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________________ ३२२. आवश्यकसूत्रस्य समुच्चयार्थः, ' न भत्रइ' न भवति =न जायते, ' तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ' व्याख्यातपूर्वमिदमित्यलमाम्रेडितेन ॥ मृ० ३ ॥ इति श्रीविश्वविख्यात - जगद्वल्लभ-मसिद्धवाचक- पञ्चदशभाषाकलितललितकलापाऽऽलापक-प्रत्रिशुद्ध गद्यपद्यनैकग्रन्थनिर्मापक - वादिमानमर्दक- श्रीशाहूछत्रपति कोल्हापुरराजपदन 'जैनशास्त्राचार्य' पद भूषित - कोल्हापुरराजगुरु- बालब्रह्मचारि- जैनाचार्य - जैनधर्म दिवाकर-पूज्यश्रीघासीलाल- प्रतिविरचितायाम् आवश्यकमुत्रस्य मुनितोषण्याख्यायां व्याख्यायां षष्ठं प्रत्याख्यानाख्यमध्ययनं समाप्तम् ॥ ६ ॥ ॥ सम्पूर्णमिदं सूत्रम् ॥ दुक्कडं' उस सम्बन्धी मेरा पाप निष्फल हो - इत्यादि अर्थ पहले की तरह जान लेवें ॥ सू० ३ ॥ ॥ इति छठा अध्ययन सम्पूर्ण ॥ इति आवश्यक सूत्र की मुनितोषणी टीका का हिन्दी भवार्थ संपूर्ण. थामा हत्याहि अर्थ प्रथम प्रमाणे लगी सेवा (सू०3) કૃતિ છઠ્ઠું અધ્યયન સંપૂર્ણ ઇતિ આવશ્યક સૂત્રની મુનિતેષણી ટીકાને ગુજરાતી અનુવાદ સંપૂર્ણ
SR No.040007
Book TitleAvashyak Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1958
Total Pages405
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_aavashyak
File Size262 MB
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