२ai પાપકર્મને “હું' ઉપશમ દ્વારા ત્યાગ કરૂ છું, અર્થાત દ્રવ્યભાવથી નમ્ર તથા ચારિત્રમર્યાદામાં સ્થિત થઈને હું સાવઘક્રિયાવાન આત્માની નિન્દા કરૂં છું અને કરેલા પાપને ઉપશમભાવથી હઠાવું છું-એ પ્રમાણે અર્થ કરે છે. આ પ્રમાણે અર્થ કરે તે કોઈ પ્રકારે અસંગત નથી પરંતુ સર્વથા ઉચિત જ છે, કારણ કે સમુદાય પ્રત્યેકથી ભિન્ન નથી –આ ન્યાય પ્રમાણે જ્યારે પદની સાર્થકતા
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मुनितोषणी टीका स्यापि वर्णसमुदायात्मकत्वेनाऽऽनर्थक्याऽऽपत्तेः, तदुक्तम्-' अर्थवन्तो वर्णा०' इति प्रतिज्ञाय 'संघातार्थवत्त्वाच्च' इति हेतुपदर्शकवार्तिकव्याख्यायां पतञ्जलिना-'येषां समुदाया अर्थवन्तोऽवयवा अपि तेषामर्थवन्तः........तद्यथा-एकचक्षुष्मान् दर्शने समर्थस्तत्समुदायश्च शनमपि समर्थम्, एकश्च तिलस्तैलदाने समर्थस्तत्समुदायश्च शतमपि समर्थम् , येषां पुनरवयवा अनर्थकाः समुदाया अपि तेषामनर्थकाः, एका च सिकता तैलदानेऽसमर्था तत्समुदायश्च खारीशतमप्यसमर्थ-मिति' । सार्थकता स्वीकार करनी होती है; अन्यथा वर्गों के समुदायरूप पद और पदों के समुदायरूप वाक्य में यदि वर्गों को अनर्थक कहें तो उनके समुदायरूप शब्द तथा वाक्य भी अनर्थक हो जाय, जैसा कि पतञ्जलिने अपने ग्रन्थ व्याकरण-महाभाष्य में कहा है-"जिनके समुदाय अर्थवान् होते हैं उनके अवयव भी अर्थवान् ही रहा करते हैं, जैसे-नेत्रवाला एक व्यक्ति देख सकता है तो उसी तरह नेत्रवाला हजारों का समुदाय भी देख सकता है, तिलके एक दाने में तैल है तो अनेक दानों में भी है, और जिनके अवयव अनर्थक होते हैं उनके समुदाय भी अनर्थक ही हुआ करते हैं, बालूके एक कणसे तेल नहीं निकल सकता तो बालूकी देरीसे भी नहीं निकलता" इत्यादि । સ્વીકાર કરવામાં આવે તે પ્રત્યેક વર્ષની પણ સાર્થકતા સ્વીકારવી જોઈએ. અન્ય વર્ગોના સમુદાયરૂપ પદ અને પદેના સમુદાયરૂ૫ વાક્યમાં જે વણેને અનર્થક કહીએ તે તેને સમુદાયરૂપ શબ્દ તથા વાકય પણ અનર્થક થઈ જાય. જેવી રીતે કે પતંજલિએ પિતાના ગ્રંથ વ્યાકરણ-મહાભાષ્યમાં કહ્યું છે : “જેને સમુદાય અર્થવાન હોય છે તેનું અવયવ પણ અર્થવાન જ રહે છે. જેમ નેત્રવાળે એક માણસ દેખી શકે છે તે તે રીતે નેત્રવાળા હજારો માણસને સમુદાય પણ દેખી શકે છે. તલના એક દાણામાં તેલ છે તે તેના અનેક દાણુઓમાં પણ છે અને જેનું અવયવ અનર્થક હોય છે તે તેના સમુદાય પણ અનર્થક હોય છે. રેતીના એક કણમાંથી તેલ નીકળતું નથી તે રેતીના ઢગલામાંથી પણ તેલ નીકળી શકતું નથી. ઈત્યાદિ.'
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आवश्यकमूत्रस्य अथवा निरुक्तरीत्या 'मिच्छामि, दुक्कडं' इत्यस्य 'मि' मयि विषयसप्तम्याश्रयणान्मद्विषयकं छयति=छिनत्ति शिवसृखमिति छाः =मिथ्यास्वादिस्ते नो पलक्षितं, 'मि 'मिनोमि-प्रक्षिपामि, किम् ? इस्याह-दुक्कडं.' दुष्कृतं पापम् । एवंच मद्विषयकं मिथ्यात्वाद्युपलक्षितं दुष्कृतं (पाप) प्रक्षिपामि= दूरतः परिहारामीत्यर्थः । यद्वा ‘मिच्छामि' इति पदत्रयव्याख्या पूर्ववत् , 'दुक्कडं' इत्यत्र च 'द'-रिति दष्टे 'के'-त्यात्मनि 'डे' ति सत्तायां, दुष्टत्वं च सत्ताया विवक्षितं, तथाच-'मि' मयि 'छा'=मिथ्यात्वादिना हेतुभूतेन दुष्टां निन्दितामात्मनः सत्तामतिचारप्रवृनिलक्षणां 'मि' प्रक्षिपामीत्यर्थः। व्याख्यानान्तराणि
___ अथवा निरुक्त रीतिसे 'मिच्छामि दुक्कडं' का अर्थ इस प्रकार . भी होता हैं-'मि' 'छा' 'मि' 'दुक्कडं' ऐसा पदच्छेद करने से 'मि' मुझ में रहे हुए 'छा'=मिथ्यात्व अविरति कषार प्रमाद अशुभयोगरूप 'दुक्कडं' पाप को 'मि'=दर करता हूँ।
___अथवा 'मि' 'छा' 'मि' का व्याख्यान पहले की तरह जानना, 'दुकडं' शब्द में 'दु' 'क' 'डं' इस प्रकार पदच्छेद करने से 'दु'= दुष्ट (अप्रशस्त) 'क'=आत्मा की 'ड' सत्ता को, अतएव समुदाय का यह अर्थ हुआ कि-उक्त मिथ्यात्वादिके कारण मुझमें रही हुई
अथवा नित-शत-प्रमाणे " मिच्छामि दुक्कडम् " । म मेवी रीते पा, थाय छ. "मि छा मि दुक्कडं" मेवो ५६२छे ४२वाथी 'मि' भारामा २७॥ 'छा' मिथ्याप भविशति पाय प्रभाई अशुभ-यो॥३५ 'दुक्कडं' पापने 'मि' १२ ४३ छु, मया 'मि' 'छा' 'मि' नु व्याभ्यान पसानी भा . 'दुकडं' शमां "दु क डं" मेवी शत ५४२७६ ४२वाथी 'द' हुट (मप्रशस्त) 'क' मामानी 'डं = સત્તાને, અએવ સમુદાયને આ અર્થ થાય છે કે ઉક્ત મિથ્યાત્વાદિના કારણે १- 'छाः' 'छो छेदने' अस्मास्कर्तरि 'क्विम् । ‘आदेच उपदेश'
इत्याकारः । २- 'तेन' इत्यत्र- 'जटाभिस्तापसः' इतिवत्तृतीया। ३- 'मिनोमि' 'डुमिन् प्रक्षेपणे' अस्मात्करि किए । 'मि' इत्यत्रार्षत्वा
दीर्घाभावः। ४- 'दुक्कडं' इत्यत्र कुयोगे षष्ठीप्राप्तावपि आर्षत्वाद्वितीया ।
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मुनितोषणी टीका यथामत्यूहनीयानि। एतच्च मिध्यादुष्कृतप्रायश्चित्तं समितिगुप्तिरूपसंयममार्गगत्तस्य साधोः प्रमादादिवशात्स्खलनायां सत्यामनुष्ठितं सत् प्रदीपस्तम इव दोषमपनयति, अकृत्यवासनावासितान्तरात्मना साधुना मिथ्यादुष्कृतदानं पुनरकृत्यसेवनाद्गुर्गदेरंनुरञ्जनमात्रफलकं भवति, तस्मात्तदर्थ नेदं प्रायश्चित्तं, नहि ज्ञात्वा भृशमपराध्यतोऽप्यज्ञानकृतापराधमायश्चित्तनाऽऽत्ममोचनं जातु दृष्टचरम् , 'बुद्ध्वा चेद् द्विगुणो दमः'-'मत्या तु द्विगुणं चरेत्' इत्यादिनी तेर्यथाऽपराधं राजादिशासनवद्धर्मआत्मा की अतिचार प्रवृत्तिरूप अप्रशस्त सत्ता (अशुद्ध अवस्था) को हटाता हूँ ॥ . ऊपर कहा हुआ मिथ्यादुष्कृत प्रायश्चित्त समिति - गुप्तिरूप संयम मार्ग में प्रवृत्त साधु के प्रमाद आदि कारणसे लगे हुए दोषको उसी तरह हटा देता है जैसे दीपक अन्धेरे को, किन्तु जो साधु जान-बूझकर दोष सेवन किया करता हो उसका मिथ्यादुष्कृत केवल गुरु आदि के मनोरञ्जन के लिए ही है पापसे छुटकारे के लिए नहीं, क्यों कि भूल से होनेवाले अपराधों के लिए जो प्रायश्चित्त नियत है उससे जान-बूझकर अपराध करनेवाले का दोष दूर नहीं होसकता। जैसे अनजानमें किसीसे राजशासनके विरुद्ध कोई अपराध किया जाता है तो उसको जितनी साधारण सजा दीजाती है, तो जान-बूझकर अपराध करनेवाले को अपराध के મારામાં રહેલી આત્માની અતિચારપ્રવૃત્તિ રૂપ અપ્રશસ્ત સત્તા (અશુદ્ધ અવસ્થા) ने त्याj छु.
ઉપર કહેલા મિથ્યાદુકૃત પ્રાયશ્ચિત્ત સમિતિ-ગુપ્તિરૂપ સંયમ માર્ગમાં પ્રવર્તેલા સાધુના પ્રમાદ આદિ કારણથી લાગેલા દેષને એવી રીતે હટાવી દે છે કે જેવી રીતે દીવે અંધારાને હટાવી દે છે. પણ જે સાધુ જાણી જોઈને દેશનું સેવન કર્યા કરે છે તેના મિયા દુષ્કૃત કેવળ ગુરૂ વિગેરેના મનોરંજન માટે જ છે. પાપમાંથી છુટવાને માટે નહિં. કારણ કે ભૂલથી થયેલા અપરાધને માટે જે પ્રાયશ્ચિત્ત નકકી છે, તેથી જાણી જોઈને અપરાધ કરવાવાળાના દેષ દૂર થઈ શકતા નથી. જેવી રીતે અજાણતાં કેઈથી રાજ્યશાસન-વિરુદ્ધ કોઈ અપરાધ થઈ જાય તે તેને જેટલી સજા દેવાય છે, તે કરતાં જાણી જોઈને અપરાધ કરવાવાળાને તે અપરાધથી
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आवश्यकत्रस्य
शास्त्रमायश्चित्तस्याऽप्युत्तममध्यमाधम साहसरूपत्वस्य सर्वजनीनत्वात् । अन्यथा कदाचित् कुम्भकारक्षुल्लक मिथ्याष्दुकृतत्वापत्तेः ॥ मू० २ ॥
सम्प्रत्यतिचाराणां विशेषशुद्धयर्थं कायोत्सर्गः कर्त्तव्य इति सविधि कायोत्सर्गस्वरूपमाह -' तस्सुत्तरी' - त्यादि ।
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॥ मूलम् ॥
तस्सुत्तरीकरणेणं पायच्छित्तकरणेणं विसोहीकरणेणं विसल्लीकरणेणं पावाणं कम्माणं निग्घायणट्टाए काउस्सग्गं अनत्थ ऊससिएणं नीससिएणं खासिएणं छीएणं जंभाइएणं उड्डुएणं वायनि सग्गेण भमलिए पित्तमुच्छाए सुहुमेहिं अंगसंचालेहिं सुहमेहिं खेलसंचालेहिं सुहुमेहिं दिहिसंचालेहिं एवमाइएहिं आगारेहिं 'अभग्गो अविराहिओ हुज मे काउस्सग्गो जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमुक्कारेण न पारेमि ताव कार्य ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ॥ सू० ३ ॥
॥ छाया ॥
तस्योत्तरीकरणेन प्रायश्चित्त करणेन विशुद्धि ( त्रिशोधी ) करणेन विशल्यीकरणेन पापानां कर्मणां निर्घातनार्थ तिष्ठामि कायोत्सर्गम्, अन्यत्रोच्छ्वसितेन निःश्वसितेन कासितेन क्षुतेन जृम्भितेन उद्गारितेन वात निसर्गेण भ्रमल्या पित्तमूर्च्छया सूक्ष्मैरङ्गसञ्चारैः मृक्ष्मैः श्लेष्मसञ्चारैः सूक्ष्मटसञ्चारः,
अनुसार उससे अधिक ही सजा दीजाती है । मिथ्यादुष्कृत के भरोसे पर जान-बूझकर पाप करते रहनेवाले साधु की प्रायः वैसी ही दुर्दशा होती है जैसी कुम्भार के हाथसे मिथ्यादुष्कृत देनेवाले क्षुल्लक साधु की हुई थी ॥ सृ० २ ॥
अब अतिचारों की विशेष शुद्धि के लिए विधिपूर्वक कायोत्सर्ग का स्वरूप दिखलाते है - 'तस्सुत्तरीकरणेणं' इत्यादि । અધિક સજા દેવાય છે, મિથ્યાદુષ્કૃતના ભરોસા ઉપર જાણી જોઈને રહેનારા સાધુની ખાસ કરીને એવી દુર્દશા થાય છે કે જેવી રીતે કુંભારના હાથથી મિથ્યાદુષ્કૃત દેવાવાળા ક્ષુલ્લક સાધુની થઈ હતી. સૂ॰ ૨
પાપ કરતા
હવે અતિચારની વિશેષ શુદ્ધિ માટે વિધિપૂર્વક કાર્યોત્સર્ગનુ સ્વરૂપ तावे छे. 'तस्सुत्तरीकरणेणं' इत्यादि.
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मुनितोषणी टीका
८९ एवमादिकरागारैरभन्नोऽविराधितो भवतु मे कायोत्सर्गों यावदर्हतां भगवतां नमस्कारेण न पारयामि तावत्कार्य स्थानेन मौनेन ध्यानेनाऽऽत्मानं व्युत्सृजामि।।म० ३॥
॥ टीका ॥ 'तस्स' तस्य-प्रमादकृताऽशुभयोगसम्बन्धेन देशतः सर्वतो वा खण्डितस्य श्रमणयोगस्य सातिचारस्याऽऽत्मनो वा, तच्छन्देनात्रौचित्यात्तयोरेव ग्रहणात् , अतिचारस्य तु सम्भवेऽपि 'उत्तरीकरण-विशल्यीकरणाऽसम्भवादग्रहणम् , न च भागतिचारस्य 'जो मे देवसिओ अझ्यारो' इत्यादौ यच्छन्दनिर्दिष्टतया यत्तदोश्च नित्यसम्बन्धेनाऽत्र 'तस्स' इत्यनेन ग्रहणमिति वाच्यम् , तत्र यच्छन्दनिर्दिष्टस्याऽतिचारस्य तत्रत्येनैव 'तस्स मिच्छा मि' इत्यनेन गतार्थसम्बन्धखात , अत्रोकेन च 'तस्स' इति तच्छब्देन बुद्धिविषयतावच्छेदकखोपलक्षितधर्मावच्छिन्नस्यैव श्रमणयोगस्याऽऽत्मनो वा ग्रहणं न खतिचारस्येति सुधीभिर्विवक्तव्यम् । 'उत्तरीकरणेणं'–उत्तरीकरणेन अनुत्तरस्योत्तरस्य कर
यहां पर 'तस्स' पदसे देशखण्डित सर्वविराधितरूप श्रमणयोग अथवा सातिचार आत्मा का ग्रहण है। कोई-कोई 'तस्स' इस पदसे अतिचार का ग्रहण करते हैं-वह उचित नहीं है, इसलिए उसका सम्बन्ध 'तस्स मिच्छा मि दुक्कडं' इस पदमें रहे हुए 'तस्स' शब्द के साथ पूर्ण हो चुका है। दूसरा कारण यह भी है कि यद्यपि प्रायश्चित्तकरण तथा 'पापविशुद्धि' कण्टकशुद्धि-पैर आदि में लगे हुए कांटे को निकालने-की तरह अतिचारों का विशुद्धीकरण
माया 'तस्स' ५४थी देशपांडित भने सवाचित ३५ श्रमायया। मया सातियार मात्मानु अडए छ. ४ 'तस्स' मा પદથી અતિચારને ગ્રહણ કરે છે. પરંતુ તે યંગ્ય નથી તેથી તેને સંબંધ "तस्स मिच्छा मि दुक्कडं" मा पहना २९सा तस्स शहना साथे पू२॥ ययो छे. બીજું કારણ એ પણ છે કે “પ્રાયશ્ચિત્તકરણ” તથા “પાપવિશુદ્ધિ” કંટક - શુદ્ધિ-પગ આદિમાં લાગેલા કાંટાને નિકાલવાની રીતે અતિચારોનું વિશુદ્ધીકરણ
१-'राजा गौडेन्द्रं कण्टकं शोधयति' इत्यादिषु कण्टकविशुदिवदतिचारविशुद्धिकरणं संभवति तस्मादुक्तम्-' उत्तरीकरणे'-ति, नहि-शल्यं मायादिरूपमविचारस्य समस्ति; अपि त्वात्मनस्तत्वाधान्याच्छामण्ययोगस्य च ।
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आवश्यक सूत्रस्य
णम् 'उत्तरीकरणम्, उत्तरशब्द उच्चतरार्थकः करणशब्दो भावसाधनस्तेन- अनुचतरस्य पुनः संस्कारद्वारोच्चतरस्य ( उत्कृष्टस्य ) करणं = सम्पादनं तेनेत्यर्थः । ' अध्ययनेन वसति' इतिबद्धेतौ तृतीया, यद्वाऽऽर्षस्वात्तादर्ध्यचतुर्थ्यर्थे तृतीया; तदा चोत्तरीकरणार्थमित्यर्थः । एवमग्रेऽपि तृतीयान्तार्थी बोद्धव्यः । यथा कुपथ्याहारविहारादिना समुत्पन्नस्य व्याधेरुपशमाय वैद्यकोक्तः प्रतीकारः क्रियते तद्वदिदमुत्तरीकरणम् । उत्तरीक्रिया च प्रायश्चित्ताचरणेनैव संभवतीत्यत आह-' पायच्छित्तकरणेणं' प्रायश्चित्तकरणेन - पायो = बाहुल्येन प्रयतत्वाद्वा चितम् = उपचितमशुभं तनूकरोतीति, अशुभयोगाद्वा स्खलितं चित्तम् आत्मानं प्राति=तसदशुभयोगापनयनेन पूरयतीति प्रापयति चित्तम् = आत्मानं मनो वा शुद्धिमिति, प्रायः=बाहुल्येन चेतयति = ' पुनरेवं न कर्त्तव्य - मिति प्रतिबोधयत्यात्मानमिति वा प्रायश्चित्तम्, यद्वा-' प्रायः प्रोकं तपस्यादि, चित्तं निश्रय उच्यते । तच्च होसकता है तो भी यहां कहे गये 'उत्तरीकरणेणं' और 'विसल्लीकरणेणं' के साथ उसका सम्बन्ध नहीं बैठता, कारण यह है कि न तो अतिचारों को उत्कृष्ट बनाने के लिये कायोत्सर्ग किया जाता है और न उनमें मायादिशल्यों का संभव है, मायादिशल्य तो आत्मा के विभाव परिणाम हैं, अतएव सिद्ध हुआ कि उस खण्डित अथवा विराधित श्रमणयोग या उस योग से युक्त आत्मा को उत्कृट बनाने के लिये, और विना प्रायश्चित्तके आत्मा उत्कृष्ट नहीं बन सकतीइसलिये लगे हुए पापोंका प्रायश्चित्त करने के लिये, तथा प्रायश्चित्त यह शडे छे तो पशु यदि उस 'उत्तरी करणेणं' अथवा 'विसल्ली करणेणं' ની સાથે તેને સંબંધ નથી બેસતા. કારણ એ છે કે ન તા અતિચારોને ઉત્કૃષ્ટ બનાવવા માટે કાયાસ કરવામાં આવે છે અને નથી તેમાં માયાદિ શલ્યાને સંભવ. માયાદિશલ્ય તા આત્માના વિભાવપરિણામ છે. એથી સિદ્ધ થયુ કે–એ ખ ંડિત અથવા વિરાધિત શ્રમયોગ અથવા એ યેગથી યુકત આત્માને ઉત્કૃષ્ટ બનાવવા માટે અથવા પ્રાયશ્ચિત્ત વિના આત્મા ઉત્કૃષ્ટ થઈ શકતે નથી તેથી લાગેલાં પાપાના પ્રાયશ્ચિત્ત કરવા માટે, તથા પ્રાયશ્ચિત્ત પણ પરિણામેની યુદ્ધતા વિના થઈ શકતાં નથી તે १ - उत्तरीकरणम् -' अभूततद्भावेऽर्थे 'कृभ्वस्तियोगे संपकर्तरि for: ( ५ । ४ । ५० ) इति चित्रः, 'अस्य च्वौ' ( ७ । ४ । ३२ ) इतीकारः ।
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सुनितोषणी टीका
निश्चयसंयुक्त, प्रायश्चित्तमिति स्मृतम् || १ || ' इत्युक्तविधं तस्य 'करणम्=अनुष्ठानं, तेन । प्रायश्विशाऽऽचरणं च परिणामविशुद्धिमन्तरेण न संभवतीत्यत आह - ' विसोही करणेणं ' इति, विशोधनं (विशिष्य शोधनं) विशोधिः =सम्यक्शुद्धिः, तस्याः करणं = सम्पादनम्, यद्वा शोधनं शोध ः ३ विशिष्टः शोधो यस्य खण्डित-त्रिराधितरूपस्य श्रामण्ययोगस्य तत्सम्बद्धस्यात्मनो वेत्यर्थात्, स विशोधः, अविशोधस्य विशोधस्य करणं विशोधीकरणं तेन । विशोधीकरणं प्रति भावशल्योदरगस्य कारणत्वात्तदाह-' विमलीकरणेणं' इति, विनष्टं मायानिदानादित्रिकरूपं शल्यं यस्योक्तरूपस्य ( श्रामण्ययोगस्य ) स विशल्यः खण्डनाविराधनादितोऽविशल्यस्य त्रिशल्यस्य करणं विशल्यीकरणं तेन । आह-कः शल्यशब्दार्थ : ? कतिविधश्व सः ? उच्यते शल्यते= धातूनामनेकार्थत्वाद् वाध्यते, यद्वा संवियते सुखमनेनेति शल्यं, तच्च द्रव्यभावभेदाद्विविधं तत्र द्रव्यशल्यं लोकप्रतीतं कण्टकसूची - शूल - भल्लादिकम् । भावशल्यं मायाप्रभृति, जीवतां कठोरतमतीक्ष्ण दशनैः श्वापदैरङ्गं स्फोरयित्वा स्वयं वा निजां स्वयं निःसार्य स्वशरीरस्य लवणसर्जिकाभी परिणामों की शुद्धता के बिना नहीं होसकता इस कारण अतिचार हटाकर आत्मपरिणामों को निर्मल करने के लिये, विशोधीकरण (आत्मपरिणामों का निर्मल करना) भी शल्य के दूर किये बिना नहीं हो सकता, क्योंकि सिंह व्याघ्र आदि भयानक जीवजन्तुओं के तीखे नाखून दान आदिसे शरीर के अंग अंग को फडवा लेना, अपने आप सारे शरीर की खाल खींचकर उस पर માટે અતિચારોને દૂર કરી આત્મપરિણામેને શુદ્ધ કરવાને માટે વિશેષીકરણ ( આત્મપરિણામે ને શુદ્ધ કરવા ) પણુ શલ્યને દૂર કર્યા વિના નથી થઇ શકતે, કેમ કે સિંહ વાઘ વિગેરે ભયંકર પ્રાણીઓના તીક્ષ્ણ નખ દાંત વિગેરેથી શરીરના અંગે અગને ફડાવવું, પોતાના જ હાથે આખા શરીરની ચામડી ખેંચીને તેના ઉપર મીઠું છાંટી લેવું, રાજીખુશીથી પોતાનું માથું કાપીને ફેંકી દેવું,
१ - 'प्रायश्चित्तकरणम्' = सिद्धिर्निरुक्तांक्तरीत्या पृषोदरादित्वात् । २- विशोधिः - 'वि' + पूर्वकात् शुधू धातोर्ण्यन्तादौणादिकः स्त्रियां भावे 'इ' प्रत्ययः ।
३- शोध: - भावे घञ्
४- विशोधीकरणम् अभूततद्भावे विरीकारादेशश्च ।
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आवश्यकमुत्रस्य
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क्षारादिना सेचनं, लीलयेव छिचा स्त्रमस्तकस्यापि प्रक्षेपणं, मज्वलदनल करालकुण्डे निर्भयपतनमुत्ता पोद्गलद्रवसीसकादिपानं, भृगुप्रपातः, काण्डादिमस्था नानां कुन्तादिना वेधनं च कत्तु सुशकं; किन्तु ऋद्ध्यादिगौत्त्र्यभङ्गभयाज्जायाष्टविधमदाद्वा पामरैरमकाशित घोरतपः प्रभृतिमुनिक्रियाकलापको मलकल्पलताकर्त्तनककर्त्तरीकल्पमनल्पदोपरा शिनिदानमनन्त चतुर्गतिसंसृतिभ्रामकमिदं भात्रशल्यं सर्वथा दुःसहमिति शल्यशब्देन प्रकृते मायादिभात्रशल्यमेव गृह्यते प्रकरणस्याऽभिधानियामकत्वात्, 'पात्राणं कम्माणं पापानां कर्मणां पांशयन्ति =मलिनयन्ति नरकादौ पातयन्ति, आनन्दरसं शोषयन्ति क्षपयन्ति वेति पापानि तद्रूपाणां कर्मणां ज्ञानावरणीयादीनां निग्धायणद्वाए निर्धातनार्थ = समूलमुन्मूलनार्थम् निर्धातनार्थ=समूलमुन्मूलनार्थम् नमक छिडकना, खुशी से अपना मस्तक काटकर फेंक देना, उकलते सीसेको पी जाना, धधकते हुए अग्निकुण्डमें कूद पडना, पर्वत की चोटी पर चढकर धडाम से नीचे गिर पडना, कलेजे में भाला भोंकना आदि द्रव्यशल्य सहन करना सहज है; परन्तु ऋद्रयादि तीन गौरवों (गारव) के नाश होने के डरसे, अथवा जाति आदि आठ प्रकार के मद के कारण अपने अन्दर ही छिपाये हुए-मुनियों के मुक्तिसाधन घोर तप आदि क्रियारूप कोमल कल्पलता के कतरने में कतरनी के समान तथा अनन्त दुर्गुणों से युक्त और चारगतिरूप अनन्त संसार में परिभ्रमण करानेवाले - माया आदि भावशल्यों का पामरोंसे सहन होना अत्यन्त कठिन है, अतः भावशल्यों को दूर करने के लिये, तथा ज्ञानावरणीय आदि पाप (आठ) कर्मों का नाश ગરમ કરેલુ સીસું પી જવું, ધગધગતા અગ્નિકુંડમાં કુદી પડવું. પર્યંતની ચ ઉપર ચઢીને ધડામથી ઝંપલાવવું, કલેજામાં ભાલા ભેાંકવા આદિ દ્રવ્યશલ્ય સહન કરવા સહેજ છે પરંતુ ઋદ્ધાદિ ત્રણ ગૌરવે (ગારવ)ને નાશ થવાના ડરથી
જાતિ વિગેરે
પ્રકારના મદ્યને
અંદરજ
લીધે પેતાની
અથવા
આઠે
છુપાએલ-મુનિએનાં મુકિતસાધન ઉત્કૃષ્ટ તપ વિગેરે ક્રિયારૂપ કામલ-કલ્પલતાને કાતરવામાં કાતર સમાન, તથા અનંત દુર્ગાણુાથી યુકત અને ચાર ગતિરૂપ અનંત સંસારમાં પરિભ્રમણુ કરાવનાર-માયા આદિ ભાવયેનું પામરેથી ६२ કરવા, તથા જ્ઞાનાવરણીય થવું ઘન્નુંજ કઠણ છે તે માટે ભાષાવ્યેાને
સડન
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मुनितोषणी टीका 'काउस्सग्गं' कायस्य-शरीरस्य उत्सर्गम् अतिचारविशुद्धये त्यागं 'ठामि' 'तिष्ठामि स्थापयामीत्यर्थः यद्वा उकरोमीत्यर्थः । अथवा 'काउस्सग्गं' इत्यप्राऽऽर्षस्वात्तृतीयार्थे द्वितीया, तेन कायोत्सर्गेणाऽर्थात् कायोत्सर्ग कृत्वा तिष्ठामीस्यर्थः । ननु कथमेतावत्सामध्ये कायोत्सर्गम्य वर्णित ? मिति चेदच्यते यतः साक्षात्तीर्थकरैरेवायं मोक्षमार्गः प्रोक इति, एवं च सति सातिचारस्य श्रामण्ययोगस्याऽऽत्मनो वोच्चतरीकरण-प्रायश्चित्तकरण-विशोधीकरण-विशल्यीकरण-पापकर्मनिर्घातनान्यतिचारनिवृत्तिस्वरूपाण्ये वेत्यनिचारनिवृत्त्यर्थ कायोत्सर्ग करोमीति पर्यवसन्नोऽर्थः । न च सर्वथा, किं तर्हि ? तदाह-' अन्नस्थ ' अन्यत्र-विना 'ऊससिएणं ' ऊर्च श्वसनम् उच्छ्वसितं, नपुंसके भावे क्तस्तेन-उच्छ्वासं विनेस्यर्थः, एवमग्रिमरपि तृतीयान्तैः सहाऽन्यत्रेत्यस्य सम्बन्धो योज्यः। नीससिंएणं' निःश्वसितेन-निःश्वसितं=श्वासमोक्षणं तेन, 'कासिएणं' -कासितेन कासेन। 'छीएणं' क्षुतेन क्षुतं नासिकाऽभिघातजन्याऽऽकस्मिकमशब्दाऽनिलनिस्सरणं 'हन्छि' रिति, 'छिक्के ति च प्रसिद्धं ('हा छी' इति भाषायाम् ) तेन । 'जंभाइएणं' जृम्भितेन-जुम्भा आलस्यजनितो मुखव्यादानपूर्वकतद्वाराऽऽन्तरपवनविनिर्गमस्तेन। 'उड्डुएणं' उद्गारितेन'उड्डुअ' इत्यस्य देशिशब्दतादद्गारितमर्थः,उद्गारितं चोद्गार:कण्ठगर्जनाऽपरपर्यायः, उद्वमनप्रभेदस्तेन । 'बायनिसग्गेणं' वातनिसर्गेण-वातस्य= करने के लिये मैं कायोत्सर्ग करता है, किन्तु इसमें श्वास का लेना तथा निकालना, खाँसना, छीकना, जंभाई लेना, डकारना, अपानवायु का निकलना, पित्तप्रकोप आदिसे चक्करका आना, मृर्छाका आना, વિગેરે પાપ (આઠ) કમેને નાશ કરવા માટે હું કાર્યોત્સર્ગ કરું છું. પણ એમાં શ્વાસ લે તથા મૂક, ખાંસી ખાવી, છીંક ખાવી, બગાસું ખાવું, એડકાર ખાવે, અપાનવાયુનો સ્ત્રાવ થવે, પિત્તપ્રકોપથી અંધારા આવવા, મૂરછ
१- दृष्टं हि सकर्मकस्यापि धातोः कचिदकर्मकत्वं यथा, काव्यप्रकाशे द्वितीयोल्लासे -' विषयविभागो न पाप्नोती'-ति । अकर्मकस्यापि च सकर्मकत्वं यथा-' यथा शत्रु जयति भारं वहती'--त्यादि च ।
२- अन्तर्भावितण्यर्थत् स्था-धातोः स्थापयामीत्यर्थः ।
३- 'कुर्द खुर्द गुर्द गुद क्रीडायामेव' इत्यत्रैवग्रहणेन ‘परौ भुत्रोऽबनाने, इत्यत्राऽवज्ञानग्रहणेन च धातूनामनेकार्थत्वकल्पनात् करोमीत्यर्थः ।।
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आवश्यकसुत्रस्य पायुवायोनिसर्गः=निम्सरणं वातनिसर्गस्तेन । ' भमलीए' भ्रमल्या-भ्रमली= आकस्मिकशरीरभ्रमणं-पित्तोदयेन याम्यन्महीदर्शनं पूर्वादिदिग्भ्रान्तिश्च (चक्कर, घुर्मा, इत्यादि भाषायाम्) तया। 'पित्तमुच्छाए ' पित्तमूर्छया-पित्तमूर्छा पित्तजन्या नष्टचेष्टता तया । 'सुहुमेहिं अंगसंचालेहिं ' मूक्ष्म- संचालैःरोमोद्गमादिरूपैरलक्षितप्रायः, मृक्ष्मः शरीरसञ्चालैः स्वभाविकैरङ्गस्फुरणादिभिर्वा, 'सुहुमेहि खेलसंचालेहि'-मृक्ष्मैःश्लेष्मसंचालैः-खेलेति देशभाषायां प्रश्लेष्मणो नाम, श्लेष्मणां-कफानां सञ्चालैः गलबिलात्स्वभावतः श्लेष्मणामधो बहिर्वाऽवतरणैः । 'सहुमेहि दिहिसंचालेहि-मूक्ष्मदृष्टिसंचालैः मूक्ष्मः स्वाभाविकैदृष्टिसञ्चाल:= पक्ष्मनिकोचनादिभिः । एनआइरहि भागारेहि' एमादिराकारैः- एप्रमादिनिरुक्तस्वरूपैरुच्छ्वसितादिभिराकारैःकायोत्सर्गप्रतिरोधकः, अत्राऽऽदिशब्देनाऽग्न्युपद्रवजलोपद्रव-महासाहसिकोपद्रव-राजोपद्रवेभ्यः, भित्तिच्छ्त्रादिपातसिंहसयपद्रवेभ्यो मानारादिकृतभृशोपद्रव-सङ्कटापन्नमूषिकादिप्राणिपरिरक्षणार्थ वा स्थानपरिवर्तनं ग्राह्यम् , एषामुच्छ्वसितादीनामागाराणां कायोत्सर्गप्रसङ्गे निरूपणमेतदधिकारिसंहननसामर्थ्य तात्पर्येण; 'अभग्गो' अभग्नः देशतोऽखण्डितः, 'अविराहिओ' अविराधित:सर्वतोऽखण्डितः, 'हुज' भवेत् 'मे' मम 'काउस्सग्गों' कायोत्सर्गः अर्थादुच्छ्वसितैरागारः सद्भिरपि मम कायोत्सर्गोऽखण्डितोऽविराधितोऽस्तु । अत्रावधिमाह-'जाव' सूक्ष्मरूपसे अंगों का हलना-चलना अथवा फडकना, कफ, यूँक आदि का संचार होना, तथा दृष्टिका संचलन होना आदि आगार हैं, यहां आदि शब्द से अग्नि जल डाकू राजा सिंह सर्प भीत (दीवार) तथा छत का गिरना आदि उपद्रवों से या बिल्ली आदि हिंसक प्राणियों से घिरे हुए चूहे आदि जीवों को दया भावसे छुडाने के लिये स्थानपरिवर्तन करना आदि आगारों का ग्रहण करना चाहिये। ये उच्छ्वसितादि आगार अधिकारियों (ध्यानस्थ . આવવી, સહમ પણે અંગેનું હલન ચલન થવું તથા ફરકવું, કફ. થુંક વિગેરેને સંચાર છે, તેમજ દૃષ્ટિનું સંચલન થવું વિગેરે આગાર છે. અહિં આદિ શબ્દથી અગ્નિ જલ ડાકુ રાજા સિંહ સર્પ દીવાલ તથા છતનું પડી જવું વિગેરે ઉપદ્રથી અથવા ખિલાઈ વિગેરે હિંસક પ્રાણિઓથી ઘેરાએલ ઉદર વિગેરે જીવેને દયા ભાવથી છોડાવવા માટે સ્થાનફેર કરે વિગેરે આગાનું ગ્રહણ કરવું જોઈએ.
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मुनितोषणी टीका इत्यादि, 'जाव' यावत् ' अरहंताणं भगवंताणं ' अर्हतां भगवतां तत्कर्मकेणेत्य
त । ' नमोकारेण ' नमस्कारेण 'न पारेमि' न पारयामि, कायोत्सर्गपरिसमाप्तौ हि — नमोऽरहंताणं' इत्युच्चार्यैव विरमणीयमिति सम्पदायस्तस्मात् 'नमो रहंताणं' इत्युचार्य यावत्पारं न यास्यामीति भावः, वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवत्पत्ययः 'अयमागच्छामी'-ति यथा । ' ताव ' तावत् 'कार्य' देहं 'ठाणेणं' स्थानेन-गतिनिवृत्या कायव्यापारनिरोधेन 'मोणेणं' मौनेन तूष्णीम्भावेन= बाग्व्यापारनिरोधेन 'झाणेणं' ध्यानेन= चित्तैकाग्रतया मनोव्यापारनिरोधेन कायिक-वाचिक-मानसिकव्यापारपरित्यागपूर्वकमिति यावत् , 'अप्पाणं' आत्मानम्' अत्राऽऽस्मशब्द आत्मीयार्थकः, स च 'काय' इत्यस्य विशेषणं तेनाऽऽत्मीयं कायमिति सम्बन्ध इति केचित् , वस्तुतस्तु कायमात्मानं चेत्यर्थः । चशब्दाsभावेऽपि समुच्चयार्थस्य 'अहरहनयमानो गामवं पुरुषं पशु' मित्यादौ दर्शनात् , अतएव मने 'कार्य' इत्युक्त्वाऽनन्तरं 'ठाणेणं' इति कायव्यापारनिरोधः, 'अप्पाणं' इत्यत्र च 'झाणेणं' इति मनोव्यापारनिरोधः प्रोक्त इति सूक्ष्मेक्षिकयाऽवधार्यम् । कायोत्सर्गस्य पसिद्भिरप्येतनापार्यपरिकैव; नह्यात्मत्यागन्यतिरेकेण कायत्यागमात्रायथोक्तं पायश्चित्तं संभवति । किश्च रूढः पयोजनस्य तात्पर्याऽनुपपनश्च हेतोरभावेन लक्षणाया असम्भवात् ,आत्मीयार्थत्वकल्पनमायमूलकमेवेत्यास्तां विस्तरः । 'बोसिरामि' व्युत्सृजामि-परित्यजामीत्यर्थः ।।०३।। व्यक्तियों)की न्यूनाधिक शक्तिकी अपेक्षासे कहे गये हैं । इन आगारों से मेरा कायोत्सर्ग ग्वण्डित तथा विराधित नहीं हो, कबतक ? जबतक कि अरिहंत भगवान को नमस्कार करके ध्यानको समाप्त न कर, तब तक, एक स्थिति से काय को, मौनसे वचनको और चित्तकी एकाग्रतासे आत्मा को बोसराता हूँ॥ सू० ३ ॥ ઉચ્છવસિતાદિ આગાર અધિકારિયે ધ્યાનસ્થ વ્યક્તિએ)ની ઓછી વધુ શકિતની અપેક્ષાથી કહ્યું છે. આ આગારેથી મારા કાર્યોત્સર્ગ ખંડિત તથા વિરાજિત નહિં થાય, કયાં સુધી ? કે જ્યાં સુધી અરિહંત ભગવાનને નમસ્કાર કરીને ધ્યાન પૂરે ન કરી લઉં ત્યાં સુધી, એક સ્થિતિથી કાયાને, મોનથી વચનને અને ચિત્તની એકાગ્રતાથી मात्माने योस (सू. 3)
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भावश्यकमूत्रस्य एवं कायोत्सर्गमास्थाय तत्र भेदेन प्रकृताऽतिचाराँत्रिन्तयति
॥ मूलम् ॥ आगमे तिविहे पण्णत्ते तंजहा-सुत्तागमे अत्थागमे तदुभयागमे । जं वाइद्धं, वच्चामेलियं, हीणक्खरं,अच्चक्खरं, पयहीणं, विगयहोणं, जोगहीणं, घोसहीणं, सुट्ठदिन्नं सुझुपडिच्छियं, अकाले कओ सज्झाओ काले न कओ सज्झाओ, असज्झाए सज्झाइयं, सज्झाए न सज्झाइयं, 'तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।सू०४॥
॥ छाया ॥ __ आगमस्त्रिविधः प्रज्ञप्तम्तयथा-मूत्रागमः अर्थागमः तदुभयागमः । (तत्र ) यद् व्याविद्धं, व्यत्यानेडिनं, हीनाक्षरम् , अत्यक्षरं, पदहीनं, योगहीनं, घोषहीनं, सुष्ठुदत्तं, दुष्ठुप्रतीष्टम् , अकाले कृतः स्वाध्यायः, काले न कृतः स्वाध्यायः, अस्वाध्याये स्वाध्यायितं, स्वाध्याये न स्वाध्यायितं, तस्य मिथ्या मयि दुष्कृतम् ॥ मू० ४॥
" ॥ टीका ॥ 'आगमे' आ-समन्तात् गम्यन्ते-ज्ञायन्ते जीवानीवादिपदार्था येनेति, आ-विनयादिमर्यादया गम्यते-पाप्यते तीर्थकरगणधरादिभ्य इति, आ= स्मरणार्थमात्मस्वरूपस्येत्यर्थात् , गम्यते गृह्यते इति, आ आभिमुख्यमर्था
इस प्रकार कायोत्सर्ग का अवलम्बन करके उममें अतिचारों का विशेषरूपसे चिन्तन करते हैं-'आगमे तिविहे' इत्यादि।
जिमसे 'जीव, अजीव' आदि नौ तत्त्व अच्छी तरह जाने जाएँ या जो विनय आदि के आचरणद्वारा तीर्थङ्कर और गणधरों
એવી રીતે કાર્યોત્સર્ગનું અવલંબન કરીને તેમાં અતિચારોનું વિશેષરૂપથી चिंतन ५२ छ 'आगमे तिविहे' इत्यादि
नाथी 'जीव' 'अजीव' विगेरे न त राम२ ne aवाय - અથવા જે વિનય આદિ આચરણદ્વારા તીર્થકર અથવા ગણધરોથો
१- भणता गुणता विचारता ज्ञान और ज्ञानवंत की आशातना की होतो 'तस्स मिच्छा मि दुक्कडं'।
२-धातूनामनेकार्थस्वादिति भागुक्तमेव । यद्वा 'ये गत्यर्थास्ते प्राप्त्यर्थाः' इति गतिः माप्तिग्रहणं च मिथोऽनर्थान्तरमेव ।
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सुनिनपणी टीका
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न्मोस्य साम्मुरूयं गम्यते = ज्ञायते येनेति, आगमयति = माकल्येन बोधयति जीवाजीवादितमार्यमिति. आं= सम्यग्ज्ञानादित्रयमोक्षमार्गरूपा मर्यादा गम्यते= जायते येनेति. आ=तीर्थकर प्ररूपितत्वेन सर्वथा निःशङ्कितत्वाद्विस्मयजनको गमो = ज्ञानं यस्मिन्निति वा आगमः । यद्वा नामैकदेशे नामग्रहणान् आ ' 'ग' 'म' इति पत्रयं परिकल्प्य ' आ = जगतस्तीय करार. 'ग'ानो गमत्ररमुखे. म=मतो भव्यानां सर्वेषामित्यागमः, तयाच आगतो वीतरामातु गतो गणवराऽऽनने । मतः समस्त भव्यानां तस्मादागम उच्यते ॥ १ ॥ ' इति निर्गतिम् । व्याख्यानान्तरं यथामत्युङनीयम् । आगमः सिद्धान्तः प्रवचनमिति पर्यायाः । कतिविधः सः ? इत्याह-' तित्रिहे पष्णते ' इति । तिस्रो विधा:= प्रकारा यस्य स त्रिविधः प्रवप्रः = प्रकर्षेण सदेवमनुजामृरसभायां समत्रसरणस्थैस्तीर्थनाथैईतः = ज्ञापित उक्त इति यावत् । तं जहा ं तद्यथा - ( अत्र स यथे - वि वक्तव्ये तदिति निर्देश आगमस्वरूपविशेषणापेक्षयाऽऽर्षत्वाद्वा यद्वाऽव्ययं तच्छन्दमादाय तदेवाऽऽगमस्वरूपं दर्शयामीत्यर्थः ) ' सुत्तागमे ' सूत्रागमः =मूत्ररूष आगमः । ' अत्थागमे ' अर्थागम: =अर्थरूप आगमः । ' तदुभयागमे ' तदुभयासे प्राप्त हो, अथवा जो आत्मस्वरूपके स्मरण के लिये प्राप्त किया जाय, या जिस से मोक्षमार्गका ज्ञान हो, अथवा जो तीर्थङ्कर भगवान के द्वारा उपदिष्ट होने के कारण शंकारहित और अलौकिक होने से भव्य जीवों को चकित कर देने वाले ज्ञान को देने वाला हो, या जो अर्हन्त भगवान के मुख से निकल कर गणधर देवको प्राप्त हुआ और भव्य जीवोंने सम्यक भावसे जिसको माना उसे आगम' कहते हैं । वह तीन प्रकारका है – (१) सुत्तागम, (२) अत्थागम (३) तडुभयागम ।
"
પ્રાપ્ત થાય, અથવા જે આત્મસ્વરૂપની જેનાથી મેક્ષમાર્ગનું જ્ઞાન થાય હાવાને કારણે શંકારહિત અને કરવાવાળા જ્ઞાનને આપવાવાળા ડે.ય, અથવા હીને ગણધર દેવને મલ્યા તથા જૈને ભવ્ય
'आगम' हे छे. ते प्रहार (1) सुचागम, (२) अस्थागम, (3) तदुभयागम.
સ્મરણને માટે પ્રાપ્ત કરવામાં આવે, અથવા અથવા જે તીર્થંકર ભગવાન દ્વારા ઉપદેષ્ટ અલોકિક હવાથી ભવ્ય જીવે.ને તિ અડિત ભગવાનના મુખથી નીકજીવ.એ સમ્યક ભાવથી માન્યા તેને
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आवश्यकमुत्रस्य
गमः=मृत्रार्थद्वयरूप आगमः । तत्र सूत्रपदं व्याचष्टे - ' सुत्तं ' इति प्राकृतशैल्या सूत्रं मृक्तं सुप्तमिति पदत्रयस्य 'सुत्तं ' इति भवति, तस्मात् सूत्र्यन्ते = संगृह्यन्ते बहवोऽर्था यस्मिन्निति, मृत्रयति = गुम्फयति विविधानर्थान् संक्षेपेणेति, सूत्रयति = मृचयत्यल्पाक्षरैर्द्रव्यपर्यायनयादिस्वरूपं भृशमर्थमिति दोषराहित्येन 'सुष्ठुन:= प्रतिपादितमिति, अर्थज्ञानमन्तरेण सर्वे पदार्थाः सुप्तवत्प्रतिभान्स्यत्रेति वार्थः । यद्वा मृत्रं=तन्तुस्तत्सादृश्याद्गोण्या लक्षणया सूत्रम्, यथा तन्तौ बहूनि वस्तून्येकत्र संग्रध्यन्ते तथेहापि बहवोऽर्था इति । आहोस्वित् यथा तन्त्त्रपरपर्यायं मूत्रमेव सुचतुरैः पटकरैः पटरूपतां नीतं सद् गोप्याङ्गान्यानृत्य शैत्यादिभ्यो रक्षन् धारकस्य शोभां मङ्गलं च तनोति तथेदमपि म्रत्रमाचार्यादिव्याख्यातं सत् पटस्था
जिसमें संक्षेप रूपसे बहुत अर्थों का संग्रह किया जाय, अथवा जो दोषरहित कहा हुआ हो, या जैसे सोये हुए ७२ कला के ज्ञाता पुरुष को जगाने पर कला का भेद-प्रभेद का ज्ञान होता है उसी प्रकार अर्थ द्वारा सर्वतत्त्व जिससे जानें जाये अथवा जैसे सूत्र (मृत) में मणि मोती आदि तरह तरह के पदार्थ गूँथे हुए रहते हैं, या जैसे सूत बहुत से इकट्ठे किये जाकर चतुर पुरुषों से तरह२ के (अपनी इच्छा के अनुसार) कपडे बनाये जाते हैं और जो गुप्त अंगों को ढांकते हैं, सर्दी गर्मी से बचाते हैं तथा धारण करने वाले की शोभा को बढाते हैं, वैसे ही जो जीवादि नाना पदार्थों के स्वरूप से गुम्फित (ग्रथित) तथा आचार्य आदि से
જેમાં સક્ષેપ રૂપે ઘણા અર્થાના સંગ્રહ કરવામાં આવે. અથવા જે દોષ રહિત કહેલ હાય, અથવા જેમ સુતેલ ૭૨ કળાના જ્ઞાતા પુરૂષને જગાડયા પછી કળાના ભેદપ્રભેદ જાણી શકાય તેવી રીતે અર્થ દ્વારા સઘળા તત્ત્વ જેનાથી જાણી શકાય, અથવા જેમ દેરામાં મિ-મેતી વિગેરે ભાતભાતના પદા ગુંથાએલ રહે છે, અથવા જેવી રીતે ઘણાં સૂતરને ભેગા કરીને ડાહ્યા માણુસા પાતાની ઇચ્છારૂપ ભાતભાતનું કાપડ બનાવે છે તે કાપડ ગુપ્ત અંગાને ઢાંકે છે, સદી અને તાપથી બચાવે છે અને પહેરનારની शोलाने वधारे छे. तेवी रीते ने वाहि नाना पहार्थोंना स्व३५थी गुम्फित (अति)
१ - ' सुष्ठुकं सूक्तमिति च्छायाक्षे । २ - 'सृप्त' - मिति च्छायापक्षे ।
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मुनितोषणी टीका नीयतामासाद्य पिधानीयं कुमार्गमावृत्य शैत्यादिस्थानीयाऽष्टविधकर्मभ्यो रक्षन् पारकाणां भव्यानां मुखशोभा परममङ्गलं च तनोतीति । अथवा मृचयति-सीव्यति स्रवति वाऽर्थानिति निरुक्तपरिपाच्या मृत्रम , ' स्वल्पाक्षरमसन्दिग्धं, सारवद्विश्वतोमुखम् । अस्तोभमनवा च, भूत्रं मूत्रविदो विदुः ॥ १॥' इत्युक्तमन्यत्र । सूत्रस्यार्थापेक्षितयैवोपयोगित्वादाह-' अत्थागमे' इति, अर्थ्यते याच्यते, अथवा व्याख्यान आदि के द्वारा विस्तृत हो कर आस्रवों को ढकता है, अष्टविध कर्मों से बचाता है, धारण करने वाले की शोभा बढाता है, या जैसे मई के द्वारा वस्त्रों के टुकडे सीये जाने पर तरहतरह के सुन्दर वस्त्र बनकर लोगों के उपकारक होते हैं, वैसे ही जो बहुत से फुटकर अर्थों स जोडा जाकर भव्यों के लिये अपूर्व लाभदायक होता है, अथवा जैसे किसी झरने से पानी झरता है उसी प्रकार जिसमें से उत्तम अर्थ निकलता है उसे 'मूत्र' कहते है। कहा भी है
"जिसमें अक्षर थोडे पर अर्थ सर्वव्यापक, सारगर्भित, सन्देहरहित, निर्दोष तथा विस्तृत हो उसे विद्वान लोग 'मत्र' कहते है" ॥१॥
तद्रूप (मत्ररूप) आगम मृत्रागम कहलाता है।
जो मुमुक्षुओं से प्रार्थित हो उसे अर्थागम कहते हैं। केवल सूत्रागम या अर्थागम से प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता, इसलिये सूत्र और अर्थरूप 'तभयागम' कहा है। इनमें जो कुछ क्रमको તથા આચાર્ય વિગેરેના વ્યાખ્યાનાદિ-દ્વારા વિરતૃત થઈને આને ઢાંકે છે, અષ્ટ પ્રકારના કર્મોથી બચાવે છે, ધારણ કરવાવાળાની શોભા વધારે છે, અથવા જેવી રીતે સમય-દ્વારા કાપડના ટુકડા સીવાઈ ગયા પછી તરેહ તરેહનાં સુંદર વસ્ત્ર બનીને લોકો માટે ઉપકારી બને છે. તેવી રીતે જે ઘણુ પ્રકારના અર્થો થી સંગૃહીત થઈને ભવ્યને અપૂર્વ લાભદાયક થાય છે, અથવા જેવી રીતે કેઈ ઝરણામાંથી પાણી ઝરે છે એવી રીતે જેમાંથી ઉત્તમ અર્થ નિકળે છે, તેને સૂત્ર કહે છે.
કહ્યું પણ છે –
જેમાં અક્ષર થોડા છતાં પણ અર્થ સર્વવ્યાપક, સારગર્ભિત, સદેહરહિત નિર્દોષ તથા વિસ્તૃત હેય તેને વિદ્વાન માણસે સૂત્ર કહે છે.
तद्रूप (सूत्र३५) भागम-सूत्रागम आय छे.
જે મુમુક્ષુઓથી પ્રાર્થિત હોય તેને અથગમ કહે છે. કેવળ સુત્રાગમ અગર અર્થાગમથી પ્રોજન સિદ્ધ નથી થઈ શકતું, એટલા માટે સ્ત્ર અને અર્થરૂપ તદુભાયાગમ કહેલ છે. એમાં જે થે ડુંક કમને છેડીને અર્થાત્ ક્રમપૂર્વક
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आवश्यकमूत्रस्य अर्यते गम्यतेऽर्थात्माप्यते बुभुत्सृभिरित्यर्थः । पृथक पृथक मूत्ररूपेणार्थरूपेण चाऽऽगमेन यथोचितोपयोगाभावादुभयमाह- तदुभयागमे ' इति, तच्च स च ते तयोरुभयं तदुभयं तच्चासावागमश्च तदुभयागमः मूत्रार्थों-भयरूप आगम इत्यर्थः। तत्र ‘जं' यत् — वाइदं ' ब्याविद्धं विपर्यस्तमणिमालावत्तदेव विपरीतोच्चारितम् , 'वच्चामेलिय'-व्यत्यानेडित व्यत्ययेन सूत्रान्तरस्याऽऽलापक सूत्रान्तरेण संयोज्याऽस्थाने विरामं कृत्वा स्वकपोलकल्पितानि सूत्राभासानि विरचय्य वा आप्रेडितं समुघुष्टमादुच्चारितम् । 'हीणक्रवरं' हीनाक्षरं-हीनमक्षरं यस्मिंस्तत् , हीनाक्षरदोषो हि महान्तमनर्थ जनयति, अकारमात्रलोपे सत्यनलोऽपि छोडकर अर्थात् क्रमपूर्वक न पढा गया हो, जैसे 'नमो अरिहंताणं' इत्यादि की जगह 'अरिहंताणं नमो' इत्यादि पढा गया हो (१)। एक सूत्र का पाठ दुसरे सूत्र में मिलाकर या जहां विराम न लेना चाहिये वहां विराम लेकर, अथवा अपनी तरफ से कुछ शब्द जोडकर पढ़ा गया हो (२)। अक्षरहीन पढा गया हो, जैसे 'अनल' शब्द का अकार कम कर दिया जाय तो 'नल' बन जाता है, 'संसार' शब्दका सिर्फ अनुस्वार निकाल दिया जाय तो 'ससार' नया डाय, वारीत 'नमो अरिहंताणं' विगैरेनी न्याये 'अरिहंताणं नमो' વિગેરે વંચાયું હોય (૧). એક સૂત્રના પાઠ બીજા સૂત્રમાં મેળવીને અગર જ્યાં રોકાવું ન જોઈએ ત્યાં રોકાઈને, અથવા પિતાના તરફથી ચેડા શબ્દ જોડીને વાંચ્યું હોય, (૨). અક્ષરહીન વંચાયું હોય–જેવી રીતે “અનલ' શબ્દને અકાર કાઢી નાખીએ તે “નલ' બની જાય છે, “સંસાર” શબ્દમાં ખાલી અનુસ્વાર કાઢી નાખીએ તે.
१- अर्थ:-अर्थ उपयाच्वायाम्' अस्माद् बाहुलकेन कर्मण्यच्, पक्षे 'क गतौ' अस्मादौणादिकः कर्मणि थन् ।
२- 'आगमे तिविहे' इत्यत आरभ्य ' तदुभयागमे,' इत्यन्तं यावत्एवं मागधीशल्या ॥
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मुनितोषणी टीका
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नलः, अनुस्वारमात्रलोपे सत्यसारः संसारोऽपि ससारः संजायते । अत्र बहत्र इत्थमाभणन्ति - राजगृहे समवतस्य भगवतो महावीरस्य धर्मदेशनाश्रवणानन्तरं भगवन्तं वन्दित्वा परिषत् प्रतिगता, तदा किञ्चिदुत्पत्यात्रपतितं पुनरुत्पत्यात्रपतितं विद्याधरविमानमालोक्य सन्दिहानेन सपुत्रेण राज्ञा श्रेणिकेन पृष्टो भगवानाह - 'विमानवाहोऽयं विमान चारणमन्त्रस्यैकमक्षरं विस्मृतवांस्तेनेदं विमानं हतपक्षः पक्षीत्र मुहुर्मुहुरुत्पत्योत्पत्य निपतती 'ति । तच्छ्रुत्वा श्रेणिकपुत्रोऽभयकुमारो निजया पदमात्रोपलब्धिपूर्वकाऽनेपदानुसन्धानशक्त्या तं विमानचारणमन्त्रं न्यूनाक्षरा(सारसहित ) बन जाता है, तथा 'कमल' शब्दके 'क' को कम करदेने से 'मल' बन जाता है, इत्यादि; इस विषय में विद्याधर और अभयकुमार का दृष्टान्त है
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एक समय राजगृह नगरीमें पधारे हुए भगवान महावीर स्वामी की धर्मदेशना सुनकर तथा उनको वन्दना करके परिषद के चले जाने पर बार बार उडते-गिरते किसी विद्याधरके विमान को देख कर अपने पुत्र अभयकुमार के साथ राजा श्रेणिकने भगवान से पूछा, प्रभो ! यह विमान इस प्रकार उड कर क्यों गिरता है? तब भगवानने फरमाया कि यह विद्याधर अपनी विद्या का एक अक्षर भूल गया है जिसमे यह विमान विगर पांख के पक्षी की तरह वार वार उड-उड कर गिरता है । ऐसा सुन कर राजा 'ससार' ( सारसहित ) ने छे. तथा જેમ ‘ ક્રમળ શબ્દના 'ક' તે કાઢી મળ શબ્દ બની જાય છે.
नावाश्री'
"
આ વિષયમાં એક વિદ્યાધર અને અભયકુમારનું દૃષ્ટાંત છે.
એક વખત રાજગૃહ નગરીમાં પધારેલા ભગવાન ધર્મદેશના સાંભળી તથા મહાવીર સ્વામીની ભગવાનને વન્દન કરી પરિષદ ચાલી ગયા પછી એક વિદ્યાધરના વિમાનને ઉડતા–પડતા જોઇને પોતાના પુત્ર અભયકુમારની સાથે શ્રેણિક રાજાએ ભગવાનને પૂછ્યું. પ્રભે ! આ વિમાન આવી રીતે ઉડીને પાછું કેમ પડે છે ? ત્યારે ભગવાને જણાવ્યું કે આ વિદ્યાધર પોતાની વિદ્યામાંથી એક અક્ષર ભૂલી ગયા છે. જેથી વિમાન પાંખ વિનાના પક્ષીની જેમ વારંવાર ઉડી ઉડીને પડી જાય છે, સાંભળીને રાજા શ્રેણિકના પુત્ર અભયકુમારે
આ
એવું
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आवश्यक सूत्रस्य
,
नुसन्धानेनाऽत्रिलीकृत्य फलितमनोरथात्प्रसन्नात्तस्माद्विद्याधरात्तद्विद्या सिद्ध्युपायम्रुपलब्धवानिति । 'अच्चक्खरं ' अत्यक्षरम् - अति = आगमगाथासूत्रापेक्षयाऽधिकमक्षरं यस्मिंस्तत्तथाभूतमर्थादेकद्वयादिक्रमेणाक्षरमधिकीकृत्योच्चारितम् । 'पयहीणं' पदहीनं= पदं न्यूनीकृत्योच्चारितम्, एतच्चोपलक्षणमधिकपदत्वस्यापि अधिकाक्षरत्वस्येवाधिकपदत्वस्याप्युपन्यासाईत्वात् । ' विणयहीणं ' विनयहीनं= विनयं विनोश्चारितम् । जोगहीणं ' योगहीनं- योगो = मनोयोगस्तेन हीनं मनोयोगं दत्वा पठितमित्यर्थः । श्रेणिकका पुत्र अभयकुमारने अपनी पदानुसारिणी- लब्धि-द्वारा उसके विमान चारण मंत्र को पूरा करके उसके मनोरथ को सिद्ध किया और उस विद्याधर से आकाशगामिनी विद्याकी सिद्धि का उपाय सीख लिया । (३)
अधिक अक्षर जोडकर पढा गया हो, जैसे एक राजा के वाचक 'नल' शब्द के पहले 'अ' जोड कर पढा जाय तो 'अनल' बन जाता है, जिसका अर्थ अग्नि हो जाता है (४) । पद को न्यून या अधिक करके बोला गया हो, जैसे "सप्त व्यसन सेवनीय नहीं है" यहां पर 'नहीं' पदको न्यून कर देने से तथा "हार" के साथ " प्र" आदि अधिक शब्द लगा देने से बहुत अर्थभेद हो जाता है (५) । विनयरहित पढा गया हो (६) । मनोयोग दिये बिना पढा गया हो, अथवा आयम्बिल आदि પેાતાની પદાનુસારિણી લબ્ધિ દ્વારા એના વિમાનચારણુ ( વિમાન ચલાવનાર ) મત્રને પૂરો કરી તેના મનેાથને સિદ્ધ ', અને તે વિદ્યાધર પાસેથી આકાશગામિની વિદ્યાની સિદ્ધિના ઉપાય શીખી લીધે (૩).
66
"
"
વાચક નલ
શબ્દ પહેલાં અ' જોડી દેવાય તા
હાય – જેવી રીતે એક રાજાના 'मनस > ખની જાય છે અને જેને અ અગ્નિ થઈ જાય છે (૪). પદને થાડું અગર વધારે કરીને માલાયુ હાય જેવી રીતે સાત બ્યસન સેવવા યાગ્ય નથી. અહીં નથી પદ્યને छोडी देवाथी, तथा 'हार' नी साथै 'अ' विगेरे बधारे शब्द उमेरवाथी थे। અર્થભેદ થઈ જાય છે (૫). વિનયરહિત વહેંચાયું હૈાય (૬). મનાયેગ આપ્યા વિના વાંચ્યું. હાય અથવા આયમ્મિલ વિગેરે શાસ્રોત તપ કર્યાં વિના વાંચ્યું. ડાય
વધારે અક્ષર જોડીને વાંચ્યુ
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मुनितोपणी टीका यद्वा-आचामाम्लायनुष्ठानरूपयोगोद्वहनमन्तरेण पठितम् । 'घोसहीणं' घोषहीनंघोषः=उदात्तानुदात्तस्वरितरूपस्वरत्रयं तद्धीनमर्थादुदानादिस्वराणां यथोचितमुच्चारणमकृत्वैव पठितम् । 'सुष्ठदिन्नं' मुष्ठदत्तं-सुष्टु-शोभनं यथास्यानथा मरहस्यमित्यर्थः, दरां-पाठितम् . पात्रापात्रविवेकमकृत्वैव निकटोपस्थिताय यस्मै कस्मैचित्सम्यतया मूत्रार्थदानमित्यर्थः। पात्रविवेकमन्तरेण हि कदाचित्कुपात्रायाऽध्यापितं महान्तमनर्थ जनयति, यथा भुनङ्गस्य क्षीरपायनं तद्विषवर्द्धनायैव, यथा वा ज्वरातस्य घृतपायनं शीतलजलस्नपनं वा तज्ज्वरवर्द्धनायैव, यद्वा यथा बहुमूल्यां सुविशालां मालां संग्रथ्य वानरगले समर्पणं तन्मालायाः समुच्छेदायैव, अथवा यथोषरभूमावुप्तवीजं न फलनि प्रत्युत तत्रैव ( भूमौ ) विलीयते तथैवाऽपात्राय विद्यादानं, यतोऽमौ काकतालीयन्यायेन कदाचिल्लब्धविद्योऽपि स्वस्वशास्त्रोक्त तप किये विना पढा गया हो (७)। उदात्त आदि स्वरों के उचित उच्चारण किये विना पढा गया हो (८)। पात्र कुपात्र का विचार किये विना रहस्य ग्वोल कर पढाया गया हो, क्यों कि शिष्य की परीक्षा किये विना कदाचित् कुपात्र को पढाया जाय तो वह सांप को दूध पिलाने तथा ज्वर वाले को घी पिलाने या ठण्ढे जल से नहलाने के बराबर अनर्थकारी होता है। अथवा जैसे सुन्दर रत्नों की माला बन्दर के गलेमें डाल दी जाय, या ऊसर भूमिमें बीज बोया जाय तो लाभ के बदले हानि ही होती है उसी प्रकार कुपात्र शिष्यको शास्त्र का ज्ञान पढाना अलाभकारी है। यदि किसी संयोग से वह विद्या प्राप्त भी कर (૭). ઉદાત્ત વિગેરેને શુદ્ધ ઉરચાર કર્યા વિના વાંચ્યું હોય (૮). પાત્ર-કુપાત્રના વિચાર કર્યા વિના રહસ્ય સમજાવીને ભણાવ્યું હોય. કારણ કે શિષ્યની પરીક્ષા કર્યા વિના કેઈ વખત કુપાત્રને ભણાવાય તો તે સાંપને દૂધ પીવરાવવા જેવું તથા તાવવાળાને ઘી ખવરાવવા જેવું અથવા તે ઠંડા પાણીથી સ્નાન કરાવવા જેવું અનર્થકારી થાય છે, અથવા તે સુન્દર રત્નની માળા વાંદરાના ગળે પહેરાવવી અગર ખારા વાળી જમીનમાં બીજ વાવી દેવામાં આવે તો લાભ થવાના બદલે હાનિ જ થાય છે. એ પ્રમાણે કુપાત્ર શિષ્યને શાસ્ત્રનું જ્ઞાન આપવું અલાભકારી છે, કદાચ કોઈ સગવશાત તે વિદ્યા પ્રાપ્ત પણ કરી લે તે પણ પિતાના કુટિલ
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आवश्यकमुत्रस्य
भावमपरित्यजन् 'दृष्टीदृष्टि पात्रभूतानपि शिष्यानपात्रत्वं नयति, स्वल्पीयसाऽपि कारणेन महान्तं क्रोधमादाय गवितोऽनाचरणीयमाचर्य निजया दुर्भावनया कुठारधारया धर्मकल्पवृक्षमेव चिच्छित्सति । ननु कोऽपात्रपदभाक? इति चेदुच्यते-यः परापवादशीलो, योऽसंयतेन्द्रियो, योऽनृजुर्यः क्रोधी, यः पिशुनो, यः क्रूरवाक् , यो बहुभोजनप्रियः, यो मनोवाग्देहेष्वसमवृत्तियश्चाविनयः। प्रोक्तमिदमुत्तराध्ययननियुक्तौलेवे तो अपने कुटिल स्वभाव को न छोडता हुआ सुपात्र शिष्यों को भी अपने समान बना डालता है। और जरा २ सी बातमें क्रुद्ध होकर घमण्डपूर्वक दुर्भावनारूप कुल्हाडी से धर्मरूप कल्पवृक्ष को काटने के लिये उतारू होजाता है।
कुपात्र उसको कहते हैं- जो पराई निन्दा करे, इन्द्रियों का लोलुपी, हृदय का कुटिल, क्रोधी, चुगलखोर, कठोरभाषी, खानेपीनेमें अधिक लोलुपी, मन वचन और कायामें विषम वृत्ति रखने वाला ( मनमें कुछ, बोले कुछ, करे कुछ ऐसा ) तथा उद्दण्ड हो । जैसा कि उत्तराध्ययननियुक्तिमें कहा हैસ્વભાવને તે છોડતું નથી અને સુપાત્ર શિષ્યને પણ પિતાના જેવું બનાવે છે, અને સામાન્ય જેવી વાતમાં પણ ક્રોધાયમાન થઈને ઘમંડ સાથે દુર્ભાવના રૂપ કુહાડી વડે ધર્મરૂપ કલ્પવૃક્ષને કાપી નાંખવા તૈયાર થઈ જાય છે.
કુપાત્ર તેને કહે છે કે જે પારકી નિન્દા કરે. ઇદ્રિયોમાં લુપી, કુટિલઅંત:કરણ હોય. ક્રોધી, ચાડીયાપણું, કડવી વાણી બેલનાર, ખાન-પાનમાં લુપી, મન વચન અને કાયામાં વિષયવૃત્તિ (મનમાં બીજું, બોલવામાં બીજું અને કરવામાં બીજું) રાખનાર, તથા ઉદ્ધત હોય. જેમકે ઉત્તરાધ્યયનનિર્યુકિતમાં કહ્યું છે કે –
१-'दृष्टीदृष्टि' 'देखादेखी' इति भाषा, ‘कर्णाकर्णि प्रथितमयशो बन्धुवगैरभाणि' इत्यादाविव प्रहरणविषयस्य कर्मव्यतिहारस्य चाभावेऽपि बहुव्रीहिसमासस्येच्प्रत्ययस्य चेष्टत्वात् ॥
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मुनितोषणी टीका
" 'दंसगमसगसमाणा, जलूगवेच्छुगसमा य जे होति । ते किर होति खलंका, तिकावमिऊ चंडमद्दविया ॥१॥" जे किर गुरुपडिणीया, सबला असमाहिकारगा पावा । कलहकरणस्स भावा, निणवयणे ते किर खलुका ॥२॥ पिसुणा परोक्यावी. भिन्नरहम्सा परं परिभवंति । निविअणिज्जा य मढा, निणवयणे ते किर खलुका ॥३॥” इति । स्थानाङ्गे भगवताऽपि निदर्शितम्
" जो डाम, मच्छर, जौंक विच्छू के समान आचरण करने वाला, असहिष्णु, आलसी, क्रोधी, वारवार कहने पर भी गुरुकी
आज्ञा को नहीं मानने वाला, गुरुका विरोधी, चारित्रमें शवलदोषयुक्त, गुरुको अममाधि पैदा करने वाला, झगडालू , चुगलखोर, पर को पीडा देने वाला, दूसरे को दबाने वाला, रहस्यभेद करने वाला, विरुद्ध आचरण करने वाला तथा शठ, पापात्मा, जिनवचनमें ग्वल-कुशिष्य कहलाता है ॥ ३ ॥
म्थानाङ्ग सूत्र में भगवान ने फरमाया है कि-'अविनीत, रस
"s, iस, म२७२, विछीना समान मायाय ४२वा, मसलिए આળસુ, ધી, વારંવાર કહેવા છતાંય ગુરુની આજ્ઞાનું પાલન નહિ કરનાર, ગુરુના વિરેધી, ચારિત્રમાં શબલ દેવયુકત, ગુરૂને અસમાધિ ઉત્પન્ન કરનાર, કજીયાખેર, ચડીયાપણું, પરને પીડા કરનાર, બીજાને દબાવનાર, ખાનગી વાતને જાહેર કરનાર, વિરુદ્ધ આચરણ કરનાર તથા શઠ પાપાત્મા જિનવચનમાં શંકા પંખા કરનાર કશિષ્ય કહેવાય છે.
સ્થાનાગ સત્રમાં ભગવાને કહ્યું છે કે-અવિનીત, રસલુપ, મહાક્રોધી, १-दंशकमशकसमाना जलकावृश्चिकसमाश्च ये भवन्ति । ते किल भवन्ति खलुङ्कास्तीक्ष्णमृदुचण्डमार्दविकाः ॥ १॥ ये किल गुरुप्रत्यनीकाः, शबला असमाधिकारकाः पापाः । कलहकरणस्वभावा जिनवचने ते किल खलुङ्काः॥२॥ पिशुनाः परोपतापिनो, भिन्नरहस्याः परं परिभनन्ति । निर्वेदनीयाश्च शठा जिनवचने ते किल ग्वलुङ्काः ।। ३ ।। इति संस्कृतच्छाया ।
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आवश्यकमुत्रस्य "चत्तारि अवायणिज्जा पन्नना, तंजहा-अविणीए विगइपडिबढे अविओसवितपाहुडे माई " इति । यद्वा 'मुगुदिन्नं' इत्यत्र प्राकृतत्वादकारलोपस्तेन 'मुष्ठ्वदत्त'-मितिच्छाया, तेन सृष्ठवे-विनीताय अदत्तं न दत्तमित्यर्थः । विनीताय शिष्याय दत्त शास्त्रमनन्तगुणफलकं भवति, यत इदमेव धर्मदानमितीत्युक्तमन्यत्र
"पात्रेभ्यो दीयतां विद्या, नित्यं चैवाऽनपेक्षया । केनलं धर्मबुद्धया य,-द्धर्मदानं प्रचक्षते" ॥ १॥ इति ।
'दुठ्ठपडिच्छिय' दुष्ठु-अशोभनं यथा स्यात्तथा दुर्भावनया वा लोलुप, महाक्रोधी तथा मायाचारी शिष्य, ये चार वाचना देने • योग्य नहीं है।'
__अथवा 'सुठुदिन्नं' यहां पर प्राकृत के कारण अकार का लोप है इसलिये सुष्टु-विनीत को अदत्त-न पढाया गया हो, क्योंकि विनीत शिष्य को पढानेसे अनन्त ज्ञानादि गुणों की प्राप्ति होती है, इसको अन्यत्र धर्मदान भी कहा है-जैसे
'सुपात्र शिष्य को निर्लोभ होकर केवल परमार्थ धुनि से ज्ञान देने को 'धर्मदान' कहते हैं ॥१॥
(९) दुष्ट भावसे ग्रहण किया हो, अथवा दुष्ट पुरुष से लिया गया हो। इस अतिचारको किसीने 'सुटुंदिन्नं' से अलग नहीं माना તથા માયાચારી શિષ, આ ચારેને વાચના આપવી એગ્ય નથી.
अथवा 'मुठुदिन्नं' मामा प्राकृत भाषाना २ मारने ५ छ. એટલા માટે સુહુ-વિનીતને અદત્ત-નહિ ભણાવ્યું હોય. કારણ કે વિનીત શિષ્યને અભ્યાસ કરાવવાથી અનન્ત જ્ઞાનાદિ ગુણેની પ્રાપ્તિ થાય છે. એને બીજે ઠેકાણે ધમદાન પણ કહેલ છે. જેવી રીતે “સુપાત્ર શિષ્યને નિર્લોભ થઈને કેવલ પરમાર્થ– બુદ્ધિથી જ્ઞાન આપવું તેને “ધર્મદાન” કહે છે” . ૧
(૯) દુષ્ટભાવથી ગ્રહણ કર્યું હોય અથવા દુષ્ટ પુરૂષ પાસેથી લીધું હોય આ मतियारने मे "मुट्ठदिन्नं" थी म भान्यो नथी, अर्थात् “सुट्ठदिन्नं
१- “चत्वारोऽवाचनीयाः प्रज्ञप्तास्तद्यथा-अविनीतो विकृतिपतिबद्धोऽन्यवशमितपाभृतो मायी" इतिच्छाया ॥
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मुनितोषणी टीका दुष्ठो; पतीष्टं प्रतिगृहीतम्, 'प्रतीप्सित'- मितिच्छायायामप्ययमेवार्थ:। केचिदनयोर्दोषयोरेकत्वं व्याचक्षते, तदयुक्तम् ; परस्परमनपेक्षत्वात् , अत एवात्राऽतिचाराणामागोपालवावहालिकासिद्धं चतुर्दशत्वमप्युपपद्यतेऽन्यथा त्रयोदशस्वापत्तेः, एतेन 'सुष्टु दत्तं गुरुणा, दुष्ठु प्रतीच्छितं कलुषितान्तरात्मने-' ति व्याख्यानमसदिति बुद्धिमद्भिरनुभाव्यम् । मुष्ठु-दुष्ठु-शब्दावव्ययौ त्रिलिङ्गौ च ।
_ 'अकाले को सज्झाओ' न कालोऽकालस्तस्मिन्नकाले-असमये, अर्थाद् यस्य कालिकादिश्रुतस्य योऽध्ययनसमयः प्रथमपहरादिस्तमतिक्रम्य कृतो-विहितः स्वाध्यायः। 'काले न को सज्झाभो' काले स्वाध्यायसमये प्रथममहरादौ न कृतः स्वाध्याय इति निगदव्याख्यातमिदम् । 'असज्झाये सज्झाइयं' न स्वाध्यायो यस्मिन् सोऽस्वाध्यायस्तस्मिन् = स्वसमुत्थपरसमुत्थभेदभिन्ने रुधिरस्रावोल्कापात-दिग्दाहाऽकालवर्षणादिरूपे २स्वाध्यायितं स्वाध्यायः कृतः। है, अर्थात् 'सुठुदिन्नं दुटुपडिच्छियं' इन दोनों को मिलाकर एक अतिचार माना है सो उचित नहीं है, क्योंकि इन दोनों का ऐसी कोई अपेक्षा नहीं है जिससे एक साथ सम्बन्ध किया जाय । दोनों को जुदा २ मानने से ही चौदह अतिचार होते हैं नहीं तो तेरह ही रह जायँगे (१०)। अकाल में स्वाध्याय किया गया हो (११), काल दुछुपडिच्छियं' मा पनि सवी मे मतियार माने ते अयित नथी, म આ બન્નેની કોઈ એવી અપેક્ષા નથી કે જેથી એક સાથે સબંધ કરવામાં આવે. બન્નેને જૂદા જૂદા માનવાથી ચૌદ અતિચાર થાય છે. નહિ તે તેર જ થઈ જશે (૧૦) અકાલમાં
१-'पडिच्छियं ' इत्यस्य ‘प्रतीच्छित'-मितिच्छायया प्रतिगृहीतार्थकरपनं तु व्याकरणाननुसन्धानेन गजनिमीलिकैव 'इषुगमियमां छः' (७ । ३। ७७) इति शित्येव छादेशविधानात् । न च प्रतीच्छा संजाताऽस्येत्यर्थे तारकादित्वादितचि प्रतीच्छितमिति युक्तमेवेति सन्देग्धव्यम् , तथा सनि प्रतीच्छावत एव बोधसम्भवेन 'प्रतिगृहीत'-मिति कर्मवोधकत्वानुपपत्तेरिति कृतमसारग्रन्थपर्यालोचनेन ॥
२- स्वाध्यायितम्'-' तत्करोति तदाचष्ट'-इति णिजन्तात् स्वाध्यायशब्दात् नाप्रत्यये 'निष्ठायां सेटि' (६।४।५२) इति णिलोपः। 'स्वाध्यायिकम्'इतिच्छायो कल्पयित्वा स्वाध्याय एव स्वाध्यायिकम्-इति व्याख्यानं तु न रुचिरं, स्वाध्यायशब्दात् स्वार्थठकोऽसंभवात् , विनयादेराकृतिमणत्वे प्रमाणाभावस्य प्रामुक्तत्वात् ।
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आवश्यकमुत्रस्य 'सज्झाए न सम्झाइयं' स्वाध्याये न स्वाध्यायः कृतः। 'तस्स' तस्योकपकारातिचारस्य 'मि' मयि मद्विषये 'दुक्कडं' दुष्कृतं पापम् — मिच्छा' मिथ्या निष्फलं भवत्विति भाग्वत ॥
__ अत्र दर्शनसम्यकत्व-समितिपश्चक-गुप्तित्रय-यावरपश्चक-विकलेन्द्रियत्रयपश्चेन्द्रिय-पश्चमहाव्रत-रात्रिभोजन-पापस्थानाष्टादशकपट्टीसमुच्चारणपूर्वकं 'मूलोतरगुणानां त्रयस्त्रिंशतो गुर्वाशातनानां च यो मयाऽतिचारः कृतस्तस्य मिध्या मयि दुष्कृतमस्तु' इति 'इच्छामि ठामि०' इति संपूर्णी पट्टी च परिचिन्तयेत् किन्तु ध्यानवेलायां ' तम्स मिच्छामि दुक्कडं ' इत्यस्य स्थाने 'तस्स आलोएमि' इति चिन्तनीयम् । पर्यवसाने च नमस्कारपूर्वकं कायोत्सर्गः समापनीयः । एताः सर्वा: पट्टिका हिन्दीभाषायामधस्ताद् विलोकनीयाः।। इति श्रीविश्वविख्यात-जगवल्लभ-प्रसिद्धवाचक-पश्चदशभाषाकलितललितकलापाऽऽलापक-प्रविशुद्धगद्यपद्यनैकग्रन्थनिर्मापक-वादिमानमर्दक-श्रीशाहूछत्रपतिकोल्हापुरराजपदत्त जनशास्त्राचार्य' पदभूषित-कोल्हापुरराजगुरु-बालब्रह्मचारि-जैनाचार्य-जैनधर्मदिवाकर-पूज्यश्रीघासीलाल-तिविचितायां श्रीश्रमणसूत्रस्य मुनितोषण्याख्यायां व्याख्या यां प्रथमं सामायिका.
ख्यमध्ययनं समाप्तम् ॥ १॥ में स्वाध्याय न किया गया हो (१२), अस्वाध्यायमें स्वाध्याय किया गया हो (१३)। स्वाध्यायसमय में स्वाध्याय नहीं किया गया हो (१४)। 'तस्स मिच्छामि दुक्कडं ' वह पाप मेरा निष्फल हो ॥
अस्वाध्याय के विषयमें आगे कोष्ठक दिया जाता हैસ્વાધ્યાય કર્યો હોય (૧૧) કાલમાં સવાધ્યાય કર્યો ન હોય (૧૨) અસ્વાધ્યાયમાં સ્વાધ્યાય કર્યો હોય (૧૩) સ્વાધ્યાયના સમયમાં સ્વાધ્યાય ન કર્યો હોય (૧૪) - "तस्स मिच्छामि दुक्कडं" ते भा३ ५५ नि०५८ यामा.
અસ્વાધ્યાયના વિષયમાં આગળ કેઠક આપેલું છે.
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संख्या
९
उकावाय (उल्कापात)
तारा टूटे
२ दिसिदाह ( दिग्दाह )
दिशा की लालिमा
गज्जिय ( गणित )
मेघ की गर्जना
विज्जुय (विद्युत् )
बिजली चमके
निग्धाय ( निर्घात) बादल कडके या भूकम्प हो वे
बालचन्द्र १ । २ । ३ शुक्ल तिथि
आकाशमें यक्षादिका चिह्न ।
३
अस्वाध्याय
६
जूत्रय (यूपक)
9
७ नक्खदित्ते ( यक्षदीस)
८
|| अस्वाध्याययन्त्रम् ॥
द्रव्य
धूमिया ( धूमिका)
महिया (महिका )
लाल या काली घूँवर
सफेद घूँत्रर
क्षेत्र
: जिस मण्डलमें
99
19
19
39
सर्वत्र
जिस मण्डलम
99
19
काल
एक पहर
जब तक रहे
एक पहर
एक पहर
८-१२-१६ पहर
एक पहर
जब तक दिखाई दे
जब तक रहे
19
भाव
सूत्र न पढे
95
99
15
37
"
36
"
36
"
99
मुनितोषणी टीका
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१०
११
१२
१३
१६
१७
१८
रयउग्घाय (रज उद्वात )
अट्ठी (अस्थि)
मंस (मांस)
१९
सोणिय ( शोणित)
१४ असुइ सामन्त (अशुचि सामन्त )
१५
सुसाणसामन्त
( श्मशानसामन्त )
रायपडण (राजपतन)
| सब दिशाओंमें धूलका
छा जाना
रायवुग्गह (राजविंग्रह)
चंदोवराग (चंद्रोपराग )
खोबराग (सूर्योपराग)
हाड मनुष्य तिर्यच का
मांस मनुष्य तिर्येच का
लोही मनुष्य' तिर्यच
का तथा प्रसव का
अवचि
स्मशान
19
चन्द्रमा का ग्रहण
सूर्य का ग्रहण
१०० हाथ मनुष्य का ६० हाथ तिर्येच का हाड हो तो
।
मनुष्य का १०० हाथ तिर्येच का ६० हाथ
११०० हाथ २६० हाथ सातघरों के अंदर यदि बीचमें रस्ता न पडता हो
जहां दीखे, गंध आत्रे.
चारों तरफ सौ सौ (१००) हाथ
राजाका अवसान जहां तक उसका राज्य हो । नया राजा बैठे
राजाओं की लडाई उपनगर नगर के समीप
सब जगह में
सब जगह में
99
मनुष्य के हाड की अवधि १२ वर्ष
३ पहर
३३ पहर
कन्या प्रसव ८ अहोरात्र पुत्र प्रसव ७ अहोरात्र
जब तक रहे
सर्व काल
तबतक
जब तक होवे
४ । ८ । १२ पहर
४ । ८ । १६ पहर
सूत्र न पढे
59
"
99
99
99
34
"
99
64
99
११०
आवश्यकमुत्रस्य
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मुनितोषणी टीका
उवस्मयस्सअंतोओरालियशरीरे स्थानक के अंदर पंचेन्द्रियका || " (उपाश्रयम्यान्तरौदारिकशरीरम) कलेवर पडा हो
जिस स्थानक म | जब तकपडा रहे ,
| १ अपादी २ भाद्रपदी २८ | महापुणिमा ५ (महापूर्णिमा ) |३ आश्विनी ४ कात्तिकी | सब जगह | ८ पहर
५ चैत्री
श्रावण वदि १,आश्विन वदि१ ३० महापरिकर ५ (महापतिपदः) | कार्तिक वदि १, मार्गशीर्ष |
सब जगह | वदि १,बैशाख वदि १ (५महा
। ८ पहर पूर्णिमा केदसरे रोज)
१ मूहर्त (आधा| ३४ संझा (संध्या) ४
प्रभात १ दुपहर २ सांझ३/
| सब जगह | मुहत पहले का | दशवैकालिअर्धरात्रि ४
आधा मुहून | कादि न पढे । पीछे का)
॥ इति अस्थाध्याययन्त्रम् ॥
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११२
आवश्यकम्त्रस्य दर्शनसम्यक्त्वादिपट्टिका
दसणसंमत्तं परमत्थसंथवो वा सुदिट्टपरमत्थसेवणं वावि बावनकुदंसणवज्जणा इयसंमत्तसद्दहणा सम्मत्तस्स पंच अइयारा पेयाला जाणियचा न समायरियन्ना, तंजहा-संका कंखा वितिगिच्छा परपासंडपसंसा परपासंडसंथवो वा (ते म्हरा समकितरूप रत्नपदार्थ के विषय मिथ्यास्वरूप रजोमल लागो होय, तो) तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
(टिप्पणी-दर्शनसम्यक्त्वम् । तत्र दर्शनं जिनमताभिरोचनम् , तदेव सम्यक्त्वम् , परमार्थसंस्तवो वापरमार्थः जीवादिस्वरूपम् , तस्य संस्तवः परिचयो बोध इत्यर्थः, सुदृष्टपरमार्थ सेवना वापि, तत्र सुदृष्टैः अतीन्द्रियार्थदर्शिभिः सर्वरुपदृिष्टः परमार्थः जीवादिस्वरूपं तस्य सेवना आसेवनम् ; व्यापनकुदर्शनवर्जनातत्र व्यापन्न-विनष्टं दर्शनं सम्यक्त्वं येषां ते व्यापन्नदर्शनाः, कुदर्शनाः कुत्सितं दर्शनमसद्भावनिरूपणादिरूपं येषां ते कुदर्शनाः, तेषां वर्जना व्यापन्नकुदर्शनवर्जना, वान्तसम्यक्त्वानां मिथ्यादृष्टीनां च संसर्गवर्जनमित्यर्थः । इति सम्यक्त्वश्रद्धानम् । सम्यक्त्वस्य पश्च अतिचाराः पेयाला प्रधानानि ज्ञातव्या न समाचरितव्याः। 'पेयाल' इति प्रधानार्थको देशीयः शब्दः । तद्यथा-शङ्का-जिनवचनेषु संदेहकरणम्। काक्षा-परदर्शनाभिलाषरूपा। विचिकित्सा तपःसंयमाराधनफलं प्रति संशयः। परपाषण्डप्रशंसा-परधर्मप्रशंसाकरणम् , परपाषण्डसंस्तवो वा पर. धर्मपरिचयकरणम् ॥)
पहिली इरियाममिति के विषय जो कोई अतिचार लाग्यो होय तो आलोऊं, द्रव्य थकी छ काया का जीव जोइने न चाल्यो होऊ, क्षेत्र की साढातीन हाथ प्रमाणे जोइने न चाल्यो होऊं, काल थकी दिन को देखे विना रात को पूंजे विना चाल्यो होऊं, भाव थकी उपयोग सहित जोईने न चाल्यो होऊ, गुण थकी संवरगुण, पहिली इरियासमिति के विषय जो कोई पाप दोष लाग्यो . होय तो देवसिय सम्बन्धि तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
दूसरी भाषासमिति के विषय जो कोई अतिचार लाग्यो होय तो आलोऊ, द्रव्य थकी भाषा कर्कशकारी, कठोरकारी, निश्चयकारी, हिंसाकारी, छेदकारी, भेदकारी, परजीव को पीडाकारी, सावज्जसव्वपापकारी कूडी मिश्रभाषा बोल्यो होऊ, क्षेत्र थकी रस्ते चालतां
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मुनितोषणी टीका
११३ बोल्यो होऊ, काल थकी पहर रात्रि गयां पीछे गाढे गाढे शब्द बोल्यो होऊ, भाव थकी रागद्वेष से बोल्यो होऊ, गुण थकी संवर गुण, दूसरी भाषासमिति के विषय जो कोई पाप दोष लाग्यो होय तो देवसिय संबंधी तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
तीसरी एषणासमिति के विषय जो कोई अतिचार लाग्यो होय तो आलोऊं, द्रव्य थकी सोले उदगमणका दोष, सोले उत्पातका दोष, दश एषणाका दोष इन बयालीश दोष सहित आहार पाणि लायो होऊ, क्षेत्र थकी दो कोश उपरांत लेजाईने भोगव्यो होय काल थकी पहेला पहर को छेला पहर में भोगव्यो होऊ, भाव थकी पांच मांडलाका दोष न टाल्या होय गुण थकी संवरगुण, तीसरी एषणा समिति के विषय जो कोई पाप दोष लाग्यो होऊं तो देवसिय संबन्धी तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।।
चोथी आयाणभंडमत्तनिक्खेवणासमिति के विषय जो कोई अतिचार लाग्यो होय तो आलोऊ, द्रव्य थकी भाण्डोपकरण अजयणा से लीधा होय अजयणा से रख्या होय, क्षेत्र थकी गृहस्थके घर आंगणे रख्या होय, काल थकी कालोकाल पडिलेहणा न की होय, भाव थकी ममता मूर्छा सहित भोगव्या होय, गुण थकी संवर गुण, चोथी समिति के विषय जो कोई पाप दोष लाग्यो होय तो देवसिय सम्बन्धी तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥ ४ ॥
पांचवी उच्चार-पासवण-खेल-जल्ल- सिंघाण-परिहावाणिया समिति के विषय जो कोई अतिचार लाग्यो होय ते आलोऊं, द्रव्य थकी ऊंची नीची जगह परठव्यो होय, क्षेत्र थकी गृहस्थ के घर आंगणे परठव्यो होय, काल थकी दिनको विना देखे रातको विना पूंजे परठव्यो होय, भावथकी जाता आवसही आवसही, न करी होय, परिठवते पहले शक्रेन्द्र महाराज की आज्ञा नहीं ली होय, थोडो पूंजी ने घणो परिठव्यो होय, परठने के बाद तीनवार बोसिरे वोसिरे न किन्हो होय, आवता निःसही निश्सही न करी होय, ठिकाणे आईने काउसग्ग न कर्यो होय, गुणथकी संवरगुण,
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११४
आवश्यकमूत्रस्य पांचवी समिति के विषय जो कोई पाप दोष लाग्यो होय तो देवसीय सम्बन्धि तस्य मिच्छामि दुक्कडं ॥५॥
मनगुप्ति के विषय जो कोई अतिचार लाग्यो होय तो आलोऊ, वचन आरंभ, सारंभ, समारंभ, विषय, कषाय के विषय खोटो मन प्रवर्ताव्यो होय तो देवसिय सम्बन्धि तस्य मिच्छामि दुक ।१।
वचनगुप्ति के विषय जो कोई अतिचार लाग्यो होय तो आलोऊ, वचन आरंभ, सारंभ, समारंभ, राजकथा, देशकथा, स्त्रीकथा, भत्तकथा इन चार कथा में से कोई कथा की होय तो देवसिय सम्बन्धि तस्स मिच्छामि दुक्कडं । २।
___कायागुप्ति के विषय जो कोई अतिचार लाग्यो होय तो आलोऊं, काया आरंभ, सारंभ, समारंभ, विना पूंज्या अजयणापणे असावधानपणे हाथपग पसारथा होय, संकोच्या होय, विना पूंज्या भीतादिक को ओटींगणो (सहारो) लीधो होय तो देवसिय सम्बन्धि तस्स मिच्छामि दुवडं । ३।
पृथ्वीकाय में मिट्टी, मरडो, खडी, गेरु, हिंगलू, हडताल, हडमचि, लूग, भोडल, पत्थर इत्यादि पृथ्वीकाय के जीवों की विराधना की होय तो देवसिय सम्बन्धि तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥१॥
अप्काय में ठार को पाणी, ओस को पाणी, हीम को पाणी, घडा को पाणी, तलाव को पाणी, निवाण को पाणी, संकालको पाणी, मिश्र पाणी, वर्षाद को पाणी इत्यादि अप्पकाय के जीवों की विराधना की होय तो देवसिय सम्बन्धि तस्स मिच्छामि दुकडं । २।
तेउकाय में खीरा, अंगीरा, भोभल, भडमाल, झाल, टूटती झाल, विजली, उल्कापात इत्यादि तेउकाय के जीवों की विराधना को होय तो देवसिय सम्बन्धि तस्स मिच्छामि दुक्कडं । ३ ।
वाउकाय में उक्कलियावाय, मंडलियावाय, घणवाय, घणगं. जवाय, तणवाय, शुद्धवाय, सपटवाय, वीजणे करी, तालिकरी,
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मुनितोषणी टीका चमटीकरी, इत्यादि वाउकाय के जीवों की विराधना की होय तो देवसिय सम्बन्धि तस्स मिच्छामि दुक्कडं । ४।
__ वनस्पति काय में हरी, तरकारी, बीज, अंकुरा, कण, कपास, गुम्मा, गुच्छा, लत्ता, लीलण, फूलण, इत्यादि वनस्पतिकाय के जीवों की विराधना की होय तो देवसिय सम्बन्धि तस्स मिच्छामि
बेन्द्रिय में लट, गिंडोला, अलसिया, शंख, संखोलिया, कोडी, जलोक, इत्यादि बेन्द्रिय जीवों की विराधना की होय तो देवसिय सम्बन्धि तस्स मिच्छामि दुक्कडं । १।
तेन्द्रिय में कीडी, मकोडी, जूं, लींख, चांचण, माकण, गजाई, खजूरीया, उधई, धनेरिया इत्यादि तेन्द्रिय जीवों की विराधना की होय तो देवसिय सम्बन्धी तस्स मिच्छामि दुक्कडं । २।
चतुरिन्द्रिय में तीड, पतंगिया, मक्खी, मच्छर, भंवरा, तिगोरी, कसारी, विच्छं इत्यादि चतुरिन्द्रिय जीवों की विराधना की होय तो देवसिय सम्बन्धि तस्स मिच्छामि दुक्कडं । ३ ।
पंचेन्द्रिय में जलचर, थलचर, खेचर, उरपर, भुजपर, सन्नी, असन्नी, गर्भज, समुच्छिम, पर्याप्ता, अपर्याप्ता, इत्यादि पंचेन्द्रिय जीवों की विराधना की होय तो देवसिय सम्बन्धी तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।४।
पहिला महाव्रत के विषय जो कोई अतिचार लाग्यो होय तो आलोऊं, (१) इन्दथावरकाय (२) बम्भथावरकाय (३) सिप्पथावरकाय (४) सम्मतीथावरकाय (९) पायावचथावरकाय (६) जंगमकाय, द्रव्य से इनकी हिंसा की होय, क्षेत्र से समस्त लोक में, काल से जावजीवतक, भाव से तीन करण तीन योग से पहिला महाव्रत के विषय जो कोई पाप दोष लाग्यो होय तो देवसिय सम्बन्धी तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥१॥
दसरा महाव्रत के विषय जो कोई अतिचार लाग्यो होय तो मालोऊं, कोहावा, लोहावा, भयावा, हासावा, क्रीडा, कुतुहलकारी, द्रव्य से झूठ बोल्यो होऊ, क्षेत्र से समस्त लोक में, काल से
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११६
आवश्यकमूत्रस्य
जावजीव तक, भाव से तीन करण तीन योग से दुसरा महाव्रत के विषय जो कोई पांप दोष लाग्यो होय तो देवसिय सम्बन्धी तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥ २ ॥
तीसरा महाव्रत के विषय जो कोई अतिचार लाग्यो होय तो आलोऊं, देव अदत्त, गुरु अदत्त, राजा अदत्त, गाथापति अदत्त, साधर्मि अदत्त, द्रव्य से इनकी चोरी की होय, क्षेत्र से समस्त लोक में, काल से जावजीवतक, भाव से तीन करण तीन योग से तीसरा महाव्रत के विषय जो कोई पाप दोष लाग्यो होय तो देवसिय सम्बन्धी तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥ ३ ॥
चौथा महाव्रत के विषय जो कोई अतिचार लाग्यो होय तो आलोऊं, कामराग, स्नेहराग, दृष्टिराग, देवता सम्बन्धी, मनुष्य सम्बन्धी, तिच सम्बन्धी, द्रव्य से काम भोग सेव्या होय, क्षेत्र से समस्त लोक में, काल से जावजीवतक, भाव से तीन करण तीन योग से चौथा महाव्रत के विषय कोई पाप दोष लाग्यो होय तो देवसिय सम्बन्धी तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥४॥
पांच गं महाव्रत के विषय जो कोई अतिचार लाग्यो होय तो आलोऊं, सचित्त परिग्रह, अचित्त परिग्रह, मिश्र परिग्रह, द्रव्य से छति वस्तु पर मूर्छा की होय, पर वस्तु की इच्छा की होय, सूई कुसग धातु मात्र परिग्रह राख्यो होय, क्षेत्र से समस्त लोक में, काल से जावजीव तक, भाव से तीन करण तीन योग से पांचवां महाव्रत के विषय जो कोई पाप दोष लाग्यो होय तो देवसिय सम्बन्धी तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥ ५ ॥
छट्ठा रात्रि भोजन के विषय जो कोई अतिचार लाग्यो होय तो आलोऊं, चार आहार असणं, पाणं, खाइनं, साइमं, सीत मात्र, लेप मात्र, रातवासी राख्यो होय, रखायो होय, राखता प्रत्ये भलो जाण्यो होय तो देवसिय सम्बन्धी तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥ ६ ॥
अठारह पाप (१) प्राणातिपात (२) मृषावाद (३) अदन्तादान (४) मैथुन (५) परिग्रह (६) क्रोध (७) मान (८) माया
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मुनितोषणी टीका
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(९) लोभ (१०) राग (११) द्वेष (१२) कलह (१३) अभ्याख्यान (१४) पैशुन्य (१५) परपरिवाद (१६) रति अरति (१७) मायामोसो (१८) मिश्रयादर्शनशल्य ये अट्ठारह पाप सेव्या होय, सेवाया होय, सेवता प्रत्ये भलो जाण्यो होय तो देवसिय सम्बन्धी तस्स मिच्छामि दुकडं ।
पांच मूलगुण महाव्रत के विषय जो कोई पाप दोष लाग्यो होय तो देवसिय संम्बन्धी तस्स मिच्छामि दुक्कडं । इस उत्तरगुण पचक्खाण के विषय जो कोई पाप दोष लाग्यो होय तो देवसिय सम्बन्धी तस्स मिच्छामि दुक्कडं । तेतीस आशातना में से गुरु की बडों की कोई भी आशातना हुई हो तो देवसिय सम्बन्धी तस्स मिच्छामि दुकडं ।
सूचना- इसके पीछे 'इच्छामि ठामि काउसग्गं' का पाठ बोलना, इस प्रकार ये सभी पाठ मौन रहकर प्रथम अध्ययन (आवश्यक) के ध्यान में बोलने का है, एवं तीसरा अध्ययन (आवश्यक) के बाद भ्रमणसूत्र के पहले चौथे अध्ययन के आदि में खडे होकर स्पष्ट उच्चारणपूर्वक बोला जाता है । ( इसी प्रकार प्रथम आवश्यक के ध्यान में और तीसरे आवश्यक के बाद चौथे आवश्यक के आदि में जो निन्यानवें अतिचार गृहस्थ बोलते हैं उन्हें आवश्यकसूत्र के अन्त के परिशिष्ट में देखें)
इति प्रथम अध्ययन सम्पूर्ण.
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४ चतुर्विंशतिस्तवः
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११८ - १४५
आवश्यकसूत्रस्य
। अथ द्वितीयमध्ययनम् ।
इथं प्रथमाध्ययने सावययोगोपरमस्वरूपं सामायिकमभिधाय संपति चतुर्विंशतिस्तुतिरूपेऽस्मिन् द्वितीयेऽध्ययने सर्वसावद्ययोगविरत्युपदेशस्य लब्धबोधिपरिशुद्धेर्भूयो बोध्युपलब्धेः प्रधानकर्मक्षयस्य च हेतुत्वेनाऽवसरसङ्ग तेस्तीर्थकराणां गुणसङ्कीर्त्तनमधिक्रियते – ' लोगस्से ' त्यादि ।
"
॥ मूलम् ॥
लोगस्स उज्जोयगरे, धम्मतित्थयरे जिणे । अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीसंपि केवली ॥१॥ उसभमजिअं च वंदे, संभवमभिणंदणं च सुमई च । पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्यहं वंदे ॥ २ ॥ सुविहिं च पुष्पदंतं, सीयल सिजंस वासुपुजं च । विमलमणं तं च जिणं, धम्मं संतिं च वंदामि ॥ ३ ॥ कुंथुं अरं च मल्लिं, वंदे मुणिसुव्वयं नमिजिणं च । वंदामि रिद्वनेमिं पासं तह वद्रमाणं च ॥ ४ ॥ एवं मए अभिथुआ, विहूयरयमल्ला पहीणजरमरणा । चवीसंपि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ॥ ५ ॥ कित्तिय वंदिय -महिया, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा । आरुग्गबोहिलाभं, समाहिवरमुत्तमं दितु ॥ ६ ॥ चंदेसु निम्मलयरा, आइचेसु अहियं पयासयरा । सागरवरगंभीरा सिद्धा सिद्धि मम दिसंतु ॥ ७ ॥
॥ छाया ॥ लोकस्योद्योतकरान्, धर्मतीर्थकरान् जिनान् । अर्हतः कीर्त्तयिष्यामि, चतुविंशतिमपि केवलिनः ॥ १ ॥
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मनितोषणी टीका
ऋषभमजितं च वन्दे, सम्भवमभिनन्दनं च सुमतिं च । पद्मप्रभं सुपाचे, जिनं च चन्द्रप्रभ वन्दे ॥ २ ॥ सुविधि च पुष्पदन्तं, शीतल-श्रेयांस-वासुपूज्याश्च । विमलमननं च जिनं, धर्म शान्ति च वन्दे ॥३॥ कुन्थुमरं च मलिं, वन्दे मुनिसुव्रतं नमिजिनं च । वन्देऽरिष्टनेमि पार्थ तथा वर्दमानं च ॥ ४ ॥ एवं मयाऽभिष्टुता, विधृतरजोमलाः प्रहीणजरामरणाः। चतुर्विंशतिरपि जिनवरा, -स्तीर्थकरा मे पसीदन्तु ॥ ५ ॥ कीर्तित-वन्दित-महिता, य एते लोकस्योत्तमाः सिद्धाः। आरोग्यबोधिलाभ, समाधिवरमुत्तमं ददतु ॥ ६ ॥ चन्द्रेभ्यो निर्मलतरा, आदित्येभ्योऽधिकं प्रकाशकराः । सागरवरगम्भीराः, सिद्धाः सिद्धिं मम दिशन्तु ।। ७ ।।
॥टीका ॥ लोकस्योद्योतकरानर्हतश्चतुर्विंशतिमपि केवलिनो जिनान् धर्मतीर्थकरान् कीर्तयिष्यामीति सम्बन्धः । लोक्यते-दृश्यते केवलज्ञानादित्ये नेति, लोक्यते=
इस प्रकार पहले अध्ययन में सावद्योग की निवृत्तिरूप सामायिक का निरूपण करके अब चतुर्विशतिम्तव (चउवीमत्थव) रूप इस दुसरे अध्ययनमें समस्त सावद्य योगों की निवृत्ति के उपदेश होनेसे समकित की विशुद्धि तथा जन्मान्तरमें भी बोधिलाभ
और संपूर्ण कर्मों के नाश के कारण होने से परम उपकारी तीर्थङ्करों का गुण कीर्तन करते है-लोगस्स' इत्यादि ।
__ जो केवलज्ञानरूपी सूर्य से अथवा प्रमाण (ज्ञान) के द्वारा देखा जाय उसे लोक कहते हैं, उस पंचास्तिकायरूप लोक को
એ પ્રમાણે પહેલા અધ્યયનમાં સાવદ્યાગની નિવૃત્તિ રૂપ સામાયિકનું नि३५५५ उशने ७३ यतुविशतिस्त१ (चउनीसत्थव) ३५ मा भाग अध्ययनमा સમસ્ત સાવદ્ય ગેની નિવૃત્તિને ઉપદેશ હેવાથી સમતિની વિશુદ્ધિ તથા જન્માંતરમાં પણ ધિલાભ અને સંપૂર્ણ કર્મોના નાશક હેવાથી પરમ ઉપકારી तीर्थ रोना शु-शीतन रे छ " लोगस्स" त्याह.
જે કેવળજ્ઞાનરૂપી સૂર્યથી અથવા પ્રમાણ (જ્ઞાન) વડે જોઈ શકાય તેને લોક” કહે છે, તે પંચાસ્તિકાયરૂપ લેકને પ્રવચનરૂપી દીવા વડે પ્રકાશ
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भावश्यकमत्रस्य पतिवीक्ष्यते प्रमाणवले नेति वा लोकः पश्चास्तिकायविशिष्ट आकाशविशेषः । यदुक्त भगवत्याम्
किमियं भंते ? लोएति पवुच्चइ ? गोयमा ? पंचत्थिकाया एस णं पत्रत्तिए लोएत्ति पवुच्चइ ' इत्यादि ।
तस्य लोकस्य (कर्मणि षष्ठी) उद्दयोतनमुद्दयोतस्तं कर्तुं शीलं येषां त उद्योतकरास्तान केवलाऽऽलोकेन प्रवचनप्रदीपेन वा निखिललोकप्रकाशकानित्यर्थः । 'धर्म'इति-दुर्गतिपतितमात्मानं धारयति-शुभस्थाने प्रापयतीति धर्मः तीर्यते पारं नीयतेऽनेनेति तीर्थ-प्रवचनम् , धर्मप्रधानं तीर्थ, धर्मतीर्थ, द्रव्यरूपस्य प्रवचनरूपी दीपक द्वारा उद्दयोत करनेवाले, प्राणियों को संसार के दुःखों से छुडाकर सुगति में धारण करनेवाले, धर्मरूप तीर्थ के स्थापक, रागादि कर्मशत्रुओं को जीतकर केवलज्ञान युक्त होकर विराजमान ऐसे चौवीसों श्री अरिहन्त भगवान की स्तुति करता हूँ।
। यहां पर 'लोक' शब्द से पञ्चास्तिकाय का ग्रहण है और आकाश भी पंचास्तिकाय का ही भेद है, तथा अलोक भी आकाशस्वरूप है अतएव 'लोक' पद से ही लोक और अलोक दोनों का ग्रहण होने से केवलज्ञान की अनन्ततामें कोई बाधा नहीं आसकती। કરવાવાળા, અને પ્રાણીઓને સંસારના દુખેથી છોડાવીને સુગતિમાં ધારણ કરવાવાળા, ધર્મરૂપી તીર્થના સ્થાપક, રાગ આદિ કર્મશત્રુઓને જીતી લઈને કેવલજ્ઞાનયુકત થઈને વિરાજમાન એવા ચોવીસ અરિહન્ત ભગવાનની સ્તુતિ કરૂં છું.
___ महिं "लोक" wथी पंगास्तियन ग्रहण ४२ . भने माश પણ પંચાસ્તિકાયનો જ ભેદ છે તથા અલેક પણ આકાશસ્વરૂપ છે. એ કારણે "लोक" पहथी as भने म मन्ननु अ य श छ, तेथी १४ ज्ञाननी અનન્તતામાં કઈ પ્રકારે હાનિ થઈ શકતી નથી.
१- ‘लोक दर्शने' अस्मात् 'अकरि च कारके संज्ञायाम् (३ । ३। . १८) इति कणि घन् ।
२- कुलो हेतुताच्छील्यानुलोम्येषु (३।२।२० ) इति कर्तरि टः । ३- 'धृन धारणे' अस्मादौणादिको मन्पत्यस्तेन 'धर्मः' इति सिद्धम् ।
४- 'तीर्थम्'-'तृप्लवनसन्तरणयोः' अस्मादौणादिकस्थन् 'ऋत इद्धातोः (७ । १ । १००) इतीत्वम् , 'हलि च' (८ । २ । ७७ ) इत्युपधादीर्घः ।
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मुनितोषणी टीका
१२१ नद्यादेः शाक्यादिप्रणीतस्याधर्मप्रधानस्य च तीर्थस्य परिहारार्थ धर्मग्रहणम् , धर्मतीर्थ कर्तुं शीलं येषां ते धर्मतीर्थकरास्तान् ।जयति अपनयति रागादिकर्मशत्रूनिति, जयति केवलज्ञानादियुक्ततया सर्वोत्कर्षेण राजत इति वा 'जिनः, 'अरिहंते' इति व्याख्यातोऽईच्छब्दार्थः, 'नमोऽरिहंताणं' इत्यत्र; 'चउवीसं' इति संख्यान्तरव्यवच्छेदाय, अपिशब्दोऽवधारणार्थो महाविदेहक्षेत्रस्थकेवलिभगवद्ग्रहणार्यश्च, लोकशब्देन पश्चास्तिकायग्रहणादाकाशस्य च पश्चास्तिकायान्तःपातिवादलोकस्याप्याकाशस्वरूपतया लोकपदेनैव लोकालोकयाग्रहणमिति न केवलोद्योतस्यापरिमितत्वहानिः, लोकोद्दयोतकरत्वमवधिविभङ्गज्ञानिषु चन्द्रमूर्यादिष्वपि चास्त्यत उक्तं 'धम्मतित्थयरे' इति, धर्मार्थ निम्नेषु नद्यादिष्ववतरणाय ये तीर्थ (घट्ट-'घाट' इतिभाषापसिदं ) कुर्वन्ति तेष्वनिप्रसङ्गवारणाय 'लोगस्स उज्जोयगरे' इति, लोकोद्योतकरत्वं धर्मतीर्थकरत्वं च दर्शनान्तरमतकल्पितेष्वपि ज्ञानिषुलोक के उद्दयोतकर अवधिज्ञानी, विभङ्गज्ञानी तथा चन्द्रमर्यादिक भी होते हैं, अतएव उनकी निवृत्ति के लिये 'धम्मतित्थयर' पद दिया है। नदी तालाव आदि जलाशयों में उतरने के लिये धर्मार्थ तीर्थघाट बनानेवाले भी धर्मतीर्थकर कहला सकते हैं, उनका यहां ग्रहण न हो इसलिये 'लोगस्स उज्जोगगरे' विशेषण दिया है, लोक के उहयोतकर तथा धर्मतीर्थकर अन्यमत के ज्ञानी भी हो सकते हैं; जैसा कि अन्य शास्त्रों में कहा गया है
ન લેકમાં પ્રકાશ કરનાર અવધિજ્ઞાની, વિર્ભાગજ્ઞાની તથા ચંદ્રસૂર્યાદિક પણ હોય छ. मे भाटतनी निवृत्ति ४२१"धम्मतित्थयरे" ५६ मपिछ. नही-तसा माह જલાશમાં ઉતરવા માટે ધર્માર્થ તીર્થઘાટ બનાવવાવાળા પણ ધર્મતીર્થકર उपाय छे. तेने स्वी२ महिं नड या भाट "लोगस्स उज्जोयगरे" विशेष આપ્યું છે. લેકના પ્રકાશક તથા ધર્મતીર્થકર અન્ય મતના જ્ઞાની પણ હોઈ શકે છે, જેવી રીતે અન્ય શાસ્ત્રોમાં કહ્યું છે કે
१-'जिनः' 'जि अभिभवे' अस्मात् 'जि जये' अस्माद्वा बाहुलकादौणादिको नः प्रत्ययः ।
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आवश्यकमुत्रस्य " ज्ञानिनो धर्मतीर्थस्य, कर्तारः परमं पदम् । __ गत्वाऽऽगच्छन्ति भूयोऽपि, भवं तीर्थनिकारतः ।। १ ॥” इति,
तदुक्तरीत्या सम्भवति तद्वयात्तये 'जिणे ' इति, नहि ते जिनाः रागादिशत्रुजेतारस्तदुक्तपुनरागमनादेव, यतो रागादिशत्रुजयमन्तरेण कर्मबीजाऽदाहादुद्भवत्येव भवाङ्कुरः, तदुक्तमितरत्रापि
“ अज्ञानपांशुपिहितं, पुरातनं कर्मबीजमविनाशि ।
तृष्णाजलाभिषिनी, मुञ्चति जन्माकुर जन्तोः ॥ १ ॥” इति । जिनानित्येव वाच्ये ' लोगस्स उज्जोयगरे' इत्याधुक्तिः श्रुतजिनावधि'धर्म तीर्थ के करने वाले ज्ञानी धर्म की हानि होते देख कर परम पद पर आरूढ होकर भी पुनः संसार में लौट आते हैं ॥१॥'
उनका ग्रहण न हो इसलिये 'जिणे' विशेषण दिया है, क्यों कि रागादि शत्र को जीते विना कर्मबीज का नाश नहीं होता,
और कर्मबीज का नाश हुए विना भवरूपी अंकुर का नाश नहीं होता है, जैसा कि अन्यत्र भी कहा है
__ 'अज्ञानस्पी मिट्टी के अन्दर पडा हुआ, प्राणी का पुराना कर्मवीज तृष्णारूप जलसे सींचा जाकर जन्मरूप अंकुर को पैदा करता है ॥१॥'
'जिणे' पद कह कर भी 'लोगस्स उजोयगरे' कहने से
ધર્મતીર્થના કરવાવાળા જ્ઞાની ધર્મની હાનિ થતી હોય તે જોઈને પરમ પદ પર આરૂઢ થઈને પણ ફરી સંસારમાં પાછા આવે છે. ( ૧ ”
तमनु अ५ न थाय ते भाटे "जिणे" विशेषर पिटु छ. १२१ ॥ શત્રુઓને જીત્યા વિના કર્મબીજને નાશ થતું નથી, અને કર્મબીજના નાશ થયા - વિના ભવસંસારરૂપી અંકુરને નાશ થતો નથી, જેવી રીતે બીજા સ્થળે પણ पामा माव्यु छ :
અજ્ઞાનરૂપી માટીની અંદર પડેલા પ્રાણીના પુરાણું કર્મ બીજ તૃષ્ણરૂપ જલથી સિંચન પામીને જન્મરૂપ અંકુરને ઉત્પન્ન કરે છે. ૧
"जिणे" ५६ डीने ५५ "लोगस्स उज्जोयगरे" पाथी श्रुतनि,
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१२३ जिनमनःपर्ययजिनच्छद्मस्थवीतरागाणां व्यवच्छेदाय । इत्यमुक्तगुणविशिष्टा अईन्त एव संभवन्ति नेतरे, पुनः ‘अरिहंते' इत्युनिविशेष्यत्वाभिमायेणेति केचित् वस्तुतस्त्विह तीर्थकरगुणोत्कीर्तनाध्ययने गुणोत्कीर्तनमेव लक्ष्यं, तथा च तीर्थङ्कराणां ये ये गुणा येन येन शब्देन लक्ष्यन्ते तेन तेन तेषां गुणानां संकी
नं क्रियते-इत्यष्टविधमहापातिहार्याहत्वगुणोत्कीर्तनाथमुकम् ‘अरिहंते' इति. एतेनेव · केवली ' इत्यपि व्याख्यातं कैवल्यगुणबोधनाय तदुपादानात् , एवं च पदान्तरनदहत्पदमपि गुणोत्कीर्तनायैव नतु विशेष्यत्वाय, विशेष्यं तु 'धम्मतित्ययरे' इत्येव प्राप्तावसरत्वात् , तदपि यथोक्तगुणोत्कीर्तनपुरस्सरमेव, योगा-( व्युत्पत्य ) 'श्रुतजिन, अवधिजिन, मनःपर्ययज्ञानजिन, तथा छद्मस्थ वीतरागों की निवृत्ति की गई है । ऊपर कहे हुए सष विशेषणों से युक्त अर्हन्त ही हो सकते हैं फिर 'अरिहंते' पद जो कहा है वह विशेष्यवाचक है । अथवा इस अध्ययन में तीर्थंकरों का गुण वर्णन किया जाता है, इस अवस्था में जिन २ शब्दों से उनके जो जो गुण प्रकट हो सकते हैं उन २ शब्दों से उनका गुण वर्णन करना आवश्यक है अतएव तीर्थङ्कर अष्टमहाप्रातिहार्य के अर्ह-योग्य भी हैं, इस बातको समझाने के लिये 'अरिहंते' पद दिया है, अतः 'अर्हत्' पद भी गुण-विशेषण-वाचक ही है, विशेष्यवाचक 'धम्मतित्थयरे' पद है, किन्तु उससे भी उपरोक्त कथन के अनुसार गुण का बोध होता ही है, क्योंकि प्रकृति प्रत्यय के અવધિજિન, મન:પર્યયજ્ઞાનજિન તથા છદ્મસ્થ વીતરાગોની નિવૃત્તિ કહેવામાં આવી छ. 6५२ सा सब विशेषथी युत मईत डा श छ. ५२॥ "अरिहंते" પર જે કહેવામાં આવ્યું છે તે વિશેષવાચક છે અથવા આ અધ્યયનમાં તીર્થકરોના ગુણ વર્ણન કરવામાં આવે છે. એ અવસ્થામાં જે જે શબ્દથી તેમના જે જે ગુણે પ્રગટ થઈ શકે તે તે શબ્દ વડે તેમનું વર્ણન કરવું જરૂરી છે, એ કારણથી તીર્થ. ४२ समाप्रतिडायने -यय पर छ. मे पातने समला भाटे "अरिहंते" ५६ मापे छ. अर्थात “ मत" ५६ ५५] गु-विशेष-वाय ॥ छे. विशेष्यवाय 'धम्मतित्थयरे' ५४ छे. परंतु तेनाथी ५, परना ४थन अनुसारे ગુણને બંધ થાય જ છે. કારણ કે પ્રકૃતિ પ્રત્યાયના બલથી થવાવાળા
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आवश्यकमूत्रस्य थपरित्यागे प्रमाणाभावात् । अस्तु वाऽईत एव विशेष्यत्वं तीर्थकरपर्यायत्वात् , न वयं तत्राऽऽग्रहिलाः, किन्तु पर्यायत्वेऽप्यईत्तीर्थकरकेवलिनामुपादानं तत्तच्छन्दसामर्थ्य गम्यार्थप्रदर्शनार्थमेवेत्येव केवलं ब्रूमः ।
_अत्र केचित्-ननु सम्भवव्यभिचाराभ्यां स्याद्विशेषणमर्थवत्-यथा नीलो घटः, कृष्णा गौरित्यादिषुः सम्भवव्यभिचाराभावे विशेषणमनर्थक-यथा शीतोऽनलः, श्यामो भ्रमर इत्यादिषु; ततश्चात्र केवलिन इति धर्मतीर्थकरविशेषणं श्यामो पलसे होनेवाले अर्थका त्याग करना न्यायविरुद्ध है, 'केवली' पदके देनेका भी यही तात्पर्य समझना चाहिये।
___ यहां पर शंका होती है कि-' विशेषण' संभव अथवा व्यभिचार होने पर दिया जाता है, जैसे-'नीले घडे को लाओ' यहां पर घडे का नीला होना संभव भी है, और यदि केवल 'घडेको लाओ' ऐसा कहते हैं तो काले पीले आदि घडों का व्यभिचार भी है, इसलिए यहां 'नीला' विशेषण देना उचित है। और जहां पर संभव नथा व्यभिचार न हो वहां विशेषण का देना व्यर्थ होता है, जैसे 'ठंढी अग्नि' यहां अग्नि में ठंढापन संभव नहीं है, ऐसे ही 'काला भौंरा' यहां पर भौंरे में कालेपन के सिवाय दूसरे वर्ण का व्यभिचार नहीं है, अर्थनी त्या ४२३ ते न्यायवि३६ छ, "केवली" ५६ पार्नु ४।२५५ ५५ ઉપર પ્રમાણે સમજી લેવું જોઈએ.
અહિં એક શંકા થવા સંભવ છે કે વિશેષણ, સંભવ અથવા વ્યભિચાર થતું હોય તે સ્થળે આપવામાં આવે છે, જેવી રીતે કે;–“નીલા ઘડાને લાવો” અહિં ઘડાનું નીલા હોવા પણું સંભવિત છે, અને જે માત્ર “ઘડાને લાવે એ પ્રમાણે કહે તે કાળે, પીળે આદિ ઘડાઓને વ્યભિચાર પણ છે. એટલા માટે અહિં “નીલે” વિશેષણ આપ્યું તે ઉચિત છે. અને જ્યાં આગળ સંભવ તથા વ્યભિચાર થતું નથી ત્યાં વિશેષણ આપવું તે વ્યર્થ થાય છે. જેવી રીતે કે “શીતલ અગ્નિ” અહિં અગ્નિમાં શીતલતાનો સંભવ નથી, તેવી જ રીતે “કાલા ભમરા” અહિં ભમરામાં કાળાપણા વિના બીજા રંગને વ્યભિચાર નથી એટલા માટે એવા વિશેષણે આપવાં વ્યર્થ છે તે કારણથી
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भ्रमर इतिवदितरव्यावर्त्तकत्वाभावादपार्थम् धर्मतीर्थकराणां केवलित्वान्यभिचारादित्याशङ्क्य - ' केवलिन एव यथोक्तस्वरूपा धर्मतीर्थकरा नान्ये ' इति नियमादर्थत्वेन स्वरूपज्ञानायेदं विशेषणमित्याहुः ।
कीर्त्तयिष्यामि = अनुपदं स्तोष्यामि, वस्तुतस्तु आर्षत्वादत्र लट्स्थानिको ऌट्, स्तौमीत्यर्थः । अपिः पूर्वापरसमुच्चया ( सङ्ग्रहा ) - थ: । ' उस ' इति । ऋषभादीनां सर्वेषां द्वितीयान्तानां चन्दनक्रिययाऽन्वयः, 'उसभ' इति ऋषभवृषभशब्दयोरुभयोरपि भवति, ततश्च गत्यर्थधातूनां ज्ञानार्थत्वात्, ऋषति जानाति लोकालोकस्वरूपमिति, ऋषति = गच्छति परमं पदमिति, शरणैषिभिर्भव्यजनैऋष्यते = प्राप्यते इति वा ऋषभः । पक्षे वर्षति = पूरयति भव्यजनमनोरथानिति, इसलिये ऐसे विशेषणों का देना व्यर्थ है, अतएव धर्मतीर्थकर को 'केवली' विशेषण देना भरे के काले विशेषण के समान व्यर्थ है, क्यों कि धर्मतीर्थकर केवली ही होते हैं ' ।
बात
इसका उत्तर यह है कि - ' केवली होने पर ही तीर्थङ्कर धर्मतीर्थ के प्रवर्तक होते हैं छद्मस्थ अवस्था में नहीं, इस को स्पष्ट करने के लिये 'केवली' विशेषण दिया गया है ॥ १ ॥ इस प्रकार चौवीस तीर्थङ्करों की स्तुति करने की सामान्य रूपसे प्रतिज्ञा करके नामग्रहणपूर्वक विशेषरूप से स्तुति करते हैं, जो लोकालोक के स्वरूप को जाननेवाले, परम पदको प्राप्त होनेवाले भव्य जनों के आधारभूत तथा उनके मनोरथों को पूरा करધર્મતીર્થંકરને કેવલી વિશેષણ આપવું તે ભમરાને કાળાપણાનું વિશેષણ આપવા પ્રમાણે બ્ય છે, કેમ કે ધર્મતીર્થંકર કેવલી જ હોય છે.
આ શંકાના ઉત્તર એ છે કેઃ—“કેવલી થયા પછી જ તીર્થંકર ધર્મતીર્થના પ્રવર્ત્તક હાઇ શકે છે, છદ્મસ્થ અવસ્થામાં થઈ શકતા નથી, એ વાતને સ્પષ્ટ કરવા भाटे "ठेवली” विशेष आसु छे ॥१॥
એ પ્રમાણે ચાવીસ તીથંકરોની સ્તુતિ કરવાની સામાન્યરૂપની પ્રતિજ્ઞા કરીને નામગ્રહણપૂર્વક વિશેષરૂપથી સ્તુતિ કરે છે કે જે લેકાલેકના સ્વરૂપને જાણવાवाजा, પરમ પદને પ્રાપ્ત થવાવાળા ભવ્યજવાને આધારભૂત તથા તેમના મનારથાને પૂર્ણ કરવાવાળા, ધર્મારૂપી બગીચાને પ્રવચનરૂપ જલનું સીંચન
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आवश्यकसूत्रस्य वर्षति=सिञ्चति प्रवचनजलेन धर्मोद्यानमिति वा वृषभः, वृषभलाञ्छनयोगाद्वा वृषभः । अथवा एतन्मातां गर्भस्थ एतस्मिन् दृष्टेषु चतुर्दशसु स्वप्नेषु प्रथमं वृषभमद्राक्षीत्तेन वृषभस्तम् (१)। 'अजिअं ' अजितो रागद्वेषादिभिरपराजितः, यद्वा गर्भस्थ एतस्मिन् पाशकैः क्रीडतोर्मातापित्रोः पित्रा माता न जितेति मातुरजयहेतुत्वादजितस्तम् (२)। 'संभवं 'संभवति-प्रकर्षण जायते सुखराशियेन यस्माद यस्मिन् वेति, दुर्भिक्षादिचिन्ताक्रान्तामु प्रजासु गर्भस्थेऽस्मिन् भगवति नेवाले, धर्मरूपी बगीचे को प्रवचनरूप जलसे सींचनेवाले तथा वृषभ चिह से युक्त हैं। अथवा भगवान जब गर्भमें आये तष उनकी माताने चौदह स्वप्नों में पहले-पहल वृषभ (बैल) देखा था अतएव 'वृषभ' नाम रक्खा, ऐसे श्री ऋषभदेव स्वामी ('वृषभदेव ) को मैं वन्दना करता हूँ।१।
जो राग-द्वेषादि को जीतनेवाले हैं, अथवा वे जब गर्भ में आये तब चौपड खेलते समय माता की हार न होनेसे जिनका 'अजित' नाम पडा उन श्री अजितनाथ को मैं वन्दना करता हूँ।२।
जो अनन्त सुखस्वरूप हैं और जिनसे अनन्त सुख की प्राप्ति होती है, अथवा जिनके गर्भ में आते ही धान्यादि का કરવાવાળા તથા વૃષભચિન્હથી યુક્ત છે. અથવા ભગવાન જ્યારે ગર્ભમાં આવ્યા ત્યારે તેમની માતાએ ચૌદ સ્વપ્નમાં સૌથી પ્રથમ વૃષભ (બળદ) ને જોયેલે से भाटे " वृषम" नाम राभ्यु, मेवा श्री ऋषलव स्वामी ( वृषमहे"* " भने “वृषम" मा गन्न शहानु प्राकृतभा “GAR" ३५ मन छ.) ने હું વંદના કરું છું. મેં ૧ છે
જે રાગ દ્વેષાદિકને જિતવાવાળા છે અથવા તેઓ જ્યારે ગર્ભમાં આવ્યા ત્યારે પાટે રમવા સમયે માતાની હાર નહિ થવાથી જેનું “અજિત” નામ - પડયું, તે શ્રી અજિતનાથને હું વંદના કરું છું. ૨
જે અનન્ત-સુખ-સ્વરૂપ છે. અને જેનાથી અનંત સુખની પ્રાપ્તિ થાય છે. અથવા જેઓના ગર્ભમાં આવવા માત્રથી ધાન્યાદિકને અધિક સંભવ(ઉત્પત્તિ)હેવાથી १- 'ऋषभ' और 'वृषभ' इन दोनों शब्दों का पातमें 'उसभ' रूप बनता है।
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मुनितोषणी टीका मस्यादिसम्पत्तेराधिक्येन संभव आसीदित्युपचाराना संभवम्तम् (३)। 'अभिणंदणं' अभिनन्दयति हर्षयति भव्यजनानिति, गर्भादारभ्य जन्मावधि भृशमिन्द्रेणाऽभिनन्दित इति वा-अभिनन्दनम्तम् (४)। 'च' किश्च 'सुमई' सुष्ठ-शोभना मतिर्यस्येति, गर्भस्थेऽस्मिन् भगवति जनन्याः सर्वेषु धर्मकर्तव्येषु पूर्णतया शोभना मतिर्माता तद्योगाद्वा, प्राणिनामेतद्दर्शनेन शोभना मोक्षविषयिणी मतिर्जातेति वा, यद्वा गर्भस्थस्याम्य भगवतो माता मृतपतिकयोः कयोश्चिदेकस्मिन् पुत्रे धने च ' ममेदं सपूत्रधनादिकं न तवे '-ति विवदमानयोः सपल्योनिर्णयाय शरणमागतयोर्व्यवहारं निजया तदानीन्तन्या विशदया मत्या निर्णीतवतीति मातृमुमतिहेतुत्वात्सुमतिस्तम् (५)। 'पउमप्पई ' पद्मस्य कमअधिक संभव (उत्पत्ति) होने से दुर्भिक्ष मिटकर सुभिक्ष हो गया ऐसे श्री संभवनाथ को ।।
___ जो भव्य जीवों को हर्षित करनेवाले हैं और गर्भमें आने पर इन्द्रने जिनकी वार वार स्तुति की ऐसे श्री अभिनन्दनस्वामी को । ४।
जिनका ज्ञान पूर्ण निर्दोष है, जिनके दर्शन मात्रसे प्राणियों को सुबुद्धि की प्राप्ति हुई, जिनके गर्भस्थ होने पर धर्मकर्तव्यों में माता की बुद्धि विशुद्ध हो गई और पुत्र तथा धन के बारे में झगडती हुई दो विधवा मौतों का क्लेश का जब कहीं निपटारा न हो सका तो गर्भस्थ भगवान की माताने गर्भ के प्रभाव से ही अपनी सुबुद्धि द्वारा यथार्थ न्याय कर दिया, इसलिये माता की દુકાલ નિવારણ થઈ સુભિક્ષ (સુકાલ) થઈ ગયે એવા શ્રી “સંભવનાથ ને ૩
જે ભવ્ય જીવોને હર્ષિત કરવાવાળા છે. અને ગર્ભમાં આવ્યા ત્યારે જેની ઇંદ્ર મહારાજે વારંવાર સ્તુતિ કરી એવા શ્રી અભિનન્દન સ્વામીને ૪
જેનું જ્ઞાન પૂર્ણ નિર્દોષ છે, જેના દર્શન માત્રથી પ્રાણીઓને સુબુદ્ધિ પ્રાપ્ત થઈ, જેઓના ગર્ભમાં આવવાથી ધર્મ-કર્તવ્યમાં માતાની બુદ્ધિ વિશુદ્ધ થઈ અને પુત્ર તથા ધનની બાબતમાં પરસ્પર કલહ કરી રહેલી બે વિધવા શકય સ્ત્રીઓનો કલેશ જ્યારે કોઈપણ ઠેકાણે નહીં પચે ત્યારે ગર્ભસ્થ ભગવાનની માતાએ ગર્ભના પ્રભાવથી પિતાની સુબુદ્ધિ દ્વારા તેનો યથાર્થ ન્યાય કર્યો તેથી માતાની
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आवश्यकत्रस्य
लस्य प्रभा पद्मप्रभा, पद्मप्रभेव प्रभा तत्तुल्यकोमलाङ्गत्वात् यस्य सः', यद्वा पद्मषु कमलेषु प्रभा यस्यासौ पद्मप्रभः-मूर्यस्तद्वद्विमलकेवलज्योतिषा भासमानस्वेन गौणलक्षणावलेन रूपककल्पनया, अथवा गर्भस्थस्यास्य मातुः पद्मशय्यादोहदः सञ्जातो यो देवेन पूरितस्तदुत्तरमसौ पाभवदिति पद्मप्रभस्तम् , एज्वरयव्याख्याने पद्मोत्तरं पद्मशय्यादोहदोत्तरं प्रभवतीति व्युत्पत्तिः (६)। 'सुपासं' सु-शोभनौ पाश्वौं यस्य सः, यद्वा गर्भस्थस्यास्य माता सुपार्धा शोभनपावती जाता तयोगात् सुपार्श्वस्तम् (७) । 'निणं' जिनम् । व्याख्यातो जिनपदार्थः । सुमति के कारण जिनका 'सुमति' नाम रक्खा गया उन श्री सुमतिनाथ भगवान को । ५।
पद्म-कमल के समान प्रभा-कान्ति-वाले, अथवा पद्मों-कमलों में प्रभा-किरण है जिसकी वह हुवा पद्मप्रभ अर्थात् सूर्य, उसके समान कान्तिवाले, या जब भगवान गर्भ में थे तो इनकी माता को पद्मशय्या का दोहद (दोहला)हुआ, जिसको देवताने पूरा किया इस कारण पद्मप्रभ नामवाले भगवान को । ६ ।
देखने में सुडौल हैं पार्श्व (पसवाडे) जिनके, अथवा जब ये गर्भ में थे तो इनकी माता गर्भ के प्रभावसे सुन्दर पार्श्व (पसवाडे) वाली हुई, इसलिये गुणनिष्पन्न नामवाले श्री सुपार्श्वनाथ को ॥७॥ સુમતિના કારણે જેનું “સુમતિ” નામ રાખવામાં આવ્યું એવા શ્રી સુમતિનાથ ભગવાનને ૫૫
५-भस समान प्रभा-न्तिवा, अथवा पो-भाभा प्रमा-४२५ છે જેની તે થયે પદ્મપ્રભ અર્થા-સૂર્ય, તેના સમાન કાન્તિવાળા, અથવા જ્યારે, ભગવાન ગર્ભમાં હતા ત્યારે તેની માતાને પદ્મશાને દેહલે થયેલે જે દેવતાએ પૂર્ણ કર્યું તે કારણથી “પદ્મપ્રભ” નામવાળા ભગવાનને છે ૬
જોવામાં પાશ્વ (પડખાને ભાગ) સુડોળ સરખે છે જેને અથવા જ્યારે તે ગર્ભમાં હતા ત્યારે ગર્ભના પ્રભાવથી જેની માતા સુંદર પાર્થવાળાં થયાં એટલા માટે ગુણ-નિષ્પન્ન નામવાળા શ્રી સુપાર્શ્વનાથ ને ૭ .
१- पद्मप्रभः– 'सप्तम्युपमानपूर्वपदस्य बहुव्रीहिरुत्तरपदलोपश्च वक्तव्यः' इति वचनात्समास उत्तरपदलोपश्च खरमुखोष्ट्रमुखादिवत् । २-पद्मपभः–'शाकपार्थिवादित्वात् 'उत्तर' शब्दस्य लोपे पृषोदरादित्वात्सिदिः।।
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सुनितोषणी टीका
१२९
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चंदप्पहं ' चन्दते= आहादते इति चन्द्रस्तस्य प्रभा चन्द्रप्रभा, चन्द्रप्रमेव प्रभा विशुद्धश्यत्वाद् यस्यासौ यद्वा गर्भावस्थायामस्य जनन्याश्चन्द्रप्रभाषानदोहदोऽभवत्तत्सम्बन्धाच्चन्द्रमभस्तम् ''वंदामि' वन्दे (८) | 'सुविर्हि' सुविधि = सुशोभनो विधिरनुष्ठानं यस्य सः, यद्वा यद्दर्शनस्मरणादिना लोकाः सुविधयः= सुभाग्या भवन्ति सः, अथवा गर्भस्थस्यास्य जननी सर्वेषु अभयदान-सुपात्रदानम्रियमाणप्राणि परिमोचनादिविधिषु सातिशया शोभना = कुशला जाताऽतस्तद्योगात्सुविधिस्तं, 'पुष्कदंतं' सुविधेरेवेदमपरं नाम विशिष्य परिचयार्थमुपनिबद्धम्, स्वच्छत्वान्मनोहरत्त्राच्च पुष्पाणीव, यद्वा नामैकदेशेन नामग्रहणात् पुष्पपदेन तत्कुणालाग्रस्य ग्रहणात् पुष्पकुड्मलाग्राणीव दन्ता यस्यासौ पुष्पदन्तस्तम् (९) । 'सीयलतथा चन्द्रमा के समान कान्तिवाले, या जब ये गर्भ में थे तो इनकी माता को चन्द्रप्रभापान का दोहद हुआ, इस कारण गुणनिष्पन्न नाम वाले श्रीचन्द्रप्रभ भगवान को ॥ ८ ॥
अच्छे अनुष्ठान वाले, या जिनके दर्शन स्मरण आदि से प्राणी पूर्ण भाग्यवान होते हैं ऐसे, अथवा जब ये गर्भ में थे तो इनकी माता अभयदान, सुपात्रदान, मरते हुए प्राणियों को बचानाआदि धर्म की सभी विधियों में विशेषतया निपुणा हुई, इस कारण सुविधिनाथ और पुष्प के समान स्वच्छ दोनों की छटावाले होने से पुष्पदन्त भी नाम है जिनका ऐसे भगवान को ॥९॥
તથા ચંદ્રસમાન કાન્તિવાળા અથવા જ્યારે તે ગર્ભમાં હતા ત્યારે તેમની માતાને ચંદ્રપાન કરવાનું દેહલેા થયેલું તે કારણથી ગુણુ-નિષ્પન્ન नाभશાળા શ્રી ચંદ્રપ્રભ ભગવાનને ૫ ૮ ॥
આદિથી પ્રાણી પૂ
સારા અનુષ્ઠાનવાળા, અથવા જેના દર્શન સ્મરણુ ભાગ્યવાન થાય છે એવા, અથવા જ્યારે તે ગર્ભમાં હતા ત્યારે તેમની માતા સ`વિધિએક બ્લેમાં વિશેષ નિપુણ થયા આ કારણથી પુષ્પસમાન સ્વચ્છ દાંતની પંકિતવાળા હેાવાથી “ પુષ્પદન્ત मेवा भगवानने ॥ ५॥
66
"
સુવિધિનાથ અથવા
નામ પણ છે જેનું
१- 'बंदामि' अत्र माकृतत्वात्परस्मैपदम् ।
""
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आवश्यकसूत्रस्य सिजंस-वासुपुजं' च' शीतलश्च श्रेयांसश्च वासुपूज्यश्चेत्येतेषामितरेतरयोगद्वन्द्वे शीतल-श्रेयांस-वासुपूज्यास्तान् । तेष्वाधिव्याधिजसन्तापकलापनितान्तक्लान्तस्वान्तजन्तुजातकृते चन्द्रचन्दनादितोऽप्यपूर्वशीतलत्वात् , यद्वा शीतलशब्दस्य गुणवाचकस्लात् शीतं शैत्यं कषायप्रशमनस्वरूपं लाति आदत्त इति, अथवाऽस्य भगवतः पितुरेकदाऽतितीव्रः पित्तज्वरदाहः सञ्जातः स विविधैरुपचारैः कृतैरपि न शान्ति प्राप्तः,-गर्भगते त्वस्मिन् भगवति देव्याः करकमलस्पर्शमात्रेणैवोपशान्त इति मातद्वारा पितृवरदाहपशमनहेतुत्वात् शीतलस्तम् (१०)। सिज्जंसं श्रेयांसम्सकलभुवनहिताधायकत्वादतिशयेन प्रशस्यः='श्रेयान् ; यद्वा श्रेयांसावंसौ-स्कन्धौ यस्य सः, अथवैतत्पितू राज्ञः पितृपरम्परामाप्तायां कस्याश्चिच्छय्यायां
आधि-व्याधि से होने वाले समस्त सन्तापों को मिटाकर प्राणियों को चन्द्रमा चन्दन आदि से भी अधिक शीतल शान्ति को, या कषाय के उपशमरूप शीतलता को देने वाले, अथवा जब ये गर्भ में थे तो इनकी माता के कर-कमल का स्पर्श होते ही पिता का असाध्य दाहज्वर इनके प्रभाव से उपशान्त हुआ इस कारण 'शीतलनाथ' नाम वाले भगवान को ॥१०॥
तीन लोक के हित करने वाले, अथवा इनके पिताके यहाँ पितृपरम्परासे प्राप्त एक शय्या देवाधिष्ठित थी, जिससे उस पर
આધિ-વ્યાધિથી થવાવાળા તમામ સંતાપને નિવારણ કરીને પ્રાણીઓને ચન્દ્રમા-ચંદન વિગેરેથી અધિક શીતલ શાંતિને અથવા તે કષાયની ઉપશમતા રૂપ શીતલતા આપવાવાળા અથવા જ્યારે તેઓશ્રી ગર્ભમાં હતા ત્યારે તેના પ્રભાવથી તેમની માતાના કર કમલને સ્પર્શ થતાંજ તેઓના પિતાને અસાધ્ય દાહજવર ઉપશાંત થયે એ કારણથી “શીતલનાથ” નામવાળા ભગવાનને ૧૦ |
ત્રણ લેકનું હિત કરનારા, અથવા તેમના પિતાને ત્યાં પિતૃપરંપરાથી પ્રાપ્ત એક શા દેવાધિષ્ઠિત હતી, જેથી તે શા ઉપર બેસવાવાળાને ઉપસર્ગ થતું હતું,
१-'सीयल........वासुपुज्जं च' अत्र सूत्रे आषत्वादेकवचनम् , यद्वा समाहाराभिप्रायेण ।
२- प्रशस्यशब्दादतिशयेऽर्थे 'द्विवचनविभज्योपपदे तरबीयसुनौ' (५ । ३ । ५७) इतीयमुनि 'प्रशस्यस्य श्रः' (५। ३ । ६०) इति प्रशस्यशब्दस्य श्रादेशः, श्रेयांसेत्यदन्तत्वं तु पृषोदरादित्वात् ।
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मुनितोषणी टीका देवाधिष्ठितत्वेन यः कश्रन पुरोपविशति तमुपसर्गों बाधते स्म, गर्भस्थे स्वस्मिन् भगवति मातुस्तच्छय्योपवेशदोहदे जाते तदुपर्युपवेशमात्रेणैव देवोपद्रवो विनष्ट इतीदृशश्रेयोमूलत्वाच्छ्रेयांसस्तम्' (११)। 'वासुपुजं' २वसवः मुनयः-साध. वस्त एव वासवस्तेषां पूज्यो वासुपूज्यः, यद्वा वमनिरत्नानि तानि चात्र सम्यग्ज्ञानदर्शनचारित्राणि, तान्येव वानि, तत्पकाशकत्वात्पूज्यो वासुपूज्यः, अथवा गर्भस्थेऽस्मिन् भगवत्यस्य जननी वासवेन=देवेन्द्रेण भृशं वन्दन-नमस्काराभ्यां पूजिताऽभूत्तेन वासुपूज्यस्तम् (१२)। 'विमलं' विगतं सर्वथा नष्टं मलं= कर्ममलं यस्य, यद्वा विशेषेण मलतेधारयति दुर्गतिगर्ते पिपतिषून् भव्यान् यः बैठनेवाले को उपसर्ग होता था, किन्तु भगवान गर्भ में थे तब उस शय्या पर उनकी माता के बैठते ही देवकृत उपसर्ग नष्ट हो गया, इस प्रकार श्रेय (कुशल) करने वाले श्री श्रेयांसनाथ को ॥११॥
__ मुनियों के पूज्य, या रत्नत्रयरूप वसु-सम्पत्ति के प्रकाशक अथवा जब ये गर्भ में थे तब इनकी माता इन्द्र के द्वारा वारवार सम्मानित हुई, ऐसे यथार्थ नामवाले श्री वासुपूज्य भगवान को ॥ १२ ॥
जिनका कर्ममल सर्वथा नष्ट हो चुका है, या जो दुर्गति में गिरते हुए प्राणियों को धारण करनेवाले, निर्मल स्वरूप वाले, પરંતુ ભગવાન ગર્ભમાં હતા ત્યારે તે શય્યા પર તેમની માતા પિતે બેઠાં કે તુરતજ દેવકૃત ઉપસર્ગ નાશ થઈ ગયે, એ પ્રમાણે શ્રેય (કુશળ) કરવાવાળા " श्री श्रेयांसनाय "ने ॥ ११ ॥
મુનિઓનાં પૂજ્ય, અથવા રત્નત્રય રૂ૫ વસુ-સંપત્તિના પ્રકાશક, અથવા ત્યારે તેઓ ગર્ભમાં હતા ત્યારે તેમની માતા ઈન્દ્ર વડે વારંવાર સન્માન પામી सेवा यथार्थ नामा " श्री वासु५न्य " भगवानने ॥ १२ ॥
જેને કમલ સર્વથા નષ્ટ થઈ ગયે, અથવા જે દુર્ગતિમાં પડતા પ્રાણીઓને ધારણ કરવાવાળા, નિર્મલ સ્વરૂપવાળા, અથવા ગર્ભમાં આવવા
१- 'श्रेयांसः' सिद्विरुक्तैव निरुकवृत्त्या वा बोध्या ।
२- 'वसुः साधुः' इति शब्दरत्नावलीति शब्दकल्पद्रुमः । ३- 'वासुपूज्यः'-अस्मिन् व्युत्पत्तित्रयेऽपि वासुशन्दसिदिः पृषोदरादित्वात् ।।
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आवश्यकमुत्रस्य
स त्रिमल, अथवा विमलस्वरूपत्वाद्विमलः अपि वा गर्भस्थस्यास्य जनन्यास्तजुर्मतिश्च विमला सञ्जातां तद्द्योगाद्विमलस्तम् (१३) । 'अनंत' मोक्षाधिकरणक निरवधिस्थितिकत्वात् अविद्यमानोऽन्तो=नाशो यस्यासावनन्तः, यद्वा अनन्तानि ज्ञानदर्शनादीनि तद्धेतुत्वादनन्तः, कारणे कार्योपचारात्, अपि वाऽनन्तस्वरूपत्वादनन्तः । अथवा गर्भस्थस्यास्य भगवतो माता स्वप्नेऽनन्ताकारां मालामद्राक्षी नानन्तस्तम् (१४) । ' जिणं' जिनम्, प्राग्व्याख्यातो जिनशब्दार्थः । 'धम्मं ' दुर्गतौ प्रपततो जन्तून् धारयतीति धर्मः, यद्वा कारणे कार्योपचाराच्तचारित्रादिरूपस्य धर्मस्य प्ररूपकतया धर्मस्वरूपत्वाद्वा, अथवा गर्भस्थेऽस्मिन् भगवति जनन्या दानादिरूपे धर्मे दृढा मतिरुदिना तद्योगाद्धर्मस्तम् (१५) । अथवा गर्भ में आने पर जिनकी माता की बुद्धि निर्मल हो गई, ऐसे यथानाम तथागुण वाले 'श्री विमलनाथ' को ॥१३॥
अविनाशी पद (मोक्ष) को प्राप्त करनेवाले, अनन्त ज्ञान अनन्त दर्शन आदि आत्मिक गुणों के दाता, अथवा गर्भ में आने पर जिनकी माताने स्वप्न में अनन्त आकारवाली रत्नमाला को देखा अतएव यथार्थ नामवाले श्री अनन्तनाथ को ॥ १४ ॥
दुर्गति में पडते हुए जीवों के उद्धारक, श्रुत- चारित्ररूप धर्म के उपदेशक, अथवा गर्भ में आने पर जिनकी माता की बुद्धि दानादि धर्म में दृढ हुई, ऐसे सार्थक नाम वाले श्री धर्मनाथ को ॥१५॥ સાથેજ જેની માતાની બુદ્ધિ નિર્મૂલ થઈ ગઈ એવા યથાનામ તથાગુણવાળા " श्री विभसनाथ "ने ॥ १३ ॥
अविनाशी यह (मोक्ष) ने प्राप्त उरवावाणा, अनन्त ज्ञान,
અનન્તદન આદિ આત્મિક ગુણાના દાતા, અથવા ગભમાં આવતાં જ જેની માતાએ સ્વપ્નમાં અનન્ત આકારવાળી દેખી એટલા માટે યથા
નામવાળા
રત્નમાળા " श्री अनन्तनाथ "ने ॥ १४ ॥
દુર્ગતિમાં પડતા જીવાના ઉદ્ધારક, શ્રુત ચારિત્રરૂપ ધર્માંના ઉપદેશક, અથવા ગર્ભમાં આવવાથી જેની માતાની બુદ્ધિ દાનાદિ ધર્મને વિષે દૃઢ થઈ, એવા સાર્થક નામવાળા " श्री धर्मनाथ "ने ॥ १५ ॥
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मुनितोषणी टीका 'संति' शमयतिव्यपनयति कषायमिति 'शान्तिः, यद्वा कर्मसन्ततिसन्तापमालाऽऽकुलानां जनानां शान्तिकरणशीलत्वाच्छान्तिः, शान्तिस्वरूपखाद्वा शान्तिः, निराबाधमुक्तिरूपशान्तिहेतुत्वाद्वा, स्मरणेन भव्यजनाधिव्याधिशान्तिहेतुत्वाद्वा, अथवा बहोः कालाजनपदे वर्तमानस्य दुर्भिक्षरोगोपद्रवादेरस्मिन् भगवति गर्भागते सति शान्तिर्जाता तद्योगाच्छान्तिस्तम्, नामैकदेशेन नामग्रहणात्-'शान्तिनाथ'-मित्यर्थः (१६) । 'वंदामि' वन्दे-स्तौमि । 'कुंथु' कुन्थति=हिनस्ति कर्मशत्रुमिति, कुथ्नाति-मोक्षश्रियमालिङ्गतीति वा 'कुन्थुः, यद्वा कुं-पृथिवीम् उपलक्षणादबादिकं च स्तभ्नाति धारयति-रक्षतीति कुन्थुः षट्कायरक्षकमुनिगणः, तं सदोरकमुखवत्रिकाधारिणं भव्यजीवोपकारकं मोक्षमार्गप्रचारकं महत्यामनेक. कषायों के नाश करनेवाले, कर्मरूपी सन्ताप से संतप्त प्राणियों को शान्ति प्रदान करने वाले, शान्तस्वरूपी, जिनके स्मरण मात्रसे आधिव्याधि मिट जाती है ऐसे, अथवा गर्भ में आने पर दुर्भिक्ष तथा महामारी (मरकी) आदि की उपशान्ति हो गई, ऐसे अन्वर्थ नामवाले श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्र को मैं वन्दना करता हूँ ॥१६॥
कर्म-शत्रुओं का नाश कर मोक्ष को प्राप्त करनेवाले, अथवा गर्भ में आने पर जिनकी माताने स्वप्न में कुन्थु अर्थात् सदोरकमुखवस्त्रिकाधारी, भव्य जीवों के उपकारी, मोक्षमार्ग के प्रचारक
કષાયને નાશ કરવાવાળા, કર્મરૂપી સંતાપથી તપી રહેલા પ્રાણીઓને શાંતિ આપવાવાળા, શાન્તસ્વરૂપી, જેના મરણ માત્રથી આધિ-વ્યાધિ મટી જાય છે એવા, અથવા ગર્ભમાં આવતાં જ દુષ્કાલ તથા મરકી આદિ રોગ-ઉપદ્રની ઉપશાન્તિ થઈ ગઈ એવા યથાર્થ નામવાળા “ શ્રી શાંતિનાથ” જિનેન્દ્રને હું વંદન કરું છું ૧૬
કર્મશત્રુઓને નાશ કરીને મોક્ષને પામવાવાળા, અથવા ગર્ભમાં આવતાં જ જેમની માતાએ સ્વપ્નમાં કુન્થ એટલે દેરાસહિત મુખવસ્ત્રિકા બાંધનાર, મેક્ષમાર્ગના પ્રચારક, અનેક દેવ મનુષ્યની વિશાળ પરિષદમાં વિચિત્ર ધર્મોપદેશ દેનાર
१- 'शान्तिः अत्र बाहुलकात्कर्तरि किन् ।
२- 'कुन्थुः' भौवादिकादिसार्थकात् कुथि धातोः पक्षे क्रैयादिकात्संश्लेषणार्थकात् कुन्थधातोरौणादिक उपत्ययः ।
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आवश्यकमूत्रस्य देवमनुष्यपरिषदि विचित्रं धर्ममुपदिशन्तमेतस्मिन् गर्भस्थेऽस्य जननी स्वप्ने दृष्टवती तयोगात् कुन्थुस्तम् (१७)। ' अरं' अर्यते पाप्यते मोक्षो यस्मात्सोऽरः, यद्वाऽस्मिन् भगवति गर्भसमागतेऽस्य जननी स्वप्ने रत्नमयमरं (चक्राङ्गं) दृष्टवती तद्योगादरस्तम् (१८)। 'मल्लिं' मल्लते धारयति दुःखकूपे पततः पाणिन इति मल्लिः, यद्वा गर्भावस्थेऽस्मिन् भगवत्येतज्जनन्याः सञ्जातो मल्लीकुसुमदामशय्यादोहदो देवेन पूरितस्तद्योगान्मल्लिस्तम् , नामैकदेशेन नाम्नो ग्रहणान्मल्लिस्वामिनमित्यर्थः, 'वंदे' वन्दे (१९) । 'मुणिसुव्वयं' मन्यते मनुते वा परलोकायास्तिकतामिति मुनिः, सु-शोभनानि तानि यस्यासौ सुव्रतः, मुनितथा अनेक देव मनुष्यों की विशाल परिषद में विचित्र धर्मोपदेश करते हुए षटकायरक्षक मुनिवृन्द को देखा, ऐसे उन सगुण नामवाले श्री कुन्थुनाथ भगवान को ॥१७॥
मोक्ष प्राप्त कराने वाले, अथवा गर्भ में आने पर जिनकी माताने स्वममें रत्नमय पहिये के आरे देखे, उन गुणयुक्त नाम वाले श्री अरनाथ भगवान को ॥ १८ ॥
दुःग्वरूप कुएं में गिरते हुए प्राणियों की रक्षा करने वाले, अथवा गर्भ में आने पर जिनकी माता के मल्ली-मालती फूलमाला की शय्या के दोहद (दोहले) को देवताने पूरा किया, ऐसे गुणसम्पन्न नाम वाले श्री मल्लीनाथ भगवान को ॥१०॥
श्रेष्ठ चारित्र को पालने वाले, अथवा जिनके शासन काल એવા છે કાયના રક્ષક મુનિર્વાદને જોયું, એવા સગુણ નામવાળા “શ્રી કુષ્ણુનાથ” ભગવાનને છે ૧૭૫
મેક્ષ પ્રાપ્ત કરાવવાવાળા અથવા ગર્ભમાં આવતાં જ જેની માતાએ સ્વપ્રમાં રત્નમય પડાને આરે છે. એવા ગુણયુક્ત નામવાળા “શ્રી અરનાથ ભગવાનને કે ૧૮ ૫
:ખરૂપ કુવામાં પડતા પ્રાણુઓની રક્ષા કરવાવાળા, અથવા ગર્ભમાં આવતાં જ જેની માતાને મહુલી-માલતી ફૂલમાળાની શયાના દેહદ (દેહલા) ને દેવતાએ પૂર્ણ કર્યો એવા ગુણસંપન્ન નામવાળા “શ્રી મલ્લીનાથ” ભગવાનને ૧લા
શ્રેષ્ઠ ચારિત્રનું પાલન કરવાવાળા, અથવા જેના શાસન કાલમાં નિરતિચાર
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मुनितोषणी टीका
१३५ थासौ सुव्रतश्च मुनिसुव्रतः, यद्वाऽस्य शासनकाले मुनयो निरतिचारेण शोभनव्रतशालिनो जाता इति कालिकांदिसम्बन्धेन, अथवा गर्भस्थेऽस्मिन् भगवत्येतजननी मुनिवत्सुव्रता जाता तद्योगान्मुनिसुव्रतस्तम् (२०)। 'नमिजिणं' नमयति तिरस्करोति कर्मशत्रूनिति नमिः, यद्वा गर्भप्राप्तेऽस्मिन् भगवति, एतत्मभावैः सर्वे परनरपतयो नमितास्तद्योगान्नमिः, स चासौ जिनश्च नमिजिनस्तम् (२१)। 'वंदामि' वन्दे 'रिटनेमि' अरिष्टम् अशुभमुपद्रवं वा नमयति अधःकरोतीति, जातमात्रः सन्नरिष्टं 'मृतीगृहं तात्स्थ्यात्मृतीगृहस्थितजनान् अनमयत्नतशिरमें निरतिचार चारित्र पालनेवाले बहुत मुनि हुए, अथवा जब ये गर्भ में आये तब उनकी माता मुनिके समान सुव्रता हुई इस कारण 'मुनिसुव्रतनाथ' नाम वाले भगवान को ॥२०॥
कर्म शत्रुओं को जीतने वाले, या जब ये गर्भमें थे तो अन्य सभी विमुख राजगण नम्र हो गये (झुक गये) अत एव यथार्थ नाम वाले श्री नमिजिन को मैं वन्दना करता हूँ ॥२१॥
अशुभ तथा उपद्रवों को दूर करनेवाले, अथवा जिनके जन्म लेते ही उस समय अरिष्ट-प्रसूतिगृह (सौर-सुवावड का घर) में स्थित समस्त मनुष्यों के सिर मुक गये, या जो सारे संसार ચારિત્ર પાલન કરનારા ઘણાજ મુનિ થયા, અથવા જ્યારે તે ગર્ભમાં આવ્યા ત્યારે તેમની માતા મુનિના સમાન સુવ્રતા થઈ એ કારણથી “મુનિસુવ્રતનાથ” નામવાળા ભગવાનને ૨૦
કર્મ શત્રુઓને જીતવાવાળા, અથવા જ્યારે ગર્ભમાં હતા ત્યારે સર્વ અણનમ રાજાગણે નગ્ન થઈ ગયા (ઝુકી ગયા) એ કારણથી યથાર્થ નામવાળા “શ્રી નમિનાથ” ભગવાનને વંદના કરૂં છું . ૨૧
અશુભ અથવા ઉપદ્રવને દૂર કરવાવાળા, અથવા જેને જન્મ થતાં જ એટલે જન્મ સમયે અરિષ્ટ પ્રસૂતિ ગૃહ (સુવાવડનું ઘર)માં રહેલા તમામ માણસેનાં શિર-મસ્તક નમી પડયાં (ઝુકી ગયાં) અથવા જેઓ સકલ સંસારનું અરિષ્ટ
१- 'अरिष्टं मूतिकागृह'-मित्यमरः, 'अरिष्टं मूत्यागारेऽन्तचिह्ने तक्रे शुभेऽशुभे' इति हैमः ।
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आवश्यकसूत्रस्य स्कानकरोत् स्वतेजसेति, अरिष्टं='शुभं (कल्याणम् ) अर्थाजगतो नयतिापयतीति निरुक्तवृत्या वा अरिष्टनेमिः, यद्वाऽस्य गर्भस्थस्य माता म्वप्नेऽरिष्ट (रत्न) मयी नेमिरथचक्रमान्तभागं दृष्टवती तद्योगादरिष्टनेमिस्तम् (२२)। 'पास' पश्यति लोकालोकस्वरूपमिति पार्थः, पृषोदरादित्वात् ; भविजनविघ्नवल्लीसमुच्छेदार्थ प समूहतुल्यखात्पाः , यद्वाऽस्मिन् भगवति गर्भस्थे कदाचिद्रात्रौ निर्वाणे प्रदीपेऽस्य जननी राजपार्थे सामायान्तं सर्प गर्भज्योतिःप्रभावेणाऽऽलोक्य राजानं सचेतीकृतवती, राजा च प्रज्वाल्य प्रदीपं दृष्ट्वा च पार्थे समागतं सर्प विस्मिस्य गर्भप्रभावं निश्चिकायेत्यन्धकारेऽपि निजमातृकर्तकपितृपार्श्वसमागतसर्पकर्मकदर्शनहेतुत्वात्पार्थस्तम् (२३) । 'तहा' 'तथा' बद्धमाणं च' वर्द्धते ज्ञानाका अरिष्ट-कल्याण करने वाले, अथवा जब ये गर्भ में थे तो माताने स्वपमें पहिये की अरिष्ट-रत्नमयी-नेमि (पुठ) को देखा इस कारण जिनका नाम 'अरिष्टनेमि' पडा, ऐसे बाईसवें तीर्थङ्कर को ॥२२॥
लोकालोक के यथार्थ स्वरूपको जानने वाले, या भक्त जीवों की विघ्नलता को विनाश करने के लिए कुठार के समान, अथवा जब ये गर्भ में थे तब किसी रातमें दीपक के बुझ जाने पर इनकी माताने राजाके पार्श्व-पसवाडे के पास आते हुए सर्प को गर्भ के तेजसे देखकर राजाको सावधान किया, इस प्रकार 'पार्श्व' पद के सम्बधसे 'श्री पार्श्वनाथ' नामवाले भगवान को ॥२३॥ और
ज्ञानादि गुणों से वर्द्धमान (बढनेवाले) या अनन्त काल से કલ્યાણ કરવાવાળા અથવા જ્યારે તેઓ ગર્ભમાં હતા ત્યારે માતાએ સ્વમમાં પેડાની અરિષ્ટ-રત્નમયી નેમિ (પૂંઠને) જોઈ. એ કારણથી જેનું નામ “અરિષ્ટનેમિ, પડયું, એવા બાવીસમાં તીર્થકરને કે ૨૨ છે
લે કાલેકના યથાર્થ સ્વરૂપને જાણવાવાળા, અથવા ભવ્ય જીની વિપ્નલતાને વિનાશ કરવા માટે કુઠાર જેવા, અથવા જ્યારે તેઓ ગર્ભમાં હતા ત્યારે કઈ રાત્રિમાં દીપક બુઝાઈ જતા તેમની માતાએ રાજાના પાર્ષ—પસવાડાની નજદીક આવતા સપને ગર્ભના તેજથી જોઈને રાજાને સાવધાન કરી દીધા. એ કારણથી પાર્શ્વ પદના સંબંધથી “શ્રી પાર્શ્વનાથ” નામવાળા ભગવાનને છે ૨૩ !
જ્ઞાનાદિ ગુણેથી વિદ્ધમાન (વધવાવાળા) અથવા અનંત કાલથી સંસાર સમુ१- 'अरिहं तु शुभाशुभे' इत्यमरः ।
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सुनितोषणी टीका
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दिनेति, यद्वा, वर्द्धते == =अन्तर्भावितण्यर्थत्वाद् वर्द्धयति भव्यानामनन्तकालतः पर्य
तां ज्ञानादिगुणमिति, गर्भशय्यास्थितेऽस्मिन् भगवति ज्ञातकुलं धनधान्यादिभिवर्द्धतेति वा बर्द्धमानस्तम् (२४), चः = अप्यर्थकः, वर्द्धमानमपीत्यर्थः, पूर्वोकेन 'वंदामि' इत्यनेनान्त्रय इत्युक्तमेव । अभिवन्द्योपसंहरन्नाह - ' एवं ' इत्यादि,
एवम् = उकप्रकारेण, 'मए' मया 'अभिथुया' अभि= सर्वतो भावेन स्तुताः = 1अभिष्टुताः नामनिर्देशपूर्वकं यथाविधि स्तुतिविषयीकृता इत्यर्थः, 'वियरयमल्ला' विशेषेण धृते विधूते, रजश्व मलं च रजोमले, विधृते रजोमले यैस्ते विधूतरजोमला:; तत्र रजः = बध्यमानं ज्ञानावरणीयादिरूपमीर्यापथरूपं वा कर्म, मलं= पूर्वबद्धनिकाचित - साम्परायिकरूपम्, यद्वा रज इवाऽऽवारकत्वाद्रजः = ज्ञानावरणीयादिकर्म तदेव मलं रजोमलं, विधूतं =क्षालितं रजोमलं यैस्ते विधूतरजांमलाः | 'पहीणजरमरणा' जीर्यन्ति = शिथिलीभवन्त्युत्थानादीनि संसार समुद्र में गोते खाते हुए प्राणियों के ज्ञानादि आत्मिक गुणों को बढानेवाले, अथवा जब ये गर्भमें आये तब ज्ञातकुल धन धान्य हिरण्य सुवर्णादि से परिपूर्ण हुआ अतएव गुणनिष्पन्न नामवाले ' श्री वर्द्धमानस्वामी' को मैं वन्दना करता हूँ ॥ २४ ॥
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गुणोत्कीर्त्तन करके उपसंहार करते हैं
इस प्रकार मुझसे अलग२ नामनिर्देशपूर्वक स्तुति किये गये, जो ज्ञानावरणीयादि बध्यमान कर्मोंका तथा निकाचित-साम्परायिकरूप पूर्वबद्ध कर्ममल का नाश करने वाले और चेष्टाविशेष रूप उत्थान, માં ગોથાં ખાતા પ્રાણીઓના જ્ઞાનાદિક આત્મિક ગુણેાને વધારનારા, અથવા જ્યારે તેઓ ગર્ભમાં આવ્યા ત્યારે સાતકુલ ધન ધાન્ય हिरएयસુવર્ણાદિકથી પરિપૂર્ણ થયું એ કારણથી गुणु-निष्यन्न-नाभव મવાળા “ શ્રી વમાન સ્વામી ” ને હું વ ંદના કરૂં છું ॥ ૨૪ ૫
ગુણેાત્કીન કરીને ઉપસંહાર કરે છે.
આ પ્રમાણે મારાથી જૂદા જૂદા નામનિર્દેશપૂર્વક સ્તુતિ કરવામાં આવેલ, જેએ જ્ઞાનાવરણીયાદિ બાંધેલા કર્મોના તથા નિકાચિત-સામ્પરાયિક રૂપ પૂર્વીબદ્ધ કમલના
१ - ' अभिष्टुता ः ' - ' उपसर्गात्सुनोती 'ति षत्वे 'ष्टुना ष्टु' - - रिति दुस्वम् ।
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आवश्यकमुत्रस्य
(अत्राऽऽदिपदेन चेष्टाविशेषः,
कर्म-वल- - वीर्य - पुरुषकार - पराक्रमा गृह्यन्ते, तत्र उत्थानं= कर्म = भ्रमणादिक्रिया, बलं शरीरसामर्थ्यम्, वीर्य = जीवमभवं, पुरुषकारः = अभिमानविशेषः, पराक्रमः = स्वाभीष्टकर्म साधनशक्तिविशेषः ) यया सा, यद्वा जरणं=त्रयोढानिर्जरा, मरणं पाणविनिर्गमापरपर्याय आयुष्य नाशः, जरा च मरणं च जरामरणे, प्रहीणे=प्रणष्टे जरामरणे येषां ते तथाभूताः, ' चउवी संपि चतुर्विंशतिरपि, अपिशब्दः पूर्ववदवधारणार्थी महाविदेहस्थभगवद्ग्रहणार्थश्च । ' जिणवरा' जिनेषु = अवधिज्ञान्यादिषु वराः = श्रेष्ठाः । सामान्य केवलिनोऽपि जिनवराः संभवन्ति तद्वारणायाह- 'तित्थयरा' तीर्थकराः । 'मे' मम उपरीत्यस्याध्याहारः । 'पसीयंतु' प्रसीदन्तु = प्रसन्ना भवन्तु ॥ ५ ॥ 'कित्तिय - बंदिय- महिया' कीर्तिताश्च वन्दिताश्च महिताश्वेति द्वन्द्वः, तत्र कीर्त्तिताः = ततन्नामनिर्देशेनैककशः कथिताः, वन्दिताः = वामनः काययोगैर्गुणसंभ्रमणादिरूप कर्म, शरीरमामर्थ्यरूप बल, जीव सम्बन्धी वीर्य, 'मैं इस कार्य को सिद्ध करूँगा ' इस प्रकार अभिमान विशेषरूप पुरुषाकार, तथा अभीष्ट सिद्ध करने का शक्तिविशेषरूप पराक्रम, इन सबका नाश करनेवाली वृद्धावस्थारूप जरा और मरण का विनाश करनेवाले, केवलियों में श्रेष्ठ उपर्युक्त चौवीस तीर्थकर हैं वे, तथा अपि शब्द से महाविदेह क्षेत्रमें रहे हुए तीर्थकर मुझ पर प्रसन्न हों |
किन्तिय' पृथक २ नाम से कीर्त्तित, ' वंदिय ' - मन वचन काय से स्तुत, 'महिय - ज्ञानातिशय आदि गुणों के कारण सब નાશ કરવાવાળા અને ચેષ્ટાવિશેષરૂપ ઉત્થાન, ભ્રમણાદિ રૂપ ક, શરીર સામ'રૂપ બલ, જીવ સમ્બન્ધી વીર્ય, “હું આ કાર્યને સિદ્ધ કરીશ” એ પ્રમાણે અભિમાન વિશેષરૂપ પુરૂષાકાર, તયા અભીષ્ટ સિદ્ધ કરવાની શકિતવિશેષરૂપ પરાક્રમ, એ સર્વને નાશ કરવાવાલી વૃદ્ધાવસ્થારૂપ જરા અને મરણને નાશ ४२वावाजा, ठेवलीयोमा श्रेष्ठ उपर डेला थोपीस तीर्थ ५२ छे ते, तथा 'अपि' શબ્દથી મહાવિદેહ ક્ષેત્રમાં રહેલા તી કરે મારા ઉપર પ્રસન્ન થાએ ?
4
'कित्तिय' भूहा - भूहा नाभथी डीर्तित, 'बंदिय' स्तुति रामेला, 'महिय' ज्ञानातिशय माहि गुना
मन, वचन मने आयाथी रथे सर्व आशीमोथी
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मनितोषणी टीका स्तवकरणात्सम्यकस्तुताः, महिताः महद्भिानादिगुणैः कृत्वा सर्वैराहताः, यद्वा महिताः पूजिताः-सादरं प्रशंसिता इन्द्रादिभिरित्यर्थः, कीर्तिताः मनसा गुणचिन्तनरूपेण, वन्दिताः वचसा स्तुताः-वदिधातोः स्तुतिपरत्वात् , महिताः कायेन इन्द्रादिभिः शरीरावनमनकरणेन नमस्कृताः इति हृदयम् ,
'पुष्पादिभिः पूजिताः' इति केषाश्चिद्व्याख्यानमशोभनम सावधपूजाया हिंसामधानत्वेन वीतरागाणां तदसंभवात्तस्याः मृत्रेऽनभिधानाच, 'मह पूजायाम्' इत्यत्र पूजायामित्यविशिष्यत्रोक्तमस्ति; ततश्च महितः पूजित इत्यायाति, नैतावता प्राणियों से सम्मानित, अथवा इन्द्रादिकों से सादर प्रशंसित जो ये रागद्वेष आदि कलङ्क से रहित होने के कारण तीनों लोक में उत्तम सिद्ध अर्थात् कृतकृत्य हैं वे मुझे आरोग्य-सिद्धस्वरूप की प्राप्ति के लिये जिनधर्मकी रुचिरूप बोधिका लाभ और उत्तमोत्तम समाधि देखें।
किसीने यहां 'कित्तिय-वंदिय-महिया 'इम पदमें रहे हुए 'महित' का अर्थ 'पुष्प आदि से पूजित' किया है किन्तु वह सर्वथा असंगत है, क्यों कि पुष्पादि सावद्य द्रव्यों से की हुई पूजा हिंसाप्रधान होने के कारण ऐसी पूजा वीतरागों की नहीं हो सकती और शास्त्र में कहीं ऐसा उल्लेख भी नहीं है । 'मह पूजायाम्'इस धातु से 'महित' बनता है जिसका अर्थ सामान्यतः 'पूजित' यही हो सकता है, उससे 'पुष्पादिपूजित' अर्थ करना केवल સન્માનિત, અથવા ઈન્દ્રાદિકોથી સાદર પ્રશંસા પામેલા જે એ રાગ-દ્વેષ આદિ કલાકથી રહિત હોવાના કારણે ત્રણેય લેકમાં ઉત્તમ સિદ્ધ અર્થાત્ કૃતકૃત્ય છે તે મને આરોગ્ય – સિદ્ધસ્વરૂપની પ્રાપ્તિ માટે જિન ધર્મની ચિ-રૂપ બેધિને લાભ અને ઉત્તમત્તમ સમાધિ આપે ?
२ ॥ स्यले 'कित्तिय-वंदिय-महिया' मा ५६मा २७सा 'महित' ને અર્થ “પુષ્પ આદિથી પૂજિત કરે છે, પરંતુ એ અર્થ સર્વથા અસંગત છે. કારણ કે પુષ્પાદિ સાવધ દ્રવ્યોથી કરેલી પૂજા હિંસાપ્રધાન હોવાથી તે પૂજા વીતરાગની હોઈ શકે નહિ તેમજ શાસ્ત્રોમાં એ ઉલ્લેખ પણ મળતું નથી, 'मह पूजायां' मा धातुथी 'महित' ने छ भने अर्थ सामान्यत: 'पूलित' 45 શકે છે, તેનાથી “પુષ્પાદિપૂજિત અર્થ કરે તે કેવલ ક૯૫ના માત્ર છે,
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आवश्यकसूत्रस्व पुष्पादिभिरेव पूजनमिति शक्यते वक्तुं, तथा सति महच्छब्दस्यापि तथास्वापतेः। न चास्तु का नो हानिरिति वाच्यम्, एवं सति 'महाबाहुर्महाशयः' इत्यादावपि 'पुष्पादिपूजितबाहुमान्' 'पुष्पादिपूजिताऽऽशयवान्' इत्यसतार्थापत्तेः, पूजार्थकमहधातुनिष्पन्नमहच्छब्दस्य तत्र तत्रापि सत्त्वात् , न च 'विनिगमनाविरहात्पुष्पादिपूजनमप्यर्थः स्यादित्युट्टङ्कनीयं, वीतरागाणां सावधपूजाऽनौचित्यरूपाया विनिगमनाया अनुपदमुक्तत्वात्, कित्रैवं भवदाग्रहे 'महामोहं पकुबई' (दशा० स्कं) 'महावाए व वायंते' (दशवै०) 'महामुमिणं पासित्ताणं पडिकल्पनामात्र है, क्यों कि ऐसा माननेसे जो जो शब्द मह धातु से बनते हैं उन सब जगहों में पूर्वपक्षी के कथनानुसार 'पुष्पादि से पूजन' रूप अर्थ मान लेने पर 'महाबाहु, महाशय' आदि शब्दों के भी 'पुष्पादि से पूजित भुजावाले' 'पुष्पादि से पूजित आशयवाले' आदि अनिष्ट अथे होने लगेंगे। यदि कहें कि-'किसी अर्थविशेष का निश्चय न रहने के कारण 'मह धातु' के 'विशाल' 'उदार' आदि अर्थ की तरह' पुष्पादिपूजनरूप' भी अर्थ ले सकते हैं तो इसका उत्तर पहले ही दे चुके हैं कि-'वीतरागों के सावच पूजन का न होना ही पुष्पादिपूजनरूप अर्थके न होने में नियामक है, और ऊपर लिखी हुई संस्कृत टीका में दिखलाये हुए महामोहं.'
आदि स्थलों में तथा अन्यत्र भी जहां कहीं 'मह' धातु का प्रयोग કેમકે એ પ્રમાણે માનવાથી જે શબ્દ મદ્ ધાતુથી બને છે તે સર્વ સ્થળે પૂર્વપક્ષીના કહેવા પ્રમાણે “પુષ્પાદિથી પૂજન રૂ૫ અર્થ માની લેવાથી “મહાબાહુ, મહાશય આદિ શબ્દને પણ “પુષ્પાદિથી પૂજિત ભુજાવાળા,” “પુષ્પાદિથી પૂજિત આશયવાળા વગેરે અનિષ્ટ અર્થ થવા મંડશે. જે કહેશે કે “કઈ અર્થ વિશેષને निश्चय नहि रवाना रणे 'मह' धातुन विशाल, GER' मा अय प्रमाणे 'Yount પૂજનરૂપ પણ અર્થ લઈ શકાય છે. તે તેને ઉત્તર પ્રથમજ આપી ચૂકયા છીએ કે “વીતરાગ ને સાવદ્ય પૂજન ન થવુંજ પુષ્પાદિપૂજનરૂપ અર્થ નહિ डाइ १४१। भाटे नियम छे. अने ५२ समेटी सत्त रीमा मतावेल 'महामोर्ड' આદિ સ્થળોમાં તથા બીજા સ્થળે પણ જે ઠેકાણે “મર' ધાતુને પ્રવેગ આવે છે
१-एकतरपक्षपातिनी युक्तिपिनिगमना तस्या विरहोऽभावस्तस्मात् ।
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मुनितोषणी टीका
१४१ बुद्धा' 'महाणुभावेस महापरक्कमेसु' (म. कृ. २ अ. २) 'सविकारात्मधानात्तु महत्तत्त्वं प्रजायते । महानिति यतः ख्यातिलोंकानां जायते सदा ॥१॥ अहङ्कारश्च महतो जायते मानवर्द्धनः॥' (म. पु.)। 'प्रकृतेमहान् महतोऽहकारोऽहकारात्पञ्चतन्मात्राणि' (सांख्यमूत्र)। 'प्रकृतेर्महाँस्ततोऽहङ्कारस्तस्मादगश्च षोडशकः (सांख्यतत्वकौमुदी)। 'द्रव्यपत्यक्षे महत्वं समवायसम्बन्धेन कारणम्' (न्या. सि. मु.) इति दर्शनान्तराणि । 'शुद्रास्यात्पादजो दासो प्रामकटो महत्तरः।' (त्रि. शे.), 'रणपण्डितोऽग्यविबुधारिपुरे कलहं स राममहितः कृतवान् ।' (भट्टिका० १० स.), 'विशङ्कटं पृथु बृहद्विशालं पृथुलं महत्' (अ. को.), इत्यादीनि च न सङ्गच्छन्ते । 'जे ए' ये एते, 'लोगस्स' 'लोकस्य, निर्धारणे षष्ठी तेन लोकत्रयस्य मध्य इत्यर्थः । 'उत्तमा' उत्तमाः रांगद्वेषकर्म पङ्ककलङ्कसंवन्धराहित्यात् श्रेष्ठाः । 'सिदा' सिद्धाः कृतकृत्यत्वादग्धभवबीनाङ्करत्वाच्च । 'आरुग्गवोहिलाभ' रुजति–पीडयतीति रोगो जन्मजरामरणादिरूपोऽत्र; अविद्यमानो रोगो येषां ते-अरोगाः सिद्धास्तेषां भाव आरोग्य=सिद्धत्वम् बोधिः निखिलभवबन्धनपतिकूला परमार्थावबोधहेतुभूता जिनमणीतप्रवचनरुचिस्तस्या लाभो बोधिलाभः, आरोग्याय=सिद्धस्वरूपाय बोधिलाभः =आरोग्यबोधिलाभस्तम् , यद्वा-आरोग्य=निरुपद्रवम् = उपवाभावस्तेन बोधिलाभस्तम् । 'आरोग्याय' इत्यत्र च फलेभ्यो यातीत्यादिवत् 'क्रियाओंपपदस्य च कर्मणि स्थानिनः ' (२।३।१४) इति चतुर्थी; तेन सिद्धत्वं प्राप्तुं बोधिलाभ इति निष्कर्षः । अयं च बौधिलाभोऽनिदानात्मक एव मोक्षप्राप्तिहेतुन तु
आता है 'पुष्पादिसे पूजन' रूप अर्थ कहीं नहीं लिखा है, अतएव यह निर्विवाद सिद्ध हुआ कि 'महित' अर्थात् ज्ञानातिशय आदि गुणों से सम्मानित अथवा इन्द्रादि से सादर प्रशंसित ।
___'निदान (नियाणा) रहित ही बोधिलाभ मोक्ष का कारण ત્યાં “પુષ્પાદિથી પૂજન” રૂપ અર્થ કરેલ નથી એટલા માટે નિર્વિવાદ સિદ્ધ ययु : 'महित' अर्थात् ज्ञानातिशय Ale गुथी सन्मानित मयान्या સાદર પ્રશંસા પામેલા. ___ 'निदान' (निय.) हित Man मोक्षनु ॥२५ छ मे पात अभ
१-'जे ए'-(ये एते) अत्राऽऽर्षत्वादेकारलोपः।। २- लोकस्य-आर्षत्वादेकवचनम् 'अचोऽन्त्यादि टी'-त्यादिवत् ।
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आवश्यक सूत्रस्य
सनिदानात्मकोऽत आह- 'समाहिवरं ' इति, समाधानं समाधिः = रत्नत्रयोषलब्धिः । अयं च समाधिद्रव्यभावभेदाद्विविधस्तत्र द्रव्यसमाधिः = शरीरादिसौख्यात्राप्तिः, भावसमाधिस्तु रत्नत्रयोपलब्धिस्तयोर्द्रव्यसमाधिव्यावृत्यर्थं वरपदमाह - वरश्वासौ समाधिश्चेति विग्रहः, यद्वा समाध्योर्वरः समाधित्ररस्तम्, समाधित्ररश्च भावसमाधिरेव स च सम्यग्ज्ञानादिरत्नत्रयप्राप्तिस्वरूप इति तदानीम निदान बोधिलाभस्योदयात् सनिदानबोधिला भव्यवच्छेदः सम्यग्ज्ञानादिरत्नत्रयप्राप्तिर्हि मोक्षसाक्षात्कारणमतस्तस्यां वेलायां सनिदान बोधिलाभो पक्षयादनिदानबोधिलाभो जायते । समाधित्ररोऽपि जघन्यादिभेदैरनेकविधस्तस्मादाहहै' इस बात को समझाने के लिए 'समाहिवरं' कहा है, समाधि भी द्रव्य-भाव भेदसे दो प्रकार की है, उनमें से शरीरादि सुख की प्राप्ति रूप द्रव्यसमाधि को हटा कर केवल रत्नत्रय प्राप्तिरूप भावसमाधि का ग्रहण करने के लिए 'वरं' पद दिया है अत एव सनिदान बोधिलाभ का निवारण हो गया, क्योंकि ज्ञानादि रत्नत्रय की प्राप्ति मोक्ष का साक्षात् कारण है, इसीलिए इस अवस्था में केवल अनिदान ( नियाणारहित) बोधिलाभ रहता है। भावसमाधि भी जघन्य आदि भेदों से अनेक प्रकार की है उनमें लववा भाटे 'समाहिवरं' हे छे, समाधि पशु द्रव्य-भाव लेहथी में प्रभारनी છે તેમાંથી શરીરાદિ સુખની પ્રાપ્તિ રૂપ દ્રવ્યસમાધિને હઠાવીને કેવલ રત્નત્રયીની પ્રાપ્તિરૂપ ભાવસમાધિનું ગ્રહ્મણુ કરવા भाटे 'बरं' यह खायेसु छे भेटला भाटे સનિદાન એધિલાભનું નિવારણ થઈ ગયું, કારણ કે જ્ઞાનાદિ-રત્નત્રયીની પ્રાપ્તિ મેાક્ષનું સાક્ષાત્ કારણ છે આ માટે એ અવસ્થામાં કેવલ અનિદાન (નિયાણુારહિત) મેધિલાભ રહે છે ભાવસમાધિ પણ જઘન્ય આદિ ભેદથી અનેક પ્રકારની
१ - समाधिः, सम् + आइपूर्वकात् 'घा' धातोः ' उपसर्गे घोः किः ' (पा. ३ । ३ । ८२ )' इति भावे किः प्रत्ययः, आतो लोप इटी' - स्याकारलोपः। २ - ' वरसमाधिः' पूर्वनिपातमकरणस्य 'समुद्राभ्राद्धः' (पा. ४ । ४ । ११८) इत्यादिनिर्देशच लेनाऽनित्यत्वाद्वरशब्दस्य पश्चात्प्रयोगः । अत्रत्यादिना 'लक्षण हेत्वोः क्रियायाः' (३ । २ । १२६ ) इत्यादीनां ग्रहणम् 1
३–' समाध्यांर्वरः ' अत्र सप्तमीतत्पुरुषः षष्ठीतत्पुरुषस्तु 'न निर्द्धारणे' (पा. २ । २ । १०) इति प्रतिषेधान्नात्र भवति ।
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मुनितोषणी टीका
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'उत्तमं' उत्तमं=सर्वोत्कृष्टम्, एतेन जघन्यमध्यमयोर्व्यवच्छेदः । 'दिंतु ' ददतु= वितरन्त्वित्यर्थः । नंदेसु निम्मलयरा' क्षालिताखिलकर्ममलत्वाच्चन्द्रेभ्यो निर्मलतमाः=चन्द्रापेक्षयाऽप्यतिशयितनैर्मल्यभाज इति भावः । ' आइचेसु अहियं पयासयरा ' मिथ्यात्वादितिमिरविनाशकात्युत्कृष्ट केवलाऽऽलोकेनाखिललोकालोकप्रकाशकत्वेनाऽऽदित्येभ्योऽप्यधिकं प्रकाशकराः । 'सागरवर गंभीरा ' सागरवरः=स्वयम्भूरमणसमुद्रस्तद्वद्गम्भीराः=
सागराः = समुद्रास्तेषु वरः =श्रेष्ठः परीषदादिसहनशीलत्वात्पशान्ततमाः, 'सिद्धा' सिद्धाः = साधिताखिला भीप्सिताः, 'सिद्धि' सिद्धि = निवृत्तिपदोपलब्धि 'मम' मयं 'दिसंतु' दिशन्तु ददत्वित्यर्थः ।
raft सिद्धानां वीतरागत्वेनाऽऽरोग्यबोधिलाभादिदायकत्वं न संघटते तथापि याचन्या भाषया भक्त्युद्रेकादेवमुच्यते इति न काऽपि क्षतिः । से जघन्य और मध्यम को हटाने के लिये 'उत्तम' पद दिया है | सकल कर्ममलों के हट जाने के कारण चन्द्रमासे भी अत्यन्त निर्मल, केवलज्ञानरूपी आलोक (प्रकाश) से संपूर्ण लोकालोक के प्रकाशक होने के कारण सूर्य से भी अधिक तेजवाले, तथा अनेक अनुकूल-प्रतिकूल परीषह - उपसर्ग के सहनेवाले होने से स्वयम्भूरमण समुद्र के समान सुगम्भीर सिद्ध भगवान मुझे सिद्धि (मोक्ष) देवें ॥ ७ ॥
सिद्ध भगवान वीतराग हैं अतएव यद्यपि किसीको आरोग्य बोधिलाभ आदि दे नहीं सकते तो भी भव्यों की उत्कृष्ट श्रद्धा छे, तेभांथी धन्य अने मध्यभने ाववा भाटे 'उत्तम' यह पे छे.
સકલ ક`મલ દૂર થઈ જવાના કારણે ચન્દ્રથી પણ અત્યન્ત નિર્મલ, કેવલજ્ઞાનરૂપી આદ્યાક-(પ્રકાશ)થી સંપૂર્ણ àકાલેકના પ્રકાશક હાવાના કારણે સૂર્યથી પણ અધિક તેજવાળા, તથા અનેક અનુકૂળ પ્રતિકૂળ પરીષહે ઉપસગે'નાં સહન કરવાવાળા હાવાથી સ્વયંભૂરમણ સમુદ્રના वान भने सिद्धि (मोक्ष) भो ॥७॥ સમાન સુગંભીરસિદ્ધ
लग
સિદ્ધ ભગવાન વીતરાગ છે. એ કારણથી જો કે કેઇને આરેગ્ય બેાધિલાભ આદિ આપી શકતા નથી તે પશુ ભવ્ય જીવેાની ઉત્કૃષ્ટ
શ્રદ્ધાથી આ પ્રકારની ३- 'चंदेसु' 'आइश्च्चेसु' अत्राऽऽर्षस्वास्पञ्चम्यर्थे सप्तमी ।
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आवश्यकसूत्रस्य ननु तावताऽपि याश्चाभङ्ग आपयेत इति चेन्ना भक्तिमहिम्ना स्वत एवं याचितार्थोंपलब्धेः,परिपकभक्तेस्तथास्वाभाव्यात् । न चैतस्यां प्रार्थनायां सनिदानस्वं (सकामत्वं ) प्रसज्जत इति वाच्यं, प्रार्थनाया मोक्षप्राप्तिविषयकत्वात् ।
__ आह-जिनवरैर्यदातव्यं बोधिलाभादिहेतुभूतं तद्दत्तमेव रत्नत्रयोपदेशरूपमिति किमतः परमवशिष्टं दातव्यं यत्मार्थ्यते? इति, उच्यते-यद्यपि सर्व तैरुपदेशेन दत्तमेवास्ति तथाप्युत्कटभावभक्तिभरितस्येत्यमुकौ सचितानां ज्ञानावरणीयादीनां कर्मणां प्रक्षयो भवति, तत्मक्षयाच्च मोक्षोपलब्धिरिति । जिन भक्त्यैवाऽऽरोसे इस प्रकार की प्रार्थना उचित ही है, क्योंकि सिद्ध भगवान् कुछ भी न देखें पर भक्तिमान् भव्यों की अपनी अटल भक्ति के प्रभाव से प्रार्थना के अनुसार फल हो जाता है। यह प्रार्थना मोक्षप्राप्ति के लिये है अतः इसे निदानसहित नहीं कह सकते ।
यहां प्रश्न उठता है कि सिद्ध भगवान् जो कुछ देसकते थे वह मोक्ष मार्ग का उपदेश अरिहंत अवस्थामें दे ही चुके हैं फिर क्या शेष रह गया जिसके लिये प्रार्थना की जाती है ?।।
इसका समाधान यह है कि इस प्रकार भक्तिमान् भव्यों की उत्कृष्ट भावना से की हुई प्रार्थना के द्वारा पूर्वसञ्चित ज्ञानावरणीय आदि कर्मोंका क्षय होकर मोक्षप्राप्ति होती है। પ્રાર્થના ઉચિત જ છે, કારણ કે સિદ્ધ ભગવાન કાંઈ પણ આપતા નથી તે પણ ભકિતમાન ભવ્ય જીની પોતાની અટલ ભકિતના પ્રભાવથી પ્રાર્થના અનુસાર ફળ થઈ જાય છે. આ પ્રાર્થના મોક્ષ પ્રાપ્તિ માટે છે, માટે તેને નિદાનસહિત કહી શકાય નહિ
અહિ એક પ્રશ્ન થાય છે કે, સિદ્ધ ભગવાન જે કાંઈ આપી શકે છે તે મોક્ષમાર્ગને ઉપદેશ અરિહંત અવસ્થામાં આપી ચુકયા છે. પછી શું બાકી રહી ગયું છે કે જેના માટે પ્રાર્થના કરવામાં આવે?
આ પ્રશ્નનું સમાધાન એ છે કે આ પ્રમાણે ભકિતમાન ભવ્ય જીની ઉત્કૃષ્ટ ભાવનાથી કરવામાં આવેલી પ્રાર્થના દ્વારા પૂર્વ સંચિત જ્ઞાનાવરણીય આદિ કર્મોને ક્ષય થઈને મોક્ષ પ્રાપ્તિ થાય છે.
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मुनितोषणी टीका, सामायिकाध्ययनम्-२
१४५ ग्यबोधिलामादिसिदौ तपश्चरणादिक्लेशोऽकिश्चित्कर इति तु नाशङ्कनीयम् , तपःसंयमाचनुष्ठानेन दृढस्य श्रदानस्योत्पत्तौ भक्तिदाढय तेन कर्मक्षयम्ततो मोक्ष इति भक्तिदाढर्थ पति तपःसंयमाघनुष्ठानस्य हेतुत्वात् ॥१-७॥ इति श्रीविश्वविख्यात -जगदवल्लभ-प्रसिद्धवाचक-पश्चदशभाषाकलिनललितकलापाऽऽलापक-प्रविशुद्धगधपपनैकग्रन्थनिर्मापक-वादिमानमर्दक-श्रीशाहछत्रपतिकोल्हापुरराजमदत्त 'जैनशास्त्राचार्य'-पदभूषित-कोल्हापुरराजगुरु-बालब्रह्मचारि-जैनाचार्य-जैनधर्मदिवाकर-पूज्यश्रीघासीलाल-व्रतिविरचितायां धीश्रमणमृत्रस्य मुनितोषण्याख्यायां व्याख्यायां चतुर्विंशति
स्तवाग्व्यं द्वितीयमध्ययनं समाप्तम् ॥ २ ॥ कोई कहे कि-भगवान की भक्ति से ही मोक्ष प्राप्ति तक की सिद्धि हो तो तप संयम आदि के कष्ट उठाने का क्या प्रयोजन है ?
इसके लिये यही उत्तर है कि-तप संयम आदि के आराधन करने से 'श्रद्धान' दृढ हो कर भक्ति प्रबल होती है और भक्ति की दृढता से कर्मों की निर्जरा होकर क्रमसे मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥१-७॥
॥ इति द्वितीय अध्ययन संपूर्ण ॥ | કઈ કહેશે કે ભગવાનની ભકિતથી જ મોક્ષપ્રાપ્તિ સુધીની સિદ્ધિ થાય છે તે તપ સંયમ આદિ કષ્ટ ઉઠાવવાનું શું પ્રજન છે?
ઉત્તર એ છે કે તપ. સંયમ આદિની આરાધના કરવાથી શ્રદ્ધા દઢ થઈને ભકિત પ્રબલ થાય છે. અને ભક્તિની દૃઢતાથી કર્મોની નિર્જરા થઈને भया मोक्षनी प्राप्ति याय छे. (१-७)
। ति द्वितीय अध्ययन संपूर्ण ॥ २ ॥
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५ वन्दना
१४६-१५६
भावश्यकमूत्रस्य । अथ तृतीयमध्ययनम् । द्वितीयेऽध्ययने पाणातिपातादिसावधव्यापारनिवृत्तिलक्षणसामायिकवतोपटेष्टणामहतां गुणोत्कीर्तनं कृतम् , अधुनाऽहंदुपदिष्टस्यापि सामायिकवतादेगुरुकृपयेवोपलब्धेर्गुरुवन्दनोनरमेव प्रतिक्रमणानुष्ठानस्य शिष्टाचारपरिगृहीतस्वाचाऽवसरसंगतां गुरुवन्दनां कर्तुं वन्दनाख्यं तृतीयमध्ययनमाह-'इच्छामि' इत्यादि,
॥ मूलम् ॥ इच्छामि खमासमणो! वंदिउं जावणिज्जाए निसीहियाए, अणुजाणह मे मिउग्गहं, निसीहि अहोकायं कायसंफासं, खम•णिजो मे किलामो, अप्पकिलंताणं बहुसुभेण भे दिवसो वइकतो?
जत्ता भे? जवणिजं च भे? खामेमि खमासमणो! देवसि वइकम, आवस्सियाए पडिकमामि खमासमणाणं देवसिआए आसायणाए तेत्तीसन्नयराए जंकिं चिमिच्छाए मणदुक्कडाए
॥ अथ तीसरा अध्ययन प्रारंभ ॥ दमरे अध्ययन में प्राणातिपात आदि सावद्य योगकी निवृत्तिरूप सामायिक व्रतके उपदेशक तीर्थकरों का गुणोत्कीर्तन किया गया है। तीर्थकरों से उपदिष्ट वह मामायिक व्रत गुरु महाराज की कृपासे ही प्राप्त हो सकता है इस कारण, तथा गुरुवन्दनापूर्वक ही प्रतिक्रमण करने का शिष्टाचार होने से गुरुवन्दना करना आवश्यक है अतएव अब वन्दनाध्ययन नामक तीसरा अध्ययन प्रारंभ करते हैं-'इच्छामि' इत्यादि।
અથ ત્રીજી અધ્યયન પ્રારંભ બીજા અધ્યયનમાં પ્રાણાતિપાત વગેરે સાવધ ગની નિવૃત્તિ-રૂપ સામાયિક વ્રતના ઉપદેશક તીર્થકરેનું ગુણે કીર્તન કરવામાં આવ્યું છે. તીર્થકરેએ ઉપદેશેલું સામાયિક વ્રત ગુરુ મહારાજની કૃપાથી જ પ્રાપ્ત થાય છે, એટલા માટે, તથા ગુરૂવંદનાપૂર્વક જ પ્રતિક્રમણ કરવાને શિષ્ટાચાર લેવાથી ગુરૂવન્દના કરવી તે આવશ્યક છે, એ માટે હવે વંદનધ્યયન નામનું ત્રીજું અધ્યયન भार ४३ छ-" इच्छामि " त्याह.
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सुनितोषणी टीका, वन्दनाध्ययनम् - ३
१४७
वयदुक्कडाए कायदुक्कडाए कोहाए माणाए मायाए लोहाए सव्व - कालियाए सव्वमिच्छोवयाराए सव्वधम्माइक्कमणाए आसायणाए जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स खमासमणो ! पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥ सू० १ ॥
॥ छाया ॥
इच्छामि क्षमाश्रमण ! वन्दितुं यापनीयया नैषेधिक्या, अनुजानीत मे मितात्रग्रहम् । निषिध्य अधःकायं कायसंस्पर्शम् | क्षमणीयो भवद्भिः क्लमः । अल्पक्लान्तानां बहुशुभेन भवतां दिवसो व्यतिक्रान्तः ?, यात्रा भवताम् ? यापनीयं च भवताम् ? क्षमयामि क्षमाश्रमण ! दैवसिकं व्यतिक्रमम् । आवश्यक्या प्रतिक्रमामि क्षमाश्रमणानां दैवसिक्या आशातनया त्रयस्त्रिंशदन्यतरया यत्किञ्चिन्मिथ्याभूतया मनोदुष्कृतया वचोदुष्कृतया कायदुष्कृतया क्रोधया मानया मायया लोभया सर्वकालिक्या सर्व मिथ्योपचारया सर्वधर्मातिक्रमणया आशातनया यो मया दैवसिकोऽतिचारः कृतस्तस्य क्षमाश्रमण ! प्रतिक्रमामि निन्दामि ग आत्मानं व्युत्सृजामि ॥ ०२ ॥
॥ टीका ॥
· खमासमणो' क्षमणं परीषहादीनां सहनं क्षमा, ' 'श्रमणो, शमनः, समनाः, समणः' इत्येषां प्राकृते 'समणो' इति भवति, तत्र श्राम्यति=तपस्यतीति, भवभ्रमणहेतुभूतविषयेषु विद्यतीति यद्वाऽन्तर्भावितण्यर्थत्वात् श्राम्यति=दमनेन 'श्रमणः, शमनः, समनाः, समणः ' इन चारों का प्राकृत में 'समणो' ऐसा रूप बनता है अतः संस्कृत छाया के अनुसार इन चारों का अलग २ अर्थ कहते हैं
बारह प्रकार की तपस्या में श्रम (परिश्रम) करनेवाले,
4
" श्रमणः, शमनः, समनाः, समणः, मा ચારેય પદાનું પ્રાકૃત ભાષામાં "समणा" मेवु ३५ जने छे; भेटले संस्कृत छाया अनुसार मे यारैय पहना हा- हा अर्थ उहे छे:
णार प्रभारनी तपस्यामा श्रम (पश्चिम) ४२वावाजा, अथवा, इन्द्रिय, १ - क्षमा- ' क्षमूष् सहने' अस्मात् ' षिद्भिदादिभ्योऽङ्' ( ३ । ३ । १०४) इति सूत्रेण स्त्रियामप्रत्ययस्वष्टाप् ।
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१४८
भावश्यकमूत्रस्व श्रमयतीन्द्रियनोइन्द्रियाणीति 'श्रमणः। शमयति शान्ति नयति कषायनोकषायरूपानलमिति, शाम्यति विशालभनाटवीपर्यटगोगानलज्वालामालाकरालतापकलापतः पृथग्भवतीति वा 'शमनः । समानं स्वपरजनेषु तुल्यं मनो यस्येति, कुशलमयेन मनसा सह वर्तते इति वा समनाः । सम्=सम्यक् 'अणति-प्रवचनं ब्रूत इति, सम्यक अण्यते-संयमबलेन कषायं जित्वा जीवतीति वा समणः । क्षमामधानः श्रमणः, शमनः, समनाः, समणो वा क्षमाश्रमणादिस्तत्संबुद्धौ । अथवा इन्द्रिय नोइन्द्रिय (मन) का दमन करनेवाले को 'श्रमण' कहते हैं । कषाय-नोकषायरूप अग्नि को शान्त करनेवाले, या संसाररूप अटवीमें फैली हुई कामभोगरूप अग्नि की प्रचण्ड ज्वालाओं के भयङ्कर ताप से आत्मा को अलग करनेवाले को 'शमन' कहते १२। शत्रुमित्र में एकसा मन रखनेवाले, अथवा विशुद्ध मनवाले को 'समना' कहते हैं ३ । अच्छी तरह प्रवचन का उपदेश देनेवाले, अथवा संयम के बल से कषाय को जीतकर रहने वाले को 'समण' कहते हैं ४ । परन्तु यहां पर प्रसिद्धि के कारण 'श्रमण' शन्द को लेकर ही व्याख्या करते हैं-क्षमा है प्रधान जिनमें नन्दिय (मन)नु भन ४२वापान "श्रमण" के छ (१). पाय, नाय રૂપ અગ્નિને શાંત કરવાવાળા અથવા સંસારરૂપી અટવીમાં ફેલાએલી કામભેગરૂપી અગ્નિની પ્રચંડ જવાલાઓના ભયંકર તાપથી આત્માને અલગ-જુ ४२वापणाने 'समन' ४३ छ (२). शत्रु-भित्रमा सरभु मन राम गया विशुद्ध भनाजान 'समना' ४९ छ (3). १२०५२ सारी शत प्रयनने ઉપદેશ આપવાવાળા, અથવા સંયમના બળથી કષાયને જીતીને રહેવાવાળાને 'समण' 3 छ (४). ५२न्तु महिं प्रसिद्धिना र 'श्रमण' शहने सन વ્યાખ્યા કરે છે, જેની અંદર સમાગુણ મુખ્ય છે તેને ક્ષમાશ્રમણ કહે છે.
१- 'श्री तपसि खेदे च ' अस्मान्नन्यादिलात्कर्तरि ल्युः । २- शमनः-'शमु उपशमे' अस्माण्ण्यन्ताच्छुद्धाद्वा ल्युः पूर्ववत् ।
३- समनाः-पूर्वत्र व्युत्पत्तौ ' समानस्यच्छन्दसी'-त्यत्र 'समानस्ये 'ति योगविभागाउ समानस्य सः, उत्तरत्र 'वोपसर्जनस्य' (६।३।८३) इति सहस्य सः।
४- 'अणति' भौवादिकात्परस्मपदिनः' शब्दार्यकात् 'अण्' धातोरिदम् । ५- 'अण्यते' देवादिकस्य आत्मनेपदिनः 'अण पाण' इत्यस्येदं रूपम् ।
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मुनितोषणी टीका, पन्दनाध्ययनम्-३
१४९ 'जावणिज्जाए' यापनीयया शक्त्यनुकूलया 'निसीडियाए' निषेधनं निषेधः = प्राणातिपातादिसावधव्यापारविरतिः सा पयोजनं यस्या सा नैषेधिकी' , तया नषेधिक्या तन्वेति भेषः, शक्त्यनुकूलेन प्राणातिपातादिनिवृत्तरूपेण शरीरेणेत्यर्थः, 'वंदिउं' वन्दितुम् अभिवादयितुम् 'इच्छामि' अभिलषामीत्यर्थः । अतः 'मे' मम 'मिउग्गह' अवगृह्यत इत्यवग्रहः क्षेत्रम् , यद्वा-अवग्रहणमवग्रहः क्षेत्रपरिग्रहः, मितश्चासाववग्रहश्च मितावग्रहः, अथवा मितायाः अर्थात्परिमितभूमेरवग्रहः ग्रहणं मितावग्रहः उपविष्टस्य गुरोरभिमुखं वर्तमानायाः स्वदेहपरिमिताया भूमेग्रहणं, तम् 'अणुजाणह' अनुजानीत=मितावग्रहप्रवेशायानुझां दत्त, अस्मिन्नवसरे गुरुः 'अनुजानामि' इति भणति, ततोऽनुज्ञातः शिष्यः 'निसीहि' निषिध्य-सावधव्यापारान् परित्यज्य 'अहोकायं' कायस्य-शरीरस्याऽधः अधःकायः, यता अधः अधस्तनः कायः अध:कायस्तं चरणस्वरूपं प्रतीति शेषः । षष्ठ्यर्थे वा द्वितीयाऽऽर्षत्वात् । 'कायसंफासं' कायेन=स्वशिरोउनको 'क्षमाश्रमण' कहते हैं। यहां शिष्य सम्बोधन करके कहता है कि "हे क्षमाश्रमण ! मैं अपनी शक्ति के अनुसार प्राणातिपात आदि सावद्य व्यापारों से रहित काय से वन्दना करना चाहता हूँ; अतएव मुझे आप मितावग्रह (जहां गुरु महाराज विराजित हों उनके चारों ओर की साढे तीन २ हाथ भूमि) में प्रवेश करने की आज्ञा दीजिये"। उस ममय गुरु शिष्य को 'अनुजानामि' कह कर प्रवेशकी आज्ञा देवें, तब आज्ञा पाकर शिष्य घोले-'हे गुरु महाराज ! मैं सावध व्यापारों को रोक कर मस्तक और हस्त से અહિં શિષ્ય સંબોધન કરીને કહે છે કે
હે ક્ષમાશ્રમણ ! હું મારી શકિત અનુસાર પ્રાણાતિપાત આદિ લાવવા (પાપકરી) વ્યાપારથી રહિત શરીર વડે વંદના કરવા ઈચ્છા કરું છું, એટલા માટે મને આપ મિતાવગ્રહ (જ્યાં ગુરુ મહારાજ બિરાજિત હોય તેમની ચારે બાજુ સાડા ત્રણ સાડા ત્રણ હાથ ભૂમિ)માં પ્રવેશ કરવાની આજ્ઞા આપે. તે સમયે शुरु शिष्यने 'अनुजानामि' हीन प्रवेशवानी माज्ञा भाषे. त्यारे माज्ञा भगवान શિષ્ય કહે કે – હે ગુરુ મહારાજ ! હું સાવધ વ્યાપારોને રોકીને શિર તથા
१- ‘नषेधिकी-तदस्येत्यधिकारे 'प्रयोजनम्' (५।१।१०८) इति रक, ठगन्तखान्कीप् ।
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१५०
आवश्यकसूत्ररूप
,
इस्तलक्षणेन संस्पर्श: =सम्यक् स्पर्शस्तम् । 'अणुजाणह' इत्यनेन पूर्वोक्तेन सम्बन्धः, करोमीत्यस्य शेषो वा । 'किलामो ' क्लमः = शरीरग्लानिकृत् मत्कृतोऽपराधः निजकठोर करशिरसा भवदीयकोमलचरणकमलस्पर्शेनेत्यर्थात्, यझ मदीयेनानेन नमस्कारव्यापारेण भवतो मानस एवं कश्वन श्रमः सञ्जातः स्यात्स 'भे' भवद्भिः, यद्वा भवतां ' ' खमणिज्जो' क्षमणीयः = सोढव्यः तथा 'अप्प - किलंताणं' अल्पशब्दोऽत्राऽभाववाची, 'क्लान्तं = कान्तिः, अल्पं= त्रिगतं क्लान्तं = शरीरग्लानिरूपः श्रमो येषां तेऽल्पक्लान्तास्तेषामल्पक्लान्तानाम् - अल्प वेदनावतामित्यर्थः, 'भे' भवतां गुरुवर्याणां 'दिवसो दिवसः 'बहुसुभेण ' बहु च तच्छुभं च बहुशुभं तेन प्रभूतशान्तिपूर्वकमित्यर्थः ' वइकंतो' व्यतिक्रान्तः = गतः किम् ? 'नचा' यात्रा = तपोनियमादिस्वरूपा संयमयात्रा 'भे' भवतां निराबाधे ? वि शेषः, च = किश्च 'भे' भवतां शरीरमिति गम्यते ' जवणिज्जं ' यापनीयम् = इन्द्रि - मनोइन्द्रियबाधारहितं वर्त्तते ? इति शेषः, एवं संयमयात्रादिकुशलमा पृच्छय शिष्यः पुनरप्याह - ' खमासमणी' हे क्षमाश्रमण ! 'खामेमि' क्षमापयामि आपके चरण का स्पर्श करता हूँ' इस तरह वन्दना करनेमें मुझसे जो आपको किसी प्रकार का क्रम (कष्ट) पहुंचा हो आप उसकी क्षमा करें । हे गुरु महाराज ! आपका दिन बहुत सुखशान्ति से व्यतीत हुआ न ?, आपकी संयमयात्रा निराबाध है न ?, और आपका शरीर, इन्द्रिय, नोइन्द्रिय की बाधा से रहित है न ? | इस प्रकार संयमयात्रा और शरीर के सम्बन्ध में कुशल पूछ कर फिर से शिष्य कहता है- हे क्षमाश्रमण ! मुझसे, जो दिवस-सम्बन्धी હાથથી આપના ચરણના સ્પર્શ કરૂં છું. આ પ્રમાણે વંદના આાપને જે કંઇ પ્રકારથી કષ્ટ થયું હોય તે આપ મને ક્ષમા કરો.
કરવાથી મારા 3
હે ગુરુ મહારાજ ! આપને દિવસ ખૂબ શાંતિથી પસાર થયે છે કે કેમ ? આપની સંયમયાત્રા નિરખાધ છે કે કેમ ? અને આપનું શરીર, ઇન્દ્રિય, નાઇન્દ્રિયની ઉપાધિથી રહિત છે કે કેમ ? આ પ્રમાણે સમયાત્રા અને શરીરના સબંધમાં કુશળતા પૂછીને શિષ્ય ફરીથી કહે છે કે:- હે ક્ષમાશ્રમ'ગુ ! મારાથી
१ - ' निजकठोरकरशिरसा ' अत्र प्राण्यङ्गत्वादेकवद्भावः ।
२ - ' भत्रताम् ' अत्र 'कृत्यानां कर्त्तरि वा' (२ । ३ । ७१) इति कर्त्तरि षष्ठी । ३- ' क्लान्तं ' भाषेतः ।
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मुनितोषणी टीका, बन्दनाध्ययनम्-३
१५१ 'देवसियं' दिवसे भवो देवसिकस्तं, दिवसशब्दोऽत्र रात्रेरप्युपलक्षणस्तेनाऽहोरात्रकृतमित्यर्थः, 'वइक्कमं' व्यतिक्रमोऽपराधस्तम् 'आवस्सियाए' आवश्यक्या अवश्यं कर्त्तव्यैश्चरणकरणयोगैनिवृत्ता आवश्यकी अवश्यकर्त्तव्यगुरुशुश्रूषादिरूपा तया हेतुभूतया यत्किश्चिद्विपरीतमाचरितं स्यात् तत् 'पडिक्कमामि' प्रतिक्रामामि-परित्यजामि, यद्वा तस्मात् पतिक्रामामि-विनिवर्ते, इत्येवं केचिद्वयाचक्षते, वस्तुतस्तु 'खामेमि खमासमणो देवसियं वइक्कम आवस्सियाए पडिकमामि' इत्यस्य हे क्षमाश्रमण ! सञ्जातं दैवसिकमपराधं क्षमापयामि भविष्यन्तं च तमवश्यकर्त्तव्यया भवदीयाऽऽज्ञाराधनया परित्यजामीत्येवार्थ इति वयम् । पोक्तमेवार्थ विशेषतः स्फोरयति-'खमा०' इति । 'खमासमणाणं' क्षमाश्रमणानां पूर्वोक्तानां 'देवसियाए' दैवसिक्या, दिवसपदस्य रात्रेरप्युपलक्षणत्वादहोरात्रसअपराध हुआ हो उसकी क्षमा चाहता हूँ आप क्षमा करें, आवश्यक क्रिया करते समय भूल से जो कुछ विपरीत आचरण किया गया उससे निवृत्त होता हूँ' इस प्रकार कोई २ व्याख्या करते हैं।
वास्तव में 'खामेमि खमासमणो ! देवसियं वहक्कम आवस्सियाए पडिकमामि' का तात्पर्य यह है-'हे क्षमाश्रमण ! दिवस संबन्धी जो कुछ अपराध हो चुका हो उसके लिये क्षमा चाहता हु और भविष्यमें आपकी आज्ञाकी आराधना रूप आवश्यक क्रिया के द्वारा अपराध से अलग रहूँगा, अर्थात् अपराध नहीं होने देनेका प्रयत्न करूँगा'। इसी बात को शिष्य विस्तारसे कहता है-'हे गुरु महाराज ! आप क्षमाश्रमणों की, दिवस-सम्बन्धी तैतीस દિવસ સંબંધી જે કાંઈ અપરાધ થયો હોય તેની ક્ષમા માગું છું. આપ ક્ષમા કરે, આવશ્યક ક્રિયા કરવા વખતે ભૂલથી મારા વડે જે કાંઇ વિપરીત આચરણ થયું હોય તેનાથી નિવૃત્ત થાઉં છું-કઈ કઈ આવી રીતે વ્યાખ્યા કરે છે.
वास्तवशते तो 'खामेमि खमासमणो देवसियं वइक्कम आवस्सियाए પરિમાન' અને તાત્પર્ય એ છે કે “હે ક્ષમાશ્રમણ ! દિવસ સંબંધી જે કાંઈ અપરાધ થયે હેય તેના માટે ક્ષમા માગું છું, અને ભવિષ્યમાં આપની આજ્ઞાની આરાધનારૂપ આવશ્યક ક્રિયા વડે અપરાધથી દૂર રહીશ અર્થાત અપરાધ ન થવા પામે તે પ્રયત્ન કરીશ. આ વાતને શિષ્ય વિસ્તારથી કહે છે -
હે ગુરૂ મહારાજ ! આપ શમાામણની દિવાસસંબંધી તેત્રીશ આશા
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आवश्यकमूत्रस्प म्बन्धिन्येत्यर्थः, 'तेत्तीसन्नयराए' त्रयस्त्रिंशदन्यंतरया त्रयस्त्रिंशदाशातनास्वन्यतरया कयाचिदेकया 'आसायणाए' आशातनया आ-समन्तात् शात्यन्ते= खण्डयन्ते ज्ञानादयो गुणा यया, यद्वा आ-समन्तात् शातयति-अवरुणदि मोक्षसुखं या सा- आशातना तया, तथा 'जंकिंचिमिच्छाए' यस्किश्चिन्मिध्यया-मिथ्याऽस्त्यस्या इति 'मिथ्या, या काचिन्मिथ्या यत्किञ्चिन्मिध्या
तया, यया कयाचिन्मिथ्यायुक्तयेत्यर्थः, असम्यग्भावसंपन्नयेति यावत्, 'मणदुक्कडाए' मनोदुष्कृतया दुर्भावेन कृता-दुष्कृता, मनसा, ज्ञानपूर्वकमित्यर्थात् दुष्कृता-मनोदुष्कृता तया अशुभपरिणामरूपयेति भावः । 'वयदुकडाए' चोदुष्कृतया (समासः प्राग्वत्, एवमग्रेऽपि) स्वङ्कारादिरूपयेत्यर्थः । 'कायदुक्कडाए' कायदुष्कृतया-उपगमनाऽवस्थानादिनिमित्तया कोहाए'क्रोधया क्रोधोऽस्यामस्तीति क्रोधा तया क्रोधयुक्तयेत्यर्थः, एवं 'माणाए' मानया मानयुक्तया, 'मायाए' मायया-मायायुकया, 'लोहार' लोभया लोभयुनाया (३३) आशातनाओंमें से किसी भी आशातना द्वारा, तथा मिथ्याभाव के कारण अशुभ परिणाम से, तुकारा आदि दुर्वचनों से और अत्यन्त निकट चलना, अभ्युत्थानका न करना आदि शरीर की दुष्ट चेष्टा से, क्रोध, मान, माया और लोभ से की गई, तथा भूत भविष्य वर्तमान रूप तीनों कालों में की गई, सर्वथा मिथ्योपवारसे की गई, क्षान्त्यादि सकल धर्मों का उल्लंघन करने वाली
आशातना के कारण जो मुझसे दिवससम्बन्धी अतिचार किया તિના પૈકી કઈ પણ આશાતના વડે તથા મિયા ભાવનાને કારણે અશુભ પરિણામથી, તુંકારે વગેરે ખરાબ વચનથી અને અત્યંત નજીક ચાલવું, અભ્યત્થાન ન કરવું વગેરે શરીરની દુષ્ટ ચેષ્ટાથી, ક્રોધ, માન, માયા, અને લેભથી કરેલી તથા ભૂત, ભવિષ્ય, વર્તમાન રૂપે ત્રણે કાળમાં સર્વથા મિથ્યા ઉપચારથી કરેલી, ક્ષાત્યાદિ સકલ ધર્મોનું ઉલ્લંઘન કરવાવાળી આશાતનાના કારણે મારાથી દિવસ
१-'जंकिंचिमिच्छाए' इत्यारभ्य 'लोहाए' इत्यन्तं यावत् सर्वत्र अर्शआदेराकृतिगणत्वान्मत्वर्थीयोऽच्पत्ययः। आकृत्या पठितगणविषयकशास्त्रविहिततत्तद्गणान्तर्गतत्वप्रयुक्तकार्यवत्तया गण्यते इत्यातिगणस्तस्य भावस्तत्वं तस्मात् प्राकृतिगणस्वादिति ।
२-मयूरव्यंसकादित्वात्समासः ।
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सुनितोषणी टीका, बन्दनाध्ययनम् - ३
१५३
'आसयणाए ' इत्यस्य विशेषणानीमानि । एवमहोरात्रसम्बन्धिनी राशातना उक्त्वा सम्पत्यैहिकजान्मान्तरिकाऽतीताऽनागतकालिकादिपरिग्रहायोच्यतेसव्व० ' इत्यादि ।
"
' सन्नकालियाए ' सर्वः कालो यस्याः सा सर्वकालिका तया, यह । सर्वास कालः सर्वकालस्तत्र भवा सर्वकालिकी तया - वर्त्तमानाऽतीतादिकालत्रय सञ्जातयेत्यर्थः । ' सन्नमिच्छोवयाराए' सर्व मिथ्योपचारया = सर्वांशतो मिथ्योपचारयुक्तया, सर्वो मिथ्योपचारो यस्यामिति बहुव्रीहेः । 'सव्वधम्माइकमणाए' सर्वे च ते धर्मा अनुष्ठानरूपाः क्षान्त्यादयः सर्वधर्मास्तेषामतिक्रमणम् = उल्लङ्घनं यस्यां सा, अथवा सर्वे धर्माः प्रवचनमातरस्तासामतिक्रमणं यस्यां सा, सर्वधर्मातिक्रमणा तया । 'आसायणाए' आशातनया, ( व्याख्यात आशातना पदार्थः) 'जो मे' यो मया 'देवसिओ' देवसिकः 'अइयारो' अतिचारः 'कओ ' कृतः ' तस्स ' तस्य 'तमित्यर्थः, 'पडिक्कमामि' विनिवर्चे, 'निंदामि गरिहामि अप्पाणं बोसिरामि' इति पूर्ववत् । एवं क्षमयित्वा 'इच्छामि खमासमणो ' इत्यादिपाठं पुनरप्युनेन विधिना भणेत् । बन्दनाविधिश्व प्रसङ्गतोऽत्र स्फुटपतिपतये निरूप्यते स यथा
6
चन्दनवेलायाम् 'इच्छामि खमासमणो बंदिउं जावणिज्जाए निसीहियाए ' इत्युच्चार्याऽवग्रहमवेशायाऽऽज्ञां ग्रहीतुं गुरुसमक्षं कृताञ्जलिः शिरो नमयेत् ( इवं गया हो उससे मैं निवृत्त होता हूँ, उसकी निन्दा और ग करता हूँ, तथा सावधकारी आत्माको वोसरता (त्यागता) हूँ ।
इस प्रकार खमाकर फिरभी उक्त विधि से क्षमाश्रमण (पाठ) पढे। यहां पर प्रसंग से वन्दना की विधि कहते हैं वह इस तरह - वन्दना के समय 'इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणिजाए निसीहियाए' इतना बोलकर अवग्रह में प्रवेश करनेकी आज्ञा के लिये अवग्रह से बाहर સબધી જે અતિચાર લાગ્યા હોય તેમાંથી હું... નિવૃત્ત થાઉં છું અને તેની નિંદા તયા ગાઁ કરૂ છુ. તથા સાવદ્યકારી આત્માના ત્યાગ કરૂ છું,
આ પ્રમાણે ક્ષમા માંગીને કરી પણ કહેલી વિધિથી ક્ષમાશ્રમણુ (પાઠ) ખાલે. અહિં પ્રસંગથી વંદનાની વિધિ કહે છે. તે આ પ્રમાણે છે. વંદના કરવા वमते “इच्छामि खमासमणो बंदिउं जावणिज्जाए निसीहियाए” मा प्रभा બાલીને અવગ્રહમાં પ્રવેશ કરવાની આજ્ઞા માટે અવગ્રહથી બહાર ઉભા રહીને બન્ને १ - तस्य - तमित्यर्थः, अत्र द्वितीयार्थे सम्बन्धविवक्षयाऽऽर्षत्वाद्वा षष्ठी ।
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१५४
आवश्यक सूत्रस्व
प्रथमाऽवनतिः ); आज्ञालब्ध्युत्तरं दीक्षाग्रहणसमये परिधृतचोलपट्टक- प्रावरणसदोरक मुखवस्त्रिकारजोहरणंप्रमार्जिको बद्धाञ्जलिपुटश्चासीत्, तामत्रस्थामाश्रित्य वन्दनकरणं यथाजातत्रन्दनम् ; तत्पूर्वकः सन् गुप्तित्रयभूषितोऽवग्रहं प्रविश्य 'अ' इत्युच्चार्याञ्जलिपुटं दक्षिणभागक्रमेण परिभ्राम्य वामभागमानीय शिरसा संयोज्य 'हो' इति वदेत्, इत्थं प्रथममावर्त्तनं समाप्य 'का' 'यं' इत्युक्त्वा द्वितीयं, 'काय' इत्यभिधाय तृतीयं चावर्त्तनं पूर्ववत् कृत्वा 'संफासं' इति वदन् शिरो नमयित्वा गुरुचरणौ स्पृशेत्, पत्रिशन्नेव 'खमणिज्जो भे किलामो अध्यक्लिंताणं बहु
"
काय
ही खडा हुआ दोनों हाथ ललाट प्रदेश पर रख कर गुरु के सामने शिर झुकावे ( यह प्रथम अवनति ) । आज्ञा प्राप्त हो जाने पर यथाजात वन्दन (दीक्षा ग्रहण के समय धारण किये हुए चद्दर बोलपट्टक के सहित एवं मुंह पर मुहपत्ती बान्धे हुए रजोहरण प्रमाजिका के सहित अंजली (दोनों हाथ ) जोडे हुए मुनि की वन्दनविधि को यथाजातवन्दन कहते हैं ) - पूर्वक तीन गुप्तियों के सहित अवग्रहमें प्रवेश करके 'अ' ऐसा बोल कर अंजलि को दाएं हाथकी तर्फसे घुमा कर बायें हाथकी तरफ लावे और बादमें मस्तक पर लगाता हुआ 'हो' ऐसा बोले । इस प्रकार प्रथम आवर्त्तन समाप्त करके 'का' और 'थं' से दूसरा आवर्त्तन पूरा करे । फिर ' से तीसरा आवर्त्तन करके संफासं' बोलता हुआ सिर झुका कर चरण स्पर्श करे । बादमें वहीं बैठा हुआ मणिजो હાથ કપાલનાં ભાગ ઉપર રાખીને ગુરુની સામે માથુ નમાવવું (આ પ્રથમ અવનતિ). આજ્ઞા પ્રાપ્ત થયા પછી યથાજાતવન્દન-(દીક્ષા ગ્રહણુ સમયે ધારણ કરેલ, ચાદર ચાલપટ્ટક સહિત તથા મેઢા ઉપર મુહપત્તિ બાન્ધેલ, રોહરણુ ગેચ્છા સહિત અજલિ (બન્ને હાથ) જોડેલ મુનિની વન્દેનવિધિને યથાજાતવન્દેન કહે છે) પૂર્ણાંક ત્રણ ગુપ્તિ સહિત અવગ્રહમાં પ્રવેશ કરીને મેં શબ્દના ઉચ્ચારણ કરીને અલિ (બે હાથ જોડી) જમણા હાથ તરફથી ઘુમાવીને ડાબા હાથ તરફ લાવવા અને પછીથી માથા ઉપર લગાવીને એમ બેલે એ પ્રમાણે પ્રથમ આવત્ત ન (બે હાથ જોડીનેવર્તુલ જમણી બાજુથી ડાખી ખાજી સુધી ફેરવવું) પૂર્ણ કરીને TM અને ચં શબ્દથી ખીજું આવત્તન પૂરું કરીને ફરી ય થી ત્રીજું આવન કરીને "संफासं” मोलता था भाथु नमावीने थर स्पर्श २
6
पछी ते स्था
.
(
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मुनितोषणी टीका, वन्दनाध्ययनम्-३ सुभेण भे दिवसो वइक्कतो?' इति वाक्येनाऽपराधक्षमापणपूर्वकं देवसिकं मुखशातादिकं पृष्ट्वा 'जत्ता भे' इत्युच्चार्य चतुर्थ 'जवणिज' इत्युच्चार्य पञ्चमं च भे' इत्युच्चार्य षष्ठं चाऽऽवर्त्तनं कृत्वा शिरो नमयित्वा 'खामेमि खमासमणो देवसियं वइक्कमं' इति वदेत्, ततः 'आवस्सियाए' इत्युक्त्वा, अवग्रहादहिनिःसृत्य क्षमाश्रमणस्य पूर्णा पट्टिकामुच्चारयेत् । एवमेकाऽननतिः, एकं यथाजातं, तिस्रो गुप्तयः, एकः प्रवेशः, एकं निष्क्रमणं, शिरोद्वयं-क्षमापणकाले शिष्यस्यावनतं शिरः प्रथमं शिरः, गुरुणा वन्दनस्वीकृतये यच्चालितं स्वशिरस्तद् द्वितीयं शिरः, इति शिरोद्वयम्, षडावर्तनानि च सम्पद्यन्ते । ततः 'इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणिजाए निसीडियाए' इत्युच्चार्य पुनरवग्रहं प्रवेष्टुं गुरुपुरतो नतभे किलामो अप्पकिलंताणं बहुसुभेण भे दिवसो वइकतो ?' इस वाक्य से अपराध की क्षमाप्रार्थनापूर्वक दिवससम्बन्धी सुखशाता पूछ कर 'जत्ता भे' से चौथा 'जवणिजं' से पांचवाँ और 'च भे' से छठा आवर्तन समाप्त कर के सिर झुकावे, अनन्तर 'खामेमि खमासमणो ! देवसियं वइक्कम' यह पाठ बोले, फिर 'आवस्सियाए' कह कर अवग्रह से बाहर आकर क्षमाश्रमण की पूरी पाटीको पढे। इस प्रकार एक अवनति १, एक यथाजात २, तीन गुप्तियाँ ५, एक प्रवेश ६, एक निष्क्रमण ७, दो मस्तक ८, (क्षमापण काल में शिष्य गुरु के सामने मस्तक मुकावे, वह एक मस्तक हुआ, गुरु की तरफ से स्वीकृतिमचक मस्तक का हिलाना दुसरा मस्तक हुआ, इस प्रकार दो मस्तक हुए) और छह आवर्तन १५, होते हैं । मे खमणिज्जो मे किलामो अप्पकिलंताणं बहुसुभेण भे दिवसो वइकंतो આ વાકયથી અપરાધની પ્રાર્થનાપૂર્વક ક્ષમા માગવી. તે પછી દિવસસંબંધી સુખAiति पूछीन “जत्ता में” थी यायुः जवणिज्जं थी पांमु भने च भे थी भावनन ५ । भाथु नभाव. पछी "खामेमि खमासमणो देवसियं वइक्कम" આ પાઠ બેલવે અને ફરીથી ગારિયાઇ બેલીને અવગ્રહથી બહાર આવીને ક્ષમાશ્રમણની પૂરી પાટી બેલવી, આ રીતે એક અવનતિ ૧, એક યથાજાત ૨,ત્રણ ગુપ્તપ,
એક પ્રવેશ ૬, એક નિષ્ક્રમણ ૭, બે મસ્તક ૮(ક્ષમાપણ સમયે શિષ્ય ગુરુસમીપે મસ્તક નવે તે એક મસ્તક કહેવાય અને ગુરૂ તરફથી સ્વીકાર સૂચક મસ્તકને હલાવવું તે બીજે મસ્તક કહેવાય. એ પ્રમાણે બે મસ્તક થયા) અને છ આવર્તન ૧૫ થાય છે.
पछी "इच्छामि खमासमणो वंदिलं जारणिज्जाए निमीडियाए" सीन
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१५६
आवश्यकमूत्रस्य मस्तकः पार्थ येत , (इयं द्वितीयाऽवनतिः), गुर्वाज्ञया यथाविध्यवग्रहं प्रविश्य पूर्ववद्वन्दमानस्तत्रैवाऽवग्रहे 'खमासमण'-पट्टिकां समापयेत् , इह निष्क्रमणं नास्ति, अत्रैकाऽवनतिरेकः प्रवेशः पडावर्तनानि शिरोद्वयमिति पूर्वापरसंकलनया पञ्चविंशतिविधयः । उक्तश्च भगवता समवायाङ्गे
''दो ओणयं अहाजायं, किइकम्मबारसावयं ।
चउस्सिरं तिगुनं च, दुपवेसं एगनिक्खमणं ॥१॥' इति ॥मू०१॥ इति श्रीविश्वविख्यात-जगद्वल्लभ-प्रसिद्रवाचक-पञ्चदशभाषाकलितललितकलापाऽऽलापक-प्रविशुद्धगद्यपद्यनैकग्रन्थनिर्मापक-वादिमानमर्दक-श्रीशाहूछत्रपतिकोल्हापुरराजप्रदत्त 'जैनशास्त्राचार्य'-पदभूषित-कोल्हापुरराजगुरु-बालब्रह्मचारि-जैनाचार्य-जैनधर्मदिवाकर-पूज्यश्रीघासीलाल-तिविरचितायां श्रीश्रमणमत्रस्य मुनितोपण्याख्यायां व्याख्यायां वन्दनाख्यं
तृतीयमध्ययनं समाप्तम् ॥ ३ ॥ अनन्तर 'इच्छामि खमासमणो वंदिउं जावणिजाए निसीहियाए' बोल कर फिरसे अवग्रहमें प्रवेश करने के लिये गुरु के सामने सिर झुकावे (यह दुसरी अवनति हुई)। गुरु की आज्ञा मिलने पर विधिपूर्वक अवग्रहमें प्रवेश करके पहले की भाँति वन्दना करता हुआ अवग्रहमें ही 'खमासमण' की पाटी पूरी बोले। यहां पर निष्क्रमण नहीं होता है, अतः एक अवनति १६, एक प्रवेश १७, छह आवर्तन २३, और दो मस्तक २५ होते हैं। इस प्रकार पूर्वापर की संख्या जोडने से वन्दना की पच्चीस विधियां होती हैं ।सू०१॥
इति तृतीय अध्ययन संपूर्ण ॥३॥ ફરીથી અવગ્રહમાં પ્રવેશ કરવાને માટે ગુરુની સામે માથું નમાવવું. (આ બીજી અવનતિ થઈ) ગુરુની આજ્ઞા મેળવી વિધિપૂર્વક અવગ્રહમાં પ્રવેશ કરીને પ્રથમ प्रमाणे पहना ४२ता ५४ अपमान "खमासमण" ना पाटी पूरी मालवी. अडिं નિષ્ક્રમણ થતું નથી. એ માટે એક અવનતિ, એક પ્રવેશ, છ આવર્તન, અને બે માથાં થાય છે. આ રીતે પૂર્વાપરની સંખ્યા જોડવાથી વંદનાની પચીસ વિધિઓ થાય છે. (સૂ૦ ૧)
ઇતિ તૃતીય અધ્યયન સંપૂર્ણ. १ छाया-'द्वयवननं यथाजातं, कृतिकर्म द्वादशावर्त्तम् ।
चतुःशिरस्त्रिगुप्तं च द्विप्रवेशमेकनिष्क्रमणम्' ॥१॥ इति ।
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प्रतिक्रमणम्
१५७-२८५
मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
१५७
अथ प्रतिक्रमणनामकं चतुर्थमध्ययनम् पूर्वाध्ययने वन्दनापूर्वक गुरुसमीपे ‘पडिकमामि' इत्यनेन प्रतिक्रमणप्रतिज्ञा प्रदर्शिता, सम्पति चतुर्थाध्ययने तदेव प्रतिक्रमणमाह-अथवा पूर्वाध्ययनेऽहत्वणीतसामायिकानुष्ठातृभिर्गुरोर्वन्दनादिरूपा प्रतिपत्तिः कर्तव्येत्युक्तम् , अत्र चतुर्थाध्ययने तस्याः प्रतिपनेरकरणेन परवलिनस्यात्मनो निन्दा प्ररूप्यते, मूत्रे 'खलियम्स निंदणा' इत्युक्तत्वात् , यद्वा बन्दनाध्ययने वन्दनादिरूपया मुनिभन्या कर्मक्षयो दर्शितः, इह तु मिथ्यात्वाऽविरत्यादिपरित्यागेन कर्ममूलं प्रतिषि
। चौथा अध्ययन । नीमरे अध्ययनमें वन्दनापूर्वक गुरु महाराजके समीप प्रतिक्रमण की प्रतिज्ञा करने की विधि दिग्वलाई गई है। अब इस चौथे अध्ययन में उसी प्रतिक्रमण को दिग्वलाते हैं । अथवा तीसरे अध्ययनमें 'अर्हन्त भगवान से उपदिष्ट सामायिक करनेवाले भव्यों को गुरुकी वन्दनारूप प्रतिपत्ति (सेवा) करनी चाहिये' ऐसा कहा है, अब इस चौथे अध्ययन में वन्दना आदि न करने के कारण स्खलित आत्मा की निन्दा की जाती है, अथवा वन्दनाध्ययन में यह दिखलाया गया है कि 'वन्दनादिरूप मुनिभक्ति से कर्मक्षय होता है' और इस अध्ययनमें मिथ्यात्व अविरति आदिका त्याग
योथु २मध्ययन. ત્રીજા અધ્યયનમાં વંદનાપૂર્વક ગુરુ મહારાજની સમીપ પ્રતિક્રમણ કરવા માટે પ્રતિજ્ઞા કરવાની વિધિ બતાવવામાં આવી છે. હવે આ ચેથા અધ્યયનમાં તે જ પ્રતિક્રમણને બતાવે છે અથવા ત્રીજા અધ્યયનમાં “અહંત ભગવાનથી ઉપદેશ કરાએલી, સામાયિક કરનારા ભવ્ય જીને ગુરુની વંદનારૂપ પ્રતિપત્તિ (સેવા) કરવી જોઈએ” એમ કહેલ છે, હવે આ ચોથા અધ્યયનમાં વંદના વિગેરે ન કરવાના કારણે ખલિત આત્માની નિંદા કરવામાં આવે છે, અથવા વંદના અધ્યયનમાં આ બતાવવામાં આવ્યું છે કે “વંદનાદિરૂપ મુનિભકિતથી કર્મને ક્ષય થાય છે અને આ અધ્યયનમાં મિથ્યાત્વ અવિરતિ વિગેરેને
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१५८
आवश्यकमुत्रस्य ध्यते । प्रतिशब्दोऽत्र प्रातिकूल्ये तेन प्रतिकूलं क्रमणं-परावृत्य गमनं-पतिक्रमणं', पूर्व शुभयोगेभ्यो विनिष्क्रम्याऽशुभयोगसंप्राप्तस्यात्मनः पुनस्तेष्वेव शुभयोगेषु संक्रमणमित्यर्थः । तथा चोक्तम्
" स्वस्थानादपरस्थाने. प्रमादात्संगतस्य यत् । तत्रैव क्रमणं भूयः प्रतिक्रमणमुच्यते ॥” इति, " गतस्यौदयिकं भावं क्षायोपशमिकात्पुनः ।
क्षायोपशमिकाऽऽवेशः प्रतिक्रमणमुच्यते ॥” इति च । यद्वा प्रतिशब्द आभिमुख्यार्थकः 'लक्षणेनाभिप्रती आभिमुख्ये' इत्यादौ करने से कर्मनिदान का प्रतिषेध दिखलाया जाता है। शुभ योग से अशुभयोगमें पहुंची हुई आत्माको फिर से शुभयोगमें लेजानेका नाम प्रतिक्रमण है । जैसा कि कहा है
___ 'प्रमाद वश अपने स्वरूपसे अशुभ योगमें प्रवृत्त आत्माका जो फिरसे अपने स्वरूपमें आना उसे प्रतिक्रमण कहते हैं ॥१॥' तथा
'क्षायोपशमिक भावसे औदयिक भाव को प्राप्त आत्मा के फिरसे क्षायोपशमिक भावमें प्रवेश करने को प्रतिक्रमण कहते हैं ॥१॥
अथवा जिससे मोक्ष के सन्मुख जाया जाय, या शुभ ત્યાગ કરવાથી કમનિદાનને પ્રતિષેધ બતાવવામાં આવે છે. શુભયેગથી અશુ ભાગમાં પહોંચેલ આત્માને ફરીથી સુભાગમાં લઈ જવાનું નામ પ્રતિક્રમણ છે. જેમ કહ્યું છે કે
પ્રમાદવશ પિતાના સ્વરૂપથી અશુભ યોગમાં પ્રવૃત્ત આત્માનું ફરીથી પિતાના સ્વરૂપમાં આવવું તેને પ્રતિક્રમણ કહે છે કે ૧ .
તથા લાપશમિક ભાવથી ઓયિક ભાવને પામેલ આત્માને ફરીથી સાપશમિક ભાવમાં પ્રવેશ કરવાને પ્રતિક્રમણ કહે છે (૧)
અથવા જેનાથી મેક્ષની સન્મુખ જવાય અથવા શુભમાં વારંવાર १-प्रतिक्रमणशब्दश्च प्रति+पूर्वकात् 'क्रमु पादविक्षेपे' इत्यस्मात्
युट् प्रत्यये सिद्धः ।
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मुनितोषणी टीका, पतिक्रमणाध्ययनम्-४
१५९ तथादर्शनात् , क्रमुधातुश्च गमनार्थकस्तेन पति-मोक्षाभिमुखं क्रम्यते-गम्यतेऽनेनेति, अथवा मतिशब्दस्य भृशार्थकत्वाच्छुभयोगेषु वारं वारं क्रमणं प्रतिक्रमणम् । तत्र (पतिक्रमणे) ध्यानविषयीकृतम्-'आगमे तिविहे' इति पट्टिकाया आरभ्य 'इच्छामि ठामि' इति पर्यन्तं सर्व प्रस्फुटं वनव्यं, तदनु 'तिक्खुत्तो' इत्यस्य पाठेन सविधि वन्दनां विधाय श्रमणसूत्रस्याज्ञा ग्रहीतव्या, ततो नमस्कारमन्त्रोचारणपूर्वकं 'करेमि भंते' इत्युचार्य माङ्गलिकमुच्चारणीयमिति । सम्पति माङ्गलिकसूत्रमाह-'चत्तारि' इत्यादि ।
॥ मूलम् ॥ चत्तारि मंगलं-अरिहंता मंगलं, सिद्धा मंगलं, साहू मंगलं, केवलिपन्नत्तो धम्मो मंगलं । चत्तारि लोगुत्तमा-अरिहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा, केवलिपन्नत्तो धम्मोलोगुत्तमो । चत्तारिसरणं पवज्जामि, अरिहंते सरणं पवजामि, सिद्धे सरणं पवजामि, साहू सरणं पवजामि, केवलिपण्णत्तं धम्मं सरणं पवजामि ॥ सू० १॥ योगों में बार वार जो संक्रमण (जाना) उसको प्रतिक्रमण कहते हैं। इसमें 'आगमे तिविहे' से लेकर 'इच्छामि ठामि' तक ध्यानमें चिन्तित सव पाटियों (पाठों) को प्रगट रूपसे योले, बादमें 'तिक्खुत्तो के पाठसे विधिपूर्वक वन्दना करके श्रमणसूत्र की आज्ञा लेवें तय नमस्कार मन्त्र के उच्चारणपूर्वक 'करेमि भंते' की पाटी पोल कर मांगलिक योले, ऐसा नियम है, इस कारण यहां मांगलिक कहते हैं-'चत्तारि' इत्यादि । Key (r) तेरे प्रति भए डे 2, मेमा “आगमे तिविहे" थी सन 'इच्छामि ठामि' सुधा प्यानमा वितित मी पाटिया (48) 3२ ३५ नावे. पछी 'तिक्खुत्तो' ना ५४ विधि- ना शत श्रम सूत्रता भाज्ञा स नभ२४१२ भावना वा ५४ (करेमि भंते) नी पाटी मासीन માંગલિક બેલવું. એ નિયમ છે. એટલા માટે અહિંયા માંગલિક કહે છે. 'चत्तारि' इत्यादि
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आवश्यकमूत्रस्य ॥ छाया ॥ चत्वारो मङ्गलम्-अईन्तो मङ्गलं, सिद्धा मङ्गलं, साधवो मङ्गलं, केवलिप्रज्ञतो धर्मों मङ्गलम् । चत्वारो लोकोत्तमाः-अर्हन्तो लोकोत्तमाः, सिद्धा लोको. समाः, साधवो लोकोत्तमाः, केवलिपज्ञप्तो धर्मों लोकोत्तमः । चतुरः शरणं प्रपद्येआतः शरणं प्रपद्ये, सिद्धान् शरणं प्रपद्ये, साधून शरणं प्रपद्ये, केवलिमज्ञप्तं धर्म शरणं प्रपद्ये ॥ मू. १॥
॥ टीका ॥ _ 'चत्तारि' चत्वारः, 'गलं' मङ्गलम्-मङ्गः श्रुतचारित्रादिरूपो धर्मस्तं लाति आदत्त इति 'मङ्गलम् , यद्वा मां गालयति-भवादपनयतीति, मङ्कनं मङ्क: भूषणं-ज्ञानदर्शनादि तं लाति आदत्त इति वा मङ्गलम् , अथवा मङ्ग्यते= पाप्यते हितमनेनेति मङ्गलम् । अत्रैकवचनं तु अईदादिचतुष्टयनिष्ठस्य मङ्गलवस्येकत्वेन 'सूत्राणि प्रमाणम्' इत्यादिवत्, तत्र हि पमितिकरणतावच्छेदकं सूत्रत्वाबच्छिन्नयावत्सूत्रनिष्ठमेकमेवेत्यवच्छेदकैकत्वमादायैकवचनप्रयोगः, "स्पष्टमिदम- . न्यत्र विस्तरेण । 'चत्तारि' इत्युक्तं, सम्पति चतुःपदार्थानाह-'अरिहंता'
चार मंगलस्वरूप हैं, मंगल उसको कहते हैं जो श्रुत चारित्र रूप धर्म को देनेवाला हो, अथवा मुझ (नमस्कार करनेवाले) को संसारसे पार करने वाला हो, या मङ्क-ज्ञान दर्शन आदि भूषण को धारण करनेवाला हो, अथवा जिसके द्वारा हितकी प्राप्ति हो। इस प्रकार सामान्यतया मंगलका निरूपण करके अब चार शन्दसे जो लिए जाते हैं उन का निरूपण करते हैं-अर्हन्त
ચાર મંગળ સ્વરૂપ છે, મંગળ તેને કહે છે કે જે શ્રત ચારિત્રરૂપ ધર્મને દેવાવાળે હેય. અથવા મને (નમસ્કાર કરવાવાળાને) સંસારથી પાર કરનારા હેય. અથવા ન જ્ઞાન દર્શન વિગેરે ભૂષણને ધારણ કરવાવાળા હેય. અથવા જેના દ્વારા હિતની પ્રાપ્તિ થાય, આવી રીતે સામાન્ય પ્રકારે મંગળનું નિરૂપણ કરીને હવે ચારથી જે લેવાય તેનું નિરૂપણ કરે છે. અહત-સમસ્ત વિનેનાં १- 'आतोऽनुपसर्गे कः' (३।२।३) इति कपत्यये 'आतो लोप इटी'-त्यालोपः। २-मङ्क:-'मकि मण्डने' भौत्रादिक आत्मनेपदी, सिदिः पृषोदरादिपाठात् । ३- 'मङ्गलम्'-गत्यर्थकात् 'मगि' धातोरौणादिकोऽलच् प्रत्ययः । ५- अन्यत्र व्युत्पत्तिवादादिषु ।
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सुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
१६१ अहन्तः ‘मंगलं' मालम्-सकलविघ्नविनाशकत्वान्मङ्गलस्वरूपत्वेन सामानाधिकरण्यमुभयोः, मालत्वस्य जातेः सर्वेष्वर्हत्स्वेकत्वेनैकवचनमिति प्रागुकं न विस्मतव्यम् । 'सिद्धा मंगलं' निगदस्पष्टमिदम् । 'साहू मंगलं' साधवो मङ्गलम् , साधुपदेनाऽऽचार्योपाध्याया अपि लक्ष्यन्ते तेषामपि साधुताऽवच्छेदकधर्मवत्त्वात् , अदादिपदव्याख्या च नमस्कारमन्त्रे गता। 'केवलिपण्णत्तो धम्मो केवलं केवलज्ञानमस्त्येषामिति केवलिनस्तैः प्रजातः मरूपितः केवलिपज्ञप्तः, धर्मः श्रुतचारित्रलक्षणः 'मंगलं' मङ्गलस्वरूपः। 'चत्तारि' चखारः ‘लोगुत्तमा' कोकेषु-द्रव्यभावरूपेषु उत्तमाः श्रेष्ठा लोकोत्तमाः। 'लोकस्योत्तमाः' इति व्याख्यानं तु न सम्यक्, निरिणषष्ठयामेकवचनान्तवस्यासक्तेः, 'न निर्दारणे' (२।२।१०) इति समासप्रतिषेधाच । 'अरिहंता लोगुत्तमा' अन्तिो लोकोत्तमाः । 'सिद्धा लोगुत्तमा' सिद्धा लोकोत्तमाः। 'साहू लोकोत्तमा' साधनो लोकोत्तमाः 'केवलिपण्णतो धम्मो लोगुत्तमो' केबलिप्रज्ञप्तो धर्मों लोकोत्तमः । 'चारि' चतुरः, 'सरणं' शरणम् 'पवजामि' प्रपद्ये-पामोमि चतुर्गविभ्रमणभयपरित्राणायेत्यर्थात् । 'अरिहंते सरणं पवजामि' अतः शरणं अपधे । 'सिद्धे सरणं पवज्जामि' सिद्धान् शरणं प्रपद्ये । 'केवलिपण्णचं धम्म सरणं पत्रज्जामि केवलिमानसं धर्म शरणं प्रपद्ये, निगदव्याख्यातमिदं सर्वम् ।।मू० १॥ समस्त विघ्नों के विनाशक होने से मंगलस्वरूप है १। वैसे ही सिद्ध मंगलस्वरूप हैं २। साधु पदसे यहं पर साधु, आचार्य, उपाध्याय, तीनों का ग्रहण है अत एव अर्थ हुआ कि-साधु, आचार्य तथा उपाध्याय मंगलस्वरूप हैं ३। केवली प्ररूपित धर्म मंगलस्वरूप है ४। ये ही चार लोकमें उत्तम हैं अत एव इन्हीं चारों की शरण को मैं प्राप्त होता हूँ, क्यों कि चतुर्गति-भ्रमण के भय को हटाने वाले ये ही चार हैं ॥ सू० १॥ નાશ કરવાવાળા હેવાથી મંગલસ્વરૂપ છે (૧) તેવી જ રીતે સિદ્ધ મંગલ२१३५ छे. (२) साधु ५४थी महिया साधु, मायाय, उपाध्याय, पेनु म छे. એટલા માટે અર્થ છે કે સાધુ, આચાર્ય તથા ઉપાધ્યાય મંગલસ્વરૂપ છે. (૩) કેવળિપ્રરૂપિત ધર્મ મંગળસ્વરૂપ છે. (૪) એ જ ચાર લેકમાં ઉત્તમ છે. એટલે એ ચારેનાં શરણને હું પ્રાપ્ત થાઉં છું. કારણ કે ચતુર્ગતિ-બ્રમણના ભયને હટાવવાવાળા એ જ ચાર છે.
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आवश्यकत्रस्य ___ अथ 'इच्छामि ठामि काउस्सग्गं' इति सम्पूर्णी पट्टिकां पठित्वा 'इच्छामि पडिक्कमिउं' इति सर्वा पट्टी पठेद, सैषा-'इच्छामि० इरियावहियाए' इत्यादि ।
॥ मूलम् ॥ इच्छामि पडिक्कमिउं इरियावहियाए विराहणाए गमणागमणे, पाणकमणे, बीयकमणे, हरियक्कमणे ओसा-उत्तिंग-पणगदग-मट्टी-मक्कडा-संताणा-संकमणे जे मे जीवा विराहियाएगिदिया, बेइंदिया, तेइंदिया, चउरिंदिया, पंचिंदिया, अभिहया, वत्तिया, लेसिया, संघाइया, संघट्टिया, परियाविया, किलामिया, उद्दविया ठाणाओ ठाणं संकामिया, जीवियाओ ववरोविया तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ॥सू० २॥
॥ छाया ॥ इच्छामि पतिक्रमितुमैर्यापथिक्याः (क्यां) विराधनायाः (यां), गमनागमने भाणातिक्रमणे, बीजाक्रमणे, हरिताक्रमणे, अवश्यायोतिङ्गपनकोदकमृत्तिकामर्कटसन्तानसंक्रमणे ये मया जीवा विराधिताः-एकेन्द्रियाः, द्वीन्द्रियाः, त्रीन्द्रियाः, चतुरिन्द्रियाः, पश्चेन्द्रियाः, अभिहताः, वर्तिताः, श्लेषिताः, संघातिताः, संघट्टिताः, परितापिताः, क्लमिताः, अबदारिताः, स्थानात्स्थानं संक्रामिताः, जीवितायपरोपितास्तस्य मिथ्या मयि दुष्कृतम् ॥
॥ टीका ॥ 'इरियावहियाए' ऐर्यापथिक्याः ईरणमीर्या=संयमिनां गमनम् , पथिभवा पन्थानं गच्छतिमामोतीति वा 'पथिकी, ईर्याप्रधाना पथिकी ई-पथिकी,
इसके बाद 'इच्छामि ठामि काउस्सगं' की पाटी पढकर 'इच्छामि पडिक्कमिउं' की पूरी पाटी पढे, वह इस प्रकार-'इच्छामि. इरियावहियाए' इत्यादि।
हे गुरुमहाराज ! मैं ईर्यापथसम्बन्धी विराधना से निवृत्त
तपछी 'इच्छामि ठामि काउस्सगं' - luीने इच्छामि पडिक्कमिउं' नी ५री पारी मालवी, ते भा प्रा३-'इच्छामि० इरियावहियाए' इत्यादि. હે ગુરુમહારાજ ! હું ઈયપથસબંધી વિરાધનાથી નિવૃત્ત થવા ઈચ્છું છું.
१-पथिकी-‘पयःष्कन्' (५। १ । ७५) इति ष्कन् प्रत्ययः पित्त्चान्की ।
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नितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम् - ४
१६३
यद्वा ईर्याप्रधानः पन्थाः = ई : = ईर्यापथस्तत्र भवा = ऐर्यापथिकी = ईर्ष्या पथसम्बन्धिनी विराधनेति यावत् तस्याः । ' पडिकमिडं' प्रतिक्रमितुं निवर्तितुम् इच्छामि' स्पष्टमिदम् । अथ विराधनाविषयान् दर्शयति —
"
तत्राऽवश्यायः=
'गमणागमणे' गमनं चाऽऽगमनं च गमनागमनं, तस्मिन् गमनागमने तत्र गमनं = स्वाध्यायादिनिमित्तमुपाश्रयाद्वहिः प्रस्थानम् आगमनं कार्य समाप्तौ परादृत्य पुनरुपाश्रय एव समागमनम् । अतिचारोत्पतौ निदानमाह-'पाणकमणे' इत्यादि, माणाः सन्त्येषामिति प्राणाः = द्वीन्द्रियादयः प्राणिनस्तेषाम् आक्रमर्ण = पादादिना पीडनं प्राणाक्रमणं तस्मिन् । 'वीयकमणे' बीजानि प्रसिद्धानि तेषामाक्रमण बीजाक्रमणं तस्मिन् । 'हरियकमणे ' हरितस्य = वनस्पतिमात्रस्याssक्रमण हरितक्रमण तस्मिन् । 'ओसाउसिंग पणगद्गमट्टी मक्कडासंताणासंक्रमणे ' अवश्यायश्वोत्तिङ्गश्च पनकश्च दकं च मृत्तिका च मर्कटकसन्तानश्वेत्येतेषां द्वन्द्वे अत्र इयायोचिङ्गपनक- दक- मृत्तिका मर्कटकसन्तानास्तेषां संक्रमण = आक्रमणम् तस्मिन, य: = मेघमन्तरेण रात्रौ पतितः ऋक्ष्मतुषाररूपोऽकाय विशेषः 'ओस' इति भाषाप्रसिद्धः, उनिङ्गाः = भूमौ वर्तुलविवरकारिणो गर्दभमुखाकृतयः कीटविशेषाः कीटिकानगरादयो वा, पनकः = अङ्कुरितोऽनङ्कुरितो वा पञ्चवर्णानन्तकाय विशेषः, जलसम्बन्धेन जायमानः पिच्छिलाकार: 'काई' इति लोकप्रसिद्धः, 'दकम् =उदकमष्कायः, मृत्तिका = सचित्तपृथ्वीकायः, मर्कटकसन्तानः = लूताजालम् । होना चाहता हूँ । स्वाध्याय आदि के लिये उपाश्रय से बाहर जाने में और लौटकर फिर उपाश्रय आने में पैर आदि से प्राणियों के दब जानेमें, बीजों के दब जानेमें, वनस्पति के दब जानेमें, ओस, उसिंग (कीट विशेष), पंचवर्ण पनक (फूलन), पानी, मिट्टी, मकडेके जाल आदि के कुचल जानेमें, जो एक સ્વાધ્યાયાદિ નિમિત્ત ઉપાશ્રયમાંથી બહાર જવામાં અને પાછા ક્રી ઉપાશ્રયે આવવામાં, પગ વિગેરેથી પ્રાણીઓના દબાઈ જવામાં, ખીજ વગેરે દબાઈ જવામાં, વનસ્પતિના દુખાઈ જવામાં, એસ, ઉત્તિગ (એક પ્રકારનું જીવડું),
પંચવણું
पन (साथ), पाणी, भाटी, भडोडीनी लस विगेरेना उयराध क्वामां ने मे४
१ - ' गमनागमनम् ' अत्र द्वन्द्वेनैकवचनान्तता ।
२ - प्राणाः - 'अर्श आदिभ्योऽच् ' इत्यचप्रत्ययः ।
३ - दकं-जलम् -' प्रोक्तं प्राज्ञैर्भुवनममृतं जीवनीयं दकं च' इति हलायुधः ।
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आवश्यकसूत्रस्थ एवमन्येऽपि 'जे' ये 'एगिदिया' एकं स्पर्शरूपमिन्द्रियं येषां त एकेन्द्रियाः= पृथिव्यादयः, 'बेइंदियां' द्वीन्द्रियाः कृमिप्रभृतयः, 'तेइंदिया' त्रीन्द्रियाः= पिपीलिकाद्याः, 'चउरिदिया' चतुरिन्द्रियाः देशमशकभ्रमरायाः, पंचिंदिया' पञ्चेन्द्रियाः गृहगोधिकाधाः 'मे' मया 'विराडिया' विराधिताः दुःखीकृताः, 'अभिहया' अभि-साम्मुख्येन हताःचरणादिस्पर्शन परिपीडिताः, 'बत्तिया' वर्तिताः धूल्यादिषु विलोठिता धूल्यादिभिराहता वा, यद्वा परिवर्तिताः यथावस्थानाद्वैपरीत्यं नीता इत्यर्थः, 'लेसिया' श्लेषिताः सम्मर्दिताः, 'संघाइया' संघातिताः मिथः संयोजिताः, 'संघट्टिया' संघट्टिताः ईषत्स्पृष्टाः, 'परियाविया' परि=सर्वतोभावेन तापिता:=पीडिताः, 'किलामिया' क्लामिता:ग्लानिमानीताः, 'उद्दविया' अपद्राविताः उपद्राविता वा त्रासिता इत्यर्थः, 'ठाणाओ ठाणं संकामिया' स्थानात एकस्मात् स्थानात् स्थानं स्थानान्तरं संक्रामिताः मापिताः, 'जीवियाओ ववरोविया' जीवितं जीवनं तस्माद् व्यरोपिताः मोचिताः, 'तस्स' तस्य-तत्सम्बन्धिनोऽतिचारस्य 'मि' मयि स्थितमिति शेषः, 'दुक्कडं' 'दुष्कृतं पापं 'मिच्छा' मिथ्या निष्फलमस्त्वितिशेषः ॥मृ०२॥
एवं गमनागमनातिचारमुक्त्वा सम्पति स्ववर्तनस्थानातिचारइन्द्रियवाले, दो इन्द्रियवाले, तीन इन्द्रियवाले, चार इन्द्रियवाले, पांच इन्द्रियवाले जीव मुझसे विराधित (दुखी) हुए हों, कुचले गये हों, धूल आदिमें लुढकाये या ढके गये हों, किसी प्रकार मसले गये हों, इकट्ठे किये हों, छ्ये गये हों, सताये गये हों, थकाये गये हों, अथवा जीवसे रहित किये गये हों तो 'तस्स मिच्छा मि दुक्कडं'
इस प्रकार गमन--आगमन सम्बन्धी अतिचार कहकर शयन ઇંદ્રિયવાળા, બે ઇંદ્રિયવાળા, ત્રણ ઇંદ્રિયવાળા, ચાર ઇંદ્રિયવાળા, પાંચ ઇંદ્રિયવાળા જીવ મારાથી વિરાતિ (દુખી) થયા હોય, કચરાઈ ગયા હય, ધૂળ વિગેરેમાં ઢંકાઈ ગયા હોય, કોઈ પ્રકારે મરડાઈ ગયા હોય, ભેગા કરાયા હોય, સ્પર્શ થઈ ગયે હય, સતાવ્યા હોય, થકાવ્યા હોય અથવા જીવથી રહિત કર્યા હોય તે 'तस्स मिच्छा मि दुक्कडं'.
આવી રીતે ગમન આગમન સંબંધી અતિચાર કહીને શયન આદિમાં પડખું
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४ प्रतिक्रमणमुच्यते-'इच्छामि० पगामसिजाए' इत्यादि ।
॥ मूलम् ॥ इच्छामि पडिक्कमिउं पगामसिजाए निगामसिजाए संथाराउव्वट्टणाए परियट्टणाए आउंटणाए पसारणाए छप्पईसंघट्टणाए कूइए कक्कराइए छिइए जंभाइए आमोसे ससरक्खामोसे आउलमाउलाए सोवणवत्तिआए इत्थीविप्परिआसिआए दिडिविप्परिआलिआए मणविप्परिआसिआए पाणभोयणविप्परिआसिआए जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ॥सू०३॥
॥ छाया ॥ इच्छामि प्रतिक्रमितुं प्रकामशय्यया निकामशय्यया संस्तारकोद्वर्त्तनया परिवर्तनया आकुश्चनया प्रसारणया षट्पदीसंघटनया कूजिते कर्करायिते क्षुते जृम्भिते आमर्शे सरजस्कामर्श आकुलाकुलया स्वमप्रत्ययया स्त्रीवैपर्यासिक्या दृष्टिवैपर्यासिक्या मनोवैपर्यासिक्या पानभोजनवैपर्यासिक्या यो मया दैवसिकोऽतिचारः कृतस्तस्य मिथ्या मयि दुष्कृतम् ।।
॥ टीका ॥ 'पडिक्कमिउं' प्रतिक्रमितुं निवतितम् , 'इच्छामि' अभिलषामि, 'पगामसिज्जाए' शयनं शय्या' , प्रकामं शय्या 'प्रकामशय्या तया, रात्रिआदि में करवट बदलने आदि से होनेवाले अतिचारों की निवृत्ति कहते है-'इच्छामि पगामसिजाए' इत्यादि । हे भगवन् ! मैं दिन-रात सम्बन्धी शयन आदि अतिचारों से निवृत्त होना मा ३२११ामा यना मतियाशेनी निवृत्ति छे. इच्छामि पगामसिज्जाए' इत्यादि। હે ભગવાન ! હું દિવસ-રાત્રિ સંબંધી શયન વિગેરે અતિચારોથી નિવૃત્ત થવાને ચાહું છું તે અતિચાર અગર અધિક સુવાથી અથવા વિના કારણે સુવાથી અથવા
१ शय्या'-शील स्वमें अस्मात् 'संज्ञायां समज-निषद्-निपत-मन-विदपुन्-शीङ्-भृत्रिणः' (३ । ३ । ८८) इति भावे क्यप् । किन्तु
‘कृत्यल्युटो बहुलम्' इति वचनाद् 'य' प्रत्ययः 'त्युक्तिस्तु व्याकरणानवबोधमूलवेत्यलमितराक्षेपेण ।
२ 'प्रकामशय्या'-अत्र सुप्मुपेति समासः ।
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आवश्यकसूत्रस्य मध्ययामद्वयाधिकशयनेन निष्कारण दिवाशयनेन वा, यद्वा-बहालस्यादिननिकया मृदुतमया स्थलशय्ययेत्यर्थः। मध्ययामद्वयाधिकशयनस्य स्वाध्यायपतिरोधकत्वेन प्रतिषेधाव । 'निगामसिज्जाए' प्रकामशय्यैव नित्यमासेव्यमाना 'निकामशय्ये'-त्युच्यते । 'संथारा' इति लुप्तसप्तम्यन्तं पृथक्पदं, समासे तु सति 'संथारा' इत्यस्य ‘परियट्टणाए' इत्यनेन विवक्षितः सम्बन्धो न स्यात् ‘पदार्थः पदार्थेनान्वेति नतु पदार्थैकदेशेन ' इतिसिद्धान्तात् , समासे च विशिष्ट एव शक्तिस्वीकारेण तदेकदेशस्य पदार्थवाभावादिति 'पपश्चितमन्यत्र, संस्तीर्यतेऽस्मिन्निति संस्तरणं वा संस्तारः आस्तरणं तस्मिन् , 'उन्चट्टणाए' उद्धवर्तनमुद्वर्तना-प्रमार्जनमन्तरेण दक्षिणपार्वाऽऽवर्तनं तया, 'परियट्टणाए' परिवर्तनं परिवर्तनाबामपाश्र्वावर्तनं तया, 'आउंटणाए' आकुश्चनमाकुचना-शरीरसङ्कोचस्तया, 'पसारणाए' प्रसारणं प्रसारणा-शरीरसञ्चारणं तया, एतत्पर्यन्तं 'प्रमार्जनमन्तरेणे'-त्यस्य शेषो बोद्धव्यः । 'छप्पईसंघट्टणाए' षट्पयो यूका स्तासां संघट्टनम् अयथावत्स्पर्शः षट्पदीसंघटना तया, 'कूइए' कूजितं? कूजन-क्लेष्मादिवशेनाऽयथावत्कासनं, तस्मिन् सतीत्यर्थः । 'ककराईए' कर्कचाहता हूँ। वे अतिचार चाहे अधिक सोनेसे या बिना कारण सोने से, अथवा अत्यन्त कोमल मोटी (जाडी) शय्या पर सोने से तथा ऐसी शय्या का नित्य सेवन करने से, बिछौने (संथारे) पर शरीर के दिन पूजे करवट लेने से, बिन पूंजे अंगोपांग के संकोचन और पसारने से, जॅ आदि के अविधिपूर्वक स्पर्श से, अविधि से खांसी आदि के करने से, अयतना पूर्वक छींकने तथा અત્યંત કેમલ મટી શા ઉપર સુવાથી તથા એવી પથારીને નિત્ય ઉપગ કરવાથી, પથારી (સંથારા) ઉપર શરીરને પંજ્યા વિના કરવટ લેવાથી, પંન્યા વિના અંગ-ઉપાંગને સંકોચવા–પસારવાથી, શું આદિના અવિધિપૂર્વક સ્પર્શથી. અવિધિએ ઉધરસ વિગેરે ખાવાથી, અયતનાપૂર્વક છીંકવાથી તથા બગાસું
१ अन्यत्र-'वैयाकरणषभूण-लघुमञ्जुषादिषु' । २ भावे कः । ३ 'यस्य च भावेने ति सप्तमी, एवमग्रेऽपि ।
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४ रायिते-कर्करायित हा विषमेयं परुषेयं शय्या; तदुपरि कथं मया शयितव्यमित्यादि शय्यादोषकथनं तस्मिन् सति, 'छिइए' क्षुते-छिक्कादौ 'जंभाइए' जृम्भितं ज़म्भा तस्मिन् ; एतद्वयं चाविधिपूर्वकमेव कृतं सदतिचारोत्पादकमित्यवगन्तव्यम् ‘आमोसे' आमर्शः स्पर्शस्तस्मिन्-अपमायं हस्तादिना कण्डूयनस्वरूपे । 'ससरक्खामोसे' सह रजसा वर्तते सरजस्कः स चासावामर्शश्च सरजस्कामर्शस्तस्मिन् सचित्तरजोयुक्तवस्तुस्पर्श इत्यर्थः। इत्थं जाग्रतोऽतिचारमुक्त्वा सम्पति सुप्तस्य तमाह-'आउलमाउलाए' इति, आकुलाकुला-निद्रा प्रमादायभिभूतस्य मूलोत्तरगुणसम्बन्धिविविधोपरोधक्रियास्वरूपा, युद्ध-विवाह-राज्यप्राप्तिपभृतिसावधक्रियास्वरूपा वा तया। 'सोअणवत्तिआए' स्वप्नः शयनं प्रत्ययः हेतुर्यस्याः सा स्वप्नपत्यया' तया स्वमवशात्सञ्जातयेत्यर्थः, विराधनयेत्यर्थाद्गम्यते; स्वप्नवशात्सञ्जातया मूलोत्तरगुणसम्बन्धिविविधोपरोधक्रियास्वरूपया, युद्ध-विवाह-राज्यपाप्तिपमुखसावधक्रियास्वरूपया वा विराधनयेत्यर्थः। इमामेव पविभज्य प्रदर्शयति' इत्थीविप्परिआसिाए' खिया स्त्रीभिर्वा सह विपर्यासः स्वप्ने ब्रह्मचर्यस्खलनरूपो व्यत्यासस्तत्र भवेति, यद्वा विपर्यासे भवा वैप-सिकी स्त्रिया वैपर्यासिकी स्त्रीवैपर्यासिकी तया, 'दिहिविपरिआसिआए' स्वप्ने अनुरागवशात्स्यवलोकनं दृष्टिविपर्यासस्तत्र भवा दृष्टिवैपर्यासिकी तया, 'मणविप्परिआसिआए' स्वप्ने मनसा जंभाई लेने से, विना पूँजे खुजलाने से या सचित्त रजयुक्त वस्त्रादिके स्पर्श से जो अतिचार किया गया हो,ये सब जाग्रत अतिचार हुए, अब सुप्त अतिचार कहते हैं-एवं स्वन-अवस्थासम्बन्धी, मूलोत्तर गुणको दृषित करनेवाली, अथवा युद्ध, विवाह, राज्यप्राप्ति आदि सावध क्रिया अर्थात् स्वममें स्त्री के साथ कुशील सेवन, अनुराग पूर्वक स्त्री का अवलोकन, मनके विकार, तथा ખાવાથી, પૂજ્યા વિના ખોલવાથી અથવા સચિત્ત રજયુક્ત વસ્ત્રાદિકના સ્પર્શથી જે અતિચાર થયા હોય એ બધા જાગ્રત અતિચાર થયા, હવે સુપ્ત અતિચાર કહે છે – એવું સ્વપ્ન અવસ્થા સબંધી, મૂત્તર ગુણને દૂષિત કરવાવાળી અથવા યુદ્ધ, વિવાહ, રાજ્યપ્રાપ્તિ વિગેરે સાવદ્ય ક્રિયા અર્થાત્ સ્વપ્નમાં સ્ત્રીની
१-प्रत्ययोऽधीनशपथज्ञानविश्वासहेतुषु ।। इत्यमरः ॥
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भावश्यकसूत्रत्व विपर्यासो मनोविपर्यासस्तत्र भवा मनोवैपर्यासिकी तया, 'पाणभोअणविपरिआसिआए' स्वप्ने पानश्च भोजनश्च पानभोजने तयोविपर्यासः पानभोजनादिसेवनं तत्र भवा पानभोजनवैपर्यासिकी तया हेतुभूतमा विराधनया, 'जो' यः 'मे' मया, 'देवसिओ' देवसिकः 'अइयारो' अतिचारः, 'कओ' कृतः सम्पादितः 'तस्स' इत्यादि भाग्वत् ।
नन्वयमतिचारो न प्राप्नोति प्रतिषिद्धत्वादिवास्वापस्येति ? अत्रोच्यते यद्यपि प्रतिषिद्धो दिवास्वापस्तथाप्येतद्वचनसामर्थ्यादध्वश्रान्तादीनां नासौ पतिषिद्ध इति गम्यते ॥ इतित्वग्वर्तनातिचारमतिक्रमणम् ॥ सू० ३ ॥
गतं त्वग्वर्तनाऽतिचारप्रतिक्रमणं सम्पति गोचरातिचारपतिक्रमणमभि. धीयते-'पडिकमामि गोयर०' इत्यादि ।
आहार पानीके सेवन रूप विराधना के कारण मुझ से जो अतिचार किया गया हो 'तस्स मिच्छा मि दुक्कडं' ।
यद्यपि साधुओं के लिये दिनमें शयन का निषेध है तो भी यहां पर शयन सम्बन्धी दैवसिक अतिचार बताने से यह सिद्ध होता है कि विहार आदि से अधिक थकावट आजाने पर था अन्य अनिवार्य कारणों से यदि दिन में सोया जाय तो ऐसी अवस्था के लिये उक्त दैवसिक अतिचार पताये हैं ॥ सू० ३ ॥
इस प्रकार शयन सम्बन्धी अतिचारों का प्रतिक्रमण कह कर अब गोचरी के अतिचार सम्बन्धी प्रतिक्रमण कहते हैं'पडिकमामि गोयर० इत्यादि । સાથે સમાગમ, પ્રેમપૂર્વક સ્ત્રીનું જેવું, મનને વિકાર, તથા આહાર-પાણીના सेवन३पा विराधनाना २थे भाराथी को मतियार यया य. 'तस्स मिच्छा मि दुकडं'
યદ્યપિ સાધુઓને માટે દિવસમાં સુવાનું નિષેધ છે તે પણ શયન સબંધી દેવસિક અતિચાર બતાવવાથી એ સિદ્ધ થાય છે કે વિહાર આદિથી ખૂબ થાકી જવાના કારણે અથવા બીજા અનિવાર્ય કારણથી દિવસે સુવું પડે તે આવી અવસ્થાને માટે ઉપર કહેલું દેવસિક અતિચાર બતાવેલ છે. (સૂ૦ ૩)
આવી રીતે શયન સંબંધી અતિચારના પ્રતિક્રમણ કહીને હવે ગોચરીના भतिया२ संधी प्रतिभY ४९ - 'पडिकमामि गोयर० 'इत्यादि'
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
॥ मूलम् ॥ पडिकमामि गोयरचरियाए भिक्खायरियाए उग्घाडकवाडउग्घाडणाए साणावच्छदारासंघट्टणाए मंडीपाहुडिआए बलिपाहुडिआए ठवणापाहुडिआए संकिए सहसागारिए अणेसणाए पाणेसणाए पाणभोयणाए बीयभोयणाए हरियभोयणाए पच्छाकम्मियाए पुरेकम्मियाए अदिट्ठहडाए दगसंसट्टहडाए रयसं. सहहडाए पारिसाडणियाए पारिठावणियाए ओहासणभिक्खाए जं उग्गमेणं उप्पायणेसणाए अपरिसुद्धं पडिगाहियं परिभुत्तं वा जं न परिठविअं तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ॥ सू० ४॥
॥ छाया ॥ पतिक्रामामि गोचरचर्यायां भिक्षाचर्यायामुद्घाटकपाटोद्घाटनया इचवत्सदारकसंघट्टनया मण्डीमाभृतिकया बलिपाभृतिकया स्थापनापाभृतिकया शङ्किते सहसाकारिकेऽनेषणया पानैषणया पाणभोजनया बीजभोजनया हरितभोजनया पश्चात्कमिकया पुरःकर्मिकयाऽदृष्टाहतया उदकसंसृष्टाऽऽहतया रजःसंसटाहतया पारिशाटनिक्या (पारिशातनिक्या) परिष्ठापनिक्या ओहासनभिक्षया यद् उद्गमेन उत्पादनैषणयाऽपरिशुद्ध प्रतिगृहीतं परिभुकं वा यन्न परिष्ठापितं तस्य मिथ्या मयि दुष्कृतम्' ॥ मू० ४ ॥
॥ टीका ।। 'गोयररियाए' चरणं चरः गोश्वरो गोचरः, चर्या चरणमित्यपर्यायान्तरम् , गोचर इव चर्या निर्गोचरचर्या तस्यां तद्रूपायामिति भावः। 'भिकरवायरिआए' भिक्षायै चर्या भिक्षाचर्या तस्यां कुलेषत्तममध्यमाधमेषु वस्तुषु चेष्टानिष्टेषु रागादिराहित्येन लाभादिनरपेक्ष्येण च समचेतसा मुनिना भिक्षार्थमटनीयं तादृश्यां भिक्षाचर्याया
___ गायके समान जगह जगह से थोडा थोडा आहार लेने के लिये भ्रमण करने का नाम गोचरचर्या है, तत्स्वरूप जो भिक्षाचर्या (अर्थात् उत्तम मध्यम और नीच (साधारण) कुलों में तथा इष्टગાયની જેમ ઠેકાણે ઠેકાણેથી શેડ ડે અ હાર લેવા માટે ફરવું તે કામને ગેચરચર્યા કહે છે તસ્વરૂપ જે ભિક્ષાચય ( અર્થાત્ ઉત્તમ મધ્યમ અને નીચ
१-भिक्षायामीविधत्वमुपदर्शयितुमेवोक मूले-गोचरचर्ययेति ।
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आवश्यक सूत्रस्य
मित्यर्थः अस्याग्रे सम्बन्धः । अत्र यथाऽतिचारस्तं सप्रभेदमाह - 'उग्वाडकवाडउग्घाडणाए' उद्घाटयत इति, यद्वा उद्गतो घाट : = घटनं = परस्परसंयोजनं यस्य तदुद्वाटं किञ्चित्स्थगितमदत्तविष्कम्भकं वा तच्च तत्कपाटं च उद्घाटकपाटं तस्योद्वाटना = ममार्जनमन्तरेण स्वामिनिदेशमन्तरेण वा मोचनमुद्घाटक पाटोद्घाटना तया । 'साणात्रच्छदारासंघट्टणाए ' श्वा = कुक्कुरः, वत्सः = गया पत्यरूपो वत्सतरः, दारकः= बालकः, श्वा च वत्सश्च दारकश्चेत्येतेषामितरेतरयोगद्वन्द्वे श्ववत्सदारकास्तेषां संघट्टना=गात्रैः संहतीकरणं श्ववत्सदारकसंघट्टना तया, उपलक्षणमिदं गवादीनामपि । 'मंडी पाहुडियाए ' मण्डी = अग्रकूरः ( अग्रभक्तं ) तस्याः प्राभृतिका=प्राभृतपढौकन मिति यावत्, यद्वा प्र=प्रकर्षेण आ= मर्यादया भृता साध्वर्थे संरक्षिता प्राभृता, सैव माभृतिका तया । 'बलिपाहुडिआए' बलिः = देवभूताद्युद्देशेन देयमन्नादि तस्य प्राभृतिका तया । 'ठत्रणापाहुडिआए' स्थाप्यत इति स्थापना = कृपणवनीपकादिभ्यः स्थापितमन्नादि तस्याः प्राभृतिकेति प्राग्वत्तया, 'संकिए ' अनिष्ट वस्तुओंमें रागादिरहित हो कर लाभालाभमें समानभाव से आहारादि ग्रहण करना) उसमें विना सांकलके ढके हुए या अधढके हुए किवाडों को विना पूँजे अथवा विना स्वामी की आज्ञाके खोलने से, कुत्ते, बछडे, बालक आदिको ढकेलकर या लांघकर जाने से, कुत्ते आदिके लिये निकाले हुए अग्रपिण्डके लेने से, देवता भूत आदिकी बलि के लिये तथा याचक-कृपण आदिके (સાધારણ) કુળમાં તથા ઇષ્ટ અનિષ્ટ વસ્તુઓમાં રાગાદિ રહિત થઈને લાભાલાભમાં સમાન ભાવથી આહાર આદિ ગ્રહણ કરવું) તેમાં સાંકળ વિના બંધ કરેલ અગર અર્ધા વાસેલા કમાડને પૂજ્યા વિના અથવા ધણીની આજ્ઞા વિના ખેાલવાથી, કુતરા, વાછરડા, બાલક આદિને ધકેલીને અથવા મેાળંગીને જવાથી, કુતરા વિગેરે મટે કાઢેલે અત્રપિંડ લેવાથી, દેવતા, ભૂત વિગેરેના બલિના માટે તથા યાચક-કૃપણ
१ - हन्तकारादिस्वरूपं 'हन्दा' इत्यादिना पञ्चापादिपदेशेषु प्रसिद्धं, यद्वा कुक्कुरादिकृते रक्षितम्, 'मण्डूकडी' इति राजस्थानादौ प्रतीतम् ।
२ - इदं हि कस्मैचिदिष्टाय पूजनीयाय वा स्नेहात्सब हुमानं देयमिष्टं वस्तु, तस्सादृश्यात्साधुभ्यो देयं भिक्षाद्यपि ।
३ - बाहुलकारकर्मणि 'ण्यासश्रन्यो युच्' ( ३ । ३ । १०७ ) इति युच् ।
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मुनितोषणी टीका, पतिक्रमणाध्ययनम्-४ शङ्का सञ्जाता यरिंमम्तच्छङ्कितं तस्मिन् , आधाकर्मादिदोषदुष्टेऽन्नादावित्यर्थात् , सनिसप्तमीयम्, तृतीयान्तानामिव सप्तम्यन्तानामपि सर्वेषां परस्परं निरपेक्षतया 'नं उग्गमेणं' इत्यादिनाऽग्रेतनेनैवान्वयः, 'सहसागारिए' सहसा करणं सहसाकारस्तत्र भवः सहसाकारिक: आकस्मिक आहारस्तस्मिन , 'अणेसणाए' न एषणा= ग्राह्यमिदमग्राह्यं वेत्याधन्वेषणाभावो यस्यां भिक्षाचर्यायां सा अनेषणा तया, 'अण्णेसणाए' इतिपाठे अन्नस्य भक्तादेः एषणा परीक्षणं यस्यां सा अन्नषणा तयेति बोध्यम् ; हेतौ तृतीया, 'पाणेसणाए' पीयत इति पानं जलादि तस्यैषणा= अन्वेषणं यस्यां सा पानेषणा तया; पानेषणायां वैषम्येणेति भावः, पाणभोयणाए' प्राणाः सन्त्येषामिति प्राणाः द्वीन्द्रियाद्यास्तन्मिश्रिता भोजना प्राणभोजना तया, भवति हि कदाचिद्दध्यादिप्रदानवेलायां दातुग्रहीतुर्वाऽपराधेन द्वीन्द्रियादीनां जीवानां सम्मिश्रणेन संघटनेन वा व्यापादनम् ; अयमेव चात्रातिचारो बोद्धव्यः। 'वीयभोयणाए' वीजानां भोजना, यद्वा वीजानि भोजने यस्यां क्रियायां सा=बीजभोजना तया, 'हरियभोयणाए' हरितभोजनया, 'पच्छाकम्मियाए' पश्चात भिक्षापदानोनरं कम-भाजनधावनादि यस्यांसा=पश्चात्कमिका तया, पुरेकम्मियाए' लिये स्थापित (रक्खे हुए), एवं आधाकर्म आदिकी शंकासे युक्त, तथा विना मोचे विचारे आहारादि के लेनेसे, अनेषणीय किमी वस्तुके लेनेसे, पानी आदि पीने योग्य वस्तुको एषणामें किसी प्रकारकी त्रुटि होनेसे, द्वीन्द्रियादिप्राणिमिश्रित, बीजयुक्त, तथा हरितकागयुक्त आहारादि के लेने से, पश्चात्कर्मिक (जिसमें आहारादि ग्रहण करने के बाद हाथ बरतन आदि धोया जाय) આદિને અર્થે રાખવામાં આવેલ, અથવા આધાકર્મી આદિની શંકાથી યુક્ત, તથા જાણ્યા વિચાર્યા વિના આહાર વિગેરે લેવાથી, અનેષણીય કઈ પણ વસ્તુને લેવાથી, પાણી વિગેરે પીવા ગ્ય વસ્તુની એષણામાં કોઈ પણ પ્રકારની ખામી હોવાથી, હીન્દ્રિયદિ–પ્રાણિ-મિશ્રિત, બીજયુક્ત, તથા હરિતકાયયુકત આહાર આદિ લેવાથી, પશ્ચાત્યમિક (જેમાં આહાર આદિ ગ્રહણ કરી લીધા પછી હાથ-વાસણ વિગેરે
१ ‘प्राणाः'-अत्र-अर्श आदिस्वादच । २-प्राणभोजना-शाकपार्थिवादिस्वादुत्तरपदलोपः ।
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१७२
आवश्यकसूत्रस्व पुरः भिक्षापदानात्पूर्व कर्म हस्तधावनादि यस्यां सा-पुरःकम्मिका तया, 'अदिट्टहडाए' अष्टम अनालोकितम् आहतं गृहीतं यस्यां (भिक्षायां) सा, यद्वा अदृष्टान स्थानादाहृता आनीता अदृष्टाहता तया, गृहीतादृष्टवस्तुकयेत्यर्थः अत्र हि जीवसम्मिश्रणमर्दनादिनातिचारसम्भवः, 'दगसंसडाए' दकमुदकं, तेन संसृष्टं सम्मिश्रितं दकसंसृष्टं तत आहृतं गृहीतं यस्यां सा-दकसंसृष्टाहता तया सचित्तजलमिश्रितान्नादिग्रहणिकया हस्तसंलग्नजलसंयुतया वेत्यर्थः, 'रयसंसट्टहडाए' रजः सचित्तधुलिकादि, तेन संसृष्ट-युक्तं रजःसंसृष्टं, तत आहृतं यस्यां सारजःसंसष्टाहता तया, 'पारिसाडणियाए' परिशाटनं देयवस्तुनो घृतादेविन्द्वादीनां भूमौ पातनं, तेन नित्ता पारिशाटनिकी तया, 'पारिहावणियाए' परिर्वतोभावेन स्थापनं परिष्ठापनं-गृहस्थेन अकल्पनीयं वस्तु प्रदानपात्रानिःसार्य तत्रैव पात्रे देयवस्तुस्थापनं, तेन नित्ता भिक्षा पारिष्ठापनिकी तया', 'ओहासणभिक्खाए' 'ओहासण' इति प्रवचनपरिभाषया तथा पुरःकर्मिक (जिसमें आहारादि देनेके पहिले हाथ बरतन आदि धोया जाय) आहारके लेने से, अदृष्ट स्थान से लाई हई वस्तु के लेने से, सचित्त पानी के द्वारा गीले हाथ से आहारादिके ग्रहण करने से, सचित्त रजयुक्त आहारादि के लेने से, दाता द्वारा इधर उधर गिराते हुए आहारादि के लेने से, किसी पात्रमें अकल्पनीय वस्तु रक्खी हुई हो उसे निकाल कर उसी पात्र से दिये हए आहारादि के लेने से, अथवा विना कारण आहारादि के परिठवने से और દેવાય) તથા પુરકર્થિક (જેમાં આહારાદિ દેતાં પહેલાં હાથ, વાસણ આદિ ધેવાય) આહાર આદિ લેવાથી, અદષ્ટ જગ્યાએથી લાવવામાં આવેલી વસ્તુને લેવાથી, સચિત્ત પાણીથી ભીંજાયેલા હાથે આહાર આદિ ગ્રહણ કરવાથી, સચિત્ત રજપુત આહાર આદિ લેવાથી, દાતાર દ્વારા આમતેમ ઢાળતા આહાર આદિ લેવાથી, કે પાત્રમાં અકલ્પનીય વસ્તુ પડેલી હોય તેને ખાલી કરી તેજ પાત્રથી દેવામાં આવેલ આહાર આદિ લેવાથી અથવા વિના કારણે આહાર આદિ પરિઠવાથી
१-उपसर्गात्सुनोतीति षत्वं, यदि त्वत्र परिर्भागार्थकोऽनर्थको वा तदा 'परी'-त्यस्य कर्मप्रवचनीयसञ्जयोपसर्गसद्भाया अभावात्ततः परस्यसस्य षत्वाभाव एवाऽतएव कचित् 'पारिस्थापनिकी' ति षकाररहितोऽपि प्रयोगो दृश्यते ।
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
१७३ विशिष्टद्रव्ययाचनं गृह्यते, तत्पधाना भिक्षा ओहासनभिक्षा तया, हेतुं विनैव विशिष्टस्य वस्तुनो नामोपादाय 'अमुकं में देहि नामुक'-मित्येवंरूपया याचनयेत्यर्थः। भेदस्य बहुत्वात्संक्षिपति - 'ज' यत्, 'उग्गमेणं' उद्गमेन=आधाकर्मादिदोषस्वरूपेण, 'उप्पायणेसणाए' उत्पादनाधात्र्यादिदोषः, एषणा-शङ्कितादिस्वरूपा ताभ्याम् 'अपरिसुद्धं' अपरिशुद्धं दृषितं, 'पडिग्गडियं' प्रतिगृहीतं= स्वीकृतम्, 'परिभुत्तं' परिभुक्तम् आसेवितम् , सर्वेषामेव तृतीयान्तानां सप्तम्यन्तानां च अपरिशुद्धादिभिः क्तान्तैरेव सम्बन्ध इति विभावनीयम् , 'जं' यत् , 'न परिदृवियं' न परिष्ठापितं न परित्यन, 'तस्स' तस्य सर्वस्योकरूपस्यातिचारस्य ‘मिच्छा मि दुक्कडं' इति व्याख्यातपूर्वम् ।। मृ० ४॥
एवं गोचरातिचारॉश्चिन्तयित्वा सम्पति स्वाध्यायातिचारांश्चिन्तयति'पंडिकमामि चाउक्कालं०' इत्यादि ।
॥ मूलम् ॥ पडिकमामि चाउकालं सज्झायस्स अकरणयाए उभओकालं भंडोवगरणस्स अप्पडिलेहणाए दुप्पडिलेहणाए अपमजणाए दुप्पमजणाए अइक्कमे वइक्कमे अईयारे अणायारे जो मे देवसिओ अईयारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ॥ सू० ५॥
॥ छाया ॥ प्रतिक्रामामि चतुष्कालं स्वाध्यायस्याऽकरणतया, उभयकालं भाण्डो. पकरणस्याऽमतिलेखनया दुष्पतिलेखनया अप्रमार्जनया दुष्पमार्जनया, अतिक्रमे बिना कारण मांगकर विशिष्ट वस्तु के लेने से जो कोई अतिचार लगा हो, तथा आधाकर्म आदि उद्गमदोष, धात्री आदि उत्पादनादोष, एवं शङ्किन आदि एषणादोष से क्षित आहार आदि लिया गया हो, उपभोगमें लाया गया हो और जो परिष्ठापित न किया गया हो 'तम्स मिच्छा मि दुक्कडं' ॥ स० ४ ॥ અને વિના કારણે વિશિષ્ટ વસ્તુની યાચના કરી લેવાથી જે કાંઈ અતિચાર લાગ્યા હોય, તથા આધાકર્મ આદિ ઉગમર્દોષ, ધાત્રી આદિ ઉત્પાદના દેશ, અને શકિત આદિ એષણા દેશથી દૂષિત આહાર આદિ લેવાઈ ગયા હોય, ઉપભેગમાં લીધા राय अथवा २ परिचित न डाय "तस्स मिच्छा मि दुक्कडं" (५० ४)
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१७४
आवश्यकसूत्रस्य
व्यतिक्रमेऽतिचारेऽनाचारे यो मया दैवसिकोऽतिचारः कृतस्तस्य मिथ्या मयि दुष्कृतम् ॥ म्र० ५ ॥
॥ टीका ॥
पडिकमामि' प्रतिक्रामामि = विनिवर्ते,
यद्वा
स्वात्मानं
विनिवर्त्तयामि अतिचारादिति शेषः । अतिचारस्वरूपमाह- ( चाउक्कालं ' चत्वारः=दिवसरात्रि - प्रथमान्तिमप्रहरस्वरूपाः कालाः = समया यस्य तद्यथा स्यातथेति क्रियाविशेषणमिदम्, यद्वा चतुर्णां कालानां समाहारश्चतुःष्कालं' ' सज्झायस्य' सु = सुष्ठु आ= मर्यादया अध्यायः =अध्ययनं निर्दिष्टकालानतिक्रमेण यथाविधि प्रवचनपठनं, तस्य,
द्यमानं करणम् = अनुष्ठानं यस्मिन् सोऽकरणः - अस्वाध्यायः, तस्य भावोऽकरणता तया अकरणेनेत्यर्थ: । अत्र 'स्वाध्याय करणादिभिर्हेतुभिरतिक्रमे व्यतिक्रमेऽतिचारेऽनाचारे (जाते) सति यो मयाऽतिचारः कृतस्तस्य मिथ्या मयि दुष्कृत'मित्यादिरीत्या सम्बन्ध इति सूक्ष्मेक्षिकयाऽवधारणीयम् ।
"
स्वाध्यायः
'अकरणयाए 'अत्रि
'उभओकालं ' दिवसस्य उभयतः = प्रथमान्तिमप्रहररूपौ कालौ यस्मिस्तदुभयतः कालम् ; तद्यथा स्यात्तथा 'भंडोवगरणस्स' भणति = शब्दायते इति मैं आगे कहे हुए इन अतिचारों से निवृत्त होता हूँ, दिन तथा रात्रि के प्रथम और अन्तिम प्रहररूप चार कालों में मर्यादा पूर्वक प्रवचनके मूलपठनरूप स्वाध्यायको न करना, दोनों कालों (दिनके प्रथम और अन्तिम प्रहर) में पात्र रजोहरण आदि भंड उपकरण
આગળ કહેવામાં આવેલા અતિચારોથી હું નિવૃત્ત થાઉ છું. દિવસ તયા રાત્રીના પ્રથમ અને છેલ્લા પ્રહરરૂપ ચાર કાળમાં મર્યાદા પૂર્વક પ્રવચનના મૂળપઠન ३५ સ્વાધ્યાય ન કરવું, અને સમય ( हिवसना પહેલા અને પાછલા પ્રહર ) માં પાત્ર-રજોહરણુ આદિ ભંડ ઉપકરણનું સથા
१- समाहारद्विगुत्वान्नपुंसकता, ततोऽत्यन्तसंयोगे ' व्याप्य' इति क्रियाध्याहारेण वा द्वितीया, न चैवं सति 'अकारान्तोत्तरपदो द्विगुः स्त्रियामिष्टः इति वार्तिकबलेन स्त्रीत्वे 'त्रिलोकी' इत्यादिवत् द्विगो:' ( ४ । १ । २१ ) इति ङीप् स्यादिति वाच्यम्, पात्राद्यन्तर्गणेऽस्य पाठकल्पनात् । कालस्य वस्तुत usedsप्यपचारिकत्वादिह चातुर्विध्यं बोध्यम् ।
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मुनितोषणी टीका, पतिक्रमणाध्ययनम्-४
१७५ भण्डं तदेव भाण्डं-पात्रादि, उपक्रियते-दृढीक्रियते संयमादि येन तदुपकरणं= सदोरकमुखवत्रिकावस्त्ररजोहरणादि भाण्डं चोपकरणं चेत्यनयोः समाहारः,भाण्डोपकरणं तस्य, अप्पडिलेहणाए' अप्रत्युपेक्षणया सर्वथैवानिरीक्षणेन,'दुप्पडिलेहणाए' दुष्पतिलेखनया असम्यग् निरीक्षणेन, 'अप्पमज्जणाए ' अपमार्जनया अप्रमाजना=रजोहरणादिना सर्वतोभावेनाऽशोधनं तया, 'दुप्पमज्जणाए' दुष्णमार्जनया दुष्पमार्जना तेनैव रजोहरणादिनाऽसम्यक् परिशोधनं तया,२ 'अइक्कमे अतिक्रमे अतिक्रमः अकुत्यसेवनस्य सङ्कल्पस्तस्मिन् 'संयमसम्बन्धिनि' इति शेषः,एवमग्रेऽपि सप्तम्यन्तेषु, सति सप्तमीयम् । एवमग्रेऽपि । 'वइक्कमे' व्यतिक्रमे व्यतिक्रमः अकृत्यसेवनाय सामग्रीसंयोजनं तस्मिन् , 'अईयारे' अतिवारे-अतिचारः अकृत्यसेवनाय पवर्तनं तस्मिन् , 'अणायारे' अनाचार-अनाचारः अकृत्यसेवनं तस्मिन् , 'जो' यः 'मे' मया 'देवसिओ' देवसिका दिवसं व्याप्य भवः, 'अईयारो' अतिचारः, 'कओ' कृतः, 'तस्स मिच्छा मि दुक्कडं' इति व्याख्यातपूर्वम् ॥ मृ० ५ ॥ का सर्वथा सम्यक प्रकार से प्रतिलेखन न करना, तथा पात्र उपाश्रय आदिका सर्वथा या यतनापूर्वक न पूजना आदि कारणों से संयमसम्बन्धी अतिक्रम (अकृत्यसेवनका भाव), व्यतिक्रम (अकृत्य सेवन की सामग्री मिलाना), अतिचार (अकृत्य सेवनमें गमनादिरूप प्रवृत्ति करना) तथा अनाचार (अकृत्य का सेवन करना) हो जाने पर जो मुझसे अतिचार किया गया हो 'तस्स मिच्छा मि दुकाई' ।। सू० ५॥ અથવા સમ્યફ પ્રકારે પ્રતિલેખન ન કર્યું હોય, તથા પાત્ર, ઉપાશ્રય આદિને સર્વથા અથવા યતના પૂર્વક પૂજવાનું કાર્ય ન કર્યું હોય આદિ કારણેથી સંયમ સંબંધી અતિક્રમ (અકૃત્ય સેવનને ભાવ), વ્યતિક્રમ (અકૃત્ય સેવનની સામગ્રી મેળવવી), અતિચાર (અકૃત્ય સેવનમાં ગમનાદિરૂપ પ્રવૃત્તિ કરવી) તથા અનાચાર (અકૃત્યનું સેવન કરવું) થઈ જવાને કારણે મારાથી જે અતિચાર થયા હોય "तस्स मिच्छा मि दुक्कडं" (२० ५)
१- शब्दार्थकाद् ‘भण्' धातोरौणादिको डः प्रत्ययः । प्रज्ञादिपाठादण् । २- एषु सर्वत्र हेतौ तृतीया, हेतुत्वं चातिक्रमाधपेक्षया ।
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आवश्यकमूत्रस्य सम्पत्यतिचारैकानेकभेदगर्भ प्रतिक्रमणमाह-'पडिक्कमामि एगविहे' इत्यादि ।
॥ मूलम् ॥ __पडिकमामि एगविहे असंजमे । पडिकमामि दोहि बंधणेहि-रागबंधणेणं दोसबंधणेणं । पडिकमामि तिहिं दंडेहिमणदंडेणं वयदंडेणं कायदंडेणं । पडिक्कमामि तिहिं गुत्तीहिंमणगुत्तीए वयगुत्तीए कायगुत्तीए। पडिक्कमामि तिहिं सल्लेहिमायासल्लेणं नियाणसल्लेणं मिच्छादंसणसल्लेणं। पडिकमामि तिर्हि गारवेहि-इड्ढीगारवेणं रसगारवेणं सायागारवेणं । पडिक्कमामि तिहिं विराहणाहि-नाणविराहणाए दंसणविराहणाए चरित्तविराहणाए ॥ सू० ६ ॥
॥ छाया ॥ प्रतिक्रामामि एकविधेऽसंयमे । पतिक्रामामि द्वाभ्यां बन्धनाभ्यां-गगबन्धनेन द्वेषबन्धनेन । प्रतिक्रामामि त्रिभिर्दण्डैः-मनोदण्डेन वचोदण्डेन कायदण्डेन । प्रतिक्रामामि तिसृभिर्गुप्तिभिः-मनोगुप्त्या वचोगुप्त्या कायगुप्या। प्रतिक्रामामि त्रिभिः शल्यैः-मायाशल्येन निदानशल्येन मिथ्यादर्शनशल्येन । प्रतिक्रामामि त्रिभिगौरवैः-ऋद्धिगौर वेण रसगौरवेण शातगौरवेण । प्रतिक्रामामि तिसृभिविराधनाभिः-ज्ञानविराधनया दर्शनविराधनया चारित्रविराधनया ।। मृ० ६ ॥
॥ टीका ॥ 'पडिकमामि' गताऽस्य व्याख्या, “एगविहे' एका विधा-प्रकारो (भेदो) यस्य स एकविधस्तस्मिन् , 'असंजमे' न संयमः असंयमः पापाचारा
यह अतिचार संक्षेप से एक प्रकारका, विस्तार से दो तीन आदि आरमाध्यवसायसे संख्यात असंख्यात यावत् अनन्त प्रकार का है, उनमें से एक आदि भेद कहते हैं-'पडिकमामि एगविहे.' इत्यादि ।
एक प्रकारका असंयम होने पर जो मुझसे अतिचार हुआ
આ અતિચાર સંક્ષેપથી એક પ્રકારના છે, અને વિસ્તારથી બે-ત્રણ આદિ આત્માધ્યવસાયથી સંખ્યાત અસંખ્યાત યાવત્ અનન્ત પ્રકારના છે, તેમાંથી એક વગેરેને से छ-"पडिकमामि एगविहे" त्याह..
એક પ્રકારનો અસંયમ થવાથી મને જે અતિચાર લાગ્યું હોય એ
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सुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
१७७ चिरतिस्तस्मिन् , अर्थादेकविधेऽसंयमे जाते सति निषिद्धाऽऽचरणादिना यो मयाऽतिचारः कृतस्तस्य दुष्कृतं मयि मिध्याऽस्त्विति सारायः। एवमन्यत्रापि बोध्यम् । उक्तोऽसंयमरूप एकविधोऽतिचारः, सम्मति नानाविधं तं दर्शयन्नाह-'पडिक्कमामि दोहिं बंधणेहिं' इति 'दोहिं' द्वाभ्यां, बध्यते-बन्धविषयीक्रियते जीवो गाभ्यां राग-द्वेषाभ्यां ते बन्धने ताभ्यां, हेतौ तृतीया, अत्र 'योऽतिचारः कृतस्तं, तस्मात् इति वा 'प्रतिक्रामामि'-ति सम्बन्धः कार्यः, के ते बन्धने ? इत्यपेक्षायामाह-'रागवंधणेणं' रज्यते येनेति रागः, स च तद्न्धनं च तेन, 'दोसबंधणेणं' प्राकृते द्वेष-दोष-शब्दयोः समानरूपत्वात् द्वेषबन्धनेन-दोषबन्धनेन वा इति च्छाया, द्वेष्टि, जीवानामप्रीतिमुत्पादयतीति, द्विष्यते अपीतिरूपाधते येन यस्माद्वा स द्वेषः, स च तद्वन्धनं च द्वषबन्धनं, तेन' यद्वा दुष्यन्ति= विकृता भवन्ति क्षान्त्याद्यात्मगुणा येन यस्माद्वेति दोषः मिथ्यात्वाविरति-प्रमादकषायाशुभयोगलक्षणः स च तद्वन्धनं च दोषबन्धनं तेन,२ 'पडिक्कमामि' प्रतिक्रामामि, 'तिहिं' त्रिभिः, ‘दंडेहिं' दण्डैः, दण्डयते रत्नत्रयैश्वर्यापहरणादसारीक्रियते आत्मा यैरिति, दण्डयन्ते व्यापाघन्ते माणिनो यैरिति वा दण्डास्तैः, दण्डो द्रव्यादिभेदादनेकविधोऽप्यत्र मापदण्ड एवाधिकृतो बोध्यः, दण्डत्रैविध्यमाह-'मणदंडेणं' मन्यते-ज्ञायते पदार्थसार्थोऽनेनेति मनस्तेन दण्डो (असदयापारात्मकः) मनोदण्डस्तेन, 'वयदंडेणं' उच्यते इति वचस्तेन दण्डो वचोदण्डस्तेन, 'कायदंडेणं' चीयतेऽस्मिन्नस्थ्यादिकमिति कायः कायेन दण्डः कायदण्डहो तो, एवं राग (अनुराग) द्वेष (अप्रीति) रूप दो बन्धनों के कारण, सम्यग्ज्ञानादिरूप रत्नत्रयका नाश करके आत्माको असार करनेवाले, अथवा प्राणियों की हिंसामें निमित्तभूत मानसिक, वाचिक, कायिक, इन तीन दण्डों के कारण, विहित का अनुष्ठान પ્રમાણે રાગદ્વેષ રૂપ બે બન્ધનેના કારણે સમ્યફ-જ્ઞાનાદિ રૂ૫ રત્નત્રયને નાશ કરીને આત્માને અસાર કરવાવાળા, અથવા પ્રાણીઓની હિંસામાં નિમિત્તભૂત માનસિક, વાચિક અને કાયિક એ ત્રણ દડાના કારણે વિહિતનું અનુ
१- 'द्विष अपीतो' अस्माद्बाहुलकास्करणेऽपादाने वा घन् । २- 'दुष वैकृत्ये' अस्मात्पूर्ववद्धन् । ३- 'निवासचितीत्यधिकरणे घञ् चस्य कुत्वं च' ।
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आवश्यकसूत्रस्य स्तेन, 'तिहिं' तिसृभिः, 'गुत्तीहिं' गोपनमर्थाद्रक्षणं गुप्तिः आगन्तुककर्मकचवरनिरोधो योगनिरोधो वा ताभिर्योऽतिचारः कृतस्तस्मात् 'पडिकमामि' प्रतिक्रामामि, गुप्तित्रयमाह 'मण' इति 'मणगुत्तीए' मनोगुप्स्या, 'वयगुत्तीए' वचोगुप्स्या, 'कायगुत्तीए' कायगुप्त्या, अर्थः प्रस्फुटः, आह-कथं गुप्तीनामतिचारं पति करणत्व ? मिति, उच्यते-विहिताननुष्ठान-निषिद्धाऽऽचरण-श्रदानमस्खलनादिना व्युत्क्रमेण सेविता मनोगुप्त्यादयोऽतिचारहेतवः सम्पयन्त इति । 'तिर्हि' त्रिभिः, 'सल्लेहिं' शल्यते-क्लिश्यते जीवो यैस्तानि शल्यानि, द्रव्यभावभेदेन शल्यस्य द्वैविध्येऽप्यत्र प्रकरणाद्भावशल्यस्यैव ग्रहणं बोध्यम् , अन्वय इहापि प्राग्वदेव, शल्यत्रयमाह-'माया०' इति-'मायासल्लेणं' मीयते-प्रतार्यते पक्षिप्यते वा नरकादौ लोकोऽनयेति, यद्वा, 'माय्यते अशुभकर्मरूपे गर्ने पात्यते लोकोऽनयेति, मान्ति सर्वे दुर्गुणा यस्यामिति वा माया, तद्रूपं शल्यं मायाशल्यं= मनसा वाचा कायेन वा परवञ्चनस्वरूपं तेन, 'नियाणसल्लेणं' नितरां दीयते= छियते आत्मभूमिजात-सम्यक्त्वाऽङ्कुरित-विविधविमलभावनासलिलसंवदितध्यानक्रियापल्लविताऽखण्डतपःसंयमाद्यनुष्ठानपुष्पित - मोक्षफलसुभूषित - कुशलकर्मकल्पवृक्षो येन-ऐहिकचक्रवर्त्यादिपारलौकिकदेवदर्यादिपदप्राप्तिजन्यविषयन करने, निषिद्ध का सेवन करने, तथा अश्रद्धानादिसे सम्यक् असेवित योगनिरोधरूप मनोगुप्ति वचनगुप्ति कायगुप्ति, इन तीन गुप्तियों के कारण, अशुभ कर्मों के गड्डेमें या नरकमें गिरानेवाली अथवा विषयोंमें प्राणियों को लुभानेवाली माया, ऐहिक चक्रवर्ती आदि, परलोकसम्बन्धी देवऋद्धि आदिके पदों की प्राप्ति से होनेवाली विषयसुखलालसारूप तीक्ष्णधारा से युक्त कुठार के ઠાન ન કર્યું હોય અને નિષિદ્ધનું સેવન કર્યું હોય, તથા અશ્રદ્ધાથી સમ્યક અસેવિત ગનિરોધરૂપ મને ગુપ્તિ, વચનગુપ્તિ, કાયપ્તિ, આ ત્રણ ગુપ્તિઓના કારણે. અશુભ કર્મોના ખાડામાં અથવા નરકમાં નાખનારી, અથવા વિષયમાં પ્રાણીઓને લેભાવનારી માયા, અહિક-ચક્રવર્તી આદિ, પરલેક સબંધી દેવ ઋદ્ધિ આદિ પદની પ્રાપ્તિથી થનારી વિષયસુખની લાલસારપ તીક્ષણ
१-'डुमिन् प्रक्षेपणे' इत्यस्येदम् । २-'मय गतौ' इत्यस्य ण्यन्तस्येदम् ।
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मुनितोषगी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
१७९ मुखलालसारूपनिशितधारकुठारेण तन्निदानं तच तच्छल्यं निदानशल्यं तेन, 'मिच्छादसणसल्लेणं' मिथ्या विपरीतं मोहकर्मोदयजनितं दर्शनम् अभिप्रायो मिथ्यादर्शनं तदेव शल्यं तेन, 'पडिकमामि' प्रतिक्रामामि, 'तिर्हि' त्रिभिः, 'गारवेहि' गुरोः कर्म भावो वा गौरवं, तद्विविधं द्रव्यगतं भावगनं च, द्रव्यगतं वज्रादेः, भावगतमहङ्कारलोभादिजन्यमात्मनोऽशुभभावरूपचर्तुगतिसंसारचक्रभ्रमणनिदान - कर्मकारणम् , अत्र त्वेतदेव विवक्षितं प्रकरणात, तैः, तद्द्वारेति भावः 'यो मयाऽतिचारः कृतः' इत्यादिसम्बन्धः प्राग्वत् । तदेव गौरवत्रयमाह-'इइडी.' इति, 'इइडीगारवेणं' ऋद्धिः राजैश्चर्यादिलक्षणा, आचार्यादिपदसम्माप्तिलक्षणा वा तया तस्या वा गौरवमृदिगौरवम् आत्मोस्कर्षस्तेन, ‘रसगारवेणं' रसः रसनेन्द्रियार्थों मधुरादिः, तस्य गौरवं तदवाप्त्यभिमानस्तेन, 'सायागारवेणं' शातं= शरीरादिसुखं तेन तस्य वा गौरवं शातगौरवं, तेन-'अहो अहमस्मि शरीरादिमुखसम्पन्नः 'इत्यभिमानेनेति यावत् 'साया' इत्यत्र प्राकृतबादीर्घः, 'पडिक्कमामि' समान, आत्मरूप भूमिमें उत्पन्न समकित रूप अङ्कर से युक्त निर्मल भावनारूप जलसे सींचे हुए, तप संयम आदि फूलों से हरे भरे
और मोक्षरूप फलसे विभूषित कुशलकर्मरूप कल्पवृक्ष को काटनेवाला निदान (नियाणा) और मोहकर्म के उदय से होनेवाला अभिप्रायरूप मिथ्यादर्शन, इन तीन शल्यों से और राजा आदि या आचार्य आदि की पदप्राप्तिरूप ऋद्धिगौरव, मधुर आदि रसकी प्राप्ति का अभिमानरूप रसगौरव, तथा शरीर आदि की सुख प्राप्ति से होनेवाला अभिमानरूप शातगौरव के कारण, एवं ज्ञानकी (जिसके
ધારથી યુકત કુઠાર સમાન, આત્મરૂપ ભૂમિમાં ઉત્પન્ન સમકિતરૂપ અંકુરથી યુકત નિર્મલ ભાવનારૂપ જલથી સીંચેલ, તપસંયમ આદિ કુલેથી ભરેલા મેક્ષરૂપ ફલથી વિભૂષિત કુશલ કર્મ રૂપ કલ્પવૃક્ષને કાપવાવાળા નિદાન (નિયાણું) અને મેહકર્મના ઉદયથી ઉત્પન્ન થનારા અભિપ્રાય રૂ૫ મિથ્યાદર્શન, આ ત્રણ શલ્યથી, રાજા અથવા આચાર્ય આદિ પદની પ્રાપ્તિ ૨૫ અદ્ધિગોરવ, મધુર આદિ રસની પ્રાપ્તિના અભિમાન રૂ૫ રસગોરવ તથા શરીર આદિના સુખની પ્રાપ્તિથી થવાવાળા અભિમાનરૂપ શાતગોરવ, એ પ્રમાણે જ્ઞાનની (જેના વડે
१-निपूर्वकात् 'दो अवखण्डने' अस्मात् करणे ल्युट् ।
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आवश्यकसूत्रस्थ प्रतिक्रामामि, 'तिहिं' तिसृभिः, 'विराहणाहि' विगतान्याराधनानि, यद्वा वि= विशेषेण राधनानि विराधनाः खण्डनास्ताभिरर्थात्तद्वारा यो मयाऽतिचारः कृतः' इत्यादिसम्बन्धः प्रागुकपकारः। विराधनाभेदानाह-' नाण.' इति 'नाणविराहणाए' ज्ञायन्ते-अवबुध्यन्ते पदार्था येन यस्माद्वा तज्ज्ञानम्=पदार्थपरिबोधस्तस्य विराधना-जानविराधना-तया, 'दसणविराहणाए' दृश्यन्ते= धातूनामनेकार्थत्वात् श्रद्धीयन्ते पदार्था अनेनेति दर्शनं सम्यग्रूपं तस्य विराधना तया, 'चारित्तविराहणाए' चर्यते-समाराध्यते मुमुक्षुभिरिति चर्यते= कर्मणा रिक्तीक्रियते आत्माऽनेनेति वा चरित्रं तदेव 'चारित्रं-त्रस-स्थावरादिमाणातिपातायुपरमरूपाऽऽत्मपरिणामरूपं, सर्वसावधयोगपरित्यागपुरस्सरनिरवद्ययोगानुष्ठानरूपं वा सामायिकादि, तस्य विराधना=चारित्रनिराधना तया ।। म०६॥
॥मूलम् ॥ पडिकमामि चऊहिं कसाएहि-कोहकसाएणं, माणकसाएणं, मायाकसाएणं, लोहकसाएणं । पडिकमामि चऊहिं सण्णाहि-आहारसण्णाए, भयसण्णाए, मेहुणसण्णाए, परिग्गद्वारा जीवादि पदार्थ जाना जाय वह ज्ञान, उसकी) विराधना, दर्शनकी (जिस के द्वारा जीवादि पदार्थों का श्रद्धान किया जाय वह दर्शन, उसकी) विराधना, चारित्रकी (मोक्षार्थियों से सेवन करने योग्य, अथवा आत्मा को कर्म रहित करने वाला चारित्र, उसकी) विराधना, इन तीन विराधनाओं (आराधना के अभाव अथवा खण्डनारूप) के कारण जो मुझ से अतिचार किया गया हो तो उससे मैं निवृत्त होता ॥ सू० ६ ॥ જીવાદિ પદાર્થ જાણી શકાય તે જ્ઞાન, તેની) વિરાધના, દર્શનની (જેના વડે જીવાદિ પદાર્થોની શ્રદ્ધા કરવામાં આવે, પ્રવચનમાં રુચી થાય તે દર્શન, તેની) - વિરાધના, ચારિત્રની (મેક્ષાથી જીવેને સેવન કરવા યેગ્ય, અથવા આત્માને કર્મરહિત કરવાવાળે ચારિત્ર, તેની,) વિરાધના, આ ત્રણ વિરાધનાઓના કારણે ( આરાધનાને અભાવ અથવા ખંડનારૂપ) કારણે મને જે અતિચાર લાગ્યો હોય તે तेमांथा हु निवृत्त था छु. (५० ६)
१-प्रज्ञादित्वात्स्वार्थिकोऽण् प्रत्ययः ।
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४ हसण्णाए । पडिकमामि चऊहिं विकहाहि-इत्थिकहाए, भत्तकहाए, देसकहाए,रायकहाए। पडिकमामि चऊहिं झाणेहि-अट्टणं झाणेणं, रुद्देणं झाणेणं, धम्मेणं झाणेणं, सु णं झाणेणं ॥ सू०७॥
॥ छाया ॥ प्रतिक्रामामि चतुभिः कषायै:-क्रोधकपायेण, मानकषायेण, मायाकषायेण, लोभकपायेण । प्रतिक्रामामि चतसृभिः संज्ञाभिः-आहारसंज्ञया, भयसंज्ञया, मैथुनसंज्ञया, प्रतिग्रहसंज्ञया । प्रतिक्रामामि चतमभिर्विकथाभिः-स्त्रीकथया, भक्तकथया, देशकथया, राजकथया। प्रतिक्रामामि चतुर्भिान:-आतैन ध्यानेन, रौद्रेण ध्यानेन, धर्मेण ध्यानेन, शुक्लेन ध्यानेन ॥ मृ० ७ ॥
॥ टीका ॥ 'पडिकमामि' प्रतिक्रामामि, 'चऊहिं' चतुर्भिः, 'कसाएहि' कष्यते संसारे समाकृष्यत आत्मा यैस्ते कषायाः ; यद्वा कषति=हिनस्ति विषयकरवालेन पाणिन इति कषः=संसारस्तम्य आयः लाभो यैरिति, कष्यन्ते गमनाऽऽगमनादिकण्टकेषु घृष्यन्ते पाणिनो यैरिति, कृष्यते-मुखदुःग्वादिसम्यफलयोग्या क्रियते कर्मभूमिरिति, कलुषयन्ति मलिनयन्ति स्वभावमपि जीवमिति निरुक्तवृत्या वा कषायाम्तैः, तवारेत्यर्थः 'यो मये'-त्यादिसम्बन्धः प्राग्वत् , तदेव कषायचतुष्टयमाह-कोह.' इति-'कोहकमाएणं' क्रुभ्यति=विकृतो भवस्यात्माऽनेनेति क्रोधः स चासौ कषायश्च क्रोधकषायस्तेन, 'माणकसाएणं' माननं स्वमपेक्ष्याऽऽन्यस्य हीनतया परिच्छेदनं, यद्वा मीयते परिच्छिद्यतेऽनेनेति मानः स चासौ कषायश्च मानकषायस्तेन, ‘मायाकसाएणं' मायाशब्दव्याख्या
आत्मा को इस संसारमें परिभ्रमण करानेवाले, या गमनागमनरूप कण्टकों में प्राणियों को घसीटने वाले, अथवा आत्मा को मलिन करनेवाले जीवपरिणाम को कषाय कहते हैं, इस कषाय अर्थात् क्रोध-मान-माया-और लोभ के कारण, जिससे जीव या
આત્માને સંસારમાં પરિભ્રમણ કરાવનાર અથવા જવું આવવું વગેરે ક્રિયારૂપ કટકમાં પ્રાણીઓને ખેંચી જવાવાળા, અથવા આત્માને મલિન કરવાવાળા જીવના પરિણામને કષાય કહે છે. આ કષાય અર્થાત્ ક્રોધ, માન,
१- 'कष्' धातोरौणादिक 'आय' प्रत्ययः
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आवश्यकमूत्रस्थ स्वनुपदमेवोक्ता, · लोहकसाएणं' लोभोऽभिकाक्षा, अथवा ' लुभ्यते व्याकुलीक्रियत आत्माऽनेनेति लोभः, स चासौ कषायश्च लोभकषायस्तेन, 'पडिकमामि' प्रतिक्रामामि, काभिः ? 'चऊहिं' चतसृभिः, 'सण्णाहि' संज्ञानानि=संहाः, संज्ञायते जीवस्तच्चेष्टाविशेषो वा याभिरिति संज्ञाः=अभिलाषविशेषरूपास्ताभिरर्थानद्वारा 'योऽतिचारः कृत' इत्यादिसम्बन्धः प्राग्वत् । तद्भेदानाह'आहार०' इति 'आहारसण्णाए' आहारणमाहारस्तद्विषया संज्ञाऽऽहारसंज्ञा क्षुद्वेदनीयोदयेन कवलाधभिलाषस्वरूपाऽऽत्मपरिणतिविशेषस्तया, 'भयसण्णाए' भयं भीतिस्तद्विषया संज्ञा भयसंज्ञा तया 'मेहुणसण्णाए' मिथुनं स्त्रीपुंसौ तत्कर्म मैथुनं तद्विषया संज्ञा मैथुनसंज्ञा स्यादिवेदोदयरूपा तया, 'परिग्गहसण्णाए' परि=समन्ताद् गृह्यते स्वीक्रियत इति परिग्रहः, यद्वा परिग्रहणं परिग्रहस्तद्विषया संज्ञा परिग्रहसंज्ञा लोभजन्याऽऽत्मपरिणतिविशेषस्तया। 'पडिक्कमामि' प्रतिक्रामामि, 'चऊहिं ' चतसृभिः, 'विकहाहिं' विविरुद्धाः संयमविराधकत्वेन कथाःबचनरचनावल्यः विकथास्ताभिस्तद्वारेत्यर्थः 'यो मये' त्यादिसम्बन्धः प्राग्वदेव । तदेव विकयाचतुष्टयमाह-'इत्थि.' इति। 'इत्थिकहाए' स्त्रीणां कथा स्त्रीकथा तया, इयं च स्त्रीकथा जाति-कुल-रूप-नेपथ्य-भेदाचतुर्दा; तत्र जात्या स्त्रीकथा, यथा--
'मृते पत्यौ दुःखदग्धां, धिगस्तु ब्राह्मणी सदा। धन्या शूदैव याऽऽप्नोति, अजीवकी चेष्टा जानी जाय ऐसी आहार-भय-मैथुन-तथा परिग्रहरूप संज्ञा के कारण और स्त्रीकथा, भक्तकथा, देशकथा तथा राजकथा रूप चार विकथाओं के कारण जो कुछ अतिचार किया गया हो तो उससे मैं निवृत्त होता हूँ।
इनमें 'स्त्रीकथा' जाति कुल रूप और नेपथ्य के भेदसे માયા અને લેભના કારણે, જેના વડે જીવ અને અજીવની ચેષ્ટા જાણવામાં આવે એવી આહાર, ભય, મેથુન તથા પરિગ્રહ રૂપ સંજ્ઞાના કારણે, અને સ્ત્રીકથા, ભકતકથા, દેશકથા, તથા રાજકથા રૂપ ચાર વિકથાઓ કરવાના કારણે જે કઈ અતિચાર થયા હોય તે તેમાંથી હું નિવૃત્ત થાઉં છું.
એમાં સ્ત્રીકથા જાતિ કુલ રૂ૫ અને નેપચ્ચેના ભેદથી ચાર પ્રકારની છે, १- 'लुभ विमोहने' ' विमोहनमाकुलीकरण'-मिति सिद्धान्तकौमुदी ।
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मुनितोषणी टीका, पतिक्रमणाध्ययनम्-४ धवे प्रेते परं परम्" ॥१॥ इत्यादि रीत्या ब्राह्मण्यादीनां विनिन्दमादिः। कुलेन यथा-'अहो प्रशस्ततमोग्रकुलसंभूतेयं बाले'-त्येवमादिः । रूपेण यथाटा क्षबाणा मैथिल्य आन्ध्रयः शशधराननाः' इत्येवमादिः, नेपथ्मैनपा-मचिमाह पर्वतीयाश्च चिपिटनासिका निःसीमवस्त्राभरणादिभारा दुर्भाषिता, पानी गुर्जरी-मैथिली-पाश्चाल्यो यथोचितवस्त्राभरणादिसुवेषपरिच्छिन्ना इत्यादि स्त्रीकथायां स्वपरोदीरणोड्डाहब्रह्मचर्यागुफ्यादिदोषसम्भवेनाऽसिकारहेतुत्वमकि सेयम् । ‘भत्तकहाए' भक्तस्य ओदनादेः कथा, भक्तकथा तया; इसनि: चतुदरी आवाप-निर्वापा-ऽऽरम्भ-निष्ठानभेदात् , तत्राऽऽवापेन भककाधाचार प्रकारकी है, उनमें जातिकथा जैसे-"पति के मर जाने राहा से दिन बितानेवाली ब्राह्मणी को धिक्कार है, शद्रा ही अन्य को एक पति मर जाने पर भी दसरे पति के द्वारा सुखने नीमच बिताती है' इत्यादि । कुलकथा जैसे-'यह कन्या उपकुढ़की है इसलिये अच्छी है' इत्यादि । रूपकथा जैसे–'पहाडी लिस्यां प्रस्त
और आभूषण बहुत रखती है, मैथिली और पंजाबी खिमाँ भाला श्यकतासे अधिक वस्त्र तथा आभूषण नहीं पहनती है' इत्यादि की कथाओंसे ब्रह्मचर्य आदि व्रतों में दोष लगने की संभावना मी है इसलिये इसको अतिचार का हेतु माना गया है ।
___ 'भक्तकथा' आवाप, निर्वाप, आरम्भ और निष्ठान भेस्से चार प्रकारकी है। उनमें आवाप भक्तकथा जैसे-इस रसोई में તેમાં જાતિકથા જેવી રીતે કે-પતિ મરણ પામ્યા પછી દુઃખથી દિવસ વિતાવારી બ્રાહ્મણીને ધિકકાર છે, શુદ્ધાણીને જ ધન્ય છે કે જેને એક પતિ મરણ પામી જતાં બીજા પતિ દ્વારા સુખથી જીવન ગુજારે છે. ઈત્યાદિ.
કુલકથા–આ કન્યા ઉકુલની છે, એટલા માટે સારી છે. ઈત્યાદિ. રૂપકથા જેમ–પહાડી સ્ત્રીઓ વઓ અને આભૂષણ બહુજ રાખે છે, મૈથિલી અને પંજાબી સ્ત્રીઓ જરૂરત કરતાં વધારે વસ્ત્ર તથા આભૂષણ પહેરતી નથી, ઈત્યાદિ. આવી કથાઓથી બ્રહ્મચર્ય આદિ વ્રતમાં દેષ લાગવાની સંભાવના રહેવાથી તેને અતિચારને હેતુ માનવામાં આવેલ છે.
ભક્તકથા-આવાપ–નિર્વાપ-આરંભ અને નિષ્ઠાન ભેદથી ચાર પ્રકારની છે.
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आवश्यकमूत्रस्थ 'एतावदत्र महानसे घृतमेतावच्छाकाद्येतावद्वेसवारादि युकं स्यादित्येवं प्रकथनम् । निर्वापेण यथा-'एतावन्ति पकान्येतावन्त्यपकान्यन्नान्येतारद्वयञ्जन'-मित्यायुक्तिः। आरम्भेण यथा 'अस्मिन् महानसे शाकफलादीनि एतावन्ति उपयोक्ष्यन्त' इत्युक्तिः। निष्ठानेन यथा-'अस्मिन् महानसे शतं रूप्यकाणि 'वियन्ति' इत्यादि द्रव्यसंकथनम्, अत्र चाजितेन्द्रियत्वौदरिकत्वादयो दोषा भवन्ति । 'देसकहाए' देश: मगधराजस्थानपश्चालादिरूपो जनपदस्तस्व कथा देशकथा तया, इयमपिच्छन्द-विधि-विकल्प-नेपथ्य-भेदाच्चतुर्विधा-तत्र छन्देन देशकथा यथा-- इतना घी इतना शाक और इतना मसाला ठीक होगा' इत्यादि । निर्वाप भक्तकथा जैसे-इतने पकवान थे इतना शाक था और इतना मधुर था' इस प्रकार देखे हुए भोज्य पदार्थों की कथा करना। आरम्भ भक्तकथा जैसे-'इस रमोई में इतने शाक और फल आदिको जरूरत रहेगी इत्यादि । निष्ठान भक्तकथा जैसे-अमुक भोज्य पदार्थों में इतने रूपये लगेंगे' इस प्रकार द्रव्य की मुख्यता से कथा करना। भक्तकथा से अजितेन्द्रियत्व आदि दोष होनेके कारण अतिचार होता है।
मगध आदि देशोंकी कथा करने को 'देशकथा' कहते हैं। वह भी चार प्रकारकी है-(१) छन्द (२) बिधि (३) विकल्प (४) नेपथ्य. તેમાં આવા૫ ભકતકથા-જેવી રીતે કે આ રસોઈમાં-અમુક પ્રમાણમાં ઘી-શાક અને મશાલે હશે તે સારી રસોઈ થશે, ઈત્યાદિ, નિર્વાપ ભકતકથા-આટલાં પકવાન હતાં, આટલાં શાક હતાં અને સ્વાદમાં મધુર હતાં. એ પ્રમાણે જોયેલા પદાર્થોની કથા કરવી તે. આરંભ ભકતકથા-જેમકે “આ રસઈમાં આટલાં શાક અને ફળની જરૂરત રહેશે, ઈત્યાદિ. નિષ્ઠાન ભકતકથા-જેમકે અમુક ભેજન કરવાના પદાર્થોમાં આટલા રૂપિઆ થશે આ પ્રમાણે દ્રવ્યની મુખ્યતાથી કથા કરવી તે. ભકતકથાથી અજિતેન્દ્રિયત્ન આદિ દેષ થવાના કારણે અતિચાર લાગે છે.
મગધ આદિ દેશોની કથા વગેરેને દેશ કથા કહે છે. તે પણ ચાર પ્રકા२नी . (१) ४.६, (२) विधि, (3) (4s६५, (४) नेपथ्य.
१-व्ययितानि भवन्तीत्यर्थः ।
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम् - ४
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'दक्षिणे मातुली कन्या परिणेया प्रयत्नतः ' - इति लाटादिदेशेषु मातुलकन्या गम्या तदितरत्र - ' मातुलस्य सुतामूदवा मातृगोत्रां तथैव च । समानप्रवरां चैव भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्' इति सैवागम्येत्यादिप्रकथनम् । विधिः== भोजनादिसम्पादनं तेन देशकथा यथा— मगधेऽन्नदुग्धादीनां भोज्यानामेवं प्राचुर्ये भवति, कोसलदेशे भवनादीन्येवं निर्मीयन्ते, स्रुध्ने चैत्रं व्यापारपरायणा धनिनः, -इत्येवमादि, विकल्पः = क्षेत्र वापी - कूप - तडागादि निर्माण, सस्यादिसम्पनिश्च तेन देशकयेस्यतिरोहितम्, नेपथ्यं = स्त्री पुरुष कर्तृकमणिभूषणादिधारणं
(१) छंद - देशकथा जैसे- दक्षिण देशमें मामाकी कन्या के साथ विवाह किया जाता है । अन्य देशों में दोष माना जाता है, जैसा लिखा है कि-' मामाकी कन्या से माता के गोत्रमें उत्पन्न किसी और भी कन्या से अथवा एक प्रवर (मूल) की कन्या से यदि कोई विवाह करे तो वह विवाह अयोग्य समझा जाता है और विवाह करनेवाले को चान्द्रायणव्रत करना पडता है' इत्यादि । (२) विधि-देशकथा जैसे—' मगध देशमें चावल, दूध, आम वगैरह इस प्रकार उत्पन्न होते हैं, कोसल (अवध) देशमें मकान इस प्रकार बनाये जाते हैं, तथा स्रुघ्न ( आगरा प्रान्त) के धनी लोग इस प्रकार व्यापार किया करते हैं' इत्यादि । (३) विकल्प - देशकथा जैसे-खेत, बावडी, कूप, तालाब, आदि के खुदवाने तथा शालि आदि के रोपने आदि की कथा करना । ( ४ ) नेपथ्य - देशकथा 'मणि-भूषण
(૧) છન્દ દેશકથા—જેમકે, દક્ષિણ દેશમાં મામાની પુત્રી સાથે લગ્ન કરી શકાય છે. અને બીજા દેશેમાં તે પ્રમાણે કરવામાં દ્વેષ માનવામાં આવ્યે છે. જેવી રીતે અન્ય ગ્રંથેમાં લખેલુ છે કે:- મામાની પુત્રીથી, માતાના ગાત્રમાં ઉત્પન્ન કાઇ ખીજી કન્યાથી અથવા એક પ્રવર (મૂલ) ની કન્યા સાથે કઇ વિવાહ કરે તે તે ત્રિવાહ-લગ્ન અયેગ્ય સમજવામાં આવે છે અને લગ્ન કરનારને ચાંદ્રાયણ વ્રત ४२वुं पडे हे धृत्याहि. (२) विधि देशभ्या-भडे, भगध देशमां यावस- (योमा)-दूधઆંખા વગેરે આ પ્રમાણે ઉત્પન્ન થાય છે, કેશલ (અવધ) દેશમાં મકાન આ પ્રમાણે મનાવવામાં આવે છે. તથા આગરા પ્રાન્તમાં ધનવાન માણસેા આ પ્રમાણે વ્યાપાર पुरे छे घेत्याहि. (3) विमुत्पथी देशस्था - मडे, जेती, वाडी, वा-ताव वगेरे ખાદાવવાની તથા શાલી આદિ ધાન્ય રોપવાની કથા કરવી તે. (૪) નેપથ્ય
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आवश्यकसूत्रस्प
तेन-देशकथा यथा—' -'अहो वैदेहीनां केशपाशविन्याशो बासोधारणमात्रीष्यं च, अहो गौर्जरीणामल्पीयसाऽपि भूषाप्रयोगेण रूपसौन्दर्यम्, अहो पाञ्चालीनामधरीयचैलचमस्कारः" इत्यादिः, इह च रागद्वेषोदयपक्षपातादयो दोषा बोद्धव्याः । ' रायकहाए' राज्ञः = नृपतेः कथा राजकथा तया, इयमपि अतियाननिर्याण - बलवाहन – कोशकोष्ठागारभेदाच्चतुर्विधाः तत्राऽतियानं=नगरादिप्रवेशनं तेन राजकथा यथा- -' शशिप्रभच्छत्र निवारितातपः, सदन्तिवाजी सितचामरद्वयः । असौ नृपो मागधवन्दिवन्दितो, रथेन सम्प्राप्स्यति राजधानिकाम् '
—
वस्त्र आदि के धारण करने की कथा करना, जैसे-विदेह देशकी स्त्रियों के केशपाश आदि की सुन्दरता अच्छी है, गुजराती स्त्रियों की थोडे आभूषण से भी रूपसुन्दरता और पञ्जाबी स्त्रियों के अधरीय वस्त्रोंका चमत्कार प्रशंसनीय है ' इत्यादि रूप से कथन करना । देशकथा में राग-द्वेष - पक्षपात आदि दोषों की संभावना से अतिचार लगता है ।
राजकथा भी चार प्रकार की है- (१) अतियान (२) निर्याण (३) बलवाहन (४) कोष- कोष्ठागार, उनमें (१) अतियान ( नगरादिप्रवेश) से राजकथा-जैसे 'चन्द्रमा के समान स्वच्छ छत्र और चामरों से सुशोभित, हाथी घोडों से युक्त, रथ पर चढ़ा हुवा यह राजा मागध, बन्दी आदि याचक जनों की जयध्वनि के साथ राजधानी
દેશ કથા-મણુિ-ભૂષણુ વજ્ર આદિ ધારણ કરવાની કથા કરવી તે. જેમકે વિદેહ દેશની શ્રીએના કેશ–પાશ વગેરેની સુંદરતા સારી છે. ગુજરાતી સ્ત્રીઓ ચેડાં આભૂષણ પહેરે તે પણ સુંદર દેખાય છે, પંજાખી સ્રીઓના વસ્ત્રોના ચમત્કાર પ્રશંસા કરવા ચેાગ્ય છે ઇત્યાદિ રૂપથી વાત કરવી તે. દેશકથામાં રાગ-દ્વેષ-પક્ષપાત વગેરે રાણે થવાના સંભવ છે તેથી અતિચાર લાગે છે.
२०४४था पशु यार प्रहारनी छे (१) अतियान, (२) निर्याय, (3) जसवाढन, (४) भाष-ष्ठागार. तेमां (१) अतियान (नगराद्विप्रवेश) थी राजस्था:જેમકે-‘ ચન્દ્રમા પ્રમાણે સ્વચ્છ છત્ર અને બે ચામરીથી સુન્થેભિત, હાથી ઘેાડાથી યુકત, રથ ઉપર બેઠેલા આ રાજા માગધ-બી આદિ યાચક જતાની જયઘેષણા સાથે રાજધાનીમાં પ્રવેશ કરશે-ઇત્યાદિ. (૨) નિર્માંણુ-નગરાદિથી ખહાર નીકલવાની
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
१८७ इति । निर्माण=पुरादर्गिमनं, तेन यथा तत्रैव 'पुराबहिर्गच्छति सैन्यसंवृतः' इति चतुर्थचरणव्यत्यासेनोदीरणम् । बलं सैन्यं, वाहनं-गजादि, ताभ्यां यथा
'अमी खुरक्षुण्णधरास्तुरङ्गमाः, रथा महान्तश्च गजा मदोद्धताः । पदातयो वैरिनिबईणक्षमाः, क्षमापतेः कस्य चकासतीदृशाः' ॥ इति, कोश:=भाण्डागारं, कोष्ठागारं-धान्यादिगृहं ताभ्यां यथा
___'रत्नादिपूर्णकोशः, कोट्टपदातिप्रकोपदलितारिः। संभृतकोष्ठागारः, मुखं स्वपित्येष नरनाथः' इत्यादि । अत्र राजरहस्यभेदनादयो दोषाः प्रतीता में प्रवेश करेगा' इत्यादि । (२) निर्याण (नगरादि से बाहर निकलने) से राजकथा-जैसे-'उक्तशोभाके साथ राजा राजधानी से बाहर निकलेगा' इत्यादि । (३) बल (सेना) वाहन (हाथी घोडे आदि) से राजकथा-जैसे-'अहा! ऐसे पडे २ चंचल घोडे, मदोन्मत्त हाथी और शत्रुओं के छक्के छुडानेवाले शूरवीर किस राजाके हैं !' इत्यादि । ४ कोष (खजाने) और कोष्ठागार (कोठार) से राजकथा-जैसे-' जिसके रत्नादि से खजाना, और धान्य आदि से कोठार भरे हुए हैं तथा जिसका किला अभेद्य एवं योद्धागण शत्रओं का दमन करनेवाले हैं, ऐसा यह राजा सुख से समय बिताता है' इत्यादि । इस प्रकार राजकथा करने से राजरहस्यमेदन आदि अनेक दोषों की उत्पत्ति होने के कारण अतिचार लगता है। કથા–જેમકે –ઉપર કહેલી શોભા સાથે રાજા-રાજધાનીથી બહાર નીકળશે ઈત્યાદિ. (3) स-(सेना) पान (हाथी घोड) सहित १४या-भ-मड ? मावा મોટા-મોટા ચંચલ ઘેડા, મદેન્મત્ત હાથી અને શત્રુઓના માન ઉતારી નાખે તેવા शूरवी२ ७. सन ? Vत्याहि. (४) उष ( न) भने । ॥२ ( २)नी રાજકથા-જેમકેજેના રત્નાદિકથી ખજાના અને ધાન્યાદિકથી કોઠાર ભરેલા છે તથા જેન રાજના કિલા અભેદ્ય છે. અને દ્ધાઓ શત્રુઓનું દમન કરવાવાળા છે. એવા આ રાજા સુખથી સમય ગુજારે છે. ઈત્યાદિ. આ પ્રમાણે રાજકથા કહેવાથી રાજાની ગુપ્ત વાત ભેદન વગેરે અનેક દેની ઉત્પત્તિ થવાના કારણે અતિચાર લાગે છે.
१.-तत्रैव-मोक्तश्लोक एव ।
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१८८
आवश्यकसूत्रस्य एव । 'पडिक्कमामि' पतिक्रामामि, 'चऊहिं' चतुभिः, 'झाणेहि' ध्यातिः= ध्यानं निर्वातस्थानस्थितनिश्चलपदीपशिखावत् स्थिरतर-धारावाहिज्ञानविच्छेदकविषयान्तरसञ्चारानन्तरितकमात्रार्थचिन्तनरूपचित्तैकाग्रतास्वरूपं, यदुक्तम्___ 'अंतोमुहुत्तमित्तं, चित्तावस्थाणमेगवत्थुम्मि ।
छउमस्थाणं झाणं, जोगणिरोहो जिणाणं ति' इति ।
तैः, तद्द्वारा यो मयाऽतिचारः कृतः, इत्याधन्वयः प्राग्वत् । क्रमेण भेदचतुष्टयमेवाह-'अट्टेणं झाणेणं' आर्तेन ध्यानेन, अति: मनोव्यथा, तस्यां तया सह वा भवमिति, अथवा 'ऋतिः अशुभं तया सह भवमात तेन ध्यानेन मनोज्ञामनोज्ञवस्तुसंयोगवियोगजनितचित्तोद्रकलक्षणेनेत्यर्थः, तदुक्तमितरत्रापि
पवन रहित स्थानमें रखे हुए निश्चल दीपकी शिखाके समान अत्यंत स्थिर-धारावाही ज्ञानका विच्छेद करनेवाले अन्य पदार्थों के संबन्ध से रहित एक मात्र वस्तु के चिन्तन को ध्यान कहते हैं, जैसा कि कहा है-'छद्मस्थों के एक वस्तु में अन्तर्मुहूर्त मात्र मनका अवस्थान 'ध्यान' कहलाता है। किन्तु जिन भगवान के मन का अभाव होने के कारण योगनिरोध ही होता है, अवस्थान नहीं'। वह ध्यान आर्त्त (१) रौद्र (२) धर्म्य (३) और शुक्ल (४) भेद से चार प्रकार का है, उनमें से (१) आर्तध्यान उसे कहते हैं जो अति-मन की व्यथा के साथ, अथवा ऋति-अशुभ के साथ होने वाला हो, अर्थात् इष्ट शब्दादि के संयोग और अनिष्ट के वियोग का चिन्तन करना। जैसा कि लिखा है जिसमें
નિવૃત ( જ્યાં પવન આવી શકે નહિ તેવા) સ્થળે રાખેલા નિશ્ચલ દીપક–દીવાની શિખા સમાન અત્યંત સ્થિર ધારાવાહી જ્ઞાનને વિચ્છેદ કરવાવાળા અન્ય પદાર્થોના સંબંધથી રહિત એક માત્ર વસ્તુના ચિન્તનને “ધ્યાન” કહે છે.
કહ્યું છે કે “છદ્મસ્થને ” એક વસ્તુમાં અન્તર્મહત્ત માત્ર મનનું અવસ્થાન २७ तर ध्यान ४३ छ. ते ध्यान (१) भात, (२) शैद्र, (७) भ्यः, (४) शुस ભેદ થી ચાર પ્રકારનું છે. તેમાં (૧) આ ખ્યાન તેને કહે છે કે જે અતિ–મનની પીડાની સાથે અથવા તિ-અશુભની સાથે થનારૂં હોય, અર્થાત્ ઈષ્ટ શબ્દાદિને
१-ऋतिः-अशुभमिति शब्दकल्पद्रुमः ।
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
'राज्योपभोगशयनाऽऽसनवाहनेषु,
स्त्रीगन्धमाल्यमणिरत्नविभूषणेषु । यत्राभिलाषमतिमात्रमुपैति मोहाद्
ध्यानं तदातमिति संप्रवदन्ति तज्ज्ञाः ॥१॥' इति 'रुदेणं झाणेणं' रौद्रेण ध्यानेन, रोदयति=अन्तर्भावितण्यर्थत्वात् सहसोपघातादिपरिणामयुको जीवो व्यथयति पराननेनेति रुद्रः, यद्वा रुद्र इत्र चण्डस्वादुद्रस्तस्य कर्म रौद्रं, तेन ध्यानेन हिंसाधतिक्रौर्यभावोपहतेनेत्यर्थः, एतच्चोक्तम्--
'संछेदनैर्दहन-भञ्जन-मारणश्च,
___ बन्ध-प्रहार-दमनैविनिकृन्तनश्च रागोदयो भवति येन न चानुकम्पा,
ध्यानं तु रौद्रमिति तत्पवदन्ति तज्ज्ञाः ॥२॥ इति । मोहवश राज्य के उपभोग, शय्या, आसन, हाथी, घोडे आदि वाहन, स्त्री, गन्ध, माला, मणि, रत्न, भूषण आदि की इच्छा उत्पन्न हो उसे और इससे विपरीत संयोगों की अनिच्छा करना 'आर्तध्यान है।
(२) उपघात आदि परिणामों से जो जीव को मलावे अर्थात् दुखी करे, अथवा अत्यन्त क्रूर आत्माका जो कर्म (आत्मपरिणामरूप क्रियाविशेष) उसको 'रौद्रध्यान' कहते हैं, जैसे कहा है-'जिससे छेदन-भेदन-दहन-मारण-बन्धन-प्रहरण-दमन-कर्तन સગ અને અનિષ્ટનાં વિયેગનું ચિન્તન કરવું, જેમકે–જેમાં મેહવશ રાજ્યના ઉપભેગ यथ्या, मासन, साथी, 1 माह पाईन, सी, आन्ध, मासा, मणि, २त्न, भूषण વગેરેની ઈરછા ઉત્પન્ન થાય છે અને એ સર્વથી વિપરીત સંયોગની અનિચ્છા કરવી તે આ ધ્યાન કહેવાય છે.
(૨) ઉપઘાત-વગેરે પરિણામોથી જીવને રડાવે અર્થત-દુઃખી કરે, અથવા અત્યંત ક્રૂર આત્માનું જે કમ (આત્મપરિણામરૂપ ક્રિયાવિશેષ) તેને 'शरप्यान' छ. म युं रेना । छेन, बहन, हन, भार, मधन, પ્રહરણ, દમન, કર્તન (કાપવું) વગેરેના કારણથી રાગ-દ્વેષને ઉદય થાય અને દયા
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आवश्यकमुत्रस्व
"
'धम्मेणं झाणेणं' धर्म्येण ध्यानेन धर्मः श्रुतचारित्रलक्षणस्तस्मादनपेतं = तद्युकं 'धयै, तेन ध्यानेन वीतरागाऽऽज्ञाऽनुचिन्तनेनेत्यर्थः । एतदप्युक्तम्
'मृत्रार्थसाधन महाव्रतधारणेषु,
१९०
बन्धप्रमोक्ष गमनागमहेतु चिन्ता |
पञ्चेन्द्रियव्युपरम दया च भूते,
ध्यानं तु धर्म्यमिति संप्रवदन्ति तज्ज्ञाः || ३ || ' इति ।
'सुकेणं झाणेणं' शुक्लेन ध्यानेन, शुक्रम् = आर्त्तरौद्रोक्तदोषराहित्येन निष्कलङ्कतया स्वच्छम्, यद्वा शु=शुचं = ज्ञानावरणीयादिकर्ममलं क्ल= क्रमयति= अपनयतीति शुक्लं तेन ध्यानेन, दोषमलापगमाच्छुचिस्वरूपेणेत्यर्थः । इदमप्युक्तम्'यस्येन्द्रियाणि विषयेषु पराङ्मुखानि, संकल्पकल्पनविकल्प विकारदोषः ।
(काटना) आदि के कारण रागद्वेषका उदय हो और दया न होऐसे आत्मपरिणाम को 'रौद्रध्यान' कहते हैं ' ॥
(३) वीतराग की आज्ञारूप धर्म से युक्त ध्यान को 'धर्म्यध्यान' कहते हैं, कहा भी है- 'आगम के पठन व्रतधारण, बन्धमोक्षादि के चिंतन, इन्द्रियदमन तथा प्राणियों पर दया करने को 'धर्म्यध्यान' कहते हैं ॥
(४) शुक्ल अर्थात् सकल दोषों से रहित होने के कारण निर्मल, अथवा शु-ज्ञानावरणीयादि कर्ममल को क्ल-दूर ध्यान को 'शुक्लध्यान' कहते हैं, जैसा कि कहा है ન થાય આવા આત્મપરિણામને ‘રૌદ્રધ્યાન’ કહે છે,
रनेवाले जिसकी
L
(૩) વીતરાગની આજ્ઞા રૂપ ધર્મયુક્ત ધ્યાનને ‘ધ ધ્યાન' કહે છે. કહ્યુ :- सागमा स्वाध्याय, વ્રતધારણ, ખંધ–મેાક્ષાદિનું ચિન્તન, ઇંદ્રિયદમન તથા પ્રાણીઓ પર દયા કરવી તેને ધમ્ય ધ્યાન કહે છે.
અથવા
(૪) શુકલ અર્થ સકલ દેષાથી રહિત હાવાના કારણે નિર્માલ ૩-જ્ઞાનાવરણીય આદિ ક`મલને કલ-દૂર કરનાર ધ્યાનને શુકલધ્યાન કહે છે. प्रेम मधु छे :-नेनी इंद्रियो विषयवासनारहित होय, समुदय-विश्य दोष१- ' धर्म्यम् ' १' धर्मपथ्यर्थन्यायादनपेते' (४।४।९२ ) इति यत् ।
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मनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
योगैस्तथा त्रिभिरहो ? निभृतान्तरात्मा,
ध्यानं तु शुक्लमिदमस्य समादिशन्ति ॥४॥' इति । संक्षिप्यषां स्वरूपाण्युक्तानि यथा
'कामाणुरंजियं अट्ट, रोई हिंसाणुरंजियं । धम्माणुरंजियं धम्मं, मुक्कज्झाणं निरंजणं ॥१॥' इति ॥ सू० ७॥
॥ मूलम् ॥ पडिकमामि पंचहि किरियाहि-काइयाए, अहिगरणियाए, पाउसियाए, परितावणियाए, पाणाइवायकिरियाए । पडिक्कमामि पंचहि कामगुणेहि-सद्देणं,रूवेणं,गंधेणं,रसेणं,फासेणं।पडिक्कमामि पंचहिं महत्वएहि-सव्वाओ पाणाइवायाओ वेरमणं, सव्वाओ मुसावायाओ वेरमणं, सव्वाओअदिनादाणाओ वेरमणं, सव्वाओ मेहुणाओ वेरमणं, सव्वाओ परिग्गहाओ वेरमणं । पडिकमामि पंचहि समिईहिं-इरियासमिईए,भासासमिईए, एसणासमिईए, आयाणभंडमत्तनिक्खेवणासमिईए, उच्चारपासवणखेलजल्लसिंघाइन्द्रियाँ विषयवासना रहित हो, संकल्पविकल्पादिदोषयुक्त जो तीन योग उनसे रहित उस महापुरुष के ध्यान को 'शुक्लध्यान' कहते हैं। संक्षेप से चारों का स्वरूप इस प्रकार है-'किमी वस्तुकी कामना से युक्तको आर्त, हिंसादि से युक्त को रौद्र, धर्म से युक्त को धम्य और सब प्रकार के दोषों से रहित को शुक्लध्यान कहते हैं'। इन चार ध्यानों के निमित्त से जो अतिचार लगा हो उससे मैं निवृत्त होता हूं। सू० ७॥ યુક્ત જે ત્રણ વેગ તેનાથી રહિત એવા મહાપુરુષના ધ્યાનને “શુકલધ્યાન' કહે છે. સંક્ષેપથી ચારે ધ્યાનનું સ્વરૂપ આ પ્રમાણે છે. “કઈ વસ્તુની કામનાથી યુકતને આd, હિંસ દિથી યુકતને રો, ધર્મથી યુકતને ધમ્મ અને સર્વ પ્રકારના દેષ રહિતને શુકલધ્યાન કહે છે. આ ચાર ધ્યાનેના નિમિત્તથી જે કાંઈ અતિચાર auया है.५ ते. ननायी हुँ निवृत्त या छु. (२०७)
१- कामानुरञ्जितमा गै, हिमानुरञ्जितम् । धर्मानुरञ्जितं धर्म्य, शुल्कध्यानं निरन्जनम् ॥ १ ॥
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१.२
आवश्यकसूत्रस्य णपारिठावणियासमिईए। पडिकमामि छहिं जीवनिकाएहिपुढविकाएणं, आउकाएणं, तेउकाएणं, वाउकाएणं, वणस्सइ. काएणं, तसकाएणं। पडिक्कमामि छहिं लेसाहि-किण्हलेसाए, नीललेसाए, काउलेसाए, तेउलेसाए, पउमलेसाए, सुक्कलेसाए ॥ सू० ८॥
॥ छाया ॥ प्रतिक्रामामि पञ्चभिः क्रियाभिः–कायिक्या, आधिकरणिक्या, पावे. पिक्या, पारितापनिक्या, प्राणातिपातक्रियया। प्रतिक्रामामि पश्चमिः कामगुणैः-शब्देन, रूपेण, गन्धेन, रसेन, स्पर्शेन । प्रतिक्रामामि पञ्चभिर्महाव्रतैःप्राणातिपाताद्विरमणेन, मृषावादाद्विरमणेन, अदत्तादानाद्विरमणेन, मैथुनाद्विरमणेन, परिग्रहाद्विरमणेन । प्रतिक्रामामि पञ्चभिः समितिभिः-ईर्यासमित्या, भाषासमित्या, एषणासमित्या, भाण्डमात्रादाननिक्षेपणासमित्या, उच्चारणप्रस्रवणखेलजल्लसिंघाणपारिष्ठापनिकासमित्या । प्रतिक्रामामि षभिर्जीवनिकायैःपृथ्वीकायेन, अपकायेन, तेजस्कायेन, वायुकायेन, वनस्पतिकायेन, त्रसकायेन । -प्रतिक्रामामि षभिर्लेश्याभिः-कृष्णलेश्यया, नीललेश्यया, कापोतलेश्यया, तेजोलेश्यया, पद्मलेश्यया, शुक्ललेश्यया ॥ सू० ८ ॥
॥ टीका ॥ 'पडिक्कमामि' प्रतिक्रामामि, 'पंचहि' पञ्चभिः, 'किरियाहिं' क्रिया करणं व्यापारस्तेन तद्वारेत्यर्थः, बहुवचनं, 'यो मयाऽतिचारः कृत इत्यादिसम्बन्धः प्राग्वत् ; क्रियापश्चकमेवाह--'काइ०' इति 'काइयाए' चीयन्ते एकत्रीभवन्ति अस्मिन्नस्थ्यादय इति कायः शरीरं तेन निर्वृत्ता क्रिया कायिकी-शरीर
क्रिया पांच प्रकारकी है-(१) कायिकी (२) आधिकरणिकी, (३) प्रादेषिकी, (४) पारितापनिकी (५) प्राणातिपातकी । जिसमें - अस्थि आदि हो उसे काय कहते हैं। उससे होनेवाली क्रिया को 'कायिकी' कहते हैं, वह तीन प्रकारकी है-(१) अविरतकायिकी,
या पांय ना छे. (१) आयडी, (२) भाषियी ; (3) प्राषिक्षी, (४) पारितापनिधी, (५) प्रायातिती . मा अस्थि-8131 वगेरे डाय ते आय કહે છે. અને તેના વડે થવા વાળી ક્રિયાને “કાયિકી” કહે છે. તે ત્રણ પ્રકારની
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मुनितोषणी टीका, पतिक्रमणाध्ययनम्-४
१९३ व्यापारः, इयं त्रिविधा-अविरतकायिकी, दुष्पणिहितकायिकी, उपरतकायिकी चेति, तत्राविरतानांव्रतरहितानां सम्यग्दृष्टीनां मिथ्यादृष्टीनां च कर्मबन्धनहेतुभूता उत्क्षेपादिस्वरूपा प्रथमा, द्वितीया द्विविधा-इन्द्रियदुष्पणिहितकायिकी नोइन्द्रियदुष्पणिहितकायिकी च, इयं द्विविधाऽपि प्रमत्तसंयतानां क्रियोच्यते, तत्र इन्द्रियैः चक्षुःश्रोत्रादिभिः दुष्पणिहितस्य-इष्टानिष्टविषयसंपाप्तौ किश्चिन्मोक्षमार्ग पति दुर्व्यवस्थितस्य कायेन नित्ताऽऽद्या, नोइन्द्रियेण मनसा दुष्पणिहितस्याऽशुभसंकल्पेन दुर्व्यवस्थितस्य कायेन निर्वृत्ताऽपरा । उपरतस्य-प्रायः सावधयोगनिवृत्तस्याऽप्रमत्तसंयतस्य कायेन निवृत्ता-उपरतिकायिकी तृतीया, तया (२) दुष्प्रणिहितकायिकी (३) उपरतकायिकी। मिथ्यादृष्टियों और अविरतसम्यग्दृष्टियों की कर्मबन्धन के हेतुभूत क्रिया को 'अविरतकायिकी' कहते हैं । दुष्प्रणिहितकायिकी क्रिया दो प्रकारकी है-(१) इन्द्रियदुष्प्रणिहितकायिकी, (२) नोइन्द्रियदुष्प्रणिहितकायिकी, ये दोनों क्रियाएं प्रमत्त साधुओं की हैं। उनमें चक्षु आदि इन्द्रियों की चपलता के कारण मोक्षमार्ग के प्रति अव्यवस्थित (अस्थिर) के काय से होनेवाली क्रिया को 'इन्द्रियदुष्प्रणिहितकायिकी' कहते हैं, ऐसे ही नोइन्द्रिय (मन) के अशुभ संकल्प के द्वारा अव्यवस्थित के काय से होनेवाली क्रिया को नोइन्द्रियदुष्प्रणिहितकायिकी' कहते हैं। प्रायः सावध योग से निवृत्त अप्रमत्त संयत के काया से होनेवाली क्रिया को 'उपरतकायिकी' कहते हैं । (१) छ. (१) अविरत 481, (२) दुप्रणितियी , (3) ५२तयिी . मिथ्याદૃષ્ટિઓ અને અવિરતસમ્યગુદૃષ્ટિઓની કર્મબન્ધનની હેતુભૂત ક્રિયાઓને "अविरताय3 छ. प्रतियि लिया मे २नी छे. (१) ઈન્દ્રિયદુપ્પણિહિતકાયિક, (૨) નેઈન્દ્રિયદુપ્રણિહિતકાયિકી, આ બન્ને ક્રિયાઓ પ્રમત્ત સાધુઓની છે. તેમાં ચક્ષુ આદિ ઈન્દ્રિઓની ચપલતાને કારણે મેક્ષમાર્ગમાં અસ્થિર કાયાથી થવા વાળી ક્રિયાઓ ઈન્દ્રિયદુપ્રણિહિતકાયિકી કહેવાય છે. એ પ્રમાણે નેઈન્દ્રિય (મન) ના અશુભ સંકલ્પ દ્વારા અસ્થિર કાયાથી થવાવાળી ક્રિયાઓને નેઈન્દ્રિયદુપ્રણિહિતકાયિકી ક્રિયા કહે છે. પ્રાયઃ-ઘણું કરીને સાવદ્ય યુગથી નિવૃત્ત અપ્રમત્ત સંયતીની કાયા વડે થવાવાળી ક્રિયાઓને ઉપરતકાયિકી ક્રિયા કહે છે. એ ૧
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आवश्यक सूत्रस्य
त्रिविधस्वरूपया, 'अहिगरणियाए' अधिक्रियते = समाश्रीयते = प्राप्यते नरकादिgrat जीवोऽनेनेत्यधिकरणं = खड्गादि, तत्र भवाऽऽधिकरणिकी, इयं द्विविधा-संयोजनाधिकरणिकी निर्वर्त्तनाधिकरणिकी चेति, यस्यां खड्गतत्कोषादिकयोः संयोजनं क्रियते सा संयोजनाधिकरणिकी, यस्यां च खङ्गतोमरादीनामादितो निर्वर्तनंनिष्पादनं सा निर्वर्तनाधिकरणिकी तया, 'पाउसियाए ' प्रद्वेषः = मत्सरस्तत्र भवा माद्वेषिकी तया; एषा द्विविधा - जीनमाद्वेषिकी अजीवमाद्वेषिकी च, तत्राऽऽद्याजीत्रमद्वेषेण निर्वृत्ता, द्वितीया चाऽजीवमद्वेषेण = पाषाणादिस्खलनादिना यो द्वेषजिसके द्वारा आत्मा नरकादि कुगति में जावे, ऐसे खड्गादि से होनेवाली क्रियाको 'आधिकरणिकी' क्रिया कहते वह दो प्रकार की है - (१) संयोजनाधिकरणिकी और (२) निर्वर्त्तनाधिकरणिकी, जिसमें खड्ग आदि का कोष (म्यान) आदि के साथ संयोग किया जाय वह 'संयोजनाधिकरणिकी' है, और जिस (क्रिया) में खड्ग आदि बनाये जायँ उसे 'निर्वर्त्तनाधिकरणिकी' क्रिया कहते है ॥ २॥
- द्वेष से युक्त क्रिया को 'प्राद्वेषिकी' क्रिया कहते हैं, वह दो प्रकार की है- (१) जीवप्राद्वेषिकी और (२) अजीवप्राद्वेषिकी । जीव पर द्वेष करने से होनेवाली क्रिया को 'जीवप्राद्वेषिकी' और अजीव पाषाणादि की ठोकर आदि लगने के कारण उस पर द्वेष करने से होनेवाली क्रिया को अजीवप्राद्वेषिकी' क्रिया कहते हैं ॥ ३ ॥
6
જેના વડે આત્મા નરકાદિ કુગતિમાં જાય, એવી તલવાર આદિ શસ્ત્રથી थवावाजी याने 'माधिरथिड्डी' दिया आहे हे, ते मे अारनी छे. (१) संयाઆદિના કાષ જનાધિકરણિકી (૨) અને નિવત્તનાધિકરણુકી', જેમાં તલવાર (મ્યાન) આદિ સાથે સંચેગ કરવામાં આવે તે ‘સયાજનાધિકરણિકી” છે અને જે ક્રિયામાં તલવાર આદિ બનાવવામાં આવે તેને નિવત્તનાધિકરણિકી' કહે છે. द्वेषयुक्त डियाने 'अद्वेषिकी डिया हे छे. ते मे अभरनी छे. (१) लণપ્રાત્યેષિકી અને (૨) અછવાદ્રેષિકી, જીવઉપર દ્વેષ કરવાથી થવા વાળી ક્રિયાને ‘જીવપ્રાક્રેષિકી' ક્રિયા કહે છે. અને અજીવ–પાષાણુ માહિની ઠાકર લાગવાના કારણે તેના ઉપર દ્વેષ કરવાથી થવા વાળી ક્રિયાને અજીવપ્રાક્રેષિકી” ક્રિયા કહે છે. નાણા
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
१९५ स्तेन निवृत्ता, 'पारितावणियाए' परितापन= दुःखं तेन निवृत्ता तत्र भवा वा पारितापनिकी-खड़गायाघातेन पीडाकरणं तया, इयमपि द्विविधा-स्वहस्तपारितापनिकी परहस्तपारितापनिकी च, स्वहस्तेन स्वपरदेहस्य दुःखमुत्पादयतः प्रथमा, परहस्तेन तथा कारयतो द्वितीया, 'पाणाइवायकिरियाए' प्राणाः सन्त्येषामिति प्राणाः पाणिनः तेषामतिपातो-नाशः पाणातिपातः स एव क्रिया पाणातिपातक्रिया तया, एषापि द्विविधा-स्वहस्तप्राणातिपातक्रिया परहस्तपाणातिपातक्रिया च, इहापि प्राणपदेन प्राणिनो ग्रहणं पागवत् , तत्र स्वहस्तेन माणातिपातं कुर्वतः
खड्ग आदि के द्वारा पीडा पहुँचाने को 'पारितापनिकी' क्रिया कहते हैं, उसके दो भेद हैं-(१) स्वहस्तपारितापनिकी, और (२) परहस्तपारितापनिकी। अपने हाथ से परको दुःख पहुँचाने वाली क्रिया को 'स्वहस्तपारितापनिकी' और अन्य द्वारा दूसरे को दुख पहुँचाने वाली क्रिया को 'परहस्तपारितापनिकी' क्रिया कहते हैं ॥४॥
प्राणियों का नाश करने को 'प्राणातिपात' क्रिया कहते हैं। यह भी दो प्रकार की है-(१) स्वहस्तप्राणातिपातक्रिया, और (२) परहस्तप्राणातिपातक्रिया। अपने हाथ से प्राणियों का नाश करने को 'स्वहस्तप्राणातिपातक्रिया,' और पराये हाथ से प्राणियों का नाश करने को 'परहस्तप्राणातिपातक्रिया' कहते हैं ॥५॥
તલવાર આદિ હથિર વડે પીડા પહોંચાડવી તેને “પરિતાપનિકી ક્રિયા” छ, तनारे मे छ (१) २१६स्तपारितापनि' भने (२) '५२६२तપારિતાપનિકી પિતાના હાથ વડે પરને દુ:ખ પહોંચાડવા વાળી ક્રિયાને “સ્વહસ્તપારિતાપનિકી”. ક્રિયા કહે છે અને અન્ય દ્વારા બીજાને દુઃખ પહોંચાડવું તે ક્રિયાને “પરહસ્તપારિતાપનિકી ક્રિયા કહે છે. ૪
પ્રાણીઓના નાશને “પ્રાણાતિપાત’ ક્રિયા કહે છે. તેના પણ બે ભેદ છે; (૧) સ્વહસ્તપ્રાણાતિપાતક્રિયા અને (૨) પરહસ્તપ્રાણાતિપાતક્રિયા, પિતાના હાથ વડે પ્રાણીઓને નાશ કરે તેને “સ્વહસ્તપ્રાણાતિપાતક્રિયા' કહે છે. અને બીજાના હાથથી પ્રાણીઓને નાશ થાય તેવી ક્રિયાને પરહસ્તપ્રાણાતિપાત કિયા કહે છે કે ૫ છે
१- प्राणाः-अर्श आदित्वान्मत्वर्थीयोऽच् ।
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आवश्यकमूत्रस्व
क्रिया प्रथमा, परहस्तेन सा द्वितीया । 'पडिक्कमामि, प्रतिक्रामामि ‘पंचहि' पञ्चभिः, 'कामगुणेहि काम्यन्ते भोगाणिभिरभिलष्यन्ते इति कामाः शब्दाधास्ते च ते कामवृद्धिकारणत्वात् गुणा (पुद्गलधर्मा) व कामगुणाः, यद्वा कामस्य कन्दर्पस्याऽभिलाषमात्रस्य वा सम्पादका गुणाः कामगुणास्तैर्निषिद्धाचरणद्वारेत्यर्थः 'यो मयाऽतिचारः कृत' इत्यादिसम्बन्धो भूतपूर्वः, 'कामगुणपश्चकमेवाऽऽह-'सद्देणं' इति 'सद्देणं' शब्दयते उच्चार्यत इति शब्द: कर्णेन्द्रियग्राह्यनियतक्रमवर्णस्वरूपस्तेन, 'रूवेणं' रूप्यते-विलोक्यते इति रूपंचक्षुर्विषयं नीलपीतादिलक्षणं तेन, 'गंधेणं' गन्ध्यते-आघ्रायत इति गन्धः=घ्राणेन्द्रियविषयश्चन्दनकर्पूरादिस्तेन, 'रसेणं' रस्यते आस्वाद्यत इति रसः=रसनेन्द्रियविषयो मधुरादिस्तेन, 'फासेणं' स्पृश्यते छुप्यत' इति स्पर्शः त्वगिन्द्रियविषयः
इन क्रियाओं के द्वारा मुझ से जो अतिचार किया गया हो उसकी मैं निवृत्ति करता हूँ।
शब्द-जो बोला जाय उस को शब्द कहते हैं, वह कर्णेन्द्रियग्राय मनोज्ञ-अमनोज्ञ वर्णमालास्वरूप है। रूप--जो देखा जाय उसको रूप कहते हैं, वह चक्षु इन्द्रिय का विषय नील-पीतादि है। गन्ध-जो सूंघा जाय उसको गन्ध कहते हैं, वह घाणेन्द्रिय का विषय चन्दन कपूर आदि है। रस-जो चक्खा जाय उसको रस कहते हैं वह रसना इन्द्रिय का विषय मधुर आदिक है । स्पर्श-जो स्पर्श किया जाय (छुआ जाय) उस को स्पर्श कहते हैं, वह स्पर्श इन्द्रिय का विषय
આ ક્રિયાઓ વડે કરી મને જે અતિચાર લાગ્યા હોય તે તેનાથી હું નિવૃત્ત થાઉં છું.
| શબ્દ-જે બોલવામાં આવે છે તેને શબ્દ કહે છે, તે કણેન્દ્રિય ગ્રાહ્ય અને મનેશ અમનેઝ વર્ણમાલા સ્વરૂપ છે. રૂપ-જે જોવામાં આવે તેને રૂપ કહે છે, તે ચક્ષુ ઈન્દ્રિયને વિષય લીલા પીળા આદિ છે. ગન્ધ–જે સુંઘવામાં આવે તેને ગન્ધ કહે છે, તે ઘણેન્દ્રિયના વિષય સૂખડ કપૂર આદિ છે. રસ-જે ચાખવામાં આવે તેને રસ કહે છે, તે રસના ઈન્દ્રિયના વિષય મધુર આદિક છે. સ્પર્શ—જેને સ્પર્શ કરવામાં આવે તેને સ્પર્શ કહે છે તે સ્પર્શેન્દ્રિયના વિષય માલા, સુખડ,
टि. १- 'छुप स्पर्शे' तुदादिरनिट् परस्मैपदी ।
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सुनितोषणी टीका, मतिक्रमणाध्ययनम् - ४
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स्रक्चन्दनाङ्गनादिस्तेन । ' पडिक्कमामि' प्रतिक्रामामि 'पंचहि ' पञ्चभिः, ' महत्वएहिं ' व्रतं = शास्त्रमर्यादांनुसरणं, महान्ति विशालानि च तानि व्रतानि महाव्रतानि तैः, महत्वं चैषां महद्भिस्तीर्थ करगणधरादिभिराचरितत्वेन महापुरुषाऽऽचर्यमाणत्वेन सर्वव्यापकत्वेन श्रावकत्रतापेक्षया च बोध्यं, तैस्तत्सहकृत इति तात्पर्य 'यो मयाऽतिचारः कृतः' इत्यादिसम्बन्धो यथापूर्वम्, महाव्रतपञ्चकमेवाह - ' सव्वा०' इति । 'सव्वाओ पाणाइवायाओ वेरमणं सर्वस्मात् = निखिलात् =स्थूलम्क्ष्मादियावद्भेदविशिष्टात् कृत-कारिता - ऽनुमोदितस्त्ररूपाच्च, प्राणाः = उच्छ्वासनिःश्वासादयस्तेषामतिपातो = वियोजनं = हिंसनमिति यावत्, उनच - 'पञ्चेन्द्रियाणि त्रिविधं बलं च, उच्छ्वासनिःश्वासमथान्यदायुः । प्राणा दशैते भगवद्भिरुक्ता, - स्तेषां त्रियोगीकरणं तु हिंसा' इति, तस्माद्विरमणं = माला, चन्दन, अंगना आदि है । ये पांच काम (विषय भोग के अभिलाष ) गुण (वर्द्धक) हैं, अर्थात् ये आत्मा के स्वभाविक गुणों का नाश करने वाले हैं, इन कामगुणों द्वारा मुझसे जो अतिचार किया गया हो उसकी मैं निवृत्ति करता हूं ।
शास्त्र की मर्यादामें चलने का नाम 'व्रत' है, इन्हें तीर्थकर गणधर आदि महापुरुषोंने स्वीकार किये अथवा ये महापुरुषों के ही आचरण करने योग्य होने से और श्रावक के व्रतों की अपेक्षा बडे होने के कारण 'महाव्रत' कहलाते हैं, वे पांच हैं- (१) कृत-कारित - अनुमोदित रूप सब प्रकार से स्थूल सूक्ष्म आदि समस्त जीवों के प्राणों (पांच इन्द्रिया, तीन बल, श्वासोच्छ्वास અંગના આદિ છે. આ પાંચ अभ ( विषयलोगनी अभिलाषा) गुलु (वर्धक) छ. અર્થાત્ તે આત્માના સ્વાભાવિક ગુણેના નાશ કરવાવાળા છે. તે કામ ગુણેથી મારાથી અતિચાર થયા હેાય તે તેમાંથી હું નિવૃત્ત થાઉં છું.
શાઓની મર્યાદામાં ચાલવાનું નામ ‘વ્રત' છે. આ વ્રતા તીર્થંકર અને ગણધર આદિ મહાપુરૂષોએ સ્વીકાર કરેલ છે, અથવા એ મહાપુરૂષનેજ આચરણ કરવા ચેાગ્ય હાવાથી અને શ્રાવકેાના વ્રતાની અપેક્ષા મોટા હોવાથી 'મહાવ્રત’ કહેાય છે, તે પાંચ પ્રકારનાં છે-(૧) કરવું, કરાવવું અને કરતા હાય તેને અનુમેદન રૂપ સર્વ પ્રકારથી સ્થલ-સૂમ આદિ તમામ જવાના પ્રાણે! (પાંચ ઇન્દ્રિય,
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आवश्यकमत्रस्त निवर्तनम् । 'सन्चाओ मुसावायाभो वेरमणं' मृषावादः अलीकभाषा, तम्माविरमणम् । 'सव्वाओ अदिन्नादाणाओ वेरमणं' अदन=स्वामि-गुरु-राजगृहपति-समिभिरवितीर्ण, तस्य सचिचादिस्वरूपस्य वस्तुन आदान-प्रहगं तस्मात् । 'सन्नाओ मेहुणाओ वेरमणं' सर्वस्मात्, मिथुनं स्वीपुंसलक्षणं, तस्स कर्म मैथुनं तस्मात् , देव-मनुष्य तिर्यग्-लक्षणादित्यर्थः। 'सन्चाओ परिग्गहाबो बेरमणं' परिगृह्यते-स्त्रीक्रियते ममत्वेनेति परिग्रहः सचित्ताचित्तमिश्रमृच्छालक्षणस्तस्मात् । 'पडिकमामि' प्रतिक्रामामि ‘पंचहि' पञ्चभिः 'समिईहि'सम्सम्यक्-एकीभावेन वा इतयः-शोभनैकाग्रपरिणामचेष्टाः, यद्वा संगता इतयः प्रवृत्तयः समितयः पाणिपरितापपरिजिहीर्षया सम्यक् प्रवर्तनानि तामिस्तत्सेवनपसनेनेति भावः, 'यो मयाऽतिचारः कृतः' इत्यादिसम्बन्धः प्रागुक्तः। तदेव समितिपश्चकमाह-'इरि०' इति, 'ईरियासमिईए' ईरणमीर्यान्वतिगमनं, तत्र या समितिः सम्यगेकीभावेन वा रागद्वेषरा हित्येन प्रवर्चनं प्रखरतथा आयु, इन दश) के अतिपात-हिंसा से विरमण (निवृत्त होना)। (२) सब प्रकार के मृषावाद (झूठ) से विरमण । (३) सब प्रकार के अदत्तादान (चोरी) से विरमण । (४) देव-मनुष्य-निर्यच सम्बन्धी सब प्रकार के मैथुन से विरमण। और (५) सचित्त आदि सब प्रकार के परिग्रह से विरमण। इनसे तथा रागडेपरहित शोभन चेष्टा अर्थात् जीवों को किसी भी प्रकार से पीडा न पहुंचे, इस भाव से प्रवृत्ति करने को 'ममिति' कहते हैं । बह पांच प्रकार की है-(१) 'ईर्यासमिति' मुनियों का एकाकी ત્રણ બેલ, શ્વાસોચ્છવાસ તથા આયુષ્ય આ શ) નાં અતિપાત-હિંસ.થી વિરમણ (निवृत्त ५g), (२) स २॥ भृषावा-असत्यया विभ, (3) सब ..२ना भात्तहान (ये.)थी विरभ, (४) ३१; मनुष्यति य समन्धी प्र.ना भयुનથી વિરમણ, અને (૫) સચિત્ત આદિ સર્વ પ્રકારના પરિગ્રહથી વિરમણ એનાથી તથા રાગદ્વેષરહિત ૭ી ચેષ્ટા અર્થાત્ કઈ પણ જાને કેક પ્રકારની પીડા ન પહેચાડવી એવા ભાવ રાખીને પ્રવૃત્તિ કરવી. તેને “સમિતિ કહે છે. તે પાંચ घर छ
(૧) “ઈસમિતિ-મુનિઓના એકાકી ભાવથી અથવા રાગદ્વેષ રહિ.
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
१९९ सरसहस्रकरकरनिकरपकाशितासु दिशासु पदार्थावेक्षणक्षमे चक्षुषि मनुष्यरथचक्र-तुरगखुरक्षुण्णतुषारादौ पासुकमार्गे तदेकतानमनसो मुनेः शनैविन्यस्तचरणस्य सङ्कुचितनिजपूर्वापरगात्रस्य पुरतो युगमात्रदृष्टया चेष्टनमिति यावत् तया। ‘भासासमिईए' भाषणं भाषा-वचनं तस्यां समिति षासमितिः= कार्कश्यादिरहित-हित-मित-स्फीत-मृदुभाषणव्यवहारस्तया । 'एसणासमिईए' एषणा गवेषणा-ग्रहणेषणा-परिभोगैषणादिलक्षणा तत्र समितिरेषणासमितिःभिक्षागतेन मुनिना सोपयोगं नवकोटिविशुद्धभिक्षाग्रहणं तया । 'आयाणभंडमत्तभाव से अथवा रागद्वेषरहिततापूर्वक गमनकालिक प्रवृत्ति, अर्थात जब सूर्य की प्रखर किरणों से दिशाओं के प्रकाशित होने के कारण आंखें पदार्थों को ग्रहण करने में समर्थ हो जायँ, रथ, घोडे, मनुष्य आदि के चलने से ओस के मर्दित हो जाने के कारण मार्ग प्रासुक हो जाय, उस मार्ग पर सावधान हो कर अयत्ना के भय से शरीर को संकुचित करके युगप्रमाण मार्ग को देखते हुए धीरे धीरे मुनि का चलना ।
(२) 'भाषासमिति'-कर्कशता आदि से रहित, सब प्रकार का कल्याण करने वाली, परिमित, स्पष्ट और मधुर वाणी बोलना।
(३) 'एषणासमिति' गवेषणा, ग्रहणेषणा, परिभोगैषणास्वरूप एषणा में यत्नापूर्वक प्रवृत्ति करना, अर्थात् उपयोगपूर्वक नवकोटिविशुद्ध आहार का ग्रहण करना। તતાપૂર્વક ગમનકાલિક પ્રવૃત્તિ અર્થાત જ્યારે સૂર્યના પ્રખર કિરણેથી દિશાઓ પ્રકાશિત થવાના કારણે આંખે પદાર્થને ગ્રહણ કરવા શકિતમાન થઈ જાય. રથ, ઘોડા, મનુષ્ય આદિના ચાલવાથી એસની ભીનાશ ખુદાઈ જવાથી રસ્તે પ્રાસુક થઈ જાય, તે રસ્તા ઉપર સાવધાન થઈ અયનાના ભયથી શરીરને સંકુચિત રાખી યુગપ્રમાણ માર્ગને જોતા થકા ધીરે ધીરે મુનિનું ચાલવું.
(२) भाषासमिति-शत माथी २हित, सप २ना या ४२१વાળી, પરિમિત, સ્પષ્ટ અને મધુર વાણી બોલવી.
(૩) એષણાસમિતિ-ગવેષણ, ગ્રહણષણા, પરિભેગેષણ-સ્વરૂપ એષણામાં યત્નાપૂર્વક પ્રવૃત્તિ કરવી અર્થાત-ઉપગ પૂર્વક નવકેટી વિશુદ્ધ આહાર ગ્રહણ કર.
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आवश्यकसूत्रस्य निक्खेवणासमिईए' भाण्डमात्रे उपकरणमात्रे, आदाननिक्षेपणं ग्रहणस्थापन तद्विषया समितिस्तया। 'उच्चारपासनणखेलजल्लसिंघाणपरिठावणियासमिईए' उन्चार:=पुरीषं, प्रस्रवणं भूत्रं, खेलः श्लेष्मा, जल्लादेहमलं, सिंघाणं= नासामलं, तेषां परिष्ठापनिका व्युत्सर्जनं तद्विषया समितिस्तया। 'पडिक्कमामि प्रतिक्रामामि, 'छहि' षड्भिः, 'जीवनिकाएहि' जीवानां निकायाः=राशयः जीवनिकायाः पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतित्रसस्वरूपास्तैस्तद्वारेत्यर्थः 'यो मयातिचारः कृत' इत्यादि-सम्बन्धः पाग्वदेव । 'पडिक्कमामि' प्रतिक्रामामि, 'छर्हि' पभिः, 'लेस्साहि' लिश्यते-श्लिष्यते-सम्बध्यते आत्मा कर्मभिः
(४) 'आदानभाण्डमात्रनिक्षेपणासमिति'-वस्त्र-पात्र आदि उपकरणों का यत्नापूर्वक लेना और रखना।
तथा (५) 'उच्चार-प्रस्रवण-खेल-जल्ल-सिवाण-पारिष्ठापनिकासमिति'-उच्चार आदि का यत्नापूर्वक दश बोल वर्ज (टाल) के परिष्ठापन करना, इनसे एवं पृथ्वी, अप, तेज, वायु, वनस्पति
और प्रसरूप छह जीव निकायों से, तथा कृष्ण, नील, कापोत, तेज, पद्म और शुक्ल, इन छह लेश्याओं के सम्बन्ध से जो अतिचार किया गया हो तो उससे मैं निवृत्त होता हूं'।
अब लेश्या का स्वरूप कहते हैं
जिसके द्वारा आत्मा कर्मों से लेपायमान हो उसको अर्थात् कषायों के उदय से प्राप्त शक्तिविशेषवाली योगप्रवृत्ति
(४) 'माहान-मां-भात्र-निपा -समिति'-पत्र, पात्र माह ७५४२એને યત્નાપૂર્વક લેવું મૂકવું.
तया (५) 'क्या२-प्रसपा-भेस-area-सिंधा-पारिठापनि-समिति'-यार આદિને યત્ના પૂર્વક દશ-બાલ ત્યજીને પરિષ્ઠાપન કરવું એનાથી એવં પૃથ્વી, પાણી, તેજ, વાયુ, વનસ્પતિ અને ત્રસરૂપ છે જીવ નિકાયેથી, તથા કુષ્ણ, નલ, કાપત, તેજ, પદ્મ અને શુકલા આ છ વેશ્યાઓના સમ્બન્યથી જે કોઈ અતિચાર લાગ્યા હોય તે તેમાંથી હું નિવૃત્ત થાઉં છું,
હવે વેશ્યાનું સ્વરૂપ કહે છેજેના દ્વારા આત્મા કર્મોથી લેપાયમાન થાય તેને અર્થાત્ કક્ષાના ઉદયથી
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
२०१ सहाऽनयेति लेश्या; सा च कषायोदयलब्धशनिविशेषा योगपत्तिः, लेश्या द्रव्य-भावभेदाद्विविधा, तत्रं द्रव्यलेश्या-पुद्गलविशेषरूपा, साऽपि द्विधानोकर्मद्रव्यलेश्या कर्मद्रव्यलेश्या च, तत्र नोकर्मद्रव्यलेश्या वर्णविशेषात्मिका, कर्मद्रव्यलेश्या तु भावलेश्याजनककषायमोहनीयकर्म=नामकर्मद्रव्याणि ।
यच्च परैः कर्मनिष्यन्द-(बध्यमानकर्मपवाह)-रूपत्वं कर्मद्रव्यलेश्याया उकं, तन्न युक्तम्; तथाहि-स कर्मणां निष्यन्दः साररूपोऽसाररूपो वा ? साररूपश्रेत् ज्ञानावरणीयादिष्वन्यतमस्य सारः सर्वेषां वा ? विकल्पद्वयमप्यागमविरुद्धम् , को लेश्या कहते हैं, वह द्रव्य, भाव भेद से दो प्रकार की है। उनमें द्रव्यलेश्या पुद्गलस्वरूप है, वह भी नोकर्मलेश्या, कर्मलेश्या के भेद से दो प्रकार की है। उस में नोकर्मद्रव्यलेश्या वर्णविशेषरूप मानी गई है और कर्मद्रव्यलेश्या भावलेश्या के उत्पादक कषायमोहनीयकर्म और नामकर्म द्रव्यस्वरूप है।
___ जो कोई इस कर्मद्रव्गलेश्या को कर्मनिष्यन्द (बध्यमान कर्मप्रवाह) रूप मानते हैं वह ठीक नहीं, क्यों कि यदि ऐसा लक्षण मान लिया जाय तो यहाँ दो प्रश्न उपस्थित होते हैं कि-वह कर्मनिष्यन्द साररूप है या असाररूप?। यदि सार रूप मानें तो ज्ञानावरणीयादि आठ कमों में से किसी एक कर्म का सार है या सब कर्माका ?, मगर ये दोनों विकल्प आगमविरुद्ध हैं, क्यों कि પ્રાપ્ત થયેલી શકિતવિશેષવાલી ગપ્રવૃત્તિને લેસ્યા કહે છે. તે દ્રવ્ય અને ભાવ ના ભેદથી બે પ્રકારની છે. તેમાં દ્રવ્યલેશ્યા પુગલસ્વરૂપ છે. તે પણ
કમલેસ્યા અને કમલેસ્યાના ભેદથી બે પ્રકારની છે. તેમાં નેકમંદ્રવ્યસ્યા વર્ણવિશેષરૂપ માનવામાં આવી છે અને કર્મ દ્રવ્યલેશ્યા ભાવલેશ્યાની ઉત્પાદક કષાયમહનીયકમ અને નામકર્મ દ્રવ્યસ્વરૂપ છે.
જો કે કેટલાક માણસે આ કર્મ દ્રવ્યલેશ્યને કર્મનિણંદ (બધ્યમાન કર્મ પ્રવાહ) રૂપ માને છે. પણ તે માન્યતા ઠીક નથી. કારણ કે જે એવા લક્ષણ માનવામાં આવે તે આ સ્થળે બે પ્રશ્ન ઉભા થાય છે કે –તે કર્મનિણંદ સારરૂપ છે કે અસાર રૂપ છે ? જે સાર રૂપ છે એમ માનશે તે જ્ઞાનાવરણીયાદિ આઠ કર્મોમાંથી કઈ એક કર્મનો સાર છે, અથવા સર્વ કર્મોને ? પણ
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आवश्यकसूत्रस्त तत्र (आगमे) तासां कर्मफलत्वेनाऽप्रतिपादनाव, कर्मसारेण ववश्यं फलवता भवितव्यम् । यद्युत्तरपक्षः कक्षीक्रियते तर्हि असारस्वरूपस्य तस्य नोस्कृष्टानुभाग प्रति हेतुत्वं सिध्यति ।
ननु यथा कार्मणशरीरस्य कर्मवर्गणाभिः कार्यकारणभेदोऽभ्युपगतः शास्त्रे तथैव लेण्याद्रव्याण्यपि कर्मवर्गणाभिभिन्नान्यभ्युपगन्तव्यानि, तासां तदन्तर्भा. वाऽभारादिति, तदप्यमामाणिकमेव, यथा-कार्मणशरीरस्य कर्मवर्गणाभिभिन्नद्रव्यत्वमागमे प्रतिपादितं तथा लेश्याद्रव्यस्य पृथक्त्वेनाऽनुपादानात्, पृथक्त्वेनाऽनुआगमों में लेश्या कर्मफलस्वरूप नहीं बताई गई है और कर्मों का सार तो अवश्य फलवाला होना ही चाहिये, इसलिये उसको कर्मों का साररूप नहीं कह सकते, यदि असाररूप मानें तो वह उत्कृष्ट अनुभाग का हेतु नहीं हो सकता। अतः लेश्या को कर्मनिष्यन्दरूप नहीं मानना चाहिये । इसलिये जिसके द्वारा आत्मा कमों से लिप्त हो ऐसी शुभाशुभ आत्मपरिणति को ही लेश्या मानना शास्त्रसंमत है।
यहाँ एक ऐसा प्रश्न होता है कि जैसे कार्मण शरीर को कर्मवर्गणा के साथ कार्यकारणरूप माना है वैसे ही लेश्याद्रव्य को मी कर्मवर्गणा के साथ का कारणरूप मानने में क्या आपत्ति है! क्यों कि उन लेश्याओंका कर्म के अन्दर समावेश नहीं होता है। એ બન્ને વિકલ્પ આગમથી વિરુદ્ધ છે. કેમકે આગમાં લેશ્યાને કર્મના ફલસ્વરૂપ કહેવામાં આવી નથી. અને કર્મોના સારરૂપ તે જરૂર ફળવાળું હોવું જ જોઈએ, એટલા માટે તેને કર્મોના સારરૂપ કહી શકાશે નહિ. હવે જે અસારરૂપ માનીએ તે તે ઉત્કૃષ્ટ અનુભાગને હેતુ થઈ શકતું નથી. તે કારણથી લેસ્થાને કર્મનિષ્પન્દરૂપ નહિ માનવું જોઈએ. એટલા માટે જેના દ્વારા આત્મા કર્મોથી લેપાય એવી શુભ-અશુભ આત્મપરિણતિનેજ લેશ્યા માનવી, તે શાસ્ત્રસંમત છે.
અહિં એક એ પ્રશ્ન થાય છે કે જેવી રીતે કાર્ય શરીરને કર્મવર્ગ ણની સાથે કાર્યકારણરૂપ માનવામાં આવે છે. તેવી જ રીતે લેસ્યાદ્રવ્યને પણ કર્મવર્ગણની સાથે કાર્યકારણરૂપ માનવામાં શું આપત્તિ છે? કારણ કે તે લેસ્યાઓને કર્મની અંદર સમાવેશ થતો નથી. એ પ્રમાણે પ્રશ્ન કરે તે
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
२०३ पादानं च कर्मवर्गणान्तर्गतत्वसाधकं, ततश्च, 'तदन्तर्भावाभावात्' इत्ययं हेतुर्बापितविषयः ।
उक्ता द्रव्यलेश्या सम्पति भावलेश्यामाह-सा च कषायोदयलब्धशक्तिविशेषयोगप्रवृत्त्यात्मिका प्रोक्तैव । _अत्राशङ्कते कश्चित्-ननु भावलेश्याया उक्तलक्षणस्वीकारे उपशान्त-क्षीणकषाय-सयोगिकेवलि-गुणस्थानेषु तदभावः प्रसज्यते, तत्र कषायाभावात्-योगप्रवृत्तेरतिशयान्तरमुपनीतेरसंभवात् , इति चेन, तत्र भावलेश्याया उपचारतोऽजीऐसा प्रश्न करना ठीक नहीं, क्यों कि आगमों से विरोध आता है।
अर्थात् किसीभी आगम में लेश्या को कार्यकारणरूप नहीं मांना है।
लेश्या को अलग नहीं बताने का कारण यह है कि वे कर्मवर्गणा के अन्तर्गत साधकस्वरूप हैं। यह हुई द्रव्यलेश्या, अब भावलेश्या कहते हैं
भावलेश्या कषायोदयलन्धशक्तिविशेषयोगप्रवृत्तिरूप पहले कह चुके हैं।
यहाँ पर यह प्रश्न होता है कि भावलेश्या का पूर्वाक्त लक्षण मानने से उपशान्तकषाय, क्षीणकषाय और सयोगिकेवली गुणस्थानों में उस (लेश्या) का अभाव मानना पडेगा, क्यों कि वहाँ कषाय नहीं है! ઠીક નથી, કારણ કે આગમને તેમાં વિરોધ આવે છે.
અર્થાત્ કોઈપણુ આગમમાં સ્થાને કાર્યકારણ રૂપ માનવામાં આવેલ નથી.
લેશ્યાને જૂદી બતાવવાનું કારણ એ છે કે કર્મવર્ગણાની અંદર સાધક સ્વરૂપ છે, આ વાત દ્રવ્યલેસ્યાની થઈ. હવે ભાવલેશ્યા કહે છે.
ભાવલેશ્યા કષાયે દલબ્ધશકિતવિશેષગપ્રવૃત્તિરૂપ છે એમ પ્રથમ કહેવાયું છે.
અહિઆ એક પ્રશ્ન થાય છે કે–ભાવસ્થાનું પર્વોકત લક્ષણ માનવાથી ઉપશાન્તકષાય, ક્ષીણકષાય અને સગિકેવળી ગુણસ્થાનેમાં તે લેસ્થાને અભાવ માનવે પડશે, કારણકે ત્યાં કષાય નથી.
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आवश्यकसूत्रस्त कारात् । 'मुख्याभावे सति प्रयोजने निमित्ते चोपचारः प्रवर्तते' इति न्यायादत्र योगमवृत्तिसत्तेवौपचारिकलेश्यासत्त्वे हेतुः । इदमदम्पर्यम्-या हि योगप्रवृत्तिः मूक्ष्मसम्परायगुणस्थानपर्यन्तं कषायोदयलब्धशक्तिविशेषाऽऽसीत् सैवोपशान्तकषायादिष्वस्ति, अत एव भूतपूर्वनयाऽपेक्षया तत्र लेश्यासद्भावः शास्त्रेषूपगीयते। यथा लोके भगिन्यां मृतायामपि तत्पतिर्भगिनीपतित्वेन व्यवहियत एव ।
नवागमे सामान्येन सयोगिकेवलिपर्यन्तं लेश्यासद्भावाऽऽवेदक
यह प्रश्न करना ठीक नहीं, क्यों कि वहाँ भावलेश्या उपचारमात्र से मानी गई है। "मुख्य का अभाव होने पर निमित्त में उपचार किया जाता है" इस न्याय से योगप्रवृत्ति की सत्ता ही औपचारिक लेश्या के सद्भाव में हेतु माना गया है। यहाँ तात्पर्य यह है कि जो योगप्रवृत्ति सूक्ष्मसंपराय गुणस्थान तक कषायोदयलब्धशक्तिविशेषस्वरूप थी वही योगप्रवृत्ति उपशान्तकषायादिक में है इसलिये भूतपूर्वनयकी अपेक्षा से वहा (उपशान्त क्षीणकषायादि गुणस्थानों में) लेश्या का सद्भाव शास्त्रों में कहा है। लोक में भी यह उक्ति प्रसिद्ध है कि भगिनी (बहिन) के मर जाने पर भी उसके पतिको भगिनीपति (बहनोई) कहते हैं।
बात यह है कि सामान्यतया सयोगिकेवली गुणस्थान पर्यन्त उपचार से ही लेश्या का सद्भाव सिद्ध होता है। -
આ પ્રશ્ન કરે ઠીક નથી, કેમ કે ત્યાં ભાવલેશ્યા ઉપચાર માત્રથી માનવામાં આવી છે. “મુખ્યને અભાવ હોવાથી નિમિત્તમાં ઉપચાર કરાય છે. આ ન્યાયથી વેગ પ્રવૃત્તિની સત્તાજ ઓપચારિક લેસ્થાના સર્ભાવમાં હેતુ માનવામાં આવેલ છે, અહિં તાત્પર્ય એ છે કે જે યુગપ્રવૃત્તિ સુહમપરાય ગુણસ્થાન સુધી કષાયે દયલબ્ધશકિતવિશેષ રૂપે હતી એજ યુગપ્રવૃત્તિ ઉપશાંતકષાયાદિકમાં છે, એટલા માટે ભૂતપૂર્વનયની અપેક્ષાથી ત્યાં (ઉપશાંતક્ષીણુકષાયાદિ ગુણસ્થાનમાં) લેસ્થાને સદ્ભાવ શાસ્ત્રોમાં કહેલ છે. તેમાં પણ આ ઉકિત પ્રસિદ્ધ છે કે બેન મરી જવા પછી પણ તેના પતિને બનેવી કહે છે.
વાત એ છે કે સામાન્ય રીતે સગિકેવળીગુણસ્થાન સુધી ઉપચારથી જ લેસ્યાનો સદ્દભાવ સિદ્ધ થાય છે. જે ત્યાં વાસ્તવિક વેશ્યા માનીએ તે તેનાથી
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मुनितोषणी टीका, पतिक्रमणाध्ययनम्-४
२०५ शाखाऽभिप्राय औपचारिक एवेत्यवसीयते । वास्तविकलेश्यास्वीकारे तत्र स्थित्यनुभागवन्धप्रसङ्गः स्यात् , न च तत्र तत्सद्भावः, तथाहि-'जोगा पयडिपएसं ठिइ अणुभागं कसायओ कुणई' इति वचनात् , प्रकृतिप्रदेशौ योगजन्यौ, स्थित्यनुभागौ च कषायजन्यौ म्तः। मयोगिकेवल्यादिगुणस्थानेषु योगनिमित्तकप्रकृतिपदेशबन्धसद्भावेऽपि कषायाभावात् स्थित्यनुभागसंभवेन कुडयपतितशुष्कलोष्टवस्थितिमकुर्वन्नेव कर्म त्वरितं प्रत्यावर्चते, तदुक्तं श्री
यदि वहाँ वास्तविक लेश्या मानी जाय तो उससे स्थितिबन्ध और अनुभागवन्ध का भी प्रसंग होगा, परन्तु वहाँ उन दोनों बन्धों का अभाव है, कहा भी है कि-"प्रकृति और प्रदेश का बन्ध योग से होता है तथा स्थिति और अनुभाग पन्ध कषाय से होता है।"
इस वचन से प्रकृति और प्रदेश-बन्ध योगजनित है, स्थिति और अनुभागबन्ध कषायजनित है।
सयोगिकेवलि आदि गुणस्थानों में योगनिमित्तक प्रकृतिबन्ध और प्रदेशबन्ध का सद्भाव होने पर भी तथा कषाय के अभाव से स्थिति और अनुभाग का संभव होते हुए भी भीत पर फेंके हुवे सूखे ढेले की तरह वहाँ स्थिति नहीं करता। हुआही कर्म तुरन्त वापस हट जाता है, यही श्री सूयगडांग सूत्र में भगवानने फरमाया है कि
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સ્થિતિબંધ અથવા અનુભાગબંધનો પણ પ્રસંગ થશે, પરંતુ ત્યાં તે બંને બંધને અભાવ છે, કહ્યું પણ છે કે “પ્રકૃતિ અને પ્રદેશને બંધ વેગથી થાય છે તથા સ્થિતિ અને અનુભાગને બંધ કષાયથી થાય છે.”
આ વચનથી પ્રકૃતિ અને પ્રદેશબંધ ગજનિત છે. સ્થિતિ અને અનુભાગ બંધ કષાયજનિત છે. સગિકેવળી વિગેરે ગુણસ્થાનોમાં ગનિમિત્તક પ્રકૃતિબંધ અને પ્રદેશબંધને સદભાવ થયા પછી પણ તથા કષાયના અભાવથી સ્થિતિ અને અનુભાગને સંભવ થયા પછી પણ ભીંત ઉપર ફેકેલ સુકા ઢેફાની માફક ત્યાં સ્થિતિ નથી કરતે. તુરત થએલું કર્મ પાછું હઠી જાય છે. આ વિષય શ્રી સૂયગડાંગ સૂત્રમાં ભગવાને ફરમાવેલું છે–
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आवश्यकमूत्रस्थ सूत्रकृताङ्गे-'तं पढमसमए बद्धं, बीयसमए वेइयं, ततियसमये निजिणं' इति; अतस्तबन्ध ईर्यापथबन्ध उच्यते । अयमेवाऽऽगमस्तत्रौपचारिकलेश्यासत्ताऽऽवेदकः; इत्युक्तलक्षणलक्षितैव भावलेश्येति सिद्धम् ।
___ अत्र च भावलेश्यैव प्रतिक्रमणविषयस्तस्या एवाधिकृतत्वात् , भावलेश्यासु कृष्णादिशब्दव्यवहारस्तदुत्पादकलेश्यापुद्गलनिमित्तका परिणामसादृश्यमूलकथेति ध्येयं, ताभिः ।
"प्रथम समयमें बन्ध होता है, दूसरे समयमें वेदा जाता है और तीसरे समयमें निर्जर जाता है अर्थात् दूर हो जाता है ॥"
इसी कारण से उस बन्धको ईर्यापथबन्ध कहा है। यही आगमवाक्य वहां औपचारिक लेश्या के सद्भावको बतानेवाला है, अत: पूर्वोक्त लक्षणवाली ही भावलेश्या है।
__ यहां प्रतिक्रमणमें भावलेश्या का अधिकार है, उनमें कृष्णादि शब्दों का जो व्यवहार होता है वह सिर्फ उनके उत्पादक लेश्या के पुद्गलों के निमित्त से तथा परिणाम भी वैसे हो जाने के कारण से माना जाता है।
वह लेश्या छह प्रकारकी है जैसे
(१) कृष्णलेश्या । (२) नीललेश्या । (३) कापोतलेश्या । (४) तेजोलेश्या । (५) पद्मलेश्या । (६) शुक्ललेश्या ।
પ્રથમ સમયમાં બંધ થાય છે, બીજા સમયમાં અનુભવ થાય છે, અને ત્રીજા સમયમાં નિર્જરી જાય છે અર્થાત દૂર થઈ જાય છે.” આ કારણથી તે બંધને ઈર્યાપથ બંધ કહેલ છે. આ શાવાય ત્યાં ઔપચારિક લેયાનાં સદ્દભાવને બતાવવા વાળે છે, એટલે પૂર્વોક્ત લક્ષણવાળીજ ભાવલેશ્યા છે.
અહિં પ્રતિક્રમણમાં ભાવલેસ્થાનો અધિકાર છે, એમાં કૃણાદિ શબ્દોને જે વ્યવહાર થાય છે તે માત્ર તેની ઉત્પાદક વેશ્યાનાં પુદગલનાં નિમિત્તથી તથા પરિણામ પણ તેવાજ થઈ જવાના કારણથી મનાય છે. તે લેયા છ પ્રકારની છે, જેવી शत (१) वेश्या, (२) नासवेश्या, (3) पोतोश्या, (४) तेन्नवेश्या (५) ५मवेश्या, (६) शुसवेश्या.
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
२०७ लेश्याषट्कमेवाह-(१) 'किण्ड लेसाए' कृष्णद्रव्यात्मिका कृष्णद्रव्योपरागजनिता वा लेश्या कृष्णलेश्या-कृष्णद्रव्योपाधिकात्मपरिणामविशेषः, येन जीवस्य हिंसाचारवेषु प्रवृत्तिः, मनोवाकायानामसयंमः, स्वभावे क्षुद्रता, गुणदोषावविमृश्यैव कार्येषु प्रवृत्तिः क्रूरत्वं च संजायते तया ।।
(२) 'नीललेसाए' नीलद्रव्यात्मिका नीलद्रव्योपरागजनिता वा लेश्या नीललेश्या अशोकतरुसमाननीलवर्णद्रव्योपाधिकाऽऽत्मपरिणामविशेषः, येन जीवः ईर्ष्यालुः असहिष्णुः, मायावी, नित्रपः, प्रदीप्तविषयाभिलाषः, रसलोलुपः, सदा पौद्गलिकसुखगवेषकश्च भवति, तया । __(३) 'काउलेसाए' कपोतस्यायं कापोतः=पारावतवर्णस्तत्तुल्यद्रव्यरूपा तत्तु
(१) कृष्णलेश्या- कृष्णद्रव्यस्वरूप तथा कृष्णद्रव्योपरागजनित आत्मपरिणाम स्वरूप है, जिससे हिंसा आदि आश्रवों में आत्माकी प्रवृत्ति होती है, मन-वचन-कायाका असंयम, स्वभावमें क्षुद्रता, गुण दोषों के विना विचारे कार्यमें प्रवृत्ति करना और क्रूर भाव का आना होता है।
(२) नीललेश्या- नीलद्रव्यात्मक तथा नीलद्रव्यउपरागजनित अर्थात् अशोक वृक्ष के समान नीलवर्णवाले आत्मपरिणामस्वरूप है। इससे आत्मा ईर्ष्यालु, असहिष्णु, मायावी, निर्लज, विषयलोलुपी, रसलोलुपी और पौद्गलिक सुखोंका अन्वेषक होता है।
(३) कापोतलेश्या- कबूतर के तुल्य वर्णवाली तथा उसके
(૧) કૃષ્ણલેસ્યા-કૃષ્ણદ્રવ્યસ્વરૂપ તથા શુદ્રોપરાગજનિત આત્મપરિણામ સ્વરૂપ છે, જેનાથી હિંસા આદિ આશ્રમાં આત્માની પ્રવૃત્તિ થાય છે. મન વચન અને કાયાને અસંયમ, સ્વભાવમાં ક્ષુદ્રતા, ગુણોને વિચાર્યા વિના કાર્યમાં પ્રવૃત્તિ કરવી અને કૂરભાવનું આવવું થાય છે.
(૨) નીલલેશ્યા–નીલદ્રાવ્યાત્મક તથા નીલદ્રવ્યઉપરાગજનિત અર્થાત્ અશેક વૃક્ષની જેમ નીલવર્ણવાળા આત્મપરિણામ સ્વરૂપ છે, એથી આત્મા ઈર્ષ્યા, અસહિષ્ણુ માયાવી નિર્લજજ, વિષયપ્રેમી, રસપ્રેમી અને પગલિક સુખનાં અન્વેષક હોય છે.
(૩) કાપતલેસ્યા–કબુતરની સમાન વર્ણવાળી તથા તેની જેમ કોપરાગ
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आवश्यकसुत्रस्य ल्यद्रव्योपरागननिता वा लेश्या कापोतलेश्या तरुणपारावतकण्ठतुल्यकृष्णलोहित (धुपछाया) वर्णद्रव्योपाधिकात्मपरिणामः; येन जीवस्य वचसि कर्तव्ये विचारणायां च सर्वत्र वक्रतैव जायते, कस्मिन्नपि विषये सारल्यं न भवति, नास्तिकत्वं परदुःखजनकभाषणशीलत्वं च संजायते तया ।
(४) 'तेउलेसाए' तेजः अग्निज्वाला तत्तुल्यलोहितवर्णद्रव्यात्मिका तादृशद्रव्योपरागजनिता वा लेश्या तेजोलेश्या शुकतुण्डवद्रक्तवर्णद्रव्योपाधिकात्मपरिणामविशेषः, यद्वशात् जीवे नम्रत्वं पदमादधाति शाठयं चापल्यं च मुद्रमपसरति, धर्मेऽमिरुचिर्दाढय सर्वजनहितैषित्वं च जञ्जन्यते नया । तुल्य द्रव्योपरागजनित अर्थात् तरुण कबूतर के कंठसदृश कृष्ण और नील वर्णवाले द्रव्यात्मक आत्मपरिणाम स्वरूप है, जिससे आत्मा मन वचन कर्तव्य और विचारमें सर्वथा वक्र भावको धारण करता है, किन्तु किसी विषयमें सरलता नहीं रखता है, और उसमें पुण्य पाप आदिकी नास्तिकता तथा परदुःखजनक भाषा बोलनेका स्वभाव होता है।
(४) तेजोलेश्या-अग्निज्वाला के समान लालवर्णद्रव्यस्वरूप तथा तादृश (वैसे) द्रव्योपरागजनितस्वरूप है, अर्थात् तोते की चोंचके समान लाल वर्णवाले द्रव्य के सदृश आत्मपरिणामरूप है, इससे आत्मा नम्र बनता है, शठता और चपलता रहित होता है, धर्म के अन्दर दृढ, प्राणीमात्र का हितैषी होता है। જનિત અર્થાત તરુણ કબુતરના કંઠના જેવા કાળા અને નીલવર્ણવાળા-દ્રવ્યાત્મક આત્મપરિણામરૂપ છે, જેથી આત્મા, મન, વચન, કર્તવ્ય અને વિચારમાં હંમેશાં વક્રભાવને ધારણ કરે છે પરંતુ કેઈ વિષયમાં સરળતા નથી રાખતે, અને તેમાં પુણ્ય પાપ વિગેરેના નાસ્તિકતા તથા પરદુ:ખજનક ભાષા બેલવાને સ્વભાવ याय छे.
(૪) તેજલેશ્યા-અગ્નિની જ્વાળાની પેઠે લાલવણ દ્રવ્યસ્વરૂપ તથા એવું જ કપરાગજનિત સ્વરૂપ છે, અર્થાત પોપટની ચાંચની જેમ લાલવર્ણવાળા દ્રવ્યની જેમ આત્મપરિણામરૂપ છે, એથી આત્મા નમ્ર બને છે, લુચ્ચાઈ તથા ચપલતાથી રહિત થાય છે, ધર્મની અંદર દૃઢ, પ્રાણીમાત્રને હિતેવી થાય છે.
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
२०९ (५) 'पउमछेसाए' अत्र पद्मशब्देनोपचारात्पद्मगर्भग्रहणम् स च पीतो भवत्यतः पनगर्भवत्पीनद्रव्यात्मिका पीतद्रव्योपाधिजन्या वा लेश्या पनलेश्या हरिद्रावस्पीतद्रव्योपाधिकाऽऽत्मपरिणामविशेषः, यद्द्वारा जीवस्य क्रोधमानादिकषायाणां बहुतरांशेषु मान्धं, स्वान्ते शान्तिः, आत्मसंयमधारणक्षमत्वम् , मितभाषित्वम्, जितेन्द्रियत्वं च संपवते, तया । ___'सुक्कलेसाए' शुक्लं=शुक्लद्रव्यं तदात्मिका तदुपरागजनिता वा लेश्या शुक्ललेश्या-शङ्खवच्छ्वेतवर्णद्रव्योपाधिकात्मपरिणामः, यद्वशतो जीवस्याऽऽर्तरौद्रग्वानाऽवरोधपूर्वकं धर्म-शुक्रध्यानद्वयमुपसंपद्यते, मनोवाक्कायसंयमनशक्तिः, कषायोपशान्तिः, वीतरागभावसम्पादनाऽऽनुकूल्यं च जायते, तया (६) . (६) पद्मलेश्या-पद्म-कमल-के गर्भ के समान पीतद्रव्यस्वरूप तथा हलदी के समान पीले द्रव्यवाले आत्मपरिणामविशेषस्वरूप है, जिससे आत्मा के क्रोध मान माया आदि कषाय मंद अर्थात् पतले हो जाते हैं, और आत्मामें मन की शान्ति, आत्मसंयम का सामर्थ्य, मर्यादित बोलना और जितेन्द्रियता आदि गुण आजाते हैं।
(६) शुक्ललेश्या-शुक्लद्रव्यस्वरूप याने शंग्वके तलेके समान श्वेत द्रव्यवाले आत्मपरिणामविशेषरूप है, जिससे आत्मा आतरौद्र ध्यान को छोडकर धर्म तथा शुक्लध्यानधारी होता है, मन बचन काया के संयमन का सामर्थ्य, कषायों की उपशान्ति, वीत
(૫) પદ્મલેશ્ય-પદ્મ=કમળના ગર્ભ સમાન પીળા દ્રવ્ય સ્વરૂપ તથા હળદરની જેમ પીળા દ્રવ્યવાળા આત્મપરિણામવિશેષ સ્વરૂપ છે. જેનાથી આત્માને, ક્રોધ, માન, માયા આદિ કષાયે મંદ અર્થાતુ પતલા થઈ જાય છે, અને આત્મામાં મનની શાંતિ, આત્મસંયમનું સામર્થ્ય, મર્યાદિત બલવું અને જીતેન્દ્રિયપણું આદિ ગુણ આવી જાય છે.
(૬) શુકલયા-શુકલવ્યસ્વરૂપ અર્થાત્ શંખના તલીયાની સમાન સફેદ દ્રવ્યવાળા આત્મપરિણામવિશેષરૂપ છે જેથી આત્મા આ રોદ્ર ધ્યાનને છેડીને ધર્મ તથા શુકલ યાન ધારી થાય છે. મન વચન કાયાના સંયમનું સામર્થ, કષાયેની ઉપશાંતિ, વીતરાગભાવને પ્રાપ્ત કરવાની અનુકૂળતા વિગેરે
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आवश्यक सूत्रस्व
षड्विधानामपि लेश्यानां स्वरूपं सुस्पष्टं बोधयितुमुदाहरणं प्रदर्श्यतेकश्चितस्करः षट्स्वामिकं धनं चौर्येणाऽपजहार । पश्चाद् धनस्वामिनः स्वं स्वं विवं चौरेणाऽपहृतं विज्ञाय तस्कराऽऽवासभूमिं गत्वा परस्परं विचारयामासुः, तत्र प्रथमोऽवदत्-मदीयधनापहारकोऽस्मिन् ग्रामे निवसत्यतोऽयं ग्राम एवाऽस्माभि
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दः (१)
द्वितीय:- समस्तग्रामदाहो नोचितः, किन्तु ग्रामस्य यस्मिन् पाटके स निवसति तावन्मात्र एव दग्धव्य इति (२) । रागभावको प्राप्त करनेकी अनुकूलता आदि अनेक प्रशस्त गुणवाला होता है ।
इन छहीं लेश्याओं के द्वारा जो अतिचार लगे हों उनका मैं प्रतिक्रमण करता हूँ अर्थात् उन अतिचारों से मैं अलग होता हूँ । पूर्वोक्त छहों लेश्याओं के स्वरूप को स्पष्ट समझाने के लिए उदाहरण दिया जाता है जैसे
किसी चोरने छह जनोंका धन चुराया तो वे छहों मनुष्य चोर के गाम पहुंचे और परस्पर विचार करने लगे, उनमें से पहले पुरुषने कहा कि हमारे धनका हरण करने गाम में रहता है इसलिए हम सब मिल कर इस जला दें ॥ १ ॥
दूसरे ने कहा कि सारा गाम जलाना ठीक नहीं किन्तु અનેક પ્રશસ્ત ગુણવાળા થાય છે.
આ છએ વૈશ્યાઓ દ્વારા જે અતિચાર લાગ્યે હાય તેને હું પ્રતિક્રમણ કરૂ છું. અર્થાત્ તે અતિચારોથી હું અલગ થાઉં છું. પૂર્વાંકત છએ લેશ્યાએનાં સ્વરૂપને સ્પષ્ટ સમજાવવાને માટે ઉદાહરણ દેવાય છે. જેવી રીતે
वाला चोर इस सारे गाम को
ગામ
કોઇ ચારે છ માણસનું ધન ચાયું તે તે છએ મનુષ્ય ચારના ગયા અને પરસ્પર વિચાર કરવા લાગ્યા, એમાંથી પહેલા પુરુષે કહ્યું કે અમારા ધનની ચારી કરવાવાળા ચાર આ ગામમાં રહે છે, એટલા માટે આપણે બધાએ મહીને આ આખા ગામને બાળી નાખવું જોઇએ (૧). બીજાએ કહ્યું-આખું ગામ ખાળી નાખવું ઠીક નથી. પરંતુ જે મહેલ્લામાં ચાર રહે છે એ મહેાલાને
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
तृतीयः - ननु पाटकवास्तव्यानां कोऽपराधः ? केवलमस्मद्धनापहारकमात्रस्य गृहं दाद्यमिति (३) ।
२११
चतुर्थः - तद्गृहनिवासिनोऽन्ये तत्परिजना न ह्यस्मद्धनापहारिणोऽतएव तरलेशनमनुचितं यस्त्वस्मद्धनापहर्ता स एव दहनीय इति ( ४ ) |
पञ्चमः - तस्करदाहेनालं तदीयसर्वस्वं तत्समक्षमेवाऽपहरणीयमिति (५) ।
षष्ठः - सर्वस्वापहरणमपि नोचितम् अज्ञानवशतोऽनेनाऽस्मद्धनमपहृतमित्यतो विविधाऽनर्थकारणं तदीयाज्ञानमेव दूरीकरणीयं येनाऽतः प्रभृति पुन - रेवंविधमकायै न कुर्यादिति (६) । अपर आम्रफलखादकपुरुषषट्कदृष्टान्तः सुप्रतीत एवेति ॥ सू० ८ ॥
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जिस मुहल्ले में चोर रहता है उस मुहल्ले को जला देना ठीक है || २ || तीसरे ने कहा कि इस मुहल्ले में रहने वालों का क्या अपराध है ! केवल अपने धन को चुरानेवाले के घर को ही जला दें ॥ ३ ॥
चौथे ने कहा कि- इसके घरवालोंने क्या अपराध किया है ! केवल अपने धन को चुरानेवाले चोर को ही जलाना ठीक है ॥ ४ ॥
पांचवें ने कहा कि बेचारे चोर के प्राण लेना ठीक नहीं, किन्तु इसके धनमाल को ही जला दो ॥ ५ ॥
छठे ने कहा कि - इसके धनमाल को जलाने से क्या होगा ! इसने अज्ञानवश यह काम किया है अतः अनेक प्रकार का अनर्थ करनेवाले इसके अज्ञान को उपदेश द्वारा दूर करना चाहिए जिस બાળી નાંખવા ઠીક છે (ર). ત્રીજાએ કહ્યુ-આ મહેલ્લામાં રહેનારા લેાકેાના શુ અપરાધ છે ? ફકત આપણા પૈસા ચારનારના ઘરનેજ ખાળીએ (૩). ચેથાએ કહ્યું કે એ ઘરના લેકેએ શુ અપરાધ કર્યાં છે? ફકત આપણા ધનને ચેરી જનાર ચેરનેજ બાળી નાખવા ઠીક છે (૪). પાંચમાએ કહ્યુ કે બિચારા ચારના પ્રાણ લેવા એ ઠીક નથી, પરંતુ એના ધનમાલનેજ બાળી નાખેા (૫). છઠ્ઠાએ કહ્યું કે એના ધન-માલને ખાળી નાખવાથી શું વળશે ? તણે અજ્ઞાનતાથી છે. માટે અનેક પ્રકારના અનથ કરવાવાળા એના અજ્ઞાનને
આ કામ કરેલુ ઉપદેશ દ્વારા ६२
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आवश्यकसूत्रस्य
॥ मूलम् ॥ पडिक्कमामि सत्तहिं भयहाणेहिं । अहिं मयहाणेहिं । नवहिं बंभचेरगुत्तीहि । दसविहे समणधम्मे ॥ सू० ९ ॥
॥ छाया ॥ प्रतिक्रामामि सप्तभिर्भयस्थानैः। अष्टभिर्मदस्थानः। नवभिब्रह्मचर्यगुप्तिभिः । दशविधे श्रमणधर्मे ।। मृ० ९ ॥
॥ टीका ।। 'पडिक्कमामि' इत्यादि। भयं भीनिस्तस्य स्थानानि पर्यायभेदाः-भयस्थानानि तैः, सप्त भयस्थानान्युक्तानि यथा-'इहपरलोयादाणमकम्हा आजीवमरणमसिलोए' इति । अस्य 'इहपरलोकादानमकम्मादाजीवमरणमश्लोकः' इतिच्छाया। तत्र लोकशब्दस्य द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणत्वादिहेत्यनेनाप्यन्वयः, इहलोकः सजातीयलोकस्तस्माद्भयं-यथा मनुष्येभ्यो मनुष्याणां, निर्यग्भ्यस्तिरश्चां भयम् । परलोकः-विजातीयलोकस्तस्माद्भयं, यथा सिंहादिभ्यो मनुष्यादीनां भयम्, आदीयते-गृह्यते इत्यादानं धनं, तद्धेतकं चौरा-ऽग्नि-राजादिभ्यो भयम्, यद्वा आदानं राजादिवितीर्णपदवीग्रामादिम्बीकरणं, तदर्थ भयमर्थाद्राजादिभ्य एव, राजानो हि चारचक्षुष्ट्वात् क्षणे तुष्टाः क्षणे रुष्टाः दत्तमपि सर्वस्वं कदाचिदपराधलवेनाऽप्यपहरन्ति, से फिर यह भविष्य में ऐसा अनर्थ न करके अच्छे रास्ते चले और सुखी बने ॥ ६॥
इसी प्रकार दुसरा आम्रफल के खानेवाले छह पुरुषों का दृष्टान्त प्रसिद्ध ही है ॥ मृ०८॥
(१) इहलोकभय-मनुप्य को मनुष्य से और तिर्यश्च को तिर्यश्च से भय, (२) परलोकभय--मनुष्य आदि को सिंह आदि से भय, (३) आदानभय-चोर राजा आदि से धन आदि छीने जाने का भय, (४) . કરવું જોઈએ. જેથી એ ફરીથી ભવિષ્યમાં આવો અનર્થ ન કરીને ઉત્તમ માર્ગે જાય અને સુખી થાય (૬). આવી રીતે બીજું આમ્રફળ ખાનારા છ પુરૂષનું टांत प्रसिद्ध छ. (सू० ८)
(१) U Rय- मनुष्यने मनुष्यथा भने ति यति यथा लय, (२) ५२समय-मनुष्य माहिने सिंह विगैरेथा लय, (3) माहानमय-यार रात वये
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
२१३ तथोकं नीतौ-'राजा मित्रं केन दृष्टं श्रुतं वा,' 'राजसेवा मनुष्याणामसिधारावलेहनम् । पश्चाननपरिष्वङ्गो, व्याली वदनचुम्बनम्' इत्यादि । अकस्मात् बाह्यनिमित्तमन्तरेणैव सर्पादिबुदया रज्ज्वादिभ्यो भयं, सहसैवार्तनादादिश्रवणाद्वा भयम् । आजीवः जीविका तस्मात्तदर्थ वा भयम् - 'निर्धनोऽहं दभिक्षादौ कथं प्राणान् धारयिष्यामि' इति, 'कथं वा मम जीविका मुढा भविष्यतीति । मरणं-प्राणवियोगस्तस्माद्भयम् । श्लोकः यशः- पद्ये यशसि च श्लोकः' इत्यमरः, न श्लोकः अश्लोकः अपयशस्तस्माद्भयम् । तदेवमुविधैः सप्तभिर्भयम्थानों मयाऽतिचारः कृतस्तस्मात्तं वा प्रतिक्रामामि-विनिवर्ते-परित्यजामि वेति समन्वयः । अत्रोक्तस्य 'पडिकमामि' इत्यस्येत आरभ्य त्रयस्त्रिंशदाशातना यावत् सम्बन्धो बोद्धव्यः। 'अहिं' अष्टभिः, 'मयहाणेहिं' मदोऽहङ्कारम्तस्य स्थानानिजातिकुल-बल-रूप-तपः-श्रुत-लाभै-उवर्यरूपाणि तैः, सम्बन्धः प्राग्वन् ।
___ 'नवर्हि' नवभिः, 'बंभचेरगुत्तीहि' ब्रह्मचर्य-मैथुनविरतिवनं तस्य गुप्तयः रक्षापकाराः ब्रह्मचर्यगुप्तयः मैथुनविरतिपरिरक्षणोपायाम्ताभिः, सम्बन्धः पूर्ववत् । ताश्च ब्रह्मचर्यगुप्तयः-(१) वसति-(२) कथा-(३-४) निषधेन्द्रिय-(५) कुडयान्तर-(६) पूर्वक्रीडा-(७-८) प्रणीनाऽनिमात्राहार-(२)विभूषणपरिहाररूपाः, तत्र वसतिः स्वीपशुपण्डकाऽऽश्रितस्थानसेवनं तत्परिहारः प्रथमा गुप्तिः (१)। अकम्माद्भय- विनाकारण ही अचानक डर जाना, (२) आजीविका भय-मेरा निर्वाह कैसे होगा ! दृष्काल आदि में प्राण कैसे रवगा! इत्यादि रूप भय, (६) प्राणवियोग का भय, और (७) अश्लोक (अपयश) होने का भय, इन सात भयों से; जाति, कुल, बल, रूप, तप, श्रुत, लाभ, और ऐश्वर्य-मद, इन आठ मदों से; नथा (१) वमतिस्त्री, पशु, पण्डक सहित स्थान-का त्याग, (२) कथा-स्त्री मम्बन्धी રેથી ધન આદિ છીનવીને લઈ જવાનો ભય, (૪) અકસ્માતૃભય-વિના કારણેજ અચાનક બી જવું, (૫) આજીવિકા ભય-મારે નિર્વાહ કેમ થાશે? દુષ્કાળ આદિમાં પ્રાણ કઈ રીતે રાખીશ? ઈત્યાદિ રૂ૫ ભય, (૬) પ્રાણ વિયેગને ભય, અને (૭ અક (A4ne) यानो भय, मा सात भयोथी. ति, , मस३५, त५, श्रत a. अने मेश्वर्य-म६ मा माः महथा तथा (१) वसति-स्त्री, पशु, ५४ सहित स्थानने त्या, (२) ४या-श्री संधी वाताना त्याग, (३) निषधा-ल्यां
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आवश्यकमूत्रस्य
कथा = स्त्री सम्बन्धिनी, स्त्रिया सहैकान्ते वा वार्ता, तत्परिहारो द्वितीया (२)। निषद्या = पूर्वमुपविष्टानां पश्चादुत्थितानां स्त्रीणामासने तदुत्थानोत्तरं होराद्वयाभ्यन्तरे समुपवेशस्तत्परिहारः ( ३ ) । इन्द्रियम् = इन्द्रियावलोकनं = स्त्रीणामङ्गोपाङ्ग निरीक्षणं, तत्परिहार : ( ४ ) । 'कुड्यान्तरं = भित्त्यादिव्यवहितानां स्त्रीणां सम्मोहकमधुरध्वन्यायाकर्णनं तत्परिहारः (५) । 'पूर्वक्रीडा ' = दीक्षाग्रहणात्पूर्वं संसारावस्थायां स्त्रिया सह कृतस्य क्रीडादेः स्मरणं, तत्परिहार : ( ६ ), प्रणीतं = निष्यन्दमानघृतादिबिन्दु, ततोऽन्यदपि वा धातूपबृंहकं भोज्यवस्तु तत्परिहार : ( ७ ), अतिमात्राऽऽहारः=परिमाणाधिकभोजनं, तत्परिहारः (८), विभूषणं = स्नानादिना शरीरसंस्कारस्तत्परिहार : ( ९ ) । ' दसविहे ' दश विधाः = प्रकारा यस्य स तथा तस्मिन् 'समणधम्मे' श्रमणधर्मे, 'यो मयाऽतिचारः कृत ' - इत्यादिसम्बन्धो
वार्ता का त्याग, (३) निषद्या - जहाँ पहले स्त्री बैठी हो उस स्थान पर स्त्री के उठ जाने पर दो घडी के भीतर उस स्थान पर उपवेशन (बैठने) आदि का त्याग, (४) इन्द्रिय- स्त्री के अंगोपांग के निरीक्षण का त्याग, (५) कुड्यान्तर - दीवार आदि की ओट में स्त्री पुरुष के विषयोत्तेजक शब्द श्रवण का त्याग, (६) पूर्वक्रीडा - स्त्री के साथ पहले की हुई क्रीडा आदि के स्मरण का त्याग, (७) प्रणीत-प्रतिदिन सरस भोजन का त्याग, (८) अतिमात्राहार- प्रमाण से अधिक भोजन का त्याग, (९) विभूषा - शरीर की शुश्रूषा का त्याग, इन नौ ब्रह्मचर्यगुप्तियों (बाडों) द्वारा और क्षान्ति, मुक्ति ( लोभपरित्याग), आर्जव ( मायापरित्याग), मार्दव (मानपरित्याग), लाघव
પહેલાં સ્ત્રી બેઠી હેાય તે સ્થાન ઉપર સ્ત્રી ઉઠી ગયા બાદ બે ઘડીની અંદર તે જગ્યા ઉપર બેસવા વિગેરેના ત્યાગ, (૪) ઇન્દ્રિય–સ્રીના અંગ-ઉપાંગ જોવાને ત્યાગ, (૫) કુડયાન્તર-દીવાલ આદિની એટમાં સ્રીપુરુષના વિષયને ઉત્તેજન કરે એવા શબ્દ સાંભળવાને ત્યાગ, (૬) પૂર્વક્રીડા-સ્ત્રીની સાથે પ્રથમ કરેલી ક્રીડા विगेरेना स्मरणुन त्याग, (७) प्रणीत प्रतिहिन सरस लोभननो त्याग, (८) અતિમાત્રાહાર–પ્રમાણુથી વધારે ખારાક ખાવાના त्याग (6) विलूषा- शरीरनी શુશ્રૂષાને ત્યાગ, આ નવ બ્રહ્મચય ગુપ્તિએ (વાડા) દ્વારા અને ક્ષાન્તિ, મુક્તિ
१--कुड्यस्य अन्तरं=व्यवधानं कुडचान्तरम्, एतस्योपलक्षणत्वादुक्तोऽर्थः ।
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम् -४
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भूतपूर्व एव तत्र दश श्रमणधर्मा यथा - क्षान्ति-मुक्ति- रार्जवं मार्दत्रं, लाघवं, सत्यं, संयम-स्तप-स्त्यागो, ब्रह्मचर्यत्रासचेति ॥ सू० ९ ॥
॥ मूलम् ॥ एगारसहि उवासगपडिमाहिं ॥ सू० १० ॥
॥ छाया ॥ एकादशभिरुपासकप्रतिमाभिः ।। सू० १० ॥ ॥ टीका ॥
' एगारसहिं' इत्यादि । उपासते श्रमणानित्युपासकाः =श्रावकास्तेषां प्रतिमाः = अभिग्रहाः ( प्रतिज्ञाविशेषाः ) उपासकप्रतिमास्ताभिः प्ररूपणादौ यो मयाऽतिचारः कृत इत्यादिसम्बन्धो यथापूर्वम् । आसां प्रतिमानामाद्या प्रथमा (१) मासिकी सम्यक्त्व ( दर्शन ) - प्रतिमा, शङ्कादिदोषरहितस्य सम्यक्त्वस्य पालनम् । द्वितीया (२) द्वैमासिकी व्रतप्रतिमा, तत्र नैर्मल्येन ( द्रव्यभाव से लघुता ), सत्य, संयम, तप, त्याग ( साम्भोगिक साधुओं को आहारादि लाकर देना) और ब्रह्मचर्यवास (ब्रह्मचर्य - पालन) इस दश प्रकार के यतिधर्म में जो कोई अतिचार किया गया हो तो उससे मैं निवृत्त होता हूँ ॥ सू० ९ ॥
उपासकों (श्रावकों) की प्रतिमाएँ ( प्रतिज्ञाविशेष) ग्यारह होती हैं, उनमें पहली 'दर्शनप्रतिमा' एक मास की, इसमें एक मास एकान्तर उपवास और शङ्कादि दोषों से रहित निर्मल समकित का पालन किया जाता है (१) । दूसरी 'व्रतप्रतिमा' दो मास की होती है, इसमें पूर्वक्रिया सहित दो महीने तक दो दो उपवास (सोलन) त्याग) मानव (मायानो त्याग) भाईव (मानना त्याग) લાધવ (द्रव्य लावथी बुजवायागु ), सत्य, संयम, तप, ત્યાગ (સાંભગિક સાધુઓને આહાર વિગેરે લાવી દેવા), અને બ્રહ્મચર્ય વાસ ( બ્રહ્મચર્ય પાલન ) આ દશ प्रीરનાં યતિધર્મીમાં જો કોઇ અતિચાર કર્યાં હોય તે તેમાંથી હું નિવૃત્ત થાઉં છું. (સ્૦ ૯) उपास है। ( श्राव}। ) नी प्रतिभाओ ( प्रतिज्ञाविशेष) भगियार होय छे. એમાં પહેલી ‘દનપ્રતિમા' એક માસની, એમાં એક માસ એકાંતર ઉપવાસ અને શકાદિ દોષોથી રહિત નિમાઁલ સમકિતનું પાલન કરાય છે (૧), ખીજી ‘વ્રતપ્રતિમા બે માસની હાય છે, એમાં પૂર્વ ક્રિયા સહિત બે મહિના સુધી બબ્બે ઉપવાસના પારણાપૂર્વક વ્રત પ્રત્યાખ્યાન નિર્મૂળ પાળવામાં આવે છે (૨). ત્રીજી
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आवश्यकसूत्रस्य व्रत-प्रत्याख्यानयोः पालनम् । तृतीया (३) त्रैमासिकी सामायिकपतिमा, तत्र अतिचारवर्जनपूर्वकमुभयोः कालयोः सामायिकाऽऽचरणम् । चतुर्थों (४) चातुर्मासिकी पौषधप्रतिमा, तत्र अष्टमी-चतुर्दशी-पूर्णिमादिपर्वतिथिपूपवासः । पञ्चमी (५) पश्चमासिकी प्रतिमा, तत्र स्नान-रात्रिभोजनवर्जन-कच्छकमोचन-दिवाब्रह्मचर्यपालन - नक्तन्तत्परिमाणकरणरूपपञ्चविधमर्यादापालनम् । षष्ठी (६) 'पाण्मासिकी ब्रह्मपतिमा, तत्र सर्वथा ब्रह्मचर्यपालनम्-अबद्धपरिधानका पारणापूर्वक व्रतप्रत्याख्यान निर्मल पाला जाता है (२)। तीसरी 'सामायिकप्रतिमा' तीन मास की, इसमें तीन मास तक तीन तीन उपवास का पारणा किया जाता है, दोनों काल अतिचार • रहित सामायिक की जाती है (३)। चौथी 'पौषधप्रतिमा' चार मास की, इस में चार मास तक चार चार उपवास का पारणापूर्वक अष्टमी, चतुर्दशी, पूर्णिमा आदि पर्व तिथियों में पौषध किया जाता है (४)। पांचवीं 'प्रतिमा' नामकी प्रतिमा पांच मास की, इसमें पांच मास तक पांच पांच उपवास का पारणापूर्वक पांच बोलों की मर्यादा की जाती है। वे पांच बोल इस प्रकार हैं-(१) स्नान न करना, (२) रात्रिभोजन न करना, (३) एक लॅॉग खुली रखना, (४) दिन में मैथुन का सर्वथा त्याग करना, और (५) रात्रि में उसका परिमाण करना; परन्तु पौषध-अवस्था में सर्वथा त्याग ही करना (५)। छठी 'ब्रह्मप्रतिमा' छह मास की, इसमें छह महीने तक સામાયિકપ્રતિમા” ત્રણ માસની. એમાં ત્રણ માસ સુધી ત્રણ ત્રણ ઉપવાસના પારણા કરાય છે અને વખત અતિચારરહિત સામાયિક કરાય છે (૩),
થી “પોષધ પ્રતિમા ” ચાર માસની, એમાં ચાર માસ સુધી ચાર ચાર ઉપવાસના પારણા અને આઠમ, ચોદશ, પૂનમ, આદિ પર્વ તિથિમાં પોષધ કરાય छ (४). पांयमी 'प्रतिभा' नामनी प्रतिभा पांय भासनी, मां (पांय भास સુધી પાંચ પાંચ ઉપવાસના પારણાપૂવક નિગ્ન પાંચ બોલેની મર્યાદા કરાય છે. તે પાંચ બેલ આ પ્રકારે છે– ૧) સ્નાન ન કરવું. (૨) રાત્રિ ભેજન ન કરવું. (3) मे ain मुखी रामवी. (४) से भैथुनना सया त्या ४२३ म२ (५) રાત્રિમાં એને પરિમાણુ કરવું, પરંતુ પૌષધ અવસ્થામાં સર્વથા ત્યાગ કરે. (૬) છઠી “બ્રહ્મપ્રતિમા” છ માસની, એમાં (છ માસ સુધી છ છ ઉપવાસના
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४ कच्छत्वं च । सप्तमी (७) सप्तमासिकी-सचित्तपरित्यागप्रतिमा, तत्र सर्वथा सचित्तवस्तुपरित्यागः। अष्टमी (८) अष्टमासिकी आरम्भपरित्यागपतिमा, तत्र स्वहस्तेनारम्भपरित्यागः । नवमी (९) नवमासिकी-प्रेष्यारम्भपरित्यागप्रतिमा, तत्र अन्यद्वाराप्यारम्भपरित्यागः। दशमी (१०) दशमासिकी उद्दिष्टभन परित्यागप्रतिमा, तत्र स्वोद्दिष्टभक्तपरित्यागः । अत्र स्थितेन श्रावकेण क्षुरमुण्डितमुण्डेनाऽ
छह छह उपवास का पारणापूर्वक अखण्ड ब्रह्मचर्य पालन किया जाता है तथा दोनों लांगे खुली रखी जाती हैं (६)। सातवीं 'मचित्तपरित्यागप्रतिमा' सात मास की, इसमें सात मास तक सात सात उपवास का पारणा, और सर्वथा सचित्त वस्तु का त्याग किया जाता है (७) । आठवीं 'आरम्भपरित्यागप्रतिमा' आठ मास की; इसमें आठ मास तक आठ आठ उपवास का पारणा तथा स्वयं आरंभ करने का त्याग किया जाता है (८)। नववीं 'प्रेष्यारम्भपरित्यागप्रतिमा' नौ मास की; इसमें नौ मास तक नौ २ उपवास का पारणा और दूसरे से भी आरंभ कराने का परित्याग किया जाता है (१)। दसवों 'उद्देश्यप्रतिमा' दस मास की; इसमें दस मास तक दस दस उपवास का पारणा तथा अपने उद्देश्य से बनाये गये आहारादि का परित्याग किया जाता है, इसमें स्थित श्रावक क्षुरमुण्डित अथवा अमुण्डित रह कर गृहसम्बन्धी किसी बात के पूछे जाने પારણા પૂર્વક અખંડ બ્રહ્મચર્યનું પાલન કરાય છે તથા બંને લોગો ખુલી રાખવામાં આવે છે. (૬) સાતમી સચિત્ત પરિત્યાગપ્રતિમા’ સાત માસની, એમાં સાત માસ સુધી સાત સાત ઉપવાસના પારણા અને સર્વથા સચિત્ત વસ્તુને ત્યાગ કરાય છે. (૮) આઠમી “આરંભ પરિત્યાગપ્રતિમા આઠ માસની, એમાં આઠ માસ સુધી આઠ આઠ ઉપવાસના પારણા અને પિતાના હાથે આરંભ કરવાને त्या ४२शय छे. (6) नवमी 'प्रेष्यार सपरित्यागप्रतिमा' नव भासनी, अभी नव भास સુધી નવ નવ ઉપવાસના પારણા અને બીજાથી પણ આરંભ કરાવવાને પરિત્યાગ ४२॥य छे. (१०) शमी दृश्यप्रतिमा' श भासनी, अभय ४२॥ भास सुधी દશ દશ ઉપવાસના પારણા અને પિતાના ઉદેશથી બનાવાએલા અહારાદિકને પરિત્યાગ કરાય છે, એમાં રહેલ શ્રાવક મુરમુંડિત અથવા અમુંડિત રહીને ઘર
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आवश्यकमूत्रस्य मुण्डितेन वा गृहसम्बन्धे कैश्चित्किश्चित्पृष्टे सति तद्ज्ञाने 'वेडी'-ति तदज्ञाने 'न वेग्रीति च निगदता भाव्यम् । एकादशी (११) एकादशमासिकी-श्रमणभूतप्रतिमा, तत्र तेन शिखावर्ज कृतलुचनेन क्षुरमुण्डितेन वा साधुवेषधारिणा ईर्यासमित्यादिकमखिलं साधुधर्ममनुपालयता धृतनिर्वस्वरजोहरणदण्डेन स्वजातिमात्रत एव पालितभिक्षाग्रहणव्रतेन भिक्षायै गृहप्रवेशवेलायां 'श्रमणोपासकाय प्रतिपन्नाय भिक्षा देया'-इति भाषितव्यम्, 'कस्त्व'-मिति केनापि पृष्टे सति 'श्रमणोपासकोऽहम् , इति ब्रुवता भवितव्यम् । आस्वेकादशसु प्रतिमासु यथोत्तरं पूर्वपूर्वपतिमागतगुणसम्बन्धो बोध्यः ॥ ० १० ॥ पर जानता हो तो कहे कि 'जानता हूँ और नहीं जानता हो तो ऐसा कहे 'नहीं जानता हूँ' (१०)। ग्यारहवीं 'श्रमणभूत (साधु समान ) प्रतिमा' ग्यारह मास की; इस में ग्यारह महीने तक ग्यारह २ उपवास का पारणा किया जाता है, इस में स्थित श्रावक शक्ति हो तो लोच करे, नहीं तो मुण्डन करे, शिखा रक्खे, ईर्यासमिति आदि समस्त साधुधर्मों का पालन करता हुआ उघाडी (खुली हुई) दांडी का रजोहरण लिये हुए केवल . अपनी जाति में गोचरी करे और गोचरी के लिये किसी के घरमें प्रवेश करते समय बोले कि-'प्रतिमाधारी श्रमणोपासक को भिक्षा दो।' यदि कोई पूछे कि-'तुम कौन हो?' तो कहे कि 'मैं प्रतिमाधारी श्रावक हूँ साधु नहीं' (१)। इन ग्यारह प्रतिमाओं में पहली पहली સબંધી કઈ વાત પૂછવામાં આવે તે જાણતા હોય તે કહે કે હું જાણું છું, નહિ જાણતા
य तो ४७ नया ongतो, (११) मायाभी श्रमभूत-(साधुसमान) પ્રતિમા” અગિયાર માસની, એમાં અગિયાર માસ સુધી અગિયાર અગિયાર ઉપવાસના પારણા કરાય છે. એમાં સ્થિત શ્રાવક શક્તિ હોય તે લેચ કરે, નહિ તે મુંડન કરે, એટલી રાખે, ઈર્યાસમિતિ આદિ સર્વ સાધુધર્મોનું પાલન કરતા થકા ઉઘાડી દાંડીનું રહરણ લઈને કેવળ પિતાની જાતિમાંજ ગોચરી કરે અને નેચરી માટે કેઈના ઘરમાં પ્રવેશ કરતી વખતે બેલે કે “પ્રતિમધારી શ્રમણોપાસકને ભિક્ષા આપ’. જે
पछ -'तमे । छ। ?' तो हे प्रतिभाधारी श्रा१४ छ, साधु નથી.” આ અગિયાર પ્રતિમાઓમાં પહેલી પહેલી પ્રતિમાનાં ગુણ ઉત્તર ઉત્તર પ્રતિ
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मुनितीषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
॥ मूलम् ॥ बारसहि भिक्खुपडिमाहिं ॥ सू० ११ ॥
॥ छाया ॥ द्वादशभिर्भिक्षुपतिमाभिः । मृ० ११ ॥
॥ टीका ॥ द्वादशभिभिक्षुपतिमाभिः-भिवृणां प्रतिमाः भिक्षुपतिमास्ताभिर्योऽतिचारः कृत इत्यादिमम्बन्धः प्राग्वदेव । तत्र प्रथमा मासिकी भिक्षोः प्रतिमा, तस्यामन्नस्य जलस्य चैकैका दत्तिाद्या; दनिश्च हस्तपात्रादितो निरवच्छिन्नधारारूपेण पतिता भिक्षा गृह्यने, धाराविच्छेदेन तु सिक्थमात्रपातेऽपि दतिभेदः। एवं द्वैमासिकी-त्रैमासिकी-चातुर्मासिकी-पाश्चमासिकी-पाण्मासिकी-सप्तमासिकीषु क्रमेणाऽन्न-जलयोर्दत्तिद्वय-त्रय-चतुष्टय-पञ्चतय-षट्क-सप्तकानि गृवन्त इनि स्वयमूहनीयम । अष्टमी प्रतिमा सप्ताहोरात्रिकी, तत्र चतुर्विधाऽऽप्रतिमा के गुण उत्तर उत्तर प्रतिमामें समझने चाहिये। इनमें प्ररूपणा आदि द्वारा जो कोई अतिचार लगा हो तो उससे मैं निवृत्त होता हूँ ॥ १०॥
__ मिनु (साधु) की बारह प्रतिमाएँ (प्रतिज्ञाविशेष) होती हैं। पहली एक मासकी, यावत् सातवीं मातमासकी भिक्षुप्रतिमा । पहली प्रतिमामें निर्लेप एक दत्ति अन्नकी एक दत्ति पानी की ली जाती है। अम्बण्डित एक धारा से एक बार जितना आहारपानी पात्र में गिरे उतना ही उपभोग में ले १। इसी प्रकार क्रमसे सातवी प्रतिमामें सात दत्ति अन्न और सात दत्ति पानी की ली મામાં સમજવા જોઈએ. એમાં પ્રરૂપણા આદિ દ્વારા જે કઈ અતિચાર લાગ્યા डाय तो तेभायी निवृत्त या छु. (सु. १०) ।
मित (साधु) नी मा२ प्रतिभासा (प्रतिज्ञा विशेष) सोय छे पक्षी એક માસની, બીજી બે માસની, યવત સાતમી સાત માસની ભિક્ષુપ્રતિમા. પહેલી પ્રતિમામાં નિર્લેપ એક દત્તિ અન્નની એક દત્તિ પાણીની લેવાય છે. અખંડિત એકધારાથી એક વખત જેટલે આહાર પાણી પાત્રમાં પડે એટલે જ Suोगमा व्ये (१). मेरी प्रा३ भया सातभी प्रतिमामा सात हत्ति अन्ननी अने
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२२.
आवश्यक सूत्रस्प
हार परित्याग पूर्व कैकान्तरोपवाससेवनं ग्रामाद्वहि: कायोत्सर्गे च कुर्यात्, उत्तान एकपार्श्वे वा शयीत, पल्यङ्काऽऽसनेन वाऽऽमीत । एवं नवमी - दशम्यावपि प्रतिमे सप्तसप्ताहोरात्रसाध्ये, तयोस्तपश्चरणमष्टमी देव केवलमासनभेदः, तत्र नवम्यां दण्डासन-लगण्डासनो - कुदुकासनरूपाणि त्रीण्यासनानि तेषु दण्डासनं नाम - पादाग्रादिप्रसारणेन दण्डवत्पतनरूपम् । लगण्डं = त्रक्रकाष्ठं, तद्वत्अर्थान्मस्तक पार्ण्यादिभागानां भूमिसम्बन्धेन पृष्टस्य च तदसम्बन्धेन यदा सनं तल्लगण्डासनम् । उत्कुटुकासनं नाम - पुतस्य ( श्रोणिभागस्य ) अलगनेनोपवेशनम् । दशम्यां वीरासन - गोदोडिकासना - SS म्रकुब्जकासनानि,
तत्र
जाती है ! आठवीं प्रतिमा सात अहोरात्र की है, इसमें एकान्तर चविहार उपवास और गाम से बाहर कायोत्सर्ग किया जाता है । तथा उत्तानासन ( चित्त सोना), एकपार्श्वसन (एक पसबाडे से सोना) और पर्यासन, इन तीन आसनों में से कोई भी एक आसन किया जाता है। इसी प्रकार नवमी और दशवीं प्रतिमाएँ आठवीं के समान हैं, किन्तु नववीं में दण्डासन (दंडके पडने की तरह पग पसार कर सोना), लगण्डासन (मस्तक और एडियों को भूमि पर लगा कर पीठ को अधर रखना), उत्कुटुकासन-पूर्तिभागबैठकको जमीन पर नहीं लगा कर ऊकहूँ बैठना यानी दो पैरों के ऊपर ही बैठना । तथा दसवीं में वीरासन कर सिंहासन पर बैठे हुए के समान, घुटने
(पृथ्वी पर पैर रख अलग २ रख
कर
અહારાત્રિના છે. એમાં
આ
સાત દત્ત પાણીની લેવાય છૅ. આઠમી પ્રતિમા સત એકાંતર ચેાવિહાર ઉપવાસ, અને ગામથી બહાર કાયેત્સર્ગ કરાય છે, તથા ઉત્તાनासन ( भित्ता सुबुं ), पार्श्वासन ( भेड पड्यो सुवुं ), मने पर्य असन. ત્રણ આસનેમાંથી કેઇ પણ એક માસન કરાય છે, એવી રીતે નવમી અને દશમી પ્રતિમા આઠમીની સમાન છે પરંતુ નવમીમાં દ'ડાસન (દંડ-લાકડી પડેલ હૈય તેમ પગ પસારીને સુવું), લગડાસન (માથું અને એડીએને ભૂમિ ઉપર લગાવી પીઠને પર ન લગાવીને ઉભડક अधर राजवी), उत्डुटुडासन - यूतिलाग - जैठने भीन બેસવું, અર્થાત્ બે પગ ઉપરજ બેસવું. તથા દશમીમાં વીરાસન–પૃથ્વી પર પગ રાખીને સિંહાસન ઉપર બેઠા હોય એવી ઘુંટણ જુદા જુદા રાખીને
રીતે
આધાર
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
२२१ 'वीरासनं'-निरालम्बेऽपि सिंहासनोपविष्टवन्यस्तचरणं मुनजानुकमुपवेशनम् , 'गोदोहिकासनं'-गोदोहिकावंत् = गोदोहनवदासनमर्थात-यथा गोदोहको गोदोहन वेलायामास्ते तद्वत्पादाग्रतलाभ्यामवस्थानम् , 'आम्रकुब्जकासनम्'-आम्रवस्कुब्जमासनम् । आस्वष्टम्यादिदशम्यन्तप्रतिमासु प्रतिप्रतिममुक्तानामासनानामन्यतमाऽवलम्बनेनासितव्यमिति तात्पर्यम् । एकादशी प्रतिमा त्वेकाहोरात्रसाध्या, तस्यां चतुर्विधाऽऽहारपरित्यागपूर्वकं दिनद्वयोपवासो ग्रामादहिर्गत्वा कायोत्सर्गश्च कर्तव्यः ।
अथैकदिनमात्रसाध्या द्वादशी प्रतिमा, तस्यां चतुर्विधाऽऽहारपरित्यागपूर्वकं दिनत्रयमुपोष्य तृतीयस्मिन् दिने ग्रामाद्वहिः श्मशानस्थानं गत्वा पुद्गलस्यैकस्योपरि दृष्टिदानेन कायोत्सर्गः कर्तव्यः, तदानीं च तत्र देव-मनुष्यविना सहारे स्थिर रहना), गोदोहासन (गोदोहनकी तरह पैरों के अग्रभाग और तल भाग के सहारे बैठना) और आम्रकुब्जकासन (आम्रफलकी तरह कूबडा हो कर स्थिर रहना); इनमें कोई भी एक आसन किया जाता है १०।।
ग्यारहवीं प्रतिमा केवल एक दिन की होती है, इसमें चउविहार बेला किया जाता है और गाम के बाहर काउसग किया जाता है ११ । बाहरवों प्रतिमा एक दिन की होती है, इसमें चविहार तेला किया जाता है, तेला के दिन गाम से बाहर श्मशान भूमिमें जा कर किसी एक पुद्गल पर दृष्टि स्थिर करके कायोत्सर्ग किया जाता है। उस समय होने वाले देव-मनुष्य और વિના સ્થિર રહેવું, ગદહાસન-ગાય દેતા હોઈએ તેવી રીતે પગના આગલા ભાગ અને તલ ભાગના આશ્રયે બેસવું, અને આમ્રકુંજકાસન (આમ્રફળની જેમ કૂબડા થઈને સ્થિર રહેવું). આમાંથી કેઈ પણ એક આસન કરાય છે (૧૦).
અગિયારમી પ્રતિમા ફકત એક દિવસની હોય છે. એમાં ચેવિહાર છઠ્ઠ કરાય છે અને ગામની બહાર કાઉસગ્ગ કરાય છે (૧૧). બારમી પ્રતિમા એક દિવસની હેય છે એમાં ચેવિહાર અઠ્ઠમ કરાય છે. અઠ્ઠમના દિવસે ગામની બહાર સ્મશાન ભૂમિમાં જઈને કોઈ એક પુદગલ ઉપર દૃષ્ટિ સ્થિર કરીને કાર્યોત્સર્ગ કરાય છે. એ વખતે થવાવાળા દેવ મનુષ્ય અને તિર્યંચ સબંધી ઉત્કૃષ્ટ ઉપસર્ગ જે સહન
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आवश्यकमूत्रस्थ तिर्यकृते घोर उपसर्गे सोढेऽवधि-मनःपर्यय-केवलज्ञानामन्यतमस्यैकस्य कस्यचिज्ज्ञानस्योदयो जायते, 'अन्यथा तून्मादादिदुष्टरोगसंक्रमेण श्रमणस्य केवलिपरूपितधर्माद्भवति परिभ्रंशनम् ॥ भू० ११ ॥
तेरसहि किरियाठाणेहिं ॥सू० १२॥
॥ छाया ॥ त्रयोदशभिः क्रियास्थानः ॥ भू० १२ ॥
॥ टीका ॥ त्रयोदशभिः क्रियास्थानों मयाऽतिचारः कृतः इत्यादिसम्बन्धो यथोक्तः। तत्र क्रियास्थानान्युक्तानि, यथा-"(१) अट्ठादंडे, (२) अणहादंडे, (३) हिंसादंडे, (४) अकम्हादंडे, (५) दिहिविपरियासियादंडे, (६) मोसवत्तिए, (७) अदिन्नादाणवत्तिए, (८) अज्झत्थवत्तिए, (९) माणवत्तिए, (१०) मित्तदोसवचिए, (११) मायावत्तिए, (१२) लोभवत्तिए, (१३) इरियावहिए" इति । तत्रार्थाय स्वपयोजनाय दण्डोऽर्थदण्डः (१) अनर्थ प्रयोजनमन्तरेण दण्डोतिर्यच सम्बन्धी घोर उपसर्ग यदि सहन करले तो अवधि, मनःपर्यय, और केवलज्ञान में से किसी एक की उत्पत्ति होती है, नहीं तो उन्मत्त (पागल), दीर्घकालिक दाहज्वरादि रोगों से पीडित और केवलिप्ररूपित धर्म से च्युत हो जाता है। इन बारह भिक्षुप्रतिमाओं में न्यूनाधिक श्रद्धा-प्ररूपणा आदि द्वारा जो अतिचार किया हो तो उस से मैं निवृत्त होता हूँ ॥सू. १९॥
क्रियास्थान तेरह हैं-(१) अथेदण्ड (स्वप्रयोजन के लिये કરી લે તે અવધિ, મન:પર્યય અને કેવળ જ્ઞાનમાંથી કઈ એકની ઉત્પત્તિ થાય છે; નહિં તે ઉન્મત્ત (પાગલ), દીર્ઘકાલિક દાહવરાદિક રેગથી પીડિત અને કેવલિપ્રરૂપિત ધર્મથી પતિત થાય છે. આ બાર ભિક્ષુપ્રતિમાઓમાં ઓછી વધતી શ્રદ્ધા પ્રરૂપણા વિગેરે દ્વારા જે કઈ અતિચાર લાવ્યા હોય તે તેમાંથી હું નિવૃત્ત था . (सू० ११)
यास्थान ते२ छे-(१) अर्थ (पोताना प्रयोग भाटे या ४२वी ) (२) मन ( २५ विना या ४२वी), (3) हिंसा, (४) भात
१ उपसर्गभीरुत्वे
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम् - ४
ऽनर्थदण्डः = सावधक्रियाऽनुष्ठानम् (२) हिंसैव दण्डः = हिंसादण्डः = माणातिपातस्त्ररूपः (३)। अकस्मात् = अन्यक्रिययाऽन्यदीयव्यापादनरूपो दण्डः = अकस्माद्दण्डः (४)। दृष्टेः=नेत्रस्य विपर्यासः - दर्शनविभ्रान्तिः = रज्ज्वादिषु सर्पादिबुद्धि: - दृष्टिविपर्यासः, स चासौ दण्डश्च दृष्टिविपर्यासदण्डः - बाणादिना लोष्टादिभ्रान्त्या तित्तिरिचटकादीनां विहिंसनम् (५) । सद्भूतनित्रपूर्वका -ऽसद्भूतसमारोपणनिमिनो मृषावादमात्ययिकः, 'मोसवत्तिए' इति पुंस्त्वं तु दण्ड विशेषणत्वाभिप्रायेण, एवमेवाग्रेऽपि ( ६ ) । अदत्तस्य = स्वाम्यादिभिरवितीर्णस्य परकीयस्येति यावत् आदानं=ग्रहणमदत्तादानं= चौर्यप्रकारस्तन्निमितः ( ७ ) । आत्मनीत्यध्यात्मं तत्प्रात्ययिकोऽध्यात्ममात्ययिकः =स्वात्मनि
मित्तको दण्डः, यतो दुःखभावो जनो निर्हेतुकमेव क्षत संकल्पश्चिन्तासन्तानसमाक्रान्तस्वान्तो नितान्तं दनान्तस्तिष्ठति (८) । जाति - कुल - बलरूपादिमदस्थानाष्टकाऽऽवेष्टितहृदयस्य परनीचत्वावलोकिनो योऽभिमानमूलको दण्डः स मानमात्ययिकः (९) । मित्रकर्मक सन्तापजो दोषो मित्रदोषो मातृ-पितृप्रभृतीनामपीयसाऽप्यपराधेनोग्रतमस्वरूपधारणया महाऽऽधिजनकचेष्टा विशेषरूपस्तन्निमित्तको दण्डी मित्रदोषप्रात्ययिकः (१०) । माया = परप्रतारणोपायक्रिया करना), (२) अनर्थदण्ड (विना प्रयोजन क्रिया करना), (३) हिंसादण्ड, (४) अकस्माद्दण्ड (एकको मारते बीच में दूसरे का मारा जाना), (५) दृष्टिविपर्यासदण्ड (पत्थर समझकर तीतर, चटका आदि का मारा जाना), (६) मृषाप्रात्ययिक (असत्य से लगने वाला (७) अदत्तादानप्रात्ययिक, (८) अध्यात्मप्रात्ययिक (जिससे मनुष्य स्वयं निष्कारण चिन्ता करे ), (९) मानप्रात्ययिक, (१०) ( એકને મારતાં વચમાં ખીન્દ્રની હિંસા થવી ), (૫) દૃષ્ટિવિપર્યાસદંડ ( પત્થર સમજીને તેતર ચકલી આદિની હિંસા થવી ), (૬) મૃષાપ્રાત્યયિક ( અસત્યથી सागवावा पाप), (७) महत्ताधानप्रात्ययि, (८) अध्यात्मप्रात्ययिक (मेथी માણસ પાતે નકામી ચિંતા કરે ), (૯) માનપ્રાત્યયિક, (૧૦) મિત્રદોષપ્રાત્યયિક ( भाता, पिता महिने मस्य मयराधना लारे दंड हेवा ), (११) भायायात्य
पाप),
१ - ' अन्तः ' शब्दो रेफान्तोऽन्तःकरण पर्यायोऽव्ययः ।
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आवश्यकमूत्रस्य स्तनिमित्तको दण्डो मायामात्ययिकः (११)। लोभनिमित्तको दण्डो लोभपात्ययिकः (१२)। ईर्यानिमित्तको दण्ड ई-प्रात्ययिकः (१३)। व्यपेतकषायस्य सर्वत्रोपयुक्तसमितिगुप्तिमतो भगवतो योगेनेर्याप्रात्ययिको जायते । एषु च सर्वत्र प्रात्ययिकपदार्थस्य 'कर्मबन्ध' इति विशेष्यः स्वयमहनीयः । अत्र 'प्रात्ययिक' पदस्थाने 'प्रत्ययक' शब्देन व्याख्यायामौचित्यं प्रतिभाति, मषा प्रत्ययो यस्येत्यादिरीत्या बहुव्रीही शेषाद्विभाषेति वैकल्पिककबुत्पत्तः, तथा सति विवक्षितोऽर्थों विस्पष्टं प्रतीयते । 'प्रत्यय' शब्दश्चात्र हेतुपर्यायः- 'प्रत्ययोऽधीनशपथज्ञानविश्वासहेतुषु' इत्यमरः। 'मात्ययिकः' इति पाठे भवाद्यर्थे ठक, 'प्रत्ययिकः' इति पाठस्तु यथा न रोचते तथा प्रेक्षावन्त एव प्रमाणम् ॥ मू० १२ ॥
॥ मूलम् ॥ चउद्दसहिं भूयग्गामेहि। पन्नरसहिं परमाहम्मिएहिं । सोलसहि गाहासोलसएहिं । सत्तरसविहे असंजमे । अहारसविहे अबंभे । एगूणवीसाए नायज्झयणेहिं । वीसाए असमाहिट्टाणेहि ॥सू० १३॥
॥ छाया ॥ चतुर्दशभिर्भूतग्रामैः। पञ्चदशभिः परमाधार्मिकैः। षोडशभिर्गाथाषोडशकैः । सप्तदशविधेऽसंयमे । अष्टादशविधेऽब्रह्मणि । एकोनविंशल्या ज्ञाताध्ययनैः। विंशत्याऽसमाधिस्थानः ।। सू० १३ ॥ मित्रदोषप्रात्ययिक (माता, पिता आदि को अल्प अपराध का भारी दण्ड देना), (११) मायाप्रात्ययिक, (१२) लोभप्रात्ययिक (१३) ईर्याप्रात्ययिक (कषायरहित, उपयोगसहित, समिति-गुप्ति के धारक भगवान को योग से लगने वाला सामान्य कर्मबन्ध); इन तेरह क्रियास्थानों द्वारा जो अतिचार लगा हो तो उससे मैं निवृत्त होता हूँ ॥ सू० १२॥ યિક, (૧૨) લેભપ્રાયયિક, (૧૩) ઈપ્રાયયિક (કષાયરહિત ઉપયોગસહિત સમિતિગુપ્તિને ધારણ કરવાવાળા ભગવાનને વેગથી લાગવાવાળા સામાન્ય કર્મ બંધ). આ તેર ક્રિયાસ્થાને દ્વારા જે કઈ અતિચાર લાગેલ હોય તે તેમાંથી निवृत्त या छु. (५० १२)
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नितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम् -४
॥ टीका ॥
' चउद्दसहि ' चतुर्दशभिः, 'भूयग्गामेहिं' भूतानि = जीवास्तेषां ग्रामाः = समुदायास्तैः, ग्रामैरिति बहुवचनेन मृक्ष्मै केन्द्रियग्राम - बादरे केन्द्रियग्राम - द्वीन्द्रियग्राम-त्रीन्द्रियग्राम-संज्ञिपञ्चेन्द्रियग्रामा - ऽसंज्ञिपञ्चेन्द्रियग्रामाणां पर्याप्ताऽपर्याप्तभेदेन चतुर्दशानां ग्रहणमभिप्रेतम् । एतत्सूत्रस्थानां सर्वेषामेव पदानां ' यो मयाऽतिचारः कृतः ' इत्यादिभिः पूर्वोकैः सम्बन्धः ।
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'पन्नरसहिं' पञ्चदशभिः, 'परमादम्मिएहिं ' धर्मं चरन्तीति धार्मिका न धार्मिकाः = अधार्मिका परमाश्व ते अधार्मिकाः = परमाधार्मिकाः अतिकलुषितहृदयपरिणामा यम- लोकपालसेवका असुरकुमारदेवविशेषास्तैस्तकृत पापाऽनुमोदनादिभिरित्यर्थः । तन्नामानि प्रोक्तानि यथा
(१) अंबे, (२) अंबरिमी, (३) सामे, (४) सबले, (५) रुद्दे, (६) उत्ररुद्दे, (७) काले, (८) महाकाले, (९) असिपत्ते, (१०) धणू, (११) कुंभे, (१२) वालू, (१३) वेयरणी, (१४) खरस्सरे, (१५) महाघो से ।
6
'तत्र ' अम्ब : ' = अम्बनामा परमाधार्मिको, यो हि नारकान् गगनतलं (१) सूक्ष्म एकेन्द्रिय, (२) बादर एकेन्द्रिय, (३) हीन्द्रिय, (४) त्रीन्द्रिय, (५) चतुरिन्द्रिय, (६) असंज्ञि पञ्चेन्द्रिय ( 9 ) संज्ञि पञ्चेन्द्रिय, इन सातों के पर्याप्त और अपर्याप्त के भेद से चौदह भूतग्राम ( जीवसमूह) होते हैं, इनकी विराधना आदि से जो अतिचार लगा हो 'तो उससे मैं निवृत्त होता हूँ'
अत्यन्त कलुषित परिणाम वाले होने से परमाधार्मिक कहलाने वाले देव (१५) पन्द्रह प्रकार के हैं-
(१) अंब - नारकी जीवों को आकाश में ले जाकर नीचे
(१) सूक्ष्म भेडेंद्रिय, (२) महर डेंद्रिय (3) द्वीन्द्रिय, (४) त्रीन्द्रिय, (4) यतुरिन्द्रिय, (६) असंज्ञि यथेन्द्रिय, (७) संज्ञि पथेन्द्रिय, या सातेना पर्याप्त અને અપર્યાપ્તના ભેદથી ચૌદ ભૂતગ્રામ (જીવસમૂહ) હાય છે. એની વિરાધના આદિથી જે અતિચાર લાગ્યા હોય ‘તે તેથી હું નિવૃત્ત થાઉં છું.'
અત્યંત કલુષિત પરિણામવાળા હાવાથી પરમાધાર્મિક કહેવાતા દેવ પંદર
प्रभारना छे
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आवश्यकसूत्रस्व
नीवा ऽधस्ताद्विमुञ्चति, दत्त्वा च गलहस्तं गर्भे पातयति, अधोमुखमम्बरतले समुत्क्षिप्य पुनः पुनः पतन्तं शूलादिना विध्यति, पापं संस्मार्य संस्मार्य चानेकधा भूयः कदर्थयति । १ ।
खण्डनः
'अम्बरीषो ' नारकान् मुद्गरादिना कुट्टयित्वा क्रकचादिभिः कृत्वा भ्राष्ट्रादौ पचति, हताऽऽहततया मूच्छिताँश्च तान् कदलीस्तम्भवचर्मणामेकैकं पुटमुत्पाट्योत्पाटय कदर्थयति । २ ।
' श्यामः ' कशाघातादिना शातयति, हस्तपादादीन् दुर्दर्शतया छिनत्ति, शूल - सूच्यादिना विध्यति, उपरितो वज्रशिलायां पातयति, तथा रज्ज्वादिना पटकने वाले, गर्दनिया देकर (गर्दन पकड कर ) गड्ढे में गिरानेवाले, उलटे मुँह आकाश में उछाल कर गिरते समय बर्छा आदि भोंकने वाले, और पाप का वारम्वार स्मरण कराकर अनेक प्रकार से पीडा पहुँचाने वाले ।
(२) अंबरीष - नेरइयों को मुद्गर आदि से कूट कर करोत, कैंची आदि से टुकडे २ कर भाड भूँजने वाले तथा अधमरे कर के कदली स्तम्भ के समान एक एक चर्मपुट को खींच कर दुःखी करने वाले ।
(३) श्याम -- कशा (कोडा) आदि से पीटने वाले, हाथ पैर आदि अवयवों को बुरी तरह काटनेवाले, शूल सुई आदि से बींधनेवाले, ऊपर से वज्रशिला पर पटकने वाले, और रस्सी
(૧) આંખ-નારકી જીવાને આકાશમાં લઈ જઈને નીચે પછાડવાવાળા, ગરદન પકડીને ખાડામાં ફૂંકવાવાળા, અવળા મેઢ આકાશમાં ઉછાળીને પડતી વખતે બરછી વિગેરે લાંકવાવાળા, અને પાપનું વારંવાર સ્મરણ કરાવીને અનેક પ્રકારથી પીડા પહાંચાડવાવાળા,
(२) मंजरीष-नेरयाने भुगहर माथि टीने शेत, थी (तर) माहिथी ટુકડા ટુકડા કરીને ભઠીમાં શેકવાવાળા તથા અધમુવા કરીને કેળના થાંભલાની જેમ એકેક ચપુટને ખેચીખેચીને દુ:ખી કરવાવાળા.
(3) श्याम-शा (अयडा ) माहिथी भारवावाजा, हाथ पत्र आहि वयोवाने છુરી રીતે કાપવાવાળા, શૂળ સેય આદિથી વીધવાવાળા, ઉપરથી વજ્ર શિલા ઉપર
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तोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम् - ४
दृढं बद्ध्वा लतादिप्रहारपुरस्सरं भीषणयातनां नयति, अस्य श्यामाङ्गत्वाच्छ्चामनाम । ३ ।
शबल: =वर्णेन कर्बुरः, अयं महरादिना नारकिणाम स्थिसन्धि चूर्णयति, अन्त्रवसादीन्निष्कासयति च । ४ ।
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'रौद्रो' रुद्रकर्मकरत्वात्, यतोऽयं नारकान् भ्रामयित्वा २ व्योम्नि सुदूरमुत्क्षिप्य निपततस्तान् शक्त्यमितोमरादिषु प्रोतयति । ५ ।
उपरौद्रः = रौद्रकल्पः, एष च करचरणाद्यङ्गोपाङ्गानि मनक्ति । ६ । 'काल: स यो नारान नानाविधेषु कुम्भ्यादिपात्रेषु पचति, भयं च तोऽपि काल एत्र । ७ ।
,
महाकाल:- पूर्वस्मिन् जन्मनि मांसाहारिणो नारकान्तदीयोकर्तितं पृष्टादिवं मांसं कदर्थनया भक्षयति, अयं च वर्णेन महाश्यामत्वान्महाकाल उच्यते |८| आदि से मजनून बांध कर लना (बेन) आदि के प्रहार से चमडा उडने वाले ।
(४) शबल – मुद्गर आदि द्वारा नारकियों की हड्डी के जोड़ों को चूर चूर करने वाले तथा आँन और चरवी को निकालने बाछे । (५) रौद्र - नरकम्प जीवों को खूब ऊँचे उछाल कर गिरते समय, शक्ति, तलवार, भाले आदि में पिगनेवाले । (६) उपरौड़नारकीय जीवों के हाथ पैर तोडने वाले । (9) काल - कुंभी आदिमें पचानेवाले । (८) महाकाल - पूर्वजन्म के मांसाहारी जीवों को उन्हों की पीठ आदिका मांस काट काट कर विलाने वाले । (९) ५७.८१.१.. भने हेर महिथी कधीन aai (नंतर) विगेरेधी भरीने ગાડું નેડન.
(४) शम-भुशहर महिद्वारा नरडीन यूरेश ४२१.१॥ तथः तन् भने रजीने उठ (4) नांव वने म छजीने पती मते शक्ति, बार, लावा विगेरेभां पाषाणा (3) ઉપરોઢનારીય વેનાં 6.4 પગ ते.१.२.ज. (७) 5.3 - इसी महिमां ने मनी पीउनु
२८.१०८, (5) मई.5.8 पूर्व४न्मना मां માંસ ક્ર:પી ક.પીને ખવર.વાવાળ. (૯) અસપત્ર-તલવાર જેવા તીક્ષ્ણ પાંદડાવાળા
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आवश्यकसूत्रस्व 'असिपत्रः' स देवो योऽसितुल्यपत्राणां वनं विरचय्य तच्छायाऽभिलाषेण समागतानारकिणो विकृतवातान्दोलनपूर्वकमसिपत्रपातनेन खण्डशश्छिनत्ति ।९।
धनुः-स यो धनुषो विनिर्मुकैरर्द्धचन्द्राकारैर्बाणैः कर्णीष्ठनासादीनवयवाभारकिणां छिनत्ति । १० ।
____ कुम्भः-विविधाष्ट्रिकाद्याकारामु कुम्भीषु नारकिणो भृशं पचति हन्ति च । ११ ।
वालुः'-भ्राष्ट्रस्थतप्तवज्रवालुकासु नारकान् सतडत्कारं चणकादीनिव भनयति । १२ ।
वैतरणी-नरकस्थनदी, तदधिष्ठातृत्वेन तद्देवोऽपि तात्स्थ्यात् गृहा दारा इतिवत् , स चातिपूतिगन्धिपूयरुधिरपवाहपरिपूरितां तप्तत्रपुताम्रादिकलकलाअसिपत्र-तलवार जैसे तीखे पत्तों के वनकी विकुर्वणा करके उस वनमें छायाकी इच्छा से आये हुए नारकी जीवों को वैक्रिय घायुद्वारा पत्ते गिराकर छिन्नभिन्न करनेवाले । (१०) धनु-धनुष से छोडे हुए अर्द्धचन्द्राकार बाणों से आँख नाक आदि अवयवों को छेदनेवाले। (११) कुंभ-ऊँटनी आदि के आकारवाली कुम्भियों में पचानेवाले । (१२) वालू-वज्रमय तप्तवालुका में चनों के समान
डतडाहट करते हुए नारकी जीवों को भूननेवाले । (१३) वैतरणी-अत्यन्त दुर्गन्धवाली राध लोहू से भरी हुई, एवं तपे हुए जस्त और कथीर की उकलती हुई, अत्यन्त क्षार से युक्त उष्ण पानी से भरी हुई वैतरणी नदी की विकुर्वणा करके उसमें વનની વિમુર્વણુ કરીને તે વનમાં છાયાની ઈચ્છાથી આવેલા નારકી જીવને વૈક્રિય વાયુ દ્વારા પાંદડાઓને ખેરવીને છિન્નભિન્ન કરવાવાળા. (૧૦) ધન-ધનુષ્યથી છેડેલ અર્ધચંદ્રાકાર બાણથી આંખ નાક આદિ અવયવને છેદવાવાળા. (૧૧) કુંભ ઉંટની (સાંઢણું) આદિના આકારવાળી કુંભિયમાં પકાવવાવાળા. (૧૨) વાલ્વ મય તપેલી રેતીમાં ચણાની સમાન તડતડાત કરતા નારકી અને શેકવાવાળા (૧૩) વૈતરણીખૂબ દુધવાલી રાધ લેહીથી ભરેલી, તપેલા જસત અને કથીરથી ઉકળતી, અત્યંત ક્ષાર યુક્ત ઉના પાણીની ભરેલી વૈતરણી નદીની વિદુર્વણા કરીને એમાં
१- ‘असिपत्र' इत्यत्राऽर्श आदित्वादच् ।
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
२२९ यितां क्षारोष्णजलभृतां भयानका विकृतदर्शनां नदी विकृत्य नारकान् क्लिश्नाति । १३ ।
खरस्वरः-सचीत्कारमुच्चैराक्रोशतो नारकान् तीक्ष्णवज्रकण्टकाऽऽकीर्णेषु शाल्मल्यादिप्रांशुवृक्षेषु' समारोप्याऽऽकर्षति, शिरम्सु च क्रकचं निधाय विदारयति, परशुभिर्ग खण्डयति । १४ ।।
__'महाघोषः'-अयं परमपीडोत्पत्तिभीतान् मृगानिवेतस्ततः पलायमानान् नारकान् घोरगर्जनां कुर्वन् वाटकं (वनं) पनिव नरकाऽऽत्रासमवरुणदि । १५ ।
___'सोलसहि' षोडशभिः, 'गाहासोलसएहि' गाथानामकं षोडशमध्यनरकके जीवों को डाल कर अनेक प्रकार से पीडित करनेवाले। (१४) खरस्वर-तीखे वज्रमय काटेवाले ऊँचे२ शाल्मली (सेमल) वृक्षों पर चढाकर चिल्लाते हुए नारकी जीवों को खींचनेवाले, मस्तक पर करोंत रखकर चीरनेवाले, तथा फरसा से खंड२ करनेवाले ।
(१५) महाघोष-अत्यन्त वेदना के डरसे मृगोंकी तरह इधर-उधर भागते हुए नारकी जीवों को वाडेमें पशुओंकी तरह घोर गर्जना करके रोकनेवाले। इनके द्वारा होनेवाले पापकी अनुमोदना आदि से जो अतिचार लगा हो तो मैं उससे निवृत्त होता है।
सूत्रकृताङ्ग के प्रथम श्रुतस्कन्ध के मोलह अध्ययन इस નરકના જીવને નાખીને અનેક પ્રકારથી દુઃખ દેવાવાળા. (૧૪) ખરસ્વર-તીખા વજા જેવા કાંટાવાળા ઉંચા ઉંચા શેમળના ઝાડ ઉપર ચઢાવીને બુમો પાડતા નારકી છાને ખેચવાવાળા, માથા ઉપર કરવત રાખીને ચીરવાવાળા તથા ફરસીથી ટુકડા ટુકડા કરવાવાળા (૧૫) મહાષ- અત્યંત વેદનાના ડરથી હરણની જેમ
જ્યાં ત્યાં ભાગતા નારકી અને વાડામાં પશુઓની માફક ઘેર ગર્જના કરીને રેકવાવાળા એ પરમાધાર્મિક દેથી થતા પાપની અનુમંદના આદિથી જે અતિચાર લાગ્યા હેય “તે તેમાંથી હું નિવૃત્ત થાઉં છું
સૂત્રકૃતાંગના પ્રથમ શ્રુતસ્કંધના સેળ અધ્યયન આ પ્રકારે છે १.- 'प्रांशुरुच्चः' इत्यर्थः। २- रुधेर्द्विकर्मकत्वादिदमकथितं कर्म 'वनमवरुणदि गाम्' इत्यादिवत् ।
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आवश्यक सूत्रस्व
"
यनं येष्वभ्यवनेषु तानि गाथाषोडशकानि तैः = मृत्रकृताङ्गप्रथमश्रुतस्कन्धाध्वयनैः सम्बन्धस्तुक्त एव । प्रसङ्गप्राप्तानि षोडशानामध्ययनानां नामान्युच्यन्तेस्वसमय पर समयनामकं १, वैतालीयम् २, उपसर्गपरिज्ञम् ३, स्त्रीपरिइम् ४. नरकविभक्तिः ५, वीरस्तुतिः ६, कुशीलपरिभाषानामकम् ७, वीर्य - नामकम् ८, धर्मनामकम् ९, समाधिनामकम् १०, मोक्षमार्गनामकम् ११, समवसरणनामकम् १२. याथातथ्यनामकम् १३, ग्रन्थनामकम् १४, आदाननामकम् १५, गाथानामकम् १६ चेति ।
' सत्तरसविहे' सप्तदशविधे ' असंजमे' न संयमांऽसंयमः = सावधातुटानमर्थान पृथिवीव्यप्तेजोवायुवनस्पति- द्वि- त्रि- चतुःपञ्चेन्द्रियाऽजीवप्रकार हैं - (१) स्वसमयपर समय, (२) वैतालिक, (३) उपसर्गपरिज्ञा (४) स्त्री परिज्ञा, (५) नरकविभक्ति, (६) वीरस्तुति, (७) कुशीलपरिभाषा (८) वीर्यनाम, (९) धर्मनाम, (१०) समाधिनाम, (११) मोक्षमार्ग नाम, (१२) समवसरणनाम, (१३) याथातथ्यनाम, (१४) ग्रन्धनाम, (१५) आदाननाम, (१६) गाधानाम । इन सोलह अध्ययनोंमें श्रद्धा प्ररूपणा आदिकी न्यूनाधिकता के कारण जो कोई अतिचार किया गया हो तो मैं उससे निवृत्त होता हूँ ॥
असंयम (मात्रय - अनुष्ठान - विशेष ) सतरह प्रकारका है(१) पृथ्वीकाय असंयम, (२) अकाय असंयम, (३) तेजस्काय
(१) स्वसमय समय (२) वैताबिक, (3) उपसर्गपरिज्ञा, (४) खीयज्ञ (4) विलासित, (६) वीरस्तुति, (७) कुशीसपरिभाषा, (८) वीर्य - नाम, (८) धर्मनाम, (१०) समाधिनाम, (११) भोक्षमार्गनाम, (१२) सभवन२धुनाम, (13) ब. ध. तथ्यनाम (१४) अथनाभ, (१५) महाननाम, (१६) गाथानाभ्
આ સાળ અધ્યયનામાં શ્રદ્ધા પ્રરૂપણા આદિની ન્યૂનાધિકતાના કારણે જે કાઇ અતિચાર લાગ્યા હોય તા તેમાંથી હુ નિવ્રુત્ત થાઉં છુ.
અસયમ (સાવધ અનુષ્ઠાન વિશેષ) સૂત્તર
પ્રકારના छे. (१) पृथ्वीडाय १ - बहुमूल्य वस्त्रादीनां ग्रहणं सदोषोपधिग्रहणं चाजीवाऽसंयमः । उपकरणादीनामविधिना प्रत्युपेक्षणमप्रत्युपेक्षणं वा प्रेक्षाऽसंयमः । असंयमे प्रवर्त्तनं संयमे चाऽप्रवर्तनमुपेक्षाऽसंयमः, प्रस्फुटा इतरे ।
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४ लोपेक्षापमार्जनपरिष्ठापनमनोवाक्कायानां, तस्मिन् ।
'अहारसविहे' अष्टादशविधाः प्रकारा यस्य तस्मिन् 'अबंभे' अंसंयम, (४) वायुकाय असंयम, (५) वनस्पतिकाय असंयम, (६) बीन्द्रिय असंयम, (७) श्रीन्द्रिय असंयम, (८) चतुरिन्द्रिय असंयम, (९) पश्चेन्द्रिय असंयम, (१०) अजीव असंयम, (पात्र आदि उपधिका अविधि से काममें लाना, अधिक तथा सदोष उपधि आदिका ग्रहण करना), (११) प्रेक्षा असंयम (उपधिका अविधि से प्रतिलेखन करना, अथवा प्रतिलेखन नहीं करना), (१२) उपेक्षा असंयम (संयम योगमें मन वचन काय के योगों को नहीं लगाना और असंयममें लगाना), (१३) अप्रमार्जना असंयम (उपाश्रय आदिका नहीं पूँजना), (१४) परिष्ठापनिका असंयम (अयतनासे किसी वस्तुका परिष्ठापन करना), (१५) मन असंयम, (१६) वचन असंयम, (१७) काय असंयम । इन असंयमों द्वारा जो अतिचार किया गया हो 'तो मैं उससे निवृत्त होता है।
अठारह प्रकार का अब्रह्मचर्य (कुशील-मैथुन) (१-२) औदारिक शरीर द्वारा मन वचन और काय से सेवन किया हो, कराया हो, या मसयम, (२) २५५४ाय असयम, (3) ते४२४य असयम, (४) वायुय अस. यम, (५) वनस्पतिय असंयम, (६) द्वन्द्रय असयम, (७) जीन्द्रिय ससयम, (८) यतुन्द्रिय असंयम, (e) ५येन्द्रिय असंयम, (१०) १७१ असयम (पात्र આદિ ઉપધિને અવિધિથી કામમાં લેવું, અધિક તથા સદૈષ ઉપધિ આદિનું ગ્રહણ કરવું), (૧૧) પ્રેક્ષા અસંયમ (ઉપધિનું વિધિ વિના પ્રતિલેખન કરવું અથવા પ્રતિલેખન નહિ કરવું), (૧૨) ઉપેક્ષા અસંયમ (સંયમયેગમાં મન વચન કાયાના યેગેને નહીં લગાડવા અથવા અસંયમમાં લગાડવા). (૧૩) અપ્રમાજના અસંયમ (ઉપાશ્રય વિગેરેને નહિ પંજવા), (૧૪) પરિઝાપનિકા અસંયમ (અયનતાથી કઈ वस्तु परिठापन ४२y), (१५) मन मसयम, (१६) पयन मसयम, (१७) छायઅસંયમ. આ અસંયમ દ્વારા જે અતિચાર થયા હોય તે તેમાંથી હું નિવૃત્ત या छु.
અઢાર પ્રકારનું અબ્રહ્મચર્ય થશીલ-મિથુન) (૧-૯)
દારિક શરીર દ્વારા
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आवश्यकसूत्रस्य कुशल मनुष्ठानं ब्रह्म,न ब्रह्म-अब्रह्म अर्थान्मैथुनं, तस्मिन् अब्रह्मणि; एतद्धि-औदारिकवैक्रयिकशरीराभ्यां करणंकारणाऽनुमोदनैर्वाङ्मनःकायतोऽष्टादशविधं भवति, अर्थादौदारिकं मनसा वाचा कायेन च स्वयं न करोतीति त्रिविधम् , मनसा वाचा कायेन चाऽन्यद्वारा न कारयतीति त्रिविधमिति षड्विधम् । मनसा वाचा कायेन च कुर्वन्तमप्यन्यं न समनुजानातीति च त्रिविधमिति सर्वसङ्कलनयौदारिकशरीरसम्बन्धिनो नव भेदाः । एवमेव वैक्रयिकशरीरसम्बन्धिनोऽपीति मिलिस्वाऽष्टादशविधत्वम् ।
'एगृणवीसाए' एकोनविंशत्या 'नायज्झयणेहिं' ज्ञातानि=उदाहरणानि, तत्प्रतिपादकान्यध्ययनानि=ज्ञाताध्ययनानि तैः, एषु यत्र परमेण कारु• ज्येनाऽऽत्यन्तिककष्टसहनपूर्वकं मेघकुमारकर्तृकं हस्तिभवाधिकरणकं पादैकोत्क्षेपगरूपं वृत्तमुपनिवद्धं तदुत्क्षिप्तज्ञातं नाम प्रथममध्ययनम् । अस्य चैवं ज्ञातत्वम्दयादिगुणशालिनो दवदाहादिकष्ट सहन्ते समुत्क्षिप्तकचरण-मेघकुमार-जीवहस्तिवदिति १। यत्र श्रेष्ठि-तस्करयोरेकत्र बन्धनवृत्तान्त उपनिवद्धस्तत् 'संघाटजातं' नाम द्वितीयमध्ययनम् । तृतीयं 'मयूराण्डज्ञाताध्ययनम् ।' अनुमोदना की हो, इसी प्रकार (१०-१८) वैक्रिय शरीर से मैथुन मन, वचन और काय से सेवन किया हो, कराया हो और अनुमोदन की हो। इस अठारह प्रकार के अब्रह्मचर्य द्वारा जो अतिचार किया गया हो तो उससे मैं निवृत्त होता हूँ।
ज्ञाताधर्मकथा के उन्नीस अध्ययन-(१) मेघकुमार (उत्क्षिप्त), (२) धन्ना सार्थवाह (संघाट), (३) मयूराण्ड, (४) कूर्म (कच्छप) મન વચન અને કાયાથી સેવન કર્યું હોય, કરાયું હોય અને અનુમોદન આપ્યું હોય, આ પ્રકારે (૧૦-૧૮) વૈક્રિય શરીરથી મિથુન મન વચન અને કાયાથી સેવન કર્યું હોય, કરાયું હોય અને અનુમોદન આપ્યું હોય. આ અઢાર પ્રકારના અબ્રહ્મચર્ય દ્વારા જે અતિચાર લાગ્યા હોય ‘તે તેમાંથી હું निवृत्त था .
જ્ઞાતાધર્મકથાના ઓગણીસ અધ્યયન (૧) મેઘકુમાર (ઉક્ષિપ્ત), (२) पन्ना सार्थवाड (सपाट), (3) मयूरा3, (४) दूर्भ (४२७५ ), (५) शैक्ष
१- ज्ञाताध्ययनेषु ।
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सुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम् -४
२३३
चतुर्थं कूर्मज्ञाताध्ययनम् । पञ्चमं शैलकराजर्षिज्ञाताध्ययनम् । षष्ठं तुम्बज्ञातम् । सप्तमं रोहिणीज्ञातम् । अष्टमं मल्लीज्ञातम् । नवमं माकन्दीपुत्रज्ञातम् । दशमं चन्द्रज्ञातम् । एकादशं समुद्रनीरस्थदावद्दत्र वृक्षचरित्रयुक्तत्वाद्दावद्दवज्ञाताध्ययनम् । द्वादशमुदकज्ञाताध्ययनम्, अत्र नगरपरिखाजलवर्णनम् । त्रयोदशं मण्डूकज्ञाताध्ययनम् । अत्र नन्दनमणिकारश्रेष्ठिजीववृत्तान्तवर्णनम् । चतुर्दशं तेतली - प्रधानज्ञाताध्ययनम् । पञ्चदशं नन्दिवृक्षाख्य तरुफलवृत्तान्तसम्बन्धान्नन्दिफलज्ञाताध्ययनम् । षोडशममरकङ्काज्ञातम्, अमरकङ्का नाम घातकीखण्ड - भरत क्षेत्रराजधानी तत्सम्बन्धात् । सप्तदशमाकीर्णज्ञातम् - आकीर्णाः = आकीर्णजातीयाः समुद्रमध्यवर्त्तिनोऽश्वविशेषास्तत्सम्बन्धात् । अष्टादशं मुमाज्ञातं नाम । एकोनविंशतितमं पुण्डरीकज्ञातं नामाध्ययनम् ॥
'बीसाए' विंशस्या 'असमाद्द्द्विाणेहिं' समाधिधितैकाग्रता=मोक्षमार्गेSTस्थानं, न समाधिरसमाधिः, यत्सेवनेन स्वपरोभयमोक्षसुखविच्छेदो जायते (५) शैलकराजर्षि, (६) तुम्बलेप, (७) रोहिणी, (८) मल्लिनाथ, (९) माकन्दी, (१०) चन्द्र, (११) दावद्दववृक्ष, (१२) उदकनाम, (१३) मण्डूक, (१४) तेतली प्रधान, (१५) नन्दीफल, (१६) अमरकंका, (१७) आकीर्णजातीय अश्व, (१८) सुसुमा, (१९) पुण्डरीक, इन उन्नीस ज्ञाताध्ययनों की श्रद्धा-प्ररूपणादि में न्यूनाधिकता होने से जो कोई अतिचार किया गया हो तो उससे मैं निवृत्त होता हूँ ।
चित्तकी एकाग्रतापूर्वक मोक्षमार्ग में स्थित होने को समाधि कहते हैं, और इससे विपरीत को असमाधि कहते हैं, उसके बीस स्थान ( ज्ञानादिरहित अप्रशस्त भाव वाले स्थान) हैंराजर्षि (१) तुम्ञशेष, (७) रोडिली, (८) मस्लिनाथ, (E) भाउंछी, (१०) चंद्र, (११) हावहृववृक्ष, (१२) नाम, (१३) मंडूक, (१४) तेनसी प्रधान, (१५) नन्हीईल, (११) अभ२४°४, (१७) भाडी गुलतीय अश्व, (१८) सुंसुभा, (१८) पुंडरी ४. આ એગણીસ અધ્યયનોની શ્રદ્ધા-પ્રરૂપણાદિમાં ન્યૂનધિકતા થવાના કારણે જે કોઇ અતિચાર લાગ્યા હાય ‘તા તેમાંથી હું... નિવૃત્ત થાઉં છું.'
ચિત્તની એકાગ્રતાપૂર્વક મોક્ષમાર્ગમાં સ્થિત થવું તેને અને તેનાથી વિપરીત સ્થિતિને અસમાધિ કહે છે. તેના
સમાધિ કહે છે, વીસ સ્થાનકા
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२३४
आवश्यक सूत्रस्य
सः,
तस्य स्थानानि=पदान्यसमाधिस्थानानि - ज्ञानादिरहिताऽमशस्तभावसम्पन्नानि स्थानानीत्यर्थस्तैः । तानि क्रमेण यथा - प्रथमं द्रुतद्रुतचरणं = संयम त्रिराधनामात्मविराधनां चानपेक्ष्य गमनम् । द्वितीयमप्रमार्जितचरणम् = अप्रमार्जिते= रजोहरणेनाऽविशुद्धीकृते मार्गादौ गमनम् । तृतीयं दुष्पमार्जितचरणम् =असम्यक् प्रमार्जिते गमनम् । चतुर्थ मर्यादातिरिक्तशय्यापीठफलकादिसेवनम् । पञ्चमं रत्नाधिकपरिभवः= गुर्वाचार्यादीनां पराभवकरणम् । षष्ठं स्थविराणां घातचिन्तनम् । सप्तमं भूतानामुपघातचिन्तनम् । अष्टमं प्रतिक्षणं क्रोधकरणम् । नवमं पृष्ठतोsवर्णवादः = परोक्ष आक्षेपवचनम् । दशमं शङ्कितेऽर्थे पुनः पुनर्निश्चित भाषणम् । एकादशमनुत्पन्ननूतनकलहकरणम् 1 द्वादशं पुरातनोपशमितकलढोदीरणम् ।
(१) दवदव- जल्दी जल्दी चलना (२) विना पूँजे चलना, (३) सम्यक् प्रकार पूँजे विना चलना (पूँजना कहीं चलना कहीं), (४) मर्यादा से अधिक पाट पाटला आदि का उपभोग करना, (५) गुरु आदि के साथ अविनयपूर्वक बोलना तथा उनका पराभव करना, (६) स्थविर ( अपने से बडे ) की घात चिन्तन करना, (७) भूतों (जीवों) की घात चिंतन करना, (८) क्षण क्षण क्रोध करना, (९) परोक्ष में अवर्णवाद करना, (१०) शङ्कित विषय में बार बार निश्चयपूर्वक नवीन बोलना, (११) क्लेश उत्पन्न करना, (१२) उपशान्त क्लेश की उदीरणा करना, (१३)
(જ્ઞનાદિ રહિત અપ્રશસ્ત लाववाला स्थान) छे. (१) हवहव (न्सही सही) यादवु. (२) पूल्या विना यथासवु, (3) सभ्य પ્રકારે પૂજ્યા વિના ચાલવું (પૂજવું ક્યાંય અને ચાલવું કયાંય), (૪) મર્યાદાથી વધારે પ્રમાણમાં ૫ટ-પાટલા વગેરેના ઉપભાગ કરવા, (૫) ગુરુ વગેરેની સાથે અવિનયપૂર્વક ખેલવું તથા તેમના પરાભવ કરવા, (૬) સ્થવિર (પેાતાનાથી મેટા)ની ઘાત કરવાનું ચિન્તવન ४२, (७) लूतों (लवोनी) घात अश्वानुं चिंतन १२, (८) क्षणुक्षशुभां द्बोध કરવા, (૯) પરેક્ષમાં અવર્ણવાદ મેલવું, (૧૦) શ ંકા હોય તેવા વિષયમાં વારવાર નિશ્ર્ચયપૂર્વક ખેલવુ, (૧૧) નવો કલેશ ઉત્પન્ન કરવો, (૧૨) ઉપશાન્ત કલેશની ઉદીરણા કરવી, (૧૩) અકાલે સ્વાધ્યાય કરવો, (૧૪) સચિત્ત રજવાળા
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
२३५ त्रयोदशमकाले स्वाध्यायकरणम् । चतुर्दशं सरजस्कचरणेनाऽऽसनादावुपवेशनम् । पञ्चदशं रात्रिषु प्रथमहरोत्तरंमुच्चैः सम्भाषणम् , गृहस्थभाषाभाषणं वा । षोडशं गच्छादिषु भेदोत्पादनम् । सप्तदशं झंझकरणम् गणदुःखदभाषाव्यवहरणम् । अष्टादशं कलहकरणम्येन केनचित् सह विरोधाऽऽचरणम् । एकोनविंशतितमं सूर्योदयादारभ्याऽस्तं यावत्पौनःपुन्येनाऽभ्यवहरणम्। विंशतितममनेषणिकाहारादिसेवनम् ॥ मू० १३ ॥
॥मूलम् ॥ एगवीसाए सबलेहिं ॥सू० १४ ॥
॥ छाया ॥ एकविंशत्या शबलैः ॥ भू० १४ ॥
॥ टीका ॥ यद्वारा चारित्रं शबलं कर्बुरं भवति तानि शबलानि, तेषामेकविंशतिः अकाल में स्वाध्याय करना, (१४) सचित्त रजयुक्त चरणों से आसन आदि पर बैठना, (१५) प्रहररात्रि व्यतीत होने के बाद जोर से बोलना अथवा गृहस्थ जैसी भाषा बोलना, (१६) गच्छ आदि में छेद-भेद करना, (१७) गण को दुख उत्पन्न हो ऐसी भाषा बोलना, (१८) हरेक के साथ विरोध करना, (१९) सूर्योदय से सूर्यास्त तक खाते रहना, (२०) अनेषणिक आहार आदि का सेवन करना। इनके विषयमें अतिचार किया गया हो तो उससे मैं निवृत्त होता हूँ ।। सू० १३ ॥
जिनसे चारित्र शबल (कर्पुर) अर्थात् चारित्र दृषित हो પગ વડે આસન વગેરે પર બેસવું, (૧૫) પ્રહર રાત્રી ગયા બાદ ઊંચા સ્વરથી બેલ-અથવા ગૃહસ્થ જેવી ભાષા બોલવી, (૧૬) ગચ્છ, સંઘ વગેરેમાં છેદ-ભેદ પડાવવો, (૧૭) ગણને દુ:ખ ઉત્પન્ન થાય તેવી ભાષા બોલવી, (૧૮) દરેકની સાથે વિરોધ કરવો, (૧૯) સૂર્યોદયથી લઈ સૂર્યાસ્ત સમય થાય ત્યાં સુધી ભજન કરતા રહેવું; (૨૦) અષણિક આહાર આદિનું સેવન કરવું, આ વિષે જે કંઈ અતિચાર લાગ્યા હોય તે તેમાંથી હું નિવૃત્ત થાઉં છું” (સૂ૦ ૧૩)
જેના વડે ચારિત્ર શબલ-અર્થાત ચારિત્ર દ્રષિત થાય છે તેને “શબલ'
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२३६
आवश्यकमत्रस्य भेदाः, तत्र हस्तकर्मकरणं प्रथमम् (१) अतिक्रमव्यतिक्रमातिचारैथुनसेवन द्वितीयम् , (२) रात्रिभोजनं तृतीयम् (३) आधाकर्म सेवनं चतुर्थम् (४), राजपिण्ड-(नृपतिमुद्दिश्य निष्पादित) ग्रहणं पञ्चमम् (५), द्रव्यादिना साध्वर्थ क्रीतमुद्धारगृहीतमनिच्छतः पुत्रभृत्यादेईस्तादपहृत्याऽन्यसम्बन्धिसाधारणाऽऽहारादिकं ताननापृच्छय स्वकीयमपि स्वस्थानादपहृत्य वा साधवे दीयमानमित्येषां पश्चानां पिण्डानां सेवनं षष्ठम् (६), पुनः पुनः प्रत्याख्यानभञ्जनं सप्तमम् (७), षण्मासाभ्यन्तरे स्वगच्छानिःसृत्य गच्छान्तरगमनमष्टमम् (८), मासाभ्यन्तर उदकत्रयले पसेवनं नवमम् (९) मासाभ्यन्तरे मातृस्थानत्रयसेवनं दशउन्हें 'शबल' कहते हैं, वे इक्कीस (२१) हैं-(१) हस्तकर्म करना (२) अतिक्रम व्यतिक्रम और अतिचार से मैथुन सेवन करना, (३) रात्रि भोजन करना, (४) आधाकर्मी आहार आदिका सेवन करना, (६) राजपिण्ड लेना (६) 'कीयं' (क्रीत)-साधु के निमित्त खरीदे हुए, 'पामिचे' (प्रामित्य)-उधार लिये हुए, 'अच्छिन्नं' (अच्छेद्य)-पुत्र भृत्य आदि के हाथ से छीने हुए, 'अणिसिह' (अनिसृष्टं)=अनेक के हिस्से का आहार आदि उनसे विना पूछे दिये हुए, तथा 'आहट्ट दिनमाणं' (आहृत्य दीयमानं) स्वस्थान से सामने लाकर दिये हुए, आहार
आदि का सेवन करना, (७) प्रत्याख्यान का बारम्बार भंग करना, (८) छह महीने से पहले अपना गच्छ छोड कर दूसरे गच्छ में जाना, (९) एक महीने में तीन बार उदक का लेप लगाना (नदी 53 छ. तसेवा प्रारना छे. (१) स्तम ४२, (२) मातम, व्यतिम अने अतियारथी मैथुन सेवन ४२, (3) त्रि-ant ४२j, (४) आधाभी माडा२ परेनु सेवन ४२j, (५) पिंड य ४२वो. (६) 'कीयं' (क्रीत) साधुना निमित्त मश: ४२सा, 'पामिचे' (पामित्यं) Gधा२ वाघेला, 'अच्छिन्नं (अच्छेध) पुत्र-नौ४२ माहिना यमाथी छीनी सीधेला, 'अणिसिट्ट' ( अनिसृष्टं) અનેક માણસોના ભાગને આહાર વગેરે તેઓને પૂછયા વિના આપેલાં તથા 'आहट्ट दिजमाणं' ( आहृत्य दीयमानम् ) पोताना स्थानथी सामा भावी सावी આપેલા આહાર અદિનું સેવન કરવું, (૭) પ્રત્યાખ્યાનને વારંવાર ભંગ કરવો, (૮) છ માસ પૂર્વે પિતાનો ગચ્છ ત્યજી બીજા ગચ્છમાં જવું, (૯) એક મહિનામાં
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
२३७ मम् (१०), मातृस्थानशब्देनात्र कपट (माया) गृह्यते । शय्यातरपिण्डसेवनमेकादशम् (११), ज्ञात्वा प्राणातिपातकरणं द्वादशम् (१२), ज्ञात्वा मृषावादकरणं त्रयोदशम् (१३), ज्ञात्वाऽदत्ताऽऽदानं चतुर्दशम् (१४), ज्ञात्वा सचित्तपृथिव्युपवेशनादि पञ्चदशम् (१५) स्निग्धपृथिव्यामुपवेशनं षोडशम् (१६), सजीवपीठफलकादिसेवनं सप्तदशम् (१७), मूल-कन्द-स्कन्ध-त्वक्-प्रवालपत्र-पुष्प-फल-बीज-हरितादीनां सेवनमष्टादशम् (१८), संवत्सराभ्यन्तरे दशोदकले पसेवनमेकोनविंशतितमम् (१९) संवत्सराभ्यन्तरे दशमातृम्थानसेवनं विंशतितमम् (२०), सचित्तोदकरजोव्याप्तहस्तादिना दत्तस्याऽऽहारादेः सेवनमेकविंशतितमम् (२१) ॥ सू० १४ ॥
आदि से उतरना), (१०) एक महीने में तीन मातृस्थान (कपट) सेवन करना, (११) शय्यातर पिण्ड का सेवन करना, (१२) जानबूझ कर प्राणातिपात करना, (१३) जानबूझ कर झूठ बोलना, (१४) जानबूझ कर चोरी करना, (१५) जानबूझ कर सचित्त पृथ्वी पर बैठना, (१६) स्निग्ध (गीली) पृथ्वी पर बैठना, (१७) जीव सहित पीठ फलक आदि का सेवन करना, (१८) मूल-कन्दस्कन्ध-स्वक-प्रवाल-पत्र-पुष्प-फल-बीज और हरित, इन दश प्रकार की सचित्त वनस्पति आदि का सेवन करना, (१०) एक वर्ष में दश उदक लेप लगाना, (२०) एक वर्ष में दश मातृस्थान सेवन करना, (२१) सचित्त उदक से भीगे हुए (गीले) हस्तपात्र
ત્રણ વાર પાણીને લેપ લગાડવો (નદી વિગેરે ઉતરવાં), (૧૦) એક માસમાં ३ भातृस्थान (४५८नु) सेवन ४२j, (११) शय्यातरपिंड सेवन ४२j, (१२) Me-मुडीन प्रातिपा1 ४२५ो, (13) सी-समथने असत्य मास, (१४)
-समटने यारी ४२वी, (१५) onel-मुलीने २.यित्त पृथ्वी ५२ मेसयु, (૧૬) પાણીથી ભીંજાએલી જમીન પર બેસવું, (૧૭) જીવ સહિત પીઠફલક વગેરેનું सेवन ४२७, (१८) भूत, ६, २४०५, छास, प्रवास, पत्र, पु.५, ५०, ४ भने હરિત-લીલી આ દસ પ્રકારની સચિત્ત વનસ્પતિનું સેવન કરવું, (૧૯) એક વર્ષમાં દસ पाशीना ५ ॥31, (२०) मे वर्षमा ६स भातृस्थान (७५८) सेवन ४२५i, (२१) સચિત્ત પાણીથી ભીંજાએલા હાથ-પાત્ર આદિથી આપેલા આહાર-આદિનું સેવન
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२३८
आवश्यकसूत्रस्य
॥ मूलम् ॥ बावीसाए परिसहेहि ॥ सू० १५ ॥
॥ छाया ॥ द्वाविंशत्या परिषहैः ॥ मू० १५ ॥
॥ टीका ॥ 'परिसहेहिं' परि=समन्तात् सान्ते क्षम्यन्ते कर्मनिर्जराथै मोक्षार्थिभिरिति परिषहास्तैः, ते यथा क्षुधापरिषहः (१), पिपासापरिषहः (२), शीतपरिषहः (३), उष्णपरिषहः (४), दंशमशकपरिषहः (५), अचेलपरिषडः (६), अरतिपरिषहः (७), स्त्रीपरिषहः (८), चर्या-(बिहार) परिषहः (१), नैषेधिकीपरिषहः (१०), शय्यापरिषहः (११), आक्रोशपरिषहः (१२), वधपरिपहः (१३), याचनापरिषहः (१४), अलाभपरिषहः (१५), रोगपरिषहः (१६), तृणस्पर्शपरिषहः (१७), जल्ल [मल्ल]-परिषहः (१८), 'सत्कारपुरस्कारआदि से दिये हुए आहार आदि का सेवन करना, इनसे जो अतिचार हुआ हो तो उससे मैं निवृत्त होता हूँ ॥सू० १४॥
मोक्षार्थी जिन्हें कर्मों की निर्जरा के लिये सहन करते हैं उन्हें 'परिषह' कहते हैं वे बाईस है
(१) क्षुधा, (१) पिपासा, (३) शीत, (४) उष्ण, (५) दंशमशक, (६) अचेल, (७) अरति, (८) स्त्री, (९) चर्या (चलना), (१०) नषेधिकी (बैठना), (११) शय्या, (१२) आक्रोश, (१३) वध, (१४) याचना, (१५) अलाभ, (१६) रोग, (१७) तृणस्पर्श, (१८) मल, (१९) सत्कारपुरस्कार, (२०) प्रज्ञा, (२१) अज्ञान, (२२) કરવું,-એ સર્વથી જે કઈ અતિચાર લાગ્યા હોય તે તેમાંથી હું નિવૃત્ત થાઉં છું.' (सू० १४)
મોક્ષાથી જો કર્મોની નિર્જરા કરવા માટે જે સહન કરે છે. તેને 'परिष' . मने परिपड मावीस-२२ ॥२॥ छ (१) क्षुधा भूम, (२) पिपासा (तृषा), (3) शीत (62), (४) Gey (५), (५) शमश: () (भ-७२), (६) अयेस, (७) मति, (८) श्री, (e) यर्या (यासत), (१०) नैघिी (स), (११) शय्या, (१२) Bha, (१३) १५, (१४) यायना (१५) men, (१६) रोग, (१७) तृपस्पश, (१८) मत, () सा२५२२४१२, (२०) प्रज्ञा,
१- अत्र सत्कारो वस्त्रादिना, पुरस्कारचाभ्युत्थानादिना ।
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम् -४
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परिषद ः (१९), प्रज्ञापरिषहः (२०), अज्ञान परिषदः (२१), दर्शनपरिषह - (२२) श्रेति, सम्बन्धस्तु यो मयेत्यादिनैव सर्वत्रेति प्रागुक्तं न विस्मर्त्तव्यम् ।। मृ० १५ ।। ॥ मूलम् ॥
तेवीसाए सूअगडज्झयणेहिं । चउवीसाए देवेहिं । पणवीसाए भावणाहिं । छव्वीसाए दसाकप्पववहाराणं उद्देसणकालेहिं । सत्तावीसाए अणगारगुणेहिं ॥ सू० १६ ॥
॥ छाया ॥
त्रयोविंशत्या सूत्रकृताध्ययनैः । चतुर्विंशत्या देवैः । पञ्चत्रिंशत्या भावनाभिः । षडविंशत्या दशाकल्पव्यवहाराणा मुदेशन कालैः । सप्तत्रिंशत्याऽनगारगुणैः ॥ ४० १६ ॥ ॥ टीका ॥
' तेवी०' इति । मृत्रकृताङ्गप्रथम श्रुतस्कन्धस्य षोडशाध्ययनानि प्रागुकानि तद्व्यतिरिक्तानि च द्वितीयश्रुतस्कन्धस्य पुण्डरीकाध्ययन- क्रियास्थानाध्ययना-ऽऽहारपरिज्ञाध्ययन-प्रत्याख्यानक्रियाध्ययना - ऽऽचारश्रुताध्ययना-ऽऽर्द्रकाध्ययन - नालन्दीयाध्ययनानि सप्तेति मिलित्वा त्रयोविंशतिः सूत्रकृताध्ययनानि तैः । दर्शन । इन परिषहों को सम्यक् प्रकार न सहने से जो अतिचार किया गया हो 'तो उससे मैं निवृत्त होता हूँ' ॥ सू० १५ ॥
सूत्रकृतांग के प्रथम श्रुतस्कन्ध के पूर्वोक्त सोलह (१६) अध्ययन और द्वितीय श्रुतस्कन्ध के (१) पुण्डरीक, (२) क्रियास्थान, (३) आहारपरिज्ञा, (४) प्रत्याख्यानक्रिया, (५) आचारश्रुत, (६) आर्द्रकुमार और (७) नालन्दीय, ये सात मिलाकर तेईस अध्ययनोंमें श्रद्धा प्ररूपणा आदि की न्यूनाधिकतासे, तथा दस भवनपनि, आठ (२१) अज्ञान, (२२) हर्शन, मा जावीस परिषहोने सभ्य - इडा કરવાથી જે કાંઇ અતિચાર લાગ્યા હોય તે તેમાર્થી હું નિવૃત્ત થાઉં છું ( સૂ॰ ૧૫ ) સૂત્રકૃતાંગના પ્રથમ શ્રુતસ્કંધના પૂકત ૧૬ (સેલ) અધ્યયન અને श्री श्रुतसन्धनां (7), पुंडरीड (२) द्वियास्थान, अत्याख्यान डिया, (५) मायारश्रुत, (६) सांदकुमार सने સાત અધ્યયન મેળવીને કુલ તેવીશ (૧૩) અધ્યયનામાં न्यूनाधिताथी, तथा દસ ભવનપતિ, આઠે વ્યંતર, પાંચ
પ્રકારે સહન ન
(3) आहारपरिज्ञा, (४)
(७) नासदीय, या શ્રદ્ધાપ્રરૂપણા-વગેરેની યાતિષી અને એક
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आवश्यकसूत्रस्व ‘चउवीसाए देवेहि' दश भवनपतयः, अष्टौ व्यन्तराः, पश्च ज्यौतिषिकाः, एको वैमानिकः, इति मिलित्वा चतुर्विंशतिर्देवास्तैः, अथवा चतुर्विंशतितीर्थकरैः । 'पणवीसाए भावणाहिं' भाव्यते-गुणैर्वास्यते आत्मा याभिरिति, भाव्यन्ते अभ्यस्यन्ते कर्ममलक्षालनाथै मुमुक्षुभिरिति वा भावनाः-ईर्या-मनो-वचन-षणा-ऽऽदाननिक्षेपरूपाः पञ्च प्रथममहाव्रतस्य (१)। आलोच्य संभाषणं क्रोध-लोभ-भयहास्येष्वनृतविवर्जनश्चेति पत्र द्वितीयमहाव्रतस्य (२)। अष्टादशविधशुद्धवसते
चिनापूर्वक सेवनं प्रतिदिनमवग्रहं याचित्वा तृणकाष्ठादिग्रहणं, पीठफलकाद्यर्थ• व्यन्तर, पाच ज्योतिषी और एक वैमानिक, इन चौबीस प्रकार के
देवों की अथवा चौवीस तीर्थंकरों की आशातना से जो अतिचार लगा हो तो उससे मैं निवृत्त होता है।
जिसके द्वारा आत्मा गुणयुक्त होता है अथवा कर्ममल धोने के लिये मोक्षार्थी जिसका अभ्यास करते हैं, उसे भावना कहते हैं। प्रत्येक महाव्रतकी पाच पाँच भावनाएँ होने से वे सब मिलकर पचीस हैं। उनमें पहले महाव्रत की पांच भावना-(१) ईर्या, (२) मन, (३) वचन, (४) एषणा, (५) आदाननिक्षेप । दुसरे महाव्रतकी पाँच भावना-(६) विचार कर बोलना, (७) क्रोध, (८) लोभ, (१) भय, (१०) हास्यवश असत्य नहीं बोलना। तीसरे महाव्रतकी पाँच भावना-(११) अठारह प्रकार के शुद्ध स्थानकी याचना करके सेवन करना, (१२) प्रतिदिन तृण काष्ठादिका अवग्रह लेना, (१३) વૈમાનિક, આ ચેવીશ પ્રકારના દેવોની અથવા તે ચોવીશ તીર્થકરની આશાતનાથી જે અતિચાર લાગ્યા હોય તે તેમાંથી હું નિવૃત્ત થાઉં છું.
જેના દ્વારા આત્મા, ગુણયુકત થાય છે, અથવા કર્મમલ દેવા માટે મેક્ષાથી જીવો જેને અભ્યાસ કરે છે તેને ભાવના કહે છે; પ્રત્યેક મહાવ્રતની પાંચ-પાંચ ભાવનાઓ હોવાથી તે સર્વે મળીને કુલ પચીસ ભાવના થાય છે તેમાં પહેલા મહાવ્રતની पांय भावना (१) ध्र्या, (२) भन, (3) पयन, (४) मेषा , (५) माहाननि:५. भी महानतनी पांय भावना (6) पियारी नाम, (७) अध, (८) साल, (e) भय, (१०) हास्यवश असत्य न सत. श्री महाव्रतनी पांय नाना(૧૧) અઢાર પ્રકારના શુદ્ધ સ્થાનની યાચના કરીને સેવન કરવું, (૧૨) પ્રતિદિન
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वजन,स्त्र्य
मुनितोषगी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
२४१ मषिवृक्षादीनामच्छेदनं, साधारणपिण्डस्याधिकतो न सेवनं, साधुवैयावृत्त्यकरणं चेति पञ्च तृतीयमहाव्रतस्य (३)। स्त्री-पशु-पण्डकरहितवसतिसेवनं, स्त्र ङ्गोपाङ्गाऽनवलोकन, पूर्वकृतसुरतरतेरस्मरणं, प्रतिदिनं भोजनपरित्यागश्चेति पश्च चतुथमहावतस्य (४)। प्रशस्ताऽप्रशस्त शब्द-रूप-गन्ध-रस-स्पर्शषु रागद्वेषवर्जनं, शब्दादिभेदात्पश्च पश्चममहाव्रतस्ये (५) ति मिलित्वा पञ्चविंशतिर्भावनास्ताभिः। 'दसा-काप-ववहाराणं' दशा-कल्प-व्यवहाराणां दशाश्रुतस्कन्ध-बृहत्कल्प-व्यवहारमूत्राणां यथाक्रमं दश-षड्-दशसंख्यकाध्ययनयुक्तानाम् 'उद्देसणकाले हिं' उद्देशनकालैः पठनसमयैः । 'सत्तावीसाए' सप्तविंशत्या, 'अणगारगुणेहिं' अविद्यमानपीठ फलक आदि के लिए भी वृक्षादि को नहीं काटना, (१४) साधरण पिण्डका अधिक सेवन नहीं करना, (१५) साधुकी वैयावृत्य (वेयावच्च) करना । चौथे महाव्रत की पाँच भावना-(१६) स्त्री-पशु-पण्डक-रहित स्थानका सेवन करना, (१७) स्त्रीकथा वर्जन करना, (१८) स्त्रियों के अंगोपांगका अवलोकन नहीं करना, (१९) पूर्वकृत काम भोगका स्मरण नहीं करना, (२०) प्रतिदिन सरस भोजन का त्याग करना। पाँचवे महाव्रत की पाँच भावना- (२१) इष्टानिष्ट शब्द, (२२) रूप, (२३) गन्ध, (२४), रस, और (२५) स्पर्शमें राग-द्वेष नहीं करना । इन पच्चीस भावनाओं के विषयमें तथा दशाश्रुतस्कन्ध के दस, बृहत्कल्पके छह और व्यवहारसूत्र के दस, इन छब्बीस अध्ययनों के पठनकालमें, और जिनके द्रव्यसे-मिट्टी आदिका बना हुआ તૃણ-કોઠાદિનું અવગ્રહ લેવું. (૧૩) પીઠ ફલક આદિ માટે પણ વૃક્ષને કાપવું નહિ તે, (૧૪) સાધારણ પિંડનું અધિક સેવન કરવું નહિ તે, (૧૫) સાધુના पेयावृत्त्य (वैया१२५) ४२वी. याथा भावती पांय भावना- (१६) श्री-पशु-५/રહિત સ્થાનકનું સેવન કરવું, (૧૭) સ્ત્રીકથા વર્જન કરવું, (૧૮) સ્ત્રીઓના અંગેપાંગનું અવલોકન નહિ કરવું, (૧૯) પૂર્વકૃત કામગનું સ્મરણ નહિ કરવું, (૨૦) પ્રતિદિન સરસ ભેજનને ત્યાગ કરે. પાંચમાં મહાવ્રતની પાંચ ભાવના(२१) ४ानिट थप, (२२) ३५, (२3) 114, (२४) २४ भने (२५) स्पर्शमा રાગ-દ્વેષ નહિ કરે. આ પચીશ ભાવનાઓના વિષયમાં તથા દશાશ્રુતસ્કંધના દશ, બૃહત્ક૯પના છે અને વ્યવહારસૂત્રના દસ, આ છવ્વીસ અધ્યયનને પઠન
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२४२
भावश्यकसूत्रस्थ मगारं-द्रव्यतो गृह भावतः कषायमोहनीयं येषां तेऽनगाराः साधवस्तेषां गुणाः= पञ्चमहाव्रतानि, पश्चेन्द्रियनिग्रहाः, चत्वारः क्रोधादिविवेकाः, अन्तरास्मशुदिसञ्जातं भावसत्यं, प्रत्युपेक्षणादिक्रियायामुपयुक्तत्वं करणसत्यं, योगानां मनादीनां यथार्थत्वं योगसत्यमिति भाव-करण-योगसत्यानि त्रीणि, क्षमैका, विरागिका पसिद्धे इमे, अकुशलानां मनो-चाक्कायानां निरोधात्रयः, ज्ञान-दर्शन-चारित्रसम्पन्नतास्तिस्रः, शीतादिवेदनासहिष्णुत्वमेकं, मारणान्तिकोपसर्गसहनशीलता चैकेति सङ्कलनेन सप्तविंशतिरनगारगुणास्तैः ॥ मू० १६ ॥
॥ मूलम् ॥ अट्ठावीसाए आयारप्पकप्पेहि। एगणतीसाए पावसुयप्पसंगेहिं ॥सू० १७ ॥ अगार (घर) और भावसे-कषायमोहनीयरूप अगार नहीं है उन अनगार के (१-५) पाच महाव्रत, (६-१०) पाँच इन्द्रियनिग्रह, (११-१४) चार कषायजय, (१५) भावसत्य (अन्तरात्मशुद्धि), (१६) करणसत्य (प्रतिलेखनादि क्रिया में उपयोग), (१७) योगसत्व (शुद्धमार्गमें मनयोग आदि की प्रवृत्ति करना), (१८) क्षमा, (१९) विरागिता-वैराग्य, (२०) अप्रशस्त मन (२१) वचन (२२) काय का निरोध, (२३) सम्यग् दर्शन, (२४) ज्ञान, (२५) चारित्र से युक्तता, (२६) शीत आदि वेदना का सहना, और (२७) मारणान्तिक उपसर्ग सहना । इन सत्ताईस अनगार गुणों के विषय में जो कोई अतिचार किया गया हो तो उससे मैं निवृत्त होता हूँ ॥ सू० १६ ॥ સમયમાં, અને જેના દ્રવ્યથી-માટી આદિનું બનેલું મકાન (ઘર) અને ભાવથી-કપાય મેહનીય રૂ૫ અગાર નથી તે અણગારના (૧-૫) પાંચ મહાવ્રત (૬-૧૦) પાંચ छन्द्रियनिग्रड (11-१४) यार षाय-जय, (१५) नासत्य (अन्तरात्मशुबि), (१६) ४२सत्य (प्रतिमनाहि यामां 6पयोग), (७) योगसत्य (Y भाभी मनाया माहिनी प्रवृत्ति ४२वी), (१८) क्षमा, (१) वैराश्य, (२०) मप्रशस्त मन, (२१) १यन भने (२२) यानु नि, (२३) सभ्यहन, (२४) જ્ઞાન અને (૨૫) ચારિત્રથી યુક્તતા, (૨૬) શીત આદિ વેદનાઓનું સહન કરવું અને (૨૭) મરણાન્તિક ઉપસર્ગ સહન કરે. આ સત્તાવીશ અણુગારના ગુણોના વિષયમાં જે કઈ અતિચાર લાગ્યા હોય તે તેમાંથી હું નિવૃત્ત થાઉ છું. (સૂ૦ ૧૬)
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२४३ पुनितोषणी टीका, अतिक्रमणाध्ययनम्-४
॥ छाया ॥ अष्टाविंशत्याऽऽचारप्रकल्पैः । एकोनत्रिंशता पापश्रुतमसङ्गैः ॥ सू० १७॥
॥ टीका ॥ 'अट्ठावीसाए' अष्टाविंशत्या, 'आयारप्पकप्पेहि' आचार: आचाराहं पञ्चविंशत्यध्ययनात्मकं, तत्र (१) शस्त्रपरिज्ञा-(२) लोकविजय-(३)शीतोष्णीय-(४) सम्यक्त्व-(५) लोकसार-(६) धूत-(७) विमोक्षो-(८) पधानश्रुत-(९) महापरिज्ञारूपाध्ययननवकः प्रथमश्रुतस्कन्धः, (१-२) पिण्डैषणा-शय्ये-(३) --(४) भाषा-(५) वस्त्रैषणा-(६-७) पात्रैषणाऽवग्रहपतिमाः, (6) स्थानमौकिका (९) नैषेधिकीसप्तैकिका (१०) उचारमस्रवणसप्तैकिका (११) शब्दसप्तैकिका (१२) रूपसप्तैकिका (१३) परक्रियासप्तैकिका (१४)
आचारांग के दो श्रुतस्कन्ध हैं, उनमें प्रथम के नव अध्ययन हैं-(१) शस्त्रपरिज्ञाध्ययन (२) लोकविजयाध्ययन, (३) शीतोष्णनामाध्ययन, (४) सम्यक्त्वनामाध्ययन, (५) लोकसाराध्ययन, (६) धूताध्ययन, (७) विमोक्षाध्ययन, (८) उपधानश्रुताध्ययन, (९) महापरिज्ञाध्ययन । द्वितीय श्रुतस्कन्ध के सोलह-(१) पिण्डैषणाध्ययन, (२) शय्याध्ययन, (३) ईर्याध्ययन, (४) भाषाध्ययन, (५) वस्लेषणाध्ययन, (६) पात्रैषणाध्ययन, (७) अवग्रहप्रतिमाध्ययन, (८) स्थानसप्तैकिकाध्ययन, (९) नैषेधिकीसप्तैकिकाध्ययन, (१०) उच्चारप्रस्रवणसप्तैकिकाध्ययन, (११) शब्दसप्तैकिकाध्ययन, (१२) रूपसप्तैकिकाध्ययन, (१३) परक्रियासप्तैकिकाध्ययन, (१४) अन्योन्य
मायाशंगना ने श्रुत३४५ छ, तभी प्रयभना न अध्ययन छ. (१) शव परिज्ञाप्ययन (२) विजयाध्ययन (3) शीनामाध्ययन, (४) सभ्यत्वनामाप्ययन, (५) सध्ययन, (६) धूताध्ययन (७) विमोक्षाध्ययन, (८) ઉપધાનશ્રાધ્યયન, (૯) મહાપરિણાથયન. દ્વિતીય શ્રુતસ્કંધના સેળ અધ્યયન छे-(१) पिपाययन (२) शय्या, (3) र्या, (४) भाषा, (५) क्ष मा, (६) पाषा (७) अप्रतिमाध्ययन, (८) स्थानसययन, (6) नवधिही. સતૈકિકાશ્ચયન (૧૦) ઉચારપ્રસવણસતૈકિકાધ્યયન (૧૧) શબ્દસપ્તકિકાધ્યયન (૧૨) રૂપસપ્તકિકાયયન (૧૩) પક્રિયાસપ્તકિયયન (૧૪) અન્ય ક્રિયા
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आवश्यकमुत्रस्थ अन्योन्यक्रियासप्तैकिका, (१५) भावना, (१६) विमुक्तिश्चेति षोडशाध्ययनात्मको द्वितीयश्रुतस्कन्धः, इति मिलित्वा पञ्चविंशतिरध्ययनानि, प्रकल्प:-प्रकृष्टः कल्पः स (१-२) चोद्घाताऽनुद्घाता-ऽऽ--(३) रोपणारूपाध्ययनत्रयात्मकनिशीथापरनामक इति सकल' सङ्कलनयाऽष्टाविंशतिरध्ययनानि, तथा चाऽऽचारपदेन पञ्चविंशतेरध्ययनानां, प्रकल्पपदेन च त्रयाणामध्यनानां ग्रहणमभिप्रेत्य आचाराश्च प्रकल्पाश्चेति द्वन्द्वेनाऽऽचारप्रकल्पास्तैरिति बहुवचनमुक्तम् ॥ ___'एगूणतीसाए' एकोनत्रिंशता, ‘पावसुयप्पसंगेहि' पातयन्त्यात्मानं दुर्गताविति पापानि, श्रूयन्ते गुरुमुखादिति श्रुतानि-शास्त्राणि, पापानिपापरूपाणि
श्रुतानि, पापश्रुतानि तेषां प्रसङ्गाः तद्विवेचनरूपास्तदभ्यसनरूपा वा पापश्रत· प्रसङ्गास्तैः, तत्र पापश्रुतानि यथा-भौमोत्पातस्थमा-ऽन्तरिक्षाङ्ग-स्वर-व्यञ्जनक्रियासप्तैकिकाध्ययन, (१५) भावनाध्ययन, (१६) विमुक्ताध्ययन, इस प्रकार दोनों मिलाकर पच्चीस अध्ययन हुए, और निशीथ के तीन-(१) उद्धात, (२) अनुद्धात, (३) आरोपणा, इन अट्ठाईस अध्ययनों की श्रद्धा प्ररूपणा आदिमें जो कोई अतिचार किया गया हो 'तो उससे मैं निवृत्त होता है।
आत्मा को दुर्गति में डालनेवाले को 'पाप' कहते हैं, जो गुरुमुख से सुना जाय उसे 'श्रुत' कहते हैं, और पापरूप श्रुत को ‘पापश्रुत' कहते हैं, वह उन्तीस प्रकार का है-(१) भौमभूकम्प आदि के फल का प्रतिपादक शास्त्र, (२) उत्पात-अपने आप સપ્તકિક યયન (૧૫) ભાવનાધ્યયન, (૧૬) વિમુકતધ્યયન. એ રીતે બન્ને મળીને ५या। अध्ययन च्या, भने निशीथना तय (१) धात, (२) अनु६धात, (3) मा२।પણ. એ પ્રમાણે એ અઠાવીશ અધ્યયનેની શ્રદ્ધા પ્રરૂપણા આદિમાં જે કાંઈ અતિચાર લાગ્યા હોય “તે તેમાંથી હું નિવૃત્ત થાઉં છું.
- આત્માને દુર્ગતિમાં નાખનાર ક્રિયા તેને પાપ કહે છે. જે ગુના મુખથી સાંભળવામાં આવે તેને “શ્રુત” કહે છે અને પાપરૂપ શ્રુતને “પાપશ્રુત” કહે છે. તે ઓગણત્રીશ પ્રકારના છે. (૧) ભૌમ-ભૂકમ્પ વગેરેના ફલને કહેનારાં શાસ્ત્ર. (२) ५.त-पातानी भेगे-पुरती शत यनारी-सहानी वृष्टिन ने नातं
१- सकल '-आचार-प्रकल्पयोरुभयोरिति भावः ।
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
२४५ लक्षणरूपाण्यष्टौ। प्रत्येक मूत्र (मूल)-वृत्ति (टीका)-वानिक-(आकाक्षिकदेशपूरण) भेदाच्चतुर्विंशतिः, विकथानुयोग-विद्यानुयोग-मन्त्रानुयोग-योगानुयोगा-ऽन्यतैर्थिकप्रवृत्तानुयोगाश्चेति मिलित्वा एकोनविंशत् । तत्र भौमभूकम्पादिफलप्रतिपादकं शास्त्रम् । उत्पातं स्वाभाविकरुधिरवृष्टयादिफलप्रतिपादकम् । 'स्वप्न स्वमफलपतिपादकम् । अङ्गम् अङ्गस्फुरणादिफलपतिपादकम् । स्वरं जीवाजीवगतस्वरफलप्रतिपादकम् । व्यज्यतेऽनेनेति व्यञ्जन-चिह्न, तत्सम्बन्धाच्छास्त्रमपि व्यञ्जनं, तच्च जन्मोत्तरकालजायमानशरीरस्थतिलमषाऽऽदिचिह्नविशेषशुभाशुभफलमूचकम् । लक्षणं-शरीरसहजातमानोन्मानप्रमाणादिफलाभिधायकम् । इत्येवं चतुर्विशतिः । तथा विकथानुयोगः कामोपायप्रतिपादकानि वात्स्यायनप्रणीतहोनेवाली मधिर आदि की वृष्टि के फल का कहनेवाला शास्त्र, (३) स्वप्न-स्वप्नफलप्रतिपादक शास्त्र, (४) अन्तरिक्ष-आकाश में ग्रहयुद्ध आदि के फलका सूचक शास्त्र, (५) अंग फडकने के फल का सूचक शास्त्र, (६) स्वर--जीव आदि के स्वर के फल का प्रदर्शक शास्त्र, (७) व्यत्रन-शरीर के तिल, मष आदि के फल का बोधक शास्त्र, (८) लक्षण-शरीर के साथ होने वाले मान उन्मान और प्रमाण के फलका प्रतिपादक शास्त्र ये आठ, सूत्र (मूल), वृत्ति (अर्थ) और वार्तिक (आकाक्षित अर्थ की पूर्ति) ऐसे एक एक के तीन तीन भेद होने से आठत्रिक गैबीस हुए। (१) विकथानुयोग-कामोद्दीपकशास्त्र वात्स्यायन प्रणीत कामसूत्र आदि, (२) शत्र. (3) सन-२११३सानु प्रतिपाहन ४२नारा शख. (४) सन्तरिक्ष-म:શમાં ગૃહયુદ્ધ આદિના ફલને જણાવનારૂં શાસ્ત્ર. (૫) અંગ ફરકે તેનું ફળ જણાવનારૂં શાસ્ત્ર. (૬) સ્વર-જીવ આદિના સ્વરના ફળને જણાવનારૂં શાસ્ત્ર (૭) વ્યજન-શરીરમાં તિલ, મસા આદિના ફલને જણાવનારૂં શાસ્ત્ર. (૮) લક્ષણ-શરીરના સાથે થવાવાળા માન ઉન્માન અને પ્રમાણુના ફલને જણાવનારૂં શાસ્ત્રએ આઠ सूत्र ( भूत ), वृत्ति ( अर्थ ) भने पति ( भाक्षित अर्थनी पत्ति) से प्रभार એક-એકના ત્રણ-ત્રણ ભેદ હોવાથી ત્રણ અઠ્ઠ ચાવીશ થાય છે, (૧) વિકથાનુयोग-मादी५४॥२-वाल्यायन २यित मसूत्रा, (२) विधानुयोग
१-स्वप्नः स्वप्नसम्बन्धिफलाफलविषयोऽस्मिन्नस्तीति स्वमम् , अर्श आदित्वान्मत्वर्थीयोऽच्प्रत्ययस्तेन 'स्वप्र' इति जातम् ।
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आवश्यकमूत्रस्य कामसूत्रादीनि, विद्यानुयोगः रोहिण्यादिविद्यासाधनोपायप्रदर्शकानि शास्त्राणि । मन्त्रानुयोगः भूतपिशाचादिसाधकमन्त्रप्रतिपादकानि शास्त्राणि । योगाऽनुयोगः= वशीकरणादिविधिबोधकानि हरमेखलादियोगप्रतिपादकानि शास्त्राणि । अन्यतैर्थिकमवृत्तानुयोगः अन्ये च ते तैर्थिकाः अन्यतैथिकाः कापिला (साङ्ख्या) दयस्तेभ्यः प्रवृत्त: अन्यतैर्थिक वृत्तः स चासावनुयोग: स्वकीयाऽऽचारवस्तुतत्वानां विचारविशेषस्तत्करणार्थ शास्त्रसन्दर्भोऽपि तथा 'गृहा दारा' इतिवदिति । सम्बन्धस्तु 'यो मयाऽतिचारः कृतः' इत्यादिनामागुतवदेवेति बहुश उनमस्मामिः।।म्० १७॥
॥ मूलम् ॥ तीसाए मोहणीयहाणेहि ॥ सू० १८ ॥
॥ छाया ॥ त्रिंशता मोहनीयस्थानः ॥ मू० १८ ॥
॥ टीका ॥ 'तीसाए' त्रिंशता-त्रिंशत्संख्यकैः, 'मोहणीयहाणेहिं' अत्र मोहविद्यानुयोग-रोहिणी आदि विद्या के साधन के उपाय का प्रदर्शक शास्त्र, (३) मन्त्रानुयोग-भूतपिशाच आदि के साधक मन्त्रों के शास्त्र, (४) योगानुयोग-वशीकरण आदि का बोधक, तथा हरमेखलादियोगप्रतिपादक शास्त्र; (५) अन्यतैर्थिकप्रवृत्तानुयोग-कपिल आदि के बनाये हुए सांख्य आदि शास्त्र, इनकी श्रद्धा प्ररूपणा आदि करने से जो अतिचार किया गया हो तो उससे मैं निवृत्त होता हूँ' ॥ सू० १७ ॥
जो सामान्य रूप से आठ कोंके और विशेषरूप से આદિ વિધા આદિના સાધનાના ઉપાયનું દર્શન કરાવનારૂં શાસ્ત્ર, (૩) મંત્રાનુયોગ- ભૂત પિશાચ આદિના સાધક મંત્રનું શાસ્ત્ર. (છ યેગાનુયેગ-વશીકરણ આદિનો બંધ કરાનારૂં શાસ્ત્ર, તથા હર–મેખલાદિ વેગ પ્રતિપાદન કરનારૂં શાસ્ત્ર. (૫) અન્યતૈર્થિક પ્રવૃત્તાનુગ-કપિલ આદિના બનાવેલા સાંખ્યાદિ શાસ્ત્ર, તેની શ્રદ્ધા-પ્રરૂપણાદિ કરવાથી જે કઈ અતિચાર લાગ્યા હોય તે તેમાંથી હું निवृत्त या छु.' (सू० १७) ।
જે સામાન્ય રૂપથી આઠ કર્મોના અને વિશેષરૂપથી મોહનીય કર્મના
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
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नीयशब्देन सामान्यतोऽष्टविधं कर्म विशेषतश्चाष्टविधकर्मान्तर्गतं चतुर्थ कर्म, तस्य स्थानानि = निमित्तानि मोहनीयस्थानानि = मोहनीयकर्मबन्धनजनकानीत्यर्थस्तैः । सम्बन्धस्तु यथापूर्वम् । तत्र त्रिंशत्स्थानानि यथा - (१) जले ब्रोडभित्वा स्त्रीपुरुषादि - सजीवानां हननम्, (२) श्वासावरोधेन हननम्, (३) अग्निधूमप्रयोगेण हननम्, (४) प्रकृष्टमहार पूर्व कमस्त कस्फोटनेन हननम्, (५) आईचर्मणा शिरोवेष्टयित्वा हननम्, (६) उन्मत्तादीन् मातुलुङ्गादिफलादिभिः पौनःपुन्येन वो पहसनम्, यद्वा तस्करमहासाहसिकादिवच्छलेन निर्जने वने नीत्वा हननम्, (७) गूढमायाचारित्वं - मायया मायाऽऽच्छादनं सूत्रार्थगोपनं वा, (८) स्वात्मकृतस्य ऋषिघाताच कृत्यस्यान्यस्मिन्नारोपणम्, (९) सदसि मिश्रभाषासंभाषणम्, (१०) भूपस्यार्थाऽऽगमद्वारमत्रध्रुय तद्द्वारा राज्यादेः स्वायत्तीकरणम्,
मोहनीय कर्म के बन्ध का कारण है, उसे 'महामोहनीयस्थान' कहते हैं, उसके तीस भेद हैं- (१) त्रसजीव स्त्रीपुरुष आदि पञ्चेन्द्रियों को पानी में डुबार कर मारना, (२) श्वास आदि को रोक कर मारना, (३) अग्नि धूम आदि के प्रयोग से मारना, (४) लट्ठ आदि से शिर फोड कर मारना, (५) गीले चमडे से सिर बांध कर मारना, (६) पागल को नीबू आदि से मारकर हँसना, या चोर डाकुओं की तरह छल से निर्जन स्थान में लेजाकर मारना, (७) कपट में कपट करना अथवा सूत्र और अर्थको छिपाना, (८) अपने किये हुए ऋषिघातादि के पापका दूसरे पर आरोप करना, (९) सभा में मिश्र भाषा बोलना, (१०) राजा की आमदनी आदि
બંધનુ કારણ છે તેને મહામેાહનીય સ્થાન કહે છે, તેના ત્રીશ ભેદ છે. (૧) ત્રસજીવ સ્ત્રી-પુરૂષ આદિ પંચેન્દ્રિય જીવાને પાણીમાં ડુબાવી ડુબાવીને भारवां. (२) श्वास वगेरे रोडीने भारवां (3) अग्नि, धूमाडा वगेरेना प्रयोगथी મારવાં તે. (૪) લાઠી આદિથી માથુ ફાડીને મારવુ, (૫) લીલા ચામડાથી માથુ ખાંખીને મારવુ. (૬) ગાંડા માણસને લિંબુના ફળ વડે મારીને હસવું, અગર ચાર– ડાકુની પ્રમાણે છલ-કપટ કરી વગડામાં લઈ જઈને મારવું, (૭) ૪૫૮માં કપટ કરવું અથવા સૂત્ર-અર્થને છુપાવવું. (૮) પોતે કરેલા ઋષિઘાતાદ્ધિ પાપના ખીજા ઉપર આરોપ મૂકવા (૯) સભામાં મિશ્રભાષા ખેલવી (૧૦) રાજાની
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आवश्यकमुत्रस्व
(११) अकुमारब्रह्मचारिणः सतोऽपि ' अहमस्मि कुमारब्रह्मचारी ' - विभाषणम्, (१२) मैथुनादनिवृत्तस्य सतोऽपि 'ब्रह्मचार्यह' - मिति संभाषणम्, (१३) यदवलम्बनेन बृद्धिमुपगतस्तस्यैव विभूतिषु प्रलोभः, (१४) यैः पौरजनैर्यः स्वामिपदे समारोपितस्तेन तेषामनिष्टकरणम्, (१५) स्वीयाण्डसमृहस्य नागिन्येव स्वामिनो व्यभिचारिण्या पत्न्येव पोषयितू राजादेर्दुः सचिवादिनेवाऽऽश्रयस्ब स्वेन हननम्, (१६) एकदेशाधिपतेर्घातचिन्तनं घातो वा, (१७) अनेक देशाधिपतेर्बहुजननायकस्य, हेयोपादेयवस्तुनिरूषकधार्मिक पुरुषस्य वा घातचिन्तनं घातो वा, (१८) प्रव्रज्यादिग्रहणरूपधर्मार्थमुद्यतस्य पुरुषस्य धर्मादे
रोककर उसके राज्य आदि को अपने अधिकार में करना, (११) बालब्रह्मचारी न रहने पर भी अपने को बालब्रह्मचारी कहना, (१२) ब्रह्मचारी नहीं और ब्रह्मचारी नाम धराना, (१३) जिसके आश्रय से उन्नत हुआ हो उसीकी जड काटना, (१४) जिस जनसमुदाय से उच्च अधिकार पाया हो उसीका अनिष्ट करना, (१५) जैसे सर्पिणी अपने अण्डेका, व्यभिचारिणी स्त्री अपने पतिका और दुष्ट मन्त्री अपने राजाका संहार करते हैं उसी प्रकार अपने रक्षक का विनाश करना, (१६) एक देशके स्वामी राजा का घानचिन्तन करना, या घात करना, (१७) अनेक देशके स्वामी राजा, या जनसमुदाय के नायक, अथवा धर्मात्मा पुरुष का घातचिन्तन करना या घात करना, (१८) प्रव्रज्या लेने के लिये उद्यत આમદાના વગેરે રેકીને તેના રાજ્યને પોતાના કબજામાં લેવું, (૧૧) ખાલબ્રહ્મચારી ન હોવા છતાંય પેાતાને માલબ્રહ્મચારી કહેવરાવવું, (૧૨) બ્રહ્મચારી ન હાય અને બ્રહ્મચારી કહેવરાવવુ. (૧૩) જેના આશ્રયે પોતાની ઉન્નતિ થઇ હાય તેજ માણસના મૂળ કાઢવાં તે, (૧૪) જે માણસના સમુદાયથી ઉચ્ચ અધિકાર મળ્યે હોય તેનું જ અનિષ્ટ કરવું. (૧૫) જેવી રીતે સર્પિણી પેતાના ઇંડાનેા, વ્યભિચારિણી શ્રી પાતાના પતિને અને દુષ્ટ મંત્રી પોતાના રાજાના સંહાર કરે છે, તે પ્રમાણે પોતાના રક્ષકના વિનાશ કરવા. (૧૬) એક દેશના સ્વામી રાજાને ઘાત ચિતવવે અથવા ઘાત કરવા. (૧૭) અનેક દેશના સ્વામી રાજા, અથવા અથવા ધર્માત્મા પુરુષનાં ઘાતનું ચિન્તવન કરવું, અગર જનસમુદાયના નાયક તે ઘાત કરવા. (૧૮) પ્રત્રજ્યા લેવા તૈયાર થએલા પુરુષના પરિણામને પાછા
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम् - ४
शनम्, (१९) वीतरागावर्णवादकरणम्, (२०) मोक्षमार्गस्यापकरणमवर्णत्रादकरणं वा, (२१) येभ्य आचार्योपाध्यायेभ्यः मूत्रविनयादिकं गृहीतं तेषामेव निन्दनम्, (२२) आचार्योपाध्यायादीनां यथाशक्ति वैयावृत्याsकरणम्, विनयाद्यकरणं वा, (२३) अबहुश्रुतस्या ऽपि सतो 'बहुश्रुतोऽस्मी' - ति वचनम् ' (२४) अतपस्विनः सतोऽपि 'तपस्व्यहमस्मी' ति प्रकथनम्, (२५) ग्लानादीनां वैयावयाकरणम्, (२६) हिंसोपदेशदानं संघच्छेदभेदादिकरणं वा, (२७) आत्मश्लाघायें मुहुर्मुहूरधार्मिकवशी करणादिप्रयोगसाधनम्, (२८) ऐडिकपारलौकिक कामभोगानां तीव्राभिलाषाऽऽविष्करणम्, (२९) ऋद्धयादिमतां
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पुरुष के परिणामों को हटाना, (१९) वीतराग का अवर्णवाद करना, (२०) मोक्षमार्गका अपकार, अथवा अवर्णवाद करना, (२१) जिन आचार्य उपाध्याय आदिकों से सूत्र विनय आदि सीखे हों उन्हीं की निंदा करना, (२२) आचार्य उपाध्याय आदिकों की यथाशक्ति वैयावृत्त्य विनय आदि का नहीं करना, (२३) बहुश्रुत नहीं होने पर भी 'मैं बहुश्रुत हँ' ऐसा कहना, (२४) तपस्वी न होने पर भी तपस्वी नाम धराना, (२५) ग्लान आदिकी यथाशक्ति वैयावृत्त्य नहीं करना, (२६) हिंसाका उपदेश देना या संघ में छेद-भेद करना, (२७) अपनी बड़ाई के लिये बारबार वशीकरण आदि अधार्मिक प्रयोगों का करना, (२८) इसलोक या परलोक सम्बन्धी कामभोगों की तीव्र लालसा करना, (२९) ऋद्धियुक्त
સૂત્ર
हठावी हेवां ते. (१८) वीतरागना अववाह ४२ (२०) मोक्षमार्गनी भार અથવા અવ વાદ કરવેા, (૨૧) જે આચાર્ય ઉપાધ્યાય આદિથી આદિ શીખ્યા હાય તેની નિન્દા કરવી. (૨૨) આચાયૅ ઉપાધ્યાય વગેરેની યથાવિનય શકિત વેયાવચ વિનય આદિ નહિ કરવુ' તે. (૨૩) ખહુશ્રુત નહીં હાવા છતાંય પશુ ‘હું બહુશ્રુત છું' એમ કહેવુ. (૨૪) તપસ્વી નહિ હોવા છતાંય તપસ્વી નામ ધરાવવું. (૨૫) ગ્લાન આદિની યથાશકિત વૈયાવૃત્ય નહિ કરવી. (૨૬) હિંસાના ઉપદેશ આપવા અથવા તે સંધમાં છેદ-ભેદ પાડવા, (૨૭) પેાતાની બડાઇ માટે વારંવાર વશીકરણ આદિ અધાર્મિક પ્રયોગ કરવા. (૨૮) આ લેક લેક સખશ્રી કામલેગની તીવ્ર લાલસા કરવી, (૨૯) ઋદ્ધિયુકત દેવાને અવ
अथवा ५२
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आवश्यकसूत्रस्य देवानामवर्णवादः, (३०) अपश्यतोऽपि ‘पश्याम्यहं देवान्' इत्युक्तिः, अजिनत्वेऽपि 'जिनोऽस्मी' स्युनिषेति ॥ सू० १८ ॥
॥ मूलम् ॥ एगतीसाए सिद्धाइगुणेहिं । बत्तीसाए जोगसंगहेहिं ॥ सू० १९॥ ।
॥ छाया ॥ एकत्रिंशता सिद्धादिगुणैः । द्वात्रिंशता योगसङ्ग्रहैः ।। सू० १९ ॥
॥ टीका ॥ 'एग०' इति. 'एगतीसार' एकत्रिंशता एकत्रिंशत्सङ्ग्यकैः, 'सिद्धाइगुणेहि' आदौ=सिद्धावस्थामाप्तिवेलायामेव यौगपधेन स्थायिनो न तु क्रमभाविनो गुणा आदिगुणाः, सिद्धानामादिगुणाः सिद्धादिगुणास्तैः । सम्बन्धस्तूक्त एव । ते गुणा यथा-पञ्चविधज्ञानावरणीयक्षीणत्वानि पञ्च, नवविधदर्शनावरणीयक्षीणत्वानि नव, द्विविधवेदनीयक्षीणत्वे द्वे, द्विविधमोहनीयक्षीणत्वे द्वे, चतुविधायुःक्षीणत्वानि चत्वारि, द्विविधनामकर्मक्षीणत्वे द्वे, द्विविधगोत्रकर्मक्षीणत्वे द्वे, पञ्चविधान्तरायक्षीणत्वानि पश्चेति मिलित्वैकत्रिंशदिति । 'बनीदेवोंका अवर्णवाद बोलना, (३०) देवता को नहीं देखते हुए भी ‘में देवता को देखता हूँ' ऐसा कहना, इन तीस महामोहनी। स्थानों के द्वारा जो कोई अतिचार किया गया हो तो मैं उससे निवृत्त होता हूँ' ॥ सू०१८॥
सिद्ध अवस्था की प्राप्तिके समय सिद्धी में एक साथ रहनेवाले गुणोंको सिद्धादिगुण कहते हैं, वे पाच ज्ञानावरणीय, नौ दर्शनावरणीय, दो वेदनीय, दो मोहनीय, चार आयु, दो गोत्र, दो नाम, पाँच अन्तराय, इन इकतीस प्रकृतियों के क्षयरूप इकत्तीस ર્ણવાદ બોલવો. (૩૦) દેવતાને નહિ જેવા છતાંય “હું દેવતાને જોઉ છું” એ પ્રમાણે કહેવું. તે આ ત્રીશ મહામેહનીય સ્થાન દ્વારા જે કાંઈ અતિચાર લાગ્યા હોય તો તેમાંથી હું નિવૃત્ત થાઉં છુ ” (સૂ૦ ૧૮)
સિદ્ધ અવસ્થાની પ્રાપ્તિના સમયે સિદ્ધોમાં એક સાથે રહેવાવાળા ગુણેને સિદ્ધાદિગુણ કહે છે તે પાંચ જ્ઞાનાવરણીય, નવ દર્શનાવરણીય, બે વેદનીય, બે મેહનીય, ચાર આયુ, બે નેત્ર, બે નામ, પાંચ અખ્તરાય, એ એકત્રીશ પ્રક
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साए' द्वात्रिंशता = द्वात्रिंशत्संख्यकैः 'जोगसंगहेहिं' योगाः = योजनानि=मनोवाकाव्यापारास्ते च यद्यपि शुभाशुभभेदेन द्विविधास्तथापि प्रसङ्गादत्र शुभा एव विवक्षिताः, तेषां सङ्ग्रहास्तैः, सम्बन्धो यथापूर्वमेव, ते च संग्रहा द्वात्रिंशद्यथा(१) गुरुसमीपगमनपुरःसर पापसमालोचनरूपमालोचनम्, (२) अन्यपुरतो गुरुणाऽपि शिष्यानालोचनरूपो निरपलाप:, (३) आपत्सु धर्मदादर्थम्, (४) ऐहिकपारलौकिक सुखानिच्छया क्रियानुष्ठानरूपमनिश्रितोपधानम्, (५) ग्रहणाऽऽसेवनारूपा शिक्षा, (६) शरीरादिसंस्कारवर्जनरूपा निष्पतिकर्मता, (७) प्रच्छन्नतपःगुण हैं; इनके विषयमें जो अतिचार किया गया हो 'तो मैं उस से निवृत्त होता हूँ ।
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मन वचन कायके व्यापार को योग कहते हैं, वे यद्यपि शुभ अशुभ के भेद से दो प्रकार के हैं, तथापि यहाँपर प्रकरण वश शुभ योगों का ही ग्रहण है, उनके संग्रह को योगसंग्रह कहते हैं, वे बत्तीस हैं - (१) आलोचन- गुरु के समीप जाकर पापकी आलोचना करना, (२) निरपलाप - दूसरे के सामने शिष्यकी आलोचना का प्रकाशित न किया जाना, (३) आपत्ति आने पर भी धर्म में दृढ रहना, (४) अनिश्रितोपधान- इहलोक-परलोक सम्बन्धी सुख की इच्छा न रखकर क्रियानुष्ठान करना, (५) शिक्षा-विधि पूर्वक सूत्रादि-ग्रहण - रूप ग्रहणा और समाचारीका सम्यक् पालनरूप आसेवना (६) निष्प्रतिकर्मता - शरीरसंस्कार का परित्याग, તિઓના ક્ષયરૂપ એકત્રીશ ગુણ છે. તે વિષયમાં જે કાંઇ અતિચાર લાગ્યા હાય तो 'तेमांथी हुँ निवृत्त था 'छु '
મન, વચન અને કાયાના વ્યાપારને યાગ કહે છે તે શુભ-અશુભના ભેદથી એ પ્રકારના હોય છે છતાં પણ આ સ્થળે પ્રકરણ વશ શુભયોગાનું ગ્રહણુ કરેલુ છે. તેઓમાં સ ંગ્રહને યેગસ ંગ્રહ કહે છે. તે ખત્રીશ પ્રકારના છે. (૧) આલાચન ગુરુના પાસે જઈને પાપની આવેચના કરવી, (૨) નિરપલાપ-બીજાના પાસે શિષ્યની આલાચના જાહેર નહિ કરવી, (૩) આપત્તિ આવવા છતાંય ધર્મમાં દૃઢ રહેવું, (૪) અનિશ્રિત પધાન-આ લોક-પરલેક સંબધી સુખની ઇચ્છા નહિ રાખતાં ક્રિયાનુષ્ઠાન કરવાં, (૫)શિક્ષા-વિધિપૂર્વક સૂત્રાદિગ્રહણ રૂપ ગ્રહણા અને સમાચારીનું
१ - यथाविधिमुत्रादिग्रहणलक्षणा ग्रहणा, सामाचार्याः सम्यक् पालनमा सेवना ।
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आवश्यकमूत्रस्य
करणरूपा अज्ञातता, (८) अलोभ लोभराहित्यम् , (९) परिषहोपसर्गादिसहनरूपा तितिक्षा, (१०) कौटिल्यत्यागरूपमार्जवम् , (११) संयमविषयकातिचारमलवर्जनरूपा शुचिः, (१२) सम्यक्त्वशुद्धरूपा सम्यग्दृष्टिः, (१३) चित्तैकाग्रतारूपः समाधिः, (१४) आचार: मायाराहित्यम्, (१५) विनय-मानराहिस्यम् , (१६) धैर्यसहिता या मतिस्तद्रूपा धृतिमतिः (१७) संसाराद्भयस्य मोक्षाभिलाषस्य च यत्करणं तद्रूपः संवेगः (१८) मायाशल्यवर्जनरूपः प्रणिधिः, (१९) प्रशस्तक्रियापरायणतास्वरूपः मुविधिः, (२०) आश्रवनिरोधरूपः संवरः, (२१)
आत्मदोषपरिहारः, (२२) कामपरित्यागः, (२३) मूलगुणविषयकभत्याख्यानम्, . (२४) उत्तरगुणविषयकपत्याख्यानम्, (२५) द्रव्यभावेन कायोत्सर्गकरणरूपो
(७) अज्ञातता-गुप्त तप करना, (८) अलोभ-लोभ त्यागना, (९) तितिक्षा-परिषह-उपसर्गादिका सहन करना, (१०) आर्जव-कुटिल भावका त्याग करना, (११) शुचि अतिचाररहित संयम पालना, (१२) सम्यग्दृष्टि समकितकी शुद्धि, (१३) समाधि-चित्तकी एकाग्रता, (१४) आचार, (१५) विनय, (१६) धृतिमति-धैर्ययुक्तमति, (१७) संवेग-संसार से भय और मोक्ष की इच्छा, (१८) प्रणिधिमायापरित्याग, (१९) सुविधि-उत्तम क्रियामें तल्लीन रहना, (२०) संवर-आश्रवनिरोध, (२१) आत्मदोषपरिहार, (२२) कामपरित्याग, (२३) मूलगुण-सम्बन्धी प्रत्याख्यान, (२४) उत्तरगुणसम्बन्धी प्रत्याख्यान, (२५) द्रव्यभाव से कायोत्सर्गकरणरूप
सभ्य पान ४२१६३५ मासेवना. (९) निप्रतित-शरीरस२७।२ने। परित्या (७) अज्ञाता गुप्तत५ ४२j, (८) ale-art त्या ४२वी, (6) तितिक्षाપરિષહ-ઉપસર્ગનું સહન કરવું, (૧૦) આજવ-કુટિલ ભાવને ત્યાગ કરે, (11) शुथि-मतिया२२डित सयभनु पान ४२j, (१२), सभ्यष्टि-समतिनी शुद्धि, (13) समाधि-यित्तनी माता, (१४) मायार, (१५) विनय, (१९) છતિમતિ-ધેર્યયુકત મતિ, (૧૭) સંવેગ-સંસારને ભય અને મેક્ષની ઈચ્છા, (१८) प्रविधि-भायापरित्याग, (16) सुविधि-उत्तम याwi deelन २३, (२०) १२ भावनिरोध, (२१) मात्भोपपरिवार, (२२) भपरित्याग, (૨૩) મૂલગુણસંબન્ધી ત્યાખ્યાન, (૨) ઉત્તરગુણસંબંધી પ્રત્યાખ્યાન,
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न्युत्सर्गः, (२३) अमवादः, (२७) समुचितसमयानतिक्रमेण सामाचार्यनुष्ठान रूपो लवाल:, ( २८ ) आर्त्तरौद्रध्यानमहाणपूर्वकधर्म शुक्लध्यानसमादरणरूपो ध्यानसंवरणयोगः, (२९) मारणान्तिकवेदनोदयेऽपि क्षोभराहित्यम्, (३०) झ - मयाख्या नपरिज्ञया 'संगपरिज्ञान- संगवर्जनरूपा सङ्गपरिज्ञा, (३१) प्रायश्चित्ताऽऽचरणम्, (३२) मरणान्ते ( मरणसमये ) ऽपि ज्ञानाद्याराधना चेति ।। सू० १९ ॥ ॥ मूलम् ॥ तित्तीसाए आसायणाए ॥ सू० २० ॥
॥ छाया ॥
त्रयस्त्रिंशताऽऽशातनाभिः मू० २० ॥
॥ टीका ॥ त्रयस्त्रिंशतात्रयस्त्रिंशत्संख्यकाभिः,
' तित्तीसाए ' 'आसायणाए ' व्युत्सर्ग, (२६) अप्रमाद, (२७) उचित समयमें सामाचारीका अनुष्ठानरूप लबालब, ( २८ ) आर्तरौद्ररूप ध्यान के परित्याग - पूर्वक धर्मशुक्ल ध्यानका आदररूप ध्यान संवरणयोग, (२९) मारणान्तिक उपसर्ग सहन करना, (३०) प्रत्याख्यानपरिज्ञा से संगपरित्यागरूप संगपरिज्ञा, (३१) प्रायश्चित्त करना, (३२) मरणपर्यन्त ज्ञानादिकी आराधना करना । इन बत्तीस योगसंग्रहों का सम्यग् आराधन नहीं होने से जो कोई अतिचार किया गया हो ' तो मैं उससे निवृत्त होता हूँ ' ॥ सू० १९ ॥
जिससे ज्ञान आदिगुण नष्ट हो जाते हैं, अथवा सम्यग् (२५) द्रव्याने भावथी प्रयोत्सर्ग ४२वा ३५ व्युत्सर्ग, (२६) अप्रभाहु, (२७) ઉચિત સમયમાં સામાચારીના—અનુષ્ઠાન રૂપ લવા-લવ, (૨૮) આત્તરૌદ્ર – રૂપ ધ્યાનના પરિત્યાગપૂર્ણાંક-ધર્મ શુકલ ધ્યાનના આદરરૂપ ધ્યાન (૨૯) મારણાન્તિક ઉપસ સંવરણુયાગ, સહન કરવા, (૩૦) પ્રત્યાખ્યાનપરિજ્ઞાથી સંગ પરિત્યાગરૂપ સંગપરિજ્ઞા, (૩૧) પ્રાયશ્ચિત્ત કરવું તે (૩ર) મરણુ સુધી જ્ઞાનાદિકની આરાધના કરવી, આ પ્રમાણે ખત્રીશ ચેગસ ંગ્રહનું સમ્યક્ પ્રકારે આરાધન નહિ થવાથી જે કાંઇ અતિચાર થયા હૈાય તે ‘તેમાંથી હું...નિવૃત્ત થાઉં છુ.' (સ્૦ ૧૯)
જેના કારણે જ્ઞાન આદિ ગુણુ નાશ થઈ જતા હાય, અથવા સમ્યગ
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आवश्यकम्त्रस्य आ-समन्तात्' शास्यन्ते अपनीयन्ते ज्ञानादयो गुणा याभिरिति, यद्वा निरुक्तरीत्या आ-आयः सम्यंगज्ञानादिलाभस्तस्य शातनाः खण्डनाः आशातनास्ताभिः । सम्बन्धस्तु पूर्ववदेव, अत्रैकवचनं त्वार्षत्वात्, एतात्रयस्त्रिंशदाशातनाः प्रकरणान्तरोक्ता गुरुसम्बन्धिन्यो बोदव्याः, ता यथा-(१) रात्निकस्य पुरतो गमनम् , (२) पार्वतः समश्रेण्या गमनम् , (३) 'आसन्नतो गमनम् , एवं (४) रात्निकस्य पुरतोऽवस्थानम् , (५) पार्श्वतोऽवस्थानम् , (६) आसन्नावग्थानम् , (७) पुरतो निषदनम् , (८) पार्श्वतो निषदनम् , (९) आसन्ननिषदनं चेति नव । (१०) संज्ञाभूमि गतवतोगुरुशिष्ययोर्गुरुतः पूर्वमाचमनम् , (११) गमनागमनयोः पूर्वमालोचनम् , (१२) गुरुणा संलपितुमागतेन सह गुरुतः पूर्व संलपनम् , (१३) 'को जागर्तीति कः स्वपितीति वा' रात्रौ गुरुणा पृष्टस्य जाग्रतोऽपि शिष्यस्याऽज्ञानादि-रत्नत्रयका लाभ जिसके द्वारा खण्डित होता है वह गुरुसम्बन्धी 'आशातना' तेंतीस प्रकारकी है-(१) गुरु से आगे चलना, (२) बराबर चलना, (३) अत्यन्त नजदीक चलना, (४) गुरुके आगे ग्वडा रहना, (५) बराबर खडा रहना, (६) अधिक पासमें खडा रहना, (७) गुरुके आगे बैठना, (८) बरावर बैठना, (९) अत्यन्त समीप बैठना, (१०) गुरुके साथ संज्ञाभूमि जाने पर गुरुसे पहले शौच करना, (११) उपाश्रय में आकर गुरु के पहले इर्यावही-प्रतिक्रमण करना, (१२) गुरु से वार्तालाप करने के लिए आये हुए के साथ गुरु के पहले बोलना, (१३) 'कौन सोया कौन जागता है ?' इस प्रकार જ્ઞાનાદિ-રત્ન–ત્રયને લાભ જેના દ્વારા ખંડિત થતું હોય તે ગુરુ-સંબંધી " तना" alu प्रा२नी छ.
(१) गुरुनी भासण यासयु, (२) मराम२ याल, (3) अत्यन्त नभा याल (४) गुरुनी भाभा २९g, (५) राम२ SAL २७j, (६) म नभi Geet २७j, (७) गुरुनी माग मेस, (८) सरासर मेस, (e) मे न भ मेसg, (૧૦) ગુરુની સાથે સંજ્ઞાભૂમિ જાતાં ગુરુની પહેલાં શૌચ કરવું, (૧૧) ઉપશ્રયમાં આવીને ગુરુના પહેલાં ઈયવાહી પ્રતિક્રમણ કરવું, (૧૨) ગુરુની સાથે વાર્તાલાપ કરવા માટે આવેલાની સાથે ગુરુ વાત કરે પહેલાં વાત કરવી, (૧૩) કોણ સુતેલા છે? કેણ જાગે છે? આ પ્રમાણે રાત્રીએ ગુરુજી પૂછે ત્યારે
१-आसन्नतः निकटतः ।
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
२५५ भाषणम् , (१४) अशनादिकमानीय पूर्व लघोः पुरत आलोचनम् , (१५) एवमेवोपदर्शनम् , (१६) निमन्त्रणं च, (१७) रास्निकमपृष्ट्वा स्वेच्छयवाहारादिकस्यान्येभ्यः प्रदानम् , (१८) गुरुणा सहाऽभ्यवहरणे अप्रशस्तं विहाय प्रशस्तस्य वस्तुनो भोजनम् , (१९) सति प्रयोजने व्याहरता रास्निकेनाऽऽहूतस्यापि तूष्णीभावः, (२०) आसनासीनतयैव रात्निकाय प्रतिवाक्यदानम्, (२१) रात्निकाऽऽहूतेन शिष्येण 'तथेति' इति वक्तव्ये 'किमुच्यते ? न श्रुतं पुनरुच्यताम्'इत्यादिपलपनम् , (२२) प्रेरयन्तं रात्निकं प्रति त्वङ्कारशब्दोच्चारणम् , (२३) रत्नाधिकस्य पुरतः प्रयोजनादधिकं निरर्थकं कठोरं वा संभाषणम् , (२४) ग्लाना
रांत्रिमें गुरु के पूछने पर जागते हुए भी उत्तर नहीं देना, (१४) आहार आदि लाकर प्रथम छोटे के पास आलोचना करना, (१५) आहारपानी आदि लाकर प्रथम छोटे को दिखाना, (१६) गुरु को पूछे बिना अपनी इच्छा से अन्य छोटे साधुओं की निमन्त्रणा करना, (१७) गुरु को पूछे विना ही अपनी इच्छासे अन्य साधुओं को आहार आदि देना, (१८) गुरु के साथ आहार करता हुआ मनोज्ञ २ स्वयं खाजाना, (१९) कार्यवश गुरु के योलाने पर चुप रह जाना, (२०) आसन पर बैठे हुए ही गुरु को उत्तर देना, (२१) गुरु के घुलाने पर 'तहत्ति' न बोल कर 'क्या कहते हैं !" क्या कहना है !' ऐसा बोलना, (२२) गुरुको 'तू' शब्द बोलना, (२३) गुरु के सामने प्रयोजन से अधिक निरर्थक तथा कठोर बोलना, જાગતા હોવા છતાંય ઉત્તર નહિ આપ, (૧૪) આહાર વગેરે લાવીને પ્રથમ નાનાની પાસે આવેચના કરવી, (૧૫) આહાર-પાછું આદિ લાવીને પ્રથમ નાના હોય તેને દેખાડ, (૧૬) ગુરુજીને પૂછ્યા વિના પિતાની ઇચ્છાથી જ અન્ય નાના સાધુને નિમંત્રણ કરવું, (૧૭) ગુરુજીને પૂછ્યા વિના પિતાની ઈચ્છાથી જ અન્ય સાધુઓને આહાર આદિ આપવું, (૧૮) ગુરુની સાથે આહાર કરતાં પિતાને જે સારું લાગે તે પોતે જ ખાઈ જવું, (૧૯) કાર્યવશ ગુરુજી બોલાવે તે પણ ચુપ રહી જવું, (૨૦) આસન ઉપર બેઠાં બેઠાં ઉત્તર આપ, (૨૧) ગુરુજી લાવે त्यारे " तहत्ति " न तi “शु हो छ। ?” शु छ ? मे प्रमाणे पाम भापको, (२२) गुरुकने 'तू' या नावावा, (२3) गुरुनी सामे प्रयो
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आवश्यकसूत्रस्य दिपरिचर्यार्थ प्रेरकाय गुरवे 'वं कथं न संपरिचरसि'-इत्यादिरीत्योदीरणम्, (२५) कथां कथयतो रात्निकस्य ‘एवं वक्तव्यम्' इति कथनम् , (२६) कयां कथयतो रानिकस्य 'नो स्मरति भवान्' इति कथनम् , (२७) कर्मकथां श्रावयति रास्निकेऽन्यमनस्कता, (२८) रास्निककथायां परिषद्भेदनम् , (२९) धर्मकथायां 'गोचरीवेला सम्पाप्ता' इत्यादिविप्रलापः, (३०) अनुत्थितायां परिषदि रानिकोक्ताया एव कथाया मुहुर्मुहू रुचिररूपेण स्वयंभाषणम् , (३१) रात्निकसम्बन्धिशय्यासंस्तारकादीनां पादादिना संघटनम् , (३२) तस्य शय्यादिषूपवेशनादि, (३३) रात्निकादुच्चासने समुपवेशनमिति ॥ मू० २० ॥ • (२४) ग्लान आदि की वैयावृत्य के लिये गुरुद्वारा प्रेरणा करने पर 'आप क्यों नहीं करते हो !' ऐसा उत्तर देना। (२५) धर्मकथा करते हुए गुरु को टोंकना अर्थात् 'यह ऐसा नहीं है ऐसा है' इत्यादि कहना, (२६) धर्मकथा कहते हुए गुरु को 'आपको याद नहीं है क्या !' ऐसा कहना, (२७) गुरु की धर्मकथा से प्रसन्न नहीं होना, (२८) गुरु की सभा में छेदभेद करना, (२९) धर्मकथा में 'गोचरी का समय आ गया' इत्यादि बोलना, (३०) उपस्थित (बैठी हुई) सभामें गुरु से कही गई कथा को दोहरा कर सुन्दर रूप से कहना, (३१) गुरुसम्बन्धी शय्या-संथारे का पैर आदि से संघद्या करना, (३२) गुरु की शय्या आदि पर बैठना (३३) गुरु से ऊंचे आसन पर बैठना। इन तेंतीस आशातनाओं જનથી અધિક નિરર્થક તથા કઠેર બોલવું, (૨૪) પ્લાન આદિની વૈયાવૃત્ય કરવાની ગુરુદ્વારા આજ્ઞા મળતા “તમે કેમ કરતા નથી” ? એવો ઉત્તર આપવો, (૨૫) ધર્મકથા કરતા હોય ત્યારે ગુરુને ટોકવું, અર્થાત “આ પ્રમાણે नयी' में प्रभारी छे, त्यात पु. (२६) धर्मया ४२ता शुरुछने आपने યાદ નથી શું” આવી રીતે કહેવું, (૨૭) ગુરુની ધર્મકથાથી પ્રસન્ન નહીં થવું, (૨૮) ગુરુજીની સભામાં છેદભેદ કવું, (૨૯) ધર્મકથામાં ગોચરીને સમય થઈ ગયે છે? આ પ્રકારે બોલવું, (૩૦) બેઠેલી સભામાં ગુરુજીએ કહેલી કથાને બીજી વખત સુંદર રૂપથી કહેવી. (૩૧) ગુરુજી સમ્બન્ધી શયા સંથારાને પગ 43 रीने २५र्श वो. (३२) गुरुनी शय्या वगेरे ५२ सयु, (33) ગુરુજીના આસન કરતાં ઉંચા આસન ઉપર બેસવું. આ તેત્રીશ આશાતનાઓ
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
२५७ एवं गुरुसम्बन्धिनीस्त्रयस्त्रिंशदाशातना अभिधाय सम्पति तदितरा अप्याह-'अरिहंताणं' इत्यादि ।
॥ मूलम् ॥ अरिहंताणं आसायणाए, सिद्धाणं आसायणाए, आयरियाणं आसायणाए, उवज्झायाणं आसायणाए, साहूणं आसायणाए, साहुणीणं आसायणाए, सावयाणं आसायणाए, सावियाणं आसायणाए, देवाणं आसायणाए, देवीणं आसायणाए, इहलोगस्स आसायणाए, परलोगस्स आसायणाए, केवलीणं आसायणाए, केवलिपन्नत्तस्स धम्मस्स आसायणाए, सदेवमणुयासुरस्सलोगस्स आसायणाए, सव्वपाणभूयजीवसत्ताणं आसायणाए, कालस्स आसायणाए, सुअस्स आसायणाए, सुयदेवयाए आसायणाए, वायणायरियस्स आसायणाए, जं वाइद्धं, वच्चामेलियं, हीणक्खरं, अञ्चक्खरं, पयहीणं, विणयहीणं, जोगहीणं, घोसहीणं, सुट्ठदिन्नं, दुडुपडिच्छियं, अकाले कओ सज्झाओ, काले न कओ सज्झाओ, असज्झाए सज्झाइयं, सज्झाए न सज्झाइयं, तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ॥ सू० २१ ॥
॥ छाया ॥ अर्हतामाशातनया, सिद्धानामाशातनया, आचार्याणामाशातनया, उपाध्यायानामाशातनया, साधूनामाशातनया, साध्वीनामाशातनया, श्रावकाणामाशातनया, श्राविकाणामाशातनया, देवानामाशातनया, देवीनामाशातनया, इहलोकस्याऽऽशातनया, परलोकस्याऽऽशातनया, केवलिनामाशातनया, केवलिसम्बन्धी कोई अतिचार किया गया हो तो उससे मैं निवृत्त होता हूँ ॥ सू० २० ॥
इस प्रकार गुरु सम्बन्धी तेंतीस (३३) आशातनाएं कह कर अब अरिहन्तादि की आशातनाएं कहते हैंસંબી કે અતિચાર લાગ્યા હોય તે તેમાંથી હું નિવૃત્ત થાઉં છું (સૂ૦ ૨૦)
આ પ્રકારે ગુરુ સંબન્ધી તેત્રીશ આશાતના કહ્યા પછી હવે અરિહંતાદિકની આશાતના કહે છે –
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आवश्यक सूत्रस्य प्रज्ञप्तस्य धर्मस्याऽऽशातनया, सदेवमनुजाऽसुरस्य लोकस्याऽऽशातनया, सर्वप्राणभूतजीवसत्त्वानामाशातनयां, कालस्याशातनया, श्रुतस्याशातनया, श्रुतदेवताया आशातनया, वाचनाचार्यस्याऽऽशातनया, यद् व्यात्रिद्धं, व्यत्याम्रेडितं, हीनाक्षरम्, अन्यक्षरं, पदहीनं, विनयहीनं, योगहीनं घोषहीनं, सुष्ठु दत्तं दुष्ठु प्रतीच्छितम्, अकाले कृतः स्वाध्यायः, काले न कृतः स्वाध्यायः, अस्वाध्याये स्वाध्यायितं, स्वाध्याये न स्वाध्यायितं, तस्य मिथ्या मयि दुष्कृतम् ।। सू० २१ ॥
॥ टीका ॥
'अरिहंताणं' अर्हताम्, कर्मणि सम्बन्धसामान्ये वा षष्टी, तेनाऽस्कमिंयाऽर्हत्सम्बधिन्या वेत्यर्थः । एवमग्रेऽपि, आशातना चाऽत्र - 'न सन्त्यईन्तस्तत्पदवाच्यानामप्यस्मदादिवद्भोगाऽऽसक्तत्वाद्' इत्याद्युक्त्या जायते । ननु नेयमाशातना तात्विकत्वात् तथाहि श्रूयन्त एवाऽर्द्वन्तोऽपि विषमविपकल्प भोगभोगिनो, देवकृतैः समवसरणस्फाटिकादिसिंहासनादिभिरष्टविधमहाप्रातिहार्यैश्व युक्ता, इति चेन्न, नहि ते सरागिण इवाऽऽमक्त्या भोगान् भुञ्जते स्म, अपितु पूर्वार्जित
अरिहंतों की आशातना से, यह आशातना इस प्रकार अर्हन्त नहीं हैं, क्यों कि जिनको हम अर्हन्त कह रहे हैं वे भी कभी भोगों का फल कडवा समझते हुए भी भोगते ही थे, तथा केवलज्ञान प्राप्त होने पर भी देवकृत समवसरण स्फटिकसिंहासन आदि से युक्त होते ही हैं । यहाँ प्रश्न उठता है कि- 'यह आशातना कैसे ? क्यों कि ऐसा उल्लेख तो अर्हन्त भगवान के लिये शास्त्रों में आता ही है।' इसका उत्तर यह है कि - 'अर्हन्त भगवान ने जो संसार अवस्थामें भोगादि भोगा है वह सरागी
પ્રમાણે છે. ‘ અન્ત નથી'. કોઇ વખત ‘ ભેગોનું ફુલ તથા કેવલજ્ઞાન પ્રાપ્ત થવા યુકત હોયજ છે, અહિં
અરિહંતેાની આશાતનાથી, તે આશાતના આ કારણ કે જેને અમે અન્ત કહીએ છીએ તે પણ કડવુ છે' એમ સમજતા છતાંય ભાગવતાજ હતા, છતાંય પણ દેવકૃત સમવસરણ સ્ફટિકસિંહાસન આદિથી પ્રશ્ન થાય છે કે—આ આશાતના કેવી રીતે? કારણ કે એવા ઉલ્લેખ તે અન્ત ભગવાન માટે શાસ્ત્રમાં આવે છેજ, તેના ઉત્તર એ છે જે સ સાર-અવસ્થામાં ભેગાદિ ભગવ્યા છે તે સરાગી લેકે
કે ' અન્ત ભગવાને પ્રમાણે આસકત થઈને
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मनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
२५९ पुण्यप्रकृतिबाहुल्येनाऽन्तःसन्त्यक्तनिखिलाऽऽसक्तितया केवलमौदासीन्येनैव, तदपि च संसारावस्थायामेव, एवं केवलज्ञाने सम्माप्तेऽपि मोहनीयकर्माभावादनिच्छायां सत्यामपि समवसरणादिप्राप्तिस्तीर्थकरनामकर्मप्रकृतिफलभोगस्य दुर्निवारतया तदुदयेनैव, न तावता वीतरागत्वमाप्त्युत्तरं तेषां किश्चिद्धीयते वीतरागत्वादेव । 'सिद्धाणं.' इति, सिदानामाशातना यथा-न सन्ति सिद्धाश्चेष्टालोगों की तरह भासक्त हो कर नहीं; किन्तु पूर्वोपार्जित पुण्यप्रकृति का प्रबल उदय होने के कारण अनिवार्य भोगों को अनासक्त हो कर उदासीन भावसे भोगा है, इसी प्रकार मोहनीय कर्म का अभाव होने से सब प्रकार की इच्छा से रहित और वीतराग हो जाने पर भी तीर्थङ्करनामकर्म प्रकृति के उदय के कारण दुर्निवार देवकृत समवसरणादि से युक्त होते हैं। अतएव 'अर्हन्त नहीं हैं'-इत्यादि कथन करना आशातना है । सिद्धों की आशातना से, यह आशातना इस प्रकार होती है-'सिद्ध नहीं हैं,' क्यों कि उनके हलन-चलन आदि किसी प्रकार की चेष्टा का अभाव है, और यदि वे हों भी तो रागद्वेषसे मुक्त नहीं हैं, क्यों कि राग-द्वेष ध्रुव होने के कारण किसी से नष्ट नहीं किये जा सकते, और साथ ही यह भी कह सकते हैं । कि जिनको आप सिद्ध कहते हैं वे भी असर्वज्ञ ही हैं, सर्वज्ञ नहीं हैं। क्यों कि નહિ, પરંતુ પૂર્વોપાર્જિત પુણ્ય પ્રકૃતિના પ્રબળ ઉદય હોવાના કારણે અનિવાર્ય ભેગોને અનાસકત થઇને ઉદાસીનભાવથી ભેગવ્યા છે, એ પ્રમાણે મેહનીય કર્મનો અભાવ હોવાથી સર્વ પ્રકારની ઈચ્છાથી રહિત અને વીતરાગ થવા પછી પણ તીર્થકર નામકર્મ પ્રકૃતિના ઉદયના કારણે દુર્નિવાર દેવકૃત સમવસરણાદિથી યુકત હોય છે, એટલા માટે “અહંન્ત નથી” ઈત્યાદિ કહેવું તે આશાતના છે. સિદ્ધોની આશાતનાથી, તે આશાતના આ પ્રમાણે છે-“સિદ્ધ નથી” કારણ કે તેને હલન-ચલન આદિ કઈ પ્રકારની ચેષ્ટા કરવાપણું નથી, અને જે તે હોય તે પણ રાગ-દ્વેષથી તે મુકત નથી, કારણ કે રાગ-દ્વેષ ધ્રુવ હેવાના કારણે કેઈથી નાશ થઈ શકતો નથી, અને સાથે-સાથે એ પણ કહી શકીએ છીએ કે - આપ જેને સિદ્ધ કહો છો તે પણ અસર્વર છે, સર્વજ્ઞ નથી, કેમકે વસ્તુના સામાન્ય
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आवश्यकसूत्रस्य घदर्शनाद्रागद्वेषयुक्तत्वाच्च, रागद्वेषौ हि धौव्यान्न केनापि दवयितुं शक्येते, किश्च ये सिद्धपदवाच्यास्तेऽपि वयमिवाऽसर्वज्ञा, यतः पदार्थानां सामान्यधर्मग्राहि दर्शनं, विशेषधर्मग्राहि च ज्ञानमिति सामान्यज्ञानोत्तरकाल एव विशेषज्ञानोत्पत्तेः सर्वत्र दृष्टत्वान्नास्ति दर्शनज्ञानयोयौंगपद्य (मेककालावच्छिन्नत्व) मिति ज्ञानदशनयोः परस्पराऽऽवारकतया ज्ञानोपयोगे दर्शनोपयोगस्य, दर्शनोपयोगे ज्ञानोपयोगस्य चाऽभाव एव, भावे वा ज्ञानदर्शनयोरेकत्वमापयेत, तस्माज्ज्ञानत्वसामान्यावच्छिन्नयोदर्शनज्ञानयोयौंगपद्येनाऽयोगपद्येन वा भवदभिमतेषु सिद्धपदवाच्येष्वसम्भवान्नास्ति तेषु सर्वज्ञताऽपीति । ननु कथमियमाशातना ? सिद्धाना• वस्तु का सामान्यधर्मग्राही दर्शन और विशेषधर्मग्राही ज्ञान होता है, तथा पदार्थों का सामान्य ज्ञान हुए विना विशेष ज्ञान हो नहीं सकता; अतः एक समयमें एक ही उपयोग सिद्ध होता है, कारण यह है कि दर्शनोपयोग के समयमें ज्ञानोपयोग नहीं
और ज्ञानोपयोग के समयमें दर्शनोपयोग नहीं, इसलिये एक समयों मामान्य-विशेषात्मक उभय धर्म का ज्ञान असंभव है, यदि संभव कहें तो ज्ञान और दर्शन में एकत्व हो जायगा, क्यों कि वैसी अवस्था में पदार्थस्वरूप जितना ज्ञानसे प्रतीत होगा दर्शन से भी उतना ही होगा, इस कारण ज्ञान दर्शन का योगपद्य (एक साथ स्थिति) न रहने से 'सिद्ध असर्वज्ञ हैं'-इत्यादि। ધર્મગ્રાહી દર્શન અને વિશેષધર્મગ્રાહી જ્ઞાન હોય છે, તથા પદાર્થોનું સામાન્ય જ્ઞાન થયા વિના વિશેષ જ્ઞાન થઈ શકતું જ નથી. એટલા કારણથી એક સમયમાં એકજ ઉપયોગ સિદ્ધ થાય છે, કારણ કે દર્શન-ઉપગના સમયમાં જ્ઞાન- ઉપયોગ હોય નહિ અને જ્ઞાન- ઉપગના સમયે દર્શનપગ હોય નહિ, એટલા માટે એક સમયમાં સામાન્ય-વિશેષાત્મક બન્ને ધર્મનું જ્ઞાન થવું અસંભવિત છે, જે સંભવ છે એમ કહેશો તે જ્ઞાન અને દર્શનમાં એકત્વ આવી જશે, કારણ કે તેવી અવસ્થામાં પદાર્થ સ્વરૂપ જેટલા જ્ઞાનથી પ્રતીત થશે તેટલું જ દર્શનથી થશે, એ કારણથી જ્ઞાન-દર્શનનું યૌગપદ્ય-એક સાથેની સ્થિતિ નહિ રહેવાથી 'सिद्ध अस छ' त्यादि.
१-दुरीकर्तुम् ।
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सुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम् - ४
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मुक्ताभ्य एव युक्तिभ्योऽसत्त्वात् सत्त्वेऽपि वा तत्तद्दोषसम्पृक्तत्वादिति चेतुच्छमिदम्, यतः ' सिद्धाः' इति प्राप्तस्यैव हि प्रतिषेधो भवति, सिद्धाः सन्तीत्यत एव भवताऽप्युच्यते, 'न सन्ती' - ति, प्रसिद्धप्रतियोगिकस्यैव ह्यभावस्य सर्वत्र ग्रहणं दृश्यते, गोशृङ्गं नास्तीति वक्तुं शक्यते यतो गोशृङ्गमन्यत्रोपलभ्यते, यच्च नोपलभ्यते न तत्प्रतियोगिकाभावो वक्तुं शक्यते - ' शशशृङ्गं नास्त्यश्त्रशृङ्गं नास्तीति । यद्यपि पदपार्थक्ये शशादेः शृङ्गादेव वाच्याः सन्त्येव घटादेखि,
यदि कोई कहे कि - यह आशातना कैसे ? क्योंकि ऊपर कही हुई युक्तियों से यह बात सत्य ही जान पडती है' तो इस का उत्तर यह है कि- 'तुमने जो कहा है कि - 'सिद्ध नहीं हैं' - इसी से 'सिद्ध हैं' - ऐसा सिद्ध हुआ, क्योंकि सत् (विद्यमान ) वस्तु का ही निषेध किया जाता है, जो वस्तु विद्यमान नहीं है उसका निषेध भी नहीं किया जासकता है, 'गायके सींग नहीं हैं' ऐसा कहा जाता है, इसलिए कि गाय के सींग होते हैं, जो वस्तु त्रिकालमें होने की नहीं, जैसे घोडे या खरगोश के सींग, तो ऐसी वस्तुओं का निषेध भी प्रायः बुद्धिमान मनुष्यों के मुख से नहीं किया जाता, यों तो शशशृंग आदि पदों को अलग २ रखने पर प्रत्येक का अर्थ प्रसिद्ध ही रहता है; किन्तु इकट्ठा कर देने पर 'शशशृंग' 'अश्वशृंग' आदि शब्दों का अर्थ होगा 'खरगोश के सींग' 'घोडे
જો કાઇ કહે કે:- આ આશાતના કેવી રીતે ? કેમકે ઉપર કહેવામાં આવેલી યુકિતઓથી આ વાત તદન સત્યજ દેખાય છે, તે એનેા ઉત્તર એ છે કે:તમે જે કહ્યું કે ‘સિદ્ધ નથી,’ એ વાકય ઉપર સિદ્ધ છે, તેમ નિશ્ચય થયેલ છે. કારણ કે સત્-વિદ્યમાન-વસ્તુનેાજ નિષેધ થઇ શકે છે, જે વસ્તુ વિદ્યમાન ન હાય તેના નિષેધ પણ કરી શકાતા નથી. ‘ગાયને શીંગ નથી' એમ કહેવામાં આવે છે તે એટલા માટે કે ‘ગાયને શીંગ હાય છે જ. જે વસ્તુ ત્રિકાળમાં હાયજ નહિ, જેમકે ઘેાડા અથવા ખરગેાશના શીંગ” તા એવી વસ્તુઓના નિષેધ પણુ ઘણુ કરી બુદ્ધિમાન મનુષ્યનાં મુખથી કરવામાં આવતા નથી. જેમકે શશશૃંગ આદિ પહેાને દા—જૂદા રાખવાથી પ્રત્યેકના અર્થ પ્રસિદ્ધજ રહે છે. પરન્તુ એકઠા કરવાથી ' शशशुंग ' ' अश्वशुंग' माहि शब्दोनो अर्थ थशे. 'अरगोशना शींग' ' घोडाना
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आवश्यकसूत्रस्य तथापि मिथः सम्बद्धानां शशशृङ्गादीनामप्रसिद्धिरेव, अत एव 'एष बन्ध्यामुतो याति, खपुष्पकृतशेखरः। कूर्मक्षीरचये स्नातः, शशशृङ्गधनुर्धरः ॥' इत्यादिषु समुदितार्थाभावेन भातिपदिकत्वाभावाऽऽपत्तिमाशङ्कय वन्ध्यापदार्थपुत्र पदार्थादेरेकैकस्य प्रसिद्धया बौद्धमर्थमादायाऽथवत्त्वात्मातिपदिकत्वमित्याहुवैयाकरणाः, तस्मात् 'सिद्धा न सन्ती'-ति दुष्पतिपादम् । यदुनं 'निश्चेष्टस्वमिति' तदत्यन्तमसत् , तेषां सिद्धसकलकार्यत्वान्निःशरीरत्वाच, रागद्वेषौ तु के सींग' इत्यादि; वह अप्रसिद्ध है। यही कारण है कि 'एष वन्ध्यासुतो याति' इत्यादि स्थलों में यद्यपि अलग २ रखने पर घध्या शब्द और सुत शब्द का अर्थ प्रसिद्ध ही है, परन्तु इकट्ठा कर देने पर 'वन्ध्यासुत' 'कूर्मक्षीर' (कछुएका द्ध) आदि शब्दों का अर्थ कुछ भी नहीं होता है, अतएव अनर्थक होने से प्रातिपदिक संज्ञाका होना असंभव जानकर वैयाकरणोंने एक एक पदार्थकी प्रसिद्धि रहने के कारण समुदायमें बौद्ध (बुद्धिकृत) अर्थ को मानकर प्रातिपदिक संज्ञा आदि कार्य किये हैं, इस कारण 'सिद्ध नहीं हैं। ऐसा कहना सर्वथा असंगत है। दूसरी बात यह है कि आपने जो सिद्धों को निश्चेष्ट कहा वह भी ठीक नहीं है, कारण यह कि सिद्धों के कर्तव्य कोई बाकी रहा नहीं और शरीर भी नहीं जिससे वे चेष्टा करें। राग-द्वेष भी उनमें इसलिये नहीं शी' त्याह, ते प्रसिद्ध नथी, मेल ४२ 'एष बन्ध्यासुतो याति' ઈત્યાદિ સ્થળમાં યદ્યપિ જુદા જુદા રાખવા પર વંધ્યા શબ્દ અને સુત શબ્દને म प्रसिद्ध छ परन्तु मन्ने शण्टे मे ४२वाथी 'वंध्यासुत, 'कूर्मक्षीर' (आय. બાનું દૂધ) વગેરે શબ્દોનો કોઈ પણ અર્થ થશે નહિ, એટલા કારણથી અનર્થક હોવાના કારણે પ્રતિદિક સંજ્ઞાનો અસંભવ જાણીને વૈયાકરણીઓએ એક એક પદાર્થની પ્રસિદ્ધિ રહેવાના કારણે સમુદાયમાં બૌદ્ધ (બુદ્ધિકૃત) અર્થ માનીને પ્રાતિપાદિક સંજ્ઞા આદિ કાર્ય કરેલું છે. એ કારણથી “સિદ્ધ નથી” એમ કહેવું તે સર્વથા અસંગત છે. બીજી વાત એ છે કે તમે સિદ્ધોને નિચેષ્ટ કહો છો તે પણ ઠીક નથી, કારણ એ છે કે સિદ્ધોને કોઈ કર્તવ્ય બાકી રહેલુંજ નથી, અને શરીર પણ નથી કે જેનાથી ચેષ્ટા કરે, રાગ-દ્વેષ પણ તેમનામાં એટલા માટે નથી
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
२६३ प्रक्षीणसकलकषायाणां तेषां संभवतामेव कुतः ? न चोपयोगयोगपघमन्तरेण सर्वज्ञता कथमिति वाच्यम्, योगपधेनोपयोगद्वयाभावस्य जीवस्वाभाव्यान्नयाभिप्रेतत्वाच, तयोरैक्थं तु न, विभिन्नाऽऽवरणकत्वात् । द्रव्याथिकनयेन ज्ञानदर्शनयोरेकत्वं, ज्ञाननयमाश्रित्य सर्वमेवेदं ज्ञानमिति दर्शननयमाश्रित्य च सर्वमेवेदं दर्शनमिति नास्स्यसर्वज्ञताशङ्कालेशोऽपीति ।
'आयरियाणं' आचार्याणाम् , 'आसायणाए ' आशातनया, आचार्याशातना च-'बाला अकुलीना अतिमन्दबुद्धयश्चमे, अन्योपदेशदक्षा न च किश्चिदाचरन्ति' इत्यादिविकथनरूपा । एवमुपाध्यायानामप्याशातना बोदव्या । है कि उनके सम्पूर्ण कषाय नष्ट हो गये हैं। एक समय में दो उपयोग नहीं होते हैं, इसका कारण यह है कि जीवका स्वभाव ही ऐसा है। ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग दोनों को एक तो इसलिये नहीं कह सकते हैं कि दोनोंका आवरण भिन्नर है। रही बात अमर्वज्ञताकी, उसका उत्तर यह है कि द्रव्यार्थिकनय के मतसे ज्ञान और दर्शनमें एकता है क्यों कि ज्ञाननय की अपेक्षा सब ज्ञानमय है और दर्शननय की अपेक्षा सब दर्शनमय, इसलिये सिद्ध सर्वज्ञ हैं।
आचार्यकी आशातनासे, वह इस प्रकार-"ये बालक हैं, अकुलीन हैं, अल्प-बुद्धि हैं, औरों को तो उपदेश देते हैं पर खुद कुछ नहीं करते" इत्यादि । इसी प्रकार उपाध्याय की आशातना समझनी चाहिये। કે –તેમના કષાયે સંપૂર્ણ નાશ થયા છે. એક સમયમાં બે ઉપયોગ થાય નહિ એનું કારણ એ છે કે:- જીવનો સ્વભાવજ એવો છે. જ્ઞાનેપગ અને દશનો પગ એ બન્નેને એટલા માટે એક કહેતા નથી કે બન્નેના આવરણ જૂદા જૂદા છે. હવે અસર્વજ્ઞતાની વાત રહી, તેને ઉત્તર એ છે કે દ્રવ્યાર્થિક નયના મતથી જ્ઞાન અને દર્શનમાં એકતા છે, કેમ કે જ્ઞાનનયની અપેક્ષાએ સર્વ જ્ઞાનમય છે અને દર્શનનયની અપેક્ષાએ સર્વ દર્શનમય છે, એ કારણે સિદ્ધ સર્વજ્ઞ છે.
આચાર્યની આશાતનાથી, તે આ પ્રમાણે છે-“આ બાલક છે, અકુલીન છે, અલ્પબુદ્ધિ છે, બીજાને ઉપદેશ આપે છે પણ પિતે કાંઈ કરતા નથી?-ઇત્યાદિ એ પ્રમાણે ઉપાધ્યાયની આશાતના સમજવી જોઈએ.
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आवश्यकसूत्रस्य
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साहूणं' साधूनाम्, 'आमायणाए' आशातनया, साध्वाशातना चेत्थम् - ' एते साधवो विरूपनेपथ्था हीनसंस्कारा जडा व्यर्थजीवना मुण्डितमुण्डा भिक्षामात्रशरणाः' इत्यादि । एवमेव साध्वीनामप्याशातना ज्ञातव्या । सावयाणं श्रावकाणाम्, 'आसायणाए ' आशातनया, श्रावकाऽऽशातना चअहो इमेऽभिगतजीवाजीवा उपलब्धपुण्यपापा आश्रव - संवर- निर्जरा क्रियाधिकरणवन्धमोक्षकुशला जिनमवचनपरिज्ञानेन यथार्थ मानुष्यकं लब्ध्वाऽपि न विरतिं श्रयन्ते धिग्धिग् ' - इत्यादिरूपा । श्राविकाणामध्याशात नेदृश्येव । 'देवाणं ' देवानाम्, 'आसायणाए' आशातनया, सा च- 'देवास्तु विषयवासनावासित
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माधु मुनिराजकी आशातना से, वह इस प्रकार 'ये साधु मैले कुचले वस्त्रोंके धारक, संस्कारहीन, जड, मृढ़, सिर मुंडाकर जीवन को व्यर्थ करने वाले हैं, इत्यादि । इसी प्रकार साध्वीकी आशातना समझनी चाहिये ।
श्रावक की आशातना से, वह जैसे- 'हाय ! जीव अजीव के स्वरूप और पुण्य पापके मर्म को जानने वाले, तथा आश्रव संवर निर्जरा क्रिया अधिकरण बन्ध और मोक्ष, इनमें हेय, उपादेय का ज्ञान रखने वाले, एवं जिन प्रवचन के यथार्थ ज्ञाता होकर भी ये श्रावक सर्वविरति को धारण नहीं करते हैं 'धिक्कार है' इत्यादि । श्राविकाओं की भी आशातना इसी प्रकार की है ।
देवों की आशातना से, वह इस प्रकार - " देवता तो विषय મેલાં-ગ ંધાતા બ્ય કરનાર
સાધુ મુનિરાજની આશાતનાથી, તે આ પ્રમાણે છે–‘ એ સાધુ કપડાં ધારણ કરે છે, સંસ્કારહીન, જડ, મૂઢ, શિર મુંડાવી જીવનને છે ઇત્યાદિ. આ પ્રમાણે સાધ્વીની આશાતના સમજવી જોઇએ.
શ્રાવકની આશાતનાથી, તે આ પ્રમાણે-હાય ? જીવ-અજીવના સ્વરૂપ અને પુણ્ય-પાપના મને જાણવાવાળા, તથા આશ્રવ સંવર નિર્જરા ક્રિયા અધિકરણ, બન્ધ અને મેાક્ષ, તેમાં હેય-ઉપાદેયનું જ્ઞાન રાખવાવાળા, એ પ્રમાણે જિન પ્રવચનને યથાર્થ જાણુનાર હોઇને પણ તે શ્રાવક સર્વવિરતિને ધારણ કરતા નથી, ધિક્કાર છે ઇત્યાદિ. શ્રાવિકાઓની આશાતના પણ આ પ્રમાણે જ છે.
દેવાની અશાતનાથી, તે આ પ્રમાણે-દેવતા તે વિષયવાસનામાં આસકત,
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सुमितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम् - ४
चित्तवृत्तयोsप्रत्याख्याना अविरताः शक्तिमन्तः सन्तोऽपि शासनसमुन्नतिमकुर्वाणाः सन्ति ' - इत्येवंरूपा । देवीनांमप्याशा तनैवमेव । ' इहलोगस्स' इहलोको = मनुष्यलोकस्तस्य 'आसायणाए' आशातनया न्यूनाधिकत्वनिरूपणादिलक्षणया ।
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9.
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एवमेव परलोकस्याऽऽशातनाऽपि, अत्र परलोकः = स्वर्गनरकादिलक्षणः | 'केवलीणं' केवलिनाम्, 'आसायणाए' आशातनया = ' केवलिनः कैवल्याकवलाहारादिकं न कुर्वन्ति - इत्यादिरूपया । ' केवलिपन्नत्तस्स ' केवलिपज्ञप्तस्य 'धम्मस्स' धर्म्मस्य = जीवदया - सत्या - ऽस्तेय- ब्रह्मचर्य - क्षान्ति- पञ्चेन्द्रियनिग्रहरूपस्य, 'आसायणाए' आशातनया = = विपरीत निरूपणस्वरूपया । सदे बमणुयासुरस' सदेवमनुष्यासुरस्य = देव - मनुष्या -ऽसुरसहितस्य, 'लोगस्स' लोकस्य, 'आसायणाए ' आशातनया = वितथप्ररूपणस्वरूपया । 6 सव्वपाणभूयजीवसत्ताणं' प्राणाः = प्राणिनो व्यनेन्द्रिया द्वि- त्रि- चतुरिन्द्रियलक्षणाः, भूताः= वासनामें आसक्त, अप्रत्याख्यानी, अविरती हैं, और शक्तिमान होते हुए भी शासन की उन्नति नहीं करते हैं " इत्यादि । इसी प्रकार देवी की भी आशातना समझना ।
इस लोक की न्यूनाधिकत्व - निरूपणरूप आशातनासे, ऐसे ही 'स्वर्ग नरक आदि रूप परलोक की आसातना से । '
'केवली कवलाहार आदि नहीं करते हैं' इत्यादि विरुद्ध प्ररूपणारूप केवली की आशातना से । केवलिप्ररूपित धर्मकी विपरीत प्ररूपणारूप आशातना से । देव मनुष्य और असुर सहित लोककी असत्य प्ररूपणारूप आज्ञातना से । द्वीन्द्रियादि प्राणी, અપ્રત્યાખ્યાની, અવિરતિ છૅ, અને શકિતમાન હોવા છતાંય પણ શાસનની ઉન્નતિ કરતા નથી, ત્યાદિ એ પ્રમાણે દેવીની પણ આશાતના સમજવી
આ લેાકની ન્યૂનાધિકત્વ નિરૂપણું રૂપ આશાતનાથી, એવીજ રીતે સ્વર્ગ-નરક આદિ રૂપ પરલેકની આશાતનાથી.
“ કેવલી કવલ આહાર આદિ કરતા નથી” વગેરે વિરુદ્ધ પ્રરૂપણારૂપ કેવલીની આશાતનાથી. કેવલી પ્રરૂપિત ધર્મની વિપરીત પ્રરૂપણા રૂપ આશાતનાથી. દેવમનુષ્ય અને અસુર સહિત લાકની અસત્ય પ્રાણી, વનસ્પતિકાયરૂપ ભૂત, પંચેન્દ્રિયરૂપ છત્ર અને પૃથ્વી આદિ સત્ત્વ, એ પ્રરૂપણા રૂપ આશાતનાથી. દ્વીન્દ્રિયાદિ
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आवश्यकमूत्रस्य वनस्पतयः, जीवाः पश्रेन्द्रियाः, सत्त्वाः पृथिव्यप्तेजोवायवः; प्राणाश्च भूताच जीवाश्च सत्त्वाश्चेत्येतेषामितरेतरयोगद्वन्द्वे प्राण-भूत-जीव-सत्त्वाः, सर्वे च ते प्राण-भूत-जीव-सत्त्वाश्चेति सर्व-प्राण-भूत--जीव-सत्त्वाः, उनं च
'प्राणा द्वि-त्रि-चतुः प्रोक्ता, भूतास्तु तरवः स्मृताः। जीवाः पश्चेन्द्रिया ज्ञेयाः, शेषाः सत्त्वा इतीरिताः' इति ।
तेषाम् ‘आसायणाए' आशातनया वितथपरूपणादिरूपया, वितथ. प्ररूपणा यथा-'अङ्गुष्ठपर्वमात्रात्मवन्तो द्वीन्द्रियादयः, भूतसत्त्वा वनस्पतिथिव्यादिरूपा अजीवा एव चेतनगतस्पन्दनादिचेष्टारहितत्वात् , जीवास्तु क्षणिकाः' इत्यादि । 'कालस्स' कालस्य, 'आसायणाए' आशातनया, कालाऽऽशातना च-'वर्ननालक्षणः कालो नास्ति' इत्यपलापरूपा, काल एवं कर्ता यथा-'काल: पचति भूतानि, कालः संहरते प्रजाः । कालः मुप्तेषु जागर्ति, कालो हि दुरतिक्रमः ॥' इत्येकान्तकालकर्तृत्वरूपया वा । 'सुयस्स' श्रूयते इति श्रुतं भगवनस्पतिकायरूप भूत, पञ्चेन्द्रियरूप जीव और पृथिवी आदि सत्त्व, इन सबकी असत्य प्ररूपणारूप आशातना से, वह असत्य प्ररूपणा जैसे-'द्वीन्द्रिय आदिमें आत्मा अंगूठे के पर्व (पोर) के बराबर होती है, वनस्पति और पृथिवी आदि तो हलन चलन आदि चेष्टा के न होने से अचेतन ही हैं और जीव भी क्षणिक ही हैं' इत्यादि । वर्त्तनालक्षण काल नहीं है। इस प्रकारकी, अथवा 'काल ही सबकुछ करता है जीवों को पचाता है उनका संहार करता
और संसार के सोये रहने पर जागता है अतएव काल दुर्निवार है' इस प्रकार काल को एकान्त का माननेरूप आशातना से। भगवान महावीर के मुखचन्द्र से निस्मृत, गणधरके कर्णमें पहुंचा સર્વની અસત્ય પ્રરૂપણારૂપ આશાતનાથી, તે અસત્ય પ્રરૂપણા- જેમકે “ દ્વાન્દ્રિય - આદિમાં આત્મા અંગુઠાના પર્વ પર)ની બરાબર હોય છે. વનસ્પતિ અને પૃથ્વી વગેરે હલન-ચલન આદિ ચેષ્ટા કરતા નથી તેથી અચેતન જ છે, અને જીવ પણ ક્ષણિક છે” ઇત્યાદિ. “વર્તાનાલક્ષણ કાલ નથી” “આ પ્રકારની” અથવા કાલજ સર્વ કાંઈ કરે છે, જેને પચાવે છે તેમના સંહાર કરે છે અને સંસાર સુવે છે ત્યારે તે કાલ જાગે છે, એટલા માટે “કાલ' દુર્નિવાર છે. એ પ્રમાણે કાલને એકાત કર્તા માનવા રૂપ આશાતનાથી, ભગવાન મહાવીરના મુખરૂપચન્દ્રમાથી નિકલી ગણધરના
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पुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४ पन्मुखसुधांशुनिःसृत-गणधरश्रवणपुटप्रविष्ट-विशिष्टार्थप्रदर्शकाऽजरामरत्वसंसाधकवारुपीयूषमात्र, तस्य, 'आंसायणाए' आशातनया वितथपरूपणादिलक्षणया। 'मुयदेवयाए' श्रुताधिष्ठात्रीदेवता-श्रुतदेवता-जिनवाणी, तस्याः , 'आसायणाए' भाशातनया, अत्राऽऽशातना च-विपरीतश्रद्धानप्ररूपणादिरूपा । 'वायणायरियस्स' वाचनाचार्यः श्रुताध्यापनाचार्यस्तस्य, 'आसायणाए' आशातनया='अयमध्यापको विनयवन्दनायर्थ मुहर्मुहुर्मा प्रेरयति-इत्येवमादिप्रकथनस्वरूपया। 'जं वाइदं' इत्यादिपदव्याख्या 'आगमे तिविहे' इत्यत्र पट्टिकायां गता ।। मू० २१ ॥
___ एवमेकविधाऽसंयमादारभ्य त्रयस्त्रिंशत्तमपर्यन्तैः स्थानदाघाशातनाहुआ, सामान्य विशेषात्मक पदार्थों के पोधक और भव्य जीवों को अजर अमर करनेवाले-वचनामृत स्वरूप श्रुतकी असत्य प्ररूपणा आदि आशातना से। श्रुतदेवता की आशातना से । ये विनय बन्दना आदि के लिये मुझे वारंवार तंग करते रहते हैं। इस प्रकार की वाचनाचार्य की आशातना से तथा व्याविद्ध-क्रमरहित (भागेपीछे बोलना), व्यत्यानेडित (अपनी मति से पाठ बनाकर पोलना) आदि पूर्वोक्त (पृष्ट) दोषों से जो कोई अतिचार किया ‘गया हो तो मैं उससे निवृत्त होता हूँ और उसका 'मिच्छा मि दुकडं' देता हूँ । मू० २१ ॥
इस प्रकार एकविध असंयम से लेकर तेंतीस (३३) स्थानों, तथा अरिहन्त आदिकी आशातनाओं के द्वारा किये गये हुए अतिકાનમાં પહોંચેલા સામાન્ય-વિશેષાત્મક પદાર્થોના બોધક અને ભવ્ય જીવોને અજરઅમર કરવા વાળા વચનામૃતસ્વરૂપ શ્રુતની અસત્ય પ્રરૂપણા આદિ આશાતનાથી, શત દેવની આશાતનાથી, “અ વિનય વંદના આદિ માટે મને વારંવાર તંગ કર્યા કરે છે, એ પ્રમાણે વાચનાચાર્યની આશાતનાથી તથા વ્યાવિદ્ધ-કમરહિત (આગલ પાછલ બોલવું), વ્યત્યાઍડિત (પિતાની ઇચ્છાથી પાઠ બનાવી બેલવું) આદિ પૂર્વે કહેલા (પૃષ્ટ) દેથી જે કાંઈ અતિચાર લાગ્યા હોય તેનાથી નિવૃત્ત થાઉં છું. भने तना 'मिच्छा मि दुक्कडं' मा ७. (२० २१)
આ પ્રમાણે એક સંયમથી લઈને તેત્રીસ (૩૩) સ્થાન, તથા અરિહન્ત આદિની આશાતના દ્વારા થયેલા અતિચારોથી નિવૃત્ત થઈને ફરીથી અતિચાર નહિ
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आवश्यकमूत्रस्व भिवाऽतिचारेभ्यः प्रतिक्रान्तः पुनरतिचाराकरणार्थ प्रतिचिक्रसयाऽऽदौ नमस्करोति--'नमो चउवीसाए" इत्यादिना ।
॥ मूलम् ॥ नमो चउवीसाए तित्थयराणं उसभाइमहावीरपज्जवसाणाणं। इणमेव निग्गंथं पावयणं सच्चं अणुत्तरं केवलियं पडिपुन्नं नेयाउयं संसुद्धं सल्लगत्तणं सिद्धिमग्गं मुत्तिमग्गं निजाणमग्गं निवाणमग्गं अवतिहमविसंधि सव्वदुक्खप्पहीणमग्गं । इत्थं ठिआ जीवा सिज्झंति बुज्झति मुच्चंति परिनिव्वायंति सव्वदुक्खाणमंतं करंति। तं धम्मं सदहामि पत्तियामि रोएमि फासेमि पालेमि अणुपालेमि। तं धम्मं सदहतो पत्तियंतो रोअंतो फासंतो पालंतो अणुपालंतो तस्स धम्मस्स केवलिपन्नत्तस्स अब्भुठिओमि आराहणाए विर
ओमि विराहणाए, असंजमं परियाणामि, संजमं उवसंपज्जामि, अबंभं परियाणामि बंभं उवसंपज्जामि। अकप्पं परियाणानि, कप्पं उवसंपजामि। अन्नाणं परियाणामि, नाणं उवसंपजामि। अकिरियं परियाणामि, किरियं उवसंपन्जामि। मिच्छत्तं परियाणामि, सम्मत्तं उवसंपजामि। अबोहि परियाणामि, बोहि उवसंपजामि। अमग्गं परियाणामि, मग्गं उवसंपन्जामि। जं संभराभि जं च न संभरामि, ज पडिकमामि जं च न पडि‘कमामि तस्स सव्वस्स देवसियस्स अइयारस्स पडिकमामि। समणोहं संजयविरयपडिहयपच्चक्खायपावकम्मो अनियाणो दिहिसंपन्नो मायामोसविवजिओ अढाइज्जेसु दीवसमुद्देसु पन्नरससु कम्मभूमीसु जावंति केइ साहू रयहरणमुहपत्तियगोच्छगपडिचारों से निवृत्त हो कर फिर से अतिचार न करने के लिए प्रतिक्रमण करना जरूरी है, इमलिये प्रथम नमस्कार करते हुए प्रति. क्रमण करते हैं-'नमो चोवीसाए' इत्यादि । કરવા માટે પ્રતિક્રમણ કરવું એ જરૂરી વસ્તુ છે, એટલા માટે નમસ્કાર કરીને प्रतिभर ७३ छ. 'नमो चोवीसाए' त्यादि.
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अनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
२६९ ग्गहधारा पंचमहन्वयधारा अहारससहस्ससीलंगधारा अक्खयायारचरित्ता ते सव्वे सिरसा मणसा मत्थएण वंदामि
'खामेमि सव्वजीवे, सव्वे जीवा खमंतु मे ।
मित्ती मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झ न केणई ॥१॥ एवमहं आलोइय, निदिअ गरहिअ दुगंछियं सम्मं । तिविहेण पडिक्कतो, वंदामि जिणे चउव्वीसं ॥२॥॥सू० २२ ॥
॥ छाया ॥ नमश्चतुर्विशतये तीर्थकरेभ्य ऋषभादिमहावीरपर्यवसानेभ्यः। इदमेव नैन्यं प्रवचन सत्यमनुत्तरं कैवलिकं प्रतिपूर्ण नैयायिकं संशुद्ध शल्यकर्त्तनं 'सिदिमार्गों मुक्तिमार्गों निर्याणमार्गों निर्वाणमार्गोऽवितथमविसन्धि सर्वदुःखपहीणमार्गः । अत्र स्थिता जीवाः सिध्यन्ति युध्यन्ते मुच्यन्ते परिनिर्वान्ति सर्वदुःखानामन्तं कुर्वन्ति । तं धर्म अपधे प्रतिपद्ये रोचयामि स्पृशामि पालयामि अनुपालयामि । तं धर्म श्राधानः प्रतिपद्यमानो रोचयन् स्पृशन् पालयन्ननुपालयन् तस्य धर्मस्य केवलिपज्ञप्तस्याऽभ्युत्थितोऽस्म्याराधनायां विरतोऽस्मि विराधनायाम् । असंयमं परिजानामि संयममुपसंपधे, अब्रह्म परिजानामि ब्रह्मोपसम्पधे, अकल्पं परिजानामि कल्पमुपसम्पये, अज्ञानं परिजानामि ज्ञानमुपसम्पधे, अक्रियां परिजानामि क्रियामुपसम्पो, मिध्यात्वं परिजानामि सम्यक्त्वमुपसम्पथे, अबोधि परिजानामि चोधिमुपसम्पधे, अमार्ग परिजानामि मार्गमुपसम्पधे, यत्स्मरामि यच न स्मरामि, यत्पतिक्रामामि यच्च न प्रतिक्रामामि, तस्य सर्वस्य दैवसिकस्यातिचारस्य प्रतिक्रामामि । श्रमणोऽहं संयतविरतप्रतिहतप्रत्याख्यातपापकर्मा अनिदानो दृष्टिसम्पन्नो मायामृषाविवर्नका, अर्द्धतीयेषु द्वीपसमुद्रेषु पञ्चदशकर्मभूमिषु ये केऽपि साधवो रजोहरणमुखवत्रिकागोच्छकपतिग्रहधाराः पश्चमहाव्रतधारा अष्टादशसहनशीलाधारा अक्षताऽऽचारचारित्रास्तान् सर्वान् शिरसा मनसा मस्तकेन
“ क्षमयामि सर्वान् जीवान् , सर्वे जीवाः क्षाम्यन्तु माम् । मैत्री में सर्वभूतेषु, वैरं मम न केनापि ॥१॥ एवमहमालोच्य, निन्दिता गई यिखा जुगुप्सित्वा सम्यक् । त्रिविधेन पतिक्रामन् , वन्दे जिनानां चतुर्विशतिम् ॥ २॥ ॥ मू• २२ ॥
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२७.
आवश्यकमूत्रस्थ
॥ टीका ॥ 'चउवीसाए.' इति स्पष्टोऽथः। 'उसभाइ.' अत्र माकखाचतुर्थ्य षष्ठी, व्यक्तमन्यत् । एवं नमस्कृत्य तीर्थङ्करमणीतमवचनमशंसनपूर्वकं प्रकृतमाह'इणमेव' इदमेव नान्यत् , 'निग्गथं' नैन्यं-निर्गता ग्रन्थाः द्रव्यतः स्वर्णादयो, भावतो मिथ्यात्वाऽविरत्यादिलक्षणा येभ्यस्ते, यद्वा अन्येभ्यो निष्क्रान्ता निग्रन्थाः मुनयस्तेषामिदम् 'पावयणं' प्रकर्षेण यथार्थत उच्यन्ते पदार्था यत्र तत्पवचनं तदेव प्रावचनम्-स्वार्थिकः प्रज्ञादिपाठादण । सामायिकमभृतिप्रत्याख्यानपर्यन्तं द्वादशाङ्गं गणिपिटकं वा, एतदेव विशिनष्टि-'सर्च' इत्यादिना, सन्तः पाणिनः पदार्था मुनयो वा तेभ्यो हितं, सत्सु-मुनिजीवादिपदायेंषु यथाक्रम मुक्तिमापकत्व-यथावस्थितचिन्तनाभ्यां साधु वा सत्यम्' , यद्वा सन्तमर्थमाययतिअत्यायतीति निरुक्तपक्रियया सत्यम् ।
'अणुत्तरं' न उत्तरम-उच्चतरं (प्रधान) यस्मातदनुत्तरम-अनन्यसहशमिस्यर्थः । 'केवलियं' केवलिना प्रोक्तं यद्वा केवलमेव केवलिकम्-अद्वितीयमि
श्री ऋषभदेव स्वामी से लेकर श्री महावीर स्वामी पर्यन्त चौबीसों तीर्थङ्कर भगवान को मेरा नमस्कार हो। इस प्रकार नमस्कार करके तीर्थङ्कर प्रणीत प्रवचनकी स्तुति करते हैं-यही निर्ग्रन्थअर्थात् स्वर्ण रजत आदि द्रव्यरूप और मिथ्यात्व आदि भावरूप ग्रन्थ (गाठ) से रहित-मुनिसम्बन्धी सामायिक आदि प्रत्याख्यानपर्यन्त द्वादशाङ्ग गणिपिटकस्वरूप तीर्थङ्करों से उपदिष्ट प्रवचन, सत्य, सर्वोत्तम, अद्वितीय, समस्त गुणों से परिपूर्ण, मोक्षमार्ग
શ્રી ઋષભદેવ સ્વામીથી આરંભીને શ્રી મહાવીર સ્વામી સુધી વીરા તીર્થકર ભગવાનને મારા નમસ્કાર છે. આ પ્રમાણે નમસ્કાર કરીને તીર્થંકર પ્રણીત પ્રવચનની સ્તુતિ કરે છે. આ નિર્ચન્થ-અર્થાત સોનું-ચાંદી આદિ દ્રવ્યરૂપ અને મિથ્યાત્વ આદિ ભાવરૂપ ગ્રન્થ-ગાંઠથી રહિત-મુનિ સંબંધી સામાયિક આદિ પ્રત્યા
ખ્યાન પર્યન્ત બાર અંગ ગણિપિટસ્વરૂપ તીર્થકરથી ઉપદેશાએલું પ્રવચન, સત્ય, સર્વોત્તમ, અદ્વિતીય, સમસ્ત ગુણેથી પરિપૂર્ણ, મોક્ષમાર્ગપ્રદર્શ, અગ્નિમાં
१-' तस्मै हित'-मिति, 'तत्र साधु'-रिति वा यत् प्रत्ययः। २-बोधयति ।
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सुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
तिभावः, 'पडिपुनं' प्रतिपूर्ण सूत्रतोऽक्षरमात्रादिन्यूनतया, अर्थतोऽध्याहाराssकाङ्क्षादिभि रहितं सर्वप्रमाणोपेतमपवर्गप्रापककृत्स्नगुणसंयुतं वा । 'नेयाउयं' न्यायेन चरति न्यायमनुगच्छति न्यायमनतिक्रान्तं न्याये भवं वा नैयायिकं मोक्षगमकम् । 'संसृद्धं' सं= सामस्त्येन शुद्धं = कषायादिमलरहितं निघर्षच्छेद-तापताडन - कोटिविशुद्ध हेमव निर्दोषमिति यावत् । ' सल्लगत्तणं' शल्यं = मायादि पाएं वा कृन्तति = छिनतीति कृत्यते = छिद्यतेऽनेनेति वा शल्यकर्त्तनम् । वादिमतं प्रतिक्षिपति 'सिद्धिमग्गं' सिद्धिः = साध्य निष्पत्तिः अविचलसुखप्राप्तिस्तस्या मार्गः=उपायः-सिद्धिमार्गः । 'मुत्तिमग्गं' मुक्तिः = अडितार्थ कर्म महाणं, तस्य मार्गः । विप्रतिपत्तिं निरस्यति - 'निज्जाणमरगं' निर्याणं = सकलकर्मभ्य आत्मनो निःसरणं, तस्य मार्गों निर्याणमार्गः=विशिष्टनिर्वाणावाप्तिनिदानमित्यर्थः । 'निव्वाणमरंगं' निर्वाण= निर्वृतिः = निखिलकर्मक्षयजन्यं परमसुखं, यद्वा निर्वायते = अपुनरा - वृत्ति गम्यतेऽस्मिन्निति, तस्य मार्गों निर्वाणमार्गः । वस्त्वन्तरं पूर्वतः सुस्थमपि कालान्तरेण विक्रियते प्रवचनं तु न तथा कालत्रयेऽप्यविकृतत्वादिति निगमयन्नाह - 'अत्रित ' अवितथं = तथ्यम्, आह- सत्याऽवितथयोः पर्यायत्वात् पौनरुक्तचं कथं नेति ? उच्यते-पूर्वं सत्यार्थप्रतिपादकत्वात्सत्यमित्युक्तमिह तु सवस्वरूपत्वादवितथमिति 'अविसंधि = अव्यवच्छिन्नम्, एतच्च विदेहक्षेत्रमपेक्ष्योकं, भरत क्षेत्राच प्रदर्शक, अग्नि में तपाये हुए सोने के समान निर्मल (कषाय मलसे रहित), मायादि शल्यका नाशक, अविचल सुखका साधन-मार्ग, कर्मनाशका मार्ग, आत्मा से कर्मको दूर करनेका मार्ग, शीतलीभूत होनेका मार्ग, अवितथ अर्थात् तीनों कालमें भी अविनाशी, महाविदेह क्षेत्रकी अपेक्षा सदा और भरतक्षेत्र आदिकी अपेक्षा इक्कीस हजार वर्ष रहनेवाला और सब दुःखों का नाश करनेवाला मार्ग है। તપામેલા સેાના સમાન નિર્મૂલ ( કષાયમલથી રહિત ), માચાદિશલ્યનાશક, અવિચલ સુખના સાધન-માર્ગ, કનાશ કરવાને મા, માત્માને લાગેલાં કને દૂર કરવાના માર્ગ, શીતલીભૂત થવાને મા, અવિતથ અર્થાત ત્રણે કાલમાં અવિનાશી, મહાવિદેહ ક્ષેત્રની અપેક્ષા સદા અને ભરતક્ષેત્ર આદિની અપેક્ષા એકવીશ હજાર વ રહેવાવાળા અને સ` દુ:ખનેા નાશ કરવાવાળા માર્ગ છે.
टि. १- क्रियाविशेषमिदम् ।
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आवश्यकसूत्रस्थ पेक्षयैकविंशतिसहस्रावच्छिन्नवर्षाण्येव निरवच्छेदमवस्थितेः। 'सव्वदुक्खप्पडीगमगं' सर्वदुःखमक्षीणं=निःश्रेयसं तस्य मार्गः सर्वदुःखमक्षीणमार्गः ।
इत्थं प्रवचनस्य विशेषणबाहुल्येन यन्निर्गलितं तदाह-'इत्थंठिया' इस्थमिति 'अत्र' इत्यस्यार्थेऽव्ययम् , इत्थम् अत्र-प्रोक्तविशेषणविशिष्टे निर्ग्रन्थपवचने स्थिताः वर्तमानाः जीवाः पाणिनः, “सिझंति' सिध्यन्ति-सिदिगति प्राप्नुवन्ति 'अणिमाघष्टसिद्धियुक्ता भवन्ति वा । 'बुझंति ' बुध्यन्ते केवलिनो भवन्ति, 'मुच्चंति' मुच्यन्ते कर्मबन्धात्पृथग् भवन्ति 'परिनिव्वायंति' परिनिवान्ति-सर्वथा मुखिनो भवन्ति । ‘सम्बदुक्खाणमंतं करंति' सर्वाणि च तानि दुःखानि सर्वदुःखानि शारीरमानसादीनि तेषामन्तो नाशस्तं कुर्वन्ति । इत्वं ज्ञात्वा संसारसागरं तितीर्घरात्मानमुद्दिश्याऽऽह-तं' तम्=पूर्वोक्तविशेषणविशिष्टम् , 'धम्म' धर्म-निर्ग्रन्थपवचनस्वरूपम् ‘सदहामि' श्रद्दधे अयमेव केवलं संसारपारावारपारोत्तारक इति भावये । 'पत्तियामि' प्रत्येमि-विश्वा
इस मार्गमें रहे हुए प्राणी सिद्धगति से, अथवा अणिमा आदि आठ सिद्धियों से युक्त होते हैं, केवल पदको प्राप्त होते हैं, कर्मबन्ध से मुक्त होते हैं, सर्व सुख को प्राप्त होते हैं और शारीरिक मानसिक सर्व दुःखोंसे निवृत्त होते हैं। उस धर्मकी में श्रद्धा करता हूँ अर्थात् एक यही संसार समुद्र से तारनेवाला है ऐसी भावना करता हूँ, अन्तःकरण से प्रतीति करता हूं, उत्साहपूर्वक आसेवन करता हूँ, आसेवना द्वारा स्पर्श करता हूँ और प्रवृद्ध परि
આ માર્ગમાં રહેલા પ્રાણી સિદ્ધગતિથી અથવા અણિમાદિ આઠ સિદ્ધિઓએ યુકત હોય છે, કેવલપદને પ્રાપ્ત થાય છે, કર્મબન્ધથી મુકત થાય છે, સર્વ સુખને પ્રાપ્ત કરે છે અને શારીરિક માનસિક દુ:ખેથી નિવૃત્ત થાય છે. તે ધર્મની હું અઢા કરું છું અર્થાત્ આ સંસાર સમુદ્રથી તારવાવાળો તે એકજ છે એવી ભાવના કરૂં છું; અન્તઃકરણથી પ્રતીતિ કરૂં છું. ઉત્સાહપૂર્વક આસેવન કરું છું, આસેવના દ્વારા સ્પર્શ કરૂં છું, અને પ્રવૃદ્ધ પરિણામ-ઉચ્ચ ભાવથી પાલન કરૂં છું, અને સર્વથા નિરંતર આરાધના કરું છું. તે ધર્મમાં શ્રદ્ધા કરતો થક, પ્રતીતિ કરતો થક, રુચિ રાખતે
१- अणिमादयो यथा-"अणिमा महिमा चव गरिमा लघिमा तथा।
पाप्तिः प्राकाम्यमीशित्वं, वशित्वं चाष्टद्रियः" इति ॥
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मुनितोषणी टीका, पतिक्रमणाध्ययनम्-४ सभूमिं करोमि, यद्वा प्रतिपधे भीत्या प्रामोमि । 'रोएमि' रोचयामि=उत्साहातिरेकेणाऽऽसेवनाभिमुखो भवामि 'फासेमि' सेवनाद्वारेण स्पृशामि। 'पालेमि' प्रबुद्धपरिणामेन पालयामि । 'अणुपालेमि' अनु-अनुकूलं पालयामि, यद्वा सर्वतोभावेन करोमि । 'तं धम्म' तं धर्मम् , 'सहहंतो' श्रद्दधानः='प्रवचनमिदं सत्यमस्ती'-त्येवमात्मपरिणामं कुर्वाणः, 'पत्तियंतो' प्रतियन् विश्वासभूमि कुर्वन् , यद्वा प्रतिपद्यमानः पीत्या स्वीकुर्वाणः, 'रोएंतो' रोचयमानः= रुचिविषयं कुर्वाणः, 'फासंतो' स्पृशन्=आसेवमानः, 'पालंतो' पालयन्= पद्धपरिणामेन सेवमानः, 'अणुपालंतो' अनुपालयन् अनुकूलं पालयन् , यद्वा सर्वतोभावेन कुर्वन्, 'तस्स' तस्य पूर्वोक्तस्य 'केवलिपन्नत्तस्स' केवलिपज्ञप्तस्य, 'धम्मस्स' धर्मस्य, 'अब्भुटिओमि' अभ्युत्थितोऽस्मि उद्यतो भवामि ‘आराहणाए' आराधनायामर्थादासेवनाविषये, 'विरओमि' विरतोऽस्मि, निवृत्तोऽस्मि 'विराहणाए' विराधनायां-खण्डनायाम् । एष एवार्थों विभिघोच्यते-यत एवमतः-'असंजमं परियाणामि' असंयमःमाणातिपाताधकुशलानुष्ठानरूपः संयमाभावस्तं परिजानामिज्ञपरिज्ञावलेन ज्ञात्वा प्रत्याख्यानपरिज्ञया परित्यजामि। 'संजमं' सम-शोभनाः यमाः माणातिपातादिनिवृत्तिरूपा यस्मिन्, यद्वा संयम्यते निवर्त्यते सावधानुष्ठानादात्मा येन स संयमस्तम् 'उपसंपन्जामि' णाम (उच्चभाव) से पालता हूँ और सर्वथा निरन्तर आराधना करता हूँ। उस धर्ममें श्रद्धा करता हुआ, प्रतीति करता हुआ, रुचि रखता हुआ, स्पर्श करता हुआ, पालन करता हुआ और सम्यक् पालन करता हुआ उस केवलि प्ररूपित धर्म की आराधना के लिए मैं उद्यत हुआ हूँ, तथा सब प्रकार की विराधना से निवृत्त हुआ हूँ, अतएव असंयम (प्राणातिपात आदि अकुशल अनुष्ठान) की ज्ञपरिज्ञा से जानकर और प्रत्याख्यानपरिज्ञा से परित्याग कर सावद्य अनुष्ठानથકે, સ્પર્શ કરતે થકે, પાલન કરતે થકે, અને સમ્યફ પાલન કરતે થકે તે કેવલિ-પ્રરૂપિત ધર્મની આરાધના માટે હું તૈયાર થયે છું, તથા સર્વ પ્રકારની વિરાધનાથી નિવૃત્ત થયે છું, એટલા માટે અસંયમ (પ્રાણાતિપાત આદિ અકુશલ અનુષ્ઠાન) ને ઝપરિજ્ઞાથી જાણીને અને પ્રત્યાખ્યાનપરિણાથી પરિત્યાગ કરીને સાવધ અનુષ્ઠાન નિવૃત્તિરૂપ સંયમને સ્વીકાર કરું છું. મિથુનરૂપ અકૃત્યને છોડી
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आवश्यकसूत्रस्थ उपसम्पधे स्वीकुर्वे । 'अबंभ' अब्रह्म-मैथुनलक्षणाऽकुशलकर्म' 'परियाणामि' परिजानामि परित्यजामि। 'बंभ' ब्रह्म-मैथुनपरित्यागलक्षणं कुशलकर्म= शीलमित्यर्थः, 'उवसंपज्जामि' उपसम्पद्ये अङ्गीकुर्वे । एवम् -'अकप्पं' 'अकल्पम्= मुमुक्षुभिरनाचरितं 'कप्पं' कल्पःकरण-चरणस्वरूप आचारस्तम्, 'अन्नाणं' जीवादिवस्तुनो यथावस्थितस्वरूपानिर्णयलक्षणमज्ञानम्, 'नाणं' ज्ञायते परिच्छिघते वस्त्वनेनास्माद्वेति ज्ञानम् वस्तुयथावत्स्वरूपकं, यद्वा ज्ञातिर्ज्ञानं वस्तुयथावस्वरूपानुभवस्तत् , 'अकिरिय' अक्रियाम्, नबोऽत्र दुरर्थकबाढुष्टां क्रियामिति, यद्वा अभाशस्त्यार्थकोऽत्र नत्र, तेनाप्रशस्ता क्रियां नास्तिकवादस्वरूपामित्यर्थः 'किरिय' क्रिया सम्यग्न्यापारः, सम्यग्वादो वा ताम्, 'मिच्छत्तं' मिथ्यात्वं तत्त्वार्थाश्रद्धानं विपर्यस्तश्रद्धानमित्यर्थः, तथा चोक्तम्-'मिच्छत्तं जिणधम्मविवरीयं' इति । 'सम्मत्तं' सम्यक्त्वं-सामान्य विशेषाभ्यां जिनप्रणीतजीवादिपदार्थसार्थस्य श्रद्धानम् । 'अबोहिं ' अबोषि: आत्मनो मिथ्यात्वपरिणामस्तम्। 'बोहिं' बोधि: आत्मनः सकलदुःखक्षयनिदानजिनधर्मप्राप्तिस्तम्, 'अमग्गं' निवृत्तिरूप संयम को स्वीकार करता हूँ, मैथुनरूप अकृत्य को छोड कर ब्रह्मचर्यरूप शुभ अनुष्ठान को स्वीकार करता हूँ, अ. कल्पनीय को छोड कर करणचरणरूप कल्प को स्वीकार करता हूँ, अज्ञान को त्याग कर ज्ञान को अङ्गीकार करता हूँ, नास्तिक वादरूप अक्रिया को छोडकर आस्तिकवाद रूप क्रिया को ग्रहण करता हूँ, मिथ्यात्व को त्याग कर सम्यक्त्व को स्वीकार करता हूँ, आत्मा के मिथ्यात्व परिणामरूप अबोधि को छोड कर सकल दुःखनाशक जिनधर्मप्राप्तिरूप बोधि को ग्रहण करता हूँ और जिनमतसे विरुद्ध पार्श्वस्थ निहव तथा कुतीथि-सेवित अमार्ग બ્રહ્મચર્યરૂપ શુભ અનુષ્ઠાનને સ્વીકાર કરું છું. અકલ્પનીયને છોડીને કરણચરણ રૂપ ક૯પને સ્વીકાર કરું છું. અજ્ઞાનને છોડીને જ્ઞાનને અંગીકાર કરું છું. નાસ્તિકવાદરૂપ અક્રિયાને ત્યાગ કરીને આસ્તિકવાદરૂપ ક્રિયાને ગ્રહણ કરૂં છું. મિથ્યાત્વને ત્યાગ કરીને સમ્યકત્વને સ્વીકાર કરું છું. આત્માના મિથ્યાત્વપરિણામરૂપ અધિને છોડીને સકલ દુઃખને નાશ કરનાર જિનધર્મની પ્રાપ્તિરૂપ બધિને ગ્રહણ કરું છું, અને જિનમતથી વિરુદ્ધ પાર્થસ્થ નિદ્ધવ તથા કુતીર્થિ
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२७५ मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४ अमार्गः जिनवचनविरुद्धपार्श्वस्थ निवादिकुतीथिसंसेवितलक्षणस्तम्, 'मग' मार्गों ज्ञानादिरत्नत्रयस्वरूपस्तम्, छद्मस्थत्वात्समस्तदोषशुदिमाह-'जं संभरामि' यस्मरामि स्मृतिपथमानयामि, 'जं च न संभरामि' यच्च न स्मरामि छअस्थस्वेन विस्मृतिस्वाभाव्यात्स्मृतिपथं नाऽऽनयामि, 'जं पडिकमामि' यत्पतिका. मामि=ज्ञानं सत् प्रतिनिवर्त्तयामि परित्यजामि वा, 'जं च न पडिकमामि' यच्चाऽनाभोगादज्ञातं सूक्ष्मं न प्रतिक्रमितुं शक्नोमि, ' तस्स सव्वस्स देवसियस्स अइयारस्स पडिकमामि' निगदव्याख्यातमिदम् ।
___ इत्थं प्रतिक्रम्य संयतविरतादिविशेषणविशिष्टं स्वात्मानमनुस्मरन् सर्वसाधुवन्दनां करोति-'समणोह' श्राम्यति-तपस्यतीति श्रमणः, तपश्चरणशील: कश्चिदन्यो वा सम्भवतीत्यत आह-'संजयविरयपडिहयपच्चक्खायपावकम्मो' संयंतःवर्तमानकालिकसर्वसावद्यानुष्ठाननिवर्तकः, विरतः अतीतकालिकपापाज्जुगुप्सापूर्वकं भविष्यति च संवरपूर्वकं निवृत्तः, अत एन प्रतिहतं-सम्यकप्रकारेण को छोड कर ज्ञानादि रत्नत्रय रूप मार्ग को स्वीकार करता हूँ। इसी प्रकार जो अतिचार स्मरण में आता है या छद्मस्थ अवस्था के कारण स्मरण में नहीं आता है तथा जिसका प्रतिक्रमण किया हो या अनजानवश जिसका प्रतिक्रमण नहीं किया हो उन सब देवसिक अतिचारों से निवृत्त होता हूँ।
इस प्रकार प्रतिक्रमण करके संयत-विरतादिरूप निज आत्मा का स्मरण करता हुआ सष साधुओं का वन्दना करता है।
संयत ( वर्तमान में सकल सावद्य व्यापारों से निवृत्त) विरत (पहले किये हुए पापों की निन्दा और भविष्य काल के સેવિત અમાને છેડીને જ્ઞાનાદિ–રત્નત્રયરૂપ માર્ગને હું સ્વીકાર કરું છું. એ પ્રમાણે જે અતિચાર સ્મરણમાં આવે છે અથવા છદ્મસ્થ અવસ્થાના કારણે સ્મરણમાં ન આવે તથા જેનું પ્રતિક્રમણ કર્યું હોય અથવા અજાણપણાથી જેનું પ્રતિક્રમણ ન કર્યું હોય તે સર્વ દેવસિક અતિચારેથી નિવૃત્ત થાઉં છું.
આ પ્રમાણે પ્રતિક્રમણ કરીને સંયત-વિરતાદિરૂપ નિજ આત્માનું સ્મરણ કરતે થકે સર્વ સાધુઓને વંદના કરૂં છું.
સંયત (વર્તમાનમાં સર્વ સાવધ વ્યાપારથી નિવૃત્ત), વિરત (પ્રથમ કરેલા
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आवश्यकसुत्रस्व नाशितं प्रत्याख्यातं च-पूर्वकृतस्याऽतिचारस्य निन्दया, भविष्यतोऽकरणेन च निराकृतं पापकर्म पापानुष्ठानं येन स प्रतिहतपस्याख्यातपापकर्मा, संयतश्चासौ विरतश्च संयतविरतः, (विशेषणयोरपि परस्परविशेष्यविशेषणभावात्समासो गतपस्यागतादिवत्) संयतविरतश्चासौ प्रतिहतमत्याख्यातपापकर्मा चेति संयतविरतपतिहप्रत्याख्यातपापकर्मा, पुनः कीदृशोऽहम् ? 'अणियाणो' अनिदानः अकृतनिदानः, एतादृशो मिथ्यादृष्टिरपि सम्भवति तस्मादाह-'दिद्विसंपन्नो' दृष्टिसम्पन्नः सम्यग्दर्शनसहितः, अतएव 'मायामोसविवजिओ' मायामृषाविवर्जितः मायामृषावादाभ्यां रहितः, एवं भूत्वा 'अट्ठाइज्जेसु दीवसमुद्देसु' 'अद्भवतीयेषु द्वीपसमुद्रषु-जम्बूद्वीप-धातकीखण्ड-पुष्करार्द्धरूपेषु, ‘पन्नरसकम्मभूमीसु' पञ्चदशन कर्मभूमिषु कर्म कृषिवाणिज्यप्रभृति मोक्षानुष्ठानं वा तत्पधाना भूमयः कर्मभूमयः भरतपञ्चकैरवतपञ्चक-महाविदेहपश्चक-लक्षणास्तामु स्थिता इति शेषः, 'जावंति' यावन्तः, 'केइ' केचित् 'रयहरणमुहपत्तियगोच्छगपडिग्गहधारा' रजा बाबाभ्यन्तरं रजो हियते अपनीयतेऽनेनेति, हरत्यपनयतीति वा रजोहरणम् , तत्र लिये संवर करके सकल पापों से रहित), अतएव अतीत अनागत वर्तमान कालीन सब पापों से मुक्त, अनिदान-नियाणारहित, सम्यग्दर्शनसहित तथा माया मृषा का त्यागी ऐसा मैं श्रमण, अढार द्वीप पन्द्रह क्षेत्र (कर्मभूमियों) में विचरनेवाले, रजोहरण पूंजनी पात्र को धारण करने वाले और डोरासहित मुखवस्त्रिका को मुख पर बांधनेवाले, पांच महाव्रत के पालनहार और अठारह પાપની નિન્દા અને ભવિષ્ય કાલ માટે સંવર કરીને સર્વ પાપથી રહિત), એટલા માટે અતીત, અનાગત અને વર્તમાન કાલના સર્વ પાપોથી મુકત, અનિદાન-નિયાણા રહિત, સમ્યગદર્શન સહિત તથા માયામૃષાને ત્યાગી એ હું શ્રમણ, અઢી દ્વીપ સંબંધી પંદર ક્ષેત્રે (કર્મભૂમિ) માં વિચરવાવાળા, રજોહરણ પૂરું પાત્રને ધારણ કરવાવાળા અને દેરાસહિત મુખવાચિકાને મુખ પર બાંધવાવાળા, પાંચ મહાવ્રતના - પાલનહાર અને અઢાર હજાર શીલાંગરથના ધારણ કરનાર તથા આધાકર્મ આદિ
१-अर्दै वतीयं येषु तेऽद्धतृतीयास्तेषु । २-अर्थमात्रप्रदर्शनमिदं, व्युत्पत्तिस्तु 'रजसो हरण'-मित्येवेति प्रेक्षवतां सूक्ष्मेक्षिका ।
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सुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४ बाह्य पृथिव्यादिरजः, आभ्यन्तरंबध्यमानकर्मस्वरूपं, कारणे कार्योपचारात्, ननु-रजोहरणस्पर्शवशादल्पकायानां कुन्थु-मत्कुण-पिपीलिका-मशकादीनां जीवानां विनाशस्य, यथेच्छ गमनभोज्यादिव्याघातस्य प्रमृष्टरजःप्रभृतिभिः कदाचित् पिपीलिकादिविवरादिसंमुद्रणादिनोपघातस्य प्रायः प्रत्यक्षसिद्धत्वाद्रजोहरणं संयमयोगानां न कारणं प्रत्युताऽनर्थस्य, तस्मान्न धार्यमिति, हजार शीलाङ्गरथ के धारक तथा आधाकर्म आदि ४२ दोषों को टाल कर आहार लेने वाले, ४७ दोष टाल कर आहार भोगने वाले, अखण्ड आचार चारित्र को पालने वाले ऐसे स्थविरकल्पी जिनकल्पी मुनिराजों को 'तिक्खुत्तो' के पाठ से वन्दना करता हूँ।
__यहां पर रजोहरण धारण करने के विषयमें कोई शङ्का करता है कि-रजोहरण धारण करना एक प्रकार की हिंसा का कारण है; क्यों कि रजोहरण के स्पर्श से कुन्थु, पिपीलिका आदि छोटे २ जीवों के इच्छानुकूल चलने फिरने में बाधा हो सकती है, और इसके द्वारा एकत्रित की हुई धूली आदि से पिपीलिका आदि का विवर (दर) ढंक जाने पर उनका उपघात होना प्रायः प्रत्यक्ष सिद्ध है, इसलिये रजोहरण संयम योग का कारण नहीं है प्रत्युत अनर्थ का कारण है, अतः इसका धारण करना उचित नहीं है। ૪૨ દોષને ટાલી અહાર ગ્રહણ કરનારા, ૪૭ દોષ ટાલીને આહાર ભેગવવાવાળા, અખંડ આચાર ચારિત્ર પાલન કરવાવાળા એવા સ્થવિરક૯પી જિનક૯પી મુનિરાજોને તિખુત્તાના પાઠથી વંદના કરું છું
અહીં રજોહરણ ધારણ કરવા વિષે કઈ શંકા કરે છે કે-જેહરણ ધારણ કરવું એક પ્રકારની હિંસાનું કારણ છે. કારણ કે રજોહરણના સ્પર્શથી કંથવા, કીડી આદિ નાના નાના જીવોને સ્વઈચ્છા પ્રમાણે હરવા-ફરવામાં તકલીફ થઈ શકે છે. અને એના વડે એકઠી કરેલી ધૂલ આદિથી કીડી આદિના દર (રહેવાના દર) ઢંકાઈ જવાથી તે જીન ઉપઘાત થઈ જવું પ્રાય: પ્રત્યક્ષ સિદ્ધ છે. એટલા માટે રજડરણ સંયમ યોગોને સાધક નથી પરંતુ અનર્થનું કારણ છે, માટે એને ધારણ કરવું ઉચિત નથી.
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आवश्यकसूत्रस्थ अत्रोच्यते-अपरिज्ञातरजोहरणग्रहणाऽऽशयत्वाभ्रान्तोऽसि, येन नेत्रेऽङ्गलिदानतो हिचन्द्रादिप्रतिभानवद्रजोहरणधारणस्याऽन्यथात्वमिस्थमाशङ्कसे, इन्त विकृताङ्ग ! नासौ त्वत्पक्षः क्षोदक्षेमक्षमः, नहि वयं धृतरजोहरणा यूयमिव गजनिमीलिकया सञ्चरामः पर्यटामोऽन्यद्वा विश्चियवहरामो, येन रजोहरणस्पर्शादिना जीवल्लेशलेशोऽपि समुत्पधेत, चक्षुषा समीक्ष्य कुन्थुपिपीलिकादीनामनुपलम्भे सति उपलम्भेऽपि वा तद्रक्षणसक्षणतयैव तत्राऽप्यतिकोमलोर्णादिरचितेन रजोहरणेन प्रमाम इति कथमुपघातादिसम्भवः ? न ह्यपथ्याशिनोऽपरिपाकादिकायदोषसद्भावात्पथ्याशनं केनापि सद्विवेकजुषा विदुषा परिहीयते, जीवाधव
इस शंका (प्रश्न) का उत्तर देते हैं-अरे भ्राता! रजोहरण धारण करने के आशय से अनभिज्ञ होने के कारण आप भ्रान्त हैं। इस कारण आपका पक्ष तर्क की कसौटी पर खरा (बराबर) नहीं उतरता, क्यों कि बाह्य-पृथ्वी आदि रज और आभ्यन्तरबांधे हुए कर्मरूपी रज जिससे दूर किया जाय उसे रजोहरण कहते हैं। उस सुकोमल रजोहरण द्वारा हम उपयोग-सहित यत्नायुक्त प्रमार्जन करते हैं, इसलिये प्रमार्जन (पूंजने) से जीवोपघात होने की संभावना नहीं हो सकती।
___ यदि किसी को अपथ्य भोजन से अजीर्ण होजाय तो क्या पथ्याहारी लोग पथ्य भोजन करना छोड देंगे ! कदापि नहीं । इसी प्रकार यदि कदाचित् असंयमी द्वारा प्रमार्जन करते जीवोपघात
આ શંકાનો ઉત્તર આપે છે કે–અરે ભ્રાતા ! રજોહરણ ધારણ કરવાના આશયથી અનભિજ્ઞ હોવાના કારણે તું બ્રાન્ત છે. તેથી તમારો પક્ષ તર્કની કટી ઉપર બરોબર નથી ઉતરતે, કેમ કે બાહ્ય-પૃથ્વી આદિ રજ અને આભ્યન્તર-બાંધેલા કર્મરૂપી રજ જેનાથી દૂર કરી શકાય તેને રજોહરણ કહે છે. તે સુકોમલ રજોહરણ દ્વારા ઉપયોગ સહિત યતનાયુકત પ્રમાર્જન કરીએ છીએ, એ કારણે પ્રમાજન (પંજવા)થી જીપઘાતક થવાની સંભાવના નથી.
જે કદાચિત કેઈને અપથ્ય આહારથી અજીર્ણ થઈ જાય તે શું પથ્ય આહાર કરવાવાળા માણસે પથ્ય ખાવું છેડી દેશે! ન જ છેડે. એજ રીતે જે કદાચિત અસંયમી દ્વારા પ્રમાર્જન થાતા જીપઘાત થઈ જાય તે શું સંયમી રજોહરણને
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मुनितोषणी टीका, पतिक्रमणाध्ययनम्-४
२७९ लोकनपूर्वकेऽपि प्रमार्जने त्वत्कल्पितेन सम्भावितोपघातेन तु वयं नाऽपराध्यामो, न वा शास्त्रसिद्धान्तगन्धोऽपि तथा, यतो रजोहरणधारणतत्पमाननादिकमस्माभिर्जन्तुजातत्राणार्थमेव क्रियते नतूपघातधिया, अत एव व्याधिग्रस्तानां माणिनामुपकारार्थ चिकित्सता विज्ञेन विहिते चिकित्साप्रयोगे कदाचित्तेषां व्यापत्तौ सत्यामपि नासौ प्रायश्चित्ताईश्चिकित्सकः । किश्च यदि सम्मार्जनादिना कदाचित्संभावितं दोषमपेक्ष्य रजोहरणग्रहणप्रतिषेधाऽऽग्रहग्रहिलोऽसि, तदा मन्ये त्वयाऽशन-पानहो जाय तो क्या संयमी रजोहरण का त्याग करदें ! कदापि नहीं ! क्यों कि संयमी द्वारा जीवोपघात होने की संभावनाही नहीं है। जीवों को देखकर यत्नापूर्वक प्रमार्जन करने पर भी तुमने जो कल्पना की उस संभावित जीवोपघात का अपराध हमें नहीं लग सकता, इस कारण तुम्हारी शङ्का जरा भी शास्त्रानुकूल नहीं है। क्यों कि जीवों की रक्षा के लिये ही संयमी रजोहरण धारण करते हैं एवं उसके द्वारा प्रमार्जन करते हैं, उपघात के लिये नहीं। यदि उपकार की दृष्टि से रोगियों की चिकित्सा करने वाले वैद्य की चिकित्सा से किसी रोगी को किसी भी प्रकार की क्षति पहुंच भी जाय तो भी वह वैद्य अपराधी नहीं हो सकता, क्यों कि वैद्य रोगी की हितबुद्धि से ही चिकित्सा करता है।
इस पर भी यदि तुम रजोहरण धारण करने में आपत्ति समझते हो तो मैं मानता हूँ कि तुम्हें अशन, पान, भ्रमण, ત્યાગ કરી ઘે! ન જ કરે. કેમકે સંયમી દ્વારા જીપઘાત થવાની સંભાવના જ નથી. જેને જોતા થકા યત્નાપૂર્વક પ્રમાર્જન કર્યા છતાં તમે જે કલ્પના કરી તે સંભાવિત છપઘાતને અપરાધ અમને નથી લાગી શક્ત, એ કારણે તમારી શંકા જરાય શાસ્ત્રાનુકુલ નથી, કેમ કે સંયમી મુનિ જીવોની રક્ષા અર્થેજ રજોહરણ ધારણ કરે છે તેમજ તેના વડે પ્રમાર્જન કરે છે, જીપઘાત માટે નહીં. જે ઉપકારની દૃષ્ટિથી રેગિઓની ચિકિત્સા કરવાવાળા વૈદ્યની ચિકિત્સાથી કે રોગીને કોઈ પણ જાતની હાનિ પહોંચી પણ જાય તે પણ વૈદ્ય અપરાધી થઈ શકતે નથી, કારણ કે વૈદ્ય તે રેગીની હિતબુદ્ધિથીજ ચિકિત્સા કરવાવાળે છે.
તે છતાં જો તમે રજોહરણ ધારણ કરવામાં આપત્તિ માનશે તે મને માનવું
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२८.
आवश्यकसूत्रस्प
भ्रमण - भाषणो-स्थान- पार्श्व परिवर्तन - मलमूत्रत्यागादिकाः क्रिया अपि परिहरणीया एव स्युः, त्वत्संम्भावितस्योक्तदोषस्य कदाचित्ताभ्योऽपि सद्भावादिति कथं जीवसि ? कथं वा न निगृहीतोऽसीति ब्रूहि, तूष्णीं वाऽऽस्स्व, त्वत्पक्षे जीवदयास्वरूपमेव गगनकुसुमायत इति विभावय च । तस्मान्मुनीनां संयमनिर्वाहार्थ रजोहरणाद्युपकरणग्रहणं परमावश्यकमिति बोध्यम् ।
अत्र सक्षिप्तपूर्वोत्तरपक्षसङ्ग्रहगाथा अप्यन्यत्रोक्ता यथा
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१ ॥
केई भांति मूढा, संजमजोगाण कारणं नेत्रं । रहरणंति पमज्जण, - माईहुनघाय भावाओ मूइंगलिआईणं, विणाससंताणभोगविरहाई | रयदरिथगण - संस, - ज्जणाऽऽरणा होइ उवघाओ ॥ २ ॥ पडिले हिउं पमज्जण, - मुवघाओ कहणु तत्थ होज्जाउ ? | अप्पमज्जिउं च दोसा, वज्जाऽऽदागाढवोसिरणे ॥ ३ ॥ आय पर परिचाओ, दुहावि सत्थस्सऽकोसलं नूणं । संसज्जणाइदोसा, देहेव्वऽविहीर णो हुंति ॥ ४ ॥
भाषण, उत्थान ( उठना ), शयन, पार्श्वपरिवर्तन ( करवट बदलना ) और मल-मूत्र - परित्याग आदि क्रियाओं को भी छोडना होगा, क्यों कि तुम्हारे द्वारा कथित दोष इन क्रियाओं में भी आसकता है तो फिर बताओ कि जीवित ही कैसे रह सकोगे ? तुम्हारे कथनमें जीवदया का स्वरूप आकाशकुसुम के समान हो जायगा, यह भी सोचो। इसलिये ' किसी भी जीवको किसी प्रकारका कष्ट न पहुँचने पावे' इसी हेतु मुनियोंको रजोहरण आदि उपकरण धारण करना संयमनिर्वाह के लिये अत्यन्त आवश्यक है ! पडथे } तमोने अशन, पान, भ्रमणु, भाषण, उत्थान ( उठवुं), शयन, पार्श्वपरिवर्तन (પડખુ ફેરવવું) અને મલમૂત્ર પરિત્યાગ આદિ ક્રિયાઓને છેડી દેવી પડશે. કારણ કે તમારા તરફથી કથિત (કહેલ) દ્વેષ એ સર્વ ક્રિયાઓમાં પણ આવી શકે છે, તે પછી મ્હા કે જીવિતજ કઇ રીતે રહી શકશેા! તમારા કથનમાં જીવદયાનું સ્વરૂપ આકાશકુસુમ સમાન થઈ જશે. આ માટે ‘કોઇપણ જીવને કોઇ પ્રકારનું કષ્ટ ન પહોંચે ' આ હેતુથી સુનિયાને રજોહરણુ આદિ ઉપકરણ ધારણ કરવું સ ંયમનિર્વાહ અર્થે અત્યંત
આવશ્યક છે.
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
॥ छाया ॥ केऽपि भणन्ति मूढाः, संयमयोगानां कारणं नैवम् । रजोहरणमिति प्रमार्जनादिमिरुपघातभावात् ॥ १ ॥ मूइङ्गलिकादीनां, विनाशसन्तानभोग्यविरहादयः । रजोदरिस्थगनसंसर्जनादिना भवत्युपघातः ॥ २ ॥ प्रत्युपेक्ष्य प्रमार्जन,-मुपघातः कथं नु तत्र भवेत् । अपमृज्य च दोषा वा आदावागाढव्युत्सर्गे ॥ ३ ॥ आत्मपरपरित्यागो द्विधापि शास्त्रस्य (शासितुः) अकौशलं नूनम् । संसर्जनादिदोषा देहे इव अविधिना नो भवन्ति ॥ ४ ॥
इत्यास्तां विस्तरः, प्रकृतमनुस्रियते-मुखवत्रिका-वायुकायादियतनार्थ मुखोपरि दवरकेण बन्धनीयमष्टपुटमुपकरणम् , गुच्छकः पात्रादिपमार्जनीविशेषः, पूँजनी' इति भाषापसिद्धः, प्रतिगृह्णाति भक्तपानादिकं स्वस्मिन्नाधत्त इति प्रतिग्रहः भक्तपानादिपात्रम् , रजोहरणं च मुग्ववत्रिका च, गुच्छकश्च प्रतिग्रहश्चेति रजोहरणमुखवत्रिकागुच्छकप्रतिग्रहास्तान् धरन्ते ये ते रजोहरण-मुग्ववत्रिकागुच्छक-प्रतिग्रहधाराः । इत्थं निवादयोऽपि संभवन्तीति तदपाकरणार्थमाह'पंचमहन्मयधारा' पश्चमहाव्रतानिमाणातिपाताऽनृतभाषणाऽदत्ताऽऽदाना-ऽब्रह्मचर्यपरिग्रहव्युपरमलक्षणानि धरन्त इति पञ्चमहाव्रतधाराः । न केवलमेत एव किन्तूक्तगुणविशिष्टाः सन्तोऽपि- अट्ठारससहस्ससीलंगधारा' अष्टादशसहस्रशीलागधाराः । अष्टादशशीलाङ्गसहस्राणि तु यथा-यो न करोति मनसाऽऽहारसज्ञाविप्रयुतः श्रोत्रेन्द्रियसंवृतः शान्तिसम्पन्नः पृथिवीकायारम्भम् (१), एवमकायारम्भम् (२), तेजस्कायारम्भम् (३), वायुकायारम्भम् (४), वनस्पतिकायारम्भम् (५), द्वीन्द्रियारम्भम् (६), त्रीन्द्रियारम्भम् (७), चतुरिन्द्रियारम्भम् (८), पश्चेन्द्रियारम्भम् (९), अजीवारम्भं च (१०)। एते क्षान्तिपदेन
१-'........धाराः' कर्मण्यण् ।
२-निहनुवत इति निवाः, पचादेराकृतिगणलात्कर्तर्यच, यद्वा निहवः = अपलापोऽस्त्येषामिति निवाः, निदवशब्दादर्श आदिस्वान्मत्वर्थीयोऽच, सज्ञेयं तान्त्रिकी ।
३.-'........धाराः' कर्मण्यण् ।
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२८२
आवश्यकसूत्रस्व जाता दश । एवं मुक्ति (निलो भता) पदेन (१०), आर्नवेन (१०), मार्दवेन (१०), लाघवेन (१०), सत्येन (१०), संयमेन (१०), तपसा (१०), त्यागेन (१०), ब्रह्मचर्येण च (१०); जाताः सर्वे श्रोत्रेन्द्रियपदेन शतमेकम् (१००)। एवं चक्षुषा (१००), घ्राणेन (१००), रसनया (१००), स्पर्थेन च (१००), जाताः सर्वे आहारसज्ञापदेन शतानि पश्च (५००)। एवं भयसज्ञापदेन (५००), मैथुनसज्ञापदेन (५००), परिग्रहसज्ञापदेन च (५००)। जाताः सर्वे 'न करोति' पदेन सहस्रद्वयम् (२०००), ए 'न कारयति' पदेन(२०००), 'नानुजानाति' पदेन (२०००), जाताः सर्वेः 'मनसा' पदेन षट् सहस्राणि (६०००)। एवं वचसा (६०००), कायेन च (६०००); जाताः सर्वेऽष्टादश सहस्राणि शीलाङ्गानि, तानि धरन्ते इत्यष्टादशशीलासहस्रधारा इति । उनं च
जोए' करणे सण्णा, इंदिय भोम्माइ समणधम्मे य ।
अण्णोण्णेहि अब्भत्था, अट्ठारह सीलसहस्साइं ॥१॥ ' छाया-योगाः करणानि संज्ञा इन्द्रियाणि भूम्यादयः श्रमणधर्माश्च ।
अन्योन्यैरभ्यस्ता अष्टादशशीलसहस्राणि ॥१॥
अठारह हजार शीलाङ्गरथ ये हैं-१-पृथ्वीकाय आरम्भ, २अप्काय आरम्भ, ३-तेजस्काय आरम्भ, ४-वायुकाय आरम्भ, ५-वनम्पतिकाय आरम्भ, ६-बेन्द्रिय आरम्भ, ७-तेन्द्रिय आरम्भ, ८-चतुरिन्द्रिय आरम्भ, ९-पंचेन्द्रिय आरम्भ, १०-अजीव आरम्भ, ये १० भेद क्षान्ति के हुए, इसी प्रकार मुक्ति के (१०), आर्जव के (१०), मार्दव के (१०), लाघव के (१०), सत्य के (१०), संयम के (१०), तप के (१०), त्याग के (१०), ब्रह्मचर्य के (१०), ये सब श्रोत्रेन्द्रिय के १०० भेद हुए, इसी प्रकार चक्षुरिन्द्रिय के १००, घ्राणेन्द्रिय के १००, रसेन्द्रिय के १००, स्पर्शेन्द्रिय के १००, ये सष आहार संज्ञा के ५०० - भेद हुए, इसी प्रकार भयसंज्ञा के ५००, मैथुनसंज्ञा के ५००, और परिग्रहसंज्ञा के ५०० हुए, इस प्रकार सब २००० भेद हुए, इन्हें न करने, न कराने और न अनुमोदन करने के द्वारा तिगुना करने पर ६००० भेद हुए, इन्हें फिर मन, वचन, काया से तिगुना करने पर १८००० होते हैं।
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मुनितोषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४
२८३ अतएव, 'अक्खयाचारचरित्ता' आचार: आधाकर्मादिदोषपरित्यागः, चारित्रं-सामायिकादि, आचारश्च चारित्रं चेत्याचारचारित्रे, अक्षते अखण्डिते आचारचारित्रे येषां ते-अक्षताऽऽचारचारित्राः देशतः सर्वतश्चाऽविप्लुताऽऽचारचारित्रा इत्यर्थः । सम्पत्युपसञ्जिहीर्षयाऽऽह-'ते सव्वे' तान् सर्वान् गच्छगताँस्तनिर्गताँश्च जिनकल्पिकादीन् साधून 'सिरसा' शिरसा करशिरःसंयोगेनेति भावः, अग्रे 'मत्थएण' (मस्तकेन) इत्यस्योपादानात्, ‘मणसा' मनसा हृदयेन, 'मत्थएण' मस्तकेन=शिरसा नतेनेति शेषः, अतएव 'सिरसा' 'मत्थएण' इत्यनयोः पर्यायत्वेऽपि न पौनरुत्यम्, यत्तु पौनरुक्त्यभयाद्डलिकाप्रवाहेण वा 'मस्थएण वंदामि' इति वाचा वदेदिति व्याख्यानं तदत्यन्ताऽसामञ्जस्यात्सूत्राक्षराभिमायापरिज्ञानाद्वा विद्वदश्रद्धेयमेवेति सहृदयाः प्रमाणम् । न च'सिरसा' इत्यनेन कायिकस्य ‘मणसा' इत्यनेन मानसिकस्य च वन्दनस्योक्ती वाचिकस्यापि तस्योपादानमावश्यकमेवेति युक्तमेवेति वाच्यम्, 'तान् सर्वान् शिरसा मनसा मस्तकेन वन्दे' इत्युक्तौ वाचिकवन्दनस्यार्थापत्तिलभ्यत्वात् , नहि वापयोगं विनैवमुक्तिः 'समस्तीत्यास्तां तावत् । इत्थं सर्वसाधूनभिवन्ध निखिलपाणिजातक्षमापणपूर्वकं मैत्रीमभिव्यनक्ति-'सन्न.' इति 'सन्चजीवे' सर्वे च ते जीवाः सर्वजीवास्तान्=क्षुद्रक्षुद्रेतराखिलपाणिनः, 'खामेमि' क्षमयामि= सर्वेभ्यो जीवेभ्यः क्षमामभिकाङ्क्षामीत्यर्थः, 'सब्वे जीवा' सर्वे जीवाः 'मे' मम अज्ञानादिवशाजातमपराधमितिशेषः 'खमंतु' क्षमेरन् । 'मे' मम, 'सव्वभूएसु' सर्वभूतेषु, 'मित्ती' मैत्री मित्रभावः अस्तीत्यध्याहियते, 'यत्र
इस प्रकार सन्त मुनिराजों को वन्दना करके समस्त जीवों की क्षमापनापूर्वक मित्रभावना प्रकट करते हैं-'मैं सब जीवों से अपने अपराध की क्षमा मांगता हूँ और वे सभी मेरे अपराध की
એ પ્રમાણે સન્ત મુનિરાજોને વંદના કરીને સમસ્ત જીવેની ક્ષમાપનાપૂર્વક મિત્રભાવના પ્રગટ કરે છે. હું સર્વ જી પાસે મારા અપરાધની ક્ષમા માંગુ છું, અને
टि. १-समस्ति-संभवति ।
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आवश्यकसूत्रस्य काचन क्रिया नास्ति तत्रास्तिर्भवन्तीपरः' प्रयोकव्य'-इति वैयाकरणसिद्धान्तात् । 'केणवि' केनापि सह, सहार्थे तृतीया; ननु सहशब्दस्य तदर्यकशब्दान्तरस्य वा प्रयोगाभावेन कथं सहार्थे तृतीयेति चेन्मैवम् , 'पृथग्विनानानाभिस्ततीयाऽन्यतरस्या'-मित्यादाविव 'सहेनाऽमधाने' इतिन्यासेनैव योगार्थलाभे सिद्धे 'सहयुक्तेऽपधाने' इत्यत्र युक्तग्रहणं 'सहशब्दाभावेऽपि तदर्थमात्रसत्वे. ऽपि तृतीये'-ति बोधनार्थम् , अत एव 'वृद्धो यूने'-त्यादयो निर्देशा अपि संगच्छन्ते, एतेन 'वीरो युध्यति कर्मभिः' इत्यादिषु तृतीया कथमिति पत्युक्तमित्यलमिहातिप्रसङ्गेन, 'मज्झ' मम, 'वेरं' वैरं-विरोधः, 'न' नहि अस्तीतीहापि पूर्ववदध्याहृतं ज्ञेयम् । उक्तः क्षमापणापूर्वको मैत्रीभावः, सम्पति मङ्गलमयमुपसंहारमाह-'एवमहं' एवम् उनैः प्रकारैः अहमित्यात्मनिर्देशे, 'सम्म' सम्यक् यथावत् सम्यगित्यस्य सर्वैः क्तान्तैः सह सम्बन्धः, 'आलोइय' आलोच्य आलोचनाविषयीकृत्य, 'निंदिय' निन्दित्वा-स्वसाक्षिकं सम्यगविनिन्ध, 'गरहिय' गहित्वा-गुरुसाक्षिकं सम्यग्विनिन्ध, 'दुगुंछिय' जुगुप्सित्वा 'घिङ्मां पापकरं मूढधिय' मित्यादिभर्त्सनापूर्वकं निन्दित्वा, ‘तिविहेण' त्रयो विधाः प्रकारा यस्य स त्रिविधस्तेन-त्रिप्रकारेण वाङ्-मनः-कायलक्षणेन कृत-कारिता-ऽनुमोदित-लक्षणेन चेत्ययः । 'पडिक्कतो' पतिक्रान्तः= क्षालिताखिलातिचारमलतया परमशुचित्वमाप्तः, 'चउव्वीसं' चतुर्विंशतिम्= क्षमा करें, क्यों कि सब जीवों के साथ मेरा मित्रभाव है, किसी के भी साथ वैरभाव नहीं है। इस तरह विधिपूर्वक आलोचना, निन्दा, गर्दी और जुगुप्सा (पापकारी मुझ मूढात्मा को धिक्कार है તે સર્વ જી મારા અપરાધની ક્ષમા કરે, કારણ કે સર્વ જી સાથે મારે મિત્રભાવ છે, કેઈની સાથે મારે વૈરભાવ નથી. એ પ્રમાણે વિધિપૂર્વક આચના, નિન્દા, ગહ અને જુગુપ્સા (પાપકારી મારા મૂહાત્માને ધિકકાર છે ઈત્યાદિ રૂ૫) કરીને ત્રણ કરણ
२-भवन्तीपरः लट्परः भवन्तीति लटः संज्ञा पूर्वाचार्याणाम् । ३-युध धातोरात्मनेपदित्वाधुध्यतीति युधमिच्छतीति क्यजिति सिद्धान्तकौमुदी।
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मुनितोषणी टीका, पतिक्रमणाध्ययनम्-४ चतुर्विंशतिसंख्यकान् ‘जिणे' जिनान् रागद्वेषादिकर्मशत्रुजेतॄन् 'वन्दे' बन्दे स्तौम्यभिवादये च । चतुर्विंशतिजिनवन्दनयाऽध्ययनसमापनं मङ्गलार्थम् ।। मू० २२॥ इति श्रीविश्वविख्यात-जगवल्लभ-प्रसिद्धवाचक-पञ्चदशभाषाकलितललितकलापाऽऽलापक-प्रविशुद्धगधपद्यनैकग्रन्थनिर्मापक-वादिमानमर्दक-श्रीशाहूछत्रपतिकोल्हापुरराजपदत्त 'जैनशास्त्राचार्य'-पदभूषित--कोल्हापुरराजगुरु-बालब्रह्मचारि-जैनाचार्य-जैनधर्मदिवाकर-पूज्यश्रीघासीलाल-तिविरचितायां श्रीश्रमणसूत्रस्य मुनि
तोषण्याख्यायां व्याख्यायां चतुर्थ
प्रतिक्रमणाख्यमध्ययनं समाप्तम् ॥५॥ इत्यादि रूप) करके तीन करण और तीन योग से निर्मल बना हुआ मैं चौबीसों जिनेश्वरों को नमस्कार करता हूँ॥ ॥ सू० २२॥
॥ इति चतुर्थ अध्ययन सम्पूर्ण ॥ અને ત્રણ વેગથી નિર્મલ બનેલે હું વીસ જિનેશ્વરેને નમસ્કાર કરું છું. (સૂ૦ ૨૨)
अति चोथु मध्ययन स .
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७ कायोत्सर्गः
२८६-२९९
२८६
आवश्यकसुत्रस्य
। अथ पञ्चममध्ययनम् । अथ 'इच्छामि खमासमणो' इति पट्टिकां द्विः पठित्वा परमेष्ठिनां भाववन्दना विधातव्या, तदनु 'अनन्त चउवीसी जिन नमो' इत्यादि पठेत् । ततश्च
॥ अथ पञ्चम अध्ययन ॥ 'नमो चउवीस.' की पट्टी (पाटी) पूरी होने के बाद 'इच्छामि खमासमणो' की पट्टी दो बार बोलकर पंचपरमेष्ठी की भाववन्दना करनी चाहिये। पांच पदों की वंदना।
टि० १- पहिले पद श्री अरिहन्तजी जघन्य बीस तीर्थकरजी उत्कृष्ट एक सौ साठ तथा एक सौ सित्तर देवाधिदेवजी, उन में धर्तमान काल में बीस विहरमानजी महाविदेहक्षेत्र में विचरते हैं एक हजार आठ लक्षण के धारणहार, चौतीस अतिशय, पैंतीस वाणी करके विराजमान, चौसठ इन्द्रों के वन्दनीय, अठारह दोष रहित, बारह गुण सहित अनन्त-ज्ञान, अनन्त-दर्शन, अनन्त-चारित्र, अनन्त-बलवीर्य, अनन्तसुख, दिव्यध्वनि, भामण्डल, स्फटिक
अथ पयममध्ययन. "नमो चउवीसाए"n पाटी पूरी यया पछी "इच्छामि खामासमणो" ની પાટી બે વાર બોલીને પંચ પરમેષ્ઠીની ભાવવંદના કરવી જોઈએ.૧
પહેલાં ખામણાં-શ્રી અરિહંત દેવને
(બન્ને ઢીંચણ નીચાં ઢાળી ખામણાં બોલવા) પહેલાં ખામણાં શ્રી પંચ મહાવિદેહ ક્ષેત્રને વિષે જયવંતા તીર્થકર દેવ બિરાજે છે, તેમને કરું છું. તે સ્વામીના ગુણગ્રામ કરતાં જઘન્ય રસ ઉપજે તે કર્મની કોડી ખપે અને ઉત્કૃષ્ટો રસ ઉપજે તે આ જીવ તીર્થકર નામ ગોત્ર ઉપજે. હાલ બિરાજતા વીશ તીર્થકરોનાં નામ:
(१) श्री सीमध२ स्वामी, (२) श्री गुरोधर स्वामी, (3) श्री माहु स्वाभी, (४) श्री सुमाई स्वाभी (५) श्री सुगत स्वामी, (९) श्री स्वयंस स्वामी, (७) श्री
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सुनितोषणी टीका, कायोत्सर्गाध्ययनम्=५ सिंहासन, अशोकवृक्ष, कुसुमवृष्टि, देवदुन्दुभि, क्षत्र धरायें, चँवर विजावें, पुरुषाकार पराक्रम के धरणहार, अढाई द्वीप पन्द्रहक्षेत्र में विचरें, जघन्य दो क्रोड केवली और उत्कृष्ट नव क्रोड केवली केवलज्ञान केवलदर्शन के धरणहार सर्व द्रव्य क्षेत्र काल भाव के जाननहार।
ऐसे श्री अरिहन्त भगवन्त दीनदयाल महाराज आपकी (दिवस सम्बन्धी) अविनय आशातना की हो तो धारम्बार हे अरिहन्त भगवन् ! मेरा अपराध क्षमा करिये। हाथ जोड, मान मोड, शीस नमाकर १००८ वार नमस्कार करता हूँ।
तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं (करेमि) वन्दामि नमसामि सक्कारेमि सम्माणेमि कल्लाणं मंगलं देवयं चेइयं पज्जुवासामि मत्थएण वंदामि।
आप मांगलिक हो, उत्तम हो, हे स्वामी ! हे नाथ! आपका इस भव, पर भव, भव भव में सदा काल शरण हो।
अपमानन स्वामी (८) श्री मनतवीय स्वामी, (e) श्री सुरप्रभ स्वामी, (१०) श्री qिua स्वाभी, (११) श्री ११२ स्वामी, (१२) श्री यंदानन स्वामी, (१३) श्री यमाई स्वाभी, (१४) श्री भुगडेव स्वामी (१५) श्री श्वर स्वामी, (१९) श्री नेमप्र स्वामी, (१७) श्री वीरसेन स्वामी, (१८) श्री भडास स्वामी, (16) श्री १२६॥ स्वामी (२०) श्री अनितसेन स्वाभी.
તે જઘન્ય તીર્થકર ૨૦ અને ઉત્કૃષ્ટ હેય તે ૧૬, અગર ૧૭૦ તેમને મારી તમારી સમય સમયની વંદના હે!
તે સ્વામીનાથ કેવા છે ! મારા તમારા મન મનની વાત જાણે દેખી રહ્યા છે, ઘટઘટની વાત જાણી દેખી રહ્યા છે, સમય સમયની વાત જાણું દેખી રહ્યા છે, ચોદ રાજુલોક અંજલીજલ પ્રમાણે જાણી દેખી રહ્યા છે. તે સ્વામીને અનંત જ્ઞાન છે,
અનંત દર્શન છે, અનંત ચારિત્ર છે, અનંત તપ છે, અનંત પૈર્ય છે, અને અનંત વિર્ય છે; એ ષટ (છ) ગુણે કરી સહિત છે. ચેત્રીશ અતિશયે કરી બિરાજમાન છે, પાંત્રીશ પ્રકારની સત્ય વચન વાણીના ગુણે કરી સહિત છે, એક હજારને અષ્ટ ઉત્તમ લક્ષણે કરી સહિત છે, અઢાર દોષ રહિત છે, બાર ગુણે કરી સહિત છે, ચાર કર્મ ઘનઘાતિ
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आवश्यकसूत्रस्थ दूजे पद श्री सिद्ध भगवान महाराज पन्द्रह भेदे अनन्त सिद्ध हैं। आठ कर्म खपाय के मोक्ष पहुँचे हैं। (१) तीर्थसिद्धा (૨) અર્થસિદ્ધા, (૨) તીર્થ સિદ્ધા, (૪) અતીનિદ્રા (૬) - યુદ્ધવિરા (૬) પ્રત્યે કિલ્લા પુરોહિતસિદ્ધા), (૮) સ્ત્રીસિદ્ધા, () પુરિંદ્ધિા , (૨૦) નપુંજિઢિા , (૨૨) સિરા, ક્ષય કર્યા છે. બાકીના ચાર કર્મ પાતળાં પડ્યાં છે. મુકિત જવાના કામી થકા વિચરે છે, ભવ્ય જીવના સંદેહ ભાંગે છે. સગી, સશરીરી, કેવળજ્ઞાની, યથાખ્યાત ચારિત્રના ધરણહાર છે, ક્ષાયિક સમકિત, શુકલેશ્યા, શુભધ્યાન, શુભગ સહિત છે, ૬૪ ઇદ્રોના પૂજનીક, વંદનિક અર્થનિક છે. પંડિત વીર્ય આદિ અનંત ગુણે કરી સહિત છે.
ધન્ય તે ગ્રામ, નગર, રાજધાની, પુર, પાટણ જ્યાં જ્યાં પ્રભુ દેશના દેતા થકા વિચરતા હશે. ત્યાં ત્યાં રાઈસર, તલવર, માડંબી, કેડંબી, શેઠ, સેનાપતિ, ગાથાપતિ આદિ, સ્વામીની દેશના સાંભળી કર્ણ પવિત્ર કરતા હશે, સ્વામીનાં દર્શન દેદાર કરી નેત્ર પવિત્ર કરતા હશે, અનાદિક ચૌદ પ્રકારનું દાન દઈ કર પવિત્ર કરતા હશે, ચરણે મસ્તક નમાવી કાયા પવિત્ર કરતા હશે. વ્રત પચ્ચખાણ આદરી આત્માને નિર્મળ કરતા હશે અને પ્રશ્ન પૂછી મનનાં સંદેહ દૂર કરતા હશે, તેમને ધન્ય છે.
સ્વામીનાથ! આપશ્રી પંચ મહાવિદેહ ક્ષેત્રમાં બિરાજે છે, હું અપરાધી, દીનકિકર, ગુણહીન, અહીંયાં બેઠે છું. આજના દિવસ સંબંધી આપના જ્ઞાન, દર્શન ચારિત્ર, તપને વિષે અવિનય, આશાતના, અભકિત, અપરાધ કીધે હોય તે હાથ જોડી, માન મેડી, મસ્તક નમાવી, ભુજે ભુજે (વારંવાર) કરી ખમાવું છું. ( અહિં તિખુત્તાને પાઠ ત્રણવાર બોલવો)
બીજાં ખામણ-શ્રી સિદ્ધ ભગવંતોને
બીજા ખામણાં અનંતા સિદ્ધ ભગવંતજીને કરું છું. તે ભગવતજીના ગુણગ્રામ કરતાં જધન્ય રસ ઉપજે તે કમની કેડી ખપે, અને ઉત્કૃષ્ટો રસ ઉપજે તે જીવ તીર્થકરનામગોત્ર ઉપાજે. આ ભરતક્ષેત્રને વિષે આ વીશીમાં વીશ તીર્થકરે સિદ્ધ થયા, તેમના નામ કહું છું -
(૧) શ્રી ઋષભદેવ સ્વામી, (૨) શ્રી અજિતનાથ સ્વામી, (૩) શ્રી સંભવનાથ સ્વામી, (૪) શ્રી અભિનંદન સ્વામી, (૫) શ્રી સુમતિનાથ સ્વામી, (૬) શ્રી પદ્મપ્રભ સ્વામી
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मुनितोषणी टीका, कायोत्सर्गाध्ययनम्-५
२८९ (१२) अन्यलिंगसिद्धा (१३) गृहस्थलिंगसिद्धा (१४) एकसिद्धा (१५) अनेकसिद्धा, जहां जन्म नहीं, जरा नहीं, मरण नहीं, भय नहीं, रोग नहीं, शोक नहीं, दुःख नहीं, दारिद्रय नहीं, कर्म नहीं, काया नहीं, मोह नहीं, माया नहीं, चाकर नहीं, ठाकर नहीं, भूख नहीं, तृषा नहीं, जोत में जोत विराजमान, सकल कार्य सिद्ध करके चवदे प्रकारे पन्द्रह भेदे अनन्त सिद्ध भगवन्त हुए। अनन्तसुखों में तल्लीन, अनन्तज्ञान, अनन्तदर्शन, निरायाध, क्षायिक समकित, अटल अवगाहना, अमूर्ती, अगुरुलघु, अनन्तवीर्य, यह आठ गुण करके सहित हैं।
ऐसे श्री सिद्ध भगवन्तजी महाराज आपकी अविनयआशातना की हो तो बारम्यार हे सिद्ध भगवन् ! मेरा अपराध क्षमा करिये, हाथ जोड, मान मोड, शीस नमाकर तिक्खुत्ता के पाठ से १००८ बार नमस्कार करता हूँ।
(७) श्री सुपाचनाय स्वामी, (८) श्री यम स्वामी, (e) श्री सुविधिनाय स्वामी, (१०) श्री सनाय स्वामी, (११) श्री श्रेयांसनाय स्वामी, (१२) श्री वासुन्य स्वाभी, (१3) श्री विमानाय स्वामी, (१४) श्री सनातनाय स्वामी, (१८) श्री धर्मनाथ स्वामी, (१९) श्री शilतनाय स्वामी, (१७) श्री थुनाथ स्वामी, (१८) श्री १२नाय स्वामी, (१८) श्री मसिनाथ स्वामी, (२०) श्री मुनिसुव्रत स्वामी, (२१) श्री नभिनाय स्वामी, (२२) श्री नेमीनाथ स्वामी, (२३) श्री पार्श्वनाथ स्वामी, (२४) श्री (वी२ १५ भान) महावीर स्वामी.
આ એક એવીસી અનંત ચોવીશી પંદર ભેદે સીઝી બુઝી, આઠ કર્મક્ષય કરી મેક્ષ પધાર્યા, તેમને મારી તમારી સમય સમયની વંદના હેજે! આઠ કર્મનાં નામ-જ્ઞાનાવરણય, દર્શનાવરણીય, વેદનીય, મેહનીય, આયુષ્ય, નામ, ગેત્ર અને અંતરાય, એ આઠે કર્મક્ષય કરી મુકિત શિલાએ પહોંચ્યા છે, તે મુકિતશિલા કયાં છે!
સમપૃથ્વીથી ૭૯૦ જન ઉંચપણે તારા મંડળ આવે. ત્યાંથી દશ જજન ઉંચે સૂર્યનું વિમાન છે, ત્યાંથી ૮૦ જેજન ઉંચપણે ચંદ્રમાનું વિમાન છે, ત્યાંથી ચાર
જન ઉંચપણે નક્ષત્રનાં વિમાન છે, ત્યાંથી ચાર જજન ઉંચપણે બુધને તારે છે, ત્યાંથી ત્રણ જજન ઉંચપણે શુકનો તારે છે, ત્યાંથી ત્રણ જે જન ઉંચપણે બૃહસ્પતિને
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आवश्यक सूत्रस्य
तीजे पद श्री आचार्यजी छत्तीस गुण करके विराजमान पांच महाव्रत पालें, पांच आचार पालें, पांच इन्द्रिय जीतें, चार कषाय टालें, नव-वाड - सहित शुद्ध ब्रह्मचर्य पालें, पांच समिति तीन गुप्ति शुद्ध आराधें, यह ३६ गुण और आठ सम्पदा ( १ आचार सम्पदा, २ श्रुतसम्पदा, ३ शरीरसम्पदा, ४ वचन सम्पदा, ५ वाचनासम्पदा, ६ मतिसम्पदा, ७ प्रयोगसम्पदा, ८ संग्रहपरिज्ञासम्पदा ) सहित हैं ।
ऐसे आचार्य महाराज न्याय पक्षवाले, भद्रिकपरिणामी, परम पूज्य, कल्पनीय अचित्त वस्तु के ग्रहणहार, सचित्त के त्यागी, वैरागी, महागुणी, गुण के अनुरागी, सौभागी हैं । ऐसे श्री आचार्यजी महाराज आपकी ( दिवससम्बन्धी ) अविनय - आशातना की हो तो बारम्बार हे आचार्यजी महाराज ! मेरा अपराध क्षमा करिये, हाथ जोड मान मोड, शीस नमाकर तिवखुत्ता के पाठ से १००८ वार नमस्कार करता हूँ ।
તારા છે, ત્યાંથી ત્રણ જોજન ઉંચપણે મગળના તારા છે, ત્યાંથી ત્રણ જોજન ઉંચપણે છેલ્લા શનિશ્ચરના તારા છે એમ નવસેા જોજન લગી જ્યાતિષચક્ર છે
ત્યાંથી અસ ંખ્યાતા જોજન ક્રોડા ક્રોડી ઉંચપણે ખાર દેવલાક આવે છે. તેના नाम :- सुधर्म, ईशान, सनत्कुमार, भाडेन्द्र, ब्रह्मो, सांत, महाशु४, सहसार, भात, પ્રાણત. આરણ અને અચ્યુત, ત્યાંથી અસંખ્યાતા જોજનની ક્રોડા ક્રોડી ઉંચપણે ચડીએ त्या नव औदेयक आवे, तेनां नाम :- लद्दे, सुलछ, सुन्नन्ये, सुभाएगुसे, प्रियहं साणे, આમાટે, સુબિરૢ અને જસેધરે, તેમાં ત્રણત્રિક છે, પહેલી ત્રિકમાં ૧૧૧ વિમાન છે, ખીજમાં ૧૭ અને ત્રીજીમાં ૧૦૦ વિમાન છે. ત્યાંથી અસંખ્યાતા જોજનની ક્રોડાક્રોડી ઉંચાપણેએ ચડીએ ત્યારે પાંચ અનુત્તર વિમાન આવે, તેનાં નામ :- વિજય, વિજયંત જયંત અપરાજિત અને સર્વાર્થસિદ્ધ.
આ સર્વાર્થસિદ્ધ મહાવિમાનની ધ્વજાથી ખાર ત્તેજન ઉચપણે મુકિતશિલા છે. તે મુકિતશિલા કેવી છે ? પીસ્તાલીશ જોજનની લાંખી પહેાળી છે, મધ્યે આઠ જોજનની नडी छे. उतरतां छेडे भाभीनी पां पातजी छे. गोक्षीर, शंभ, चंद्र, અકરત્ન, રૂપાના પટ, મેાતીના હાર સાગરના પાણી થકી પણ અધિક उणी छे.
रतां य અને ક્ષીર
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नितोषणी टीका, कायोत्सर्गाध्ययनम्-५
२९१ चौथे पद श्री उपाध्यायजी, पच्चीस गुण करके सहित (ग्यारह अंग, बारह उपांग, चरणसत्तरी, करणसत्तरी-इन पच्चीस गुण करके सहित), ग्यारह अंग का पाठ अर्थ सहित सम्पूर्ण जानें, १४ पूर्व के पाठक और निनोक्त बत्तीस सूत्र के जानकार हैं।
તે સિદ્ધશિલા ઉપર એક જજન, તેના કેટલા ગાઉના છઠ્ઠા ભાગને વિષે સિદ્ધ ભગવંતજી નિરંજન નિરાકાર બિરાજી રહ્યા છે. તે ભગવંતજી કેવા છે? અવળું , અગંધ, અસે, અફસે, અમૂર્તિ, અવિનાશી, ભૂખ નહિ, દુઃખ નહિ, રાગ નહિ, શોક નહિ, જન્મ નહિ, જરા નહિ, મરણ નહિ, કાયા નહિ, કર્મ નહિ, અનંત અનંત આત્મિક સુખની લહેરમાં બિરાજી રહ્યા છે. ધન્ય સ્વામીનાથ? આપ શ્રી સિદ્ધક્ષેત્રને વિષે બિરાજે છે, હું અપરાધી, દીનકિંકર, ગુણહીન અહીં બેઠો છું, આપના જ્ઞાન દર્શનને વિષે આજના દિવસ સંબંધી અવિનય, અશાતના, અભકિત અપરાધ થયે હોય તે હાથ જોડી, માન મેડી, મસ્તક નમાવી ભુજે ભુ કરી ખમાવું છું. (અહીં તિખુત્તાને પાઠ ત્રણ વખત કહે.)
ત્રીજા ખામણાં-કેવળી ભગવાનને
ત્રીજાં ખામણાં પંચ મહાવિદેહ ક્ષેત્રને વિષે બિરાજતા જયવંતા કેવળી ભગવાનને કરું છું. તે સ્વામી જઘન્ય હોય તે બે ક્રોડ અને ઉત્કૃષ્ટ હોય તો નવઠોડ કેવળી, તે સર્વને મારી તમારી સમય સમયની વંદના હેજે. તે સ્વામી કેવા છે ? મારે તમારા મન મનની વાત જાણી દેખી રહ્યા છે, ઘટ ઘટની વાત જાણી દેખી રહ્યા છે, સમય સમયની વાત જાણી દેખી રહ્યા છે, ચૌદરાજુ લોક અંજલિ-જલપ્રમાણે જાણું દેખી રહ્યા છે, અનંત જ્ઞાન છે, અનંતુ દર્શન છે, અનંત ચારિત્ર છે, અનંતે તપ છે, અનંત પૈર્ય છે, અનંત વીર્ય છે-એ ષટે (છ) ગુણે કરી સહિત છે. ચાર કર્મ ઘનઘાતી ક્ષય કર્યા છે, બાકીનાં ચાર કર્મ પાતળાં પડયાં છે. મુકિત જવાના કામી થકા વિચરે છે, ભવ્ય જીના સંદેહ ભાંગે છે. સગી, સશરીરી, કેવળજ્ઞાની, કેવળદર્શની, યથાખ્યાત ચારિત્રના ધરણહાર છે, ક્ષાયિક સમકિત, શુકલ ધ્યાન, શુકલ લેશ્યા, શુભ ધ્યાન, શુભ ગ, પંડિત વીર્ય આદિ અનંત ગુણે કરી સહિત છે
ધન્ય તે સ્વામી ગામાગર, નગર, રાયાણી, જ્યાં જ્યાં દેશના દેતા થકા વિચરતા હશે, ત્યાં ત્યાં રાઈસર, તલવર, માડંબી, કેબી, શેઠ, સેનાપતિ, ગાથાપતિ આદિ સ્વામીની દેશના સાંભળી કર્ણ પવિત્ર કરતા હશે, તેમને ધન્ય છે? સ્વામીનાં દર્શન
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आवश्यक सूत्रस्य
પારદ અંગ-લાચારીન, સૂચનડાંગ, કાળાંગ, સમયયાંગ, માવતી, જ્ઞાતાધર્મથી, જીવાલા, અંતળવા, અનુસરોવવા, प्रश्नव्याकरण, विपाकसूत्र |
પદ્મવળા,
યાદ્ ઉપાંગ–૩વાર્ફ, રાયસેની, નીયાભિગમ, નમ્બૂદીવપન્નત્તી, ચપન્નત્તી, સૂપન્નત્તી, નિયાવહિયા, વ્વયંશિયા, પુર્વાિષા, પુખ્તવૃત્તિયા, જિલા
चार मूलसूत्र - उत्तराध्ययन, दशवैकालिकसूत्र, नन्दीसूत्र, अनुयोगद्वार |
चार छेद- दशाश्रुतस्कन्ध, बृहत्कल्प, व्यवहार सूत्र, નિશીયसूत्र, और बत्तीसवां आवश्यक, इत्यादि अनेक स्वसमय पर समय के जानकर, सात नय, निश्चय, व्यवहार, चार प्रमाण आदि स्वमत દેદાર કરી નેત્ર પવિત્ર કરતા હશે. તેમને ધન્ય છે. સ્વામીને અશનાદિક ચૌદ પ્રકારનું દાન દઈ કર પવિત્ર કરતા હશે, તેમને પણ ધન્ય છે.
ધન્ય સ્વામીનાથ ! આપ પચ મહાવિદેહ ક્ષેત્રને વિષે બિરાજે છે, હું અપરાધી દીનકિંકર ગુણહીન અહીં બેઠે। છુ. આજના દિવસ સંબંધી આપના જ્ઞાન, દર્શન, ચારિત્ર તપને વિષે અવિનય, આશાતના, અભિકત, અપરાધ થયા હાય, તેા હાથ જોડી, માન મેડી, મરતક નમાવી ભુજ ભુજો કરી ખમાવું છું. (અહીં તિમુત્તાના પાઠ ત્રણ વખત કહેવેા).
ચેાથા ખામણાં
ચેાથા ખામણાં ગણધરજી, આચાર્યજી, ઉપાધ્યાયજીને કરૂં છું. ગણુધરજી ખાવન ગુણે કરી સહિત છે, આચાર્યજી છત્રીશ ગુણે કરી સહિત છે, ઉપાધ્યાયજી પચ્ચીશ ગુણે કરી સહિત છે, મારા તમારા ધર્મગુરુ, ધર્માચાર્ય, ધર્મ ઉપદેશના દાતાર, પંડિતરાજ, મુનિરાજ મહાપુરુષ, ગીતા, બહુસૂત્રી, સૂત્રસિદ્ધાંતના પારગામી, તરણતારણુ, તારણી નાવા સમાન, સફ્રી જહાજ સમાન, રત્નચિંતામણિ સમાન, જિનશાસનના શણુંગાર, ધર્મોના નાયક, સઘના મુખી, સંઘના નાયક આદિ અનેક ઉપમાએ કરી બિરાજમાન હતા. ઘણા સાધુ-સાધ્વીએ આલેવી, પડિક્કમી, નિન્દી, નિ:શલ્ય થઈને પ્રાય: દેવલેાક પધાર્યા છે તેમના ઘણા ઘણા ઉપકાર છે.
આજ વર્તમાન કાળે તરણ, તારણ, તારી નાવા સમાન, સફી જહાજ સમાન, રત્નચિંતામણિ સમાન, જિનશાસનના શણુગાર, ધના નાયક, સંઘના મુખી, સંધના
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२९३ तथा अन्यमत के जानकार मनुष्य या देवता कोई भी विवाद में जिनको छलने में समर्थ नहीं, जिन नहीं पण जिन सरीखे, केवली नहीं पण केवली सरीखे हैं।
ऐसे उपाध्ययाजी महाराज मिथ्यात्वरूप अंधकार के मेटनहार, समकित रूप उद्योत के करनहार, धर्म से डिगते प्राणी को स्थिर करे, सारए, वारए, धारए इत्यादि अनेक गुण करके सहित हैं। ऐसे श्री उपाध्यायजी महाराज आपकी अविनय-आशातना की हो तो हे उपाध्यायजी महाराज ! मेरा अपराध बारम्बार क्षमा करिये, हाथ जोड, मान मोड, शीस नमाकर तिक्खुत्ता के पाठ से १००८ वार नमस्कार करता हूँ।
पांचवें पद "णमो लोए सव्वसाहूणं"-अढाईद्वीप पन्द्रह क्षेत्र નાયક આદિ અનેક ઉપમાએ કરી બિરાજમાન છે જે સાધુ-સાધ્વી વીતરાગ દેવની આજ્ઞામાં બિરાજતા હોય, તેમને મારી તમારી સમય સમયની વંદના હેજે.
તે સ્વામી કેવા છે? પંચ મહાવ્રતના પાલનહાર છે, પાંચ સમિતિએ અને ત્રણ ગુપ્તિએ સહિત, છકાયના પિયર, છકાયના નાથ, સાત ભયના ટાલણહાર, આઠ મદના ગાલણહાર, નવાવાડ વિશુદ્ધ બ્રહ્મચર્યના પાલણહાર, દશવિધ યતિ ધર્મના અજવાળક, બાર ભેદે તપશ્ચર્યાના કરણહાર, સત્તર ભેદે સંયમના ધરણહાર, બાવીશ પરિષહના જિતણહાર, સત્તાવીશ સાધુજીના ગુણે કરી સહીત, ૪૨-૪૭-૯૬ દોષ રહિત આહાર પાણીના લેનાર, બાવન અનાચારના ટાલણહાર, સચિત્તના ત્યાગી, અચેતના ભેગી, કંચન-કામિનીના ત્યાગી, માયા-મમતાના ત્યાગી, સમતાના સાગર, દયાના આગર, આદિ અનેક ગુણે કરી સહિત છે.
ધન્ય મહારાજ ! આપ ગામ, નગર, પૂર, પાટણને વિષે વિચરે છે, અમે અપરાધી, દીનકિકર, ગુણહીન અહીં બેઠા છીએ. આજના દિવસ સંબંધી આપના જ્ઞાન, દર્શન, ચારિત્ર, તપને વિષે અવિનય, આશાતના, અભકિત અપરાધ થયેલ હોય, તે હાથ જોડી, માન મેડી, મસ્તક નમાવી ભુજ ભુજે કરી ખમાવું છું. (અહીં તિખુત્તાને પાઠ ત્રણ વખત કહે).
પાંચમા ખામણા
પાંચમા ખામણા પાંચ ભરત, પાંચ ઈરવત. પાંચ મહાવિદેહ એ અઢી દ્વીપ
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आवश्यकमूत्रस्थ
रूप लोक के विषे सर्व साधुजी जघन्य दो हजार करोड, उत्कृष्ट नव हजार करोड जयवन्ता विचरें। पाँच महाव्रत पालें, पाँच इन्द्रिय जीतें, चार कषाय टालें, भावसच्चे, करणसच्चे, जोगसच्चे, क्षमावन्त, वैराग्यवन्त, मनसमाधारणीया, वयसमाधारणीया, कायसमाधारणीया, नाणसम्पन्ना, दंसणसम्पन्ना, चारित्तसम्पन्ना, वेदनीयसमाअहियासनीया, मरणांतिकसमाअहियासनीया हैं-ऐसे सत्ताईस गुण करके सहित, पाँच आचार पालें, छह काय की रक्षा करें, सात कुव्यसन, आठ मद छोडें, नववाड सहित ब्रह्मचर्य पालें, दस प्रकार यतिधर्म धारें, बारह भेदे तपस्या करें, सत्रह भेदे संयम पालें, अठारह पापों को त्यागें, बाईस परिषद जीतें, तीस महामोहनीय कर्म निवारें, तेतीस
आशातना टालें, पयालीस दोष टाल के आहार पानी लेवें, संतालीस दोष टाल के भोगें, बावन अनाचार टालें, तेडिया (बुलाया ) आवे नहीं, नातिया जीमे नहीं, सचित्त के त्यागी, अचित्त के भोगी, लोच करें, नंगे पैर चालें-इत्यादि कायाक्लेश करें और मोह-ममता-रहित हैं। ક્ષેત્રને વિષે બિરાજતા સાધુ સાધ્વીજીને કરું છું. તેઓ જધન્ય હોય તે બે હજાર ક્રોડ સાધુ-સાવી, અને ઉત્કૃષ્ટ હોય તે નવ હજાર ક્રોડ સાધુ- સાધ્વી, તેમને મારી તમારી સમય સમયની વંદના હેજે.
તે સ્વામી કેવા છે? પાંચ મહાવ્રતના પાલણહાર છે, પાંચ સમિતિઓ અને ત્રણ ગુપ્તિએ સહિત, છ કાયના પિયર, છ કાયના નાથ, સાત ભયના ટાલહાર, આઠ મદના ગાલણહાર, નવવાવિશુદ્ધ બ્રહ્મચર્યના પાલણહાર, દશવિધ યતિધર્મના અજવાલક, બાર ભેદે તપશ્ચર્યા કરણહાર, સત્તર ભેદે સંયમના ધરણહાર, બાવીશ પરિષહના તણહાર, સતાવીશ સાધુજીના ગુણે કરી સહિત, ૪૨-૪૭-૯૬ દોષ રહિત આહાર પાણીના લેવણહાર, બાવન અનાચારના ટાલણહાર, સચિત્તના ત્યાગી, અચેતના ભેગી, કંચન કામિનીના ત્યાગી, માયા-મમતાના ત્યાગી, સમતાના સાગર, દયાના આગર, આદિ અનેક ગુણે કરી સહિત છે.
घन्य स्वामीनाथ! मा५ गाम, नगर, ५२, पारने विभिन्न छ, અપરાધી, દીન કિકર, ગુણહીન અહીં બેઠે છું. આજના દિવસ સંબંધી આપના જ્ઞાન, દર્શન, ચારિત્ર, તપને વિષે અવિનય, આશાતના અભક્તિ, અપરાધ કીધે હોય તે
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सुनितोषणी टीका, कायोत्सर्गाध्ययनम् - ५
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ऐसे मुनिराज महाराज आपकी अविनय आशातना की हो तो हे मुनिराज ! मेरा अपराध बारम्बार क्षमा करिये। हाथ जोड, मान मोड, शीस नमाकर, तिक्खुत्ता के पाठ से १००८ बार नमस्कार करता हूँ ।
॥ दोहा ॥
अनन्त चौबीसी जिन नम्रं, सिद्ध अनन्ता कोड ! केवल ज्ञानी गणधरा, वन्दू बे कर जोड ॥ १ ॥ दोय कोडि केवलधरा, विहरमान जिन बीस । सहस्र युगल कोडी नमूं, साधु नमूं निशदीस ॥ २ ॥ धन साधु धन साधवी, धन धन है जिन धर्म । ये समय पातक झरे, टूटे आठो कर्म ॥ ३ ॥ अरिहंत सिद्ध समरूंसदा, आचारज उवज्झाय । साधु सकल के चरण को, बन्दु शीस अंगूठे अमरित वसे, लब्धि तणा श्री गुरु गौतम समरिये, वांछित फल दातार ॥ ५ ॥ लोभी गुरु तारे नहीं, तिरे सो तारण हार । जो तूं तिरियो चाह तो, निरलोभी गुरु धार ॥ ६ ॥ गुरु दीपक गुरु चांदणो, गुरु विन घोर अंधार । पलक न विसरूं तुमभणी, गुरु मुझ प्राण अधार ॥ ७ ॥
नमाय ॥ ४ ॥
भण्डार ।
હાથ જોડી, મસ્તક નમાવી ભુજો ભુો કરી ખમાવું છું. (અહીં તિખુત્તાના પાઠ ત્રણ વખત કહેવા.)
અને સાધુ-સાધ્વીજી બિરાજતાં હોય, તે નીચેની ગાથા ખેાલી ત્રણ વખત વિવિધ વંદના કરવી
સાધુ વન્દે તે સુખીયા થાય, ભવા ભવના તેા પાતક જાય, ભાવ ધરીને વંદે જેહ, વહેલા મુતે જાશે તેહ.
છઠ્ઠાં ખામણા
(છઠ્ઠાં ખામણા અઢીદ્વીપ માંહે અઢીદ્વીપ બહાર અસ ંખ્યાતા શ્રાવક- श्राविाने કરૂ છું. તે શ્રાવકજી કેવા છે?
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आवश्यक सूत्रस्य
॥ चौरासी लाख जीव योनि का पाठ ॥
सात लाख पृथ्वीकाय, सात लाख अप्काय, सात लाख ते काय, सात लाख वायुकाय, दश लाख प्रत्येक वनस्पतिकाय, चौदह लाख साधारण वनस्पतिकाय, दो लाख बेइन्द्रिय, दो लाख तेइन्द्रिय, दो लाख चाउरिन्द्रिय, चार लाख नारकी, चार लाख देवता, चार लाख तिर्यञ्च पंचेन्द्रिय, चौदह लाख मनुष्यकी जात ऐसे चार गति में चौरासी लाख जीव-योनि के सूक्ष्म बादर पर्याप्त अपर्याप्त जीवों में से हालते चालते उठते बैठते सोते किसी जीव का हनन किया हो, રાયા હો, હનતા પ્રતિ અનુમોદ્ન શિયાળે, સેવા હો, મેવા તે, किलामणा उपजाई हो, मन वचन काया करके अठारह लाख चौबीस
હુંથી તમથી, દાને, શીયળે, તપે, ભાવે, ગુણુ કરી અધિક છે, એ વખત આવશ્કય પ્રતિક્રમણના કરનાર છે, મહિનામાં બે, ચાર અને છ પાષાના કરનાર છે, સમકિત સહિત ખાર વ્રતધારી, અગિયાર પડિમાના સેવણુહાર છે, ત્રણ મનેાથના ચિંતવનાર છે, દુખળા-પાતળા જીવની દયાના અણુનાર છે, જીવ અજીવ આદિ નવ તત્વના જાણુનાર છે, એકવીશ શ્રાવકજીના ગુણે કરી સહિત છે, પધન પત્થર ખાખર લેખે છે, પરસ્ત્રી માત બેન સમાન લેખે છે, દૃઢધી, પ્રિયધમી, દેવતાના ડગાવ્યા ડગે નહિ એવા છે, ધર્મ'ના રંગ હાડ હાડની મીંજાએ લાગ્યા છે: એવા શ્રાવક, શ્રાવિકા, સંવર, પેાષા, પ્રતિક્રમણમાં બિરાજતા હશે તેમને આજના દિવસ સંબંધી અવિનય, આશાતના, અભકિત, અપરાધ કર્યાં હાય, તા હાથ જોડી, માન મેાડી, મસ્તક નમાવી. ભુને જો કરી ખમાવું છું)
સાધુ-સાધ્વીને વાંદું છું, શ્રાવક-શ્રાવિકાને ખમાવુ છું, ચેારાશી લાખ વાનિના જીવને ખમાવું છું:
૭ લાખ પૃથ્વીકાય, ૭ લાખ અપકાય, ૭ લાખ તેઉકાય ૭ લાખ વાયુકાય, ૧૦ લાખ પ્રત્યેક વનસ્પતિકાય, ૧૪ લાખ સાધારણુ વનસ્પતિકાય, ૨ લાખ એ ઇંદ્રિય, ૨ લાખ તેઈંદ્રિય, ૨ લાખ ચારેંદ્રિય, ૪ લાખ નારકી, ૪ લાખ દેવતા, ૪ લાખ તિ' ચ પંચેન્દ્રિય, ૧૪ લાખ મનુષ્ય જાતિ, એ ચોરાશી લાખ જીવાોનિના જીવને હાલતાં, ચાલતાં, ઉઠતાં, બેસતાં, જાણુતાં, અજાણતાં, હણ્યા હાય, હણાવ્યા હોય,
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सुनितोषणी टीका, कायोत्सर्गाध्ययनम् - ५
चतुरशीतिलक्षयोनिगतान् जीवान् क्षमाप्य सार्द्ध सप्तनवतिलक्षाधिकैककोटिकुलकोटिविराधनासम्बन्धि मिध्यादुष्कृतं दत्त्वा पापाटादशकपट्टिकामुच्चार्य कायोत्सर्गाभिस्य पञ्चमावश्यकस्याज्ञां गृह्णीयात् । तत्र पूर्वस्मिन्नध्ययने मूलोत्तर
अनन्तर 'अनन्तचउवीसी जिन नमो' इत्यादि पढे, बाद में चौरासी लाख योनि गत जीवों से क्षमापना करके एक करोड साढे સત્તાનવેરાણ (૨૦૭૦૦૦૦) રુ કોટિ (જોડી) નીયોં ની વિરાધનાसम्बन्धी मिथ्यादृष्कृत देकर और अठारह पापस्थान की पट्टी बोलकर गुरु से कायोत्सर्ग नामक पाचवें आवश्यक की आज्ञा ग्रहण करे ।
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ત્યાર બાદ ‘અનન્ત ચઉવીસી જિન નમે” ઈત્યાદિ બેલે, પછી ચેરાસી લાખ ચેનિગત જીવાની પાસે ક્ષમાપના માગીને એક કરેડ સાડા સત્તાણુ લાખ (૧૯૭૫૦૦૦૦) કુલ કેટી (કાડી) જીવેાની વિરાધના સબંધી મિથ્યા દુષ્કૃત આપીને અને અઢાર પાપ સ્થાનની પાટી મેલીને ગુરુપાસે કાર્યોત્સર્ગ નામના પાંચમાં આવસ્યકની અજ્ઞા ગ્રહણ કરવી.
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हजार एक सौ वीस (१८२४१२०) प्रकारे “ तस्स मिच्छामि दुक्कडं ' खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे ।
मित्ती मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झं न केणइ ॥ एवमहं आलोइय, निंदिय गरहिय दुगंछिउं सम्मं । तिविहेणं पडिक्कंतो, वंदामि जिणे चउव्वीसं ॥
દેવા હાય, ભેદ્યા હોય; પરિતાપના-કિલામના ઉપજાવી હોય, તે અહિન્ત અનંતા સિદ્ધ ભગવંતની સાખે “તસ્સ મિચ્છામિ દુક્કડ, ’
ખામેમિ સવ્વ જીવા સબ્વે જીવા ખમંતુ મે મિત્તીમે સભૂએસુ વેર મખ્ખુ ન કેણુઈ એવમહ આલાઇય નિંદિચગરહિયદુર્ગાછ સક્ષ્મ,
નિવિહેણું પડિકતે
વંદામિ જીણે ચઉન્નીસ
ખમાવું છું સ વેને,
સર્વા જીવા મને ક્ષમા આપજો સર્વ જીવે સાથે મારે મિત્રતા છે કેઇની સાથે મારે ઘેર નથી.
એ પ્રકારે હું આલેચના કરી, નિંદા કરી, (ગુરુની સાક્ષીએ) વિશેષે નિંદા કરી, દુગછા કરી
સમ્યક્ પ્રકારે, ત્રણ પ્રકારે (મન, વચન, કાયાએ) પ્રતિક્રમણ કરતા થકે ચેવિશ જનેશ્વર પ્રભુને વંદુ છુ
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आवश्यक सूत्रस्व
गुणेषु स्खलितस्य निन्दाऽभिहिता, इह त्वाचारप्रस्खलितस्य चारित्रपुरुषस्यातिचारलक्षणत्रणोत्पत्तिसम्भवात्तचिकित्सारूपः कायोत्सर्ग उच्यते, अथवा मोके प्रतिमिध्यात्वाविरत्यादिपञ्चविधप्रतिक्रमणद्वारा कर्माऽऽगमप्रतिरोध उपपादितः, इह तु कायोत्सर्गविधिना पूर्वसचितानां कर्मणां प्रक्षयो भवतीति प्रतिपाद्यते -' इच्छामि णं' इत्यादि
क्रमणाध्ययने
॥ मूलम् ॥
इच्छामि णं भंते तुब्भेहिं अब्भणुण्णाए समाणे । देवसियपायच्छित्तविसोहणहं करेमि काउस्सग्गं ॥ १ ॥
॥ छाया ॥
इच्छामि खलु भगवन् युष्माभिरभ्यनुज्ञातः सन् । दैवसिकप्रायश्चित्तविशोधनार्थं करोमि कायोत्सर्गम् ॥ १ ॥
॥ टीका ॥
व्याख्या प्रस्फुटा ॥ १ ॥
पूर्व (चौथे) अध्ययन में मूल और उत्तर गुणों में स्खलित की निन्दा कही है, इस पांचवें अध्ययन में आचार से स्खलित चारित्ररूप पुरुष के अतिचाररूप व्रण (घाव) होने के संभव से उस की चिकित्सारूप कायोत्सर्ग कहा जाता है । अथवा प्रतिक्रमणाध्ययन में मिथ्यात्व आदि पाँच प्रकार के प्रतिक्रमण द्वारा कर्मों के आगमन का प्रतिरोध किया गया है, और यहाँ कायोत्सर्ग द्वारा पूर्वसचित कर्मों का क्षय दिखलाया जाता है-' इच्छामि णं भंते' इत्यादि ।
પ્રથમ પહેલા (ચેાથા) અધ્યયનમાં મૂલ અને ઉત્તર ગુણેામાં સ્ખલિતની નિન્દા કહી છે. આ પાંચમાં અધ્યયનમાં આચારથી સ્ખલિત ચારિત્રરૂપ પુરુષના અતિચાર રૂપ ત્રણ (ધા) થવાના સંભવથી તેની ચિકિત્સારૂપ ક્રાર્યાંસ કહેલે છે, અથવા પ્રતિક્રમણાધ્યયનમાં મિથ્યાત્વ આદિ પાંચ પ્રકારના પ્રતિક્રમણ દ્વારા કર્માંના આવવાપણું:ને પ્રતિરેધ કરવામાં આવે છે, અને અહીં કાયેત્સ દ્વારા पूर्व संचित ना क्षय जताववामां आवे छे. (इच्छामि णं भंते ) छत्याहि.
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मुनितोषणी टीका, कायोत्सर्गाध्ययनम्-५
२९९ ___'करेमि भंते ? सामाइयं.' 'इच्छामि ठामि काउस्सग्गं.' ' तस्सोतरीकरणेणं.' इत्येताः सर्वाः पट्टिकाः पठित्वा कायोत्सर्ग विदध्यात् , तत्र 'लोगस्स उज्जोयगरे०' इति पट्टिकां वारचतुष्टयं मनसा संस्मृत्य सनमस्कार कायोत्सर्ग समाप्य च पुनरपि 'लोगस्स उज्जोयगरे०' इत्यादि पट्टिकां पूर्णामुच्चारयेत् , ततः 'इच्छामि खमासमणो०' इति पट्टिकां द्विः पठित्वा गुरुसमीपे प्रत्याचक्षीत ॥१॥ इति श्रीविश्वविख्यात-जगद्वल्लभ-प्रसिद्धवाचक-पञ्चदशभाषाकलितललितकलापाऽऽलापक-प्रविशुद्धगधपद्यनैकग्रन्थनिर्मापक-वादिमानमर्दक-श्रीशाहूछत्रपतिकोल्हापुरराजमदत्त 'जैनशास्त्राचार्य-पदभूषित--कोल्हापुरराजगुरु-बालब्रह्मचारि-जैनाचार्य-जैनधर्मदिवाकर-पूज्यश्रीघासीलाल-तिविरचितायां श्रीश्रमणमूत्रस्य मुनि
तोषण्याख्यायां व्याख्यायां पश्चम
कायोत्सर्गाख्यमध्ययनं समाप्तम् ।। ५॥ उसमें प्रथम 'इच्छामि णं भंते' की पट्टी से कायोत्सर्ग की प्रतिज्ञा करके करेमि भंते ! सामाइयं' और 'इच्छामि ठामि काउस्सग्गं.' तथा 'तस्सोत्तरीकरणेणं०' बोलकर कायोत्सर्ग करें' और कायोत्सर्गमें चार 'लोगस्स.' मनमें गिन कर नमस्कारपूर्वक कायोत्सर्ग की समाप्ति करें, फिर 'लोगम्स' की पट्टी प्रगट बोलें। तदनन्तर 'इच्छामि खमासमणो०' की पट्टी दो बार बोल कर गुरुके निकट प्रत्याख्यान करें ॥१॥
वमअध्ययन समाप्त ॥ तभा प्रथम 'इच्छामि णं भंते,' नी पायी योत्सना प्रतिज्ञा शन 'करेमि भंते सामाइयं' भने 'इच्छामि ठामि काउस्सग्गं' तथा 'तस्सोत्तरीकरणेणं' झालीन योस ४२वो भने योसभा या२ 'लोगस्स' मनभा या२६३ १२ मोदी नभ७२ पूर्व योत्सर्गी समाप्ति ४२वी, भने पछी 'लोगस्सी पारी प्रगट मालवी, ते पछी 'इच्छामि खमासमणो' नी पाटी मे पा२ मातीने गुरु सभापे प्रत्याज्यान ४२. (१)
ઈતિ પાંચમું અધ્યયન સંપૂર્ણ
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८ प्रत्याख्यानम्
३००-३२२
३००
आवश्यकसूत्रस्य
। अथ षष्ठमध्ययनम् । अनन्तरोके पश्चमाध्ययने पूर्वसश्चितानां कर्मणां प्रक्षयः प्रतिपादितः, सम्पतीह षष्टाध्ययने आगन्तूनां कर्मणां निरोधः पोच्यते, अथवा पूर्वत्र कायोत्सर्गद्वारा व्रणचिकित्सा सम्मोक्ता, चिकित्सोत्तरं च गुणप्रतिपत्तिर्भवतीतीह गुणधारणापराऽऽख्ये प्रत्याख्यानाध्ययने मूलोत्तरगुणधारणामाह-'दसविहे' इत्यादि।
॥ मूलम् ॥ दसविहे पञ्चक्खाणे पण्णत्ते तंजहा'अणागयमइकंतं, कोडीसहियं नियंटियं चेव । सागारमणागारं, परिमाणकडं निरवसेसं । संकेयं चेव अद्धाए, पञ्चक्खाणं भवे दसहा ॥सू० १॥
॥ छाया ॥ दशविधं प्रत्याख्यानं प्रज्ञप्तं तद्यथा-अनागतम्-(१) अतिक्रान्तम् (२) कोटिसहितं (३) नियन्त्रितं (४) चैव । साकारम् (५) आनाकार
अथ छठा अध्ययन पाचवें अध्ययनमें पूर्वसश्चित कर्मों का क्षय कहा गया है। इस छठे अध्ययनमें नवीन बन्धनेवाले कर्मों का निरोध कहा जाता है। अथवा पाचवें अध्ययनमें कायोत्सर्ग द्वारा अतिचाररूप व्रण की चिकित्सा का निरूपण किया गया है। चिकित्साके अनन्तर गुण की प्राप्ति होती है, इसलिये 'गुणधारण' नामक इस प्रत्याख्यान अध्ययनमें मृलोत्तर गुण की धारणा कहते हैं-'दसविहे पच्चखाणे' इत्यादि ।
અથ છઠું અધ્યયન પાંચમાં અધ્યયનમાં પૂર્વસંચિત કર્મોને ક્ષય કહેવામાં આવ્યું છે. હવે આ છઠા અધ્યયનમાં નવીન બન્ધ થવાવાળા કર્મોને નિરોધ કહેવામાં આવે છે. અથવા પાંચમાં અધ્યયનમાં કાર્યોત્સર્ગ દ્વારા અતિચાર રૂપ ત્રણ-ઘાવની ચિકિત્સાનું નિરૂપણ કરવામાં આવ્યું છે, ચિકિત્સા કર્યા પછી ગુણની પ્રાપ્તિ થાય છે, એ માટે “ગુણધારણ” નામના આ પ્રત્યાખ્યાન અધ્યયનમાં મૂલત્તર ગુણની धा२२॥ छे. 'दसविहे पञ्चक्रवाणे" त्यादि.
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मुनितोषणी टीका, प्रत्याख्यानाध्ययनम् - ६
३०१
(६) परिमाणकृतं (७) निरवशेषम् (८) । सङ्केतं (९) चैत्र अद्धायाः (१०) प्रत्याख्यानं भवति दशधा ।। सू० १ ॥ ॥ टीका ॥
' पच्चक्खाणे ' प्रत्याख्यायते = गुरुसाक्षिकं तदभावे स्वसाक्षिकं वा प्रतिषिध्यते हेयवस्तु, अनागतपापं वा येनेति प्रत्याख्यानम् | 'दसविहे' दशविधं ' पण्णत्ते' प्रज्ञप्तं भगवतेत्यर्थात् । ' तंजहा ' तद्यथा
भविष्य में लगनेवाले पापों से निवृत्त होने के लिये गुरुसाक्षी या आत्मसाक्षी से हेय वस्तु के त्याग करने को प्रत्याख्यान कहते हैं, वह दस प्रकार का है
ભવિષ્યમાં લાગવાવાળા પાપેથી નિવૃત્ત થવા માટે ગુરુની સાક્ષી અથવા તે આત્મની સાક્ષીથી હેય વસ્તુને ત્યાગ કરવે તેને પ્રત્યાખ્યાન કહે છે, તે દસ
प्राश्ना छे
१- 'प्रत्याख्यानम्' अत्र करणे, यद्वा भावे प्रत्याइ - पूर्वकात् चक्षिङ व्यक्तायां वाचि इत्यस्माल्ल्युटि, तस्यार्द्धधातुकत्वात्तस्मिन् परे चङिः ख़्शावादेशे, खुशाबः शकारस्य 'शस्य यो वे' ति यादेशे प्रत्याख्यानम् । यत्तु 'ख्या प्रकथने ' इत्यस्य प्रस्याङ्पूर्वकस्य ल्युडन्तस्य प्रत्याख्यानं भवती ' - ति ' तथा प्रत्याख्यातीति प्रत्याख्याते ' -ति च केचिदाहुस्तद्व्याकरणाज्ञानमूलकम्, 'ख्या प्रकथने ' इत्यस्य सार्वधातुकमात्रविषयकत्वात्, तदुकं 'सस्थानत्वं नमः ख्यात्रे' इति वार्तिके व्याकरणमहाभाष्यकारपतञ्जलिना - ' नमः ख्यात्रे' इत्यत्र चक्षिङः खुशाबा देशे शकारस्य 'शस्य यो वे' ति कृतो यादेशः 'शर्परे विसर्जनीयः' इति मृत्रं प्रत्यसिद्धः शर्परखर्परत्वाद्विसर्गस्य विसर्ग एव भवति न तु 'कुवो ५ क पौ चे' - ति सस्थानत्व (जिहामूलीयत्व) मिति 'नमः ख्यात्रे' इत्यत्र सस्थानत्वाभावश्च क्षिष्ङः ख्शाञादेशस्य प्रयोजनमितरथा जिह्वामूलीयस्य दुर्वारत्वात्, यदि तु 'ख्या प्रकथने' इत्यस्य तृनादौ प्रयोगः स्यानदास्मात्तृचि 'नमः ख्यात्रे ' इत्यत्र 'शर्परे० ' इत्यस्यामप्या जिहामूलीयो दुर्वारः स्यादिति भाष्यासङ्गतिः स्पष्टेव । अतएव 'पुंख्यानम् ' इत्यत्र 'पुमः खय्यम्परे' इति रुः, 'सौख्ये भवः' इत्यर्थे ' योपधाद्गुरूपोत्तमादि' - ति वुञ, 'आख्यातम्' इत्यादौ 'संयोगादेरातो धातोर्यत्रतः' इतिनिष्ठानत्वम्, 'पर्याख्यानम्, इत्यादौ णत्वं च 'शस्य यो वे' - त्यस्यासिद्धत्वेन नेति पश्चितमन्यत्र विस्तरेण ।
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आवश्यक सूत्रस्य
'अणागयं' अनागतं = वैयावृत्त्यादिकारणवशान्निर्दिष्ट समयात्प्रागेव तपःकरणम् (१) ‘अइकंतं' अतिक्रान्तं = निर्दिष्टसमयमतिक्रम्य तपोविधानम् (२) । ' कोडीसहियं' कोटिसहितम् = यया कोटया तपः समारब्धं तयैव तस्य परिसमापनम्, अर्थाच्चतुर्भक्तादिना समारब्धं तपश्चतुर्भक्तादिनैव समापनीयम् । 'णियंटियं' नितरां यन्त्रितं = प्रतिज्ञया प्रतिबद्धं नियन्त्रितम् = त्रैयावृत्यादिप्रगाढकारणसद्भावेऽपि ‘मयाऽवश्यमेवामुकदिवसे तपः कर्तव्य ' - मिति प्रतिज्ञायां कृतायां कारणे सत्यपि नियमिततपश्चरणम् (४) । एतच्च वज्रर्षभनाराचसंहननधारिणाऽनगारेणैव क्रियते । ' सागारं ' उत्सर्गाऽपवादहेतुगर्भेणाऽऽकारेण सह वर्तत इति साकारम्, इहोत्सर्गपक्षेऽनाभोग - सहसाकाराभ्यामवश्यं भाव्यम्, अपवादपक्षे च महत्तराद्याकारैः (५) । ' अणागारं ' अविद्यमाना आकारा:=
३०२
S
(१) अनागत- वैयावृत्त्य ( वेयावच्च ) आदि कारणवश नियत समय से पहले तप करना, (२) अतिक्रान्त-नियत समय के बाद तप करना, (३) काटिसहित - जिस कोटि (चतुर्भक्त आदि क्रम) से प्रारम्भ किया उसीसे समाप्त करना, (४) नियन्त्रित - वैयावृत्त्य (वेयावच्च) आदि प्रबल कारणों के हो जाने पर भी संकल्पित तप का परित्याग न करना, यह प्रत्याख्यान वज्रऋषभनाराचसंहननधारी अनगार ही कर सकते हैं । (५) सागार - जिसमें उत्सर्ग अवश्य रखने योग्य अण्णत्थणाभोग और सहसागार रूप तथा अपवाद ( महत्तर आदि) रूप आगार हो उसे सागार कहते हैं, (६) अणागार - जिसमें उक्त
(१) अनागत-वैयावृत्त्य (वैयावस्थ) आदि अशु वंश नियत ( निर्णय કરેલા) સમય પહેલાં તપ કરવું, (ર) અતિક્રાન્ત નિયત (નિર્ણય કરેલા) સમય પછી તપ કરવું, (૩) કેટિસહિત–જે ક્રુટિ (ચતુર્ભ`કત આદિ ક્રમ) થી પ્રારંભ કર્યાં તેનાથીજ સમાપ્ત કરવું, (૪) નિય ંત્રિત–વૈયાવૃત્ત્વ અદિ પ્રબલ કારણેા બની જાય તેપણુ સંકલ્પ કરેલા તપના પરિત્યાગ ન કરવે, આ પ્રત્યાખ્યાન વજાૠષભનારાચ–સંહનન-ધારી અણુગારજ पुरी शडे ઉત્સર્ગ અવશ્ય રાખવા યેાગ્ય "ग्याशुत्थशालोग" याने તથા અપવાદ ( મહત્તર–મોટા આદિ ) રૂપ આગાર ઢાય તેને (૬) અણુાગર-જેમાં કહેલા અપવાદ રૂપ આગાર (ટ) રાખવામાં નહિ આવે
छे, (५) सागार-नेमां
6"
સહસાગાર રૂપ ”
સાગાર કહે છે.
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३०३
मुनितोषणी टीका, प्रत्याख्यानाध्ययनम्-६ अनाभोगसहसाकारव्यतिरिक्ता महत्तरादयो यत्र तदनाकारम् (६)। 'परिमाणकडं' परिमाणं दत्त्यादिरूपं कृतं विहितं यस्मिंस्तत् (७)। 'निरवसेसं' निर्गतानि अवशेषाणि अवशिष्टान्यशनपानादीनि यत्र तत् , सर्वथाऽशनादिपरित्यागरूपमित्यर्थः (८)। ‘संकेयं' सङ्केतः अङ्गल्यादिचालनस्वरूपवितविशेषः, सोऽस्मिन्नस्तीति सङ्केतम्' –अङ्गुल्यादिसंङ्केतावधिकमित्यर्थः, मुष्टिमोचनाऽल्यादिपरिचालनादिक्रियातः मागेव प्रत्याख्यानमिति भावः (९)। ‘अद्धाए' अदा कालो मुहूर्तपौरुष्यादिकस्तस्याः (१०)। प्रत्याख्यानमिति दशस्वपि सम्बध्यते । अद्धापत्याख्यानं चानेकधा तदुपदर्यते(१) नमोकारसहियपच्चक्खाणं
उग्गए सूरे नमुक्कारसहियं पञ्चक्खामि चउविहंपि आहारं असणं पाणं खाइमं साइमं अन्नत्थणाभोगेणं (१) सहसागारेणं
(२) वोसिरामि । अपवाद रूप आगार (छूट ) न रक्खे जाय उसे अणागार कहते हैं, (७) परिमाणकृत-जिसमें दत्ति (दात) आदिका परिमाण किया जाय । (८) निरवशेष-जिसमें अशनादि का सर्वथा त्याग हो । (९) संकेतजिसमें मुट्ठी खोलने आदि का संकेत हो, जैसे-'मैं जबतक मुटटी नहीं खोलूंगा तयतक मेरे प्रत्याख्यान है' इत्यादि । (१०) अद्धाप्रत्याख्यान-मुहर्त पौरुषी आदि काल सम्बन्धी प्रत्याख्यान । इसके अनेक भेद है, उनमें से मुख्य २ दस भेद कहते हैं जो संस्कृत टीका में स्पष्ट है ॥ मू०१॥ તેને અણગાર કહે છે. (૭) પરિમાણકૃત-જેમાં દત્તિ ( દાત) આદિનું પરિમાણ ४२वामां आवे. (८) नि२५ोष-भां मनाना सर्वथा त्याग य. () संतજેમાં મુઠ્ઠી ખોલવા આદિના સંકેત હોય, જેવી રીતે કે – “હું જ્યાં સુધી મુઠ્ઠી નહિ ખેલું ત્યાં સુધી ભારે પ્રત્યાખ્યાન છે.” ઈત્યાદિ. (૧૦) અદ્ધાપ્રત્યાખ્યાનમુહૂર્ત પારુષી આદિ કાલ સંબન્ધી પ્રત્યાખ્યાન. તેના અનેક ભેદ છે, તેમાં મુખ્ય મુખ્ય દસ ભેદ કહે છે જે સંસ્કૃત ટીકામાં સ્પષ્ટ છે. (સૂ૦૧)
१ अर्श आदित्वान्मत्वर्थीयोऽच् ।
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३०४
आवश्यकमुत्रस्य (२) पोरिसीपञ्चक्खाणं
उग्गए सूरे पोरिसिं पञ्चक्खामि, चउविहंपि आहारं असणं पाणं खाइमं साइमं अन्नत्थणाभोगेणं (१) सहसागारेणं (२) पच्छन्नकालेणं (३) दिसामोहेणं (४) साहुवयणेणं (५) सब
समाहिवत्तियागारेणं (६) वासिरामि। एवं साड्ढपोरिसियं । (३) पुरिम (पूर्वार्द्ध)-पच्चक्खाणं
उग्गए सूरे पुरिमड्ढं पच्चक्खामि, चउविहंपि आहारं असणं पाणं खाइमं साइमं अन्नत्थणाभोगेणं (१) सहसागारेणं (२) पच्छन्नकालेणं (३) दिसामोहेणं (४) साहुवयणेणं (५) मह
त्तरागारेणं (६) सबसमाहिवत्तियागारेणं (७) वोसिरामि । (४) एगासण-बेआसण-पच्चक्खाणं
उग्गए सूरे एगासणं बेआसणं पच्चक्खामि, दुविहं तिविहं असणं पाणं खाइमं साइमं अन्नत्थणाभोगेणं (१), सहसागारेणं (२), सागारियागारेणं (३), आउट्टणपसारेणं (४), गुरुअब्भुटाणेणं (५) परिहावणियागारेणं (६), महत्तरागारेणं (७),
सवसमाहिवत्तियोगारेणं वोसिरामि । (५) एगहाणपञ्चक्खाणं
उग्गए सूरे एगहाणं पच्चक्खामि, चउविहंपि आहारं असणं . पाणं खाइमं साइमं अन्नत्थणाभोगेणं (१) सहसागारेणं (२) सागारियागारेणं (३), गुरु-अब्भुटाणेणं (४), पारिट्ठावणियागारेणं (५), महत्तरागारेणं (६), सबसमाहिवत्तियागारेणं (७) वोसिरामि।
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मुनितोषणी टीका, प्रत्याख्यानाध्ययनम्-६
३०५ (७) आयंबिलपच्चक्खाणं
उग्गए सूरे आयंबिलं पञ्चक्खामि-तिविहंपि आहारं असणं खाइमं साइमं अन्नत्थणाभोगेणं (१), सहसागारेणं (२), लेवालेवेणं (३), गिहत्थसंस) (४), उक्खित्तविवेगेणं (५), पारिट्टावणियागारेणं (६),महत्तरागारेणं (७), सबसमाहिवनियागारेणं
(८) वोसिरामि। (७) चउबिहारपञ्चक्खाणं• (क) उग्गए सूरे अभत्तहँ पञ्चक्खामि-चउविहंपि आहारं असणं
पाणं खाइमं साइमं, अन्नत्थणाभोगेणं (१), सहसागारेणं (२), पारिट्ठावणियागारेणं (३), महत्तरागारेणं (४) सब
समाहिवत्तियागारेणं (५), वोसिरामि । (ख) तिविहाहारपञ्चक्खाणं
उग्गए सूरे अभत्तहँ पञ्चक्वामि-तिविहंपि आहारं असणं खाइमं साइमं अन्नत्थणाभोगेणं (१), सहसागारेणं (२), पारिट्टावणियागारेणं (३), महत्तरागारेणं (2), सबसमाहिवत्तियागारेणं (५), पाणरसलेवेण वा अच्छेण वा
बहुलेण वा ससित्थेण वा असित्थेण वा बोसिरामि। (८) दिवसचरिमभवचरिमपञ्चक्खाणं
दिवसचरिमं भवचरिमं वा पच्चक्वामि-चउविहंपि आहारं असणं पाणं खाइमं साइमं अन्नत्थणाभोगेणं (१), सहसागारेणं (२), महत्तरागारेणं (३), सबसमाहित्तियागारेणं (४), वोसिरामि।
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आवश्वकसूत्रस्य (९) अभिग्गहपञ्चक्खाणं
उग्गए सूरे गंठिसहियं मुट्टिसहियं पञ्चक्खामि-चउबिहंपि आहारं असणं पाणं खाइमं साइमं अन्नत्थणाभोगेणं (१), सहसागारेणं (२), महत्तरागारेणं (३), सबसमाहिवत्तियागारेणं
(४) वोसिरामि। (१०) निविगयपच्चक्खाणं
उग्गए सूरे निविगइयं पञ्चक्खामि-चउविहंपि आहारं असणं पाणं खाइमं साइमं अन्नत्थणाभोगेणं (१), सहसागारेणं (२), लेवालेवेणं (३), गिहत्थसंसठेणं (४) उक्वित्तविवेगेणं (५), पडुच्चमक्खिएणं (६), पारिट्ठावणियागारेणं (७), महत्तरागारेणं (८), सबसमाहिवत्तियागारेणं (९) वोसिरामि ॥सू०१॥
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आगार
साह
महता
पा
लेवालेवेणी
विवेगेणं उक्खित्ता
अन्नस्थ
सम्व ..... सागा | आउ- | गुरु पारिट्ठा- गिहसहसापच्छन
|रिया | दृण अब्भुटावणियागारेण कालेणं मोहेणं वयणेणं संख्या प्रत्याख्यान
गारेणं पसारेणं णेणं | गारेणं . १ नवकारसी १ १ • • • • २ पौरुषी । १५१ १ १ । । । ३ पुरिमदद ४ एकाशन १ १ . . .।१ १।११ ।१। ५ एकलठाण १ | १ • • • १ १ १ ० १ १ . ६। आंबिल | १ १ . • • १ १ • • • १ | १ | १ | १
चउत्थ भक्त (उपवास) दिवसचरिम १ १ अभिग्रह १ १ नीवी १ १ ० ० . १ । १ . . . १ १ १ १
पणी टीका, प्रत्याख्यानाध्ययनम्-६
.
.
.
१म०
१
३०॥
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આાગાર
નાણા-ઉજાગર ST સમા મિ
પસાણ
-- અત્યસહસા પામેવય હિ
fa3911
ણણ
સ સકે ગિહત્ય વિવેગણું ઉફખિત્ત
ગુરુ અભુઠા.
આગાર સંખ્યા
દિલાસાહ/31 મહત્તસાગા-ક સંખ્યા પ્રત્યાખ્યાન ગારેણુકાલેણું] ]
| શું શિTગામ, કારસી નવકારસી
| • • • • • • • • • • • • • | પૌરષી પુરિમડૂઢ | એકાશન ૫ | એકલઠાણ ૧ | | | | | | | | | | • • • •
આંબિલા • ચઉથભકત ૧ ૧ ૦ | - - ૧ | ૧ • • • ૧ | ° ° ° | * | " ૮ દિવસચરિમ ૧
| અભિગ્રહ ૧ ૧ ૧૦ | નવી | ૦ | ૦ ૦ ૧ ૧ ૦ |
ચ6યલકત
૦ | 1
| ૧ભ૦
૦ |
૦
૪
૦ ||
आवश्यकसूत्र
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मनितोषणी टीका, प्रत्याख्यानाध्ययनम्-६
एवं यथाशक्ति प्रत्याख्याय गुरोरभिमुखस्तदभावे पूर्वाभिमुख उत्तराभिमुखो वा भूत्वा दक्षिणं जानु भूमौ संस्थाप्य वामं चोर्वीकृत्य साञ्जलिपुटं 'नमोत्थु णं' इति पठेत्, तथाहि
॥मूलम् ॥ नमोत्थुणं अरिहंताणं भगवंताणं आइगराणं तित्थयराणं सयंसंबुद्धाणं पुरिसुत्तमाणं पुरिससीहाणं पुरिसवरपुंडरीआणं पुरिसवरगंधहत्थीणं लोगुत्तमाणं लोगनाहाणं लोगहियाणं लोगपईवाणं लोगपजोअगराणं अभयदयाणं चक्खुदयाणं मग्गदयाणं सरणदयाणं जीवदयाणं बोहिदयाणं धम्मदयाणं धम्मदेसयाणं धम्मनायगाणं धम्मसारहीणं धम्मवरचाउरंतचक्कवट्टीणं दीवो ताणं सरणं गई पइट्टा अप्पडिहयवरनाणंदसणधराणं विअट्टछउमाणं जिणाणं जावयाणं तिन्नाणं तारयाणं बुद्धाणं बोहयाणं मुत्ताणं मोयगाणं सव्वन्नृणं सव्वदरिसीणं सिवमयलरुमयमणंतमक्खयमव्वाबाहमपुणरावित्तिसिद्धिगइनामधेयं ठाणं संपत्ताणं नमो जिणाणं जियभयाणं ॥ सू०२॥
॥ छाया ॥ नमोऽस्तु अद्भयो भगवद्भय आदिकरेभ्यस्तीर्थकरेभ्यः स्वयंसंबुद्धभ्यः पुरुषोत्तमेभ्यः पुरुषसिंहेभ्यः पुरुषवरपुण्डरीकेभ्यः पुरुषवरगन्धहस्तिभ्यो लोको
इस प्रकार यथाशक्ति प्रत्याख्यान करके गुरुके निकट और उनके न रहने पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुँह करके बैठे,
और दाहिने जानु (घुटने) को जमीनसे अडा कर बायें जानु को ऊंचा रखकर उसके उपर अञ्जलिपुट धरकर 'नमोत्थुणं' का पाठ बोले
આ પ્રમાણે યથાશક્તિ પ્રત્યાખ્યાન કરીને ગુરુની પાસે અને તેઓની હાજરી ન હોય તે પૂર્વ અથવા ઉત્તરદિશા તરફ મુખ રાખીને બેસવું અને જમણા પગના ઘુંટણને જમીનથી અડાવી અર્થાત નીચો રાખી તથા ડાબા ઘૂંટણને ઉંચે રાખી तना 6५२ २ सय २a "नमोत्यु णं" ने 48 सवा
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३१०
आवश्यक सूत्रस्य
तमेभ्यो लोकनाथेभ्यो लोकहितेभ्यो लोकप्रदीपेभ्यो लोकप्रद्योतकरेभ्यः, अभयदयेभ्यश्चक्षुर्दयेभ्यो मार्गदयेभ्यः शरणदयेभ्यो जीवदयेभ्यो बोधिदयेभ्यो धर्मदयेभ्यो धम्र्म्म देशकेभ्यो धर्मनायकेभ्यो धर्मसारथिभ्यो धर्म वर चातुरन्तचक्रवर्त्तिभ्यो द्वीपस्त्राणं शरणं गतिः प्रतिष्ठा अप्रतिहतवरज्ञानदर्शनधरेभ्यो व्यावृत्तच्छ्द्मभ्यो जिनेभ्यो जापकेभ्यस्तीर्णेभ्यस्तारकेभ्यो बुद्धेभ्यो बोधकेभ्यो मुक्तेभ्यो मोचके - सर्वज्ञेभ्यः सर्वदशिभ्यः शिवमचलमरुजमनन्तमक्षयमव्यावाधम पुनरा वृत्ति सिद्धिगतिनामधेयं स्थानं सम्प्राप्तभ्यो नमो जिनेभ्यो जितभयेभ्यः ।। सू० २ ॥
भ्यः
॥ टीका ॥
'नमोत्थु णं' नमोऽस्तु 'णं' इति वाक्यालङ्कारेऽव्ययम् । 'अरिहंताणं ' अरीन्= रागादिरूपान् शत्रून् घ्नन्ति =नाशयन्तीति व्युत्पत्त्याऽत्र सिद्धाऽर्ह तोरुभयोररिहन्तृपदेन ग्रहणं बोध्यं, तेभ्योऽरिहन्तृभ्यः, एवमग्रेऽपि सर्वत्रेदृशस्थले । 'भगवंताणं ' व्याख्यातो भगवच्छब्दार्थः । ' आइगराणं' आदौ = प्रथमतः स्वस्वशासनापेक्षया श्रुतचारित्रधर्मलक्षणं कार्य कुर्वन्ति तच्छीला आदिकेरास्तेभ्यः 'तिस्थयराणं ' तीर्यते= पार्यते संसारमोहमहोदधिर्येन यस्माद्यस्मिन्वेति तीर्थ = चतुर्विधः सङ्घस्तत्करणशीलत्वात् तीर्थकरास्तेभ्यः । ' सयंसंबुद्धाणं' स्वयं = परोपदेशमन्तरेण सम्बुद्धा:= सम्यक्तया बोधं प्राप्ताः - स्वयं सम्बुद्धास्तेभ्यः । ' पुरिसुत्तमाणं' पुरुषेषु उत्तमाः श्रेष्ठाः ज्ञानाद्यनन्तगुणत्रन्त्रात् इति पुरुषोत्तमास्तेभ्यः । पुरिससीहाणं ' पुरुषेषु सिंहा
कर्म रूप शत्रुको जीतने वाले अरिहन्त और सिद्ध भगवान को नमस्कार हो । श्रुतवारित्ररूप धर्मकी आदि करनेवाले, जिससे संसार समुद्र तिरा जाय उसे 'तीर्थ' कहते हैं, वह तीर्थ चार प्रकार का है - साधु साध्वी श्रावक श्राविका ! इस चतुर्विध संघ की स्थापना करने वाले, स्वयं बोधको पाने वाले, ज्ञानादि अनन्त गुणोंके
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કર્મરૂપ શત્રુને જીતવાવાળા અરિહન્ત અને સિદ્ધ ભગવાનને નમસ્કાર થાય. શ્રુતચારિત્ર રૂપ ધર્માંની આદિ કરવાવાળા, જેનાથી સંસારસમુદ્ર તરી શકાય તેને “ तीर्थ ” ुडे छे, ते तीर्थं यार प्रहारना छे, साधु-साध्वी, श्री मने श्रावि એ ચતુર્વિધ સ ંઘની સ્થાપના કરવાવાળા, સ્વયં બેધને પ્રાપ્ત કરવાવાળા, જ્ઞાનાદિ અનન્ત ગુણ્ણાના ધારક હાવાથી પુરુષામાં શ્રેષ્ઠ, રાગદ્વેષ આદિ શત્રુઓને પરાજય
१ - कृञो हेतुताच्छील्येति कर्तरि टः ।
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मुनितोषणी टीका, प्रत्याख्यानाध्ययनम्-६ रागद्वेषादिशत्रुपराजये दृष्टाद्भुतपराक्रमत्वादिति, यद्वा पुरुषाः सिंहा इवेति पुरुषसिंहास्तेभ्यः । 'पुरिसवरपुंडरीयाणं' पुण्डरीक-धवलकमलं, वरंच तत्पुण्डरीकं वरपुण्डरीकं-धवलकमलप्रधान, पुरुषोवरपुण्डरीकमिवेत्युपमितसमासे पुरुषवरपुण्डरीकं, पुरुषवरपुण्डरीकं च पुरुषवरपुण्डरीकं च पुरुषवरपुण्डरीकं चेत्यादिरीत्यैकशेषे पुरुषवरपुण्डरीकाणि, तेभ्यः, भगवतो वरपुण्डरीकोपमा च विनिर्गताऽशुभमलीमसत्वात् सः शुभानुभावैः परिशुद्धत्वाच, यद्वा यथा पुण्डरीकाणि पङ्काजातान्यपि सलिले वर्द्धितान्यपि चोभयसम्बन्धमपहाय निर्लेपानीव जलोपरि रमणीयानि सन्दृश्यन्ते निजानुपमगुणगणबलेन मुरासुरनरनिकरशिरोधारणीयतया:तिमहनीयानि परमसुखास्पदानि च भवन्ति तथेमे भगवन्तः कर्मपङ्काजाता भोगाम्भीवर्दिताः सन्तोऽपि निर्लेपास्तदुभयतिवर्तन्ते गुणसम्पदाऽऽस्पदतया चं केवलादिगुणभावादखिलभन्यजनशिरोधारणीया भवन्तीति, विस्तरस्त्वत्र शास्त्रान्तरेभ्योऽवलोकनीयः । 'पुरिसवरगंधहत्थीणं' गन्धयुक्ता हस्तिनो गन्धधारक होनेसे पुरुषों में श्रेष्ठ, राग द्वेष आदि शत्रुओंका पराजय करनेमें अलौकिक पराक्रम शाली होनेसे पुरुषों में सिंह के समान, समस्त अशुभ रूप मलसे रहित होने के कारण विशुद्ध, श्वेतकमल के समान निर्मल, अथवा जैसे कीचड से उत्पन्न और जलके योग से बढा हुआ होकर भी कमल उन दोनों के संसर्ग को छोड कर सदा निर्लेप रहा करता है और अपने अलौकिक सुगन्धि आदि गुणों से देव मनुष्य आदि के शिरोभूषण बनता है, वैसेही भगवान कर्मरूप कीचड से उत्पन्न और भोगरूप जलसे बढे हुए होकर भी उन दोनों के संसर्ग को छोडकर निर्लेप रहते हैं, और केवलज्ञान आदि गुणों से परिपूर्ण रहने के कारण भव्यजनों के शिरोधार्य होते કરવામાં અલૌકિક પરાક્રમશાલી હોવાથી પુરુષમાં સિંહ સમાન, સર્વ પ્રકારના અશુભ રૂપ મલથી રહિત હોવાના કારણે વિશુદ્ધ વેત કમલના જેવા નિર્મલ, અથવા જેમ કાદવમાંથી ઉત્પન્ન અને જલ-પાણીના વેગથી વધેલો હોવા છતાં કમલ એ બન્નેને સંસર્ગ ત્યજી હમેશાં નિર્લેપ રહે છે અને પિતાના અલૌકિક સુગંધ આદિ ગુણેથી દેવ મનુષ્ય આદિના શિરનું આભૂષણ બને છે. તેવી જ રીતે ભગવાન કર્મરૂપ કાદવથી ઉત્પન્ન અને ભૂગરૂપ જલથી વધીને પણ એ બન્નેને સંસર્ગ ત્યજી નિર્લેપ રહે છે, અને કેવલ જ્ઞાન આદિ ગુણેથી પરિપૂર્ણ રહેવાના કારણે ભવ્ય જીવને શિરે ધાર્ય
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३१२
आवश्यकसूत्रस्य हस्तिनः, वराश्च, ते गन्धहस्तिनो वरगन्धहस्तिनः, पुरुषा वरगन्धहस्तिनः पुरुषवरगन्धहस्तिनस्तेभ्यः । गन्धहस्तिलक्षणं यथा
“ यस्य गन्धं समाघ्राय, पलायन्ते परे गजाः ।
तं गन्धहस्तिनं विद्यान्नृपतेविजयावहम्" ।। इति । अत एव यथा गन्धहस्तिगन्धमाघ्राय गजान्तराणीतस्ततो हुतं पलाय्य क्वापि निलिलीषन्ते तद्वदचिन्त्यातिशयभभाववशाद्भगवद्विहरणसमीरणगन्धसम्बंध'गन्धतोऽपीति-डमर-मरकादय उपद्रवा द्राग् दिक्षु प्रद्रवन्तीति, गन्धगजाश्रितराजवद्भगवदाश्रितो भव्यगणः सर्वदा विजयवान् भवतीति भवत्युभयोयुकं सादृश्यम्, एतच्चेह सर्वत्र चन्द्रमुखादिवदेकदेशिकतयैव न सर्वव्यापकतयेति . नात्र कश्चिदपि विपश्चिता केनापि कर्ने क्षमः क्षोदक्षेमः । 'लोगुत्तमाणं' लोकेषु भव्यसमाजेषु उतमाश्चतुस्त्रिंशदतिशय-पञ्चत्रिंशद्वाणीगुणोपेतत्वात् तेभ्यः । 'लोगहैं। जिसका गन्ध सूंघते ही सब हाथी डर के मारे भग जाते हैं उस हाथी को 'गन्धहस्ती' कहते हैं, उस गन्धहस्ती के आश्रय से जैसे राजा सदा विजयी होता है उसी प्रकार भगवानके अतिशय से देशके अतिवृष्टि-अनावृष्टि आदि स्वचक्र-परचक्र-भयपर्यन्त छह प्रकार की ईति, और महामारी आदि सभी उपद्रव तत्काल दूर होजाते हैं, और आश्रित भव्यजीव सदा सब प्रकार से विजयी होते हैं। चौंतीस अतिशयों और वाणी के पैंतीस गुणों से युक्त होने के कारण लोगों में उत्तम, अलभ्य रत्नत्रय के लाभरूप योग થાય છે જેનો ગંધ સુંઘતા જ સર્વ હાથી ડરીને ભાગી જાય છે તે હાથીને ગબ્ધ હસ્તી” કહે છે તે ગંધહસ્તીના આશ્રયથી જેમ રાજા હમેશાં વિજયી થાય છે તે પ્રમાણે ભગવાનના અતિશયથી દેશને અતિવૃષ્ટિ અનાવૃષ્ટિ આદિ સ્વચક્ર પરચક્ર -ભય પર્યન્ત છ પ્રકારની ઈતિ અને મહામારી આદિ સર્વ ઉપદ્ર તત્કાલ દૂર થઈ જાય છે, અને આશ્રિત ભવ્ય જી સદાય સર્વ પ્રકારથી વિજયવાન થાય છે ત્રીશ અતિશયે અને વાણીના પાંત્રીશ ગુણોથી યુક્ત હોવાના કારણે લોકોમાં ઉત્તમ, १-गन्धतः लेशत इत्यर्थः,"गन्धो गन्धक आमोदे लेशे संबन्धगर्वयोः” इति कोशात् ।
२-ईतयो यथा-"अतिवृष्टिरनावृष्टिमूषिकाः शलभाः खगाः"। प्रत्यासन्नाश्च राजानः षडेता ईतयः स्मृताः ॥” इति ।
३-सादृश्यम् ।
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मुनितोषणी टीका, प्रत्याख्यानाध्ययनम्-६
३१३ नाहाणं' लोकानां भव्यानां नाथा: नेतारो योग'-२क्षेमकरत्वादिति लोकनाथास्तेभ्यः, 'लोगडियाणं' लोकः एकेन्द्रियादिः सर्वप्राणिगणस्तस्मै हिताः रक्षोपायपथप्रदर्शकत्वाल्लोकहितास्तेभ्यः। 'लोगपईवाणं' लोकस्य भव्यजनसमुदायस्य प्रदीपास्तन्मनोऽभिनिविष्टानादिमिथ्यात्वतमःपटलव्यपगमेन विशिष्टात्मतत्त्वप्रकाशकत्वाद्दीपतुल्यास्तेभ्यः, यथा प्रदीपस्य सकलजीवार्थ तुल्यप्रकाशकत्वेऽपि चक्षुष्मन्त एव तत्मकाशमुखभाजो भवन्ति न त्वन्धास्तथा भव्या एव भगवदनुभावसमुद्भूतपरमानन्दसन्दोहभाजो भवन्ति नाभव्या इति प्रतिबोधयितुं प्रदीपदृष्टान्तः, अत एव च लोकपदेन भव्यानामेव ग्रहणम् । 'लोगपज्जोयगराणं' लोकशब्देनात्र-लोक्यते-दृश्यते केवलाऽऽलोकेन यथावस्थिततयेति व्युत्पत्त्या
और लब्ध रत्नत्रय के पालनरूप क्षेम के कारण होनेसे भव्य जीवों के नायक । एकेन्द्रिय आदि सकल प्राणिगण के हितकारक । जिस प्रकार दीपक सबके लिये समान प्रकाशकारी है तो भी नेत्रवाले ही उससे लाभ उठा सकते हैं, नेत्रहीन नहीं; उसी प्रकार भगवान का उपदेश सबके लिये समान हितकर होने पर भी भव्यजीव ही उससे लाभ उठाते हैं, अभव्य नहीं, अतएव भव्यों के हृदय में अनादिकालसे रहे हुए मिथ्यात्वरूप अन्धकार को मिटाकर आत्माके यथार्थ स्वरूप को प्रकाशित करनेवाले । 'लोक' शब्दसे यहा लोक
और अलोक दोनों का ग्रहण है, अतएव केवलज्ञान रूपी आलोक અલબ્ધ રત્નત્રયના લાભરૂપ યોગ અને લબ્ધ રત્નત્રયના પાલનરૂપ ક્ષેમના કારણ હોવાથી ભવ્ય જીના નાયક, એકેન્દ્રિય આદિ સકલ પ્રાણિગણુના હિતકારક. જે પ્રમાણે દીપક સર્વને માટે સમાન પ્રકાશ આપનાર છે તે પણ નેત્રવાળા છ જ તેનો લાભ પ્રાપ્ત કરી શકે છે, પણ નેત્ર હીન પ્રાપ્ત કરી શકતા નથી, તે પ્રમાણે ભગવાનને ઉપદેશ સોના માટે સમાન હિતકર હોવા છતાંય ભવ્ય જી જ તેને લાભ પામી શકે છે, અભવ્ય છે પામી શકતા નથી. એટલા માટે ભવ્ય ના હદયમાં અનાદિ કાલથી રહેલ મિથ્યાત્વરૂપ અન્ધકારને નિવારણ કરી આત્માના યથાર્થ સ્વરૂપને પ્રકાશિત કરવાવાળા. લેક શબ્દથી આ સ્થળે
१-२-अलब्धलाभो योगः, लब्धपरिरक्षण क्षेमः, इह च प्रकरणादलब्धलब्धपदाभ्यां रत्नत्रयस्य ग्रहणम् ।
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३१४
आवश्यक सूत्रस्य
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लोकालोकयोरुभयोर्ग्रहणं, तेन लोकस्य = लोकालोकलक्षणस्य सकलपदार्थस्य प्रद्योतः - लोकालोकप्रद्योतस्तं कर्त्तुं शीलं येषां ते लोकालोकमद्योतकराः = सर्वलोकप्रकाशकरणशीलास्तेभ्यः, ताच्छील्ये कर्तरि टः प्रत्ययः । ' अभयद्रयाणं' न भयमभयं भयानाम' भावो वा अभयमक्षोभलक्षण आत्मनोऽवस्थाविशेषो मोक्षसाधनभूतमुत्कृष्टधैर्यमिति यावत् दयन्ते ददतीति दयाः २, अभयस्याभयं वा दयाः अभयदयाः, यद्वा-अभया = भयविरहिता दया = सर्वजीव सङ्कटप्रतिमोचनस्वरूपाऽनुकम्पा येषां तेऽभयदयास्तेभ्यः । 'चक्खुदयाणं' चक्षुः = ज्ञानं निखिलवस्तुतत्त्वाऽवभासकतया चक्षुः सादृश्यात् तस्य दयाः=दायकाञ्चक्षुर्दयास्तेभ्यः, . यथा हरिणादिशरण्येऽरण्ये लुण्टाकलुष्टितेभ्यः पट्टिकादिदानेन चक्षूंषि विधाय हस्तपादादि बद्ध्वा तैर्गर्ते पातितेभ्यः कश्वित्पट्टिकाद्यपनोदनेन चक्षुर्दच्या मार्ग (प्रकाश) से समस्त लोकालोक के प्रकाश करने वाले । मोक्ष के साधक, उत्कृष्ट धैर्यरूपी अभय को देनेवाले, अथवा समस्त प्राणियों के संकट को छुडानेवाली दया (अनुकम्पा ) के धारक । ज्ञान नेत्र के दायक, अर्थात् जैसे किसी गहन वनमें लुटेरों से लूटे गये और आखों पर पट्टी बांधकर तथा हाथ-पैर पकडकर गड्ढे में गिराये गये पथिक के सब बन्धनों को तोडकर कोई दयालु नेत्र खोल देता है, इसी प्रकार भगवान भी संसाररूपी अपार कान्तार લેક અને અલેાક બન્નેનું ગ્રહણ કરેલું છે, એટલા માટે કેવળજ્ઞાન રૂપી આલેક (પ્રકાશ) થી સમસ્ત લેાકાલેકના પ્રકાશ કરવાવાળા. મેાક્ષના સાધક, ઉત્કૃષ્ટ ધૈ રૂપી અભયના દેવાવાળા, અથવા સમસ્ત પ્રાણીઓના સંકટને છેડાવવાવાળી દયા (અનુકમ્પા)ના ધારક. જ્ઞાન નેત્રના આપવાવાળા, અર્થાત્ જેમ કેાઇ ગાઢ વનમાં લુટારાથી લુટાએલા અને નેત્ર ઉપર પાટા બાંધીને તથા હાથ પગને પકડીને ગહરા ખાડામાં ફેંકી દીધા હાય તેવા મુસાફરને કોઈ દયાળુ માણસ આવીને તેના તમામ બંધના તેડીને નેત્રને ખેાલી આપે છે, એ પ્રમાણે ભગવાન પણ સૌંસાર રૂપી વિષમ વનમાં રાગ-દ્વેષ રૂપી લુટારાઓથી જ્ઞાના≠િ ગુણુ લુટાએલા १- ‘अविघ्न’–मित्यादिवदभावार्थकनमा 'अव्ययं विभक्ती'-त्यव्ययीभावः । २ - 'दया' - पचादेराकृतिगणत्वादच् ।
३- अव्ययीभावपक्षे षष्ठचा 'नाव्ययीभावादतोऽम्वपश्चम्या' इत्यमादेशः ।
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सुनितोषणी टीका, प्रत्याख्यानाध्ययनम् - ६
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प्रदर्शयति, तथा भगवन्तोऽपि भवाऽरण्ये रागद्वेषलुण्टा कलुष्टिताऽऽत्मगुणधनेभ्यो दुराग्रह पट्टिकाऽऽच्छादितज्ञानचक्षुभ्य मिथ्यात्वोन्मार्गे पातितेभ्यस्तदपनयनपूर्वकं ज्ञानचक्षुर्दच्या मोक्षमार्ग प्रदर्शयन्ति । एतदेव भङ्गयन्तरेणाऽऽह - ' मग्गदयाणं' मार्गः = सम्यग्रत्नत्रयलक्षणः शिवपुरपथः यद्वा विशिष्टगुणस्थानावापकः क्षयोपशमभावो मार्गस्तस्य दयाः = दातारस्तेभ्यः । ' सरणदयाणं' शरणं = परित्राणं, कर्मरिपुत्रशीकृततया व्याकुलानां प्राणिनां रक्षणस्थानं वा तस्य दयास्तेभ्यः । 'जीवदयाणं' जीवेषु = ए केन्द्रियादिसमस्तप्राणिषु दया= सङ्कटमोचनलक्षणा येषामिति, यद्वा जीवन्ति मुनयो येन स जीवः = संयमजीवितं तस्य दयास्तेभ्यः । 'धम्मदयाणं' धर्मः = दुर्गतिप्रपतज्जन्तु संरक्षणलक्षणः श्रुतचारित्रात्मकस्तस्य दया
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(अरण्य) में राग-द्वेषरूप लुटेरों से ज्ञानादि गुण लुटाये हुए तथा कदाग्रह रूप पट्टे से ज्ञाननेत्र को ढक कर मिथ्यात्व के गड्ढे में गिराये हुए उन भव्य जीवों के उस कदाग्रह रूप पट्टे को दूर कर उन्हें ज्ञान नेत्र देने वाले, अतएव सम्यकरत्नत्रयस्वरूप मोक्ष मार्ग, अथवा विशिष्ट गुण को प्राप्त कराने वाला क्षयोपशम भाव रूप मार्ग को देनेवाले, कर्मशत्रुओं से दुःखित प्राणियों को शरण (आश्रय देनेवाले, पृथिव्यादि षड्जीवनिकाय में दया रखने वाले, अथवा मुनियों के जीवनाधारस्वरूप संयमजीवित को देनेवाले, सम-संवेग आदि के प्रकाशक, अथवा जिनवचन में रुचि को देनेवाले, दुर्गति में पडते हुए प्राणियों के धारक, अथवा श्रुत चारित्र रूप धर्म को देनेवाले, धर्म के उपदेशक, धर्म के नायक अर्थात्
તથા કદાગ્રહ રૂપી પાટા બાંધી જ્ઞાનનેત્રને ઢાંકીને મિથ્યાત્વ રૂપ ખાડામાં નાંખેલા તે ભવ્ય જીવેાના કદ્દાગ્રહ રૂપ પાટાને દૂર કરી તેમને જ્ઞાનનેત્ર આપવાવાળા, એટલે કે સમ્યક્ રત્નત્રયસ્વરૂપ મેક્ષમા, અથવા વિશિષ્ટ ગુણ પ્રાપ્ત કરાવનાર પશુમ ભાવ રૂપ માના આપવાવાળા. કર્મશત્રુઓથી દુ:ખિત પ્રાણીઓને શરણુ-આશ્રય દેનારા, પૃથ્વી આદિ ષનિકાયમાં દયા રાખવાવાળા, અથવા મુનિયાના જીવનાધાર સ્વરૂપ સોંયમજીવનના દેવાવાળા. સમ સંવેગ આદિના પ્રકાશક, અથવા જિનવચનમાં રુચિ આપનારા, દુર્ગતિમાં પડતા જીવને ધારણ કરનાર, અથવા શ્રુત-ચારિત્ર રૂપ ધર્મના દેવાવાળા, ધર્મ ઉપદેશક, ધર્મોના નાયક અર્થાત્ પ્રવર્ત્તક. ધર્મોના સારથી
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आवश्यकसूत्रस्य स्तेभ्यः । 'धम्मदेसयाणं' धर्मः प्राक्क्षतिपादितलक्षणस्तस्य देशका-उपदेशकास्तेभ्यः। 'धम्मनायगाणं' धमस्य नायकाः नेतारः प्रभव इति यावत् धर्मनायकास्तेभ्यः। धम्मसारहीणं' धर्मस्य सारथयः धर्मसारथयस्तेभ्यः, भगवत्सु सारथिवाऽऽरोपेण धर्म रथखाऽऽरोपो व्यज्यत इति परम्परितरूपकमलङ्कारस्तस्माद् यथा सारथयो रथद्वारा तत्स्थमध्वनीनं सुखपूर्वकमभीष्टं स्थानं नयन्त्युन्मार्गगमनादितश्च मतिरुन्धन्ति तथा भगवन्तो धर्मद्वारा मोक्षस्थानमिति भावः । 'धम्मवरचाउरंतचक्कचट्टीणं' दान-शील-तपो-भावैः चतसृणां नरकादिगतीनां चतुर्णा वा कषायाणामन्तो-नाशो यस्मात्, अथवा चतस्रो गतीश्चतुरः कषायान् वा अन्तयति-नाशयतीति, यद्वा चतुर्भिर्दान-शील-तपो-भावैः कृत्वा अन्तो रम्यः, अथवा चत्वारः=दानादयः अन्ता अवयवा यस्य, यद्वा चत्वारि दानादीनि अन्तानि स्वरूपाणि यस्य, 'अन्तोऽवयवे स्वरूपे च' इति हेमचन्द्रः, स प्रवर्तक, धर्म के सारथी अर्थात् जिस प्रकार रथपर चढे हुए को सारथी रथके द्वारा सुखपूर्वक उसके अभीष्ट स्थान पर पहुँचाता है उसी प्रकार भव्य प्राणियों को धर्मरूपी रथ के द्वारा सुखपूर्वक मोक्ष स्थान पर पहुँचाने वाले, दान-शील-तप और भाव से नरक आदि चार गतियों का अथवा चार कषायों का अन्त करने वाले, अथवा चार दान शील तप और भाव से अन्त-रमणीय, या दान आदि चार अन्त - अवयव वाले, अथवा दान आदि चार अन्त - स्वरूप वाले, અર્થાત જેવી રીતે રથ પર બેઠેલાને સારથી રથ દ્વારા સુખપૂર્વક તેના ધારેલા સ્થાનકે પહોંચાડે છે તે પ્રમાણે ભવ્ય પ્રાણીઓને ધર્મરૂપી રથ વડે સુખપૂર્વક મેક્ષ સ્થાન પર પહોંચાડવાવાળા. દાન-શીલ-તપ અને ભાવથી નરક આદિ ચાર ગતિઓને અથવા ચાર કષાયને અન્ત કરવાવાળા, અથવા ચાર દાન-શીલ-તપ અને ભાવથી અન્ત-રમણીય, અથવા દાન આદિ ચાર અન્ત-અવયવવાળા, અથવા हान माहि या२ अन्त-२१३५ . श्रेष्ठ भने “धर्म १२यातुरन्त" ४७ छे, मेक
१-इहोतेषु सर्वत्र 'तं दयन्ते' इत्यपव्याख्यानम् 'अधीगर्थदयेशाम्-इति कर्मणि षष्ठयुपपत्तेः, शेषत्वाविवक्षायां द्वितीयायाः सत्त्वेऽपि वा 'कर्मण्यण' (३ । २॥१) इत्यणुत्पत्त्या 'अभयदायेभ्य' इत्याघनिष्टप्रयोगापत्तेर्दुर्वारस्वादित्यास्तामिदम् ।
२-अन्तोः रम्यः-'मृताववसिते रम्ये समाप्तावन्त इष्यते' इति विश्वकोषः।
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मुनितोषणी टीका, प्रत्याख्यानाध्ययनम्-६ चतुरन्तः, स एव चातुरन्तः ।, स्वार्थिकः प्रज्ञाधण, चातुरन्त एव चक्रं जन्म-जरा-मरणोच्छेदकत्वेन चक्रतुल्यत्वात् , वरं च तत् चातुरन्तचक्रं वरचातुरन्तचक्रं, वरपदेन राजचक्रापेक्षयाऽस्य श्रेष्ठत्वं व्यज्यते, लोकद्वयसाधकत्वात् , धर्म एव वरचातुरन्तचक्रं धर्मवरचातुरन्तचक्रं तादृशस्य धर्मातिरिक्तस्यासम्भवात्, अत एव सौगतादिधर्माभासनिरासः, तेषां तात्त्विकार्थप्रतिपादकत्वाभावेन श्रेष्ठत्वाभावात् , धर्मवरचातुरन्तचक्रेण वतितुं शीलं येषामिति धर्मवरचातुरन्तचक्रवर्तिनस्तेभ्यः, चक्रवर्तिपदेन षट्खण्डाधिपतिसादृश्यं व्यज्यते, तथाहि चस्वार:= उत्तरदिशि हिमवान्, शेषदिक्षु चोपाधिभेदेन समुद्राः अन्ताः सीमानस्तेषु स्वामित्वेन भवाश्चातुरन्ताः, चक्रेण-रत्नभूतपहरणविशेषेण वर्तितुं शीलं येषां ते चक्रवर्तिनः, चातुरन्ताश्च ते चक्रवर्तिनश्चातुरन्तचक्रवर्तिनः, धर्मेण न्यायेन वराः=श्रेष्ठा इतरराजापेक्षयेति धर्मवराः 'धर्माः पुण्य-यम-न्याय-स्नाभावाऽऽचार-सोमपाः' इत्यमरः, ते च ते चातुरन्तचक्रवर्तिनश्चेति धर्मवरचातुरन्तचक्रवर्तिनः, यद्वा चातुरन्तं च तच्चक्रं-चातुरन्तचक्रं, वरं च तच्चातुरन्तचक्रं-वरचातुरन्तचक्रं, धर्मों श्रेष्ठ धर्म को 'धर्मवरचातुरन्त' कहते हैं, यही जन्म जरामरण के नाशक होने से चक्र के समान है, अतएव धर्मवरचातुरन्त रूप चक्र के धारक । यहां पर 'वर' पद देने से राजचक्र की अपेक्षा धर्मचक्र की उत्कृष्टता सूचित की गयी है, तथा सौगत आदि धर्म का निराकरण किया गया है, क्यों कि राजचक्र केवल इस लोकका साधक है परलोकका नहीं, तथा सौगत आदि धर्म यथार्थ तत्त्वों का निरूपक न होने से वह श्रेष्ठ नहीं है। 'चक्रवर्ती पद देने से तीर्थङ्करों को छह खण्ड के अधिपति राजा की उपमा दी गई है, क्यों कि वह राजा भी चार अर्थात् उत्तर दिशामें हिमवान और पूर्व-दक्षिण-पश्चिम दिशामें જન્મ જરા અને મરણનું નાશક હોવાથી ચક્ર સમાન છે એટલે ધર્મવરચાતુરન્ત રૂપ ચક્રના ધારક. અહિઆ “વર પદ આપવાથી રાજચક્રની અપેક્ષા ધર્મચક્રની ઉત્કૃષ્ટતા તથા સોગત આદિ ધર્મનું નિરાકરણ કરવામાં આવ્યું છે. કારણ કે -રાજચ કેવલ આ લકનું સાધન છે, પરલોકનું નથી, તથા સૌગત આદિ ધર્મ યથાર્થ તત્વનું નિરૂપક ન રહેવાથી તે શ્રેષ્ઠ નથી. “ચક્રવર્તિ પદ આપવાથી તીર્થકરને છ ખંડના અધિપતિ રાજાની ઉપમા આપી છે. કારણ કે તે રાજા પણ ચાર અર્થાત ઉત્તર દિશામાં હિમવાનું અને
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आवश्यकसूत्रस्थ वरचातुरन्तचक्रमिव-धर्मवरचातुरन्तचक्रं तेन वर्तितुं वर्तयितुं वा शीलमेषामिति । 'दीवो' द्वीपः संसारसमुद्रे निमज्जतां द्वीपतुल्यत्वात् , 'ताणं' त्राणं-कर्मकर्थितानां भव्यानां रक्षणसक्षणः, अत एव तेषां 'सरणगई' शरणगतिः आश्रयस्थानम्, 'पइट्ठाणं' प्रतिष्ठानं कालत्रयेऽप्यविनाशित्वेन स्थितः, 'दीवो'इत्यादीनि 'पइट्टा' इत्यन्तानि सौत्रत्वाचतुर्थ्यर्थे प्रथमैकवचनान्तानि, 'त्राण'मिति नपुंसकत्वं 'प्रतिष्ठे-ति स्त्रीत्वं च भगवतः सर्वशक्तिमत्त्व प्रदर्शनाय । 'अप्पडिहयवरनाणदंसणधराणं' प्रतिहतं भित्त्याचावरणस्खलितं, न प्रतिहतमपतिहत ज्ञानं च दर्शनं चेति ज्ञानदर्शने, वरे=श्रेष्ठे च ते ज्ञानदर्शने वरज्ञानदर्शने केवलज्ञानकेवलदर्शने अपतिहते वरज्ञानदर्शने-अपतिहतवरज्ञानदर्शने, धरन्तीति धराः अप्रतिहतवरज्ञानदर्शनयोर्धराः- अप्रतिहतवरज्ञानदर्शनधराः आवरणरहितकेवलज्ञानकेवलदर्शनधारिणस्तेभ्यः । 'विअट्टछउमाणं' छाधते आत्रियते केवलज्ञानकेवलदर्शनावात्मनोऽनेति छद्मघातिककर्मवन्दं ज्ञानावरणीयादिरूपं वा कर्मजातम्, व्यावृत्तं-निवृत्तं छद्म येभ्यस्ते व्यावृत्तच्छद्मानस्तेभ्यः । 'जिणाणं' जिनेभ्यः= स्वयं-राग-द्वेप-शत्रुजेतृभ्यः । 'जावयाणं' जापयन्ति जयन्तं भव्य जीवगणं लवण समुद्र है सीमा जिसकी ऐसे भरतक्षेत्र पर एकशासन राज्य करता है। संसार समुद्र में डूबते हुए जीवोंके एक मात्र आश्रय होने से द्वीप समान, कर्मों से संत्रस्त भव्य जीवों की रक्षामें दक्ष होने से त्राणरूप, उनको शरण देने के कारण शरणगति-आश्रयस्थान । तीनों कालमें अविनाशी स्वरूपवाले होने से प्रतिष्ठानरूप। आवरण रहित केवलज्ञान केवलदर्शन के धारक । ज्ञानावरणीय आदि कों का नाश करने वाले । राग-द्वषरूप शत्रु પૂર્વ-દક્ષિણ-પશ્ચિમ દિશામાં લવણ સમુદ્ર છે સીમા જેની એવા ભરત ક્ષેત્ર પર એકશાસન રાજ્ય કરે છેસંસારસમુદ્રમાં ડૂબતા અને એકમાત્ર આશ્રય હેવાથી દ્વીપ સમાન, કર્મોથી સંતાપ પામેલા ભવ્ય જીવોની રક્ષામાં દક્ષ હેવાથી (કુશળ હાવાથી) ત્રાણરૂપ, તેઓને શરણુ દેવાવાળા હોવાથી શરણગતિ-આશ્રયસ્થાન. ત્રણે કાલમાં અવિનાશી સ્વરૂપવાળા હોવાથી પ્રતિષ્ઠાન રૂપ. આવરણરહિત કેવલજ્ઞાન કેવલ દર્શાનના ધારક જ્ઞાનાવરણીય આદિ કર્મોને નાશ કરવાવાળા. રાગ-દ્વેષરૂપ
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मुनितोषणी टीका, प्रत्याख्यानाध्ययनम्-६
३१९ धर्मदेशनादिना प्रेरयन्तीति जापकाः' , तेभ्यः । 'तिन्नाणं' स्वयं संसारौघं तीर्णास्तेभ्यः। 'तारयाणं' तारयन्त्यन्यानिति तारकास्तेभ्यः । 'बुद्धाणं' बुद्धेभ्यः स्वयं बोधं प्राप्तेभ्यः । 'बोहयाणं' बोधयन्त्यन्यानिति बोधकास्तेभ्यः। 'मुत्ताणं' अमोचिषत स्वयं कर्मपञ्जरादिति मुक्तास्तेभ्यः। 'मोयगाणं' मुच्यमानानन्यान् प्रेरयन्तीति मोचकास्तेभ्यः। 'सबन्नूणं' सर्व सकलद्रव्य-गुण-पर्यायलक्षणं वस्तुजातं याथातथ्येन जानन्तीति सर्वज्ञास्तेभ्यः। 'सव्वदरिसीणं' सर्व समस्तपदार्थस्वरूपं सामान्येन द्रष्टुं शीलं येषां ते सर्वदर्शिनस्तेभ्यः। 'सि' शिवं निखिलोपद्रवरहितासाच्छिव (कल्याण) मयम् , स्थानमित्यस्य विशेषणमिदम्, शिवादीनां सर्वेषां द्वितीयान्तानामग्रेतनेन 'सम्प्राप्तेभ्य' इत्यनेन सम्बन्धः। 'अयलं' अचलम् स्वाभाविकमायोगिकचलनक्रियाशून्यम् । 'अरुयं' अरुजम्-अविद्यमाना रुजा यस्मिस्तत् , तत्रात्मनामविद्यमानशरीरमनस्कवादाधिव्याधिरहितमित्यर्थः । 'अणंतं' अविद्यमानोऽन्तो नाशो यस्य तत् । अत एव 'अक्खयं' नास्ति लेशतोऽपि क्षयो यस्य तत्-अविनाशीत्यर्थः। 'अव्वाबाई' न विद्यते व्यावाधा=पीडा द्रव्यतो भावतश्च यत्र तत् । 'अपुणरावित्ति' अविघमाना पुनरावृत्तिः संसारे पुनरवतरणं यस्मात् तत् , यत्र गवा न कदाचिदप्यात्मा विनिवर्त्तते, समाम्नातमन्यत्रापि न स पुनरावर्चते न स पुनरावर्तते' इति । इत्यमुक्तशिवत्वादिविशेषणविशिष्टम् ‘सिदिगइनामधेयं' सिद्धिगतिरिति को स्वयं जीतने वाले और दूसरों को जीताने वाले । भवसमुद्र को स्वयं तैरने वाले और दूसरों को तिराने वाले। स्वयं बोध को प्राप्त करने वाले और दूसरों को प्राप्त कराने वाले । स्वयं मुक्त होने वाल और दूसरे को मुक्त कराने वाले । सर्वज्ञ, सर्वदर्शी तथा निरुपद्रव, निश्चल, कर्मरोगरहित, अनन्त, अक्षय, बाधारहित, पुनरागमनरहित, ऐसे सिद्धिस्थान अर्थात् मोक्ष को प्राप्त सिद्ध શત્રુઓને પિતેજ જીતવાવાળા અને બીજાઓને જીતાવવાવાળા. ભવસમુદ્રને પતે તરવાવાળા અને બીજાને તારવાવાળા, સ્વયં બંધ પ્રાપ્ત કરનારા અને બીજાને બોધ પ્રાપ્ત કરાવનારા, સ્વયં મુકત થવાવાળા અને બીજાને મુકત કરનારા. सर्वज्ञ, सश तथा निरुपद्रव, निश्वत, भ रहित, अनन्त, सक्षय,
१- जापका-'जि' धातोणौँ 'क्रीजीणा'-मित्यात्वे ण्यन्ताण्ण्वुल् ।
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३२०
आवश्यक सूत्ररूप
नामधेयं=नाम यस्य तत् । ' ठाणं' स्थीयतेऽस्मिन्निति स्थानं लोकाग्रलक्षणं 'संपनाणं' सम्प्राप्तेभ्यः =समाश्रितेभ्यः । 'नमो जिणाणं' नमो जिनेभ्यः, ' कीदृशेभ्यः ? ' जियभयाणं' जितं भयं यैस्तेभ्य इति सिद्धपक्षे, अईत्वक्षे तु 'नमोत्थूणं जात्र संपाविउकामस्स' नमोऽस्तु यावत्सिद्धिगतिनामकं स्थानं सम्प्राप्तुकामाय, 'णं' इतिवाक्यालङ्कारेऽव्ययपदम् ॥ सू० २ ॥
[
इत्थं नमस्कारान्तं प्रत्याख्यानप्रकरणं परिसमाप्य सम्प्रति तत्पारणसमापनविधिरुच्यते— ' फासियं ' इत्यादि ।
॥ मूलम् ॥
फालियं (१) पालियं (२) सोहियं (३) तीरियं (४) • किट्टियं (५) आराहियं (६) अणुपालियं ( ७ ) भवइ, जं च न भवइ, तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ॥ सू० ३ ॥
॥ छाया ॥
स्पृष्टं (१) पालितं (२) शोधितं (३) तीरितं (४) कीर्तितम् (५) आराधितम् (६) आज्ञयाऽनुपालितं ( ७ ) भवति, यत्र न भवति, तस्य मिध्या मयि दुष्कृतम् ॥ सू० ३ ॥
॥ टीका ॥
मया स्वीकृतं प्रत्याख्यानमिति शेषः, ' फासियं' स्पृष्टं = कायादिना भगवान को तथा मोक्ष को प्राप्त होनेवाले अरिहन्त भगवान को नमस्कार हो | सू० २ ॥
इस प्रकार नमस्कारपर्यन्त प्रत्याख्यान की विधि कहकर अब उसके पारण की विधि दिखलाते हैं- 'फासि' इत्यादि ।
बार
मुझ से स्वीकृत प्रत्याख्यान का काय आदि से सेवन, बार उपयोग देकर संरक्षण, अतिचार शोधन, समाप्तिका समय हो બાધા રહિત, પુનરાગમન રહિત, એવા સિદ્ધ સ્થાન અર્થાત મેાક્ષને પ્રાપ્ત થયેલા સિદ્ધ ભગવાનને તથા મેાક્ષને પામવાવાળા અહિન્ત ભગવાનને નમસ્કાર છે. (સ્૦૨) આ પ્રમાણે નમસ્કારપન્ત પ્રત્યાખ્યાનની વિધિ કહીને હવે તેને પાળવાની विधि सतावे छे. "फासियं " इत्याहि.
મારાથી સ્વીકૃત પ્રત્યાખ્યાનનું શરીર આદિથી સમ્યક્ સેવન, વાર વાર ઉપયેગ
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मुनितोषणी टीका. प्रत्याख्यानाध्ययनम्-६
३२१ सेवितं (१), 'पालियं' पालितं मुहुर्मुहुरुपयोगदानेन संरक्षितम् (२), 'सोडियं' शोधितं तद्गताऽतिचारपरिमार्जनं कृतम् (३), 'तीरियं' तीरितं प्रत्याख्यानावधौ सम्पूर्णतां गतेऽपि कश्चित्कालमवस्थाय तीरं नीतमित्यर्थः (४), 'किट्टियं' कीर्तितं प्रत्याख्यानेऽस्मिन्निदं च कर्त्तव्यं मया कृतमित्येवं तत्तन्नामोपादाय गुरुप्रतो विनिवेदितमित्यर्थः (५), 'आराहियं' आ-समन्तात् राधितमाराधितम्-उत्सर्गापवादादिभिः समर्यादमन्तःकरणेन सेवितम् (६), 'आणाए अणुपालियं' आज्ञयाऽनुपालितं श्रीजिनेन्द्रोक्तरीत्याऽनुष्ठितम् (७), 'भवइ ' भवति-अस्ति । 'जं च' यत् 'प्रागुकेषु स्पृष्टादिषु मध्ये' इत्यर्थात् चकारः
जाने पर भी कुछ देर विश्राम, 'प्रत्याख्यान में अमुक अमुक विधि करनी चाहिये सो मैंने सब करली' इस प्रकार नामग्रहणपूर्वक गुरुके समक्ष निवेदन, मर्यादापूर्वक अन्तःकरण से सेवन तथा भगवान की आज्ञा के अनुसार पालन किया गया है ता भी प्रमावश उसमें जो कुछ त्रुटि रह गई हो तो 'तस्स मिच्छा मि
રાખીને સંરક્ષણ, અતિચાર ધન, સમાપ્તિ સમય થવા છતાંય ઘેડીવાર વિશ્રામ, “પ્રત્યાખ્યાનમાં અમુક અમુક વિધિ કરવી જોઈએ તે મેં સર્વ કરી લીધીએ પ્રમાણે નામ-ગ્રહણ-પૂર્વક ગુરુની પાસે નિવેદન, મર્યાદાપુર્વક અંત:કરણથી સેવન તથા ભગવાનની આજ્ઞા પ્રમાણે પાલન કર્યું છે. તે પણ પ્રમાદ રહેવાથી તેમાં જે કાંઈ ત્રુટી २0 ४ सय तो "तस्स मिच्छा मि दुक्कड" ते समधी भाई ५५ नि
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३२२.
आवश्यकसूत्रस्य
समुच्चयार्थः, ' न भत्रइ' न भवति =न जायते, ' तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ' व्याख्यातपूर्वमिदमित्यलमाम्रेडितेन ॥ मृ० ३ ॥
इति श्रीविश्वविख्यात - जगद्वल्लभ-मसिद्धवाचक- पञ्चदशभाषाकलितललितकलापाऽऽलापक-प्रत्रिशुद्ध गद्यपद्यनैकग्रन्थनिर्मापक - वादिमानमर्दक- श्रीशाहूछत्रपति कोल्हापुरराजपदन 'जैनशास्त्राचार्य' पद भूषित - कोल्हापुरराजगुरु- बालब्रह्मचारि- जैनाचार्य - जैनधर्म दिवाकर-पूज्यश्रीघासीलाल- प्रतिविरचितायाम् आवश्यकमुत्रस्य मुनितोषण्याख्यायां व्याख्यायां षष्ठं प्रत्याख्यानाख्यमध्ययनं समाप्तम् ॥ ६ ॥
॥ सम्पूर्णमिदं सूत्रम् ॥
दुक्कडं' उस सम्बन्धी मेरा पाप निष्फल हो - इत्यादि अर्थ पहले की तरह जान लेवें ॥ सू० ३ ॥
॥ इति छठा अध्ययन सम्पूर्ण ॥ इति आवश्यक सूत्र की मुनितोषणी टीका का हिन्दी भवार्थ संपूर्ण.
थामा हत्याहि अर्थ प्रथम प्रमाणे लगी सेवा (सू०3)
કૃતિ છઠ્ઠું અધ્યયન સંપૂર્ણ
ઇતિ આવશ્યક સૂત્રની મુનિતેષણી ટીકાને ગુજરાતી અનુવાદ સંપૂર્ણ
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९ हिन्दीपरिशिष्ट
३२३-३२८
हिन्दी-परिशिष्ट ॥ बारह व्रतों के अतिचार सहित पाठ ॥ पहिला अणुव्रत-थूलाओ पाणाइवायाओ वेरमणं,त्रसजीव-बेइंदिय तेइंदिय चररिदिय पंचिदिय जानके पहिचानके सङ्कल्प करके उसमें स्वसम्बन्धी-शरीर के भीतर में पीडाकारी सापराधी को छोड निरपराधी को आकुट्टी की बुद्धि (हनने की बुद्धि) से हनने का पच्चक्वाण जावजीवाए दुविहं तिविहेणं न करेमि, न कारवेमि, मणसा वयसा कायसा, ऐसे पहिले स्थूल प्राणातिपात-विरमण-व्रत के पंच अइयारा पेयाला जाणियव्वा, न समायरियव्वा, तंजहा-ते आलोउं बंधे वहे छविच्छेए अइभारे भत्तपाणविच्छेए, जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं।
दूजा अणुव्रत-थूलाओ मुसावायाओ वेरमणं, कन्नालिए, गोवालिए, भोमालिए, णासावहारो (थापणमोसो) कूडसक्खिवज्जे ( कूडी साख, ) इत्यादिक मोटा झूठ बोलने का पञ्चक्खाण जावजीवाए दुविहं तिविहेणं न करेमि न कारवेमि मणसा वयसा, कायसा, एवं दूजा स्थूल मृषावाद विरमणव्रत के पंच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा, तंजहा-ते आलोउं सहसब्भक्खाणे, रहम्सब्भग्वाणे, सदारमंतभेए, मोसोवएसे, कूडलेहकरणे, जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।।
तीजा अणुव्रत-थूलाओ अदिन्नादाणाओ वेरमणं, खात खनकर, गांठ खोलकर, ताले पर कुंजी लगाकर, मार्ग में चलते को लूट कर, पडी हुई धणियाती मोटी वस्तु जानकर लेना इत्यादि मोटा अदत्तादान का पञ्चकवाण, सगे-सम्बन्धी, व्यापार-संबंधी तथा पडी निभ्रमी वस्तु के उपरान्त अदत्तादान का पच्चक्खाण जावज्जीवाए दुविहं तिविहेणं न करेमि न कारवेमि, मणसा वयसा कायसा, एवं तीजा स्थूल अदत्तादान विरमणव्रत के पंच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा, तंजहा-ते आलोउं तेनाहडे तकरप्पओगे, विरुद्धरनाइक्कमे, कूडतुल्ले, कूडमाणे, तप्पडिरूवगववहारे, जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।
१ 'स्वदारसन्तोष' ऐसा पुरुष को बोलना चाहिये, और स्त्री को स्वपतिसन्तोष ऐमा बोलना चाहिये ।
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३२४
आवश्यकसूत्रस्य चौथा अणुव्रत-थूलाओ मेहुणाओ वेरमणं, । सदारसंतोसिए, अवसेसमेहुणविहिं पञ्चक्खामि जावज्जीवाए, देवदेवी-सम्बन्धी दुविहं तिविहेणं न करेमि, न कारवेमि, मणसा वयसा कायसा, तथा मनुष्य-तिर्यञ्च-सम्बन्धी एगविहं एगविहेणं न करेमि कायसा, एवं चौथा स्थूल मेहुणवेरमणव्रत के पंच अइयारा जाणियम्वा न समायरियव्वा, तंजहा ते आलोउं इत्तरियपरिग्गहियागमणे, अपरिग्गहियागमणे, अनंगकीडा, परविवाहकरणे, कामभोगतिव्वाभिलासे, जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।
पांचवा अणुव्रत-थूलाओ परिग्गहाओ वेरमणं, खेत्त-वत्थु का • यथापरिमाण, हिरण्णसुवण्ण का यथापरिमाण, धनधान्य का यथापरिमाण, दुपयचउप्पय का यथापरिमाण, कुवियधातु का यथापरिमाण, जो परिमाण किया है, उसके उपरान्त अपना करके परिग्रह रखने का पच्चक्खाण, जावज्जीवाए, एगविहं तिविहेणं न करेमि मणसा वयसा कायसा, एवं पांचवां स्थूलपरिग्रह परिमाण-व्रत के पंच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा, तंजहा-ते आलोउं खेत्तवत्थुप्पमाणाइक्कमे हिरण्णसुवण्णप्पमाणाइक्कमे धणधन्नप्पमाणाइक्कमे, दुपयचउप्पयप्पमाणाइक्कमे, कुवियप्पमाणाइक्कमे, जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।
छठा दिशिव्रत-उड्ढदिशि का यथापरिमाण,- अहोदिशि का यथापरिमाण किया है, इसके उपरान्त स्वेच्छा काया से आगे जाकर पांच आस्रव सेवन का पचक्खाण जावज्जीवाए' दुविहं तिविहेणं न करेमि न कारवेमि, मणसा वयसा कायसा, एवं छठे दिशिव्रत के पंच अइयारा जाणियव्वा, न समायरियव्वा, तंजहा ते आलोउं उड्ढदिसिप्पमाणाइक्कमे, अहोदिसिप्पमाणाइकमे, तिरिअदिसिप्पमाणाइक्कमे, खित्तवुड्ढी, सइअन्तरद्धा, जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छा मि दुकडं।
१-'एगविहं तिनिहेणं' भी कोई कोई बोलते हैं।
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बारह व्रतों का अतिचार सहित पाठ ।
३२५ सातवां व्रत-उवभोगपरिभोगविहिं पचक्खायमाणे उल्लणियाविहि १, दंतणविहि २, फलविंहि ३, अभंगविहि ४, उवट्टणविहि, ५. मज्जणविहि ६, वत्थविहि ७, विलेवणविहि ८, पुप्फविहि ९, आभरणविहि १०, धूवविहि, ११, पेज्जविहि १२, भक्खणविहि १३, ओदणविहि १४, सूपविहि १५, विगयविहि १६, सागविहि महुरविहि १८, जीमणविहि १९, पाणीअविहि २०, मुखवासविहि २१, वाहणविहि २२, उवाणहविहि २३, सयणविहि २४, सचित्तविहि २५, व्वविहि २६, इत्यादि का यथापरिमाण किया है, इसके उपरान्त उवभोगपरिभोग वस्तु को भोगनिमित्त से भोगने का पच्चक्खाण, जावज्जीवाए एगविहं तिविहेणं, न करेमि मणसा वयसा कायसा, एवं सातवां उवभोगपरिभोग दुविहे पन्नत्ते, तंजहाभोयणाओ य, कम्मओ य। भोयणाओ समणोवासएणं पंच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा, तंजहा-ते आलोउं सचित्ताहारे, सचित्तपडिबद्धाहारे, अप्पउलिओसहिभक्खणया, दुप्पउलिओसहिभक्स्वणया, तुच्छोसहिभक्खणया, कम्मओण समणोवासएणं पन्नरस कम्मादाणाइं जाणियव्वाइं न समायरियव्वाइं, तंजहा ते आलोउं इंगालकम्मे, वणकम्मे साडीकम्मे भाडीकम्मे, फोडीकम्मे दंतवाणिज्जे, लक्खवाणिज्जे, केसवाणिज्जे, रसवाणिज्जे, विसवाणिज्जे, जंतपोलणकम्मे, निल्लंछणकम्मे, दवग्गिदावणया सरदहतलायसोसणया, असईजणपोसणया, जो मे देवसिओ अइयारो को तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।
आठवां अणट्ठादण्डविरमणव्रत-चउन्विहे अणट्ठादंडे पण्णत्ते, तंजहा-अवज्झाणायरिए, पमायायरिए, हिंसप्पयाणे, पावकम्मोवएसे, एवं आठवां अणहादंड सेवन का पञ्चक्खाण (जिसमें आठ आगारआए वा, राए वा, नाए वा, परिवारे वा, देवे वा, नागे वा, जक्खे वा, भूए वा, एत्तिएहिं आगारेहिं अन्नत्थ) जावज्जीवाए दुविहं तिविहेणं न करेमि न कारवेमि मणसा वयसा कायसा, एवं आठवां अणट्ठदंड, विरमणव्रत के पंच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा, तंजहा-ते आलोउं कंदप्पे, कुक्कुइए, मोहरिए संजुत्ताहिगरणे,
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आवश्यक सूत्रस्य
उवभोगपरिभोगाइरित्ते, जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुकडं ।
नववां सामायिकव्रत- सव्वसावज्जं जोगं पच्चक्खामि जावनियमं पज्जुवासामि, दुविहं तिविहेणं न करेमि न कारवेमि मणसा, वयसा, कायसा, ऐसी सद्दहणा परूपणा तो है सामायिक का अवसर आये सामायिक करूं तब फरसना करके शुद्ध होउँ, एवं नववें सामायिक व्रत के पंच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा, तंजहा-ते आलोउं मणदुष्पणिहाणे, वयदुष्पणिहाणे, कायदुपणिहाणे, सामाहयस्स सह अकरणया सामाइयस्स अणवडियस्स करणया जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।
३२६
दसवां देसावगासिकव्रत-दिन प्रति प्रभात से प्रारंभ करके पूर्वादिक छहों दिशा की जितनी भूमिका की मर्यादा रक्खी हो उसके उपरान्त स्वेच्छा काया से आगे जाकर पांच आश्रव सेवने का पच्चऋग्वाण, जाव अहोरन्तं दुविहं तिविहेणं न करेमि न कारवेमि मणसा वयसा कायसा, जितनी भूमिका की हद रक्खी उसमें जो द्रव्यादिक की मर्यादा की है उसके उपरान्त उपभोग- परिभोगनिमित्त से भोगने का परचक्रवाण जाव अहोरत्तं एगविह तिविहेणं न करेमि मणसा वयसा कायसा, एवं दशवें देसावगामिक व्रत के पंच अध्यारा जाणियन्वा न समायरियव्वा, तंजहा ते आलोडं आणवणप्पओगे, पेसवणप्पओगे, सद्दाणुवाए, रूवाणुवाए, बहियापुग्गलपक्खेवे, जो मे देवसिओ अध्यारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
ग्यारहवां पडिपुन पोषधव्रत- असण पाण खाइमं साइमं का पच्चक्खाण, अबंभ सेवन का पच्चक्खाण, अमुक मणि सुवर्ण का पच्चत्रवाण, मालावन्नग - विलेवण का पच्चखाण, सत्यमुसलादिक सावज्जोग सेवन का पच्चक्खाण, जाव अहोरन्तं पज्जुवासामि, दुविहं तिविहेण न करेमि न कारवेमि, मणसा, वयसा कायसा ऐसी सद्दहणा परूपणा तो है पोसह का अवसर आये पोसह करूँ तब फरसना करके शुद्ध होउँ, एवं ग्यारवां पडिपुन्न पोषधव्रत का
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बारह व्रतों का अतिचार सहित पाठ ।
३२७ पंच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा, तंजहा ते आलोउं अप्पडिलेहिय-दुप्पडिलेहिय - सेज्जासंथारए, अप्पमज्जिय-दुप्पमज्जियसेज्जासंथारए, अप्पडिलेहिय - दुप्पडिलेहिय - उच्चारपासवणभूमि, अप्पमज्जिय-दुप्पमज्जिय - उच्चारपासवणभूमि, पोसहस्स सम्म अणणुपालणया, जो मे देवसिओ अइयारो कओतस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।
बारहवां अतिथिसंविभागवत-समणे निग्गंथे फासुयएसणिज्जेणं-असणपाणखाइमसाइमवत्थपडिग्गहकंबलपायपुंछणेणं पडिहारियपीढफलगसेज्जासंथारएणं ओसहभेसज्जेणं पडिलाभेमाणे विहरामि, ऐसी मेरी सद्दहणा परूपणा है, साधु साध्वी का योग मिलने पर निर्दोष दान दूं तब शुद्ध होउं । एवं बारहवें अतिधिसंविभागवत के पंच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा, तंजहा-ते आलोउंसचित्तनिक्खेवणया, सचित्तपिहणया, कालाइक्कमे, परववएसे, मच्छरिआए, जो मे देवसिओ अड्यारो को तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।
। बडी संलेखना का पाठ । ___ अह भंते अपच्छिममारणन्तियसंलेहणाझूमणा आराहणा पोषधशाला पूंजे, पूंज के उच्चारपासवण भूमिका पडि लेहे, पडिलेड के गमणागमणे पडिक्कमे, पडिक्कम के दर्भादिक संथारा संथारे, संथार के दर्भादिक संथारा दुरूहे, दुरूह के पूर्व तथा उत्तरदिशि सन्मुख पल्यंकादिक आसन से बैठे, बैठ के करयलसंपरिग्गहियं सिरसावत्तं मत्थए अंजलि कटु एवं वयासी-'नमोत्थु णं अरिहन्ताणं भगवंताणं जाव संपत्ताणं' ऐसे अनन्त सिद्धों को नमस्कार करके, 'नमोत्थुणं अरिहन्ताणं भगवंताणं जाव सम्पाविउकामाणं' जयवंते वर्तमानकाले महाविदेह क्षेत्र में विचरते हुए तीर्थङ्करों को नमस्कार करके अपने धर्माचार्यजी को नमस्कार करता है। साधु प्रमुख चारों तीर्थ को खमाके, सर्वजीवराशि को खमा के पहिले जो व्रत आदरे हैं उनमें जो अतिचार दोष लगे हों, वे सर्व आलोच के पडिक्कम करके निंद के निःशल्य हो करके, सव्वं पाणाइवायं पञ्चश्वामि, सव्वं मुसावायं पच्चकवामि, सव्वं अदिनादाणं पच्चक्खामि, सम्वं मेहुणं पच्चक्खामि, सव्वं परिग्गहं पच्चक्वामि, सव्वं कोहं माणं जाव मिच्छादंसणसल्लं सत्यं अकरणिजजोगं पच्चक्खामि, जावज्जीवाए तिविहं तिविहेणं न करेमि
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३२८
आवश्यकसुत्रस्य
न कारवेमि करतंपि अन्नं न समणुजाणामि, मणसा वयसा कायसा, ऐसे अठारह पापस्थानक पच्चक्षके सव्व असण पाणं खाइमं साइमं चउन्विहं पि आहारं पच्चक्खामि जावज्जीवाए, ऐसे चारों आहार पच्चक्ख के जं पि य इमं सरीरं इटे, कंतं, पियं मणुण्णं, मणाम, घिजं, विसासियं संमयं, अणुमयं, बहुमयं, भण्डकरण्डसमाणं, रयणकरंडगभूयं, मा णं सीयं, मा णं उण्डं, मा णं खुहा, माणं पिवासा, माणं बाला, मा णं चोरा, मा णं दंसमसगा, माणं वाहियं, पित्तियं, कम्फियं, संभीमं सनिवाइयं विविहा रोगायंका परिसहा उबसग्गा फासा फुसंतु-एवं पि य णं चरमेहिं उस्सासनिस्सासेहि बोसिरामि त्ति कटु ऐसे शरीर वोसिरा के, कालं अणवकंखमाणे विहरामि, ऐसी मेरी सहहणा परूपणा तो है, फरसना करूं तो शुद्ध होऊ ऐसे अपच्छिम-मारणंतियसंलेहणा-झुसणा-अराहणाए पंच अइयारा जाणियबा, तं जहा-इहलोगासंसप्पओगे परलोगासंसप्पओगे, जीवियासंसप्पओगे, मरणासंसप्पओगे कामभोगासंसप्पओगे तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।
तस्स धम्मस्स का पाठ ।
तस्स धम्मस्स केवलिपन्नत्तस्स अब्भुटिओमि आराहणाए विरओमि विराहणाए तिविहेणं पडिक्कंतो वंदामि जिणचउन्नीसं ।
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१० गुजराती परिशिष्ट
३२९-३३५
બાર વ્રતના અતિચાર સહિત પાઠ.
ગુજરાતી–પરિશિષ્ટ. પહેલું અણુવ્રત ચૂલાઓ પાશુઈવાયા વેરમણું, ત્રસજીવ, બે ઇંદ્રિય, તે ઇન્દ્રિય, ચઉરિદિય, પચેદ્રિય, જીવ, જાણીપીછી, સ્વસંબંધી, શરીર માંહેલા પીડાકારી, સઅપરાધી, વિગલેંદ્રિય વિના, આકુટ્ટિ, હસુવાનિમિતે, હણવાના પચ્ચખાણ, તથા સુલમ એકેંદ્રિય પણ હણવાના પચ્ચક્ખાણ, જાવજજીવાએ, દુવિહં, તિવિહેણું, ન કરેમિ, ન કારમિ, માણસા, વસા, કાયસા, એહવા, પહેલા, થલ પ્રાણાતિપાત વેરમણુવ્રતના પંચ અઈયારા, પૈયાલા જાણિયવા, ન સમાયરિયરવા, તે જહા, તે આલેઉં, બંધે, વહે, છવિ છે, અઈભારે, ભરપાણ છે, તસ્સ મિચ્છા મિ દુક્કડં.
બીજું અણુવ્રત, પૂલાઓ મુસાવાયાએ વેરમણું, કાલિક, ગોવાલિક, માલિક, થાપણુમેસે, મટકી કુડીસાખ.
- ઈત્યાદિ મટકું જૂઠું બોલવાનાં પચ્ચખાણ જાવજજીવાએ દુવિહં, તિવિહેણું ન કરેમિ, ન કારમિ, મણસા, વસા, કાયસા; એવા બીજા સ્થૂલ મૃષાવાદ વેરમણું વ્રતના પંચ અઈયારા, જાણિયવા. ન સમાયરિયા, તે જહા-તે લેવું.
સહસ્સાભખાણે, રહસ્સાભફખાણે, સદારમતભેએ, એસેવએસે, ફૂડલેહકારણે તસ્સ મિચ્છા મિ દુક્કડં.
ત્રીજું અણુવ્રત, ચૂલાએ અદિન્નાદાણા વેરમણું, ખાતર–ખાણું, ગાંઠડી છેડી, તાલું પર કુંચી કરી, પડી વસ્તુ ધણ આતી જાણે,
ઈત્યાદિ મટકું અદત્તાદાન લેવાનાં પચ્ચખાણ, સગાસંબંધી તથા વ્યાપારસંબંધી નજરમી વસ્તુ ઉપરાંત અદત્તાદાન લેવાનાં પચ્ચખાણ, નવ જીવાએ, દુવિહં તિવિહેણું, ન કરેમિ ન કામિ, મણસા, વસા, કાયસા, એવા ત્રીજા શૂલ અદત્તાદાન વરમાણે વ્રતના પંચ અઈયારા, જાણિયવા, ન સમાયરિયળ્યા જહા, તે આલેઉં.
તેના હડ, સક્કરપગે, વિરુદ્ધ રજજાઈકમે, કુડતેલે કુડમાણે, તપડિરૂવગવવહારે, તસ્સ મિચ્છા મિ દુક્કડું,
ચોથું અણુવ્રત, ઘેલાએ મેહણાએ વેરમણું, સદારસંષિએ, અસેસ મેહુણવિહિં ના પશ્ચિકખાણ.
અને જે સ્ત્રીપુરૂને મૂળ થકી કાયાએ કરી મેહુણ સેવવાનાં પચ્ચકખાણ
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३३०
आवश्यकसूत्रस्य હોય તેને દેવતા, મનુષ્ય, તિર્યંચ સંબંધી મેહુણના પચ્ચક્ખાણ; જાવજ જીવાએ, દેવતા સંબંધી દુવિહં, તિવિહેણું ન કરેમિ, ન કામિ, મણસા, વયસા કાયસા મનુષ્ય તિર્યંચ સંબંધી.
એગવિહં, એગવિહેણું, ન કરેમિ કાયસા.
એવા ચેથા થુલ મેહુણવેરમણે વ્રતના પંચ અઈયારા, જાણિયવા, ન સમાયરિયવા, તંજ તે આલોઉં.
ઇત્તરિયપરિગ્રહિયાગમ, અપરિગ્રહિયાગમ, અનંગકીડા, પરવિવાહ કરશે, કામગેસુ તિવાભિલાસા, તસ્સ મિચ્છા મિ દુક્કડં.
પાંચમું આણુવ્રત ચૂલાઓ પરિગહાએ વેરમણું, ખેરવધુનું યથાપરિમાણ, 'હિરણુસુવણનું યથાપરિમાણ, ધનધાન્યનું યથાપરિમાણ, દુપદચઉપદનું યથાપરિમાણ, કુવિયનું યથાપરિમાણ.
એ યથાપરિમાણ કીધું છે, તે ઉપરાંત પિતાને પરિગ્રહ કરી રાખવાનાં પચ્ચક્ખાણ જાવજીવાએ.
એગવિહં, તિવિહેણું, ન કરેમિ, મણસા, વસા, કાયસા એવા પાંચમાં ધૂલપરિગ્રહ-પરિમાણ–વેરમણું વ્રતનાં પંચ અઈયારા જાણિયા, ન સમાયરિયળ્યા, તે જહા-તે આલેઉ, ખેરવભુપમાઈકમ્મ, હિરણ્યસુવણુપમાણઈકમે, ધનધાન્યપમાણઈકમે, દુપદચઉપદપમાણઈકમ્મ, કુવિય પમાઈકમ્મ, તસ્સ મિચ્છા મિ દુક્કડં.
- છઠું દિશિત, ઉદ્યદિશિનું યથા પરિમાણ, અદિશિનું યથા પરિમાણ, તિરિયદિશિનું યથાપરિમાણુ.
એ યથાપરિમાણુ કીધું છે, તે ઉપરાંત સઈરછાએ કાયાએ જઈને પાંચ આશ્રવ સેવવાનાં પચ્ચકખાણ, જાવજ જીવાએ, દુવિહં, તિવિહેણું, ન કરેમિ, ન કારમિ, મસા, વયસા, કાયસા. એવા છઠા દિશિરમણું વ્રતના પંચ અઈયારા, જાણિયવા, ન સમાયરિવા, તંજહા તે આલેઉં.
ઉદિસિ પમાઈકમે, અદિસિ પમાઈકમે, તિરિયદિસિ પમાણાઇકમે. ખેતવુદ્ધી, સઈઅંતરદ્ધા, તસ્સ મિચ્છા મિ દુકકડં.
સાતમું વ્રત, ઉવભાગપરિભેગવિહિં પચ્ચખાયમાણે, ઉલણિયાવિહિં, દંતવિહિં, ફલવિહિં, અભંગણુવિહિં વિટ્ટવિહિં. મજ્જણવિહિ, વત્યવિહિં, વિલવણુવિહિં, પુષ્ફવિહિં, આભરણવિહિં, ધૂવિહિં, પેવિહિં, ભફખણુવિહિં,
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बारह व्रतों का अतिचार सहित पाठ । દવિહિં, સૂપવિહિં, વિગવિહિં, સાગવિહિ, મારયવિહિં, જેમણવિહિં, પાણિયવિહિં, મુહવાસવિહિં, વાહણવિહિં, વાણહવિહિં, સયણવિહિ, સચિત્તવિહિં, દવિહિં.
ઇત્યાદિકનું યથાપરિમાણ કીધું છે. તે ઉપરાંત ઉવભાગપરિભાગ, ભોગનિમિત્ત ભોગવવાનાં પચ્ચકખાણ જાવજ જીવાએ એગવિહં, તિવિહેણું ન કરેમિ, મણસા, વયસા, કાયસા એવા સાતમા ઉભેગ પરિભેગ.
દુવિહે પન્નત્તે, તે જહા, ભોયણાઉય, કમ્મઉય, ભોયણાઉ, સમણવાસએણું પંચ અઈયારા, જાણિયા ન સમાયરિયળ્યા, તે જહા–તે આલેઉં.
સચિત્તાવારે, સચિત્તપડિબદ્ધાહારે, અપેલિઓસહિભફખણયા, દુપેલિ સહિભખણયા, તુચ્છ સહિભફખણયા, કમ્મઉણું સમણવાસએણું, પન્નરસ કસ્માદાણU.
જાણિયા, ન સમાયરિયળ્યા, તંજહા-તે આલેઉં,
ઇગાલમે, વણકમે, સાડીએ, ભાડીકમે, ફેડીકમ્મ, દંતવાણિજે, કેસવાણિજે, રસવાણિજે, લફખવાણિજે, વિસવાણિજે, જંતપિલ્લણકમે, નિલંછણકમ્મ, દવગિટાવણયા, સરદહત લાગપરિસેસણુયા, અસઈજણ– પિસણયા, તસ્સ મિચ્છા મિ દુકકડં.
આઠમું વ્રત-અનર્થદંડનું વેરમ, ચઉવિહે અનWાદ: પન્ન, તે જહા, અવજઝાણાચરિયું. પમાયાચરિયું હિંસાયાણું, પાવકમેવ એસ એવા આઠમા અનર્થદંડ સેવવાનાં પચ્ચકખાણ જાવજછવાએ. દુવિહં તિવિહેણું ન કરેમિ, ન કારમિ, મણસા, વયસ, કાયસા.
એવા આઠમા અનર્થ દંડ વેરમણું વતન પંચ અઈયારા જાણિયલ્વા, ન સમાયરિયળ્યા, તે જહાતે આલેઉં.
કંદપે, કફઈએ, મહરિએ, સંજીત્તાહિગરણે, ઉભેગપરિભેગઅઈરરે, તસ્સ મિચ્છા મિ દુકકડ.
નવમું સામાયિક વ્રત, વજજજોગનું વેરામણું જાવ નિયમ પજુવાસામિ, વિહં તિવિહેવું, ન કરેમિ ન કારમિ, મણસા, વસા, કાયસા.
એવી મારી તમારી સદ્દતણા પ્રરૂપણા સામાયિકને અવસર આવે અને સામાયિક કરીએ ત્યારે સ્પર્શનાએ કરી શુદ્ધ હેજે!
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भावश्यकसूत्रस्थ એવા નવમા સામાયિક વ્રતના પંચ અઈયારા જાણિયગ્યા, ન સમાયરિથવા, જહા તે આલેઉં. મદુપ્પણિહાણે, વયદુપ્પણિહાણે, કાયદુપ્પણિહાણે, સામાઈયસ્સ સઈ અકરણયાએ, સામાઈયસ્સ અણવદિયસ્સ કરણયાએ, તલ્સ મિચ્છા મિ દુકકડું,
દશમું દેશાવગાસિક બત.
દિન પ્રત્યે પ્રભાત થકી પ્રારંભીને પૂર્વાદિક છ દિશિ જેટલી ભૂમિકા મેકળી રાખી છે, તે ઉપરાંત સઈછાએ કાયાએ જઈને પાંચ આશ્રવ સેવવાનાં પચ્ચખાણ જાવઅહેરનં.
દુવિહં તિવિહેણું, ન કરેમિ ન કારમિ, મણસા વયસા કાયસા, જેટલી ભૂમિકા મકળી રાખી છે, તે માંહિ જે દ્રવ્યાદિની મર્યાદા કીધી છે તે ઉપરાંત વિભેગ, પરિભેગ, ભેગ નિમિત્તે ભેગવવાનાં પચ્ચકખાણ જાવ અહેરાં, એગવિહં તિવિહેણું ન કરેમિ ભણસા વયસા કાયસા એવા દશમા દેશાવગસિક વેરમણે વ્રતના પંચ અઈયારા જાણિયાવા ન સમાયરિયવા, તે જહાતે આલેઉં.
આણવણપૂગે, પેસવણપૂગે, સાસુવાએ, રૂવાણુવાએ, અહિઆ પગલપકવે, તસ્સ મિચ્છા મિ દુક્કડં.
અગિયારમું પરિપૂર્ણ પિષધ વ્રત, અસણું” પાણું, ખાઇમં, સાઈમના પચ્ચખાણુ, અખંભના પચ્ચકખાણ, મણિસેવનનાં પચ્ચખાણ, માલાવજગવિલેવણના પચ્ચક્ખાણ, સત્યમુસલાદિક સાવજ જેગનાં પચ્ચકખાણ, જાવ અહોરાં જુવાસામિ.
દુવિહં તિવિહેણું ન કરેમિ ન કારમિ, મણસા વયસા કાયસા એવી મારી સદ્દતણા પ્રરૂપણા પિષાને અવસર આવે અને પિ કરીએ, તે વારે સ્પર્શનાએ કરી શુદ્ધ હેજેએવા અગિયારમાં પરિપૂર્ણ પિષધ વ્રતના પંચ અઈયારા જાણિયવા નસમાયરિયળ્યા તે જહા તે આલેઉં.
અપડિલેહિય-પડિલેહિય–સેજસંથાર, અપમણિજ્ય-દુપમસ્જિયસેજજાસંથાર, અપડિલેહિય-દુપડિલેહિય-ઉચ્ચારપાસવણભૂમિ, અપ્પમજિયદુપમસ્જિય-ઉચ્ચાર-પાસવણભૂમિ, પિસહસ્સ સમ્મ અણુશુપાલણયા, તસ્ય મિચ્છા મિ દુકકડું
બારમું અતિથિ વિભાગ દ્વત, સમણે નિર્ગથે ફાસુએણે એસણિજિજેણું
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बारह व्रतों का अतिचार सहित पाठ |
३३३
અસણું પાછું ખાઈમ સાઇમ વત્યપડિગ્ગહક ખલપાયપુઋણે, પાઢિયારૂ પીઢ ફુલગ–સેજા–સંથારએણુ, ઉહલેસણું, પડિલાલેમાણે, વિદ્ધરિસ્સામિ.
એવી મારી સદૃણા પ્રરૂપણાએ કરી સુપાત્ર સાધુ-સાધ્વીજીની જોગવાઈ મળે અને નિર્દોષ આહાર પાણી વહેારાવું, તે વારે સ્પર્શનાએ કરી શુદ્ધ હેજો ! એવા ખારમા અતિથિ સવિભાગ વ્રતના પંચ અઈયારા જાણિયવ્વા ન સમાયરિયવા, ત’જહા–તે આવેાઉ.
સચિત્તનિક્ખેવયા સચિત્તપેહણયા કાલાઇમે પરોવએસે મચ્છરિયાએ તસ્સ મિચ્છા મિ દુકડ
નમે અરિહંતાણં, ના સિદ્ધાણુ, નમે આયરિયાણુ, નમે। ઉવજ્ઝાયાણુ, નમે લેાએ સવ્વસાહૂ ણુ .
સંથારા ( અણુસણુ-અનશન ) ના પાઢ
અપછિમ મારણેન્દ્રિય સલેહણા, પાષધશાળા પાંજીને, ઉચ્ચાર પાસવણુ ભૂમિકા પડિલેહીને, ગમણુાગમણે પડિકકમીને, સંથારા દુરૂહીને, પૂર્વ તથા ઉત્તર દિશિ પલ્ય કાદિક આસને બેસીને, કરયલ સપરિગહિયં સિરસાવત્તય મત્યએ અજિલ કદ એવ વયાસી, નમાત્થણુ અરિહંતાણું ભગત્રતાણું જાવ પત્તાણુ.
૭
એમ અનતા સિદ્ધને નમસ્કાર કરીને, વર્તમાન પોતાના ધર્મ ગુરુ-ધર્માંચાને નમસ્કાર કરીને પૂર્વી જે વ્રત આદર્યાં છે, તે
આલેવી, પડિકકમિ, નિંદી, નિ:શલ્ય થઈને, સવ પાણાઇવાય. પચ્ચક્રૃખામિ, સવ્વ મુસાવાય પચ્ચક્ખામિ, સવ્વ અદિન્નાદાણું પચ્ચક્ખામિ, સવ્વ મેહુy પચ્ચક્ખામિ, સવ્વ પરિગઢ પચ્ચક્ખામિ, સવ્`કે` પચ્ચક્ખામિ જાવ મિચ્છા દસણુ સલ, અકરણજ્જોગ પચ્ચક્ખામિ જાવજીવાએ, તિવિહ, તિવિહેણું, ન કરેમિ, ન કારવેમિ, કરતાપિ અન્ન ન સમણુજાણામિ, મસા વયસા કાયસા, એમ અઢારે પાપ થાનક પચ્ચક્ખીને, સવ... અસણુ પાણું ખાઇમસાઇમ ચવિડ આહાર પચ્ચક્ખીને, જાવજીવાએ,એમ ચારે આહાર પચ્ચક્ખીને, જંપિય ઈમ સરીર હૂ કત પિય મણુન્ન મણુમંધિજ્જ જિસાસિય સમય અણુમય બહુમય ભડકરડગસમાણુ રયણુકર ડગભૂ મા ણું સી ય મા છું ઉšં, મા શું ખુહા, મા છું પીવાસા, મા !' માલા, મા ! ચારા, મા ! ઈંસા, મા શું વાહિયં પિત્તિય સભિમ સન્નિવાઈય. વિવિહા ગાય કા પરિસહાવસા
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३३४
आवश्यकसूत्रस्य ફાસા કુસંતિ, એયંપિણે ચરમેહિ ઉસ્સાસનિસ્સાસેહિં સિરામિ ત્તિ કટ્ટ, એમ શરીર વોસિરાવીને, કાલ અણુવકંખમાણે વિહરિસ્સામિ,
એવી સહણ પ્રરૂપણાએ કરી, અણસણને અવસર આવ્યું, અણુસણ કરે તે વારે સ્પર્શનાએ કરી શુદ્ધ હેજે.
એવા અપછિમ મારતિય સંલેહણુ ગુસણુ આરહણના પંચ અઈયારા જાણિયળ્યા ન સમાયરિયળ્યા તં જહા તે આલેઉં.
ઈહલેગાસંસપગે, પરલગાસંસપગે, છવિયાસંસપગે, મરણસંસપગે, કામભેગાસંસMઓગે, તસ્સ મિચ્છા મિ દુકકડં.
એમ સમકિતપૂર્વક બાર વ્રત સંલેખણ સહિત તથા નવાણું અતિચાર એને . વિષે જે કઈ અતિક્રમ, વ્યતિક્રમ, અતિચાર, અણુરચાર, જાણતાં અજાણતાં મન, વચન, કાયાએ કરી સેવ્યાં હોય, સેવરાવ્યાં હોય, સેવતાં પ્રત્યે અનુદાં હોય, તે અરિહંત, અનંત સિદ્ધ ભગવાનની સાખે તસ્સ મિચ્છા મિ દુકકડ.
૧ પ્રાણાતિપાત, ૨ મૃષાવાદ, ૩ અદત્તાદાન, ૪ મૈથુન, ૫ પરિગ્રહ, ૬ ક્રોધ ૭ માન, ૮ માયા, ૯ લેભ, ૧૦ રાગ, ૧૧ શ્રેષ, ૧૨ કલહ, ૧૩ અભ્યાખ્યાન, ૧૪ પશુન્ય. ૧૫ પર પરિવાદ, ૧૬ રઈઅરઈ, ૧૭ માયા, ૧૮ મિચ્છાદંસણસલ, તસ્સ મિચ્છા મિ દુકકડ.
૨૫ પ્રકારનાં મિથ્યાત્વ
૧ અભિગ્રહિક મિથ્યાત્વ, ૨ અણુભિગ્રહિક મિથ્યાત્વ, ૩ અભિનિવેશિક મિથ્યાત્વ, ૪ સશયિક મિથ્યાત્વ + અણુભગ મિથ્યાત્વ, ૬ લોકિક મિથ્યાત્વ, ૭ લકત્તર મિયાત્વ, ૮ કુપ્રવચન મિથ્યાત્વ, ૯ જીવને અજીવ સરધે તે મિથ્યાત્વ ૧૦ અજીવને જીવ સરધે તે મિથ્યાત્વ, ૧૧ સાધુને કુસાધુ સરધે તે મિથ્યાત્વ, ૧૨ મુસાધુને સાધુ સરધે તે મિથ્યાત્વ, ૧૩ આઠ કમથી મૂકાણા, તેને નથી મૂકાણા સરધે તે મિથ્યાત્વ, ૧૪ આઠ કર્મથી નથી મૂકાણ, તેને મૂકાણ સરધે તે મિથ્યાત્વ, ૧૫ ધર્મને અધર્મ સરધે તે મિથ્યાત્વ, ૧૬ અધર્મને ધમ સરધે તે મિથ્યાત્વ, ૧૭ જિનમાર્ગને અન્ય માગ સરધે તે મિથ્યાત્વ, ૧૮ અન્ય માગને જિનમાર્ગ સરધે તે મિથ્યાત્વ, ૧૯ જિન માર્ગથી ઓછું પ્રરૂપે તે મિથ્યાત્વ, ૨૦ જિન માર્ગથી અધિકું પ્રરૂપે તે મિથ્યાત્વ, ૨૧ જિનમાર્ગથી વિપરીત પ્રરૂપે તે મિથ્યાત્વ, ૨૨ અવિનયમિથ્યાત્વ, ૨૩ અકિરિયામિથ્યાત્વ, ૨૪ અજ્ઞાનમિથ્યાત્વ. ૨૫ આશાતનામિથ્યાત્વ, તસ્સ મિચ્છા મિ દુકકડ.
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बारह व्रतों का अतिचार सहित पाठ
३३५
ચૌદ પ્રકારના સમૂચ્છિમ
ઉચ્ચારેસુ પાસવણેસ ખેલેસુ સિંધાણેસ વ તેસુ પિત્તસુ પૂએસ સાહ્યુિએસ સુકેસુ સુગ્ગલપરિસાડિએસ વિગયજીવકલેવરેસુ, ઇત્થીપુરિસસ જોગેસુ, નગર નિદ્ધમણેસ, સબ્વેસુ ચેવ અસુઇઠાણેસુ વા તસ્સ મિચ્છા મિ દુકકડ,
આ ઠેકાણે ઇચ્છામિ ઠામ આલે જે મે ક્રેવિસ અઇઆર કએ’થી જ ખડિય` જ વિરાહિયં તસ્સ મિચ્છામિ દુકકડ” સુધીના પાઠ કહેવા પછી. નવકાર મંત્ર અને ‘કરેમિ ભંતે સામાઈય”થી ‘અપાણું વાસિરામિ' સુધી પાઠ કહેવા.
સમાપ્ત
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શાસ્ત્રોની માહીતી.
5
ભાગ ૨
૧ શ્રી ઉપાસક દશાંગ સૂત્ર
પહેલી આવૃત્તિ ખલાસ.
બીજી , તૈયાર છે. ૮-૮-૦ ૨ ,, દશ વૈકાલિક ) ભાગ ૧ પહેલી , ખલાસ.
બીજી તૈયાર છે. ૧૦-૦-૦ ૩ , દશવૈકાલિક ભાગ ૨ પહેલી
૭-૮-૦ જ , નિરયાવલિકા - ભાગ ૧ થી ૫ પહેલી
૭-૮-૦ આચારાંગ
ભાગ ૧ પહેલી ખલાસ
બીજી તૈયાર છે. ૧૦-૦-૦ આચારાંગ
પહેલી
૧૦-૦-૦ આચારાંગ ભાગ ૩ પહેલી
૧૦-૦-૦ ૮ આવશ્યક
પહેલી ખલાસ.
બીજી તૈયાર છે. ૭-૮-૦ . વિપાક
પહેલી ખલાસ.
બીજી છપાય છે. ૧૦-૦-૦ ૧૦ , દશાશ્રુત સ્કંધ
પહેલી ખલાસ.
છપાય છે. -૦- , અન્નકૃત દશાંગ ,
પહેલી ખલાસ.
બીજી છપાય છે. ૫-૦-૦ , અનુત્તરો પપાતિક,
પહેલી ખલાસ.
બીજી છપાય છે. ૩-૮- ૧૩ , નંદી
પહેલી છપાય છે. ઉવવાઈ
પહેલી , છપાય છે. ઉત્તરાધ્યયન
પહેલી
છપાય છે. ૧૬ , ક૯૫
પહેલી , છપાય છે. ૩૫-૦-૦ (પત્રાકારે)
(અગાઉથી ગ્રાહક થનારને માટે રૂા. ૨૫-૦-૦) રાજકેટ તા. ૧૫-૩-૫૮
બીજી
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દાતાઓની નામાવલી
આધ મુરબ્બીશ્રી, મુરબ્બીશ્રી, સહાયક મેમ્બરે તથા મેમ્બરાની યાદી
ગામવાર કક્કાવારી લી
તા. ૧૮-૧૦-૪૪ થી તા. ૨૮-૨-૫૮ સુધીમાં દાખલ થએલ મેમ્બર,
(રૂા. ૨૫૦ થી આછી રકમ આ યાદીમાં સામેલ કરી નથી. )
શ્રી અખિલ ભારત શ્વેતામ્બર સ્થાનકવાસી જૈન શાસ્રોદ્ધાર સમિતિ.
ગરેડીઆ કુવા રોડ – ગ્રીન લેાજ પાસે રાજકોટ.
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આઘમુરબીશ્રીએ-૪
નામ
(ઓછામા ઓછી રૂ. ૫૦૦૦ ની રકમ આપનાર) નંબર
ગામ રૂપિયા ૧ શેઠ શાન્તીલાલ મંગળદાસભાઈ જાણીતા મીલમાલીક અમદાવાદ ૧૦૦૦૦ ૨ શેઠ હરખચંદ કાલીદાસભાઈ વારીયા હા. શેઠ લાલચંદભાઈ,
જેચંદભાઈ, નગીનભાઈ, વૃજલાલભાઈ તથા વલભદાસભાઈ ભાણવડ ૬૦૦૦ ૩ કોઠારી જેચંદભાઈ અજરામર હા. હરગોવીંદભાઈ જેચંદભાઈ રાજકેટ પર૫૧ ૪ શેઠ ધારશીભાઈ જીવનભાઈ
સેલાપુર ૫૦૦૧
મુરબ્બીશ્રીઓ-૨૨ (ઓછામાં ઓછી રૂ. ૧૦૦૦ ની રકમ આપનાર) ૧ વકીલ જીવરાજભાઈ વર્ધમાન કે ઠારી હ. કહાનદાસભાઈ તથા વેણીલાલભાઈ
જેતપુર ૩૬૦૫ ૨ દેશી પ્રભુદાસ મૂળજીભાઈ
રાજકેટ ૩૬૦૪ ૩ મહેતા ગુલાબચંદ પાનાચંદ
રાજકેટ ૩૨૮૯ાાતા ૪ સ્વ. પિતાશ્રી છગનલાલ શામળદાસના સ્મરણાર્થે હ. ભાવસાર ભેંતીલાલ છગનલાલ
અમદાવાદ ૩૨૫૧ ૫ મહેતા માણેકલાલ અમુલખરાય
ઘાટકોપર ૩૨૫૦ ૬ સંઘવી પીતામ્બરદાસ ગુલાબચંદ
જામનગર ૩૧૦૧ ૭ શેઠ શામજીભાઈ વેલજીભાઈ વીરાણી
રાજકેટ ૨૫૦૦ ૮ નામદાર ઠાકોર સાહેબ લખધીરસિહજી બહાદુર
મોરબી ૨૦૦૦ ૯ શેઠ લહેરચંદ કુંવરજી હા. શેઠ ન્યાલચંદ લહેરચંદ સિદ્ધપુર ૨૦૦૦ ૧૦ શાહ છગનલાલ હેમચંદ વસા હા. મેહનલાલભાઈ તથા મેતીલાલભાઈ
મુ બઈ ૨૦૦૦ ૧૧ શ્રી સ્થાનકવાસી જૈન સંઘ
મેરબી ૧૯૬૩ ૧૨ મહેતા સમચંદ તુલસીદાસ તથા તેમનાં ધર્મપત્ની અ. સો. મણીગોરી મગનલાલ
રતલામ ૧૫૦૦ ૧૩ મહેતા પિપટલાલ માવજીભાઈ
જામજોધપુર ૧૩૦૧ ૧૪ દેશી કપુરચંદ અમરશી હા. દલપતરામભાઈ જામજોધપુર ૧૦૦૨ ૧૫ બગડીઆ જગજીવનદાસ રતનશી
દામનગર ૧૦૦૨
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અમદાવાદ ૧૦૦૧ ૧૬ શેઠ આત્મારામ માણેકલાલ
પોરબંદર ૧૦૦૧ ૧૭ શેઠ માણેકલાલ ભાણજીભાઈ ૧૮ શ્રીમાન ચંદ્રસિંહ મહેતા (રેલ્વે મેનેજર સાહેબ) કલકત્તા ૧૦૦૧ ૧૯ મહેતા સમચંદ નેણસીભાઈ (કરાંચીવાલા)
મેરબી ૧૦૦૧ ૨૦ શાહ હરીલાલ અનેપચંદભાઈ
ખંભાત ૧૦૦૧ ૨૧ કઠારી છબીલદાસ હરખચંદભાઈ
મુંબઈ ૧૦૦૦ ૨૨ કોઠારી રંગીલદાસ હરખચંદભાઈ
શિહેર ૧૦૦૦ સહાયક મેમ્બશે-૩૬
(ઓછામાં ઓછી રૂ. ૫૦૦ ની રકમ આપનાર) ૧ શાહ રંગજીભાઈ મેહનલાલ
અમદાવાદ ૭૫૧ ૨ મેરી કેશવલાલ હરીચંદ્ર
સાબરમતી
૭૫૦ ૩ શ્રી સ્થાનકવાસી જૈન સંઘ હા. શેઠ ઝુંઝાભાઈ વેલસીભાઈ વઢવાણ શહેર ૭૫૦ ૪ શેઠ નરોત્તમદાસ ઓઘડભાઈ
જોરાવરનગર ૭૦૦ ૫ શેઠ રતનશી હીરજીભાઈ હા. ગેરધનદાસભાઈ
જામજોધપુર ૫૫૫ ૬ બાટવીયા ગીરધર પ્રમાણંદ હા. અમીચંદભાઈ ખાખીજાળીઆ ૫૨૭ ૭ મોરબીવાળા સંઘવી દેવચંદ નેણશીભાઈ તથા તેમનાં ધર્મપત્ની
અ. સ. મણીબાઈ તરફથી હા. મુળચંદ દેવચંદ (કરાંચીવાલા) મલાડ ૫૧૧ ૮ વારા મણીલાલ પોપટલાલ
- અમદાવાદ ૫૨ ૯ ગોસલીયા હરીલાલ લાલચંદ તથા અ. સૌ. ચંપાબેન ગોસલીયા અમદાવાદ ૫૦૨ ૧૦ પ્રેમચંદ માણેકચંદ તથા અ.સો. સમરતબેન (રાજસીતાપુરવાળા)અમદાવાદ
૫૦૨ ૧૧ શેઠ ઈશ્વરલાલ પુરૂષેતમદાસ
અમદાવાદ ૫૦૧ ૧૨ શેઠ ચંદુલાલ છગનલાલ
અમદાવાદ ૫૦૧ ૧૩ શાહ શાન્તીલાલ માણેકલાલ
અમદાવાદ ૧૪ શેઠ શીવલાલ ડમરભાઈ (કરાંચીવાળ)
લીંબડી ૫૦૧ ૧૫ કામદાર તારાચંદ પોપટલાલ ધોરાજીવાળા
રાજકોટ ૫૦૦ ૧૬ મહેતા મોહનલાલ કપુરચંદ
રાજકેટ પ૦૦ ૧૭ શેઠ ગોવીંદજી પોપટભાઈ
રાજકેટ ૫૦૦ ૧૮ શેઠ રામજી શામજી વીરાણું
રાજકેટ ૫૦૧ ૧૯ સ્વ. પિતાશ્રી નંદાજીના સ્મરણાર્થે હા. વેણચંદ શાન્તીલાલ (જાબુઆવાળા)
મેઘનગર
૫૦૧ ૨૦ શ્રી સ્થાનકવાસી જૈનસંધ હ. શેઠ ઠાકરશી કરસનજી થાનગઢ ૫૦૦ ૨૧ શેઠ તારાચંદજી પુખરાજજી
ઓરંગાબાદ ૫૦૦
૫૦૧
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૫૦૦
૫૦૦ ૫૦૧ ૫૦૧ ૫૦૧
૨૨ શ્રી સ્થાકવાસી જૈન સંઘ
ઓરંગાબાદ ૧૫૦ શેઠ શેષમલજી જીવરાજજી ૧૨૫ શેઠ અનરાજજી લાલચંદજી ૧૨૫ ધુકડચંદજી રૂપચંદજી ૧૦૦ દગડુમલજી ચાંદમલજી
૫૦૦ ૨૩ મહેતા મૂળચંદ રાઘવજી હા. મગનલાલભાઈ તથા દુર્લભજીભાઈ ધ્રાફા ૨૪ શેઠ હરખચંદ પુરૂતમ હા. ઈન્દ્રકુમાર
ચોરવાડ ૨૫ શેઠ કેસરીમલજી વસતીમલજી ગુગલીયા
રાણાવાસ ૨૬ સ્થા. જૈનસંઘ હા. બાટવીઆ અમીચંદ ગીરધરભાઈ ખાખીજાળીઆ ૨૭ શેઠ ખીમજીભાઈ બાવાભાઈ હા. કુલચંદભાઈ, નાગરદાસભાઈ તથા જમનાદાસભાઈ
મુંબઈ ૨૮ શેઠ મણીલાલ મેહનલાલ ડગલી હા. મુળજીભાઈ મણીલાલ મુંબઈ ૨૯ સ્વ. કાંતીલાલભાઈના સ્મરણાર્થે હ. શેઠ બાલચંદ સાકરચંદ મુંબઈ ૩૦ કામદાર રતીલાલ દુર્લભજી (જેતપુરવાળા)
મુંબઈ ૩૧ શાહ જયંતીલાલ અમૃતલાલ
શીવ ૩૨ વેરા મણીલાલ લક્ષમીચંદ
શીવ ૩૩ શેઠ ગુલાબચંદ ભુદરભાઈ
ખારડ ૩૪ મહાન ત્યાગી બેન ધીરજકુંવર ચુનીલાલ મહેતા
ભાણવડ ૩૫ શ્રી સ્થાનકવાસી જૈનસંઘ
ધ્રાફા ૩૬ શ્રી મગનલાલ છગનલાલ શેઠ
રાજકોટ
૫૦૧ ૫૦૧ ૫૦૧ ૫૦૧ ૫૦૧
૫૦૧
૫૦૧ ૫૦૧ ૫૦૧ ૫૦૧
૩૧૬ મેમ્બરોનું ગામ વાર લીસ્ટ
અમદાવાદ તથા પરાંઓ. ૧ શેઠ ગીરધરલાલ કરમચંદ ૨ શેઠ છોટાલાલ વખતચંદ હા. ફકીરચંદભાઈ ૩ શાહ કાન્તીલાલ ત્રીભવનદાસ ૪ શાહ પિચાલાલ પીતામ્બરદાસ ૫ શાહ પિટલાલ મેહનલાલ
૨૫૧ ૨૫૧ ૨૫૧ ૨૫ ૨૫૧
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૨૫૧
૨૫૦ - ૬ શેઠ પ્રેમચંદ સાકરચંદ
૨૫૧ ૭ શાહ રતીલાલ વાડીલાલ ૮ શેઠ લાલભાઈ મંગળદાસ ૯ સ્વ. અમૃતલાલ વર્ધમાનના સ્મરણાર્થે
હા. કાનજીભાઈ અમૃતલાલ દેસાઈ ભાવસાર ભોગીલાલ જમનાદાસ (પાટણવાળા)
૨૫૧ શાહ નટવરલાલ ચંદુલાલ
૨૫૧ ૧૨ શાહ નરસિંહદાસ ત્રીભવનદાસ
૨૫૧ ૧૩ શ્રી શાહપુર દરીયાપુરી આઠળેટી સ્થા. જૈન ઉપાશ્રય હા. વહીવટ કર્તા શેઠ ઈશ્વરલાલ પુરૂષોતમદાસ
૨૫૧ ૧૪ શ્રી છીપાળ દરીયાપુરી આઠકોટી સ્થા. જૈનસંઘ હા. ચંદુલાલ અમૃતલાલ ૨૫૧ ૧૫ શાહ ચીનુભાઈ બાલાભાઈ ડા. શાહ બાલાભાઈ મહાસુખરામ ૨૫૧ ૧૬ શાહ ભાઈલાલ ઉજમશી
૨૫૧ ૧૭ શ્રી સુખલાલ ડી. શેઠ હા. ડે. કુ સરસ્વતી પ્લેન શેઠ
૨૫૧ ૧૮ શ્રી સૌરાષ્ટ સ્થા. જૈનસંઘ હા. શાહ કાન્તીલાલ જીવણલાલ
૨૫૧ ૧૯ મેદી નાથાલાલ મહાદેવદાસ
૨૫૧ ૨૦ શાહ મેહનલાલ ત્રીકમદાસ
૨૫૧ ૨૧ શ્રી કોટી સ્થા. જૈનસંધ હા. શાહ પિાચાલાલ પીતામ્બરદાસ
૨૫૧ ૨૨ શેઠ પોપટલાલ હંસરાજના સ્મરણાર્થે હા. શેઠ બાબુલાલ પોપટલાલ ૨૫૧ ૨૩ દેશાઈ અમૃતલાલ વર્ધમાન બાપોદરાવાળા હા. ભાઇલાલ અમૃતલાલ દેસાઈ ૨૫૧ ૨૪ શાહ નવનીતલાલ અમુલખરાય
૨૫૧ ૨૫ શાહ મણીલાલ આશારામ
૨૫૧ ૨૬ શાહ ચીનુભાઈ સાકરચંદ
૨૫૧ ૨૭ શાહ વરજીવનદાસ ઉમેદચંદ
૨૫૧ ૨૮ શાહ રજનીકાન્ત કસ્તુરચંદ
૨૫૧ ૨૯ સંઘવી જીવણલાલ છગનલાલ (સ્થા. જૈન)
૨૫૧ ૩૦ શાહ શાંતિલાલ મેહનલાલ પ્રાંગધાવાળા
૨૫૧ ૩૧ અ. સો. બેન રતનબાઈ નાદેચા હા. શાહ ધુલાજી ચંપાલાલજી ૨૫૧ ૩૨ શાહ હરિલાલ જેઠાલાલ ભાડલાવાળા
૨૫૧ ૩૩ શ્રી સરસપુર દરીયાપુરી આઠકેટી સ્થા. જૈન ઉપાશ્રય હા. ભાવસાર ભેગીલાલ છગનલાલ
૨૫૧ ૩૪ શેઠ પુખરાજજી સમતીરામજી સાદડીવાળા
૨૫૧ ૩૫ શેઠ લાલચ મીશ્રીલાલ
૨૫૧
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૩૬ સ્વ. પિતાશ્રી જવાહરલાલજી તથા પૂજ્ય ચાચાજી હજારમલજી ૨૫૧
બરડીયાના સ્મરણાર્થે હા. મૂળચંદ જવાહરલાલ સ્વ. ભાવસાર બબાભાઈ (મંગળદાસ) પાનાચંદના સ્મરણાર્થે હા. તેમના ધર્મપત્ની પુરીબેન
૨૫૧ સ્વ. પિતાશ્રી રવજીભાઈ તથા સ્વ. માતુશ્રી મૂળીબાઈના સ્મરણાર્થે હા. કકલભાઈ કેઠારી
૩૦૧ ભાવસાર કેશવલાલ મગનલાલ
૨૫૧ ૪૦ શાહ કેશવલાલ નાનચંદ જાખડાવાળા હા. પાર્વતીબેન
૨૫૧ ૪૧ શાહ જીતેન્દ્રકુમાર વાડીલાલ માણેકચંદ રાજસીતાપુરવાળા (સાબરમતી) ૨૫૧ ૪૨ શ્રી સ્થા. જૈન સંઘ (સાબરમતી)
૨૫૦ ૪૩ બીપીનચંદ્ર તથા ઉમાકાંત ચુનીલાલ ગોપાણી (રાણપુરવાળા)
૩૦૧ અમલનેર ૧ શાહ નાગરદાસ વાઘજીભાઈ
૨૫૧ ૨ શ્રી સ્થા જેનસંઘ હા. શાહ ગાંડાલાલ ભીખાલાલ
૨૫૧ આણંદ ૧ શેઠ રમણીકલાલ એ. કપાસી હ. મનસુખલાલભાઈ
આસનસેલ ૧ બાવીસી મણીલાલ ચત્રભુજના સ્મરણાર્થે તેમનાં ધર્મપત્ની મણીબાઈ તરફથી હા. રમણીકલાલ, અનીલકાંત, વિનોદરાય. ૨૫૧
આટકેટ ૧ શાહ ચુનીલાલ નારણજી
૩૦૧ ઉદેપુર ૧ શેઠ મોતીલાલજી રણજીતલાલજી હીંગડ
૨૫૧ ૨ શેઠ મગનલાલજી બાગચા
૨૫૧ ૩ અ. યો પ્લેન ચંદ્રાવતી તે શ્રીમાન બહેતલાલજી નાહરનાં
ધર્મપત્ની હા. શેઠ રણજીતલાલજી હીંગડ ૪ સ્વ. શેઠ કળલાલજી લોઢાના સ્મરણાર્થે હા. શેઠ દોલતસિંહજી લેઢા ૨૫૧ ૫ સ્વ. શેઠ પ્રતાપમલજી સાખેલાના સ્મરણાર્થે
હા. પ્રાણલાલ હીરાલાલ સાખલા
૨૫૧
૨૫૧
૨૫૧
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________________
'
.
૨૫૧
૬ પૂજ્ય પિતાશ્રી મોતીલાલજી મહેતાના સ્મરણાર્થે
૨૫૧ હા. રણજીતલાલજી મેતીલાલજી મહેતા ૭ શેઠ છગનલાલ બાગટેચા
૨૫૧ ઉમરગાવ રેડ ૧ શાહ મેહનલાલ પિપટલાલ પનેલીવાળા
૨૫૧ ઉપલેટા ૧ શેઠ જેઠાલાલ ગોરધનદાસ
૨૫૧ ૨ સ્વ. બેન સંતકબેન કચરા હા. ઓતમચંદભાઈ,
છેટાલાલભાઈ તથા અમૃતલાલભાઈ વાલજી (કલ્યાણુવાળા) ૩ શેઠ ખુશાલચંદ કાનજીભાઈ હા. શેઠ પ્રતાપભાઈ
૨૫૧ ૪. સંઘાણી મૂળશંકર હરજીવનભાઈના સ્મરણાર્થે હા. તેમના પુત્ર જયંતીલાલભાઈ તથા રમણીકલાલ
૨૫૧ એડન કેમ્પ ૧ શાહ ગોકળદાસ શામજી ઉદાણ
૨૫૧ કલોલ ૧ શેઠ મેહનલાલ જેઠાભાઈના સ્મરણાર્થે હા. શેઠ આત્મારામ મેહનલાલ ૨૫૧ ૨ ડો. માયાચંદ મગનલાલ શેઠ હા. ડે. રતનચંદ મયાચંદ
૨૫૧ ૩ સ્વ. નાથાલાલ ઉમેદચંદના સ્મરણાર્થે હા. શાહ રતીલાલ નાથાલાલ ૨૫૧ ૪ શાહ મણીલાલ તલકચંદના સ્મરણાર્થે હા. મારફતીયા ચંદુલાલ મણીલાલ ૨૫૧
૧ શ્રી સ્થા. દરીયાપુરી જૈન સંઘ હા. ભાવસાર દામોદરદાસ ઈશ્વરભાઈ ૨૫૧
કલકી ૧ પટેલ ગોવીંદલાલ ભગવાનજી
૨૫૧ ૨ પટેલ ખીમજી જેઠાભાઈ વાઘાણી (તેમના સ્વ. સુપુત્ર રામજીભાઈના સ્મરણારે ૩૦૨
ખીચન ૧ શેઠ કીશનલાલ પૃથ્વીરાજ
૨૫૧ ખંભાત ૧ શેઠ માણેકલાલ ભગવાનદાસ
૨૫૧ ૨ શ્રી સ્થા. જૈન સંધ હ. પટેલ કાન્તીલાલ અંબાલાલ
૨૫૧ ૩ શાહ સાકરચંદ મેહનત
૨૫૧ ૪ શાહ ચંદુલાલ હરીલાલ
૨૫૧
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________________
ગુંદા
૧
સ્વ. મહેતા પુનમચંદ ભવાનભાઈને સ્મરણાર્થે હા. તેમનાં ધર્મપત્નિ દીવાળીબેન ભીલાધર
૨૫૧
Nisa
૨૫૧
૩૦૧
૩૦૧
૩૦૧
૨૫૧
૩૦૦
૨૫૧
૧ સ્વ. બાખડા વછરાજ તુલસીદાસનાં ધર્મપત્નિ કમળબાઈ તરફથી
હા. માણેકચંદભાઈ તથા કપુરચંદભાઈ ૨ પીપળીઆ લીલાધર દામોદર તરફથી તેમના ધર્મપત્ની અ. સો.
લીલાવતી સાકરચંદ કંઠારીના બીજા વરસીતપની ખુશાલીમાં ૩ કામદાર જુઠાલાલ કેશવજીના સ્મરણાર્થે હા. હરીલાલ જુઠભાઈ
ગોધરા ૧ શાહ ત્રીભવનદાસ છગનલાલ
ઘટકણ ૧ શાહ ચંદુલાલ કેશવલાલ
ઘોલવાડ (થાણા) ૧ મહેતા ગુલાબચંદજી ગંભીરલાલજી
ચુડા (ઝાલાવાડ) ૧ શ્રી સ્થા. જૈનસંધ હા. રતીલાલ ગાંધી પ્રમુખ
જલેસર (બાલાસર) ૧ સંઘવી નાનચંદ પિપટભાઈ થાનગઢવાળા
જામજોધપુર ૧ શ્રી સ્થા. જૈનસંઘ ૨ શાહ ત્રીભોવનદાસ ભગવાનજી પાનેલીવાળા
જામનગર ૧ શેઠ છોટાલાલ કેશવજી ૨ શેઠ ચતુરદાસ ઠાકરશી ૩ વેરા ચીમનલાલ દેવજીભાઈ
જામખંભાળીઆ ૧ શેઠ વસનજી નારણજી ૨ શ્રી સ્થા. જૈનસંધ હ. મહેતા રણછોડદાસ પરમાણંદ ૩ સંઘવી પ્રાણલાલ લવજીભાઈ
૨૫
૩૮૭ ૨૫૧
૨૫૧ ૨૫૧ ૨૫૧
૨૫૧ ૨૫૧ ૨૫૧
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નાહ
૨૫૧
૨૫૧
૨૫૧
૧ શાહ મણીલાલ મીઠાભાઈ હ. હરીલાલભાઈ (હાટીના માળીઓવાળા) ૨૫૧
જુનારદેવ (મધ્ય પ્રાંત) ૧ પેલાણી ત્રીકમજી લાધાભાઈ
જેતપુર ૧ શેઠ અમૃતલાલ હીરજીભાઈ હ. નરભેરામભાઈ (જસાપુરવાળા)
૨૫૧ ૨ દેશી છોટાલાલ વનેચંદ છે કે ઠારી ડોલરકુમાર વેણીલાલ
૨૫૧ જેતલસર ૧ શાહ કિમીચંદ કપુરચંદ
૨૫૧ ૨ કામદાર લીલાધર જીવરાજના સ્મરણાર્થે તેમનાં ધર્મપત્નિ જનકબેન તરફથી હા. શાન્તીલાલભાઈ ગંડલવાળા
ડભાસ ૧ સ્વ. તુરખીઆ લહેરચંદ માણેકચંદના સ્મરણાર્થે તેમનાં ધર્મપત્નિ જીવતીબાઈ તરફથી હા. જયંતીભાઈ.
ડાચા ૧ શ્રી સ્થા. જૈન સંધ હા. શેઠ ચંપાલાલજી માવે
૨૫૦ થાનગઢ ૧ શાહ ઠાકરશીભાઈ કરશનજી
૨૫ ૨ શેઠ જેઠાલાલ ત્રીભવનદાસ ૩ શાહ ધારશી પાશવીર હા. સુખલાલભાઈ
દહાણ રેડ (થાણા) ૧ શાહ હરજીવનદાસ ઓઘડ ખંધાર (કરાંચીવાળા)
૨૫૧ દિલ્હી ૧ લાલા પૂર્ણચંદજી જેન (સેન્ટ્રલ બેંકવાળા)
૩૫૧ ધાર (મધ્યપ્રાંત) ૧ શેઠ સાગરમલજી પનાલાલજી
૨૫૧
૨૫૧
૨૫ ૨૫૧
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૨૫ ૩૦૧ ૨૫૧
ધાંગણ ૧ શ્રી સ્થા. જૈન મોટા સંઘ હ. શેઠ માવજીભાઈ જીવરાજ ૨ સંઘવી નારણદાસ વખતચંદ ૩ ઠકકર નારણદાસ હરગોવીંદદાસ
ધોરાજી ૧ મહેતા પ્રભુદાસ મૂળજીભાઈ ૨ સ્વ. પિતાશ્રી ભગવાનજી કચરાભાઈના સ્મરણાર્થે
હા. પટેલ દલીચંદ ભગવાનજી. ૩ અ. સૌ. બચીબેન બાબુભાઈ ૪ ધી નવ સૌરાષ્ટ્ર ઓઈલ મીલ પ્રા. લીમીટેડ ૫ સ્વ. રાયચંદ પાનાચંદ શાહના સ્મરણાર્થે હા. ચીમનલાલ રાયચંદ ૬ ગાંધી પિપટલાલ જેચંદ
૫૧
૨૫૧ ૨૫૧
૨૫૧
૩૦૧ ૨૫૦
ધંધુકા
૧ ભાવસાર ખેડીદાસ ગણેશભાઈ ૨ શેઠ પોપટલાલ ધારશી ૩ સ્વ. ગુલાબચંદભાઈના સ્મરણાર્થે હા. વેરા પિપટલાલ નાનચંદ ૪ વસાણી ચત્રભુજ વાઘજીભાઈ
૨૫૧ ૨૫૧ ૨૫૧ ૨૫૧
નંદુરબાર
૩પ૦
૨૫૧
૨૫૧
૧ શ્રી સ્થાનકવાસી જૈન સંધ હા. શેઠ પ્રેમચંદ ભગવાનલાલ
પાણસણા ૧ શ્રી સ્થાનકવાસી જૈન સંધ
પાલણપુર ૧ લમીબેન હા. મહેતા હરીલાલ પીતામ્બરદાસ ૨ શ્રી કાગછ સ્થાનકવાસી જૈન પુસ્તકાલય
પાલેજ ૧ સ્વ. મનસુખલાલ મેહનલાલ સંઘવીના સ્મરણાર્થે હા. ભાઈ ધીરજલાલ મનસુખલાલ
બરવાળા (વેલાશા) ૧ સ્વ. મોહનલાલ નરસીદાસના સ્મરણાર્થે
હા. તેમનાં ધર્મપત્નિ સુરજબેન મોરારજી
૩૦૧
૨
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બગસરા (ભાયાણી)
૧. પૂજ્ય માતુશ્રી જકલખાઇના સ્મરણાથે
હા. દેશાઈ વ્રજલાલ કાળીદાસ
२
શેઠ પોપટલાલ રાઘવજી રાયડીવાળા હા. શેઠ માનસંગ પ્રેમચંદ
બેરાજા (કચ્છ)
૧
૧
૧
ર
૧૧
૧
સ્વ. વસાણી હરગાવૃંદદાસ છગનલાલના સ્મરણાર્થે હા. તેમનાં ધર્મપત્નિ છખલએન
૨ શ્રી સ્થાનક્રવાસી જૈનસંધ (૨૫૦ ખાકી)
ખેડેલી
શેઠ ગાંગજી કેશવજી (જ્ઞાનભંડાર માટે)
એટાદ
૧
શાહ પ્રવીણચંદ્ર નરસીદાસ (સાણ દવાળા)
શાહ ગીરધરલાલ સાકરચંદ
૧ શેઠ જેચંદભાઇ માણેકચંદ
ર
સંઘવી માણેકચંદ માધવજી
૩
શેઠ લાલજીભાઇ માણેકચંદ (લાલપુરવાળા)
૪ શેઠ રામજી જીણાભાઈ
૫ શેઠ પદમશી ભીમજી ફી
૬ ફાફરી ગાંડાલાલ કાનજીભાઈ હા. અ. સો. શાંતાબેન વસનજી
મદ્રાસ
શેઠ મેઘરાજજી દેવીચંદજી
ભાણવડ
મનાર (થાણા)
' શાહ શેરમલજી દેવીચંદજી જસવ તગઢવાળા હા. પૂનમચંદ શેરમલજી મેલ્યા
માનકુવા (કચ્છ)
૧
સ્વ. મહેતા કુંવરજી નાથાલાલના સ્મરણાર્થે હા. તેમનાં ધર્મપત્નિ કુવરબાઇ હરખચ દ (માનકુવા સ્થાનકવાસી જૈનસંઘ માટે)
૨૫૧
૨૫૧
૨૫૧
૨૫૧
પા
૨૫૧
૨૫૧
૩૦૧
૨૫૧
૨૫૧
૨૫૧
૨૫૧
૨૫૧
૨૫૧
૫૧
૨૫૧
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મુંબઈ તથા પરાઓ ૧ શેઠ છગનલાલ નાનજીભાઈ
૨૫૧ ૨ શાહ હરજીવન કેશવજી
૨૫૧ ઘેલાણું પ્રભુલાલ ત્રીકમજી (બોરીવલી)
૨૫૨ ૪ શેઠ છેટુભાઈ હરગોવિંદદાસ કટેરીવાલા
૨૫૧ ૫ શ્રી વર્ધમાન સ્થા. જૈનસંઘહા. કેસરીમલજી અનેપચંદજી ગુગળીયા(મલાડ) ૨૫૧ ૬ શેઠ ડુંગરશી હંસરાજ વીસરીયા
૨૫૧ ૭ શાહ રમણીકલાલ કાળીદાસ તથા અ.સૌ. કાન્તાબેન રમણીકલાલ ૨૫૧ ૮ શાહ હિંમતલાલ હરજીવનદાસ
૨૫૧ ૯ શાહ રતનશી માણુશીની કંપની
૨૫૧ શાહ શીવજી માણેક (કછ બેરાજાવાળા)
૨૫૧ ૧૧ શાહ પાનાચંદ સંઘજી હા. શાહ ત્રંબકલાલ રતીલાલ
૨૫૧ ૧૨ સ્વ. પૂ. પિતાશ્રી વીરચંદ જેસીંગભાઈ લખતરવાળાના સ્મરણાર્થે હા. કેશવલાલ વીરચંદ શેઠ
૨૫૧ ૧૩ શા. કુંવરજી હંસરાજ
૨૫૧ ૧૪ સ્વ. માતુશ્રી માણેકબેનના સ્મરણાર્થે હા. શેઠ વલભદાસ નાનજી (પોરબંદરવાળા)
૩૦૧ ૧૫ શેઠ દેવરાજજી જીતમલજી પૂનમીયા સાદડીવાળા
૨૫૧ ૧૬ એક સદગૃહસ્થ હા. શેઠ સુંદરલાલ માણેકચંદ
૨૫૧ ૧૭ અ. સૌ. પાનબાઈ હ. શેઠ પદમશી નરસિભાઈ (મલાડ)
૨૫૧ ૧૮ શ્રીયુત અમૃતલાલ વર્ધમાન બાપોદરાવાળા હ. દલીચંદ અમૃતલાલ ૨પ૧ ૧૯ સ્વ. શાહ નાગાશી સેજપાળ ગુંદાળાવાળાના સ્મરણાર્થે હા. રામજી નાગશી (મલાડ).
૩૦૧ ૨૦ શાહ રામજી કરશનજી થાનગઢવાળા
૨૫૧ ૨૧ શાહ નગીનદાસ કલ્યાણજી વેરાવળવાળા
૨૫૧ ૨૨ શીવલાલ ગુલાબચંદ શેઠ મેવાવાળા
૨૫૧ ૨૩ વ. જટાશંકર દેવજી દેશના સ્મરણાર્થે
૩૦૧ હા. રણછોડદાસ (બાબુલાલ) જટાશંકર દોશી ૨૪ સ્વ. ગેડા વણારશી ત્રીલેવન સરસઈવાળાના સ્મરણાર્થે
હા. જગજીવન વણારશી ગોડા (મલાડ) સ્વ. ત્રીવનદાસ વ્રજપાળ વીંછીયાવાળાના સ્મરણાર્થે હા. હરગોવિંદદાસ ત્રીવનદાસ અજમેરે
૨૫૧
૨૫૧
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૧૩
૩૧
૨૬ સ્વ. કાનજી મૂળજીના સ્મરણાર્થે તથા માતુશ્રી દિવાળીબાઈના ૧૬ ઉપવાસના પારણ પ્રસંગે હા. જયંતીલાલ કાનજી કાળાવડવાળા (મલાડ) ૨૫૧
૨૫૦ ૨૭ શેઠ ખુશાલભાઈ ખેંગારભાઈ
૨૫૧ ૨૮ શાહ પ્રેમજી માલશી ગંગર (મલાડ) ૨૯ સ્વ. પિતાશ્રી મનુભાઈ મેનાભાઈના સ્મરણાર્થે હા. કાનજી પતુભાઈ મલાડ ૨૫૧ ૩૦ શાહ વેલજી જેશીંગભાઈ છાસરાવાળા તરફથી તેમનાં
ધર્મપત્નિ અ. સો. સ્વ. નાનબાઈના સ્મરણાર્થે ૩૧ સ્વ. પિતાશ્રી રામશી વેલજીના સ્મરણાર્થે હા. શાહ દામજી રામશી (મલાડ) ૩૦૧
શેઠ ત્રંબકલાલ કસ્તુરચંદ લીંબડીવાળા તરફથી શ્રી અજરામર શાસ્ત્રભંડાર લીંબડી માટે (માટુંગા)
૨૫૧ ૩૩ સ્વ. પિતાશ્રી ભીમજી કરશી તથા માતુશ્રી પાલાબાઈના સ્મરણાર્થે હા. શાહ ઉમરશીભાઈ ભીમશી ક૭૫તરીવાળા (મલાડ)
૩૦૧ ૩૪ શેઠ ચુનીલાલ નરભેરામ વેકરીવાળા
૨૫૧ ૩૫ શાહ વ્રજાંગભાઈ શીવજી (મલાડ)
૨૫૧ ૩૬ રતીલાલ ભાઈચંદ મહેતા
૨૫૧ ૩૭ શાહ ખીમજી મૂળજી પૂજા (મલાડ)
૨૫૧ ૩૮ મેસર્સ સવાણી ટ્રાન્સપોર્ટ કંપની હા. શેઠ માણેકલાલ વાડીલાલ ૨૫૧ ૩૯ ઘેલાણી વલભજી નરભેરામ હા. નરસીભાઈ વલભજી
૨૫૧ ૪૦ અ. સો. સમતાબેન શાન્તીલાલ ૯૦ શાન્તીલાલ ઉજમશી શાહ (મલાડ) ૨૫૧ ૪૧ તેજાણી કુબેરદાસ પાનાચંદ
૨૫૧ કપાસી મેહનલાલ શીવલાલ
૨૫૧ ૪૩ સ્વ. પિતાશ્રી કેશવલાલ વછરાજ કઠારીના સ્મરણાર્થે સુરજબેન તરફથી હા. તનસુખલાલભાઈ (મલાડ)
૨૫૧ દડીયા અમૃતલાલ મેતીચંદ (ઘાટકોપર)
૨૫૧ શેઠ સરદારમલજી દેવીચંદજી કાવડીયા (સાદડીવાળા) ૪૬ દેશી ચત્રભુજ સુંદરજી (ઘાટકોપર)
૨૫૧ ૪૭ દેશી જુગલકીશોર ચત્રભુજ (ઘાટકોપર)
૫૨૧ ૪૮ દેશી પ્રવીણચંદ્ર ચત્રભુજ (ઘાટકોપર)
૨૫૧ શાહ ત્રીભોવનદાસ માનસિંગ દેઢીવાળાના સ્મરણાર્થે હા. શાહ હરખચંદ ત્રીભોવનદાસ
૨૫૧ ૫૦ શાહ જેઠાલાલ ડામરશી ધાંગધાવાળા હ. શાહ વાડીલાલ જેઠાલાલ ૨૫૦ ૫૧ શાહ ચંદુલાલ કેશવલાલ
૨૫૧
૨૫૧
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પર સ્વ. પિતાશ્રી શામળજી લ્યાણજી ગાંડલવાળાના સ્મરણાર્થે તેમના પુત્ર તરફથી હા. વૃજલાલ શામળજી બાવીશી
૩૦૧ પ૩ શાહ પ્રેમજી હીરજી ગાલા
૨૫૧ ૫૪ સ્વ. પિતાશ્રી ભગવાનજી હીરાચંદ જસાણીના સ્મરણાર્થે હા. લક્ષ્મીચંદ તથા કેશવલાલભાઈ
૩૦૧ ૫૫ સ્વ. પિતાશ્રી હંસરાજ હીરાના સ્મરણાર્થે હા. દેવશી હંસરાજ કરછ બીડાલાવાળા (મલાડ)
૨૫૧ પ૬ રવ. માતુશ્રી ગોમતીબાઈના સ્મરણાર્થે હ. શાહ પિપટલાલ પાનાચંદ ૫૭ શેઠ નેમચંદ સ્વરૂપચંદ ખંભાતવાળા હ. ભાઈ જેઠાલાલ નેમચંદ ૨૫૧ ૫૮ સ્વ. પિતાશ્રી શાહ અંબાલાલ પરસોતમ પાણશણાવાળાના સ્મરથાથે તેમનાં પુત્ર તરફથી હા. બાપાલાલભાઈ
૨૫૧ ૫૯ બેન કેશરબાઈ ચંદુલાલ જેસીંગલાલ શાહ
૨૫૧ ૬૦ દડીયા જેસીંગલાલ ત્રીકમજી
૨૫૧ ૧ શાહ કાન્તીલાલ મગનલાલ (ઘાટકોપર)
૨૫૧ ૬૨ કે ઠારી સુખલાલજી પૂનમચંદજી (ખાર)
૨૫૧ ૬૩ વ. માતુશ્રી કડવીબાઈના સ્મરણાર્થે હા. તેમનાં પૌત્ર હકમીચંદ તારાચંદ દેશી (કાંદીવલી)
૨૫૧ ૬૪ શેઠ સારાભાઈ ચીમનલાલ
૨૫૧ ૬૫ શાહ કરશીભાઈ હીમજીભાઈ
૩૦૧ ૬૬ પિતાશ્રી કુંદનમલજી મેતીલાલજીના સ્મરણાર્થે
હા. મેંતીલાલ જુબરમલ (અહમદનગરવાળા) ૬૭ શ્રી વર્ધમાન શ્વેતામ્બર સ્થા. જૈન સંઘ હા. શેઠ રૂપચંદ શીવલાલ કામદાર (અંધેરી)
૨૫૧ ૬૮ અ. સો. કમળાબેન કામદાર હા. રૂપચંદ શીવલાલ (અંધેરી) ૬૯ ધી મરીના મેડન હાઈસ્કુલ ટ્રસ્ટ ફંડ હા. શાહ મણીલાલ ઠાકરશી. ૭૦ સ્વ. માતુશ્રી જીવીબાઈના સ્મરણાર્થે હા. શામજી શીવજી કચ્છ ગુંદાળાવાળા (ગેરેગાંવ)
૨૫૧ ૭૧ શાહ રવજીભાઈ તથા ભાઈલાલભાઈની કંપની (કાંદીવલી)
૨૫૧ ૭૨ અ. સો. લાધુબેન હા. રવજી શામજી (કાંદીવલી)
૨૫૧ ૭૩ અ. સી. બેન કુંદનગોરી મનહરલાલ સંઘવી (ખારરેડ)
૨૫૧ ૭૪ શાહ કરશન લધુભાઈ (દાદર)
૩૦૧ ૭૫ અ. સો. રંજનગૌરી ચંદુલાલ શાહ વાહ ચંદુલાલ લક્ષ્મીચંદ (માટુંગ) ૨૫૧ ૭૬ મહેતા મેટર સ્ટેર્સ હા. અને પચંદ ડી. મહેતા (મુંબઈ)
૨૫૧
જે
૨૫૧
૨૫૧
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૨૭.
૨૫૦
માંડવી (કચ્છ) ૧ શ્રી સ્થા. છ કેટી જૈન સંઘ હા. મહેતા ચુનીલાલ વેલજી
મેસાણા ૧ શાહ પામશી સુરચંદના સ્મરણાર્થે હા. શીવલાલ પદમશી વરમગામવાળા
મે આસા ૧ શાહ દેવરાજ પેથરાજ
૨૫૦ ૨ શ્રીયુત નાથાલાલ ડી. મહેતા
૨૫૧ યાદગીરી ૧ શેઠ બાદરમલજી સૂરજમલજી બૅન્કર્સ
રાણપુર (ઝાલાવાડ) ૧ શ્રીમતી માતુશ્રી અમૃતબાઈના સ્મરણાર્થે હા. ડે. નરોત્તમદાસ ચુનીલાલ ૨૫૧
રાણાવાસ (મારવાડ) ૧ શેઠ જવાનમલજી નેમીચંદજી હા. બાબુરખબચંદજી
૩૦૧ રાજકોટ ૧ ધી વાડીલાલ ડાઈંગ એન્ડ પ્રિન્ટીંગ વર્કસ ૨ શેઠ રતીલાલ ન્યાલચંદ
૨૫૧ ૩ બાબુ પરશુરામ છગનલાલ શેઠ (ઉદેપુરવાળા)
૨૫૦ ૪ શેઠ મનુભાઈ મુળચંદ (એજીનીઅર સાહેબ)
૨૫૧ ૫ શેઠ શાન્તીલાલ પ્રેમચંદ તેમનાં ધર્મપત્નિના વરસીતપ પ્રસંગે ૨૫૧ ૬ ઉદાણી ન્યાલચંદ હાકેમચંદ વકીલ
૨૫૧ ૭ શેઠ પ્રજારામ વીઠ્ઠલજી
૨૫૧ ૮ શેઠ હકમીચંદ દીપચંદ નોંડલવાળા) સ્ટેશનમાસ્તર
૨૫૧ ૯ બહેન સર્કબાળા નોત્તમલાલ જસાણી (વરસીતપની ખુશાલી)
૨૫૧ ૧૦ મેદી સૌભાગ્યચંદ મેતીચંદ
૨૫૧ ૧૧ બદાણી ભીમજી વેલજી તરફથી તેમનાં ધર્મપત્નિ અ. સી. સમરતબેનના વરસીતપની ખુશાલી
૨૫૧ ૧૨ દેશી મોતીચંદ્ર ધારશીભાઈ (રીટાયર્ડ એજીનીઅર સાહેબ)
૨૫૧ ૧૩ કામદાર ચંદુલાલ જીવરાજ
૨૫૦ ૧૪ હેમા ઘેલભાઈ સવચંદ
૨૫૧
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૨૫૧ ૨૫૧ ૨૫૧
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૨૫૧
રંગુન ૧ કામદાર ગોરધનદાસ મગનલાલનાં ધર્મપિત્ન એ. સી. કમળાબેન
લખતર ૧ શાહ રાયચંદ ઠાકરશીને સ્મરણાર્થે હા. શાહ શાન્તીલાલ રાયચંદ ૨ ભાવસાર હરજીવનદાસ પ્રભુદાસના સ્મરણાર્થે
હા. ભાઈ ત્રીજોવનદાસ હરજીવનદાસ ૩ શાહ તલકશી હીરાચંદના સ્મરણાર્થે હા. ભાઈ અમૃતલાલ તલકશી ૪ શાહ ચુનીલાલ માણેકચંદ ૫ શાહ જાદવજી ઓઘડભાઈ સદાદવાળાના સમરણાર્થે
'હા. ભાઈ શાન્તીલાલ જાદવજી ૬ દેશી ઠાકરશી ગુલાબચંદના સ્મરણાર્થે તેમનાં ધર્મપત્નિ સમરતબેન વૃજલાલ તરફથી હા. જયંતીલાલ ઠાકરશી
લાલપુર ૧ શેઠ નેમચંદ સવજીભાઈ મોદી હા. મગનલાલભાઈ ૨ શેઠ મુળચંદ પિપટલાલ હ. મણીલાલભાઈ તથા જેસીંગલાલભાઈ
લાખેરી (રાજસ્થાન) ૧ માસ્તર જેઠાલાલ મનજીભાઈ હ. મહેતા અમૃતલાલ જેઠાલાલ (સીવીલ એજીનીઅર સાહિબ)
- લીમડી (પંચમહાલ) ૧ શાહ કુંવરજી ગુલાબચંદ ૨ છાજેડ ઘાસીરામ ગુલાબચંદ
લેનાવલા ૧ શેઠ ધનરાજજી મૂળચંદજી મૂળા
વઢવાણ શહેર ૧ શાહ દિલીપકુમાર સવાઈલાલ હા. સવાઈલાલ ચંબકલાલ શાહ ૨ શાહ મગનલાલ ગોકળદાસ હા. રતીલાલ મગનલાલ કામદાર ૩ સંઘવી મુળચંદ બેચરભાઈ હા. ભાઈ જીવણલાલ ગફલદાસ ૪ શેઠ વૃજલાલ સુખલાલ ૫ શેઠ કાન્તીલાલ નાગરદાસ
૨૫૧
૨૫૧ ૨૫૧e
૨૫૧
૨૫૧ ૨૫૧ ૨૫૧ ૨૫૧ ૨૫૧
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૬ વેરા ચત્રભુજ મગનલાલ
૨૫૧ ૭ સંઘવી શીવલાલ હીમજીભાઈ
૨૫૧ ૮ શાહ દેવશી દેવકરણ
૨૫૧ ૯ વેરા ડોસાભાઈ લાલચંદ્ર સ્થા. જૈન સંઘ હા. વેરા નાનચંદ શીવલાલ ૨૫૧ ૧૦ વોરા ધનજીભાઈ લાલચંદ સ્થા. જૈન સંઘ હા. વેરા પાનાચંદ ગેબરદાસ ૨૫૧ ૧૧ દેશી વીરચંદ સુરચંદ હા. દેશી નાનચંદ ઉજમશી
૨૫૧ ૧૨ સ્વ. વેરા મણીલાલ મગનલાલ હા. વેરા ચત્રભુજ મગનલાલ
૨૫૧
વટામણ
૧
શ્રી વટામણ સ્થા. જૈનસંઘ હા. શ્રી ડાહ્યાભાઈ હભુભાઈ પટેલ
૨૫૧
વલસાડ
૧ શાહ ખીમચંદ મૂળજીભાઈ
૨૫૧
વણી
૧ મહેતા નાનાલાલ છગનલાલનાં ધર્મપત્નિ સ્વ. ચંચળબેન તથા
પુરીબેનના સ્મરણાર્થે હા. ભાઈ મનહરલાલ નાનાલાલ
૨૫૧
વડોદરા
૧ કામદાર કેશવલાલ હિમતરામ પ્રેફેસર સાહેબ (ગોંડલવાળા)
૨૫૧ ૨ વકીલ મણીલાલ કેશવલાલ શાહ
૨૫૧ ૩ સ્વ. પિતાશ્રી શાહ ફકીરચંદ પુંજાભાઈના સ્મરણાર્થે હા. શાહ રમણલાલ ફકીરચંદ
૨૫૧ વડીયા ૧ પંચમીયા ભવાનભાઈ કાળાભાઈ (જેતપુરવાળા)
૨૫૧ વાંકાનેર ૧ માસ્તર કાન્તીલાલ ત્રંબકલાલ ખંઢેરીયા
૨૫૧ ૨ શ્રી સ્થા. જૈન સંઘ (રૂ. ૨૫૦ બાકી) ૩ દફતરી ચુનીલાલ પિપટભાઈ મેરબીવાળા હા. ભાઈ પ્રાણલાલ ચુનીલાલ
વીંછીયા ૧ શ્રી સ્થા. જૈન સંધ હા. અજમેરા રાયચંદ વૃજપાળ
૨૫૧
૨૫૧
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૧૮
૩૦૦
૨૫૧
વિરમગામ ૧ શાહ વાડીલાલ નેમચંદ વકીલ
૨૫૦ ૨ શાહ વીઠલભાઈ મેરી માસ્તર
૨૫૧ ૩ શાહ નાગરદાસ માણેકચંદ
૨૫૧ ૪ શાહ મણીલાલ જીવણલાલ (શાહપુરવાળા)
૨૫૧ ૫ શાહ અમુલખ (બચુભાઈ) નાગરદાસનાં ધર્મપત્નિ અ. સો, બેન લીલાવંતીના
વરસીતપના પારણાની ખુશાલીમાં હા. ભાઈ કાન્તીલાલ નાગરદાસ ૬ સ્વ. શેઠ ઉજમશી નાનચંદના સ્મરણાર્થે તેમના પુત્ર તરફથી
હ. શેઠ ચુનીલાલ નાનચંદ ૭ સ્વ. શેઠ મણીલાલ લક્ષમીચંદના સ્મરણાર્થે તેમના પુત્રો તરફથી હા. ખીમચંદભાઈ (ખારાઘોડાવાળા)
૨૫૧ ૮ સ્વ. શેઠ હરીલાલ પ્રભુદાસના સ્મરણાર્થે હા. શેઠ અનુભાઈ હરીલાલ ૨૫૧ ૯ સંઘવી જેચંદભાઈ નારણદાસ
૨૫૧ ૧૦ સ્વ. શાહ વેલશીભાઈ સાકરચંદભાઇના સ્મરણાર્થે
હા. ચીમનલાલ વેલશી (કત્રાસવાળા) ૧૧ પારેખ મણીલાલ ટોકરશી લાતીવાળા તરફથી (મેટી બેનના સ્મરણાર્થે) ૧૨ શાહ નારણદાસ નાનજીભાઈના સુપુત્ર વાડીલાલભાઈનાં ધર્મપત્નિ અ. સી.
નારંગીબેનના વરસીતપ નિમીતે હા. શાન્તીભાઈ ૧૩ સ્વ. છબીલદાસ ગોકળદાસના સમરણાર્થે તેમનાં ધર્મપત્નિ અ. સૌ. કમળાબેન તરફથી હા. મંજુલાકુમારી
૨૫૧ ૧૪ શ્રી સ્થા. જૈન શ્રાવિકાસંઘ હા. પ્રમુખ અ. સો. રંભાબેન વાડીલાલ ૨૫૧ ૧૫ સ્વ. ત્રીભવનદાસ દેવચંદ તથા સ્વ. અ. સો. ચંચળબેનના સ્મરણાર્થે હા. ડે. હિમતલાલ સુખલાલ
૨૫૧ ૧૬ શાહ મૂળચંદ કાનજીભાઈ તરફથી હા. શાહ નાગરદાસ ઓઘડભાઈ ૨૫૧ ૧૭ શેઠ મેહનલાલ પીતાંબરદાસ હા. ભાઈ કેશવલાલ તથા મનસુખલાલભાઈ ૨૫૧ ૧૮ શ્રીમતી હીરાબેન નથુભાઈના વરસીતપ નિમીતે હા. નથુભાઈ નાનચંદ શાહ
૩૦૧ ૧૯ સ્વ. મણીયાર પરેતમદાસ સુંદરજીના સ્મરણાર્થે હા. શેઠ સાકરચંદ પરસેતમદાસ
૨૫૧ શેઠ મણીલાલ શીવલાલ
૨૫૧ વેરાવલ ૧ શાહ કેશવલાલ જેચંદભાઈ
૨૫૧ ૨ શાહ ખીમચંદ સોભાગ્યચંદ વસનજી
૨૫૧
૨૫૧
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સતારા
૧
સ્વ. મદનલાલજી કુંદનમલજી કોઠારીના સ્મરણાર્થે હા. તેમનાં ધર્મપત્નિ રાજકુંવરબાઈ મદનલાલજી
૨૫૫
સાલબની (બંગાળ) ૧ દેશી ચુનીલાલ કુલચંદ મોરબીવાળા
૨૫૦
સાણંદ ૧ શાહ હીરાચંદ છગનલાલ હ. શાહ ચીમનલાલ હીરાચંદ
૩૦૧ ૨ અ. સો. ચંપાબેન હા દોશી જીવરાજ લાલચંદ
૨૫૧ ૩. પટેલ મહાસુખલાલ ડોસાભાઈ
૨૫૧ ૪ શાહ સાકરચંદ કાનજીભાઈ
૨૫૧ પુરીબેન ચીમનલાલ કલ્યાણજી સંઘવી લીંબડીવાળાના સ્મરણાર્થે
હા. વાડીલાલ મેહનલાલ જેઠારી ૬ પારેખ નેમચંદ મોતીચંદ મુળીવાળાના સ્મરણાર્થે હા. પારેખ ભીખાલાલ નેમચંદ
૨૫૧ ૭ સંઘવી નારણદાસ ધરમશીના સ્મરણાર્થે હ. ભાઈ જયંતીલાલ નારણદાસ ૨૫૧
૨૫૧
સુરત
૨૫૧
૧ શ્રી સ્થા. જૈન સંઘ હ. શાહ છોટુભાઈ અભેચંદ
સુવઇ (કચ્છ) ૧ સાવળા શામજી હીરજી તરફથી સદાનંદી જેન મુનીશ્રી છોટાલાલ મહારાજના ઉપદેશથી સુવઈ સ્થા. જૈન સંધ જ્ઞાનભંડારને ભેટ
સુરેન્દ્રનગર
૨૫૧
૨૫૧
૨૫૧
૧ શેઠ ચાંપશીભાઈ સુખલાલ ૨ ભાવસાર ચુનીલાલ મેમચંદ ૩ સ્વ. કેશવલાલ મૂળજીભાઈનાં ધર્મપત્નિ અમૃતબાઈના સ્મરણાર્થે
હા. શાહ ભાઈલાલ કેશવલાલ (થાનગઢવાળા) ૪ શાહ ન્યાલચંદ હરખચંદ
૨૫૧
૨૫૧
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________________ 251 251 250 સંજેલી (પંચમહાલ) 1 શાહ લુણાજી ગુલાબચંદ 2 શ્રી સ્થા. જૈન સંઘ હ. શેઠ પ્રેમચંદ દલીચંદ હાટીના માળીયા 1 શેઠ ગોપાલજી મીઠાભાઈ હારીજ 1 શાહ અમુલખભાઈ મુળજી હા. પ્રકાશચંદ અમુલખ 2 સ્વ. બેન ચંદ્રકાન્તાના સ્મરણાર્થે હા. અમુલખ મુળજીભાઈ હુબલી 1 હીરાચંદ વનેચંદજી કટારીઆ 301 301 251 કુલ મેમ્બરોની સંખ્યા તા. 28-2-58 સુધી 4 આદ્ય મુરબીશ્રીઓ 316 પ્રથમ વર્ગના મેમ્બરે 22 સુરીશ્રીઓ 83 બીજા વર્ગના મેમ્બરે 36 સહાયક મેમ્બરો 461 કુલલ મેમ્બરે (બીજા વર્ગને સદંતર બંધ કરવામાં આવેલ છે.) રાજકોટ, તા. 1-3-58 સાકરચંદ ભાઈચંદ શેઠ મંત્રી, શ્રી અ. ભા. 2. સ્થા. જૈન શા. સ. ન નેટઃ- તા. ૨૩-૧૨-૫૭ના દિને મુંબઈ મુકામે ધી યુનિયન બેંક ઓફ ઈન્ડીઆ લી. માં રૂ. 251-0-0 એક સદગૃહસ્થ ભરેલા છે. જેનું નામ તે ભરનાર ભાઈ તરફથી મળેલ નથી તેમજ બેંક તરફથી વધુ વિગત મળી નથી તે તે રૂા. 251 ડીઝીટ તરીકે હાલ જમા પડયા છે જેનું નામ અને મળતાં લીસ્ટમાં લેવામાં આવશે.