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________________ सुनितोषणी टीका तस्पकारान् दर्शयितुं विशेषत आह-मनसेत्यादीति नास्ति पौनरुक्त्यम् । केचित्'मनसा वा वाचा वा कायेन वें'-ति विकल्पसंग्रहार्थ त्रिविधेनेत्युक्तमित्यूचिरे। न कारयामीत्यत्राऽन्येनेति शेषः पूरणीयः। न समनुजामि=नानुमन्ये । 'तस्येति तस्मात् सावधयोगादित्यर्थः। 'भंते' इति भदन्तेति सम्बोधनं प्राग्वदेव, पूर्वानुवृत्त्यैवार्थसिद्धौ पुनः ‘भंते' इत्युक्तिः प्रारम्भवत् पर्यवसानमपि गुर्वामन्त्रणपूर्वकमेव कर्त्तव्यमिति मूचनाय । यद्वा पुनरुच्चारणयत्नेनाऽनुत्तिरेव लभ्यते, करूँ, परन्तु वे तीन प्रकार कौन-कौनसे हैं ? ऐसी जिज्ञासा होने पर विशेषरूपसे बता दिया कि "मनसा वाचा कायेन" ये तीन प्रकार हैं, इसलिए पुनरुक्ति आदि कोई दोष नहीं है। • अथवा मन, वचन और कायके निमित्तसे होनेवाले तीन भेदों का संग्रह करने के लिए 'त्रिविधेन' पद रखा है। व्याकरण में 'भंते' शब्द अनेक प्रकार से सिद्ध होता है, इसलिए उसके अर्थ भी बहुतसे हैं। जैसे (१) कल्याण और सुखको देनेवाले, (२) संसार का अन्त करनेवाले, (३) जिनकी सेवा-भक्ति करने से संसारका अन्त हो जाता है वे, (४) जन्म-जरा मरणके भयका नाश करनेवाले-निर्भय, (५) भोगों को त्याग देनेवाले, (६) भय को दमन करनेवाले, (७) इन्द्रियोंका दमन करनेवाले, (८) सम्यगज्ञान, सम्यग्दर्शन, और सम्यकनारित्र से ४२ ४३॥ ४॥ छ ? सेवा शिसा यतi विशेष३५ तावी माध्यु मनसा वाचा જાન એ ત્રણ પ્રકાર છે. એથી કરીને પુનરૂકિત આદિ કઈ દોષ થતું નથી. અથવા મન વચન અને કાયાના નિમિત્તે થનારા ત્રણ ભેદને સંગ્રહ ४२वाने भाटे त्रिविधेन शम् ॥ध्य छे. વ્યાકરણમાં અંતે શબ્દ અનેક પ્રકારે સિદ્ધ થાય છે. તેથી એના અર્થ या छे; (१) ४८याय भने सुमने मापना२, (२) संसारने। अंत ४२ना२, (૩) જેની સેવાભકિત કરવાથી સંસારને અંત આવી જાય છે તે, (૪) જન્મ જરા મરણના ભયને નાશ કરનાર, (૫) ભેગેને ત્યાગ કરનાર, ભયનું દમન કરનારનિર્ભય, (૭) ઈદ્રિયેનું દમન કરનાર, (૮) સમ્યજ્ઞાન સમ્યગ્દર્શન અને સમ્યક १- 'तस्येति तस्मात्' अत्राऽपादानस्य शेषत्वविवक्षया षष्ठी ।
SR No.040007
Book TitleAvashyak Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1958
Total Pages405
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_aavashyak
File Size262 MB
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