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________________ २१९ मुनितीषणी टीका, प्रतिक्रमणाध्ययनम्-४ ॥ मूलम् ॥ बारसहि भिक्खुपडिमाहिं ॥ सू० ११ ॥ ॥ छाया ॥ द्वादशभिर्भिक्षुपतिमाभिः । मृ० ११ ॥ ॥ टीका ॥ द्वादशभिभिक्षुपतिमाभिः-भिवृणां प्रतिमाः भिक्षुपतिमास्ताभिर्योऽतिचारः कृत इत्यादिमम्बन्धः प्राग्वदेव । तत्र प्रथमा मासिकी भिक्षोः प्रतिमा, तस्यामन्नस्य जलस्य चैकैका दत्तिाद्या; दनिश्च हस्तपात्रादितो निरवच्छिन्नधारारूपेण पतिता भिक्षा गृह्यने, धाराविच्छेदेन तु सिक्थमात्रपातेऽपि दतिभेदः। एवं द्वैमासिकी-त्रैमासिकी-चातुर्मासिकी-पाश्चमासिकी-पाण्मासिकी-सप्तमासिकीषु क्रमेणाऽन्न-जलयोर्दत्तिद्वय-त्रय-चतुष्टय-पञ्चतय-षट्क-सप्तकानि गृवन्त इनि स्वयमूहनीयम । अष्टमी प्रतिमा सप्ताहोरात्रिकी, तत्र चतुर्विधाऽऽप्रतिमा के गुण उत्तर उत्तर प्रतिमामें समझने चाहिये। इनमें प्ररूपणा आदि द्वारा जो कोई अतिचार लगा हो तो उससे मैं निवृत्त होता हूँ ॥ १०॥ __ मिनु (साधु) की बारह प्रतिमाएँ (प्रतिज्ञाविशेष) होती हैं। पहली एक मासकी, यावत् सातवीं मातमासकी भिक्षुप्रतिमा । पहली प्रतिमामें निर्लेप एक दत्ति अन्नकी एक दत्ति पानी की ली जाती है। अम्बण्डित एक धारा से एक बार जितना आहारपानी पात्र में गिरे उतना ही उपभोग में ले १। इसी प्रकार क्रमसे सातवी प्रतिमामें सात दत्ति अन्न और सात दत्ति पानी की ली મામાં સમજવા જોઈએ. એમાં પ્રરૂપણા આદિ દ્વારા જે કઈ અતિચાર લાગ્યા डाय तो तेभायी निवृत्त या छु. (सु. १०) । मित (साधु) नी मा२ प्रतिभासा (प्रतिज्ञा विशेष) सोय छे पक्षी એક માસની, બીજી બે માસની, યવત સાતમી સાત માસની ભિક્ષુપ્રતિમા. પહેલી પ્રતિમામાં નિર્લેપ એક દત્તિ અન્નની એક દત્તિ પાણીની લેવાય છે. અખંડિત એકધારાથી એક વખત જેટલે આહાર પાણી પાત્રમાં પડે એટલે જ Suोगमा व्ये (१). मेरी प्रा३ भया सातभी प्रतिमामा सात हत्ति अन्ननी अने
SR No.040007
Book TitleAvashyak Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1958
Total Pages405
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_aavashyak
File Size262 MB
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