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________________ मुनितोषणी टीका footers firee विहर | M प्रस्तावना ३५ इति षष्ठमाकं प्रत्याख्यानाख्यं समुपन्यस्तम् । एतद्धि षडध्ययनात्मक मात्रव्यकं ( प्रतिक्रमणं ) सर्वेषामुभयकालं करणीयमेत्र । तत्रापि माधृनामनित्रार्यतया कर्त्तव्यमेतत् । यथाऽनिम्त्रच्छवबेषु कालिमाषातशङ्का, धनिनां च लुष्टाकाव्यातङ्गो विशेषरूपेण जञ्जन्यते तथैव. शुद्धचारित्रइच्छानिगेहं जणयह. इच्छानि गेहगए णं जीवे मव्वदव्वेषु विणीयनव्हे सीभृए बिहरड | .. हे भइन्न ! पचवाण ( प्रत्याख्यान ) करने से किस फल की प्राप्ति होती है । हे गौतम! प्रत्याख्यान करने से आम्रवद्वार रुक जाते हैं और इच्छा का निरोध होता है. इच्छा के निरोध से आहारादि में तृष्णा रुक जाती है. और तृष्णावरोध से आत्मा बाह्य तथा आभ्यन्तरिक सन्ताप से रहित होती है । यह प्रत्याख्यान नामक छड्डा आवश्यक हुआ । ये उहों आवश्यक यद्यपि सभी को उभय काल करना चाहिए, तो भी साधुओं के लिये उभय काल करना अनिवार्य हैं। जैसे अत्यन्त स्वच्छ कपडे पर धब्बा लगने की आशंका रहती है या धनवानों को लुटेरों का डर विशेष रूप से रहता है. उसी प्रकार आसवदारा निरंभः पच्चवाणेणं इच्छानिरोडं जगह इच्छा निरोहगए गं जीवे सव्चव्वे वीणीयादे मीडभूए रिड. " हे हन्तु ! पश्य (अन्य ज्यान) १२०. नी प्राप्ति धाय छे ? हे गोतम ! अन्य ध्यान ४२१.धी २५.१५.२ ६.४४ જય છે અને ઇચ્છનિષ થાય છે, ઇઇ.નિ.ધથી અહે.દિમાં વૃો રેકર્ડ જાય છે તેજ તૃષ્ણાવષથી માત્મા બાહ્ય અભ્યન્તરિક સન્ન.પી રહિત થ જાય છે. આ પ્રત્યાખ્યાન નામનું છઠ્ઠું અશ્યક પૂર્ણ થયું. આ છ .વશ્યક એ કે સર્વને ઉત્તય કાળ કરવાં જોએ, તે પણ સાધુને માટે તે બન્ને કળ કરવું અનિવાય છે. જેમ કે સ્વચ્છ કપડાં ઉપર ડાઘ લાગવાની शंकरडे छे. अधव. तो धनननने ખારી જ્ઞાન આદિ ગુણેથી વિભૂષિત नेवी ने शुद्ध यात्रि બહુજ રહે છે એ માટે डरने लय विशेष અને પ.પને. નચ
SR No.040007
Book TitleAvashyak Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1958
Total Pages405
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_aavashyak
File Size262 MB
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