SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 194
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ मुनितोषणी टीका, सामायिकाध्ययनम्-२ १४५ ग्यबोधिलामादिसिदौ तपश्चरणादिक्लेशोऽकिश्चित्कर इति तु नाशङ्कनीयम् , तपःसंयमाचनुष्ठानेन दृढस्य श्रदानस्योत्पत्तौ भक्तिदाढय तेन कर्मक्षयम्ततो मोक्ष इति भक्तिदाढर्थ पति तपःसंयमाघनुष्ठानस्य हेतुत्वात् ॥१-७॥ इति श्रीविश्वविख्यात -जगदवल्लभ-प्रसिद्धवाचक-पश्चदशभाषाकलिनललितकलापाऽऽलापक-प्रविशुद्धगधपपनैकग्रन्थनिर्मापक-वादिमानमर्दक-श्रीशाहछत्रपतिकोल्हापुरराजमदत्त 'जैनशास्त्राचार्य'-पदभूषित-कोल्हापुरराजगुरु-बालब्रह्मचारि-जैनाचार्य-जैनधर्मदिवाकर-पूज्यश्रीघासीलाल-व्रतिविरचितायां धीश्रमणमृत्रस्य मुनितोषण्याख्यायां व्याख्यायां चतुर्विंशति स्तवाग्व्यं द्वितीयमध्ययनं समाप्तम् ॥ २ ॥ कोई कहे कि-भगवान की भक्ति से ही मोक्ष प्राप्ति तक की सिद्धि हो तो तप संयम आदि के कष्ट उठाने का क्या प्रयोजन है ? इसके लिये यही उत्तर है कि-तप संयम आदि के आराधन करने से 'श्रद्धान' दृढ हो कर भक्ति प्रबल होती है और भक्ति की दृढता से कर्मों की निर्जरा होकर क्रमसे मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥१-७॥ ॥ इति द्वितीय अध्ययन संपूर्ण ॥ | કઈ કહેશે કે ભગવાનની ભકિતથી જ મોક્ષપ્રાપ્તિ સુધીની સિદ્ધિ થાય છે તે તપ સંયમ આદિ કષ્ટ ઉઠાવવાનું શું પ્રજન છે? ઉત્તર એ છે કે તપ. સંયમ આદિની આરાધના કરવાથી શ્રદ્ધા દઢ થઈને ભકિત પ્રબલ થાય છે. અને ભક્તિની દૃઢતાથી કર્મોની નિર્જરા થઈને भया मोक्षनी प्राप्ति याय छे. (१-७) । ति द्वितीय अध्ययन संपूर्ण ॥ २ ॥
SR No.040007
Book TitleAvashyak Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1958
Total Pages405
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_aavashyak
File Size262 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy