Book Title: Pind Niryukti Author(s): Manekyashekharsuri, Kanchanvijay Publisher: Devchand Lalbhai Pustakoddhar Fund Catalog link: https://jainqq.org/explore/600106/1 JAIN EDUCATION INTERNATIONAL FOR PRIVATE AND PERSONAL USE ONLYPage #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 卐 वीरसं. २४८४ प्रथमं संस्करणम् श्रेष्ठिदेवचन्द्र-लालभाई-जैन पुस्तकोद्धार के ग्रन्थाङ्कः १०५ श्रीमद्भद्रबाहुस्वामिप्रणीता सभाष्या श्रीजयकीर्तिसूरिशिष्यश्रीक्षमारत्नसूत्रिताऽवचूर्युपेता श्रीपिण्डनिर्युक्तिः । श्री वीरगणिरचितायाः शिष्यहितायाः श्रीमाणेकशेखरसूरिकृताया दिपीकाया अती सम्पादकः - आगमोद्धारकाणां उपसंपदाप्राप्तमुनिकंचनविजयः । प्रसिद्धिकारकः — सुरतवास्तव्य श्रेष्ठिदेव चन्द्रलाल माई जैन पुस्तकोद्धारको शस्य कार्यवाहक :- मोतीचंद मगनभाई चोकसी विक्रमः २०१४ 街 शाके १८८० निष्कर्य रुप्यकत्रयम् ------- 5 卐 20000000 Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ इदं पुस्तकं प्रेष्ठि-देवचन्द्र-लालभाई-जैन-पुस्तकोद्धारसंस्थाया कार्यवाहक-मोतीचंद-मगनभाई-चोकसी इत्यनेन भावनगाँ महोदयमुद्रणमन्दिरे शा. गुलाबचंद लल्लुभाई द्वारा मुद्रापितम् । अस्य पुनर्मुद्रणाद्याः सर्वेऽधिकारा एतद् भाण्डागारकार्यवाहकैरायत्तीकृताः । All Rights reserved by the Trustees of the Fund. Printed by Gulabchand Lalubhai S'ha at the “Mahodaya Printing Press” Danapetha, Bhavnagar (Saurashtra). Published for Sheth Devachand Lalbhai Jain Pustakoddhar Fund, at Sheth Devchand Lalbhai Jain Boarding House for (Shree Ratnasagar Jain Boarding) Badekhan Chakla, Gopi-Pura Surat, by Hon : Trustee Motichand Maganbhai Chokasi Jain Education Inte For Private & Personel Use Only T Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Intern KAKAKAKAKAKAKAKAKAKAKAKAKAKAKANGKAN Sheth Devachand Lalbhai Jain Pustakodhar Fund, Series No. 105 Shree Pindaniruktihi By Shreemad Bhadrabahu Swami Commentary By Shree Kshamaratna Maharaj Price Rs. 3--0--0 Vikrama Samvat 2014 Christian 1958 米米米米米米米米米米米米米米米米米米 Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥२॥ The Board of Trustees : सस्थानुरीभड:1 Nemchand Gulabchand Devchand Zaveri ૧ શ્રીનેમચંદ ગુલાબચંદ દેવચંદ ઝવેરી 2 Talakchand Motichand २ तबध्य भातीय 3 Babubhai Premchand ૩ , બાબુભાઈ પ્રેમચંદ 4 Amichand Zaverchand ४ अभीय वेश्य , 5 Keshrichand Hirachand. ५, शरीय हीरा 6 Motichand Maganbhai Chokasi ૬ , મોતીચંદ મગનભાઈ ચોકસી Hon. Managing Trustee માનદ મેનેજીંગ ટ્રસ્ટી विषयसूची विषयानुक्रमः परि. ५-व्याकरणादिनिर्देशः १३२ शुद्धिपत्रकम् परि० ६-'अन्ने' इत्यादि १३२ श्रीक्षमारत्नीयावचूरिः १-१२० परि० ७-नाम्नामकारादि १३२-१३४ परि० १-सभाध्यपिण्डनियुक्तेर्गाथानामकारादिक्रमः १२१-१३० परि० ८-अवचूरिगतान्युदाहरणानि १३४-१३६ परि०२-भाष्यगाथानां प्रतीकानि १३० परि० ९-शिष्यहिताया आद्यन्तभागी १३६-१६. परि० ३-साक्षीग्रन्थानामकारादि १३१ परि० १०-दिपीकाया आद्यन्तभागी १६१-१७८ परि. ४-साक्षीपाठानामकारादि Jain Education Inten For Private & Personel Use Only AIMw.jainelibrary.org Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रेष्ठी देवचन्द लालभाई जह्वेरी. DUAAAAA जन्म १९०९ वैक्रमाब्दे निर्याणम् १९६२ वैक्रमाब्दे कार्तिक शुक्लैकादश्यां (देवदीपावली सोमवासरे) पौषकृष्णतृतीयायाम् ( मकरसंक्रान्तमंदवासरे) सूर्यपूरे. मुम्बय्याम्. The Late Sheth Devchand Lalbhai Javeri. Born 22nd Nov. 1852 A.D. Surat, Died 13th January 1906 A. D. Bombay. 1000-11-1953 Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ For Private & Personel Use Only Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशकीय निवेदन. मनकना पिता श्रीशय्यंभवसूरिने नमस्कार करीने जणाववानुं के मूळ सूत्रनी अंदर आवेला श्रीदशवकालिकसूत्रमा पांचमुं अध्ययन पिण्डैषणा नामर्नु छे. तेनी नियुक्ति श्रीभद्रबाहुस्वामी महाराजे करी पण ते नियुक्ति मोटी होवाथी तेने जुदा ग्रंथरूपे राखी. ते आ पिण्डनियुक्ति नामनो ग्रंथ छे. पिण्डनियुक्ति श्रीमलयगिरि महाराजनी टीका सहितनी पूर्वे अमारी संस्थाए अन्थांक ४४ तरीके छपावी छे अने अत्यारे आ क्षमारत्ननी अवचुरि तेनी बीजी टीका ने दीपिकाना आदि अंत भाग साथे अन्यांक १०५ तरीके छपावी छे. अमारी आ श्रेष्ठिदेवचंद्र लालभाई जैन पुस्तकोद्धारक फंड नामनी संस्था श्रुतज्ञानना प्रकाशन माटे जे उद्देशयी स्थपाई छे, ते उद्देशे आज सुधीमा १०४ ग्रंथो प्रगट करी शकी छे अने १०५ मा श्रीपिण्डनियुक्तिअवचुरी नामना ग्रंथने प्रगट करे छे. परमपूज्य ध्यानस्थस्वर्गत आगमोद्धारक आचार्य श्रीआनंदसागरसूरीश्वरजी महाराजनी इच्छा एवी हती के अवचुरीनुं साहित्य प्रगट थर्बु जोईए. ए हेतुथी अमे आगमपंचांगीना जे कोई अद्यावधि अमुद्रित ग्रंथो होय ते ग्रंथोने मुद्रित कराववा उद्यम करवा नक्की कर्य छे. पिण्डनियुक्तिनुं अवतरण, विषयः-सावध अने निरवद्य एवो आहार होय छे, परंतु मुनिराजोने निरवद्य एवो आहार न लेवा लायक छे. तेनुं निरूपण करनारो ते आ ग्रंथ-आगम, ते पिण्डनियुक्ति. आनी अंदर पिण्डना उद्गम, उत्पादना, एषणा अने Join Education Intematon For Private Personel Use Only Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाश कीय निवेदन। क्षमा- प्रासैषणाना दोषोनुं निरूपण करवामां आव्युं छे. ते दोषो टाळेली जे भिक्षा छे, ते भिक्षा संयमने गुणकारी छे. ते वात आ रत्नीया- ग्रंथमां निरूपण कराइ छे. वर्यपेता पिण्डनियुक्तिना कर्ता श्रीभद्रबाहुस्वामी छे. तेनी नियुक्ति गाथाओ ६७१ अने भाष्य गाथा ३७ छे. आनी श्रीमलय श्री. IN गिरिजीनी बृत्ति ६७०० श्लोकप्रमाण छे. ए नियुक्ति, भाष्य अने वृत्ति आगमोद्धारक आचार्य श्रीआनंदसागरसूरिजीए संपादित पिण्ड करेली, अमारी ग्रंथमाळाना ४४ मा ग्रन्थाक तरीके प्रसिद्ध करवामां आवेली छे. नियुक्तिः। वृत्तिः-आचार्य श्रीहरिभद्रसूरिए आनी उपर शिष्यहिता नामनी टीका ग्रन्थान १३५० सुधी रची हती, बाकी रहेली श्री. देवाचार्यना शिष्य वीराचायें १७५० श्लोकप्रमाण रची. आथी ते वृत्ति ३१०० श्लोकप्रमाण थई. तेनो आदि अने अंत भाग आ | अन्धना परिशिष्ट ९ मां आपवामां आवेलो छे. चंद्रगच्छ:-चंद्रगच्छीय सर्वारगच्छीय ईश्वरगणिना शिष्य वीरगणिए दधीप्रद(दाहोद) मा ७६९१ श्लोकप्रमाणनी आनी वृत्ति रची छे. तेमां तेमना गुरुभाइओ महेन्द्रसूरि, पार्श्वदेवगणी, देवचंद्रगणी आधारभूत हता. आ वृत्तिने नेमिचंद्रसूरिए तथा जिनदत्तसूरिए अणहिलपूरपाटणमां संशोधन करी हती, तेनो रचना सं. ११६९ छे. आ प्रत हालमां छाणीना भंडारमा ताडपत्र उपर छे. दीपिका:-अंचलगच्छीय मेरुतुंगसूरिजीना शिष्य माणेक्यशेखरनी श्लोक २८३२ नी छे. जेनो आदिअंत भाग परिशिष्ट १० मां आपवामां आवेलो छे. Jain Education Intel For Private & Personel Use Only Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अवचुरी:-जयकीर्तिसू रिना शिष्य श्रीक्षमारत्नजीए रची छे. जे अहीं आ ग्रंथरूपे छे प्रसिद्ध करवामां आवे छे. बीजी एक वृत्ति जेना कर्तानो निर्देश नथी तेवी चार हजार श्लोकप्रमाण छे. ते जेसलमेर, पाटण, सूरतना भंडारोमां उपलब्ध थशे. गुजराती भाषांतर:-मलयगिरिजीनी वृत्ति सहितनुं गुजराती भाषांतर मुनिमहाराज श्रीहंससागरजी महाराज संस्कारित करी रह्या छे. जे श्रीहंससागरजी म.ना पुष्पमा प्रसिद्ध थवा संभव छे. शिला-ताम्रपत्र:-पालीताणा आगममंदिरमां अने सूरत ताम्रपत्रआगममंदिरमा पिंड नियुक्ति मूळ मात्र क्रमे शिलामां अने ताम्रपत्रमा आरूढ थयु छे. आ उपर प्रमाणेनुं पिण्डनियुक्ति प्रन्थना अंगेनुं प्रोफेसर वेलनकरनुं मंतव्य जिनरत्नकोषना आधारे लख्युं छे. ___ आ पिण्ड नियुक्ति अवचुरीने छपाववा माटे आगमोद्धारक आचार्य श्रीआनंदसागरसूरीश्वरजीना शिष्य मुनिमहाराज श्रीगुणसागरजी महाराजे प्रेसकोपी आपी हती अने मुनिराज कंचनविजयजी तथा मुनिराज क्षेमंकरसागरजी महाराजने आ ग्रंथ संपादननु कार्य सोंप्यु हतुं, परंतु बेत्रण फरमा जेटलुं कार्य थतां मुनि श्रीक्षेमकरसागरजीन स्वर्गगमन* थतां बाकीजें बधुं कार्य मुनि कंचनविजयजीने ज पूरे करवू पडयुं छे. * संपादन कार्य चालतु हतुं ते अरसामां हींगनघाटथी कपडवणज आवतां खडाली सुकामे (कपडवणजथी १५ माइल दूर) २०११ ना चैत्र वदी .)नी रात्रे अगीयार वागे झेरी जानवरना डंखथी मुनिश्रीक्षेमकरसागरजी अवसान पाम्या. तेओ उत्साही संशोधक मुनि हता. तेओश्री आचार्य Jain Education Inter16 For Private & Personel Use Only C ww.jainelibrary.org Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाश कीयनिवेदन। पिण्ड क्षमा आ ग्रंथना गाथाना अकारादि बिगेरेनां परिशिष्टो आठ आपेलां छे, तेमज अमुद्रित साहित्य तरीके जे वीरगणिए आनी सुपर रत्नीया- |शिष्यहिता नामनी टीका रचीछे तेनो आदि अने अंत भाग परिशिष्ट नवमामां आपेल छे. जो के आखी टीका छपाय ते तो सारं वर्युपेता ज कहेवाय. बळी माणेक्यशेखरनी करेली दीपिका अमो मेळवी शक्या छीए, तेनो पण आदि अने अंत भाग परिशिष्ट दशमामां श्री- आप्यो छे. आवी रीते ते ते ग्रंथोमां तेनुं संपूर्ण साहित्य आप, उचित गणीये छीए. विनंति-अमारी आ संस्था हालमां आगम पंचांगीना अप्रगट ग्रंथो प्रगट करवानी भावना राखे छे. जेथी श्रीश्रमणनियुक्ति। संघने अमारी विनंति छे के जेओनी पासे तेवा ग्रंथोनी प्रेसकोपीओ होय, अगर अमे जे नामावळी अप्रगटनी बहार पाडी छे, ते सिवायनो कोई ग्रंथ पंचांगीमांनो अप्रगट जाणमां होय तो अमोने जणावे. जे मुनिराजाओने ते ग्रंथो पैकी कोई ग्रंथ संपादन ॥४॥ करवानी ईच्छा होय तो अमने जणावे, के जेथी अमारी आ संस्था ते कार्यमां आपनो सहकार ले अने बने तेटला वधारे ग्रंथो प्रगट करी शके. __ आ ग्रंथना पृष्ठ १२० मा जे पुष्पिका बीजी मूकी छे, ते आचार्य श्रीकमळसूरिपुस्तकोद्धारकफंड तरफथी जेसलमरनी प्रत उपरथी उतरावेली प्रतनी छे. आ रीते आ फंड तरफथी उतरावेली प्रतो छपाववाना उद्यमनी जरुर छे. जेमां अनेक अप्रगट ग्रंथो श्रीआनंदसागरसूरीश्वरजीना समुदायमां उगता भानु समा हता. तेओश्रीए अमारी संस्थाना पण नीचे प्रमाणेना प्रकाशनोमा मुनिश्रीकंचनविजयजीनी साथे संपादनकार्य कयु छः-पंचाशकचूर्णी, वंदनप्रतिक्रमणअवचुरी, दशवकालिकअवचुरी, अल्पपरिचितसैद्धान्तिकशब्दकोश भा० १लो. आ माटे संपादकीए तेमना अंगे जुदी फुटनोट लखी छे, अमारी संस्था पण तेमना अवसान बदल खेद जाहेर करे छे भने तेमना आत्मानी शांति इच्छे छे. in Education Intel For Private Personel Use Only Irww.jainelibrary.org Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inter लखायेला पण छे. आ ग्रंथना प्रकाशनमा अमोने जेमणे सहाय करी छे अने संपादकने पण जेमणे जेमणे सहाय करी छे ते सर्वनो अमो ट्रस्टीओ आ फंड तरफथी आभार मानीए छीए. आ ग्रंथमां दृष्टिदोषथी के कोई कारणथी अशुद्धि रहेवा पामी होय तो शुद्ध करवा हमारी विनंती छे. २०१४ कार्तिकी पूर्णिमा. लि० भवदीयः - मोतीचंद मगनभाई चोकसी वि० संस्थाना ट्रस्टीओ. Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संपादकीय निवेदन क्षमारत्नीयावचूर्युपेता संपादकीय निवेदन। भी पिण्ड नियुक्तिः। श्रमण भगवान महावीर महाराजना शासनमां शासननी स्थापना वखते द्वादशांगीनी रचना कराई, तेमज समये समये चौद पूर्वधर विगेरेए अनेक आगमो रच्या. तेनी अंदर शासन ज्यां सुधी चाले त्यां सुधी एटले के लगभग पांचमा आराना छेडा सुधी आवश्यक क्रिया विगेरे साधुनो आचार रहे, आथी जे सूत्रो आवश्यक उपयोगी तेवा चार सूत्रो जे दीर्घकाल रहेवानां छे, तेने मूळसूत्र तरीके संज्ञा आपी. तेनी अंदर आवेला श्रीदशवकालिकसूत्रनी श्रुतकेवली मनकना पिता श्रीशय्यंभवसूरिए रचना करी छे. आ श्रीदशवकालिकनी अंदर छ महिना शेष आयुष्यवाळा एवा आठ वरसना मनकमुनि भणी शके अने समजी शके तेवी सरळ रचना कराइ छे. तेमा दश अध्ययनो छे अने पाछळथी बे चुलिकाओनो उमेरो थयो छे. आ श्रीदशवकालिक उपर श्रीभद्रबाहुस्वामी महाराजे नियुक्ति रची. तेमां पांचमुं अध्ययन पिण्डैषणा छे. जेमा साधुने आ शरीर टकाववाने माटे, संयम पाळवाने माटे आहारनी जरूर पड़े तेथी आहार कया प्रकारे लाववो जोइए ते विगेरे व्यवस्थानी साधुने जरुर रहे. तेने जणावनार आ अध्ययन छे. ___आथी श्रीभद्रबाहुस्वामी महाराजे आ अध्ययननी विस्तारपूर्वक नियुक्ति करी अने विस्तारपूर्वकनी नियुक्ति होवाना कारणे जुदा ग्रंथ तरीके ते राखी, तेनु पिण्डनियुक्ति एवं नाम राख्युं. श्रीमलयगिरि महाराजनी टीका साथेनी पिंडनियुक्ति आ संस्थाए विक्रम सं. १९७४ मां आगमोद्धारक गुरुदेवश्री पासे 2 संपादन करावी हती. पिण्डनियुक्ति उपरनी आ अवचुरी छे. अवचुरीका श्रीमानक्षमारत्नजीए रची छे. अवचुरीनो उपसंहार ॥५॥ Jain Education Intel For Private & Personel Use Only | Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ करती वखते अवचूरिकारे एक गाथा जणावी छे के-" गंभीर अर्थवाळी एवी मोटी वृत्तिने जोईने में आ प्रगट अर्थवाळी बनावी ( अवचुरी पृष्ठ १२० ) अर्थात् अवचुरीकारे मोटी वृत्तिने अनुसरीने आ अवचुरी रची छे. श्रीवीरगणिये शिष्यहिता नामनी वृत्ति रची छे ते वृत्तिने अनुसरीने आ अवचुरी रचाइ होय एवं कंइ पण अनुमान थाय तेवू नथी. वीरगणि जे. पद्धतिए टीका रचे छे, ते पद्धति मलयगिरि महाराजनी वृत्तिथी तद्दन निराळी छे. परंतु आ अवचुरीकारे जे अवचुरी रची छे, ते मलयगिरि महाराजनी वृत्तिने अनुसरे छे. जे जे स्थळे जोवानी जरुर पडे छे, ते ते स्थळे मलयगिरि महाराजनी वृत्तिने आश्रीने सुधारो करी शकाय छे. सुज्ञजन आ अवचुरिने मलयगिरि महाराजनी वृत्ति साथे जो मेळवशे तो एवां केटलांये स्थळो मळशे के जे मलयगिरि महाराजनी वृत्तिने अक्षरे अक्षर मळतां आवशे, एटले " आ वृत्ति मोटी वृत्तिने अनुसरीने करी छे" एम जणाववाथी मलयगिरि महाराजनी वृत्तिने अनुसरीने करी छे एमज मानी शकाय. कर्ताः-आ अवचुरीना का विधिपक्षगच्छना श्रीजयकीर्तिमरिना शिष्य श्रीक्षमारत्नजी महाराज छे. तेमणे आ अवचूरि क्यारे रची ते विषे खुलासो अवचूरिमा नथी. तेनुं ग्रंथाक पाटणनी जे प्रत आधारे प्रेसकोपी थइ छे तेना आधारे ३००१ नुं छे. ज्यारे जेसलमेरनी प्रतना आधारे ग्रन्थान २८३२ छे. आनी प्रेस कोपी सं. १९८३ मां गुरुदेवश्रीए पाटणमां करावी हती के जेना आधारे आ अवचुरी छपाववामां आवी छे. आ प्रेसकोपी अमारे हींगनघाटमा सं. २०१० मां शुद्ध करवी पडी हती. आनी प्रेसकोपी अने आचार्यश्रीविजयकमळसूरीश्वरप्राचीन हस्तलिखित-पुस्तकोद्धारक तरफथी जेसलमेरनी प्रत उपरथी उतरावेली आ अवचुरीनी प्रत श्रीजैनानंदपुस्तकालय( सुरत )मां Jain Education Inter For Private & Personel Use Only T Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा संपादकीय रत्नीया | निवेदन। वचूर्युपेता श्री. पिण्ड नियुक्तिः। हती तेने पण प्रेसकोपी शुद्ध करती वखते साथे राखवामां आवी हती. जो के जेसलमेर उपरथी उतरावेली प्रत घणीज अशुद्ध हती, परंतु पाटणनी जे प्रत उपरथी प्रेसकोपी थई हती, ते प्रतमां कोई कोई जग्याए पाठो पडेला हता जे फंडनी प्रतमा हता. आथी ते पाठो चालुमा जरुरी छे एम मानि अमे ते पाठोने <> आQ चिह्न आपी चालु अवचुरीमा आप्या छे. गाथाओनी तुलना:-अवचुरीकारे अने टीकाकारे जे गाथाओ मानी छे, तेनो सन्तुलन आ रीते पाय छे. पिण्डनियुक्तिमा नियुक्ति गाथा ६७१ छे, भाष्य गाथा ३७ छे अने अनिर्दिष्टांक गाथा २ छे. वीरगणिनी जे टीकावाली प्रत छे, तेमां गाथाओ आखी आपवामां आवी छे. अने भाष्य तेमज नियुक्तिनी गाथाना संलग्न अंक आपवामां आव्या छे. समजुतिः-गाथा २४२ (पृष्ठ ४८) पछी "छक्कायए" एम अवचुरीकारे गाथा मानी छे. पण ते गाथा आखी आपी नथी. गाथा ३९१ ( पृष्ठ ७३ ) "छन्नमि" गाथा कोइ जगाए देखाती नथी एम अवचुरिकार कहे छे, पण मलयगिरि महाराजे तेमज वीरगणिए तेनी व्याख्या करी छे. गाथा ५४४ (पृष्ठ १००) नी टीकामां “पयसम" एम करीने अडधी गाथा अवचुरीकारे साक्षिमा आपी छे, पण मलयगिरि महाराजे मानेली गाथाओनी साथे आ गाथानो क्रम राख्यो छे तेथी फुटनोटमा संपूर्ण गाथा आपी छे अने तेनो। अंक पण लीधो छे. १ जुओ मलयगिरिटीका पत्र ११६. Jain Education Inteme For Private & Personel Use Only A w.jainelibrary.org Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गाथा ६०९ (पृष्ठ ११० )मां जे फुटनोट आपवामां आवी छे ते आगमोद्धारक भीए करेली छे. गाथा ६३६ (पृष्ठ ११४ ) नी पछी " संजो " एम गाथा मानी तेनी अवचुरी करी छे पण आखी गाथा आपी नथी तेथी अमो आखी गाथा आपी शक्या नथी, तेमज अंक पण अत्रे गण्यो नथी. गाथा ६६४ ( पृष्ठ ११८ ) ' इरियं ' एवी गाथा अवचुरीकारे मानी होय तेवुं लागतुं नथी. परंतु मलयगिरि महाराजनी टीकाना अंको कायम राखवा माटे ते गाथानो अंक अने गाथा अमे आप्यां छे. गाथा ६६८ (पृष्ठ ११९ ) " एऐहिं" एम करीने अवचुरीकारे आखी गाथा आपी छे पण व्याख्या करी नथी मलयगिरि महाराजे ए गाथा मानी नथी, पण वीरगणिनी वृत्तिमां ए गाथा छे. आ रीतनी गाथाओनो समन्वय थाय छे. आनीं अंदर मूळ तरीके जे अंगीकार कयुं छे ते शिलाना आगम माटे तैयार करेली प्रतना आधारे लीघेलुं छे.<> आवी निशानीनी अंदर जे पाठ आपवामां आव्यो छे ते पाठ जेसलमेर उपरथी संवत् २००८मां उतरावेली प्रतमांनो जरुरी पाठ छे. आथी ज तेने चालुमां लीधो छे. ( ) आवा चिह्ननी अंदर ने पाठ आप्यो छे ते मलयगिरि महाराजनी टीकाना आधारे जरुरी मानीने आप्यो छे. [ ] आवाचिन्ह अंदर जे आपवामां आव्युं छे ते ते प्रतमां छे खरं पण बंधवेसे तेयुं नथी. पिंड नियुक्तिमा (१) पिंनुं निरूपण, (२) उद्गमना दोषो, (३) उत्पादनाना दोषो, ( ४ ) एषणाना दोषो अने ( ५ ) प्रा१ जुओ मलयगिरि टीका पत्र १६५. २ w Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्लीया संपादकीय निवेदन। वच्युपेता श्री. पिण्डनियुक्तिः। LAN ॥ ७॥ पणानो विषय छे. क्रमे गाथा ७२, ४०३, ५१५, ६२८, अने ६७१ मीए ते विषयो पूरा थाय छे. परिशिष्ट १-८-पिंडनियुक्तिनी अंदर आ विषय उपरांत संपूर्ण विषयनी माहिती मळी शके ते माटे ग्रंथनी शरुआत पहेला नंदीआदिना विषयानुक्रमना आधारे विषयानुक्रम आपवामां आव्यो छे. आ अवचूरिने अंगारवा माटे तेमज अंदर आवेली वस्तुओनी माहीती मळे ते हेतुधी अवचूरि पछी आठ परिशिष्टो आपवामां आवेलां छे. ते आ प्रमाणे १-गाथाओने अकारादिक्रम, २-भाष्य गाथानां प्रतीक, ३-साक्षी ग्रन्थो, ४-साक्षी पाठोनो अकारादि, ५-व्याकरणआदि, ६-'अन्ने' विगेरे, ७-नामोनो अकारादि अने ८-उदाहरणोनां नामादि. परिशिष्ट ९-वीरगणिनी शिष्यहिता नामनी वृत्तिनो आदिअंत भाग अहिं परिशिष्ट ९ मां आपवामां आव्यो छे. तेनी मूळ प्रत पाटणना भंडारनी मूळ माथा सहितनी वृत्तिवाळी छे. आ प्रत पडिमात्रानी छे परंतु एटली बधी अशुद्ध छे के मारा क्षयोपशमना आधारे बने तेटली शुद्धि करतां पण एमां अशुद्धिओ पारावार रहेवा पामी छे, तो विद्वद्जनो बीजी प्रतनो समन्वय करीने शुद्ध करशे, एवी आशा तो जरुर रखाय. अवचूरिनी अंदर परिशिष्ट तरीके विशाळकाय वृत्तिनो आदि अंतभाग आपको ए खरेखर व्याजबी नथी, परंतु आ पण एक अद्यावधि अमुद्रित भंडारोमा सुरक्षित रहेली प्रत छे, एम जणाववाने माटे ए अयोग्य न गणाय. परिशिष्ट १०-अंचलगच्छीय श्रीमेरुतुंगसूरिना शिष्य श्रीमाणिक्यशेखरमूरिए जे दीपिका रची छे, तेनो आदि अने अंतभाग | आना परिशिष्ट१०नी अंदर आपवामां आव्यो छे. दीपिकाकार पोते ज ए वात जणावे छे के मलयगिरि महाराजनी Jain Education Interi For Private & Personel Use Only T Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Intern वृत्तिने जोड़ने में आरची छे. जुओ परि० १० पृ. १७७ प्र० लो० २. एटलुं ज नहि पण मने मेळवतां एवं देखाय छे के दीपिकानो घणो ज मोटो भाग मलयगिरि महाराजनी वृत्तिना अक्ष अक्षर ज छे. ते बात चोक्कस छे के दीपिकाकारे कईक कईक संक्षेप कर्यो छे. परिशिष्ठ १०मां आपेलो दीपिकानो आदिअंतभाग छे. ते पूनानी प्रत परथी उतरविवामां आव्यो छे. ते प्रत त्रिपाठी के पंचपाठीवाली होवी जोइए. कारण के तेनी प्रेसकोपी मूळ गाथाओना गुच्छक साथेनी छे. मारा हाथमां आ प्रत आवेली नथी, पण प्रेसकोपी परथी ए जोई शकाय तेवुं छे. आ प्रत पडिमात्रानी होय तेवो संभव छे. ए प्रत कोई संयोगोमां दरेक पाने तुटेली या घसाइ गयेली छे. जेथी जगो जगो पर चालु दीपिकामां त्रुटकता थई जाय छे आने जणाववा माटे अमे त्यां xx eg चिह्न आप्युं छे. कोई शंका करे के आदि ने अंतभाग आपको अने तेमां वळी आवुं तुटकपणुं आपकुं, ते कांइ योग्य छे ? आवुं कहेनारने जणाववुं पडे के जे अवचूरि छपावीए छीए ते पंचांगीना अमुद्रित साहित्यने मुद्रित कराववाना उद्देशथी छे, एटले आ दीपिका भंडारोमां पडेली अमुद्रित हती अने ते आ स्वरूपनी छे, ते जणाववा माटे आ अमारो प्रयत्न छे. कोई भाग्यशाळी परिशिष्ट ९ अने १० मां आवेली वृत्ति अने दीपिकाने संपूर्ण छपाववानुं करीने ज्ञान उपासनानो लाभ लेशे, एवी मारी आशा खोटी न गणाय जे एक वृत्तिनो प्रोफेसर वेनलकरमा जे निर्देश करवामां आवे छे, के जेनुं प्रमाण ४००० श्लोक गणाववामां आवे छे अने जेमां जेसलमेर, पाटण, सुरतनो निर्देश करवामां आवे छे. ते खरेखर ४००० श्लोकप्रमाण नहि परंतु ३००० लोकना प्रमाणनी अने क्षमारत्नजीवाळी अवचूरि ज होवी जोईए. कारण के जेसलमेरनी प्रत परथी जे प्रत उतरावीने सुरत मूकवामां S Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा संपादकीय निवेदन । रत्नीया वर्यपेता श्री. पिण्डनियुक्तिः। आवी छे, ते क्षमारत्नजीवाळी ज छे. तेमज पाटणनी प्रत परथी जे प्रेसकोपी थई छे, के जेनो उपयोग अमे आ अवचूरि छपाववामां कयों छे. ते पण तेमनी ज छे. आथी ए त्रणे स्थळनी प्रतो जे अन्य वृत्तिना नामे निर्देश करी छे, ते भिन्न न होतां क्षमारत्नजीवाळी अवचूरि केम न होय १ शंका:-आचार्य श्रीहरिभद्रमूरिए ' स्थापना' द्वार सुधीनी शिष्यहिता नामनी टीका रची, तेने वीराचार्ये संपूर्ण करी, एम वीरगणि पोतानी टीकानी शरुआतनी ६-७-८' गाथाथी जणावे छे. ज्यारे पोते एटले ईश्वर गणिना शिष्य वीरगणिए ७६११' प्रमाण अहिं परिशिष्ट ९ मा आयंत भागमा आपेलो छे. एवी वृत्ति रची छे. तेओ उपली वृत्तिने अनुसरिने आ रचुं छु, एम टीकानी १०'मी गाथामां बोल्या छे. बळी टीकानी पूर्णाहुति तथा प्रशस्तिनी समाप्ति करतां शिष्यहिता एवं नाम बे स्थानमा बोले छे. तो शिष्यहितावृत्ति पू. हरिभद्रसूरिनी के आ वीरगणिनी ? विज्ञा एवा प्रमाणम् . प्रकाशकीय निवेदनमा परिशिष्ट ९ वाळी टीकाने ३१०० श्लोकवाळी शिष्यहितानो आद्यतभाग छे, एम प्रकाशके जणाव्यु छे. पण खरी रीते आ ७६११ श्लोक प्रमाणनी वीरगणिनी वृत्तिनो छे. सुधारो:-परिशिष्ट ९ ना हेडींगमा वीराचार्यना स्थाने वीरगणि एम पांचवू. फंड तरफथी आ अवचुरी छपाववानुं नक्की बया पछी सं. २०१०ना हींगनघाटमां मुनिराज श्रीक्षेमकरसागरजीने आनी प्रेसकोपी सोपवामां आवी तेथी में तेमन तेमणे प्रेसकोपीने शुद्ध करवानें कार्य कयु. जे वात पूर्व जणावी छे. तेने शुद्ध करी सं. २०११ मां मुनिमहाराज श्रीगुणसागरजी महाराजने सोंपी अने तेमणे फंडने मुंबाइ रवाना करी. तेने पछी संस्थाए | Jain Education Inteme N ew.jainelibrary.org Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inter महोदय प्रेसमा आपतां ते प्रूफो आववानां शरु थयां एम अमे ते कार्य करता हता, परंतु ते अमारी संपादकनी जोडी, ते ज खालना चैत्र वद ० ) )नी काळी रात्रीए तुटी गइ. आथी आनुं संपादन कार्य मारा एकलाना हाथेज करवानुं आयु. वर्षोना वषथी जोडे रहेला अने जोडेज २० थी २५ ग्रंथोनुं संशोधन कार्य करेलं, ते आजे एकलाना हाथे चाल्युं. आथी बीजा मुनिवर्योनी सहाय लेवानुं थयुं खरु अने यत्किंचित् सहाय लीधी पण खरी आवी रीते मने मळेला संजोगोमां आ ग्रंथ में संपादन कर्यो छे. १ एक संपादक:- आ ग्रंथना एक संपादक मुनिराज श्री क्षेमंकरसागरजी अने हुं लगभग वि. सं. १९८८ थी साथ ज रहेला छिए अने अमा संपादन कार्य पण एक बीजाना सहचरपणाथी चालेलं छे तेमणे संस्कृतना ९ ग्रन्थो अने गुजराती साहित्यना २० ग्रंथोनुं संपादन कर्युं छे. संपादकनी अमारी जोडी तरीके एमनां जीवनना बे बोल तेओ आ फंडना एक संपादक होवाथी अहिं लखुं हुं. गरवी गुजरातना खेडा जील्लाना कपडवंज गामना दोशी जयचंद हरजीवनदास अने धीरज बनना लाढीला त्रीजा पुत्र कस्तुरभाइ एमनुं संसारीपणामां नाम हतुं. संसारीपणामां पत्नी तथा एक पुत्र, पुत्री हतां. कर्मनो क्षयोपशम थतां १९८८मां स्व. आगमोद्धारकश्रीना हस्ते मुनिराज श्री बुद्धिसागरजीना नामथी अमदावादमा संयम अंगीकार कर्यु अने क्षेमंकरसागरजी नाम राख्युं संयमनो मोटो भाग आगमोद्धारकनी सेवामां ज रह्या हता, यावत् आगमोद्धारनी अंतिम घडी सुधी साथै ज रह्या इता. अमे जे आगमोद्धारकनी साहित्यसेवानी कृतिओने जगत् संमुख बहार मूकी शक्या छोए ते प्रताप आ मुनिराजनोज छे. कारण के आगमोद्धारकनी कृतिओने खूणे खूणेथी शोधीने, तेनी तेनी कोपीओ, प्रतो, आगमोद्धारकना हस्ताक्षरो बेसाडीने तेमणे करी छे. ( आनो आखो सट आगमोद्धारकनी साहित्यसेवाना नामनी जे नानकडी श्रुतज्ञाननी कोटडी सुरत आगममंदिरनी बाजुमां छे त्यां मूकवामां आव्यो छे. ) एमने तपनी अंदर पण वर्धमानतपनी अमुक ओळीओ, नवपदनी ओळी, वीसस्थानकनी अमुक ओळीओ, ज्ञानपंचमी, पोसदशमी, छठो, अठमो अने अठाइ कर्या छे. ज्ञाननो उद्यम अने क्रियानो रंग, तेमज वैयावच्चनो रंग तेमनामां सारो हतो. एमनो साधुपणानो २२ वर्षनो पर्याय छे. २०१० नुं चातुर्मास हिंगनघाट कर्मा पछी कपडवंज श्रीचिंतामणीपार्श्वनाथना मंदिरना 'अंजनाशलाका प्रतिष्ठा महोत्सव पर भवतां, हिंगनघाटथी ७०० माइल आवी, Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयावर्युपेता श्री. पिण्डनिर्युक्तिः । ॥ ९ ॥ Jain Education Inte केटीक वखत शारीरिक कारणोना अंगे संपादनकार्य धीरुं चाले, तो केटलीक वखत प्रेस एवी अगवडता ऊभी करे के कार्य तद्दन ठंडुंज थई जाय, एथी पण संपादनकार्यमां ढीलाश पडे छे. अमारा संपादन कार्यमा जेणे जेणे मदद करी छे ते सर्वने अमे अत्रे याद करीए छीए. शेठ देवचंद लालभाई जैन पुस्तकोद्धारकफंडना १०५ मा क्रमांकवाला आ प्रथनुं संपादन जे अमने मत्र्युं छे ते मारा ज्ञानना क्षयोपशममां कारणभूत थाय छे. विद्वदुजनो अमारा संपादनमां जे कांई क्षति रही होय तेने मारा ज्ञानमित्रे करी आपला शुद्धिपत्रकथी शुद्ध करी वांचे अने ते उपरान्तनी क्षतिओ अमने जणावे, ए ज अभ्यर्थना. शुद्धिपत्रक परि० ८ सुधी ज आप्युं छे. साधु मुनिराजो पिण्डने - आहारने लगता आ ग्रंथनो सबहुमान उपयोग करशे एम कही हुं विरमुं कुं. आगमोद्धारक उपसंपदाप्राप्त मुनिकंचनविजय. सं. २०१४ पोष सुद १५ जैन उपाश्रय, लुणावाडा ( पंचमहाल ) } कपडवंजथी २० माइल दूर खलाडी मुकामे सं. २०११ ना चैत्र व. ० ) )नी काळी राते ११ वाम्याना सुमारे जेरी जानवरना दंशथी, सर्व जीवोने पोताना हाथे खमावी, नमस्कारमहामंत्रने सांभळतां हुं जाउं छं एम बोली, समाधिपूर्वक आ कायानी साथेना संबंधथी छुटा थया - काळधर्म पाम्या. आ रीते अमारी संपादकनी जोडी तूटी. एमनी जीवनझरमर अने तेमना संपादन करेला ग्रंथोनी यादी मारी संपादित श्रीसिद्धिगिरियात्राविधि नामनी पुस्तिकामां आपवामां आवी छे. संपादकीय निवेदन | ॥ ९ ॥ Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रीक्षमारत्नीयावर्युपेतायाः श्रीपिण्डनियुक्त विषयानुक्रमः गाथा , विषयः अन्त्यपत्रम् । गाथा विदयः अन्त्यपत्रम् | गाथा विषयः अन्त्यपत्रम् अथ पिण्डनिरूपणम् ६,१०६+' गौणसमयोभयकृतानि नामानि । १३-१५ शीतोष्णादिनाऽचित्तः, लतास्फो-12 भेदत्रयस्वरूपं सिद्धिश्च । ३ टादौस्थापनादौ च प्रयोजनम् । ४ १ पिण्डोद्गमोत्पादैषणासंयोजनाप्रमा ७,७+ अक्षकाष्ठादौ सद्भावासद्भावे । १६-३४, ८-११+ अप्काये निश्चयणाझारधूमकारणानि(८)पिण्डस्थापने। व्यवहारसचित्तता अर्वाक् नियुक्याम् । ८-९ द्रव्ये सचित्तः पिण्ड (९) निश्चय त्रिदण्डेभ्यः पतितमात्रे वर्षे २ पिण्डैकार्थिकानि (१२)। १ व्यवहारौ। अबहुप्रसन्ने तन्दुलोदके १०-११ सचित्तः पृथिवीकायपिण्डः। ३ मिश्रः, अनादेशत्रिकं, तद्द. ३-४ पिण्डनिक्षेपाः (४-६)। १ । १२ क्षीरदुमादेरधः पथ्यादौ च मिश्रः,आर्द्र षणानि, शीतोष्णादिना ५ कुलकचतुर्भागन्यायेन षट्के चतुष्कम् । एकद्वित्रिपौरुषी। चित्तः, परिषेकपानहस्तवन१ +एतचिह्नाकीता भाष्यगाथा । For Private Personal Use Only Jain Education in Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १० क्षमारत्नीयावर्युपेता श्रीपिण्डनियुक्तिः। ॥१०॥ धावनादि प्रयोजनं, ऋतुबद्धेः | ३८-४२, १२-१५+ वायुकाये धनवा प्रयोजनम् । विषयानुदोषः, वर्षास्वधावने दोषः, तादौनिश्चयेन सचित्तः,माच्या. ४९-५२ अनुपयोगिनो नारकाः, चरमा- क्रमः अर्वाग् वर्षायाः सर्वोपधेः दिर्व्यवहारेण, आक्रान्ताघ्मात स्थिदन्तादिना तिर्यञ्चः, प्रवाक्षालनं, जघन्यतः पात्रनिर्योपीडनदेहानुगतनिश्चोदनेष्व जनादिना मनुष्याः, क्षपकागस्य, आचार्यादीनां पुनः चित्त, दृत्यादिवातस्याचित्ता दिकाकर्यादिना देवा उपयोपुनः, पात्रनिर्योगाद्या अविश्रादित्वे क्षेत्रकालविचारः, ग्ला गिनः। म्याः, विश्रामणाविधिः, नी नत्वेऽचित्तेन प्रयोजनम्। ९ | ५३-५४ पिण्डनवकसंयोगाः (५०२) बोदकग्रहणं, गुर्वनशन्यादि- १३-१६ वनस्पतिकायेऽनन्तकायो निश्च- विधिश्च सौवीरतकादिषु। १२ क्रमः, पूर्व यथाकृतानि, ना येन, शेषो व्यवहारेण, मिश्रः ५५-५८ क्षेत्रकालपिण्डौ, अमूर्त्तत्वेन । च्छोटनादि, छायाऽऽतपयोः प्रम्लानो लोष्टादिः वृत्तम्लानौ शङ्का, आधेयस्थितिभ्यां प्ररूपशोषणं, कल्याणकं च । ८ अचितः, संस्तारकादिना प्र. णाहेतुत्वेन च समाधानम् । १३ ३५-३७ तेजसि निश्चयव्यवहारसचित्तत्ता, योजनम् । -७२ भावे प्रशस्ते संयमादित एकामुर्मुरादिमिश्रः, ओदनादिर- ४७-४८ विकलेन्द्रिये पिण्डत्वं, आक्षा विदशविधान्तः, अप्रशस्तेऽसंचित्तः । बुद्दहिकादिमक्षिकापुरीषादिना यमादिरेकादिर्नवान्तः, बन्धहे Jan Education Inter For Private Personal Use Only N ww.jainelibrary.org Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तुरप्रशस्तः, मुक्तिहेतुः प्रशस्तः, निक्षेपाः (४) द्रव्ये सचिः। ९४ आधाकर्मके नामादिनी (८) ज्ञानदर्शनचारित्राणां • पर्यायाचादिः ( द्विपदादि ३) भावे द्वाराणि । स्तत्तत्पिण्डः, अध्यवसायो वा गवेषणैषणादिः (३) क्रम- ९५-१२८, १६-२२+ आधाकर्मिकैकापिण्डः, आहारादिः प्रशस्त सिद्धिश्च । १७ र्थिकानि (८), द्रव्याधायां पिण्डस्योपकारी, तेन द्रव्यमा- ७९-८४ गवेषणानिक्षेपाः (१) द्रव्ये धनुरादीनां प्रत्यञ्चादि, भावावपिण्डाभ्यामधिकारः, निर्वाण- कुरङ्गगजदृष्टान्तौ, भावे उद्ग- धायां यमाधाय त्रिपातनं, कारणज्ञानादिकारणमाहारः, मोत्पादने। १८ द्रव्येऽधःकर्माणि जलादिष्ववतपटे पक्ष्मवत् , अनुपहतकारणा ८५-९१ उद्गमैकार्थिकानि (३) निक्षेपाः रणं, भावे संयमस्थानादिषु, कार्य अविकलज्ञानादिर्मोक्ष (४) द्रव्ये लडुकज्योतिस्तृ- संयमश्रेणिस्वरूपं, आधाकर्म णादि, भावे ज्ञानादि, लडुक- ग्राही अधोऽवतीर्य अधोभवा॥ इति पिण्डनिरूपणम् ॥ प्रियकथानकं, उद्गमशुद्धश्चा- युःघनीकरणादि कुरुते पतति रित्रशुद्धिस्ततो मोक्षश्च । १९ चाधोगती, द्रव्यात्मन्ने निदा॥ अथोद्गमदोषाः॥ ९२-९३ आधाकर्मादिका (१६) उद्ग- ऽनिदाभ्यां हिंसा, काया द्रव्या७३-७८ एषणैकार्थिकानि (४) एषणा। गमदोषाः। २० स्मनि,वधाचरणात्मघातः, निश्च Jain Education Intel For Private & Personel Use Only Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विषयानु क्षमारत्नीयावर्युपेता क्रमः श्री पिण्डनियुक्तिः। ॥११॥ येन ज्ञानदर्शनवघोऽपि, द्रव्यादाधाकर्मभोगिनामपि । २७ खाद्यस्वाद्यानामाधाकर्मता, त्मकर्माणि ममताविषयः, भा- १२९-१३६ एकाथिकचतुर्भजी, भना प्रामुकीकरणं निष्ठिते, उपवेऽशुभपरिणतिः, आधाकर्म त्रयीयोजना। २८ स्कृतं कृते, न छायावर्जन परिणतः परकर्म आत्मकर्मी- | १३७-१५९ साधर्मिकस्याधाकर्म, नाम न्याय्यम् । ३७ कुरुते, सक्रमशडी, कुटोपमया स्थापनाद्रव्यक्षेत्रकालप्रवच- | १७७-१७८ स्वपरपक्षस्वरूपं, कल्प्यासमाधिः केषाञ्चित् , अशुभनलिनदर्शन ( ३ ) ज्ञान कल्प्यता च। ३७ मावाद्गुरूणां, ग्रहणात्प्रसङ्ग, (५) चारित्रा (५-३) भि- | १७९-१८२ अतिक्रमाद्याश्चत्वारः, नपुप्रतिसेवादिमिरात्मकर्मता, क्र प्रह (४) भावना (१२)भिः रपण्डिताहस्तिदृष्टान्तेन मेण तेषां गुरुलघुते, न परासाधर्मिकस्वरूपं, प्रवचना अतिक्रमादिषु वृत्तिः, अतिनीते दुष्टतेति प्रतिसेवना, सुलदिषु चतुर्भजयश्च, तेषु क्रमादिस्वरूपम् । ३८ ब्धोत्को प्रतिसेवना, तद्भो कल्प्याकल्प्यता च । ३३ | १८३-१८८ आधाकर्मग्रहे आज्ञाऽनवगिप्रशंसाऽनुमोदना, स्तेनरा- १६०-१७६ अशनाद्याधाकर्म, कृतनि स्थामिथ्यात्वविराधनाः। ३८ जपुत्रपल्लीवणिमशंसाकारिणः ठचतुर्मनी, अशनस्याधा- | १८९-२०५ आधाकर्म तत्स्पृष्टं तद्भाजनप्रतिसेवादिषु दृष्टान्ताः, तद्व कर्मत्वे दृष्टान्तः, पान स्थितं, परिहारश्च, वान्त्या Jain Education in For Private & Personel Use Only Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ S दिवदभोज्यं, उम्रतेजोदृष्टान्तः, अन्यसमयेषूष्टीक्षी रादिवत्, अशुचिस्पृष्टवत्, अशुचिभाजनस्थबच्च स्पृष्टस्तद्भाजन स्थितयोः परिहारः, अविधिपरिहारेsगीतार्थदृष्टान्तः, विघिपरिहारे द्रव्यकुलदेशभावापेक्षणम् । २०६-२१७ परिणत्या बन्धावन्धौ, वेषविडम्बकप्रियङ्करदृष्टान्तौ, उद्यानदर्शिदृष्टान्तश्च आषाकर्मभोगिनो बोडत्वमेव । ४३ ४१ २१८, २४२२३ + विभागौद्देशिके उद्दिष्ट कृतकर्म चतुष्ककेन द्वादशमेदाः, ओघौदेशिक संभवस्वरूपे, रेखादिना तज्ज्ञानं, गोवत्सदृष्टान्तेन उपयुक्तता विभागौद्देशिके संभवः, उदेशशमुद्देश | देश समादेशमेदाः, तत्स्वरूपं द्रव्यक्षेत्रकालभावैनान्ने, उद्दिष्ट कल्प्या कल्प्यविधिः, सम्प्रदाने च तत्परिज्ञानोपायः कमद्देशिके कल्प्याकल्प्यविधिः । ४७ २४३ - २७० द्रव्यपूतौ छगणधार्मिकद्रष्टान्तः, भावपूतिस्वरूपं, उनको ट्यामाधाकर्मिकाद्याः, उपकरणे द्रव्यपाने च बादरपूतिः, भक्तपूतिस्वरूपं, चुल्लघुखादिचतुर्भक्रिका त्रिष्वकरूप्यं अङ्गारादिर्न सूक्ष्मपूर्तिः, आधा कर्मपात्रस्याकल्पवये सूक्ष्मपूतिता, स्वप्रमाणं पूतिः, आधाकर्मग्रहे त्रीन् दिवसान् पूतिः, तत्परिज्ञानो पायः । ५२ १७१ - २७६, २४+ वेधकविषवत् सहस्रान्तरितमपि मिश्रमकरूप्यं, यावदर्थिक पाखण्डिसाधुमि Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीया वचूर्यपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः । ॥ १२ ॥ Jain Education Intern श्रस्वरूपं, कल्पत्रये क ५३ ल्प्यता । २७७-२८४, २५+ स्थापनायां स्वस्थानपरस्थाने, अनन्तरपर म्परे महत्रयात्परतः, विकारेतराणि द्रव्याणि । ५५ २८५-२९१, २६-२७+ बादरसूक्ष्मप्राभृतिके मङ्गलपुण्यार्याय, बरफलं च उत्पवष्कनाबष्व ष्कताभ्याम् । ५६ २९२- ३०५ प्रादुष्करणसंभवे भिक्षुकत्रयदृष्टान्तः, प्रकटकरणे चुल्लयादेर्बहिरानयनं, प्रकाशकरणे रत्नादिना छिद्रादिना च, आत्मर्थीकृतं कल्पते, विशुद्धिकोटित्वम् । ५८ ३०६-३१५ क्रीते आत्मपरद्रव्यभावक्रीतानि, सचितादि परद्रव्ये, आत्मद्रव्ये निर्माल्यादि, परभावे मडष्टान्तः, आत्मभावे धर्मकथावादक्षपणादि (९) । ५९ ३१६-३२२ प्रामित्ये लौकिके भगिनी दृष्टान्तः, लोकोत्तरे वस्त्रादौ मलिनतादिदोषाः, अपवाद६१ छ । ३२३-३२८ परिवर्त्तिते लौकिकलोकोरयोस्तद्रव्यान्यद्रव्ये, लौ किके शास्योदन दृष्टान्तः oster ऊनाधिकवस्त्रादौ दोषास्तदपवाद | ६१ ३२९-३४६ अम्माहृते बचीर्णानाचीर्णे निशीथानिशीथे स्वग्रामपरग्रामे जलपथस्थलपथी, दोषाश्च, त्रिगृहाद् बाटकादेव परतः परमामनिशीथे धनावह दृष्टान्तः, हस्तशतादाचीर्ण, उत्कृष्टादि ६५ मेदाः । ३४७ - ३५६ - उद्भिन्ने पिहितकपाटौ प्रासुकाप्रालुके, षट्कायदोषाः दानादिदोषाः अकुञ्चित विषयानु क्रमः ॥ १२ ॥ Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कपाटे आचीर्णम् । ६६ रध्यवपूरकस्विधा, मिश्राद्भे दोषाः (१६)। ७६ ३५७-३६५ मालापहृते जघन्योत्कृष्टे, दः, कल्प्याकल्प्यविधिः।७३ ४१०-४२७ ३१-३२ + क्षीरमज्जनभिक्षुदृष्टान्तः, दातृपतनादि ३९२-४०३, २८-३०+ विशोध्यविशो मण्डनक्रीडनाङ्कधात्रीत्वानि उत्कृष्टे कापिलः, ऊर्धाधिकोट्यौ, द्रव्यक्षेत्र काल करणकारणाभ्यां, धात्रीधस्तिर्यग्भेदाः, अपवाभावविवेकः, शुष्काचतु शब्दव्युत्पत्तिः, धात्रीदोषदश्च । भङ्गी, कल्प्याकल्प्यविधिः, गुणादिनिरूपणं, दत्तदृष्टा३६६-३७६-प्रभुस्वामिस्तेनाऽऽच्छिन्ना उद्गमकोट्यां पकं, शेषा न्तोऽत्र। ७९ नि, प्रभौ गोपः, दोषा विशोधिः, नवाष्टादशादि- ४२८-४३४ स्वग्रामपरग्रामप्रकटच्छन्नअपवादश्च । ७० कोट्यः, गृह्युद्भवा उद्गम भेदा दूती,लोकोत्तरे उभय३७७-३८७ सामान्यनिसृष्टे लोलुपभिक्षु दोषाः। ७५ पक्षे च, धनदत्तदृष्टान्तः।८० दृष्टान्तः, भोजनानिसृष्टे, ॥ इत्युद्दमदोपाः॥ ४३५-४३६ ३३-३४+ लाभालाभादिछिन्ने करप्य, हस्तिनि- ।। अथोत्पादनादोषाः ॥ पविघं निमित्तं, भोगिनीसृष्टं दृष्टमप्यकरप्यम् । ७२ ४०४-४०९ द्रव्योत्पादनायां सचित्तादि, दृष्टान्तः । ८१ ३८८-३९१ यावदर्थिकस्वगृहसाधुमित्रैः । भावोत्पादनायां धाच्यादयो । ४३७-४४२ जातिकुलगणकर्मशिल्पैः सू-1 Jain Education Inter For Private & Personel Use Only Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विषयानुक्रमः क्षमा रत्नीयाव चूर्यपेता श्री. पिण्डनियुक्तिः। ॥ १३ ॥ चाऽसूचाभ्यामाजीवः । ८२ ष्टान्तौ। ९१ | शङ्कितादि (१०)। ९२ ४४३-४५५ श्रमणमाहनकृपणा तिथिश्वा- ५००-५१३, ३५-३७+ चूर्णे चाणाक्य- ५२१-५३० ग्रहणभोगयोश्चतुर्भङ्गी, उभिर्वनीपकः, निग्रन्थादयः क्षुल्लको, पादलेपे समित द्गम( १६ )म्रक्षितादि श्रमण भेदाः, बनीपकत्वे सूरयः, क्षताक्षतयोन्यो (९)पु शङ्का, उपयोगादोषाः। ८४ विवाहे च युवतीयुग्मं, गर्भ च्छुद्धिः, श्रतोपयोगगृहीतं ४५६-४६० त्रिविधाश्चिकित्सास्तद्दो नृपपल्यौ। ९४ केवल्यपि भुते, अन्यथा पाश्चः। ५१४-५१५ साधुसमुत्था उत्पादना श्रुताप्रामाण्यादि, परिणामा४६१-४८३ घृतपूर्ण सेवकिकामोदकसिं दोषाः, एषणायां शङ्कित शुद्धेः शङ्कासद्भावे चाने हके शरदृष्टान्ताः क्रोधादिषु, भावापरिणती साधोः, शेषा षणीयम् । ९६ क्रोधादिकारणानि च। ८९ गृहस्थात् । ९४ | ५३१-५३९ म्रक्षिते सचित्ते पृथिव्यब्बन४८४-४९३ संस्तवस्वरूपं सम्बन्धिवच॥ इत्युत्पादनादोषाः॥ स्पतयः, अचित्ते गर्हितेतरे। नयोःपूर्वपश्चाद्भदौ च । ९० ॥ अथ एषणादोषाः ॥ हस्तमात्रयोश्चतुर्भङ्गी, सं४९४-४९९ विद्यायां मन्त्रे च भिक्षु- ५१६-५२० एषणानिक्षेपाः (४), द्रव्ये सक्तिमदकल्प्यम्। ९७ पासकः पादलिप्तश्च दृ वानरयूथ दृष्टान्तः, भावे । ५४०-५५७ निक्षिप्ते सचित्तमिश्रयोरन ॥१३॥ Jan Education Inter For Private Personel Use Only Swainelibrary.org Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ न्तरपरम्परे, सचिते षोढा, । चतुर्भङ्गयः, तल्लक्षणं, अ. भावे दातृगृहीत्रीः। ११० स्वस्थानपरस्थानयोः क चित्ते आधारसंह्रियमाणयोः, ६१३-६२६ लिप्ते दध्यादिलेपोऽपि व. ल्प्याकल्प्यविधिः, सप्तविधो शुष्काईस्तोकबहुचतुर्भद्यः यः, नित्यतपसा संयमाविध्याताद्यमिः यतना च, तत्र करप्याकल्प्यविधि दिहानेर्भोजनं, षण्मास्याचाअनत्युष्णोदकमघट्टितकर्ण दोषाश्च । १०३ म्लेोजनं, महाराष्ट्रादिवत् ग्राह्यं, पार्शवलिसानत्युष्णा५७२-६०४ बालवृद्धमत्तोन्मचादिचत्वा अलेपेन यापना, तक्रादीनां परिशाटाघट्टनमना, भङ्गारिंशद्विधदायकेषु केषुचि ग्रहणं, शीता आहारोपनयनरीतिः, अत्युष्णे दोषाः, द्भजना तदोषाश्च । १०९ विशय्याः, अलेपाल्पबहुवातहरितयोरनन्तरपरम्प- ६०५-६०८ सचित्ताचित्तमित्रैरुन्मिश्रे लेपद्रव्यादि, संसृष्टहस्तमारमेदौ। १०० चतुर्भङ्ग्यः, संहृतोन्मियो त्रसावशेषद्रव्यैभनाः।११२ ५५८-५६२ सचित्ताचित्तभिश्रेषु पिहि विशेषः, आशुष्कस्तोक- ६२७-६२८ छर्दिते शीतोष्णमिश्रचतु. तेषु चतुर्भयः, चरमे बहुचतुर्भङ्गयः, कल्प्याक भङ्गयस्तदोषाश्च, शीतोष्णभजना। १०१ स्प्यविधिश्च । १०९ च्छर्दिते कायदाहषट्का५६३-५७१ सचित्ताचित्तमिश्रसंहरणेषु । ६०९-६१२ अपरिणते द्रव्ये षट्कायाः, | यविराधनाः, मधुविन्दु Jain Education in For Private & Personel Use Only Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयावर्युपेता श्रीपिण्ड दृष्टान्तः। ११३ | कवलवदनेष्वन्तः, रसहेतौ | ६५५-६६० साकारसधूमौ तदोषाश्च११८, विषयानु॥ इत्येषणादोषाः॥ दोषः, अपवादश्च । ११५ | ६६१-६७१ क्षुद्वेदनादीनि कारणानि, ॥ अथ ग्रासैषणादोषाः॥ ६४२-६४३ पुरुषादेराहारप्रमाणं यात्रा आतङ्कादीनि न्यूनाहारका६२९-६३५ मासेषणानिक्षेपाः (४), मात्राहारश्च मुनिः। ११६ रणानि, उपसंहारः, धर्माद्रव्ये मत्स्यदृष्टान्तः, भावे ६४४-६५४ अतिबहुकमतिबहुशः प्रका वश्यकयोगानामहानिः प्रसंयोजनाद्याः, अर्थसिद्धयै मनिकामाभ्यां प्रमाणं, हीना योजनं, सूत्रविधिना विराचरितकस्पिताहरणे, साधोदिभोजने गुणाः, हितमित धना निर्जराफला । १२० रात्मानुशासनम् । ११४ स्वरूपं कालापेक्षयाऽऽहार- ॥ इति ग्रासैषणादोषाः॥ ६३६-६४१ द्रव्यसंयोजना बहिः, पात्र मानम् । ११७ ॥ इति पिण्डनियुक्तिः ॥ नियुक्तिः। ॥१४॥ ॥१४॥ Jain Education Inter For Private & Personel Use Only A lww.jainelibrary.org Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रीक्षमारत्नीयावचूर्युपेतायाः श्रीपिण्डनिर्युक्तेः शुद्धिपत्रकम् । पत्राहः पतयः १२ २६ "चितौ सीह णेवं अशुद्ध पत्राकः पतयः अशुद्ध शुद्ध पत्राङ्कः यक्यका | अशुद्धं इकाल अङ्गार "नस्था> 'नस्थापनं ६ ६ "चित्तौ अग्निरुपरि अग्नेरुपरि ८१० “अहि. सहि. ॥ १८ ॥ ॥ ३८॥ ९ १ अविभागिण अविभागण चेन्नवैः चेन्नैव० २६ नरकस्थाप० नरकस्था घ० ९ ३ ने माना मानो काय कार्य १० २० ग्रहः "ग्रह सच्चितो सच्चित्तो गृद्धन गृध्रन० ११६ गृह्णतः गृहतः लवणेन लवणेण ४१७ | पथि पृष्ठा पथौ पृच्छ] .. गुवत्ते णुबत्ते ५ ५ अस्था० अस्थ्या र नियममिति नियम इति "विहिभित्ते विहत्ते ११ २३ उध्धृता उद्धृता भावधुवर्ण भायधुवणं . ५ २६ । द्वादशास्तै० द्वादश तै० १२ ३ - 'मृधृता मुद्धृता पान० पानं १ वशादिवसादि १२ १३ कर्माणां कर्मणां Jain Education Inte ! For Private Personel Use Only al Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीया वचूर्यपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः । ॥ १५ ॥ Jain Education Intern पिण्डं निवार्णमेव वोच्छामी बोधव्यानि पिण्डः निर्वाणमेव वोच्छामि बोद्धव्यानि १६ १७ पदपदा० १७ 'पदापदा० भाषणात्रि) भवैषणां त्रि प्रकार माह ( ६.१ ) दोहृद ० ०ता प्रकारामाह ( ० १ ) दौहृद० ०ताः ( ६.२ ) विइमेय बहुआदगो बहुओदगा (६.३) (इ०३) १५ १३ तैः ( ह०२ ) विइयमेयं 12229 १६ २ नामुनि १६ १२ ७ १७ ८ १७ २३ १७ २५ १८ ६ १८ ९ १८ १४ १८ १४ १८ १५ निर्जर तत्र चतुर्द्वा सूचितं तसे न्वर्थः, नमूनि 'मन्य० संयमादिः परीत निर्झर ततः चतुर्द्धा "सूचितं तस्सेव वर्थं 'तिरिश्वांमानु० तिरश्चां मनु० तमाह क० तमाहाक० आह माही " मन्यः संयतादिः, परीता १८ १७ १८ १९ १८ १९ १८२० १८ २५ १९ १९ १२ २० ५ २० २३ २१ २ २२ २ २२ ५ x x २२ ५ २२ २२ विधाए प्राशुक० संक लेन कथन ० निर्विशका व्यावहार० कथान० निर्विशङ्का व्यवहार० रूपा, रूपाः, निमन्त्रिता, निमन्त्रिताः, विधाए प्रासुक० "शकलेन प्रथम ० प्रथमः 'तुष्णीको- 'तूष्णीकोआनतो आनेता राज० राजा च, जाताः कथनया च जाता 'कत्थनया २३ 8 २३ १५ २३ १६ २५ ३ २५ ६ २५ ७ २५ १३ २५ २४ २५ २४ २५ २५ २६ ६ २६ १५ २७ ३ २७ ९ शुद्धि पत्रकम् । ॥ १५ ॥ Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तत्रा० तथा० कर्तव्याः कत्तव्या 'चार्थ्या० चार्था० 'दि नाम्ना दिनाम्नां निहगा निगा त्वेन प्र. "त्वेनाप्र० 'नस्ती. नतस्ती . ऽनन्ने ऽणन्ने नुक्का (१) नुक्त्वा ०बुहा बुद्धा मज्ज मज्झ स्थिता, स्थिताः बालादी० बालादि० २७ १८ / कर्ता का २९ १६ पृष्टं स्पृष्टं २९ १९ राजा राज्ञा २९ १९। साधोरिति साधोरति सजियंपि सजीयपि ३० १५ एव एवं यदोप० यद्यष्यु० मज्जाए. मजार याचिता स्थि] 'याचित्वा १९ वान् स्थितवान् ३४ ९ उष्ठी उष्टी ३४ १५ ०नप्र० ०नपदप्र० तृप्ति तप्ति २७ । काष्टा० काष्ठा० ३६ २१ अदत अदत्त ३८ १ ०पयुक्तम् (ता], । ३८ ४ तथा च ०पयुक्ततया च [ ] ३८ २० "भवन्ति भवति १५ उद्देशिकं स० औद्देशिकंसा. ४६ २ 'मुका वेला, "मुको वेला ४६ १८ तदेव तदेव ४७ ४ सम्मिश्रं सम्मिश्र १७१५,१६ ३९ २३ "पवित्रममिति पवित्रमिति ४८ ३ ४० ४ कृतः कारी ४.२५ | पृष्ठः पृष्टः, नूनं पाकं नुत्नपार्क ४३ ६ | अज्जो0 अज्झो م ३९ १२ १८ ه ه २५ । له سه Jain Education inte ! For Private & Personel Use Only w ww.jainelibrary.org Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 'श्चेति साधबो शुद्धि क्षमारत्नीया. वर्युपेता पत्रकम्। विचि० तत्स० चीर्ण ५८१८,२२ साघवो पविश्चि० सत्स० चीर्ण ६० २६ ६१ १४ चीर्ण श्री ६० २० चल्लु० सन्मिथ चुल्लय० उक्करणं स्थिताश. "गमेति वर्ग. दुर्गासं र्थः सिद्धं पिण्डनियुक्तिः। ॥१६॥ चेति चुरलु. सम्मिश्र चुल्ल्यु . उवगरणं स्थितस्याश० गमे वार्ता दुप्रासं र्थसिद्धं ४९१२ । "कियं *कीयं | चटु० चाटु १९१६ - 'त्यंगुरूणा० गुरूना भगिनीं भगिनी तथैत० तवैत० 'वय॑न्ते 'वर्त्यते दारिद्र० दारिद्र्य० दारिद्र० दारिद्रये विदि० अविदि० ०द्वयो( व्ये) द्वये लाहकं लालकं वीवाहः विवाहः २ । ०रयतः ०रयन्तः चीर्णम. द्भिन्नं द्भिन्न urururur दधिर० 'सिक्या० सिद्धति दधि अ० सिक्था० सिद्ध मुद्गः शिला अन्त शिरस्फो० ६४ १० 'निवृतः ६४ १५ | न्यथा मुद्गादयः शिला अन्तः शिरःस्फो० 'निवृत्तः ऽन्यदा Jain Education inte ! For Private Personal use only Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ इस् प्रतिकुष्टं परि० नाछि ० अणुनायं पुट के सहोद 'दानाह गयमतं कुडुम्बस्य जावंति य आरम्भ अध्यवपू० ० इसु प्रतिकुष्टं पारि० "नाच्छे० अणुभावं उसके सहोद 'दामाद गयभत्तं डुम्बस्य जातिय आरम्भे पू० ६८ ९ ६८ २१ ६९ ५ ७० ५ ७० २२ ७० २४ ७१ १३ ७१ १९ ७२ १२ ७२ १५ ७२ १७, १८ ७२ २१ ७३ १ छिन्नादि किंजि तदेव० ० दवे दाद शो ० निपाति अशढ: घातनं षोद० यथा स० भेदाः कापि छिन्नादीनि कंजि तदेव० ० दवे 'दादि विवेकः शे ० निपाते अशठः घातनं षोड० यथास० "भेदा कापि ७३ ८ ७३ १९ ७४ ७ ७४ ८ ७४ ९ ७४ १५ ७४ २१ ७४ २२ ७५ ४ ७५ १० ७५ २३ ७५ २५ ७६ ९ ७६ २६ यथा विभवं यथाविभवं प० पु० हूर्व दृष्टवा पिटिना० च्छया ऽन्य० थथैषा त० स्नाप० स्वराः, कीमुखो के ण्डरि० द्धृत्य हृतं दृष्ट्वा पिटना० 'चछ्या ऽय० यथैत ० स्नप० स्वरा, की गुल कंस्थितिः ण्ड इ० वृत्य ७६ १९ ७७ ९ ७७ ११ ७७ १९ ७७ २२ ७७ २६ ७८ २ ७८ ११ ७८ २५ ७८ २५ ७९ ९ ७९ १६ ७९ १९ Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ शुद्धि ७९ १९ । "सुपन्नं २० चामष्ट० ७९ २४ घृतपु० क्षमारत्नीया. वचूयुपेता श्री. सुप्पणं चादष्ट. घृतपू. ८८ १६ ८९ ३ पत्रकम् । । २१ ।। यथाऽय० यथायथ० ८४ २२ (६०) (१०३४) प्रनष्ट प्रणष्ट प्लुत० 'प्लुति० २१ | "दि दिः ८५ १५ प्रस्न० पिण्ड नियुक्ति (६० ३१) प्रश्न 'लितं लितुं परिगृहे परिग्रहे 'तः प्राय एव तप्रायमेव यथां यथा तद् भत्ता तद्भत्रा त्या० त्या० साधुनिक साधोनिक पञ्चवि० पञ्चवि० बर्बाझ० ब्राझ मुस्कु० 'मुत्क० घोषाश्व घोषाश्च 'पत्या "पत्त्या "सय 'सयं ८१ २० ८१ ७ (१०) ८१ ८ द्वय० (१०) ८२ १० भो- 'प्येक ८४ १८ (६०) ८४ २१ । "तश्चि० ८४ २१ । ०भिभ० ८१२२ द्वयं (६० ३२) भोः- प्येकः (८० ३३) तच्चि० भिर्भ ८५ २० ते (६०) ८६ १५ दाक्षि० (१०) ८७ २० दृशी० (१०) ८८ ८ । भुञ्जते ब्रूते (१० ३५) दक्षि (१० ३६) दृश्यी० (१०३७) भुज्यते - งะะะะะะะ गणे 'गेण ॥१७॥ Jain Education Inter For Private & Personel Use Only w ww.jainelibrary.org Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inter श्चाशत् ० ( इ० ) पद ० ( 02 ) वृत्ता ( इ० ) (EP) ( इ० ) बीवा० ( 02 ) रिणितं ( इ० ) पतिर्नि० "न्तस्त० 'शत० ( ह० ३८ ) पाद० ( दृ० ३९ ) वृता ( ह० ४० ) ( ह० ४१ ) ( ४० ४२ ) विवा० ( दृ० ४३ ) रिणतं ( ४० ४४ ) पतेर्नि० ततस्त० ९२ २३ ९२ २३ ९२ २६ ९३ ७ ९३ १३ ९३ १२ ९३ १९ ९३ २१ ९४ ७ ९४ १ ९४ १७ ९४ २४ ९५ २ ९५ ३ यथ० मात्र यूथ ० मात्र विकट्यतां विकटयतां व्यक्तिः वक्तः रच लक्षण ० 'कमे० ० बुन्ना० • विलिप्ते लक्षण ० क्रमे ० 'रोso बुधना० वलिप्ते मूद्रि० मातृकेण सचिता० सचिता० संहृयते संड्रियते मुद्रि० मात्रकेण ९५ ३ ९२ ४ ९६ ६ ९६ १८ ९६ २० ९६ २३ ९७ १ ९७ १६ ९९ १८ ९९ २१ १०० २७ १०१ २४ १०१ २६ १०२ १४ *भङ्गष्व० जन्न 'चतुर्थी गद्रे गद्रे "माला ( ह० ) 'योजाना शिशु धुसु० कवी ० ददत्यां व्यन्ति पन्ति ०भङ्गेष्व० अन्नं 'चतुर्थी गर्दे द्र माना ( ह० ४५ ) योजना शिशुं घुसु० "कबी० ददत्या व्यन्ती पन्ती १०२ १९ १०२ २० १०२ २४ १०३६, ७ १०३ ७ १०३ २० १०५ ११ १०५ ११ १०५ २४ २ ८ १०६ १०६ १०६ ८ १०६ १६ १०६ १७ ****** Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीया वचूर्युपेता श्री. पिण्ड निर्युक्तिः । ॥ १८ ॥ Jain Education Inte यथा नि० द्वारे दाभ्यैव णे त्वया ग्रहणे णे परिष्टः पिज्जन ० यथाऽनि० द्वारं दाव्येवं परिणितम् समि तेण उ० पविष्टः पिञ्जन० परिणतम् सामि तेण उ "लगनात् ज्ञात्वाऽना० लग्नात् ज्ञात्वा ना० (दृ० ४४) (दृ० ४६) चागल ० च गड० (४०४५) (दृ० ४७) १०७ ८ १०७ ११ १०७ १६ १०७ १६ १०८ . १०९ ३ ११० ५ ११० १६ १११ २० १११ २५ ११३ ९ ११३ ६ ११३ २४ ११३ २१ पेशो २० मूत्क्षि ० द्रव्य ० कादे तीभ० योजना रिणित ० आहार एव स रुद्वान पेशीर० मुत्क्षि ० द्रव्ये 'कादेः तोर्म ० योजना रिणत ० स आहार एव रुद्धानि प्राशुक० प्रासुक० कीदृश कीदृशः भोक्तव्यःः, भोक्तव्यः यदै ० पदै ० ११३ २५ ११४ ५ ११५ २ ११५ ११ ११५ ११ ११५ १२ ११५ २२ ११६ १ ११७ १ ११८ ६ ११८ १३ ११८ १३ ११८ २१ इर्या० धामो आव ० दारिद० बह्मा० वर्षति ईर्या० थामो अव० दारिद्द सुत्र० सूत्र तेति भिक्षार्थं । ते तितिक्षार्थं 1 } ११९१२ मु० 'द्वति० प्रकटार्थं चिर० बला० वर्ष उ० मिहिकायां महिकायां चरित्रभेयं चरितमेयं वृति० प्रकटार्था केर० ११८ २१ ११८ २४ ११८ २५ ११९ १ ११९ 67 ११९ १६ ११९ १७ ११९१७ १२० १ १२० १३ १२० १३ १२० १६ शुद्धि पत्रकम् । 1186 11 Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १३१ १४ १३२ हस्ती० डल १३४ २६ प्रेस० मुद्रणालय० १२० १८ | उणहिय ऊणहिय १२२ २४ । ०धृतानां भूतानां 'वचुर्यु० वचूयु० १२१ १ पज्जता पजचा १२५ ७ पिन्ड- पिण्ड- नियुक्त. नियुक्ति १२१ ४ सच्चित. सच्चित्त० १२५ १४ रत्ननीया रत्नीया प्रतिकम् प्रतीकम् चरिताण चरिताण १२६ ८ द्रव्योद्मे द्रव्योद्गमे पृच्छा पुच्छा १२१ २० सच्चितो सच्चित्तो १२६ १६ हस्ति० जरभाई जरमाई १२२ ७ मञ्चितो मच्चित्तो १२७ २३ 'सीधो० साघो० 'लाणण 'लाणाण १२२ १३ संयोय. संजोय. १२९ ७ ०वेशकः वेषकः "गंधे. गंधे० १२२ १२ / धृतनां धृतानां १३१ ५ पगाईणं पागाईणं १२२ २० । बृहद्वृत्ति बृहद्वृत्तिः १३१ १० रेफमां अनुस्वार प्रेसदोषथी घणे ठेकाणे छे, तेने वांचक महशयोए समजीने वाचवा विनंती. १३६ १ -eetee-- Jain Education Intel 14 For Private & Personel Use Only T Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 8810 Jain Education inte For Private & Personel Use Only Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - Jain Education श्रेष्ठि- देवचन्दलालभाई - जैनपुस्तकोद्धारे प्रन्थाङ्कः १०५ । श्रीमद्भद्रबाहुस्वामिप्रणीता सभाध्या श्रीजयकीर्त्तिसूरिशिष्य - श्रीक्षमारत्न सूत्रितावचूर्युपेता श्रीपिण्डनिर्युक्तिः । ->*99<< पूर्वमधिकारसूत्रं, गाथा - पिंडे उग्गम उपाय सणा[सं] जोयणा पमाणं च । इंगाल धूम कारण अट्ठविहा पिंडनिज्जुती ॥ १ ॥ पिण्ड आहारविषये उगम १ उत्पादना २ एषणा ३ संयोजना ४ प्रमाण ५ इङ्गाल ६ धूम ७ कारण ८ मेदादष्टविधा पिण्डनिर्युक्तिर्भवति, पिण्डस्य- आहारस्य निश्चिता युक्तिः निर्युक्तिः ॥ १ ॥ अथ पिण्डैकार्थिकान्याह-पिंड निकाय समूहे संपिंडण पिंडणाय समवाए । समुसरण निचय उवचय चएय जुम्मे य रासी य ॥ आहारे पिण्डशब्दानां मीलनात् निकायो भिक्षुसङ्घाते, समूहो मनुजादियोगे, संपिण्डना सेवादीनां, पिण्डनापि तत्रैव, केवलं मीलनमात्रे समवायो वणिगादीनां योगे, समवसरणशब्दस्तीर्थकृतः सभायां निचयः शुकरादियोगे, उपचयः पिण्ड० अ० १ पिण्डशब्दपर्यायाः । Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पिण्डमेदाः। रत्नीयावर्युपेता श्रीपिण्डनियुक्तिः। पूर्वयोगोपचयमावे, चय इष्टकाचित्तौ, राशिः पूगफलादियोगे, युग्मः पदार्थद्वयसङ्घाते, एतान्येकाथिकानि ज्ञातव्यानि, योगवाचकत्वात् ॥ २॥ पिण्डभेदानाहपिंडस्स उ निक्खेवो चउक्कओ छकओवकायवो। निक्खवं काऊणं परूवणा तस्स कायवा ॥३॥ ___पिण्डस्य निक्षेपो-नामादिन्यासरूपः, चतुष्कका पदकको वा कर्त्तव्यः, निक्षेपं कृत्वा तस्य-पिण्डस्य प्ररूपणा कर्त्तव्या ॥३॥ षट्के चतुष्कनिक्षेपान्तर्भावं दृष्टान्ततः प्ररूपयतिकुलए उचउभागस्स संभवो छक्कए चउण्हं च नियमेण संभवो अस्थि छक्कगं निक्खिवे तम्हा॥४॥ यथा कुलके-चतुःसेतिकाप्रमाणे चतुर्भागस्य-सेतिकाप्रमाणस्य सम्भवो भवति, एवं पदके निक्षेप(पे) चतुर्णां नियमन-अवश्यतया सम्भवोऽस्ति, तस्मात् षट्कं निक्षिपामि ।। ४ ॥ तदेवाहनामं ठवणापिंडो दवे खेत्ते य काल भावे य । एसो खल पिंडस्त उ निक्खेवो छबिहो होइ॥५॥ ____ सुगमा, नवरं नामादिषु प्रत्येकं पिण्ड शब्दो योज्यः ॥ ५॥ नामपिण्ड[स्थापनं] स्थापनापिण्ड सम्बन्धं चाहगोण्णं समयकयं वा जं वावि हवेज तदुभएण कयं। तंबिंति नामपिंडं ठवणापिंडं अओवोच्छं॥६॥ तच्चतुर्विधं नामपिण्डं ब्रुवते तीर्थकराः, गौणं समयकृतं यद्वा तदुभयेन कृतं गुणसमयकृतमित्यर्थः, अपिशब्दादनुभयजं * अस्यां प्रतौ सर्वत्र ( ) एतचिह्नमध्यवर्ती पाठो मुद्रितबृहद्वृत्त्यनुगतः । Jain Education Inter For Private & Personel Use Only Niww.jainelibrary.org Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | समयकृत पिण्डनाम। गुणसमयव्यतिरिक्तमित्यर्थः, अतः स्थापनापिण्डं वक्ति ॥ ६ ॥ भाष्यंगुणनिष्फन्नं गोण्णं तं चेव जहत्थमत्थवी बेति।तं पुण खवणो जलनो तवणो पवनो पईवो य॥भा०१॥ पिण्ड इति वर्णरूपं नाम नामपिण्डः, गुणनिष्पन्न नाम गौणं तदेव च यथार्थमर्थविदो ब्रुवते, दृष्टान्तमाह-गौणं नाम विधा-द्रव्य १ गुण २ क्रिया ३ निमित्तमिति, पिण्ड इति क्रियानिमित्तं, पिण्डनं पिण्ड इति व्युत्पत्तेः, उदाहरणान्यपि क्रियानिमित्तान्येव दर्शयति, तं पुणोत्ति, तत्पुनः गौणं नाम क्षपण इत्यादि, यथा क्षपयति कर्माणीति क्षपका, ज्वलतीति ज्वलनः, तपतीति तपनः, पुनातीति पवनः, प्रदीप्यते इति प्रदीपः, चकारोऽन्यसजातीयदृष्टान्तसमुच्चयार्थः ॥१॥ सामान्यतो गौण नाम व्याख्यातं, सम्प्रति पिण्ड इति नाम गौणं समयकृतं च व्यान्विख्यासुराहपिंडण बहुदवाणं पडिवक्खेणावि जत्थ पिंडक्खा ।सो समयकओ पिंडो जह सुत्तं पिंडपडियाई ॥२॥ बहूनां द्रव्याणां पिण्ड(न)म्-एकत्रमीलनं पिण्ड इति नाम प्रवर्त्तमानं गौणमिति शेषः, समयकृतमेवाह-पूर्वापेक्षयात्र प्रतिपक्षशब्दः संयोगाभाववाची, ततः प्रतिपक्षेणापि द्रव्यसंयोगमन्तरेणापि यत्र पिण्डाख्या भवति, स समयकृतः, पिण्डो नामपिण्ड इति, यथा पिंडवायपडियाएत्ति सूत्रं, अयमभिप्रायः, यथा आचाराङ्गद्वितीयश्रुतस्कन्धे प्रथमे पिण्डैषणाध्ययने सप्तमोद्देशके-“से भिक्खू वा भिक्खुणी वा गाहावइकुलं पिण्डवायपडियाए अणुपविढे समाणे, जं पुण पाणगं पासिज्जा, तंजहा-तिलोदगं वा तुसोदगं वा" इत्यादि, अत्र पानीयमपि पिण्डशब्देनाभिहितं समयभाषया, Jain Education inte For Private Personel Use Only Jvww.jainelibrary.org Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रत्नीयावर्युपेता श्री उभय| जमुभया तिरिक्तं पिण्डनाम। पिण्ड नियुक्तिः। ॥२॥ न चान्वर्थयुक्ततयेति ॥२॥ उभय दर्शयतिजस्स पुण पिंडवायट्रया पविट्रस्स होइ संपत्ती । गुडओयणपिंडेहिं तं तदुभयपिंडमाइंसु ॥भा०३॥ यस्य पुनः साधोः पिण्डपातार्थतया-आहारलाभेच्छया गृहपतिकुलं प्रविष्टस्य गुडौदनपिण्डयोरुपलक्षणत्वादन्यपिण्डस्य सम्प्राप्तिर्भवति, तदुभयपिण्डं-गुणनिष्पन्नसमयप्रसिद्धपिण्डशब्दवाच्यमुक्तवन्तस्तीर्थकरगणधराः, पिंडेहित्ति, अत्र प्राकतत्वात् षष्ठ्यर्थे तृतीया ॥३॥ उभयातिरिक्तं प्रतिपादयतिउभयाइरित्तमहवा अन्नपि हु अस्थि लोइयं नाम । अत्ताभिप्पायकयं जह सहिगदेवदत्ताई ॥भा०४॥ 'अथवे 'ति, प्रकारान्तरे उभयातिरिक्तं-गौणसमय(ज)विभिन्नं, अन्यदपि लोकप्रसिद्धं लौकिकं-आत्माभिप्रायकृतं नाम, अनुभयजं भवतीति, यथा सिंहकदेवदत्तादिनामानि ॥ ४ ॥ ननु नियुक्तिगाथायामनुमयजस्यानुक्तत्वादिह व्याख्यानमनुचितमिति चेन्नैवमपिशब्देन तत्रापि सूचितत्वात्तथा चाह भाष्यकार:गोण्णसमयाइरिचं इणमन्नं वाऽवि सूइयं नाम। जह पिंडउत्ति कीरइ कस्सइ नामं मणूसस्स ॥भा०५॥ इदं पिण्ड इति नाम अन्यद्वा गौणसमयातिरिक्तं, अपिशब्दात् सूचितमस्ति, यथा कस्यापि मनुजस्य पिण्ड इति नाम क्रियते, तच्चान्यद्रव्यसंयोगाभावात् , शरीरावयवयोगाविवक्षणान गौणं नापि समयकृतं, अत उभयातिरिक्तमिति ॥५॥ ननु समयकृतोभयातिरिक्तयोर्न कोऽपि विशेष उभयत्राप्यन्वर्थविकलत्वादात्माभिप्रायकृतत्वादिति चेन्नवैमित्याह ॥२॥ Jain Education Internal For Private & Personel Use Only w.jainelibrary.org Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तुल्लेवि अभिप्पाए समयपसिद्धं न गिण्हए लोओ। जं पुण लोयपसिद्धं तं सामइया उवचरंति ॥ भा०६ ॥ पदैकदेशे पदसमुदायोपचारात्, अभिप्राये - अभिप्रायकृतत्वे तुल्येऽपि समयप्रसिद्धं नाम लोको न गृह्णाति, न हि कापि समुद्देशशब्देन समयप्रसिद्धेन भोजनादिकं लोको व्यवहरति, यत्पुनर्लोकप्रसिद्धं तत् सामयिका उपचरन्ति ॥ ६ ॥ अथ मूलसूत्र, स्थापनापिण्डं वक्ति raise वाकट्ठे पुत्थे व चित्तकम्मे वा । सब्भावमसब्भावं ठवणापिंडं वियाणाहि ॥ ७ ॥ अक्षेarch - कपर्दे वाशब्दोऽङ्गुलीयकादिसमुच्चयार्थः, काष्ठे, पुस्ते- ढिउल्लिकादौ, वाशब्दो लेप्यपाषाणसमुच्चये, चित्रकर्म्मणि वा सद्भावमसद्भावं चाश्रित्य स्थापनापिण्डं विजानीहि तत्र सत्तद्भावः सद्भावः, स्थाप्यमानस्येन्द्रादेरनुरूपतया चिह्नादिना यद्दर्शनाद्विद्यमान इवेन्द्रादिर्ज्ञायते स सद्भावः, इतरस्त्वसद्भावः अयं भावः यदा अक्षकपर्दादय एकत्र पिण्डवेन स्थाप्यन्ते, यथा एष पिण्डः स्थापित इति, तदा तत्रापि पिण्डाकारस्योपलभ्यमानत्वात् सद्भावः, या एकस्मिन्नक्षे वराटके वा पिण्डत्वेन स्थापना तदा पिण्डाकारस्यानुपलभ्यमानत्वाद् अक्षादिगतपरमाणूनामविवक्षणात् असद्भाव इत्यादि ॥ ७ ॥ एतदेव भाष्यकृद्गाथयाह hi अभावे तिण्हं ठवणा उ होइ सब्भावे । चित्तेसु असब्भावे दारुअलेप्पोवले सियरो ॥ भा०७॥ एकोऽक्ष उपलक्षणत्वाद्वराटकादिर्वा पिण्डत्वेन स्थाप्यमाना असद्भावे, यदा त्रयाणामक्षाणां वराटकादीनां वा परस्परं स्थापनापिण्ड स्वरूपम् । Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयावचूर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः । ॥ ३ ॥ Jain Education Inter संश्लेषकरणात् पिण्डत्वेन स्थापना तदा सद्भावे स्थापना, पिण्डाकृतेरुपलभ्यमानत्वात्, त्रयाणां चेति उपलक्षणं, तेन द्वयोरपि बहूनां वा योगे ज्ञातव्यं, तथा चित्रेषु यदै कबिन्द्रालेखनेन पिण्डस्थापना तदाऽसद्भावे, यदा त्वनेक बिन्द्रा लेखनेन प्रभूतद्रव्यात्मका स्थापना तदा सद्भावे । तथा दारुकले प्योपलेषु पिण्डाकृतिसम्पादनेन या पिण्डस्य स्थापना सा (स) इतर:सद्भावस्थापनापिण्डः, तत्र पिण्डाकारस्य दर्शनात् ॥ ७ ॥ द्रव्यपिण्डमाह तिविहो उ दवपिंडो सच्चित्तो मीसओ अचित्तो य । एक्केक्स्स य एत्तो नव नव भेआ उ पत्तेयं ॥८॥ द्रव्यपिण्डस्त्रिविधः–सचित्तो मिश्रोऽचित्तच, इतो भेदत्रयानन्तरं एकैकस्य भेदस्य नव २ मेदा ज्ञातव्याः || ८ || नव भेदानाह पुढवी आउक्काओ तेऊ वाऊ वणस्सई चेव । बेइंदिय तेइंदिय चउरो पंचेंदिया चैव ॥ ९ ॥ सुगमा, नवरं पिण्डशब्दः पूर्वगाथातोऽनुवर्तमानोऽत्र प्रत्येकं सम्बध्यते ॥ ९ ॥ प्रत्येकं भेदानाह— पुढवीकाओ तिविहो सच्चित्तो मीसओ य अच्चित्तो। सच्चित्तो पुण दुविहो निच्छयववहारओ चैव ॥१०॥ सुगमा, नवरं निश्वयतो व्यवहारतश्च सचितः पुनर्द्विविधो भवति ॥ १० ॥ निश्वयंव्यवहारस्वरूपमाहनिच्छयओ सच्चितो पुढविमहापद्ययाण बहुमज्झे । अचित्तमीसवज्जो सेसो ववहारसच्चित्तो ॥ ११ ॥ धर्मादिपृथ्वीनां मेर्वादिमहापर्वतानां बहुमध्यभागे निश्चयतः पृथ्वीकाय: सचित्तः स्यात्, अचित्तमिश्रौ वक्ष्यमाणमेदौ द्रव्यपिण्डप्रकाराः । ॥ ३॥ Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ब सचिचाचित्तमित्र पृथ्वीस्वरूपम्। वर्जयित्वा शेषभूम्यादिस्थितो व्यवहारसचित्त इति ॥ ११॥ अथ मिश्रमाहखीरदुमहे? पंथे कट्ठोले इंधणे य मीसो उ। पोरिसि एग दुग तिगं बहुइंधणमज्झथोवे य ॥१२॥ क्षीरखुमा-वटाश्वत्थादयस्तेषामधः पृथ्वीकायो मिश्र इति, तत्र वृक्षमाधुर्येण शस्त्रत्वाभावात् कियान् सचिचः शीतादिशस्त्रसम्भवात कियानचित्त इति, पथि ग्रामनगराद्धहिस्तत्रापि गन्त्रीचक्रादिभिरुत्खातः कियान सचित्तः कियानचित्त इति सर्वत्र भावनीयम् , कृष्टो-हलविदारिता, तथा आर्दो-जलमिश्रो, यतो जलं पृथ्वीकायोपरि निपतत् कियन्तं पृथ्वीकार्य शस्त्रत्वेनाचित्तीकरोतीति मिश्र उच्यते, तथा इन्धने गोमयादौ मिश्रस्तथाहि गोमयादिकमिन्धनं सचित्तपृथ्वीकायस्य शस्त्रं, | अत्रेन्धने च कालमानमाह-'पोरिसी 'त्यादि, बहिन्धनमध्यगत एका पौरुषी यावन्मिश्रा, मध्यमेन्धनसंयुक्तस्तु पौरुषीद्विकं, अल्पेन्धनसंपृक्तश्च पौरुषीत्रिकं यावन्मिश्रः पृथ्वीकायः ॥ १२॥ अथाचित्तमाहसीउण्हखारखत्ते अग्गीलोणूसअंबिलनेहे । वुकंतजोणिएणं पयोयणं तेणिमं होइ ॥ १३ ॥ | प्राकृतत्वादत्र सप्तमी तृतीयार्थे ज्ञेया, शीतोष्णक्षारक्षत्रेण-शीतं प्रतीतं, उष्णः-सूर्यादितापः, क्षारः प्रसिद्धः क्षत्रंकरीषविशेषः, एतैस्तथा अग्निः लवणं ऊपः-ऊषरादिक्षेत्रोद्भवलवणिमा, अम्लं-काञ्जिकं, स्नेहा-तैलादिः, एतैश्चाचित्त पृथ्वीकायो भवति, एतेषां शस्त्ररूपत्वात् , तथा सामान्येनापि पृथ्वीकायस्य चतुर्द्धाऽचित्त(ता)भवनं जायते-द्रव्यतः क्षेत्रतः कालतो | भावतच, द्रव्येण शस्त्रभूतेन द्रव्यता, क्षेत्रेण योजनशतातिक्रान्त्या मधुरादिक्षेत्रोत्पन्नस्यान्यक्षेत्रसंक्रान्त्या च शस्त्ररूपेण Jain Education Inter anww.jainelibrary.org Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीया वचूर्युपेता श्री पिण्डनिर्युक्तिः । 118 11 Jain Education Intern क्षेत्रतः, कालतः स्वायुःक्षयेण, कालज्ञानं [च] (न) छद्मस्थानां, भावतो वर्णादिपरावर्त्तेनेति, अचित्तपृथ्वीकाय इति । प्रयोजनमाह-व्युत्क्रान्ता - अपगतयोनि ः- जीवानामुत्पत्तिर्यत्र तेन व्युत्क्रान्तयोनिना- प्रासुकेन पृथ्वीकायेनेदं वक्ष्यमाणं प्रयोजनं भवति, साधूनामिति ॥ १३ ॥ तदेव दर्शयति अवरद्धिगविसबंधे लवणेन व सुरभिउवलएणं वा । अच्चित्तस्स उ गहणं पओयणं तेणिमं वऽन्नं ॥ १४ ॥ अपराद्धिको लूतास्फोटः सपदिदेशो वा विषं प्रतीतं तयोरुपशमनायाचित्तपृथ्वीकायबन्धनं लवणेन प्राशुकेन भोजनादौ, अथवा सुरम्युपलेन-गन्धपाषाणेन प्रयोजनं, तेन हि पामाप्रसूति (त) वातादिघातः क्रियते, ग्रहणं त्वचित्तपृथ्वी कायस्य नान्यस्येति वा, अथवा तेन पृथ्वी कायेनेदमन्यत् प्रयोजनं वक्ष्यमाणम् ॥ १४ ॥ तदेवाह - ठाणनिसियणतुण उच्चाराईण चेव उस्सग्गो । घुट्टगडगलगलेवो एमाइ पओयणं बहुहा ॥१५॥ स्थानमचित्तपृथिव्यां कायोत्सर्गकरणं निपीदनं-उपवेशनं स्वग्वर्त्तनं स्वापः, उच्चारादीनां पुरीषप्रश्रवणादीनां चोत्सर्ग :परिष्ठापनं घुट्टको - लेपितपात्राणां घुण्टनपाषाणः, डगलकानि प्रतीतानि, लेप:- पाषाणादिनिष्पन्नः, एवमाद्यचित्तपृथ्वीकायेन बहुधा प्रयोजनं स्यादिति ।। १५ ।। अथाष्काय पिण्डमाह- आउक्काओ तिविहो सच्चित्तो मीसओ य अञ्चित्तो। सच्चित्तो पुण दुविहो निच्छयववहारओ चैव ॥ १६ ॥ पृथ्वीकायाधिकारवत् व्याख्येया ॥ १६ ॥ निश्चयव्यवहार भेदावष्काये दर्शयति पृथ्वीकायप्रयोजनम् । ॥ ४ ॥ Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ घणउदही घणवलया करगसमुद्दद्दहाण बहुमज्झे । अह निच्छयसच्चित्तो ववहारनयस्स अगडाई ॥१७॥ सचित्तादिघनोदधयो घनवलया नरकस्थाः , करकाः प्रतीता, तथा समद्रद्रहाना बहमध्यभागेऽप्कायाः 'अह ति, एप सर्वोऽपि जलकायअप्कायो निश्चयसचित्तः, व्यवहारनयमतेन "मश्चाः क्रोशन्ती"ति युक्त्या अवटादिरवट:-कूप आदिशब्दाद्वाप्यादिपरिग्रहः, निरूपणम् । तत्र संस्थितोऽप्कायः सचित्तः स्यादिति ॥ १७॥ मिश्रमाह| उसिणोदगमणुवत्ते दंडे वासे य पडियमित्तंमि । मोत्तूणादेसतिगं चाउलउदगेऽबहुपसन्नं ॥ १८॥ IN अत्र जातावेकवचनं, ततोऽनुद्वत्तेषु असम्पूर्णेषु त्रिषु दण्डेषु-उत्कालेषु यदुष्णोदकं तन्मिश्रमिति, वर्षे-वृष्टौ पतितमात्रे यजलं तच्च, तथा आदेशत्रिक-मतत्रिक मुवा तन्दुलोदकं अबहुप्रसन्न-नातिस्वच्छीभूतं, मिश्रमित्यर्थः, आस्वादकारना प्रश्लेषोऽबहित्यत्र कार्यः ॥ १८ ॥ मतत्रिकं दर्शयतिभंडगपासवलग्गा उत्तेडा बुब्बुया न संमंति । जा ताव मीसगं तंदला य रज्झंति जावऽन्ने ॥१९॥ तन्दुलोदके तन्दुलप्रक्षालनानन्तरं प्रक्षालनभाजनादन्यभाजने प्रक्षिप्यमाणे भाजनस्य पावें ये उत्तेडा-बिन्दवो लग्नास्ते यावन्न शाम्यन्ति-विध्वंसमुपगच्छन्ति, तावत्तन्दुलोदकं मिश्रमित्येके १, अपरे पुन:-माजनादन्यभाजने तन्दुलप्रक्षालनजले क्षिप्यमाणे जलोपरि ये बुद्बुदा जातास्ते यावन्न शाम्यन्ति तावत्तन्दुलोदकं मिश्रमिति २, पुनरन्ये इत्थमाहुः-तन्दुलप्रक्षालनानन्तरं राद्धमारब्धाः, ते यावन्न राध्यन्ति-सिध्यन्तीति तावत्तन्दुलोदकं मिश्रमिति ३ ॥१९ ॥ एषां दूषणान्याह Jan Educh an interation ___ Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयावचूर्युपेता अप्काबप्रयोजनम्। श्री. पिण्डनियुक्तिः। एए उ अणाएसा तिन्निवि कालनियमस्सऽसंभवओ।लक्खेयरभंडगपवणसंभवासंभवाईहिं॥२०॥ तुशब्द एवकारार्थे भिन्नक्रमश्च, तत एते त्रयोऽप्यनादेशा एव, कुत ? इत्याह-कालनियमस्यासम्मवात, न हि विन्द्वपगमादौ कालनियममिति कथमित्याह-रूक्षेतरभाण्डपवनसम्भवासम्भवादिभिः, आदिशब्दाचिरकालसलिलभिन्नत्वाभिन्नत्वादिपरिग्रहः, अयं भावः-प्रथमादेशवादिनां मते रूक्षे भाजने शीघ्र बिन्दवः शोषमुपयान्ति, स्निग्धे च चिरकालं तिष्ठन्ति, ततः संशय एव, द्वितीयादेशवादिना तु मते बुद्दा अपि खरपवनेन झटिति शाम्यन्ति, पवनाभावे तु चिरमपि तिष्ठन्ति, ततः संशय एव, तृतीयादेशवादिनां मते तु तन्दुलाश्चिरकालजलभिन्ना इन्धनादिसामग्रीयुक्ताः शीघ्रमेव निष्पद्यन्ते, शेषास्तु मन्दं, ततस्तथैव निर्णयाभाव इति, इत्थं त्रयोऽप्यनादेशा एवेति ॥ २० ॥ प्रवचनाविरोधी क आदेशः प्रमाणमित्याहजाव न बहुप्पसन्नं ता मीसं एस इत्थ आएसो । होइ पमाणमचित्तं बहुपसन्नं तु नायवं ॥ २१॥ | ____ यावत्तन्दुलोदकं न बहुप्रसन्न-नातिस्वच्छीभूतं तावन्मिश्रं ज्ञेयं, एषोऽत्रादेशः प्रमाण, न शेषो भवतीति, यत्तु बहुप्रसन्नंअतिस्वच्छीभूतं तदचित्तं ज्ञातव्यम् ॥ २१ ॥ अचित्तमेवाहसीउण्हखारखत्ते अग्गीलोणूसअंबिलनेहे । वुक्कंतजोणिएणं पओयणं तेणिमं होइ ॥२२॥ ___अकायाभिलापेन प्रागिव व्याख्येया ॥ २२ ॥ प्रयोजनमाहपरिसेयपियणहत्थाइधोवणं चीरधोवणं चेव। आयमण भावधुवणं एमाइ पओयणं बहुहा ॥ २३॥ ॥५॥ Jain Education inten For Private Personel Use Only Drww.jainelibrary.org Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्षाकाले वस्त्राधालने अन्यकाले वस्त्रक्षालने दोषाः परिषेको-दुष्टवणादौ पानहस्तादिधावनं चीरधावनं चेव आचमनं-शौचकरणं, भाजनधावन, अचित्ताकायेनैवमादि बहुधा प्रयोजनं स्यादिति, चीरधावनं-वस्त्रप्रक्षालन, भिन्नविभक्तिनिर्देशात् ।। २३॥ वर्षाकालासन्ने कार्यमन्यदा दोषसम्भवात्तान् दोषानाहउउबद्ध धुवण बाउस बंभविणासो अठाणठवणं च ।संपाइमवाउवहो पावण भूओवघाओय ॥२४॥ ___ ऋतुबद्धे-वर्षाव्यतिरिक्ते काले धावनं वस्त्राणां चरण बकुशं भवति, यद्वा बाकुशिको-विभूषाशील इत्यर्थ, ब्रह्मविनाशः अस्थानस्थापनं लोकरयं कामीत्यस्थानस्थापनं 'K कैरयं कामीत्यस्थानस्था > क्रियते, सम्पातिमानां मक्षिकादिजीवानां वायोश्च वधः प्लावनेन-प्रक्षालनजलपरिष्ठापनेन आत्मोपघातो-भूतविनाशः स्यात् ।। २४ ॥ नन्वेते दोषा अन्यकाले यथा तथा वर्षाकालेऽपि ?, नैव, तत्रापालने दोषानाहअइभार चुडण पणए सीयलपाउरणऽजीरगेलपणे। ओहावणकायवहो वासासुअधोवणे दोसा॥२५॥ मलीमसस्य वस्त्रस्याधावने वर्षासु "गङ्गायां घोष" इति न्यायेन वर्षासने काले एते दोषाः स्युः, क इत्याह-अतिभारो भवति जलार्द्रमलयुक्तवस्त्रस्य, चुडणं-जीर्णता जायते, पनको-वनस्पतिविशेष उत्पद्यते, जलेन शीतलवाससां प्रावरणे भुक्ता. ऽजीर्णतया ग्लानत्वं जायते, तथा चापभ्राजना-अवज्ञा जिनमते, यथाऽमी साधवो वर्षासु मलाक्तवस्त्रपरिधाने मान्यं जायते. १ अस्यां प्रतौ सर्वत्र <> एतचिह्नमध्यवर्ती पाठः सु० प्रतावेव । Jain Education Inte? For Private & Personel Use Only Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयावचूर्युपेता श्री पिण्ड नियुक्तिः। इत्येतदपि न बुध्यते कुतः स्वर्गापवर्गादिज्ञानमिति, मलिनवस्त्रे कायवधो-ऽप्कायविनाशः स्यात् ।।२५॥ धावनविधिमाह- प्रक्षालनअप्पत्तेच्चिय वासे सवं उवाहि धुवति जयणाए। असइए उदवस्स य जहन्नओ पायनिज्जोगो ॥२६॥ विधिः। वर्षाकाले अप्राप्त एव सर्वमुपधि यतनया प्रक्षालयन्ति, उदकस्य वसति-अमावे जघन्यतः पात्रनिर्योगः प्रक्षालनीय: ॥ २६ ॥ किमयं नियम एव नेत्याहआयरिय गिलाणाण यमइला मइला पुणोविधावति।माह गुरूण अवण्णो लोगंमि अजीरणं इयरे॥२७॥ ___आचार्याणां ग्लानानां च मलिनानि २ वस्त्राणि पुनः २ प्रक्षाल्यन्ते, कारणमित्याह-मा भवतु गुरूणामवज्ञा लोके, इतरे-ग्लानेऽजीणं मा भवत्विति ॥ २७ ॥ अथ ये सततोपयोग्युपकरणविशेषास्तेषां धावनविधिमाहपायस्स पडोयारो दुनिसिज तिपट्ट पोत्ति रयहरणं। एए उन वीसामे जयणा संकामणा धुवणं ॥२८॥ पात्रप्रत्यवतारा-पात्रवजों(जः पात्र ) नियोगः, द्वे निषद्ये एकाभ्यन्तरा वस्त्रमयी कम्बलमयी बाह्यापरा रजोहरणसत्का निषद्या द्वयी ज्ञेया, त्रयः पट्टाः-संस्तारकपट्ट उत्तरपट्टश्वोलपट्टश्चेति, पोत्ति-मुखपोतिका, रजोहरण, एतानुपकरणविशेषान् न विश्रमयेत्-अपरिभोग्यान् स्थापयेत् , प्रत्यहमुपयोगभावात् , यतनयाऽन्यवस्त्रेषु षट्पदिकानां सङ्क्रमणं कुर्यात् , ततो धावनम् ॥ २८॥ भाष्यगाथात्रयेणैनां माथां व्याख्यानयतिपायस्स पडोयारो पत्तगवज्जोय पायनिजोगो। दोन्नि निसिज्जाओ पुण अभितर बाहिरा चेव भा०cudi Jain-Education Intemap M w .jainelibrary.org Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सुगमा ।। ८॥ विश्रामणासंथारुत्तरचोलग पट्टा तिन्नि उ हवंति नायवा। मुहपोत्तियत्ति पोत्ती एगनिसेजं च रयहरणं ॥भा०९॥ || प्रकारः एए उन वीसामे पइदिणमुवओगओय जयणाए।संकामिऊण धोवंति छप्पइया तत्थ विहिणाउ॥१०॥ एता व्याख्यातार्था एव, नवरं षट्पदिका अन्यत्र सङ्कमय्य तत्र विश्रामाभावे विधिना वस्त्राणि प्रक्षालयन्ति ॥९-१०॥ विश्रामणाविधिमाह जो पुण वीसामिजइ तं एवं वीयरायआणाए। पत्ते धोवणकाले उवहिं वीसामए साहू ॥२९॥ ___यः पुनरुपधिर्विश्रम्यते < अपरिभुक्तो ध्रियते तं उपधिधावनकाले प्राप्ते सति वीतरागाज्ञया एवं साधुर्विश्रमयेत् >॥ २९ ॥ विश्रामणाप्रकारमाहअभितरपरिभोगं उवरि पाउणइ नाइरेय तिन्निय तिन्नि य एग निसिं तु काउं परिच्छिज्जा ॥३०॥ साधूनां त्रयः कल्पा:-द्वौ क्षौमी एकः कम्बला, तत्र रात्रौ स्वपन अभ्यन्तरपरिभोगं सदैव शरीरेण संलग्नं परिभुज्यमानं क्षौमं कल्पमुपरि शेषकल्पद्वयात्रीणि दिनानि यावत् प्रावृणोति, येन तत्रस्थाः षट्पदिकाः कल्पद्वये शरीरे वा लगन्ति, एष प्रथमविधिः, ततस्त्रीणि दिनानि यावन्नातिदूरे संस्तारकासन्ने स्थापयति, एष द्वितीयः, एका निशा, तु:-समुच्चये, स्वापस्थानोपरि लम्बमानं शरीरलग्नप्रायः (पाद)पर्यन्तं कृत्वा स्थापयेत् , ततः परीक्षेत-दृष्ट्या प्रावरणेन च दृष्ट्या निभाल्य शरीरे Jain Education in For Private & Personel Use Only Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जलग्रहणविधिः क्षमा रत्नीयावर्युपेता श्री पिण्ड नियुक्तिः। प्रावृणोति ॥ ३० ॥ एवं सप्तमिर्दिनैः कल्पशोधना कार्या एतदनुसारेण शेषोपकरणस्यापि एतदर्थभूचिका भाष्यगाथाधोवत्थं तिन्नि दिणे उरि पाउणइ तह य आसन्नं । धारेइ तिन्नि दियहे एगदिणं उवरि लंबतं ॥भा०११॥ __ व्याख्यातार्था ॥ ११ ॥ अथ मतान्तरमाहकेई एक्केकनिसिं संवासेउ तिहा परिच्छंति । पाउणइ जइ न लग्गति छप्पइया ताहि धोवंति ॥३१॥ केपीत्थमाहुः-एकैकनिशां त्रिधा उपरि प्रावरणासन्नस्थापनोपरिलम्बनप्रकारेण संवास्य ततः परीक्षन्ते-दृष्ट्या निमालयन्ति, ततः शरीरे प्रावृष्यन्ति, ततोऽपि यदि षट्पदिका न लगन्ति शरीरे, ततो धावयन्ति-प्रक्षालयन्ति ॥३१॥ अथ जलग्रहणविधिमाहनिवोदगस्स गहणं केई भाणेसु असुइ पडिसेहो। गिहिभायणेसु गहणं ठिय वासे मीसग छारो ॥३२॥ यद्यप्राप्ते वर्षाकाले धावनिका न कृता तदा प्राप्ते सति वस्त्रधावनार्थ नीबोदकस्य ग्रहणं कर्त्तव्यं, केऽप्याहुः-भाजनेषुस्वपात्रेषु ग्रहीतव्यं, आचार्य आह-अशुचिरिति लोकगर्दादिदोषात् प्रतिषेधः, स्वपात्रेषु>गृहस्थभाजनेषु कुण्डकादिषु ग्रहण कार्यम् , परं स्थिते वृष्टौ निवृत्तायां अन्तर्मुहूर्ताद्धमिति गम्यते, कुत इत्याह-वृष्टौ सत्यां तन्मिश्रमेव भवतीति,< गृहीते च मध्ये क्षारः प्रक्षेपणीयो येन भूयः सचित्तं न स्यात्, क्षारेण च समलमपि जलं प्रसन्नतां भजतीति >॥ ३२ ॥ अथ धावनिकाक्रममाह Jain Education Intel For Private & Personel Use Only Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रक्षालन गुरुपच्चक्खाणिगिलाणसेहमाईण धोवणं पुवं । तो अप्पणो पुवमहाकडे य इयरे दुवे पच्छा ॥ ३३ ॥ पूर्व गुरूणां, ततः प्रत्याख्यानिनां-क्षपकादीनां तदनन्तरं ग्लानानां, ततः शैक्षा-नवदीक्षिकास्तेषां, तत आत्मनो वस्त्राणि क्रमेण प्रक्षालयेत् गुर्वादीनां>च, वासांसि त्रिधा जायन्ते, तद्यथा-यथाकृतानि अल्पपरिकर्माणि बहुपरिकर्माणि च, यानि यथालब्धान्येव न सीवनादिपरिकर्मयुक्तानि तानि यथा कृतानि, एकवारं द्विधा कृत्वा सीवितान्यल्पपरिकर्माणि, बहुधा खण्डित्वा सीवितानि बहुपरिकर्माणि, तत्रापि धावनक्रममाह-'पुव्व 'त्ति, पूर्व-प्रथमं सर्वेषामपि यथाकतानि वासांसि धावयेत्-प्रक्षालयेत् , पश्चात् क्रमेण इतरे द्वे, किमर्थमिति !, चेदुच्यते-विशुद्धपरिणामवृद्धयर्थ, यथाकृतेषु वस्त्रेषु प्रक्षाल्यमानेषु मनागपि पलिमन्थदोषाभावा[न] संयमबहुमानभाववृद्धिर्जायते ॥ ३३ ॥ प्रक्षालनक्रियामाहअच्छोडपिट्टणासु य न धुवे धोए पयावणं न करे। परिभोग अपरिभोगे छायायव पेह कल्लाणं॥३४॥ अच्छोट्टनपिट्टनाभ्यां वस्त्राणि न प्रक्षालयेत् , तत्राच्छोटनं-रजकैरिवास्फालनं, पिट्टन-कुट्टनं, ताभ्यां धौते-प्रक्षालिते प्रतापन-अग्निपरि न कुर्यात् , कथं वस्त्रशोषण कुर्यादित्याह-परिभोग्यानि अपरिभोग्यानि च वस्त्राणि यथाक्रमं छायाऽऽता. पयोः शोषयेत् , आर्षत्वाद् विभक्तिलोपः, तानि शोषार्थ विसारितानि पेहत्ति-प्रेक्षेत, येन तस्करा नापहरन्ति, धावनिकायां वायुविराधनारूपोऽन्यो वा कोऽप्यसंयमः संभाव्यते, गुरुणा शुद्ध्यर्थ कल्याणसचं प्रायश्चित्तं देयं साधोः ॥३४॥ तेजस्कायपिण्डमाह For Private & Personel Use Only Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयावचूर्युपेता श्री पिण्डनिर्युक्तिः ॥ ८ ॥ Jain Education Inter तिविहो तेउक्काओ सच्चित्तो मीसओ य अच्चित्तो। सच्चित्तो पुण दुविहो निच्छयववहारओ चेव ॥३५॥ पूर्ववत् तेजस्कायाभिलापेन व्याख्येया ॥ ३५ ॥ निश्चयव्यवहाराभ्यां द्वैविध्यं दर्शयति इट्ठगपागाईणं बहुमज्झे विज्जुमाइ निच्छयओ । इंगालाई इयरोत्ति मुम्मुरमाईड मिस्सो उ ॥ ३६ ॥ इष्टका पाकादीनां बहुमध्यभागे विद्युदादि - विद्युदुल्काप्रमुखतेजस्कायो निश्चयतः सचितोऽङ्गारादिरितरो व्यवहारतथ, अथ मिश्रमाह-मुर्मुरादिर्मिश्रव भवति ॥ ३६ ॥ अचित्तमाहओयणवंजणपाणगआया मुसिणोद्गं च कुम्मासा | डगलगसरक्खसूई पिप्पलमाई उउवओगो ॥३७॥ ओदनः - शाल्यादि भक्तं व्यञ्जनं-तीमनादि पानकं काञ्जिकं, तत्रोष्णावश्रावणक्षेपापेक्षयाऽग्निकायता, आयाम - अवश्रावणमुष्णोदकं - त्रिदण्डोल्कालितजलं, एतेषां समाहारद्वन्द्वः, चकारान्मण्ड कादि, कुल्माषाः - पक्का माषाः, एते चौदना - दयोsग्निकात्वेनाग्नयो व्यपदिश्यन्ते, भवति चैवं व्यवहारो, यथा-द्रम्मो भक्षितोऽनेनेति, ओदनादयश्चाचित्तास्ततोऽचित्ताग्निकात्वेन कथिताः, तथा डगलकानि प्रतीतानि, सरजस्को - भस्म सूची- लोहमयी, यथा- रक्षया भस्मना सह सूची सरक्षा - सूची, पिप्पलकः किञ्चिद्वक्रः क्षुरविशेषः, इत्यादिरचित्ताग्निकायो ज्ञेयः, प्रयोजनमाह - एतेषामोदनादीनामुपयोगो भवति भोजनादौ ॥ ३७ ॥ वायुकाय पिण्डमाह वाउक्काओ तिविहो सच्चित्तो मीसओ य अश्चित्तो। सच्चित्तो पुण दुविहो निच्छ्यववहारओ चेव ॥ ३८ ॥ अचिचोऽग्निः Page #57 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सचित्वादिः वायु: पूर्ववद्वायुकायामिलापेन व्याख्येया॥१८॥ वायौ व्यवहारनिश्चयमतं दर्शयतिसवलय घणतणुवाया अइहिम अइदुहिणे य निच्छयओ। ववहार पाइणाई अकंताई य अच्चित्तो॥३९॥ सह वलयैर्वर्तन्ते इति सवलया नरकस्थापनवातास्तनुवाताः, तथा अतिहिमे निपतति, अतिदुर्दिने मेघान्धकारे च | यो वायुः सर्वोऽपि निश्चयतः सचित्तः, प्राचीनादिः-पूर्वादिदिग्वातो व्यवहारतः सचित्तः, तथा आक्रान्तादिको वक्ष्यमाणपञ्च. प्रकारोऽचित्त इति ॥ ३९ ॥ आक्रान्तादिस्वरूपमाहअकंतधंतघाणे देहाणुगए य पीलियाइसु या अच्चित्त वाउकाओ भणिओ कम्मट्रमहणेहिं॥४०॥ कईमे स्वपादेनाक्रान्ते चिदिति-शब्दं कुर्वन् यो वायुः, यश्चाध्माते मुखवातभृते इत्यादौ यो वा घाणे-तिलपीडनयन्त्रे, यो देहानुगत:-श्वासनिश्वासरूपः, पीलितं-सजलं वस्त्रादि, तेषु यो वात एष सर्वोऽप्यचित्तः, पश्च प्रकारो वातः कष्टिमथनैर्भणितः ॥ ४० ॥ सम्प्रति मिश्रं प्रतिपिपादयिषुः इत्यादिस्थस्याचित्तवायोर्जले स्थितस्य क्षेत्रमाश्रित्य स्थले स्थित. स्य (च) कालमाश्रित्याचित्वादिविभागमाहहत्थसयमेग गंता दइओ अच्चित्तु बीयए मीसो।तइयंमि उ सच्चित्तो वत्थी पुण पोरिसिदिणेसु ॥४१॥ ____ अज्ञापश्वोरन्यतरंशरीरचर्मणा निष्पन्नो दृतिः, स चाचित्तमुखवातभृतो दवरकेण गाढबद्धमुखो नद्यादिजले प्लाव्यमानो यावद्धस्तशतमेकं याति तावत् स वातोऽचित्तो, द्वितीयहस्तशतप्रारम्भ प्रान्तं यावन्मिश्रः, ततस्तृतीयशते सचित्त एव, अथ Jain Education Inter For Private & Personel Use Only Tww.jainelibrary.org Page #58 -------------------------------------------------------------------------- ________________ SANA क्षमा रत्नीयावर्युपेता अचित्तवायुप्रयो जनम् श्री पिण्ड नियुक्तिः परमपि तथैव, उपलक्षणत्वादस्तिरपि दृतिबज्ज्ञातव्यः, नरचर्ममयो बस्तिरिति, तथा 'वत्थि 'त्ति स्थले स्निग्धं कालं रूक्षं च कालमाश्रित्य बस्तिस्थो वातः, उपलक्षणत्वात् दृतिस्थोऽपि यथाक्रमं पौरुषीषु दिनेषु चाचित्तादिरूपो ज्ञेयः॥४१॥ एनमेव गाथावयवं भाष्यकद्गाथाचतुष्टयेन व्याख्यानयतिनिद्धेयरोय कालोएगंतसिणिद्धमज्झिमजहन्नो।लुक्खोवि होइ तिविहो जहन्न मज्झो य उक्कोसो।भा१२ एगंतसिणिद्धंमी पोरिसिमेगं अचेअणो होइ । बिइयाए संमीसो तइयाइ सचेयणो वत्थी ।भा०१३॥ मज्झिमनिद्धे दो पोरिसीउ अच्चित्तु मीसओ तइए । चउत्थीए सचित्तोपवणो दइयाइ मज्झगओ॥१४॥ पोरिसितिगमच्चित्तो निद्धजहन्नंमि मीसग चउत्थी। सच्चित्त पंचमीए एवंलुक्खेऽवि दिण वुड्डी ॥१५॥ ___ इह कालो द्विविधः, सामान्यतः-स्निग्धो रूक्षश्च, स्निग्धोऽपि एकान्तस्निग्धमध्यमजघन्यभेदात्रिधा, रूक्षोऽपि | जघन्यमध्यमोत्कृष्टभेदास्त्रिधा, एकान्तस्निग्धे काले बस्तिस्थो वायुरुपलक्षणत्वात् दृतिस्थोऽपि एका पौरुषी यावदचेतनो भवति, द्वितीयायां मिश्रः, तृतीयायां सचित्त एव मध्यमस्निग्धे काले द्वे पौरुष्यौ यावदचित्तस्ततः पूर्ववदेवैकैकपौरुषीवृद्धिा, जघन्यस्निग्धे पौरुषीत्रिकमचित्तस्तत एकैकपौरुषीवृद्धिा, एवं रूक्षेऽपि काले परं तत्र दिनवृद्धिः कार्येति, यथा-जघन्यरूक्षकाले दिनमेकमचित्तो द्वितीयदिने मिश्रस्तृतीयदिने सचित्त एवेति सर्वत्र भाव्यम् ॥ १२-१५ ॥ प्रयोजनमाहदइएण वत्थिणा वा पओयणं होज्ज वाउणा मुणिणो गेलन्नमिव होजा सचित्तमीसे परिहरेजा॥४२॥ ॥९॥ Jain Education Inter For Private & Personel Use Only W w w.jainelibrary.org Page #59 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सचित्वादिः वनस्पतिः अचित्त प्रयोजनं च - दृतिना-दृतिस्थेन बस्तिना बस्तिः तेन वायुना वेति समुच्चये नद्याद्युत्तारे प्रयोजनं भवति मुनेः, अनेन जलस्थो वातो गृहीतः, अथवा ग्लानत्वे सति वायुना कार्यमिति, क्वापि रोगे इत्यादिना सगृह्य वातोऽपानादौ क्षिप्यते, अनेन स्थलस्थो गृहीतः, सचित्तमिश्रौ यत्नतः परिहरणीयौ ॥ ४२ ॥ वनस्पतिकायमाहवणस्सइकाओतिविहो सचित्तो मीसओ य अच्चित्तो। सच्चित्तो पुण दुविहो निच्छयववहारओ चेव॥४३॥ पूर्ववद्वनस्पत्यभिलापेन व्याख्येया ॥ ४३ ॥ वनस्पती व्यवहारनिश्चयमतमाहसबोऽवडणंतकाओ सच्चित्तो होइ निच्छयनयस्स । ववहारस्स य सेसो मीसो पवायरोहाई॥४४॥ निश्चयनयस्य मतेन सर्वोऽप्यनन्तकायः सचित्त इति शेषः, प्रत्येको व्यवहारसचित्ता, मिश्रमाह-मिश्रा-अम्लानलोट्टादिः, तत्र प्रम्लानः सर्वोऽपि वनस्पतिकायोऽर्द्धशुष्को ज्ञेयः, लोहा-घरट्टादिचूर्णः, तत्र काश्चिनखिकाः सचित्ता अपि सम्भाव्यन्त इति मिश्रा, आदिशब्दात्तत्कालदलितकणिक्कादिपरिग्रहः ।। ४४ ॥ अचित्तमाहपुप्फाणं पत्ताणं सरड्डफलाणं तहेव हरियाणं । वटंमि मिलाणंमी नायवं जीवविप्पजढं॥४५॥ पुष्पाणां पत्राणां शलादुफलानां-कोमलफलाना, तथा हरितानां च वृन्ते-प्रसवबन्धने म्लाने-शुष्के सति जीवविप्रमुक्तं स्वरूपं ज्ञातव्यम् ॥ ४५ ॥ अथ प्रयोजनमाहसंथारपायदंडगखोमिय कप्पा य पीढफलगाई। ओसहभसज्जाणि य एमाइ पओयणं बहुहा ॥४६॥ Jain Education in For Private & Personel Use Only w w w.jainelibrary.org Page #60 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयावचूर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः ॥ १० ॥ Jain Education Internat संस्तारकाः- शय्यापट्टादयः, पात्राणि, दण्डकाः क्षौमौ कल्पौ च पीठफलकादिकं, औषधभेषजानि च तत्रौषधानि केवलहरीतक्यादीनि, भेषजानि - तेषामेव द्वित्रिसंयोगे, एवमादि बहुधा प्रयोजनं जायते ।। ४६ ।। अथ द्वीन्द्रियादिपिण्डचतुष्टयं, तत्प्रयोजनसम्बन्धमाह - - बियतियचउरो पंचिदिया य तिप्पभिइ जत्थ उ समेंति । सट्टाणे सट्टाणे सो पिंडो तेण कज्जमिणं ॥४७॥ यत्र द्वित्रिचतुष्पञ्चेन्द्रियास्त्रिप्रभृतयः समिति-संयन्ति - एकत्र संश्लिष्टीभवन्ति स पिण्डः स्वस्थाने २ भवति, त्रिग्रहणमुपलक्षणं, तेन द्वौ द्वावपि यत्र संश्लिष्यते, यथा- द्वीन्द्रिययोगे द्वीन्द्रियपिण्ड इति, तेन द्वीन्द्रियादिपिण्डेनेदं वक्ष्यमाणलक्षणं काय भवति || ३७ || तदेवाह - बेदिपरिभोगो अक्खाण ससिप्पसंखमाईणं । तेइंदियाण उद्देहिगादि जं वा वए वेजो ॥ ४८ ॥ साधोद्वन्द्रियादीनां प्रयोजनं द्विधा - शब्देन शरीरेण च शकुनादिपरिभावनेन शब्देन, शरीरप्रयोजनं त्रिधा, सम्पूर्णेनैकदेशेन शरीरसम्पर्कसमुद्भूतेन वा केन ( किमपि ) केषाञ्चित् कदाचिदुपयोग इति, तत्र द्वीन्द्रियाणां सम्पूर्णशरीरेण प्रयोजनमाह - द्वीन्द्रियाणां परिभोगोऽक्षाणां सशुक्तिशङ्खादीनां तत्राक्षाणां समवसरणस्थापनादौ शुक्तिशङ्खानां चक्षुष्पुष्पकाद्यपनयने, इह उद्देहिकाशब्देनोद्देहि का कृतवल्मीकमृत्तिका गृह्यते, तदादिखीन्द्रियाणां परिभोगः, उद्देहिकामृत्तिका (देः) सर्पदंशादौ दाहोपशमनाय भवतीति यद्वा वैद्यः किमपि त्रीन्द्रिय शरीरादिकं बाह्यप्रलेपादिनिमित्तं वदेत् सोऽपि ॥ ४८ ॥ द्वीन्द्रि व्यादिपिण्डः तत्प्रयोजनं च ॥ १० ॥ w.jainelibrary.org Page #61 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inter चउरिंदियाण मच्छियपरिहारो आसमच्छिया चेव । पंचेंदियपिंडांमे उ अब्ववहारी उनेरइया ॥ ४९ ॥ चतुरिन्द्रियाणां परिभोगः मक्षिकाणां परिहारः- पुरीषं तेन वमननिषेधादि क्रियते, यद्वा > अश्वमक्षिका उपयुज्यन्ते, काप्यौषधे, चेवशब्दः समुच्चयार्थः, पञ्चेन्द्रियपिण्ड उपयोगविषयतया परिभाव्यमाने तिर्यगादिपिण्डो, यथासम्भवमुपयोगी, नैरयिकाः पुनः अव्यवहारिण:- अनुपयोगिन इति ॥ ४९ ॥ ( पञ्चेन्द्रिय ) तिर्यगादिपिण्डोपयोगमाहचम्मट्ठिदंतनहरोमसिंगअविलाइछगणगोमुत्ते । खीरदधिमाइयाण य पंचिदियतिरियपरिभोगो ॥५०॥ चर्मादिना पश्चेन्द्रियतिर्यक्परिभोगः स्यात्, तथा हि चर्म्मणः क्षुरलेखनादिधरणार्थं कोशकरणे, अस्थ्रो गृद्धनखिकादे', शरीरस्फोटापनोदाय दन्तस्य - शूकरदंष्ट्रायाः, दृष्टि (पु) पुष्पिकनिवारणे, नखानां काप्यौषधे, रोम्णां कम्बलादौ शृङ्गस्यमहिषसत्कस्य परिभोग इति, सर्वत्र शृङ्गं हि मार्गभ्रष्टसाधूनां मीलनाय वाद्यते, अविला-गडरिका आदिशब्दादन्येषां पशूनां anuts गोमूत्रस्य पामापमर्द्दने, क्षीरदध्यादीनां भोजने परिभोग इति ॥ ५० ॥ मनुष्यस्य सचित्तादिमेदात्रिधोपयोगमाह - सच्चित्ते पल्वावण पंथुवएसे य भिक्खदाणाई । सीसट्ठिग अच्चित्ते मीसट्ठिसरक्खपहपुच्छा ॥ ५१ ॥ सचित्ते मनुष्यप्रवाजनं दीक्षा, पथि पृष्ठे उपदेशः - कथनं, भिक्षादानादिप्रयोजनं स्यात्, अचित्ते शीर्षास्थिना तद्धि लिङ्गे रोगोपशमनाय घर्षित्वा दीयते, मिश्रे अस्थियुक्तस्य सरजस्कस्य - भस्मावगुण्ठितस्य, कापालिकस्य पथि पृष्ठा अस्थाद्यचित्तं देहश्व सचित्त इति मिश्रता ।। ५१ ।। देवतापिण्डोपयोगमाह तिर्यगादिपिण्डोपयोगः Page #62 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयावर्युपेता श्री. पिण्डनियुक्ति खमगाइ कालकज्जाइएसु पुच्छिज्ज देवयं कचि । पंथे सुभासुभे वा पुच्छेजह दिव उवओगो॥५२॥ देवताक्षपकादिभिः कोऽपि कालकार्य-मरणरूपं तदादिप्रयोजनेषु सत्सु काचिद्देवतां पृच्छेत् , पथिविषये शुभाशुभे काश्चन II पिण्डोदेवतां पृच्छेत् , एष दिव्य उपयोग इति ॥ ५२ ॥ अथ नवानां पृथ्वीकायादीनां व्यादिसंयोगे मिश्रं द्रव्यपिण्डमाह पयोग अह मीसओ य पिंडो एएसिं चिय नवण्ह पिंडाणं। दुगसंजोगाईओ नायवो जाव चरमोत्ति ॥ ५३॥ अर्थतेषामेव नवानां पिण्डानां व्यादिसंयोगात्मिको मिश्रद्रव्यपिण्डो ज्ञातव्यः, तथा हि-पृथ्वीकायोऽकायश्चेति द्विकसंयोगे प्रथमो भङ्गः, पृथ्वीकायतेजस्काय इति द्वितीयः, एवं षट्त्रिंशत् , तथा त्रिकसंयोगे चतुरशीतिः, चतुष्कसंयोगे षटविशं शतं, पञ्चकसंयोगेऽपि तथैव, षट्कसंयोगे चतुरशीतिः, सप्तकसंयोगे षट्त्रिंशत् , अष्टकसंयोगे नव, नव(क)संयोगे एकः, सर्वसङ्कथया भङ्गानां पञ्चशतानि व्यधिकानि, एतेषां च भङ्गानामानयनाय करणगाहा-" उभयमुहं रासिद्गं हिद्विल्लानंतरेण भय पढमं । लद्धह रासिविहि(भ)त्ते तस्सुवरि गुणित्तु संजोगा ॥१॥" अस्या अक्षरार्थ:-इह नवानां पदानां संयोगे भड़ा आनेतुमभिप्रेतास्ततस्तावत्प्रमाणौ द्वौ राशी उभयमुखौ स्थाप्येते, स्थापना चेयम्-२२३६५६४६१, अत्र एकस्योपरि यो नवकोऽनेन नवभङ्गा द्रष्टव्या:, न च तत्र करणगाथाया व्यापार, व्यादिसंयो(गभङ्गानयनायेव तस्याः प्रवृत्तत्वात, ततोऽधस्तने राशौ पर्यन्तवर्तिन एककस्यानन्तरेण द्विकलक्षणेनोपरितनराशौ प्रथमाई नवकरूपं भजेत् , ततो लब्धाः सार्धाचत्वारा, तेन सार्द्धन चतुष्केणाधोराशिना उपरितने प्रथमाके विभक्ते लब्धेन तस्य द्विकलक्षणस्योपरितनमङ्कमष्टकरूपं ॥११॥ Jain Education Intel For Private & Personel Use Only Page #63 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | मिश्रद्रव्य पिण्ड: गुणयेत, जाता: पढ़त्रिंशत, इत्थं च गुणयित्वा संयोगा:-संयोगभङ्गा वाच्या, यथा द्विकसंयोगे पत्रिशदिति ततो भयोऽपि त्रिकसंयोगभङ्गानयनाय प्रथमपादरहिता करणगाथा व्यापार्यते, अधस्तने राशो स्थितेन द्विकादनन्तरेण त्रिकेणोपरितन. राशिव्यस्थितं, त्रिकोपरितनसप्तकरूपाङ्कापेक्षया आद्यं षट्त्रिंशद्रूपमकं भजेत्, लब्धा द्वादशास्तैश्च अधोराशिनोपरितनेऽरू विभक्ते लब्धैस्त्रिकोपरितनमकं सप्तकं गुणयेत् , जाताश्चतुरशीतिरेतावन्तस्त्रिकसंयोगे भङ्गाः, एवं तावद्यावन्नवकसंयोगे एको भङ्गः, तथा चाह-'जाव चरिमो 'त्ति, यावन्नवकनिष्पन्न एको मिश्रपिण्डः, स च लेपमधिकृत्योपदयते, इहाक्षस्य धरि प्रक्षितायां रजोरूप: पृथ्वीकायो लगति, नदीमुत्तरतोऽप्कायः, लोहमयत्वेन धुर आत्मनस्य च घर्षणादिना तेजस्कायो यन्त्र तेजस्तन वायु'रिति, सोऽपि वनस्पतिकायोऽक्ष एव, द्वित्रिचतुरिन्द्रियाः सम्पातिमाः सम्भवन्ति, महिष्यादिचर्ममयनाडिकादेश्च घृष्यमाणस्यावयवरूपः पञ्चेन्द्रियपिण्डः, इत्थंभूतेन चाक्षस्य खञ्जनेन लेपः क्रियते इत्यसावुपयोगी, इतिशब्दो मिश्र पिण्डसमाप्तौ ॥ ५३ ॥ अथ कान्यपि मिश्रद्रव्यपिण्डस्योदाहरणानि दर्शयतिसोवीरा गोरसासव वेसण भेसज नेह साग फले।पोग्गल लोण गुलोयणणेगा पिण्डा उसंजोगे॥५४॥ सौवीर-काञ्जिकं, तच्चाऽपकायतेजस्कायवनस्पतिकायादिपिण्डरूपम्, तथाहि-तत्र तन्दुलधावनमप्कायोऽवश्रावणं तेजस्कायः तन्दुलावयवा वनस्पतिकाया, एवं सर्वत्र भावनीयम् , गोरसं-तक्रादि, आसवो-मद्यं, वेसनं जीरकलवणादि, भेषजं प्रतीतं, स्नेहो-घृतवशादि, शाका, फलं पक्कमिह ज्ञेयम्, पोग्गलं-मांसं, लवणं, गुडौदनौ, एवमने के व्यादिसंयोगे पिण्डा Jain Education in For Private & Personel Use Only Page #64 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षेत्रकालपिण्डौ क्षमा रत्नीयावर्युपेता श्री. पिण्डनियुक्तिः ॥१२॥ | भावनीयाः॥५४ ॥ अथ क्षेत्रकालपिण्डावाहतिन्नि उपएससमया ठाणट्रिइउ दविए तयाएसा। चउपंचमपिंडाणं जत्थ जया तप्परूवणया ॥५५॥ त्रयः प्रदेशाः समयाश्च सङ्गताः यथाक्रमं चतुष्पञ्चमपिण्डयोः क्षेत्रकालरूपयोः स्वरूपं स्यात् , विशेषमाह-कस्मात् | 'दविए 'त्ति, द्रव्ये पुद्गलस्कन्धरूपे, स्थान-अवगाहा, स्थिति:-कालतोऽवस्थानं, ततः स्थानस्थितित:-स्थान स्थिति चाश्रित्य यस्तदादेशः क्षेत्रकालयोर्विवक्षारूपस्तस्मादिति, यथा-एकप्रादेशिकोऽयं द्विप्रादेशिकोऽयमित्यादि व्यपदिश्यमानः क्षेत्रपिण्डः, यदा त्वेकसामयिकोऽयं द्विसामयिको वा तदा कालपिण्ड इत्यर्थः, प्रकारान्तरेण सोपचारौ क्षेत्रकालपिण्डवाहजत्थेत्ति, यत्र-बसत्यादौ यदा प्रथमपौरुष्यादौ तवप्ररूपणा-पिण्डप्ररूपणा क्रियते स पिण्डो नामादिरपि क्षेत्रमधिकृत्य क्षेत्रपिण्डः, कालमधिकृत्य कालपिण्डः, यथाऽमुकः प्रथमप्रहरादिरूपः कालपिण्ड इति ॥ ५५ ॥ ननु मूर्तेषु द्रव्येषु परस्परं संयोगतः सङ्घयावाहुल्यतश्च पिण्ड इति व्यपदेशो घटते, क्षेत्रकालयोन, यतः " खित्वं खलु आगास "मिति वचनात, क्षेत्रमाकाशं तच्च नित्याकृतकत्वात् , सदैव तथा व्यवस्थितमिति न संयोगः, कालेऽपि पूर्वापरसमययोर्विनिष्टानुत्पन्नत्वेन वार्तमानिक समय एवं प्रमाण, न तत्र संयोगः, सङ्ख्या चेति अत्रोत्तरमाहमुत्तदविएसु जुजइ जइ अन्नोऽन्नाणुवहओ पिंडो।मुत्तिविमुत्तेसुवि सो जुजइ नणु संखबाहुल्ला ॥५६॥ ननु यदि मृर्तेषु द्रव्येष्वन्योऽन्यानुवेधतः-परस्परसंयोगतः, संडबाहुल्ला इत्यनेनापि सम्बध्यते, व्यादि सङ्खथा बाहुल्य ॥१२॥ Jain Education Internation For Private & Personel Use Only Page #65 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inter तच पिण्ड इति व्यपदेशो युज्यते, तर्हि मूर्त्तिविमुक्तेष्वमूर्तेष्वपि अरूपिषु स पिण्ड इति व्यपदेशो युज्यते, तत्रापि पिण्डशब्दप्रवृत्तिनिमित्तस्य परस्परसंयोगस्य सङ्ख्याबाहुल्यस्य च सम्भवात् तथा हि क्षेत्रप्रदेशाः परस्परं नैरन्तर्यलक्षणेन सम्बन्धेन सम्बद्धा अवतिष्ठन्ते, तथा च सङ्ख्याबाहुल्यमपि, एवं कालेऽपि तच्च धर्म्मसङ्ग्रहिण्यादौ विशेषाद्विलोक्यम् ।। ५६ ।। अथ क्षेत्र पिण्डशब्दप्रवृत्या अविरोधं दृष्टान्तद्वारेण समर्थयते— जतिपसो धोतिसुवि पएसेसु जो समोगाढो । अविभागिण संबद्धो कहं तु नेवं तदाधारो ? ॥५७॥ यथा कश्चित्रिप्रदेशिकः त्रिपरमाण्वात्मकः स्कन्धस्त्रिष्वप्याकाशप्रदेशेषु अवगाढो न त्वेकस्मिन् द्वयोर्वा इत्यपि शब्दार्थः, विभागेन नैरन्तर्येण सम्बद्धः, पिण्ड इति व्यपदिश्यते, एवं त्रिप्रदेशावगाढत्रि परमाणुस्कन्ध इव तदाधारः - त्रिपरमाणुस्कन्धाधारः, प्रदेशत्रयसमुदायः कथं न पिण्ड इति व्यपदिश्यते ९, सोऽपि पिण्ड इति, उभयत्र विशेषाभावात् ॥ ५७ ॥ अथ " जत्थ जया तप्परूवणया " इति व्याचिख्यासुः, नामादिचतुर्णां पिण्डानां संयोगविभागसम्भवात् पारमार्थिकं पिण्डत्वं क्षेत्रकालयोस्तु तदभावादौपचारिकं पिण्डत्वं प्रतिपादयन्नाह - अहवा चउण्ह नियमा जोगविभागेण जुज्जए पिंडो । दोसु जहियं तु पिण्डो वणिजइ कीरए वावि ॥५८॥ ' अथवे ' ति-प्रकारान्तरे, लोके हि यत्र योगे सति विभागः कर्तुं शक्यते, तत्र पिण्डव्यपदेशः, क्षेत्रप्रदेशेषु नित्यत्वेन तथास्थितत्वाद्विभागः कर्त्तुमशक्यः, तथा कालेऽपि पूर्वापरसमययोर्विनष्टानुत्पन्नत्वेन योगाभावान्न पारमार्थिकं पिण्डत्वं क्षेत्र कालपिण्डविमर्शः । Page #66 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विरभदोपचारारकथामा, ततो नामादिदापण्डो व्या विमर्शः। श्री. क्षमा युज्यते, ततः प्रकारान्तरेणाह-चतुर्णा-नामस्थापनाद्रव्यमावपिण्डानां संयोगविभागेन पिण्डव्यपेदशो युज्यते, यथा पुरुषादिमावपिण्डरत्नीया-IN नामपिण्डस्य हस्ताद्यवयवैर्युक्तस्यापि खगादिना विभागः कत्तुं शक्यते, स्थापनायामक्षत्रिकादिसंयोगे विभागः स्यात् , द्रव्ये वचूर्युपेता गुडौदनादौ सुकर एव, भावपिण्डोऽपि भावभाववतोरभेदोपचारात्कथमपि साधादेरेव मृतॊ गृह्यते, तत्र च संयोगविभागो नामपिण्ड इवेति, क्षेत्रकालपिण्डयोस्तूक्तनीत्या न संयोगविभागौ, ततो नामादिपिण्डे उपचारः कार्य इत्येतदेवाहपिण्ड- 'दोसु'चि द्वयोः-क्षेत्रकालयोः यत्र-वसत्यादौ यदा वा प्रथमपौरुष्यादौ यो नामादिपिण्डो व्यावयेते, यद्वा यत्र गृहे नियुक्तिः। यदा वा प्रथमप्रहरादौ गुडौदनादिपिण्डो निष्पाद्यते-क्रियते स व्यावर्ण्यमानोऽथ क्रियमाणो वा गुडौदनादिपिण्डो यथाक्रम का क्षेत्रपिण्डः कालपिण्डश्च व्यपदिश्यते, यथाऽमुकवसत्यादिक्षेत्रपिण्डः प्रथमपौरुषीपिण्ड इत्यादि ॥ ५८॥ मावपिण्डमाहदुविहो उ भावपिण्डो पसत्थओ चेव अप्पसत्थो य । एएर्सि दोण्हपि य पत्तेय परूवणं वोच्छं॥५९॥ द्विविधो भावपिण्डः, प्रशस्तोऽप्रशस्तश्च, एतयोईयोरपि प्रत्येकं प्ररूपणां वक्ष्ये ॥ ५९ ॥ प्रतिज्ञातमेवाहएगविहाइ दसविहो पसत्थोचेव अप्पसत्थोय। संजमविजाचरणे नाणादितिगंच तिविहो उ॥६०॥ नाणं दंसणं तव संजमोय वय पंच छच्च जाणेजा। पिंडेसण पाणेसण उग्गहपडिमा य पिंडम्मि ॥६॥ पवयणमाया नव बंभगुत्तिओतह यसमणधम्मो या एस पसत्थो पिंडोभणिओकम्मट्टमहणेहिं ॥२॥ अपसत्यो य असंजम अन्नाणं अविरई यमिच्छत्तं । कोहायासव काया कम्मे गुत्ती अहम्मो य ॥३॥ Jain Education in For Private & Personel Use Only Page #67 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Internal गाथाचतुष्टयं लग्नं, प्रशस्तो प्रशस्तश्च मावपिण्डः, प्रत्येकमेकविधादिको दशविध इति, प्रथममेकविधो यावद्दशविध इत्यर्थः, तथैवाह - ' संजम ' त्ति, संयम एवैकः प्रकारः प्रशस्त भावपिण्ड इति शेषभेदानामत्रैवान्तर्भूतत्वात् विद्याचरणे ज्ञानक्रिये द्विप्रकारः, सम्यक्त्वं ज्ञानेऽन्तर्भूतं ज्ञानादित्रिकं ज्ञानदर्शनचारित्ररूपं तु त्रिविध इति, यो यथा प्रतिपद्यते तस्य तथा कथ्यत इति, चतुर्विधः पिण्डो ज्ञानदर्शनतपः संयमाः, पञ्चविधः पञ्च व्रतानि षड्विधः षड् व्रतानि, रात्रिभोजनस्य पृथक्करणात्, सप्तविण्डे-सप्त पिण्डेषणाः सप्तावैग्रह प्रतिमाथ, तत्र पिण्डैषणाः पानैषणाच संसृष्टादय:-“ संसेदुमसंस १ अवग्रहप्रतिमाः सप्त, अवगृह्यते इत्यवग्रहस्तस्य प्रतिमा अभिग्रहाः, तत्र पूर्वमेवैवंभूतः प्रतिश्रयो मया प्राह्यो नान्यथाभूत इति विचिन्त्य तमेव याचित्वा गृहतः प्रथमा १ | तथा यस्यैवंभूतोऽभिप्रहो भवति - अहं खल्वन्येषां कृतेऽवग्रहः प्रहीष्यामि, अन्यैव गृहींतेऽवग्रहे वत्स्यामीति द्वितीया, तत्र प्रथमा सामान्येन, इयं तु गच्छान्तर्गतानां साम्भोगिकानां चोयुक्तविहारिणां यतस्तेऽन्योsन्यार्थ याचन्ते २ । अन्यार्थमवग्रहं याचिष्ये अन्यावगृहीते तु न स्थास्यामीत्येषाऽहालन्दिकानां यतस्ते सूत्रावशेषमाचार्यादभिकान्त आचार्यार्थं तं याचन्ते ३ । अहमन्यार्थमवमहं न याचिध्ये, अन्यावगृहीते तु वत्स्यामीति, एषा गच्छ एवोयुक्तविहारिणां जिनकल्पाद्यर्थं परिकर्म कुर्वतां ४ । आत्मकृतेऽवमहं याचिध्ये न परार्थ, एषा जिनकल्पिकस्य ५ । यदीयमवग्रहं ग्रहीष्यामि तदीयमेव चेत्कटादिसंस्तारकं ग्रहीष्यामि, अन्यथोत्कटुक उपविष्टो वा रात्रि गमिष्यामीत्येषा जिनकल्पिकादेः ६ । सप्तमी स्वैषैव पूर्वोक्ता नवरं यथासंस्तृतमेव शिलादि ग्रहीष्यामि नान्यदिति ७ । २ व्याख्या- असंसृष्टा हस्तमात्राभ्यां चिन्त्या, असंसट्टे हत्थे असंसट्टे मत्ते, अखरंटिअत्ति वृत्तं भवइ, एवं गृहतः प्रथमा, भावपिण्ड विमर्शः । Page #68 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयावचूर्युपेता श्री पिण्डनिर्युक्तिः । ॥ १४ ॥ Jain Education Intern ठा उद्घड तह अप्पलेविया चैव । उग्गहिया पग्गहिया उज्जियधम्माय सत्तमिया ॥ १ ॥ अवग्रहप्रतिमा - वसतिनियमविशेषा इति, तथाऽष्टविधः पिण्डोष्टौ प्रवचनमातरः, नवविधो नव ब्रह्मगुप्तयः; तथा चेति समुच्चये, दशविधः पिण्डः श्रमणधर्म्मः क्षान्त्यादिक इति, एष प्रशस्तपिण्डो भणितः, कर्माष्टकमथनैः, अप्रशस्तं भावपिण्डमाह- अप्रशस्तो भावपिण्ड एकविधः असंयमः, अज्ञानं अविरतिश्च द्विविधः, चकारो भिन्नक्रमः, तेन मिथ्यात्वं वेत्यत्र योज्यः, ततो मिध्यात्वं चकारादज्ञानाविरती इति त्रिविधः क्रोधादयश्चत्वारः कषायश्चतुर्विधः, पञ्चाश्रवद्वाराणि प्राणतिपातादीनि पञ्चविधः, षड्विधः षट्का यहिंसा, सप्तविधः कर्म्मणि, इह कर्मशब्देन कम्र्म्मबन्धभूता अध्यवसाया गृह्यन्ते, भावपिण्डाधिकारात्, तत आयुर्वर्खाः शेषसप्तकर्मबन्धरूपाः शुभाशुभाश्वाध्यवसायाः सप्तभेदाः, अष्टविधोऽपि कर्म्मणि, तत्रापि कम्मष्टिकबन्धनाध्यवसाया इति, नवविधोऽगुप्तयो नव ब्रह्मगुप्तीनां प्रतिपक्षरूपाः, अधम्म दशविधधर्म्मप्रतिपक्षो दशविधोऽप्रशस्तो भावपिण्ड इति ।। ६०-६१-६२-६३ ॥ अथ गाथाभङ्गभयाद्विपर्ययनिर्देश: १, संसृष्टापि ताभ्यां चिन्त्या, " संसट्टे हत्थे संसट्टे मत्ते, खरंटिअत्ति वृत्तं भवइ २, उष्धृता पाकस्थानाद्यत् स्थाल्यादौ स्वयोगेन भोजनजातमुष्धृतं तत एव गृह्णतः ३, अल्पलेपाऽल्पशब्दोऽभाववाचकस्ततो निर्लेपं पृथुकादि गृहतः ४, अवगृहीता भोजनकाले भोक्तुकामस्य शरावादिना यदुपहृतं तत एव गृहतः ५, प्रगृहीता भोजनवेलायां भोक्तुकामाय दातुमभ्युद्यतेन भोक्त्रा वा स्वहस्तादिना यत्प्रगृहीतं तद्गृहतः ६, उज्झितधर्मा यत्परित्यागाईं भोजनजातमन्ये च द्विपदादयो नावकाङ्क्षन्ति तदहं त्यक्कं वा गृह्णतः ७ । पानैषणा अध्येवमेव, नवरं चतुर्थ्यामायामसौवीरादि निलैपं ज्ञेयम् ( एते टिप्पणके आगमोद्धारकसम्पादितपिण्डनिर्युतित उद्धृते प० २५ ) भावपिण्डविमर्शः । ॥ १४ ॥ Page #69 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रशस्ता प्रशस्तयोर्लक्षणमाह झइ य जेण कम्मं सो सबो होइ अप्पसत्थो उ। मुच्चइ य जेण सो उण पसत्थओ नवरि विन्नेओ ॥ ६४ ॥ येनैकविधादिना भावपिण्डेन कर्म्म बध्यते, सर्वोऽपि अप्रशस्तो भवति, येन पुनः कर्म्मणो मुच्यते, नवरं पुनः प्रशस्तो मावपिण्डो विज्ञेयः ॥ ६४ ॥ ननु पिण्डो नाम बहूनामेकत्र मीलनमुच्यते, भावस्तु चित्तपरिणामरूपस्तस्यैकदा चैकस्यैव भावात् कथं पिण्डत्वमिति चेदुत्तरमाह - दंसणनाणचरिचाण पज्जवा जे उ जत्तिया वावि । सो सो होइ तयक्खो पज्जवपेयालणापिंडो ॥ ६५॥ इह चारित्रग्रहणेन तपःप्रभृत्यपि गृह्यते, ततो दर्शनज्ञानचारित्राणां प्रत्येकं ये पर्यवा:- पर्यायाः अविभागपरिच्छेदरूपा यदा २ यावन्तो वर्त्तन्ते तदा २ स तत्तदाख्या दर्शनाख्यो ज्ञानाख्यश्चारित्राख्यः, पर्यायपेयालनापिण्डः - पर्यायाणां पालनया-संहतिविवक्षया पिण्डो भवतीत्यर्थः, एवं सर्वेष्वपि पिण्डेषु भावना कार्या ॥ ६५ ॥ प्रकारान्तरेण भावपिण्ड स्वरूपमाह कम्माण जेण भावेण अप्पगे चिणइ चिक्कणं पिंडं । सो होइ भावपिंडो पिंडयए पिंडणं जम्हा ॥६६॥ येन भावेन प्रशस्तेनाप्रशस्तेन वा कम्र्माणां शुभाशुभानां पिण्डं चिकणं-गाढसंश्लेषरूपं आत्मनि चिनोति जीव इति स भावपिण्डं स्यात् हेतुमाह यस्मात् कारणात् पिण्डनमिति पिण्ड्यते येन सहात्मा तत्पिण्डनं ज्ञानावरणीयादिकर्म्म तत् भावपिण्डविमर्शः । Page #70 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयावचूर्युपेता श्री. पिण्डनियुक्तिः। सा सीसमहर भावपिण्डोपचयकारणं द्रव्यपिण्डः। ॥१५॥ पिण्डयत्यात्मना सह सम्बद्धं करोति सद्भावस्तस्माद्भावपिण्ड इत्युच्यते ॥६६॥ षण्णामपि पिण्डानां स्वरूपं कथयित्वा केनात्राधिकारः पिण्डेने त्याहदवे अञ्चित्तेणं भावमि पसत्थएणिहं पगयं । उच्चारियत्थसरिसा सीसमइविकोवणट्टाए ॥ ६७ ॥ इहास्यां पिण्डनियुक्ती द्रव्ये अचित्तद्रव्यपिण्डेन भावे च प्रशस्तेन भावपिण्डेन प्रकृतं-प्रयोजनं तर्हि शेषाः कथमुक्ता ? अत आह-शेषा नामादयः पिण्डा उच्चारितार्थसदृशा-उच्चारितः प्रतिपादितो योऽर्थः, पिण्डशब्देनान्वर्थयुक्तेन तत् सदृशास्तेषामपि पिण्ड इत्येवमुच्चार्यमाणत्वात् , ततः शिष्याणां मतेर्विकोपन-प्रकोपनं झटिति तत्तदर्थव्यापकतया प्रसरीभवन तदर्थमुक्ताः, अयं भावा-नामादयोऽपि पिण्डा उच्यन्ते, परमिहाचित्तद्रव्यपिण्डेन प्रशस्तभावपिण्डेन च कार्य, न शेषः, अस्थार्थस्य ज्ञानार्थं शेषनामादिपिण्डोपन्यास इति ॥ ६७ ॥ ननु मुमुक्षूणां मोक्षाय प्रशस्तेन भावपिण्डेन प्रयोजनं किमचित्तद्रव्यपिण्डेनेति, चेदुच्यते, भावपिण्डोपचयस्य कारणत्वात्तथैवाहआहारउवहिसेज्जा पसथपिंडस्सुवग्गहं कुणई। आहारे अहिगारो अट्ठहिं ठाणेहिं सो सुद्धो ॥६॥ अचित्तद्रव्यपिण्डस्निधा-आहार उपधिः शय्या च, एतत्रयमपि प्रशस्तपिण्डस्य ज्ञानादेरुपग्रह-उपष्टम्भं करोति, केवलमत्राहारेऽधिकारः स चाहारोऽष्टभिः स्थानरुद्गमादिषु परिशुद्धो यथा यतीनां स्यात्तथोच्यते ॥ ६८ ।। ननु आहारपिण्डेन कथं विशेषकार्यमत्रेत्याह अयं भावानापमाणत्वात् , जरतार्थसदृशा-चावच प्रशस्तन ॥१५॥ Jain Education Inter For Private & Personel Use Only R w w.jainelibrary.org Page #71 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Int निवाणं खलु कज्जं नाणाइतिगं च कारणं तस्स । निवाणकारणाणं च कारणं होइ आहारो ॥ ६९ ॥ ' खलु ' अवधारणे साधूनां निवार्णमेव कार्य, ज्ञानादित्रिकं च तस्य निर्वाणस्य कारणं, निर्वाणकारणानां - ज्ञानदर्शनचारित्राणां आहारः कारणं भवति, आहारमन्तरेण देहस्थितेरभावात्तदभावे च ज्ञानाद्यसाधनात् आहारस्य तु दोषदुष्टस्य चारित्रभ्रंशकारित्वात् ।। ६९ ।। शुद्ध एव ग्राह्य इति दृष्टान्तेनैतदर्थं वक्ति जह कारणं तु तंतू पडस्स तेसिं च होंति पम्हाई । नाणाइतिगस्सेवं आहारो मोक्खनेमस्स ॥७०॥ यथा पटस्य तन्तवः कारणं तेषां च तन्तूनां पक्ष्माणि कारणानि भवन्ति, एवमनेन दृष्टान्तेन ज्ञानादित्रिकस्य मोक्षो नेमः इति नेमशब्दो देश्यः कार्यवाची, ततो मोक्षकार्यस्य आहारः कारणं भवतीति ॥ ७० ॥ मोक्षकारणतां दृष्टान्तेन पुनर्भावयति जह कारणमणुवहयं कज्जं साहेइ अविकलं नियमा । मोक्खक्खमाणि एवं नाणाईणि उ अविगलाई ॥ ७१ ॥ यथा बीजादिकारणं अनुपहतं - अग्न्यादिभिरविध्वस्तं अविकलं - परिपूर्ण सामग्री सम्पन्नं नियमादङ्गकुरलक्षणं कार्य जनयति, एवं अविकलानि ज्ञानादीनि मोक्षक्षमानि - मोक्षसाधनयोग्यानि भवन्ति ॥ ७१ ॥ पिण्डोपसंहारं तथैषणोपन्यासं चाह - संखेव पिंडियत्थो एवं पिंडो मए समक्खाओ । फुडवियडपायडत्थं वोच्छामी एसणं एत्तो ॥ ७२ ॥ सङ्क्षेपेण पिण्डितो मीलितोऽर्थः सङ्क्षेपपिण्डितार्थः, एष मया पिण्डः समाख्यातः । स्फुटविकटप्रकटार्थामेषणामितो वक्ष्ये, शुद्धा हारस्य मोक्ष कारणत्वम् । Page #72 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एषणामेदाः। क्षमारत्नीयावर्युपेता श्रीपिण्डनियुक्तिः। ॥१६॥ तत्र स्फुटो-निर्मलो न तात्पर्यानवबोधेन कश्मलः, विकटः-सूक्ष्ममतिगम्यतया दुर्भेदः प्रकटो-विशिष्टवचनरचनाविशेषण सुखप्रतिपाद्योऽर्थोऽभिधेयं यस्याः सा तथा ताम् ॥ ७२ ।। अथैषणाया एकार्थिकानि नामानि प्राहएसण गवेसणा मग्गणा य उग्गोवणाय बोद्धव्वा । एए उ एसणाए नामा एगट्रिया होंति ॥७३॥ एषणा, गवेषणा, मार्गणा, उद्गोपना, एतान्येकाथिकानि नामानि एषणाया बोधव्यानि भवन्ति ॥ ७३ ॥ अथैषणा भेदानाहनाम ठवणा दविए भावंमि य एसणा मुणेयवा । दवे भावे एकेकया उ तिविहा मुणेयवा ॥७४ ॥ चतुर्विधा एषणा ज्ञातव्या, तथाहि नामैषणा, एषणा इति कस्यापि नामेति, स्थापनैषणा एषणावतः साध्वादेरयमेष. णेति स्थापना, तथा द्रव्ये एषणा भावे चैपणा, द्रव्यभावयोः स्वरूपमाह-द्रव्ये भावे चैषणा एककात्रिविधा ज्ञातव्या ॥७४॥ तत्र द्रव्यविषया सचित्तादिभेदात्रिधा, भावैषणा-गवैषणाग्रहणैषणाग्रासैषणामेदात्रिधा तत्र द्विपदचतुष्पदापदमेदात्रिधा, सचित्तद्रव्यपणा, तत्र प्रथमतो द्विपदद्रव्यविषयामेषणामाहजम्मं एसइ एगो सुयस्स अन्नो तमेसए नद्रं । सत्तं एसड अन्नो पएण अन्नो य सेमच्चुं ॥७५॥ इह यद्यपि चत्वारि एषणादीनि नामानि प्रागेकाथिकान्युक्तानि, परं कश्चिदर्थविशेषोऽस्ति, तथा हि 'इषु इच्छायाम्' एषणं एषणा इच्छा गवेषणमनुपलभ्यमानस्य पदार्थस्य परिभावनं, मार्गणं निपुणबुद्ध्या अन्वेषणं, उद्गोपन-विवक्षितस्य ॥१६॥ Jain Education Intern For Private Personel Use Only ww.jainelibrary.org Page #73 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भावैषणाप्रकाराः। पदार्थस्य जनप्रकाशं चिकीर्षा, तत एतेषां क्रमेणोदाहरणान्याह-एकः कोऽपि सुतस्य जन्म एषते-इच्छति इदमेषणायामुदाहरणं, अन्यः कोऽपि तं सुतं क्वापि नष्टं एषते-गवेषयते विलोकयति, इदं गवेषणायामुदाहरणं, अन्यः कोऽपि पदेन धूलीसमुत्थचरणप्रतिबिम्बानुसारेण शत्रु एषते-मृगयते, इदं मार्गणायामुदाहरणम , अन्यः ‘से' तस्य शत्रोमृत्युमेषते-उद्गोपयति, सर्वजनसमक्षं मृत्युमभिधातुमभिलपतीत्यर्थः, इदमदोपनायामदाहरणम् ॥ ७५ ॥ उक्ता सचित्तद्विपदद्रव्येषणा, अथ चतुष्पदापदमिश्राचित्तविषयामाहएमेव सेसएसुवि चउप्पयापय अचित्तमीसेसु । जा जत्थ जुज्जए एसणा उ तं तत्थ जोएज्जा ॥७६॥ | एवमेव द्विपदप्रकारेणैव शेषेष्वपि चतुष्पदपदाचित्तमिश्रेषु गवादिवीजपूरकादिद्रम्मादिकटककेयूरायाभरणविभूषितसुतादिरूपेष्वपि यत्र या एषणा-इच्छा गवेषणा मार्गणा उद्गोपनारूपा युज्यते-घटते तां तत्र योजयेत् ॥ ७६ ॥ भावेषणात्रिप्रकारमाहभावेसणा उ तिविहा गवेसगहणेसण उ बोद्धवा । गासेसणा उ कमसो पन्नत्ता वीयरागेहिं ॥७७॥ गवेषणाग्रहणपणाग्रासैषणाभेदाद भावैषणा त्रिविधा, वीतरागैः क्रमश:-क्रमेण प्रज्ञप्ता:-ज्ञातव्याः, भावो ज्ञानादिपरिणामविशेषस्तस्य यथा हानिन स्यात्तथा पिण्डो विलोकनीय इति ॥ ७७॥ कथं पुनरयं क्रम इत्याहअगविट्रस्स उगहणंन होड न य अगहियस्स परिभोगो। एसणतिगस्स एसानायबाआणुपुत्वी उ॥७८॥ Jain Education Inter For Private & Personel Use Only Page #74 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयावचूर्युपेता पिण्ड नियुक्तिः। ॥१७॥ अगवेषितस्य-अपरिभावितस्य ग्रहणं न भवति, अगृहीतस्य परिभोगो न स्यात् , एषणात्रिकस्य एषा आनुपूर्वी ज्ञातव्या | द्रव्य॥७८ ॥ अथ गवेषणाया नामादीन् मेदानाह गवेषणायां नाम ठवणा दविए भावंमि गवसणा मुणेयवा । दवमि कुरंगगया उग्गमउप्पायणा भावे ॥७९॥ मृगगवेषणा चतुर्की नामगवेषणा स्थापनागवेषणा द्रव्ये भावे च गवेषणा, द्वयं पूर्ववत् , द्रव्ये द्रव्यगवेषणायां कुरङ्गगजा दृष्टान्तः। उदाहरणं, भावे भावगवेषणायां 'सूचनात् सूत्रमिति उद्गमोत्पादनादोषरहित आहार इति ॥ ७९ ॥ अथ द्रव्ये कुरङ्गोदाहरणं गाथात्रयेण दर्शयतिजियसत्तु देवि चित्तसभ पविसणं कणगपिट्ठपासणया।दोहल दुब्बल पुच्छा कहणंआणाय पुरिसाणं॥८०/ सीवन्निसरिसमोयगकरणं सीवनिरुक्खहटेसु। आगमण कुरंगाणं पसत्थ अपसत्थ उवमा उ ॥८१॥16 विडअमेयं कुरंगाणं, जया सीवन्नि सीयइ । पुरावि वाया वायंता, न उणं पुंजकपुंजका ॥२॥ आसामर्थः कथानकादवसेय इति तदुच्यते (६.१) क्षितिप्रतिष्ठितपुरे जितशत्रुनृपस्य सुदर्शनादेव्या सुगर्मायाचित्रसभायां प्रवेशनं, तत्र कनकपृष्ठान् मृगान् दृष्टा | तन्मांसभक्षणे दोहृदमजायत, तेन सा राज्ञी दुर्बला, तथाविधां मं दृष्ट्वा नृपतेः पृच्छा, तथा च दुर्बलत्वस्य दोहदकारणकथनं कृतम् , राजा कनकपृष्ठमृगानयनाय पुरुषान् प्रेषितवान् , कनकपृष्ठकुरङ्गानां श्रीपर्णीफलानि वल्लभानि, तानि च ॥१७॥ Jain Education a l For Private & Personel Use Only Page #75 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Intern सम्प्रति न सन्ति, यश्च यत्राशक्तस्तं प्राप्य प्रमोदेन बध्यते, अतः श्रीपर्णी वृक्षाघः श्रीपर्णीफल सदृश मोदककरणं कुर्मः, तत्र च पाशान् स्थापयाम इति राजपुरुषैश्चिन्तितम्, तथैव च कृतम्, तेषां च मृगानां यूथाधिपतिनां समं तत्रागमनं जातं यूथपतिमृगान् उक्तवान्, विदितं प्रतीतमेतत् कुरङ्गाणां यदा श्रीपर्णी सीदति धातूनामनेकार्थत्वात् ' फलति तस्मान्नेदानीं फलानि सम्भवन्ति सम्भवन्तु वा तथापि कथं ( पुञ्जक) पुञ्जकाकारेण स्थितानि । वातवशाच्चेनैव पुरारापि वाता वान्ति न पुनरेवं पुञ्जकपुञ्जकाः फलानामभवन् तस्मात् केनापि धूर्तेण भवबन्धनाय कूटं कृतमिति, मायूयमेतेषामुपकण्ठं गमत इत्युक्ते यैस्तद्वचः प्रतिपन्नं ते दीर्घायुषो जाता, यैस्त्वाहारलम्पटतया न प्रतिपन्नं ते पाशबन्धनादि दुःखयुता जाता । इह यूथाधिपतेः श्रीपर्णीफलसममोदकसदोषत्व निर्दोषत्वविलोकनं द्रव्यगवेषणा, इह " पसत्थ अप्पसत्थ उवमाओ " ये यूथाधिपतिवचनकारिणः ते प्रशस्ताः, इतरे त्वप्रशस्ता इति, अनेन दार्शन्तिकोऽप्यर्थः सूचितस्तथा हि-यूथपतिसमा आचार्याः मृगसमा साधवः, गुरुवचसा आधाकर्मादिदुष्टमाहारं त्यजन्ति ते प्रशस्ताः, इतरे त्वप्रशस्ताः (६.२ ) हरन्तसन्निवेशे समिताः सूरयः समागताः, कदापि श्राद्धैः साधुनि मित्तमात्रा कम्र्मादि कारितं, सूरिभिर्ज्ञातं निवारिताः सावो ये गतास्तत्राहारग्रहणार्थं ते दुर्गतिदुःखभाजिनोऽजायन्त, ये तु गुरुवचनासक्तास्ते संसारपारमगुरिति ॥८०-८१-८२॥ अथ गाथाद्वयेन गजदृष्टान्तमाह हत्थिग्गहणं गिम्हे अरहट्टेहिं भरणं च सरसीणं । अच्चुदएण नलवण आरूढा गयकुलागमणं ॥८३॥ द्रव्यगवेषणायां मृग दृष्टान्तः । Page #76 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीया बचूर्युपेता श्रीपिण्ड निर्युक्तिः 11 26 11 Jain Education Inter विइमेय गजकुलाणं, जया रोहंति नलवणा । अन्नयावि झरंति हदा, न य एवं बहुआदगो ॥ ८४ ॥ अत्रापि कथानकादर्थस्तचेदम् (६.३) आनन्दपुरे रिपुमर्दनभूपस्यासन्नगज कुल शतसहस्रयुतमरण्यं ज्ञात्वा ग्रीष्मकाले मया हस्तिग्रहणं कार्यमिति चिन्ता, पुरुषाः आदिष्टाः, तैः गजाः सल्लकीप्रियाः, सम्प्रति गीष्मकालत्वात् सलकी नेति अरघद्वैः सरसीनां मरणं चक्रे, नलवासने पाशा मण्डिताः, ततोऽत्युदकेन नलवनानि अतिप्ररूढानि, ततो यूथपतिना समं गजकुलानामागमनं जातम्, यूथपतिर्गजानुवाच - विदितमेतद्गजकुलानां यदा नलवनानि रोहन्ति प्ररूढानि भवन्ति, तस्मान्नामुनि स्वाभाविकानि, अथ निर्जर. वशादिति चेन्नैवं, अन्यदापि इदास्रवन्ति, न त्वेवं बहूदकाः सरस्यः कदाचनापि, तत्र कूटमत्रास्ति मा यूयमत्र गमतेत्युक्ते ये स्थितास्ते तु चिरायुषोऽन्ये तु बन्धिताः, इहापि यूथाधिपतेर्नलवनस्य यथा स्वपरिभावनं द्रव्यगवेषणा, दार्शन्तिकयोजना पूर्ववत् ।। ८३-८४ ॥ अथ भावगवेषणामाह - उग्गम उग्गोवण मग्गणा य एगट्टियाणि एयाणि । नामं ठवणा दविए भावंमि य उग्गमो होई ॥८५॥ मावैषणायामुद्र मोत्पादनादोषशुद्धिराहारे वाच्येति प्रथममुगमै कार्थिकानि नामादिभेदाँ चाह - उद्गम उद्घोषना मार्गणा एतान्येकार्थिकानि स्युः, तथोद्गमचतुर्द्धा भवति, तद्यथा-नामोद्गमः स्थापनोद्गमः द्रव्ये भावे चोद्गम इति द्वयं पूर्ववत् ॥८५॥ द्रव्यभावयोर्विशेषमाह - द्रव्यगवेषणायां गज दृष्टान्तः । ॥ १८ ॥ Page #77 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लड्डुकप्रियस्य कथानक दत्वंमि लड्डुगाई भावे तिविहोग्गमो मुणेयवो । दसणनाणचरित्ते चरित्तुग्गमेणेत्थ अहिगारो ॥ ८६ ॥ ____ द्रव्ये उद्गमो लड्डुकादेः सम्बन्धी ज्ञेयः, आदिशब्दाज्ज्योतिरादिपरिग्रहः, भावे त्रिविधोद्गमो ज्ञातव्यः, त्रैविध्यमेवाह दर्शने ज्ञाने चारित्रे, अत्र ज्ञानदर्शनाविनामावित्वेन चारित्रस्य साक्षान्मोक्षाङ्गत्वाचारित्रोद्गमेनाधिकार इति ॥ ८६ ॥ का लड्डुकादेरत्रादिशब्दसूचित्तं ज्योतिरादि प्रतिपादयतिजोइसतणोसहीणं मेहरिणकराणमुग्गमो दवे । सो पुण जत्तोय जया जहा य दव्वुग्गमो वच्चो॥८७॥ ज्योतिषां-चन्द्र सूर्यादीनां तृणानां-दर्भाणां औषधीनां-शाल्यादीनां, मेघानां ऋणस्य कराना-राजदेयभागानां द्रव्ये उद्गमो भवति, स पुनद्रव्योदमो यतो-यस्मात आकाशादेः स्थानात यदा वा प्रभातादिके काले यथा वा-येन प्रकारेण नम:प्रसरणभूस्फोटनादि वा भवति, तथा वाच्यः ॥ ८७॥'लड्डुगाई ' इत्यत्र लड्डुकप्रियकुमारस्य कथानकं सूचितं तदेव गाथात्रयेणाहवासहरा अणुजत्ता अस्थाणी जोग्ग किड्डकाले य। घडासरावेसु कयाउ मोयगा लड्डुगपियस्स ॥८८ जोग्गा अजिण्ण मारुय निसग्ग तिसमुत्थ तो सुइसमुत्थो।आहारुग्गचिंता असुइत्ति दुहा मलप्पभवो।। तसेवं वेरग्गुग्गमेण सम्मत्तनाणचरणाणं । जुगवं कमुग्गमो वा केवलनाणुग्गमो जाओ ॥ ९०॥ Jain Education in For Private & Personel Use Only Page #78 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लड्ड्कप्रियस्य कथानकम् क्षमा रत्नीयाबचूर्युपेता श्रीपिण्डनियुक्तिः ॥१९॥ अत्र कथानकादर्थोऽवसेय इति तदुच्यते (दृ. ४)-श्रीस्थलकपुरे भानुनृपो रुक्मिणी राज्ञी तयोः सुरूपनामा पुत्रोऽभीष्टमोदकत्वेन मोदकप्रिय इति ख्याति लेमे । स चान्यदा वासगृहादनुयात्रार्थ निर्गमनं कृतवान् , आस्थान्यां गत्वा योग्य| क्रीडा तेन प्रारब्धा, काले भोजनावसरे प्राप्ते घटेषु शरावेषु च लडकप्रियस्य जनन्या कृत्वा पूर्वकृता वा मोदकाः प्रेषिताः, तेन परिजनेन समं भुक्तास्ततो रात्रावपि योग्यक्रीडाविलोकनेन जागरणभावतस्ते न जीर्णाः, कुमारस्य तस्मादजीर्णदोषात् समुद्भवस्तत्समुद्भवोऽशुचिपमुत्थो वातनिसर्गोऽभवत् , नासायां तद्गन्धे वा याते आहारोद्गमचिन्ता जाता, यथाऽमी मोदकाः शुभा एव परं द्विधा मलप्रभवो देहस्तत् सम्पर्कादशुचयो जाता इति, अथवा बृहवृत्ताविति व्याख्या, (पृ. ३३) मारुतनिसर्गे जाते आहारोद्गमचिन्ता जाता, यथाइति समुद्भवति, घृतगुडादिसमुद्भवा एते मोदकास्तस्मात् शुचिसमुत्था एव, सूत्रे च, जातावेकाचनं केवलं द्विधा मलप्रभवो देहस्तद्योगादशुचय इति, 'सूचनात् सूत्रमि' ति देह इति योगतः, तस्य कुमारस्यैवं वैराग्योद्गमेन सम्यत्वज्ञान चारित्राणां युगपत्क्रमेण वा उद्गमो जातस्ततः केवलज्ञानोद्गम इति गाथार्थो भावार्थोऽपि ॥ ८८-९० ॥ यदुक्तं चारित्रोद्गमेनाधिकारस्तत्र चारित्रं शुद्धमेव, कथं शुद्धिरित्याहदसणनाणप्पभवं चरणं सुद्धेसु तेसु तस्सुद्धी । चरणेण कम्मसुद्धी उग्गमसुद्धी चरणसुद्धी ॥९१॥ दर्शनज्ञानप्रभवं चारित्रं तयोः शुद्धयोस्तस्य चारित्रस्य शुद्धिरिति कारणमभ्यन्तरं शुद्धः, चरणेन कर्मशुद्धिर्जायते न ॥१९॥ Jain Education Inter For Private & Personel Use Only Page #79 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आधारमकार्थिकानि केवलं ज्ञानदर्शनशुद्धौ चारित्रशुद्धिः, किन्तूद्गमशुद्धिरिति ( द्धाविति ) बाह्य शुद्धे कारणमिति द्विधाऽपि प्रोक्तम् ॥ ११ ॥ उद्गमशुद्धौ उद्गमदोषास्त्याज्यास्तान् पोड शापि नामतः प्राहआहाकम्मुद्दसिय पूईकम्मे य मीसजाए य । ठवणा पाहुडियाए पाओअर कीय पामिच्चे ॥९॥ परियहिए अभिहडे उब्भिन्ने मालोहडे इय। अच्छिज्जे अणिसटे अज्झोयरए य सोलसमे॥९॥ गाथाद्वयेन नामानि पुरतश्चान्वर्थः, स्वरस्थाने निरूपयिष्यामि, शेषं सुगमम् ॥ ९२-९३ ॥ अथ प्रथमभेदे द्वारगाथामाहआहाकम्मिय नामा एगट्ठा कस्स वावि किं वावि । परपक्खेय सपक्खे चउरो गहणे य आणाइ ॥९॥ इह प्रथममाधाकमैकार्थिकानि नामानि वक्तव्यानि, ततः कस्यार्थाय कृतमाधाकर्म स्यादिति वाच्यम् , किं स्वभावं तदिति वाच्यं, तथा परपक्षनिमित्तं कृतं तन्न भवति स्वपक्षनिमित्वं तु भवतीति वाच्यम् , चत्वारोऽतिक्रमादयोऽतिचाराः स्युरिति वाच्यम् , तथा ग्रहणेन आजादयः 'सूचनात् सूत्रमिति आज्ञामङ्गादयो दोषा वक्तव्याः॥९४ ॥ प्रथमद्वारमाहआहाअहे यकम्मे आयाहम्मे य अत्तकम्मे य । पडिसेवण पडिसुणणा संवासऽणुमायणाचेव ॥१५॥ आधाकर्म अधःकर्म आत्मघ्नं आत्मकर्म प्रतिसेवना प्रतिश्रवणा संवासना अनुमोदना चैतान्येकार्थिकानि, एतान्येव व्याख्यानयति, इह आधाकम्र्मेति शब्दविचारे आधया कर्म आधाकर्मेत्युक्तम् ॥९५॥ सापि चाधा नामादिभेदाचतुर्दा, Jain Education in Page #80 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आषाकर्मः स्वरूपम् पिण्ड हमा नामस्थापने सुगमे, द्रव्याधामाहपत्नीया- धणुजुयकायभराणं कुडुंबरजधुरमाइयाणं च । खंधाई हिययं चिय दव्वाहा अंतए धणुणो ॥१६॥ पर्युपेता धनुश्चापं, यूपः-युगं कायः कापोती, यया स्कन्धारूढया पानीयं वहति पुरुषः भरो-मारः कुटुम्बराज्ययोऽश्चिन्ता इत्याश्री दीनां स्कन्धादि हृदयं, यावद्रव्याधा ज्ञेया, इहाधाशब्देनाधीयतेऽस्यामित्याधा, आधार उच्यते, सूत्रगतिविचित्रत्वाद्धनु राधारभूतं शेषाण्याघेयानीति धनुराधेयं पश्चाद्वक्ष्यति, आधेयानामाधारमाह-स्कन्धादीति, यथाक्रमं स्कन्धो बलीव दीनां नियुक्तिः। यूपाधारो, नरादिस्कन्धश्च कापोत्याः, भारस्य गन्व्यादि कुटुम्बराज्यचिन्तयोहृदयम् , अथ धनुराधेयमाह-अन्तके करहसंज्ञे ॥२०॥ धनुषःसम्बन्धिनी प्रत्यञ्चारोप्यते, ततो धनुः प्रत्यञ्चाया आश्रय इति ॥ ९६ ।। अथ भावाधामाह, भावाधायां साधुं मनस्याधाय यदोदनादि क्रियते सा भावाधा, तथैवाहओरालसरीराणं उद्दवण तिवायणं च जस्सट्रा। मणमाहित्ता कीरइ आहाकम्मं तयं बेति ॥९७॥ औदारिकशरीराणामेकेन्द्रियादिपञ्चेन्द्रियपर्यन्ततिरिश्चां मानुष्याणां च यस्यार्थ साध्वर्थ मन आधाय अपद्रावणं त्रिपातनं Pा हिंसनं च करोति गृही अपद्रावणं साध्वथं त्रिपातनमात्मार्थमेवं कल्प्यमित्युक्तम् , त्रिपातनग्रहणेन तदाधाकर्म ब्रुवते ।।९७॥ भाष्यगाथात्रयेणैनां गाथा व्याख्यानयतिओरालग्गहणेणं तिरिक्खमणुयाऽहवा सुहुमवज्जा।उद्दवणं पुण जाणसु अइवायविवाजियं पीडभा०१६॥ ॥२०॥ Jain Education Inter! For Private & Personel Use Only Tww.jainelibrary.org Page #81 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inte कायवमणो तिन्नि उ अहवा देहाउइंदियप्पाणा । सामित्तावायाणे होंइ तिवाओ य करणेसुं ॥ भा० १७ ॥ हिययंमि समाहेउं एगमणेगं च गाहगं जो उ । वहणं करेइ दाया कायेण तमाह कम्मंति ॥ भा० १८ ॥ औदारिकग्रहणेन तिर्यञ्च मनुष्याः अथवा सूक्ष्मवर्जा ज्ञेयाः, सूक्ष्माणां मनुष्यकृतापद्रावणायोगात्, अपद्रावणं पुनरति पातवर्जितां पीडां जानीहि, त्रिपातनमिति कायवाङ्मनांसि त्रीणि, अथवा देहायुरिन्द्रियरूपास्त्रयः प्राणास्तेषां पातनं प्रथमत्रिकं गर्भजति मनुष्याणां स्याद्, द्वितीयत्रिकं तु सर्वजीवानां भवति, एवं स्वामित्वे सम्बन्धविवक्षया अथवाऽपादाने त्रिभ्यः पातनमिति, अथ त्रिभिर्वा करणभूतैः पातनमिति अतिपातो भवति, हृदये एकमनेकं वा ग्राहकं साधु समाधाय यत्कायानां वधं करोति तदाघाकर्मेति, एतेनान्वर्थोऽप्युक्त एव ॥ १६-१८ ।। अथाधः कर्मेति नाम वाच्यं तदपि नामादिभेदाच्चतुर्द्धा, नामस्थापनेपूर्ववत् द्रव्य भावयोर्नियुक्ति कृद्विशेषमाह - वं उद्गा छूमहे वयइ जं च भारेणं । सीईए रज्जुएण व ओयरणं दमं ॥९८॥ यत्किमपि द्रव्यं उदकादिषु क्षिप्तमधो व्रजति, यच्च भारेणाधो याति, तथा ' सीतीए ' निश्रेण्या रज्ज्वा वा अवतरणं पुरुषादेः कूपादौ मालादेर्वा भुवि तद् द्रव्याधःकर्मेति ज्ञेयम् ॥ ९८ ॥ संजमठाणाणं कंडगाणं लेसाठिईविसेसाणं । भावं अहे करेई तम्हा तं भावकम्मं ॥ ९९ ॥ संयमस्थानानां कण्डकानां-सङ्ख्यातीत संयमस्थानसमुदायानां लेश्यानां सातवेदनीयादिशुभकर्मप्रकृतिविशेषाणां भावं अधः कर्मभेदाः Page #82 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयाबचूर्युपेता भी पिण्ड निर्युक्तिः । ॥ २१ ॥ Jain Education Inte अध्यवसायं साधुधाकर्म्म भुञ्जानोऽघः करोति हीनं हीनतरं करोति, तस्माद्भावाधः कर्मेति ॥ ९९ ॥ भाष्यगाथायेनां गाथां व्याख्यानयति तत्थाणंता उ चरित्तपजत्रा होंति संजमट्ठाणं । संखाईयाणि उ ताणि कंडगं होइ नावं ॥ भा० १९ ॥ संखाईयाणिउ कंडगाणि छट्टाणगं विणिद्दिद्वं । छट्टाणा उ असंखा संजमसेढी मुणेयवा ॥ भा०२० ॥ किण्हाइया उ लेसा उक्कोसविसुद्ध ठिइविसेसाओ । एएसि विसुद्धाणं अप्पं तग्गाहगो कुणइ ॥ भा०२१ ॥ तत्रानन्ताश्चारित्रपर्यायाः संयमस्थानं भवति, कोऽर्थः १ इह किल कल्पनया सर्वोत्कृष्टदेशविरतिशुद्धिस्थानस्य निर्व भागा भागा दश सहस्राणि १००००, सर्वजीवानन्तकप्रमाणश्च राशिः शतं तेन गुणितानि जातानि दश लक्षाणि १००००००, एतावन्तः किल सर्वजघन्य सर्वविरतिशुद्धिस्थानस्य निर्विभागा भागाः स्युरिति । सङ्ख्यातीतानि संयमस्थानानि कण्डकं ज्ञातव्यं भवति, तत्र कण्डकं समय ( परि ) भाषया अङ्गुलमात्रक्षेत्रासङ्घयेय भागगतप्रदेशराशिप्रमाणा सङ्ख्याभिधीयते, तथा चोक्तम् -" कंडेति इत्थ भण्णइ अंगुलभागो असंखिओ ।" ततः कण्डकानन्तरं अनन्त भागासङ्ख्यात भागसङ्ख्यात भागसङ्घथगुणासङ्ख्यगुणानन्तगुणभेदात्पोढा गुणाकारेण गुण्यते, गुणनं च विस्तरतो बृहद्वृत्तेरवसेयं (पृ. ३९ ), इत्थं सङ्ख्यातीतानि कण्डकानि पट्स्थानकं भवति, ततः पुनरसङ्ख्यातानि पट्स्थानकानि संयमश्रेणिर्ज्ञातव्या, तथा चोक्तम्44 'छडाणगअ (ण) बसाणे अनं छट्ठाणयं पुणो अन्नं । एवमसङ्घा लोगा छडाणाणं मुणेयवा ॥ १ ॥ " तथा कृष्णादयो संयम श्रेणिः ॥ २१ ॥ Page #83 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आधाकर्म अहण फलस् लेश्यास्तथोत्कृष्टविशुद्धसातावेदनीयादिकर्मणां स्थितिविशेषाः, तत एतेषां संयमस्थानादीनां सम्बन्धिषु शुभेषु स्थानेषु वर्तमानस्तग्राहक आधाकर्मग्राह आत्मानमेतेषां विशुद्धानां संयमस्थानादीनामधोऽधस्तात् करोति ॥ १९-२०-२१॥ ततः किं दूषणमित्याहभावावयारमाहेउमप्पगे किंचिनूणचरणग्गो । आहाकम्मग्गाही अहो अहो नेइ अप्पाणं ॥१०॥ - भावानां संयमादि स्थानानां विशुद्धानां हीनहीनतरं अवतरणमधःपतनमधःपतनमात्मन्याधाय किश्चिन्यूनचरणानः किश्चिन्न्यूनेन चरणेनाना-प्रधान उपशान्तमोह इत्यर्थः, आस्तामन्यप्रमत्तसंयमादिः, आधाकर्मग्राही अधोऽधो नरकपृथ्व्यादौ । नयत्यात्मानम् ॥ १०॥ तदेवाहबंधइ अहेभवाऊ पकरेइ अहोमुहाई कम्माई। घणकरणं तिवेण उ भावेण चओ उवचओ य ॥१०॥ आधाकर्मग्राही अधोभवस्य-नरकादिभवस्यायुर्वध्नाति, शेषाण्यपि कर्माणि अधोमुखानि-अधोगतिनयनशीलानि प्रकरोति, तीव्रण [ तुल्यं पयादि ] भावेन घनकरणं निकाचिततया व्यवस्थापनं स्यात् , अन्यकर्मग्रहणेन चय उपचयश्च भवति, स्तोका वृद्धिश्च चयः, प्रभूता तूपचय इति ॥ १.१॥ तेसिं गुरुणमुदएण अप्पगं दुग्गईएँ पवडतं । न चएइ विधारेउं अहरगति निति कम्माई ॥१०॥ तेषां गुरूणां कर्मणामुदये आत्मानं दुर्गतौ पतन्तं विधारयितुं-निवारयितुं न शक्नोत्याधाकर्मग्राही, यतः कर्माणि Jain Education Intel For Private Personel Use Only | Page #84 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयाबचर्युपेता श्री. पिण्डनिर्युक्तिः ॥ २२ ॥ Jain Education Inter अधरगतिं नरकादिरूपां नयन्ति तथा चोक्तम् - " आहाकम्मं णं भुंजमाणे समणे निग्गंथे अट्ठ कम्मपयडीओ बंध, अहे बंध (अहे पकरेइ) अहे चिणह अहे उवचिणइ " ( व्याख्याप्रज्ञप्तिः ) इत्यादि ।। १०२ ।। अथात्मनेति नाम आख्येयम्, तदपि नामादिभेदाच्चतुर्द्धा, नामस्थापने पूर्ववत्, द्रव्यभावयोर्विशेषमाह अट्ठा अट्ठाए छक्कायपमद्दणं तु जो कुणइ । अनियाए य नियाए आयाहम्मं तयं बेंति ॥ १०३ ॥ गृह स्वास्वार्थायानर्थाय कार्यमन्तरेण वा अनिदया निदया च भाष्यवक्ष्यमाणस्वरूपया षट्कायप्रमर्दनं करोति, तदात्मनं द्रव्यतो बुवन्ति तीर्थकरादयः ।। १०३ || अनिदानिदयोः स्वरूपं भाष्यकृदाह जाणंतु अजाणतो तहेव उद्दिसिय ओहओ वावि। जाणग अजाणगं वा वहेइ अनिया निया एसा । भा०२२|| निदानं निदा-प्राणिहिंसा नरकादिदुःखहेतुरिति जानतापि यत्प्राणिव्यपरोपणं क्रियते सा निदा, तद्विपरीता अनिदा, अथवा स्वार्थं परार्थं चेति विभागेनोद्दिश्य यत्प्राणिव्यपरोपणं सा निदा तद्विपरीत उच्यते सामान्येनानिदा, अथवा व्यापाद्यमानो जीवो हा! धिग् मामेष मारयिष्यतीति जानाति तं जानन्तं प्रति हिंसा निदा तद्विपरीता स्वनिदा ।। २२ ।। अथ षट् कायप्रमर्द्दनं कथं द्रव्यात्मनं कस्मान्न भावात्मनमित्युत्तरमाहदवाया खलु काया भावाया तिन्नि नाणमाईणि । परपाणपाडणरओ चरणायं अप्पणो हणइ ॥ १०४ ॥ कायाः - पृथिव्यादयो द्रव्यात्मनो-द्रव्यरूपा आत्मनः, जीवानां गुणपर्यायवत्तया द्रव्यत्वात्, अतो द्रव्यात्मनेति नाम आत्मन्न मेदाः ॥ २२ ॥ Page #85 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आत्मकर्मभेदा: सङ्गतम् । मावात्मनमाह-ज्ञानादीनि त्रीणि भावात्मनो भवन्ति, तेषामेवात्मनः पारमार्थिकत्वात , ततो यश्चारित्री परेषां पृथिव्यादीनां ये प्राणा-इन्द्रियादयस्तेषां पातनं-विनाशनं, तत्र रत:-आसक्तः, आत्मनश्चरणात्मानं हन्ति, चरणात्मनि । इते ज्ञानदर्शनात्मानौ हतावेव ।। १०४ ॥ यत आहनिच्छयनयस्त चरणायविधाए नाणदंसणवहोऽवि । ववहारस्स उचरणे हयंमि भयणाउसेसाणं॥१०५। निश्चयनयस्य मतेन चरणात्मघाते ज्ञानदर्शनवघोऽपि जात एव, व्यवहारनयस्य तु मतेन चरणे हते शेषयोनिदर्शनयो- IN भजना-कचिद्भवतः क्वचिन्नेति ॥ १०५॥ अथात्मकर्म नामोच्यते, तदपि नामादिभेदाचतुर्दा, नामस्थापने प्रागिव, द्रव्यभावयोर्विशेषमाहदबंमि अत्तकम्मं जं जो उ ममायए तयं दत्वं । भावे असुहपरिणओ परकम्म अत्तणो कुणइ ॥१०६॥ यः पुमान् यद् द्रम्मादिकं द्रव्यं ममायते-ममेति प्रतिपद्यते द्रव्ये तदात्मकर्म स्यात् , आत्मसम्बन्धित्वेन करणमितिव्युत्पत्त्या, भावे अशुभपरिणतो-अशुभेन प्रस्तावादाधाकर्मग्रहणरूपेण भावेन परिणतः परस्य पाचकादेः सम्बन्धि पचनपाचनादिजनितं कर्मात्मनः सम्बन्धि करोति तद्भावात्मकर्मेति भावेन परकीयस्यात्मसम्बन्धित्वेन कर्म करणमिति व्युत्पचेः ॥ १०६ ।। एतदेव सार्द्धगाथयाहआहाकम्मपरिणओ फासुयमावि संकिलिट्ठपरिणामो। आययमाणो बज्झइ तं जाणसु अत्तकम्मति ॥ काIN For Private Personal Use Only Jan Education Intem Page #86 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बमा कर्मबन्विचार रत्नीयावर्युपेता श्री नियुक्ति ॥२३॥ | परकम्म अत्तकम्मीकरेइ तं जो उ गिहिउंभुंजे। तत्थ भवे परकिरिया कहं नुअन्नत्थ संकमइ ?॥१०॥ आस्तामन्यत् प्राशुकमपि संश्लिष्टपरिणामः-आधाकर्मपरिणतः सन् आददानो बध्यते कर्मणा तदात्मकर्म जानीहि, यस्तदाधाकर्म गृहीत्वा मुक्ते स परस्य कर्म पचनादिजनितं आत्मकर्मीकरोति ॥ १०७ ।। गाथासकलेन पराक्षेपमाह तत्रेति परकर्म आत्मकर्मीकरोतीत्यत्र परवक्तव्यं भवेत्तदेवाह-परक्रिया कथमन्यत्र साधौ सङ्कामति ॥ १०८ ॥ अथ केचिदसत्कल्पनां कथयन्ति तदुक्त्वा निराकुर्वन् गाथाद्वयमाहकुडउवमाइ केइ परप्पउत्तेऽवि बेंति बंधोत्ति । भणइ य गुरू पमत्तो बज्झइ कूडे अदक्खो य ॥१०९॥ एमेव भावकूडे बज्झइ जो असुभभावपरिणामो। तम्हा उ असुभभावो वज्जेयवो पयत्तेणं ॥११॥ केचित प्रवचनसारमजानाना: कूटोपमया परप्रयुक्तेऽपि-परनिष्पादितेऽप्योदनादौ 'सूचनात् सूत्रमिति साधोर्बन्धो भवतीति ब्रुवते, यथा व्याधेन कूटे स्थापिते मृगस्यैव बन्धो न व्याधस्य तथा गृहिणा पाकादौ कृते साधोरेव बन्धो न गृहस्थस्य | तदेतदयुक्तं, गृहस्थस्य प्रत्यक्षमारम्भकरणे कर्मबन्धसम्भवात् , न च मृगस्यापि परप्रयुक्तिमात्राद्वन्धः, किन्तु स्वप्रमादादिदोषादपि, एवं साधोरपि, तथैवाह च-गुरु:-श्रीयशोभद्रसूरिरेवं भणति-मृगः प्रमत्तोऽदक्षश्च कूटे बध्यते, योऽप्रमत्तस्तत्रायात्येव नाप्यायाति(त:) तर्हि दक्षतयाऽपसरति, एवमनेन दृष्टान्तेन यः साधुरशुभभावपरिणामो भावकूटे आधाकर्मणि कर्मणा बध्यते स इति तस्मादशुभभावः प्रयत्नेन वर्जयितव्यः ॥ १०९-११०॥ ननु यदि साधुराधाकर्म न करोति न कारयति नानु सश ॥२३॥ Jain Education in For Private & Personal use only Page #87 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inter मोदते तस्य को दोष १ इति चेदाह - कामं सयं न कुबइ जाणंतो पुण तहावि तग्गाही । वड्डेइ तप्पसंगं अगिण्हमाणो उ वारेइ ॥ १११ ॥ कामं सम्मतमेतत् यद्यपि स्वयं न करोति उपलक्षणत्वान्न कारयति नानुमोदते, तथापि पुनर्जानन् तद्ग्राही आधा कर्म्मग्राही तत्प्रसङ्गमाधाकर्म्मग्रहणप्रसङ्गं वर्द्धयति, यथाऽन्ये साधवो जानन्ति यदनेन साधुना जानवाप्याधाकर्म्म आददे ततो न कोऽपीति (पि) दोष इति प्रसङ्गः, तुः पुनरगृह्णन् प्रसङ्गं निवारयति ॥ १११ ॥ अथ प्रतिषेवणादीनि नामानि वाच्यानि, तानि चात्मकर्मनामाङ्गत्वेन प्रवृत्तानि ततस्तेषामात्मकम्र्मेति नामाङ्गत्वं गुरुलघुचिन्तां चाह अती कम्मं पडिवाईहिं तं पुण इमेहिं । तत्थ गुरू आइपयं लहु लहु लहुगा कमेणियरे ॥ ११२ ॥ तत्पुनर्ज्ञानावरणीयादिकर्म वक्ष्यमाणस्वरूपैः प्रतिषेवणादिभिरात्मीकरोति, परकीयमित्यर्थः, तत्र प्रतिषेवणादीनां चतुर्णां मध्ये आदिपदं प्रतिषेवणारूपं गुरु-महादोषमितराणि-प्रतिश्रवणादीनि क्रमेण लघुलघुलघुकानि द्रष्टव्यानि ॥ ११२ ॥ पडिसेवणमाईणं दाराणऽणुमोयणावसाणाणं । जहसंभवं सरूवं सोदाहरणं पवखामि ॥ ११३ ॥ प्रतिषेवणादीनां द्वाराणामनुमोदनावसानानां यथासम्भवं स्वरूपं सोदाहरणं प्रवक्ष्यामि ॥ ११३ ॥ तदेवाह - अन्नेणाहा कम्मं उवणीयं असइ चोइओ भणइ । परहत्थेणंगारे कडुंतो जह न उज्झइ हु ॥ ११४ ॥ एवं खु अहं सुद्धो दोसो देंतस्स कूडउत्रमाए । समयत्थमजाणतो मूढो पडिसेवणं कुणइ ॥ ११५ ॥ प्रतिषेवणस्वरूपम् Page #88 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रति क्षमा रत्नीयापर्युपेता श्रवणादीनां स्वरूपम् पिण्ड नियुक्तिः अन्येन-साधुना उपनीतं आनीतं आधाकर्म योऽश्नाति स प्रतिषेवणं करोतीति सम्बन्धः, स चाधाकर्म भुञ्जानः केनापि 'चोइओ'त्ति, विक्षिप्तः प्रेरितः सन्ने भणति, न मे दोषो येनानीतं तस्य दोषः, तथा चात्र दृष्टान्तः, यथा परहस्तेनाङ्गारानाकर्ष(न्) न दह्यते, एवं 'खु'निश्चितमहं शुद्धो, दोषो पुनर्ददतो यथा परस्य स्वहस्तेनाङ्गारानाकर्षतः, एवं कूटया उपमया समयार्थमजानानो मूढः प्रतिषेवणं कुरुते ॥ ११४-११५ ॥ प्रतिश्रवणमाहउवओगंमि य लाभं कम्मग्गाहिस्स चित्तरक्खट्रा। आलोइए सुलद्धं भणइ भणंतस्स पडिसुणणा॥ यो गुरुः कर्मग्राहिण-आषाकर्मग्रहणप्रवृत्तस्य साधोश्चित्तरक्षार्थ उपयोगकरणवेलायां लाभ भणति, आधाकर्मणि गृहस्थगृहादानीयालोचिते सति सुलब्धं शोभनं जातमिति भणति, तस्य गुरोरेवं मणतः प्रतिश्रवणं नाम दोषः 'प्राकृतत्वात् । स्त्रीत्वनिर्देशः' ॥ ११६ ॥ संवासानुमोदनयोः स्वरूपमाहसंवासो उ पसिद्धो अणुमोयण कम्मभोयगपसंसा। एएसिमुदाहरणा एए उ कमेण नायबा ॥११७॥ ___ संवासः-आधाकर्मभोजिमिः सह वसनं स प्रसिद्ध एव, अनुमोदना आधाकर्मभोजकप्रशंसा, एतेषां प्रतिषेवणादीनां एतानि क्रमेणोदाहरणानि ज्ञातव्यानि ॥ ११७ ॥ पडिसेवणाएँ तेणा पडिसुणणाए उ रायपुत्तो उ।संवासंमि य पल्ली अणुमोयण रायदुट्ठोय ॥११८॥ प्रतिषेवणस्य स्तेना उदाहरणं, प्रतिश्रवणस्य राजपुत्री, राजपुत्रोपलक्षिताः शेषाः पुरुषा, संवासे पल्लीवास्तव्या वणिजः ॥२४॥ ॥२४॥ Jain Education Inter For Private & Personel Use Only T ww.jainelibrary.org Page #89 -------------------------------------------------------------------------- ________________ स्तेन. दृष्टान्त: अनुमोदनायां राजदुष्टो, राजदुष्टोपलक्षितास्तत् प्रशंसाकारिणः ॥ ११८ ॥ प्रथमं स्तेनदृष्टान्तं भावयतिगोणीहरण सभूमी नेऊणं गोणिओपहे भक्खे। निविसया परिवेसण ठियावि ते कूविया घत्थे ॥११९॥ गाथाक्षरार्थः कथनकादवसेय इति तदेवोच्यते-(दृ०५)-इह कापि ग्रामे बहवो दस्यवस्तैश्च कुतोऽपि गवामपहरणं कृतं, स्वग्राम प्रति चलिताः, स्वभूमि-स्वदेशं प्राप्ताः, तेषां च पथि गच्छतां केऽप्यन्ये दस्यवः पथिका मिलिताः, तेऽपि सहव सन्ति, ततो भोजनवेलायां कतिपया गा विनाश्य भोजनाय तन्मांसं पक्तुमारब्धं, इतः केऽप्यन्ये पथिका: समेतास्तेऽपि चौर जनार्थमामन्त्रिताः, अथ गोमांसे पक्के सति केऽपि चौराः पथिकाच निर्विशका जाता भोजनं कतुं प्रवृत्ता इति, केऽपि गोमांसं बहुपापमिति भोजनाशां मुक्त्वा परिवेषने स्थिताः, अत्रान्तरे कूजका-व्यावहारकारिणो गवां व्यावर्तकाः पुरुषाः समागताः, तैः सर्वेऽपि-भोक्तारः परिवेषकाच पथिका वयमिति वाणा अपि चौरवत् 'घत्थे 'त्ति गृहीता विनाशिताश्च ॥ ११९ ॥ अमुमेवार्थ दार्शन्तिकेन योजयतिजेऽवि य परिवेसंती,भायणाणिधरंति य । तेऽवि बज्झति तिव्वेण, कम्मुणा किमु भोइणो? ॥१२०॥ चौरवत् येऽपि च साधवः प्रतिसेवन्ति अन्यानीतमाधाकाहारयन्ति, ये भाजनानि धरन्ति तेऽपि तीव्रण कर्मणा बध्यन्ते, किं पुनराधाकममोजिन ? इति, इह चौरस्थानीया आधाकर्मनिमन्त्रिणः, साधवो गोमांसभक्षकचौरपथिकस्थानीयाः स्वयं गृहीतनिमन्त्रिताधाकर्मभोजिनो गोमांसपरिवेषकादिरूपा, गोमांसमाधाकर्मसदृशमित्यादि ॥ १२० ॥ Jain Education Intel For Private & Personel Use Only Page #90 -------------------------------------------------------------------------- ________________ राजसुत दृष्टान्त: क्षमा रत्नीयावर्युपेता श्री. पिण्डनियुक्ति ॥२५॥ अथ राजसुतदृष्टान्त:सामत्थण रायसुए पिइवहण सहाय तह य तुहिक्का। तिण्हपि हु पडिसुणणा रण्णा सिटुंमिसा नत्थि॥ अस्याप्यक्षरार्थः कथानकादवसेयस्तच्चेदम् (१०६)-गुणसमृद्धनगरे महाबलभूपस्य शीलादेव्यां विजितसमरो ज्येष्ठपुत्रस्तस्य सामथणं, देश्या चिन्ता, यथेष मम पिता न म्रियते तदेनं निजभटान् सहायीकृत्य मारयामीति, एवं चिन्तयित्वा निजभटैः समं मन्त्रयितुं प्रावत, 'रायसुए 'त्ति, 'तृतीयार्थे सप्तमी' तेन राजसुतेन स्वभटैः समं सामथणंपर्यालोचनं पितृहनने प्रारब्धं, तत्र " केऽपि वयं तव सहाया" इति उक्तवन्तः, तथेति समुच्चये, तेन कैश्चिदुक्तमेवं कुरु, । केचित्पुनस्तूष्णीका जाता-मौनमेव स्थिताः, एतेषां त्रयाणामपि प्रतिश्रवणदोषः, केऽपि सर्व वृत्तान्तं भूपाय निवेदयामासुः, IN राज्ञः शिष्टे सा प्रतिश्रवणा नास्ति, ततो महिपतिना राजपुत्रादयो मारिता वृत्तान्तकथकाच पूजिता इति ॥१२१ ।। अमुमेवार्थ दार्शन्तिकेन योजयतिभुंज न भुंजे भुंजसु तइओ तुसिणीए भुंजए पढमो। तिण्हपि हु पडिसुणणा पडिसेहंतस्स सा नत्थि॥ केनापि साधुना चत्वारः साधव आधाकर्मणा निमन्त्रिता, यथा-भुवं यूयमेनमाहारमिति, तत्र प्रथमभुते द्वितीयः प्राह-न भुञ्जेऽहं, भुङ्क्षव त्वमिति, तृतीयस्तुष्णीको मौनमाश्रित्य स्थितः, तेषां त्रयाणामपि प्रतिश्रवणदोषो भवति, चतुर्थस्य पुनर्न कल्पते साधूनामाधाकर्मेति प्रतिषेधतः सः प्रतिश्रवणदोषो न स्यात् , अत्राह परः प्रथमस्याधाकर्मभुञ्जानस्य AG ॥२५॥ Jain Education Inter For Private & Personel Use Only w ww.jainelibrary.org Page #91 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Intern प्रतिषेवणदोष एव न स्यात् प्रतिश्रवणाख्यः, अत्रोच्यते- यावन्निमन्त्रितः सन् भोजनमभ्युपगच्छति तावन्नाद्यापि प्रतिषेवणमिति प्रतिश्रवणदोष एव ॥ १२२ ॥ अथामीषां भोजकादीनां कस्को दोषः स्याद्, अत आह— भुंगा का उ बीयस्स वाइओ दोसो । तइयस्स य माणसिओ तीहिं विसुद्धो चउत्थो उ ॥ आनतो मोजकचैतौ द्वावपि कर्म्मणा - आनयन भोजनरूपया कायक्रियया दोषवन्तौ, द्वितीयस्य वाचिको दोषस्तृतीयस्य मानसिक चतुर्थस्त्रिभिर्दोषैर्विप्रमुक्त इति ॥ १२३ ॥ अथ विशेषमाह - पडिसेवण पडिसुणणा संवासऽणुमोयणा उ चउरोवि । पियमारग रायसुए विभासियव्वा जइजणेऽवि ॥ पितृमारके राजसुते प्रतिषेवण प्रतिश्रवण संवासनानुमोदनारूपाश्चत्वारोऽपि दोषा घटन्ते, तथाहि तस्य पितृमारणाय प्रवृत्तत्वात् प्रतिषेवणं, “ वयं तव सहाया " इति भटवचनं प्रतिपद्यमानस्य प्रतिश्रवणं, तैरिव सार्द्ध संवसनं संवास:, तेषु बहुमानदानादिनाऽनुमोदना, एवं यतिजनेऽप्याधाकर्म्मभोक्तरि विभाषितव्याः - योजनीयाः, तदेवं यत्र प्रतिषेवणं तत्र नियमतत्वारोऽपि दोषाः, प्रतिश्रवणे च केवले त्रयः, संवासे द्वौ, अनुमोदना तु केवलैव, अत एवादिपदं गुरु शेषाणि तु पदानि लघुलघुलघुकादिनीति ॥ १२४ ॥ अथ संवासे पल्लीदृष्टान्तमाह ( दृ० ७ ) मिट्ठा चोरावणिया वयं न चोरत्ति । न पलाया पावकरत्ति काउं रन्ना उवालद्धा ॥१२५॥ बसन्तपुरेऽरिमर्दनो राजा प्रियदर्शनादेवीयुक्तो राज्यं प्रशास्ति, तत्रासन्ना भीमा नाम पल्ली, तस्यां बहवो दस्यवो आधाकम दोषतर तमता, पल्लिदृष्टा न्तश्व Page #92 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयावचूर्युपेता दृष्टान्त: श्री पिण्डनियुक्तिः ॥२६॥ वणिजश्च परिवसन्ति, चौरा: सकलमपि राजमण्डलमरिमर्दनसत्कमुपद्रवन्ति सदेशम् , अन्यदा भूपः सेनया तान् जेतुं जगाम, तैः सह युद्धं जातं, केऽपि हन्यमानाः परासवो बभूवुः, केपि पुनः पलायितवन्तः राजपल्ली विवेश, तत्रैत्य वणिजो न वयं चौरास्ततः किमस्माकं राजा करिष्यतीति बुद्धथा नानेशत, राज्ञा च तेऽपि ग्राहिताः, ततस्तैर्विज्ञप्तं न वयं चौरा इति, राजाऽवोचत्, यूयं चौरेभ्योऽप्यतीवापराधकारिण इति तेऽपि निगृहीताः, > गाथार्थस्तु सुगम एव ॥ १२५ ॥ दार्शन्तिकयोजनामाहआहाकडभोईहि सहवासो तह य तविवजपि । दसणगंधपरिकहा भाविति सुलूहवित्तिपि ॥ १२६॥ | एवं आधाकर्मभोक्तृभिः सह संवासो दोषाय स्यात, तथेति दृष्टान्तयोजने, यथा-चौरसहवासितां वणिजां तथेत्यर्थः, हेतुमाह-यस्तद्विवर्जमपि आधाकर्मपरिहारकमपि ८ सुरूक्षमपि > साधु लक्षाहारमपि आधाकर्मसम्बन्धिन्यो दर्शनगन्धपरिकथा भावयन्ति, तद्भावनायुक्तं कुर्वन्ति ॥ १२६ ॥ अनुमोदनायां राजदुष्टदृष्टान्तमाह (१०८)रायारोहऽवराहे विभूसिओ घाइओ नयरमज्झे । धन्नाधन्नत्ति कहा वहावहो कप्पडिय खोला ॥१२७॥ - श्रीनिलयनगरे गुणचन्द्रभूपस्य गुणवतीप्रमुखा अन्तःपुर्यः, तत्रैव च सुरूपो नाम वणिग् अतिरूपवान् , अन्यदा राजान्तःपुरासन्ने गच्छन् अन्तःपुरिकाभिः सस्नेहं विलोकितः, तेनापि ताः सानुरागमवेक्षिताः, परस्परमनुरागो जाता, दृतीनिवेदितप्रयोगवशेन च ताः प्रतिदिनं तेन सेवितुमारब्धाः, राज्ञा ज्ञातं, यैर्भूषणैरलङ्कतस्तैर्युक्त एव सकलजनसमक्षं नगर ॥२६॥ Jain Education in | Page #93 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आधाकर्मानुमोदनाप्रकार मध्ये विनाशितः, राजा कोपावेशात् हेरिकांस्तत्र मुश्चति स्म, तत्र केऽपि लोका धन्य इति कथयन्ति, येन मनुष्यजन्मनि राजान्तःपुरिकाः भुक्तेति तेषां वधो जातः, केऽप्यधन्योऽयमिति वदन्ति, येन स्वामिकलत्रं जननीसममित्यज्ञानवर्तव चक्रे, तेषामवधः पूजा च, जाताः। गाथार्थस्त्वयम् , राजावरोधापराधे यैराभरणैर्विभूषितस्तैरिव विभूषितो नगरमध्ये घातितः, ततः कार्पटिकवेषधारिणः खोला:-हेरिका राज्ञा नियुक्ताः, लोकानां च धन्याधन्यकथा, ततो धन्यकथाकारिणां विनाश इतरेषां तु पूजा इति, दार्टान्तिकयोजना स्वयं भाव्या ॥१२७ ।। अनुमोदनाप्रकारमाहसाउं पज्जत्तं आयरेण काले रिउक्खमं निद्धं । तग्गुणविकत्थणाए अभुंजमाणेऽवि अणुमन्ना ॥१२८॥ ___ आधाकर्मभोजिनमुद्दिश्य केचिदेवं त्रुवते, एते स्वादुमन्योऽन्यं लभन्ते, पर्याप्तं-परिपूर्णमादरेण काले-भोजनवेलायां ऋतुक्षम शिशिरादिऋतुयोग्यं स्निग्धं, न तु वयमिति, तद्गुणविकथनया-तद्गुणप्रशंसनया अभुञ्जानेऽपि अनुमन्या-अनुमोदना | भवति ॥ १२८ ॥ मूलद्वारगाथायां " आहाकम्मे नामा" (नि. ९४ ) इति व्याख्यातम् , अथ " एगट्ठ" इत्याहआहा अहे य कम्मे आयाहम्मे य अत्तकम्मे य ।जह वंजणनाणत्तं अत्थेणऽवि पुच्छए एवं ॥१२९॥ अत्र परः पृच्छति, आधाकर्म अधःकर्म आत्मघ्नमात्मकम्र्मेति प्रतिषेवणादीनामात्मकर्मण्यन्त तत्वाच्चतुर्षु नामसु यथा व्यञ्जनै नात्वं तथा अर्थेनापि नानात्वं किं वा नेति ?, अयं भावः-आधाकादिनाम्नां व्युत्पत्तिनिमित्तं पृथग २ उक्तं, यथा तथा प्रवृत्तिनिमित्तमपि तथैव, अत्रोत्तरमाह ।।१२९॥ अत्र शिष्यबुद्धिवृद्धये सामान्यतो नामविषयां चतुर्भङ्गिकामाह JainEducation int Page #94 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयावचूर्युपेता आधाकर्मणि चतुर्मशिका श्री A पिण्डनियुक्तिः ॥२७॥ एगट्टा एगवंजण एगट्टा नाणवंजणा चेव । नाणट्र एगवंजण नाणदा वंजणानाणा ॥ १३०॥ जगति नामानि चतुर्धा वर्त्तन्ते, तथाहि-एकार्थानि एकव्यञ्जनानि १, एकार्थानि नानाव्यञ्जनानि २, नानार्थानि एकव्यञ्जनानि ३, नानार्थानि नानाव्यञ्जनानि ४ ॥ १३० ॥ एतेषामुदाहरणान्याहदिखीरं खीरं एगद्रं एगवंजणं लोए । एग; बहनामं दुद्ध पओ पील खीरं च ॥ १३१॥ ____ लोके क्षीरं क्षीरमिति एकार्थ एकव्यञ्जनं च नाम दृष्टम् , यथैकत्र गृहे गोदुग्धादौ क्षीरं तत्रान्यत्रापीति, दुग्धं पयः पीलु क्षीरं चैतानि एकार्थानि नानाव्यञ्जनानि च नामानि ॥ १३१ ॥ गोमहिसिअयाखीरं नाणटुं एगवंजणं नेयं । घडपडकडसगडरहा होइ पिहत्थं पिहं नामं ॥ १३२ ॥ गोमहिष्यजानां क्षीरमिति नानार्थमेकव्यञ्जनं च नाम ज्ञेयं, क्षीरं इत्येके नाम्नः पृथगर्थयोगात् , घटपटकटशकटरथा इत्यादि नाम पृथगर्थ पृथग् व्यञ्जनं च ज्ञेयम् , नानार्थ नानाव्यञ्जनं चेति ॥ १३२ ॥ अथाधाकर्मणि चतुर्भङ्गिकां यथासम्भवं योजयति गाथाद्वयेनआहाकम्माईणं होइ दुरुत्ताइ पढमभंगो उ । आहाकम्मति य बिइओ सक्किंद इव भंगो ॥ १३३॥ आहाकम्मतरिया असणाई उ चउरो तइयभंगो।आहाकम्म पहुच्चा नियमा सुन्नो चरिमभंगो॥१३४॥ ॥२७॥ Jain Education Inter For Private Personel Use Only Tww.jainelibrary.org Page #95 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चताना घटना आधाकर्मादिनाम्नां युगपद्धहुभिः पुरुषरेकेन वा कालभेदेन वा एकस्मिन्नेवाशनादिरूपे वस्तुनि यद्विरुक्तादि-द्विरु- चारणादिः सम्भवति, स प्रथमो भङ्गा, अयमर्थः-यथैकत्र वसतावशनविषये केनाप्याधाकर्मेति नाम प्रयुक्तं, तथाऽन्यत्रापि एवं सर्वाण्यायाधाकर्मादिनामानि एकार्थानि एकव्यञ्जनानि, तथा आधाकर्म अधःकर्मेत्यादीनि नामानि विवक्षिताशनादिरूपैकविषये प्रवर्तमानानि द्वितीयो भङ्गः, एकार्थानि नानाव्यञ्जनानीति, यथा-शक इन्द्र इति, तथा अशनादयः-अशनपानखादिमस्वादिमरूपाश्चत्वार आधाकान्तरिता-आधाकर्मशब्देन व्यवहिता यथाऽशनमाधःकर्म पानमाधाकर्मेत्यादिस्वतीयो भतः, नानार्थकव्यञ्जनरूपा, आधाकम्मरूपं नामाश्रित्य पुनर्नियमाचरमभङ्गो नानार्थानि नानाव्यञ्जनानीत्येवंरूपो नास्ति, उपलक्षणत्वात् प्रत्येकं सर्वाण्यपि, यदा तु कोऽन्यशनविषये आधाकर्म वक्ति पानविषये त्वाधाकर्म खादिमे त्वात्मनं स्वादिमे त्वात्मकम्र्मेति, तदाऽमूनि नामानि नानार्थानि नानाव्यञ्जनानीति चरमोऽपि भङ्गः सम्भवति ॥ १३३-१३४ ॥ द्वितीयमङ्गं विशेषाद्भावयतिइंदत्थं जह सद्दा पुरंदराई उ नाइवत्तंते । अहकम्म आयहम्मा तह आहे नाइवत्तंते ॥ १३५ ।। __ यथा पुरन्दरादयः शब्दा इन्द्रार्थ-इन्द्रशब्दवाच्यमर्थ नातिवर्तन्ते-नातिकामन्ति, तथा अधःकर्म आत्मन्नं, उपलक्षणवादात्मकर्मशब्दश्च 'आई 'त्ति, 'सूचनात् सूत्र' मित्याधाकर्म वाच्यमथं नातिवर्तन्ते ॥ १३५ ।। तदेवाहआहाकम्मेण अहेकरेति जं हणइ पाणभूयाई। जंतं आययमाणो परकम्मं अत्तणो कुणइ ॥ १३६ ॥ Jain Education Inter For Private & Personel Use Only ANT Page #96 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीया वचूर्युपेता श्री पिण्डनिर्युक्तिः ॥ २८ ॥ Jain Education Intern आधा कर्म्मणा भुज्यमानेनाधः करोति आत्मानं संयमात् सद्गतेर्वा यस्मादाधाकर्म्मणा प्राणान् द्वीन्द्रियादीन् भूतान्वनस्पतिकायान् उपलक्षणत्त्रात् जीवान् सवाँश्च दन्ति, यस्मात्तदाघाकर्म्म आददानः परकर्म्म आत्मनः सम्बन्धी करोति ||| १३६ ॥ मूलद्वारगाथायां " एगट्ठा " ( नि. ९४ ) इति व्याख्यातं, अथ " कस्स वावि " ( नि. ९४ ) इति व्याख्यानयतिकस्सति पुच्छिमी नियमा साहम्मियस्स तं होइ । साहम्मियस्स तम्हा काय व परूवणा विहिणा ॥ १३७ । कस्यार्थाय कृतमाधाकर्म भवतीति पृष्टे परेणोत्तरमभिधीयते, नियमात् साधम्मिकस्यार्थाय कृतं तत्-आधाकर्म भवति, तस्मात् साधर्मिकस्य प्ररूपणा विधिनाऽऽगमोक्तेन कर्तव्या || १३७ || साधम्मिक भेदानाह— नाठवणा दविए खेत्ते काले अ पवयणे लिंगे। दंसण नाण चरित्ते अभिग्गहे भावणाओ य ॥१३८॥ एते द्वादश साधम्मिका भवन्ति, सुगमोऽर्थः ॥ १३८ ॥ भेदान् गाथात्रयेण व्याख्यानयतिनामि सरिसनामो ठवणाए कटुकम्ममाईया । दबंमि जो उ भविओ साहंमि सरीरगं चैव ॥१३९ खेत्समाणदेसी कालम्मि समाणकालसंभूओ । पवयणि संघेगयरो लिंगे रयहरणमुहपोती ॥१४०॥ दंसण नाणे चरणे तिग पण पण तिविह होइ उ चरिते । दवाइओ अभिग्गह अह भावणमो अणिच्चाई ॥ नाम्नि सदृशनामा साधमिकः, स्थापनायां काष्टकम्मदिकाः स्थापितमूर्त्तयो जीवतां साधूनां साधम्मिकाः, द्रव्ये यो साधर्मिकभेदाः ॥ २८ ॥ Page #97 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सामान्यतः कल्प्याकल्प्यविधिः भव्यस्तेनैव शरीरेण, भावे दीक्षायोगः, 'स' इति अथवा साधर्मिकशरीरं सिद्धशिलातलादिगतमपगतजीवं, तदप्यतीतावस्थाऽपेक्षया द्रव्य इति, क्षेत्रे समानदेशसम्भूतः, काले एककालसम्भृतः, प्रवचने साध्वादिरूपचतुष्टयसङ्घमध्ये एकतरः, लिङ्गे रजोहरणमुखवस्त्रिका उपलक्षणत्वादन्योपकरणानि च तद्वान् साधम्मिक इति, सर्वत्र क्षायिकक्षायोपशमिकौपशमिक मेदात्रिधा दर्शने, मतिश्रुतावधिमनःपर्यवकेवलज्ञानभेदात् पञ्चधा ज्ञाने, यथा मतिज्ञानिनो मतिज्ञानी साधर्मिक इति सर्वत्र | ज्ञेयम् , सामायिकछेदोपस्थापनपरिहारविशुद्धिसूक्ष्मसम्पराय( यथाख्यात )भेदात पञ्चधा चारित्रे, 'तिविह 'त्ति मतान्तरेण पक्षायिकक्षायोपशमिकोपशमिकभेदात् त्रिधा वा भवति चारित्रे, द्रव्यक्षेत्रकालभावभेदाच्चतुर्दा अभिग्रहे, अथ भावनाया. मनित्यादिभेदावादशधा साधम्मिका इति सर्वत्र ॥ १३९-१४१ ।। अथ नामसाधम्मिकमुद्दिश्य कल्प्याकल्प्यविधिमाहजावंत देवदत्ता गिहीव अगिहीव तेसि दाहामि । नो कप्पई गिहीणं दाहंति विससिये कप्पे ॥१४२॥ यावन्तो देवदत्ता गृहस्था अगृहस्था वा तेभ्यो दास्यामीत्युक्ते देवदत्ताख्यस्य साधोर्न कल्पते, तदुक्तं देवदत्तशब्देन तस्यापि सङ्कल्पविषयीकरणात् , यदा तु गृहस्थानां देवदत्तानां दास्ये इति विशेषिते सति कल्पते ॥ १४२ ।। पासंडीसुवि एवं मीसामीसेसु होइ हु विभासा । समणेसु संजयाण उ विसरिसनामाणवि न कप्पे ॥ तथा पाखण्डिषु एवं पूर्वोक्तप्रकारेण मिश्रामिश्रेषु विभाषा कर्तव्या, अत्र सामान्यसङ्कल्पविषया मिश्रा उच्यन्ते, यथा यावन्तः पाखण्डिनो देवदत्ता इति विशेषकल्पविषयास्त्वमिश्रा यथा यावन्तः सौगता देवताः पाखण्डिन इति तत्र मिश्र Jain Eduent an inte For Private & Personel Use Only Page #98 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयावचूर्युपेता| श्रीपिण्डनियुक्तिः ॥२९॥ सङ्कल्पिते सति न कल्पते देवदत्तपाखण्डिशब्दाभ्यां देवदत्ताख्यस्य साधोरपि सङ्कल्पविषयीकरणाव , अमिश्रसङ्कल्पे साधु- विशेषतः व्यतिरिक्तान्यपाखण्डिभ्यो दास्यामीत्यादिरूपे कल्पते सङ्कल्पविषयाभावात् , यथा पाखण्डिषु तथा श्रमणेष्वपि मिश्रामिश्रेषु । कल्प्याविभाषा कर्त्तव्याः, यतः श्रमणा: शाक्यादयो भण्यन्ते यतो वक्ष्यति-"निग्गंथसकतावसगेरुय आजीव पंचहा समणा" यथा कल्प्ययावन्तः श्रमणाः देवदत्ताख्यास्तेभ्यो दास्यामीति मिश्रसङ्कल्पे न कल्पते, यावन्तः शाक्याः श्रमणाः साधुव्यतिरिक्ता वा विधिः तेम्यो दास्यामीत्यमिश्रसङ्कल्पे कल्पते, तीर्थङ्करप्रत्येकबुद्धानां सङ्घातीतत्वेन सङ्घमध्यवर्तिभिः सह साधम्मिकत्वाभावात् , Td " संजयाण उ विसरिसनामाणवि न कप्पा" इति वचनाचार्थ्यापत्त्या यावन्तो देवदत्ता इत्यादौ विसदृशचैत्रादि नाम्ना साधूनां कल्पते इति प्रतिपादितं द्रष्टव्यम् ॥ १४३ ॥ अथ स्थापनाद्रव्यसाधम्मिकावाश्रित्य कल्प्याकल्प्य विधिमाहनीसमनीसा व कडं ठवणासाहम्मियम्मि उ विभासा। दवे मयतणुभत्तं न तं तु कुच्छा विवज्जेजा ॥१४४| इह कोऽपि गृही गृहीतप्रबज्यस्य मृतस्य जीवतो वा पित्रादौ स्नेहवशात् प्रतिकृति कृत्वा तत् पुरतो ढोकनाय बलिं करोति सा द्विधा-निश्रयाऽनिश्रया च, तत्र ये रजोहरणधारिणो मत्पितृतुल्यास्तेभ्यो दास्यामीति सङ्कल्पे निश्रा, तद्विपरीता स्वनिश्रा, ततः स्थापनासाधमिकनिश्रयाऽनिश्रया वा कृतं भक्तादि तत्र विभाषा कर्त्तव्या, यदि निश्राकृतं तदा न कल्पते, अनिश्राकृतं तु कल्पते, प्रवृत्तिदोषप्रसङ्गादाचार्या निषेधयन्ति च, तथा द्रव्ये द्रव्यसाधर्मिके मृतस्य साधोर्या तनुस्तस्याः पुरतो ढौकनाय कृतं भक्तं निश्राकृतं, अनिश्राकृतं प्रागवत् द्विधा, तन्नेति-तन्नैव कल्पते, अनिश्राकृतं तु कल्पते, परं लोके जुगुप्सा स्यादिति वर्जयन्ति ॥ १४४ ॥ क्षेत्रकालावाश्रित्याह ॥२९॥ Jain Education Inter For Private & Personel Use Only | Page #99 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विशेषत: कल्प्या तत्र क्षेत्रे यथा सौराष्मता भवति, तदा तस्याव्यमिति सङ्कल्पे तमिहको, दर्शनेन सह काला कल्पते, यदा तु सोमवातदिनजातेभ्यः पाशतिः, तद्यथा-प्रवचनस्यादिभिः सह पश्च, दमक विधि: पासंडियसमणाणं गिहिनिग्गंथाण चेवउ विभासा।जह नाममितहेव य खेत्ते कालेय नायत्वं ॥१४५॥ ___यथा नाम्नि तथा क्षेत्रे काले च पाखण्डिनां श्रमणानां गृहिणां निर्ग्रन्थानां च विभाषा स्यादिति ज्ञातव्यम् , तत्र क्षेत्रं सौराष्ट्रादिकं, कालो दिनादिः, तत्र क्षेत्रे यथा सौराष्ट्रदेशोत्पन्नेभ्यः पाखण्डिम्यो मया दातव्यमिति सङ्कल्पे सौराष्ट्रदेशोत्पन्नस्य साधोन कल्पते, यदा तु सौगतादिविशेषः कृतो भवति, तदा तस्यापि कल्पतेऽन्यदेशोत्पन्नानां तु कल्पत एव, इत्थं श्रमणादिष्वपि कालसार्मिकेऽपि विवक्षितदिनजातेभ्यः पाखण्डिभ्यो दातव्यमिति सङ्कल्पे तद्दिनजातस्य न कल्पते इत्यादि भावनीयम् , शेषप्रवचनादिपदसप्तके द्विकसंयोगा भङ्गा एकविंशतिः, तद्यथा-प्रवचनस्य लिङ्गेन सहेको, दर्शनेन सह द्वितीयो, ज्ञानेन सह तृतीयः, एवं यावद्भावनया सह षष्ठ इति षड्भङ्गाः, एवं लिङ्गस्य दर्शनादिभिः सह पश्च, दर्शनस्य ज्ञानादिभिः सह चत्वारः, ज्ञानस्य चारित्रादिभिः सह त्रयः, चारित्रस्याभिग्रहभावनाभ्यां द्वौ, अभिग्रहस्य भावनया सहक इति एकविंशतिः, एतेषु भङ्गेषु च प्रत्येकमेकैका चतुर्भङ्गिकाः, यथा प्रवचनसाधम्मिको न लिङ्गतः, लिङ्गतः साधम्मिको न प्रवचनतः, प्रवचनतः साधम्मिको लिङ्गतश्च, न प्रवचनतो न लिङ्गतश्च, शेषा अपि चतुर्भङ्गिकाः स्वयमूह्याः ॥ १४५ ॥ आधचतुर्भङ्गिकायाः प्रथमभङ्गद्वयोदाहरणं दर्शयतिदस ससिहागासावग पवयण साहम्मिया न लिङ्गेणालिङ्गेण उसाहम्मी नो पवयण निहगा सवे॥१४॥ दशमी प्रतिमां प्रतिपन्ना आद्यप्रतिमाप्रारम्भात् सशिखाका:-सकेशा इति-हेतोः श्रावकाः प्रवचनसाधम्मिका न लिङ्गेन, For Private & Personel Use Only Page #100 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा भङ्गघटना रत्नीयावर्युपेता श्री पिण्डनियुक्तिः अत्र निमित्तकारणहेतुषु सर्वासां विभक्तीनां प्रायो दर्शन मिति हेतौ प्रथमा, लिङ्गतः साधमिका न प्रवचनतो निवा, निहवाश्च ज्ञाताज्ञातभेदेन द्विधा, तत्र ये ज्ञातास्तेऽत्र ग्राह्या, अज्ञातानां तु लोके साधुत्वे न प्रतिषिद्धत्वादेषामर्थाय कृतं कल्पते साधूनां चकारादिहोत्तरत्रादि भङ्गद्वयमाद्यमेव कथयिष्यति, शेषं भङ्गद्वयं स्वयमृद्य, यथाऽत्र प्रवचनतः साधम्मिका लिङ्गतश्च साधव एकादशमी प्रतिमा प्रतिपन्नाः श्रावका वा तत्र साधनामर्थाय कृतं कल्पते श्रावकाणां त्वाय कृतं कल्पते न प्रवचनतः साधम्मिकानामपि लिङ्गतस्तीर्थकरप्रत्येकबुद्धाः, तेषां प्रवचनलिङ्गातीतत्वात् , तदर्थकृतं कल्पते ॥ १४६ ॥ शेषचतुर्भङ्गिकानां भङ्गाद्वयं चाहविसरिसदसणजुत्ता पवयणसाहम्मिया नदसणओ।तित्थगरा पत्तेया नो पवयणदंससाहम्मी ॥१४७ विसदृशदर्शनयुक्ताः प्रवचनसाधम्मिका न दर्शनतो, यतः साधूनां श्रावकाणां वा केषाश्चिदपि क्षायोपशमिकं दर्शनमन्येषां क्षायिकमपरेषामौपशमिकमिति भिन्नता दर्शने दृश्यते, तीर्थङ्करप्रत्येकबुद्धा न प्रवचनतो दर्शनतः साधम्मिकाः समानदर्शनत्वात् , तेषामर्थाय कृतं कल्पते साधूनां एवं द्वितीयचतुर्भङ्गिकाबभङ्गद्वयं, एवं सर्वत्र ।। १४७॥ अथ तृतीयचतुर्थभङ्गिकयोः स्वरूपमाहनाण चरित्ता एवं नायवा होंति पवयणेणं तु। पवयणओसाहम्मी नाभिग्गह सावगा जइणो ॥१४८॥ साहम्मऽभिग्गहेणं नोपवयण निण्ह तित्थ पत्तेया। एवं पवयणभावण एत्तो सेसाण वोच्छामि ॥१४९॥ ॥३०॥ Jain Education Inter Tww.jainelibrary.org Page #101 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विविध चतुर्भङ्गि काणां घटना। यथा प्रवचनेन सह दर्शनमुक्तं एवं ज्ञानचारित्रेऽपि मङ्गद्वयोपन्यासेन प्रवचनेन सह योज्ये, यथा प्रवचनतः साधम्मिका न ज्ञानतो, विसदृशज्ञानसहिताः साधवः श्रावका वा, साधूनामय कृतं कल्पते नैत्र, श्रावकाणां त्वर्थाय कृतं करपते इति सर्वत्र, ज्ञानतः साधर्मिका न प्रवचनस्तीर्थङ्करप्रत्येकबुद्धाः एवं चारित्रेणापि सदृशादिपर्योगः कार्यः। पञ्चमषष्ठीचतुर्भङ्गिकयोराचं भेदद्वयमाह गाथार्द्धम् पाश्चात्यं-प्रवचनतः साधम्मिकतोऽभिग्रहतः श्रावका यतयश्च विसदृशाभिग्रहसहिताः अभिग्रहेण साधम्मका न प्रवचनेन निहवतीर्थङ्करप्रत्येकबुद्धाः, एवं प्रवचनेन सह भावना विसदृशादिपर्योज्या, यथा प्रवचनतः साधम्मिका न भावनातः साधवः श्रावका वा विसदृशभावनायुक्ताः, भावनातः साधम्मिका न प्रवचनतो निह्नवतीर्थङ्करप्रत्येकबुद्धाः, एवं शेषभङ्गद्वयमपि ज्ञेयम् , तदेवं प्रवचनाश्रिता षडपि चतुर्भङ्गाः, इतः शेषचतुर्मङ्गिकानामुदाहरणानि वक्ष्ये ।। १४८-१४९॥ । लिङ्गाईहिवि एवं एकेकेणं तु उवरिमा नेया। जेऽनन्ने उवरिल्ला ते मोत्तुं सेसए एवं ॥ १५०॥ 'सप्तम्यर्थे तृतीया' ततो लिङ्गादिष्वपि पदेषु एकैकेन लिङ्गादिना पदेन उपरितनानि-दर्शनज्ञानप्रभृतीनि पदानि नयेत् , पूर्वोक्तानुसारेण चतुर्भङ्गिका ज्ञेयेति, अतिसङ्किप्तव्याख्यानमितीहविशेषमाह-जेऽणन्ने इति, ये अनन्ये उदाहरणा. पेक्षया अन्यादृशा न भवन्ति किन्तु तुल्या एवेति तान् मङ्गकान् मुक्त्वा शेषानुपरितनान् मेदानेवं वक्ष्यमाणप्रकारेण NI जानीत, अयं भावः-लिङ्गदर्शनयोर्ये चत्वारो भङ्गाः सोदाहरणा वक्ष्यन्ते-तत् समाना एव, लिङ्गज्ञानलिङ्गचरणयोरपि भङ्गाः, ना तान् मुक्त्वा लिङ्गदर्शनलिङ्गाभिग्रहादि भङ्गानुदाहरिष्यामि, तत्र लिङ्गदर्शनचतुर्भङ्गिका ॥ १५० ॥ आघमङ्गद्वयमाह Jain Education in For Private & Personel Use Only Page #102 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्वमारत्नीया. |विविधचतुङ्गिकास्वरूपम् । वचूर्युपेता श्रीपिण्डनियुक्ति। लिडेण उ साहम्मी न दंसणे वीसुदसि जइ निहा। पत्तेयबुद्ध तित्थंकरा य बीयमि भंगमि ॥१५१॥ लिङ्गेन साधम्मिका न दर्शनेन विष्वग्दर्शना-विभिन्नदर्शना यतयो निवाश्च, उपलक्षणत्वादेकादश प्रतिमाप्रपन्नाः श्राव- काश्च, प्रत्येकबुद्धतीर्थकरा द्वितीयभङ्गे दर्शनतः साधर्मिका न लिङ्गत इत्येवंरूपे ॥ १५१ ॥ अथ लिङ्गज्ञानलिङ्गचारित्रचतुर्भङ्गिकाद्वयं समानमित्यनुक्ता (2) लिङ्गाभिग्रहचतुर्भङ्गिकाद्यभङ्गद्वयमाहलिंगेण उनाभिग्गह अणभिग्गह वीसुऽभिग्गही चेवाजइ सावगबीयभंगे पत्तेयबुहाय तित्थयरा ॥१५२/ लिङ्गेन साधम्मिका नाभिग्रहतोऽनभिग्रहाः, विष्वगभिग्रहा( हिणो)-विभिन्नाभिग्रहयुक्ता यतय एकादशप्रतिमास्था: श्रावका वा, अभिग्रहतः साधम्मिका न लिङ्गत इति द्वितीयमङ्गे प्रत्येकबुद्धास्तीर्थङ्कराश्च ॥ १५२॥ लिङ्गभावनाचतुर्भङ्गिका. स्वरूपमाहएवं लिङ्गेण भावण यथा लिङ्गे अभिग्रहेण तथा भावनया भङ्गा वाच्या इति, यथा लिङ्गतः साधम्मिका न भावनातो भावनारहिता विष्वग्भावना वा, यतय एकादशप्रतिमास्था श्रावका वा इत्यादि, दर्शनज्ञानचतुर्भङ्गिकाद्यभङ्गद्वयमाहदंसणनाणं य पढम भंगो उ। जइ सावग वीसुनाणी एवं चिय बिइय भंगोऽवि ॥ १५३ ॥ दर्शनज्ञाने दर्शनतः साधम्मिका न ज्ञानत इत्येवंरूपः प्रथमो भङ्गा, यतयः श्रावका वा विष्वग्वानिनो-विभिन्नज्ञाना: ॥३१॥ ISH Jain Education Inter! For Private Personal Use Only w.jainelibrary.org Page #103 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education I समानदर्शना वा, एवमेव ज्ञानतः साधम्मिका न दर्शनतः इत्येवंरूपो द्वितीयो भङ्गो ज्ञेयः । यतयः श्रावकाश्च तत्रापि केवलं विभिन्नदर्शनाः समानज्ञाना इति ।। १५३ ।। दर्शनचरणचतुर्भङ्गिकाद्य मङ्गद्वयमाह - दंसणचरणे पढमो सावग जइणो य बीयभंगोउ । जइणो विसरिसदंसी दंसे य अभिगहे वोच्छं ॥ १५४ ॥ दर्शनचारित्रे दर्शनतः साधम्मिका न चरणत इत्ययं प्रथमो भङ्गः समानदर्शनाः श्रावका विसदृशचरणा पतयश्च द्वितीयो मङ्गश्चरणतः साधम्मिका न दर्शनत इति, तत्र विसदृशदर्शनाः समानचारित्रा यतय इति, दर्शने अभिग्रहे चाद्यमङ्गद्वयं वक्ष्ये ॥ १५४ ॥ तदेवाह - सावग जइ वीसऽभिग्गह पढमो बीओ य भावणा चेवं । नाणेणऽवि नेज्जेवं एचो चरणेण वोच्छामि ॥ १५५ समानदर्शना विष्वगभिग्रहा - विभिन्नाभिग्रहाः श्रावका यतयश्च दर्शनतः साधम्मिका नाभिग्रहत इति प्रथमो मङ्गः, द्वितीयोऽपि भङ्गोऽभिग्रहतः साधम्मिका न दर्शनत इति तत्रापि यतिश्राद्धा एव परं विभिन्नदर्शनाः समानाभिग्रहा ज्ञेया इति, दर्शनभावनाचतुर्भङ्गिकाद्यभङ्गद्वयं सूचयति — यथा दर्शनेन अभिग्रह उदाहृतः, एवं भावनापि वक्तव्या । यथा दर्शनतः साधर्मिका न भावनातो, विसदृशभावनाः समानदर्शनाः श्रावका यतयश्चेत्यादि, अथ ज्ञानस्य चारित्रादिभिः सह चतुर्भङ्गिका प्ररूपणमाह यथा दर्शनेन सह चतस्रश्चतुर्भङ्गिका उक्तास्तथा ज्ञानेनापि सह चारित्रादीनि पदान्यधिकृत्य तिस्रश्चतुर्भङ्गिका ज्ञेयाः । भिन्नभिन्नचतुमङ्गिकाः । Page #104 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धमा 1. गवेषणायां गज रत्नीयावचूर्युपेता श्रीपिण्डनियुक्तिः। ॥३२॥ अतीव सजिप्तमिदमिति विशेषमाह अवचूरिकृत-ज्ञानचरणयोश्चतुर्भङ्गिका १ज्ञानाभिग्रहयोश्च २ ज्ञानभावनयोस्तृतीया । 'इत्तो' इति-इत ऊर्ध्व चरणेन सह ये द्वे चतुर्भङ्गिके तदुदाहरणानि वक्ष्ये ॥१५५॥ प्रथमचतुर्भङ्गिकाया आद्यमङ्गद्वयमाह जइणो वीसाभिग्गह पढमो बिय निण्हसावगजइणो उ(ईणो)। एवं तु भावणासुऽवि वोच्छं दोण्हंतिमाणित्तो ॥ १५६ ॥ चरणतः साधम्मिका नाभिग्रहत इति प्रथमो मङ्गः, समानचरणा विष्वग्-विभिन्नाभिग्रहा यतयः अभिग्रहतः साधम्मिका न चरणत इति द्वितीयो भङ्गः समानाभिग्रहनिवाः श्रावका विभिन्नचरणा यतयश्च, चरणभावनयोश्चतुर्भङ्गिकाद्यभङ्गद्वयमाह यथा चरणेन सहाभिग्रह उदाहृत एवं भावनास्वपि वाच्यम् , यथा चरणतः साधम्मिका न भावनातो यतय इति प्रथमो भल इत्यादि, अथाभिग्रहभावनयोश्चतुर्भङ्गिका वक्तुमाह___ इतोऽभिग्रहभावनालक्षणयोः पदयोश्चतुर्भङ्गिकामुदाहरणतो वक्ष्ये ॥ १५६ ॥ आद्यमङ्गद्वयमाह| जइणो सावगनिण्हव पढमे बिइए य हुंति भंगे य। केवलनाणे तित्थंकरस्स नो कप्पइ कयं तु ॥१५७॥ अभिग्रहतः साधमिका न भावनात इत्येवं प्रथमे भने तथा भावनातः साधम्मिका नाभिग्रहत इत्येवंरूपे द्वितीयमले यतयः श्रावका निहवाश्च भवन्ति, परं प्रथमे भने समानाभिग्रहा विसदृशभावना, द्वितीये तु समानभावना विसदृशाभिग्रहा इति ज्ञेयम् , अत्र शेषमङ्गद्वयमपि लिख्यते-अभिग्रहतः साधमिका भावनातच समानत्वाद्यतिप्रमुखा एव, नाभिग्रहतो AU॥३२॥ in duet an internation For Private Personal Use Only Page #105 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चतुर्मङ्गिकाणामतिदेशः। नापि भावनातोऽसमानत्वात् , त एव इत्थमनुक्ता अपि पाश्चात्यभङ्गकेषु भङ्गाः स्वयमृह्याः। अत्र सर्वत्र श्रावकलोकविख्यातनिहवानां कृते कृतं कल्पते, प्रत्येकबुद्धतीर्थकुदर्थकृतं साधूनामर्थाय च कृतं न कल्पते, एवमेकविंशतिरपि चतुर्भङ्गिकाः प्रोक्ताः, अथ सामान्यकेवलिनं तीर्थकरं चाधिकृत्य करण्याकल्प्यविधि कथयति । केवलज्ञानिनः सामान्यसाधो उपलक्षणत्वात्तीर्थङ्करप्रत्येकबुद्धवर्जशेषसाधूनामित्यर्थः, तीर्थङ्करस्य, तीर्थकरग्रहणमुपलक्षणं, तेन प्रत्येकबुद्धस्य चार्थाय कृतं, यथाक्रमं न कल्पते, तुशब्दस्यानुक्तसमुच्चायकत्वात् , कल्पते च, अयं भावः-तीर्थकरप्रत्येकबुद्धवर्जशेषसाधूनामर्थाय कृतं न कल्पते तीर्थकरप्रत्येकबुद्धानां त्वर्थाय कृतं कल्पते, तथा हि-तीर्थकरनिमित्तं कृतेऽपि समवसरणे साधूनामुपदेशश्रवणार्थमुपवेशनादि कल्पते, एवं भक्ताद्यपि, एवं प्रत्येकबुद्धस्यापि, कापि तु पाठ एवायं-"केवलनाणे तित्थंकरस्स जह कप्पड़ कयं तु" अत्र तु कल्पते इति सङ्गतमेव ॥१५७ ।। अथ यानाश्रित्य पूर्वोक्ता भङ्गाः सम्भवन्ति तान् प्रतिपादयतिपत्तेयबुद्धनिण्हव उवासए केवली वि आसज । खइयाइए य भावे पडुच्च भंगे उ जोएजा ॥१५॥ प्रत्येकबुद्धान् निवान् उपासकान्-श्रावकान् केवलिनः, अपिशब्दाच्छेषसाधूनाश्रित्य तथा क्षायिकादीन् भावान् क्षायिकादिदर्शनानि, चशब्दाद्विचित्राणि ज्ञानानि चरणानि अभिग्रहान् भावनाश्च प्रतीत्य भङ्गान् योजयेत्, तथैव चोक्ता | इति स्थितम् ॥ १५८ ॥ अथ प्रथमचतुर्मङ्गिका प्रवचनलिङ्गविषयामधिकृत्य विशेषमाह Jan Education a For Private Personal Use Only l Page #106 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीया वचूर्युपेता श्री 'पिण्डनिर्युक्तिः । ॥ ३३ ॥ Jain Education Interla जत्थ उतइओ भंगो तत्थ न कप्पं तु सेसए भयणा । तित्थंकर केवलिणो जहकप्पं नो य सेसाणं ॥ १५९ सूचनात् सूत्र 'मिति यत्र साधर्मिके तृतीयो भङ्गः प्रवचनतः साधर्मिका लिङ्गतचेत्येवंरूपस्तत्र न कल्पते, यतः प्रत्येकबुद्ध तीर्थकर वर्जा यतयस्ततस्तेषामर्थाय कृतं न कल्पते, तुशब्दोऽनुक्तस्य समुच्चये, तत एकादश प्रतिमां प्रतिपन्नस्य श्रावकस्य तृतीयभङ्गभाविनोऽप्यर्थाय कृतं कल्पते इति केचित्पुनराहुः - सोऽपि प्रतिमावान् साधुकल्प इति न कल्पते, तदयुक्तं, मूलटीकायामसम्मतत्वात्, 'सेस' चि, शेषके भङ्गत्रये भजना - विकल्पना कचित् कल्पते कचिन्नेति, अथ सामान्येन भङ्गचतुष्टयमधिकृत्योदाहरति-यथेत्युदाहरणोपन्यासे, तीर्थकर केवलिनोऽर्थाय कृतं कल्पते, न शेषसाधूनामर्थाय कृतमिति ॥ १५९ ॥ मूलद्वारगाथायां " कस्स वावी "ति व्याख्यातम्, अथ " किं वावी "ति ( नि. ९४ ) व्याख्यानयतिकिं तं आहाकम्मति पुच्छिए तस्सरूव कहणत्थं । संभवपदरिसणत्थं च तस्स असणाइयं भणइ ॥ १६०॥ farara पृष्ठे शिष्येण तत् स्वरूपकथनार्थं तस्य आधाकर्म्मणः सम्भवप्रदर्शनार्थं च गुरुरशनादिकं भणति ॥ १६० ॥ सम्प्रत्यशनादिकमेव व्याचष्टे - सालीमाइ अवडे फलाइ सुंठाइ साइमं होइ । तस्स कडनिट्ठियंमी सुद्धमसुद्धे य चत्तारि ॥१६१ ॥ शाल्याद्यशनं, अवटः- कूप उपलक्षणत्वात्तटाकादिपरिग्रहः, अवटादिस्थं जलं पानमित्यर्थः फलं नालिकेरादि खादिमं, शुष्ट्यादि स्वादिमं भवति, एतेष्वाघाकर्म्मणः सम्भवात् स्वरूपत्वमुक्तम्, एतेषां अत्रैतेष्वाधाकर्म्मरूपेषु प्रत्येकं चतुर्भङ्गीमाह आधाक र्माशनादि विवरणम् । ॥ ३३ ॥ Page #107 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Int तस्य - साधोरर्थाय कृतमिति कर्त्तुमारब्धं तस्यैवार्थाय निष्ठितं निष्पन्नं, अत्र चत्वारो भङ्गाः स्युः, तस्य कृतं तस्य निष्ठितं, तस्य कृतमन्यस्य निष्ठितं, अन्यस्य कृतं तस्य निष्ठितं, अन्यस्य कृतमन्यस्य निष्ठितं एते चत्वारो भङ्गाः, 'सुद्धमसुद्धे य'त्ति, आर्षत्वाद्वौ शुद्धौ द्वावशुद्धौ चेति द्रष्टव्यम्, द्वितीयचतुर्थी शुद्ध, प्रथमतृतीयावशुद्धाविति ॥१६१॥ अथाधाकर्म्मणः सम्भवं प्रतिपिपादयिषुः कथानकमाह - कोद्दवरालगगामे वसही रमणिज भिक्खसज्झाए । खेत्तपडिलेह संजय सावयपुच्छ्रुज्जुए कहणा ॥ १६२ जुज्जइ गणस्स खेत्तं नवरि गुरूणं तु नत्थि पाउग्गं । सालित्ति कए रुंपण परिभायण निययगेहेसु ॥ १६३॥ वोलिता व अन्नवा, अडंता तत्थ गोयरं । सुणंति एसणाजुत्ता, बालादिजणसंकहा ॥ १६४ ॥ एए ते जेसिमो रद्धो, सालिकूरो घरे घरे । दिन्नो वा से सयं देमि, देहि वा बिंति वा इमं ॥१६५॥ थक्के थक्कावडियं, अभत्तए सालिभत्तयं जायं । मज्ज य पइस्स मरणं, दियरस्त य से मया भज्जा ॥ १६६ ॥ चाउलोदगंपि से देहि, साली आयामकंजियं । किमेयंति कयं नाउं, वज्र्जतऽन्नं वयंति वा ॥१६७॥ गाथाषट्कम्, अर्थः कथानकादवसेय इति, तदेवाह ( ०९ ) - सङ्कलो नाम ग्रामस्तत्र जिनदत्तश्रावकः, तद्भार्या जिनमतिर्नाम तत्र ग्रामे कोद्रवरालकाः प्राचुर्येणोत्पद्यन्ते, ततस्तेषामेव कूरं गृहे २ भिक्षार्थं गताः साधवो लभन्ते, वसतिश्च आधाक मदनपरीहार साधुकथानकम् । Page #108 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयावचूर्युपेता मौदन श्री. साधु पिण्डनियुक्तिः। ॥३४॥ रमणीया प्राप्यते, स्वाध्यायोऽपि निर्विघ्नं जायते, परं शाल्योदनो न प्राप्यते इति केऽपि सूरयस्तत्रादरेण न तिष्ठन्ति । आधाकअन्यदा तत्रासने भद्रिलाभिधाने ग्रामे केऽपि सूरयः समाजग्मुः, तैश्च सङ्कलग्रामे क्षेत्रप्रत्युपेक्षणाय साधवः प्रेषिताः, साधवोऽपि तत्रागत्य यथाऽऽगमं जिनदत्तसमीपे वसतिमयाचिषत, जिनदत्तेनापि हर्षाद्वसतिर्दत्ता, साधवश्च तत्र स्थिता, परीहारियथाऽऽगमं भिक्षाप्रवेशनेन बहिर्भूमौ स्थण्डिलनिरीक्षणेन सर्वमपि ग्राम प्रेक्षितवन्त इति, जिनदत्तोऽपि वसतावागत्य महत्तरं साधु वन्दित्वाऽपृच्छत्-रुचितमिदं क्षेत्रं ?, सूरयोऽत्र पादमवधारयिष्यन्ति ? साधुरवोचत्-वर्तमानेन योगेन, कथानकम्। ततो ज्ञातं जिनदत्तेन न रुचितमिति, श्राद्धश्चिन्तयामास च यदत्र साधवः समागच्छन्ति परं न तिष्ठन्ति तन्न ज्ञायते किमत्र कारणमिति , ततः कारणपरिज्ञानाय कमपि अजु साधुं ज्ञात्वा पप्रच्छ, स च यथावस्थितमुक्तवान् , यथाऽत्र सर्वेऽपि गुणा विद्यन्ते, योग्यमिदं च क्षेत्रं, केवलमत्राचार्यप्रायोग्यः शाल्योदनो न प्राप्यते इति नावस्थीयते । तदेवं कारणं परिज्ञाय जिनदत्तेन परस्माद् ग्रामात् शालिबीजमानीय निजग्रामक्षेत्रभूमिषु वापितं, ततः सम्पन्नो भूयान् शालिः, अन्यदा च यथा विहारक्रमं ते चान्ये वा साधवः समाययुः श्रावकश्चिन्तयामास, यथैतेभ्यो मया शाल्योदनो दातव्यो येन सूरीणामिदं योग्य क्षेत्रमिति परिमाव्य साधवोऽमी सूरीनानयन्ति, तत्र यदि निजगृह एव दास्यामि, तदाऽन्येषु गृहेषु कोद्रवादिलम-N मानानामेतेषामाषाकर्मशङ्कोत्पत्स्यते तस्मात् सर्वेष्वपि गृहेषु स्वजनसम्बन्धिषु शालिं प्रेषयामीति, तथैव कृतं स्वजनाथोक्तवान् , यथा स्वयमप्यमुं शालि पक्त्वा भुञ्जत, साधुम्योऽपि च ददथ, एष च वृत्तान्तः सर्वेऽपि बालादीमिरवजग्मे, साधवश्व भिक्षार्थमटन्तो यथागममेषणासमितिसमिता बालादीनामुक्तानि शृण्वन्ति, तत्र कोऽपि बालको वक्ति, एते ते साधवो ॥३४॥ Jain Education ins t al Page #109 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आधाकमौदनपरीहारि साधुकथानकम्। येषामर्थाय गृहे २ शाल्योदनो निरपादि, अन्यो भाषते-साधुसम्बन्धी शाल्योदनो मह्यं जनन्या ददे, दात्री वा क्वचिदेवं भाषते-दत्तः परकीयः शाल्योदनः सम्प्रत्यात्मीयं किमपि ददामि, गृहनायकोऽपि कापि ते-दत्तः शाल्योदनः परकीय: सम्प्रत्यात्मीयं किमपि देहि, चालकोऽपि कापि कोऽप्यनभिज्ञो जननी ब्रते मम साधुसम्बन्धिनं शाल्योदनं देहीति, अन्यस्त्वीपद्दरिद्रः सहपे भाषते-अहो 'थके थकावडिय'मस्माकं सम्पन्न, इह यत अवसरे अवसरानुरूपमापतति तत् 'थके थकावडिय' | मित्युच्यते, ततः स एवमाह-येनामक्ते-भक्ताभावेऽस्माकं शालिभक्तमुदपादि । अत्रैवार्थे स लौकिकं दृष्टान्तमुदाहरति- (१०१०) सूरग्रामे यशोधराभिधाना काचिदामीरी, तस्या योगराजो नाम भर्ता, वत्सराजो नाम देवरः, तस्य भार्या योधनी, अन्यदा दैववशात् योधनीयोगराजौ समकालमेव मृतौ, ततो यशोधरा देवरं बूते, तब भार्याऽहं भवामीति, देवरोऽपि मम भार्या न विद्यते इति विचिन्त्य प्रतिपन्नवान, ततः सा चिन्तयामास, अहोऽवसरेऽवसरापतितमस्माकमजायत, यस्मिन्नेवावसरे मत्पतिर्मृतस्तदैव देवरस्यापि भार्या मृतेति, ततोऽहं देवरेण भार्यात्वेन प्रतिपन्ना, अन्यथा न प्रतिपघेत । तथा वापि बालको जननीमाचष्टे-माता! शालितन्दुलोदकमपि साधुभ्यो देहि, अन्यस्त्वाह-शालिकाञ्जिक, तत एवमादीनि बालादिजनजल्पितानि श्रत्वा किमेतदिति पृच्छन्ति, पृष्टेऽपि च ते ऋजवो यथावत्कथितवन्तो यथा युष्माकमथायेदं कृतमिति, ये तु मायाविना श्रावकेण तथाप्रज्ञापिताः, ते न कथयन्ति, केवलं परस्परं निरीक्षन्ते, तदेवमाधाकर्मेति परिमाव्य तानि सर्वाण्यपि गृहाणि परिहत्यान्येषु मिक्षार्थमटन्ति स्म, ये च तत्र निर्वहन्ति स्म न ते प्रत्यासनग्रामे भिवार्थमगच्छन् , एवमन्यत्राप्याधाकर्म सम्भवति, तच्च बालादिजल्पितैरवगम्य कथानकोक्तसाधुभिरिख वजेनीयम्, सूत्रे Jain Education Page #110 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पानादी नामाधाकर्मत्वम् । क्षमा सुगमम् , परं 'रुपण'त्ति रोपणं, परिभावणत्ति गृहे परिभोजनं, स इति एतेभ्यः, 'अन्नं' ति, अन्य ग्रामम ॥ १६२रत्नीया-INI १६७ ॥ अथ पानस्याधाकर्मसम्भवमाहवर्युपेता लोणागडोदए एवं, खाणित्तु महुरोदगं । ढकिएणऽच्छते ताव, जाव साहुत्ति आगया ॥ १६८ ॥ श्री- ___ यथाऽशनस्याधाकर्मणः कथानकसूचनेन सम्भव उक्तस्तथा पानस्याप्याधाकर्मणो ज्ञेयः, कथानकमपि तथैव, केवलपिण्ड- मयं विशेषः, क्वापि ग्रामे सर्वेऽपि कूपाः क्षारोदका आसीरन , अत्र क्षारशब्देन मलोदकं ज्ञेयम्, न त्वत्यन्तक्षारमिति, नियुक्तिः। शेषसाधसमागमनपृच्छनादि पूर्ववज्ज्ञेयम्, नवरं मधुरोदकं कूपं खानयित्वा लोके प्रवृत्तिजनितपापभयात फलकादिना स्थगितमखं कत्वा तावदास्ते श्रावका, यावत्ते चान्ये साधवः समागताः, पूर्ववत् स्वजनगृहेषु जलप्रेषणं वालाद्यल्लापाः, ॥३५॥ परिहरणं च ज्ञेयम् ॥ १६८ ॥ अथ खादिमस्वादिमयोराधाकर्मसम्भवमाहकक्कडिय अंबगा वा दाडिम दक्खा य बीयपूराई । खाइमऽहिगरणकरणंति साइमं तिगडुगाईयं ॥१६९॥ कर्कटिका-चिर्भटिका आम्रकानि दाडिमानि द्राक्षा बीजकपूरकादीन्याश्रित्य खादिमविषयेऽधिकरणकरणं भवेत-पापकरणं स्यादित्यर्थः. साध्वर्थमेतेषां वपनादि कुर्यादिति भावः। त्रिकटुकादिकं स्वादिमं तदपि खादिमवज्जेयम ॥१६९॥ अथ कृतनिष्ठितयोः स्वरूपमाहal असणाईण चउण्हवि आमं जं साहुगणपाउग्गं । तं निट्ठियं वियाणसु उवक्खडं तू कडं होइ॥१७॥ Jain Education Intel For Private & Personel Use Only | Page #111 -------------------------------------------------------------------------- ________________ निष्ठितयोग स्वरूपम् । अशनादीनां चतुर्णामपि यत् आम-अपरिणतं साधुग्रहणप्रायोग्यं कृतं प्रासुकीकतमित्यर्थः तं निप्रित विजातीत उपस्कृतं तूपस्कृतमारब्धं, कृतं भवति तत् ॥ १७० ॥ एतदेव विशेषतो भावयतिकंडिय तिगुणुकंडा उ निट्ठिया नेगदुगुणउकंडा । निट्ठियकडो उ कूरो आहाकम्मं दुगुणमाह ॥१७॥ इह ये तन्दलाः प्रथम साध्वर्थमुप्तास्ततः क्रमेण करटयो जातास्ततः कण्डिताः कथं भृताः१, कण्डिता इत्याह-त्रिगणोत्कण्डा:-त्रीन वारान कण्डिता इत्यर्थः, ते निष्ठिता उच्यन्ते, एकद्विगुणोत्कण्डिता न निष्ठिताः, किन्तु कृता एक, अत्रायं वदाम्नाय:-योकं वारं द्वौ वा वारौ साध्वथे कण्डितास्तृतीयवारं तु आत्मनिमित्त कण्डिता राद्धाश्च तदा साधनां कल्पते. यदि पुनरेंकं द्वौ वा वारौ साधुनिमिचं आत्मनिमित्तं वा कण्डितास्तृतीयं तु वा वारं साध्वर्थमेव, तैरेव तन्दले माल निष्पादितकरः स निष्ठितकृत उच्यते, निष्ठितैराधाकर्मतन्दुले राद्ध इत्यर्थः, स साधूनां सर्वथा न कल्पते, हेतमाह-तत्राधाकर्म द्विगुणमाहुस्तीर्थकदादय इति ॥ १७१ ॥ अथ खादिमस्वादिममाश्रित्य मतान्तरमाहछायंपिविवजंती केई फलहेउगाइवुत्तस्स । तं तु न जुज्जइ जम्हा फलंपि कप्पं बिडयभंगे ॥१७२॥ हफलहेतकादेः फलहेतोः पुष्पहेतोरन्यस्माद्वा हेतोः साध्वथेमुप्तस्य वृक्षस्य केचिदगीतार्थाश्छायामपि आधाकर्मशाक्या वर्जयन्ति, तत्त न युज्यते, यस्मात् फलमपि यदर्थ स वृक्ष आरोपितस्तत आधार्मिकवृक्षसम्बन्धि द्वितीये भडे तस्य कृतमन्याथै निष्ठितमित्येवंरूपे द्वितीयभङ्गे वत्तेमानं सत् कल्पते, अयमर्थ:-साध्वर्थ मुप्ते कल्पादौ वृक्षे निष्पाद्यमानं फलं Jain Education Fil Page #112 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर्मणि क्षमारत्नीयावचूर्युपेता श्री. पिण्डनियुक्तिः। ॥३६॥ साधुसत्ताया अपनीयात्मसम्बन्धि करोति, तदा तदपि कल्पते, किं पुनः 'छाये 'ति ॥ १७२ ॥ पुनराह आधापरपच्चइया छाया न विसा रुक्खोव वहिया कत्ता। नट्रच्छाए उ दुमे कप्पइ एवं भणंतस्स ॥१७३॥ सा छाया परप्रत्ययिका-सूर्यहेतुका न वृक्षमात्रनिमित्ता न च सा वृक्ष इव कर्त्ता वृद्धि नीता, तथा परस्य एवं-पूर्वोक्तं IN मतान्तरं भणतो मेघादिकारणान्नष्टच्छाये दुमेऽवस्थानं कल्पते इति प्राप्तं, तच्च न युक्तम् , तस्मान्नाधाकम्मिकी छायेति, किन्तु स . तन्निरएव वृक्ष आधामिकस्तत् संस्पृष्टाश्चाधः कतिपयप्रदेशाः पूतिरिति ॥ १७३ ।। पुनः परेषां दूषणान्तरमाह शनश्च। वड्डइहायइ छाया तत्थिकं पइयंपिवन कप्पे न य आहाय सुविहिए निबत्तयई रविच्छायं ॥१७॥ ___इह सूर्यगतिवशाच्छाया वर्द्धते हीयते च, ततो रवेरस्तमनसमये प्रातःसमये चातिद्राधीयसी विवर्द्धमाना छाया सकलमपि ग्राममभिव्याप्य वर्त्तते, अतस्तत् पृष्टं सर्वमपि प्रामसम्बन्धि वसत्यादिकं पूतिकमिव तृतीयोद्गमदोषदुष्टमशनादिकमिव न कल्पते, न चैतदागमे प्रोक्तं तन्नाधाकर्मिमकी छायेति, न च सूर्यः सुविहितानाधाय छायां निवर्तयति ततः कथमाधाकम्मिकी ॥ १७४ ॥ यदि पुनराधाकर्मिमकी स्यात् , तर्हिअघणघणचारिगगणे छाया नद्रा दिया पुणो होइ । कप्पइ निरायवे नाम आयवेतं विवजेउं॥१७५॥ ____ अपना-विरला घना-मेघाश्चारिणः-परिभ्रमणशीला यत्र इत्थंभूते गगने, छाया नष्टापि सती दिवा पुनरपि भवति, ततो मेघेरन्तरिते सूर्ये निरातपे-आतपाभावे तस्य वृक्षस्याधस्तनं प्रदेश सेवितु कल्पते, आदपेतु विवर्जयितुं, न चायं विषय- II॥३६ ॥ Jain Education Interne For Private & Personel Use Only Page #113 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विभागः सूत्रे कापि दृश्यते, न च पूर्वपुरुषाचीर्णा इति, तस्मादसदेतत्परोक्तमिति ॥ १७५ ॥ अथ गीतार्थानां किञ्चिदावा- निष्ठितसनं छायानिर्दोषतानिगमनपूर्वकं वक्ति कृतजतम्हा न एस दोसो संभवई कम्मलक्खणविहणो। तंपि य हु अइघिणिल्ला वज्जेमाणा अदोसिल्ला १७६ । मङ्ग तस्मात् पूर्वोक्तकारणाद् एष दोषः परोपन्यस्तो न सम्भवति, कुत ? इत्याह-यतोऽयं दोषः कर्मलक्षणविहीना-आधा- चतुष्टयम् । कर्मरहित उक्तयुक्तरित्यर्थः, अथवा तामप्याधाकम्मिकवृक्षच्छाया हु-निश्चितं, अतिघृणावन्त:-अतिदयालबो विवर्जयन्तोऽदोपवन्त इति ॥ १७६ ॥ मूलद्वारगाथायां " किंवावी "ति व्याख्यातं, अथ " परपक्खो य सपक्खो" (नि०९४) इति द्वारद्वयं व्याख्यानयन् प्रसङ्गतः पुनरपि निष्ठितकृतयोः स्वरूपं ताभ्यामुत्पन्नं भङ्गचतुष्टयं चाहपरपक्खो उगिहत्था समणो समणीउ होइ उसपक्खो। फासुकडं रद्धं वा निट्टियमियरं कडं सवं १७७ तस्स कडनिट्टियंमी अन्नस्स कडांमि निदिए तस्स । चउभंगो इत्थ भवे चरमदुगे होइ कप्पं तु १७०। __गृहस्था:-श्रावकादयस्तेषामर्थाय कृतं साधूनामाधाकर्म न भवति, यतः स परपक्ष इति, श्रमणाः श्रमण्यश्च स्वपक्ष| स्तदर्थकृतं त्वाधाकम्मैव स्यादिति, तथा प्रासुकीकृतं शाल्यादिराद्धं वा निष्ठितं वेदितव्यं, इतरस्तु एककण्डितद्विकण्डित-17 तन्दुलादिकं कृतं भवति सर्व, तस्य साधोराय कृते निष्ठितेऽत्र अन्यस्यार्थाय कृते तस्यार्थाय कृते निष्ठिते च भक्तादौ चतुर्भङ्गिका भवति, तत्रैतौ प्रथमतृतीयौ भङ्गो साक्षादातिौ द्वितीयचतुर्थों च स्वयमूह्यो, उक्तभङ्गापेक्षया चरमभङ्गद्य JainEducationa lonal For Private Personal Use Only Page #114 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयावचूर्युपेता श्री पिण्डनियुक्तिः । ॥ ३७ ॥ Jain Education Inte कल्प्यमशनादि भवति, आद्यापेक्षया द्वितीयश्वरमस्तृतीयापेक्षया चतुर्थ इति ।। १७७-१७८ ॥ अथ “ चउरो " (नि० ९४) इति मूलद्वारगाथायां व्याख्यानयति चउरो अइक्कमवइकमा य अइयार तह अणायारो । निद्दरिसणं चउण्हावे आहाकम्मे निमंतणया १७९ harपि श्राद्धेणाधाकर्म्मणि निमन्त्रणे कृते चत्वारो दोषा भवन्ति, तथाहि - अतिक्रमो व्यतिक्रमोऽतीचारोऽनाचारख, चतुर्णामपि निदर्शनं भावनीयम्, तच्च वक्ष्यति ॥ १७९ ।। अथाधाकर्म्मनिमन्त्रणं वक्तिसालीघयगुलगोरस नवेसु वल्लीफलेसु जाएसुं । दाणे अहिगमसड्डे आहायकए निमंतेइ ॥ १८० ॥ शालिषु - शाल्योदनेषु घृतगुडगोरसेषु साधूनाधाय कृतेषु नवेषु च वल्लीफलकेषु साध्वर्थमचित्तीकृतेषु दाने कोऽप्यनिवश्राद्धो निमन्त्रयति ।। १८० ॥ ततश्चआहाकम्मग्गहणे अइकमाईसु वइए चउसु । नेउरहारिगहत्थी चउतिगदुगएगचलणं ॥ १८१ ॥ आधाकर्मग्रहणे अतिक्रमादिषु चतुर्षु दोषेषु वर्त्तते, स च यथा २ उत्तरस्मिन् दोषे वर्त्तते तथा तथा तत्पापादात्मानं महता कष्टेन व्यावर्त्तयितुमीशः अत्र दृष्टान्तमाह- 'नेउरि 'त्ति, नूपुरहारिकायाः कथानके यो हस्ती राजपत्नीं सञ्चारयन् प्रसिद्धः, स यथा “चउ तिग दुग एग चलणेणं" तं पश्चानुपूर्व्या एकेन द्वाभ्यां त्रिभिश्चतुर्भिश्च रणैराकाश स्थैरति कष्टेनात्मानं व्यावर्त्तयितुमीशस्तथाssधाकर्म्मग्राह्यपि । सङ्घितकथा चैवम् - आधा कर्मण्यति क्रमाद्याः, नूपुरहारिका हस्तिप दोपनयः । ॥ ३७ ॥ Page #115 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education In (०११) यथा राजा नू पुरहारिकाकथानके हस्ती स्वपत्नीमिहाभ्यां सह छिन्नटंके पर्वते समारोपितः, ततो मिंढेन पर्वताग्रभागे व्यवस्थाप्य कमप्येकं चरणं नमसि कारितः, स च तथावस्थः स्तोकेन क्लेशेन तं चरणं व्यावर्च्य तत्रैव पर्वते आत्मानं स्थापयितुं शक्रोति, एवं साधुरपि कश्चिदतिक्रमाख्यं दोषं प्राप्यात्मानं सुखेन निवर्त्तयित्वा संयमे तु स्थापयितुमीशः, परं क्रमवृद्धौ गजस्य दोपवृद्धौ साधोरिति कष्टं स्यादिति भावः ॥ १८१ ।। अथातिक्रमादीनां स्वरूपमाह - आहाकम्मनिमंतण पडिसुणमाणे अइक्कमो होइ । पयभेयाइ वइक्कम गहिए तइएयरो गिलिए ॥१८२॥ आधा कर्म्मनिमन्त्रणे प्रतिशृण्वति - अङ्गीकुर्वति अतिक्रमो भवति-पदमेदाच्चरणविन्यासादाधाकर्म्मग्रहणं प्रति व्यतिक्रमः स्यात्, आषाकर्म्मणि गृहीते तृतीयो दोषः, इतरश्चतुर्थो गलिते-भक्षिते सति स्यात् ।। १८२ ॥ मूलद्वारगांथायां " गहणे य आणाई " (नि० ९४ ) इति व्याख्यानयति - आइय दोसा गहणे जं भणिय मह इमे ते उ । आणाभंगऽणवत्था मिच्छत्तविराहणा चैव ॥ १८३॥ यदुक्तमाधाकर्मग्रहणे आज्ञादयः - आज्ञामङ्गादयो दोषाः अथ इमे ते वक्ष्यमाणास्ताने वाह - आज्ञामङ्गोऽनवस्था मिथ्यात्वं विराधना च ॥ १८३ ॥ क्रमाद् व्याख्यानयति — आणं सव्वजिणाणं गिण्हंतो तं अइक्कमइ लुद्धो । आणं च अइकमंतो कस्साएसा कुणइ सेसं? ॥९८४॥ सुगमा, नवरं तदाधाक गृह्णन्निति ॥ १८४ ॥ अनवस्थादोषमाह- आधा कर्मण्याज्ञा भङ्गादि दोषाः । Page #116 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आधाकर्मण्याज्ञा. भङ्गादिदोषाः। क्षमा एक्केण कयमकजं करेइ तप्पच्चया पुणो अन्नो। रंपर वोच्छेओ संजमतवाणं ॥१८५॥ रत्नीया एकेन अकार्य आधाकर्मग्रहणलक्षणं कृतं, तत् प्रत्ययात्-तत् कारणात्पुनरन्यः करोति, एवं सातबहुलानां-सुख- बच्र्युपेता II लम्पटानां परम्परया संयमतपसा व्यवच्छेदो भवति ॥ १८५ ॥ मिथ्यात्वदोषमाह श्री- जो जहवायं न कुणइमिच्छाहिटी तओहको अन्नो?। वडेड यमिच्छत्तं परस्स संकं जणेमाणो ॥१८६॥ पिण्ड यो यथावादं आगमाभिहितं न करोति ततोऽन्यः को मिथ्यावृष्टिः स एवेत्यर्थः, चशब्दो हेतौ, यस्मात् परस्य शङ्क नियुक्तिः। जनयन् मिथ्यावं वर्धयति ॥ १८६ ॥ अन्यच्च॥३८॥ वजेई तप्पसंगं गेही अपरस्स अप्पणो चेव । सजियंपि भिन्नदाढो नमुयइ निद्धंधसो पच्छा ॥१८७॥ ____ आधाकर्मग्राही परस्यात्मानश्च ततः प्रसङ्गं वर्धयति गृद्धिरत्यन्तासक्तिश्च जायते, ततः पश्चाद् भिन्नदंष्ट्राकस्तद्रसास्वादेन निर्द्धमसो-निर्दयः सजीवमपि फलादिकं न मुञ्चति ॥ १८७ ।। विराधनादोषमाहखद्धेनिद्धेयस(रु)या सुत्तेहाणी तिगिच्छणे काया।पडियरगाणविहाणी कुणड किलेसंकिलिस्संतो १८० खद्धे-प्रचुरे निद्धे-स्निग्धे आधाकर्मणि भुक्ते रुजा-रोगः स्यात् , ततः सूत्रहानिरगुणनेन जायते, चिकित्सायां काया-पृथ्वीकायादयो विराध्यन्ते, प्रतिचारकानां-परिपालकसाधूनां तद्वयावृत्त्यतत्परतया सूत्रार्थसंयमहानिः, तथा क्लिश्यमानः परं क्लेशं करोति ॥ १८८ ।। अथाधाकर्मणोऽकल्प्यविधि कथयन् द्वारगाथामाह ॥३८॥ Jain Education Inter Uw.jainelibrary.org Page #117 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Internationa जह कम्मं तु अकप्पं तच्छिकं वाऽवि भायणठियं वा । परिहरणं तस्सेव य गहियमदोसं च तह भणइ १८९ यथा कर्म्म - आधा कर्म्म अकल्प्यं, यथा तत्स्पृष्टं यथा भाजनस्थितं वा अकल्प्यं तस्यैव यथा परिहरणं तद्गृहीतं यथा वाsदोषं तथा गुरुर्भणति ।। १८९ ।। अत्र पञ्च द्वाराणि एतान्येव द्वाराणि विशेषेणाह अन्भोजे गमणाइ य पुच्छा दवकुलदेसभावे य । एव जयंते छलणा दिट्टंता तत्थिमे दोन्नि ॥ १९० ॥ यथा साधून माघाकर्म तत्स्पृष्टं कल्पत्रयाक्षालितभाजनस्थं वा अभोज्यं तथा भणनीयमिति द्वारत्रयं सूचितम्, तथा अविधिपरिहारे गमनादिका: कायक्लेशादिदोषा वाच्याः, विधिपरिहारे यथा द्रव्यकालदेशभावे पृच्छा कर्त्तव्या, यथा च न कर्त्तव्येति वाच्यमिति चतुर्थं द्वारं, एवं यतमाने कदापि छलना जायते, ततस्तत्र इमौ वक्ष्यमाणौ दृष्टान्तौ वक्तव्यौ इति पञ्चमं द्वारम् ॥ १९० ॥ आधाकर्म्मणोऽकल्प्यतारूपं द्वारमाह S जह वतं तु अभोज्जं भत्तं जइवि य सुसक्कयं आसि । एवमसंजमवमणे अणेसणिज्जं अभोजं तु ॥ १९९ ॥ यदोपभक्तं पूर्व सुसंस्कृतं आसीत्, तदपि यथा वान्तमभोज्यमेव, एवमसंयमवमने साधोरनेषणीयमभोज्यमेवेति ॥१९१॥ एतदेव गाथाद्वयेन दृष्टान्तपूर्वकमाह मज्जाएखइयमंसा मंसासित्थि कुणिमं सुणयवंतं । वन्नाइ अन्नउप्पाइयंपि किं तं भवे भोजं ? ॥ ९९२ ॥ आधाकर्मण्य कल्प्यादि पश्च द्वाराणि । Page #118 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयावचूर्युपेता श्री पिण्डनियुक्तिः। ॥३९॥ केई भणति पहिए उट्ठाणे मंसपेसिवोसिरणं । संभारिय परिवेसण वारेइ सुओ करे घेत्तुं ॥ १९३॥ आधा (दृ० १२) च(व)क्रपुर नगरं, तत्रोग्रतेजाः पदातिः, भार्या रुक्मिणी, अन्यदा चोग्रतेजसो ज्येष्ठभ्राता सोदासाभि-INI कर्मणि धानः कुतोऽपि ग्रामादागतः प्राघूर्णकत्वेन, उग्रतेजसा मांसं क्रीत्वानीय भार्याय समर्पितम् , तस्याश्च गृहकार्यसक्ता- बान्तानायास्तन्मांसं मार्जारेण भक्षितं, रुक्मिणी चिन्तयामास, किं करोमि ? अत्रान्तरे कापि मृतस्य कार्पटिकस्य शुना मांसं दाने उग्र. भक्षयित्वा तद्गृहप्राङ्गणे दृष्टौ वातसङ्क्षोभादिवशादुद्वमितं, भोजनवेला समागतेति रुक्मिण्या तदेवाददे, जलेन प्रक्षाल्य तेजससंस्कृतं, समागतौ सोदासोग्रतेजसावुपविष्टौ भोजनार्थ परिवेषितं तन्मांसं, ततो गन्धविशेषेणोग्रतेजसा ज्ञातं, यथा-वान्तमेत- | उदा०। दिति, ततः साक्षेप भार्या पृष्टा, सा च कम्पमाना यथावस्थितं कथयामास, ततस्तन्मांसं परित्यज्य तां निर्भत्स्यान्यन्मांसं पाचितम् । प्रथमगाथाक्षरार्थस्त्वयम्-मार्जारेण स्वादितमांसं यस्याः सा मार्जारखादितमांसा मांसाशिन उग्रतेजसः स्त्री-महेला अन्यन्मांसमप्राप्नुवती श्ववान्तं कुणपं-मांसं गृहीतवती, तच्च वेसवारेण वर्णादिभिरन्यदिवोत्पादितमपि किं भवति भोज्यमपि तु नैव, एवमाधाकपि । केचित्पुनरेवमाहु:-तस्या रुक्मिण्या गृहे कोऽप्यतीसारेण पीडितो दुष्प्रमनामा कार्पटिका, किश्चिद्विविक्तं स्थानं याचि[ता स्थितवान् , स चातीसारेण मांसखण्डानि व्युत्सृजति, मार्जारहूते मांसे तान्येव खण्डानि सजितानि, तच्च मृतसपत्नीपुत्रेणोग्रतेजसो जातेन गुणमित्रेण ददृशे, न च तदानीं भयात् किमपि कथितम् , भोजनावसरे द्वावपि पितृपितृव्यौ तेन करे कृत्वा निवारितो, प्रोक्तश्च मांसवृत्तान्तः, तत उग्रतेजसा रुक्मिणी निर्मत्सिता, त्यक्तं तन्मांसम् , द्वितीयगाथार्थस्त्वयं-केचिद्भणन्ति पथिके पथिकस्य उद्घाणे-अतीसारोत्थाने मांसपेशी Jan Education inte Howjainelibrary.org. Page #119 -------------------------------------------------------------------------- ________________ व्युत्सर्जन, मांसपेशीरादाय तासां सम्भृत्य-वेसवासरेणोपस्कृत्य परिवेषणे कृते सुतः करेण गृहीत्वा तौ पितपितव्यो। तत्स्पृष्टस्य भोजनाय वारयति स्म, ततो यथा पुरीषमांसमभोज्यं विवेकिनामेवमाधाकापि ॥ १९२-१९३ ॥ किञ्च भाजनअविलाकरहीखीरं ल्हसण पलंड सुरा य गोमंसं वेयसमएवि अमयं किंचि अभोजं अपिजं च ॥१९॥ स्थितस्य अविला-ऊरणी करभी उष्ट्री तयोः क्षीरं, तथा लशुनं पलाण्डु सुरा गोमांसं च यथा वेदे-अन्यसमयेऽपि अमतं-असम्मतं चाक- . अनमीष्ट भोजने पाने च तथा जिनशासने किश्चित् आधाकम्मिकादिरूपमभोज्यमपेयं च ज्ञेयम् ॥१९४ ॥ अथ ततस्पृष्टस्या ल्प्यता। कल्प्यतामाहवन्नाइजयाविबली सपललफलसेहरा असुइनत्था।असुइस्स विप्पुसेणविजह छिक्काओअभोजाओ १९५४ यथा वर्णादियतोऽपि बलिः-उपहारः सपललफलशेखर:-इह पललं तिलक्षोद उच्यते, फलं-नालिकेरादि, अशुचिन्यस्तः, तथा अशुचिना-विटस्पर्शनापि, [अथ ] अशुचेः पदार्थस्य विस्पर्शनापि स्पृष्टोऽभोज्यो भवति, तथाऽऽधाकर्मस्पृष्टमपीति ॥१९५ ॥ अथ भाजनस्थितस्याकल्प्यतामाहएमेव उज्झियमिवि आहाकम्ममि अकयए कप्पे। होइ अभोज भाणे जत्थ व सद्धेऽवितं पडियं ॥१९६॥ ___ यथाऽऽधाकावयवेन संस्पृष्टमभोज्यमेवं यस्मिन् भाजने तदाधाकर्मगृहीतं तस्मिन्नाधाकर्मण्युज्झितेऽपि अकृतकल्पे वक्ष्यमाणन्यायेन कल्पत्रयेणाप्रक्षालितेऽपि ज्ञेयम्, यद्वा यत्र भाजने पूर्व शुद्धेऽपि भक्ते गृहीते तदाधाकर्मस्तोकमात्रं पतितं Jain Education in | Page #120 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीया वचूर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः । 1180 11 Jain Education Inter तत्रापि भाजने पूर्व शुद्धाहारे आधाकर्म्मणि च सर्वात्मना च त्यक्ते कल्पत्रयामावेऽभोज्यमेवेति ॥ १९६ ।। अथ परिहरणमाहवंतुच्चारसरिच्छं कम्मं सोउमवि कोविओ भीओ । परिहरइ सावि य दुहा विहिअविहीए य परिहरणा१९७ वान्तोच्चारसदृशं कर्म - आघाकर्म्म श्रुत्वा 'अपि सम्भावने ' कोविदः ' पण्डितो भीतः सन् परिहरति, सा परिहरणा विधिना अविधिना च द्विधा स्यात् ।। १९७ ।। अथाविधिपरिहारे कथानकं गाथात्रयेणाह ( दृ० १३ ) - सालीओअणहत्थं दहुं भणई अकोविओ देंतिं । कत्तो चउत्ति साली वाण जाणइ पुच्छ तं गंतुं ॥ ९९८ ॥ तू वसोवाणियगं पुच्छए कओ साली ? । पञ्चंते मगहाए गोब्बरगामो तहिं वयइ ॥ ९९९ ॥ कम्मा का पह मोतुं कंटाहिसावया अदिसिं । छायंपि[वि] वज्जयंतो डज्झइ उण्हेण मुच्छाई ॥ २०० ॥ शालिग्रामे ग्रामणीर्वणिक, भार्याऽपि ग्रामणीः, अन्यदा मर्त्तरि हवं गते भिक्षार्थमटनकोविदः साधुस्तद्गृहं प्रविवेश, आनीतच ग्रामण्या शाल्योदन इति, साधुना चाधाकर्म्मशङ्कापनोदाय सा पृष्टा, यथा-श्राविके कुतस्त्यः शालिरेष इति १ सा प्रत्युवाच नाहं जाने, वणिग् जानाति, ततो वणिजं विपणौ गत्वा पृच्छ, सोऽपि साधुर्विपणौ गत्वा वणिजं पृष्टवान् कुतः शालिरिति १, वणिजाप्युक्तं - मगधजनप्रत्यन्तवर्त्तिनो गोर्वरग्रामादागतः शालिः, ततः स तत्र गन्तुं प्रावर्त्तत, तत्रापि साधुनिमित्तं केनापि श्रावणायं पन्था कृतो भविष्यतीत्याधाकम्र्म्माशङ्कया पन्थानं विमुच्योत्पथेन व्रजति, उत्पथेन च व्रजन्नहिकण्टकश्वापदादिभिरभिद्र्यते, नापि काश्चन दिशं जानाति, तथाऽऽघाकर्म्मशङ्कया वृक्षच्छायामपि परिहरन् मूर्ध्नि सूर्यकर आधाकर्मणि परिहारे विध्य विधी कथा नकश्च । ॥ ४० ॥ Page #121 -------------------------------------------------------------------------- ________________ निकरप्रपातेन तप्यमानो मूर्च्छामगमत् क्लेशं च महान्तं प्रापेति । १९८-२०० ॥ इ अविपरिहरणा नाणाईणं न होइ आभागी । दवकुलदेस भावे विहिपरिहरणा इमा तत्थ ॥ २०९ ॥ इति अविधिपरिहरणाद् ज्ञानादीनामाभागी न भवति, तस्माद्विधिना परिहरणं कर्त्तव्यम्, तच्चेदं द्रव्यकुलदेशभावानाश्रित्य स्यात् ॥ २०९ ॥ तत्र द्रव्यादीन् गाथाद्वयेनाह - ओयणसमिइमसत्तुगकुम्मासाई उ होंति दवाई | बहुजणमप्पजणं वा कुलं तु देसो सुरट्ठाई ॥ २०२ ॥ आणायर भावे सयं व अन्नेण वाऽवि दावणया। एएसिं तु पयाणं चउपयतिपया व भयणा उ । २०३ । ओदनः समितिमा :- माण्डादिकाः सक्तवः कुल्माषाद्या द्रव्याणि, बहुजनमल्पजनं वा कुलं, देशः सुराष्ट्रादिः, आदरोनादरो वा भावे, एतावेव विशेषयति-स्वयं- चान्येन कर्मकरादिना यद्दापनं ततो यथासङ्ख्यमादरानादरौ, एतेषां च पदानां भजना- विकल्पना चतुष्पदा त्रिपदा वा स्याद् यदा चत्वार्यपि द्रव्यादीनि भवन्ति, तदा चतुष्पदा, यदा नादरो नाप्यनादरस्तदा त्रिपदेति ॥ २०२ - २०३ ॥ अथ यादृशेषु द्रव्यादिषु सत्सु पृच्छा यादृशेषु न पृच्छेत्याहअणुचियदेसं दवं कुलमप्पं आयरो य तो पुच्छा। बहुएवि नत्थि पुच्छा सदसदविए अभावेवि ॥ २०४ ॥ अनुचितदेश-देशासम्भवि द्रव्यं कुलं चाल्पं आदरश्च दृश्यते, ततः पृच्छा कार्या, स्वदेश भाविनि द्रव्ये बहुके प्रभूतेऽपि पृच्छा नास्ति परं कुलं विलोकनीयमल्पकुलपृच्छा स्यादिति, अभावे-आदररहितत्वे नाम्ति पृच्छा ॥ २०४ ॥ अथ आधाकर्मणि पृच्छोचिता द्रव्याद्याः । Page #122 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीया वचूर्युपेता श्री पिण्ड - निर्युक्तिः । ॥ ४१ ॥ Jain Education Inte पृच्छायां कृतायां यद्भवति तदाह तुज्झट्टाए कयमिणमन्नोऽन्नमवेक्खए य सविलक्खं । वज्जंति गाढरुट्ठा का भे तत्तित्ति वा गिण्हे ॥२०५॥ यदा कापि दात्री ऋजुता युष्मदर्थायेदं कृतमिति वक्ति, अथवा मायाविकुटुम्बं तन्मुखेनैवमाचष्टे - गृहार्थमेतत् कृतं न तवार्थायेति परं ज्ञाता वयमिति सविलक्षं सर्वाण्यपि मानुषाणि परस्परमवेक्षन्ते चकाराद्धसन्ति च तदा साधवस्तद्देयमाधकम्मैति ज्ञात्वा वर्जयन्ति, यदा दात्री पृष्टे सति गाढं रुष्टा भवति, यथा हे तापस ! तत्र का तृप्तिरिति तदा शङ्कापरिहारेण गृह्णति || २०५ || अथ " गहियमदोसं चे "ति पञ्चमद्वारमाह गूढायारा न करेंति आयरं पुच्छियावि न कहेंति । थोवंति व नो पुट्ठा तं च असुद्धं कहं तत्थ ? ॥ २०६ ॥ गूढाचा गुप्तस्वभावा न कुर्वन्त्यादरं, पृष्टा अपि न कथयन्ति, स्तोकमिति साधुना न पृष्टाः तच्च देयवस्तु अशुद्धं तत्र साधोः कथं शुद्धिर्भविष्यतीति १ ।। २०६ ।। शिष्येण पृष्ठे गुरुराह— आहा कम्मपरिणओ फासुयभोईवि बंधओ होइ । सुद्धं गवेसमाणो आहाकम्मेवि सो सुद्धो ॥ २०७ ॥ प्राकभोज्येऽपि आधाकर्म्मपरिणतः कर्म्मणां बन्धको भवति, शुद्धं गवेषयन् आधाकर्म्मण्यपि गृहीते स शुद्धः स्यादिति, ।। २०७ ।। एतदेव कथानकाभ्यां भावयति संघुद्दि सोउं एइ दुयं कोइ भाइए पत्तो । दिन्नंति देहि मज्झति गाउ साउं तओ लग्गो ॥ २०८ ॥ आधाकर्मणि शिष्यगुर्वोः प्रश्नोत्तरम् । ॥ ४१ ॥ Page #123 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education ( ० १४ ) शतमुखनगरे गुणचन्द्रः श्रावको महान्तं जिनमन्दिरं कारयित्वा युगादिजिनप्रतिमां प्रतिष्ठापितवान्, ततः सङ्घभोज्यं दापयितुमारब्धम् । इतश्वासन्नग्रामे कोऽपि द्रव्यलिङ्गधारी साधुः तेन शुश्रुवे, यथा-गुणचन्द्रः सङ्घभोज्यं दत्ते, ततः स तत्राययौ, सङ्घभक्तं च सर्व दत्तं तेन च श्रेष्ठी याचितो यथा-मह्यं देहि, श्रेष्ठिना च चन्द्रिकाम्यधायि देि साधवे भक्तमिति, सोवाच दत्तं सर्वं न किमपीदानीं वर्त्तते, ततः श्रेष्ठी प्राह-मम रसवृतीमध्याद्देहि, ततः सादात्, साधुश्च सङ्घभक्तमिति बुद्ध्या परिगृह्य स्वोपाश्रये भुक्तवान् ततः शुद्धमपि भुञ्जान आधा कर्म्मग्रहण परिणामवशादाधाकम्मैपरिभोगजनितेन कर्मणा बद्ध इति एवमन्योऽपि सूत्रं सुगमम्, नवरं देहि मज्झति गाउत्ति भार्यया दत्तमित्युक्ते श्रेष्ठी माण, देहि मम मध्यात्-मदीय भोजनमध्यात्, दत्ते च स्वादु मिष्टमिदं सङ्घमुक्तमिति भुञ्जानो विचिन्तयति, ततो लग्न-आधाकर्मपरिभोगकर्मणा बद्धः ॥ २०८ ॥ “ सुद्धं गवेसमाणो " इति कथानकेन भावयति - मासियपारणगट्ठा गमणं आसन्नगामगे खमगे । सड्डी पायसकरणं कयाइ अज्जेजिही खमओ ॥ २०९॥ खेल्छुगमल्लगलेच्छारियाणि डिंभग निभच्छणं च रुंटणया। हंदि समणत्ति पायस घयगुलजुय जावणट्ठाए एगंतमवक्कमणं जइ साहू इज्ज होज तिन्नोमि । तणुकोट्ठमि अमुच्छा भुत्तंमिय केवलं नाणं ॥ २१९ ॥ माथा । ( ० १५) पोतनपुरे पञ्चशतसाधुपरिवृताः श्रीरत्नाकरसूरयः समेताः, तेषां मध्ये प्रियङ्करो नाम क्षपको मासोपवासी पारणे चान्यग्रामेऽज्ञातभिक्षायां याति, अथान्यदा पारणाय कापि ग्रामे जगाम, तत्र यशोमतिर्नाम श्राविका, शुद्धाहारप्राप्तावपि दोष दर्शिका कथा । 1 Page #124 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमास्नीया. बचूर्युपेता प्राप्तावपि श्री. दर्शिका पिण्ड नियुक्तिः। ॥४२॥ तथा च जनश्रुत्या पारण(क)दिनं ज्ञात्वा साधुः कदाऽप्यत्रायातीति बुझ्या पायसं संस्कृतं, ततः साधोरशुद्धदोपपरिहारावगत्यै अशुद्धाहारवटादिपत्रैः कृतेषु शरावाकारेषु डिम्भयोग्या स्तोका क्षरेयी क्षिप्ता, उक्तं च तेषां, यथा-रे बालकाः! यदा क्षपकः साधु: समायाति तदा युष्माभिरिति वाच्यं, हे अम्ब ! प्रभूतास्माकं क्षरेयी परिवेषिता न शक्नुमो भोक्तुं, एवमुक्तेऽहं युष्मानिर्भ- ld मानि निर्दोषसयिष्यामि, ततो भवद्भिः कथनीयं किं दिने २ पायसमुपस्क्रियते १, एवं बालकेषु शिक्षितेषु साधुरागतः, श्राविकापि कुटि कथा। लधियाऽऽदरं न कुर्वतीति, यथास्वभावमवतिष्ठते, पालकैर्यथाशिक्षितं चक्रे, ततस्तया सरुषेव साधुर्वमणे, यथाऽमी बाला: पायसमपि नेच्छन्ति, ततो यदि युष्मभ्यं रोचते तर्हि गृहीत पायसं, नो चेत् व्रजतेति, ततः साधुना निःशङ्केन तद् गृहीतं, साधुनिवृत्तो वृक्षाधः पारणार्थमुपविष्टश्चिन्तयति, अहो लब्धमुत्कृष्टं, यदि कोऽपि साधुआँ संविभागयति तदा भव्यमित्याधन्यसाधून स्तुवन्नात्मानं च निन्दन भुञ्जानोऽपि मूर्छारहितो भोजनावसाने केवलज्ञान प्राप्तः । यत्रं सुगमम्, परं 'खल्लग"ति, मल्लकं-शरावं तदाकाराणि यानि खल्लकानि वटादिपत्रकृतभाजनानि तानि लिच्छारीमाणि डिम्मकयोग्यस्तोक २ पायस. प्रक्षेपेण खरण्टितानि रुण्टणया इति-अवज्ञाया 'हन्दी' त्यामन्त्रणे भो श्रमण ! यदि रोचते तदा गृहाणेतिशेषः, ततः शरीरयापनाय घृतगुडयुतं पायसं गृहीत्वा एकान्तेऽवक्रमणं, शेष सुगमम् ॥ २०९-२११ ॥ अत्र च भगवदा व प्रमाणमिति दृष्टान्तेन तां स्थापयतिचंदोदयं च सूरोदयं चरन्नो उ दोन्नि उजाणा। तेसिं विवरियगमणे आणा कोवो तओ दंडो॥२१२॥ Idng२॥ For Private Personal use only Jan Educh an inte sww.jainelibrary.org Page #125 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आधाकर्मणि परिणामप्राधान्यं, सूरोदयं गच्छमहं पभाए चंदोदयं जंतु तणाइहारा। दुहारवी पच्चुरसंति काउंरायावि चंदोदयमेव गच्छे पत्तलदुमसालगया दच्छामु निवंगणत्तिदुच्चित्ता । उजाणपालएहिं गहिया य हया य बद्धा य॥२१४ ॥ । सहस पइट्ठा दिट्ठाइयरेहि निवंगणत्ति तो बद्धा। निंतस्स य अवरण्हे दंसणमुभओ वहविसग्गा॥२१५॥ (१०१६) चन्द्राननापुर्यां चन्द्रावतंसकराबखिलोकरेखाप्रमुखा अन्तःपुरिकाः, राज्ञो द्वे उद्याने, पूर्वस्यां सूर्योदय पश्चिमायां चन्द्रोदयमिति, अन्यदा वसन्तमासे नृपः क्रीडार्थ पुरीमध्ये पटहोद्घोषणं कारितवान् , यथा-भो! शृणुत जनाः! प्रातः सूर्योदयोद्यानेऽन्तःपुरीभिः सह यथेच्छं राजा विहरिष्यते, ततो मा तत्र कोऽपि यासीत् , सर्वेऽपि तृणकाष्टाहारादयश्चन्द्रोदयं गच्छन्त्विति, पटहदापनानन्तरं सूर्योदयरक्षणार्थ पदातयः प्रेषिताः, राजा च निशि चिन्तयामास । सूर्योदये गच्छतामपि प्रभाते सूर्यः प्रत्युरसं स्यात् , ततः प्रतिनिवर्तमानानामपि मध्याहे, प्रत्युरसं च सूर्यो दुःखावहः, तस्माच्चन्द्रोदयं गमिष्यामीति, इति चिन्तयित्वा प्रातस्तथैव कृतवान् । इतश्च कैश्चिदपि लोकैरचिन्ति, यदस्माभिर्नुपान्तःपुरिकाः कदापि न दृष्टाः, तत् प्रातः प्रच्छन्नवृत्त्या सूर्योदये राजानं सान्तःपुरिक क्रीडन्तं परिभाषयाम इति बुद्ध्या तत्र गताः, आरक्षकदृष्टाः, गृहीता बद्धाश्च, ये चान्ये तृणहारादयस्ते चन्द्रोदयं गतास्तैश्च सहसा प्रविष्टेष्टा राज्ञोऽन्तःपुरिकाः, तेऽपि राजपुरुषैर्बद्धाः, ततो नगराभिमुखं याति, नरैश्च राज्ञो द्वये(द्वाव)ऽपि निवेदिता(तो), कथितश्च वृत्तान्तस्तैः, ये आज्ञाभङ्गकारिणस्ते विनाशिताः, इतरे मुक्ताः । सूत्रं सुगम, नवरं 'तओ दंड'ति, दण्डो-मरणं 'पच्चुरसं'ति प्रत्युरसं-उरसः सम्मुखं 'नितस्स सूर्योद्यानोदाह। JainEducation IntaN For Private Personal Use Only Page #126 -------------------------------------------------------------------------- ________________ औद्देशिकव्याख्या श्री क्षमा य'ति, उद्यानादपराढे निर्गतो राज्ञ उमयेषां दर्शनं, ततो यथाक्रम वधविसौ, "दिवता तत्थिमो दुन्नि" समर्थितम् ॥ रत्नीया-IVI॥२१२-२१५ ॥ दाान्तिकयोजनमाहवर्युपेता | जह ते दंसणकंखी अपूरिइच्छा विणासिया रणा। दिद्वेऽवियरे मुक्का एमेव इहं समोयारो ॥२१६ ॥ यथा-ते दर्शनकासिणः अपूरितेच्छा अपि आज्ञाभङ्गकारिण इति राज्ञा विनाशिताः, इतरे दृष्टेऽप्यन्तःपुरे आज्ञाकारिपिण्ड त्वान्मुक्ता एवेति, एवमिहाप्याधाकर्मणि समवतारो-योजना कार्या, सा च सुगमा ॥२१६॥भूय आधाकर्मभोजनं निन्दतिनियुक्तिः। आहाकम्मं भुंजइ न पडिक्कमए य तस्स ठाणस्स। एमेव अडइ बोडो लुक्कविलुक्को जह कवोडो ॥२१७॥ ॥४३॥ य आधाकर्म भुङ्क्तेन च तस्मात् स्थानात् प्रतिक्रामति-प्रायश्चितग्रहणेन निवर्तते, स बोडो-मुण्ड इति अधिक्षेपवाक्यं, एवमेव निष्फलमेव, अटति-जगति भ्रमति, दृष्टान्तमाह, यथा-कपोत:-पक्षिविशेषो लुक्कविलुको-लुश्चितविलुश्चित इति, तत्र सामान्यतो लुञ्चनं विच्छिच्या विलुश्चनं, यथा कपोतस्य लुश्चनं अटनं च न धर्माय तथा साधोरप्याधाकर्मभोजिन इत्यर्थः॥ २१७॥ आहाकम्मदारं भणियमियाणि पुरा समुद्दिष्टुं । उद्देसियंति वोच्छं समासओ तं दुहा होइ ॥ २१८॥ मणितमाधाकर्मद्वारं, इदानीं पुरा पूर्वमौदेशिकमिति यत्तद्द्वार समुद्दिष्टं तत् वक्ष्ये ॥ २१८ ॥ तच्च समास तो द्विधा, तदेवाह ॥४३॥ Jain Education in For Private Personal Use Only Page #127 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education ओहेण विभागेण य ओहे ठप्पं तु बारस विभागे । उद्दिट्ठ कडे कम्मे एक्कक्कि चउक्कओ भेओ ।। २१९ ।। ओवेन - सामान्येन विभागेन- विशेषेण च द्विधौदेशिकमिति, तत्र ओधे स्थाप्यं, नात्र व्याख्येयम्, पुरो व्याख्यास्यत - इति भावः, विभागे द्वादशधा औद्देशिकं भवति, तदेवाह - ' उद्दिठे' त्यादि, प्रथमतस्त्रिधा विभागौदेशिकं, तद्यथा-उद्दिष्टं कृतं कर्म च तत्र स्वार्थनिष्पन्नमशनादि यद् मिक्षाचरणां दानाय उद्दिश्यते- कल्प्यते तदुद्दिष्टं, अनेनान्वर्थोऽपि सूचित इति, यदुद्धरितं शाल्योदनादिकरम्बादिरूपतया कृतं तत् कृतमुच्यते, यत्पुनर्विवाहादौ मोदकचूर्णाद्युद्धरितं तद् भिक्षाचराणां दानाय भूयोऽपि मोदकादिकृतं तत्कर्मेत्यभिधीयते, एकैकस्मिन्नुद्दिष्टादिके मेदे चतुष्कश्चतुःसङ्ख्यो भेदो भवति, त्रयश्चतुमिर्गुणिता द्वादश भवन्ति ।। २१९ ॥ अथौषौदेशिकस्य पूर्व स्थाप्यतया उक्तस्य सम्भवमाह - सूत्रस्य विचित्रगतेःजीवामु कहवि ओमे निययं भिक्खावि कइवई देमो । हंदि हुनत्थि अदिन्नं भुज्जइ अकथं न य फलेई ॥ इह दुर्भिक्षानन्तरं केचिद् गृहस्था एवं चिन्तयन्तिः कथमपि महता कष्टेन जीविता, अवमे-दुर्भिक्षे ततो नियतं कतिपया भिक्षा दद्यो, यतो हु-निश्चितं हन्दीति स्वसम्बोधने नास्त्येतद् यदुत अदत्त इह जन्मनि भवान्तरे भुज्यते, नापीह भवे अकृतं शुभं कर्म्म परलोके फलति, तस्मात् परलोकाय कतिपय भिक्षाप्रदानेन शुभं कर्मोपार्जयाम इत्योषौदेशिकसम्भवः || २२० ।। अथोषौदेशिक स्वरूपमाह साउ अविसेसियं चिय मियंमि भत्तंमि तंडुले छुहइ । पासंडीण गिहीण व जो एहिइ तस्स भिक्खट्टा ॥ औद्देशिके द्वादशधा विभागौ देशिक, ओधौ देशिक स्वरूपश्च । Page #128 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयावचूर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः । ॥ ४४ ॥ Jain Education Int सा तु गृहनायिका योषित् प्रतिदिवसं यावत् प्रमाणं भक्तं पच्यते, तावत् प्रमाण एव भक्ते पक्तुमारभ्यमाने पाखण्डिनां गृहिणां वा मध्ये यः कोऽपि समागमिष्यति तस्य भिक्षार्थ अविशेषितमेव, एतावत् स्वार्थमेतावद्भिक्षादानार्थमिति विभागरहितमेव तन्दुलानधिकतरान् प्रक्षिपति, एतदोघौदेशिकम् ।। २२१ ।। अत्र पूर्वपक्षं परस्याशङ्कयोत्तरमाहछमत्थोद्दे कहं वियाणाइ चोइए भणइ । उवउत्तो गुरु एवं गिहत्थसद्दाइचिट्ठाए ॥ २२२ ॥ छद्मस्थः कथमोघौदेशिकं पूर्वोक्तस्वरूपं विजानाति १, एवं प्रेरितो गुरुर्भणति, एवं वक्ष्यमाणन्यायेन गृहस्थशब्दादिचेष्टायामुपयुक्तो दत्तावधानो जानाति ॥ २२२ ॥ एतदेवाह - दिन्नाउ ताउ पंचवि रेहाउ करेइ देइ व गणंति । देहि इओ माय इओ अवणेह य एत्तिया भिक्खा | २२३ ॥ यदि पूर्वसङ्कल्पः कृतो भवति तदैवं गृहस्थानां चेष्टाविशेषा भवेयुः, यथा - क्वापि गृहे साधोः शृण्वत एव भर्त्रा पृष्टा पत्नी कथयति, ताः प्रतिदिवसं कल्पिताः पञ्चाऽपि भिक्षा अन्यभिक्षाचरेभ्यो दत्ताः, यद्वा भिक्षां ददती दत्तभक्षा परि गणनाय भित्त्यादिषु रेखाः करोति, अथ प्रथमेयं द्वितीयेयं भिक्षेत्येवं गणयन्ती ददाति, अथवा काचित् कस्या अपि सन्मुखमेवं भणन्ति, यथा अस्मादुद्दिष्टदत्तिसत्कपिट कादेर्मध्याद्देहि मा इत इति, अथवा काचित् कां प्रत्याह अपनय - पृथक् कुरु विवक्षितस्थानादेतावतीर्भिक्षा भिक्षाचरदानयोग्या इति, तत इत्यादि प्रकारैरोघौदेशिकं ज्ञातुं शक्यते, ज्ञात्वा च परिह्रियते ॥ २२३ ॥ एतच्चोपयुक्तत्वेनैव ज्ञायते इति सामान्यत उपयुक्ततां वक्ति ओधौदेशिक परिक्षा । ॥ ४४ ॥ Page #129 -------------------------------------------------------------------------- ________________ औदेशिके एषणोपयोगे गोवत्सोदा। 4 सद्दाइएसु साहू मुच्छं न करेज गोयरगओ य । एसणजुत्तो होजा गोणीवच्छो गवत्तिव ॥ २२४ ॥ ___ साधुर्गोचरं गतः शब्दादिषु मृच्छौं न कुर्यात् , एषणायुक्तो भवेत् यथा-गोवत्सेण 'गवत्तित्व 'त्ति ॥ २२४ ॥ गाथा | द्वयेन भावयति ( दृ० १७)ऊसव मंडणवग्गा नपाणियं वच्छएन वा चारि। वणियागम अवरण्हे वच्छगरडणंखरंटणया ॥२२५॥ पंचविह विसयसोक्खक्खणी व इसमहियं गिहं तंतु।न गणेइ गोणिवच्छोमच्छिय गढिओगवत्तमि॥ गुणालयनगरे सागरदत्तश्रेष्ठी, तस्य भार्या श्रीमती नाम्नी, श्रेष्ठिना च नवीनं धवलगृहं कारितं जीणं स्फेटयित्वा, तस्य चत्वारस्तनया:-गुणचन्द्रो गुणसेनो गुणचूडो गुणशेखरश्च, तेषां च क्रमेण इमाश्चतस्रो वध्वः-प्रियङ्गुलतिका प्रिया रुचिका प्रियङ्गुसुन्दरी प्रियङ्गुसारिका चेति, कालेन श्रेष्ठिनो भार्या मृत्यु प्राप्ता, श्रेष्ठिना प्रियङ्गुलतिका सर्वगृहसारार्थ स्थापिता, गृहे च सवत्सा गौर्विद्यते, गौर्दिवसे बहिर्गत्वा चरति, वत्सस्तु गृहबद्धोऽवतिष्ठते, तस्य चारि पानीयं च चतस्रोऽपि वध्वो यथायोगं प्रयच्छन्ति । अन्यदा गुणचन्द्रप्रियकुलतिकापुत्रस्य गुणसागरस्य विवाहदिवस उपतस्थ, ततस्ताः सर्वा अपि वध्वस्तस्मिन् दिने सविशेषमाभरणविभूषिताः स्वपरमण्डनादिकरणव्यापृता अभूवन , वत्सश्च तासां विस्मृतिं गतः, न कयापि तस्मै पानीयादि दौकित, मध्याह्ने श्रेष्ठी तत्रैव समेतो, वत्सेनापि श्रेष्ठथागमने रटितुमारब्धं, ज्ञातश्चायं बुभुक्षितः, कुपितेन श्रेष्ठिना सर्वा अपि पुत्रवध्वो निर्मत्सिताः, ततस्ताभिश्चारिं पानीयं च गृहीत्वा तदग्रे दौकितं, वत्सश्च ताभिः सुर Jain Education Inte पा Page #130 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयावचूर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः । ॥ ४५ ॥ Jain Education Int सुन्दरीभिरिव समलङ्कृतं गृहं वधूञ्च, सरागदृष्टया न विलोकयति, किन्तु केवलां तां चारिं पानीयं च समानीयमानं विभावयति । सूत्रं सुगमम्, किन्तु 'पंचविहे 'त्यादि, पञ्चविधविषयसौख्यखनय इव या वध्वस्ताभिः समधिकमतिशयेन रमणीयं तद्गृहं न गणयति, न दृष्ट्या परिभावयति, नापि ता वधूः, एवं साधुरपि मिक्षार्थं प्रविष्टो नालोकते रूपादि, भिक्षामेव परिभावयतीत्युपयुक्तम् [ ता ], तथा च जानाति शुद्धमशुद्धं वा ।। २२५-२२६ ।। तदेवाह - गमागमणुक्खेवे भासिय सोयाइइंदियाउत्तो। एसणमणेसणं वा तह जाणइ तम्मणो समणो ॥ २२७॥ गमनमागमनं च दात्र्या उत्क्षेपो - माजनादीनामुत्पाटनं भाषितं जल्पितं 'इंदियाउत्तो' इत्यादि, श्रोत्रादीन्द्रियानि तैरुपयुक्तः, तथा वत्स इव तन्मनाः श्रमण एषणामनेषणां वा जानाति || २२७ ॥ अथ विभागौदेशिकमाह - महईए संखडीए उव्वरिय कूरवंजणाईयं । पउरं दहूण गिही भणइ इमं देहि पुण्णट्ठा ॥ २२८ ॥ महत्यां सङ्खडयां विवाहादिप्रकरणे उद्धरित कूव्यञ्जनादिकं प्रचुरं धान्यं दृष्ट्वा गृही भणति, कमप्युद्दिश्य इदं भक्तं पुण्यार्थे भिक्षाचरेभ्यो देहीति । उद्दिष्टादिस्वरूपं पूर्व कथितमेव ॥ २२८ ॥ भाष्यम् - तत्थ विभागुद्देसियमेवं संभवइ पुवमुद्दिटुं । सीसगणहियट्ठाए तं चैव विभागओ भणइ ॥भा. २३॥ तत्रोद्धरिते कुरादौ विभागौदेशिकं एवं पूर्वोक्तन्यायेन पूर्वमुद्दिष्टं सम्भवन्ति, अथ तदेव शिष्यगणहितार्थ विभागतो मेदेन भणति ग्रन्थकारः ॥ २३ ॥ विभागौदेशिकम् । ॥ ४५ ॥ Page #131 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उद्देसियं समुद्देसियं च आएसियं समाएसं। एवं कडे य कम्मे एकोक्कि चउक्कओ भेओ ॥ २२९॥ विभागौउद्दिष्ट-विभागौदेशिक चतुर्दा, तथाहि-उद्देशिकं समुद्देशिकं आदेशं समादेशं च, एवं कृते कर्मणि च एकैकस्मिन् । देशिकचतु:सहाथो मेदो ज्ञेय इति द्वादशधा ॥ २२९ ।। अथ भेदचतुष्टयं व्याख्यानयति गताजावंतियमदेसं पासंडीणं भवे समुहसें । समणाणं आएसं निग्गंथाणं समाएसं ॥ २३०॥ वान्तरउद्दिष्ट कृतं कर्म वा यावन्तो भिक्षाचरा गृहिणो वा समेष्यन्ति तेभ्यो देयमिति सङ्कल्पे औद्देशिकं भवति, पाखण्डिनां मेदाः। कल्पितं समद्देश, श्रमणानामादेश, निर्ग्रन्थानां समादेशम् ॥ २३० ॥ अथ मेदान्तरानाहछिन्नमछिन्नं दविहं दवे खेत्ते य काल भावे य । निप्फाइयनिष्फन्नं नायवं जं जहिं कमइ ॥ २३१॥ होमिहेशादिकं प्रत्येक द्विधा, छिन्नमछिन्नं च, तत्र छिन्न-नियमितं, अच्छिन्नं तु विपरीतं, पुनरपि द्वयं चतुर्दा, द्रव्यक्षेत्रकालभावभेदात, एवं यथोद्दिष्टमौद्देशादिकं प्रत्येकमष्टधा, एवं निष्पादितनिष्पन्नमिति, निष्पादितेन-गृहिणा स्वार्थ कृतेन निष्पन्नं यत् करम्बादि (मोदकादि) वा, तनिष्पादितनिष्पन्नमुच्यते, ततो यन्निष्पादितनिष्पन्नं यत्र कृते कर्मणि वा क्रामति-घटते, तत् प्रत्येकमौदेशिकादिभेदभिन्नं छिन्नमच्छिन्नं चेत्यादिना प्रकारेणाष्टधा ज्ञातव्यम् ।।२३१॥ अथामुमेव गाथार्थ व्याख्यानयतिभत्तुबरिय खल संखडीएँ तद्दिवसमन्नदिवसेवा।अंतो बहिं च सवं सबदिणं देहि अच्छिन्नं ॥ २३२।। खलु सङ्खडयां भक्तादुद्धरितं, यदोदनादि तत्तस्मिन् दिवसे वा भार्यादिना दापयति गृहस्वामी, अन्तर्गृहमध्ये बहिर्वा, Jain Education For Private & Personel Use Only Page #132 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पिण्ड क्षमा अनेन क्षेत्राच्छिन्नमुक्त, सर्व इत्यनेन द्रव्याच्छिन्नं सर्वदिनं यावदिति, कालाच्छिन्नमच्छिन्न-अनवरतं देहि, भावाच्छिन्नं विभागौरत्नीया-II स्वयमा, यदि तव रोचते वा न वा तदपि देहीति ॥ २३२ ॥ अथ द्रव्यादिच्छिन्नमाह देशिकवचूर्युपेता देहि इमं मा सेसं अंतो बाहिरगयं व एगयरं जाव अमुगत्तिवेला अमुगं वेलंच आरब्भ ॥२३३॥ गताश्रीइदं देहि मा शेषमिति, द्रव्यच्छिन्नं, अन्तर्बहिर्वा व्यवस्थितं देहि एकतरमिति क्षेत्रच्छिन्नं, अमुकस्या वेलाया आरम्य वान्तरयावदमुका वेला, तावद्देहीति कालच्छिन्न, भावच्छिन्नं स्वयमूह्य, यावत्तव रोचते तावदेहि नाधिकमिति भावच्छिन्नम् ॥ २३३ ।। मेदाः । नियुक्तिः। अथोद्दिष्टमुद्दिश्य कल्प्याकल्प्यविधिमाह॥४६॥ दवाईच्छिन्नंपि हु जइ भणई आरओऽवि मा देह । नो कप्पइ छिन्नपि हु अच्छिन्नकडं परिहरंति ॥ २३४ 12 द्रव्यादिभिश्छिन्नमपि पृथकिर्दारितमपि हः-निश्चितं यदि गृहस्वामी आरत एव-देयस्य वस्तुनो नियतावधेरागपि भणति, यथा मा इत ऊर्ध्व कस्मायपि देहीति, तथा सङ्कल्पस्यान्यथा करणात कल्पते, यदि अच्छिन्नं अनिर्धारितं कृतं वर्तते तत् परिहरन्ति, यदा त्वच्छिन्नमपि पश्चादात्मसत्ताकीकृतं दानपरिणामाभावाचदा तदपि कल्पते ।। २३४ ॥ अथ सम्प्रदानविभागमधिकृत्य कल्प्याकल्प्यविधिमाहअमुगाणंति व दिजउ अमुकाणं मित्तिएत्थ उ विभासा।जत्थ जईण विसिट्रो निद्देसो तं परिहरंति ॥२३५/ अमुकेभ्यो दद्यान्मा अमुकेम्य इति सम्प्रदानविषयसङ्कल्पे कृतेऽत्र विभाषा ज्ञेया, क्वचित्कल्पते क्वचिन्नेत्याह-यत्र देये Jain Education Inter For Private Personel Use Only Irww.jainelibrary.org Page #133 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कृतौदेशिकस्य संभव हेतवः स्वरूपश्च। वस्तुनि यतीनामेव विशेषेण निर्देशो भवति, यथा-यतिभ्यो दातव्यमिति तत्परिहरन्ति, नात्र सन्देहः ॥ २३५ ।। संदिस्संतं जोसुणइ कप्पए तस्स ससेए ठवणा। संकलिय साहणंवा करेंति असुए इमा मेरा ॥२३६ ॥ साधौ समागते यत्रोद्दिश्यते तत्र यः साधुः सन्दिश्यमानमर्थिभ्यो देयमिति सङ्कल्प्यमानं शृणोति, अतस्तत्कल्पते तदेव, दोषामावाद , तदप्युद्दिष्टौदेशिकादि, न कृतं कर्म च, शेषके न कल्पते, कुत इत्याह-स्थापनादोपात् , तथा अश्रुते. शेषसाधुभिरनाकर्णिते इयं मर्यादा-यत सङ्कलिकया एका सकाटकोऽन्यस्मै कथयति सोऽप्यन्यस्मायित्येवं रूपया, 'साहणं' कथनं करोति ॥ २३६ ॥ अथैवमपि यः सङ्घाटकन ज्ञातं तत्परिज्ञानोपायमाह मा एयं देहि इमं पुढे सिट्ठांम तं परिहरंति । जं दिन्नं तं दिन्नं मा संपइ देहि गेण्हति ॥ २३७ ॥ मा कापि भिक्षा ददती कयापि निषिध्यते-मा एतद्देहि किन्विदं ततः साधुना पृष्टे इदं दानाय कल्पितमिदं नेति, शिष्ट कथिते सति साधवस्तत्परिहरन्ति, यदि पुनर्यदत्तं तद्दत्तं मा शेष सम्प्रति दद्यादिति निषिद्धे तत् कल्पते इति कृत्वा गृढन्ति, तदेवमुक्तमुद्दिष्टौदेशिकम् ॥ २३७ ॥ अथ कृतौदेशिकस्य सम्भवहेतून स्वरूपं चाहरसभायणहेउं वा मा कुच्छिाहिई सुहं व दाहामि । दहिमाई आयत्तं करेइ कूरं कडं एयं ॥ २३८॥ माकाहंति अवण्णं परिकहलियं वदिजड सहत। वियडेण फाणिएणवनिषेण समं तु वदति ॥२३९॥ रसेन-दध्यादिना युक्तमिदं भाजनं, तस्मादेतेन दयादिना यदद्धरित शाल्योदनादि तत् करम्बीकृत्य रिक्तमिदं Jan Education inte For Private Personel Use Only warijainelibrary.org Page #134 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयापर्युपेता कौंदेशिकस्य संभवहेतवः स्वरूपश्च। श्री पिण्डनियुक्तिः ॥४७॥ भाजनं करोमि येनान्यत्प्रयोजनमनेन क्रियते इति रसभाजनहे तोः, यद्वा इदं दध्यादिना अमिथ कोथिष्यते (ति), न च कुथितं दातुं शक्यते, तस्मात् कुथनं मा प्राप्नुयादिति बुद्धथा, यद्वा दध्यादि सन्मिश्रकेनैव प्रयासेन सुखं दीयते, इत्यादि कारणजातेन दध्यायायत्तं-दध्यादिसन्मिभं करोति, करं-ओदनं एतत् कृतं ज्ञातव्यम् , तथा यदि भिन्न भिन्नमोदकाचूर्णीकृता दास्यामि, ततो मे पाखण्डथादयोऽवर्ण-अश्लाघो करिष्यन्ति, यद्वा परिकलितं-एकत्रपिण्डीकृतं सुखेन दीयते, ततो विकटेन-मद्येन देशविशेषापेक्षमेतद्, यद्वा फाणितेन अबद्धगुडेन, यद्वा स्निग्धेन घृतादिना मोदकचूर्णादि समं वर्तयन्तिपिण्डतया बनन्ति । अत्र द्वयोरपि गाथयोः पूर्वार्धम्यां सम्भवहेतव उक्ताः, उत्तरार्द्धाभ्यां तु स्वरूपम् ॥ २३८-२३९ ।। अथ कौंदेशिकस्य सम्भवहेतून स्वरूपश्चाह| एमेव य कम्ममिऽवि उण्हवणे नवरि तत्थ नाणत्तं । तावियविलीणएणं मोयगचुन्नीपुणकरणं ॥२४०॥ यथा कृतस्य सम्भवः स्वरूपं चोक्तं तथा कर्मण्यपि द्रष्टव्यम् , नवरं तत्र कर्मणि नानात्व-विशेषः, यतस्तापितेन | विलीनेन च गुडादिना मोदकचूर्णस्य पुनर्मोदकत्वेन करणं नान्यथा, उपलक्षणत्वादन्यद्भक्तमपि तथैव ज्ञेयम् ॥ २४ ॥ अथ कल्प्याकल्प्यविधिमाहअमगंति पुणो रद्धं दाहमकप्पं तमारओ कप्पं । खेत्ते अंतो बाहिं काले सुडवं परेवं वा॥२४१॥ कोऽपि साधु भणति, अहममुकं-मोदकचूर्णादि भूयोऽपि राद्धं तुभ्यं दास्यामि, त्वया पुनरागन्तव्यं मद्गृहे, I n Jain Education in For Private Personal Use Only Page #135 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education इत्युक्त्वा यदि तथा कृत्वा ददाति तर्हि न कल्पते, आरतो-भूयः पाकारम्भादर्वाक् पुनः कल्प्यं दोषाभावात्, तथा क्षेत्रेऽन्तहिर्वा काले श्वस्तनं परतरदिनभवं वा अकल्प्यमारतः कल्प्यं, अयं मावः - यतो गृहान्तर्बहिर्वा मोदकचूर्णादिकं भूय उपस्करिष्यामि कालविवक्षायां अद्य श्वः परतरे वा दिने भूयोऽपि पक्ष्यामि तत्तुभ्यं दास्यामीत्युक्ते तथैव कृत्वा चेददाति ततो न कल्पते, भूयोऽपि पाकारम्भाद् आरतः कल्पते ॥ २४९ ॥ तथैवाह - जं जहव कथं दाहं तं कप्पइ आरओ तहा अकथं । कयपाकमणिट्ठत्ति ठियंपि जावत्तियं मोत्तुं ॥ २४२ ॥ द्रव्यं यथा वा क्षेत्रादिनिर्द्धारणेन भूयोऽपि कृतं दास्यामीत्युक्ते तचथाऽकृतं पाकारम्भादारतोऽर्वाक् कल्पते, तथा कृतं तु न कल्पते, अथ कम्मौदेशिकं कृतपाकमात्मार्थीकृतमपि यावदर्थिकं मुक्त्वा शेषमनिष्टं नानुज्ञातं तीर्थकरगण घरैः, यावदर्थिकं स्वात्मार्थीकृतं कल्पते ।। २४२ ॥ कापि ' छक्काये ' ति गाथा दृश्यते, परं सा वृत्तौ न व्याख्याता, सुगमा च, सम्बन्धश्व न कोऽपि ॥ अथ पूतिद्वारमाहपूतिश्चतुर्द्धा नामादिमेदाचत्र भेदद्वयं प्रागिव, द्रव्यभावौ चाह पूई कम्मं दुविहं दवे भावे य होइ नायवं । दवंमि छगणधम्मिय भावंमि य बायरं सुमं ॥ २४३ ॥ द्रव्ये भावे च द्विधा पूतिकर्म्म ज्ञातव्यं भवति, द्रव्ये लगणधार्मिको- गोमयोपलक्षितो धार्मिको दृष्टान्तः, भावे पुनर्द्विधा १ मुद्रितादर्श नैषा गाथा न च टीका, अतो न सम्पूर्णा लिखिता । ३ पूतिदोषे तद्भेदौ । Page #136 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा । रत्नीया. पूतिदोषे सभोपलेपनोदा। वचूयुपेता श्री • पिण्डनियुक्तिः ॥४८॥ बादरं सूक्ष्मं च ॥ २४३ ॥ अथ द्रव्यपूतिलवषमाह ॐ गंधाइगुणसमिद्धं जं दवं असुइगंधदवजुयं । प्रइत्ति परिहरिजइ तं जाणसु दवपूइत्ति ॥२४४॥ __यत् द्रव्यं गन्धादिगुणविशिष्टमपि अशुचिगन्धद्रव्ययुक्तं पूतिरपत्रिममिति परिहियते, तद्व्यतिरिति जानीहि ॥२४४॥ अथ गाथाद्वयेन छगणधार्मिकदृष्टान्तं वक्तिगोट्ठिनिउत्तो धम्मी सहाएँ आसन्नगोट्टि भत्ताए। समियसुरवल्लमीसंअजिन्न सन्नामहिसिपोहो ॥२४५॥ संजायलित्तभत्ते गोढिगगंधोत्ति वल्लवणिआयो। उक्खाणय अन्न छगणेण लिंपणं दवपूई उ ॥२४६ ॥ 1. (१०१८) सम्मिल्लपुरोधाने माणिभद्रो यक्षः। तत्रान्यदा शीतलकामिधाने रोगे समुत्पन्ने लोकैरुयापनिका यक्षगृहे मानिता वर्षमेकं यावदष्टम्यादिषु तिथिपर्वस, रोगोपशान्तौ समातिहार्योऽयं यक्ष इति, देवशख्यिपूजाकृतः कथितः त्वयोद्यापनिकादिने गोमयेनोपलिम्पनं देवकुलाङ्गणे कार्य, तेन प्रतिपन, अथान्यदोद्यापनिकादिनेऽनुगत एव सूर्ये कस्यापि कुटुम्बिनो गोपाटके छगणग्रहणाय पूजाकजगाम. तत्र च केनापि कर्मकरेण रात्री मण्डकवल्लमुराद्यभ्यवहारतो जाताजीर्णेन पश्चिमरात्रौ तत्रैव गोपाटके क्वचिद्दर्गन्धमजीर्ण पुरीष व्युदसर्जि, तस्य चोपरि कथमपि महिषी समागत्य छगणपोहं मुक्तवती, देवशम्मेणा न ज्ञातमिति पुरीपमिश्रगोमयं गृहीतं, सभायां लिप्तायामुद्यापनिकाथे मोदकाबादाय जनाः समागताः, तावत्तेषामतीवदुर्गन्धे नासाप्रविष्टे जनैर्देवशर्मा पृष्ठः, तेनोक्तं-न जाने, ततस्तैः सम्यक् परिभावयद्भिरूपलेपनामध्ये ॥४८॥ in Education For Private Personel Use Only Page #137 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education वल्लाद्यवयवा दृष्टाः, सुरा गन्धश्च ज्ञातः पुरीषमिश्रता च ज्ञाता लोकैः, ततः सर्वं भोजनमशुचीतिकृत्वा त्यक्तं, उपलेपनं चोत्खाय नव्यगोमयेनोपलेपनं कारितं, नूनं पाकं चानं भुक्तम्, सूत्रं सुगमं, नवरं धर्मी - धार्मिकः, संज्ञा-पुरीषं, यदुपलेपनं तत्र न्यस्तं भोजनादिकं द्रव्यपूतिरिति ।। २४५ - २४६ ॥ अथ भावपूतिमाह - उग्गमकोडिअवयवमित्तेणवि मीसियं सुसुद्धपि । सुद्धपि कुणइ चरणं पूइं तं भावओ पूई ॥ २४७ ॥ उद्गमकोट आधाकर्मादिरूपा भेदा, द्विधा विशोधयोऽविशोधयथ, तत्रेहाविशुद्धयो ग्राह्यास्तासामविशोधिरूपाणामुद्गमकोटीनामवयवमात्रेणापि मिश्रितमशनादिकं सुशुद्धमपि चरणं शुद्धमपि पूर्ति करोति, तदशनादिकं भावपूतिरनेनावर्थोऽपि सूचित इति ॥ २४७ ॥ अथोद्गमकोटी स्वरूपमाह आहाकम्मुद्देसिय मीसं तह बायरा य पाहुडिया । पूई अज्जोयरओ उग्गमकोडी भवे एसा ॥ २४८ ॥ आधा कर्मसकल मौदेशिकं यावदर्शिकं मुक्त्वा शेषं कम्मौदेशिकं मिश्रं वादरा च प्राभृतिका पूर्ति र्भाव पूतिरध्य व पूरकचोतरभेदद्वयात्मकः, एषा भवति उद्गमकोटिरविशोधिकोटिरूपा ॥ २४८ ॥ अथ भावपूतिभेदानाहबायर हुमं भावे उ इयं सुहुममुवरि वोच्छामि । उवगरण भत्तपाणे दुविहं पुण बायरं पूइं ॥ २४९ ॥ भावे बाद सूक्ष्मति द्विधा पूतिः, सूत्रत्वान्नपुंसकनिर्देशः, सूक्ष्मानुपरि वक्ष्ये, बादरा पुनर्द्विधा - उपकरणे भक्तपाने च ।। २४९ ॥ अथ भक्तपानपूर्ति सामान्यत आह भावपूतिः तद्भेदाथ । Page #138 -------------------------------------------------------------------------- ________________ VM क्षमा- रत्नीयावर्युपेता बादरमाव पूतावुपकरणभेद श्री ला व्याख्या। पिण्डनियुक्तिः ॥४९॥ चल्लुक्खलिया डोए दवीढे य मीसगं पूइं। डाए लोणे हिंगू संकामण फोडणे धूमे ॥ २५०॥ चुल्ली प्रतीता उखा-स्थाली डोयः-बृहदारुहस्तकः, महांश्चट्टक इति, दर्बी-लघुदारुहस्तका, एतानि सर्वाण्याधाकर्मरूपाणि ज्ञेयानि, एतेषु 'छुढं ' ति क्षिप्तं 'मीसगं' ति, एतैः सन्मिश्रं शुद्धमप्यशनादि पूतिर्भवति, तत्र चुल्लयखाम्यां कृत्वा रन्धनेन यद्वा तत्र स्थापनेन, तथा डाय-शाकं लवणं हिगु च प्रतीतं, एतैराधाकम्मिकैः सन्मिश्र पूतिः, तथा सङ्क्रामण- | स्फोटनधूमैरपि, तत्र सङ्कामणं-आधाकर्मखरण्टितभाजने पचनं मोचनं वा, स्फोटनं-आधाकर्मणा राजिकादिना | संस्कारकरणं धृमो-हिङ्गादिसत्को वधारः ॥२५०॥ एनामेव गाथां व्याचिख्यासुः पूर्वमुपकरणशब्दं व्याख्यानयति| सिझंतस्सुवयारं दिजंतस्स व करेइ जं दत्वं । तं उक्करणं चुल्ली उक्खा दबी य डोयाई ॥२५१॥ यद्रव्यं चुल्ल्यादिकं सिद्धयतोऽन्यस्य यद्व्यादिकं दीयमानस्य भक्तस्य उपकारं करोति तच्चुल्ल थादिकमुपकरणं स्यादिति ॥ २५१ ॥ अथ चुल्ल्युखयोः स्थिताशनादेः कल्प्याकल्प्यविधिमाहचुल्लुक्खा कम्माई आइमभंगेसु तीसुवि अकप्पं । पडिकुटुं तत्थत्थं अन्नत्थगयं अणुन्नायं ॥ २५२ ॥ इह चुल्ल्युखयोः कर्मादि चतुर्भङ्गी स्यात् , तथा हि-चुल्ली उखा च द्वे आधाकर्मिके, चुल्ली आधाकम्मिकी नोखा, उखा आधाकर्मिमकी म चुल्ली, नोखा नापि चुल्ली आधार्मिकीति, तत्रादिमेषु त्रिष्वपि भङ्गेषु रन्धनेनावस्थानमात्रेण वा स्थितमशनाद्यकल्प्य पूतिदोषात् , अथ तत्रैव विषयविभागेन कल्प्यतामाह-तत्र चुल्ल्यादौ रन्धनेनान्यतो वाऽऽनीय स्था ॥४९॥ For Private Personal Use Only Jain Education inte Page #139 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पनेन स्थितं सत् प्रतिक्रुष्ट-निराकृतं, अन्यत्र गतं पुनस्तदेवानुज्ञातं तीर्थकदादिभिः, परं स्वभावेनान्यत्र नीतं न साध्वर्थ- 10 पूतावुपमिति विशेषः ॥ २५२ ॥ अथ चुल्ल्याापकरणानां पूतिभावं दिदर्शयिषुः “चुल्लखलिया डोए" इति पूर्वगाथावयवं करणव्याख्यानयति मेदकम्मियकद्दममिस्सा चुल्ली उक्खा य फडगजुया उ। उवगरणपूइमयं डोए दंडे व एगयरे ॥ २५३ ॥ व्याख्या। ___ आधाकम्भिककर्दमेन या मिश्रा चुल्ली उखा च कियता शुद्धेन कियताऽऽधाकम्मिकेण च निष्पादितेत्यर्थः, 'सा फगजुय 'ति, आधाकमिकेन युता इति, उपकरणपूतिः, तथा 'डोए' ति, पदैकदेशन्यायेन डोयस्याग्रभागो ज्ञेयस्तस्मिअथ दण्डे एकतरस्मिन्नाधाकर्मणि स दारुहस्तकः पूतिर्भवति, इत्थं सर्वोपकरणानां भावना कार्या पूतित्वे ॥ २५३ ॥ अथ " दब्बीछुढे " इति व्याख्यानयतिदबीछुढेत्ति जं वुत्तं कम्मदवाएँ जं दए । कम्मं घट्टिय सुद्धं तु घट्टए हारपूइयं ॥२५४ ॥ ___'दब्बी छुढे ' इति प्रागुक्तं, तस्यायमर्थः, आधाकम्मिकदा यत् शुद्धमप्यशनादिकं घटयित्वा ददाति तद 'आहारपूतिः,' सा चेत् दर्वी स्थाल्याः सकाशानिष्काशिता तर्हि स्थाल्याः सत्कं कल्पते, 'सूचनात् सूत्रमिति, यद्वा माभूदाधाकम्मिकी दी केवलं शुद्धथाऽपि दा यदि पूर्वमाधाकर्मिकं घटयित्वा-चालयित्वा पश्चादाधाकावयवखरण्टितयाऽन्यत् | शुद्धमपि घटयित्वा ददाति तदप्याहारपूतिः, अस्यां च दयां स्थाल्या निष्काशितायामपि शेषं स्थालीमक्तं न कल्पते, Jain Education a l For Private & Personel Use Only Page #140 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयावर्युपेता |पूतौ भक्त पानपूतिः सूक्ष्मपूतिश्च । श्री पिण्डनियुक्ति ॥५०॥ आधाकावयवमिश्रितत्वात् ।। २५४ ॥ " डाये" त्याद्युत्तराद्धं व्याख्यानयतिअत्तट्ठिय आयाणे डायं लोणं च कम्म हिंगुं वा । तं भत्तपाणपूई फोडण अन्नं व जं छुहइ ॥२५५॥ संकामेउं कम्मं सिद्धं जं किंचि तत्थ छुढं वा । अंगारभूमि थाली वेसण हेट्ठा मुणीहि धूमो ॥२५६ ॥ आत्मार्थ आदाने-तक्रादिपाकारम्भकरणरूपे सति यदाधाकम्मिकं डायं-शाकं, यद्वा लवणं यद्वा हिङ्गु अन्यद्वा स्फोटनं राजिकाजीरिकादि, 'जं छुभइ 'ति, तन्मध्ये क्षेपयति, तत् तक्रादिकं तेन सम्मिश्रं भक्तपानपूतिः, एतेन 'डाए लोणे हिंगू फोडण'मिति व्याख्यातम् , तथा यस्यां स्थाल्यां राद्धमाधाकर्म तद् अन्यत्र सङ्क्रमय्य तस्यामेव स्थाल्यामकृत कल्पप्रयायां यद् आत्मार्थ सिद्धं किञ्चित् , यद्वा तत्र प्रक्षिप्तं तदपि भक्तपानपूतिः, अनेन सङ्कामणेति व्याख्यातं, तथा अङ्गारेषु-निर्धूमाग्निरूपेषु वेसने उपलक्षणत्वाद् हिगुजीरकादौ प्रक्षिप्ते सति यो धूम उच्छलति स वेसनाङ्गारे धूम इति ज्ञेयम् , पूर्वगाथायां धूम इत्यस्य पदस्यायमर्थो भावनीय इत्यर्थः, अनेन च धूमेन या व्याप्ता स्थाली तक्रादिकं च तदपि पूतिः, अवार्यत्वाद्वसनादिपदानां व्यस्तन्यासः ॥ २५५-२५६ ॥ अथ सूक्ष्मपूतिमाहइंधणधूमेगंधेअवयवमाईहिं सुहुमपूई उ । सुंदरमेयं पूई चोयग भणिए गुरू भणइ ॥ २५७ ॥ इन्धनधूमगन्धाद्यवयवैर्मियं भक्तादिसूक्ष्मपूतिरादिशब्दाद्वाष्पादिपरिग्रहः, इन्धनाद्याधाकम्मिकं ज्ञेयम् , एषा च सूक्ष्मपूति गमेति निषिध्यते ॥ २५७ ॥ ततः शिष्य आह-सुन्दरं युक्तमेतत् पूतिपरिहरणमिति शिष्येण भणिते गुरुर्भणति ॥५० Jain Education in For Private & Pertsonel Use Only Page #141 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पक्ष्मपूतेर साध्यता। a इंधणधूमेगंधेअवयवमाई न पूइयं होइ । जोर्स तु एस पूई सोही नवि विजए तोर्स ॥ २५८ ॥ पूर्वार्द्ध प्रागिव, येषां तु मते एवं पूतिर्भवति शुद्धिर्न विद्यते ॥ २५८ ॥ तेषां तथैवाह| इंधनअगणीअवयव धूमो बप्फो य अन्नगंधो य । सवं फुसंति लोयं भन्नइ सवं तओ पूई ॥२५९॥ इन्धनाग्न्यवयवाः सूक्ष्मा ये धूमेन सहादृश्यमाना गच्छन्ति, तथा धूमो बाष्पोऽन्नगन्धश्च, एते वातादिवशेन सर्वमपि लोकं स्पृशन्ति, ततस्तवाभिप्रायेण सर्वमपि वसत्यादिकं पूतिर्भण्यते अतः कथं शुद्धिरिति गुरुवाक्यम् ॥ २५९ ।। अथ पर। स्वपक्षस्थापनमिच्छन्नाहनणु सुहूमपूइयस्सा पुव्वुदिट्ठस्सऽसंभवो एवं । इंधणधूमाईहिं तम्हा पूइत्ति सिद्धमिणं ॥ २६०॥ ननु एवं भवद्वाक्येनैव पूर्वोद्दिष्टस्य " भावम्मि य बायरं सुहुम " मित्यादिना पूर्वोक्तस्य सूक्ष्मपूतेः सम्भवः, अन्यथा तदभावात् , तस्मात् सिद्धमिदं यदिन्धनादिधूमादिभिर्मिश्रं सूक्ष्मपूतिरिति ॥ २६० ॥ गुरुराहचोयग इंधणमाईहिं चउहिवी सुहमपूइयं होइ । पन्नवणामित्तमियं परिहरणा नत्थि एयस्स ॥२६१॥ हे चोदक ! इन्धनादिभिरिन्धनाग्न्यवयवधूमबाष्पगन्धैश्चतुर्भिरपि स्पृष्टं सूक्ष्मपूतिर्भवति, केवलमिदं प्रज्ञापनामात्र, GI परिहरणं पुनस्तस्याः सूक्ष्मपूतेर्नास्ति ॥ २६१ ॥ एतदेवाह Jain Education in For Private & Personel Use Only Page #142 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयापर्युपेता श्री पिण्डनियुक्तिः ॥५१॥ सज्झमसझं कजं सज्झं साहिजए न उ असझं । जो उ असझं साहइकिलिस्सइनतं चसाहेई ॥२६२ लक्ष्मप्तेर शक्यसाध्यमसाध्यं च कार्य द्विधा, तत्र साध्य साध्यते न स्वसाध्यं, यस्त्वसाध्यं युष्मादृशः साधयति स क्लिश्यते, न च परिहारता। तत्कार्य साधयति ॥ २६२ ॥ अथ परः सूक्ष्मपूतिपरिहरणं सुकरमिति प्रतिपादयतिआहाकम्मियभायणपप्फोडण काय अकयए कप्पे। गहियं तु सुहुमपूई धोवणमाईहिं परिहरणा ।२६३ ____ यत्र भाजने गृहीतमाधाकर्म तस्मिन् भाजने आधाकर्मपरित्यागानन्तरं प्रस्फोटनं हस्तादिना कृत्वा, अकृते कल्पत्रये यद् गृहीतं तत सूक्ष्मपूतिर्भवति आधाकांशत्वात् , तस्याश्च परिहरणं जलप्रक्षालनादिभिरिति, तदेतदयुक्तं, तत्र बादरपूतिभावात् ॥ २६३ ॥ धोयंपि निरावयवं न होइ आहच्च कम्मगहणंमि । न य अदवा उगुणा भन्नई सुद्धी कओ एवं ?॥२६४॥ आधाकर्मग्रहणे सति तत्परित्यागानन्तरं कदाचित् धौतमपि निरवयवं भाजनं न भवति, पश्चादपि गन्धस्योपलभ्यमानत्वात् , अथ गन्ध एव उपलभ्यते, न कश्चिदवयव इति ब्रूषे, तत आह-न चाद्रव्या गुणा गन्धादयः सम्भवन्ति, तेनावश्य धौतेऽपि केचिदवयवाः सूक्ष्मा ज्ञेयाः, तत एवमपि भवत् परिकल्पितप्रकारेणापि कुतः सूक्ष्मपूतेः शुद्धिरपि तु नैवेति, ततः प्रज्ञापना मात्रमेवेति स्थितम् , न च गन्धादयो दूरगताः पूतिकारणं स्युः ॥ २६४ ॥ तदेवाहलोएवि असुइगंधा विपरिणया दूरओ नदूसंति। न य मारंति परिणया दूरगयाओ(अवि)विसावयवा ॥ ॥५१॥ Jan Education Intel Page #143 -------------------------------------------------------------------------- ________________ द्रव्यपूते परिहार्यता। लोकेऽपि अशचिगन्धा दस्त आगता विपरिणताः सन्तः स्पृष्टा अपि न दुष्यन्ति, न च विषाक्यवा अपि दस्गताः (सन्तः) परिणताः-पर्यायान्तरमापन्ना मारयन्ति, तथाऽऽधाकर्मगन्धाः पुद्गला अपीति ॥२६५॥ अथ द्रव्यपूतिपरिहार्यतामाह- सेसेहि उ दवेहिं जावइयं फुसइ तत्तियं पूई । लेवेहि तिहि उ पूई कप्पइ कप्पे कए तिगुणे ॥ २६६ ॥ शेषैरिन्धनाद्यवयवव्यतिरिक्तैः शाकलवणादिभिर्यावत् स्थाल्यादिपरिमितं द्रव्यं स्पृष्ट भवति, तावत प्रमाणं प्रतिः, तथा विभिलेपैः पतिः, अयं भावः-स्थाल्यां किलाधाकम्मे राद्धं, ततस्तस्या अपनीय अपनीते च तस्मिन् या पाश्चात्या खरण्टि: सा एको लेपः, ततस्तस्यामेव स्थाल्यामकृतकल्पत्रयायां शुद्धं रार्दू पूतिः, एवं वारद्वयमन्यदपि राद्धं पूतिः, अथ गृहिणास्वकायें यदि कल्पवयं स्यात् तर्हि किमित्याह-कल्पे त्रिगुणे-त्रिसङ्खये कृते तस्यामेव स्थाल्यां शुद्धमशनादि राद्धं कल्पते ॥ २६६ ॥ तथैवाहइंधणमाई मोत्तं चउरो सेसाणि होति दवाई। तेर्सि पुण परिमाणं तयप्पमाणाउ आरब्भ ॥ २६७॥ इन्धनावयवादीनि चत्वारि पूर्वोक्तानि मुक्त्वा शेषाणि द्रव्याणि पूतिकारणानि भवन्ति, तेषां च परिमाणं त्वप्रमाणादारभ्य द्रष्टव्यम्, त्वङ्मात्रमादौ कृत्वा पूतिकारणत्वं तेषामित्यर्थः॥ २६७ ॥ अथ साधुपात्रं दात्गृहं चाश्रित्य पूतिविषयं कल्प्याकल्प्यविधिमाहपढमदिवसंमि कम्मतिन्नि उ दिवसाणि पूइर कप्पइ कप्पड तइओ जया कप्पो॥ Jain Education a l For Private & Personel Use Only , Page #144 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयापर्युपेता- श्री. पिण्डनियुक्ति ॥५२॥ यत्र गृहे प्रथमदिवसे आधाकर्मनिष्पन्न तत् प्रथमदिवसे आधाकम्भँव गृहं, त्रीणि दिवसानि तु पूतिः, पूतिदोषवत्सु लाप्रतिज्ञानोत्रिषु दिनेषु आधाकर्मदिने चैवं चत्वारि दिनानि (न) कल्पते, साधुपात्रे च पूतिभृते यदि तृतीयः कल्पो दत्तो भवति पायो तदाऽन्यच्छुद्धाशनादिकं गृहीतुं कल्पते ॥ २६८॥ मिश्रजातसमणकडाहाकम्मं समणाणं जंकडेण मीसं तु । आहार उवाह वसही सवं तु प्रइयं होइ ॥ २६९ ॥ दोषश्च । श्रमणानामर्थाय कृतमाधाकर्म आहारोपधिवसत्यादिकं यत्पुनः श्रमणानामर्थाय कृतेन आधाकर्मणा मिश्रमाहारादि तत् सर्व पूतिर्भवति ॥ २६९ ॥ अथ परिज्ञानोपायमाहसड्ढस्स थेवदिवसेसु संखडी आसि संघभत्तं वा। पुच्छित्त निउणपुच्छं संलावाओ वडगारीणं ॥२७०॥ साधुना गृहमागतेन सङ्घड्यादिकं चिहं दृष्ट्वा श्राद्धम्य श्राविकाया वा पार्श्वे निपुणपृच्छं प्रष्टव्यं, यथा-युष्माकं गृहे स्तोकदिवसेषु-स्तोकदिनमध्ये सङ्कडी-वीवाहादिरूपा सङ्घभक्तं (वा) दत्तमासीत् ?, सङ्खयां यदि साधुनिमित्तं किमपि कृतं भवेत् तदा पूर्वोक्तदिनपरिमाणेन त्याज्यं, अथवा क्वापि प्रश्नमन्तरेणापि अगारिणीनां संलापात् पूतिरपूतिर्वति ज्ञातव्यम् , मिथो वर्गकरणात् ।। २७० ॥ मिश्रजातमाहमीसजायं जावंतियं च पासंडिसाहुमसिं च । सहसंतरं न कप्पइ कप्पइ कप्पे कए तिगुणे ॥ २७१॥ मिश्रजातं विधा-यावदार्थकं पाखण्डिमिश्रं साधुमिश्रं च, आत्मीयपाकारम्मे एतेषां सङ्कल्पेन मिश्रत्वात् , एतेनान्व ॥५२॥ For Private Personal Use Only Jain Education in ww.jainelibrary.org Page #145 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४ मिश्रजातदोषमेदाः। र्थोऽपि सूचित इति, एतच्च सहस्रान्तरमपि न कल्पते, यथा येन कृतं तेनान्यस्मै दत्तं तेनाप्यन्यस्मायिति सहस्रान्तरगतमुच्यते, यस्मिन् भाजने तन्मियं गृहीतं तस्मिन् मिश्रपरित्यागानन्तरं कल्पे त्रिगुणे कृतेऽन्यच्छुद्धं भक्तादि गृहीतुं कल्पते नान्यथा ॥ २७१ ॥ एनामेव गाथां भाष्यकृद् व्याख्यानयति, पूर्व मिश्रसम्भवमाहदुग्गासेतं समइच्छिउं व अद्धाणसीसए जत्ता । सड्डी बहुभिक्खयरे मीसजायं करे कोई ॥भा. २४॥ 'दुःखेन ग्रासो यत्र तद् दुर्गासं-दुर्मिक्षं तत्र भिक्षाचरसत्त्वानुकम्पया, यद्वा तद् दुर्भिक्षं समतिक्रान्तः कश्चिद् बुभुक्षाकष्ट महत्परिज्ञाय यदि वा अध्वशीर्षके-कान्तारादिनिर्गमरूपे खिन्नभिक्षाचरानुकम्पया, यद्वा यात्रादिरूपे उत्सवविशेषे दानश्रद्धया कोऽपि श्रद्धी-श्रद्धावान् बहून् भिक्षाचरानुपलभ्य मिश्रजातं करोति ॥ २४ ॥ अथ यावदर्थिकस्य परिज्ञानोपायमाहजावंतवा सिद्धं नेयं तं देह कामियं जइणं । बहुसु व अपहुप्पंते भणाइ अन्नपि रंधेह ॥ २७२॥ कापि साधवे ददती कयापि निषिध्यते-नेदं दीयमानं यावदर्थः सिद्धं किन्तु विवक्षितमिति तस्मात्तद्देहि यतिभ्यः कामितयावद् गृहन्ति तावदित्यर्थः, यद्वा प्रचुरेषु भिक्षाचरेषु समागच्छत्सु अग्रेतनप्रमाणे राध्यमाने अप्रभवति-अपूर्यमाणे गृहनायको भणति, यदा नैतावता भवति तदाऽन्यदपि प्रक्षिप्य राख्नुहि, एवं श्रुते यावदर्थिकं ज्ञात्वा परिहत्तव्यम् ॥ २७२ ॥ अथ पाखण्डिसाधुमिश्रे आहअत्तट्ठा रंधते पासंडीणंपि बिइयओ भणइ । निग्गंथट्टा तइओ अचट्ठाएऽवि रंधते ॥ २७३ ॥ Page #146 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मिश्रस्याकल्प्यता पात्रस्य कल्पकरण विधिश्च । श्री क्षमा आत्मार्थ राध्यमाने यावदर्थिकमिश्रप्रवर्तकापेक्षया द्वितीयो मणति, पाखण्डिनामप्यायाधिक प्रक्षिपेति, तथाऽऽत्मार्थरत्नीया मेव राध्यमाने तृतीयो ब्रूते निर्गन्थानामप्यायाधिकं प्रक्षिपेति, तत एवं श्रुते पाखण्डिमिश्रसाधुमिश्रे परिज्ञाय त्यक्तव्ये वचूर्युपेताना ॥ २७३ ॥ अथ सहस्रान्तरगतमपि न कल्पते इति यदुक्तं तदृष्टान्तेनाह विसघाइयपिसियासीमरइ तमन्नोविखाइउंमरइ। इय पारंपरमरणे अणुमरइ सहस्ससोजाव ॥२७॥ पिण्ड इह कोऽपि वेधकेन विषेण घातितस्तस्य पिशितं योऽश्नाति सोऽपि म्रियते, तस्यापि मांसं यो भक्षयति सोऽपि म्रियते, नियुक्ति वा एवं परम्परया मरणे यावत् सहस्रश इति ॥ २७४ ।। ॥५३॥ NI एवं मीसजायं चरणप्पं हणइ साह सुविसुद्धं । तम्हा तं नो कप्पइ पुरिससहस्संतरगयपि ॥२७५॥ ____ एवं सहस्रवेधकविषदृष्टान्तेन मिश्रजातं पुरुषसहस्रान्तरगतमपि साधोः सुविशुद्धं चरणात्मानं हन्ति तस्मान्न कल्पते ॥ २७५ ॥ अथ साघुविषयं विधिमाहनिच्छोडिए करीसेण वावि उवहिए तओ कप्पा । सुक्कावित्ता गिण्हइ अन्न चउत्थे असुक्केऽवि ॥ २७६ ॥ मिश्रे गृहीते त्यक्ते च भाजने निच्छोटिते-अङ्गुल्यादिना निरवयवे कृते, यद्वा करीषेण-शुष्कगोमयरूपेण उद्वर्तिते पश्चात्रयः कल्पा दीयन्ते, तत आतपे ताजनं शोषयित्वा तस्मिन् भाजने पश्चाच्छुद्धमशनादि गृह्यते, अन्ये त्वेवं कथयन्ति-चतुर्थे कल्पे दत्ते सति अशुष्केपि गृह्यते, अयं प्रक्षालनविधिः सर्वत्राप्यविशोधिकोटिग्रहणे ज्ञातव्य इति ।। २७६॥ स्थापनाद्वारमाह ॥५३॥ Jain Education Intern For Private Personal Use Only Mww.jainelibrary.org Page #147 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५ स्थापना दोपः तद्भेदाश्च। सटाणपरट्ठाणे दुविहं ठवियं तु होई नायव्वं । खीराइ परंपरए हत्थगय घरंतरं जाव ॥ २७७ ॥ साधुनिमित्तं स्थापितं द्विधा ज्ञातव्यं भवति, स्वस्थाने परस्थाने चेति, एकैकं पुनर्द्विधा-अनन्तरं परम्परं च, तत्र घृताघनन्तरं, क्षीरादि परं, क्षीराद्दधिनवनीतादि परम्परता, हस्तगतभिक्षायां यावद्गृहान्तरं स्थापना गृहत्रयोपयोगसम्मवात्तल गृहान्तरमित्यर्थः, एतेनान्वर्थोऽपि कथित एव ॥ २७७ ।। एनामेव गाथां भाष्यकृद् व्याख्यानयति, अथ स्वस्थानमाहचुल्ली अवचुल्लो वा ठाणसठाणं तु भायणं पिढरे । सटाणटाणमि य भायणठाणे य चउभंगा ॥भा०२५ स्थानं द्विधा-स्वस्थानस्थानं भाजनस्थानं चेति, तत्र चुल्ली प्रतीता, अथ अवचुल्लोऽति उल्हक (अवचुल्हकः) इत्यर्थः, स्वस्थानस्थानं स्यात, भाजनस्थानं पिठरं-स्थाली, एतेषु स्थितमशनादि स्थापनेति, तत्र स्वस्थानस्थाने भाजनस्थाने चत्वारो भङ्गा भवन्ति, तथाहि-चुल्ल्यां स्थापितं पिठरे च १, तथा चुल्ल्यां स्थापितं न पिठरे २, न चुल्ल्यां किन्तु पिठरे ३, न चुल्ल्यां नापि पिठरे ४, छब्बकादावन्यत्र स्थापितत्वात् ४ ॥ २५ ॥ अथ परस्थानमाहछब्बगवारगमाई होड परट्राणमो वऽणेगविहं। सटाणे पिढरे छब्बगे य एमेव दरेय ॥ २७॥ छब्बकवारकादिकमनेकविधं परस्थानं भवति, तत्र छब्बकं-पटलिकादिरूपं वारको-लघुर्घटः, आदिशब्दाल्पाकभाजनवर्जशेषभाजनपरिग्रहः, अत्रापि स्वस्थानपरस्थानापेक्षया चतुर्भङ्गी, तद्यथा-स्वस्थाने स्वस्थाने, स्वस्थाने परस्थाने, परस्थाने स्वस्थाने, परस्थाने परस्थाने, एतदेवाह-सट्ठाणे त्ति, 'सहाणे पिढरे छब्बगे य' इत्यनेन भङ्गद्वयं सूचितम्, तथाहि Jain Education For Private Personal use only Page #148 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयावचूर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः ॥ ५४ ॥ Jain Education Intern स्वस्थाने चुल्ल्यादौ पिठरे च तथा स्वस्थाने चुल्ल्यादौ छब्ब के च परस्थाने, 'एमेव दूरे य' त्ति इह दूरं-चुल्ल्यवचुल्ल्याभ्यां अन्यत्प्रदेशान्तरं तत्रापि तदपेक्षया एवमेव भङ्ग-द्वयं ज्ञेयं, तथाहि - भाजनरूपे स्वस्थाने पिठरे परस्थानेऽन्यत्र प्रदेशान्तरे, तथा परस्थानेऽन्यत्र प्रदेशान्तरे, परस्थाने छब्बकादाविति ॥ २७८ ॥ अथ “ खीराह" इत्याद्युत्तरार्द्ध व्याख्यानयतिएक्कं तु दुविहं अणंतरपरंपरे य नायवं । अविकारिकयं दवं तं चेव अणंतरं होइ ॥ २७९ ॥ पूर्वार्द्ध सुगमम् अविकारिकृतं द्रव्वं तदेव अनन्तरं भवति, परम्पराभेदश्च स्वयमूहनीयः ॥ २७९ ॥ अथ विकारीतराणि द्रव्याण्याह उच्छुक्खीराईयं विगारि अविगारि घयगुलाईयं । परियावज्जणदोसा ओयणदहिमाइयं वावि ॥ २८०॥ इक्षुक्षीरादिकं विकारिद्रव्यं घृतगुडादिकं त्वविकारि, तथा ओदनदध्यादिकमपि करम्बादिरूपं विकारि, कुत इत्याहपर्यायापादनदोषात् ॥ २८० ॥ अथ परम्परास्थापितं भावयतिउब्भट्ठपरिन्नायं अन्नं लद्धं पओयणे घेत्थी । रिणभीया व अगारी दहित्ति दाहं सुए ठवणा ॥ २८९ ॥ वणी मंथुतकं व जाव अन्तट्टिया व गिण्हंति । देसूणा जाव घयं कुसणंपिय जत्तियं कालं ॥ २८२॥ नापि साधुना क्षीरमभ्यर्थितं दात्र्या च प्रतिज्ञातं - क्षणान्तरे दास्यामीति, साधुना चान्यत्र लब्धं दात्र्या दुग्धयोगे साधुर्निमन्त्रितः, साधुनोक्तं मयाऽन्यत्र लब्धं पुनः प्रयोजने सति घेत्थी - ग्रहीष्यामि इत्युक्ते सा आगारिणी ऋणभीतेव स्वयं स्थापनाभेदाः । ॥ ५४ ॥ Page #149 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दोषः। नोपबुभुजे, किन्त्वेवं चिन्तयामास, श्वः कल्ये दधि कृत्वा दास्यामीति स्थापयति, ततो द्वितीयदिने साधुना दधिरग्रहणे नवनीतं जातं, मस्तु तक्रं च जातं, यावदेतान्यात्मार्थीकृतानि मा गृह्णीयात् साधुः कुटुम्बे भविष्यतीत्येवमात्मसत्ताकीकृतानि प्राभृतिकासाधवो गृह्णन्ति, घृतं त्वात्मार्थीकृतमपि तेजस्कायारम्भादाधाकर्मेति न कल्पते, घृतं च स्थापितं यावद्दशोना पूर्वकोटी तावद् घटते एतावच्चारित्रस्यापि सम्भवात् , इत्थं गुडादिद्रव्यस्यापि, तथा कुसुणितमपि करम्बादिरूपतया कृतमपि यावन्तं | कालमविनाशि तावत्कालं तस्य स्थापना पश्चान्न कल्पत एवेत्यर्थः ।। २८१-२८२ ॥ पुनराहरस ककब पिंडगुला मच्छंडिय खंडसकराणं च । होइ परंपरठवणा अन्नत्थ व जुज्जए जत्थ ॥२८३n ___ केनापि साधुना कोऽपीक्षुरसं याचितः, पूर्वगाथावत्स्थापनायां ककवं करोति यावच्छकरेति, एवं परम्परस्थापना स्यात् , NI अन्यत्र वा द्रव्यान्तरे यत्र युज्यते-घटते तत्र भाव्येति ॥ २८३ ।। " हत्थगय" ति व्याख्यानयति-- भिक्खागाही एगत्थ कुणइ बिइओ उदोसु उवओगं। तेण परं उक्खित्ता पाहुडिया होइ ठवणा उ ॥२८४|| भिक्षाग्राही एकत्रोपयोगं करोति द्वितीयस्तु द्वयोहयोस्तत्र त्रिषु गृहेषु स्थापनादोषो न भवति, गृहत्रयात् परं साध्वर्थ- II मुत्पाटिता भिक्षा प्रामृतिका स्थापना भवति ॥ २८४ ॥ अथ प्राभृतिकाद्वारमाहपाहुडियावि हु दुविहा बायर सुहुमा य होइ नायबा। ओस्सक्कणमुस्सकण कब्बट्ठीए समोसरणे ॥२८५/ बादरा सूक्ष्मा च द्विधा प्राभृतिका ज्ञातव्या भवति, पुनरेकैका द्विधा-अवष्वष्कणेन उत्वष्कणेन, तत्राववष्कर्ण-अवा- 1 en Education in For Private & Personel Use Only al Page #150 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीया-| वचूर्युपेता श्रीपिण्डनियुक्तिः। करणं, उत्ष्वष्कणं-परतः करणं, यत् पुरतो ढौक्यते तत्प्रामृतं, ततः प्राभृतमिव प्राभृतं साधुदेयं, ततः प्राभृतमेव प्राभृति- प्राभृतिककेत्यन्वर्थः, तत्र बादरप्राभृतिकाविषयमाह-इह समयभाषया कब्बट्ठी-लघ्वी दारिका कथ्यते, तस्या उपलक्षणत्वात् पुत्रादेव भेदाः । विवाहस्यावष्वष्कणमुत्वष्कणं वा भवति, समवसरणे-साधुविषये साधुनामागमनं ज्ञात्वा कोऽप्येवं करोति, प्रतिष्ठितलग्नापूर्व पश्चाद्वा साधूनां मोदकादिप्रतिलाभनार्थमित्यर्थः ॥ २८५ ॥ अथापसर्पणरूपां सूक्ष्मप्राभृतिका गाथाद्वयेनाहकन्तामि ताव पेलं तो ते देहामि पुत्त! मा रोव। तं जइ सुणेइ साहू न गच्छए तत्थ आरंभो॥भा २६ न अन्न उद्विया वातुब्भवि देमित्ति किंपिपरिहरति। किह दाणि न उढिहिसी ? साहुपभावेण लब्भामो काचित कर्त्तयन्ती भोजनं याचमानं बालकं वदति, तावदिदं पेलु-रूतपूणिकां, कृणन्मीति 'कुदुपवेष्टने ' इत्यस्य रौधादिकस्य प्रयोगः, ततः-पश्चात्ते-तुभ्यं दास्यामीति मा रोदीः, अत्रान्तरे यद्यागतः साधुस्तच्छृणोति तर्हि तत्र गृहे न गच्छति, | तत्र मा भूत् साधुनिमित्तं आरम्भो बालकभोजन(दानतदनन्तर)हस्तक्षालनादिक इति, अथवा काचिदेवं वदति-अन्यार्थअन्यप्रयोजनोत्थिता सती तुभ्यमपि किमपि दास्यामि, इतः साधुस्तच्छ्रुत्वा गृहं परिहरति, तत्रापि प्रागिवारम्भसम्भवात् , अथ तथाभूतगृहस्थावचनानाकर्णनेऽपि साघोः समागते बालको जननीं वदति, कथमिदानी नोत्थास्यसि ?, समागतो ननु साधुस्ततोऽवश्यमुत्थातव्यम् , तथा च सति साधुप्रभावेन वयमपि लप्स्यामहे, इत्थमपि श्रुत्वा दीयमानं परिहरति ॥२६-२७॥ अथोत्सर्पणरूपा सूक्ष्मप्राभृतिकां गाथाद्वयेनाह ॥५५॥ Jain Education Inter s Page #151 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बादरप्राभृतिकायामवप्व| कणादि। | मा ताव झंख पुत्तय ! परिवाडीए इहेहि सो साहू। एयस्स उठ्ठिया तं दाहं सोउं विवजेइ ॥२८॥ अहवा-अंगुलियाए घेत्तुं कड्डइ कप्पट्टओ घरंजत्तो। किंति कहिए न गच्छइ पाहुडिया एस सुहुमाउ॥ काचित्पुत्रमेवं भणति-हे पुत्र ! मा तावझप-वारं २ जल्प, इह परिपाट्या साधुरागमिष्यति, ततस्तस्यार्थमुत्थिता सती तुभ्यं दास्यामि, एतदपि श्रुत्वा साधुर्वर्जयति, अथवा जननीवचने तथाविधे बालकेन श्रुते कप्पट्टओ-बालकस्तं साधुमङ्गल्या गृहीत्वा यातो निजगृहम् , ततः समाकर्षति, किमिति साधुना पृष्टे स यथावस्थितं कथयति, कथिते च तत्र न गच्छति साधुर, एषा सूक्ष्मप्राभृतिका ।।२८६-२८७॥ अथ "कब्बढिए समोसरणे" इति व्याचिख्यासुः पूर्वमवष्वष्कणवादरप्राभृतिकामाहपुत्तस्स विवाहदिणं ओसरणे अइच्छिए मुणिय सड्डी। ओसकंतोसरणे संखडिपाहेणगदवदा ॥२८॥ पुत्रस्योपलक्षणत्वात् पुत्रिकायाश्च विवाहदिनं अवसरणे-साधुसमुदाये यथाविहारक्रममतिक्रान्तेऽन्यत्र गते सत्युपदिश्यमानं श्रुत्वा अवष्वकते, अर्वागदिन पृष्ट्वा विवाहं करोति, किमथेमित्याह षष्ठीसप्तम्योरमेदात समवसरणस्य-साधुसमदायस्य सङ्खडयां प्रहेणकं-मोदकादि, द्रवं-तन्दुलधावनादि तहानार्थम् ॥ २८८ ॥ अर्थोत्सर्पणरूपां बादरप्राभृतिकामाहअप्पत्तमि य ठवियं ओसरणे होहिइत्ति उस्सकणं । तं पागडमियरं वा करेइ उज्जू अणुज्जु वा ॥ स्थापितं प्रतिष्ठितलग्न अवसरणे-साधुसमुदाये प्राप्त एव-अनागत एव भविष्यतीति, उत्वष्कणमुत्सर्पणं करोति साधुसमागमनकाल एव करोतीत्यर्थः, तां द्विधाऽपि प्राभृतिकां ऋजुः प्रकटं करोति, अनृजुरितरं-प्रच्छन्नमित्यर्थः ॥ २८९ ।। Jain Education For Private & Personel Use Only Page #152 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीया वचूर्युपेता श्री. पिण्ड निर्युक्तिः । ॥ ५६ ॥ Jain Education Inter अथ किमर्थं बादरप्राभृतिका गृहिणा क्रियत इत्याह मङ्गलहेडं पुन्नट्टया व ओसक्कियं दुहा पगयं । उस्सक्कियंपि किंति य पुट्ठे सिट्टे विवज्जति ॥ २९०॥ प्रकृतं विवाहादिकं द्विधा अवष्वष्कितं भवति, साधुदर्शनान्मङ्गलहेतोः पुण्यार्थं वा एवमुत्वष्कितमपि ततः किमिदमिति साधुना पृष्ठे गृहस्थेन यथावस्थिते कथिते तद्विवजर्यन्ति ॥ २९० ॥ ये न वर्जयन्ति तेषां दोषमाहपाहुडिभत्तं भुञ्जइ न पडिक्कमए अ तस्स ठाणस्स । एमेव अडइ बोडो लुक्कविलुको जह कवोडो ॥ यः प्राभृतिकाभक्तं भुङ्क्ते न च तस्मात् प्राभृतिका परिभोगस्थानात् प्रतिक्रामति, स बोडो-मुण्ड एवमेव निष्फलमटति, यथा लुश्चितविलुश्चित कपोत इति ॥ २९९ ॥ अथ गाथा षट्केन प्रादुष्करणद्वारसम्भवमाह - लोयविरलुत्तमगं तवोकिसं जल्लखउरियसरीरं । जुगमेत्तंतरदिट्ठि अतुरियचवलं सगिहर्मितं ॥ २९२॥ दहूण य अणगारं सड्डी संवेगमागया काइ । विपुलन्नपाण घेत्तूण निग्गया निग्गओ सोऽवि ॥ नीदुवामि घरे न सुज्झई एसणत्ति काऊणं । नीहंमिए अगारी अच्छइ विलिया व गहिएणं ॥ चरणकरणालसांम य अन्नमि य आगए गहिय पुच्छा । इहलोगं परलोगं कहेइ चइउं इमं लोगं ॥ नीदुवारंमि घरे भिक्खं निच्छंति एसणासमिया । जं पुच्छसि मज्झ कहं कप्पइ लिंगोवजीवीऽहं ॥ प्रादुष्करणदोषाः । ॥ ५६ ॥ Page #153 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रादुष्करण सम्भवः। सागुणेसणकहणं आउट्टा तमि तिप्पड़ तहेव । कुक्क्रडि चरंति एए वयं तु चिन्नबया बीओ ॥ (इ. १९) कापि श्राविका साधु लोचविरलोत्तमाङ्गं, अत्रोत्तमाङ्गशब्देनोत्तमाङ्गस्थाः केशा ज्ञेयाः, तपःकृशं मलकलुषितशरीरं युगमात्रान्तरन्यस्तदृष्टिमत्वरितमचपलं स्वगृहमागच्छन्तं दृष्ट्वा संवेगमागता, विपुलं भक्तपानं गृहीत्वा निर्गता गृहमध्यात्, सोऽपि साधुर्नीचद्वारेऽस्मिन् गृहे न शुद्ध्यति ममैषणेति कृत्वा निर्जगाम, निर्गते च तस्मिन् श्राविकागृहीतेन भक्तपानेन सञ्जातविप्रियेवावतिष्ठते, अत्रान्तरे चरणकरणालसेऽम्यस्मिन् साधौ तत्रागते तस्मै सा भिक्षा दत्ता, गृहीतायां च भिक्षायां स साधुः पृष्टः-यत्पूर्वमागतेन साधुना न गृहीता त्वया गृहीता, तत्र किं कारणमिति , ततः स ऐहलौकिक भिक्षालाममात्रं पारलौकिकं धर्म यथाक्रममल्पगुणं बहुगुणं चिन्तयित्वा इमं लोकं परित्यज्य कथयति, यथा-नीचद्वारे गृहे साधव एषणा(समिति)समिता भिक्षा नेच्छन्ति, तत्रान्धकारभावात, यदप्युक्तं-त्वया किं कारणं गृहीतेति , तत्रा लिङ्गमात्रोपजीवी, न साधुगुणयुक्त इत्यर्थः, साधुगुणेषणयोः कथनं साधुना कृतं, ततस्तस्य परगुणप्रकाशकोऽयं योग्य इति गुणेनाकृष्टा, यद्वा आउट्टा-अतिशयेन भक्तिं कृतवती श्राविका, 'तिप्पई' इति-भक्तादिना तर्पयति, प्रीणयति साधु, यद्वा भक्तपानं तेपते क्षरति स्मेति भावः, अथ गते तस्मिन्नन्यः कोऽपि निर्धर्मा साधुरागतः, सोऽपि भिक्षां दत्वा पृष्टः, तेन पापात्मना प्रोक्तमेते कुक्कुट्या-मायया चरन्ति, तेन त्वच्चित्तावर्जनार्थमेवं कृतं, न कोऽपि तत्र दोषः, ईदृशानि मायारूपाणि व्रतानि अस्माभिः पूर्व चीर्णानि, अथ वयं मायां न कुर्मः, ततस्तया दुरात्मायमिति विसर्जितः ।। २९२-२९७ ॥ इत्थं भूता च श्राविका भक्त्या प्रादुष्करणमपि कुर्यादिति प्रादुष्करणसम्भवः । अथ प्रादुष्करणस्वरूपं गाथाद्वयेनाह भिक्षां नेच्छा बहुगुणं चिन्तयित्वा तत्र किं कारणमिति मक्षा दत्ता, गृहीत Jain Education Interna For Private & Personel Use Only Page #154 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयावचूर्युपेता श्री पिण्डनिर्युक्तिः । ॥ ५७ ॥ Jain Education Intern पाओकरणं दुविहं पागडकरणं पगासकरणं च । पागड संकामण कुड्डदारपाए य छिन्नेव ॥२९८॥ पईवे जोई न कप्पइ पगासणा सुविहियाणं । अत्तट्ठि अपरिभुक्तं कप्पड़ कप्पं अकाऊणं ॥ प्रादुष्करणं द्विधा - प्रकट करणं प्रकाशकरणं च तत्र प्रकटकरण मन्धकारादन्यत्र सङ्क्रामणेन प्रकाशकरणं 'कुडदार पाए' इत्यादि कुडथस्य द्वारपातेन - रन्ध्रकरणेन, यद्वा कुडयेन मूलत एव छिनेन तथा रत्नेन प्रदीपेन ज्योतिषा, वैश्वानरेण, तत्रैवं प्रकाशना सुविहितानां न कल्पते, एतेनान्वर्थोऽपि ज्ञेय इति, अथापवादमाह आत्मार्थीकृतं तदपि कल्पते, अथ साधुपात्रमाश्रित्य विधिमाह - अपरीत्यादि, सहसा प्रादुष्करणदोषाघातं भक्तादिगृहीतम परिभुक्तमुपलक्षणत्वादर्द्धमुक्तमपि परिस्थायोद्धरित सिक्यादिना युक्तेऽपि पात्रे कल्पं - जलक्षालनरूपमकृत्वापि अन्यच्छुद्धं भक्तादि ग्रहीतुं कल्पते ।। २९८-२९९ ।। एतद् गाथाद्वयं व्याचिख्यासुः पूर्वं चुल्लीसङ्क्रामणमुद्दिश्य प्रकटकरणमाह संचारिमा चुल्ली बहिं व चुल्ली पुरा कया तेसिं । तहि रंधंति कयाई उवही पूई य पाओ य ॥ fter चुल्ली - एका सञ्चारमा या स्थानान्तरे नेतुं शक्यते चकारादाधाकर्मिमकी द्वितीया बहिरेव, तेषां - साधूनां निमित्तं पुरा कृता आसीत्, चशब्दात्तदानीं च साधुनिमित्तं बहिष्कृता सा तृतीया, ततो यदि कदाचित्तिसृणामन्यतमस्यां गृहस्था राज्यन्ति, तदा द्वौ दोषौ उपकरणपूतिः प्रादुष्करणं च शुद्धायां चुल्ल्यामेक एव प्रादुष्करणदोषः पृथक्कतेऽपि च ।। ३०० || अथ श्राविका प्रादुष्करणे कृते यद् ऋजुत्वेन भाषते तदाह प्रादुष्करणस्वरूपम् । ॥ ५७ ॥ Page #155 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रादुष्करणे कल्प्याकल्प्यविचारः। EI नेच्छह तमिसंमि तओ बाहिरचुल्लीऍ साहु सिद्धण्णे । इय सोउं परिहरए पुढे सिटुंमिवि तहेव ॥ हे साधो ! तमिस्र-अन्धकारे त्वं मिक्षां नेच्छसि, ततो बहिश्चुल्ल्यां भक्तं सिद्धति अस्मामिः, इति श्रुत्वा तत्परिहरति, तथा प्रादृष्करणशङ्कायां साधुपृष्टे दाच्या शिष्टे यथाऽवस्थिते कथिते तथैव परिहारः ॥ ३०१ ॥ अथ सङ्कामणे कृताहारस्य प्रकारान्तरेण कल्पतामाहमच्छियघम्मा अंतो बाहि पवायं पगासमासन्नं । इय अत्तट्ठियगहणं पागडकरणे विभासेयं ॥३०२॥ पूर्व साध्वर्थ चुल्ल्यादि कृत्वा काऽप्येवं चिन्तयति, गृहस्यान्तमक्षिका घर्मश्च, बहिब प्रवातं, तथा प्रकाशमासन, ततो वयमत्रैवात्मनिमित्तं सदैव पक्ष्याम इति आत्मार्थी कृते ग्रहणं कल्पते ॥३०२ ॥ इयं प्रकटकरणे विमाषा कल्प्याकल्प्यविषया. अथ प्रकाशकरणे " कुडदारपाए" इति व्याख्यानयतिकुडस्स कुणइ छिडं दारं बड्डेइ कुणइ अन्नं वा। अवणेइ छायणं वा ठावह रयणं व दिपंतं॥ जोइ पइवे कुणइ व तहेव कहणं तु पुट्ट दुढे वा। अत्तट्ठिए उ गहणं जोइ पइवे उ वजिता ॥ कुब्यस्य छिद्रं करोति, यद्वा द्वारं लघु सत् वर्द्धयति, यदि वा अन्यत् द्वितीयं द्वारं करोति, अथ गृहोपरि वर्त्तिनं छादनमपनयति, अथ दीप्यमानं रत्नं स्थापयति, तथा ज्योतिः प्रदीपं च करोति, तथैव पूर्वोक्तप्रकारेण पृष्टेऽपृष्टे वा कथनमात्मसत्ताकीकृते कल्पते, अन्यथा नेति, ज्योति प्रदीपाभ्यां प्रकाशमात्मार्थीकृतमपि न कल्पते, तेजस्कायारम्भसम्भवात् 1644 Jain Education Inter Page #156 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीया बचूर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः । ॥ ५८ ॥ Jain Education Intern ॥ ३०३ - ३०४ ॥ अथ "अपरिभ्रत्त" मित्यादि व्याख्यानयति पागडपयासकरणे कयंमि सहसा व अहवऽणाभोगा । गहियं विर्गिचिऊणं गेण्हइ अन्नं अकयकप्पे ॥ प्रकटकरणे प्रकाशकरणे च कृते सति सहसानाभोगतो वा गृहीतं परिस्थाप्य तस्मिन् पात्रे अकृतकल्पे अन्यत् शुद्धाशनादि गृह्णाति न कोऽपि दोष इति ॥ ३०५ ॥ अथ क्रीतद्वारमाह कीयगपि दुविहं दवे भावे य दुविहमेक्केकं । आयकियं च परकियं परदद्वं तिविहं चित्ताई ॥३०६ क्रयणं क्रीतं तेन कृतं निष्पादितं क्रीतमित्यर्थः, तदपि द्विविधं द्रव्ये भावे च पुनरेकैकं द्विधा - आत्मक्रीतं परक्रीतं च, 'विचित्र गतित्वात् सूत्रस्य ' पूर्वं परद्रव्यक्रीतमाह - परद्रव्यं गृहस्थसत्कं त्रिविधं - सचित्ताचित्तमिश्रभेदात् ॥ ३०६ ॥ अथ शेषं भेदत्रयमाह - आयकिय पुण दुविहं वे भावे य दव चुन्नाई । भावंमि परस्सट्ठा अहवावी अप्पणा चैव ॥३०७॥ आत्मक्रीतं पुनर्द्विधा-द्रव्ये भावे, तत्र द्रव्ये चूर्णादिना वक्ष्यमाणेन, मावे परस्य साधोरर्थाय यन्निजविज्ञानदर्शनादिनोपायते तद्भावक्रीतं, अथवा आत्मना स्वयमेवाहारार्थं धर्म्मकथादिनाऽऽवर्ज्य यद् गृह्णाति तदात्मभावक्रीतमिति ॥ ३०७ ॥ अथ विशेषेणाह - निम्मल गंधगुलिया वन्नय पोत्ताइ आयकय दवे । गेलने उड्डाहो पउणे चडुगारि अहिगरणं ॥ ३०८ ॥ क्रीतदोषः तद्भेदाथ | ।। ५८ ।। Page #157 -------------------------------------------------------------------------- ________________ निर्माल्यं-तीर्थसम्बन्धिः गन्धा:-पटवासादयः, गुटिका:-रूपपरावर्त्तनादियोग्या वर्णकः-चन्दनं पोतानि-लघुवालकयो- Ior परमावग्यानि वस्त्रखण्डानि इत्यादि समर्पयित्वा यद्भक्तादि गृह्णाति तदात्मद्रव्यक्रीतम् । अथ दोषानाह-निर्माल्यादिदानान- क्रीते मल्न्तरं यदि दैवयोगतो ग्लानत्वे सत्युद्धाहो भवति, अथ प्रगुणो-नीरोगो भवति, तदा चटुकारी जायते, यथाऽहं साधुना खोदा० । प्रगुणीकृत' इति चाटु जल्पति, तथा च सत्यधिकरणमन्यजनश्रवणात ॥ ३०८ ॥ अथ परभावक्रीतमाहवइयाइ मंखमाई परभावकयं तु संजयटाए। उप्पायणा निमंतण कीडगडं अभिहडे ठविए ॥३०९॥ वजिका-लघुगोकुलं, तत्रोपलक्षणत्वात् पत्तनादौ च, मङ्खादिर्यः पटमुपदर्य लोकमावर्जयति, स मङ्खस्तदादिः भक्तिवशात संयतार्थ यद् घृतदग्धादेरुत्पादनं करोति, ततो निमन्त्रयति. तत परभावक्रीतं, तत्र च त्रयो दोषार, क्रति, अन्यगृहादानीतं इत्यस्याहृतं, स्थापना च व्यक्तैव ॥ ३०९ ॥ एतदेव गाथाद्वयेन स्पष्टयतिसगारि मंख छंदण पडिसेहो पुच्छ बहु गए वासे।कयरिं दिसिं गमिस्सह ? अमुई तहिं संथवं कुणइ ॥ दिजते पडिसेहो कज्जे घेत्थं निमंतणं जइणं । पुवगय आगएसुं संछुहई एगगेहमि ॥ ३११ ॥ | (१.२०) शालिग्रामे देवशख्यिो मङ्खस्तद् गृहैकदेशेऽन्यदा साधवश्चतुर्मासी स्थिताः, स च साधुगुणैर्भक्तो जातो | भक्तादिना साधून निमन्त्रयति, शय्यातरपिण्डमिति यतयः प्रतिषेधयन्ति, ततस्तेनाचिन्ति-यदमी मद्गृहे किमपि न गृहन्ति, तस्माद्वर्षाकालानन्तरं यत्रामी गमिष्यन्ति तत्राग्रे गत्वा कथमप्येतेभ्यो ददामि, ततः शेषे वर्षाकाले साधवस्तेन Join Education For Private & Personal use only Page #158 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयावचूर्युपेता श्री पिण्डनिर्युक्तिः । ।। ५९ ।। Jain Education Intert पृष्टा, यथा- कस्यां दिशि गमिष्यथ १, साधुभिर < मुकस्यां दिशी >त्युक्ते ज्ञाते स तस्यामेव दिशि क्वचिद् गोकुले निजपटपद वचनकौशलेन लोकावर्जनं चकार, लोकश्च तस्मै घृतदुग्धादिकं दातुं प्रावर्त्तिष्ट, ततः स ऊचे यदा याचिष्ये तदा दातव्यम्, अथ साधवथ विहारक्रमेण तत्रागतास्तेन चात्मानमज्ञापयता पूर्वप्रतिषिद्धघृतदुग्धादिकं प्रतिगृहं याचित्वा एकत्र च गृहे सम्मील्य मुक्तं, ततः साधवो निमन्त्रितास्ते छद्यस्थच्चान्नावगतं, शुद्धमिति गृहीतं चेति, परं ज्ञाते सति परिहर्त्तव्यमिति । सूत्रं सुगमम्, नवरं सागारिकः - शय्यातरः संस्तवः - परिचयः ।। ३१०-३११ ॥ अथात्मभावक्रीतमाहधम्मकह वाय खमणं निमित्त आयावणे सुयट्ठाणे । जाई कुल गण कम्मे सिप्पम्मि य भावकीयं तु धर्मकथां वादं क्षपणं-पष्टाष्टमादि निमित्तं आतापनां करोति, तथा श्रुतस्थानमाचार्योऽहमिति कथयति, जातिं कुलं गण शिल्पं कर्म वा परेभ्यः प्रकटयति, इत्थं च परभावमावर्ज्य यद् भक्तादि गृह्णाति तदात्मभावक्रीतम् ॥ ३१२ ॥ अथ धर्म्मकथां वक्ति धम्मका अक्खित्ते धम्मकहाउट्ठियाण वा गिण्हे । कति साहवो चिय तुमं व कहि पुच्छिए तुसिणी ॥ आहाराद्यर्थ कृतधर्म्मकथाक्षिप्तानां धर्म्मकथात उत्थितानां वा पार्श्वे यद् गृह्णाति तदात्मभावक्रीतं यद्वा श्राद्धाः पृच्छन्ति - यो धर्म्मकथकः श्रूयते स च किं त्वमिति पृष्टे वक्ति साधुक्तादिलोभार्थं, यथा- साधव एव धर्मकथा कथयन्ति, नान्ये, यद्वा तूष्णीं - मौनेनावतिष्ठते, ततस्ते श्रावका जानते स एवायं परं गम्भीरत्वादात्मानं न प्रकाशयतीति, आत्मभावक्रीत वर्णनम् । ॥ ५९ ॥ Page #159 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रामित्यदोषः। प्रभतं तस्मै प्रयच्छन्तीति, आत्मभावक्रीतम् ॥ ३१३ ॥ अथवा धर्मकथकपृच्छायां इत्थमुत्तरमाहकिंवा कहिज छारा दगसोयरिआ व अहवऽगारत्था। किं छगलगगलवलया मुंडकुडंबीव किं कहए? किंक्षारा-भस्मावगुण्डितवपुषः कथयेयुः, किं वा दकशोकरिकाः, दकस्य-जलस्य शौकरिका इव पापर्द्धिकारिण इव-1 सामथा. अथवा अगारस्थाः, यद्वा छगलस्य गलं वलयन्ति-मोटयन्ति ये ते, यद्वा मुण्डाः सन्तो ये कुटुम्बिनः शौद्धोदनीयास्ते थियेयः?, नैव ते कथयन्ति, किन्तु यतय एवेति, श्राद्धा जानते स एवायमिति ॥ ३१४ ॥ अथ शेषद्वाराण्याहएमेव वाह खमए निमित्तमायावगम्मि य विभासा। सुयठाणं गणिमाई अहवा वाणायरियमाई॥ मेव धर्मकथावत वादिनि क्षपके निमित्तचे आतापके च विभाषा कत्र्तव्या, यथाऽहं वादीत्यादि, तथा श्रतस्थानगण्यादिगणित्वं-आचार्यत्वमिति, अथवा वाचनाचार्यत्वादि, आदिशब्दाजात्यादिद्वाराण्यप्यवसेयानि ॥ ३१५ ॥ अथ प्रामित्यद्वारमाहNI पामिञ्चपि य दुविहं लोइय लोगुत्तरं समासेण । लोइय सज्झिलगाई लोगुत्तर वत्थमाईसु ॥ ३१६ ॥ प्रामित्य-भूयोऽपि तव दास्यामीत्यभिधाय यत् साधुनिमित्तं गृह्यते तत् प्रामित्यमित्यर्थः, प्रामित्यमपि समासेन द्विविधंलौकिकं लोकोत्तरं च, तत्र लौकिक 'सज्झिलगाई' सज्झिलगा-भगिनी आदिशब्दाव भ्रात्रादि परिग्रहः तस्मिन.किमत भवति १. भगिन्यादिभिः क्रियमाणं द्रव्यमिति, अनेन च कथानकं सूचितम् , तदने वक्ष्यति, लोकोत्तरं वस्त्रादिषु साधनामेव Jain Education in For Private & Personel Use Only Page #160 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीया बचूर्युपेता श्री. पिण्ड निर्युक्तिः । ॥ ६० ॥ Jain Education Intern परस्परमवसेयम् || ३१६ ।। अथ भगिनीदृष्टान्तं गाथात्र येणाह ( ० २१ ) - अभिगमनाय विही बहि पुच्छा एग जीवइ ससा ते । पविसण पाग निवारण उच्छिंदण तेल जइदाणं अपरिमिय नेहड्डी दासत्तं सो य आगओ पुच्छा । दासत्तकहण मा रुय अचिरा मोएमि एत्ताहे ॥ भिक्खद्गसमारंभे कहणाउट्टो कहिंति वसहित्ति । संवेया आहरणं विसज्जु कहणा कइवया उ ॥३१९ कोशलाविषये क्वापि ग्रामे देवराजकुटुम्बिनो भार्या सारिका सम्मतप्रमुखाः सुताः, सम्मतिमुख्याः पुत्र्यः, सकलमपि कुटुम्बं श्रावकं तत्रैव शिवदेवः श्रेष्ठी, भार्या शिवा, अथ (अन्यदा) समुद्रघोषसूरिपाइ सम्मतेन दीक्षा गृहीता, क्रमेण गीतार्थी गुरूणापृच्छथ निजबन्धुग्रामे समागतः बहिः कस्यापि पार्श्वे पृष्टं देवराजस्य कोऽप्यस्तीति ?, तेनोक्तम्- सर्वं मृतमेका विधवा पुत्रिका जीवति स्म सम्मत्यभिधाना, साधुस्तद् गृहे जगाम सा भ्रातरमायन्तं दृष्ट्वा दृष्ट्वा वन्दितः साधुः, तन्निमित्तं चाहारपचनमारब्धं, साधुना ज्ञात्वा निषिद्धं, अथ भिक्षावेलायां साऽन्यत् किमप्यलभमाना शिवदेवहट्टालपलिकाद्वयं दिने २ द्विगुणवृद्धि (रूपेण) कलान्तरेण समानीय भ्रातृसाधवे दत्तवती, तेनाजानता शुद्धमिति जगृहे, तस्मिन् दिने साधुपर्युपास्तिपरत्वेन तैलपलिकाद्वयं न दत्तं द्वितीय दिने तद्वियोगशोकेन, तृतीयदिने कर्षद्वयं देयमभूत् प्रभूतया प्रवेशयितुं न शक्नोति, कियत् काले शिवदेवेन भणितं मम तैलं देहि, यद्वा दासिका भवेति, तैलदानासमर्था दासी जाता, पुनरेकदा स एव साधुस्तत्रागतो भगिनीं स्वगृहे न दृष्टा, ततः कर्म कृत्वाऽऽगता सती पृष्टा, तया च सर्वोऽपि वृत्तान्तः प्रामित्यदोषे मगिन्युदा० । | ॥ ६० ॥ Page #161 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inter कथितो यावद्दासत्वं जातमिति, दुःखाच्च रोदितुं लग्ना, ततः साधुरूचेऽहमचिराचां मोचयिष्यामि, मोचनोपायं चिन्तयन् शिवदेवगृहे जगाम, तद्भार्या शिवा भिक्षादानार्थं जलेन करप्रक्षालनं कर्त्तुं लग्ना, तां च साधुर्निवारयामास, यथैवमस्माकं न करपते, समीपस्थेन शिवदेवेन साधुः पृष्टः - कोऽत्र दोषः ?, साधुना चाकायविराधनादिदोषाः प्रोक्ताः पुनः श्रेष्ठिनोचे - क ते वसतिः १, साधुनोचे - नास्ति मे प्रतिश्रयः श्रेष्ठिना निजगृहैकदेशे वसतिर्दत्ता, धर्म्मश्रवणात् सम्यक्त्वादि प्रतिपन्नं, अन्यदा साधुना श्रेष्ठ्य वासुदेवस्य दीक्षाग्राहकानिवारणाभिग्रहः प्रोचे, शिवदेवेनामिग्रहो वासुदेवस्य जगृहे, तदा च शिवदेवस्य ज्येष्ठपुत्रः सम्मतिश्च दीक्षां ग्रहीतुमुपतस्थे, श्रेष्ठ्यनुज्ञायां द्वावपि दीक्षां प्रतिपन्नाविति, सूत्रं सुगमं, केवलं श्रुताभिगमज्ञातविधिरिति, अत्र अपर आह- परम्परया प्रव्रज्याकारणत्वात् साधुना विशेषेण प्रामित्यं ग्राह्यमित्याह -कइवयाओ, एवंविधा गीतार्थाः कतिपया एव स्युर्न भूयांस इति प्रामित्यदोष एव ।। ३१७-३१९ ।। अथ वस्त्रादिविषये दोषानाह - एए चैव य दोसा सविसेसयरा उ वत्थपाएसुं । लोइयपामिच्चेसुं लोगुत्तरिया इमे अन्ने ॥ ३२० ॥ लौकिकेषु प्रामित्येषु पात्रेषु एत एव सविशेषतरा बन्धनादिका दोषा ज्ञातव्याः, लोकोत्तर प्रामित्यविषयाः पुनरिमेऽन्ये वक्ष्यमाणाः || ३२० ॥ तानेवाहमइलिय फालिय खोसिय हियनट्टे वावि अन्न मग्गंते । अवि सुंदरेवि दिण्णे दुक्कर रोई कलहमाई ॥ इह द्विधा लोकोत्तरं प्रामित्यं, तत्र कोऽपि कस्यापि सत्कमेव वस्त्रादि गृह्णाति, यथा कियद्दिनानि परिभुज्य पुनस्ते समर्प - ११ प्रामित्ये वस्त्रादिविषये दोषाः । library.org Page #162 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयावचूर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः । ॥ ६१ ॥ Jain Education Inter यिष्यामि, कोऽपि पुनरेवम् एतावद्दिनानामुपरि तथैतत् सदृशमपरं वस्त्रादि दास्यामि, तत्र प्रथमे भेदे मलिनिते पाटिते खोसितेजीर्णप्राये यद्वा चौरादिभिर्हते, यद्वा नष्टे मार्गपतिते कलहादयो दोषाः, द्वितीये च प्रकारे अन्यद्वस्त्रादिकं याचमाने सुन्दरेऽपि अन्यस्मिन् दत्ते कोऽपि दुष्कररुचिः स्यात्, ततः कलहादयश्च भवन्ति ।। ३२१ ॥ अथात्रैवापवादमाह - उच्चत्ताए दाणं दुल्लभ खग्गूड अलस पामिच्चे । तंपि य गुरुस्स पासे ठवेइ सो देइ मा कलहो ॥ इह दुर्लभे वस्त्रादौ सीदतः साधोरुच्चतया दानं कर्त्तव्यम्, न प्रामित्यकरणेन, तथा यः खग्गूडः- कुटिलो वैयावृत्त्यादौ, योऽपि चालसस्तौ वस्त्रादिदानेन प्रलोभ्य वैयावृत्यं कार्येते, ततस्तद्विषयं प्रामित्यं भवति, तदपि दीयमानं वस्त्रादिकं दायको गुरोः पार्श्वे स्थापयेत्, न स्वयं दद्यात्, ततः स गुरुर्ददाति, मा भूदन्यथा कलह इति ॥ ३२२ ॥ अथ परावर्त्तितद्वारमाहपरियट्टियंपि दुविहं लोइय लोगुत्तरं समासेणं । एक्केकंपि अ दुविहं तदवे अन्नदवे य ॥ ३२३ ॥ परिवर्त्तितमपि द्विविधं समासेन लौकिकं लोकोत्तरं च, एकैकमपि पुनर्द्विविधं तद्रव्ये अन्यद्रव्ये च समानद्रव्यपरावर्त्तस्तद्रव्ये, यथा कुथितं घृतमन्यघृतेन परावर्च्यन्ते, विजातीय द्रव्यपरावर्त्तनमन्यद्रव्ये, एतेनान्वर्थोऽपि कथित इति ।। ३२३ ॥ अथ लौकिकस्योदाहरणं गाथात्रयेणाह - अवरोप्परसज्झिलगा संजुत्ता दोवि अन्नमन्नेणं । पोग्गलिय संजयट्ठा परियहण संखडे बोही ॥ . अणुकंप भगिणिगे दरिद्द परियहणा य कूरस्स । पुच्छा कोद्दवकूरे मच्छर णाइक्ख पंतावे ॥ ३२५ ॥ १० परा वर्त्तित दोषः । ॥ ६१ ॥ Page #163 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भार्या, धनदत्तः पुत्रो, बन्धुमती कोद्रवकूर एव भुज्यते, देवदत्तस्य गो दारिद्रणाहं युक्तेति । भाता इयरोऽवि य पंतावे निसि ओसवियाण तेसि दिक्खा य। तम्हा उन घेत्तवं कइ वा जे ओसमेहिंति॥ साधु (१०२२) वसन्तपुरे निलयश्रेष्ठी, सुदर्शना पत्नी, द्वौ पुत्रौ क्षेमकरो देवदत्तश्च, लक्ष्मी मा च दुहिता, तत्रैव च निमित्तम वसन्तपुरेतिलकश्रेष्ठी, सुन्दरीभार्या, धनदत्तः पुत्रो, बन्धुमती पुत्री, क्षेमङ्करेण समितसूरीणां पार्वे दीक्षा गृहीता, देवदत्तेन शनादिबन्धुमती धनदत्तेन च लक्ष्मी परिणीता, धनदत्तगृहे दारिद्रभावात् कोद्रवकूर एव भुज्यते, देवदत्तस्य गृहे धनाढ्यत्वाच्छाल्यो- परावर्तने दन इति, अन्यदा च क्षेमकरसाधुस्तत्रागतश्चिन्तयामास-यदि भ्रातुगृहे गमिष्यामि, तदा भगिनी दारिद्रेणाहं युक्तति साधुना पराभूता इति चिन्तयिष्यति, तेन भगिनीगृहे जगाम, भिक्षावेलायां लक्ष्म्या चिन्तितं, यदस्य प्राघूर्णकभ्रातृ- भगिन्युदाः साधो कोद्रवकरः कथं दीयते १, भ्रातृजाया बन्धुमत्या गृहाच्छाल्योदनमानीय ददामीति तथैव कृतम् परावर्त्तनेन कूरयो, IIहरणम । अथ देवदत्ते भोजनार्थ गृहमागते बन्धुमत्या कथितमद्य कोद्रवकूरो जिमितव्यः, तेन चान्या(ज्ञात)वृत्तान्तेन चिन्तितम्यदनया कृपणतया कोद्रवौदनो राद्ध इति, तां ताडयितुमारेमे, सा च ताडथमाना पाह-मम किं कथयसि ?, तव भगिन्येत्थं कृतम्, धनदत्वेनापि साधुदत्तशेषशाल्योदने दृष्टे पृष्टा पत्नी, तयोक्ते जाते सोऽपि चुकोप, यथा-कथमेवं मम मानमालिन्यं कृतमन्यगृहादानयनात् , तेनापि सा ताडिता, साधुना गृहयुगस्य वृत्तान्तो जनपरम्परया श्रुतः, निशि सर्वाण्यपि प्रतिबोधितानि, यथाऽस्माकं न कल्पते मया त्वजानता गृहीतं, ततः सर्वेषां दीक्षा दत्ता । सूत्रं सुगमम् , नवरं अवरुप्परसज्झिलगा-परस्परमुक्तराच्या [१] भ्रातरौ द्वावपि अन्योऽन्यसम्बन्धेन संयुक्तौ परिणीतौ पौद्गलिकस्य संयतार्थ परिवर्चनं कृतं, संखडं-कलहस्ततो बोधिः, अस्या गाथाया उत्तरं गाथाद्वयं विवरणभूतं तच्च सुगमम्, परं मच्छरित्ति-मत्सरेण, नाइ Jain Education For Private Personal Use Only Page #164 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयाबचूर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः । ॥ ६२ ॥ Jain Education In क्खति-परिवर्त्तने अकथिते, पंताचे - अताडयत्, 'ओसवियाण 'त्ति-उपशमितानां, अत्राह - परः परिवर्तनमपि प्रव्रज्याकारणत्वाद् मव्यमित्याह-कह व इत्याह-कइवत्ति कतिपया एव क्षेमङ्करसाधुतुल्या ये कलहमुपशाम्य दीक्षां ग्राहयिष्यन्ति, तस्मान्नैवेदमाचरणीयम् ॥३२४-३२६ ॥ अथ लोकोत्तरं परिवर्त्तनं-यत्र साधुः साधुना वस्त्रादिपरावर्त्तनं करोति, तत्र दोषानाहऊणहिय दुब्बलं वा खर गुरु छिन्नमइलं असीयसहं । दुव्वन्नं वा नाउं विपरिणमे अन्नभणिओ वा ३२७ वस्त्र परिवर्तने कृते इदं वस्त्रं न्यूनमधिकं दुर्बलं - जीर्णप्रायं खरं कर्कशं गुरुः-स्थूलसूत्रं छिन्नं मलीमसं अशीत सहशीतरक्षणाक्षमं दुर्वर्ण वा मया यदर्पितं तन्नैवंविधमिति ज्ञात्वा विपरिणामेत् पृष्टोऽहमिति विचिन्तयेत् ॥ ३२७ ॥ अत्रैवापवादमाह - एगस्स माणजुत्तं न उ बिइए एवमाइ कज्जेसु । गुरुपामूले ठवणं सो दलयइ अन्नहा कलहो ॥ ३२८ एकस्य साधर्यस्य तन्न भवति तस्य वस्त्रं मानोपेतं, न द्वितीयस्य - साधोर्यस्य सत्कं तस्य मानयुक्तं नेति, इत्यादि कार्येषु परिवर्तनसम्भवः, कथं पुनः परिवर्त्तनं कार्यमित्याह - वस्त्रादौ गुरुपादमूले स्थापनं कर्त्तव्यम्, स गुरुर्ददाति, अन्यथा कलहः स्यादिति ।। ३२८ ।। अथाभ्याहृतद्वारमाह आइन्नमणाइन्नं निसीहऽभिहडं च नोनिसीहं च । निसिहाभिहडं ठप्पं वोच्छामी नोनिसीहं तु ॥ ३२९ अभ्याहृतं द्विधा - आचीर्ण अनाचीर्णे च तत्रानाचीर्णं द्विधा - निशीथाम्याहृतं नोनिशीथाभ्याहृतं च तत्र निशीथं - अर्द्ध साधुमध्ये वस्त्रादिपरावर्तन रीतिः । ॥ ६२ ॥ Page #165 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ११ अभ्या| हृतदोषा तद्भेदाश्च । रात्रं तत्रानीतं किल प्रच्छन्नं भवति, एवं साधूनां यदि विदितमभ्याहृतं तनिशीथाम्याहृतं, तद्विपरीतं नोनिशीथाम्याहृतं, साधुज्ञातमेवेत्यर्थः, अमि-सम्मुखं साधूनामाहृतमानीतमित्यन्वर्थः, तत्र निशीथाम्याहृतं स्थाप्य, अग्रे वक्ष्यमाणत्वाद, नोनिशीथं तु वक्ष्यामि ॥ ३२९ ॥ सग्गाम परग्गामे सदेस परदेसमेव बोद्धव्वं । दुविहं तु परग्गामे जलथल नावोडु जंघाए ॥ ३३०॥ नोनिशीथाभ्याहृतं द्विधा-स्वग्रामे परग्रामे, पुनः परग्रामाभ्याहृतं द्विधा-स्वदेशे परदेशे वा, एतद् द्विविधमपि प्रत्येक द्विधा-जलथलत्ति, 'सूचनात सूत्र 'मिति, जलपथेन स्थलपथेन च, तत्र जलपथेनाभ्याहृतं द्विधा-नावा उडपेन च, उपलक्षणत्वात् स्तोकजले जङ्घाभ्यामपि, नौः-तरिका, उडुपः-तरणकाष्ठं, स्थलपथेनापि द्विधा-जङ्घाभ्यां पद्भयो च, उपलक्षणत्वाद् गन्न्यादिपरिग्रहः ॥ ३३० ।। अथामूनेव जलस्थलाभ्याहृतभेदान् सदोषानाहजंघा बाह तरीइव जले थले खंध आरखुरनिबद्धा। संजमआयविराहण तहियं पुण संजमेकाया ३३१॥ अस्थाहगाहपंकामगरोहारा जले अवाया उ। कंटाहितेणसावय थलंमि एए भवे दोसा ॥ ३३२ ॥ जलमार्गे जवाभ्यां बाहुभ्यां तरिकयाऽभ्याहृतं स्यात, स्थलमार्गे तु स्कन्धेन, तथा आरखुरनिवद्धा-गन्त्रीतया खुरनिबद्धा रासमवलीवदयस्तैरम्याहृतम, अत्र संयमात्मविराधनारूपा दोषाः, तत्र पुनः संयमविराधनाय काया-अप्कायादय, इति मार्गद्वयो(ब्ये)ऽपि, अथात्मविराधनामाह-जलमार्गे अस्तापनिमञ्जनसम्भवात, तथा ग्राहेभ्योऽपि पङ्कतो मकरेभ्यो Jnin Education in T Page #166 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अभ्याहृतमेदाः। क्षमा- ओहारेत्ति-कच्छपेभ्योऽपाया'-विनाशादयो दोषा भवन्ति, स्थलमार्गे कण्टकादिस्तेनश्वापदेभ्यो एत एव दोषा अपायादयः रत्नीया-IN ॥ ३३१-३३२ ॥ अथ स्वग्रामाम्याहृतं नोनिशीथं गाथाद्वयेनाहवचूर्युपेता सग्गामेऽवि य दुविहं घरंतरं नोघरंतरं चेव । तिघरंतरा परेणं घरंतरं तं तु नायव्वं ॥ ३३३॥ श्री नोघरंतरऽणेगविहं वाडगसाहीनिवेसणगिहेसु। काये खंधे मिम्मय कंसेणव तं तु आणेज्जा ॥ ३३४ ॥ पिण्डनियुक्तिः। स्वग्रामाम्याहृतं द्विधा-गृहान्तरं नोगृहान्तरं च, तत्र त्रिगृहान्तरात् परेण यदानीतं तद् गृहान्तरं ज्ञातव्यं, नोगृहान्तरमनेकविधं, वाटकादिविषयं, तत्र वाटकः प्रतीतः, साही-वर्तनी सैवैकान्तराले विद्यते, निवेशनं-एकनिष्क्रमणप्रवेश्यानि द्वयादिगृहाणि, गृहं-मन्दिरं, एतच्च सकलमपि अनाचीणमनुपयोगसम्भवात् , एतच्च द्विविधमपि गृहान्तरं नोगृहान्तरं(च) साधोरुपाश्रयमानयेत् कापोत्या स्कन्धेन वा, मृन्मयेन भाजनेन कांस्येन वा भाजनेन वा ॥३३३-३३४ ॥ अथ स्वग्रामाम्याहृतनोनिशीथस्य सम्भवमाहसुन्नं व असइ कालो पगयं व पहेणगं व पासुत्ता। इय एइ काइ घेत्तुं दीवेइ य कारणं तं तु ॥३३५॥ यदा साधुर्भिक्षार्थमायातस्तदा शून्यं गृहमासीत् , यद्वा असन्-अविद्यमानो भिक्षाकालः, अथ प्रकृतं स्वजनाईगौरवभक्तादिकरणेन व्याकुलतया तदा दातुं न प्रपारिता, यद्वा पश्चात् प्रहेणकं-लाहकं समेतं, अथ तदा श्राविका प्रसुप्ताऽभू| दिति, एतैः कारणैः क्वापि गृहीत्वा उपाश्रये साधोरानयेत् , तच्च कारणं तस्य दीपयति ।। ३३५ ॥ अथ स्वग्रामपरग्रामभेद Jain Education Inte For Private & Personel Use Only अ w w.jainelibrary.org Page #167 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education भिन्नं निशीथाभ्याहृतमाह एमेव कमो नियमा, निसीहऽभिहडेऽवि होइ नायव्वो । अविइअदायगभावं निसीहिअं तं तु नायव्वं य एव क्रमो नोनिशीथाभ्याहृते उक्तः, स एव निशीथाभ्याहृते ज्ञातव्यः, अविदितदायकभावं निशीथाभ्याहृतं तु ज्ञातव्यमिति शेषः || ३३६ ।। अथ निशीथाभ्याहृतस्य सम्भवं गाथाचतुष्टयेनाह - अदूरजलंतरिया कम्मासंकाऍ मा न घेच्छति । आणंति संखडीओ सङ्को सङ्घी व पच्छन्नं ॥ ३३७ निगम देउल दाणं दियाइ सन्नाइ निग्गए दाणं । सिमि सेसगमणं दिंतऽन्ने वारयंतऽन्ने ॥ ३३८ ॥ भुंजण अजीरपुरिमड्डगाइ अच्छंति भुत्तसेसं वा । आगमनिसीहिगाई न भुंजई सावगासंका ॥ ३३९ उक्तं निखप आसगयं मल्लगंमि पास गए। खामित्तु गया सड्डा तेऽवि य मु (सुद्धा असढभावा ( ० २३ ) क्वापि ग्रामे धनावहमुख्याः श्रावकाः, धनवतीप्रभृतयः श्राविका ककुटुम्बवर्त्तिनः, अन्यदा तेषां गृहे ववाहः समजनि, तेनोद्धरिते मोदकादौ साधुं दानश्रद्धया चिन्तयामासुः, एके साधवोऽतिदूरे तथाऽन्ये जलान्तरिता नद्यादि भावात् कथमागमिष्यन्ति १, ते आगता अपि आधाकम्र्म्माशङ्कया न ग्रहीष्यन्ति, ततो यत्र ग्रामे साधवः सन्ति तत्रैव प्रच्छन्नं व्रजाम इति, तथा कृतं, ततः साधूनाऽऽहूय यदि दास्यामस्तदाऽशुद्धशङ्का भविष्यतीति द्विजेभ्यो ( ऽपि किमपि ) दद्य इति, तथापि साधुदृष्टौ निःशङ्कृतोत्पादनार्थं दद्म इति, बहिर्देवकुले द्विजादिभ्यो दातुमारब्धम्, तत उच्चारादिकार्यार्थं विनिर्ग परग्रामास्याहते - नावहादि दृष्टान्तः । Page #168 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयावचूर्युपेता स्वग्रामाभ्याइते दृष्टान्तः। पिण्ड- I नियुक्ति ॥६४॥ तानां साधूनां निमन्त्र्य दानं साधुभिः शुद्धमिति जगृहे, अन्यसाधूनां च कथितं, तेऽपि तद्ग्रहणाय गता इति, तत्रैके श्राद्धा ददति, अन्ये मातृस्थानतो निवारयतः प्रतिषेधयन्ति, यथा सर्वः कोऽपि भुक्तः शेषं सर्व साधुभ्यो दीयतामिति, साधवोऽपि IN ये नमस्कारसहितास्ते भुक्ता, ये च पौरुषीप्रत्याख्यानास्ते भुञ्जाना वर्तन्ते, ये चाजीर्णवन्तस्ते पूर्वाद्धादि प्रतीक्ष्यमाणा वर्तन्ते, ततः श्राद्धैर्जातं साघवो भुक्ता भविष्यन्ति, वन्दित्वा याम इति साधुवसतावुपागता साधुभिर्विमर्शना, पूर्वमुपलक्षिता नूनमेतैरभ्याहृतं कृतमिति निश्चित्य भोजनायानु < पविश्चित्य भोजनायानु > पविष्टैने मुहू भुञ्जानैश्च या कवल उत्क्षिप्तः स भाजनेऽमुच्यत, यत्तु मुखे क्षिप्तं नाद्यापि गलितं सत्समीपस्थे मल्लके क्षिप्तं, सर्वमपि परिस्थापित, श्रावकश्राविकावर्गश्च क्षमयित्वा जगाम ये भुक्ता ये चार्द्धभुक्तास्ते सर्वेऽप्यशठतया शुद्धा इति । सूत्रं सुगमम् ।। ३३७-३४०॥ उक्तं परग्रामाभ्याहृतनिशीथम् , अथ स्वग्रामाम्याहृतं, तदेवाह गाथाद्वयेनलद्धं पहेणगं मे अमुगत्थगयाएँ संखडीए वा । वंदणगट्ठपविट्ठा देइ तयं पट्ठिय नियत्ता ॥ ३४१॥ नीय पहेणगं मे नियगाणं निच्छियं व तं तेहिं । सागारि सयज्झियं वा पडिकुट्ठा संखडे रुट्ठा ॥३४२॥ ___ काऽप्यन्याहृतशङ्कापनोदाय साधुमाह-यथा मयेदं प्रहेणकममुकं गृहे गतया लब्धं, यद्वा सङ्खडयां, सम्प्रति वन्दनार्थमत्र प्रविष्टा, इत्युक्ता तकद् आनीतं ददाति पट्ठियत्ति, पूर्वमस्य गृहं प्रस्थिता ततो निवृत्ता सती यद्वा एवमाह-निजकानांस्वजनानामर्थाय प्रहेणकं < मया स्वगृहान्नीतं, परं तैर्नेप्सितं, तत्प्रतिनिवृत्ता वन्दनार्थमत्रागतेत्युक्त्वा दत्ते, अथ कापि ॥६४॥ lain Education in For Private Personel Use Only Page #169 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अभ्याहृते आचीर्णस्य मेदाः। मायया सागारिकां-शय्यातरिका, यद्वा सइज्झियं-भगिनीं वसतीप्रवेशिनी पूर्वगृहीतसङ्केतां यथा साधवः शृण्वन्ति तथा वक्ति-गृहाणेदं प्रहेणकं, तया च मातृस्थानतो निषिद्धा, यथा-त्वया मदीयं प्रहेणकं > नादायि, अहमपि तावकीनं | नादास्ये इत्यादि वचोभिः संखडे-कलहे प्रहेणकनेत्री रुष्टा वसतिप्रविष्टा वृत्तान्तकथनेन तद्ददाति ॥ ३४१-३४२ ॥ अथानाचीर्णनिगमयनाचीर्णस्य भेदानाहएयं तु अणाइन्नं दुविहंपि य आहडं समक्खायं। आइन्नपि य दुविहं देसे तह देसदेसे अ॥ ३४३॥ | ____एतदनाचीर्णमध्याहृतद्विविधमपि समाख्यातं, आचीर्णमपि द्विधा-देशे तथा देशदेशे च ॥ ३४३ ।। अथ देशस्य देशदेशस्य च स्वरूपमाहहत्थसयं खल देसो आरेणं होइ देसदेसो य । आइन्नमि(उ)तिगिहा ते चिय उवओगपुव्वागा॥३४४॥ ___ हस्तशतप्रमाण क्षेत्रं देशोर्वाक्-हस्तशतमध्ये देशदेश इति, तत्र हस्तशतप्रमाणे आचीर्णे त्रीणि गृहाणि उपयोगपूर्वकाणि भवन्ति, ततः कल्पते नान्यथेति ॥ ३४४ ॥ अथ गृहत्रयव्यतिरेकेण हस्तशतसम्भवं तद्विषयं कल्प्याकल्प्यविधि चाहपरिवेसणपंतीए दूरपवेसो य घंघसालगिहे। हत्थसया आइन्नं गहणं परओ उ पडिकुटुं ॥३४५॥ ___ परिवेषणपङ्क्तौ-भोक्तृजनश्रेण्या यद्वा दूरप्रवेशे प्रलम्बगमनमा छिण्डिकादौ यद्वा घशालायां हस्तशतादानीतस्य ग्रहणमाचीर्ण परतस्त्वनाचीर्णमिति ॥ ३४५ ॥ Jain Education Inter Huaww.jainelibrary.org Page #170 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीया वचूर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः । 11 84 11 Jain Education Inter उक्कोस मज्झिम जहन्नगं तु तिविहं तु होइ आइन्नं । करपरियत जहन्न सयमुक्कोसं मज्झिमं सेसं ॥ त्रिविधमाचीर्णभ्याहृतं उत्कृष्टं मध्यमं जघन्यं च यत् स्वयोगेन परिवेषणार्थं वा मण्डकादि करे गृहीतं स्यात्, तदानीय ददाति, तत्करपरिवर्त्तितमात्रं जघन्यं, हस्तशतानीतमुत्कृष्टं, अपान्तराले मध्यममिति ॥ ३४६ ॥ अथोद्भिन्नद्वारमाहपिहि उभिन्न कवाडे फाय अप्फासुए य बोद्धव्वे । अप्फासु पुढविमाई फासूय छगणाइदद्दरए ॥ उद्भेदनं कुतुपादिमुखानां साधुदाननिमित्तमुद्धिन्न इत्यन्वर्थः, उद्भिन्नं द्विधा - पिहितोद्भिनं कपाटोद्भिनं तत्र पिहितोद्विनेपिधानं द्विधा - प्रासुकमप्रासुकं च तत्राप्रासुकं सचित्तपृथ्यादि प्रासुकं छगणादि, दर्दुरको मुखबन्धनं बखखण्डम् ॥ ३४७ ॥ अथ द्विधोद्भिने दोषानाह उभन्ने छक्काया दाणे कयविक्कए य अहिगरणं । ते चेव कवाडंमिवि सविसेसा जंतमाईसु ॥ ३४८ पिहितोद्भिने पकाया विराध्यन्ते, तथा पुत्रादिभ्यस्तैलादिदाने, क्रयविक्रये चाधिकरणं स्यात्, त एव दोषाः कपाटोद्धिने, विशेषास्तु यन्त्ररूपकपाटादिषु द्रष्टव्याः, तत्राधिकविराधनायोगात् ॥ ३४८ ॥ अथैनामेव गाथां व्याचिख्यासुः, " उभिने छकाया " इति गाथाद्वयेन व्याख्यानयति सच्चित्त पुढविलितं लेल सिलं वाऽवि दाउमोलित्तं । सच्चित्तपुढविलेवो चिरंपि उदगं अचिरलित्ते ३४९ एवं तु पुव्वलिते काया उलिंपणेऽवि ते चेव । तिम्मेउं उवलिंपइ जउमुद्दं वावि तावेउं ॥ ३५० ॥ उद्भिन्न दोषः, तद्भेदाथ। ॥ ६५ ॥ Page #171 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उद्भिने षटकायविराधनादि संभावना। सम्भाव्यन्ते, तथा कोऽपि तापयित्वा दुह कतपादिमखं कदाचिदर्दरकोपरि लेष्टुं शिला-पाषाणखण्डं वा प्रक्षिप्य जलार्द्रसचित्तपृथ्वीलिप्तं भवति. प्रथिवीलेपचिरकालमपि सचित्तः स्यात, उदकं त्वचिरलिप्ते चिरकालोऽन्तर्मुहूर्तात्परं ज्ञेयः, चिरलिप्ते पृथ्वीकायस्य विनाशोऽकायस्य त प्रथ्वीकायशखादचित्ततेति, एवं पूर्वलिप्से दोषा उक्ताः, एतदेव शेषस्य रक्षणार्थमुपलिप्यमाने अप्कायविराधनादयो दोषा:. यतस्तापयित्वा जलेन पृथ्वीकार्य भिन्नं कृत्वा उपलिम्पति, पृथ्वीमध्ये मुद्गः कीटिकादयश्च सम्भाव्यन्ते, तथा कोऽपि तापयित्वा जतुमुद्रां करोति ॥ ३४९-३५० ॥ एतदेवाहजह चेव पुठवलित्ते काया दाउं पुणोऽवि तह चेव । उवलिप्पंते काया मुइअंगाई नवरि छट्टे ॥३५१॥ यश चैव पूर्वलिप्ते षटकाया विराध्यन्ते, तथा देयं दत्वा पुनरुल्लिप्यमाने षटकाया विराध्यन्ते, < नवरं षष्ठे त्रसकाये विराध्यमाने >, महङ्गादया-पिप्पीलिकाकुन्थ्वादयो ज्ञेयाः॥ ३५१॥ अथ "दाणे कयविक्कए" इति व्याख्यानयति परस्स तं देइ स एव गेहे, तेल्लं व लोणं व घयं गुलं वा। उग्घाडिए तंमि करे अवस्सं, सविक्कयं तेण किणाइ अन्नं ॥३५२॥ तस्मिन् कुतुपादिमुखे साध्वर्थमुद्घाटिते सति परस्मै ग्राहकादिकाय स्वगृहे वा पुत्रादिभ्यस्तैलं लवणं घृतं गुडं वा । ददाति, यद्वा स करोत्यवश्य विक्रयं तेन च मूल्येनान्यत् क्रीणाति ॥ ३५२॥ “अहिगरणे "त्यवयव व्याख्यानयतिदाणे कयविक्कए वा होई अहिगरणमजयभावस्स । निवयंति जे यतहियं जीवा मुइयंगमूसाई॥३५३॥ Jain Education For Private & Personel Use Only All Page #172 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उद्भिन्नेडपवादः। क्षमारत्नीयावचूर्युपेता श्रीपिण्डनियुक्तिः। ॥६६॥ दाने क्रय विक्रये वाऽयतमावस्याधिकरणं जायते, तथा तत्रोद्घाटितमुखे मुइङ्गमृषकादयो जीवाः पतन्ति, तदप्यधिकरणम् ।। ३५३ ।। अथ " ते चेव कवाडंमिवि" (गा. ३४८) इति व्याख्यानयति जहेव कुंभाइसु पुव्वलित्ते, उब्भिजमाणे य हवंति काया। ओलिंपमाणेवि तहा तहेव, काया कवाडंमि विभासियव्वा ॥ ३५४ ॥ यथैव कुम्मादौ-घटादौ पूर्वलिप्ते उद्भिद्यमाने तथा उल्लिप्यमाने षट्काया विराध्यमानाः स्युः, उपलक्षणत्वादधिकरणं च, तथा कपाटेऽपि वेदितव्याः, यथा कपाटे उद्भिद्यमाने जलभृतभाजने भिद्यमाने पानीयं चुल्ल्यादावपि प्रविशेत् , कीटिकादयश्च प्लाव्यन्ते इत्यादिमावनीयम् ॥ ३५४ ॥ अथ " सविसेसा" इति व्याख्यानयतिघरकोइलसंचारा आवत्तण पीढगाइ हेट्रुवार । नितेवि एयअंतो डिभाईपेल्लणे दोसा ॥ ३५५ ॥ ___सञ्चारात्-कपाटस्य सञ्चलनात् गृहगोधिकादयो जीवा विराध्यन्ते, तथा पीठिकायां अध उपरितले च कपाटैकदेशस्यावर्त्तने तदाश्रितजीवविनाशः, पीठिकेति-कपाटस्थितिभूमिः, तथा निन्ते-पश्चान्मुखं नीयमाने उद्घाटयमाने अन्तस्थितस्य डिम्भादेः प्रेरणे दोषाः, शिरस्फोटनादयोऽपि भवन्ति ॥ ३५५ ॥ अथात्रापवादमाहघेप्पड अकुंचियागमि कवाडे पइदिणे परिवहंते । अजऊमुद्दिय गंठी परिभुज्जइ दद्दरो जो य॥३५६॥ अकृश्चिका-कुश्चिकाविवररहिते कपाटे सततं प्रतिवहति दीयमाने उद्घाटयमाने चोद्घायते गृह्यते भिक्षेति, यत्र ॥६६॥ in Educh an inte Tww.jainelibrary.org Page #173 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education In कुञ्चिकाविवरं तत्रोल्लालकयोगाद् घर्षणद्वारेण सच्वविराधना, तथा यश्च दर्दरकः परिभुज्यते - बध्यते < छोडते > च यत्र यदि जतुमुद्रा व्यतिरेकेण केवलवस्त्रग्रन्थिर्दीयते, न च पृथ्व्यादिलेपस्तत्रोद्भिन्ने कल्पते, स्थविरकल्पिकानामाचीर्णवात् ।। ३५६ ।। अथ मालापहृतमाह मालोहडंपि दुविहं जहन्नमुक्कोसगं च बोद्धवं । अग्गतलेहि जहन्नं तविवरीयं तु उक्कोसं ॥ ३५७ ॥ मालापहृतं द्विविधं - जघन्यमुत्कृष्टं च तत्र भून्यस्ताभ्यां अग्रतलाभ्यां पादयोरग्रभागाभ्यां फलकसंज्ञाभ्यां पाणिभ्यां चोत्पाटिताभ्यां सिक्ककादिस्थितं दाव्या दृष्टेरगोचरं यद्दीयते तज्जघन्यं तद्विपरीतं बृहन्निःश्रेण्यारुहणादिना दीयमानमुत्कृष्टं, मालादपहृतमानीतमित्यन्वर्थः || ३५७ || अनयोरेव दृष्टान्तौ सदोषौ वक्तुकाम आहभिक्खू जहन्नगंमी गेरुय उक्कोसगंमि दिट्टंतो। अहिडसणमालपडणे य एवमाई भवे दोस्सा ॥ ३५८ ॥ जघन्ये भिक्षुर्दृष्टान्तः, उत्कृष्टे गैरुकः - कापिलः, जघन्ये अहिदशनं, उत्कृष्टे मालात्पतनमित्येवमादयो दोषा भवन्ति ।। ३५८ ।। अथ गाथाद्वयेन भिक्षुदृष्टान्तमाह मालाभमुहं दट्ठण अगारिं निग्गओ तओ साहू । तच्चन्निय आगमणं पुच्छा य अदिन्नदाणन्ति ॥ ३५९ ॥ मालंमि कूडे मोयग सुगंध आहे पविसणं करे डक्का । अन्नदिण साहु आगम निद्दय कहणा य संबोही ॥ ( ० २४) जयन्तपुरे यक्षदिनो गृहपतिर्भार्या वसुमती, अन्यदा धर्म्मरुचिः साधुस्तगृहे भिक्षार्थमागतो, यक्षदिनेन १२ मालापहृतदोषः । Page #174 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयावर्युपेता मालापहते भिक्षु| दृष्टान्तः । श्री पिण्डनियुक्तिः ॥६७॥ सादरं वसुमती बभणे-देहि साधवे अमुकान् मोदकानिति, चेत् (ते च ) सिक्ककोपरि घटेऽवतिष्ठन्ते, सा तान्यदातुं चचाल, साधुश्च सदोषमिति निवृत्तः, ततस्तदेव कोऽपि भिक्षुरागतः, पृष्टो यक्षदिन्नेन-किं संयतेन सिक्ककादानीयमाना मिक्षा नाददे, तेन प्रवचनमात्सर्यादित्यूवे-अदत्तदाना अमी वराका इति, श्रेष्ठिना तानेव मोदकान् तस्मायपि दापिता वसुमती, सा च यावत्तानादातुं गता तावत्तत्र घटे मोदकगन्धेन भुजङ्गमः प्रविष्टो अव तिष्ठते, वसुमती मोदकघटे यावत् करं क्षिपति तावदहिना दष्टा, वैद्यौपधैरायुरत्रुटीतमिति निरुग् बभूव । अन्यदा च स एव धर्मरुचिस्तत्रागतः, यक्षदिन्नेनोपलक्ष्य | पृष्टम्-यदि दयाप्रधानो धर्मस्तर्हि सर्पदर्शने कथमुपेक्षा तवेति ? साधुराह-न मया दृष्टोऽहिः, किन्तु भगवदादेशोऽयंमालापहृतभिक्षा त्याज्येति, तेनाहं प्रतिनिवृतः, तच्छ्रुत्वा यक्षदिनेन साधुपार्श्वे धर्म श्रवणेन वैराग्याद्भार्यया सह दीक्षा जगृहे, सूत्रं सुगमम् ।। ३६० ॥ अथ जघन्य एवान्यानपि दोषानाह आसंदिपीढमंचकजंतोडूखल पडंत उभयवहे। वोच्छेय पोसाई उड्डाहमनाणिवाओ य ॥ ३६१ ॥ ___आसन्दी-मश्चिका पीठं-गोमयाद्यासनं, मश्चकः प्रतीतः, यन्त्र-व्रीह्यादिदलनोपकरणं, उदूखलः प्रतीतः, एतेष्वारुह्य | दात्री भिक्षां ददती, यदि मश्वकादिल्हसनतो निपतति, तदोभयवधो-दाच्याः पृथिवीकायादीनां च (विनाशः), तया एतस्मै भिक्षामहं ददती प्रागपि पतिता ततोऽनेकोऽप्यस्मै दास्यतीति तद्गृहे तद्रव्यान्यद्रव्यव्यवच्छेदः स्यात्, प्रद्वेषः साधौ, तथा प्रवचनोड्डाहः, अज्ञानवादश्च यथैते एवंविधानपि न जानन्तीत्येवं मूर्खताप्रवादः ॥ ३६१ ।। अथोत्कृष्टस्य दोषानाह Jain Education Intel For Private & Personel Use Only kww.jainelibrary.org Page #175 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education In एमेव य उक्कोसे वारणनिस्सेणि गुठिवणीपडणं । गब्भित्थिकुच्छिफोडण पुरओ मरणं कण बोही ॥ ३६२ ( इ० २५ ) जयन्तीपुर्यां सुरदत्तश्रेष्ठी, भार्या वसुन्धरा, अन्यदा गुणचन्द्रर्षिस्तद्गृहे भिक्षायै समेतः, सुरदत्तेन वसुन्धराऽभिहिता - मालादानीयास्मै मोदकान् देहि, सा चान्तर्वत्नी परं पत्युरादेशात् मालाभिमुखं चचालेति, साधुरस्माकं न कल्पते इति तां निवार्य निर्वृत्तस्तदा कोऽपि कापिलस्तत्राजगाम भिक्षार्थं, सुरदत्तेन पृष्टः- संयतेन मालादानीयमाना भिक्षा कथं न गृहीता ?, तेनापि मात्सर्यादसम्बद्धं किमप्युक्तं, सुरदत्तो वसुन्धरया तस्मायपि मोदकान् दापितवान् साच निःश्रेणिमारोहन्ती पादल्हसनतो भूमौ पपात, अधश्च व्रीहिदलनयन्त्रेणोदरद्विधाकरणाद् गर्भः पृथक् जातः, तया पीडया माता गर्भश्च द्वयमपि मृतम्, उत्थितः कापिलस्यावर्णवादोऽन्यथा स एव साधुस्तद्गृहे भिक्षार्थमागतो यक्षदिनवत्पृष्ठे यथावस्थिते कथिते प्रव्रज्या । सूत्रं सुगमम् ।। ३६२ ।। अथ मालापहृतं मङ्गयन्तरेणाह उम तिरियंपिय अहवा मालोहडं भवे तिविहं । उड्डे य महोयरणं भणियं कुंभाइसू उभयं ॥ ३६३ ॥ अथवा मालापहृतं त्रिविधं तथाहि - ऊध्वं अवस्तिर्यक् च, ऊर्ध्वं सिक्ककादिगतम्, अधो भूमिगृहादाववतरणं, कुम्भादिषु - घटादिषु बृहद्भाजनेषूमयं भणितम्, अधोमुखकरणादू पात्पातनात् ॥ ३६३ ॥ अथापवादमाह - दद्दर सिल सोवाणे पुव्वारूढे अणुच्चमुक्खित्ते । मालोहडं न होई सेसं मालोहडं होइ ॥ ३६४ ॥ दर्दरका - निरन्तरकाष्ठफलकमयो निःश्रेणिविशेषः, शिला प्रतीता, सोपानानि इष्टकामयान्यवतरणानि, एतान्यारुह्य मालापहृते द्वितीय दृष्टान्तः । भङ्गानि च। Page #176 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयाबचूर्युपेता भी पिण्ड निर्युक्तिः । ॥ ६८ ॥ Jain Education Int यद्ददाति तन्मालापहृतं न भवति, तथा पूर्वारूढः साध्वागमनात्, अनुच्चोत्क्षिप्ते साधुपात्रे यद्ददाति तदपि मालापहृतं न स्याच्छेषं तु भवति ।। ३६४ ॥ अथानुच्चोत्क्षिप्तयोः स्वरूपमाह - तिरियायय उज्जुगएण गिण्हई जं करेण पासंतो । एयमणुच्चुक्खित्तं उच्चुक्खित्तं भवे सेसं ॥३६५ तिर्यग् आयतेन- दीर्घेण ऋजुकेन - सरलेन करेण-हस्तेन पात्रं दृष्ट्या निमालयन् यत् गृह्णाति पात्रे हस्तं प्रक्षिप्य ददाति दाता यत्र, तदित्थं भूतं पात्रमनुच्चोत्क्षिप्तं भवति, शेषं पुनरुच्चोत्क्षिप्तं स्यात् || ३६५ ॥ अथाच्छेद्यमाह - अच्छिपि य तिविहं पभू य सामी य तेणए चेव । अच्छिजं पडिकुटुं समणाण न कप्पए घेत्तुं ॥ ३६६ ॥ लादाच्छिद्य दीयते साधुभ्यस्तदाच्छेद्यमित्यन्वर्थः । आच्छेद्यमपि त्रिविधं प्रभुस्वामिस्तेनविषयत्वात् तदाच्छेद्यं प्रतिकुष्टं - निषिद्धं तीर्थ करादिभिः श्रमणानां गृहीतुं न कल्पते ॥ ३६६ ॥ अथ प्रभुविषयमाह - गोवालए य भयएऽखरए पुत्ते य धूय सुण्हाए । अचियत्त संखडाई केइ पओसं जहा गोवो ॥ ३६७॥ प्रश्चकर्तृकमा च्छेद्यं, गोपालके भृतके - कर्म्म करे अक्षर के - द्व्यक्षरामिधाने दास इत्यर्थः पुत्रे दुहितायां स्नुषायां भवति, अत्र दोषानाह - अचियत्तं- अप्रीतिः संखड - कलह इत्यादि दोषाः केचित्पुनः प्रद्वेषमपि साधौ गच्छन्ति, यथा गोपः || ३६७ || गोपदृष्टान्तं गाथाद्वयेनाह आच्छेद्य मेदाः दोषाच । ॥ ६८ ॥ Page #177 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आच्छेद्ये गोप दृष्टान्तः। गोवपओ अच्छेत्तुं दिन्नंतु जइस्स मइदिणे पहुणा । पयभाणूणं दटुं खिंसइ भोई रुवे चेडा ॥ ३६८ ॥ | पडियरणपओसेणं भावंनाउंजइस्स आलावो। तन्निबंधा गहियं हंदि स मुक्कोसि मा बीयं ॥ ३६९ ॥ (१०२६) वसंतपुरे जिनदासरुक्मिण्यो दम्पती, वत्सराजो गोपालः, स चाष्टमे दिने सर्वाषामपि गोमहिषीणां दुग्धमादत्ते, इदमेव भाटकमिति, अन्यदा साधुर्भिक्षार्थ तत्रागमत् , तस्मिन् दिने गोपस्य सर्वदुग्धादानवारकस्तेन सर्वगोमहिषीणां दुग्धेन परिभृता, जिनदासेन भक्तं प्रतिलाभ्य साधवे पायसं बलादाछिद्य गोपादत्तं, ततस्तद्भाजनं कतिपयपयसोनं गृहे नीतवान् , भार्या च तद् दृष्ट्वा ज्ञातवृत्तान्ता खिसति, चेटरूपाणि दुग्धं स्तोकमालोक्य रोदितुं प्रवृत्तानि, तथा वसतौ (च सति) गोप: सकोपः साध्वनाथं चचाल, दृष्टः कापि साधुः, प्रधावितो लकुटमुत्पाठ्य गोपः, साधुस्तं सकोपमायातं दृष्ट्वा नूनमस्य दुग्धं बलादाच्छिद्य जिनदासेन दत्तमिति चिन्तयित्वा विशेषात् प्रसनीभ्य तत् सन्मुखं चचाल मणितं च, भो गृहाण स्वदीयं दुग्धमित्युक्त सोऽप्युपशान्तो निजभावं प्रकटयन् चोक्तवान् , मुक्त इदानीं, याहि दुग्धं लात्वा, परं भूयोऽप्येवमाच्छे न गृहीतव्यं, गोपसाधू स्वस्थानं गतौ । सूत्रं सुगमम् , नवरं पयभाणूणं-पयोभाजनमूनं दृष्ट्वा भोई इति-भोग्या-भार्या रोविति-रुदन्ति, हन्दीत्यामन्त्रणे तन्निर्बन्धात, स्वदीयजिनदासाख्यप्रभुनिबन्धात गृहीतं, ततः स प्राह-मुक्तोऽसि सम्प्रति मा द्वितीयं वारमेवं गृहीथाः ॥ ३६८-३६९ ॥ अथ गोपविषय एव " अचियत्तसंखडाई" इति व्याख्यानयतिनानिविद्रं लब्भइ दासीविन भुजए रिते भत्ता। दोन्नेगयरपओसं जं काही अंतरायं च ॥३७०॥ Jain Education Inter M w.jainelibrary.org Page #178 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयापर्युपेता श्री का पिण्डनियुक्ति इह प्रभुणा बलाद् दुग्धादिकमाच्छिद्यमाने कोऽपि गोप एवं युवाणः सम्भाव्यते, यथा-अनिविष्ट:-अनुपार्जितं स्वाम्या. किमपि न लभ्यते, ततो मया दुग्धमिदं शरीरायासेनार्जितं, ततस्त्वं कथमत्र प्रभवसि ?, न हि दास्यप्यास्तामुत्तमरुयादिक- INद्याच्छेद्यः। | मिति भक्ताहते-भरणपोषणं विना भुज्यते-भोक्तुं लभ्यते, ततो मदीयं भोजनमिदमिति न प्रभुत्वावकाशः, एवमुक्तो द्वयोरेकतरस्य वा प्रद्वेषः, प्रद्वेषे च यत् करिष्यति धनहरणमारणादिकं तदोषतया भाव्यम् , यच्चान्तरायं गोपालस्य तत् कुटुम्बस्य वा तदपि दोषरूपमिति । ३७० ॥ अथ स्वामिविषयमाच्छेद्यमाहसामीचारभडा वा संजय दट्ठण तेसि अट्ठाए । कलुणाणं अच्छेजं साहूण न कप्पए घेत्तुं ॥३७१॥ स्वगृहमात्रनायकः प्रभुः, ग्रामादिनायकः स्वामी, तथा चोक्तम्-" होइ पभूघरमाणे सामी पुण गामसामिओ भणिओ। तेणो पसिद्धगोच्चिय एयच्छिन्नं न गेहिजा ॥१॥" चारभटाः स्वामिभटा वा संयतान् दृष्ट्वा तेषां संयतानामर्थाय करुणानां-कृपास्थानानां दरिद्रकौटुम्बिकादीनां सम्बन्ध्याच्छिद्य यद्ददाति तत् साधूनां गृहीतुं न कल्पते ॥ ३७१ ।। एतदेव व्यक्तमाह आहारोवहिमाई जइअट्ठाए उ कोइ अच्छिदे । संखडि असंखडीए तं गिण्हते इमे दोसा ॥३७२॥ __यदि कोऽपि स्वामी भटो वा यतीनामर्थाय परकीयमाहारोपध्यादिकं संखडया-कलहेन असङ्खडया-कलहामावेनाच्छिद्य | | यतिभ्यो ददाति तद् गृह्णत इमे दोषाः वक्ष्यमाणाः ॥ ३७२ ॥ तानेवाह Jain Education Inten For Private & Personel Use Only aw.jainelibrary.org Page #179 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education अचित्तमंतरायं तेनाहड एगऽणेगवोच्छेओ । निच्छुभणाइदोसा तस्स अलंभे य जं पावे ॥ ३७३ ॥ यत्सत्कं गृह्यते, तस्याप्रीतिर्जायत अन्तरायं वा तथाभूतं साधूनां गृह्णतां स्तेनाहृतं भवति, तत् स्वामिनाऽननुज्ञातत्वात्, तद्दोषादेकस्य तस्यैव साधोर्यद्वाऽन्येषां साधूनामनेकेषां तद्गृहे भक्तादिव्यवच्छेदः स्यात्, यद्वा ते रुष्टाः सन्तो यः पूर्वमुपाश्रयो दत्तस्तस्मान्निष् कासयन्ति, तथा तस्योपाश्रयस्यालामे यत् किमपि कष्टं प्राप्नुवन्ति तदप्याच्छेद्यादाननिमित्तमिति दोषः || ३७३ ।। अथ स्तेनाछिद्यमाह तेणो व संजयट्ठा कलुणाणं अप्पणो व अट्ठाए । वोच्छेय पओसं वा न कप्पई कप्पणुन्नायं ॥ ३७४ ॥ स्तेना अपि केचित् संयतान् प्रति भद्रका भवन्ति, संयता अपि दरिद्रसार्थेन सह व्रजन्ति, ततस्तान् भिक्षावेलायां भिक्षामप्राप्नुवतो दृष्ट्वा संयतानामर्थाय यद्वा तस्यात्मनोऽर्थाय तेषां करुणानां कृपास्थानानां दरिद्रसार्थमनुष्याणां सकाशादाच्छिद्य यद्ददाति स्तेनः तत् स्तेनाच्छेद्यं ज्ञेयम्, तच्च साधूनां न कल्पते, यतस्तग्रहणे पूर्वोक्तन्यायेनै काने कसाधूनां भक्तादिव्यवच्छेदः प्रद्वेषश्च जायते, यदि पुनस्ते सार्थिका वक्ष्यमाणप्रकारेणानुजानन्ते तर्हि कल्पते ॥ ३७४ ॥ एतदेव गाथाद्वयेनाह - संजयभद्दा तेणा आयंती वा असंथरे जइणं । जइ देति न घेतव्वं निच्छुभवोच्छेउ मा होजा ॥ ३७५ ॥ घसत्यदितो समणुन्नाया व घेत्तुणं पच्छा। देति तयं तेंसिं चिय समणुन्नाया व भुंजंति ॥ ३७६ ॥ इह स्तेना अपि संयतभद्रका भवन्ति साधवश्च दरिद्रसार्थेन सह कदापि यान्ति, ततस्तेषां साधूनां भिक्षावेलायाम स्तेनाच्छेयनिरोधः । Page #180 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयावचूर्युपेता श्रीपिण्डनियुक्तिः स्तनाच्छेधेऽपवादोऽनिसृष्टद्वारश्च । ॥७०॥ संस्तरे-अनिर्वाहे ते स्तेनाः स्वग्रामाभिमुखं प्रत्यागच्छन्तो वा शब्दादन्यत्र गच्छन्तो वा यदि तेषां भक्तादि बलादाच्छिद्य ददति, तर्हि न कल्पते, न ग्राह्य, यतो माऽभूत्रिच्छोभा-निष्काशनं सार्थात , एकानेकसाधूनां भक्तादिव्यवच्छेदः, यदि पुनः सार्थिकैः स्तेना अपि गृहीष्यन्ति, ततो भवद्भिर्गृह्यतामिति मयेनानुज्ञाताः साधवस्तदा तद् गृहीत्वा भक्तादि तत्तेभ्य एव पश्चाद्ददति, यथा तदानीं चौरप्रतिभयादस्माभिर्गृहीतं, अथ ते गता यूयमात्मीयं भक्तादि गृहीथेति, एवमुक्तेऽपि यद्यनु जानन्ते युष्मभ्यं दत्तमिति तर्हि भुञ्जते, क्वचिद्वितीयगाथायां "घय सत्तुय दिढतो" इति दृश्यते, तत्र च सार्थिकाः स्तेनेबलाद्दाप्यमाना यदि एवं युवते, यथाऽस्माकं घृतसक्तुदृष्टान्तः, यथा-घृतं सक्तुमध्ये क्षिप्तमपि संयोगाय एवमस्माकं चौरर्गृहीतव्यम्, ततो यदि चौग अपि युष्मभ्यं दापयन्ति, ततो महानस्माकं समाधिरिति अनुज्ञाताः साधवः, शेष प्रागिव ॥ ३७५-३७६ ॥ अथानिसृष्टद्वारमाहअणिसिटुं पडिकुटुं अणुनायं कप्पए सुविहियाणं । लड्डग चोल्लगजंते संखडि खीरावणाईसु ॥३७७॥ ____ अनिसृष्टं यदननुज्ञातं तत् प्रतिक्रुष्टं, एतेनान्वर्थोऽपि भाव(वि)त एव, अनुज्ञातं सुविहितानां कल्पते, तच्चानिसृष्टमनेकधा, मोदके चुल्ल्के भोजने यन्त्र इति-कोल्हुकादिषाणके सङ्घडयां क्षीरे आपणादौ च, अयं भावः-इह सामान्येनानिसृष्टं द्विधासाधारणानिसृष्टं भोजनानिसृष्टं च, तत्र चोल्लकशब्देन भोजनानिसृष्टमुक्तं, शेषभेदैः साधारणानिसृष्टमिति ॥ ३७७ ॥ तत्र | मोदकविषयसाधारणानिसृष्टोदाहरणं गाथाचतुष्टयेनाह ॥७०॥ Jnin Education in For Private Personel Use Only Page #181 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education In बत्तीसा सामन्ने ते कहि हाउं गयत्ति इअ वृत्ते । परसतिएण पुन्नं न तरसि काउंति पच्चाह ॥ ३७८ ॥ अविय हु बत्तीसाए दिन्नेहि तवेगमोयगो न भवे । अप्पवयं बहुआयं जइ जाणसि देहि तो मज्झं ॥३७९ लाभिय नें तो पुट्ठो किं लद्धं नत्थि पेच्छिमो दाए । इयरोऽवेि आह नाहं देमित्ति सहोढ चोरत्ति ॥ ३८० गिण्हण कड्डण ववहार पच्छकडुड्डाह पुच्छ निबिसए । अपहुंमि भवे दोसा पहुंमि दिन्ने तओ गहणं ॥ (दृ० २७) रत्नपुरे माणिभद्रमुख्या द्वात्रिंशद्वयस्याः साधारणान् मोदकान् कारयित्वोद्यापनिकार्थं गताः, एको मोदकरक्षार्थं मुक्तोऽन्ये त्वेकत्रिंशन्नद्यां स्नातुं गताः, अत्रान्तरे कोऽपि लोलुपसाधुस्तत्रागतो, मोदका याचिताः, आरक्षकेनोक्तं नमस्यैते, किन्तु परेषां एकत्रिंशजनानां ततः कथं ददामि, साधुराह - ते कुत्र गताः १, नद्यां गताः नद्यां स्नातुं गता इति | तेनोक्ते साधु-परसत्केन मोदकसमूहेन त्वं पुण्यं कर्त्तुं न शक्नोषि १, पच्चाहति तं प्रत्याह साधुरिति, अपि च द्वात्रिंशतमपि मोदकान् यदि मे प्रयच्छसि तथापि तव मागे एक एव मोदको याति, तत एवमलपव्ययं बह्वायें दानं यदि जानासि तर्हि मह्यं सर्वानपि मोदकान् देहि, तत एवमुक्ते दत्ताः सर्वेऽपि मोदकाः, भृतं साधुभाजनं, साधुः पश्चान्निवृत्तः, अत्रान्तरे माणि भद्रादयः सन्मुखमागच्छन्ति, पृष्टश्च साधुस्तैः, किमत्र त्वया लब्धं १, साधुना च मोदकवनिका इति ज्ञात्वा, नेत्युक्ते, | तैर्भाक्रान्तं साधुमालोक्योक्तम् - दर्शय निजभाजनं यथा प्रेक्षामहे, साधुश्च न दर्शयति, बलादालोकिते दृष्टा मोदकाः, अनिसृष्टे दृष्टान्तः । Page #182 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयाचचूर्युपेता श्री. पिण्डनिर्युक्तिः । ॥ ७१ ॥ Jain Education Inter साधिक्षेपमारक्षकः पृष्टः, तेन यथावस्थिते कथिते चौरस्त्वं, सहोढ - सलोपुत्र इदानीं प्राप्तोऽसि कुतस्ते मोक्ष इत्युक्त्वा बद्धः, गृहीतो वस्त्राञ्चले, कर्षितो बाहुना, पश्चात्कृत इति गृहीत्वा रजोहरणादिकं गृहस्थीकृतः, तत उड्डाह इति, नीतो राजकुलम्, धर्माधिकरणिकानां कथिते तैः पृष्टे च साधुर्लज्जया घोमुख एवास्थात्, चौराणां मौनमेव स्यादिति निर्विषयश्चक्रे, अप्रभावित्थं दोषा भवन्ति, तस्मात् प्रभुदत्तग्रहणं कार्यमिति ॥ ३७८-३८१ ।। एमेव य जंतमिवि संखडि खीरे य आवणाई सुं । सामन्नं पडिकुटुं कप्पइ घेत्तुं अणुन्नायं ॥ ३८२ ॥ एवमेव मोदकोदाहरणप्रकारेण यन्त्रेऽपि सङ्घडयामपि क्षीरे च आपणादिषु सामान्यं साधारणं तत् स्वामिभिः सर्वैरप्यनिसृष्टं प्रतिक्रुष्टं, अनुज्ञातं पुनः कल्पते ग्रहीतुम् ।। ३८२ ।। अथ चुल्लकद्वार प्रस्तावनां सभेदानाह त्ति दारमहुणा बहुवतव्वंति तं कयं पच्छा । वन्नेइ गुरु सो पुण सामिय हत्थीण विन्नेओ ॥३८३॥ अधुना 'चुल्ल' इति द्वारं व्याख्येयं तच्च बहुवक्तव्यमिति पश्चात्कृतं, गुरुः तीर्थकरादिर्वर्णयति, स पुन चुल्लको द्विधा स्वामिनो हस्तिनञ्च विज्ञेय इति || ३८३ || अथ स्वाम्यनिर्दिष्टमाह - छिन्नमच्छिन्नो दुविहो होइ अच्छिन्नो निसिट्ट अणिसिट्ठो । छिन्नांमे चुलगंमी कप्पड़ घेत्तुं निसिटुंमि ॥ ३८४ छिन्नो दिट्ठमदिट्ठो जो य निसिट्ठो भवे अच्छिन्नोय । द्विधा चुल्लक:- स्वामिसम्बन्धी छिन्नोऽच्छिन्नथ, यो बहूनां हालिकानां पृथक् २ भाजने कृत्वा कौटुम्बिकेन प्रेष्यते स चुल्लकमेदाः । ॥ ७१ ॥ w.jainelibrary.org Page #183 -------------------------------------------------------------------------- ________________ का च्छिन्न एकत्रभाजने त्वच्छिन्न इति, अच्छिन्नोऽपि द्विधा-निसृष्टोऽनिसृष्टश्च, कौटुम्बिकेन हालिकैश्चानुज्ञाताननुज्ञातत्वात् , छिन्नाच्छितथा छिन्ने चुल्लके धनिकेन निसृष्टे गृहीतुं कल्पते, तथा छिन्नो यस्य निमित्तं तेन कौटुम्बिकेन वा दृष्टोऽदृष्टो वा कल्पते, Nौ दृष्टातथा यश्चाच्छिन्नो योऽपि च्छिन्ना, सोऽनुज्ञातोऽन्योऽन्यदीयमानो दृष्टोऽदृष्टो वा कल्पते दर्शनं चात्र स्वाम्यपेक्षया क्षेयं, दृष्टौ च। इयरोत्ति-इतर एतद् व्यतिरिक्तः, पुनश्छिन्नोऽच्छिन्नो वा स्वस्वामिभिरननुज्ञातो दृष्टोऽदृष्टो वा न कल्पते ॥ ३८४-३॥ एतदेव गाथार्द्धन वक्तिसो कप्पइ इयरो उण अदिट्ठदिट्ठो वऽणुन्नाओ ॥ ३८५ ॥ अणिसिट्ठमणुन्नायं कप्पइ घेत्तुं तहेव अदिटुं । ___ अनिसृष्टमपि पूर्व पश्चादनुज्ञातमिति कल्पते, तथानुनातं सदृष्टमपि ग्रहीतुं कल्पते, दोषाभावात् ।। ३८५-३॥ उत्तरार्द्धन | हस्तिचुल्लकानिसृष्टमाहजडस्स य अनिसिटुं न कप्पई कप्पइ अदिटुं ॥ ३८६ ॥ हस्तिनो भक्तं मिण्ठेन गजेन वाऽनिसृष्टं न कल्पते, तथा मिण्ठेन स्वल्पं भक्तं दीयमानं गजेनादृष्टं कल्पते, गजदृष्टे ग्रहणे वक्ष्यमाणोपाश्रयभङ्गादिदोषप्रसङ्गात् ।। ३८६ ।। अस्यैव विधेरन्यथाकरणे दोषानाहनिवपिंडो गयमत्तं गहणाई अंतराइयमदिन्नं। डुंबस्स संतिएवि हु अभिक्ख वसहीएँ फेडणया ॥३८७ Jain Education For Private Personal Use Only al Page #184 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयाबचूर्युपेता श्री पिण्डनिर्युक्तिः ॥ ७२ ॥ Jain Education Inte यद् गजभक्तं स राज्ञः पिण्डस्ततो राज्ञाऽननुज्ञातस्य ग्रहणे ग्रहणाकर्षणादयो दोषा भवन्ति, अन्तरायिकं च कर्म अदत्तादानं, तथा कुडुम्बस्य - मिण्ठस्य सत्के पिण्डे मिण्ठेन दीयमाने यदि सदा साधुर्गजस्य पश्यतस्तद् गृह्णाति, तदा मदीय कवलमध्यादनेन पिण्डो गृहीत इति कदापि रुष्टो गजस्तं भिक्षुमेव मार्गे प्राप्य मारयेत्, वसतिमुपाश्रयं वा स्फोटयेत् ॥ ३८७ ॥ अथाध्यवपूरकद्वारमाह अज्झोयरओ तिविहो जावंति य सघरमीसपासंडे । मूलंमि य पूवकये ओयरई तिण्ह अट्ठाए ॥ ३८८ अभ्यवपूरकस्त्रिविधः, जावंति य इत्यत्र स्वगृहमिश्रशब्दयोः सम्बन्धनात् स्वगृहयावदर्शिक मिश्रा, सघरमीसत्ति, अत्र साधुशब्दोऽध्यायिते स्वगृहसाधुमिश्रः, पासंडे इति, अत्रापि स्वगृहमिश्रशब्दसम्वन्धः स्वगृहपाखण्डिमिश्र इति, मूलेआरम्भ पूर्व कृते पश्चात्रयाणामर्थाय अवतारयति -गृहस्था अधिकतरान् तन्दुलान् प्रक्षिपति, अधिकमवपूरयतीत्यध्यवपूरक इत्यन्वर्थः ।। ३८८ ।। अथाध्यवपूरकमिश्रजातयोर्भेदं दर्शयति तंडुलजलआयाणे पुप्फफले सागवेसणे लोणे । परिमाणे नाणत्तं अज्झोयरमीसजाए य ॥ ३८९ ॥ अध्य व पूरक मिश्रजातयोर्नानात्वं भेदस्तन्दुलपुष्पफलशाकवेसनलवणानामादाने - आदानकाले यत् परिमाणं तेन द्रष्टव्यम्, तथाहि मिश्रजाते पूर्वमेव स्थाल्यां प्रभूतं जलमारोप्यते, अधिकतराश्च तन्दुलाः कण्डनादिभिरुपक्रम्यन्ते इत्थं फलादिकमपि भाव्यम्, अध्यवपूरके तु पूर्वं स्तोकमेव तन्दुलादिर्गृह्यते, पश्चादधिकप्रक्षेप इति भावः ॥ ३८९ ॥ अध्यव अध्यत्र पूरक:, तन्मिथजा तयोर्भेदश्च । ॥ ७२ ॥ Page #185 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अध्यव पूरकस्य कल्प्याकल्प्यविधिः। अध्यवपूरकस्य कल्प्याकल्प्यविधिमाहजावंतीए विसोही सघरपासडि मीसए पूई । छिन्ने विसोही दिन्नंमि कप्पइ न कप्पई सेसं ॥३९॥ यावदर्थिके-स्वगृहयावदर्थिकमिश्रेऽध्यवपूरके विशोधिकोटिस्तावन्मात्रे शुद्धभक्तादपनीते शेषस्य शुद्धिरित्यर्थः, स्वगृहपाखण्डिमिश्रे उपलक्षणत्वात् , स्वगृहसाधुमिश्रे च शुद्धभक्तमध्यपतिते पूतिर्भवति, तथा विशोधिकोटौ यावत् कणाः पश्चारिक्षसास्तावन्मात्रे छिन्ने-पृथक्कृते भजना, यद्वा कार्पटिकादिभ्यो दत्ते शेषं कल्पते, साधूनां शेष स्वगृहपाखण्डिमिश्रं स्वगृहसाधुमिश्रं-चाध्यवपूरकं न कल्पते ।। ३९० ॥ अथ " जावंतिए विसोही" (गा० ३९०) इति व्याख्यानयतिछिन्नमि तओ उक्कड्डियंमि कप्पइपिहीकए सेसं। आहावणाए दिन्नं च तत्तियं कप्पए सेसं ॥३९१॥ एषा गाथा कापि न दृश्यते इति पूर्णा ज्ञेया, यावत् क्षिप्तं तावन्मात्रे छिन्ने-पृथक्कृते उत्कर्षिते-उत्पाटिते पृथक्कतेबहिनिष्काशिते शेष भक्तं साधूनां कल्पते । छिन्नादि बहूनि पदानि मन्दमत्यवबोधनाय तथा आभावनया-उद्देशेन न तु सिक्थादिपरिगणनेन यदि तावन्मात्रं कार्पटिकादिभ्यो दत्तं स्यात् , ततः शेष कल्पते ॥ ३९१ ॥ अथोद्गमदोषानां निगमनमाहएसो सोलसभेओ, दुहा कीरइ उग्गमो । एगो विसोहिकोडी, अविसोही उ चावरा ॥ ३९२॥ १ एषा गाथा मळयगिरिपादैः व्याख्यातेव ( ११६ तमे पत्रे मुद्रिता, गा० ३९१) । in Education For Private Personel Use Only Page #186 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीया वचूर्युपेता श्री पिण्डनिर्युक्तिः । ॥ ७३ ॥ Jain Education Inter एष षोडशभेद उद्गमः सामान्येन द्विधा क्रियते, एका विशोधिकोटिरविशोधिकोटिश्वापरा ।। ३९२ ॥ आहाकम्मुद्देसिय चरमतिगं पूइ मीसजाए य । बायरपाहुडियावि य अज्झोयरए य चरिमदुगं ॥ ३९३ ॥ आधाक १, औशिकस्यान्त्य भेदत्रयं २, पूतिर्भक्तपानरूपा ३, मिश्रजातं - पाखण्डिगृहमिश्रसाधुगृहमिश्ररूपं ४, बादरप्रभृतिका ५, या अध्यवपूरकस्य चरमद्विकं ६, एते उद्गमदोषा अविशोधिकोटिः ।। ३९३ ।। तत्र दोषमाह - उग्गमकोडी अवयव लेवालेवे य अकयए कप्पे । कंजियआया मगचाउलोयसंसट्ठपूईओ ॥ ३९४ ॥ उद्गम कोट्या- अविशोधिकोट्या अवयवेन - शुष्क सिक्थादिना लेपेन- तक्रादिना अलेपेन- वल्लचनकादिना संस्पृष्टं यद्भक्तं तस्मिन्नुज्झितेऽपि अकृतकस्य त्रये यच्छुद्धमपि गृह्यते तत् पूतिरिति, अथ कोऽपि मतिदौर्बल्यादेकमोदन मे वाघाकर्म्म. मन्यते न शेषमव श्रावणादिकं तदभिप्रायनिराकरणार्थमाह- किंजि इत्यादि, साध्वर्थमोदने निष्पाद्यमाने काञ्जिकाद्यण्याधाकम्मैव, तदवयवरूपत्वात्, ततः काञ्जिकेन आयामेन तन्दुलोदकेन च यत् संस्पृष्टं तदपि पूतिर्भवति ॥ ३९४ ॥ गाथात्रयेण भाष्यकृदेतदेव व्याख्यानयति सुकेणऽवि जं छिकं तु असुइणा धोवए जहा लोए । इह सुक्केणऽवि छिकं धोवइ कंमेण भाणं तु ? ॥२८॥ लेवालेवत्ति जं वृत्तं, जंपि दव्वमलेवडं । तंपि घेत्तुं ण कप्पंति, तक्काइ किमु लेवडं १ ॥ भा० २९ ॥ आहाय जंकीरइ तं तु कम्मं, वज्जेहिही ओयणमेगमेव । उद्गमदोषे अविशोधिकोटिः । ॥ ७३ ॥ Page #187 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उद्गमे विशोधि| कोटिः। सोवीर आयामग चाउलो वा, कम्मति तो तग्गहणं करेंति ॥ भा० ३०॥ सुगम, नवरमाद्यगाथायामवयव इति व्याख्यातं, द्वितीयायां लेवालेवत्ति, तत्रायं भावार्थ:-यदपि वल्लचनकादिद्रव्यमलेपकत, तदपि प्रथममनामोगादिकारणतः पात्रे गृहीत्वा पश्चात्कथमपि परिचाते परित्यज्य पात्रं कल्पयन्ति-कल्पत्रयेण प्रक्षालयन्ति, किं पुनस्तकादिकं लेपकृद् गृहीत्वा, तत्र सुतरां प्रक्षालनं कर्त्तव्यमिति परिज्ञापनार्थ इत्युक्तम् , तथा यदेव साधनाधाय क्रियते तदेवाधाकर्म नान्यदिति बुद्ध्या, वजेयिष्यन्ति शिष्या ओदनमेवैकं, न शेषं तन्दुलोदकादिकं, ततो गुरवो भद्रबाहुस्वामिनः सौवीरावश्रावणतन्दुलोदकान्याधाकर्मेति परिज्ञापनार्थ तद् ग्रहणं-सौवीरादि ग्रहण विशेषतः कुर्वन्ति ॥ २८-३० ॥ तदैवमविशोधिकोटिरुक्ता, अथ विशोधिकोटिमाहसेसा विसोहिकोडी भत्तं पाणं विगिंच जहसचिं। अणलक्खिय मीसदवे सबविवेगेऽवयवसुद्धो ॥३९५॥ अविशोधिकोटिव्यतिरिक्ताः शेषमेदादि विशोधिकोटिः, उक्तञ्च-" उद्देसियंमि नवगं उवगरणे जं च पूईयं होइ । जावंतिय मीसगयं च अज्झोयरए य पढमपयं ॥१॥ परियट्टिए अभिहडे उन्मिन्ने मालोहडे ईय । अच्छिज्जे अणिसिद्धे पाओयर कीय पामिच्चे ॥ २॥ सुहमा पाहुडियावि य ठवियगपिंडो य जो भवे दुविहो । सबोवि एस रासी विसोहिकोडी मुणेयवो ॥ ३॥" अत्र विधिमाह-'विगिचत्ति, अनया विशोधिकोट्या यत्संस्पृष्टं भक्तादि तद्यथाशक्ति 'विगिंच' त्यज सर्वभक्तं तावन्मानं चेत्यर्थः, यदि पुनरलक्षितेन सदृशवर्णगन्धादितया पृथक् परिज्ञातुमशक्येन मिश्रितं भवति, Jain Education in H al I Page #188 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीया-IN वचूर्युपेता विशोधि कोटौ | चतुर्भङ्गी। श्री पिण्डनियुक्तिः। ।।७४॥ यद्वा द्रव्येण-तक्रादिना अन्यत्तक्रादि तदा सर्वस्यापि तस्य विवेकः, कृतेऽपि सर्वात्मना विवेके यदि केऽपि सूक्ष्मा अवयवा लना भवन्ति, तथापि तत्र पात्रे अकृतकल्पे भक्तादिगृहन् शुद्धो यतिरिति ॥ ३९५ ॥ अथ चतुर्धा विवेकः स्यादित्याहदवाइओ विवेगो दवे जं दव जं जहिं खेत्ते। काले अकालहीणं असढो जं पस्सई भावे ॥ ३९६ ॥ द्रव्यादिको-द्रव्यक्षेत्रकालभावभेदाच्चतुर्दा विवेकः, तत्र यद्रव्यं त्यजति स द्रव्यविवेकः, तथा परिष्ठाप्यं यत्र क्षेत्रे त्यज्यते स क्षेत्रविवेकः, यद्विशोधिकोटिदुष्टमकालहीनं शीघ्र परित्यज्यते स कालविवेक इति, अशठोरक्तद्विष्टः सदोष भक्तादि दृष्ट्वा त्यजति स भावविवेक इति ॥ ३९६ ॥ अथात्र विशोधिकोटौ चतुर्भङ्गीमाहसुक्कोल्लसरिसपाए असरिसपाए य एत्थ चउभंगो। तुल्ले तुल्लनिवाए तत्थ दुवे दोन्नऽतुल्ला उ॥३९७॥ ___ अत्र शुष्कस्य आर्द्रस्य च सदृशोऽन्यवस्तुनि मध्यपाते सति, तथा असदृशे वस्तुनि पाते सति चतुर्भङ्गी, तथा दर्शयति'तत्थ 'त्ति, तत्र तुल्ये तुल्यनिपाति द्वौ प्रथमचतुर्थभङ्गो लब्धौ, द्वौ च भङ्गो द्वितीयतृतीयौ अतुल्यात् प्रक्षिप्यमाणाल्लब्धौ, तथा हि-शुष्के शुष्कं शुष्के आर्द्र आर्द्र शुष्कं आर्द्र आमिति ॥ ३९७ ॥ अथोद्धरणविधिमाहसुक्के सुकं पडियं विगिंचिउं होइ तं सुहं पढमो। बीयंमि दवं छोढुं गालंति दवं करं दाउं ॥ ३९८॥ तइयंमि कर छोढुं उल्लिंचइ ओयणाइ जं तरइ । दुल्लहदत्वं चरिमे तत्तियमित्तं विगिंचंति ॥ ३९९ ॥ शुष्के शुष्कं पतन्ति तत् परित्यक्तुं सुखं भवति एष प्रथमो भङ्गः, द्वितीये भङ्गे द्रव्यं प्रभृतं मध्ये क्षिप्तान्यपात्रकर्णैकदेशे ॥४॥ For Private in Eduent an inte Mww.jainelibrary.org Personal Use Only Page #189 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कोटिप्रकाराः। शुद्धभक्तपानरक्षणार्थ करं दत्वा सर्व द्रव्यं गालयन्ति, तृतीये मते भाजनमध्ये करं क्षिप्वा यद्यावन्मानं शक्नोति तावन्मात्रमुल्लिञ्चति-आकर्षति, चरिमे भङ्गे दुर्लभद्रव्ये सति तावन्मात्रमुद्देशतस्त्यजन्ति ॥ ३९८-३९९ ॥ संथरे सबमुज्झंति, चउभंगो असंथरे । असढो सुज्झई जेसं, मायावी जेसु बज्झई ॥ ४०॥ संस्तरे-निर्वाहे सति सर्व त्यजन्ति, असंस्तरे-अनिर्वाहे चत्वारो भङ्गास्तेषु भङ्गकेषु अशढः शुद्धयति मायावी येषु च बद्धयते ॥ ४०० ॥ अथ सझेपतः कोटीकरणमाहकोडीकरणं दुविहं उग्गमकोडी विसोहिकोडी य। उग्गमकोडी छक्कं विसोहिकोडी अणेगविहा ॥४०१॥ कोटीकरण द्विविध-उद्गमकोटिविंशोधिकोटिश्च, तत्रोद्गमकोटिः पटकं आधाकर्माद्यविशोधिकोटिरूपं, विशोधिकोटिः पुनरनेकविधा ।। ४०१ ॥ अथ भङ्गथन्तरेण कोटीः प्रतिपादयतिनव चेव अढारसगं सत्तावीसा तहेव चउ पन्ना । नउइ दो चेव सया उ सत्तरी होइ कोडीणं ॥४०२॥ स्वयं हननमन्येन धातनं अनुमोदनं च, तथा स्वयं पचनं पाचनमन्येनानुमोदनं, तथा स्वयं क्रयणं क्रापणमनुमोदनं चेति, इहाद्याः पडविशोधिकोटयोऽन्तिमास्तु तिस्रो विशोधिकोटयः, एता अपि नव कोटीः कोऽपि रागेण कोऽपि द्वेषेण सेवते, ततो द्विगुणिता अष्टादश भवन्ति, तथा मिथ्यात्वाज्ञानाविरतिरूपेण त्रिकेण नव गुणिताः सप्तविंशतिर्भवति, रागद्वेषौ त्वत्र न विवक्षितौ, यदा तद्विवक्षा तदा सप्तविंशतिर्द्विगुणाश्चतुःपञ्चाशद्भवति, तथा नवकोटयः कदापि क्षान्त्यादि दशविधधर्म in Education Intel For Private Personel Use Only Page #190 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयाचचूर्युपेता श्री पिण्डनिर्युक्तिः । ॥ ७५ ॥ Jain Education Intent पालनार्थं सेव्यन्ते, यथा दुर्भिक्षे कान्तारे चाऽनेन फलादिना स्वदेहं धृत्वा क्षान्त्यादिकं पालयामीत्यादि, ततो नव दश गुणिता जाता नवतिः, एषा नवतिर्ज्ञानदर्शनचारित्ररूपेण त्रिकेन गुणिता द्वे शते सप्तत्यधिके कोटीनां भवन्ति इति उक्तश्व“ रोगाई मिच्छाई (रागाई ) समर्णेधम्म नाणाई । नवे नवें सत्तावीसा नव नउईए उ गुणकारा || १ " ॥ ४०२ ॥ अथोमदोषाणां वक्ष्यमाणोत्पादनादोषाणां च सम्भवमाह - 1 सोलस उग्गमदो से गिहिणो उ समुट्ठिए वियाणाहि । उप्पायणाऍ दोसे साहू समुट्ठिए जाण ॥४०३॥ षोडश उद्गमदोषान् गृहिणः सकाशादुत्थितान् विजानीहि उत्पादनादोषान् साधोः सकाशादुत्थितान् जानीहि ॥४०३ ॥ अथोत्पादनाद्वारे पूर्वमुत्पादनामाह मंठवणादवि भावे उप्पायणा मुणेयवा । दव्वंमि होइ तिविहा भावंमि उ सोलसपया उ ॥ ४०४ ॥ नामस्थापनाद्रव्य भाव मेदादुत्पादना चतुर्विधा ज्ञातव्या, नामस्थापने सुगमे, द्रव्ये सचित्ताचित्तमिश्रमेदात्रिधा भवति, भावे प्रशस्ता प्रशस्त विवक्षायां ज्ञानादीनि प्रशस्तानि अप्रशस्तानि पोदशपदा ॥ ४०४ ॥ अथ सचित्तद्रव्योत्पादनमाहआसुमाइएहिं वालचियतुरंगबीयमाईहिं । सुयआसदुमाईणं उप्पायणया उ सच्चित्ता ॥ ४०५ ॥ सुताश्वमादीनां द्विपदचतुष्पदापदरूपाणां यथा सङ्घघमासूयादिभिरासूयं औपयाचितकं, आदिशब्दाद्भाटकजलादिपरिग्रहः, तथा बालचित्ततुरङ्गबीजादिभिस्तत्र वालै: - केशरोमादिभिश्रितो - व्याप्तः पुरुष इति यावत्तुरङ्गबीजे च प्रसिद्धे, तैर्या उत्पादनाद्वारे उत्पादनास्वरूपम् ।। ७५ ।। Page #191 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education उत्पादना, तथाहि - केनचिनिजभार्यायाः पुत्रासम्भवे देवताया औपयाचितकेन ऋतुकाले स्वसंप्रयोगेण च सुत उत्पाद्यते, तथा हि निजघोटिकायां भाटकप्रदानेन परघोटकमारोप्य तुरङ्ग उत्पाद्यते, तथा जलसेकेन बीजारोपणेन द्रुमवल्लयादिश्व, सा सचिद्रव्योत्पादना ॥ ४०५ ॥ अचित्तमिश्रद्रव्योत्पादने आह कणगरययाइयाणं जहट्ठधाउविहिया उ अच्चित्ता । मीसा उ सभंडाणं दुपयाइकया उ उप्पत्ती ॥४०६ कनकरजतादीनां यथेष्टधातुविहिता अचित्ता, तथा या द्विपदादीनां दासादीनां सभाण्डानां सालङ्कारादीनां वेतनप्रदानेनात्मीयत्वेनोत्पत्तिः कृता सा मिश्रा द्रव्योत्पादना || ४०६ || अथ भावोत्पादनामाहभावे पत्थ इयरो कोहाउपायणा उ अपसत्था । कोहाइजुया धायाइणं च नाणाइ उपसत्था भावे उत्पादना द्विविधा - प्रशस्ता इतरा च तत्र क्रोधादियुता धात्रीत्वादीनामुत्पादना साऽप्रशस्ता, ज्ञानादीनां च प्रशस्ता ।। ४०७ ।। इहाप्रशस्तयाऽधिकारः, सा च षोडशभेदाः, तानेवाहधाई दूइ निमित्ते आजीव वणीमगे तिमिच्छा य । कोहे माणे माया लोभे य हवंति दस एए ॥ ४०८ पिच्छा संथव विजा मंते य चुन्न जोगे य । उप्पायणाइ दोसा सोलसमे मूलकम्मे य ॥ ४०९ ॥ सुगमम् ।। ४०८-४०९ ।। अथ धात्रीदोषं प्रकटयन् पूर्वं धात्रीभेदानाह— खीरे यमज्जणे मंडणेय कीलावणंकधाई य । एक्केक्कावि य दुविहा करणे करावणे चैव ॥ ४१० ॥ उत्पादनायां अचिच मिश्रभावो त्पादनाः । Page #192 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयाबचूर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः । ॥ ७६ ॥ Jain Education Inter क्षीरे-स्तन्यपाने मज्जने मण्डने क्रीडापने अङ्के उत्सङ्गस (पु) त्रधारणे १ धात्रीशब्दः प्रत्येकं सम्बध्यते, एवं पश्चधा धात्री, एकैका पुनर्द्विधा स्यात् करणे कारणे च यथा क्वापि स्वयं स्वन्यं पाययति, काचिच्चान्यया पाययति ॥ ४१० ॥ अथ धात्रीशब्दनिष्पत्तिमाह धारेइ धीयए वा धयंति वा तमिति तेण धाई उ । जहविहवं आसि पुरा खीराई पंच धाईओ ||४११॥ धारयति बालकं धीयते भाटकदानेन धि ( धी) यते पोष्यते वा यद्वा धयन्ति - पिबन्ति बालकास्तामिति धात्री, ताश्च धान्यो यथा विभवं परा - पूर्वं क्षीरादिकाः पञ्च आसन् ॥ ४११ ॥ अथ साधोः स्तन्यदापनधात्रीत्वं वक्तिखीराहारो रोवइ मज्झ कयासाय देहि णं पिज्जे । पच्छा व मज्झ दाही अलं व भुज्जो व एहामि ॥ ४९२ ॥ कोsपि भिक्षागतो बालकं रुदन्तं दृष्ट्रा जननीमाह-अयं बालोऽद्यापि क्षीराहारो रोदिति तस्मान्मां कृताशाय शीघ्रं भिक्षां देहि पश्चादेनं बालकं स्तन्यं पायय, यद्वा मां पश्चाद्देहि, यद्वा अलं-पूर्ण मे सम्प्रति भिक्षया भूयोऽपि भिक्षार्थमहमेष्यामि ॥ ४१२ ।। तथा मइमं अरोगि दीहाउओ य होइ अविमाणिओ बालो । दुल्लभयं खु सुयमुहं पिज्जाहि अहं व से देमि ४१३ बालोऽविमानितो ऽनपमानितो मतिमानरोगी दीर्घायुश्च स्यात्, तथा 'दुर्लभं खलु लोके सुतमुखं', तस्मात् सर्वाण्यपि कर्माणि मुक्त्वा त्वमेनं बालकं स्तन्यं पायय, यदि त्वं न पाययसि तर्हि अहमस्मै क्षीरं ददामि ॥ ४१३ ॥ अत्र दोषमाह धात्रीशब्द व्युत्पत्तिः, भेदाः । ॥ ७६ ॥ Page #193 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अहिगरण भद्दपंता कम्मुदय गिलाणए य उड्डाहो। चडुकारी य अवन्नो नियगो अन्नं च णं संके॥४१४[ उत्पादयदि माता भद्रा तदाऽऽधाकर्माद्यधिकरणं करोति, अथ प्रान्ता तर्हि प्रद्वेषं च, अथ कम्र्मोदयाद्वालस्य ग्लानत्वे नायां उड्डाहः प्रवचनस्य, तथा चाटुकारीति लोकेऽवर्णः, तथा निजको-भर्चा अन्यद्वा-मैथुनादिकं णमित्यलङ्कारे, ताशसाधुवचन- ५ १धात्री, श्रवणतः शङ्कते-सम्भावयति ॥ ४१४ ।। दोषः। अयमवरोउ विकप्पो भिक्खायरिसड्ढि अद्धिई पुच्छा। दुक्खसहाय विभासा हियं मे धाइत्तणं अज्ज || वयगंडथुल्लतणुयत्तहिं तं पुच्छिउंअयाणंतो। तत्थ गओ तस्समक्खं भणाइ तं पासिउं बालं ॥४१६) अयमपरो विकल्पो धात्रीकरणे, यथा-भिक्षाचर्या प्रविष्टेन साधुना काचित आद्धिका अधृति-धृतिरहिता दृष्टा पृष्टा, तयोक्तं यो दुःखसहायो भवति तस्मै निवेद्यते, साधुराह-अहं सहायो दुःखस्येति, साऽऽह-अद्य मम धात्रीत्वं अमुकगृहे हृतं-स्फेटितं, साधुराह-मा विषादं कुर्विति, तथाऽभिनवस्थापिताया धाच्या वय:-तारुण्यं जरा वा, गण्डावपि-स्तनापरपर्यायौ कीदृशौ शरीरे किं किं स्थूलत्वं कृशत्वं वा अजानानः पृच्छति, तत एवं दृष्ट्वा तत्र बालसत्के गृहे गतस्तं बालकं दृष्टवा तत् समक्ष-गृहस्वाम्यादिप्रत्यक्ष भणति ॥ ४१५-४१६ ॥ किं तदित्याह अहुणुट्ठियं व अणविक्खियं व इणमं कुलं तु मन्नामि। पुन्नेहिं जहिताए ( जदिच्छाए ) तरई बालेण सूएमो ॥ ४१७ ॥ in Educe an intern Page #194 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयावर्युपेता घाच्या स्वरूपम्। श्री पिण्डनियुक्तिः। ॥७७॥ अहं मन्ये-इदं युष्मदीयं कुलं अधुनोत्थितं-सम्प्रत्येवेश्वरीभूतं, धात्रीलक्षणापरिज्ञानात्, यद्वा अनवेक्षितं-अपरिभावित महत्तरपुरुषः, तेन या वा सा वा धात्रीति, एतच्च बालेन दृष्टेन सूचयामो-लक्षयामः, यदीदृशं कुलं धरते (तरति)-क्षेमेण वर्तते । तन्मन्ये पुण्यैर्यदृच्छया एवमेव वेति ॥ ४१७ ।। साधुनेत्युक्ते जनको जननी वा पृच्छति, के दोषा धाच्या ? इति, साधुराहथेरी दुब्बलखीरा चिमिढो पेल्लियमुहो अइथणीए । तणुई उमंदखीरा कुप्परथणियाएँ सूइमुहो ॥४१८ स्थविरा धात्री दुर्बलक्षीरा अतिस्तनी-दीर्घस्तनोपेता तस्याः स्तन्यं पिवन स्तनेन प्रेरितमुखः-चम्पितमुखावयवोष्ठनासिकश्चिपिटिनासिको भवति, कशा तु मन्दक्षीरा, तथा या कर्पूरस्तनी तस्याः स्तन्यपाने वाला शूचीमुखो जायते ॥ ४१८ ॥ जा जेण होइ वन्नेण उक्कडा गरहए य तं तेणं । गरहइ समाण तिवं पसत्थमियरं च दुबन्नं ॥४१९॥ या नूतना येन वर्णेन उत्कटा भवति तां तेन वर्णन गर्हते, यथा "कृष्णा भ्रंशयति वर्ण, गौरी तु बलवर्जिता । तस्माच्छयामा भवेद्धात्री, बलवणः प्रशंसिता ॥१॥" इत्यादि, तथा यामभिनवस्थापितां गहते सा चेत् समानवर्णा तर्हि चिरन्तनी तीव्र-अतिशयेन प्रशस्तवर्णां इलाधते इतरां नवीनां दुर्वर्णां वेति ॥ ४१९ ॥ एवं प्रोक्त साधुना पुरातनी धारयति गृही नूनां त्यजति, ततः को दोष इत्याहउबट्टिया पओसं छोभग उब्भामओय से जंतु।होज्जा मज्झवि विग्यो विसाइ इयरी वि एमेव ॥४२०॥ उद्घर्त्तिता-निष्कासिता साधौ प्रद्वेषं करोति, तथा च सति छोमगं दद्यात् , यथाऽन्यसुद्धामको जारोऽनया धाच्या सह ॥७७॥ Jain Education Inter Irww.jainelibrary.org Page #195 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education I तिष्ठती 'ति से तस्य साधोर्यत् प्रद्वेषवशात् कर्त्तव्यम् बधादि तत् करोति, या चिरन्तनी सापि कदाचिदेवं चिन्तयेत्, यथैा तस्याधात्रीत्वनिरासः कृत एवमेव रूष्टे सति ममापि विघ्नो धात्रीत्व परित्याजनरूपः करिष्यतेऽनेनेति, एवं चिन्तयित्वा मारणाय विषादिकं प्रयुञ्जीत ।। ४२० ।। अथ शेषधात्रीदोषानाह एमेव सेसिया सुविसु माइसु करणकारणं सगिहे । इड्डीसुं धाईसु य तहेव य उवट्टियाण गमो ॥४२१ ॥ एवमेव क्षीरधात्रीवत् शेषाणामपि मञ्जनादिधात्रीणां सुतमातृकल्पानां स्वयं करणं कारणं चान्यया तत् स्वगृहे - बालगृहे गतः, साधुर्यथा करोति तथा वाच्यम्, दोषाश्च वक्तव्याः, तथा ऋद्धिषु ऋद्धिमत्सु ईश्वरगृहेषु अभिनवस्थापि तानां जनादिधात्रीणां धाईसु त्ति-धात्रीत्वेभ्य उद्वर्तितानां योग 'उव्वहिया पओसं' इत्यादिरूपः स सकलोऽपि तथैव ॥ ४२१ ।। अतिसङ्क्षिप्तमिदमिति विशेषमाह - otos महीऍ धूलीऍ गुंडिओ पहाणि अहव णं मज्जे । जलभीरु अबलनयणो अइउप्पिलणे अ रत्तच्छो । एष बालो मझां लोलति-लोटते ततो धूरया गुण्डितो वर्त्तते तस्मात् स्नापय, एतत् मञ्जनधात्रीत्वस्य कारणं, अथ त्वं न प्रपारयसि तदाऽहं स्नापयामि, एतत् स्वयं करणं, अथ नूत्नधात्रीदोषोद्भावनं पूर्वधाश्या निमन्त्रितो यथा करोति, तथाsse - अतिशयेनोप्लावनेन - प्रभूतजलप्लावनेन बालो गुरुजातो नद्यादौ जलप्रवेशे जलभीरुर्भवति, तथा निरन्तरजलेनोस्प्लाव्यमानोऽबलनयनोऽबलदृष्टिर्जायते रक्ताक्षय, यदि पुनः सर्वथा न मअते तर्हि शरीरं 'न' बलमादत्ते, एषा च धात्री धात्रीणां | दोषाः । Page #196 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयावचूर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः ॥ ७८ ॥ Jain Education Inte बालमतिबलोत्प्लावनेन मज्जयति, ततः पूर्वोक्ता दोषास्तस्मान्नैषा धात्री युक्ता, इत्युक्ते गृही नूत्नधात्रीं स्फेटयित्वा चिरन्तनीमेव कुरुते, तथा " उचट्टि " इत्यादि दोषाः, एवं सर्वत्र ॥ ४२२ ॥ अथ मज्जनधात्री कथंभूतं बालं मण्डनपात्र्याः समर्पयति तदाह अभंगिय संवाहिय उवट्टिय मजियं च तो बालं । उवणेइ मज्जधाई मंडणधाईऍ सुइदेहं ॥ ४२३ ॥ स्नेहेनाभ्यङ्गितं हस्ताभ्यां सम्बाधितं पिष्टकादिना उद्विर्तितं ततो मजितं बालं शुचीभूतदेहं कृत्वा मञ्जनधात्री मण्डनधात्र्याः समर्पयति ।। ४२३ ।। अथ मण्डनादिधात्रीत्वस्य करणाद्याह उआइएहिं मंडेहिं ताव णं अहव णं विभूसेमि । हत्थिच्चगा व पाए क्या गलिच्चा व पाए वा ॥ ४२४ ॥ ॥ इषु-इषुकाकारमाभरणं केsपि तिलकमिति, इत्यादिविभूषणैरेनं बालकं मण्डय, अथ त्वं न प्रपारयसि तदाहं विभूषयामि इति साधोः करणं कारणं च अथ दोषानाह - हस्तयोग्यानि आभरणानि पादे कृतानि गलसत्कानि पादे कृतानि, शेषं प्रागिव सर्वम् ।। ४२४ || अथ क्रीडनघाच्या दोषाद्याह ढड्डरसर छुन्नमुहो मउयगिरो मउयमम्मणुहावो । उल्लावणगाईहि व करेइ कारेइ वा किड्डुं ॥ ४२५ एषाऽभिनव क्रीडनात्री ढड्डूरस्वराः, ततस्तस्याः स्वरमाकर्ण्य बालो छुन्नमुखः - क्लीमुखो भवति, अथ (वा) मृदुगीर्यदि वा मृदुमन्मनो इत्यादि शेषं प्रागिव, तथा बालमुल्लापनादिभिः स्वयं क्रीडां कारयति जनन्या वा कारयति ।। ४२५ ।। धात्रीणां दोषाः । ॥ ७८ ॥ www.jairtelibrary.org Page #197 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अङ्कधाच्या दृष्टान्तः। अथाङ्कधात्रीदोषमाहथुल्लीऍ वियडपाओ भग्गकडीसुक्कडाए दुक्खं च । निम्मंसकक्खडकरहिं भीरुओ होइ घेप्पते ॥४२६॥ ___ स्थूलया-मांसलया कट्यां ध्रियमाणो बालो विकटपादो भवति, परस्परबह्वन्तरालचरण इत्यर्थः, भग्नकट्याः कव्यां वा दुःखं तिष्ठति, निर्मासकर्कशकराभ्यां ध्रियमाणो भीरुः स्यादिति, करणकारणादिस्वयमम्यूह्यम् ॥ ४२६ ॥ अथ धात्री. स्वस्य करणे दोषं दृष्टान्तेनाह (दृ० २८)कोल्लइरे वत्थवो दत्तो आहिंडओ भवे सीसो । अवहरइ धाइपिंडं अंगुलिजलणे य सादिवं ॥४२७॥ | कोल्लकिरे नगरे वा के श्रीसङ्गमस्थविराः, तैरन्यदा दुर्भिक्षे सिंहाभिधानः स्वशिष्य आचार्यपदे स्थापयित्वा सकलगच्छयुक्तः सुभिक्षे देशे प्रेषितः, स्वयं चैकाकी तत्र स्थितो यतनया, यतना चतुर्दा-द्रव्यक्षेत्रकालभावमेदाद , तत्र द्रव्यतः पीठफलकादिषु, क्षेत्रतो वसतिपाटकेषु, कालत एकत्र पाटके मासं स्थित्वा द्वितीयमासेऽन्यपाटके स्थिते, भावतः सर्वत्र निर्ममत्वं, ततश्च किश्चिने वर्षे शुद्धिनिमित्तं सिंहाचार्यप्रेषितो दत्तनामा शिष्यस्तत्रागतः, पूर्व यत्र मुक्तास्तत्रैव सूरयो दृष्टास्तेनामी भावतोऽपि मासकल्पं न कुर्वन्तीति न शिथिलैः सहैकत्र वासो युक्त इति बहिर्मण्डपिकायामुत्तीर्ण इति, ततो वन्दिता सूरयः, क्रमेण भिक्षार्थ सूरिभिः सहान्तप्रान्तकुलेषु प्रविवेश, नीरसभिक्षया विच्छायवदनमालोक्य सूरिरायगृहे गत्वा व्यन्तर्यधिष्ठितं बालं रुदन्तं चप्पुटिकावादनेन पूतनाव्यन्तरीमुक्तं विधाय गृहनायकं तोषयित्वा मोदकाना(न्) Jain Education P M For Private & Personel Use Only Bal wow.jainelibrary.org Page #198 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयावचूर्युपेता श्री पिण्डनिर्युक्तिः । ॥ ७९ ॥ Jain Education Inte दत्ताय दत्त ( दापित) वान्, हृष्टो दत्तः, संध्यायां च सूरिणोक्तं- आलोचय धात्रीपिण्डं चिकित्सापिण्डं च स प्राह- युष्माभिः सहा विहृतः, कथं मे दोषसङ्ग १ इति, चप्पुटिकया बालक्रीडनेन क्रीडनधात्रीपिण्डो, बालस्य पूतनाव्यन्तरीतो मोचितत्वाचिकित्सापिण्डरित्युक्ते सूरिभिः स चिन्तयति, अहो स्वयं सदैवमाहारं गृह्णाति, मम चैकदिनेऽप्यालोचनां दत्ते, ततः प्रद्वेषतो वसतेर्बहिः स्थितः, ततः सूरिगुणाऽऽवर्जितया देवतया तस्य शिक्षार्थं वसतावन्धकारं सवातं च वर्ष विकुर्वितं ततः स भयभीतः सूरीनाह - कुत्राहं व्रजामि, तैश्चातिनिर्मलैरभाणि वत्स ! एहि वसतौ प्रविशेति, दत्त आह-भगवन्न पश्यामि अन्धकारे द्वारमिति, ततोऽनुकम्पया श्लेष्मणा सूरिभिर्निजाङ्गुलिरुद्धृत्य ऊर्डीकृता, सा च दीपशिखेव ज्वलितं प्रवृत्ता, ततः दुरात्माऽचिन्तयत् - अहो एतस्य परिगृहे वह्निरप्यस्ति, एवं च चिन्तयन् देवतया ताडितः, सूरयः क्षामिता दत्तेन । सुगमं सूत्रम्, नवरं सादिव्वं देवताप्रातिहार्यम् ॥ ४२७ ॥ एतदेव गाथाद्वयेन भाष्यकृदाह ओमे संगमथेरा गच्छ विसज्जंति जंघबलहीणा । नवभाग खेत्त वसही दत्तस्स य आगमो ताहे ॥ भा० ३१ उवसयबाहिं ठाणं अन्नाउंछेण संकिलेसो य । पूयणचेडे मा रुय पडिलाभण वियडणा सम्मं ॥ भा०३२ एतच्च गाथाद्वयं व्याख्यातः प्राय एव, केवलं 'पूयणचेडे' ति, पूतना- दुष्टव्यन्तरी तथा गृहीते चेटे - बाले मा रोदीरिति विकटना-आलोचनम् ।। ३१-३२ ।। अथ दूतीद्वारमाह सग्गाम परग्गामे दुविहा दूई उ होइ नायव्वा । सा वा सो वा भणई भणइ व तं छन्नवयणेणं ॥ ४२८ ॥ अङ्कधात्र्यां दृष्टान्तः । ॥ ७९ ॥ Page #199 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दती द्विधा-स्वग्रामे परग्रामे च, सा चैकैका द्विधा-प्रकटा छन्ना च, तत्र सा तव माता स वा तव पिता एवं भणति- प्रतीमेदाः। एवं सन्देशं कथयति, सा प्रकटा, या तु तं सन्देशं छन्नवचनेन कथयति सा छन्ना ॥ ४२८॥ एतदेव व्यक्तमाहएकेक्कावि य दविहा पागड छन्नाय छन्न दुविहाउ। लोगुत्तरि तत्थेगाबीया पुण उभयपक्खेऽवि॥४२९ एकैका पुनर्विधा-प्रकटा छन्ना च, छन्ना पुनरपि द्विधा-एका लोकोत्तरे, सङ्घाटक साधोरपि, द्वितीयोभयपक्षेऽपि ॥४२९॥ अथोमयथां प्रकटां दुतीमाह| भिक्खाई वच्चंते अप्पाहणि नेइ खंतियाईणं। सा ते अमुगं माया सो व पिया ते इमं भणइ ॥४३०॥ मिक्षादौ व्रजन्-स्वग्रामे परग्रामे वा जनन्यादीनां अप्पाहणि-सन्देशं कथयति, सा ते माता स च ते पिता इदं भणति ॥ ४३०॥ अथ स्वग्रामे लोकोत्तरच्छन्नदूतीमाहदइत्तं खु गरहियं अप्पाहिउ बिइयपच्चया भणति । अविकोविया सुया तेजा आह इमं भणसुखंति॥ कोऽपि साधुः कस्याश्चित् पुत्रिकया सन्दिष्टो तीत्वं खलु गर्हितमिति चिन्तयित्वा द्वितीयप्रत्ययात्, मा मां सङ्घाटकसाधुर्दतीदोषदुष्टं ज्ञासीदिति भङ्गयन्तरेण भणति, यथा अविकोविदा जिनमतापण्डिता सा तव सुता, या आह-इदं भण | मदीयां जननीमिति, सापि द्वितीयसङ्घाटकसाधुचित्ताऽऽवर्जनार्थ भणति-वारयिष्यामि सुतां येनैवं पुनर्न सन्दिशति ॥४३१॥ अथ स्वग्रामे उभयपक्षच्छन्नतीमाह Jain Education T ina Page #200 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धमारत्नीयावच्युपेता श्री परनामदृत्यां दृष्टान्त:। पिण्ड नियुक्ति | उभयेऽवि य पच्छन्ना खंत ! कहिज्जाहि खंतियाएँ तुमं। तंतह संजायंति य तहेव अह तं करेजासि ॥ उभये-लोके लोकोत्तरे प्रच्छन्ना इयं, यथा-खन्तस्य खन्तिकाया वा त्वं कथय, यथा तद्विदितं विवक्षितं कार्य तथैव | सञ्जातं, अथ तत्तथैव कुर्यात् ॥ ४३२ ॥ अथ परग्रामप्रकटदूतीदोषं दृष्टान्तेनाहगामाण दोण्ह वेरंसेज्जायरि धूय तत्थ खंतस्स। वहपरिणय खंतऽज्झत्थ(प्पाहणं वणाए कए जुद्धं ॥ जामाइपुत्तपइमारणं च केण कहियंति जणवाओ। जामाइपुत्तपइमारएण खंतेण मे दिटुं॥ ४३४ ॥ (१०२९)विस्तीर्णग्रामगोकुलग्रामावासनौ, विस्तीर्णे धनदत्तकुटुम्बी, भार्या प्रियमतिः, पुत्री देवकी, तत्रैव सुन्दरेण परिणीता, देवक्याः पुत्रो बलिष्ठो, दुहिता रेवतिः, सा च गोकुलग्रामे परिणीता, प्रियमतिश्च मृता, धनदत्तश्चाचदीक्षो विहरँस्तत्रागत्य दुहितुर्गृहे वसतावस्थात् , तदा च द्वयोरपि ग्रामयोः परस्परं वैरं, विस्तीर्णग्रामवासिना लोकेन गोकुलग्रामो परिधाटी मूत्रिता, धनदत्तश्च साधुर्गोकुलग्रामे भिक्षार्थ चचाल, देवक्या भणितं, हे पितः! त्वया गोकुलग्रामे निजदौहित्र्या रेवत्या मत्सन्दिष्टं कथनीयं, तत्र धाट्यागमनमिति, साधुना तथैव कृतं, तया निजभर्तुः, तेन ग्रामलोकस्य कथिते सर्वोऽपि जनः सन्नद्धीभूयास्थात् , आगता घाटी, जातं युद्धं तत्र सुन्दरो बलिष्ठश्च धाटीमध्ये सङ्गमश्च रेवतीभर्चा गोकुलग्रामे त्रयोऽपि युद्धे मृताः, देवकी च पतिपुत्रजामातृमरणाद्विललाप, लोकैरुक्तं यदि गोकुले धाट्यागमनशुद्धि भवि- । ध्यत्तदाऽसबद्धत्वान्न कोऽपि युद्धमकरिष्यत् , परं केनापि दुरात्मना कथितं, तच्छ्रुत्वा सा सकोपा निजसन्दिष्टमेवाकथयत् , ॥८ ॥ Jain Education Intel For Private & Personel Use Only Page #201 -------------------------------------------------------------------------- ________________ निमित्तदोषः तत्र दृष्टान्तश्च। 2 साधुच लोके गहाँ प्राप । सूत्रं सुगमम् ॥ ४३३-४३४ ॥ अथ निमित्तद्वारमाहनियमा तिकालविसएऽवि निमित्ते छबिहे भवे दोसा। सज्जंतु वहमाणे आउभए तत्थिमं नायं ॥४३५॥ त्रिकालविषये लाभालामसुखदुःखजीवितमरणरूपे षड्विधेऽपि निमित्त दोषा भवन्ति, ते च केऽप्यात्मघातिनः, केऽप्युभयघातिन इति वर्तमाने निमित्ते सद्यः-तत्कालं परिविघातकारिणि, इदं ज्ञातं-दृष्टान्तः ॥ ४३५ ।। तदेवाहआकपिया निमित्तेण भोइणी भोइए चिरगयंमि । पुत्वभणिए कहं ते आगउ? रुट्टो य वडवाए॥४३६ (१०३०) कोऽपि ग्रामनायको निजमायाँ गृहे मुक्त्वा ग्रामान्तरे जगाम, सा च केनापि साधुना निमित्तेनाऽऽवर्जिता, तद् भर्ता च विमृष्टं यथा प्रच्छन्नवृत्याऽहं भार्या चेष्टितं विलोकयिष्ये, तया च साधोः सकाशाचदागर्म जात्वा परिजन: सर्वोऽपि तत्सन्मुखं प्रेषितो, दृष्टश्च साधुः, तत्र पृष्टा भार्या-कथं समागमनं त्वया ज्ञातमिति, साऽऽह-साधुर्निमित्तात् , ततस्तेन मणितमस्ति कोऽप्यन्योऽपि प्रत्ययः, साऽवक-यत् युष्माभिः सह पूर्व जल्पितं चेष्टितं यो वा स्वप्नो मया दृष्टो यश्च मम गुह्ये तिलकस्तत् सर्वमनेन सत्यमेवोक्तं, ततः स ईर्षया साधुमपृच्छत् , कथय भो साधो ! किमस्या वडवाया गर्भेऽ. स्तीति, साधुराह-पञ्चपुण्ड्रः किशोर इति, सोऽचिन्तयत्-यदीदं सत्यं भविष्यति तर्हि मद् भार्यामपतिलकादिकथनमपि सत्यमितरथा विरुद्धकर्मसमाचरीति विनिपातः, तत एवं विचिन्त्य वडवाया गर्भः पाटितः, पतितः पञ्चपुण्ड्र: किशोर इति, तद्दृष्ट्वा सञ्जातकोपोपशमः साधुमवादी , यदीदं न भवेत्तदा त्वमपि न भवेरिति । सूत्रं सुगमम् ॥ ४३६ ॥ Jain Education For Private & Personel Use Only Page #202 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा- रत्नीया- वर्युपेता श्रीपिण्डनियुक्ति आजीवद्वार तद्भेदाः जात्यादिलक्षणानि एतदेव गाथाद्वयेन भाष्यकृदाहदूरा भोयण एगागि आगओ परिणयस्स पच्चोणी । पुच्छा समणे कहणं साइयंकार सुमिणाई।भा०३३ कोवो वडवागब्भं च पुच्छिओ पंचपुंडमाइंसु फालणदिट्रेजइ नेव तो तुहं अवितहं कहवा॥भा०३४ सुगम, परं पच्चोणी-सन्मुखागमनं, साइयंकारिति-सप्रत्ययं स्वमादि, यदि वाऽनेन साधुना प्रत्ययकथनेनात्मनो वधः पारदारिकत्वं दूषणं च परिहृतं, कति पुनरेवंविधास्तस्मानिमित्तं साधुना वर्जनीयमिति ॥ ३३-३४ ॥ अथाजीवद्वारमाहजाई कुल गण कम्मे सिप्पे आजीवणा उपंचविहा। सूयाएँ असूयाएँ व अप्पाण कहेहि एकेके ॥४३७ जातिकुलगणकर्मशिल्पविषया पञ्चविधाजीवना, सा चैकैकस्मिन् भेदे द्विधा, सूचया असूचया वाऽऽत्मानं कथयति, तत्र सूचा-वचनभङ्गिविशेषेण कथनं, असूचा-स्फुटवचनेनेति ॥ ४३७ ॥ अथ जात्यादीनां लक्षणमाहजाईकुले विभासा गणो उ मल्लाइ कम्म किसिमाइ। तुलाइ सिप्पऽणावज्जगं च कम्मेयराऽऽवजं ॥४३८ ___जातिकुले विभाषा कार्या, यथा जातिर्बाह्मणादिका 'कुल'मुग्रादि, यद्वा मातृसमुत्था जातिः, पितृसमुत्थं कुलं, गणो-मल्लादिवृन्द, कर्म-कृष्यादि, शिल्पं-तूर्णादि तूर्णनं-सीवनमित्यादि, अथवा अनावर्जक-अप्रीत्युत्पादकं कर्म इतरत्त । आवर्जकं प्रीत्युत्पादकं शिल्पं, अन्ये वाहु:-अनाचार्योपदिष्टं कर्म, आचार्योपदिष्टं शिल्पमिति ॥ ४३८ ॥ अथ स्वजातिप्रकटनाद्यं यथा साधुः करोति तथाऽऽह ॥८॥ ॥८१॥ Jain Education in For Private & Personel Use Only 9. Page #203 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जातिकुलगणाजीवनस्वरूपम् । होमायवितहकरणे नजड जह सोत्तियस्स पुत्तोत्ति।वसिओ वेस गुरुकुले आयरियगुणे व सएड॥४३९ ___ कोऽपि ब्रामणगृहे साधुः प्रविष्टो द्विजपुत्रं होमादि कुर्वाणं दृष्ट्वाऽऽह-होमादिक्रियाणामवितथकरणेन एष ज्ञायते यथा श्रोत्रियस्य पुत्र इति, यदि वा एष गुरुकुले उषित इति ज्ञायते, अथवा सूचयति तव पुत्रोऽयमात्मन आचार्यगुणान् , ततो नियमादाचार्यो भविष्यतीति । तत एवमुक्त ब्रह्मक्रियापण्डितत्वादयं ब्राह्मण इति ज्ञाते स्वजातिपक्षपातश्चेदाधाकर्मादिदोषः प्रद्वेषश्चेद्वधादिर्वा, एतत् सूचया स्वजातिप्रकटनं, असूचा( चया) प्रकटनं यथाऽहं ब्राह्मण इति, एवं कुलादिष्वपि भावनीयम् ॥ ४३९ ।। एतदेवाहसम्ममसम्मा किरिया अणेण ऊणाऽहिया व विवरीया। समिहामंताहुइठाणजागकाले य घोसाई ४४० ___अथ विप्रगृहे एवं वक्ति अनेन त्वत्पुत्रेण सम्यगसम्यक् वा होमादिका क्रिया कृता, तत्रासम्यक् त्रिधा-ऊना अधिका विपरीता च, सम्यक समिधादीनाश्रित्य, तत्र समिधो-ऽश्वत्थादिवृक्षाणां शाखाखण्डानि, मन्त्राः, आहुतिरनौ घृतादेः, स्थानमुत्कुटादि, 'यागो'-ऽश्वमेधादिः, काला-प्रभातादिः, घोषाव उदात्तादयः, आदिशब्दात् इस्वदीर्घादिवर्णपरिग्रहः, इत्युक्ते पूर्ववदोषाः ॥ ४४० ॥ अथ कुलायुपजीवनमाहउग्गाइकुलेसुवि एमेव गणे मंडलप्पवेसाई । देउलदरिसणभासाउवणयणे दंडमाईया ॥ ४४१ ॥ जातिवदुग्रादिकुलेष्वपि ज्ञेयं, तथा गणे मण्डलप्रवेशादि प्रविष्टस्यैकस्य मल्लस्य यल्लम्यं भूखण्डं तन्मण्डलं, तत्र प्रव Jain Educationala For Private & Personel Use Only Page #204 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर्मशिल्प क्षमारत्नीयापचूर्युपेता स्वरूपं वनीपकद्वारश्च। श्री पिण्ड- नियुक्तिः। ॥८२॥ र्तमानस्य प्रतिद्वन्द्विनो मल्लस्य विधाताय यः प्रवेशस्तदादिः, आदिशब्दावीवाग्रहादिपरिग्रहः, तथा देवकुलदर्शनं-युद्धप्रवेशे चामुण्डा प्रतिमाप्रणमनं, भाषोपनयनं प्रतिमल्लाहानाय, तथा वचनदौकनं दण्डादिका-धरणिपातक्षिप्ताङ्कयुद्धप्रभृतयः, एतान् गणगृहे प्रविष्टस्तत्पुत्रस्य प्रशंसति, तथा च सति मल्लेन ज्ञायते. साधरयं मल्ल इति ज्ञाते प्रागिव दोषः ॥ ४४१ ॥ कम्मशिल्पयोराजीवनमाह कत्तरि पओअणावेक्खवत्थु बहुवित्थरेसु एमेव । कम्मेसु य सिप्पेसु य सम्ममसम्मेसु सूईयरा ४४२ ____ कर्मसु शिल्पेषु च एवमेव कुलादाविवोपजीवनं वक्तव्यम् , कथमित्याह-कर्तरि कर्मणां शिल्पानां च विधायके, प्रयोजनापेक्षेषु-भूमिविलिखनादिप्रयोजननिमिचं ध्रियमाणेषु हलादिषु वस्तुषु, बहुविस्तारेषु प्रभूतेषु सम्यक् असम्यगिति वा-शोभनान्यशोभनानि वा इति कथ्यमानेषु यदात्मनि कर्मणि शिल्पे वा ज्ञापनं तत्तयोरुपजीवनम् ॥ ४४२ ॥ अथ वनीपकद्वारमाहसमणे माहणि किवणे अतिहि साणे य होइ पंचमए । वणि जायणत्ति वणिओ पायप्पाणं वणेइत्ति॥ वनीपकः पश्चधा-श्रमणः ब्राह्मणः कृपणः अतिथिः श्वा च, तत्र वनीपक इति 'वनि रित्ययं चातुर्याचने 'वनु याचने' इति वचनात् , ततो वनुते प्रायो दायकसम्मतेषु श्रमणादिष्वात्मानं भक्तं दर्शयित्वा पिण्डं याचते इति, 'वणी उत्ति वनीपकः, औणादिक ईपकप्रत्ययः ।। ४४३ ॥ अथ मेदान्तरेणाहान्वर्थम् ॥८२ ॥ JainEducation in For Private Personal Use Only www.ainelibrary.org Page #205 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inte मयमाइवच्छगंपिव वणेइ आहारमाइलोभेणं । समणेसु माहणेसु य किविणाऽतिहिसाणभत्तेसु ॥४४४ मृतमातृकत्सकमिव गोपालकोऽन्यगवीति शेषः, आहारादिलो मेनात्मानं श्रमणत्राह्मणकृपणातिथिश्च भक्तेषु वनति तद्भक्तं दर्शयतीति वनीपकः ॥ ४४४ ॥ अथ श्रमणशब्दवाच्या ये तान् कथयति निग्गंथ सक्क तास गेरुय आजीव पंचहा समणा । तेसि परिवेसणाए लोभेण वणिज्ज को अप्पं ॥ ४४५ निर्ग्रन्थाः साधवः शाक्यास्तापसा गैरुका गैरुकरञ्जितवाससः परिव्राजका आजीवका - गोशालक शिष्या इति पञ्चधा श्रमणाः, एतेषां परिवेषणे - भोजनप्रदाने सति कोऽप्याहारादिलोमेन वनति - शाक्यादि भक्तमात्मानं दर्शयति तद्भक्तगृहिणः पुरत इति गम्यम् || ४४५ ।। इह प्रायः शाक्य गैरुका गृहिगृहेषु भुञ्जाना दृश्यन्ते, अतस्तानधिकृत्याह - भुंजंति चित्तकम्मं ठिया व कारुणिय दाणरुइणो वा । अवि कामगदहे सुवि न नस्लई किं पुण जईसु ? एते शाक्यादय एवं निश्चला भुञ्जते, यथा चित्रकर्म्मलिखिता इव, तथा परमकारुणिका एते दानरुचयश्च, अपि च कामगर्दमेष्वपि ब्राह्मणादिषु दत्तं न नश्यन्ति, किं पुनरमीषु शाक्यादिषु तस्मादेतेभ्यो दातव्यमिति ॥ ४४६ ।। अत्र दोषानाहमिच्छत्तथिरीकरणं उग्गमदोसा य तेसु वा गच्छे। चडुकारदिन्नदाणा पञ्च्चत्थिंग मा पुणो इंतु ॥४४७ शाक्यादिप्रशंसने मिथ्याच्चस्थिरीकरणं स्यात्, तथा शाक्यादिभक्तास्तद्गुणाकृष्टा आधाकम्मदि कुर्वन्ति, कदाचित् साधुवेषमपहाय तेषु शाक्यादिषु गच्छेत्, तथा लोके चटुकारिण एते जन्मान्तरेऽप्यदत्तदाना इति अवर्णवादः, यदि पुनः वनीपकस्वरूपं तत्करणे दोषाश्च । Page #206 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयावचूर्युपेता श्रीपिण्डनियुक्ति ॥८३॥ शाक्यादिभक्ताः प्रत्यर्थिकाः-प्रत्यनीका भवेयुस्ततः प्रद्वेषत इत्थं ब्रूयुर्मा पुनरत्र भवन्त आयान्विति ।। ४४७॥ अथ ब्रामण ब्राह्मणप्रशंसामाह कृपणालोयाणुग्गहकारिसु भूमीदेवेसु बहुफलं दाणं । अविनाम बंभबंधुसु किं पुण छक्कम्मनिरएसु ? ॥४४८ तिथिशुनकलोकानुग्रहकारिषु भूमिदेवेषु-ब्राह्मणेषु अपि नाम ब्रह्मबन्धुष्वपि-जातिमात्रब्राह्मणेष्वपि दान बहुफलं किं पुनः षट्- || प्रशंसा । कर्मनिरतेषु ।। ४४८ ॥ अथ कृपणभक्तानां पुरतो, यथा कृपणप्रशंसा स्यात्तथाऽऽहकिवणेसु दुम्मणेसु य अबंधवायंकजुंगियंगेसुं । पूयाहिजे लोए दाणपडागं हरइ दिंतो॥ ४४९ ॥ पूजितपूजको न कोऽपि कृपणादिभ्यो दत्ते, ततः कृपणेषु इष्टवियोगादिना दुर्मनस्सु अबान्धवेषु, तथा आतङ्को-ज्वरादिरोगस्तयुक्तेषु जुङ्गिताङ्गेषु-कर्तितहस्ताद्यवयवेषु निराकाङ्क्षतया ददन् अस्मिन् लोके दानपताका हरति-गृह्णाति ॥ ४४९ ॥ अथातिथिप्रशंसामाहपाएण देइ लोगो उवगारिसु परिचिएसुऽज्झुसिए वा। जो पुण अद्धाखिन्नं अतिहिं पूएइ तं दाणं ४५० प्रायेण लोक उपकारिषु परिचितेषु तथाऽध्युश्रिते-आश्रिते वा ददाति, यः पुनरध्वनि खिन्नमतिथिं पूजयति तदेव दानं जगति प्रशस्यमिति ।। ४५० ॥ अथ शुनकप्रशंसामाह-- अवि नाम होज सुलभो गोणाईणं तणाइ आहारो।छिच्छिक्कारहयाणं न हु सुलहो होइ सुणगाणं ४५१ ॥८३॥ Jain Education For Private & Personel Use Only Il Page #207 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वनीपर्क दोषाः। | केलासभवणा एए आगया गुज्झगा महिं । चरंति जक्खरूवणं पूयाऽपूया हियाऽहिया ॥ ४५२ ॥ अपि नाम गवादीनां तृणादिकमाहारः सुलभो भवेत् , पुनरेषां छिच्छिकारहतानां नैव सुलभः, तस्मादेतेभ्यो दीयतामिति, अपि च नैते श्वान: किन्तु गुह्यका-देवविशेषाः कैलासभवनादागत्य पृथिवीं यक्षरूपेण श्वाकृत्या चरन्ति, तत एतेषां पूजाऽपूजापि च यथासङ्खथं हिताऽहिता चेति ॥ ४५१-४५२ ।। अथ ब्राह्मणादि वनीपकत्वे दोषानाह- . एएण मज्झ भावो दिट्ठो लोए पणामहेजमि । एक्केके पुवुत्ता भद्दगपंताइणो दोसा ॥४५३॥ एतेन साधुना मदीयो भावो-भक्तत्वलक्षणो दृष्टो-ऽवगतो लोके-ब्राह्मणादौ कथंभूत इत्याह-प्रणामहार्य-प्रणामः-नमस्करणमपलक्षणत्वादानादि तेन हायें-आवर्जनीये, तत एकैकस्मिन् ब्राह्मणादिवनीपकत्वे पूर्वोक्ता भद्रकान्तादयो दोषा भावनीयाः ॥ ४५३ ।। साणग्रहणं काकादीनामुपलक्षणं तदेवाहएमेव कागमाई साणग्गहणेण सूइया होति । जो वा जमि पसत्तो वणइ तहिं पुटुंऽपुट्ठो वा ॥४५४ ___ एवमेव शुनकग्रहणेन काकादयः सूचिता भवन्ति, यो वा यत्र काकादौ प्रसक्तस्तत्र काकादिस्वरूपं पृष्टोऽपृष्टो वा वनति-प्रशंसाद्वारेणात्मानं भक्तं दर्शयति ॥ ४५४ ॥ दाणं न होई अफलं पत्तमपत्तेसु सन्निजुजंतं । इय विभणिए वि दोसा पसंसओ किं पुण अपत्ते? पात्रेष्वपात्रेषु वा सन्नियुज्यमानं दानं न भवत्यफलमिति भणिते दोषः, किं पुनरपात्राण्येव प्रशंसतः, तत्र सुतरां दोष Jain Eduell an For Private & Personel Use Only Page #208 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयावचूर्युपेता श्रीपिण्ड निर्युक्तिः ॥ ८४ ॥ Jain Education Internationa इति ।। ४५५ ।। अथ वनीपकद्वारानन्तरं चिकित्साद्वारमाह भइ य नाहं वेज्जो अहवाऽवि कहेइ अप्पणो किरियं । अहह्वावि विज्जयाए तिविह तिगिच्छा मुणेयवा ॥ चिकित्सा त्रिविधा-यथा रोगिणा प्रतीकारं पृष्टः साधुराह - नाहं वैद्य इत्येका, अथ ममाप्येवं व्याधिरासीत् स चामुकेनौषधेन शान्त इति द्वितीया, अथ वैद्यतया चिकित्सां करोतीति तृतीया ॥ ४५६ ॥ तत्राद्यां व्याख्यानयतिभिक्खाइ गओ रोगी किं विज्जोऽहंति पुच्छिओ भणइ । अत्थावत्तीऍ कया अबुहाणं बोहणा एवं ॥४५७ भिक्षादिनिमित्तं गतः सन् रोगिणा पृष्टः साधुर्भणति - किमहं वैद्य इति एवं चोक्ते अर्थापत्या अबुधानां वैद्यपा गत्वा चिकित्सा कार्यते, इत्यजानतां बोधना-ज्ञापना कृता भवति ।। ४५७ ।। अथ द्वितीयचिकित्सामाहएरिस चिय दुक्खं भेसजेण अमुगणे पडणं मे । सहसुपन्नं वं रुयं वारेमो अट्ठमाईहिं ॥ ४५८ ॥ ममेशमेव दुःखं अमुकेनौषधेन प्रगुणं - नष्टवेदनमभूत्, तथा सहसोत्पन्नं रोगं चामष्टमादिभिर्वारयाम इति ॥ ४५८ ॥ अथ तृतीयमाह - संसोधण संसमणं नियाणपरिवजणं च जं तत्थ । आगंतु धाउखोभे य आमाए कुणइ किरियं तु ॥ आगन्तुके धातुक्षोभे सूत्रत्वात् धातुक्षोभजे चामये यत् क्रियां करोति कथमित्याह - संशोधनं संशमनं - उपशमनं निदान - परिवर्जनं - रोगकारणप्रतिवर्जनमेषा तृतीया ।। ४५९ ।। अत्र दोषानाह चिकित्साद्वारे तद्भेद स्वरूपम् । ॥ ८४ ॥ Page #209 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education अस्संजमजोगाणं पसंधणं कायघाय अयगोलो । दुब्बलवग्घाहरणं अच्चुदये गिण्हणुाहे ॥ ४६०॥ असंयमयोगानां प्रसंधनं प्रसङ्गः, गृही तप्तायोगोलक इति तेन रुजा कृता कायघातश्च कृतो भवति । अत्र दुर्बलव्याघ्रदृष्टान्तः - यथाऽटव्यां केनापि दुर्बलव्याघ्रोऽन्धोऽपि निरामयीकृतः, पूर्वं तस्यैव वैद्यस्य विधातं करोति, ततः शेषजीवानामिति, एवं गृही साधोः संयमात्मानं षट्कायाँश्च हन्ति, अथ कम्र्मोदयादतिरोगोदये राजकुलादौ ग्राहयति कोपावेशात्, तथा च प्रवचनोड्डाह इति ॥ ४६० ॥ अथ क्रोधादिद्वारचतुष्टयं विवक्षुः पूर्वं क्रोधादिपिण्डदृष्टान्तानां नगराणि कारणानि चाहहत्थकप गिरिफुल्लिय रायगिहं खलु तहेव चंपा य । कडघयपुन्ने इट्टग लड्डुग तह सीह के सरए ॥ ४६१ ॥ क्रोधादिपिण्डदृष्टान्तानां यथा क्रमं नगराणि - हस्तकल्पं गिरिपुष्पितं राजगृहं चंपा च तथाकृतान् घृतपुरानाश्रित्य क्रोधोत्पत्तिः, इट्टका - सेवकिका अलभमानस्य मानोत्पत्तिः, मोदकानाश्रित्य मायोत्पत्तिः, सिंहकेसरसंज्ञान् मोदकानाश्रित्य लोभोत्पत्तिः ॥ ४६१ ॥ अथ क्रोधपिण्डसम्भवमाह - विजातवप्पभावं रायकुले वाऽवि वल्लभत्तं से । नाउं ओरस्सबलं जो लब्भइ कोह पिंडो सो ॥४६२ ॥ साधोर्विद्यातपःप्रभावं राजकुले चापि तस्य वल्लभत्वं यद्वा औरस्यं बलं सहस्रयोधित्वादिकं ज्ञात्वा यः पिण्डो लभ्यतेगृहस्थेन दीयते स क्रोधपिण्ड इति ॥ ४६२ ॥ अन्नेसिं दिनमाणे जायंतो वा अलद्धिओ कुप्पे । कोहफलंमिऽवि दिट्ठे जो लब्भइ कोहपिंडो सो ॥ १५ वैद्ये कायघातः क्रोधादिनां नगरादीणि च । Page #210 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा क्रोपिण्डे रत्नीया वर्युपेता श्री. पिण्ड नियुक्ति ॥८५॥ अन्येभ्यो दीयमाने याचमानोऽप्यलब्धिमान् साधु: कुप्येत, क्रोधफले च शापादिके दृष्टे यः पिण्डो लभ्यते स क्रोधपिण्ड इति ॥ ४६३ ॥ दृष्टान्तमाह-(१० ) करडयभचमलद्धं अन्नहिं दाहित्थ एव वच्चंतो। थेरो भोयण तइए आइक्खण खामणा दाणे ॥४६४॥ हस्तकल्पे नगरे ब्राह्मणगृहे मृतकमक्ते मासिके दीयमाने मासपारणे कोऽपि साधुरायातो घृतपुरान् ब्राह्मणेभ्यो दीयमानान् दृष्ट्वा दौवारिकेण प्रतिषिद्धोऽवादीत् 'अन्नहिं दाहित्य'त्ति, अस्मिन् मासिके न दत्त (लब्ध) परमन्यस्मिन् मासिके दास्यथेति, एवमुक्त्वा गतो, दैवयोगात् स्तोकदिनमध्ये तद्गृहेऽज्यन्मानुषं मृतं, तन्मासिके एस एव साधुरागतस्तथैव निषिद्धो ' अन्नहिं दाहित्थ 'त्ति प्रोचे, तृतीयमासिकेऽपि तथोक्ते स्थविरदौवारिकेण चिन्ततं, अस्य शापान्मनुष्यद्वयमृतं, सम्प्रति तृतीया वेला, ततो मा कोऽपि म्रियतामिति जातानुकम्पेन गृहनायकाय सर्व निवेदितं, गृहिणा च साधवे यथेच्छ घृतपुरादिद, स क्रोधपिण्डः । सूत्रं सुगम, नवरं करडकमक्तं-मृतकभोजनमिति ॥ ४६४ ॥ अथ मानपिण्डसम्भवमाहओच्छाहिओ परेण व लद्धिपसंसाहिं वा समुत्तइओ। अवमाणिओ परेण य जो एसइ माणपिंडोसो॥ परेणोत्साहितस्त्वमेवात्र कार्य समर्थ इति लब्धिप्रशंसाम्यां वा समुत्तइओ-गर्वितः परेण वा अपमानितो न त्वया | किमपि लभ्यते इति, तंतो मानाद्य एषयति पिण्डं स मानपिण्डः॥ ४६५ ॥ अत्र गाथाऽष्टकेन दृष्टान्तमाहइदृगछणमि परिपिंडियाण उल्लाव कोणुहु पगेव । आणिज इट्टगाओ ? खुड्डो पञ्चाह आणेमि ॥४६६॥ Jain Education Intem on For Private Personel Use Only Page #211 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जइवि य ताऽपजत्ता अगुलघयाहिं न ताहिं णो कजं । जारिसियाओइच्छह ता आणेमित्ति निक्खंतोमानपिण्डे ओहासिय पडिसिद्धो भणइ अगारिं अवस्सिमा मज्झं। जइ लहसि तो तं मे नासाए कुणसु मोयंति दृष्टान्तः । [सा आह]॥४६८॥ कस्स घर पुच्छिऊणं परिसाए अमुउकइरोपुच्छित्तु।किं तेणऽम्हे जायसुसो किविणो दाहिइन तुज्झ॥d दाहित्ति तेण भणिए जइ न भवसि छहमसि पुरिसाणं । अन्नयरोतो तेऽहं परिसामझमि पणयामि॥ सेयंगुलि बगुड्डावे किंकरे पहायए तहा । गिद्धावरंखि हद्दन्नए य पुरिसाहमा छाउ ॥ ४७१ ॥ जायसुन एरितोऽहं इट्टगा देहि पुबमइगंतुं । माला उत्तारि गुलं भोएमि दिएत्ति आरूढा ॥४७२॥ | सिइअवणण पडिलाभण दिस्सियरी बोलमंगुली नासं। दुण्हेगयरपओसो आयविवत्तीय उड्डाहो॥४७३/ (द. )गिरिपुष्पितपुरे सिंहसूरयः सपरिवारा आगताः, अन्यदा तत्र पौरुष्यनन्तरं तरुणश्रमणानामन्योऽन्योल्लापे केनाप्यूचे-प्रातः सेवकिकाः क आनेष्यति', तत्र गुणचन्द्रक्षुल्लेनोचे-अहमानयिष्यामि, अन्यसाधुनोक्तं-यदि ताः सर्वसाधू. नामपरिपूर्णा अगुडघृताश्च तदा ताभिने प्रयोजनम् , क्षुल्ल आह-यादृशीस्त्वमिच्छसि तादृशीरानेष्यामि, एवं प्रतिज्ञा कृत्वा | नान्दीपात्रमादाय भिक्षार्थ जगाम, कौटुम्बिकगृहे दृष्टाः सेवकिका घृतगुडादीनि च, सुलोचनाभिधा गृहिणी याचिता, तया For Private Personal Use Only Page #212 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मानपिण्डे दृष्टान्ते धमारत्नीयावचूर्युपेता श्रीपिण्डनियुक्तिः। ॥८६॥ | स्वरूपम्। प्रतिषिद्धे जातामर्षेण क्षुल्लकेनोचे-मयाऽवश्यं गृहीतव्याः सेवकिकाः, तया सकोपयोचे यदि त्वमेतासां सेवकिकानां किमपि लमसे ततो मे नासापुटे त्वया प्रश्रवणं कृतमिति, क्षुल्लो गृहानिर्गत्य कस्यापि पार्श्वे कस्येदं गृहमिति पप्रच्छ, सोऽवादीतविष्णुमित्रस्य, पुनः क्षुल्ल आह-स इदानी व वर्त्तते १, तेनोचे-पर्षदि, क्षुल्लस्तत्र गत्वा पर्षजनान् पृष्टवान् भो-भवतां मध्ये को विष्णुमित्र इति !, जनरुक्तं-किं कार्य ?, क्षुल्ल आह-किमपि याचिष्ये, स च प्रायः सर्वेषां भगिनीपतिरिति सहासं तैरवाचि, कृपणोऽयं न ते किमपि दास्यति तस्मादस्मानेव याचस्व, विष्णुमित्रो-मा मेऽपभ्राजना स्यादित्याह-सोऽहं याचस्व मां किमपीति, नैते सत्यवादिनः, क्षुल्ल आह-याचेऽहं यदि महेलाप्रधानानां षण्णां पुरुषाणामन्यतमो न भवसि, ततः सभ्या आहुः-के ते षट् ?, क्षुल्ल आह-श्वेताङ्गुलिः, यथा-क्काप्येक पुरुषो मार्याच्छन्दानुवर्ती प्रातर्भोजनं याचते, सा वदति ममालस्यमस्ति समाकर्ष चुल्ल्याभस्म प्रक्षिपान्यगृहादानीय वह्निं यावत् पक्त्वा कथयाऽहं , ततः परिवेषयामि, ततो लोकेन प्रातर्भस्माकर्षणात् श्वेताङ्गुलिदर्शनात्तदाख्यानश्चक्रेऽयं प्रथमः१। तथा बकोड्डायको, यथा-क्वापि कोऽपि ना भार्यादेशेन जलानयनं करोति, परं जनापवादात्पश्चिमरात्राविति, तस्य पदसश्चारादिना वका उत्थायोड्डीयन्ते पालिरक्षेभ्यो लोकैख़ते तनाम कृतं २। तथा किङ्करः-प्रियायाः सर्वकार्यकारित्वाल्लोकैस्तन्नाम कृतम् ३ । स्नायको, यथा-कोऽपि स्नानार्थी स्वयं जलः | मुष्णं कुरु तैलेनाभ्यङ्गयात्मानं इत्यायुक्तस्तथा करोति, तेन लोकेन तन्नाम कृतम् ४ । गृध्र इव रिडी, यथा-कोऽपि भोजनसमये प्रियया सह नोपविष्टया कथ्यते-समानय स्थालं, यथा परिवेषयामि, यावत्तकशाकाद्युत्थायागच्छ गृहीत्वा स्वस्थाने भुङ्क्षवेति भणितस्तथैव करोति, ततः सगृध्र इव उत्कटको रिंखन् यातीति तन्नाम कृतं लोकः ५। हदज्ञो, यथा-कस्यापि भार्या ॥८६॥ Jain Education Intem For Private & Personel Use Only W ww.jainelibrary.org Page #213 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | मानपिण्डे हाष्टन्तः। देशकारिणः पुत्रो जातः, स च पालनके स्थितः पुरीषं मुश्चति, तया च मर्चा मण्यते-बालस्य पुते क्षालय यावद्वस्त्राणि पालनकं च, स च सर्व करोति, ततो लोकैहदस्य प्रक्षालनं जानातीति तन्नाम कृतम् ६ । इत्युक्ते क्षुल्लेन पर्षजनैः सहासमयं ताडगेवेत्यूचे विष्णुमित्रोऽवादीव-नाहं पण्णां पुरुषाणां समानस्तस्माद्याचस्व मामिति, क्षुल्लेनेष्टं याचितं, तेनोक्तं ददामि, ततः क्षुल्लेन सह यावनिजगृहद्वारमायातस्तावन्निजपूर्वगमनमार्याप्रतिज्ञादिकं कथितं, ततो विष्णुमित्रः प्राह-यद्येवं तर्हि क्षणमात्रं गृहद्वारे तिष्ठ, पश्चादाकारयिष्यामि, तथा कृत्वा गृहमध्ये प्रविश्य सेवकिकादिकं निभाल्य भार्यायाः कथितम्-सर्व मव्यं परं गुडःम्तोको, ततो मालादानय गुडं येन द्विजान् भोजयामीत्युक्ता सा मालमारूढा, अपनीता तेन निःश्रेणिः, क्षुल्लकमाकार्य पात्रभरणप्रमाणेन दातुमारब्धं, सुलोचना गुडमादाय वलिता निःश्रेणिमदृष्ट्वा विलोकयन्ती क्षुल्लाय सेवकिकादि दीयमानं विभाव्य गाढशब्देन-माऽस्मै देही देहीत्युवाच, क्षुल्लकोऽपि तत सन्मुखमालोक्य मया तव नासापुटे मूत्रितमिति निजनासापुटे अङ्गुल्यभिनयेन दर्शयति, पात्रं भृत्वा निजवसतौ जगामेति । सूत्रं सुगमम् , नवरं इदृगछणंमि-सेवविकाक्षणे, पगेवेति-प्रभाते एव, मोयंति-मत्रणं प्रणयामीति-याचे, सिइअवणणत्ति-निःश्रेण्यपनयन, इत्थंभूतश्च मानपिण्डो न ग्राह्यः, यतो द्वयोरपि दम्पत्योः प्रद्वेषो भवति, ततस्तव्यान्यद्रव्यव्यवच्छेदः, कदाचिदेकतरस्य तथापि स एव दोषः, अथ सैवमप्यपमानिता कदाचिदात्मविपत्तिं कुर्यात् , तत उड्डाहः॥ ४६६-४७३ ॥ अथ मायापिण्डदृष्टान्तमाहरायगिहे धम्मरुई असाडभूई य खुडओ तस्स। रायनडगेहपविसण संभोइय मोयए लंभो ॥४८४॥ Jain Education, T Page #214 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयावर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः । 1169 11 Jain Education Inter आयरियउवज्झाए संघाडगकाणखुज्जतद्दोसी । नडपासणपज्जत्तं निकायण दिने दिने दाणं ॥ ४७५॥ धूयदुए संदेसो दाणसिणेह करणं रहे गहणं । लिंगं मुयत्ति गुरुसिटु विवाहे उत्तमा पई ॥४७६ ॥ रायघरे य कयाई निम्महिलं नाडगं तडागत्था । ता य विहरंति मत्ता उवरि गिहे दोवि पासुत्ता॥४७७॥ वाघाण नियतो दिस्स विचेला विराग संबोही । इंगियनाए पुच्छा पजीवणं रटुवालंमि ॥४७८ ॥ इक्खागवंस भरहो आयंसघरे य केवलालोओ। हाराइखिवण गहणं उवसग्गन सो नियत्तोत्ति ॥ ४७९ ॥ तेण समं पवइया पंच नरसयत्ति नाडए डहणं । गेलन्न खमग पाहुण थेरा दिट्ठा य बीयं तु ॥ ४८० ॥ (० ) राजगृहे सिंहरथो राजा, विश्वकर्मा नटः, तस्य द्वे दुहितरौ सुरूपे, अन्यदा धर्मरूचिरयस्तत्रागताः, तेषां शिष्यः प्रज्ञानिधिराषाढभूतिः, स भिक्षार्थमटन् विश्वकर्म्मणो नटस्य गृहे प्रविष्टस्तत्र च लब्धमोदकः द्वारे निर्गत्य तेन चिन्तितंसूरीणामेष भविष्यतीत्यात्मार्थं रूपपरावर्त्तने नान्यं मोदकं याचयामीति, काणरूपं कृत्वा पुनः प्रविष्टो लब्धो द्वितीयो मोदकः, एवमुपाध्यायसङ्घाटक साधुचिन्तायां यथाक्रमं कुब्जकुष्ठरूपे विधाय लब्धाश्चत्वारो मोदकाः, तच्च रूपपरावर्त्तन करणं मालोपरि स्थितेन विश्वकर्म्मणा दृष्टम् चिन्तितं चायं भव्यो नटो भवति, परं कथमपि सङ्गृहीतव्य इति चिन्तयतो बुद्धिरुत्पन्ना - दुहितृभ्यां क्षोभ्य इति, ततो मालादुत्तीर्य सादरं साधुमोदकैः प्रतिलाभितः भणितश्च भगवन् ! अस्माकं दिवसे मायापिण्ड आषाढ श्रुति दृष्टान्तः । ॥ ८७ ॥ Page #215 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आषाढभुतिदृष्टान्तः। (गृहे)प्रतिदिवसमागन्तव्यं, ततो गतः स्वीपाश्रयमापाढभूतिः, विश्वकर्मणा साधुस्वरूपं कुटुम्बस्य कथितं, दुहितरौ च शिक्षितेयथा भवदायत्तो भवति तथाऽवर्जनीयः साधुरिति, अथ सदागमनेनाषाढभूतेस्ताभ्यां मनाक्षोभश्चके, प्रोक्तं च परिणीयास्मान भोगान भुक्ष्वेति, अत्रान्तरे चारित्रावरणकर्मणा गलितगुरूपदेशः साधुराह-मव्यं, परं गुरुसमीपे लिङ्गं विमुच्य समागच्छामि, इत्युक्त्वा गतो गुरुसमीपे,-"दीहरसीले परिपालिऊण विसएसु वच्छ ! मा रमसु । को गोपयम्मि बड़ा उयहि तरिऊण बाहाहि ॥१॥" इत्यादि वाक्यगुरुभिः शिष्यमाणोऽपि निजकम्मेणा चित्तपरावर्त कथयन् लिङ्ग मुक्त्वा पश्चातकृतपादचारो-कथमेतेषां गुरूणां सेवा पुनः प्राप्स्यामीती चिन्तयन् नटगृहं गतो, विश्वकर्मा प्राह-महाभाग ! तवायत्ते द्वेऽप्यम कन्यके, ततो द्वेऽपि परिणीते, नटेनोक्तं य इदानीमपि गुरुं स्मरति, स उत्तमस्तत एतश्चित्तावर्जनार्थ नित्यं मद्यपानरहिताभिभवतीभिर्भाव्यमिति, आषाढभूतिश्च स्वकलया नटानामग्रणीर्जातः, लमते च सर्वत्र प्रभृतं द्रव्यादि, अन्यदा राजा समादिष्टा नटा:-अद्य निर्महेलनाटकं कार्यमिति, सर्वेऽपि नटाः स्वां स्वां युवति .गृहे मुक्त्वा राजकुलं गताः, आषाढभृतिभार्याम्यामपि निःशकत्वादासवपानं चक्रे, तेन विगतचेतने विवस्ने द्वितीयभूमौ सुप्ते तिष्ठतः, अथ राज्ञः परराष्ट्रदतागमनादनवसरे नटानां पश्चादागमनं जातं, आषाढभूतिः स्वभार्ये तथाविधे दृष्ट्वा विरक्तोऽहो मे मृढतेति निर्गतो गृहाद, दृष्टो विश्वकर्मणा, ज्ञात इङ्गितादिभिः, ततः सत्वरं निजदुहितरावुत्थाप्य निर्भर्त्सयति, प्रोक्तश्च-अथ यदि निर्वर्तयितुं शक्नुथ तर्हि निवर्तयेथा, नो चेत् प्रजीवनं याचवमिति, ततस्ताम्यां संवृत्तात्मभ्यां बहुक्तोऽपि यावन्न रज्यते तावत्ताभ्यामूचे-यद्येवं तर्हि प्रजीवनं देहि, येन पश्चादपि युष्मत् प्रसादेन जीवामः, तत एवं भवत्विति दाक्षिण्यानिवृत्तः, ततः कृतं भरतचक्रवर्तिचरित in Educati o nal For Private Personal Use Only Page #216 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयावचूर्युपेता श्री. पिण्डनिर्युक्तिः । ॥ ८८ ॥ Jain Education Inte प्रकाशकं राष्ट्रपालं नाम नाटकं, ततो विज्ञप्तो विश्वकर्म्मणा सिंहरथो राजा, देव ! आषाढभूतिना राष्ट्रपालं नाम नाटकं कृतम्, परं तत्र राजपुत्रपश्ञ्चशतैराभरण विभूषितैः प्रयोजनं, ततो राज्ञा दत्तानि राजपुत्राणां पञ्चशतानि यथाऽयमाषाढभूतिना शिक्षितानि ततः प्रारब्धं नाटकं नर्त्तितुं तत्रापाढभूतिरात्मना भरतो जातो, राजपुत्राश्च सामन्तादयः, तत्र यथा भरतेन पट्खण्डं भरतं प्रसाधितं चतुर्दश रत्नानि नव निधयः प्राप्ता यथा चाssदर्शगृहे केवलं यथा पश्चशतपरिवारेण सह प्रव्रज्यों, तत् सर्वमप्यभिनीयते, ततो राज्ञा लोकेनापि तुष्टेन हारकुण्डलस्वर्णादि प्रभूतं दत्तं, ततः सर्वजनानां धर्म्मलाभं प्रदाय पञ्चशतपरिवार आषाढभूतिर्गन्तुं प्रावर्त्तत, किमेतदिति राज्ञा निवारिते प्राह-किं भरतो दीक्षामादाय निवृत्तो येनाहं निवर्त्ते इति, गतः सपरिवारो गुरुसमीपं वस्त्राभरणादिकं च निजभार्याभ्यां दत्तवान्, तच्च प्रजीवनकं तयोर्जातं गृहीता दीक्षा, तदपि नाटकं विश्वकर्म्मणा कुसुमपुरे नर्त्तितुमारब्धं तत्रापि पञ्चशतसङ्ख्याः क्षत्रियाः प्रव्रज्यां गृहीतवन्तः, ततो लोकेन चिन्तितं एवं क्षत्रिया प्रव्रजन्तो निःक्षत्रियां पृथिवीं करिष्यन्तीति नाटकपुस्तकमनौ प्रवेशितम् । सूत्रं सुगमम् - नवरं ' रायनडगेपवेसणं 'ति, राजविदितो यो नटो विश्वकर्मा तस्य गृहे प्रवेशः, त्वग्दोषी - कुष्ठी, उपसर्गः -प्रत्रज्याग्रहणे निवारणं, दहनं नाटक पुस्तकस्य । अत्रैवापवादमाह – गेलन्नत्ति ग्लानो - मन्दः, क्षपको - मासक्षपकादिः प्राधूकः स्थविरः, आदिशब्दात् सङ्घकार्यादिपरिग्रहः, तेषामर्थाय द्वितीयमपवादपदं सेव्यते - मायापिण्डोऽपि ग्राह्यः ॥ ४७४४८० ॥ अथ लोभद्वारमाह लब्भंतंपि न गिण्हइ अन्नं अमुगंति अज्ज घेच्छामि। भद्दरसंति व काउंगिण्हइ खद्धं सिणिद्धाई ॥ ४८१ ॥ माया० आषा० दृष्टान्तः । | ॥ ८८ ॥ Page #217 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Internationa अद्याममुकं गृहीष्यामि सिंहकेसरादिकमिति बुद्ध्या अन्यद्वल्लादिकं लभ्यमानमपि यन्न गृह्णाति, किन्तु तदेव स लोभपिण्डः, अथवा लभ्यमानं खद्धं प्रचुरं स्निग्धादिभद्रकरसमिति कृत्वा यद् गृह्णाति स लोभपिण्डः ॥ ४८१ ॥ तत्र प्रथमभेदमाश्रित्योदाहरणं गाथाद्वयेनाह - ( ० > चंपा छमि घिच्छामि मोयए तेवि सीहकेसरए । पडिसेह धम्मलाभं काऊणं सीहकेसरए ॥४८२ ॥ सङ्कङ्करत्तकेसरभायण भरणं च पुच्छ पुरिमड्ढे । उवओग संत चोयण साहुत्ति विगिंचणे नाणं ॥ ४८३॥ चम्पापुर्यां सुव्रतसाधुः, मोदकोत्सवः, मया. सिंहकेसरा एव मोदका ग्राह्या इति सम्प्रधार्य भिक्षार्थं प्रविष्टो, लोलुपतयाsन्यत् प्रतिषेधेन सिंहकेसरा न लभमानः सार्द्धं प्रहरद्वयं यावत् परिभ्रमति, ततो न लब्धा मोदका इति, प्रनष्टचित्तो जातः, ततो गृहद्वारे प्रविशन् धर्मलाभस्थाने ' सिंहकेसरा' इति वदति, एवं सकलमपि दिनं भ्रान्त्या रात्रौ तथैव परिभ्रमन् प्रहरद्वयसमये श्रावकस्य गृहे प्रविवेश धर्म्मलाभस्थाने ' सिंहकेसरा' इत्युक्ते गीतार्थः श्रावकश्चिन्तयामास - नूनमयं सिंहकेसरार्थी अलब्धलाभश्च तेन चित्तविप्लुतवानिति सिंहकेसरभृतं भाजनमुपढौकितं भगवन् ! गृहाणेत्युक्ते साधुना गृहीताः, स्वस्थीभूतं चित्तं, श्रावकथाह - भगवन्नद्य मया पूर्वार्धः प्रत्याख्यातः, स किं पूर्णो न वेति, ततः सुव्रत उपयोगमृदुर्व दत्तवान् पश्यति गगनमण्डलमने कतारासहित मर्द्धरात्रोपलक्षितं, ततो भ्रममात्मीयं ज्ञात्वा स्वनिन्दन् - मो श्रावक ! भव्यं कृतं यदहं प्रतिबोधितः, एवं सतां नोदनेत्युक्त्वा विधिना मोदकान् परिस्थापयन् कथमपि तथा शुक्लध्यानेन घातिक लोभपिण्ड स्वरुपमुदा हरणश्च । Page #218 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा-1 रत्नीयावचूर्युपेता श्री. पिण्डनियुक्ति ॥८९॥ आणि स्फोटयामास, यथा प्राप केवलज्ञानम् । सूत्रं सुगमम् ॥ ४८२-४८३ ॥ अथ संस्तवद्वारमाह संस्तवद्वारं दुविहो उ संथवो खलु संबंधीवयणसंथवो चेव । एकेकोवि य दुविहो पुद्धिं पच्छा य नायवो ॥४८॥ तद्धेदाश्च । द्विविधः खलु संस्तवः-परिचयरूपः श्लाघारूपश्च, तत्र परिचयरूपा-सम्बन्धिसंस्तवः, इलाघारूपो-वचनसंस्तवः, एकैकोऽपि द्विधा-पूर्वसंस्तवः पश्चात्संस्तवश्च ।। ४८४ ॥ तत्र सम्बन्धिसंस्तवस्य द्विविधस्यापि स्वरूपमाहमायपिइ पुवसंथव सासूससुराइयाण पच्छा उ। गिहि संथवसंबंधं करेइ पुत्वं च पच्छा वा ॥४८५॥ मातापित्रादि पूर्वसंस्तवः, श्वश्रूश्वसुरादि पश्चात्संस्तवः, गृहिमिः सह संस्तवसम्बन्ध-परिचयघटनं पूर्वकालभाविनं पश्चात् कालमाविनं वा करोति यः साधुः ॥ ४८५ ।। कथमित्याहआयवयं च परवयं नाउं संबंधए तयणुरूवं । मम माया एरिसिया ससा व धूया व नत्ताई ॥४८६॥ साधुराहारलम्पटतया आत्मवयः परवयश्च ज्ञात्वा तदनुरूपं सम्बध्नाति, यदि सा वृद्धा स्वयं च मध्यमवयस्ततो। ममेदशी माताऽभूदिति ब्रूते, यद्यात्मतुल्यवयास्तदा ममेदृशी स्वसेति, लघुवयाश्चेत्तदा दुहिता नप्ता वेत्यादि । ४८६ ॥ अस्योदारणमाहअद्धिइ दिट्रिपण्हव पुच्छा कहणं ममेरिसी जणणी । थणखेवो संबंधो विहवासुण्हाइदाणंच ॥४८७॥ कोऽपि साधुनिजमातृसमां स्त्रियं वीक्ष्य मातृस्थानेनाधृत्या दृष्टिप्रश्नवं-ईषदश्रुविमोचनं करोति, ततः स्त्रीपृच्छायां साधोः Jain Education Intel For Private & Personel Use Only Page #219 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Educatio! कथनं मम ईदृशी जनन्यभूत् । अत्र दोषानाह तथा स्त्रिया मातृत्वप्रकटनार्थं साधुमुखे स्तनप्रक्षेपः क्रियते, सम्बन्धः परस्परं स्नेहरूपो जायते, तथा मृतपुत्रस्य स्थानेऽयं पुत्र इति विधवा स्नुपादि दानं करोति, एवं पश्चात्सम्बन्धि संस्तवोदाहरमपि खधियाऽभ्युह्यम् ॥ ४८७ ॥ तत्र दोषानाह - पच्छासंथवदोसा सासू विहवादिधूयदाणं च । भज्जा ममेरिसिश्चिय सज्जो घाउ वयभंगो वा ॥ ४८८ ॥ पश्चात्सम्बन्धिसंस्तवे इमे दोषाः श्वश्रूशी ममाभूदित्युक्ते सा विधवा सुताया दानं करोति, तथा भार्या ममेदृशी अभवदित्युक्ते यदीर्ष्यालुस्तद्धर्त्ता समीपे स्यात् तदा साधोघतं कुर्यात्, अथ भद्रकस्तर्हि स्त्री - भार्याऽहमनेन कल्पितेत्यनुरागं कुर्वाणा चित्राक्षोभमापादयेत्ततो व्रतभङ्गः ॥ ४८८ || प्रत्येकमभिधाय साधारणदोषानाह मायावी चडुयारी अम्हं ओहावणं कुणइ एसो । निच्छुभणाई पंतो करिज्ज भद्देसु पडिबंधो ॥४८९॥ अधृतिदृष्टिप्रश्नवादि कुर्वन् मायावी चटुकारी तथाऽस्माकं स्वस्य कार्यटिकप्रायस्य जनन्यादि कल्पनेनापभ्राजनं विधत्ते, एवं विचिन्त्य प्रान्तः स्वगृहनिष्काशनादि करोति, अथ भद्रकस्तर्हि प्रतिबन्धः स्नेहरूपस्तत आधा कम्र्मादिदोषाः ॥ ४८९ ॥ अथ वचनसंस्तवस्य पूर्वरूपस्य लक्षणमाह गुणसंथवेण पुर्व्विं संतासंतेण जो थुणिज्जाहि । दायारमादिनंमी सो पुविंसंथवो हवइ ॥ ४९० ॥ गुणसंस्तवेन-प्रशंसावचनरूपेण सत्येनासत्येन वा दातव्ये भक्तादावदत्ते पूर्व दातारं यः स्तूयात् स पूर्वसंस्तवः ||४९० || संबधि संस्तवे पूर्वपचा द्भाविनो दोषाः ॥ Page #220 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयाबचूर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः । ॥ ९० ॥ अस्यैवोल्लेखमाह एसोसो जस्स गुणा वियरंति अवारिया दस दिसासु । इहरा कहासु सुणिमो पच्चक्खं अज्ज दिट्ठोऽसि ॥ सुगमा ॥ ४९१ ॥ अथ पश्चाद्रूपवचनसंस्तवस्य लक्षणमाह गुणसंथवेण पच्छा संतासंतेण जो थुणिजाहि । दायारं दिनंमी सो पच्छासंथवो होइ ॥ ४९२ ॥ सुगम, नवरं दत्ते भक्तादाविति ॥ ४९२ ॥ अस्यैवोल्लेखमाह विमली कयम्ह चक्खू जहत्थया वियरिया गुणा तुज्झं । आसि पुरा मे संका संपय निस्संकियं जायं ॥ साधुक् लब्धे दातारं वक्ति यथा निजदर्शनेन त्वया विमलीकृते नश्चक्षुषी, तथा यथार्थाः स्तवगुणाः सर्वत्रापि चरिताः, तथा पूर्वं मम शङ्काऽभूत् किं सत्यमसत्यं वा श्रुतं गुणादिकमिति, सम्प्रति त्वयि दृष्टे निःशङ्कितं मे हृदयं जातम् ॥। ४९३ ॥ अथ विद्यामन्त्राख्यं द्वारद्वयमाह - विज्जामंतपरूवण विजाए भिक्खुवासओ होइ । मंतंमि सीसवेयण तत्थ मुरुंडेण दिट्टंतो ॥ ४९४ ॥ विद्यामन्त्रयोः प्ररूपणा कर्त्तव्या, सा चैवं ससाधना स्त्रीदेवतारूपा विद्या, असाधना पुरुषदेवताऽधिष्ठाता वा मन्त्रः, तत्र विद्यायां भिक्षूपासकदृष्टान्तः, मन्त्रे शिरोवेदनायां मुरुण्डेन राज्ञोपलक्षितः पादलिप्तसूरि : (गा. ४९८ ) ॥ ४९४ ॥ तत्र भिक्षूपासकदृष्टान्तं गाथाद्वयेनाह - पश्चाद्रूप वचन संस्तव लक्षणं विद्यामन्त्र | द्वारे च । ॥ ९० ॥ Page #221 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 4 विद्यापिण्ड उदाहरणं दोषाश्च । परिपिडियमुल्लावो अइपंतो भिक्खुवासओ दावे । जइ इच्छह अणुजाणह घयगुलवस्थाणि दावेमि ॥ गंतुं विज्जामंतण किं देमि? घयं गुलंच वत्थाई। दिन्ने पडिसाहरणं केण हियं केण मुट्ठोमि? ॥४९६॥ (६० ) गन्धसमृद्धनगरे धनदेवो भिक्षुपासकः, स च साधुभ्यो न किमपि ददाति, अन्यदा तरुणश्रमणानामन्योऽन्योल्लापे केनापि प्रतिपन्नमहं धनदेवाद् घृतगुडादिकमादास्ये, शेष साधुभिः साक्षेपमनुज्ञातो धनदेवगृहं गतः साधुः, धनदेवो विद्ययाऽभिमन्त्रितो बुते किं प्रयच्छामि ?, साधुसार्थे घना यतयः सन्ति, तैरुक्तं घृतगुडवस्त्रादि, ततो दापितं तेन संयतेभ्यः प्रचुरं घृतादिकं, ततः संहृता विद्या, जातस्वभावस्थो धनदेवस्ततो घृतादिस्तोकं दृष्ट्वा विलपितुं प्रवृत्तः, परिजनेनोक्तं युष्माभिरेव दापित संयतेभ्यस्ततो मौनमालम्ब्य स्थितः। गाथार्थः सुगम एव ॥ ४९५-४९६ ॥ अत्र दोषानाहपडिविज थंभणाई सो वा अन्नोव से करिजाहि। पावाजीवीमाई कम्मणगारी य गहणाई॥४९७॥ यो विद्ययाऽभिमन्त्रितः सोऽन्यो वा तत् पक्षपाती प्रद्विष्टः सन् प्रतिविद्यया स्तम्भनादि कुर्यात् , तथा पापाजीविनो मायिनः शठा इति लोके गर्दा, तथा कार्मणकारिण इमे इति राजकुले ग्रहणादि भवेदिति ॥ ४९७ ॥ मन्त्रे पादलितो. दाहरणमाहजह जह पएसिणी जाणुगंमि पालित्तओ भमाडेइ। तह तह सीसे वियणा पणस्सइ मुरुंडरायस्स ॥ (६० ) प्रतिष्ठानपुरे मुरण्डो राजा, पादलिताः सूरयः, अन्यदा राज्ञः शिरोवेदना जाता, न केनाप्युपशमयितुं Jain Education Inter For Private & Personel Use Only Tww.jainelibrary.org Page #222 -------------------------------------------------------------------------- ________________ NA मन्त्रपिण्ड उदाहरणं दोषाचूर्णादीनि द्वारानि च। पिण्ड धमा- शक्यते, आकारिता राज्ञा पादलिप्तसूरयस्ततो यथा लोको न जानीते तथा मन्त्रं ध्यायद्भिःप्रावरणमध्ये निजदक्षिणरत्नीया. I जानुशिरसि पार्श्वतो निजदाक्षिणहस्तप्रदेशिनी यथा २ भ्राम्यते तथा २ शिरोवेदनाऽपगच्छति राज्ञः, क्रमेण निरामयो वर्युपेता जातः भूपः सूरीणामुपासकत्वेन भक्तिं करोति ॥ ४९८ ॥ अत्र दोषानाहश्री. पा पडिमंतथंभणाई सो वा अन्नोव से करिजाहि । पावाजीवियमाई कम्मणगारी भवे बीयं ॥४९९ ॥ इह कथायां न कोऽपि दोषो जातः, परं कदापि स्यादिति कथनं, सूत्रं प्रागिव, केवलं पुष्टालम्बने द्वितीयमपवादपदं नियुक्तिः। भवेत् , एतच्च विद्यायामपि ज्ञेयम् ॥ ४९९ ॥ अथ चूर्णयोगमूलकाख्यं द्वारत्रयमाह चुन्ने अंतद्धाणे चाणके पायलेवणे जोगे। मूल विवाहे दो दंडिणी उ आयाण परिसाडे ॥५००॥ चूर्णेनान्तर्धानेऽदृष्टिकरणे चाणक्यविदितौ क्षुल्लौ निदर्शनम् , पादे-पादलेपनरूपे योगे समितसूरयः, तथा मूलकर्मणि अक्षतयोनिकरणरूपे युवतिद्वयं, विवाहविषयेऽपि मूलकर्माणि युवतिद्वयं, तथा गर्माधानपरिशाटरूपे मृलकर्मणि द्वे दण्डिन्यौ नृपपत्न्यौ उदाहरणम् ॥ ५०० ॥ अस्य भाष्यं, “चुन्ने अंतद्धाणे चाणक्के " इति व्याख्यानयति गाथात्रयेण| जंघाहीणा ओमे कुसुमपुरे सिस्सजोगरहकरणं । खुड्डदुगंजण सुणणा गमणं देसंतरे सरणं ॥भा०३५ भिक्खे परिहायंते थेराणं तसि ओमि दिताणं । सहभुज चंदगुत्ते ओमोयरियाए दोबल्लं॥भा० ३६ ॥ चाणक्क पुच्छ इहालचुण्णदारं पिहित्तु धूमे य । दटुं कुच्छपसंसा थेरसमीवे उवालंभो ॥ भा० ३७ ॥ ॥९॥ Jain Education Intem For Private & Personel Use Only ww.jainelibrary.org Page #223 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inter ( दृ० ) कुसुमपुरे चन्द्रगुप्तो राजा, मन्त्री चाणक्यः, तत्र जङ्घावल परिक्षीणाः सुस्थितामिधाः सूरयः, अन्यदा तत्र दुर्भिक्षमपतत्, ततः सूरिभिः समृद्धशिष्यः सुभिक्षदेशे प्रेषणाय सूरिपदे स्थापितः, विद्यामन्त्राद्येकान्ते तस्मै दातुमारब्धं, तत्र च क्षुल्लद्वयेनाहशी करणाजनव्याख्यानं श्रुतं, समृद्धसूरिर्गच्छसहितोऽन्यत्र जगाम, सूरयस्तत्र स्थिताः, अथ कतिपय दिवसैस्तत् क्षुल्लकयुगं गुरुस्नेहेन तत्र जगाम, गुरवो यत्किमपि भिक्षां लभन्ते तद्विभज्य क्षुल्लकद्वयेन सह भुञ्जते, तत आहारापूर्णतया सूरीणां दौर्बल्यमभवत्, ततः क्षुल्लद्वयेनाअनादृष्टत्वेन चन्द्रगुप्तेन सह भुजते, राज्ञः कशत्वमजायत, चाणक्यपृच्छायां राजाऽऽह - परिपूर्णाहारालाभ इति, ततञ्चाणक्येनानुमानेन ज्ञात्वाऽञ्जनसिद्धपरिज्ञानाय भोजनमण्डपेऽतीव श्लक्ष्ण इष्टकाचूर्णो विकीर्णो, दृष्टानि मनुष्यपदानि ततोऽन्यदिने भोजनवेलायां द्वारं पिधाय मध्येऽतिधूमश्चक्रे, तेनाञ्जनं नयना - श्रुभिः सह गलितं प्रत्यक्षौ जातौ क्षुल्लकौ कृता चन्द्रगुप्तेनात्मजुगुप्सा विटालितोऽहमाम्यामिति, मन्त्रिणा चित्तसमाध्यर्थं प्रशंसितो राजा, धन्यस्त्वं यो बालब्रह्मचारिभिः सह युक्त इत्यादिना, ततो वन्दित्वा मुत्कलितौ क्षुल्लो, मन्त्रिणा रात्रौ समेत्य सूरय उपालब्धास्तैः स एवोपलब्धो, यथा-त्वमेवात्रापराधकारी यनिर्वाहं क्षुल्लयोर्न करोषीति १, स प्राह-मगवन्नेवमिति, क्षामिताः पादयोगित्वा सूरयः सकलसङ्घस्य यथायोग्यं चिन्ता कृता मन्त्रिणा। सूत्रं सुगमम् ।। ३५-३७ ॥ अत्र दोषानाहजे विज्जमंतदोसा ते चिय वसिकरणमाइ चुन्नेहिं । एगमणेगपओसं कुज्जा पत्थारओ वावि ।। ५०१ ॥ सुगमा, परं एकस्यानेकेषां वा साधूनामुपरि प्रद्वेषं कुर्यात्, पत्थारओ-नाशो वा भवेदिति, अपि समुच्चये ॥ ५०१ ॥ अथ " पायलेवणे (गा. ५०० ) "त्ति व्याख्यानयति - चूर्णे दृष्टान्त दोषाश्च । Page #224 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयावर्युपेता योगपूर्णादिस्वरूपं | पादलेपे चोदाहरणं। श्री पिण्ड नियुक्तिः सुभगदुब्भग्गकरा जोगा आहारिमा य इयरे य । आघसधूवयासा पायपलेवाइणो इयरे॥५०२॥ सौभाग्यदौर्भाग्यकरा योगा द्विधा-आहार्या इतरे च, तत्राद्या आघर्षधृपवासा, ये पानीयादिना घर्षयित्वा पीयन्ते ते आघर्षाः, धूपवासाः प्रतीताः, अथ चूर्णवासयोः को विशेष ? इत्याह-सामान्यद्रव्यनिष्पन्नक्षोदचूर्णः, सुगन्धद्रव्यनिष्पन्नाः शुष्कपेषं पिष्टवासा इति, इतरे चानाहार्याः पादप्रलेपनादयः॥५०२॥ अथानाहार्यरूपस्य योगस्य पादप्रलेपनरूपस्य योगस्य दृष्टान्तं गाथात्रयेणाहनइकण्हबिन्न दीवे पंचसया तावसाण निवसति । पचदिवसेसु कुलवई पालेवुत्तार सकारे ॥ ५०३ ॥ जण सावगाण खिंसण समियक्खण माइठाण लेवेण। सावय पयत्तकरणं अविणय लोए चलणधोए॥ पडिलाभिय वच्चंता निब्बुड नइकूल मिलण समियाओ। विम्हिय पंचसया तावसाण पवज साहाय॥ (१० ) अचलपुरप्रत्यासन्ने द्वे नद्यौ, कृष्णा वेन्ना च, तयोरन्तराले ब्रह्मनामा द्वीपः, तत्र चैकोनपञ्चाशत्तापसयुतो देवशर्मा कुलपतिः परिवसति, स च संक्रान्त्यादिपर्वसु स्वतीर्थप्रभुत्वार्थ सपरिवारः पादप्रलेपनेन कृष्णा नदीमुत्तीर्य अचलपुरमागच्छति, चमत्कृतो लोकः सत्कारं करोति, श्रावकजनाश्च कुत्सयते-'न कोऽपि सातिशयो भवन्मत' इति, ततः श्राद्धः समितसूरीणामाख्यायि, तैः स्वचित्ते परिमाव्योक्तं 'मातृस्थानत एष पदलेपेन नदीमुत्तरति, न तपःशक्तितः', ततः श्राद्धः स मातृस्थानप्रकटनार्थ सतन्त्रो भोजनायाकारितः, गृहे आगते तैः पादप्रक्षालनं कर्तुमारब्धं, स न ददाति, श्राद्ध ॥९२॥ Jain Eduent an inte T Page #225 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education In चास्माकमविनयः स्यादिति बलात् क्रमौ क्षालितौ, भोजनादनु कौतुकमिलितश्राद्धान्यजनयुतो निजाश्रयं प्रति चचाल, नद्युत्तारे पादलेपाभावे मञ्जं लग्नो, जाता जनेऽपभ्राजना, तदा च तस्य प्रतिबोधाय समितसूरयस्तत्रागताः, तैर्नदीं प्रत्युक्तं - हे कृष्णे वयं परं पारं गन्तुमिच्छामस्ततो द्वेऽपि नदीकूले एकत्र मिलिते, जातो विस्मयः लोकस्य परिवारं कुलपतेच, गृहीता दीक्षा सतन्त्रेण कुलपतिना सा ब्रह्मशाखा बभूव । सूत्रं सुगमम् ॥ ५०३ - ५०५ ॥ अथ “मूल” त्ति व्याख्यानयतिअधिई पुच्छा आसन्न विवाहे भिन्नकन्नसाहणया । आयमणपियण ओसह अक्खय जज्जीवअहिगरणं ॥ जंघा परिजिय सड्डी अद्धिइ आणिजए मम सवत्ती । जोगो जोशुग्धाडण पडिसेह पओस उड्डाहो ॥ ५०७ ( दृ० ) क्वापि धनश्रेष्ठिनो घनप्रिया, पुत्री सुन्दरी मिन्नयोनिका मात्रा ज्ञायते न पित्रा परिणयनाय कस्यापि पुत्रस्य पित्रा दत्ता, आसन्ने विवाहदिने मातुश्चिन्ता जाता 'हा ! कथमेषा भर्त्रा भिन्नयोनिका ज्ञाता करिष्यति १, अत्रान्तरे समागतः संयतो भिक्षार्थं, तेन सा पृष्टा, तथा चिन्तोक्ता, साधुनोक्तं- मा भैषीरहमभिन्नयोनिकां करिष्ये, तत आचमनौषधं पानौषधं च तस्मै दत्तं जाता अभिन्नयोनिका । तथा - ( दृ० ) चन्द्राननापुर्यां धनदत्तसार्थवाहो, मार्या चन्द्रमुखा, तयोरन्योऽन्यं कलहे जाते, धनदत्तेन कस्यापि पुत्री वृत्ता, ज्ञाते पूर्वपत्न्या अधृतिः, जङ्घापरिजितसाधुना भिक्षार्थमागतेन पृष्टा कारणं, कथय मां, सपत्नी व्यतिकरे ज्ञाते साधुना समर्पितमौषधम्, भणिता च सा कथमपि तस्याः ( भक्तस्य ) पानस्य मध्ये देयं येन सा भिन्नयोनिका भवति, मूलकर्मणि दृष्टान्तः । Page #226 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीया चचूर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः ॥ ९३ ॥ Jain Education Interna ( हृ० ततः स्वभर्त्रे निवेदयेः, येन सा न परिणीयते, तथैव कृतं सा न परिणीता । सूत्रं सुगमम्, नवरं 'जज्जिव' मिति, याव जीवमधिकरणं - मैथुनप्रवृत्तिः, 'पडिसेहि'त्ति, सा परिणेतुमारब्धा प्रतिषिद्धा, अयं चेदर्थस्तया ज्ञातो भवेचाहिं तस्याः साधुं प्रति महान् प्रद्वेषो भवेत्, प्रवचनस्योड्डाहश्च ॥ ५०६ - ५०७ ॥ अथ ' विवाहे ' इति व्याख्यानयन्नाह-मा ते फंसेज कुलं अदिजमाणा सुया वयं पत्ता | धम्मो य लोहियस्सा जइ बिंदू तत्तिया नरया ॥ ५०८ किं न ठविज्जइ पुत्तो पत्तो कुलगोत्तकित्तिसंताणो । पच्छावि य तं कज्जं असंगहो मा य नासिज्जा ॥ ५०९ ) क्वापि कोऽपि गृहपतिः, तस्य पुत्रीं दृष्ट्वा तन्मातरं साधुराह तव दुहिता वयः प्राप्ता तद्यदि सम्प्रति न परिणी यते तर्हि केनापि तरुणेन सहाकार्य समाचर्य कुलमालिन्यमुत्पादयिष्यति, तथा 'धम्मो'त्ति, लोके एवं श्रुति - "यदि कुमारी ऋतुमती भवेतर्हि यावन्तो रक्तविन्दवः पतन्ति तावतो वारान् तन्माता नरकं याति । तथा - ( ० ) क्वचित् कस्यापि पुत्रमालोक्य साधुस्तन्मातरमाह-यथा कुलस्य गोत्रस्य कीर्त्तेश्च सन्तानो - निबन्धनमेष वः पुत्रो यौवनं च प्राप्त - स्ततः किं न परिणाय्यते १ अपि च-परिणीतः सन् कलत्रस्नेहेन स्थिरो भवत्यपरिणीतश्च कयापि स्वच्छन्दचारिणा सहोस्थाय गच्छेत् पश्चादपि चैष परिणापयितव्यः ।। ५०८-५०९ ।। अथ 'दो दंडिणी उ' इत्यादि व्याख्यानयतिकिं अद्धित्ति पुच्छा सवित्तिणी गब्भिणित्ति मे देवी । गब्भाहाणं तुज्झवि करोमि मा अद्धि कुणसु ॥ जइवि सुओ मे होही तहवि कणिट्ठोत्ति इयरो जुवराया । देइ परिसाडणं से नाए य पओस पत्थारो ॥ विवाहे दृष्टान्तौ । ॥ ९३ ॥ w.jainelibrary.org Page #227 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education India ) संयुगपुरे सिन्धुराजभूपस्य द्वे पत्न्यौ शृङ्गारमतिर्जयसुन्दरी च शृङ्गारमतेर्गर्भाधाने नूनमस्याः पुत्रो भविष्यतीति जयसुन्दरी चित्तेऽधृतिं चकार, साधुना पृष्टे कथिते च साधुराह - तवाप्यहं गर्भाधानं करिष्यामि, तयोक्तं- भगवन् ! यद्यपि युमत्प्रसादेन मे पुत्रो भावी तथापि 'स कनिष्ठ' इति न यौवराज्यं प्राप्स्यति, किन्तु सपत्नीसुत एव ततः साधुना गर्भाधानायौषधं दत्तं, अपरं दापितं सपत्न्या गर्भशातनायेति । सूत्रं सुगमम्, नवरमेतन्न कर्त्तव्यम्, यतो गर्भशातने साधुकृते ज्ञाते प्रद्वेषो भवति, ततः शरीरस्यापि प्रस्तारो - विनाशः ॥ ५१० -५११ ।। सम्प्रति सर्वतो मूलकर्म्मणि दोषानाह-संखडिकरणे काया कामपवित्तिं च कुणइ एगत्थ । एगत्थुड्डाहाई जज्जिय भोगंतरायं च ॥ ५१२ ॥ ( ह० ' मा ते ' (गा. ५०८-५०९ ) इति गाथाद्वयोक्ते वीवाहकरणे कायाः पृथिवी कायादयो विराध्यन्ते, एकत्र पुनरक्षतयोनिकरणे गर्भाधाने च कामप्रवृत्तिं करोति, एकत्र गर्भपातने उड्डाहादि, एकत्र पुनः क्षतयोनिकरणे यावञ्जीवं भोगान्तरायं, चशब्दादुड्डाहादि च ।। ५१२ ।। अथ ग्रहणैषणासम्बन्धमाह - एवं तु गविस्सा उग्गमउप्पायणावि सुद्धस्स । गहणविसोहिविसुद्धस्स होइ गहणं तु पिंडस्स ॥५१३ एवमुद्गमोत्पादनाविशुद्धस्य गवेषितस्य पिण्डस्य ग्रहणं भवति, परं ग्रहणविशोधिविशुद्धस्य, ततो ग्रहणैषणादोषानहं वक्ष्ये इति भावः ॥ ५१३ ॥ उप्पायणाऍ दोसे साहूउ समुट्ठिए वियाणाहि । गहणेसणाइ दोसे आयपरसमुट्ठिए वोच्छं ॥ ५१४॥ मूलकर्म्मणि दोषाः ग्रहणैषणा - कथना रंभश्च । Page #228 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीया बच्युपेता. श्री. पिण्डनिर्युक्तिः । ॥ ९४ ॥ Jain Education Intern उत्पादनाया दोषान् साधुतः समुत्थितान् विजानीहि, ग्रहणैषणाया दोषान्नात्मपर समुत्थिताँस्तानहं वक्ष्ये ॥ ५१४ ॥ अथ विभागमाह | दोन साहुसमुत्थासकिय तह भावओऽपरिणयं च । सेसा अट्ठवि नियमा गिहिणो य समुट्ठिए जान द्वौ दोषौ साधुसमुत्थितौ - शङ्कितं भावतोऽपरिणितं च शेषानष्टावपि दोषान् गृहिणः समुत्थितान् जानीहि ।। ५१५ ॥ अथ ग्रहणैषणा निक्षेपमाह - नाठवणा दविए भावे गहणेसणा मुणेयवा । दवे वानरजूहं भावंमि य दसपया हुंति ॥ ५९६ ॥ नामस्थापनाद्रव्यमावभेदाच्चतुर्द्धा ग्रहणैषणा, नामस्थापने सुगमे, द्रव्ये वानरयूथमुदाहरणं, भावे दश पदानि वक्ष्यमा - णानि भवन्ति ।। ५१६ ।। वानरयूथोदाहरणगाथात्रयेणाह - पडिसडियपंडुपत्तं वणसंडं दट्टु अन्नहिं पेसे । जूहवई पडियरए जूहेण समं तहिं गच्छे ॥ ५१७ ॥ सयमेवालोएउं जूहवई तं वणं समंतेण । वियरइ तेसि पयारं चरिऊण य तो दहं गच्छे ॥ ५९८ ॥ ओयरंतं पयं दहुं, नीहरंतं न दीसई । नालेण पियह पाणीयं, नेस निक्कारणो दहो ॥ ५१९ ॥ ( दृ० ) विशालशृङ्ग पर्वते एकत्र वनखण्डे वानरयूथं रमते, अथ तत्रैव वनखण्डं वर्त्तते सर्वर्त्तपुष्पफलादियुतं, परं तन्मध्यवर्त्तिनि हदे शिशुमारोऽवतिष्ठते, स यत् किमपि मृगादिकं पानीयाय प्रविशति, तत् सर्वमाकृष्य भक्षयति, अन्यदा: ग्रहणैषणाया भेदाः दृष्टान्तश्च । ॥ ९४ ॥ Page #229 -------------------------------------------------------------------------- ________________ च तद्वनखण्डं परिशटितपाण्डुपत्रमपगतपुष्पफलमालोक्य यूथेशोऽन्यवनखण्डगवेषणाय वानरयुगलं प्रेषितवान् , गवेषयित्वा च द्रव्यषणातेन यथाधिपतिनिवेदितं-वनखण्डममुकप्रदेशे निर्वाहयोग्यमिति, ततो यथेशो यथेन सह तत्र गतः, परिभावयितुं च प्रवृत्तः | यां वानरसमन्तस्तद्वनखण्डं, दृष्टो जलपूर्णो इदः, परं तत्र प्रविशन्ति श्वापदानां पदानि दृश्यन्ते, न निर्गच्छन्ति, ततो यथमाहूय यूथोदाहयथाधिपतिरुवाच-मात्र यूयं प्रविश्य पिवथ पानीयं, किन्तु तटस्था एवं नालेन पिवथ, यतो नैष इदो निष्कारणो निरुपद्रव रणं मावइति, एवमुक्ते यैस्तद्वचः प्रतिपन्नं ते सुखिनो जाता, इतरे विनष्टाः ॥५१७-५१९ ॥ अथ भावैषणादशमेदानाह षणाया संकिय मक्खिय निक्खित्त पिहिय साहरिय दायगुम्मीसे।अपरिणय लित्त छड्डिय एसणदोसा दस हवंति || मेदाश्च । ___निगदसिद्धेयं गाथा ॥ ५२० ॥ तत्र पूर्व शङ्कितं, शङ्कायुक्त दोषमाह| संकाए चउभंगो दोसुवि गहणे य भुंजणे लग्गो। जं संकियमावन्नो पणवीसा चरिमए सुद्धो ॥५२१ शङ्कायां चतुर्भङ्गी भवति, ग्रहणे शङ्कितो भोजने चेति १, ग्रहणे न भोजने २, भोजने न ग्रहणे ३, न ग्रहणे न भोजने ४, अत्र दोषानाह-दो सुवि 'त्यादि, द्वयोरपि शक्तिस्य ग्रहणभोजनयोरपि यो वर्तते यश्च ग्रहणे अर्थापत्या न भोजने, भोजने सामर्थ्यान्न ग्रहणे, स सर्वोऽपि लग्नो दोषेण सम्बद्धः, केन दोषेणे त्याह-'जं संकिय'मित्यादि, पश्चविंशतिदोषाणां मध्ये येन शङ्कितमापनो वर्चते तेन सम्बद्ध इत्यर्थः, चरमे मङ्गे पुनः शुद्ध एवेति ॥ ५२१ ॥ के पुनः पञ्चविंशति दोषा इत्याह Jain Educalan inte aniww.iainelibrary.org Page #230 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धमा- रत्नीयाबर्युपेता श्रीपिण्डनियुक्तिः ज्ञानस्य प्रामाण्य । ॥९५॥ उग्गमदोसा सोलस आहाकम्माइ एसणादोसा। नव मक्खियाइ एए पणवीसा चरिमए सुद्धो॥५२२ - षोडशोद्गमदोषा नव च प्रक्षितादय एषणादोषा, एवं २५, चरमे शुद्धं ॥ ५२२ ॥ तदेवाहछउमत्थो सुयनाणी उवउत्तो उज्जुओ पयत्तेणं । आवन्नो पणवीसं सुयनाणपमाणओ सुद्धो ॥५२३॥ __ छद्मस्थः श्रुतज्ञानी ऋजुकः प्रयत्नेन गवेषयन् पञ्चविंशति दोषाणामन्यतममापन्नः श्रुतज्ञान प्रमाणत शुद्धः॥ ५२३ ॥ ओहो सुओवउत्तो सुयनाणी जइवि गिण्हइ असुद्धं । तं केवलीवि भुंजइ अपमाणं सुयं भवे इहरा॥ ओघेन सामान्येन श्रुतोपयुक्तः श्रुतज्ञानी यदि कथमप्यशुद्धं गृह्णाति तत् केवल्यपि मुझे, इतरथा श्रुतज्ञानमप्रमाण भवेत् ॥ ५२४ ॥ ततः किमित्याहसुत्तस्स अप्पमाणे चरणाभावो तओय मोक्खस्स।मोक्खस्सऽविय अभावे दिक्खपवित्ती निरत्था उ॥ सुगमा ।। ५२५ ।। अथ प्रथमभङ्गसम्भवमाह| किंतु(ति)ह खद्धा भिक्खा दिजइ न य तरइ पुच्छिउंहिरिमं। इअ संकाए घेत्तुं तं भुंजइ संकिओ चेव॥ ____ कोऽपि हीमान् साधुरेवं शङ्कते किमत्र प्रचुरा भिक्षा दीयते ?, न च लज्जया प्रष्टुं शक्नोति, तत एवं शङ्कया गृहीत्वा शङ्कित एव तहले इति प्रथमो भङ्गः ॥ ५२६ ॥ द्वितीयभङ्गसम्भवमाह ४॥ ९५॥ Jain Education Inter For Private Personal Use Only ww.jainelibrary.org Page #231 -------------------------------------------------------------------------- ________________ हिरण संकिणं गहिआ अन्त्रेण सोहिया सा य । पगयं पहेणगं वा सोउं निस्संकिओ भुंजे ॥५२७॥ शङ्कितहृदयेन या भिक्षा गृहीता साऽन्यसङ्घाटिकेन शोधिता, यथा प्रकृतं प्रकरणं किमपि प्राचूर्णकभोजनादिकं, यदि वा प्रहेणकं कुतश्चिदन्यस्माद्गृहादायातमिति, द्वितीयसङ्घाटकादेतत् श्रुत्वा यो निःशङ्कितो भुङ्क्ते स द्वितीयभङ्गः ।। ५२७ ॥ तृतीयभङ्गसम्भवमाह - जारिसए च्चिय लद्धा खद्धा भिक्खा मए अमुयगेहे । अन्नेहिं वि तारिसिया वियडंत निसामए तइ ॥ कोsपि साधुभिक्षाको विकट्यतां - गुरोरग्रतः सम्यगालोचयतां आलोचनाश्रवणे सति शङ्कते यादृश्येव मया प्रचुरा भिक्षा लब्धा तादृश्येवान्यैरपि सङ्घाटकैः, तन्नूनमेतदाधाकर्मादि दोषदुष्टं भविष्यतीति भुञ्जानो यतिस्तृतीये भङ्गे वर्चते ।। ५२८ ।। अत्र पर आह जइ संका दोसकरी एवं सुद्धपि होइ अविसुद्धं । निस्संकमेसियंति य अणेसणिज्जंपि निद्दासं ॥५२९ ॥ यदि शङ्का दोषकारी तत एवं सति इदमायातं - शुद्धमपि शङ्कितं अशुद्धं भवति, तथा अनेषणीयमपि निःशङ्कितमन्वेषितं शुद्धं प्राप्नोति, न चैवं युक्तं, स्वभावतः शुद्धस्याशुद्धस्य वा शङ्काभावाभावमात्रेणान्यथा कर्त्तुमशक्यत्वात् ॥ ५२९ ॥ अत्राचार्य आह- सत्यमेतत् तथाहि अविसुद्धो परिणामो एगयरे अवडिओ य पक्खमि । एसिंपि कुणइ सिं अणसिमोसें विसुद्धो उ ॥ ५३० शङ्काया भङ्गाणां विवरणं । Page #232 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयाचचूर्युपेता श्री पिण्डनिर्युक्तिः । ॥ ९६॥ अविशुद्धः परिणाम एकतरस्मिन् शुद्धमेवेदमशुद्धं चेत्येकस्मिन् पक्षेऽपतन् एषणीयमप्यनेषणीयं करोति, विशुद्धस्तु परिणमो यथोक्तविधिना गवेषयत एषणीयं शुद्धं करोत्यनेषणीयमपि श्रुतप्रामाण्यात् ।। ५३० ॥ अथ प्रक्षितद्वारमाहदुविहं च मक्खियं खलु सच्चित्तं चैव होइ अञ्चित्तं । सच्चित्तं पुण तिविहं अच्चित्तं होइ दुविहं तु ॥ ५३१ प्रक्षितं द्विधा - सचिचमचित्तं च सचिचप्रक्षितं पुनत्रिधा, अचिचम्रक्षितं द्विधा स्यात् ॥ ५३१ ॥ अथ सचित्त < म्रक्षित-> त्रैविध्यं व्यक्तिः— पुढवी आउवणस्सइ तिविहं सच्चित्तमक्खियं होइ । अञ्चित्तं पुण दुविहं गरहियमियरे य भयणा उ ॥ पृथिव्यपवनस्पतिभेदात्रिधा सचित्तप्रक्षितं भवति, अचित्तं पुनर्द्विधा गर्हितमितरंच, अत्र कल्पयाकल्प्यविधौ मजनाविकल्पना, सा चाग्रे वक्ष्यते ।। ५३२ ।। अथ सचित्तपृथ्वीकायप्रक्षितं प्रपश्चत आह सुक्केण सरक्खेण मक्खिय मोल्लेण पुढविकाएण । सर्व्वपि मक्खियं तं एतो आउंमि वोच्छामि ॥५३३॥ शुकेन सरजस्केनातीव २ लक्ष्णतया भस्मकल्पेन यद्देयं हस्तः पात्रं वा प्रक्षितं आद्रेण वा, सर्वमपि तत् सचित पृथ्वीकाक्षितं ज्ञेयम्, अतोऽकायम्रक्षितं वक्ष्ये ।। ५३३ ॥ पुरपच्छकम्म ससिणिद्धुदउल्ले चउरो आउभेयाओ । उक्किट्ठरसालित्तं परित्तऽणतं महिरुहेसु ॥ ५३४ ॥ अकायम्रक्षिते चत्वारो मेदास्तथाहि पुरःकर्म्म पश्चात्कर्म्म स्निग्धमुदकार्द्र च तत्र भेदद्वयं प्रसिद्धम्, स्निग्धमी प्रक्षितभदाः । ॥ ९६ ॥ Page #233 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सचिचा-- चित्ते कल्प्याकल्प्यविधिः। पल्लक्ष्यमाणजलखरण्टितं हस्तादि, उदका स्पष्टोपलभ्यमानजलसंसर्गम् । अथ वनस्पतिम्रक्षितमाह-'उकिडे'त्ति-उत्कृष्टरसानि परीत्तानां-प्रत्येकवनस्पतीनामनन्तकायिकानां च सद्यःकृतानि श्लक्ष्णखण्डानि इति सामर्थ्याद्गम्यते, तैरालिप्संखरण्टितं यत् हस्तादि, तन्महीरुहेषु, अत्र तृतीयाथै सप्तमी, महीरुहैम्रक्षितं ज्ञेयम् ॥ ५३४ ॥ सेसेहिं काएहिं तीहिवि तेऊसमीरणतसहि । सञ्चित्तं मीसं वा न मक्खितं अस्थि उल्लं वा॥५३५॥ ___शेषेत्रिभिरपि तेजासमीरणत्रसरूपैः सच्चित्तरूपं मिश्रं वा आर्द्रतारूपं वा प्रक्षितं न भवति, लोके तथाशब्दप्रवृत्यभावात् ॥ ५३५ ॥ अथ कल्प्याकल्प्यविधिमाहसच्चित्तमक्खियंमी हत्थे मत्ते य होइ चउभंगो। आइतिए पडिसेहो चरिमे भंगे अणुन्नाओ ॥५३६॥ सचित्तपृथ्वीकायादिम्रक्षिते हस्ते मात्रे च चतुर्भङ्गी भवति, तथाहि-हस्तो प्रक्षितो मात्रं च, हस्तो न मात्रं, मात्र न हस्तो, नोभयमपि, आदिमे भङ्गत्रिके प्रतिषधः चरममङ्गोऽनुज्ञात इति ॥ ५३६ ॥ अथाचित्तम्रक्षितमाश्रित्य कल्प्याकल्प्यविधिमाहअच्चित्तमक्खियंमि उचउसुवि भंगेसु होइ भयणा उ। अगरहिएण उगहणं पडिसेहो गरहिए होई॥ अचित्तम्रक्षिते हस्ते मात्रे च भवति, तथाहि-हस्तयोगे प्रागिव चतुर्यु भङ्गकेषु भजना-विकल्पना, तामेवाहअगर्हितेन-लोकानिन्दितेन घृतादिना म्रक्षिते ग्रहणं, गर्हिते न तु वसादिना प्रक्षिते प्रतिषेधो भवति, तत्रापि चतुर्थों मङ्गः | ndante For Private Personal Use Only Page #234 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गर्हितागर्हिते। क्षमा- शुद्ध एवेतिग्रहणम् ॥ ५३७ ।। अगर्हिते विशेषमाहरस्नीया। संसजिमेहिं वजं अगरहिएहिंपि गोरसदवेहिं । महुघयतेल्लगुलेहि य मा मच्छिपिपीलियाघाओ ५३८ । पर्युपेता संसक्तिमद्भयां तन्मध्यनिपतितजीवयुक्ताम्यां गोरसद्वाभ्यां-दध्यादिपानकाम्यामगर्हिताभ्यां म्रक्षितं प्रक्षिताभ्यां श्री हस्तमात्राभ्यां वा दीयमानं वय॑म् , तथा मधुघृततेलगुडैरगर्हितैरपि प्रक्षिताम्यां हस्तमात्राम्यां दीयमानं वज्यं कुत पिण्ड इत्याह-मा मच्छिपिपीलियाघाओ-मा मक्षिकापिपीलिकानां, उपलक्षणत्वात्पतङ्गानां घातो-विनाशोऽभूदिति कृत्वा, नियुक्ति एतचोत्कृष्टजिनकल्पिकानामेवं ज्ञेयम् , स्थविरकल्पिकानां तु यथायोग्यम् ॥ ५३८ ।। सम्प्रति गर्हितागर्हितविशेषमाह॥९७॥ मंसवससोणियासव लोए वा गरहिएहिवि वजेजा। उभओऽवि गरहिएहिं मुत्तुञ्चारहि छित्तपि ॥ मांसवसाशोणितासवैलों के गर्हिते म्रक्षितं च वर्जयेत् , तथा उभयस्मिन्नपि-लोके लोकोत्तरे च गर्हिताभ्यां मत्रोच्चाराम्यां आस्ता प्रक्षितं स्पृष्टमपि वर्जयेत् ॥ ५३९ ॥ अथ निक्षिप्तद्वारमाहसच्चित्त मीसएसु दुविहं काएसु होइ निक्खित्तं । एकेकं तं दुविहं अणंतरं परंपरं चेव ॥ ५४॥ कल्पनीयं निक्षिप्तं द्विधा-सचित्तेषु-पृथिव्यादिषु मिश्रेषु च, एकैकमपि द्विधा-अनन्तरं परम्परं च, तत्र सामान्यतो निक्षिप्तं सचित्ताचित्तमिश्रभेदात्रिधा, तत्र च त्रय(तिस्र)श्चतुर्भङ्गयः, तथाहि-सचिचे सचित्तं १ मिश्रे सचित्तं २ सचित्ते मिश्रं ३ मिश्रे मिश्रमित्येका चतुर्भङ्गी, तथा सचित्ते सचित्तं १ अचित्ते सचित्तं २ सचित्ते अचित्तं ३ अचित्ते अचित्तमिति ॥९ ॥ For Private Personal Use Only Jain Education in Page #235 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनन्तरपरम्परविमागे पृथ्वीकायादीनां भङ्गाः । ४ द्वितीया, तथा मिश्रे मिश्रं १ अचित्ते मिश्रं २ मिश्रे अचित्तं ३ अचित्ते अचित्तमितितृतीया ॥ ५४० ॥ अथात्रैवानन्तरपरम्परविभागमाहपुढवी आउकाए तेऊवाउवणस्सइतसाणं । एकक दुहाणंतर परंपरगणमि सत्तविहा ॥ ५४१॥ । प्रथिव्यादीनां सचित्तानां प्रत्येकं सचित्तपृथिव्यादिषु निक्षेपः सम्भवति, यथा पृथ्वीकायस्य निक्षेपः पोढा, तथाहिपृथ्वीकायस्य पृथ्वी काये निक्षेप इति प्रथमभेदः, एवं पश्चस्वपि, एवमकायादीनामपि निक्षेपः प्रत्येक पोदा भावनीयः सर्व-सङ्ख्या ३६ भङ्गाः, एकेकोऽपि मङ्गो द्विधा-अनन्तरं परम्परया च, केवलमग्निकाये पृथिव्यादीनां निक्षेप: सप्तधा, एतच्चाग्रे वक्ष्यति ॥ ५४१ ॥ अथ पृथ्वीकायस्य पोढावं सूत्रकृत् साक्षादाहसच्चित्त पुढविकाए सच्चित्तो चेव पुढविनिखित्तो । आऊतेउवणस्सइसमीरणतसेसु एमेव ॥५४२॥ व्याख्यातैव ॥ ५४२ ॥ एवं शेषकायेष्वप्यतिदेशमाहएमेव सेसयाणवि निक्लेवो होइ जीवकाएसुं । एक्कको सट्ठाणे परठाणे पंच पंचेव ॥ ५४३ ॥ ___ एवमेव शेषाणामपि-अप्कायादीनां जीवनिकायेषु-पृथिव्यादिषु निक्षेपो भवति, एकैको भङ्गः स्वस्थाने, शेषाः पञ्च २ परस्थाने, यथा पृथ्वीकायस्य पृथ्वीकाये निक्षेप एको मङ्गः स्वस्थाने, अप्कायादिषु पञ्चसु परस्थाने, एवमकायादीनामपि भावनीय, तदेवं प्रथमचतुर्भङ्गिकायाः सचित्ते सचित्तमित्येवंरूपे प्रथमे भेदे षट्त्रिंशद्भवाः सम्भवन्ति ॥ ५४३ ॥ अथ प्रथम Jain Education Intematonai For Private & Personel Use Only Page #236 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पृथ्व्यादीनां ४३२ भङ्गाः, तत्र कल्प्याकल्प्यत्वं पिण्ड च। क्षमा- चतुर्भङ्गथा रचिते निक्षिप्यमाणयोर्ये द्वे चतुर्मङ्गयो, एवं शेषमङ्गत्रयं, द्वितीयतृतीयचतुर्मङ्गयौ चातिदेशत आहरत्नीया- एमेव मीसएसुवि मीसाण सचेयणेसु निक्खेवो । मीसाणं मीसेसु य दोण्हंपि य होइऽचित्तेसु ॥ पर्युपेता एवमेव सचिचेषु सचित्तमिव मिश्रेष्वपि-पृथिव्यादिषु सचित्तपृथिव्यादिनिक्षेपो मेदो ज्ञेयः, एतेन प्रथमचतुर्भङ्गथा श्री द्वितीयो भङ्गः। तथा एवमेव सचेतनेषु मिश्राणां निक्षेपो मेदा, एतेन तृतीयो भङ्गः, तथा एवमेव मिश्राणां मिश्रेषु निक्षेपो मेदः, एतेन चतुर्थों भङ्गा, सर्व सङ्ख्यया चतुर्भङ्गयां चतुश्चत्वारिंशं मङ्गशतं, एवमेव दूयोरपि सचित्तमिश्रयोरचित्ते निक्षिप्यनियुक्तिः। माणयोर्ये द्वे चतुर्भङ्गयौ प्रागुक्ते तत्रापि प्रत्येकं चतुश्चत्वारिंशं भङ्गशतं भवति, सर्वसङ्खथा भङ्गानां ४३२ चत्वारि शतानि ॥९८॥ द्वात्रिंशदधिकानि भवन्ति ।। ५४४ ॥ अथ चतुर्भङ्गीत्रयमुद्दिश्य करप्याकल्प्यविधिमाहKd जत्थ उ सचित्तमीसे चउभंगो तत्थ चउसुवि अगिज्झं। तं तु अणंतर इयरं परित्तऽणंतं च वणकाए॥ यत्र निक्षेपे सचित्तमिश्रे आश्रित्य चतुर्भङ्गी प्रथमेत्यर्थः, तत्र चतुर्ध्वपि भङ्गेषु, अपि शब्दाद् द्वितीयतृतीयचतुर्भङ्गयोरपि, आयेषु त्रिषु भङ्गेषु वर्तमानमनन्तरं परम्परं च वनस्पतिविषये प्रत्येकमनन्तं वा तत् सर्वमग्राह्य, सामर्थ्याद् द्वितीयतृतीयचतुर्भङ्गयोश्चतुर्थे २ भङ्गे वर्चमानं ग्राह्यं, तत्र दोषाभावात् ॥५४५॥ अथ सचित्तादिभित्रिभिरपि मतान्तरेणैकामेव चतुर्मङ्गी कल्प्याकल्प्यविधिमाहA अहव ण सचित्तमीसो उ एगओ एगओ उ अञ्चित्तो । एत्थं चउक्कभेओ तत्थाइतिए कहा नस्थि॥ neer Jain Education tamanna Page #237 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अथवेति प्रकारान्तरे 'णे 'ति वाक्यालङ्कारे, एकत्र पक्षे सचित्तमिश्रे एकत्र तु अचित्तः, ततः प्राक्तनकमेण चतुर्भङ्गी तथाहि - सचिते [ मिश्रे] सचित्तमिश्रं १, अचित्ते सचित्तमिश्रं २, सचित्तमिश्रे अचित्तं, ३ अचि अचित्तमिति ४, अत्रापि प्रागिव एकैकस्मिन् भङ्गे ३६ मेदाः स्युः, सर्वसङ्ख्यया १४४, तत्रादिमे मङ्गत्रये कथा नास्ति-प्रहणे वार्त्ता न विद्यते, सामर्थ्याच्चतुर्थे भने कल्पते ॥ ५४६ ।। तदेवं "पुढवी" स्यादिमूलगाथायाः पूर्वार्द्ध व्याख्यातं, अथ 'एकेके दुहाणंतर'मित्यवयवं व्याचिख्यासुर्द्वितीयचतुर्भङ्गयोः सत्कस्य तृतीयस्य भङ्गस्य सामान्यतोऽशुद्धस्य विषये विशेषं विमणिपुरनन्तरपरम्परमार्गणां करोति--- जं पुण अचित्त दवं निक्खिप्पर चेयणेसु मीसेसु । तहिं मग्गणा उ इणमो अणंतरपरंपरा होइ ॥ यत्किमपि अचितं द्रव्यं - ओदनादि सचितेषु मिश्रेषु वा निक्षिप्यते, तत्रेयमनन्तरपरम्परयोर्वा मार्गणा परिभावना भवति ॥ ५४७ ॥ तदेवाह - ओगाहिमायणंतर परंपरं पिढरगाइ पुढवीए । नवणीयाइ अनंतर परंपर नावमाईसु ॥ ५४८ ॥ अवगाहिमादि पक्कान्नमण्डकप्रभृतिपृथिव्यामानन्तर्येण स्थापितं, अनन्तरनिक्षिप्तं पृथिव्युपरि स्थिते पिठरकादौ स्थापित परम्परा निक्षितं एतत्पृथ्वी का यमाश्रित्यानन्तरपरम्परया निक्षेप उक्तः । अथाष्कायमाश्रित्याह- 'नवे 'ति नवनीतादिप्रक्षणादि सचित्तोदकेऽनन्तरनिक्षिप्तं, तदेव नवनीतादि अवगाहिमादि वा जलमध्यस्थनावादिस्थितं परम्परानिक्षिप्तमिति मतान्तरे पृथ्वी कायादी नामाभित्य शुद्धा शुद्धत्वम् । Page #238 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयापर्युपेता श्रीपिण्डनियुक्ति ॥९९॥ ॥ ५४८ ॥ अथाग्निकायेऽनन्तरपरम्परे व्याख्यानयन् “ अगणिम्मि सत्त विहो" इति व्याख्यानयति सप्तधाविज्झायमुम्मुरिंगालमेव अप्पत्तपत्तसमजाले । वोकंते सत्तदुगं जंतोलित्ते य जयणाए ॥ ५४९ ॥ .INनिकायः। सप्तधा बहिः, तथाहि-विध्यातो मुर्मुरोरङ्गारोप्राप्त प्राप्तः समज्वालो व्युत्क्रान्तश्च, यः प्रथमं नोपलभ्यते पश्चादिन्धनप्रक्षेपे ज्ञायते स विध्यातः १, आपिङ्गला अर्द्धविध्याता अग्निकणा मुर्मुरः २, ज्वालारहितो बहिरङ्गार ३, यच्चुल्या उपरिस्थं पिठरं ज्वालाभिर्न प्रामोति सोप्राप्तः ४, यस्तु प्रामोति स प्राप्तः ५, यः पिठरस्य बुनामपि यावत्कर्णी ज्वालाभिः स्पृशति स समज्वालः ६, यस्य ज्वालाः पिठरकर्णादूर्ध्वमपि गच्छन्ति स व्युत्क्रान्तः ७, एते मेदास्तेजस्कायस्य एकैकोऽप्यनन्तरपरम्परमेदाद् द्विधा, तत्र यद्विध्यातादिरूपे वह्नौ मण्डकादि प्रक्षिप्यते, तदनन्तरनिक्षिप्तं, वहथुपरि पिठरादौ परम्परं चेति, तत्र सृप्तानां मेदानां मध्ये यमेव तमेव भेदमाश्रित्य यन्त्रे-इक्षुरसपाकस्थाने कटाहादावविलिप्ते मृत्तिकाखरण्टिते यतनया परिशाटिपरिहारेण ग्रहणमिक्षुरसस्य कल्पते ॥ ५४९॥ अथैनामेव गाथां व्याख्यानयन् गाथाद्वयेन विष्यातादिस्वरूपमाहविज्झाउत्ति न दीसइ अग्गी दीसेइ इंधणे छुढे । आपिंगल अगणिकणा मुम्मुर निजाल इंगाले॥५५० अप्पत्ता उ चउत्थे जाला पिढरंतुपंचमे पत्ता। छठे पुण कण्णसमा जाला समइच्छिया चरिमे ॥५५१ सुगमम् ॥ ५५०-५५१ ॥ अथ " जंतोलित्ते य जयणाए (५४९)" इति व्याख्यानयति ॥ ९९ ॥ Jain Education Intel For Private & Personel Use Only प w .jainelibrary.org Page #239 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | पासोलित्त कडाहे परिसाडी नस्थि तंपि य विसालं। सो वि य अचिरच्छूढो उच्छरसो नाइउसिणो य । की इह यदीति सर्वत्राध्याड्रियते, यदि कटाहा-पिठरविशेषः सर्वतः पार्थेषु मृत्तिकयाऽवलिप्तो भवेत् दीयमाने च परिशाटिर्न इक्षुरसस्यात् , तदपि कटाहमाजनं विशालमुखं सोऽपि चेक्षुरसोऽचिरक्षिप्त इति कृत्वा यदि नात्युष्णो भवति, तदा स दीयमान- जले इक्षुरसः कल्पते, अन्यथा भाजनरस:-इक्षुरसबिन्द्वादिपतनेऽग्निविराधनायोगात् ॥५५२॥ अथोदकमाश्रित्य विशेषमाह- यन्त्रगते उसिणोदगंपि घेप्पइ गुडरसपरिणामियं अणच्चुसिणं। जं च अघट्टियकन्नं घट्टियपडणंमि मा अग्गी कल्पते ।। उष्णोदकमपि गुडरसपरिणमितमनत्युष्णं गृह्यते, अयं भावः-यत्र कटाहे गुडः पूर्वकथितो मवति, तस्मिन् निक्षिप्तं जलमीपत्तप्तमपि कटाहसंसक्तगुडरसमिश्रणात् सत्वरमचित्तीभवति, ततस्तदनत्युष्णमपि कल्पते, अत्रापि पार्थावलिप्तकटाहस्थितमपरिशाटितमन्वेति विशेषणद्वयमनुपातमपि ज्ञेयं, तथा यद् अघट्टितकर्ण न यस्मिन् दीयमाने पिठरस्य कर्णावुदश्चनेन प्रविशता निर्गच्छता वा घट्येते तत् कल्पते, भङ्गादिदोषाभावात् , कुत इत्याह-उदश्चनेन प्रविशता निर्गच्छता वा पिठरस्य कर्णयोर्घट्यमानयोर्लेपस्योदकस्य वा पतने माऽग्निर्विराध्यतेति कृत्वा एतेन च वक्ष्यमाणषोडशभेदानां प्रथमो भेदो दर्शित: ५५३ ॥ अथ षोडशभङ्गानाहपासोलित्तकडाहेऽनच्चुसिणे अपरिसाडऽघट्टते। सोलसभंगविगप्पा पढमेऽणुन्ना न सेसेसु ॥५५४॥ पाश्वोऽवलिप्तः कटाहोऽनत्युष्णो दीयमानो जलेक्षुरसादिः, अपरिशाटिः अघट्टन्ते-उदश्चनेन पिठरकर्णाघट्टने, इत्यमुनि Jain Education international For Private & Personel Use Only Page #240 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा- रत्नीया- बचयुपेता श्री. पोडशमन आयेऽनुज्ञाऽत्युष्ण अहणे पिण्ड नियुक्ति ॥१०॥ द्विविधविराधनादि चत्वारि पदानि आश्रित्य षोडश भङ्गा भवन्ति, भङ्गानयनोपायस्त्वयं-द्विकचतुष्टयं परस्परगुणितं भङ्गा भवन्ति, यथाद्विको द्विकेन गुणितो जातश्चत्वारा, तैस्तृतीयद्विको गुणितो जाता अष्टौ, तैस्तुर्यद्विकगुणने षोडश, " पेयसमदुगअन्मासे माणं भंगाणं" इति वचनाद् इहाये भने अनुज्ञा न शेषेषु ॥ ५५४-५५५ ।। अत्युष्णग्रहणे दोषानाहम दुविहविराहण उसिणे छड्डण हाणी य भाणभेओ य । वाउक्खित्ताणंतरपरंपरा पप्पडिय वत्थी॥ अत्युष्णे इक्षुरसादौ दीयमाने संयमात्मरूपा द्विधा विराधना स्यात् , अतितप्ततया यत्र माजने गृहीते तस्मिन् करे | क्रियमाणे दह्यते, दाव्यपि दह्यते, कदापीचरसादिच्छर्दने हानि जनमेदश्च जायते। अथ वातकायमधिकृत्यानन्तरपरम्परे दर्श- यति, वात इति वातोत्क्षिप्ता:-समीरणोत्पाटिताः पपेटिका:-शालिपपटिका अनन्तरनिक्षिप्त, परम्परनिक्षिप्तं वस्थित्ति विभक्तिलोपाद्वस्तौ, उपलक्षणत्वात् समीरणभृततिप्रभृतिव्यवस्थितं मण्डकादि ॥५५६ ।। अथ वनस्पतित्रसविषयं द्विविधमप्याहहरियाइअणंतरिया परंपरं पिढरगाइसु वर्णमि । पूपाइ पिट्टणंतर भरए कुउवाइसू इयरा ॥५५७॥ वने-वनस्पतौ अनन्तरनिक्षिप्तं हरितादिषु अनन्तरिता अपूपादय इति शेषः, हरिताद्युपरिस्थितपिठरादौ निक्षिप्ता अपू. पादयः परम्परनिक्षिप्तं, तथा बलीवनां पृष्ठे अपूपादयो निक्षिप्ता अनन्तरं त्रसेषु निक्षिप्तं, तथा बलीवर्दादिपृष्ठ एव भरके १ पयसमदुगअब्भासे माणं भंगाण तेसिमा रयणा । एगंतरियं लहुगुरु दुगुणा दुगुणा य वामेसु ।। ५५५ ॥ एषा गाथा श्रीमलयगिरिपादेरङ्गीकृता व्याख्याता च, अतोऽस्याः क्रमावोपस्थिति न्याय्यैवेति (मृद्रितपत्रे १५३)। ॥१०॥ Jain Education in Page #241 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पिहित. द्वारम्। | कुतुपादिषु वा भाजनेषु निक्षिप्ता मोदकादयः < परम्परम् >॥५५७॥ अथ पिहितद्वारमाहसञ्चित्ते अञ्चित्ते मीसग पिहियमि होइ चउभंगो। आइतिगे पडिसेहो चरिमे भंगमि भयणा उ॥ सचित्ते-सचित्तेन अचित्तेन मिश्रेण वा पिहितद्वारे चतुर्भङ्गी भवति, जातावेकवचनमिति, तिस्रश्चतुर्भङ्गयो भवन्ति पूर्ववत् , तथा गाथापर्यन्ततुशब्दात् प्रथमचतुर्भङ्गयां सर्वेष्वपि भङ्गेषु न कल्पते, द्वितीयतृतीयचतुर्भङ्गिकायास्तु प्रत्येकमादिमेषु त्रिषु भङ्गेषु न कल्पते, चरमे तु मङ्गे भजना, सा चाग्रे वक्ष्यते ॥ ५५८ ॥ अथ चतुर्भङ्गीत्रयावान्तरभेदानाह जह चेव उ निक्खित्ते संजोगा चेव होंति भंगा य । एमेव य पिहियमिवि नाणत्तमिणं तइयभंगे ____यथा निक्षिप्ते सचित्ताचित्तमिश्राणां संयोगाः प्रागुक्ताः, यथा च चत्वारिशतानि द्वात्रिंशदधिकानि भङ्गा उक्तास्तथाऽ. त्रापि द्रष्टव्याः, सर्व प्रागिव, नवरं द्वितीयतृतीयचतुर्भङ्गयोः प्रत्येक तृतीयभङ्गे अनन्तरपरम्परमार्गणाविधौ निक्षिप्तद्वारादिदं वक्ष्यमाणं नानात्वं ज्ञेयं, तत्र सचित्तपृथ्वीकायेनावष्टब्धं मण्डकादि सचित्तपृथ्वीकायानन्तरपिहितं, सचित्तपृथ्वीकायगर्भपिठरादिपिहितं परम्परपिहितमिति, तथा हिमादिनाऽवष्टब्धं मण्डकादि सचित्ताप्कायानन्तरपिहितं हिमादिगर्भपिठरादिना <पिहितं परं> परं चेति ॥ ५५९ ॥ अथ सचित्ततेजस्कायादिपिहितमनन्तरं परम्परं चाह गाथाद्वयेनअंगारधूवियाई अणंतरो संतरो सरावाई। तत्थेव अइर वाऊ परंपरं बत्थिणा पिहिए ॥ ५६०॥ अइरं फलाइपिहितं वर्णमि इयरं तु छब्बपिठराई । कच्छवसंचाराई अणंतराणंतरे छट्टे ॥ ५६१॥ en Education inte For Private Personal Use Only Page #242 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा- ... इह स्थाल्यादौ संस्वेदिमादीनां मध्ये अङ्गारं क्षिप्वा हिङ्ग्वादिना वासो दीयते, आदिशब्दाचनकादिकं मुर्मुरादिक्षिप्त- सचित्तरत्नीया- मनन्तरपिहितं ज्ञेयं, अङ्गारभृतशरावादिना पिहितं परम्परपिहितं च, तथा तत्रैव अङ्गारधूपितादौ अइरिति-अतिरोहित- तेजस्कायापर्युपेता- मनन्तरपिहितं वायोर्द्रष्टव्यं “यत्राग्निस्तत्र वायुरि"तिवचनात् , समीरणभृतेन बस्तिना पिहितं परम्परमिति, तथा वने-बनस्पती दिपिहितेभी- फलादिना अइरिति-अतिरोहितेन पिहितमनन्तरं छब्बपिठरादौ स्थितेन फलादिना तु पिहितं परम्परमिति, तथा षष्ठे त्रसकाये नन्तर पिण्डकच्छपेन सञ्चारादिना च-कीटिकापतयादिना च यत्पिहितं तदनन्तरमिति, कच्छपादिगर्भरहितादिपिहितं परम्परमिति परम्परे नियुक्तिः ॥५६०-५६१ ॥ यदुक्तं " चरमे भंगमि भयणा उ (५५८)" तद् व्याख्यानयति संत॥१०॥ NI गुरु गुरुणा गुरु लहुणा लहुयं गुरुएण दोऽवि लहुयाई । अच्चित्तेणवि पिहिए चउभंगो दोसु अग्गेझं ॥ INI द्वारश्च । ___अचित्तेनापि-अचित्ते पिहिते चतुर्भङ्गी स्यात् , तथाहि-गुरु गुरुणा १, गुरु लघुना २, लघु गुरुणा ३, लघु लघुनेति४, एतेषां मध्ये प्रथमत्तीयभङ्गयोः कल्पते, न शेषद्वये कल्पते ॥ ५६२ ॥ अथ संहृतद्वारमाहसञ्चित्ते अचित्ते मीसग साहारणे य चउभंगो। आइतिए पडिसेहो चरिमे भंगमि भयणा उ ॥५६३ इह येन मातृकेण भक्तादिकं दातुमिच्छति दात्री तत्रान्यददातव्यं, किमपि सचित्तमचित्तं मिश्रं वाऽस्ति, ततस्तदन्यत्र भूम्यादौ विस्वा तेनान्यद्ददाति, तच्च कदाचित् च सचित्तेषु पृथ्व्यादिषु मध्ये क्षिपति, कदाचिदचित्ते कदाचिन्मिश्रे तत्संहरणे सचिताद्यधिकृत्य चतुर्भङ्गीत्रयं प्रागिव, अत्रापि गाथापर्यन्ततुशब्दात्प्रथमचतुर्भङ्गिका सर्वमङ्गकेषु निषेधा, द्वितीयतृतीय- IC॥१०॥ in Education Internal For Private Personal Use Only Page #243 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भुम्यादौ संहरणत्वं । चतर्मणिकयोस्त आदित्रिके प्रतिषेधः, चरमे भजना ॥ ५६३ ॥ अथ चतुर्भङ्गीत्रयावान्तरमेदानतिदेशेनाहजह चेव उ निक्खित्ते संजोगो चेव होंति भंगा य । तह चेव उ साहरणे नाणत्तमिणं तइयभंगे व्याख्या पूर्ववत् ॥ ५६४ ॥ अथ नानात्वं दर्शयन् संहरणलक्षणमाह| मत्तेण जेण दाहिइ तत्थ अदिजं तु होज्ज असणाई। छोटु तयन्नहि तेण देई अह होइ साहरणं | येन मात्रकेण दास्यति दात्री तत्रादेयं किमप्यस्ति-अशनादिकं सचित्तपृथ्वीकायादिकं वा, ततस्तददेयमन्यत्र स्थानान्तरे क्षिप्वा ददाति, अहत्ति, एतत् संहरणं तत एतल्लक्षणानुसारेणानन्तरपरम्परमार्गेणानुसरणीया, तद्यथा-सचित्तपृथ्वीकायमध्ये यदा संहरति तदानन्तरं, यदा सचिचपृथिव्युपरिभाजने संहरति तदा परम्परं, एचमकायादिष्वपि भावनीयम, अत्राय वृत्तौ वृद्धसम्प्रदायो " निक्षिप्तादौ अनन्तरे न ग्राह्यं परम्परे सचित्तपृथिवीकायाद्यघट्टने ग्राह्य "मिति ॥५६५ ॥ सम्प्रति द्वितीयतृतीयचतुर्भङ्गीसत्कं तृतीयं २ भङ्गमाश्रित्य येषु वस्तुषु मात्रकस्थितं अदेयं वस्तु संहरति, | तान्युपदर्शयतिभमाइएस तं पुण साहरणं होइ छसुवि काएसु। तं दुहा अचित्तं साहरणं तत्थ चउभंगो॥५६६ तत्पुनर्मात्रकस्थितस्यादेयस्य वस्तुनः संहरणं भूम्यादिषु-सचित्तपृथ्वीकायादिषु षट्सु, जीवनिकायेषु भवति-जायते, तत्र चानन्तरोक्तमनन्तरपरम्परामागेणं, ततोऽनन्तरोक्त एवं करप्याकल्प्यविधिरवधारणीयः, अथ चरमभङ्गमजनामाह Jain Educationa lional For Private & Personal use only Page #244 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रत्नीया. बचूर्युपेता श्रीपिण्डनियुक्ति। | अदेयस्य पृथ्व्यादौ संहरणे मङ्गकाः । ॥१०॥ यत् संहरणं च द्विधापि-आधारापेक्षया संहृयमाणापेक्षया च अचित्तमचिचे सहयते, तत्र चतुर्भङ्गी ।। ५६६ ॥ तानेवाहसुक्के सुक्कं पढमो सुक्के उल्लं तु बिइयओ भंगो। उल्ले सुक्कं तइओ उल्ले उल्लं चउत्थो उ॥५६७॥ सुगमा ॥ ५६७॥ एकेके चउभंगो सुक्काईएसु चउसु भंगेसु । थोवे थोवं थोवे बहुं च विवरीय दो अन्ने ॥ ५६८॥ पूर्वगाथोक्तशुष्कादिचतुर्वपि भङ्गेषु एकैकस्मिन् भङ्गे चतुर्भङ्गी, तद्यथा-स्तोके शुम्के स्तोकं शुष्क, स्तोके शुष्के बहु शुष्क, विवरिय दो अन्नित्ति, एतद्विपरीतौ अन्यौ द्वौ मङ्गो द्रष्टव्यो, तद्यथा-शुष्के बहुके स्तोकं शुष्क, बहुके शुष्के बहु शुष्क, एवं शेषमङ्गध्वपि भावनीयं, सर्वसङ्ख्यया भङ्गाः १६ ॥ ५६८ ।। अत्र कल्प्याकल्प्यविधिमाहजत्थ उथोवे थोवं सुके उल्लंच छहइतंभब्भं (गेज्झं)।जइ तं तु समुक्खेउं थोवाभारं दलइ जन्नं ५६९ यत्र तु भने स्तोके तुशब्दाहुके च संहृतं स्तोकं भवति, तदपि शुष्के शुष्कं कल्पत एव, अथवा शुष्के आई वा शब्दादा शुष्कं आ आर्द्र वा तदा तद्गाचं, न शेषं, कुत' इत्याह-जह ईत्यादि, यदि तदादेयं वस्तु स्तोकाभारं-बहु भाररहितं अन्यत्र समुत्क्षिप्य ददाति, तर्हि तत्कल्पते नान्यथा, बहुकं च संद्रियमाणं बहुभारं भवति, ततः शुष्के शुष्कमित्यादिषु चतुर्यु भङ्गेषु प्रत्येकं स्तोके स्तोकं बहुके स्तोकं इति प्रथम तृतीय भङ्गौ कल्पते, न द्वितीयचतुथौ ॥५६९॥ तत्र दोषानाहउक्खेवे निक्खिवे महल्लभाणमि लद्ध वह डाहो। अचियत्तं वोच्छेओ छक्कायवहो य गुरुमने ॥५७०॥ ॥१०२॥ Jain Education daali For Private & Personel Use Only Page #245 -------------------------------------------------------------------------- ________________ शुष्कादिषु कल्प्याकल्प्यविधिः। महति भाजने-प्रभूतदेयवस्तुमारभृते उत्पाठ्यमाने निक्षिप्यमाने दात्र्याः पीडा भवति, तथा तस्य भाजनस्य वधेविनाशे दायाः साधोर्वा दाहो भवति, कदापि खेदवशादप्रीतिर्जायते, ततस्तद्रव्यान्यद्रव्यव्यवच्छेदः, तथा भाजने भन्ने सति तन्मध्यस्थभक्कादौ सर्वतोऽपि विसर्पति षट्कायवधः, तथा स्तोके बहुकं बहुके बहुकमिति द्वौ भनौ सर्वत्रापि न कल्पते ॥ ५७० ॥ एतदेवाहथोवे थोवं छुढं सुक्के उल्लं तु तं तु आइन्नं । बहुयं तु अणाइन्नं कडदोसो सोत्ति काऊणं ॥५७१॥ स्तोके स्तोकमुपलक्षणत्वात् बहुके स्तोकं यनिक्षिप्तं, तदपि शुष्के शुष्कं कल्पत एव, ततः शुष्क आर्द्र, तु शब्दादाद्रे शुष्कं आद्रे आद्रे च तद्भवति आचीर्ण, यत्र बहुकं स्तोके बहुके बहुकं तदनाचीर्ण, कुतः ? इत्याह-स बहुकसंहारः | कृतदोषो-अनन्तरगाथायामुक्तदोष इति कृत्वा ॥ ५७१ ॥ अथ दायकद्वारं गाथाषट्कनाहबाले वुड्ढे मत्ते उम्मत्ते थेविरे य जरिए य । अंधिल्लए[य] पगरिए आरूढे पाउयाहिं च ॥५७२॥ हत्थिदुनियलबद्धे विवजिए चेव हत्थपाएहिं । तेरासि गुठिवणी बालवच्छ भुंजंति घुसुलिंती ॥५७३॥ | भजंती य दलंती कंडती चेव तह य पीसंती। पीजंती रुंचती कत्तंति पमद्दमाणी य ॥ ५७४ ॥ | छक्कायवग्गहत्त्था समणट्ठा निक्खिवित्तु ते चेव। ते चेवोगाहंती संघटुंतारभंती य ॥ ५७५ ॥ Jain Education Intern For Private & Personel Use Only Page #246 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयावचूर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः ॥१०३॥ Jain Education In संसत्तेण यदद्वेण लित्तहत्था य लित्तमत्ता य । उबसंती साहारणं व दिंती य चोरिययं ॥ ५७६ ॥ पाहुडियं च ठवंती सपच्चचाया परं च उद्दिस्त । आभोगमणाभोगेण दलंती वज्जणिजा ए ॥९७७॥ बालादयो वर्जनीया इति क्रियायोगः, बालो वर्षाष्टमध्ये १, वृद्धः सप्ततिवर्षाणां मतान्तरे षष्टिवर्षाणां वा उपरि २, मतः- पीतमदिरादिः ३, उन्मत्तो- हप्तो ग्रहगृहीतो वा ४, वेपमानः- कम्पशरीरः ५, जरितो - जराक्रान्तः ६, अन्धः ७, प्रगलितो - गलि ( लत्) कुष्ठः ८, आरूढ़ः पादुकयोः - काष्ठमयोपानहोः ९ तथा ।। ५७२ ।। हस्तान्दुना - करविषय काष्ठमयबन्धने न १०, निगडेन च - पादविषयलोहबन्धनेन बद्धः ११, हस्ताभ्यां पादाभ्यां वा विवर्जितश्छिन्नत्वात् १२, त्रैराशिको - नपुंसकः १३, गुर्विणी - आपन्नासच्चा १४, बालवत्सा - स्तन्योपजीविशिशुका १५, भुञ्जाना - भोजनं कुर्वती १६, घुमुलिं ती - दध्यादिमनती १७ ।। ५७३ ।। भर्जमाला - चुल्ल्यां कडिल्लकादौ - चनकादीन् स्फोटयन्ती १८, दलयन्ती घरट्टेन १९, खण्डयन्ती उदूखलेन २०, पिषन्ती शिलायां २१, पिञ्जयन्ती रुतादि २२, रञ्चन्तित्ति-कर्षासं लोठिन्यां लोठयन्ती २३, कृतन्ती - कर्त नं कुर्वती २४, प्रमृदन्ती - रूतं कराभ्यां पौनःपुन्येन विरलं कुर्वती २५ ।। ५७४ ।। पट्कायव्यग्रहस्ता-पट्काययुक्तहस्ता २६, तथा श्रमणस्य भिक्षादानाय तानेव पट्कायान् भूमौ निक्षिप्य ददती २७, तानेव पकायानवगाहमाना पादाभ्यां चालयन्ती २८, सङ्घट्टयन्ती - तानेव पकायान् शेषशरीरावयवेन स्पृशन्ती २९, आरममाणास्तानेव पकायान् विनाशयन्ती ३० ।। ५७५ ।। संसक्तेन-दध्यादिना द्रव्येण लिप्तहस्ता-खरष्टितहस्वा ३१, तथा तेनैव द्रव्येण दध्यादिना संसक्तेन लिप्तमात्रा एषणायां दायकदोषाः। ४० ॥१०३॥ Page #247 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एतेषां वर्जनावर्जनविभागः। खरण्टितमाजना ३२, उदयन्ती-महत्पिठरादिकमुद्वर्त्य तन्मध्याइदती ३३, साधारण वहनां संसक्तं ददती ३४, चोरितं ददती ३५॥ ५७६ ।। प्राभृतिकां स्थापयन्ती-अग्रकादिनिमित्तं मूलस्थाल्या आकुष्य स्थगनिकादौ मुश्चन्ती ३६, सप्रत्यपाया-सम्भाव्यमानापाया दात्री ३७, तथा विवक्षितसाधुव्यतिरेकेण परमन्यं साध्वादिकमुद्दिश्य यत स्थापितं तहदती ३८, तथाऽऽभोगेन-साधनामित्थं न कल्पत इति परिज्ञायाप्यशुद्धं ददती ३९, अथवाऽनाभोगेनाशुद्धं ददवी ४०, सर्वसङ्ख्यया चत्वारिंशदोषाः ॥ ५७७ ॥ सम्प्रत्येतेषामेव दायकानामपवादमधिकृत्य वर्जनावर्जनविभागमाहएएसि दायगाणं गहणं केसिंचि होइ भइयत्वं । केर्सिची अग्गहणं तविवरीए भवे गहणं ॥५७८॥ एतेषां बालादिदायकानां मध्ये केषांचिन्मूलत आरम्य पञ्चविंशति सङ्ख्यानां ग्रहणं भजनीयं, कदाचिन्महत्प्रयोजनमुद्दिश्य कल्पते, शेषकालं नेति, केषाश्चित् षट्कायव्यग्रहस्तादीनां पश्चदशानां हस्तादग्रहणं भिक्षायाः, तद्विपरीते तु दातरि भवेद्रहणम् ॥ ५७८ ॥ अथैतेषां दायकानां हस्ताद् भिक्षाग्रहणे दोषानाहकब्बढिग अप्पाहण दिन्ने अन्नन्न गहण पजत्तं। खंतिय मग्गणदिने उड्डाह पओस चारभडा ॥५७९॥ (१०४३) कदाचिदभिनवश्राविका श्रमणेभ्यो भिक्षां दद्या इति निजपुत्रिका अपाहिऊणं-सन्दिश्य भक्तं गृहीत्वा क्षेत्रं जगाम, गतायां तस्यां कोऽपि साधुसङ्घाटको भिक्षार्थमायातः, तया बालिकया तस्मै तन्दुलौदनो वितीर्णः, साधुलाम्पट्य- | तया तां मुग्धतरामवेत्य पुनर्देहीत्युवाच यावत् सर्वोऽपि दत्तः, एवं मुद्घृतदध्यादिकमपि, अपराह्ने च समागता जननी, Jain Education na For Private & Personel Use Only Page #248 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Ital क्षमारत्नीयापर्युपेता व प्रान्ते काञ्जिकमात्रमया योक्तं साधुभूयो भयो मामिलति साधून (१-२) बालवृद्ध दातृजदोषाः। श्री पिण्डनियुक्तिः ॥१०॥ उपविष्टा भोजनाय, भणिता च पुत्री, देहि मह्यमोदनमिति, साऽऽह समग्रोऽपि दत्ता साधवे, मात्रोक्तम्-शोभनं जातं, मां मुद्ान् देहि, यावत् प्रान्ते काञ्जिकमात्रमयाचत, तदपि बालिका भणति-साधव दत्तमिति, ततः सा नूत्नश्राविका रुष्टा सती पुत्रिकामेवमपवदति-किमिति सर्व दत्तं ?, तयोक्तं साधुर्भूयो भूयो याचते ततोऽदायि, सा ततः साधोरुपरि कोपात् सूरीणां समीपमाप्ता, तया साधुवृत्तान्ते गाढशब्दं कथ्यमाने जने प्रातिवेश्मिके मिलति साधूनामवर्णवादे सति मूरिभिस्तस्या जनस्य च समक्षं स साधुनिर्भत्स्योपकरणं च सकलं गृहीत्वा वसतेनिष्कासितः, एवं च श्राविकायाः कोपः शममगमत् , ततः सूरीणां क्षमाश्रमणं दत्त्वोक्तं श्राविकया भगवन् ! मा मन्निमित्तमेष निष्काश्यताम् , ततो भूयोऽपि स साधुः शिक्षयित्वा प्रवेशितः । सूत्रं सुगमम् , नवरं उड्डाह पउस चारभडा-लोके उड्डाहस्तथा प्रद्वेषभावतश्चारमटा इव लुण्टाका अमी, न साधव इत्यवर्णवादः ।। ५७९ ॥ अथ (२) वृद्धदोषानाहथेरो गलंतलालो कंपणहत्थो पडिज वा देतो। अपहुचि य अचियत्तं एगयरे वाउभयओवा ॥५८०॥ ___स्थविरः प्रायो गलल्लालो भवति, ततो देयमपि लालया खरण्टितं जायते, अतो लोके जुगुप्सा, तथा कम्पमानहस्तः स्यात् , तथा वृद्धो गृहाप्रभुर्भवति, ततस्तेन दीयमाने गृहस्वामिनोऽचियत्तं-प्रद्वेषः स्यात् , स च एकतरस्मिन् साधौ वृद्धे वा यद्वा उभयोरपीति ।। ५८० ॥ अथ (३-४) मत्तोन्मत्तावाश्रित्य दोषानाहअवयास भाण(घाय)भेओ वमणं असुइत्ति लोगगरिहाय। एए चेव उमत्तेवमणविवजा य उम्मत्ते॥ ॥१०४॥ Jain Education in For Private & Personel Use Only Page #249 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ददानो वमति, वमन्च (३-१२) मचादिदायकजादोषाः। पितज्वरितावनित्याविहलतया पातमा मत्तः कदापि साधोरालिङ्गनं विदधाति, भाजनं वा भिनत्ति, यद्वा पीतमासवं ददानो वमति, वमँश्च साधु साधुपात्रं वा खरण्टयति, ततो लोके जुगुप्सा, तथा कोऽपि मत्तो विह्वलतया घातमपि कुर्यात् , ये दोषा मत्ते त एव वमनरहिता उन्मत्तेऽपि ॥ ५८१ ॥ अथ (५-६)वेपितज्वरितावश्रित्य दोषानाहवेविय परिसाडणया पासे व छ भेज भाणभेओवा। एमेव य जरियंमिवि जरसंकमणंच उड्डाहो॥५८२॥ वेपिता देयवस्तुनः परिशाटनं भवति, यद्वा पावे साधुमाजनादहिः सर्वतोऽपि देयं क्षिपेत् , यद्वा येन थाल्यादिमाजनेन भिक्षामानयति तस्य पतने भेदः-स्फोटनं स्यात् , एवमेव वरितेऽपि दोषाः, किश्च ज्वरितागृहणे ज्वरसंक्रमणमपि साधोर्भवेत् , तथा जने उड्डाह इति ॥ ५८२ ॥ (७-८) अन्धगलत्कुष्ठावाश्रित्य दोषानाह उड्डाह कायपडणं अंधे भेओ य पास छहणं च । तद्दोसी संकमणं गलंतभिसभिन्नदेहे य ॥५८३॥ ___ अन्धाद् भिक्षाग्रहणे उहाहः, तथाऽन्धोऽपश्यन् पादाभ्यां षद्जीवनिकायवधं करोति, पतनं च स्याद् मेदो भाजनस्य च, पार्श्वे माजनादर्भिक्कादिक्षेपणं च । तथा त्वग्दोषिणि किंविशिष्ट ? इत्याह, गलभृशभिन्नदेहे-आपत्वाद् व्यत्यासेन पदयोजाना, सा चैवं भृशं-अतिशयेन गलत-अर्द्ध पक्कं रुधिरं बहिर्वहन भिन्नश्च-स्फुटितो देहो यस्य स तथा तस्मिन् दातरि संक्रमणं कुष्ठव्याधेर्भवतीति ॥ ५८३ ॥ अथ (९.१२) पादुकारूढादिचतुष्टयदोषानाहपाउयदुरूढपडणं बद्ध परियाव असुइखिंसा याकरछिन्नासह खिंसा ते च्चिय पावेऽवि पडणंच ॥५८४॥ For Private & Personel Use Only Page #250 -------------------------------------------------------------------------- ________________ (१३-१७) नपुंस क्षमारत्नीयावचूर्युपेता श्रीपिण्डनियुक्ति कादि दायकजादोषाः। ॥१०५॥ पादुकारूढस्य पतनं तथा बद्धे दातरि परितापः, असुइत्ति-मूत्राात्सर्गादौ जलेन शौचाकरणासम्भवाल्लोके निन्दा, <छिन्नकरेऽपि हस्ताभावाच्छौचासम्भवे निन्दा,> छिन्नपादेऽपि तथैव, पतनं चाधिकं नियमत इति ॥ ५८४ ॥ (१३) नपुंसकमधिकृत्य दोषानाहआयपरोभयदोसा अभिक्खगहणमि खोभण नपुंसे। लोगदुगुंछा संका एरिसया नूणमेएऽवि ॥५८५॥ नपुंसके दातरि आत्मपरोभयदोषाः, तथाहि-नपुंसकादभीक्ष्णं भिक्षाग्रहणे अतिपरिच यो भवति, ततश्च तस्य साधो क्षोभो-वेदोदयरूपः समुपजायते, ततो नपुंसकस्य साधुलिङ्गायासेवनेन द्वयस्यापि मैथुनसेवया कर्मबन्धः, तथा लोके जुगुप्सा, तथा जनस्य शङ्का स्यान्नूनमेतेऽपि साधव इदृशा नपुंसकाः, कथमन्यथा परस्परं परिचय इति ॥ ५८५ ॥ अथ (१४-१५) गुर्बिणीचालवत्से आश्रित्य दोषानाहगुश्विणि गब्भे संघट्टणा उ उटुंतुवेसमाणीए । बालाई मंसुंडग मजाराई विराहेजा ॥ ५८६ ॥ गुर्विण्या दानार्थमुत्तिष्ठन्त्याः स्वस्थाने उपविशन्त्याश्च गर्भस्य सङ्घट्टनं भवति, तथा बालाई मंसुंडगत्ति, आपत्वाद् व्यत्यासेन पदयोजना, बालमिति शिशु भूमौ मश्चिकादौ वा निक्षिप्य यदि भिक्षां ददा ति, तर्हि तं बालं मार्जारादयो मांसोन्दुकादि-मांसखण्डं शशकशिशुरिति वा कृत्वा विराधयेयुः।।५८६ ।। (१६-१७) भुजानां मन्य न्तीं चाश्रित्य दोषानाहभुजंती आयमणे उदगं छोट्टी य लोगगरिहा य । घुसुलंतीसंतत्ते करंमिलित्ते भवे रसगा ॥५८७॥ d॥१०५॥ Jain Education Intene For Private & Personel Use Only Page #251 -------------------------------------------------------------------------- ________________ (१८-२५) दायकजादोषाः। भुञ्जाना दात्री दानार्थमाचमनं करोति, तथा च सति उदकं विराध्यते, अथ न करोति तदा छोटिरिति कृत्वा लोके गर्दा स्यात, तथा धुसलंती-दध्यादिमन्थन्ती संसक्तेन-दध्यादिना लिप्ते करे भिक्षां ददत्या रसजीवानां वधो भवति ॥५८७॥ अथ (१८-२५) पेषणादि कुर्वत्या दोषानाहदगबीए संघट्टण पीसणकंडदल भजणे डहणं । पिंजंत रुंचणाई दिने लित्ते करे उदगं ॥५८॥ पेषणकण्डनदलनानि कुर्वतीनां हस्ताद्भिक्षाग्रहणे उदकबीजसङ्घट्टनं स्यात् , तथा-पेषयन्ती( पिषन्ती ) यदोत्तिष्ठति तदा पिष्यमाणतिलादिसत्काः काश्चिन्नखिका: सचित्ता अपि हस्तादौ लगिताः सम्भवन्ति, ततो भिक्षादानाय हस्तादिप्रस्फोटने भिक्षां वा ददत्या भिक्षासम्पर्कतस्तासां विराधना भवति, भिक्षां च दचा हस्तौ जलेन प्रक्षालयेत. ततः पेषणे उदकवीजसनं, एवं कण्डनदलनयोरपि, तथा मर्जने-मिक्षां ददत्यां वेलालगनेन कडिल्लक्षिप्त गोधमादीनां दहनं स्यात, तथा कर्त्तनं पिञ्जनं आदिशब्दात् कसिलोठनप्रमर्दने च कुवेती भिक्षा दचा लिप्त करे हस्तौ शालनादक विराध्यते ॥ ५८८ ॥ अथ (२६-३०) षट्कायव्यग्रहस्तादिपश्चकस्वरूपं गाथाद्वयेनाहलोणं दग अगणि वत्थी फलाइ मच्छाइ सजिय हत्थंमि। पाएणोगाहणया संघट्टण सेसकाएणं ॥५८९॥ खणमाणी आरभए मज्जइ धोयइ व सिंचए किंचि। छेयविसारणमाई छिंदइ छट्टे फुरुफुरुते ॥५९०॥ इह सा पट्कायव्यग्रहस्ता-यस्या हस्ते सजीवं लवणमुदकमग्निर्वायुपूरिता वा बस्तिः फलादिकं मत्स्यादयो वा विद्यन्ते, Jain Education alitional For Private & Personel Use Only Page #252 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीया वचूर्युपेता श्रीपिण्डनियुक्तिः। तत एतेषामन्यत् [ममापि] यदि भूम्यादौ निक्षिपति तर्हि न कस्पते । तथा अवगाहना नाम यदेतेषां षण्णां पादेन सङ्घटनं, | शेषकायेन हस्तादिना सम्मईनं सङ्घट्टनं, आरममाणा कुशादिना भूम्यादीम् स्खनन्ती, अनेन पृथ्व्यारम्भ उक्तः, यद्वा 'मजन्ती' स्नान्ती, धावन्ती वस्त्राणि क्षालयन्ति, किञ्चिद् वृक्षादिकं सिञ्चन्ती, उपलक्षणत्वाद् ज्वलयन्ती वैश्वानरं, सचित्तवायुभृतवस्त्यादिकमितस्ततः प्रक्षिपन्ति, एवमपकायाग्निवायुसमारम्भ उक्तः, तथा शाकादेश्छेदविशारणे कुर्वती, तत्र छेदः पुष्पफलादेः खण्डनं विशारणं-तेषामेव खण्डानां शोषणायातपमोचनं, तथा छिन्दन्ती षष्ठान् त्रसकायान् फुरफुरते इति-पोस्फूर्यमाणान् पीडयोद्वेल्लत इत्यर्थः, एतेन त्रसकायारम्भ उक्तः ॥ ५८९-५९० ॥ अथात्र षद्कायव्यग्रहस्तेति पदे मतान्तरमाहछक्कायवग्गहत्या केई कोलाइकन्नलइयाई । सिद्धत्थगपुप्फाणि य सिरंमि दिन्नाई वजंति ॥५९१॥ केचिदाचार्याः षद्कायव्यग्रहस्तेति वचनतः कोलादीनि-बदरादीनि आदिशब्दात् करीरादिपरिग्रहः, कण्णलइया. इंति-कर्णे पिनद्धानि तथा सिद्धार्थकपुष्पाणि शिरसि दत्तानि वर्जयन्ति, हस्तग्रहणं किल सूत्रे उपलक्षणं, परं तन्मते षट्कायव्यग्रहस्तेतिपदात् षट्कायं सट्टयन्तीत्यस्य पदस्य विशेषो दुरुपपादः ॥ ५९१ ॥ अन्ने भणंति दससुवि एसणदोसेसु नत्थि तग्गहणं। तेणन वजं भन्नइ नणु गहणं दायगग्गहणा ॥५९२॥ अन्ये त्वाचार्यदेशीया भणन्ति, यथा-दशस्वपि शङ्कितादिदोषेषु मध्ये न तद्हणं षट्कायव्यग्रहस्तेतिपदोपादानं, तेन (२६-३०) दायकजा दोषाः षट्कायव्यग्रहस्तपदेमतान्तरं च। ॥१०६॥ पदात् पटकायं सहायकपुष्पाणि शिरसि दत्तावान बदरादीनि आदिश ॥१६॥ Jain Education Intel For Private & Personel Use Only Page #253 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कारणेन कोलादियुक्तदाच्या भिक्षाग्रहणं न वयं, तदेतदयुक्तं, यत आह-भण्यते-अत्रोत्तरं दीयते, ननु दायकग्रहणादेषणा- 121(३१-३८) | दोषमध्ये षट्कायव्यग्रहस्तेत्यस्य ग्रहणं विद्यत एवेति ।। ५९२ ।। अथ (३१.३३) संसक्तिमद्रव्यदाच्यादिदोषानाह दायकKI.संसज्जिमम्मि देसे संसज्जिमदवलित्तकरमत्ता । संचारो ओयत्तण उक्खिप्पंतेऽवि ते चेव ॥५९३॥ दोषाः। संसक्तिमद्रव्यवति देशे-मण्डले संसक्तिमता द्रव्येण लिप्तः करो मात्रं वा यस्याः सा भिक्षां ददती करादिलग्नान सत्वान् हन्ति, तस्मात् सा वय॑ते, तथा महतः पिठरादेपवर्त्तने 'सञ्चार' 'सूचनात् सूत्रमिति सञ्चारिमकीटिकामत्कोटादिसत्वव्याघातः, एते च दोषा उत्पाठ्यमानेऽपि ॥ ५९३ ॥ अथ (३४-३५) साधारणं चोरितं वा ददत्या दोषानाहसाधारणं बहणं तत्थ उदोसा जहेव अणिसिटे। चोरियए गहणाई भयए सुण्हाइ वा दंते ॥५९४॥ बहूनां साधारणं यदि ददाति तदा तत्र यथा निसृष्टे दोषास्तथा ज्ञेयाः, तथा चौर्येण भृतके-कर्मकरे स्नुषादौ वा ददति ग्रहणादयो दोषाः ॥ ५९४ ॥ अथ (३६-३८) प्राभृतिकास्थापनादिद्वारत्रयमाहपाइडि ठवियगदोसातिरिउडमहे तिहाअवायाओ।धम्मियमाई ठवियं परस्स परसंतियं वावि॥५९५ प्राभृतिका संस्थाप्य या भिक्षा दत्ते तत्र दोषाः प्रवर्तनादयः। सम्प्रति अपायेतिद्वारे, अपायास्त्रिविधास्तथाहि-तिर्यक ऊर्द्धमधश्च, तत्र तिर्यग्गवादिभ्य ऊर्द्धमुत्तरङ्गकाष्ठादेरधः सादेः, यत्रापायं पश्यति दाव्यास्तत्र नादत्ते इति, तथा "परं चोद्दिश्ये"ति यदुक्तं, तत्राह-धार्मिकाद्यर्थमपरसाधुकार्पटिकादिनिमित्तं यत् स्थापितं तत्परस्य परमार्थतः सम्बन्धीति न Jain Educaton International For Private & Personel Use Only Page #254 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयाबचयुपेता श्री. IN पिण्डनियुक्तिः ॥१०७॥ गृहीयात , अदत्तादानदोषसम्भवात् , यद्वा परसंतियं व ति, परस्यग्लानादेः सत्कं यद्ददाति तदपि स्वयमादातं न कल्पते. (३९-४०) तत्राप्यदत्तादानदोषसम्भवात् , किन्तु यस्मै ग्लानाय दापितं तस्मै दत्ते स चेन्न गृह्णाति तदा भयो दान्याः समर्पणीयं. दायकयदि च दात्र्यैवं वदति ग्लानाग्रहणे त्वया ग्रहणे त्वया ग्राह्यमेवं कल्पते ॥ ६९५ ॥ अथा(३९-४०)नाभोगामोगस्वरूपमाह- दोषाः अणुकंपा पडिणीयट्रयाव ते कुणइजाणमाणोऽवि। एसणदोसे बिइओ कुणइ उ असढो अयाणंतो॥ IN बालस्थ___ अनुकम्पया यद्वा मौतेषां नियमभङ्गः कर्त्तव्य इति, प्रत्यनीकार्थतया जानानोऽपि तामाधाकादिकैषणादोषान् करोति, विरमादौद्वितीयस्तु करोत्यजानानोऽशठभाव इति ।। ६९६ ॥ अथ "एएसि दायगाणं गहणं केसिंचि होइ भइयव(गा. ५७८)"मिति मजना च। व्याचिख्यासुः पूर्व वालमाश्रित्य भजनामाहभिक्खामित्ते अवियालणा उबालेण दिजमाणंमि। संदिद्वे वा गहणं अइबय विलायणेऽणुन्ना ॥५९७॥ मातुः परोक्षे समीपे वा बालेन भिक्षामात्रे दीयमाने अविचारणा-विचारणाया अभावः, किन्तु ग्रहणमेवेति, सन्दिष्टे मात्रा कथितेऽपि ग्रहणं अतिबहुके दीयमाने किपद्य प्रभूतं ददासीति विचारणे सति यद्यनुना तदाग्राह्यं, मात्रा त्वननुज्ञाते न ग्राह्यम् ॥ ५९७ ।। अथ स्थविरमत्तविषयां भजनामाहथेर पह थरथरते धरिए अन्नेण दढसरीरे वा । अवत्तमत्तसड्ढे अविभले वा असागरिए ॥ ५९८॥ स्थविरो यदि प्रभुर्भवति, यद्वा कम्पमानोऽन्येन धृतः स्यात् स्वरूपेण वा दृढशरीरस्तदा कल्पते, तथा अव्यक्तं मनाक ॥१०७॥ Jain Education Inte For Private & Personel Use Only T Page #255 -------------------------------------------------------------------------- ________________ . उन्मत्ताति: पुत्वद्गोपा दिषुच भजना। यो मत्तः स च श्रादोऽविहलश्च तदा कल्पते, यदि सागारिको न विद्यते तत्र, नान्यथेति ॥५९८॥ उन्मत्तादिचतुष्कमजनामाह- सुइभग दित्ताई ढग्गहे वेविए जरंमि सिवे। अन्नधरियं तु सड्ढो देयंधोऽन्नेण वा धरिए॥५९९॥ ___उन्मत्तो-दृप्तादिर्यदि शुचिर्भद्रकश्च तथा वेपितोऽपि दृढहस्तः,तथा जरेऽपि शिवे सति, तथा अन्धोऽपि यदि देयमन्येन धृतं ददाति, स्वयं श्राद्धश्च स एवान्धोऽन्येन विधृतश्च, तत एतेभ्यो ग्राह्य, नापरथा ॥५९९॥ अथ त्वग्दोषादिपञ्चकमजनामाहमंडलपसूतिकुट्रीऽसागरिए पाउयागए अयले। कमबद्धे सवियारे इयरे विट्टे असागरिए ॥६००॥ मण्डलानि-वृत्ताकारदद्रुविशेषरूपाणि प्रसूतिः-नखादिविदारणेऽपि चेतनाया असंवित्तिस्तद्रूपो यः कुष्ठो-रोगविशेषः सोऽस्यास्तीति मण्डलप्रसूतिकुष्ठी स चेदसागारिके-सागारिकामावे ददाति, तथा पादुकारू ढोऽपि यदि भवत्यचला, तथा क्रमयो-पादयोर्बद्धो यदि सविचार-इतश्चेतश्च पीडामन्तरेण गन्तुं शक्को, यद्वा इतरो गन्तुमशक्तस्तदोपरिष्टः, एतेभ्यो सति कारो कल्पते, नान्यथा, सागारिकाभावे इति सर्वत्र हस्तबद्धभिक्षां दातुमपि न शक्नोति, तत्र प्रतिषेध एव, न मजना. उपलक्षणत्वादसागरिके छिन्नकरोऽपि छिन्नपादोऽप्युपविष्टश्चेत्तदा कल्पते ॥ ६०० ॥ अथ नपुंसकादिसप्तकमजनामाहपंडग अप्पडिसेवी वेला थणजीवि इयर सबंपि। उक्खित्तमणावाए न किंचि लग्गं ठवंतीपm नपुंसको यदि अप्रतिसेवी लिङ्गाधनासेवकस्तर्हि कल्पते, तथा आपन्नसचापि यदि वेलत्ति, 'सूचनात सूत्रमिति वेलामासप्राप्ता भवति, नवममासगर्मा तदा स्थविरकल्पिकैः परिहार्या, अधिकारा( अर्था)त्तद्विपरीतायाः कराद्वाह्या, तथा Jain Education a l For Private Personel Use Only Page #256 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारस्नीयाबच्र्युपेता श्री पिण्डनियुक्तिः। ॥१०८॥ या बालवत्सा स्तन्यमात्रोपजीविशिशुका सा त्याज्या, यस्यास्तु चाल आहारेऽपि लगति तस्यां ददत्यां कल्प्यते, इतरे तु नपुंसजिनकल्पिकास्ते मूलत एवापन्नसचा बालवत्सां च सर्वथा परिहरन्ति, एवं भुञ्जानामर्जमानादलन्तीष्वपि भजना भावनीया, कादिषुसा चैवं-भुञ्जाना अनुच्छिष्टा सति यावदद्यापि न कवलं मुखे प्रक्षिपति तावत्कल्पते, भर्जमानापि यत् सचित्वं गोधूमादि पिंपसत्याकडिल्लके (क्षिप्त) तत् भृष्ट्वोत्तारितं अन्यच्च नाद्यापि हस्तेन गृह्णाति, अत्रान्तरे यदि साधुरायातः, सा चेद्ददाति तर्हि कल्पते, <तथा दिघुच दलयन्ती सचिचमुद्गादिना दल्यमानेन सह घरट्ठे मुक्तवती, अत्रान्तरे साधावागते सा यद्युत्तिष्ठति, अचेतनं वा भृष्टं मुगादिकं || मजना। दलयति तर्हि तद्धस्तात् कल्पते,> तथा कण्डयन्त्याः कण्डनायोत्पटितं मुशलं,न च तस्मिन मुशलके क्वापि काश्यां बीजं लग्नं स्यात्, अत्रान्तरे साधावागते यदि साऽनपाये प्रदेशे मुशलं स्थापयित्वा भिक्षा ददाति तर्हि कल्पते ॥ ६०१॥ पिपत्यादिविषयां भजनामाहपीसंती निप्पिटे फासुं वा घुसुलणे असंसत्तं । कत्तणि असंखचुन्नं चुन्नं वाजा अचोक्खलिणी ॥६०२॥ उबट्टणिऽसंसत्तेण वावि अट्टीलए न घटेइ। पिंजणपमदणेसु य पच्छाकम्मं जहा नत्थि ॥ ६०३ ॥ पिंपन्ती निष्पिष्टे-पेषणपरिसमाप्तौ, प्रासकं वा पिंपन्ती यदि ददाति तदाकल्पते. तथा घुसुलणे असंसर्त-दध्यादि मन्थन्त्याः कल्पते, तथा कर्त्तनयोः अशजचूर्ण-अखरण्टितहस्तं कुन्तति, इह काचित सूत्रस्यातिशयेन श्वेततापादनाय शङ्खचूर्णेन हस्तौ जङ्घा च खरण्टयित्वा कुन्तति, तत उच्यते अशङ्खचूर्णमिति । अथवा चूर्णमपि-शङ्खचूर्णमपि गृहीत्वा कन्तन्ती ||॥१०॥ Jain Education in Page #257 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inte या अक्खलणी - अनुक्षाशीला न जलेन हस्तौ प्रक्षालयति इत्यर्थः, तस्या हस्तात्कल्पते । तथा उद्वर्त्तने कार्पासलोठने असंसत्तेण वावित्ति-असंसक्तेनागृहीत कार्पासेन हस्तेनोपलक्षिता सती यदि उत्तिष्ठन्ती, अल्लिए-अस्थिकान्कार्पासिकानित्यर्थः, न घट्टयति तदा कल्पते । पिजनप्रमर्दनयोरपि पश्चात्कर्म्म न भवति तथा ग्राह्यमिति ॥ ६०२-६०३ ॥ सेसेसु य पडिवक्खो न संभवइ काय गहणमाईसु । पडिवक्खस्स अभावे नियमा उ भवे तयग्गहणं ६०४ शेषेषु द्वारेषु कायगहणमाईसु-पट्कायव्यग्रहस्तादिषु प्रतिपक्षः - उत्सर्गापेक्षयाऽपवादरूपो नास्ति, ततः प्रतिपक्षस्याआवे नियमात् भवति तेष्वग्रहणमिति ।। ६०४ ॥ उक्तं दायकद्वारं, अथोन्मिश्रद्वारमाह- सच्चित्ते अच्चित्ते मीसग उम्मीसगंसि चउभंगो। आइतिए पडिसेहो चरिमे भंगंमि भयणा उ ॥ ६०५ || ' इह यत् यत्रोन्मिश्यते ते द्वे अपि वस्तुनी त्रिधा, तथाहि सचित्ते अचित्ते मिश्रे च तत उन्मिश्र के मिश्रेण चतुर्भङ्गी, अत्र जातावेकवचनं तेन तिस्रश्चतुर्भङ्गयो भवन्ति, प्रागिव सचित्ताचित्तमिश्रपदैः, प्रथमा सचित्तमिश्रपदाभ्यां द्वितीया सचित्ताचित्तपदाभ्यां तृतीया मिश्राचित्तपदाभ्यामिति । तत्र गाथापर्यन्त तुशब्दादाद्य चतुर्भङ्गिकायां सकलायामपि प्रतिषेधः शेषे चतुर्भङ्गीद्वये प्रत्येकं आदित्रिके निषेधः, चरमे भङ्गे भजना वक्ष्यमाणा ।। ६०५ ।। हवय संजोगा कायाणं हेट्ठओ य साहरणे । तह चैव य उम्मीसे होइ विसेसो इमो तत्थ ॥ ६०६ ॥ यथा चैवाः प्राक् संहरणद्वारे कायानां पृथिवीकायादीनां सचित्ताचित्तमिश्रमेदभिन्नानां स्वस्थानपरस्थानाम्यां १९ उन्मिश्र द्वारम् । Page #258 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयावर्युपेता संहृतोन्मियो मेंद: उन्मिश्रेdsपवादश्च। श्री पिण्डनियुक्तिः। ॥१०९॥ संयोगमङ्गा दार्शता द्वात्रिंशदधिकचतुःशतसङ्ख्याप्रमाणाः, तथैव उन्मिश्रेऽपि ज्ञेयाः, ननु संहृते उन्मिश्रे च सचित्तादिवस्तु. निक्षेपानास्ति परस्परं विशेषमाह तत्र-तयोः संहृतोन्मिश्रयोर्भवति परस्परमयं विशेषो वक्ष्यमाणः॥६०६॥ तमेवाहदायत्वमदायत्वं च दोऽवि दवाइं देइ मीसेउं । ओयणकुसुणाईणं साहरण तयन्नहिं छोढुं ॥६०७॥ दातव्यं साधुदानयोग्यमदातव्यं च, ते द्वेऽपि द्रव्ये मिश्रयित्वा यद्ददाति, यथौदनं कुशनेन-दध्यादिना मिश्रयित्वा तदुन्मिनं, संहरणं तु यद्भाजनस्थमदेयं वस्तु तदन्यत्र वापि स्थगनिकादौ संहृत्य ददाति, ततोऽयमनयोर्विशेषः ॥६०७॥ द्वितीयतृतीयचतुर्भङ्गीसत्कचतुर्भङ्गभजनामाहतंपि य सुक्के सुकं भंगा चत्तारि जह उ साहरणे। अप्पबहुएऽवि चउरो तहेव आइन्नऽणाइन्ने ॥६०८॥ यद्यपि अचित्ते अचित्तं मिश्रयति तदपि तत्रापि शुष्क शुष्कं मिश्रितमित्येवं यथा संहरणे तथा चत्वारो भङ्गा ज्ञेयाः, तत एकैकस्मिन् मङ्गे संहरणे इव अल्पबहुत्वेऽधिकृत्य चत्वारश्चत्वारो भङ्गाः स्युः, यथास्तोके शुष्के स्तोकं शुष्कमित्यादि यावद्भङ्गाः १६, तथा तथैव संहरणे इव आचीर्णानाचीर्ण-कल्प्याकल्प्ये ज्ञातव्ये, यथा शुष्के शुष्कमित्यादीनां चतुर्णी मङ्गानां प्रत्येकं द्वौ द्वौ भङ्गौ स्तोके स्तोकमुन्मिश्रं बहुके स्तोकमित्येतौ कल्प्यो दात्रीपीडादिदोषाभावात् , स्तोके बहुकं बहुके बहुकमित्येतो चानाचीणीं ॥ ६०८ ॥ अथापरिणतद्वारमाह G१०९॥ Jain Education Inter For Private & Personel Use Only N w.jainelibrary.org Page #259 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education अपरिणयपि यदुविहं दबे भावे य दुविहमेक्केकं । दवांम होइ छेकं भावांम य होइ सज्झिलगा ॥ ६०९ ॥ अपरिणतं द्विधा - द्रव्ये भावे च पुनरेकैकं द्विधा-दातृगृहीतृसम्बन्धात्, तथाहि द्रव्यापरिणतं दातृसत्कं गृहीतृसत्कं च, एवं भावापरिणमपि ॥ ६०९ ॥ तथा द्रव्ये षट्कमिति पद्मङ्गी तामेव षद्भङ्गीव्याचिख्यासुराह— जीवर्त्तमि अविगए अपरिणयं परिणयं गए जीवे । दिट्टंतो बुद्धदही इय अपरिणयं परिणयं तं च ॥ ६१०॥ जीवत्वे-सचेतनत्वे अविगते - अभ्रष्टे पृथ्वी कायादिद्रव्यषट्कं द्रव्यापरिणतमुच्यते गते तु जीवे परिणितम् । अत्र दृष्टान्तो दुग्धदधिना, यथाह - दुग्धं दुग्धत्वात्परिभ्रष्टं दधिभावमापत्रं परिणतमुच्यते, दुग्धभावे व्यवस्थितं अपरिणतं, एवं पृथ्वी कायादिकमपि तच्च यदा दातुः सत्तायां तदा दातृसत्कं गृहीतृसत्तायां गृहीतृसत्कमिति ॥ ६१० ॥ अथ " भावंमि य होह सज्झिलगा" इति व्याख्यानयन् दातृविषयं भावापरिणतमाह दुगमाई सामने जइ परिणमई उ तत्थ एगस्स । देमित्ति न सेसाणं अपरिणयं भावओ एयं ॥ ६११ ॥ द्विकादिसामान्ये- भ्रात्रादिद्विकादिसाधारणे देये यद्येकस्य कस्यापि ददामीत्येवं भावः परिणमति, न शेषाणां, एतद् १ दातृग्रहीतृयोगादितिशेषः, तत्र द्रव्ये द्रव्यविषयं भवति षट्कं सचेतनपृथ्वी कायादिकं द्रव्यरूपत्वात्तस्य भावे चाध्यवसाये पुनर्भवति ' सझिलगा' भ्रातरो वक्ष्यमाणाः, भावाधारत्वेनोपचारात्सहोदराः उपलक्षणत्वात्तस्यैव सम्बन्धिपुत्रादीनां साधुसम्बन्धिसङ्घाकाश्व महः ( पूर्व मुद्रित १६५तमे पत्रे ट्टीपणकं ) अतोऽत्र सम्पूर्णा गाथा मुद्रापिता । अपरिणतद्वारम् । Page #260 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धमारत्नीयाबचूर्युपेता| श्री दागृहितविषयेभावापरिणतं लिप्तद्वारम् पिण्डनियुक्ति ॥११०॥ भावतोऽपरिणतम् । अथ साधारणानिसृष्टस्य दातृभावापरिणतस्य च का परस्परं विशेषः १, उच्यते, साधारणानिसृष्टं दायकपरोक्षत्वे, दातृभावापरिणतं तु दायकसमक्षत्वे इति ।। ६११ ॥ अथ गृहीतविषयं भावापरिणतमाहएगेण वावि एसिं मणंमि परिणामियं न इयरेणं । तंपि हु होइ अगिज्झं सज्झिलगा समि साहू वा॥६१२॥ एकेनाग्रेतनेन पाश्चात्येन वा एषणीयमिति मनसि परिणामितं नेतरेण तदपि भावतोऽपरिणतमिति न ग्राह्यम् , अथ द्विविधस्यापि भावापरिणतस्य विषयमाह-'सज्झिलगे 'त्यादि, तत्र दाविषयं भावापरिणतं-भ्रातृविषयं स्वामिविषयं च, (प्रहीतृविषय ) भावापरिणत-साधुविषयम् ॥ ६१२ ॥ अथ लिप्तद्वारमाह-दध्यादिना लेपो भवतीति तन्न ग्राह्यमित्याहघेत्तवमलेवकडं लेवकडे मा हु पच्छकम्माई । न य रसगेहिपसंगो इअ वुत्ते चोयगो भणइ ॥ ६१३ ॥ साधुना अलेपकद्-वल्लादि ग्रहीतव्यम् , मा भूवन् लेपे कृते गृह्यमाणे पश्चात्कदियो दोषः, अलेपकद्रहणे गुण| माह-न चालेपकृद्हणे रसगृद्धिप्रसङ्गः ॥ ६१३ ।। एवमुक्ते शिष्यो भणतिजइ पच्छकम्मदोसा हवंतिमा चेव भुंजऊ सययं तवनियमसंजमाणं चोयग!हाणी खमतस्स ॥६१४॥ यदि लेपकृद्हणे पश्चात्कर्मादयस्तर्हि मा कदाचनापि साधु तां, सूरिराह-हे शिष्य ! सर्वकालं क्षपयतोऽनशनरूपं | क्षपणं कुर्वतः साधोचिरकालभावितपोनियमसंयमानां हानिर्भवति, तस्मान्न यावजीवं क्षपणं कार्यम् ॥६१४॥ पुन: पर आहलितंति भाणिऊणं छम्मासा हायए चउत्थं तु । आयंबिलस्स गहणं असंथरे अप्पलेवं तु ॥६१५॥ ॥१०॥ Jain Education Inter ! For Private & Personel Use Only aw.jainelibrary.org Page #261 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अलेपकृतमोजने षण्मासादितप:कथनं। लिप्तं सदोषमिति भणित्वा अलेपकद्भोक्तव्यं तीर्थकृदादिभिरनुज्ञातमिति गुरुवचनम् । अत्राह शिष्य:-यावजीवमेव मा भुतां, नोचेत् यावजीवमभोजनेन शक्तिस्तर्हि षण्मासानुपोध्य आचाम्लेन भुङ्का, न चेदेवमपि शक्नोति तत एकदिनादिहान्या तावदात्मानं तोलयेत् यावच्चतुर्थमुपोष्याचाम्लस्य ग्रहणं करोतु, एवमप्यसंस्तरणे अशक्तौ अल्पलेप गृहातु ॥ ६१५ ॥ एनामेव गाथां गाथाद्वयेन विवृणोतिआयंबिलपारणए छम्मास निरंतरंतु खविऊणं। जइ न तरइ छम्मासे एगदिणूणं तओ कुणउ ॥६१६॥ | एवं एक्वेक्कदिणं आयंबिलपारणं खवेऊणं । दिवसे दिवसे गिणहउ आयंबिलमेव निल्लेवं ॥ ६१७ ॥ व्याख्यातपूर्व गाथाद्वयमिदम् ॥ ६१६-६१७ ॥ गुरुराहजइसेन जोगहाणी संपइ एसेव होइ तो खमओ। खमणंतरेण आयंबिलं तु निययं तवं कुणइ॥६१८॥ यदि से-तस्य साधोः सम्प्रति-एष्यति वा काले न योगहानिः-प्रत्युपेषणादिरूपसंयमयोगभ्रंशो न भवति, तर्हि भवतु क्षपक:-षण्मासाद्युपवासकर्ता। तत्र च क्षपणानामेकैकदिनहान्या पूर्वोक्तस्वरूपाणामन्तरान्तरा पारणमाचाम्ले करोतु, एवमप्यशक्तो नियतमाचाम्लरूपं तपः करोतु केवलं, सम्प्रति सेवा-संहननानां नास्ति ताशी शक्तिरिति, न तथोपदेशोऽपि ॥ ६१८॥ पुनः पर आहहेवावणि कोसलगा सोवीरगकूरभोईणो मणुया। जइ तेऽवि जति तहाकिं नामजई नजाविति ६१९ Jan Education inte For Private Personel Use Only Page #262 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयाबचूर्युपेता श्रीपिण्डनियुक्तिः ॥११॥ अधोऽवनयो-महाराष्ट्राः कोशलका:-कोशलदेशोद्भवाः सदैव सौवीरककरकान्नभोजिनस्तेऽपि सेवासंहननाः, त्रयानाततो यदि तेऽपीत्थं यापयन्ति यावजीवं तर्हि तथा-सौवीरककरमात्रभोजनेन किन यतयो यापयन्ति ॥६१९॥ अत्र सूरिराह-- शीतत्वे तिय सीयं समणाणं तिय उण्ह गिहीण तेणणुन्नायं । तत्काईणं गहणं कट्टरमाईसु भइयत्वं ॥६२०॥ तक्रानुज्ञा। त्रिकं वक्ष्यमाणं श्रमणानां शीतं भवति, तदेव त्रिकं गृहिणामुष्णं भवति, तेन यतीनां तक्रादिग्रहणं अनुज्ञातं, कट्टरादिषु-घृतवटिकोन्मिश्रतीमनादिषु ग्रहणं भाज्य-विकल्पनीयं, ग्लानत्वादौ ग्रहणं, नान्यथेति ॥ ६२०॥ अथ किं तत्रिकं ? कथं गुणाय दोषाय वेत्याहआहार उवहि सेज्जा तिण्णिवि उण्हा गिहीण सीएऽवि। तेण उजीरइ तेसिं दुहओ उसिणेण आहारो ६२१ ला आहार उपधिः शय्या एतानि त्रीण्यपि गृहिणां बीतेऽपि-शीतकालेऽपि उष्णानि भवन्ति, तेन तेषां तक्रादिग्रहणमन्तरेणापि 'दुहओ'ति-उभयतो-चायतोऽभ्यन्तरतश्चोष्णेन-तापेनाहारो जीर्यते, तत्राम्यन्तरो भोजनवशाद, बाह्यः | शय्योपधिवशात् ॥ ६२१ ॥ एयाइं चिय तिन्निविजईण सीयाइंहोंति गिम्हेवि । तेणुवहम्मइ अग्गी तओ य दोसा अजीराई ६२२ एतान्येवाहारादीनि त्रीण्यपि यतीनां ग्रीष्मे शीतानि भवन्ति, तत्राहारस्य शीतता मिक्षाभ्रमणे वेलालग्नात् , उपधिरेकमेववारं वर्षमध्ये वर्षाकालादर्वाक थालनेन मलिनत्वात् शय्यायास्तु प्रत्यासमाग्निकरणाभावेन, तेन ग्रीष्मकालेऽपि आहा ॥१११ Jain Education in For Private 3 Personal Use Only ww.jainelibrary.org Page #263 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अलेपाल्पलेपबहुलेपकातानि द्रव्याणि । रादीनां शीतस्वसम्भवरूपेणोपहन्यते, अग्नि:-जाठरो वहिः, ततश्चाजीर्णादयो दोषा जायन्ते, तेन तक्रादिग्रहणं साधनामनुज्ञातम् ॥ ६२२ ॥ अथालेपानि द्रव्याण्याहओयण मंडग सत्तुग कुम्मासा रायमास कल वल्ला । तूयरि मसूर मुग्गा मासा य अलेवडा सुक्का ॥ ओदना-तन्दुलादिमतं मण्डकाः प्रतीताः शक्तवो-यवक्षोदरूपाः कुल्माषा-उडदा, राजमाषा:-सामान्यचवला: श्वेतचवलिका वा, कला-वृत्तचनका सामान्येन वा चनकाः, वल्ला-निष्पावा, तुवरी प्रसिद्धा मसूरा द्विदलविशेषा मुद्रा माषाश्च प्रसिद्धाः, चकारादन्येऽप्येवंविधधान्यविशेषाः शुष्का अनाद्रों-अलेपकृतः ॥ ६२३ ।। अथाल्पलेपाणि द्रव्याण्याहउभिज पिज कंग्रतकोल्लणसूकंजिकढियाई। एए उ अप्पलेवा पच्छाकम्मं तर्हि भइयं ॥६२४॥ उद्या-वस्तुलप्रभृतिशाकमार्जिका पेया-यवागूः कण्डू:-क्रोद्रवौदनः तक्रं प्रतीतं, उल्लणं-येनौदनमार्दीकृत्योपयुज्यते सपो-रामदादाल्यादि, काञ्जिकं-सौवीरं कथितं-तीमनादि, आदिशब्दादन्यस्यैवंविधस्य परिग्रहः, एतान्यल्पलेपद्रव्याणि । एतेषु पश्चात्कर्म भाज्यं-कदाचिद्भवति कदाचिन्नेति ॥ ६२४ ॥ अथ बहुलेपद्रव्याण्याहखीर दहि जाउ कहर तेल्ल घयं फाणियं सपिंडरसं । इच्चाई बहुलेवं पच्छाकम्मं तहिं नियमा ॥६२५॥ क्षीरं दधि च सिद्धं, जाउ-क्षीरपेया, कढरं प्रागुक्तस्वभावं, तैलं घृतं च प्रतीतं, फाणितं-गुरुपानकं सपिण्डरसं अतीव| रसाधिकं खजूरादि इत्यादि बहुलेपं ज्ञेयं, तत्र च पश्चात् कम्म नियमतो भवेदतस्तानि प्रायो वर्जयन्ति यतयः यदुक्तं Jain Educati o nal For Private & Personel Use Only Page #264 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बमा. रत्नीयाबचूर्युपेता भजनायामष्टभङ्गकाः। श्री. पिण्डनियुक्ति ॥११२॥ 'पच्छा कम्मं तहिं भईयं ॥ ६२५ ॥ अथ तामेव भजनामष्टभङ्गिकयाहसट्रेयर हत्थो मत्तो विय दव सावसेसियरं । एएस अट भंगा नियमा गहणं तु ओएसु ॥६२६॥ दातहेस्तः संसष्टोऽसंसष्टो वा स्यात,येन च कृत्वा भिक्षां ददाति. तदपि मात्र संसष्टं असंसृष्टं वा, द्रव्यमाप सावशेष इतरद्वा, एतेषां च त्रयाणां पदानां-< संसृष्टहस्त>संसृष्टमात्रसावशेषद्रव्यरूपाणां सप्रतिपक्षाणां परस्परं संयोगतोऽष्टौ भङ्गा भवन्ति, ते चामी-संसृष्टो हस्तः संसृष्टं मात्रं सावशेष द्रव्यं १, संसृष्टो हस्तः संसृष्टं मात्रं निरवशेष द्रव्यं २, संसृष्टो हस्तोऽसंसृष्टं मात्रं सावशेषं द्रव्यं ३, संसृष्टो हस्तोऽसंसष्ट मात्र निरवशेषं द्रव्यं ४, असंसृष्टो हस्तः संसृष्टं मात्र सावशेष द्रव्य ५, असंसृष्टो हस्तः संसृष्टं मात्र निरवशेष द्रव्यं ६, असंसृष्टो हस्तोऽसंसष्टं मात्रं सावशेष द्रव्यं ७, असंसृष्टो हस्तोऽसंसृष्ट मात्र निरवशेष द्रव्यम् ८, एतेषां मध्ये नियमाव-निश्चयेन ओजस्सु-विषमेषु प्रथमतृतीयपश्चमसप्तमेषु भङ्गेषु ग्रहणं कार्य न समेषु-द्वितीयादिषु इति, अयं भावो-हस्तो मात्रं वा द्वे वा स्वयोगेन संसृष्टे भवतः, असंसृष्टे वा न तद्वशेन पश्चात्कम्म सम्भवति, किन्तु द्रव्यवशेन, तथाहि-यत्र द्रव्यं सावशेष तत्रैव ते साध्वर्थ खरण्टितेऽपि दात्री न प्रक्षालयति, भूयोऽपि परिवेषणसम्भवात् , यत्र तु निरवशेष द्रव्यं तत्र साधुदानानन्तरं नियमतस्तद्रव्याधारस्थाली हस्तं मात्र वा प्रक्षालयतीति पश्चात्कर्मसम्भवः ॥ ६२६ ।। अथ छर्दितद्वारमाहसच्चित्ते अच्चित्ते मीसग तह छड्डणे य चउभंगो । चउभंगो पडिसेहो गहणे आणाइणो दोसा॥६२७॥ ॥ ११२ ॥ Jain Education Inter For Private & Personel Use Only N j ainelibrary.org Page #265 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education छर्दितविषये सचित्ते कदाचित् सचिते अचित्ते मिश्रे वा छर्द्यते, ततश्चतुर्भङ्गी भवति, अत्र जातावेकवचनं, तत्र प्रागिव तिचतुर्भङ्गो भवन्ति, सर्वसङ्ख्यया पूर्ववच्चत्वारि शतानि द्वात्रिंशदधिकानि । एतेषु सर्वेषु भङ्गेषु प्रतिषेधो-भक्तादिनिवारणं, यदि पुनर्ग्रहणं कुर्याचत आज्ञाभङ्गादयो दोषाः ॥ ६२७ ॥ अथ छर्दितग्रहणे दोषानाहउसिणस्स छड्डणे देंतओ व उज्झेज्झ कायदाहो वा । सीयपडणंमि काया पडिए महुबिंदु आहरणं ॥ उष्णस्य द्रव्यस्य छर्दने ददमानो वा भिक्षां दह्येत् भूम्याश्रितानां कायादीनां पृथ्वीकायादीनां दाहः स्यात्, शीतद्रव्यस्यापि भूमौ पतने काया:- पृथ्व्यादयो विराध्यन्ते तत्र पतिते मधुबिन्दुदाहरणं, तथाहि - ( ० ४४ ) वारतपुरे अभयसेनो राजा वारतको मन्त्री, अन्यदा मन्त्रिगृहे धर्म्मघोषसाधुर्भिक्षार्थमायातः, तद्भार्या च तस्मै भिक्षादानाय घृतखण्डसन्मिश्रपाय सभृतस्थालमुत्पाटितवती, अत्रान्तरे च कथमपि खण्डमिश्र घृतबिन्दुर्भूमौ निपतितः, साधुरपि छर्दितदोषदुष्टां भिक्षां ज्ञात्वा नात्तभिक्षाक एवं निर्जगाम, दृष्टं च तत्स्वरूपं मत्तवारणस्थितेनामात्येन, ततश्चिन्त - यामास - किमनेन भगवता भिक्षा न गृह्यते स्म यावदेवं चिन्तयति तावत्तत्रविन्दौ मक्षिकाः समागत्याशिश्रियन्, तासां च भक्षणाय प्रधाविता गृहगोधिका, तस्या अपि वधाय प्रधावितः सरटः, तस्यापि वधाय धावति स्म मार्जारी, तस्या अपि च वधाय प्रधावितः प्राघूर्णकः श्वा, तस्यापि च प्रतिद्वन्द्वी प्रधावितोऽन्यो वास्तव्यः श्वा द्वयोरपि शुनोरन्योऽन्यं कलहोऽभूत्, ततः स्वस्वसारमेयपराभवदूनमनस्कतया प्रधावितयोर्द्वयोरपि तत्स्वामिनोरभूत्परस्परमस्यसि युद्धम्, तद्दृष्ट्वा वारत्तकामात्यस्य श्रीसर्वज्ञमते श्रद्धा बभूव, ततोऽमात्यो धर्म्मघोषसमीपे दीक्षामादाय केवलव्याघ्या (लमवाप्य ) छर्दिते मधुबिन्दुदाहरणम् । Page #266 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीया बचूर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः । ॥११३॥ Jain Education Intel सिद्ध इति ॥ ६२८ ॥ उक्तमेषणाद्वारं, अथ ग्रासैषणायाः संयोजनादीनि पदानि वक्तव्यानि ततो ग्रासैषणानिक्षेपमाहमंठवणा दविए भावे घासेसणा मुणेयव्वा । दवे मच्छाहरणं भावंमि य होइ पंचविद्दा ॥ ६२९ ॥ नामस्थापना द्रव्यभावभेदाच्चतुर्द्धा ग्रासैषणा, नामस्थापने प्रागिव, द्रव्ये मत्स्यः उदाहरणम्, भावग्रासैषणा संयोजनादिभेदात् पश्चविधा ॥ ६२९ ।। तत्र द्रव्यग्रासैषणोदाहरणस्य सम्बन्धमाह चरियं व कप्पियं वा आहरणं दुविहमेव नायबं । अत्थस्स साहणट्ठा इंधणमिव ओयणट्टाए ॥ ६३० विवक्षितार्थस्य साधनार्थं चरितं कल्पितं वा द्विधा उदाहरणं ज्ञातव्यम्, 'इन्धनमित्र ओदनार्थ, तत्र प्रस्तुतार्थसाधनार्थमिदं कल्पितमुदाहरणं, तथाहि - ( दृ० ४५ ) Parsaat मत्स्यबन्धी मत्स्यग्रहणनिमित्तं सरो गतवान् गत्वा तेन तटस्थेनाग्रभागे मांसपेशीसमेतो गलः सरोमध्ये प्रचिक्षिपे, तत्र च सरसि परिणतबुद्धिरेको महादक्षो जीर्णमत्स्यो वर्त्तते, स गलगतमांसगन्धमाघ्राय तद्भक्षणार्थं गलस्य समीपमुपागत्य यत्नतः पर्यन्तेर सकलमपि मांसं खादित्वा पुच्छेन चागलमाहत्य दुरतोऽपचक्राम, मत्स्यबन्धो च गृहीतो गन मत्स्य इति विचिन्त्य गलमाकुष्टवान् पश्यति मत्स्यमांसपेशी रहितं गलं, ततो भूयोऽपि समांसं गलं चिक्षेप, मत्स्येनापि तथैव कृतं एवं श्रीन् वारान् मत्स्यो मांसं खादितवान् न च गृहीतो मत्स्यबन्धकेन ॥ ३३० ॥ अह मंसंमि पहीणे झायंतं मच्छियं भणइ मच्छो । किं झायसि तं एवं सुण ताव जहा अहिरिओऽसि ॥ ६३१ द्रव्यप्रासैषणाय . कल्पितोदाहरणम् । ॥११३॥ Page #267 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कल्पितो दाहरणे मत्सोक्तिः। अथ मांसे प्रवीणे ध्यायन्तं मात्सिकं मत्स्यो भणति, यथा किं त्वमेवं ध्यायसि , शृणु तावत यथा त्वमट्टीकोनिर्लजो भवसि ॥ ६३१ ॥ तिबलागमुहम्मुक्को, तिक्खुत्तो वलयामुहे । तिसत्तक्खुत्तो जालेणं, सइ छिन्नोदए दहे ॥ ६३२ ॥ __अहमेकदा श्रीन वारान् बलाकाया मुखादुन्मुक्ता, तथाहि-कदाचिदहं चलाकया गृहीतस्ततस्तया मुखे प्रक्षेपार्थमूर्ध्वमस्क्षिप्तस्ततो मया चिन्तितं, यद्यहमृजुरेवास्या मुखे निपतिष्यामि तर्हि पतितोऽयं मुखे इति न मम प्राणकुशलं, तस्मात्तिर्यग निपतामीत्येवं विचिन्त्य तथैवकृतं, परिभ्रष्टस्तस्या मुखात्ततो भूयोऽप्यूर्वमुत्क्षिप्तस्तथैव द्वितीयवारमपि मुखास्परिभ्रष्टा, वतीयवेलायां तु जले निपतितस्ततो दूरं पलायितः, तथा त्रि:कृत्वा-त्रीन् वारान् वलयामुखे भ्राष्टरूपे निपतितोऽपि दक्षतया शीघ्र वेलयैव सह विनिर्गतः, तथा त्रिसप्तकृत्वा-एकविंशतिवारान् मात्सिकेन जाले प्रक्षिप्तेऽपि पतितो यावमायापि स मत्स्यबन्धी सोचयति जालं तावत् येनैव मार्गेण यथा प्रविष्टस्तेनैव ततो जालाद्विनिर्गतः, जालेनेति तृतीयार्थे पश्चमी द्रष्टव्या, तथा सकृत्-एकवारं मात्सिकेन इदजलमन्यत्र सञ्चार्य तस्मिन् इदे छिनोदके बहुभिर्मत्स्यैः सहाहं गृहीतः, सच सर्वानपि तान् मत्स्यान् यावदेकत्र पिण्डीकृत्य तीक्ष्णाय शलाकायां प्रोतयति, ततोऽहं दक्षतया यथा मात्सिको न पश्यति तथा स्वयमेव तामयःशलाकां वदनेन लगित्वा स्थितः, स च मासिकस्तान कईमलितान् प्रक्षालयितुं सरसि जगाम, तेषु च प्रक्षाल्यमानेष्वन्तरं ज्ञात्वा झटत्येव जलमध्ये निमनवान् ॥ ६३२ ॥ Jain Education I L onal For Private Personal Use Only Page #268 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीया मचूर्युपेता भी पिण्ड निर्युक्तिः । ॥११४॥ एयारितं ममं सत्तं सढं घट्टियघट्टणं । इच्छसि गलेण घेतुं, अहो ते अहिरीयया ॥ ६३३ ॥ एतादृशं पूर्वोक्तं मम सवं शठं-कुटिलं घट्टितस्य- धीवरादिकृतस्योपायस्य घट्टनं चालकं, ततस्त्वमिच्छसि मां गलेन गृहीतुमित्यहो ते तव अज्ञीकृता-निर्लज्जतेति । अथ भावग्रासैषणायामुपनयः - मत्स्यस्थानीयः साधुः, मांसस्थानीयं भक्तपानीयं मात्सिकस्थानीयो रागादिदोषगणः, यथा न छलितो मत्स्यो दक्षत्वेन, एवं साघुरप्यात्मानं रक्षयेदनुशास्तिप्रदानेन ॥ ६३३ ॥ तदेवाह बायालीसेसणसंकडंमि गहणं जीव ! न हु छलिओ । इपिंह जहन छलिज्जसि भुंजतो रागदोसेहिं ॥ ६३४ हे जीव ! द्विचत्वारिंशद्दोषसङ्कटे ग्रहणे भक्तपानस्य यदि त्वं न छलितस्तत इदानीं भुञ्जानो रागद्वेषाभ्यां यथा न छल्यसे तथा कर्त्तव्यम् ॥ ६३४ ॥ अथ भावग्रासैषणामाह घासणा उभावे होइ पसत्था तहेव अपसत्था । अपसस्था पंचविहा तद्विवरीया पसत्था उ || ६३५॥ ग्रासपणा भावे द्विधा - सामान्येन प्रशस्ताप्रशस्तभेदात्, अप्रशस्ताः पश्वविधाः संयोजनादिदोषाः, तद्विपरीता दोषरहितत्वेन प्रशस्ता ज्ञेया ।। ६३५ ।। तदेवाह - * संजो गाहा संयोजयति भक्तं अतिबहुकमप्रमाणं साङ्गारं सधूमं च अनर्थाय निष्कारणं एषा पश्चविधा अप्रशस्ता तद्विपरीता प्रशस्ता च ॥ * ॥ अथ संयोजनानिक्षेपमाह मत्सोदाहरणेन भाव ग्रासैषणा । ॥११४॥ । Page #269 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Intern वे भावे संजोअणा उ दवे दुहा उ बहिअंतो । भिक्खं चिय हिंडतो संजोयंतंमि बाहिरिया ॥६३६ संयोजना द्विधा-द्रव्यभावे च द्रव्ये पुनर्द्विधा बहिरन्तश्च तत्र यदा भिक्षार्थमेव हिण्डमानः सन् क्षीरादिकं खण्डादिभिः सह रसविशेषोत्पादनाय संयोजयति, एषा बाह्या वहिर्भूतत्वात् ।। ६३६ ॥ एतदेव स्पष्टमाहखीरदहिसू कहरलंभे गुडसप्पिवडगवालुंके । अंतो उ तिहा पाए लंबण वयणे विभासा उ ॥ ६३७॥ क्षीरदधिम्रपानां प्रतीतानां कट्टरस्य - तीमनविशेषस्य लाभे सति तथा गुड्सपिर्वटकवालुङ्कानां प्राप्तौ सत्यां रसोत्पादनायानुकूलद्रव्यैः सह संयोजनं यत्करोति, बहिरेव स बाह्येति, अभ्यन्तरा पुनर्वसतावागत्य भोजनवेलायां संयोजयति, तथा चाह - अन्तस्तु संयोजना त्रिधा - पात्रे लम्बने वदने च ततोऽस्यास्त्रिविधाया अपि विभाषा व्याख्या कर्त्तव्या सा चैवं पात्रे विशेषोत्पादनाय यत् क्षीरघृतखण्डादिसंयोगं करोति, एवं लम्बने - कवले हस्तस्थिते, एवं वदने कचले क्षिप्ते || ६३७ || अत्र दोषमाह संजोयणाए दोसो जो संजोएइ भत्तपाणं तु । दबाई रसहेउं वाघाओ तस्सिमो होइ ॥ ६३८ ॥ संयोजनायां यो द्रव्यस्य सुकुमारिकादे रसहेतभक्तं पानं चान्यद्रव्येण खण्डादिना संयोजयति, अन्त्रार्षत्वादादिशब्दस्य व्यत्ययेन योजनाः, तेन रसहेतोरित्यादिशब्देन शुभगन्धादिनिमित्तं च तस्य साधोरयं वक्ष्यमाणो दोषो व्याघातरूपो भवति ।। ६३८ ।। तमेव भावयन् भावसंयोजनामप्याह २. संयोजनादोष स्वरूपम् । Page #270 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीया वचूर्युपेता श्री. पिण्डनिर्युक्तिः । ॥११५॥ Jain Education Inte संजोयणा उभावे संजोएऊण ताणि दबाई | संजोयइ कम्मेणं कम्मेण भवं तओ दुक्खं ॥६३९॥ तानि द्रव्याणि संयोजयन् आत्मानमप्रशस्तेन गृध्यात्मकेन भावेन संयोजयति, एषा भावे संयोजना, तथा चात्मनि कर्म्म संयोजयति, कर्म्मणा च भवं भवेन दुःखम् ।। ६३९ ।। अथ द्रव्यसंयोजनाया अपवादमाह पत्तेय पउरलंभे भुत्तुवरिए य से सगमणट्ठा। दिट्ठो संजोगो खलु अह कम्मो (कमो) तस्सिमो होइ ॥ प्रत्येकमेकैकसङ्घाटकं प्रति प्रचुरलाभे सति भुक्तोद्धरिते शेषस्य निर्गमनार्थम्, दृष्टः- अनुज्ञातः, संयोगस्तीर्थकदादिभिरिति, तथा लाभात्, अथवाऽन्योऽपि तस्य संयोगस्य क्रमो भवति ॥ ६४० ॥ तमेवाह रसहेउं पडिसिद्धो संयोगो कप्पए गिलाणट्टा । जस्स व अभत्तछंदो सुहोचिओऽभाविओ जो य ॥ रसहेतोः प्रतिषिद्धः संयोगो, ग्लानार्थं तु कल्पते, यद्वा यस्य अभक्तछन्दो - मक्तारुचि, यश्च सुखोचितो - राजपुत्रादिः वाद्याप्य भावितो - परिणितचारित्रः ( शैक्षकः ) तन्निमित्तं संयोगोऽपि कल्पते इति अपवादपदम् ।। ६४१ ।। अथाहारप्रमाणद्वारमाह बत्तीसं किर कवला आहारो कुच्छिपूरओ भणिओ । पुरिसस्त महिलियाए अट्ठावीसं भवे कवला ॥ सुगमा, परं नपुंसकस्य चतुर्विंशतिकवला अनुक्ता अपि ज्ञेयाः, तस्य प्रायो दीक्षानर्हत्वादकथनं कवलप्रमाणं कुक्कुट्यण्डं, कुक्कुटी द्विधा - द्रव्यतो मावतच, द्रव्यकुक्कुट्यपि द्विधा - उदरकुक्कुटी गलत्कुक्कुटी च, ततो साधोरुदरं यावन्मात्रेणाहारेण न संयोजना दोष स्वरूपम् । ॥११५॥ Page #271 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education In न्यूनं नाप्याध्मात आहार एव स उदरकुक्कुटी, उदरपूरक आहारः कुक्कुटीव उदरकुक्कुटीति मध्यपदलोपिसमासाश्रयणात्, तस्य द्वात्रिंशत्तमो भागोऽण्डकं, तत्प्रमाणं कवलस्य, अथवा गल एव कुक्कुटी तस्यान्तरालमण्डकं, अयं भावः - अविकृतास्यस्य पुंसो गलान्तराले यः कवलो विलग्नः प्रविशति तत् प्रमाण कवलस्य, अथवा शरीरमेव कुक्कुटी सन्मुखमण्डकं, तत्राक्षिकपोल. वां विकृतिमनापाद्य यः कवलो मुखे प्रविशति तत् प्रमाणं, अथवा कुक्कुटी-पक्षिणी तस्या अण्डकं प्रमाणं कवलस्य, भावकुक्कुटी तु येन आहारेण भुक्तेन न न्यूनं नाप्यत्याध्मातं स्या[दुदाहर्ति ] (दुदरं) धृतिं च समुद्रहति तावत्प्रमाण आहारो भाव कुक्कुटी, अत्र भावस्य प्रधानत्वादेष प्राक् द्रव्यकुकुट्यप्युक्तः, इह भावकुक्कुटी उक्तः, तस्य द्वात्रिंशत्तमो भागोऽण्डकं तत् प्रमाणं कवलस्य ।। ६४२ ॥ एत्तो किणाइ हीणं अर्द्ध अद्धद्वयं व आहारं । साहुस्स बिंति धीरा जायामायं च ओमं च ॥६४३॥ एतस्माद्वात्रिंशदादिकवलप्रमाणाहारात् 'किणाइ' इति कियन्मात्रया एकेन द्वाभ्यां वा हीनं यावदर्द्धमर्द्धस्याप्यर्द्ध. माहारं यात्रामात्राहारं साधोधराः - तीर्थ कदादयो ब्रुवते, न्यूनं च । एष एव यात्रामात्राहार एष एवावमाहारश्च ।। ६४३ ॥ अथ प्रमाणदोषानाह पगामं च निगामं च, पनीयं भत्तपाणमाहारे । अइबहुयं अइबहुसो, पमाणदोसो मुणेो ॥६४४॥ यः प्रकामं निष्कामं प्रणीतं वा भक्तपानमाहारयति, तथाऽतिब हुकमतिबहुशश्च तस्य प्रमाणदोषो ज्ञातव्यः ॥ ६४४ ॥ आहारप्रमाणम् । Page #272 -------------------------------------------------------------------------- ________________ -1 प्रकामादि क्षमारत्नीयाबचूर्युपेता स्वरूपम् । श्री पिण्डनियुक्तिः। सम्प्रति प्रकामादिस्वरूपमाहबत्तीसाइ परेणं पगाम निच्चं तमेव उ निकामं । जं पुण गलंतनेहं पणीयमिति तं बुहा बेंति ॥६४५॥ द्वात्रिंशदादिकवलेभ्यः परेण यद्भोजनं तत् प्रकामं तमेव प्रमाणातीतं प्रतिदिवसमनतो निकामभोजनं, यत्पुनर्गल स्नेहं तत् प्रणीतं बुधाः-तीर्थकुदादयो ब्रुवते ॥ ६४५॥ अइबहयं अइबहसो अइप्पमाणेण भोयणं भोत्तुं । हाएज व वामिज व मारिज व तं अजीरंतं ॥६४६ ___ अतिबहुकमतिबहुशोऽतृप्यता भोजनं-भुक्तं हादयेत्-अतीसारं कुर्यात् , वामयेव , यद्वा तदजीर्यन्मारयेत् ॥ ६४६ ॥ अथातिबह्वादिस्वरूपमाहबहुयातीयमइबहुं अइबहुसो तिन्नि तिन्नि व परेणं। तंचिय अइप्पमाणं भुंजइ जंवा अतिप्पंतो॥६४७ बहुकातीतं-अतिशयेन बहु अतिबदुकं निजप्रमाणाम्यधिकमित्यर्थः, तथा दिनमध्ये यस्त्रीन् वारान् भुङ्क्ते त्रिभ्यो वारेभ्यो वा परतस्तद्भोजनमतिबहुशः, तदेव च वारत्रयातीतमतिप्रमाणमुच्यते, 'अइप्पमाणे 'त्यवयवो व्याख्यातः, अस्यैव प्रकारान्तरेण व्याख्यानमाह-मुक्ते यद्वा अतृप्यन् एष " अहप्पमाणे "त्यस्य शब्दस्यार्थः ॥ ६४७ ॥ अथ प्रमाणोपेताहारप्रहणे गुणानाहहियाहारा मियाहारा, अप्पाहारा य जेनरा । न ते विजा तिगिच्छति, अप्पाणं ते तिगिच्छगा॥६४८॥ ॥११६॥ For Private & Personel Use Only Page #273 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रमाणोप च । हितं द्विधा-द्रव्यतो मावतः, द्रव्यतोऽविरुद्वानि द्रव्याणि, मावत एषणीयं, तदाहारयन्ति ये ते हिताहाराः, मिताहाराः, अल्पाहाराश्च ये नराः तानेवंविधान् नरान् वैद्या न चिकित्सन्ति, रोगस्यैवाभावात् , आत्मनैवात्मनस्ते चिकित्सकाः ताहारस्य ॥ ६४८ ॥ अथाहितहितस्वरूपमाह- . गुणाः | तेल्लदहिसमाओगा अहिओ खीरदहिकंजियाणं च। पत्थं पुण रोगहरं न य हेऊ होइ रोगस्स॥६४९ हिताद्या दधितैलयोस्तथा क्षीरदधिकाञ्जिकानां च यः समायोगः सोऽहितो विरुद्ध इत्यर्थः, अविरुद्धद्रव्यमीलनं पुनः पथ्यं, INहारस्वरूपं तच्च रोगहरं, न च भाविनो रोगस्य हेतु:-कारणम् ॥ ६४९ ॥ साम्प्रतं मितं व्याख्यानयतिअद्धमसणस्स सबंजणस्स कुज्जा दवस्स दो भागे। वाऊपवियारणट्रा छब्भायं ऊणयं कुज्जा ॥६५०॥ इह किल सर्वमुदरं षड्भिर्भागैविभज्यते, तत्र चाई भागत्रयरूपमशनस्य सन्यजनस्य, तत्र शाकादिसहितस्याधारं कुर्यात् , तथा द्वौ भागौ द्रवस्य-पानीयस्य, षष्ठं तु मागं वायुप्रविचारणार्थ ऊनं कुर्यात् ॥ ६५० ॥ इह कालापेक्षया तथा २ आहारस्य मानं भवति, कालश्च विधा, तथा चाहसिओ उसिणो साहारणो य कालो तिहा मुणेयत्वो। साहारणमि काले तत्थाहारे इमा मत्ता ॥६५१ ___सुगमा, नवरं साधारणे काले आहारे इयं-अनन्तरोक्ता मात्रा-प्रमाणम् ॥ ६५१ ।। सीए दवस्स एगो भत्ते चत्तारि अहव दो पाणे। उसिणे दवस्स दोन्नि उ तिन्नि व सेसा उ भत्तस्स ॥ Jain Education Intel ब Page #274 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयावचूर्युपेता शीतादि. कालआहार. प्रमाणम् । पिण्डनियुक्तिः ॥११७॥ शीते-अतिशीतकाले द्रवस्यैको भागः, चत्वारो भक्ते-भक्तस्य, मध्यमे तु शीतकाले द्वौ भागौ पानीयस्य त्रयस्तु भागा भक्तस्य, वाशब्दो मध्यमशीतकालसंसूचनार्थः, यथा उष्णे-मध्य मोष्णकाले द्वौ भागौ पानीयस्य शेषास्तु त्रयो भागा भक्तस्य, अत्युष्णे च काले त्रयो भागा द्रवस्य द्वौ भागौ भक्तस्य, वा शब्दोऽत्रात्युष्णकालसूचनार्थः सर्वत्र षष्ठो भागो वायुप्रविचारणार्थ मुक्तलो मोक्तव्यः ॥ ६५२ ।। अथ भागानां स्थिरचिरविभागमाहएगो दवस्स भागो अवट्ठितो भोयणस्स दो भागा । वडंति व हायंति व दो दो भागा उ एक्कक्के ॥ __एको द्रवस्य भागोऽवस्थितौ द्वौ भागौ भोजनस्य, शेषौ द्वौ २ भागौ एकैकस्मिन् भक्ते पाने च, वर्द्धते वा हीयते वा ॥ ६५३ ।। तदेवाहएत्थ उ तइयचउत्था दोणिय अणवट्ठिया भवे भागा। पंचमछट्ठो पढमो बिइओऽवि अवट्ठिया भागा॥ __आहारविषयौ तृतीयचतुर्थों भागावनवस्थितौ, तो ह्यतिशीतकाले भवतोऽत्युष्णकाले च न भवतः, तथा यः पानविषयः पञ्चमो भागो यश्च वायुप्रविचारणार्थ षष्ठो भागो यौ च प्रथमद्वितीयावाहारविषयौ एते सर्वेऽपि भागा अवस्थिताः, न कदा. चिन्न भवन्तीति भावः ॥ ६५४ ॥ अथ साङ्गारसधूमद्वारमाहतं होइ सइंगालं जं आहारेइ मुच्छिओ संतो। तं पुण होइ सधूमं जं आहारेइ निंदतो ॥६५५ ॥ तद्भवति साङ्गारं भोजनं यन्मूच्छितो गृद्धः सन्नाहारयति, तत्पुनर्भवति सधूमं यनिन्दनाहारयति ।। ६५५॥ अथाजार d॥११७॥ Jain Education Internal For Private Personal Use Only Alww.jainelibrary.org Page #275 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education In धूमयोर्लक्षणमाह अंगारत्तमपत्तं जलमाणं इंधणं सधूमं तु । अंगारत्ति पच्चइ तं चिय दडुं गए धूमे ॥ ६५६ ॥ अङ्गारत्वमप्राप्तं ज्वलदिन्धनं सधूममुच्यते, तदेवेन्धनं दग्धं धूमे गते सति अङ्गार इति, एवमिहापि चरणेन्धनं रागाग्निना निर्दग्धं सत् अङ्गार इत्युच्यते, द्वेषाग्निना तु दह्यमानं चरणेन्धनं सधूमम् ॥ ६५६ ॥ एतदेव भावयति — रागग्गिसंपत्तिो भुंजतो फासूयंपि आहारं । निद्दड्डुंगालनिभं करेइ चरणिंधणं खिप्पं ॥ ६५७ ॥ प्राशुकमप्याहारं भुञ्जानो रागाग्निसम्प्रदीप्तश्चरणेन्धनं निर्दग्धाङ्गारनिभं क्षिप्रं करोति ॥ ६५७ ॥ दोसग्गीवि जलंतो अप्पत्तियधूमधूमियं चरणं । अंगारमित्तसरिसं जा न हवइ निद्दही ताव ॥६५८ द्वेषाग्निरपि ज्वलन् अप्रीतिरेव - कलुषभाव एव धूमस्तेन धूमितं चरणेन्धनं यावदङ्गारमात्रसदृशे न भवति तावनि - दहति ॥ ६५८ ॥ तत इदमागतं - रागेण सइंगालं दोसेण सधूमगं मुणेयवं । छायालीसं दोसा बोद्धव्वा भोयणविहीए ॥ ६५९ ॥ रागेण भोजनं साङ्गारं, द्वेषेण सधूमकं ज्ञातव्यं, एवं भोजनविधौ सर्वसङ्ख्या ४६ भेदाः, तथाहि - पञ्चदशोद्गमदोषाः, अध्यवपूरकस्य मिश्रजातेऽन्तर्भावितत्वात् षोडश उत्पादनादोषा, दश एषणाद्दोषाः, संयोजनादीनां पञ्चकमिति ।। ६५९ ।। कीer पुनराहारो भोक्तव्यः, साधुनेत्याह अङ्गारधूमदोष स्वरूपम् । Page #276 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीया बचूर्युपेता श्री पिण्डनिर्युक्तिः । ॥११८॥ Jain Education Intér आहारंति तवस्सी विगइंगालं च विगयधूमं च । झाणज्झयणनिमित्तं एसुवएसो पवयणस्स ॥ ६६०॥ तपस्विन आहारयन्ति भोजनं विगताङ्गारं विगतधूमं च परं न निष्कारणं किन्तु ध्यानाध्ययननिमित्तं, एष उपदेशः प्रवचनस्य ।। ६६० || अथ कारणद्वारमाह छहिं कारणेहिं साधू आहारितोऽवि आयरइ धम्मं । छहिं चैव कारणेहिं णिज्जूहिंतोऽवि आयरइ ॥ ६६९ पद्भिः कारणैर्वक्ष्यमाणैः साधुराहारमाहारयन्नप्याचरति धर्म्म, तथा षद्भिरेव कारणैर्वक्ष्यमाणैराहारं निज्जूहिन्तो त्रित्ति - परित्यजन्नप्याचरति धर्म्मम् || ६६१ || अथ यैः कारणैराहारमाहारयति तान्याह - वे वेयावेच्चे इरिट्ठीए य संजमट्ठाए । तह पार्णवत्तियाए छटुं पुण धम्मचिंताए । ६६२ ॥ यदैकदेशे पदसमुदायोपचारात्, वेयणत्ति - क्षुद्वेदनोपशमनाय तथा आचार्यादीनां वैयावृत्य करणाय, इर्यापथशोधनार्थं वा, संयमनिमित्तं वा, तथा प्राणप्रत्ययार्थ- प्राणसन्धारणार्थ, षष्ठं पुनः कारणं धर्मचिन्तार्थम् ।। ६६२ ।। एनामेव गाथां विवृणोति - नत्थि छुहाए सरिसा वियणा भुंजेज तप्पसमणट्ठा। छाओ वेयावश्चं ण तरइ काउं अओ भुंजे ॥६६३ Rasa सोई हाईअं च संजमं काउं । धामो वा परिहायइ गुणऽणुप्पेहासु अ असत्तो ॥ ६६४ १" इरिअ "मित्यादिगाथा आवचूरिकृता न स्वीकृता न च व्याख्याता । आहारे कारणानि । ॥११८॥ Page #277 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inte नास्ति त्रासदृशी वेदना, उक्तञ्च - " पंथसमा नत्थि जरा दारिदसमो य परिभवो नत्थि । मरणसमं नत्थि भयं छुहासमावेयणानत्थि ।। १ ।। तं नत्थि जं न वाहइ तिलतुसमित्तंपि एत्थ कायस्स । सन्निज्यं सवदुहाई देत आहाररहियस्स ॥ २ ॥ " ततस्तत्प्रशमनार्थं भुञ्जीत, छातो- बुभुक्षितः सन् वैयावृत्यं कर्तुं न शक्नोति, तथा चोक्तम् - " गलइ बलं उच्छाहो अवेइ सिढिलेइ सयलवावारे । नासह सत्तं अरई विवड असणरहियस्स || १ ||" अतो वैयावृत्य करणाय भुञ्जीत । एवमीर्याथशोधनादीन्यपि कारणानि मान्यानि ॥ ६६३-६६४ ॥ अथ यैः कारणैर्न भुङ्क्ते तत् सम्बन्धमाह - अहव ण कुज्जाहारं, छहिं ठाणेहिं संजए । पच्छा पच्छिमकालंमि, काउं अप्पक्खमं खमं ॥ ६६५ ॥ अथवा एभिर्वक्ष्यमाणैः षद्भिः स्थानैः संयत आहारं न कुर्यात्, तत्र विचित्रा सुत्रगतिरिति षष्ठं शरीरव्यवच्छेदलक्षणं व्याख्यानयति, पच्छा इत्यादि पश्चात् शिष्यनिष्पादनादिसकल कर्त्तव्यतानन्तरं पश्चिमे काले, अप्पखमंति-संलेखना - करणेनात्मानं क्षपयित्वा यावज्जीवानशन प्रत्याख्यानकरणस्य क्षमं-योग्यमात्मानं कृत्वा भोजनं परिहरेत्, नान्यथा ॥ ६६५ ॥ अथाभोजन कारणान्याह - आर्यके उवसग्गे, तितिक्खयों बंभचेरगुत्तीसुं । पाणिदयौ तवहेडें, सरीरवोच्छेयणट्टाएँ ॥ ६६६ ॥ आतङ्के ज्वरादौ १, उपसर्गे - राजादिक्रतेति भिक्षार्थमुपसर्गसहनार्थं २, ब्रह्मचर्यं गुप्तिब्बिति ३, अत्र षष्ठ्यर्थे सप्तमी, ततो ब्रह्मचर्यगुतीनां परिपालनाय ३, प्राणिदयार्थं ४, तपोहेतोः ५, तथा चरमकाले शरीर व्यवच्छेदार्थम् ६ ॥ ६६६ ॥ अभाजने कारणानि । Page #278 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आतङ्कादिकारणानि स्वरूपम् । धमारत्नीयाबचूर्युपेता श्रीपिण्डनियुक्तिः। ॥११९॥ एनामेव गाथां विवृणोतिआयंको जरमाई रायासन्नायगाइ उवसग्गो। बंभवयपालगट्रा पाणिदया वासमहियाई॥६६७॥ आतङ्को-ज्वरादिस्तत्र न भुञ्जीत, यत उक्तम् “बमावरोधि निर्दिष्ट, वरादौ लङ्घनं हितम् । ऋतेऽनिलश्रमक्रोधशोककामक्षतज्वरान् ॥१॥" तथा राजस्वजनादिकतोपसर्गे च, तथा ब्रह्मव्रतपालनाथ, तथा वर्षे वर्षति मिहिकायां वा निपतन्त्यां प्राणिदयार्थ नाश्नीयात् ॥ ६६७ ॥ | तवहेउ चउत्थाई जाव उ छम्मासिओ तवो होइ । छटुं सरीरवोच्छेयणट्ठया होअणाहारो ॥६६८॥ तपो हेतोर्न भुञ्जीत, तपश्चतुर्थादि यावत् षण्मासिकं भवति, षष्ठं पुनः प्रागुक्तविधिना चरमकाले शरीरव्यवच्छेदार्थ भवत्यनाहारः ॥ ६६८॥ एएहिं छहिं ठाणेहिं, अणाहारो उ जो भवे । धम्म नाइक्कमे भिक्ख, धम्मज्झाणरओ भवे ॥ ॥ ___ सुगमा ॥ ॥एवं चोक्ता त्रिविधाप्येषणा-गवेषणैषणा ग्रहणैषणा ग्रासैषणा ॥ अथ सकलदोषसङ्कलनामाह| सोलस उग्गमदोसा सोलस उप्पायणाए दोसाउ। दस एसणाएँ दोसा संजोयणमाइ पंचेव ॥६६९ सुगमा, सर्वसङ्ख्यया सप्तचत्वारिंशदेषणा दोषाः, एतान् विशोधयन पिण्डं विशोधयति, पिण्डविशुद्धौ च चारित्र१ एषा गाथा श्रीवीराचार्यवृतौ दृश्यते श्रीमलयगिरिवृतौ च न दृश्यते । ॥११९॥ Jain Education Internal For Private & Personel Use Only Page #279 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उद्गमादिदोषपरि शुद्धौ चरणत्वम्। विशुद्विः, चारित्रशुद्धौ मुक्तिसम्प्राप्तिः, उक्तश्च-" एए विसोहयंतो पिंडं सोहेइ संसओ नत्थि । एए अविसोहिते चरित्रभेयं । वियाणाहि ॥१॥ समणसणस्स य सारो भिक्खायरिया जिणेहिं पन्नत्ता । एत्थ परितप्पमाणं तं जाणसु मंदसंवेगं ॥२॥ नाणचरणस्स मूलं मिक्खायरिया जिणेहिं पनत्ता । एत्थ उज्जममाणं तं जाणसु तिवसंवेगं ।।३॥ पिण्डं असोइयंतो अचरिती एत्थ संसओ नस्थि । चारिचम्मि असंते निरस्थिया होइ दिक्खा उ॥४॥ चारिचम्मि असंतम्मि, निवाणं न उ गच्छइ । निवाणमि असंतम्मि, सबा दिक्खा निरस्थगा ॥५॥" तस्मादुद्गमादिदोषपरिशुद्धः पिण्ड एषयितव्यः ॥ ६६९ ॥ एसो आहारविही जह भणिओ सवभावदंसीहि। धम्मावस्सगजोगा जेण न हायति तं कुज्जा ॥६७० एष आहारविधिर्यथा भणितः सर्वभावदर्शिभिस्तथा मया व्याख्यात इति । पश्चार्द्धनापवादमाह 'धर्मे त्यादि, धर्मावश्यकयोगा:-श्रुतधर्माचारित्रधर्मप्रतिक्रमणादिव्यापारा येन न हीयन्ते, तथाऽपवाद सेवेतेतिभावः ।। ६७० ॥ साधुना हि | यथायथमुत्सर्गापवादस्थितेन भवितव्यम् । या चापवादसेवनया विराधनाऽशठस्य जायते साऽपि निर्जरा फला, तथा चाहजा जयमाणस्स भवे विराहणा सुत्तविहिसमग्गस्स।सा होइ निजरफला अज्झस्थविसाहजुत्तस्स। यतमानस्य सूत्रोक्तविधिपरिपालनपूर्णस्याध्यात्मविशोधियुक्तस्य रागद्वेषाम्यां रहितत्वात् या भवेद्विराधनाऽपवाद. प्रत्यया सा भवति निर्जरा फला ॥ ६७१ ॥ श्रीबृहद्वत्तिमालोक्य, गंभीरार्थापि निश्चितं । मया श्रीपिण्डनियुक्तिः, प्रकटाथं विनिर्ममे ॥ १ ॥ JainEducational Page #280 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अवचूरि क्षमारत्नीयावचूर्युपेता श्री प्रशस्तिः प्रार्थना पुष्पिका पिण्डनियुक्तिः ॥१२०॥ इति श्रीपिण्डनियुक्तिरवचूरिता। इति श्रीविधिपक्षगच्छगगनरविमण्डलश्रीगच्छेश्वरश्रीजयकीर्तिमूरिशिध्यक्षमारत्नेन स्वपरावयोधाय श्रीपिण्डनियुक्तिरवचूरिरलेखि ॥ १॥ यत्किश्चिन्मतिदौर्बल्यादसङ्गतमिहागतम् । तच्छोधने विधातव्या, कृपा सद्भिः सबुद्धिभिः॥२॥ | यावदिन्दुरवी विश्वे, प्रमोदं कुरुतो भृशम् । तावनन्दतु साधूनां, हितैषाऽप्यर्थसन्ततिः ॥ ३ ।। ग्र.३००१ श्रीरस्तु । (१) प्रेसयोग्या प्रतिःसंवत् १९८३ विक्रमा मार्गशीर्षपूर्णिमायां रत्नपुरीनिवासी प्राग्वाहवंशे रामलालात्मजऋषमचन्द्रेण पुण्यपचनेऽलेखि ॥ शुभं भवतु ॥ (२) पुष्पिका:ग्रन्थानं २८३२ श्लोकसंख्या ॥ आचार्यश्रीविजयकमलसूरीश्वरप्राचीनहस्तलिखितपुस्तकोद्धारकं सुरत ॥ आ प्रति | जेसलमेरसे उतारी सं. २००८ मिति वैशाखवदी ९॥ क्षमारत्नकृता अवचूरिः॥ ॥ इति श्रीविधिपक्षगच्छीय-श्रीक्षमारत्नकृतावचूर्युपेता __ श्रीपिण्डनियुक्तिः॥ amrimmmmmmmmm مالقياسعه بیمام سیاسیحا سماعات ومداهما سماسمحامي عاصمه PrMome mamm ॥१२॥ Jan Education Inteme For Private Personel Use Only jainelibrary.org Page #281 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Intemation गाथायाः प्रतिकम् अंगारतमपच अंगारधूवियाई अंगुलियाए अदूरजलंतरीया अइबहुयं अइबहुसो अइभारचुडण अफलाइ पिहितं अततघाणे २१ श्री क्षमारत्न सूत्रिताब चुर्युपेतायाः श्रीपिण्डनिर्युक्तेः प्रथमं परिशिष्टम् सभाष्य पिण्डनिर्युक्तेर्गाथानामकारादिक्रमः भाष्यगाथाः ३७ निर्युक्तगाथाः ६७१ गाथाङ्कः पत्रम् गाथायाः प्रतिकम् ६५६ ११७ अक्खे वराडए वा ५६० १०१ अगविठ्ठस्स उ गहणं अघणघणचारिग० २८७ ५६ ३३७ ६४ अचियतमंतरायं अच्चित्तमक्खियंमि ६४६ ११७ अच्छिज्जंपि यतिविहं २५ ६ ५६१ १०१ | अच्छोडपिट्टणासु ४० ९ अज्झोयरओ तिविहो गाथाडुः पत्रम् ७ अनिर्दिष्टाङ्कगाथे २ गाथायाः प्रतिकम् ३८८ ७८ १७५ ३७३ ७० ५३७ ९७ ३६६ ६८ ३४ ८ ७२ ३ अढाए अणढ्ढाए १७ | अणिसिट्ठमणुन्नायं अणिसिहं पडिकु ३६ अणुकंप भगिणिगेहे अणुकंपा पडिणीय ० अणुचियदेसं दबं अयि आय डायं अचट्ठा रंघते गाथानुः १०३ २२ ३८६ ७२ ३७७ ७० ३२५ ६१ ५९६ १०७ २०४ ४१ पत्रम् ? २५५ ५० २७३ ५३ गाथानामकारादि क्रमः । Page #282 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीया बचूर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः। ॥१२१॥ Jain Education Intern गाथायाः प्रतिकम् अत्तीकरेइ कम्मं अत्थाहगाह पंकाम ० अदूध मसणस्स ear दिपिण्हव अधिई पृच्छा आसन्न अन्न उट्टिया वा नेहाकम्म भन्ने भणति दससुवि अनेस दिग्गमाणे अपरिणयपि यदुविहं अपरिमिय नेहवुड अपसत्थो य असंजम अप्पम य ठवियं गाथाङ्कः पत्रम् ११२ २४ ३३२ ६३ ६५० ११७ ४८७ ८९ ५०६ ९३ +२७ ५५ ११४ २४ ५९२ १०६ ४६३ ८५ ६०९ ११० ३१८ ६० ६३ १३ २८९ ५६ + एतादृषा अड्डा भाष्यगायायाः गाथायाः प्रतिकम् अप्पा उ चत्थे अप्पतच्चियवासे अभंगिय संवाहिय अभिंतर परिभोगं अब्भोजे गमणाइ अति पुणो रद्धं अमुगाणंति य दिज्जउ अयमवरो उ विकप्पो अवसास भाण (धाय ० ) अवरद्धिगविसबंधे अप्परसज्झिलगा अवि नाम होज्ज सुलभो अविय हु बत्तीसाए गाथाङ्कः पत्रम् ५५१ ९९ २६ ४२३ गाथायाः प्रतिकम् अविलाकरहीखीरं ६ अविसुद्ध परिणामो अस्संजमजोगाणं असणाईण चउण्डंपि अह मंसंमि पहीणे अह मीसओ य पिंडो ७८ ३० ७ १९० ३९ २४१ ४७ २३५ ४६ ४१५ ७७ ५८१ १०४ १४ ४ ३२४ ४५१ ८३ ६१ ३७९ ७१ अहव ण कुज्जाहारं अहव ण सच्चितमीसो अहवा चउण्ह नियमा अहिगरण भद्दपंता अहुणुट्ठियं व आइन्नमणाइन्नं आउकाओ तिविहो गाथाङ्कः पत्रम् १९४ ४० ५३० ९६ ४६० ८५ १७० ३५ ६३१ ११३ ५३ ११ ६६५ ११९ ५४६ ९८ ५८ १३ ४१४ ४१७ ३२९ १६ ७७ ७७ ६२ ४ गाथानाम कारादि क्रमः । ॥१२१॥ ww.jainelibrary.org Page #283 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education गाथायाः प्रतिकम् आकंपिया निमितेण आणंतर्भुजगा आणं सबजिणाणं आणाइणो य दोसा आयंक उवसग्गे आर्यको जरभाई आयंबिलपारणए आयकियं पुण दुविहं आयपरोभयदोसा आयरsणायरभावे आयरिय उवज्झाए आयरियगिलाणण आयवयं च परवयं tional गाथानुः पत्रम ४३६ ८१ १२३ २६ १८४ ३८ १८३ ३८ ६६६ ११९ ६६७ ११९ गाथायाः प्रतिकम् आसंदिपीढमंच ० आसूयमाइएहिं आहाकडभोई हिं आहाकम्तरिया आहाकम्मं भुंजइ आहाकम्मद्दारं ६१६ १११ आहाकम्मग्गहणे ३०७ ५८ आहाकम्मनिमंतण ५८५ १०५ आहाकम्मपरिणओ २०३ ४१ आहाकम्मपरिणओ ४७५ ८७ २७ ६ ४८६ ८९ आहा माईण महाकम्मियनामा आहाकम्मियभायण ० गाथाङ्कः पत्रम् ३६१ ६७ ४०५ ७५ १२६ २६ १३४ २७ २१७ ४३ २१८ ४३ १८१ ३७ १८२ ३८ 37 १०७ २३ आहारोव हिमा गाथायाः प्रतिकम् आहा कम्मुद्देसिय २६३ आहाकम्मुद्देसिय आहाकम्मुद्देसिय आहाकम्मेण अहे० आहाय जंकीर आहारंति तवस्सी आहार उवहिसेज्जा २०७ ४१ इंदत्थं जहा १३३ २७ इंधणधूमेगंघे ० माई मो इंधन अगणी अवयव ९४ २० ५१ " गाथाङ्कः पत्रम् ९२ २० २४८ ४९ ३९३ ७३ १३६ २८ ३० ७३ ६६० ११८ ६८ १५ ६२१ १११ ३७२ ६९ १३५ २८ २५७ ५१ २६७ ५२ २५९ ५१ गाथानाम कारादि क्रमः । Page #284 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्वमारत्नीया . ७ वचूर्युपेत श्री ४७९ पिण्डनियुक्ति गाथायाः प्रतिकम् इंधनधूमेगंधे० इक्को उ असम्भावे इक्खागवंस भरहो इट्टगछणमि परि० इट्ठगपगाईणं इय अविहीपरिहरणा इयरोऽवि य पंतावे इरियं नऽवि सोहेई उउबद्ध धुवण बाउस उक्कोस मज्झिम उक्खि निक्खप्पड़ उक्खेवे निक्खिवे उम्गम उम्गोवण ॥१२२॥ गाथाङ्क: पत्रम् | गाथायाः प्रतिकम् २५८ ५१ | उम्गमकोडिअवयव उम्गमकोडीअवयव ८७ / उग्गमदोसा सोलस ४६६ ८५ उम्गाइ कुलेसुवि उच्चचाए दाणं उच्छुक्खीराइयं ३२६ ६१ | उड्डाह कायपडणं ६६४ ११८ | उड्डमहे तिरियपि य २४ ६ | उणहिय दुब्बलं वा ३४६ ६५ | उद्देसियं समुद्देसियं ३४० ६४ | उप्पायणाए दोसे ५७० १०२ | उब्मट्ठपरिन्नायं ८५ १८ | उन्भिज पिज्ज कंगु गाथा: पत्रम् । गाथायाः प्रतिकम् २४७ ४९ उब्भिन्ने छक्काया उभयाइरित्तमहवा उभयेऽवि य पच्छन्ना ४४१ ८२ | उवओगमि य लाभं ३२२ ६१ | उवसयबाहिं ठाणं २८० ५४ उबट्टिया पयोर्स ५८३ १०५ उबट्ठणिऽसंसत्तेण ३६३ ६८ उसिणस्स छड्डणे ३२७ ६२ | उसिणोदगंपि घेप्पइ २२९ ४६ उसिणोदगमणुवत्ते उसुआइएहिं मंडेहि २८१ ५४ ऊसव मंडणवम्गा ६२४ ११२ | एए उ अणाएसा गायाः पत्रम् | गाथानाम३४८ ६५ कारादि क्रमः। ४३२ ११६ २४ ३२ ७९ ४२० ६०३ १०८ ६३८ ११३ ५५३ १०० ४२४ ७८ २२५ २० ५ - ॥१२२॥ For Private & Personal use only Jain Education Interface Page #285 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गायाः पत्रम् गाथाङ्कः पत्रम् ३८२ .१ ३१५ ६० गाथानामकारादिक्रमः। ३२० ४५३ ८४ गाथायाः प्रतिकम् एए उ न वीसामे एए चेव य दोसा एएण मज्झ भावो एए ते जेसिमो रद्धो एएसि दोयगाणं एएहिं छहिं ठाणेहि एक्केकं तं दुविहं एक्केक्कावि य दुविहा एक्केके चउभंगो एक्केण कयमकजं एगतमबक्कमणं एगतसिणिद्धंमी एगट्ठा एगवंजण ५७८ १०४ ११९ २७९ ५४ ४२९ ८० ५६८ १०२ १८५ ३८ २११ ४२ गाथायाः प्रतिकम् एगविहाइ दसविहो एगस्स माणजुत्तं एगेण वावि एसि एगो दवस्स भागो एत्तो किणाइ हीणं एत्थ उ तइयचउत्था एमेव उज्झियंमिवि ,, कम्मो नियमा , कागमाई , भावकूडे ,, मीसएसुवि , य उक्कोसे , य कम्मंमिऽवि गाथाः पत्रम् | गाथायाः प्रतिकम् ६० १३ एमेव य जंतंमिवि ३२८ ६२ , वाइ खमए ६१२ ११० , सेसएसुवि ६५३ ११७ , सेसयाणवि ६४३ ११६ |, सेसियासवि ६५४ ११७ | एयं तु अणाइन्नं १९६ ४० एयाई चिय तिन्निवि एयारिसं ममं सत्तं ४५४ ८४ एरिसयं चिय दुक्खं ११० २३ एवं एकेक्कदिणं ५४४ ९८ , खु अहं सुद्धो ३६२ ६८ , तु गविट्ठस्सा २४० ४७ , तु पुवकित्ते . ५४३ ९८ ४२१ ३४३ ६५ ६२२ १११ ६३३ ११४ ४५८ ८४ ६१७ १११ ११५ २४ ५१३ ९४ ३५० ६५ १३० २७ Jain Education internet anal Page #286 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धमारत्नीया- बचूर्युपेता गाथाङ्कः पत्रम् २५३ ४६ ४६४ ८५ गाथानामकारादिक्रमः। श्री. पिण्डनियुक्तिः। ॥१२३॥ १११ २४ गाथायाः प्रतिकम् एवं मीसज्जायं , लिंगेण भावाण एसण गबेसणा एसो आहारविही ,, सो जस्स गुणा ,, सोलसमेओ ओगाहिमायणंतर ओच्छाहिओ परेण ओमे संगमथेरा ओयण मंडग सत्तुग ओयण वंजणपाणग० ओयणसमिइ मस० ओयरंतं पयं दटुं गाथा: पत्रम् | गाथायाः प्रतिकम् २७५ ५३ | ओरालग्गहणेणं १५३ ३१ ओरालसरीराणं ओहासिय पडिसिद्धो ६७० १२० ओहेण विभागेण य ४९१ ओहो सुओवउत्तो ३९२ कंडिय तिगुणकंडा ५४८ कक्कुडिय अंबगा कणगरययाइयाणं ३१ ७९ कत्तरि पओअणा० ६२३ ११२ कन्तामि ताव पेलं | कब्बट्ठिग अप्पाहण २०२ ४१ कम्माण जेण भावेण ५२९ ९४ | कम्मासंकाए पहं गाथाङ्कः पत्रम् | गाथायाः प्रतिकम् १६ २० कम्मियकद्दम. ९७ २० करडुय भत्तमलद्धं ४६८ ८६ कस्स घर पुच्छिऊणं २१९. ४४ कस्सत्ति पुच्छियमी ५२४ ९५ कामं सयं न कुबइ कायवइमाणो १६९ ३५ किं अद्धि इति ४०६ ७६ किं तं आहाकम्मति ४४२ ८२ किं तु (ति)ह खद्धा २६ ५५ । किं न ठविजइ पुत्तो ५७९ १०४ किंवा कहिज छारा ६६ १५ | किण्हाइया उ लेसा २०० ४० | किवणेसु दुम्मणेसु १६० ३३ ५२६ ९२ ५०९ ९३ ३१४ ६० २१ २१ ४४९ ॥१२॥ www.jainelorary.org For Private Personal Use Only Jain Education in Page #287 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गाथानामकारादिक्रमः। गाथायाः प्रतिकम् कीयगडंपिय कुडउवमाइ केइ कुड्डस्स कुणइ छिड्डु कुलए चउब्भा० केई एक्वेक्कनिर्सि केई भणति पहिए केलास भवणा एए कोडीकरणं दुविहं कोद्दवरालग़गामे कोल्लइरे वत्थत्वो कोवो बडवा गभं खणमाणी आरभए गाथाः पत्रम् गाथायाः प्रतिकम् ३०६ ५८ खद्धो निद्धे य सरु)या खमगाइ कालकज्जा. ३०३ ५८ खीर दहि जाउ कट्टर खीरदहिसूवकट्टर खीरदुमहेटुपये १९३ ३९ खीराहारो रोवह खीरे य मजणे ४५२ ८४ खेने समाणदेसी खेल्लगमल्लगलेच्छा० १६२ ३४ गंतु विज्जामंतण ४२७ गंतुण आवणं सो गंधाइगुण समिद्धं ५९० १०६ । गमणागमणुक्खेवे गाथाङ्कः पत्रम् | गाथायाः प्रतिकम् गाथाङ्कः पत्रम् १८८ ३८ गामाण दोण्ह वेरं ४३३ ५२ ११ | गिण्हण कड्डण व ववहार ३८१ ७१ ६२५ ११२ | गुणनिप्फनं गोणं गुणसंथवेण पच्छा ४९२ ९० गुणसंथवेण पुविं ४९. ९० गुरुगुरुणा गुरु लहुणा ५६२ १०१ ४१० ७६ गुरुपञ्चक्खाणि गुधिणि गब्भे ५८६ १०५ २१० १२ । गूढ़ायारा न करेंति ४९६ ९१ गोठिनिउत्तो धम्मी २४५ ४८ १९९ ४० गोणीहरण सभूमि ११० २५ २४४ ४८ गोण्णं समयकयं २२७ ४५ । गोण्णसमयाइ. ० ० 10 cm ० ० ० Jain Educat For Private & Personel Use Only Page #288 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयाबच्र्युपेता गाथानामकारादिक्रमः। पिण्डनियुक्ति गाथायाः प्रतिकम् गोमहिसि अया० गोवपओ अच्छेत्तुं गोवालए य भयए घणउदही घण. घयसत्तुयदिटुंतो घरकोइलसंचारा घासेसणा उ भावे घेत्तवमलेबकर्ड घेप्पइ अकुंचियागंमि चंदोदयं च सूरोदयं चंपा छणंमि घिच्छामि चउरिंदियाण चउरो अइक्कमवईकमा ॥१२४॥ गाथाङ्कः पत्रम् । गाथायाः प्रतिकम् १३२ २७ चम्मट्ठिदंतनहरोम० ३६८ ६९ चरणकरणालसंमि ३६७ ६८ चरियं व कप्पियं वा चाउलोदगंपि से देहि ३७६ ७० चाणक्क पुच्छ इट्टाल. चुन्ने अंतद्धाणे चुल्लत्ति दारमहुणा ६१३ ११० चुल्ली अवचुल्लो चुल्लक्खलिया डोए २१२ ४२ चुल्लुक्खाकम्माई ४८२ चोयगं इंधणमाईहिं १९ ११ छउमत्थोघुद्देसं १७९ ३७ | छउमत्था सुयनाणी गाथाङ्कः पत्रम् । गाथायाः प्रतिकम् छक्कायवग्गहत्या २९५ ५६ छक्कायवग्गहत्था ६३० ११३ छब्बगवारगमाई १६७ ३४ छहिं कारणेहिं साधू छायंपि विवजंती ५०० ९१ छिन्नमि तओ उक्क० छिन्नमछिन्नं दुविहं २५ ५४ छिन्नमच्छिन्नो दुविहो २५० ४९ छिन्नो दिट्ठमदिट्ठो २५२ ४९ जंघापरिजिय सड्डी २६१ ५१ | जंघा बाह तरीइ व २२२ ४४ जंघाहीणा ओमे ५२३ ९५ जजह व कयं दाई गाथाङ्कः पत्रम् ५७५ १०३ ५९१ १०६ २७८ ५४ ६६१ ११८ १७२ ३६ ३९१ २३१ ३८४ ३८५ ५०७ ३५ ३१ २४२ ४८ ॥१२४॥ in Education Intematon Page #289 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गाथाङ्कः पत्रम् ३५४ ६६ ४३७ ८१ गाथानामकारादिक्रमः। गाथायाः प्रतिकम् जं दवं उदगाइसु जं पुण अचित्त दवं जइणो वीसाभिग्गह जइणो सावग निण्हव जइ पच्छकम्मदोसा जइवि य ता पज्जता जइ संका दोसकरी जह से न जोगहाणी जइवि सुओ मे होही जण सावगाण जत्थ उ तइओ भंगो जत्थ उ थोवे थोवं जत्थ उ सच्चितमीसे गाथायाः प्रतिकम्गायाः पत्रम् | गाथायाः प्रतिकम् ९८ २१ जम्मं एसइ एगो ७५ १६ | जहेव कुंभाइसु ५४७ ९९ | जस्स पुण पिंडवाय० ३ २ जाई कुल गण कम्मे १५६ ३२ । जह कम्मं तु अकप्पं १८९ ३९ जाई कुले विभासा १५७ ३२ जह कारणं तु तंतू जा जयमाणस्स ६१४ ११० जह कारणमणुवयं जा जेण होई वन्नेण ४६७ ८६ जह चेव उ निक्खित्ते ५५९ १०१, जाणंतु अजाणतो ५२९ ९६ जह चेव उ निक्खित्वे ५६४ १०२ जामाइपुत्तपइमारणं ६१८ १११ जह चेव पुबलिते ३५१ ६६ जायसु न एरिसोऽहं जह चेव संजोगा ६०६ १०९ जारिसए च्चिय लद्धा ५०४ ९२ जह जह पएसिणी ४९८ ९१ जावंतहा सिद्धं नेयं १५९ ३३ | जह तिपएसो खंधो जावंत देवदत्ता ५६९ १०२ | जह ते सणकंखी २१६ ४२ जावंतिए विसोही ५४५ ९८ | जह वंतं तु अभोजं १९१ ३९ / जावंतियमुद्देसं ४७२ ५२८ २७२ १४२ ३९० २३० JainEducation A lione Page #290 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीया अचूर्युपेता श्री पिण्डनिर्युक्तिः ॥१२५॥ Jain Education Intern गाथायाः प्रतिकम् जाव न बहुप जिस देवि चिचभ जीवतंमि अविगए जीवा कवि ओमे जुज्जइ गणस्स खेतं जे विज्जमंत दोसा जेऽवि य परिवेसंती जो पवे कुण जो संतणोसणं जोग्गा अजिण्ण जो जहवायं न कुणइ जो पुण वीसामिज्ज ठाण निसियणतुय० गाथाडुः पत्रम् २१ ५ ८० ६१० ११० २२० ४४ १६३ ३४ १७ | णामं ठवणादविए णामं ठवणा दविए गाथायाः प्रतिकम् ढड्डरसर छुन १९ १८ २९ ७ १५ ४ तंडुलजल आयाणे ५०१ ९२ तं होइ सइंगालं १२० २५ तइयंमि करं छोढुं ३०४ ५८ तत्थ विभागद्देसिय ८७ १९ तत्थाणं ता उ ८९ १८६ पिय के सुकं तुम्हा न एस दोसो तव चत्थाई तर कडनियंमी तस्सेयं वेरग्गुग्गमेण गथाङ्कः पत्रम् गाथायाः प्रतिकम् ४२५ ७८ तिन्निउ पएससमया ४०४ ७५ तिबलाग मुहुम्मुको ६२९ ११३ तिय सीयं समणाणं ३८९ ७२ तिरियायय उज्जुगरण ६०८ १०९ तिविहो उ दवपिंडो ६५५ ११७ तिविहो तेडक्काओ ३९९ ७४ ४५ तुज्झट्ठाए कयमिण० २३ तुल्लेsवि अभिप्पाए १९ २१ | तेण समं पवइया तेणो व संजयट्ठा तेल्लदहिसमा ओगा १७६ ३७ ६६८ ११९ १७८ ३७ ९० १९ तेसिं गुरूणमुद एण थक्के थक्कावडियं गाथाङ्कः पत्रम् ५५ १२ ६३२ ११४ ६२० १११ ३६५ ६८ ८ ३ ३५ ८ २०५ ४१ ६ ३ ८७ ४८० ३७४ ७० ६४९ ११७ १०२ २२ १६६ ३४ गाथानाम कारादि क्रमः । ॥१२५॥ Page #291 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education गाथायाः प्रतिकम् धुल्लीऍ वियडपाओ पहु थरथरं थेरी दुब्बलखीरा ये गलतलालो थोवे थोवं छुढं सुक्के दंसणचरणे पढ़मो दंसणनाणचरिताण दंसण नाणप्पभवं दंसणनाणे चरणे दइएण वस्थिणा वा दगबीए संघट्टण दगुणय अणगारं दद्दर सिल सोवाणे गाथाङ्कः पत्रम् ४२६ ७९ ५९८ १०७ ४१८ ७७ ५८० १०४ ५७१ १०३ १५४ गाथायाः प्रतिकम् दबंमि अतकम्मं दबंमि लडुगाई ६५ १५ ९१ १९ १४१ २८ ४२ ९ ५८८ १०६ २९३ ५६ ३६४ ६८ दखया खल काया बाओ विवेगो दाई छिलंपि हु जइ ३२ दीछूढेत्ति जं वुतं दव्वे अचिणं दव्वे भावे संजोअणा दुस ससिहागा देहि इमं मा सेसं दाणं न होई अफलं दाणे कयविकए दायवमदायव्वं गाथायाः प्रतिकम् दाहित्ति तेण भणिए दिज्जंते पडिसेहो दिट्टं खीरं खीरं दिनाउ ताउ पंचवि दुगमाई सामने दुग्गा से तं समझ ० १५ | दुविहं च मक्खियं दुविहविराहण उसिने गाथाङ्कः पत्रम् १०६ २३ ८६ १९ २२ ७४ ४६ १०४ ३९६ २३४ २५४ ५० ६७ ६३६ ११५ १४६ ३० २३३ ४६ ४५५ ८४ ३५३ ६६ दूरा भोयण एगागि ६०७ १०९ | दोन्नि उ साहुसमुत्था दुविहो उ भावपिण्डो दुविहो उ संथव दूरचं खु गरहियं गाथाङ्कः पत्रम् ४७० ८६ ३११ ५९ १३१ २७ २२३ ४४ ६११ ११० २४ ५३ ५३१ ९६ ५५६ १०० ५९ १३ ४८४ ८९ ४३१ ८० ३३ ८१ ९४ ५१५ गाथानाम कारादि क्रमः । Page #292 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीया. चूर्युपेता गाथाङ्कः पत्रम् ११ ३ गाथानामकारादिक्रमः। श्री. पिण्डनियुक्ति ॥१२६॥ ४३५ गाथायाः प्रतिकम् दोसग्गीवि जलंतो धणुजुयकायभराणं धम्मकह वाय खमणं धम्मकहाअक्खिते धाई दूइ निमित्ते धारेइ धीयए वा धूयदुए संदेसो धोयंपि निरावयवं धोवत्थं तिन्नि दिणे नइकण्डविन्न दीवे नणु सुहूमपूइयस्सा नस्थि छुहाए सरिसा नव चेव अठारसगं गाथाङ्कः पत्रम् | गाथायाः प्रतिकम् ६५८ ११८ | नवणीयमथुतकं ९६ २० नाणचरिता एवं ३१२ ५९ नानिविटुं लब्भइ नाम ठवणा दविए ४०८७६ नामं ठवणा दविए नाम ठवणा दविए ४७६ नाम ठवणा दविए २६४ ५१ नामं ठवणा पिंडो नाणं दंसणं तव संजमो ५०३ ९२ नामंमि सरिसनामो २६० ५१ निग्गंथ सक्क तापस ६३३ ११८ निग्गम देउल दाणं ४०२ ७५ | निच्छयनयस्स 064-5 गाथाङ्कः पत्रम् गाथायाः प्रतिकम् २८२ ५४ - निच्छयओ सच्चितो १४८ ३० निच्छोडिए करीसेण निद्धेयरो य कालो ७४ निम्मल्लगंधगुलिया नियमा तिकालविसए १३८ २८ निवपिंडो गयभत्तं ५१६ ९४ निवाणं खलु कजं निवोदगस्स गहणं १३ | नीयं पहेणगं मे १३९ २८ | नीयदुवारंमि घरे ४४५ ८३ नीयदुवारंमि वरे ३३८ ६४ नीसमनीसा व कडं १०५ २३ | नेच्छह तमिसंमि ३४२ २९६ २९४ ५६ १४४ ३०१ ५८ ॥१२६॥ Jain Education Intel For Private & Personal use only Page #293 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गाथाङ्कः पत्रम् गाथानामकारादिक्रमः। गाथायाः प्रतीकम् नोघरंतरऽणेगविहं पंचविह विसयसोक्ख० पंडग अप्पडिसेवी पगामं च निगाम च पच्छासंथवदोसा पडिमंतथंभणाई पडियरणपओसेणं पडिलाभियवच्चंता पडिवज्ज थंभणाई पडिसडियपंडुपत्तं पडिसेवण पडिसुणणा पडिसेवणमाईणं पडिसेवणाए गाथाकः पत्रम् | गाथायाः प्रतीकम् ३३४ ६३ | पढमदिवसंमि कम्म २२६ १५ पत्तलदुमसालगया ६०१ १०८ पत्ते य पउरलंभे ६४४ १२६ । पत्तेयबुद्धनिण्हव पयसमदुगअब्भासे ४९९ ९१ परकम्म अत्तकम्मी० ३६९ ६९ परपक्खो उ गिहत्था ५०५ ९२ परपञ्चइया छाया ४९७ ९१ परस्स तं देह स एव ५१७ ९४ परिपिडियमुल्लावो १२४ २६ परियट्टिए अभिहडे ११३ २४ परिट्टियपि ११८ २४ / परिवेसणपंतीए गाथाङ्कः पत्रम् | गाथायाः प्रतीकम् २६८ ५२ परिसेयपियणहत्थाइ० २१४ ४३ पवयणमाया नव ६४० ११५ पल्लीवहंमि नट्ठा पाउयदुरुढपडणं | पाएण देइ लोगो १०८ २३ : पाओकरणं दुविहं पागडपयासकरणे पामिञ्चंपि य दुविहं ३५२ ६६ पायस पडोयारो ४९५ ९१ पायस्स पडोयारो ९३ २० पासंडियसमणाणं ३२३ ६१ पासंडीमु वि एवं ३१५ ६५ | पासोलित्तकडाहे १२५ ५८४ १०५ ४५० ८३ २९८ ५७ ३०५ १४५ ३० १४३ २९ ५५२ १०० Jain Education Inter! For Private & Personel Use Only M ww.jainelibrary.org Page #294 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धमा गाथा: पत्रम् ६४७११६ २४९ १९ ६३४ ११४ ५७२ १०४ गाथानामकारादिक्रमः। रत्नीयावचूर्युपेता श्रीपिण्डनियुक्ति ॥१२७॥ गाथायाः प्रतीकम् पासोल्लित्त कहाडे पाहुडि ठवियगदोसा पाहुडिभत्तं मुंजई पाहुडियं च ठवंती पाहुडियावि हु पिंडण बहुदवाणं पिंडनिकायसमूहे पिंडस्स उ निक्खेवो पिंडे उग्गम उप्पा. पिहिउभिन्न कवाडे पीसंती निप्पिटे पुढवीआउक्काए पुढवीआउक्काओ गायाः पत्रम् | गाथायाः प्रतीकम् ५५४ १०० पुढवी आउ वणस्सह ५९५ १०७ पुढवीकाओ तिविहो २९१ ५६ | पुत्तस्स विवाहदिणं ५७७ १०२ पुप्फाणं पत्ताणं पुरपच्छकम्मससिणि पुदि पच्छा संथव पूई कम्मं दुविहं पारासातगमचितो १ १/ बंधह अहेभवाऊ ३४७ ६५ बज्झइ य जेण कम्म ६०२ १०८ बत्तीसं किर कवला ५११ ९८ बत्तीसाइ परेणं ९ ३ | बत्तीसा सामने गाथाङ्कः पत्रम् | गाथायाः प्रतीकम् । ५३२ ९६ | बहुयातीयमइबहु वायरसुहुमं भावे २८८ ५६ बायालीसेसणसंकडंमि ४५ १० बाले वुढे मते उम्मते ५३४ ९६ बियतियचउरो ४०९ ७६ । बेइंदियपरिभोगो २१३ ४८ भंज न भंजे भुंजसु . १५ ९ भंडगपासवलग्गा १०१ २२ मज्जंती य दलंती भणइ य नाहं वेज्जो ६४२११५ भत्तुवरियं खलु ६४५ १२६ भावावयारमाहे. ३७८ ७१ । भावे पसत्थ इयरो ४८ १० १२२ २५ १९ ५७४ १०३ २३२ : : ॥१२७॥ Tww.jainelibrary.org Jain Education Intelle Page #295 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गाथारः पत्रम् ५०८ ९३ ४८५ ८९ गाथानामकारादि ३६० ६७ गाथायाः प्रतीकम् भावेसणा उ तिविहा भिक्खदगसमारंभे मिक्खाइ गओ रोगी भिक्खाई वच्चंते भिक्खागाही एगत्थ भिक्खामिते अविया० भिक्खू जहन्नगंमी भिक्खे परिहार्यते मुंजण अजीरपुरिम० भुजंति चितकम्म भुजंती आयमणे भूमाइएमु तं पुण मंगलहे पुन्नट्ठया गाथाङ्कः पत्रम् | गाथायाः प्रतीकम् मंडलपसूतिकुट्ठी ३१९ ६० मंसवससोणियासव ४५७ ८४ मइमं अरोगि दीहा. ४३० ८० मइलिय फालिय २८४ ५५ मच्छियधम्मा अंतो ५९७ १०७ मज्जारखइयमंसा ३५८ ६७ मज्झिमनिद्धे दो ३६ ९१ मत्तेण जेण दाहिद ३३९ ६४ मयमाइवच्छगंपिव महईए संखडीए ५८७ १०५ मा एयं देहि इमं पुढे ५६६ १०२ मा काहंति अवणं २९० ५६ । मा ताव झंख पुत्तया गाथाः पत्रम् । गाथायाः प्रतीकम् ६०० १०८ मा ते फंसेज कुलं ५३९ ९७ मायपिद पुवसंथव ४१३ ७६ मायावी चडुयारी ३२१ ६१ मालंमि कूडे मोयग ३०२ ५८ मालाभिमुहं दट्ठण | मालोहडंपि दुविहं मासियपारणगट्ठा ५६५ १०२ मिच्छत्तथिरीकरणं ४४४ ८३ मीसज्जायं जावंतियं २२८ ४५ मुत्तदविएसु जुजब २३७ ४७ रयणपईवे जोई २३९ ४७ रस कक्कब पिंडगुला २८६ ५६ । रसभायणहेउं वा २०९ ४४७ ८३ २७१ ५६ २९९ २८३ २३८ Jain Education a l Page #296 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गाथाङ्कः पत्रम् क्षमारत्नीया. वचूयुपेता गाथानामकारादि ७७८ ८८ १९ ८२ १० २९२ पिण्डनियुक्ति ॥१२८॥ गाथायाः प्रतीकम् रसहेउं पडिसिद्धो रागग्गिसंपलितो रागेण सइंगालं रायगिहे धम्मरुई रायघरे य कयाई रायारोहऽवराहे लद्धं पहेणगं मे लब्भंतपि न गिण्हइ लाभिय नेतो पुट्ठो लिझाईहिवि एवं लिङ्गेण उ नाभिग्गह लिङ्गेण उ साहम्मी लिति भाणिऊणं गाथा: पत्रम् | गाथायाः प्रतीकम् । ६४१११५ लेबालेवत्ति जं वुत्तं ६५७ ११८ लोएवि असुइगंधा ६५९ ११८ लोणं दग अगणि ४७४ ८७ लोणागडोदए एवं ४७७ ८७ लोयविरलुत्तमंग लोयाणुग्गहकारिसु १२७ लोलइ महीएँ ३४१ ६४ वंतुञ्चारसरिच्छं ४८१ वइयाइ मंखमाई वड्वइ हायइ छाया १५० ३१ वड्ढेई तप्पसंग १५२ ३ वणस्सइकाओ तिविहो १५१ ३१ वन्नाइजुयावि बली ६१५ ११० । वयगंडथुलतणु. गाथाङ्कः पत्रम् गाथायाः प्रतीकम् २९ ७३ | बाउक्काओ तिविहो २६५ ५१ वाघाएग नियत्तो ५८९ १०६ वासहरा अणुजत्ता १६८ ३५ विइअमेयं कुरंगाणं विइयमेय गजकुलाणं ४४८ ८३ विज्जातवप्पभावं ४२२ ७८ विज्जामंतपरूवण विज्झाउत्ति न दीसह ३०९ ५९ १७४ ३६ विज्झायमुम्मुरिंगाल १८७ ३८ विमली कयऽम्ह चक्खु विसघाइयपिसियासी १९५ ४. विसरिस दंसणजुचा ४१६ .७७ । वेयण वेयावच्चे ४६२ ४९४ ५५० ५४९ ४९३ ।। २७४ ६६२ ११८ ॥१२८॥ Jan Education Intel For Private Personel Use Only Page #297 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inter गाथायाः प्रतीकम् वेविय परिसाडणया वोलिता ते व अन्ने वा संकाए चउभंगो संकामेउं कम्मं संकिय मक्खिय खडकरणे काया संखाईयाणि उ संखेव पिंडियत्थो संघुद्दि सोउं ए संचारिमा य चुली संजमठाणाणं संजयभद्दा तेणा संजाय लित्तभते गाथाडु: पत्रम् ५८२ १०५ १६४ ३४ ५२१ ९५ २५६ ५० संथारप यदंडग० संथारूत्तर चोलग ९५ संदिस्संतं जो सुणइ संयोयणाए दोसो ९४ २० २१ संवासो उपसिद्धो ७२ १६ संसद्वेयर इत्थो ५२० ५१२ २०८ ४१ ३०० गाथायाः प्रतीकम् संजोयणा उ भावे संथ समुज्झति ५७ ९९ २१ ३७५ ७० २४६ ४८ संसमिम्मि देसे संसज्ज मेहिं वज्जं संसतेण यदव्वेण संसोधनसंसमणं सग्गामपरगामे गाथाडु: पत्रम् ६३९ ११५ ४०० ७५ ४६ १० ९ ७ २३६ ४७ ६३८ ११५ ११७ १४ ६२६ ११२ ५९३ १०७ गाथायाः प्रतीकम् सग्गामपरग्गामे सम्गामेऽवि य दुविहं सच्चित पुढविलितं चिपुढवीका सचितमक्खियंमी सचित मीसएस सच्चिते अचि सच्चिते अच्चिते सच्चिचे अि ५३८ ९७ सच्चिते अवि ५७६ १०३ सच्चिते पव्वावण ४५९ सज्झमसज्यं कज्जं ६३ | सद्वाणपरद्वाणे दुविहं ८४ ३३० गाथाङ्कः पत्रम् ४२८ ७९ ३३३ ६३ ३४९ ६५ ५४२ ९८ ५३६ ९७ ५४० ९७ ५६३ १०१ ५५८ १०१ ६०५ १०९ ६२७ ११२ ५१ ११. ५१ ५४ २६२ २७७ गाथानाम कारादि क्रमः । Page #298 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीया बचूर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः ॥१२९ ॥ Jain Education Inter गाथायाः प्रतीकम् सरसर सङ्घस्स व दिवसे सद्दाइएस साहू समणकडाहा कम्मं समणे माहणि किवणे सम्ममसम्मा किरिया सयमेवालोएउं सवलय घणतणु० aalsasiaकाओ सहस पट्ठा दिट्ठा साउं पज्जतं आयरेण सा उ अविसेसियं सागारी मंख छंदण गाथाडः पत्रम् ४८३ ८९ २७० ५२ २२४ ४५ २६९ ५२ ४४३ ८२ ४४० ८२ ५१८ गाथायाः प्रतीकम् साधारणं बहू सामत्थण रायसुए सामी चारभडा वा सालीओ अणहत्थ सालीघयगुलगोरस सालीमाइ अवडे सावग ज वीस मि० ९४ ९ साहम्मऽभिग्गणं साहुगुणकणं ३९ ४४ १० २१५ ४३ १२८ २७ २२१ ३१० सिइअवणण पडि० सिओ उसिणो साहारणो सिज्झतस्सुवया रं ५९ | सीउण्हखारखते ४४ गाथाडुः पत्रम् ५९४ १०७ १२१ २५ ३७१ ६९ १९८ ४० १८० ३७ १६१ ३२ १५५ ३२ १४९ ३० २९७ ५७ ४७३ ८६ ६५१ ११७ २५१ ४९ १३ ४ गाथायाः प्रतीकम् सी उखारखते सीए दबस्स एगो सीवन्निसरिसमोयग ० सुभद्दग दिखाई सुके सुकं पडियं सुक्के सुकं पढमो सुक्केणऽवि जं छिक्कं सुकेण सरक्खेण सुकोल्लसरिसपाए सुचस्स अप्पमाणे सुन्नं व असइ कालो सुभगदुङभग्ग करा सुयअभिगमनाय गाथाडु: पत्रम् २२ ५ ६५२ ११८ ८१ १७ ५९९ १०८ ३९८ ७४ ५६७ १०२ २८ ७३ ५३३ ९६ ३९७ ७४ ५२५ ९५ ३३५ ६३ ५०२ ९२ ३१७ ६० गाथानामकारादि क्रमः । ॥१२९ ॥ Page #299 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गाथा: पत्रम् ५५७ १०० गाथानाम| कारादिक्रमः। गाथायाः प्रतीकम् सूरोदयं गच्छमहं सेयंगुलि बगुड्डावे सेसा विसोहीकोडी सेसेसु य पडिवक्खो सेसेहिं कारहि सेसेहिं उ दबेहि सोलस उग्गमदोसे गाथाः पत्रम् । गाथायाः प्रतीकम् २१३ ४३ सोलसउग्गमदोसा ४७१ ८६ सोवीरा गोरसासव ३९५ ७४ हत्थकप्प गिरिफुल्लिय ६०४ १०९ हत्थसयं खलु देसं ५३५ ९७ हत्थसयमेग गंता २६६ ५२ हत्थिदुनियलबद्धे हत्थिग्गहणं गिम्हे गाथाकः पत्रम् । गाथायाः प्रतीकम् ६६९ ११९ हरियाइअणंतरिया ५४ १२ हियएण सकिएणं ४६१ ८५ हिययंमि समाहेउं ३४१ ६५ हियाहारा मियाहारा ४१ ९ हेट्ठावणि कोसलगा ५७३ १०३ | होमायवितहकरणे १८ २१ ६४८ ११६ ६१९ १११ ४३९ ८२ Jain Education indah For Private & Personel Use Only Page #300 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीया बचूर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः । ॥१३०॥ Jain Education Internation गाथायाः प्रतीकम् गुणनिफन्न पिंडण बहुद जस्स पुण उभयाइरित्त० गोण्णसमया० तुल्लेऽवि अभि० इको उ अस० पायरस पडोयारो संथारुत्तर ० एए उन वीसामे गाथाङ्कः १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० द्वितीयं परिशिष्टम् । पिण्डनिर्युक्तिगत भाष्यगाथानां प्रतीकानि । गाथायाः प्रतीकम् पत्रम् १ २ २ एतसिणिर्द्धमी २ ज्झमनिद्धे दो २ ३ ३ ६ हिययंमि समाउं ७ तत्थाणता उ संखाईयाणि ७ धोवत्थं तिन्नि निद्धेय य कालो पोरिसितिगम चित्तो ओरालग्गहणणं कायमणो गाथाडुः पत्रम् ११ ७ १२ ९ १२ ९ १४ ९ १५ १६ १७ १८ १९ २० २० २१ २१ २१ २१ गाथायाः प्रतीकम् किन्हाइया उ जाणंतु अजाणतो तत्थ विभागद्दे० दुग्गरसे तं सम चुल्ली अवचुल्लो कन्तामि ताव अन्न उहिया वा सुकेणऽवि जं लेवालेवत्ति आहाय जंकीरइ गाथाङ्कः पत्रम् २१ २१ २२ २२ २३ ४५ २४ २४ ५३ २६ ५५ २७ ५५ २८ ७३ २९ ७३ ३० ५४ 1919 परि० २ माध्य गाथानां प्रतीकानि । ॥१३०॥ Page #301 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ओमे संगमथेरा उवसयबाहिं | दूरा भोयण एगागि ३१ ३२ ३३ ७९ | कोवो बडवागनं ७९ | जंघाहीणा ओमे ८१ | भिक्खे परिहार्यते ३४ ३५ ३६ ८१ | चाणक पुच्छ ९१ ९१ । परि०३ साक्षिधृतानां ग्रन्थानामकारादि। नाम तृतीयं परिशिष्टम् । अवचूरिकता साक्ष्यादित्वेन धृतनां ग्रन्थानामकारादि । पत्रम् । नाम पत्रम् ३१ । पाठः ३ ३ | मूलटीका २ पिण्डनियुक्तिः मूलसूत्रम् ११ | पिण्डैषणाध्ययने सप्तमोद्देशकः २ | राष्ट्रपालम् बृहृवृत्ति १९, २१, १२० भरतचक्रवर्तिचरितम् (व्याख्याप्रज्ञप्तिः) | भाष्यम् २,२, ६, ७,२०,२१,२९, ९१ | श्रुतिः नाम अतिसङ्क्षिप्तव्याख्यानम् आचाराद्वितीयश्रुतस्कंधः करणगाहा कचिद्वितीयगाथायां धर्मसङ्ग्रहण्यादि नियुक्तिगाथा १.१५ वृत्तिः ८८ For Private Personel Use Only Page #302 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयापर्युपेता | परि०४ साथिपाठानामकरादि। भी १३ पिण्डनियुक्ति ८८ ॥१३॥ साक्षिपाठप्रतीकानि आहाकम्मं गं मुंजमाणे उभयमुहं रासिदुगं उद्देसियंमि नवगं एए विसोहयतो | कंडंति इत्थ भण्णइ कृष्णा भ्रंशयति वर्ण केवलनाणे तित्थंकरस्स खित्तं खलु आगासं गलइ बलं उच्छाहो घय सत्तुय दिहतो चारित्तम्मि असंतम्मि छट्ठाणगा(ण)वसाणे चतुर्थ परिशिष्टम् । साक्षिधृतानां पाठानामकारादि । पत्रम् साक्षिपाठप्रतीकानि पत्रम् साक्षिपाठप्रतीकानि जत्थ जया तप्परूवणया मारुतनिसर्ग तं नस्थि जं न वाहइ यत्राग्निस्तत्र वायुः दीहरसीलं परिपालिऊण यदि कुमारी ऋतिमती १२० नाणचरणस्स मूलं १२० रागाई मिच्छाई(रागाई) निक्षिप्तादौ अनन्तरे न T'संजो' गाहा निग्गंथसक्वतावस० २९ संसट्ठमसंसट्टा पंथसमा नत्थि जरा ११० समणतणस्स य सारो +पयसमदुगअब्भा० सुहुमा पाहुडियावि ११९ परियट्टिए अभिहडे से भिक्खू वा० गाहा०२ पिण्डं असोहयंतो होई पभूघरमाणे बलावरोधि निर्दिष्टम् १२० || यदपि-अवचूर्णिकृता 'संजो' इत्यादिगाथाजी११९ कृताऽस्ति तदपि न संपूर्णप्राप्ताऽतो अस्या २१ । । अवचूरिकृता एषा गाथा साक्षात्वेनोदृताऽस्ति।। अड्डो नोधृतः । १०२ १४ मा १२० । १२ १२ ६९ ॥१३१॥ Jain Education Internet For Private & Personel Use Only ww.jainelibrary.org Page #303 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inte व्याकरणादि आर्षम् " गङ्गायां घोष " इतिन्यायेन जातावेकवचनम् अन्ने अन्ये अन्ये त्वाचार्यदेशीयाः पत्रम् ५ ६ १९ पत्रम् १०६ ५, ८१ १०६ पञ्चमं परिशिष्टम् । व्याकरणादिनिर्देशः । व्याकरणादि तृतीयार्थे सप्तमी धातूनामनेकार्थत्वात् प्राकृतत्वात् पत्रम् २५ १८ २, ४, २४ षष्ठं परिशिष्टम् । अने 'इत्यादि । अपरे एके केचिदाचार्याः पत्रम् ५ १०६ व्याकरणादि मवाः क्रोशन्ति समयभाषया सूचनात् सूत्रम् वृद्धसम्प्रदायः मतान्तरम् व्यवहारनयमतम् पत्रम् ५ २, ५५ १७, १९, २३, ३३, ५०, ६३, १०८ पत्रम् १०२ ७, १०६ परि० ५, ६। Page #304 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परि०७ नाम्नामकारादि नाम धमारत्ननीया वचूर्युपेता श्री. पिन्डनियुक्तिः ॥१३२॥ नाम पत्रम् ९२ ८९ अचलपुरम् अभयसेनः अरिमर्दनः असाडभूई आनन्दम् आषाढभूतिः उग्रतेजाः कण्हा कनकपृष्ठकुरङ्गः कापिलः सप्तमं परिशिष्टम् । नाम्नामकारादिक्रमः। पत्रम् पत्रम् | नाम नाम कुसुमपुरं ९१-९२ गन्धसमृद्धनगरम् गुणसेनः कृष्णा गिरिपुष्पितपुरम् गुणालयनगरम् कोल्लइरं ७९ गुणचन्द्रः २६, ४२, गोकुलनामम् ८७ कोल्लकिरं गोर्बरः कोशलदेशोद्भवाः १११ गुणचन्द्रर्षि प्रामणी कोसलकाः गुणचूड: ग्रामणीः कोशलाविषयः गुणवतीः चंदगुत्तो ९२ कोसळगा गुणशेखरः चंदोदयं क्षेमङ्करः गुणसमृद्धनगरम् चंपा ६८ | क्षितिप्रतिष्ठितम् १. । गुणसागरः १५ | चन्द्रगुप्तः ४५ -ur o ००० २६ ur ॥१३२॥ Jain Education Inteme For Private & Personel Use Only Hw.jainelibrary.org Page #305 -------------------------------------------------------------------------- ________________ T पत्रम् परि०७ नाम्नामकारादि ४३,९३ ३७, ३८ नाम चन्द्रमुखा चन्द्राननापुरी चन्द्रावतंसकः चन्द्रिका चन्द्रोदयम् चम्पापुरी चाणको चाणक्यः छिन्नटङ्कः जयकीर्तिमूरिः जयन्तपुरम् जयन्तीपूरी जयसुन्दरी २३ -SIS.IN नाम पत्रम् | नाम पत्रम् | नाम पत्रम् जितशत्रु: १७ देक्शा ४८, ९२ | निलयश्रेष्ठी जिनदत्तः धनदत्तः ६२, ८०, ९३ नूपुरहारिका जिनदासः धनदेवः पादलिप्तरिः ९०, जिनमतिः धनप्रिया पोतनपुरम् जियसत्तु धनवती. प्रतिष्ठानपुरम् तिलक श्रेष्ठी धनश्रेष्ठी प्रियङ्करः त्रिलोकरेखा धनावहः प्रियङ्गुरुचिका दत्तः धम्मरुई प्रियङ्गुलतिका दत्तो धर्मघोषः प्रियनुसारिका दुष्प्रभः धर्मरुचिः प्रियङ्गसुन्दरी देवकी धर्मरुचिसूरयः प्रियदर्शना देवदत्तः २, २९, ६२ । धादिपृथ्वी प्रियमतिः देवराजः ६. | निम्महिलं (नाटक) ८७ । बन्धुमती ९१, ९२ १२० ६८ For Private & Personel Use Only Page #306 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्ननीया वचूर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः । ॥१३३॥ Jain Education Inte नाम बिन्ना बेन्ना ब्रह्मद्वीप: ब्रह्मशाखा भद्रबाहुस्वामिनः भद्रिल: भरतः भरहो भानु पत्रम् नाम ९२ ९२ ९२ भीमा मगधः भाष्यकारः २, ३, ९, २२, ५४,७३,७९ ९३ ७४ मुरुण्ड: ३४ मेर्वादि: ૯૮ ८७ १९ महाबलः महाराष्ट्राः माणिभद्रः मुरुडराओ २६ ४० मोदकप्रियः यक्ष दिन्नः यशोधरा यशोभद्रसूरिः यशोमतिः युगादिजिनप्रतिमा योगराजः पत्रम् नाम २५ १११ ४८, ७१ ९१ ९० ३ १९ ६५ ३५ २३ ४२ ४२ ३५ योधनी रत्नपुरम् रत्नाकरसूरि : राजगृहम् रायपरं रायग रिपुमर्दनः रुकमणी पत्रम् ३५ ७१ ४२ ८७ ८७ ८७ १८ १९,३९,६९ रेवतिः ८० लक्ष्मीः ६२ (a) क्रपुरम् ३९ वत्सराजः ३५, ६९ वसन्तपुरम् २६, ६२, ६९ नाम वसुन्धरा वसुमती वारत्तकः वारसपुरम् वासुदेवः विजितसमर: विधपक्षगच्छः विशालशृङ्गः विश्वकर्मा विष्णुमित्र: विस्तीर्णग्रामः शतमुखम् शालीग्रामः पत्रम् ६८ ६९ ११३ ११३ ६१ २५ १२० ९४ ८७, ८८ ८६, ८७ ८० ४२ ४० परि० ७ नाम्ना मकारादि क्रमः । ॥ २३३ ॥ 1ww.jainelibrary.org Page #307 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ra पत्रम् नाम परि०७ नाम्नामकारादि क्रमः। नाम शिवदेवः शिवा शिशुमारः शीतलक: शीला शृङ्गारमतिः श्रीनिलयनगरम् श्रीपर्णी श्रीमती श्रीस्थलकम् संगमथेरा पत्रम् नाम पत्रम् | नाम संयुगपुरम् सारिका सङ्कलः ३४ सिंहः सङ्गमस्थविराः सिंहक: समितसूरिः १८, ६२, सिंहरथः ९१, ९३ | सिंहसूरयः समुद्रघोषसूरिः ६० सिंहाचार्यः समृद्धः सिन्धु सम्मतप्रमुखाः ६०,६१ सुदर्शना सम्मतिप्रमुख्याः ६० सुन्दर सम्मिलपुरम् ४८ । सुन्दरी ७९ । सागरदत्तः ४५ | सुरदत्तश्रेष्ठी सुलोचना २, २० सुव्रतः ८७, ८८ सुस्थितसूरयः ८६ सूरोदयं सूर्योदयम् सोदासः सोवीरगा सौराष्ट्रम् ६२, ९३ हरन्तसन्निवेशः | हस्तकल्पम् । 50000 30m ormv १९ Jain Education In A For Private & Personel Use Only Tww.jainelibrary.org Page #308 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परि०८ धमारत्ननीया वचूर्युपेता अवचूरिपत्रम् मकगिरिटीकापत्रम् श्री. पिण्ड गाथा ८०-८१ अवचूरिगतान्पु दाहरणानि। १८ नियुक्ति ॥१३४॥ कथाङ्कः कथाविषयः १ द्रव्यगवेषणायां २ प्रशस्तद्रव्यगवेषणायां ३ द्रव्यगवेषणायां ४ द्रव्योद्गमे ५ प्रतिषेवणायां ६ प्रतिश्रवणे संवासे अनुमोदनायां ९ आधाकर्मोदनपरिहारे १० आधाकर्मपरिहारे ११ आधाकमेंऽतिक्रमादिदोषे अष्टमं परिशिष्टम् अवचूरिगतान्युदाहरणानि कथानाम मृगदृष्टान्तः समितसूरयः गजष्टान्तः लड्डुकप्रिय(मोदकप्रिय)कुमारदृष्टान्तः स्तेनदृष्टान्तः राजपुत्रदृष्टान्तः पल्लिदृष्टान्तः राजदुष्टदृष्टान्तः साधुकथानकम् लौकिकोदाहरणम् हस्तीदृष्टान्तः ८३-८४ ८८-९० ११९ १२१ १२५ १२७ १६२-१६३ १६६-१६७ १८१ 9॥१३४॥ Für Private Jain Education Personal use only Page #309 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परि०८ अवचूरिगतान्यु रणानि । १२ वान्तमिव अनेषणीये अविधिपरिहारे १४ परिणत्याऽऽषाकर्मग्रहणे १५ शुद्धगवेषणायां १६ आज्ञायां १७ एषणोपयोगे १८ पूतिदोषे १९ प्रादुष्करणे २० परभावक्रीते प्रामित्यदोषे २२ परावर्तितदोषे परप्रामस्वप्रामाभ्याहृते __मालापहृतदोषे उग्रतेजोदृष्टान्तः अकोविदसाधुदृष्टान्तः द्रव्यलिग्निदृष्टान्तः प्रियकरक्षपकदृष्टान्तः चन्द्रसूर्योद्यानोदाहरणम् गोवत्सोदाहरणम् सभोपलेपनोदाहरणम् भिन्नस्वरूपाणां साधुनामुदाहरणम् मसोदाहरणम् भगिन्युदाहरणम् मातृभगिन्युदाहरणम् धनावहादिदृष्टान्तः भिक्षुदृष्टान्तः द्वितीयदृष्टान्तः १९२-१९३ १९८-२०० २०८ २०९-११ २१३-२१५ २२५-२२६ २४५-२४६ २९२-२९७ ३१०-३११ ३१७-३१९ ३२४-३२६ ३३७-३४३ ३५९-३६० ३६२ For Private Jain Education in Vieww.jainelibrary.org Personal Use Only Page #310 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्ननीया व चूर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः । ॥१३५॥ Jain Education Interna २६ आच्छेयदोषे २७ अनिसृष्टदोषे २८ अङ्कषायां २९ परप्रामदूत्यां ३० निमित्तदोषे ३१ क्रोधपिण्डे ३२ मानपिण्डे साधुदृष्टान्तः गुणचन्द्रक्षुल्लक दृष्टान्तः गुणचन्द्रक्षुल्लक दृष्टान्तान्तरगत (१) श्वेताङ्गुलिपुरुषदृष्टान्तः (२) बकोड्डायक (३) किङ्कर 39 33 13 39 19 ३३ मायापिण्डे 33 39 33 33 गोपदृष्टान्तः द्वात्रिंशद्वयस्य दृष्टान्तः दत्तस घोईष्टान्तः धनदत्तसाधोर्दृष्टान्तः निमित्तकथकसाधोर्दृष्टान्तः 39 ( ४ ) स्नायक (५) गिद्धवरिङ्गी ( ६ ) हदज्ञ आषाढमूतिदृष्टान्तः 39 99 33 33 35 ३६८-३६९ ३७८-३८१ ४२७ ४३३-४३४ ४३६ ४६४ ४६६-४७३ ४७१ ४७१ ४७१ ४७१ ४७२ ४७२ ४८० ६९ ७१ ७९ ८० ८१ ८५ ८६ ८६ ८६ ८६ ८६ ८६ ८६ ८७ ११० ११३ १२५ १२७ १२८ १३४ १३४ १३५ १३५ १३५ १३५ १३५ १३५ १३६ -183gg परि० ८ अवचूरि गतान्यु दाह रणानि । ॥१३५॥ Jainelibrary.org Page #311 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १३९ परि०८ अवचरिगतान्यु १४२. रणानि । १४४ ३४ लोमपिण्डे ३५ विद्यापिण्डे ३६ मन्त्रपिण्डे ३७ चूर्णे ३८ पादलेपे ३९ मूलक, (प्रथम) , (द्वितीय) ४१ विवाहे HI४२ , गर्भाधाने द्रव्यैषणायां ४५ बालवदायके ४६ छर्दिते ४७ द्रव्यग्रासैषणायां occuWWWWW०००० सिंहकेशरमोदकगवेशकः सुव्रतसाधुः ४८२-४८३ धनदेवोदाहरणम् ४९५-४९६ पादलिप्सोदाहरणम् ४९८ चाणक्योदाहरणम् भा० ३५-३७ समितसूरयः ५०३-५०५ सुन्दयुदाहरणम् ५०६-५०७ धनदसोदाहरणम् ५०६-५०७ प्रथमम् ५०८ द्वितीयम् ५०९ द्वे पत्न्यौ ५१०-५११ वानरयूथोदाहरणम् ५१७-५१९ लम्पटसाधुसंघाटकोदाहरणम् ५७९ मधुबिन्दूदाहरणम् ६२८ मत्सस्य कल्पितोदाहरणम् ६३०-६३३ ॥ इति अवचूरिगतानि परिशिष्टानि समाप्तानि ॥ Coco CocoC SSCC00W occ १४४ १४५ १४५ ० १४५ १४६ १५८ १०४ ११३ ११३ ur9 . Jain Education in For Private Personel Use Only A ww.jainelibrary.org Page #312 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्ननीया वचूर्यपेठा श्री पिण्डनिर्युक्तिः । ॥१३६॥ Jain Education Inte नवमं परिशिष्टम् श्री वीराचार्यकृतायाः पिण्डनिर्युक्तिटीकायाः आद्यन्तभागौ ॥ ० ॥ नमः प्रवचनाय ॥ नम्रामरेश्वर किरीटनिविष्टशोण - रत्नप्रभा पटलपाटलितांह्निपीठाः । तीर्थेश्वराः शिवपूरीपथसार्थवाहा, निःशेषवस्तुपरमार्थविदो जयन्ति लोकप्रभागभवना भवभीतिमुक्ता, ज्ञानावलोकित समस्तपदार्थसार्थाः । स्वाभाविक स्थिर विशिष्टसुखैः समृद्धाः, सिद्धा विलीनघन कर्म्ममला जयन्ति आचारपञ्चकसमाचरणप्रवीणाः, सर्वज्ञशासनभरैकधुरन्धरा ये । ते सूरयोदमितदुर्दमवादिवृन्दा, विश्वोपकारकरणप्रवणा जयन्ति सूत्रं यतीन तिपटुस्फुटयुक्तियुक्तं, युक्तिप्रमाणनयभङ्गगमैर्गभीरम् । ये पाठयन्ति वरसूरिपदस्य योग्यास्ते वाचकाश्वतुरचारुगिरो जयन्ति ॥ १ ॥ ॥ २ ॥ ॥ ३ ॥ ॥ ४ ॥ १ यद्यपि - अवचूरिपरिशिष्टत्वेन टीकायाः मुद्रापणं नोचितं तथाप्यस्त्यिमा प्ययाऽवष्यमुद्रिता वीराचार्यकृता टीका-इति ज्ञापनार्थमेतस्याः आयन्तभागमुद्रापणमुचितमिति मत्वा आयन्तभागौ मुद्रापण उद्यमकृतः, अतो विद्वज्जना तस्याः परिमलं गृह्णन्तु । परि० ९ वीराचार्य कुतठीका पाराद्य भागः । ॥ १३६ ॥ Page #313 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परि०९ वीराचार्यकृतटीकायारायभाग:। सियानासुखसमागमवद्धवाञ्छाः, संसारसागरसमुत्तरणैकचित्ताः । ज्ञानादिभूषणविभूषितदेहभागा, रागादिघातरतयो यतयो जयन्ति इति विरहि(चि)तपञ्चपरमेष्ठिसंस्तवो गुरुजनोपदेशेन । वक्ष्ये शिष्यहिताख्यां वृत्तिमिमां पिण्डनियुक्तः ॥ ६ ॥ पश्चाशकादिशास्त्रव्यूहप्रविधायिका विवृतिमस्याः। आरेभिरे विधातुं पूर्व हरिभद्रसूरिवराः ॥७॥ ते स्थापनाख्यदोषं यावद्विवृतिं विधाय दिवमगमन् । तदुपरितनी तु कैश्चिद्वीराचार्य समाप्येषा ॥८॥ तत्रामीभिरमुष्याः सुगमा गाथा इति विभाव्या । कश्चिन्न व्याख्याता या विवृतास्ता अपि ताः ॥९॥ सम्प्रति मन्दधियां दुर्बोधा इति मया समस्तानां । तासां व्यक्तव्याख्याहेतोः क्रियते प्रयासोऽयम् ॥ १०॥ इह हि जिनशासने चूलायुगकलितदशाध्ययनमतो देशकालिकाख्यः श्रुतस्कन्धोऽस्ति, तस्य च भद्रबाहुस्वामिसूरिणा नियुक्तिरकारि, तत्र च पिण्डैषणाभिधपश्चमाध्ययनस्य सत्को बृहन्दप्रथत्वात् पिण्डनियुक्तिरिति नाम दत्वेयं तेनैव पृथक्कृताऽशेषात् , सा दशकालिकनियुक्तिजातेत्यनेन सम्बन्धेनायाताया आदाविमा द्वारगाथामाह____ पिण्डे उग्गम० ॥१॥ व्याख्या-पिण्डोति “गोष्ट-लोष्ट-हुडि-पडिसङ्घात" इति स्वादिकस्य "पूण-ममू-हुडि-पडिसङ्घात" इति । विकल्पे "नस्याश्चरादयः" इति वचनादिनपत्ययाभावाश्रयणेन चौरादिकस्य वा पडिधातोः पिण्डनमतिभाव इति सूत्रेण घ(ध्वनितस्यैव वा चौरादिकस्येनागमनपक्षमाश्रित्य स्वरहगमिग्रहामलितिसूत्रादादापिण्डो मीलनमात्रं तच्च येषामस्ति तैः सहैक्योपचारात् त्रिप्रभृतिकाः परमाण्वादय एकत्र मिलिता पिण्डः, यद्वा तयोरपि धातोः पिण्ड्यत इति, " अकरि च कारके संज्ञाया"मितिषभित् एव, परमाण्वादि | For Private Personal Use Only JainEducation inte Page #314 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्ननीया वचूर्युपेता श्री. पिण्डनियुक्तिः। परि०९ वीराचार्यकृतटीकायाराद्यभागः। ॥१३७॥ त्रिकप्रभृतिकाः पिण्डः, स च यद्यपि नामादिमेदैरनेकधा भविष्यति, तथाऽपीह संयमादिरूपभावपिण्डोपकारकस्य द्रव्यपिण्डस्य ग्रहण ज्ञेयं, सोऽप्याहारोपधिशय्याभेदात् त्रेधा, तत्राऽऽहारशुद्धेः प्रस्तुतत्वादाहाररूप एव प्रायः, ततश्च तस्मिन् पिण्डे अधिकृते विषयभूते वा, किमित्याह-उग्गमत्ति उद्गमनमुपद्गम उत्पत्तिरित्यर्थः, प्रथमैकवचनलोपः प्राकृतत्वात् , एवमुत्तरत्रापि विभक्तिलोपे विभक्तिव्यत्येऽनुस्वारलौपादौ वाऽभणितोऽप्ययं हेतु यः, स चाधाकादिमेदभिन्नः स्यात् , वक्ष्यति च-" आहाकम्मुद्देसिय" (गा. ९२) इत्यादि, तथा " उप्पायणा" (गा० ५१४ ) इत्यादि, उत्पादनमुत्पादना घायादिप्रकारैर्या(उमे) वक्ष्यति “धाईदूई (गा०४०९) "त्यादि, इह किलैषणा त्रिधा, तद्यथा-गवेषणा प्रह]षणा ग्रासैषणा च, तत्रोद्गमोत्पादनामहणेण गवेषणोक्ता, तथा 'एसणा' इति एषणाग्रहणकाले शङ्कितादिभिः प्रकारैरन्वेषणं, वक्ष्यति च (ह०प०१) "संकियमक्खिये " (गा० ५२० )त्यादि, अनेन तु ग्रहणैषणोक्ता, तथा 'संजोयणा' इति संयोजनं संजोयना-गृद्धया रसोत्कर्षोत्पादनाय सुकुमारिकादीनां खण्डादिभिः सह मीलनमित्यादिका, सा च द्रव्य. भावभिन्ना वक्ष्यति च, “दब्वे भावे संजोयणा" (गा० ६२१) इत्यादि, तथा 'पमाणे 'त्ति प्रमितिः प्रमाण-कवलसक्यालक्षणम् , एकारः प्रथमैकवचनार्थः, " बत्तीस किर कवला" (गा० ६४२)इत्यादि, चकारः समुच्चये भिन्नक्रमश्च, तथा इङ्गालत्ति चरित्रेन्धनस्यानारा- | णामिव करणमिति कारितेऽन्त्यस्वरादिलोपे "पुंसि संज्ञायां घ" इति घवाकारः, चारित्रेन्धनदहनसमर्थो रागपरिणामः, प्रथमैकवचनलोपश्छन्दोऽर्थ, तथा धूमत्ति चारित्रेन्धनस्य घूम[वत् ] इव करणमिति कारिते “मन्तुवन्तुविनां लुगि"ति वन्तुलोपेऽनुस्वरादिलोपे पूर्ववघे च धूमश्चारित्रेन्धनस्य धूमायमानताकरणसमर्थो द्वेषपरिणामः, प्रथमैकवचन लोपः पूर्ववत् , वक्ष्यति च-" तं होइ सइङ्गाल (गा० ६६५)" मित्यादि, तथा 'कारण 'ति प्रथमैकवचनलोपात्कार्यते प्राणीकार्यमनेनेतिकारणं, च निमित्तं, पूर्वोक्तः चकारोऽवयोजित, एवमुत्तरत्रापि ॥१३७॥ Jain Education Inter For Private Personal Use Only Aaw.jainelibrary.org Page #315 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परि०९ वीराचार्यकृतटीकायाराधभागः। चकारो वाशब्दादिश्चान्यत्रस्थितेऽपि यत्र घटते तत्र योज्यः, वक्ष्यति च “वेयणे" (गा० ६६२) त्यादि, इह संयोजनादिपद-| पश्चकेन प्रासैषणोक्ता, उपप्रदर्शनार्थेति शब्दलोपादित्यनेन पिण्डस्य सर्वत्र गतत्वेन व्यापकतयाऽभेदेनागणनादुद्गमाभणनरूप(य)कारण, अविहा' इति अष्टविधा-ऽष्टमेदा, का सा विहीत्याह पिण्डनिज्जुत्ती इति निर-निश्चयेन सततावियोगस्वरूपाधिक्येन वा यक्तियोजन सम्बन्ध इत्यर्थः, सूत्रेण सह येषां ते नियुक्तियो(क्त्यर्थास्तेषां युक्तिर्योजनं परिपाट्यास्तानित्यर्थः, ततश्च नियुक्तीनां युक्तिनियुक्तिरिति वाच्ये मध्यपदलोपितत्पुरुषेण प्रथमयुक्तिशब्दलोपानियुक्तिः, यद्वा निरिति पूर्ववद्युक्ताः-सम्बद्धा सूत्रेण सह ये ते नियुक्तास्तेिषां युक्तिः पूर्वोक्ता, ततश्च निर्युक्तानां युक्तिनिर्युक्तयुक्तिरितिवाच्ये पूर्ववद्युक्तशब्दलोपान्नियुक्तिः, यथोक्त]ष्ट्रमुखवन्मुखं यस्याः सोष्टमुखी कन्या, ततश्च पिण्डस्य-आहारस्य नियुक्तिः पिण्डनियुक्ति:-आहारशुद्ध्य शुद्धिपतिपादको ग्रन्थ इत्यर्थः, भवतीति शेषः, इति द्वाराष्टकप्रतिपादकगाथासमासार्थः ॥ १॥ अवयवार्थे तु ग्रन्थकारः स्वयमेव वक्ष्यति, तत्र “यथोद्देशं निर्देश" इति न्यायापिण्डस्य व्यासार्थः प्रस्तुतसूत्रामपि " तत्त्वभेदपर्यायव्यख्येि"ति कमात्पूर्व तत्त्वं वाच्यं, तच्च त्रिः प्रभृतिकाः परमाण्वादय एकत्र मिलिताः पिण्ड इति पूर्वमेवोक्तम् , अथ तस्यैव मेदभणनं क्रमायातमपि विचित्रत्वात् सूत्रगतेरित्युल्लङ्घ्य तावदेकार्थिकशब्दानाह पिंडनिकाय॥२॥ व्याख्या-पिण्ड निकाय समूहेति समाहारात् पिण्डनिकायसमूह, सर्वत्र प्राकृतत्वादेकारः तेन, तथा सम्पिण्डिनपिण्डना चकारः समुच्चये, तथा समवायः, तथा समवसरणनिचयोपचयं, चकारः पूर्ववत्, तथा युग्मं, चकारः पूर्ववत् , तथा राशिः, चकारोनिकरादीनां समुच्चयार्थः, एकार्थिकाः स्युरिति शेषः, एते सर्वेऽपि सामान्यतस्त्रिप्रभृतिके सङ्घाते वर्तन्ते, विशेषतस्तु कश्चित्कापि कस्मिन् Pा रूढः, यथा पिण्डशब्दो गुडादिपिण्डरूपे सङ्घाते, निकायशब्दस्तु भिक्षुकादिसङ्घाते, समूहशब्दस्तु मनुष्यादिसङ्घाते, सपिण्डनशब्दस्तु Jain Education in For Private & Personel Use Only al Page #316 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्ननीया वर्युपेता श्री पिण्डनिर्युक्तिः । ॥१३८॥ Jain Education Intern सेवादीनां खण्डपाकादेश्व परस्परं सम्यक् सङ्घाते, पिण्डनाशब्दस्तु तत्रैव केवलं सीलनमात्ररूप सङ्घाते, समवायशब्दस्तु वणिगादीनां सङ्घाते, समवसरणशब्दस्तु जिनसमवसरणरूपे सङ्खाते, निचयशब्दस्तु धान्यादिसङ्घाते, उपचयशब्दस्तु सुवर्णादिसङ्घाते, युग्मशब्दस्तु भाण्डानामक्षादीनां वा युगलरूपे सङ्घाते, अन्यस्य वा कस्यचित्पदार्थस्य राशौ राशिशब्दस्तु पूगफलादिसङ्घाते रूढः, ननु युग्मशब्दस्य द्विख्यावाचित्वपक्षे त्रिप्रभृतिक पदार्थसङ्घाताभावेन पिण्डत्वं न घटत ! इत्युच्यते त्रिप्रभृतिक पदार्थसङ्घातः पिण्ड इति सामान्यलक्षणं, विशेषतस्तु काप्याजन्मावियोगिनोरेकशरीरयोर्द्वयोरपि भारुण्डयोः पिण्डः स्यादेवेत्येके, अन्ये स्वाहुर्मुख्यवृत्त्या तावत् त्रिप्रभृतिकपदार्थसङ्घात एव पिण्डः स्याद्वौणवृत्त्या तु भिन्नशरीरयोरपि द्वयोः कपर्दादिकयोरेकत्र स्थाने मिलितयोर्मीलनमात्रमङ्गीकृत्य पिण्डत्वं स्यादेव, इहैकार्थिकप्रतिपादनेनैकान्तिकमेदाभेदौ व्युदस्येते, तत्रैकान्तभेदपक्षे तावनैकार्थिकाः शब्दा युज्यन्ते, कथं यस्य कान्तेनैव सर्वे भावाः सर्वथा भिन्ना वर्त्तन्ते, तस्य यथा घटशब्दस्य पटशब्दो भिन्न एव, एवं कुटशब्दोऽपि तत्कथं घटशब्दस्य कुटशब्द एकार्थिको युज्यते !, एवमेकान्ता दक्षेऽपि यस्य हि सर्वथैवामेदेन सर्वे एव भावा व्यवस्थिताः तस्य यथा घटशब्दस्य घटशब्दो अभिन्न एकार्थिको न भवत्येवं कुटादयोsये कार्थिका न युज्यन्त एव, अभिन्नत्वात्तस्माद्भेदाभेदयोरेव ते युज्यन्ते, तत्र मेदे पिण्डनलक्षणमर्थमाश्रित्य प्रवृत्तिः, एवं निकायादीनामपि स्वं स्वमर्थभिन्नमाश्रित्य प्रवृत्तिर्जायते, असे वे (!) तु सर्वेऽप्येव एकस्मिन्नेव सङ्घातलक्षणेऽर्थे प्रवृत्ता इति गाथार्थः ॥ २ ॥ अथ मेदानाद पिण्डस्स उ निक्खेो० ॥ ३ ॥ व्याख्या - पिण्डस्य प्रतीतस्य तु शब्दः पुनरर्थो भिन्नक्रमच, निक्षेपो नामादिभेदैर्न्यासः, पुनः शब्दोऽत्र सम्बध्यते, तस्य चैवं प्रयोगो, यथा पिण्डस्यैकार्थिकाः शब्दाः पिण्ड निकायादयस्तस्याऽपि निक्षेपः, पुनरिति तत्र पुनः शब्दो वैलक्षण्यस्य द्योतकस्तच पूर्ववाक्यार्थापेक्षयोत्तरवाक्यार्थस्य ज्ञेयमेवं सामान्यतः सर्वत्र पुनः शब्दो ज्ञेयः कतिविध ! इत्याह- चत्वारः परि० ९ वीराचार्य कुतटीका याराद्यभागः । ॥१३८॥ w.jainelibrary.org Page #317 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education I परिमाणमस्येति चतुष्कः, स एव चतुष्ककः- चतुर्विधो-नामस्थापनाद्रव्य भावस्वभावः, एवं षट्कः- पटप्रकारो वक्ष्यमाणः, चकारः समुच्चये, कर्तव्यो विधेयः, अनयोश्चतुष्कको व्यापकः, सर्ववस्तुष्ववतारित्वात् षट्कस्त्वव्यापकः प्रतिनियतवस्तुष्ववतारित्ववादिति मेदो गुरवस्तु व्याचक्षते, चतुष्ककः सुखं सर्वश्रोतॄणां षट्कस्तु सकष्टं प्रतिनियतश्रोतॄणां प्ररूपत इति भेदः, अयं सामान्येन पिण्डस्य निक्षेप उक्तः, अथ तदनुवादपूर्वकं यद्विविधं तदाह- कृत्वा ऽऽविधाय, चकारोऽवधारणे भिन्नकमध्य, निक्षेपं पूर्वोक्तं, प्ररूपणा स्वरूपविचारणा, तस्यैवपिण्डस्यैव निक्षेपस्यैव वा, अवधारणमन्यतो योजितं कर्त्तव्या विधेयेति याथार्थः ॥ ३ ॥ नन्वेतयोः को निक्षिप्यते षट्क ? इति ब्रुमःकिं कारणमित्याशड्क्याह कुलए चउ भागस्स || ४ || ( प० २ ) व्याख्या – कुलके - चतुःसेतिकाप्रमाणे धान्यमाने, तुशब्दोऽवधारणे स च सम्भव एवेत्येवं योग्यः, चतुर्भागस्य सेतिकायाः सम्भवो विद्यमानता, यथेति शेष इति दृष्टान्तो, अथ दान्तिकमाह - षट्के प्रकान्ते नामादिषट्कनिक्षेपे पूर्वोके चतुर्णां चतुःसख्यानां नामादीनां निक्षेपस्येति प्रक्रमः, एवं तद्धितनियमेनावश्यं तथा सम्भवो विद्यमानता अस्तिविद्यते यत इति शेषः, षट्कं पूर्वोक्तं निक्षेपेत् तस्मात्ततः कारणाद्रिति गाथार्थः ॥ ४ ॥ तमेव षट्प्रकार निक्षेपमाह - मंठा पिंडो ॥ ५ ॥ व्याख्या - नामं ठवणा पिण्डोति अनुस्वरोऽलाक्षणिकत्वान्नामस्थापनापिण्डः, तथा दवेति सूचनाद् द्रव्यपिण्डः, एवं क्षेत्रे क्षेत्रपिण्डः, चकारः समुच्चये, तथा कालभावे - कालपिण्डो भावपिण्डश्च, चकारः पूर्ववत्, अयं षट्प्रकारोऽपि वक्ष्यमाणस्वरूपः, एष एवानन्तरोक्त एव, ललुरबधारणे योजित एव, पिण्डस्सइति पिण्डस्य पिण्डशब्दस्य, निक्षेपः पूर्वोक्तार्थः, षड्विधःपद्मकारः, भवति जायत इति द्वारषट्कप्रतिपादकगाथार्थः || ५ || नामपिण्डस्य व्याख्यानाय स्थापनापिण्डस्य तु सम्बन्धनायाह २४ परि० ९ वीराचार्य कृतटीका याराद्य भागः । Page #318 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्ननीया वर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः । ॥१३९॥ Jain Education Int गोण्णं समयकथं वा० ॥ ६ ॥ व्याख्या - गौणं- यथार्थ; नामेति सर्वत्र प्रक्रमः, तथा समयकृतं - सिद्धान्तविहितं वाशब्दः - समुच्चये, तथा यत्किमपि, वाअपिशब्दौ समुच्चयार्थी ताभ्यां भाष्यकारो "गोन्न समयाइरत " ( भा० गा० ६ ) मित्यादिगाथयोभयातिरिक्तं चतुर्थं वक्ष्यति, तद् भवेत् स्यात्, तदुभयेन गौणं समयकृताख्यद्वयेन कृतं विहितं तदुभयकृतमिति भावः, एवं सामान्यतश्चतुर्विधं नामोक्तम्, इह तु नामपिण्डो भणनीयः, स च नाम्नां पिण्डत्वे सति घटते, तानि तु वर्णरूपतयोच्चरितप्रध्वंसित्वेना विद्यमानानि, पिण्डस्वे तु परमाण्वादित्रयप्रभृतिकसङ्घातलक्षणं पूर्वमुक्तं तच्च विद्यमानस्यैव पदार्थस्य घटते इति प्रत्यासत्या नामनामवतोरैक्यातच्छब्देन प्रभृतपरमाणुसंघात निष्पन्नशरीरो विद्यमानः शृङ्गिप्रभृतिको नामवत् पदार्थो गृह्यत इति, तत शृङ्गिप्रभृतिकं द्रव्यं ब्रुवते - कथयन्ति, पूर्वाचार्या इति शेषः, नामपिण्डं-नामपिण्ड इति ध्वनेर्वाच्यं एतेषां चतुर्णामपि मध्याच्चरमं व्यापकं यादृच्छिकत्वादित्युत्तरत्र सर्वत्र नामैषणादिषु सामान्यत इदमेव ग्राह्यं स्थापनापिण्डं वक्ष्यमाणार्थ, अत एव तस्माद्भणनादूर्द्ध वक्ष्ये अभिधास्य इति गाथा पर्यन्तपादस्य " अरूये " ( गा० ७ ) त्यादिकया वक्षमाणया सप्तमगाथया योग इति गाथार्थः ॥ ६ ॥ भावार्थ तु माध्यकारो यथावसरं वक्ष्यति, तत्र सामान्यतो नामनिरूपणायामाद्यनामविवरणाय माष्यकार एवाह गुणनिष्फलं गोण्णं० ॥ भा० १ ॥ व्याख्या - गुणनिष्पन्नं मत्वर्थेन सिद्धं गौणं - गौणाभिधानं नाम, तस्याऽपि संज्ञान्तरमाह तं चैवति तदेव गौणमेव, यथार्थ - घटमानव्युत्पत्तिकं, अस्थवी इति, अर्थविदस्तीर्थ करादयः, अर्थविद्भिः प्ररूपितोऽर्थोऽवितथतया लोके आदेयः स्यादिति तद्रइणं, ब्रुवते वदन्ति, तच्च गौणं चतुर्द्धा तद्यथा द्रव्यनिमितं जातिनिमित्तं गुणनिमित्तं क्रियानिमितं चेति, तत्र द्रव्यं शृङ्गादिकं तदेव निमित्तं शृङ्ग्यादिरूपाभिधानवृत्तौ हेतुर्यत्र तद्बलीवर्दादिवाचिक शृङ्गीत्यादिकावर्णावली, एवमुचरत्रापि केवलं जातित्रा परि० ९ वीराचार्य कृतटीका याराद्य भागः । ॥१३९॥ Page #319 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परि०९ | वीराचार्यकृतटीकायाराद्यभागः। मणादिकाः, गुणः शुक्लादिकाः, क्रिया तपःकरणादि पिण्डतादिरूपा, तत्र प्रक्रान्तपिण्डस्य नामात्रावतरिष्यतीति, प्रधानमेतदितिख्यापनार्थ, सामान्यगौणनामविषयं क्रियानिमित्तं भेदमाश्रित्योदाहरणमाह-तद्गौणं नामा, पुनः शब्दो विशेषणे, विशेषणत्वं च सर्वत्र पूर्ववाक्यार्थाsपेक्षयोत्तरवाक्यार्थो ज्ञेयः, क्षपयतीतिक्षपणः क्षपकर्षिस्तद्वाचकं नामक्षपण इति वर्णावली, अत्र तपःकरणादिरूपा क्रियानिमित्तम् , एवमुत्तरत्रापि भावनीयं, वलतीति ज्वलनो विश्वानरः, तपतीति तपनो रविः, पवत इति पवनो वायुः, प्रदीप्यत इति प्रदीपो दीपकलिका, चकारोऽन्येषां स्वजातीयानां भेदानां समुच्चयार्थः, एतानि तु शृनप्रभृतिकनामानि येष्वेव वलीवादिष्वाधारभूतेषु भणितानि तेष्वेव स्थितानि लब्धनिजनिजसंज्ञानि गौणानि स्युः, अन्वर्थसंज्ञात्वेन दत्तानि स्वास्माभिप्रायकृतत्वेनोभयातिरिक्तानि भवन्ति, एवं समयकृततदुभयकृतान्यपि ज्ञेयानीति गाथार्थः ॥ १ ॥ एवं सामान्येन गौणं नामाभिहितमथ प्रकृतं पिण्डमाश्रित्य गौणं समयकृतं च तदेवाह पिण्डण बहुदवाण ॥ भा० २॥ व्याख्या-पिण्डणत्ति पिण्डनं-मीलनमनुस्वारलोपः पूर्ववत् , बहुद्रव्याणां त्रिप्रभृतिसेवादिवस्तूनां लड्डुकादि तया सञ्जातानां गौणं पिण्डः, स्यादिति शेषः, प्रभूतानां द्रव्याणां मीलने यत्पिण्ड इति नामैतत् गौणमित्यर्थः, तच्च क्रियानिमित्तं पिण्डन लक्षणक्रियया निष्पन्नत्वात् , तथा प्रतिपक्षणाप्येवंविधद्रव्याणां मीलनव्यतिरेकेणाप्यप्रतिपक्षेण स्यादेवेत्यपि शब्दार्थः, यत्र तिलोदकादौ पिण्डाख्या-पिण्डप्रसिद्धिः स्यादित्यत्रोत्तरत्र च शेषः, स एवंभूतः, समयकृतः-सिद्धान्तविहितः पिण्डः-पिण्डाख्यः पदार्थः स्यात् , तस्य समयकृतत्वं दर्शयन्नाह-यथेत्युदाहरणोपन्यासार्थः, सूत्रम्-आगमम्-वाक्यं, किं तदित्याह 'पिण्डपडियाई (इति)' सूचनात्सूत्रमितिन्यायात् 'पिण्ड ' इत्यनेन पिण्डवाय इति सूत्रखण्डं लब्धं 'पडिय' इत्यनेन तु पडियाए इति द्वयोर्मिलितयोः पिण्डवायपडियाए इति जातम् , अनेन च सूत्रस्य मध्यभागवर्चिना खण्डेन “तुलादण्ड "न्यायेन Jain Education in For Private & Personel Use Only Page #320 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्ननीयावचूर्युपेता पिण्डनियुक्ति। ॥१४॥ सकलमथाचाराङ्गद्वितीयश्रुतस्कन्धसक्तपिण्डैषणाभिधानप्रथमाध्ययनसक्तसप्तमोद्देशकस्थितं सूत्रं गृहीतं, आई इत्यादि शब्दत- | परि०९ याऽस्यैव च सूत्रस्य अन्तो योज्यः, तच्चेदं "सेभिक्खू वा जाव समाणे से जं पुण पाणगं जाणिज्जा, तंजहा तिलोदगं वा तुसोदगं वीराचार्यवे"त्यादि, इह द्विकेन भिक्खुणी चेति सूचितं, यावत् शब्देन तु “गाहावद कुळं पिंडवायपडियाए अणुपविढे" इति सूचितं, कृतटीकामादिशब्दात्तत्रेत्यादीनां " से भिक्खू वा २ जाव समाणे जं पुण पाणगजायं जाणिज्जा, तंजहा उस्सेइमं चे"त्यादि सूत्राणां समहः, ५ याराधएतेषां च व्याख्या प्रस्थानतो ज्ञेया, केवलमेतैः पानकस्याऽपि पिण्डसंज्ञोक्तेति गाथार्थः ॥२॥ तदुभयमाह भागः। जस्स पुण पिंडवाय ॥ मा० ३ ॥ व्याख्या-यस्य कस्यचित्पुनर्गुडौदनपिण्डस्येति योगः, पिण्डपातार्थाय-आहारनिमित्तं प्रविष्टस्य-गतस्य साधोहिगृहमिति सामर्थ्यगम्यं, भवति-जायते सम्प्राप्ति-लाभः, कस्य सम्बन्धिनीत्याहः-गुडओयणपिण्डेहिंति विभक्तिवचनव्यत्ययाद्गुडौदनपिण्डस्य गौल्यगुणवद्रव्यविशेषकूरादिकस्य, उपलक्षणत्वात्सतुपिण्डादिप्रहः, तो गुडौदनपिंडं तदुभयपिण्डं. गौणसमयकृतपिण्डं " पिंडण बहुदव्वाणं " (भा० २) इत्यनेन गौणे त्वस्यागमप्रसिद्धत्वेन तु समयकृतत्वस्य च घटनाद् उक्तवन्तःतीर्थकरादय ऊचुः, इहान्यथाभ्याहृतः पिण्डः स्यादिति, गृहिगृहप्रविष्टस्येत्युक्तं, तत्रापि प्रवेशः प्रायोऽन्येन निमित्तेन क्रियमाणो ब्रह्मचर्ये मेदादिदोषकरः स्यादिति पिण्डपातायेत्युक्तं, यद्वा यस्य साधोः, पुनः शब्दो भिवक्रमः, पिण्डपातार्थाय प्रविष्टस्य भवन्ति सम्प्राप्तिः गुडौदनपिण्डस्य, तंति इह तदुभय पिण्डो भणनीयः, स च गुंडादिपिण्डस्यैव घटते न साधोरिति पिण्डपिण्डवतोरेक्यात् साधुना लब्धं गुडौदनपिण्डं, पुनः २ शब्दोऽन्यतो योजितः, शेषं पूर्ववदिति गाथार्थः ।। ३ ॥ उभयातिरिक्तमाह- . उभयाइरित्तमहवा०॥ भा० ४॥ (१०३) व्याख्या-उभयातिरिक्तं-गौणसमयकृतरूपद्वयाद्भिन्नं, अथ चेति नामान्तरद्यो ॥१४॥ Jain Education l a TAIT Page #321 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education तकः, अन्यच्चतुर्थमित्यर्थः, अपिशब्दः हुशब्दो वाक्यालङ्कारे, अस्ति-विद्यते, लौकिकं - लोकरूढं नाम - अभिधानं, आत्मनो नाम मातृपित्रादेरभिप्रायेण मयैतस्य बालस्यैतत्सिहकादिनामदातव्यमिति, मनोभिसन्धिनाकृतं विहितं यत्तत्, तदेवोदाहरणेन समर्थयन्नाह यथेत्युदाहरणोपन्यासार्थः, सिंहकदेवदत्तावादिर्यस्य यज्ञदत्तादेर्नाम्नस्तद्यस्य हि सुतादेः पित्रादिसिंहको देवदत्तो वेति नाम ददाति, न तस्य हिनस्तीति सिंहक इति, संस्कृतलक्षणभावेन ककारेण जातुं प्राकृतलक्षणभावेन तु सिंह इति स्याद् एमन्यत्रापि ककारो ज्ञेयः नापि देवा एनं देयासुरिति देवदत्त इति चान्वर्थो नियमेनऽस्ति, तथाभूतस्यापि तथाभूतनामदानादिति, न तावद्गौणं नापि समयकृतं समये अरूढत्वात् नापि तदुभयं गौणत्वसमयकृतत्वयोः पृथग्निदर्शित्वेना विद्यमानत्वात् किं तर्हि ?, गौण समय कुतोभयलक्षणहीनत्वेनोमयातिरिक्तामत्युच्यतेति नाम्नः, कस्यचिद् पुनर्वरप्रदानतया सुरैर्दत्तत्वमङ्गीकृत्य 'देवदत्त' इति नाम्नो गौणत्वं संभव तदपेक्षया गौणं, किमिति नोभयता ? इति उच्यते, न नामदातुरित्थं विवक्ष्या भवति, अथ भवति तर्हि प्रायिकत्वेन नैतद्विवक्षितम्, एवं यज्ञदत्तादिष्वपि भावनीयमिति गाथार्थः || ४ || आह नेदं " गोण्णं समये " ( गा० ६ ) त्यादि नियुक्तिगाथायामुपात्तमिति कुतो माष्यकृताकृतमिति, उच्यते नोपाचमित्यसिद्धं, " वावि " ( गा० ६) शब्दाभ्यां तत्र सूचितत्वात् तथा चाह भाष्यकार: गोण समयाइरितं ॥ भा० ५ ॥ व्याख्या - गौणं पूर्वोक्तं, समयति सूचनात्समयकृतं पूर्वोक्तमेव तयोरतिरिक्तं-भिन्नंउभयातिरिक्ताख्यमित्यर्थः, इदं युक्तं सिंहकादिवक्ष्यमाणं वा डिम्भरूपं द्वयोरप्यात्माभिप्रायकृतत्वेन तुल्यत्वात्, अन्यच्चतुर्थमित्यर्थः, वाविसूचितं-वा-अपिभ्यां ज्ञापितं नामा - अभिधानं ज्ञातव्यमिति शेषः, माकृताभिधानापेक्ष योदाहरणमाह-यथेत्युदाहरणोपन्यासार्थः, पिण्डउति इति पिण्डयतीति पिण्ड इत्येवं क्रियते विधीयते, कस्यचिन्नियतस्य नामं - अभिधानं मनुष्यस्य - मानवस्य, मनुष्यग्रहणं परि० ९ वीराचार्यकृतटीकायाराद्यभागः । Page #322 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्ननीयावचूर्युपेता परि०९ वीराचार्यकृतटीकायाराद्यभागः। पिण्डनियुक्तिः। ॥१४॥ सर्वस्यापि सचित्तादिवस्तुन उपलक्षणार्थम् , एवं वाऽनन्तरोक्या महास्या गाथायाः पुनरुक्तताऽपि पराहृता भवन्ति, यद्यपि हि प्रायो द्वेऽपि गाथे समानार्थे, तथाप्याद्या क्रमायातस्योभयातिरिक्तस्य प्रतिपादिका, द्वितीया तु नियुक्तिगाथायां नोपाचेति, तस्यापि परेणाविद्यमानतायां शङ्कितायामुत्तरदायिकेऽन्यकर्तृकीयमित्यन्ये, तत्र न पुनरुक्तायामपि कश्चिद्दोषः, केवलमस्याः पातनायामथवा सा इति गाथार्थः ॥ ५॥ ननु समयकृतस्य लौकिकस्य च नाम्नः संज्ञात्वेन निष्पन्नत्वान्नास्ति विशेषः, किमिति मेदेनोक्ते ते ! इति, उच्यते तदुत्पादकयोः समयलोकयोः स्वभावभेदेन तयोरप्युत्पाद्ययोर्मेंदो विवक्षित इति, अथ कस्तयो स्वभावभेद इत्यत आह___तुल्लेऽवि अभिप्पाए । भा० ६ ॥ व्याख्या-तुल्येपि-सामान्येऽप्यतुल्ये न गृह्णात्येवेति अपि शब्दार्थो, यथा तीर्थकरे शंकर | इति नाम, सामायिकानां हि शं करोतीति शकरः, ऐहिकामुष्मिकसुखजनकलक्षणक्रियानिमित्तत्वात् , क्रियानिमित्ताख्यं गौणं नामेदमित्यभिप्रायः, लोकस्य तु तीर्थकरस्याप्यनभ्युपगमात् प्राकृतपुरुषादावप्येतन्नामश्रवणाच्च, संज्ञानामेदमित्यभिप्रायतुल्यता, अभिप्राये नामनिष्पत्तेः कारणभूते संज्ञाकरणलक्षणे उभयेषामपि मनोविकल्पे सामायिकैर्हि समयकृतं, लोकेन तु लौकिकं संज्ञाकरणलक्षणमेकमेव निमित्तमाश्रित्य नाम दत्तमित्यर्थः, समयप्रसिद्धं-सामायिकैः कृतमित्यर्थः, यथा समुद्देशादिकं भोजनदेवादिकं नाम न गृह्णाति-व्यववहारविषयी न करोतीत्यर्थः, सर्ववित्त्वाभावाद्विवक्ष याऽपि सर्वमतानीकाराभावाच्च, लोकः-पृथग्जनः यस्किमपि पुनर्लोकप्रसिद्धं-पृथग्जनख्यातं तन्नाम सिंहकादिकं पुरुषदेवादिकं सामायिका-गणधरादयः उपचरन्ति-व्यवहारविषयं कुर्वन्ति, सर्ववित्वाभावाद्विवक्षया सर्वमताङ्गीकारभावाचेत्यनयोः स्वभावभेद इति गाथार्थः ।। ६ । उक्तो नाम पिण्डः, अथ " गोन्नं समयकयं" (गा०६ )चेत्यादि गाथायां " ठवणापिण्डं अओ वोच्छं" इति चतुर्थपादोद्दिष्ट स्थापनापिण्डमाह ॥१४॥ Jain Education inte For Private Personal Use Only Irww.jainelibrary.org Page #323 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inter अक्खे वराड वा० ॥ ७ ॥ व्याख्या - अक्खेति अक्षे वन्दनके पिण्डस्वेन स्थापित इति शेषः, जातित्वादेकवचनं, एवमुत्तत्रापि सद्भावमसद्भावं चाश्रित्य स्थापनापिण्डं विजानीहीति योगः, तथा वराटके - कपर्दके वाशब्दोऽंगुलीयकादेः समुच्चयार्थः, तथा काष्ठे दण्डकादौ, तथा पुस्तेति उल्लिकादौ, वाशब्दः समुच्चये, स चासद्भावं चेत्येवं योज्यः, चित्रकर्म्मणि - चित्रलिखितपुत्तलिकादो, वा शब्दो लेप्योपलयोः समुच्चयार्थः, तत्र लेप्यं-मृन्मयप्रतिमादिः, उपलः - पाषाणप्रतिमादिः तस्मिन् सम्भावंति सतोऽक्षादित्रिकप्रभृतिसता - तेनाकृत्या स्थाप्यमानस्य पिण्डस्य विद्यमानस्य भावोऽस्तित्वमिति हृदयमिति, सद्भावोऽक्षादित्रिकप्रभृतिसङ्घातरूपपिण्डस्याऽऽकृतिः, यद्वा सश्वासौ विद्यमानश्वासौ भावश्वाऽक्षादित्रिकप्रभृतिसङ्घातत्वेनाऽऽकृत्या स्थाप्यमानः पिण्डरूपः पदार्थः, स पूर्वोक्चैव पिण्डस्याऽऽकृतिस्तं, तथा अपभावेत्ति एकारस्य द्वितीयैकवचनार्थत्वात्सद्भावः, पूर्वोक्काया आकृतेरभावात्पिण्डस्यान्राकृतिः, उक्तं च "लेप्पगहत्थीत्थिति एस सम्भाविया भवे ठवणा होइ असम्भावे पुण इत्थित्ति निरागई अक्खो ॥ १ ॥ " इत्यादि, तं आश्रित्येति शेषः, स्थापनं- स्थापनेत्यक्षादौ पिण्डोऽयमिति अध्यारोपस्तया पिण्डः सः, यद्वा विषयविषयिणोरक्यात् स्थापनाया विषयभूतोऽक्षादिरेव स्थापनेति, स्थापना चासौ पिण्डश्च सः, स्थाप्यत इति स्थापनेति, पिण्डोऽयमिति विकल्पितोऽक्षादिरेव समासोऽनन्तरोक्तोऽवस्थाप्यतेऽस्मिन्निति स्थापनेति, पिण्डोऽयमिति मनोविकल्पस्य विषयभूतोऽक्षादिरेव समासोऽनन्तरोक्तवत्तं विजानीहि बुध्यस्वेति गाथार्थः ॥ ७ ॥ अत्रैव विषयविभागमाह इक्को उ अस भावे० ॥ भा० ७ ॥ व्याख्या - एकः केवलोऽक्षो वराटकोऽङ्गुलीयकादिः, वेति चित्रादीनां पारिशेष्याल्लभ्यतेपिण्डस्वेन स्थापित इति प्रक्रमः, तुशब्दममे व्याख्यास्यामः, असद्भावे पूर्वोक्ते, आकृतेरभावात्परमाण्वादयस्तु न विवक्षिताः, स्थापनापिण्ड इति सर्बत्र प्रक्रमः, भवतीति सर्वत्रयोगः, तथा त्रयाणां - त्रिसङ्ख्यानां प्रत्येकं प्रक्रान्तानामक्षकपर्दाङ्गुलीयकादीनाम्मध्यात्, परि० ९ वीराचार्यकृत टीका याराद्यभागः । Page #324 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्ननीया वसूर्यपेता श्री. पिण्ड निर्युक्तिः । ॥ १४२ ॥ Jain Education Inte तुशब्दस्तेषामेकत्र मिलितानामेवेति विशेषणार्थोऽत्र ( प० ४ ) योज्यः, त्रिग्रहणं - सर्वजघन्यसद्भावस्थापनापिण्डत्वस्य प्रतिपादनार्थं, तेन चतुरादीनामपि तेषां तत्स्यादेव, स्थापनात् पिण्डत्वेन न्यासः, पुनर्भवति - वर्त्तन्ते सद्भावे सद्भावस्थापनापिण्ड आकृतेर्भावात्, तथा चित्रेषु प्रभूतेष्वपि चित्रपुतलिकादिषु पिण्डतया स्थाप्यमानेषु, असद्भावेऽसद्भावस्थापनापिण्ड आकृतेरभावाद्वर्णपरमाण्वादयस्तु न विवक्षिताः, तथा दारुअलेप्पोवले सियरोति दारुकप्रहणस्य पुस्तोपलक्षणार्थत्वाद्दारुकपुस्तलेप्योपलेषु पूर्वोकेषु, इतरः- सद्भावस्थापनापिण्डोऽक्षाद्यपेक्षया आकृतेर्भावात्, ननु द्वयोरक्षादिकायाः का वार्त्तेति उच्यते, पिण्डः सिद्धः सन्नक्षादिष्वसन् स्थाप्यत इति स्थापनापिण्डः, स च ये पिण्डैकार्थानां मध्ये युग्मशब्देन भारुण्डयोः पिण्डैकार्थिकत्वमुक्तं येन च तेनैव राशिरुक्तास्तेनाभिप्रायेण " तिन्हं ठवणा उ होइ | सब्भावे " इति वचनाच्चासद्भावस्थापनापिण्डत्वमेव, येन त्वक्षादि युग्मस्य पिण्डैकार्थिकत्वमुक्कं तेनाभिप्रायेण “ एक्को उ प्रसन्भावे " इति वचनाच्च तयोः सद्भावस्थापना पिण्डत्वमेवेति मतमेदेन द्वेऽपि स्थापने स्वः, यद्वा मतभेदं विना द्वेऽपि ते, तथाहि एकको द्विकर्तृकइति सङ्ख्याक्रमः, तत्र च द्विको मध्ये एककर्तृकौ तु पार्श्वयोर्जातौ तत्राप्यक्षादिविषयेणैकेनासद्भावस्थापनापिण्डस्तद्विषयेण त्रिन तु सद्भावस्थापनापिण्ड उक्तस्तद्विषयद्विकस्तु ग्रन्थिरिव डमरुकस्योभयपुटे - उभयपार्श्ववर्त्येक कत्रिकलब्धे असद्भावस्थापनापिण्डत्वे स्पृशति, द्वाभ्यामपि संस्थाप्यत इत्यर्थः, प्रायिकमिदं मतं, अन्ये स्वाहु-निर्युक्ति कारवचनमेव प्रमाणं, किं युक्तिभिस्तेन च "एक्को उ असब्भावे” इत्यादि सूत्रेण स्थापनोता, तत्र द्वयोस्तयोरेकाऽपि सा नोकेत्येकाऽपि न स्यात्, दृश्यते चान्यत्रापि सतोऽप्यविवक्षा, यथा- एकः सन्नपि गणनां न याति द्वौ जघन्यं सञ्चयानमिति, इहौषनिर्युक्तिप्रभृतिग्रन्थाभिप्रायेण तु विवक्षावसतोऽक्षादीनां पृथग् द्वेऽपि स्थापने स्यातां यथा-यदैकैको अक्षादिश्वित्रे त्वेकं रूपकं पिण्डत्वेन स्थाप्यते तदा सद्भावस्थापनापिण्डो, यदा तु नान्येव व्यादीनि परि० ९ वीराचार्य कुतटीका याराद्य भागः । ॥१४२॥ Page #325 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परि०९ बीराचार्यकृतटीकायाराधमागः। स्थाप्यन्ते तदा सद्भावस्थापनापिण्ड इति गाथार्थः ॥ ७॥ उक्तः स्थापनापिण्डः, अथ द्रव्यपिण्डस्यावसरः, स च आगमतो नोआगमतश्च द्वेधा, तत्राऽऽगमतः पिण्डशब्दार्थज्ञस्तत्रानुपयुक्तः प्राणी, नोगमतस्तु ज्ञशरीरभव्यशरीरतद्व्यतिरिक्तभेदात् त्रिधा, तत्रज्ञशरीरद्रव्यपिण्डः-पिण्डशब्दार्थज्ञस्य प्राणिनो विगतजीवितं शरीरं, भव्यशरीरद्रव्यपिण्डस्तु यः पिण्डशब्दस्यायें साम्प्रतं न जानात्यप्रेतु सम्भाव्यते ज्ञास्यतीति स बालादिर्भण्यते, अथ तद्व्यतिरिक्तं द्रव्यपिण्डमाह तिविहो उ दवपिंडो॥८॥ व्याख्या-त्रिविधः-त्रिधा तुशब्दः पुनरों भिन्नक्रमश्च, स्यादिति शेषः, द्रव्यपिण्डः व्यणुकस्कन्धादिः, पुनःशब्दो प्रयोज्यः, तत्प्रयोगश्चैवं, यथा-सद्भावाऽसद्भावमेदात् स्थापनापिण्डो द्विविध उक्तः, द्रव्यपिण्डः पुनस्त्रिविध इति, वैविध्यमेवाह-सचित्तोत्ति सचित्तेन-चैतन्येन वर्तत इति सचित्तः, चशब्दस्य द्विरुक्तिच्छन्दोत्थ, सच्चित्तो-विधमान चि यस्य स सचित्तः-सजीवः, तथा मिश्रकः स जीवाजीवरूपः, चकारः समुच्चये, तथा अचित्तोति चकारस्य पूर्ववद्विर्भाव इत्यचित्तो-निर्जीवः, पृथिव्यादिद्रव्यं पूर्व सचित्तस्स्यात्ततः स्वकायशस्लादिमिः प्रासुकी क्रियमाणं कियन्तं कालं मिश्र, ततोऽचित्तमित्ययं क्रमः, तत्र चैककस्य-भिन्नभिन्नमेदस्य, चशब्द:-पुनरर्थो, भिन्नक्रमश्च, एचोति एतेभ्यः पुनः सचिचादिभ्यो मध्यात्, पुनः २ शब्दो विशेषणार्थोऽत्र योजितः, नव नवेति वीप्सायां, सङ्ख्या मेदाः प्रकारो वक्ष्यमाणाः, स्युरिति शेषः, इति मिलिता सप्तविंशति मेदाः, तुशब्दः सचिचादिमेदाविवक्षणेन सामान्यतः पृथ्वीकायादीनां नवानामपि द्विकादिसंयोगैः प्रभूतैरपि जातिनिर्देशादेको मिश्राख्योऽष्टाविंशो मेदोऽस्तीतिकथनार्थः, वक्ष्यति च “ अह मीसउ पिण्डो" इत्यादि, प्रत्येक-पृथक् पृथगिति गाथार्थः ॥ ८॥ भेदानेवाह पुढवी आउकाओ०॥९॥ व्याख्या-पृथिव्यप्कायः शर्करादिः कूपजलादिश्च, तथा तेऊ वाऊ वणस्सई' इति कायशब्दानुवृत्ते Jain Education I । Page #326 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्ननीयावर्युपेता श्री | परि०९ वीराचार्य कृतटीकायाराद्यभागः। पिण्ड नियुक्ति ॥१४३॥ स्तेजस्कायः-अङ्गारादि, वायुकायः-तनुवातादिनस्पतिकाय आम्रादिः, चैवशब्दः समुच्चये, तथा बेइंदियतेईदियत्ति विभक्तिलोपाद् द्वीन्द्रियत्रीन्द्रियाः शङ्खादयः कीटिकादयश्च, एवं चउरोत्ति, सूचनाच्चतुरिन्द्रियाः भ्रमरादयः, तथा पञ्चेन्द्रिया गवादयः, चैवशब्दः पूर्वत् , नवमा ज्ञेया इतिशेषः, इतिद्वारनवकप्रतिपादकगाथार्थः ।। ९॥ तत्र पृथ्वीकायपिण्डमाह पुढविकाओ तिविहो० ॥१०॥ व्याख्या-पृथ्वीकायः पूर्वोक्तस्त्रिविधः स्यादिति सर्वत्र शेषः, यथा-सचित्तः, मिश्रकः, चकारः समुच्चये, अचित्तः त्रयोऽपि प्रतीताः, तत्र सचित्तः पुनराद्यः, पुनःशब्दो विशेषणे, द्विविधो-द्विधा, कथम् !, इत्याहनिच्छियत्ति सूचनान्नैश्चयिकः सर्वथा सचित्तः, तथा व्यावहारिकः सम्भाव्यमानचेतनांशः, चैवेति समुच्चय इति गाथार्थः ॥ १० ॥ द्विविधमपि सचित्तपृथ्वीकायमाह निच्छयओ सच्चित्तो०॥ ११ ॥ व्याख्या-निश्चयतः शीताचलगनादविसंवादितया सचित्तः प्रतीतः, पृथिवीकाय इति प्रक्रमः, स्यादिति सर्वत्र शेषः, पृथिव्यो-धमदियो महापर्वता:-मेर्वादयः, तेषामुपलक्षणत्वाकादिग्रहः, बहुमध्येऽभ्यन्तर्गब्में, अचित्त. मिश्री प्रतीतो, तद्वर्जः-तद्रहितः सः, सेसोति पुनः शब्दलोपाच्छेषः पुनः कूटशैलनिराबाधारण्यप्रभृतिषु स्थितः, पुनः व्यवहारसचित्तो लोकानुसारितयाऽभिप्रायेण सजीव इति गाथार्थः ॥ ११ ॥ उक्तः सचित्तः पृथ्वीकायो, अथ तमेव मिश्रमाह खीरदुमहे? पन्थे० ॥ १२॥ व्याख्या-खीरदुमहेदृत्ति अन्ते एकारलोपात् क्षीरदुमाधो-बटोदुम्बरादीनां तले, तत्र हि क्षीरमाणां माधुर्यन शस्त्रत्वाभावात्सचितः, शीतादिशस्वभावाचाचित्त इति मिलितो मिश्रः, तथा पथे-मार्गे, तत्र हि गन्त्रिकाचक्रादिभिः सचित्त उत्खन्यते, तन्मध्यात् कियान् शीतादिभिरचित्तीक्रियत इति मिश्रः, तथा कृष्टार्दो हलविदारितः सजलश्च पृथ्वीकायः, तत्र कृष्टे ॥१४॥ d Jain Education in Page #327 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education पथी च मिश्रता सचित्तपृथ्वी कायस्योपरि मेघेन वर्षता स कियान् विराध्यते यावज्जलस्थितिं न बध्नाति तावन्मिश्रस्थितिः बन्धे तु सचित्तः स्यादिति सम्भाव्यते, तथा इन्धने - गोमयादिके, इन्धनं हि निश्चेतनं, पृथ्वीकायः तु सचेतनस्ततश्च कुम्भकारादिनेन्धने स प्रक्षिप्तः संस्तेनेन्धनेन परिणम्यमानो यावन्नाद्यापि सर्वथा परिणमति तावत् चकारः समुच्चये, मिश्रः प्रतीतः स्यादितिशेषः, तुशब्दः समुच्चये, ( प० ५ ) स च पौरुषीत्रिकं त्वित्येवं योज्यः, इन्धनमाश्रित्य कालनियममाह - पोरिसित्ति विभक्तिलोपात् पौरुष प्रहरं एकति अन्ते ह्रस्वत्वं विभक्तिलोपश्च इत्येकां केवलां, तथा दुगंति अत्रोत्तरत्र च पौरुषीत्यनुवृत्तेरनुस्वारलोपाच्च पौरुषीद्विकं प्रतीतं, एवं तिगंति पौरुषीत्रिकं, "कालाध्वनोरत्यन्तसंयोग " इत्यनेन यावच्छब्दाध्याहाराद्वा द्वितीया, एवमुत्तरत्राऽपि कथं मूतः सङ्क्रमः सः १, बहु इंधणचि विभक्तिलोपाद्बहु-प्रचुरमिन्धनं पूर्वोक्तं यत्र सोऽर्थापत्या स्तोकः सचित्तपृथ्वीकायः, एवं मज्झति विभक्तिलोपादत्रोत्तरत्र चेन्धनशब्दानुवृतेम्ब मध्येन्धनः प्रतीतः, एवं थोवेत्ति स्तोकेन्धनः प्रतीतः, तदुपर्यचेतनः स्यात्, चकारः समुच्चय इति गाथार्थः ॥ १२ ॥ उक्तोमिश्रः पृथ्वीकायोऽथाचितमेवाह सीउण्डखारखित्ते ॥ १३ ॥ व्याख्या - शीतोष्णक्षारक्षत्रेणेत्यर्थः, एवमुत्तरत्रापि, तत्र शीतं प्रतीतं, उष्णं तापः क्षारः तिलक्षारादिः, क्षेत्र करीषविशेषः, तथा अग्गी लोणूस अंबिलेति अग्निलवणोषाम्ल इति, तत्राग्निः विश्वानरो, लवणं प्रतीतं, उषः उखरक्षेत्रोत्पन्नो रनो विशेषः, आम्लं काञ्जिकादि, तथा स्नेहे तैलादौ, अत्र शीतोष्णान्या लक्षारस्नेहाः परकायशस्त्रमित्यादिशस्त्र योजना कार्याः, अनेनान्यान्येऽपि स्वकायपरकायशास्त्राण्युपलक्षितानि, यथा परवर्णस्यापरवपूर्ण इत्यादि, किमित्याह-व्युत्क्रान्तयोनिकेन - गतजीवोत्पत्तिस्थानेन प्रासुकेनेत्यर्थः, st for पृथ्वीका द्रव्यतः क्षेत्रतः कालतो भावतश्चेति चतुर्द्धा प्रासुकः, तत्र शीताद्यैः स्वकायपरका यशस्त्रैर्द्रव्यतः प्रासुक उक्तः, तेन च परि० ९ वीराचार्य कृतटीका याराद्यभागः । Page #328 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्ननीया. बचूर्युपेता श्री पिण्डनिर्युक्तिः । ॥१४४॥ Jain Education Inter क्षेत्रतः (क्षेत्र) प्रभृति प्रासुकोऽप्युपलक्षितो ज्ञेयः, तत्र क्षारादिक्षेत्रोत्पन्नस्य मधुरादिक्षेत्रोत्पन्नस्य चान्योन्यं मीलनेन क्षेत्रतः प्रासुकः, यदि त्वपरेण पृथ्वीकायेन सह न मीरयते किंत्वन्यत्र क्षेत्रे नीत्वा प्रियते, तदानीं सर्वोऽपि सर्वस्मात् क्षेत्रादानीतो योजनशतादृद्धं भिन्नाहारत्वेन शीतादिना च प्रासुकीस्याद्, एवं मावद्धरीतक्यादिका वनस्पतयः स्वायुःक्षयेण विनष्टः कालतः प्रासुकः, स चातिशयज्ञानिनैव सम्यग् ज्ञायते, तथा भावा:- कृष्णादिवर्णपञ्चकं तिकादिरसपञ्चकं सुरभ्यादिगन्धद्विकं गुर्वादिस्पर्शाष्टकं च तत्र स्वकायशस्त्रादिमिरपरवणैः सन्नपरवर्णो यः स्यात् स लक्षणभावेन प्रासुकीस्याद् इति भावतः प्रासुकः, एवं रसगंधस्पर्शेष्वपि भावनीयम्, मत्र वर्णादिभिश्चतुर्भिरप्यन्यथा भावं गतस्तावत्प्रासुको भवति किं तर्हि : त्रिभिर्द्वाभ्यामेकेनापि मवत्येवेति वृद्धाः, प्रयोजनं कार्य, जातित्वादेकवचनं, तेन पूर्वोकपृथ्वीकायेन इदं - अनन्तरमेव वक्ष्यमाणत्वेन प्रत्यक्षं भवति-जायत इति गाथार्थः ॥ १३ ॥ प्रस्तावितमेव प्रयोजनमाह अवरद्भिगविसबंधे॰ || १४ || व्याख्या - अपराद्धं - पीडाजननरूपोपराध इति केचिदपराधिको - लूतास्फोटकः सर्पादिदेशो वा विषं, मधुरंदद्रुप्रभृतिषु चारितं स्यात् तयोर्दा होपशमनाय बंघ इव बन्धः प्रलेपस्तिस्मिन् केदारतरिकादिनेति शेषः, प्रयोजनं भवतीति सर्वत्र प्रक्रमः, यद्वा लवणेन प्रतीतेन अळवणभक्त भोजनादिषु, वा-विकल्पे, यद्वा सुरम्युपककेन - गन्धारोहकारव्यसुगन्धपाषाणेन, तेन हि पानाथपानोदः क्रियते, वा विकल्पे, एते सर्वेऽपि पृथ्वीकायरूपाः, नन्वपराधिकादिभिः कारणैः केदारतरिकादिकस्य पृथ्वीकायस्य यद् प्रहणमनुज्ञातं तत्सचितादित्रिकस्य मध्यात् कतरस्य विधेयम् ?, इत्याशङ्कयाह- अचित्तस्य- निर्जीवस्य, तुकारः पुष्टालम्बनेनैव सचितस्यापि प्रस्तुतेन पृथ्वी कायेनोपलक्षितस्य षट्जीवनिकायस्य परिभोगो विधेयः, न यथा कथंचिदिति विशेषयति, ग्रहणं-वादानं साधुनेति प्रक्रमः, कार्यमिति शेषः, आह-अनन्तरोक्तगाथायाः पश्चार्द्धेनैतानि अपराद्धिकप्रयोजनान्याक्षिप्तानि यस्मिंस्तु " वकं तिजोणिएण" मिति विशेषणं परि० ९ वीराचार्य कुतटीका याराद्य भागः । ॥१४४॥ Page #329 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परि०९ वीराचार्यकृतटीकाया आव भागः। पृथ्वीकायस्य कृतं तिष्ठति, तेन तु सोऽचित्त एव भण्यत इति, युक्तौ वाऽपराद्धिकादिप्रयोजनेषु केदारतरिकादिकस्य पृथ्वीकायस्याचित्तस्यैव ग्रहणं विधेयमिति लब्धं, किमचित्तस्य तु ग्रहणं कृतं ! इति उच्यते, उत्सर्गतो यतिना पृथ्वीकायेनोपलक्षितानां षण्णामपि जीवनिकायानामचित्तानामेव ग्रहणं विधेयमिति दर्शनार्थ, तत् प्रयोजनं-कार्य तेन पूर्वोक्तपृथ्वीकायेन इदं वक्षमाणं, चकारः समुच्चये, अन्यदपराधिकाद्यपेक्षयाऽपरं, भवतीति शेषः, अत्राऽपि जातिनिर्देश इति गाथार्थः ॥ १४ ॥ प्रस्तावितमेव प्रयोजनमाह ठाणनिसीयणतुयट्टण ॥ १५॥ व्याख्या-ठाणनिसीयणतुयट्टणत्ति विभक्तिलोपात्स्थाननिषीदनत्वग्वर्त्तनमिति, तत्र स्थान-अवस्थितिनिधीदनं-उपवेशनं, त्वम्वन-स्वापः, तथा उच्चारादीनां-पुरीषमूत्रप्रभृतीनां, चेव उस्सगोत्ति, पदव्यत्ययाद् उत्सर्गःपरित्यागः, चैवेति समुच्चये, क्रियत इति शेषः, अच्चित्तपृथ्वीकाय इति प्रक्रमः, स चात्र स्थण्डिलरूपो ग्राह्यः, तथा घुट्टकडगलगलेपः, गृह्यत इति शेषः, तत्र घुट्टका-लेपितपात्राणां श्लक्ष्णीकारकः पाषाणः, डगलकाः-पुरीपोत्सर्गानन्तरमपानप्रोञ्छनपाषाणखण्डरूपाः, लेपः-भोगपुरपाषाणादिनिष्पन्नं तोम्बकपात्रकाभ्यन्तरग्रहणद्रव्यं, एमाइत्ति चकारलोपादेवमनन्तरोक्तं स्थानादिकं लेपपर्यन्तं वस्त्वादिःप्रभृतिर्यस्य तदेवमादि, आदिशब्दाद्वसत्युपलेपननिमित्तमृत्तिकादिग्रहः, प्रयोजनमचित्तपृथ्वीकायेन क्रियते कार्य बहुधा-अनेकशः, नन्वयं किमिति सचित्तादिभेदतया प्ररूपित इति ! उच्यते, सचित्तमिश्रपरिहारेणाचिकेन येन शिष्याः प्रयोजनं कुर्वन्ति, तर्हि सचिचादिकस्य मध्यात् किश्चिद्भेदद्वयमेव प्ररूप्यतां तृतीयभेदस्तु पारिशेष्यालप्स्यत इति :, उच्यते, शिष्याणामेव सुखावबोधार्थ, पारिशेष्येण हि तस्य मेदस्य सत्कानशेषान् सम्यक् शिष्या अवबुध्यन्ते, अयं पूर्वपक्षः सोत्तरदानोऽप्रेतनेष्वपि पिण्डेषु ज्ञेय इति गाथार्थः ॥ १५ ॥ उक्तः पृथ्वीकायपिण्डोऽथाप्कायपिण्डमाह in Eden inte Page #330 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बमारत्नीयाबर्युपेता श्री परि०९ वीराचार्य कृतटीकाया आबमागः। पिण्डनियुक्ति। ॥१४५॥ आउकाओ तिविहो० ॥ १६ ॥ व्याख्या-इयं " पुढविकाओ तिविहो" इत्यादि गाथे (गा० १०-११) द्वेऽप्काया- मिलापेन व्याख्येयेति गाथार्थः ॥ १६ ॥ " निच्छयववहारओ चेवे "त्यनेनोदिष्टं नैश्चयिकव्यावहारिकाप्कायमाह पणउदही घणवलया०॥ १७ ॥ व्याख्या-घणउदही घणवलया इति घनोदयो-नरकपृथ्वीनामाधारभूतानि कठिननीराणि, धनवलयानि-तासामेव पार्श्ववर्तिवृत्ताकारतोयानि, (प०६) पूर्वपदेन समासः, पुलिङ्गता छन्दोत्था, तथा करगत्ति विभक्तिलोपाकरका धनोपलाः, तथा समुद्ददहाणत्ति समुद्रहूदानां-जलधिनदानां बहुमध्ये पूर्वोक्ते शीताचलगनात्, चकारः समुच्चयार्थों लुप्तो दृश्य, अथेति आनन्तर्ये, निश्चयसचित्तः पूर्वोक्तः, अप्काय इति प्रक्रमः स्यादिति शेषः, या व्यवहारनयस्य-लोकानुसारिमतस्याऽभिप्रायेणेति शेषः, अगडाई इति ' तात्स्थातव्यपदेशो'ऽवटादिस्थः कूपवाप्यादिस्थाऽप्कायः, सचित्तः स्यादिति प्रक्रमः इति गाथार्थः ॥ १७ ॥ उक्तः सचित्तोऽप्कायोऽथ तमेव मिश्रमाह उसिणोदगमणुबत्ते ॥ १८ ॥ व्याख्या-उष्णोदकं-अग्नितापित जलं मिश्रोऽप्कायः, स्यादिति सर्वत्र प्रक्रमः, अणुवत्चे दंडेत्ति जातिनिर्देशादनुढुत्तेषु अजातेषु दण्डेषु त्रिपूत्कालेषु, प्रथमेन दण्डेन कश्चित्परिणमति कश्चिन्नाद्यापीतिमिश्रो, द्वितीयेन प्रभूततरः परिणमति स्तोको नाधापीतिमिश्रः, तृतीयेन तु सर्वोऽप्यचित्त इति भावः, तथा वर्षे-वृष्टिजले, चकारः समुच्चये, स च तन्दुलोदकं चेत्येवं दृश्यः, पतितमात्रे-भूमावायातमात्रे, मात्र इति पतनकालावधारणार्थः, पतनकाल एव हि यावज्जलं गर्तादौ स्थिति न बध्नाति तावत्पतत् सचित्तं किञ्चित्पतितं सत् पृथ्वीक्षारादिना ध्वस्तं पुनरचित्तं स्यादिति, मिलितं मिश्रं स्थितिबन्धे स्वाधारभूतपृथिव्यनुरूपः सचितादिविभागः सम्भाव्यते, तथा मुक्त्वा-परिहृत्य आदेशत्रिकं वक्ष्यमाणं मततत्रितयं, तेनोक्ता मिश्रता न पावेत्यर्थः, चाउलोदगंति । ॥१४५॥ Jain Education Intema For Private & Personel Use Only jainelibrary.org Page #331 -------------------------------------------------------------------------- ________________ O 34 प्रक्षिप्यमाणस्य तदाशनवर स्किोटका, चकारः समन्त्रक पूर्वोतं तन्दुलोद कमिविरका) चकार सत्र परि०९ वीराचार्यकुत टीकाया आधभाग: तन्दुलोद केष्टीकरगं अबहुपसनंति सूचनाद् अबहुपसन्नं-नातिस्वच्छीभूतमिति गाथार्थः ॥ १८ ॥ आदेशत्रिकमेवाह भंगडपासगलग्गा० ॥ १९ ॥ व्याख्या-माण्डकपार्श्वकलग्नस्तन्दुलधावनभाजनस्य बहिराश्लिष्टाः, उत्तेडा तन्दुलानामन्य भाजनप्रक्षालिताना, तत्र प्रक्षिप्यमाणस्य तद्भाजनस्य बिन्दवो न शाम्यन्तीत्यत्रापि योगः, गाथान्ते अन्ये इति भणनाद अत्रैके आचार्या भणन्तीति ज्ञेयं, तथा बुहुदास्तन्दुलोदकोपरिभवाः स्फोटकाः, चकारः समुच्चये, निशाम्यन्ति विनस्यतीत्यर्थः, यावदिति कालावधी यावताकालेनेत्यर्थः, तावदिति कालावधिनियमार्थः, तावन्तं कालमित्यर्थः, मिश्रकं पूर्वोक्तं तन्दुलोदकमिति प्रक्रमः, स्यादिति शेषः, तदुपर्यचेतनमिति सर्वत्र सामर्थ्याज्ज्ञेयं, पूर्वोक्तयुक्त्यान्ये इति भणन्ति, तथा तन्दुला येषां तद्वाचनं तेष्वीकरका:(:) चकार समुच्चये, राध्यन्ति, यावदिति पूर्ववत् , तावच्छब्दस्यानुवृत्तिः, तेषां तन्दुलोदकं मिश्रः स्यादिति क्रमः, अन्ये-परे आचार्या ब्रुवत इति शेषः, अत्र मिश्रेणैवाधिकारः, अचेतनं तु विवरणप्रसङ्गेनोक्तमिति गाथार्थः ॥ १३ ॥ एतेषां परिहरणाय दृषणान्याह एए उ अणाएसा० ॥ २० ॥ व्याख्या-एते त्वनन्तरोक्ता आदेशाः, पुनःशब्द एतेषामनादेशत्वादिद्योतकः, अनादेशाःकुत्सितमतानि त्रयोऽपि त्रिसच्या अपि, न पुनरेक एव द्वावेवेत्यपिशब्दार्थः, ज्ञेया इति शेषः, हेतुमाह-कालस्योच्छासादिकस्य नियमो यथैतावद्भिरुच्छ्रासादिकैरुत्रेटा विनस्यन्तीत्यादिनिश्चयस्तस्य असम्भवतोऽघटनात् , सोऽपि कैः कृत्वा ! इत्याह रूक्ष स्नेह-जलादिना अव्याप्तं नवमित्यर्थः, इतरच्च स्निग्धं, तद्वितरीतं यद्भाण्डकं तन्दुलभाजनाधारभूतं तत्, तथा पवनस्य-वायो? सम्भवासम्भवीविद्यमानताऽविद्यमानते तावादिर्येषां तैः, आदिशब्दात्परिपूर्णापरिपूर्ण सामग्रीग्रहः, प्रथमे बादेशे-कालो नियमे साध्ये रूक्षेतर. भाण्डकं, द्वितीये तु पवनसम्भवासम्भवौ, तृतीये तु परिपूर्णापरिपूर्ण सामग्रीकारणतया योज्या, तत्र रूक्षे भाण्डके लग्ना उत्रेटाः स्तोकेन Jain Education Intemandia For Private & Personel Use Only Page #332 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | परि०९ वीराचार्यकृतटीकाया आद्यभागः। क्षमा इतरस्मिस्तु प्रमूतेन कालेन विनस्यन्ति, एवं पवनस्य सम्भवे स्तोकेनेत्यादि भावनीयमिति, त्रयोऽप्यादेशा अनादेशत्वेन परिहार्या रलीया-IV इति गाथार्थः ॥ २०॥ तन्दुलधावनस्य मिश्रतायामभिप्रेतादेशं प्रसङ्गतस्तस्यैवाचित्ततायां स्वरूपं चाहवर्युपेता जाव न बहुप्पसन्नं०॥ २१ ॥ व्याख्या-यावदिति पूर्ववत् , न-नैव बहुप्रसन्नमतिस्वच्छीभूतं, तावदिति पूर्ववत् , मिश्र श्री. पूर्वोकं, तन्दुलोदकमिति प्रक्रमः, भवतीत्यत्रापि योगः, एषोऽयं अत्र धावनविचारे आदेशो-मतं भवति-जायते, प्रमाणमङ्गीकर्तव्यः, पिण्ड अथ बहुप्रसन्नस्य तस्य का वात्यत आह-अचित्तं पूर्वोक्तं, बहुप्रसन्नं स्वतिस्वच्छीभूतं धावनं पुनः ज्ञातव्यं-बोद्धव्यं, एतच्चाचेतनं नियुक्तिः। वक्ष्यमाणे अचेतनाधिकारे दृश्यमिति गाथार्थः ॥ २२ ।। उक्तो मिश्रोऽप्कायोऽथ तमेवाचित्तमाह सीउण्हखारखित्ते० ॥ २२ ॥ व्याख्या-अस्याः पृथ्वीकायाधिकारोक्तेवाप्कायामिलापेन व्याख्या, किस्वयं द्रव्यतः क्षेत्रतः ॥१४६॥ कालतो भावतश्च परिणतः स्यात् , तत्र तिलादिद्रव्यव्यास्या द्रव्यतः, क्षारक्षेत्रसक्तकूपादेः सक्तो मधुरक्षेत्रसक्तकूपादेः सक्तस्य मीलनेन क्षेत्रतः, स्वायुःक्षयेण कालतः परिणतः, स्वं च नातिशयज्ञानीति न सम्यग् जानात्यादेशेन तु जानाति, यदुत दधितैलादिसक्तेषु घटादिषु क्षिप्तस्य शुद्धजलादेरुपरि दध्यादियवसक्तुतरिका जायते, सा यदि स्थूग तदैकया यदि मध्यमभावा तदा द्वाभ्यां, यदाऽतितन्वी तदा तिसृभिः पौरुषीभिस्तत्परिणमतिः, एवमेव तच्छुद्धजलादिकमपि तेषां मध्ये क्षिप्तमतिस्निग्धादिविभागेनैकया द्वाभ्यां तिसृभिश्च पौरुषीभिः क्रमशः परिणमति, भावपरिणतस्त्वस्या एव गाथायाः पृथ्वीकायाधिकारोक्ताऽनुसारतो ज्ञेया, तथा स्वकायशस्त्रं परकायशस्त्रं च स्यात् , तत्र क्षारादिरप्कायो मधुरादेः स्वकायशवं, पृथ्वीकायादिस्तु सर्वस्यापि तस्य परकायशस्त्रमिति गाथार्थः ॥ २२ ॥ अनन्तरोक्तगाथायाः पर्यन्ते प्रयोजनं तेनेदं भवतीत्युक्तमथ तदेव प्रयोजनमाह ॥१४६॥ Jain Education Internationa For Private & Personel Use Only Page #333 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परि०९ वीराचार्यकृतटीकाया आधभागः। परिसेयपियणहत्थाइ० ॥२३॥ व्याख्या-परिषेकपानहस्तादिधावनमिति, तत्र परिषेको-दुष्टव्रणादेरुत्थितस्योपरि परिषेचनं, पानं-तृडपानादयोऽम्यवहारो, हस्तादिधावनं-करचरणप्रक्षालनं, तथा चीवरधावनं-उपधिप्रक्षालनमित्यर्थः, चैवेति समुच्चये, तथा आचमनं-शौचं, भाजनधावनं-पात्रकप्रक्षालनं तान् २, एवमाइत्ति एवमनन्तरोक्तपरिषेकादिप्रकारं वस्तु आदि-प्रभृतिर्यस्य तदेवमादि, आदिशब्दादाताद्यभिभूतत्वेन तैलाभ्यङ्गितस्य साधोः प्रोञ्छनार्थ काञ्जिकादिग्रहणग्रहः प्रयोजनं उपयोग इति भावः, अचित्ताप्कायेन क्रियत इति प्रक्रमः, (प० ७) बहुधा अनेकधा इति गाथार्थः ॥ २३ ॥ अनन्तरगाथोक्तश्चीवरधावनावयवो विशेषतो व्याख्यायते, तत्र च चीवरधावनमृतुबद्धे काले साधुभिर्न कर्तव्यं, कारणे दोषानाह उउबद्ध धुवण चाउस० ॥ २४ ॥ व्याख्या-उउबद्ध धुवणत्ति विभक्तिलोपाद् ऋतुबद्धे धावने शीतोष्णकाले प्रक्षालने सति को दोष ! इत्याह बाउसत्ति विभक्तिलोपाद बाकुशं-शरीरभूषादिकं, स्यादिति सर्वत्र शेषः, ततः सकाशादोषद्वयमाह ब्रह्मविनाशो-मैथुनविरतिभङ्गो, भूषावान् चिन्तयति किमनया मूषया! यदि योषितो न भुज्यन्ते, स एव वा मनोज्ञतया स्त्रीभिः प्रार्थ्यते, ततस्ताः सेवते, तथा अस्थानस्थापनं-अयोग्यतायां प्रतिष्ठा, नूनमयं कामी, तेनात्मानं भूषयतीत्ययोग्योऽयं धर्मस्येति जनो जल्पतीति भावः, चकारः समुच्चये, तथा सम्पातिमानां-प्रक्षालनजलादिषु पतनेन मक्षिकादीनां वायोश्च-काष्टपाच्यादिषु वस्त्राणामास्फालनेनोत्थितवातस्य वधो-विनाशः, तथा प्लावनेन-वस्त्रधावनजलैः परिक्षिप्यमानैः पृथिव्या रेल्लणेन भूतोपघातः-तदाश्रितकीटिकादिविनाशः, चकारात्साघोः कलाविकाकंडकप्रज्ञो इति ग्रह इति गाथार्थः ॥ २४ ॥ आह-ननु यद्येवं तर्हि न धावितव्यान्येव तानीति ! उच्यते, वर्षाकाले धावितव्यान्येव न धान्यन्ते तोते दोषा स्युस्तथा चाह Jain Education Inter For Private & Personel Use Only Pww.jainelibrary.org Page #334 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयान बूर्युपेता श्री पिण्डनिर्युक्तिः । ॥ १४७॥ Jain Education Inter अभार चुडण पणए० || २५ || व्याख्या - अतिभारो - महागुरुत्वं, चुडनं - जीर्णता शाट इत्यर्थः, पनक उल्ली, अइभारचुडनपनकः, स्यादिति सर्वत्र शेषः, अत्र वस्त्रशब्दः प्रकान्तः, स चार्थवशात्कापि पदे कयापि विभक्त्या दत्तया योज्य, यथा अतिभारथुडनं च वस्त्राणां स्यात्, अधाविततया हि वस्त्राणि समलानि स्युः, स च मलो वर्षाजलशैत्येनाहतोऽतिभारवान् स्यात्, तद्युक्तानि वाण्यप्यतिभारवन्ति स्युरित्यादि, तथा शीतलानां समलत्वेन श्येत्ययुतवस्त्राणां प्रावरणेन शरीराच्छादनेनाजीर्णे - आहारापरिणती ग्लानत्वं - शरीरमाद्यं तस्मिन्सति उहावणचि अपभ्राजना, मूर्खा एते, य अधावितवस्त्रप्रावरणेनाजीर्णत्वेन ग्लानत्वं स्यादित्यपि न जानन्तीत्यादिको जनापवादः स्यात्, तथा कायवधो-मलिनानि तानि प्रावृत्त्य बहिर्गतस्य साधोर्मेघवृष्टौ तत् क्षारेण यथासम्भवं षट्जीवनिकायविराधना स्यात्, समुच्चयार्थश्वकारोऽत्र लुप्तो दृश्यः, वर्षासु वर्षाकाले, अधावने वस्त्राणामप्रक्षालने, दोषा-अनन्तरोक्तदूषणानि स्युरिति शेष इति गाथार्थः ॥ २५ ॥ कदा कियत्प्रमाणं चोपधिं धावतीत्येतमाह अप्पत्तेच्चिय वासे० ।। २६ ।। व्याख्या - अप्पत्तेच्चियति अप्राप्त एव - अनायात एव वर्षे वर्षाकाले आषाढान्त इत्यर्थः, अनेन " उउबद्धे " त्यादि गाथायां ( गा० २४ ) यच्छीतोष्णकालग्रहणं कृतं तत् किञ्चिन्नूनं ज्ञेयं, सर्व- समस्तं उपधि-उपकरणं घावन्ति साधवः प्रक्षालयन्ति यतनया शक्तयाऽसंयमपरिहारेण, असति त्वभावे, पुनः शब्दो विशेषणे, द्रव्यस्य जलस्य, 'जहन्नओ'चि तुशब्दस्य व्यत्यययोगाज्जघन्यस्त्वपवादे, नाप्यास्तां यदुत्सर्गेण सर्वोऽप्युपधिः घावनीय इत्यपिशब्दार्थः, पात्रनिर्योगः - पात्र कबन्धादिकः, assपरिकरो धावनीय इति प्रक्रमः, इति गाथार्थः ।। २६ ।। आह-किं सर्वेषां वस्त्राण्येकामेव वारां प्रक्षाल्यन्ते किं वास्ति केषाश्चिद्विशेषो !, अस्तीति ब्रूमः केषामित्यत आह परि० ९ वीराचार्य कृतटीका या आद्यभागः । ॥ १४७॥ Page #335 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education I आयरियगिलाणाण० ॥ २७ ॥ व्याख्या -- आचार्याः - सूरयः, उपलक्षणत्वादुपाध्यायप्रमुखग्रहः, ग्लानाः - मन्दास्तेषां तुर्विशेषणे, महला महलचि लिङ्गव्यत्ययान्मलिनानि २ सन्ति वस्त्राणीति व्यक्तं पुनरपि भूयोऽपि न केवलं लोकावर्णा जीर्णलक्षणं पुष्टालम्बनं विना तेषामप्येषामेव [ वारामपोढान्ते ( १ ) ] धावन्तीत्यपि शब्दार्थः, धावन्ति वैयावृत्त्यकरादयः प्रक्षालयन्ति, कारणमाह-माशब्दो निषेघे, भवत्वितिशेषः, हुर्वाक्यालङ्कारे, गुरूणां - आचार्यादीनामवर्णोऽघावने मलिनवस्त्रतया ' अहो अन्यसाधुतुल्या एवैते ' इत्यादि लोकभाषणरूपा अश्लाघा, लोके - पृथग्जने, वेषपरिवारादिसाध्यो हि पृथग्जनः स्यात्, तथा अजीर्ण-वस्त्राणां मलिनत्वेन शैस्याधिक्याद् मुक्तभक्तापरिणतिः, इतरस्मिन् ग्लाने, जातिनिर्देशादेकत्वमिति गाथार्थः ॥ २७ ॥ एवं घावनमाश्रित्योपधेः प्रमाणमुक्तम्, अथ तस्यैव मध्याद्ये उपधिविशेषा न विश्राम्यन्ते तन्नामकथनपूर्वकं घावनविधिमाह पायस्स पडोयारं० || २८ ॥ व्याख्या - पात्रस्य प्रत्यवतारः, तथा दुन्निसिअंति विभक्तिलोपाद् द्वे निषद्ये, तथा त्रिपट्ट - पोतिर जोहरणं, समुच्चयार्थस्तुशब्दोऽत्र योज्यः, एतान् न, 'तु' शब्दो व्याख्यात एव विश्रमयेत् तत्स्थषट्पदिकानां तु यतनया सङ्क्रमणा कार्येति शेषः, ततश्च घावनं प्रक्रान्तानाम् - विश्रामणीयानां कार्यमिति शेषः, इति गाथासमासार्थः ॥ २८ ॥ एनामेव गाथां गाथात्रयेण व्याख्यानयन्नाह - पायस्स पडोयारो० ॥ भा० ८ || संथारुत्तरचोलग० ॥ भा० ९ ॥ एए उन वीसामे० ॥ भा० १० ॥ व्याख्या - पात्रस्यभाजनस्य प्रत्यवतारः - परिकरः, पत्तगजोयति पात्रकवर्जक एव-पतद्रहरहित एव पात्रनियोगः, पात्रकबन्धादिकं षड्विधं भाजनोपकरणं, तथा द्वे-द्विषे निषद्ये, पुना रजोहरणः - उपकरण विशेषरूपः पुनः ज्ञेय इति शेषः, अभितरति अभितरा - मध्यवर्तिनी, तथा परि० ९ वीराचार्य कृतटीकाया आद्यभागः । Page #336 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयावचूयुपेता Nai परि०९ वीराचार्य श्री पिण्डनियुक्तिः। ॥१४८॥ बाया-बहिर्वर्तिनी, चैवेति समुच्चये, इह सम्पति या दसिकादिभिः सह दण्डिका क्रियन्ते सा गमविधिना केवलैव स्यात्तस्या निषद्यात्रयं स्यात्तन्मीलितं रजोहरणं भण्यते, तत्रैका दण्डिका यास्तिर्यग्वेष्टकत्रयपृथुत्वैकहस्तदीोर्णमयादिकंचलीखण्डरूपा स्यात्तस्याश्चाने दशिकाः स्युः, तां च सदशिकामये रजोहरणशब्देन भणिष्यतीत्यसौ नात्र ग्राह्या, द्वितीया त्वेनामेव तिर्यग्बहिर्वेष्टकैराच्छादयन्त्येक कृतटीकाहस्तविस्तरादि किश्चिदधिकैकहस्तदीया वस्त्रमयी स्यात् , साऽत्राऽभ्यन्तरेति प्राडा, तृतीया त्वेतस्या एवं बहिस्तिर्यग्वेष्टकान् कुर्वती या आधाचतुरनुलाधिकैकहस्तमानो चतुरस्रा कंवलमयी स्यात् , सा चाधुनोपवेशनोपकारित्वात्पादप्रोन्छनकमितिरूढा, दण्डिका तूपकरणसङ्ख्यायां त्यभागौ। न गण्यते, रजोहरणस्योपष्टम्भिका मात्रत्वेन विवक्षितत्वादिति, तथा संतारुतरचोलगत्ति विभक्तिलोपासंस्तारोतरचोलकाः, पट्टा इति पट्टशब्दवाच्याः, संस्तारपट्ट उत्तरपट्टश्चोलपट्टश्चेति तत्त्वं ए० (प०८) अन्त्यभागः (५०१०५)॥ ६२५ ॥ पूर्वोदिष्टां भजनां भङ्गाष्टकेनाह संसटेयर हत्थो० ॥ २६ ॥ व्याख्या०-संसद्वेयरत्ति विभक्तिलोपासंस्पृष्टोऽल्पलेपेन स्वयोगेन खरंटित इतरस्वसंस्पृष्टस्तेनाखरंटितस्ततः कर्मधारयः स्यादिति सर्वत्र शेषः, हस्तो दाव्याः कर इत्येकं पदम् , तथा मत्तोवित्ति लिंगव्यत्ययान्मात्रकमपि-करोटिकादिकमपि लिंगव्यत्ययेन तदपि संस्पृष्टेतरः स्यादित्यनुकर्षणार्थ इति द्वितीय, च पुनरों भिन्नक्रमश्च, दवत्ति विभक्तिलोपात् पुनः शब्द-योजनाच्च द्रव्यं-वस्तु, पुनः सावशेषेतरदिति तत्र यस्य साधवे देवदत्तस्य मध्यात् किंचित्स्थास्यादाबुद्धरति तदाद्य, यन्मध्यातदुद्धरति तद्वितीयमिति तृतीयं, एतेषु पदेषु अष्टो-अष्टसंख्या भंगा-मेदाः स्युरिति, शेषास्त्वमी-संस्पृष्टो हस्तः संस्पृष्टं मात्रं Antan Jan Education Intema For Private Personel Use Only Page #337 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सावशेषं द्रव्यं १, संस्पृष्टो हस्तः संस्पृष्टं मात्रं निरवशेषं द्रव्यं २, संस्पृष्टो हस्तोऽसंस्पृष्टं मात्रं सावशेषं द्रव्यं ३, संस्पृष्टो हस्तोऽसंस्पृष्टं परि०९ मात्र निरवशेष द्रव्यं ४, असंस्पृष्टो हस्तः संस्पृष्टं मात्रं सावशेषं द्रव्यं ५, असंस्पृष्टो हस्तः संस्पृष्टं मात्रं निरवशेष द्रव्यं ६, असंस्पृष्टोवीराचार्यहस्तोऽसंस्पृष्टं मात्रं सावशेषं द्रव्यं ७, असंस्पृष्टो हस्तोऽसंस्पृष्टं मात्रं निरवशेषं द्रव्यं ८, तत्र वा नियमान्निश्चयेन ग्रहणं-आदानं भक्त- कृतटीकास्य साधुना कार्यमिति प्रक्रमः, तु ओएसुत्ति पदव्यत्ययादविषमेष्वेव प्रथमतृतीयादिषु न समेषु द्वितीय चतुर्थादिष्विति भजना, इह या अन्त्यहस्तो मात्रं वा द्वे वा स्वयोगेन संस्पृष्टा वा सन्ति, साध्वयं संस्पृष्टानि भवन्तु, न तद्वशेन यत्र द्रव्यं सावशेषं तत्रैतानि साध्वर्थं खरंटि भागः। तान्यपि दात्री न धावति, किं तर्हि ! तत्र द्रव्ये व्यापारयतीति साधोः पश्चात्कर्म स्याद्यत्र तु द्रव्यं निरवशेषं तत्रैतानि तद्रव्याधारस्थाली च साधुदानानन्तरं सा धावतीति, तत्स्यादेवेति भजना एव, बहुलेपेष्वपीयं घटते, परं ग्रंथकता नोक्तेति गाथार्थः ।। ६६१ ॥ उक्तं लिप्तद्वारमथ छर्दितद्वारमाह ॥ सच्चित्ते अच्चित्ते ॥६२७॥ व्याख्या-इह यतो मध्यादुत्स्यते तत्साध्यं वस्तु सच्चित्ते, तथा अञ्चित्ते, तथा मीसगत्ति विभक्ति| लोपात् मिश्रके, त्रितयमपि प्रतीतं, तथेति समुच्चये, कस्मिन्नेवमित्याह छर्दने-भूम्यादौ पातने, च पुनरर्थो भिन्नक्रमश्च, चउभंगो जातिनिर्देशाच्चतुर्भङ्गत्रयं प्रतीतं, स्यादित्यत्रोत्तरत्र च शेषः, यथा-सचित्तमिश्रपदाभ्यामेकः, सचित्ताचित्तपदाभ्यां द्वितीयः, मिश्राचित्तपदाभ्यां तृतीयस्तत्र सचित्ते सचित्तं मिश्रे सचित्तं सचित्ते मिश्र मिश्रे मित्रं-छर्दितमुत्पाद्य इत्यादि, तत्र चउभंगेत्ति जातिनिर्देशादपि लोपाचतुर्भङ्गत्रयेऽपि स्वयं भावनीय, प्रतिषेधः साधोक्तादिग्रहणनिवारणं, इह यत्र छदं पदं सचित्तं मित्रं वा, तत्र ग्राह्यं सचित्तं मित्रं | वा स्यादित्यादयो दोषारस्युः, किं च ग्रहणे तद्दोषदुष्टाहारादीनां आणाइणोत्ति सूचनादाज्ञाभक्तानवस्थामिथ्यात्वविराधनाः, आज्ञाभङ्गादयः in Education Inteme For Private Personel Use Only Page #338 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयाव सूर्यपेता श्री पिण्डनिर्युतिः । ॥१४९॥ Jain Education Internation पूर्वोक्तानामाधाकर्मादीनां वक्ष्यमाणानां संयोजनादीनां च दोषाणां सेवायां ज्ञेयाः, निर्युक्किकारेण मिश्रदोषेणास्य संयोगादीनामतिदेशे कृतेऽपि चतुर्भङ्गत्रयप्ररूपणासामर्थ्याद् गुरूपदेशवचनाच्च कृतो ज्ञेयो, यथा- भिक्षादानाय प्रवृत्ता यदा आभिक्षामध्याद् भ्रष्टं मूम्यादिस्थमचित्तमृतिकादेरुपरि सचिचलवणादिकं छर्दितमिति प्रथमचतुर्भङ्गस्य प्रथमभङ्गेन पृथ्वीका यमाश्रित्य स्वस्थानत एको मेदो लब्ध इत्यादि, यावच्चत्वारि शतानि द्वात्रिंशदधिकानां भङ्गानां सचित्तपृथ्वी कायछर्दित इत्यादि यावदष्टोत्तरं शतं संयोगानां स्थात्, तथा सचित्तमिश्रे सचित्तमिश्रमचिते सचित्तमिश्रं सचित्तमिश्रे अचित्तं अचितेऽचित्तं छर्दितमित्यादि चतुर्थो-मतांतर चतुर्भगो ज्ञेयः, तत्र च सचित्तमिश्रे पृथ्वी कायादौ सचित्तमिश्रं पृथ्वी कायादिच्छर्दितमित्यादि पूर्वोक्तक चतुर्भङ्गवच्चतुश्चत्वारिंशद् भङ्गशतं षट्त्रिंशत्संयोगाश्च भावनीयाः, इहातिदेशवशतो द्वितीयादि चतुर्भङ्गत्रयस के चतुर्थे भने कल्पतो लब्धाऽपि न प्राह्मा, चउमंगे पडिसेहो इति निषिद्धत्वात्, दोषा उक्ता भणिष्यति चेति गाथार्थः ॥ ६२७ ।। विराधनां विशेषतो विवृण्वनाह उसिणस्स छड्डणे० ।। ६२८ ।। व्याख्या - उष्णस्य - तप्तभक्तस्य छर्दने - मूम्यादावुज्झने ददत् प्रयच्छद्वाशब्दाद्राहको वा साधुर्द्वयं वा दश्खेत- दाहमनुभवति, यद्वा कायानां भूमिस्थस चित्तपृथ्वी का या दीनामुपरिपातेन प्लावनेन वा दाहः प्लावः, वा- विक भवेदिति शेषः, सीयपडणमित्ति युग्मशब्दलोपात् शीतपतने - शीतभक्तादिपरिसाट्, पुनः कायात्पृथ्वी कायादयः विराध्यत इति शेषः, अथ पतितं द्रव्यमाश्रितदोषपरंपरामाह-पतिते छर्दिते मधुबिन्दुदाहरणं, दोषमाश्रित्य माक्षिकलवेनोपलक्षितो द्रष्टांतः स्यादिति शेषः, इह साधोः स्वदाहेनात्म विराधना, पृथिव्यादिदाहेन तु संयमविराधना, दातृदाहेन तु प्रवचनविराधना भावनीया, मधुबिंदूदाहरणमिदम्— जहा वारचपुरं नाम पुरं आसि, तत्थ य अभयसेणो नाम राया, तस्स य सुद्धचिता नामा देवी, ताणं वारचओ नाम अमचो, परि० ९ वीराचार्यक्रतटीका या अन्त्य भागः । ॥१४९॥ ainelibrary.org Page #339 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inter तस्य य वीरा नाम अमची, अण्णया य धम्मघोसो नाम साहु मिरूकं हिंडतो वारतगस्स घरं गओ, तस्स भिक्खादाणट्ठाय गलदपायसथालं गहाय आगया वीरा, एत्थंतरे उ मज्झाओ एगो बिंदू भूमीए पडिओ, छड्डियदोसोति तं मोतुं निगओ साहु, वाररागेण मत्तवारणठिएण तं दिट्ठ, किमणेण एसा भिरका न गहियति जाव चिंतंतो चिट्ठर ताव बिदुमि मच्छियाओ लग्गाओ, ताणं घरकोइलिया . धावि, तीसे सरडो आगओ, तस्स य मज्झारो पहुचो, तरस य पाहुणगणगो पहाविओ, तहस य वत्थवगणओ समुद्धिओ, दोपि सुणगाणं भंडणं जायं, नियगनियगाणं रकगट्ठा दोहं वाणसामिणो समुट्ठिया, तेर्सिपि सपरिवाराणं महाजुज्झं जायं, जावअगाणं सुडाणं मारामारी जाया, तं सवं वारतगेण दिट्ठ, निच्छइयं च जहा नूण एएण मारामारिदोसेण साहूणो भिरूका न गहिया, इचाई भावतो संबुद्धो, तस्सेव सया से पव्वदओ, तओ तंमि भव्त्रे पुन्वभवे सुबसयमणुभूरण विओगादुविओगादुद्देण संभाविओ, तच्छेयणत्थं निचं जिणं थुणेह, जहा " जइतिहु ( प०१०६) यणेक्कमंगल ! जय निरुवममोक्खसोक्ख संजणण ! । जय भवसमुद्दतारय ! जय जय हियनिरयजिणचंद ! ॥ १ ॥ पियविप्पओग अप्पियपयोगकरू काइदुरू कलरू केहिं । नाह । कइयच्छिज्झता किंचि तुमं विन्नविस्सामि || २ || जम्मजरमरणपउरे संसारे इह मए भमंतेण । जिण ! नूण तं न दिट्ठो अह दिट्ठो सेविओ नेव || ३ || तेण जिण ! दुहाइ अणंतसोऽपि य विओोयमाणि । दुरुकाई अणुइवंतो अज्झवि एत्थेव चिट्ठामि || ४ || संपइ तुहि जोएणं अदिट्ठपुवो मए तुमं दिट्ठो । तह तं चैव जिणेसर ! आसेवे समारद्धो || ५ || पहु ! तुह सेवा करणे जा मे साहिज्जकारओ बंधु 1। आसीह पाणपिओ सो दुस्सहसेव पडिधूओ ॥ ६ ॥ ताणं काउं असमत्थयस्स सोयग्गिजलिय हिययस्स । पेच्छं तस्स वि विहिणा हरिओ दीवोध पवणेण ॥ ७ ॥ जिण | तेण पियविओयजल - परि० ९ वीराचार्य - कृतटीका या अन्त्यभागः । Page #340 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धमा. रत्नीयावचूर्युपेता पिण्डनियुक्ति ॥१५०॥ संताविओ विगयसरणो । सोयंतो रोइंतो कंदतो जाव चिट्ठामि ॥ ८॥ ता मे सयलसमाहियकजविणासणपरेहिं अपिएहिं । आजमं परि०९ संजोगो जिण ! जा दुस्सहोज्जुत्ति ॥ ९ ॥ जा तेण दुहेण य दुरूिकओ वि कहमवि गमामि जिण ! कालं । ता कंस्कादुरूकेणं गहियो वीराचार्यसीहेण हरिणो । ॥ १० ॥ एवं परिभवपमुहेहिं दुरूकलक्खे जगडिओ नाह ! । जमवत्थमहं पत्तो त कहिउँ भरसि तं चेव ॥ ११॥ तटीकाता अतुलपालस्स दयालयस्स तुह सेवगोवि जमिमेहिं । दुरूकेहि कयस्थिज्झामि सामि हीही अजुत्तमिणं ! ॥ १२ ॥ हुं नायं [ जिणा II या अन्त्यसमं ] जिणंद तुह सेवगे महं जेण । खंतिपमुहंमि धम्मे तइ भणिए निरुच्छाहो ॥ १३ ॥ ता देहि खंतिखग्ग कोहभदं जेण तेण मा भागः। जिण ! हणिमो । अपहि य मद्दववजं माणगिरिं चूरिमो जेण ॥ १४ ॥ नियडिउरगीनिवारणि अज्झवविझाए कुण जिण ! पसायं । लोहरहदलणमुत्तीगया य दाणेण य पयासी ॥ १५ ॥ तह देहि तांव सत्ती जह तव अरदए नासिमो गई । अस्संजमदलणे सुसंजमंमि जिण ! कुण ममुस्साहं ॥ १६ ॥ सचं असचहणणं सोयं च असोयपिहहणणं होइ । परिगहहणणमकिंचणमबंभहणणं जिण | बंभ ॥ १७ ॥ इय एवंविह दसविहधम्मे सिग्धं अधम्मनासयरे । तुह पयकमलपसाया होउ ममं तिहुयणप्पणया ॥ १८ ॥ जेण पियविओगाइयदुहाइगलघलिऊ ण एयाई । अणुवममुहपरिकलिए सासयसोक्खंमि गच्छामि ॥ १९ ॥ इय भववहरिवीरगणीवायगसंजयमि वह वंदिया, परिहियकरणसमसायर ! सुरनररायपणमिया । इट्टविओगविए मुहदुइतविए णमई तुह नाह ! पविहिया, जिण विन्नित्तिए सजयबंधवदयरय हवउ सहलिया ॥ २० ॥ तओ कालेण सिद्धोत्ति गाथार्थः ॥ ६२९ ॥ इति वीरगणिविरचित्तायां पिंडनियुक्तिवृत्तावेषणाख्यं तृतीयं द्वारं समाप्तमिति.॥ उक्कमेषणाद्वारं, तदुक्तौ तूक्ता ग्रहणैषणेति, अथ संयोजनाद्वारं प्रस्तुतं, तत्रैव गृहीतस्याहारस्य विधिना प्रासः कार्य इति प्रासैषणायां १५०॥ Jain Education in For Private Personel Use Only Iww.jainelibrary.org Page #341 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education In निक्षेपमाह नाम वा दवि० ।। ६२९ ।। व्याख्या - नामं ठवणा दविएति नाम स्थापना द्रव्यः, अनुस्वारलोपः, तथा भावे पूर्वोक्ते, चः समुच्चये, तथा कल्पितुं अर्थो लुप्तो द्रश्यः, प्रासो-भोजनं, तद्विषयैषणं शुद्धाशुद्धपर्यालोचनं, सा मुणितव्या - ज्ञातव्या, तत्र नामस्थापने पूर्ववत् द्रव्ये - द्रव्यैषणायां मत्स्योदाहरणं-सफरिदृष्टांतः, भावे त्वध्यवसाये, पुनः भवन्ति - जायते पंचविधा संयोजनायेति गाथार्थः ॥ ६२९ ।। द्रव्यप्रासैसणाऽऽहारणस्य संबन्धमाइ चरियं च कप्पियं वा० || ६३० || व्याख्या - चरितं वृत्तं, चः समुच्चये, तथा कल्पितं स्वमतिचरितं वा समुच्चये आहरणद्रष्टांतः, द्विविधमेवैवं ज्ञातव्यं, वा द्रव्यं, अर्थस्य-अभिलषितप्रयोजनस्य, साधनार्थं - निष्पादनायेन्धनमिव-दायं काष्ठादीवोपलक्षणत्वात् स्थास्यादिग्रहः, ओदनार्थ - कूरादिनिमित्तमिति गाथार्थः ॥ ६३० ॥ तत्र प्रत्यासत्या कल्पितोदाहरणं रूपकत्रयेणाह - अह संमि पी० ।। ६३१ || तिलागहुम्मुको० ॥ ६३२ ॥ एयारिसं ममं ससं० ॥ ६३३ ॥ व्याख्या - अस्थि अहिट्ठि नाम गामो, तस्थ य संखो नाम मच्छिओ, तस्स य लंबोयरनाम महिला, सो य मच्छगहणत्थं गलं गहाय तलाए गओ, अग्गभाए सदा तेण सो तत्थ पखित्तो, तत्थ य एगो मच्छो वसई, सो य मंसगंघेण तत्थागओ, नायं जहा अम्ह गहणत्थं केणइ मच्छिएण समंसो गलो पख्कित्तो, तो गलस्स चाउद्दिसिं सणियं सणियं भमिओ सबमंसं खाइओ, मच्छियस्स वाहणत्थं पुच्छेण गलोविओ, तओ विद्धो मच्छोत्ति चिंतिय छडत्ति गलो मच्छिएण कडिओ, दिट्ठो य मंसमच्छर हिओ, तो विलख्कीभूओ, एवं तिन्नि वाराउ, तओ अईव विलरूकी भूओ - अहो ! केणइ घुत्तमच्छेण मे गलग्गमंसं खद्धं अहं च वाहिओ, तो कहई सो गहियवोत्ति, जाव थिरदिट्ठीसरीरो २६ परि० ९ वीराचार्य क्रतटीका या अन्त्य - भागः । Page #342 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीया वचूर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः । ॥ १५१ ॥ Jain Education Inter चितो चिट्ठता मच्छेण भणिओ-भो भो मच्छिप ! किमेवं झायसि, हुं नायं मम गहणत्थं उवाए चिंतेसि, एत्थ सुणेहि मे वयणं, जहा निल्लज्जोसि तुमं, अहं तिन्नि वाराउ बलागाए पत्तो, गिलाणत्थं चंचूए गहाय उट्ठ उच्छलिओ, तो नियविन्नाणेण तिरिच्छो पडिओ, तीसे मुहे न माइ, अओ पब्मट्ठो नट्टो य, तहा- तिन्निवाराउ वेलाए भट्टो पक्खितो झडति वेलाए चैव सह नियतिऊण ठाणं पत्तो, वहा एकवीसवारा मच्छिएण तत्थ जालं पक्खितं, अहंपि मझे पडिओ, ताव सो न अज्ज विप्पइ ताव झडन्ति हेट्ठे कद्दमे पविट्ठो, तं उवरिट्ठियं ते संकोणयं तत्थ छदेहिं, तहा एगवारं मच्छिएण दहाउ जलं सोसिऊण बहुर्हि मच्छेहिं सह अहं गहिओ, सो य तिक्खे सूले सबै ते पोइउं लग्गो, मए सयमेव दंतेहि सूलो गहिओ, पोइओचि नाउं तेण नाहं विद्धो, सो य कदमधोवणत्थं तलाए छूढो तओहं तत्थेव जले पविट्ठो, तं एयारिस तं मंस मच्छिय विहियगलायबंधणाभिभव कारगं, जं गलेण घेत्तुं इच्छसुति, सूत्रं सुगमं, नवरं वलयामुहेति वेलिकामुख इति वेलाये ममं तिमं षट्टिय घट्टणंति-वठ्यते स्म मत्स्यादिना चाल्यते स्मेति घट्टितं गलादि तस्य घट्टनो - अभिभवक इत्यर्थः रूपकत्र्यार्थः ॥ ६३१- ६३३ ॥ भावप्रासैषणायां रागद्वेषपरिहारो मुख्यो, अतः साधुर्भिक्षाटनेन द्विचत्वारिंशदोषशुद्धां भिक्षामादायोपाश्रये भोजनार्थं उपस्थितः संस्तारवांश्चेत्यात्मनाऽऽत्मानमनुशासितुमाह बायाली से सण संकडंमि० ॥ ६३४ ॥ व्याख्या - द्विचत्वारिंशत्संख्यां आधा कर्मादिदोषाणामेषणापरिहारार्थमन्वेषणं तया विषम (१) तस्मिन्प्रहणे - भक्तायादाने जीव ! हे अन्तरात्मन् ! न-नैव महुरन्नकृते छलितस्त्वं वंचितः दाभ्येति शेषः, ततश्व इदानीं -संप्रति येन प्रकारेण न-नैव छल्यसे-वंच्यसे, भुंजान इमां भिक्षामभ्यवहरन् रागद्वेषाभ्यामभि ( प० १०७ )ष्वंगाप्रीतिभ्यां तथाकर्त्तव्यमिति च शेष इति गाथार्थः ।। ६३४ ॥ तामेव मेदत आह परि० ९ वीराचार्य कृतटीका या अन्त्य - मागः । ॥ १५१ ॥ Page #343 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education घासेसणा उभावे० ।। ६३५ || व्याख्या - प्रासैषणा पूर्वोका, उ भावेति पदध्यत्ययाद्भावे त्वध्यवसाये पुनः भवति जायते प्रशस्ताऽऽद्या, तथैवेति समुच्चये, तथा अप्रशस्ता तद्विपरिता, तत्र प्रशस्तेतरमाह - अप्रशस्ता पूर्वोक्ता पंचविधा - संयोजनाप्रमाणाङ्गारधूमकारणरूपा, तद्विपरीता - अप्रशस्ताया विपक्षभूता प्रशस्याख्याः, पुनरिति गाथार्थः || ६३५ || संयोजनाया निक्षेपमाह दवे भावे संयोजणा उ० || ६३६ ॥ व्याख्या - द्रव्ये द्रव्यविषया, तथा भावे - भावविषया समुच्चयार्थस्तुशब्दोऽत्र योज्यः, संयोजना-कूरादे रसमुत्पादनाय दध्यादिष्वन्मिश्रणं, स्यादिति सर्वत्रशेषः, तुर्व्याख्यात एव, तत्र द्रव्ये द्रव्यविषया द्विधा - द्विभेदा, बहि अंतोत्ति चः समुच्चयार्थः, तुशब्दः व्यत्यययोगाद्वहिरंतश्च- बाचा अभ्यंतरा च तत्र भिक्षां समुदानां चियत्ति - अवधारणे, तच बा - वेत्याद्यां हिंडमान-पर्यटन्, संजोएति संयोजनं-मीलनमुपचाराचत्कारणमपि संयोजयेत् कूरादीनां लाभे दध्याद्यर्थं पर्यटेद्वा लभ्यमाने भिन्नपात्रेषु स्थापयेत्साधु - तिरिति शेषः, तत्र - तस्मिन्साधो बाह्य बाह्यसंशेति गाथार्थः ॥ ६३६ ॥ एनं स्पष्टयन्नभ्यंतरां तु प्रतिपादयन्नाह - खीरदधिसून कट्टर० ।। ६३७ ॥ व्याख्या - कश्चित्साधुर्भिक्षामटन् क्षीरदधिरूपकट्टरला मे दुग्धस्य - गोरसस्य मुद्रादिदाले स्तीमनोन्मिश्रघृतवटिकानां च प्राप्तौ तथा गुडसपिर्वढकवालुके गौरयोपेतद्रव्यविशेषस्य घोलवटकानां चोपलक्षणत्वान्मंड कादिग्रहलो मे सतीत्यनुवृत्तिः, रसगृध्या संयोजना स्यादिति शेषः, भिक्षार्थं घटता साधुना क्षीरं लब्धं ततो रसवृद्धिनिमित्तं गुडगवेषयतीत्यादि, यद्वाऽधुना मीलितानि भाजनवेलायां यावद्धृतानि सरसानि भविष्यन्तीति भोजनं कुर्वन् मीलयिष्यामीति विचित्य क्षीरादीनि लब्धानि बहिरेव पृथक् पृथग् भाजनेषु गृह्णाति, अतस्त्वभ्यंतरा पुनः त्रिवा-त्रिमेदा स्यादित्यत्रोत्तरत्र च शेषो यथा पात्रे भिक्षाटने वसतौ वा भाजनविषया, तथा लवणति समुच्चयार्थस्तुशब्दयोजनाल्लवणदाने च कवलविषया च तत्र विभाषा - विविधं भणनं स्याद्यथा सुकुमारिकादि येन खंडतामुह परि० ९ वीराचार्यकृत टीका या अन्त्यभागः । Page #344 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धमारत्नीयावर्युपेता परि०९ वीराचार्यकृतटीकाया अन्त्यमागः। पिण्ड नियुक्ति ॥१५२॥ रोचते तद्भिक्षां पर्यटन वसतौ वयोवियण]तस्तेनैव सहैकस्मिन्नेव पात्रे चिरं व्यवस्थापयतीति यदुकां के विद्यादि (1) वसतो तदाऽभ्यंतरा च भिक्षाचर्यायां तदा बायेति व्याख्यायन्ति, तुर्व्याख्यात एवेति गाथार्थः ।। ६३७ ॥ द्रव्यसंयोजनाया दोषान्बिभणिषुः प्रस्तावनामाह___संजोयणाए दोसा०॥६३८॥ व्याख्या-संयोजनायां द्रव्यरूपायां दोषा-वक्ष्यमाणा अपायाः स्युरिति शेषः, यथा यः कश्चित्साधुः संयोजयति-मीलयति भक्तपानं-कूरादिकं दध्यादिना सहेत्यादीत्यर्थः, तुः पूरणे, दवाई रसहेउंति सूचनाद् द्रव्यरसादिहेतुरेवति, तत्र द्रव्याणां मीलनीयकूदध्यादीनां रसो विशेषमिष्टता आदिशब्दात् सुकुमारितादिप्रहः, एतल्लक्षणा, हेतुर्निमित्तं यस्य स एव न तु " पत्तेय पउरलंमे( ६४० )इत्यादिकः, व्याघात:-चारित्रविराधना, तस्य साधोः अयं वक्षमाणः भवति-जायत इति गाथार्थः ॥ द्रव्यसंयोजनासेवायामनन्तरोदिष्टं व्याघात विमणिषुर्भावसंयोजनामाह संजोयणा उ भावो० ॥ ६३९ ॥ व्याख्या-संयोजना पूर्वोक्तार्था, उ मावेत्ति पदव्यत्ययाद् भावे स्वध्यवसाये, पुनः इयं | स्यादिति शेषः, संयोज्य-मीलयित्वा तानि क्षीरादीनि द्रव्याणि-वस्तूनि, ततः संयोजयेद् द्वितीयादित्यर्थः कर्म-ज्ञानावरणादि आत्मनीति शेषः, ततश्च कर्मणा पूर्वोक्तेन भव-संसारं निवर्तयतीति शेषः, भवं ततो सकाशाहुःख-असातां प्रामोतीति शेषः, द्रष्यसंयोजना क्षीरादिद्रव्यविषया, गृद्धिरूपोऽध्यवसायो भावः, संयोजना त्वात्मना सह कर्मादीनां मीलनमिति भावेन संयोजना, भावेन संयोजना भावसंयोजनेति गाथार्थः ॥ ६३९ ॥ द्रव्यसंयोजनायामपवादं गाथाद्वयेनाह पत्तेय पउरलंभे ॥६४०॥ रसहेउं पडिसिद्धो० ॥ ६४१॥ व्याख्या-पत्तेयत्ति एकमेकं साधुसंघाटकं प्रति प्रत्येकमनुस्वारलोपः, प्रचुरलाभे-घृतादेविपुलपाप्तिस्तस्मिंश्च मुक्तसाधुभिरम्यवहतादुद्धरितं शेषं तस्मिन् , चः समुच्चये, शेषः-स्थानन्तरोक्त-1 ॥१५२।। Jain Education Intel For Private & Personel Use Only Page #345 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परि०९ वीराचार्यकृतटीकाया अन्त्यभागः।. विधिनोद्धरितस्य गमनमुपभोगस्तदर्थ-तन्निमित्तं द्रष्टः तीर्थकरादिमिरनुज्ञात इत्यर्थः, संयोगः संयोजना-उद्धरितं हि घृतादि येन केनचिद् सुकुमारिकादिना सह ब्रजति तेनैव भोक्तव्यं, येन परिष्ठापनीयाज्जातं प्रायश्चित्तं तत्स्यात् , खलुरलंकारे, अयेति संयोगविशेषः प्रतिपादनानन्तर्यद्योतकः, क्रमः-परिपाटितः कारणानीत्यर्थः, तस्य संयोगस्य अयं “पत्तेय पउरलंमे" इत्यायुक्तरूपो वक्ष्यमाणश्चायं यथा भवति-जायत-इति वक्ष्यमाणश्चायं यथा रसहेउंति विभक्तिव्यत्ययाद्रसहेतुं, सविशेषशोभनत्वपादाननिमित्तं, प्रतिषिद्धस्तीर्थकरादिभिनिषिद्धः संयोगः प्रतीतः, स एव कल्पन्ते कर्तुमुचितः, ग्लानार्थ-रोगनिमित्तं यथा यस्य कस्यचित्साघोः, वा समुच्चये, अभक्तछंद-आहारे अरुचिः स्यादत्रोत्तरत्र च शेषः, तस्येस्यत्रोत्तरत्र च सामर्थ्यगम्य, तथा मुखाय उपचारात् सुखकारिसंयोजिताहाराय शुभस्य वा संयोगजाताय प्रधानाहारस्योचितयोग्यो राजपुत्रादिः स इत्यत्रापि योगः तस्य तथा अभावितः साधुचितेन संयोगरहिताहारेण भोजनकारणेनाद्यपि सम्यगनुद्यातः, यः शिक्षकादिः तस्य, चः समुच्चये, कल्पत इति सर्वत्रानुवृत्तिः, एतेषां हि सालनकादिनैवाहारोरोचत इति गाथाद्वयार्थः ।। ६४०-६४१ ॥ इति वीरगणिविरचितायां शिष्यहितायां पिण्डनियुक्तिवृत्तौ संयोजनाख्यं चतुर्थ द्वारं समाप्तमिति ॥ २ ॥ उक्तं संयोजनाद्वारमथ प्रमाणद्वारमाह बत्तीसं किर कवला०॥ ६४२ ॥ व्याख्या-द्वात्रिंशत्प्रतीता, किरित्ति किलित्ति मध्यप्रमाणेनैव जघन्यतः स्तोका उत्कृष्टतस्तु बहवोऽपि स्युरिति वाचकः, कवला-प्रासाः आहारो-भाजनं कुक्षिपूरक इति सामीप्योपचारादरभरक एव तृप्तिकारक इत्यर्थः, भणितस्तीर्थकरादिभिरुक्तः, इह द्वारपर्यंत यावद्विशेषभणनं भुक्तैव कस्मिन् दिन इति दृश्य, पुरुषस्य-पुंसः, तथा महिलायाः-स्त्रियः अष्टाविंशति प्रतीताः-भवेति भवेयुः स्युः। कवला-पासाः, नपुंसकस्य चतुर्विशतिस्ते स्युः, परं तस्य प्रायोऽप्रवाजनीयत्वादत्र प्रमाण नोकं, इह य Jan Education India T | Page #346 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्लीयावर्यपेता श्रीपिण्डनियुक्ति। | परि०९ वीराचार्यकुतटीकाया अन्त्यमागः। ॥१५३॥ पाहारितो वृत्ति(दि) ज्ञानादिवृद्धिं च करोति, तस्य (प० १०८ ) द्वात्रिंशो भागः साधोः कवलप्रमाणं, स च तथा भूतो मणसोत्यादिवक्ष्यमाणन्यायेनैव स्यादिति गाथार्थः ।। ६४२ ॥ इतः प्रमाणान्न्यूनस्याहारस्य नामभेदानाह एत्तो किणाइ हीणं०॥ ६४३ ।। व्याख्या-इत एतस्माद् द्वात्रिंशत्कवलप्रमाणाद् एकेनापि केवलेनाप्यास्तां द्वयादिभिरित्यप्यर्थः, कवलेनेति प्रक्रमेण हीन-न्यूनं यावकिमिहाध-घोडशकवलप्रमाणं अौद्ध अष्टकवलप्रमाण, चः समुच्चये, प्रमाणं भोजनं साधोः पर्यत ब्रुबते-जल्पति घीरास्तीर्थकरादयः मात्रा संयमनिर्वाहः, सैव मात्रा-प्रमाणं यस्य संयमनिर्वाहः क्षम इत्यर्थस्तं, चः समुच्चये, तमेव चावभनमाणन्यूनत्वेनावमाख्यं, चः पूर्ववत् , उपलक्षणवाद्यथानुरूपं साध्वीश्चाश्रित्यैतत्सर्वं ज्ञेयमिति गाथार्थः ॥ ६४३ ॥ प्रमाणदोषान् मेदेनाह पगामं च निगाम च० ॥६४४॥ व्याख्या-प्रकाम, चः समुच्चये भिन्नकमश्च, तथा निकामः, चः समुच्चये, यः कश्चित्साधुः तथा प्रणीतं भक्तपानं प्रतीतं, आहारयेदश्नीयात् , तथा अति-बहुकं तथा अतिबहुशः, उकचकारात् अइप्पमाणं इति च, तत्रापि प्रमाणं मक्तपानं, लिंगव्यत्ययादतृप्यमानो वा साधुः, तस्येति शेषः, प्रमाणदोषः-आहारविषयं मानदूषणं मुणितव्यः-ज्ञातव्य इति, मैदषट्कप्रतिपादको गाथार्थः ॥ ६४४ ॥ तत्राऽऽद्यमेदत्र यस्वरूपमाह बत्तीसाइ परेणं० ॥ ६४५ ॥ व्याख्या-द्वाविंशतिः प्रतीतायाः कवलानामिति प्रक्रमः, परेणोर्द्ध त्रयस्त्रिंशदादिकवलैरितितत्त्वं भोजनमिति प्रक्रमः, अप्रेतनपेदे नित्यग्रहणादिहैकस्मिन्नैव दिने ज्ञेयं, तस्तिमित्याह-पगामत्ति अनुस्वारलोपात्पकामो-प्रकामाख्यं, तच्च केवलप्रकामत्वेनैतैरगलत्स्नेहबिन्दुभिर्जेय, यदि तु गलत्स्नेहबिन्दुभिः स्यात्तदा प्रक्रामः प्रणीतश्चाद् द्वौ दोषौ स्याता, एवं शेषदोषश | ॥१५॥ Jain Education in . For Private sPersonal use Only ww.jainelibrary.org Page #347 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education In त्वमपि भावनीयं नित्यं पुनर्निरन्तरं द्व्यादीनि तानि पुनः पुनः शब्दो भण्यमान तुशब्दाज्ज्ञेयः, तदेव प्रमाणभोजनं, तुर्व्याख्यात एव, निकामं - निकामाख्यं, यत्पुनर्यत्किमपि पुनः गलन्नुत्पाद्यमानेभ्यः कवलेभ्यश्चैतत् स्नेहो घृतादिर्यत्र तत् प्रणीतमिति, तं -प्रणीतमित्यनेन शब्देन तद्भोजनं, बुद्धास्तीर्थकरादयः ब्रुवते वदन्तीति गाथार्थः ॥ ६४५ ॥ अति बहु कादित्रि कसे वनदोषानाह अबहु अबहुसो || ६४६ ।। व्याख्या - अतिबहुकमिति बहुकाख्यं तथा अतिबहुशो [ भि ] वा तथातिप्रमाणेन कारणभूतेनातृप्यमानेन वा साधुना यद्भोजनं- अशनादिकं भुक्तं अभ्यवहृतं हादयेद्वा-पुरीषाधिक्यं कारयेत्, यद्वा वामयेच्छर्दिकारयेत्, यद्वा मारयेद् - प्राणत्यागं कारयेत्, वाशब्दाः स्वस्थाने विकल्पार्थाः, तदिति बहुकादिभोजनं, अजीर्यद्- अपरिणमत्, इह स्वरूपप्रतिपादनप्रस्तावेऽपि यद्बहुकादिप्रमाणत्रयस्य पूर्वं दोषा उक्तास्तदस्यात्मविराधनादिजनकत्वेनातिपरिहारता प्रकटिता स्यात्, तत्रात्मविराधना मरणादेः संयमविराधना तु तापनार्थं तेजस्कायादिविराधनायाः प्रवचन विराधना औदरिका एत इत्यादिजनापवादात् उपलक्षणत्वात्प्रकामादित्रयभोजनेऽपि यथाऽनुरूपदोषा भावनीया इति गाथार्थः || ६४६ ॥ अति बहुकादित्रयस्वरूपमाह - बहुयातीयमइबहुयं० ।। ६४७ ॥ व्याख्या - बहुयातीय इति साध्यद्वितीयैकवचनलोपाद् एकस्मिन् दिने बहुकं न्यूनोद - तारहितत्वेन परिपूर्ण अतीतं - अतिक्रांतं स्वप्रमाणाधिकमित्यर्थः यदशनादिकमिति भुक्त इति च सर्वत्र योगः, तत्किमित्याह अतिबहुकमिति बहुकाख्यं स्यादिति सर्वत्रशेषः, तथा अतिबहुशोति बहुशोऽभिधानं स्यात्, तिस्रः - त्रिवारा इति सामर्थ्यगम्यं, भुंक्ते यदशनादिकं तिण्हंत्ति तिसृभ्यः पुनः परेणोपरतश्चतसृवारादित्यर्थः, तं चिपत्ति तदेवाशनादिकं यद्भक्तः, तत्किमित्याह- अप्पमाति प्रमाणमिति प्रमाणाख्यमस्याप्यमेतन वाशब्दसूचितं संस्कारांतरमाहन्तः - अइप्पमाणमद्धप्रमाणाख्यं स्यात्, भुंक्ते - अभ्यवहरति, परि० ९ वीराचार्य कुतटीका या अन्स्यभागः । Page #348 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धमारत्नीया. वचूर्युपेता परि०९ वीराचार्यकुतटीकाया अन्त्यभागः। भी पिण्डनियुक्तिः। १५४॥ यदशनादिकं चेति व्याख्यात एवेति, अतृप्यमानो-अतिलोस्योऽतृप्ति मन्यमानसाधुरिति गाथार्थः ।। ६४७॥ एवं प्रमाणातिरिक्तस्याहारस्य भोजने साधो दोषा उक्ताः, अथ तस्यैव प्रमाणादियुक्तस्य भोजने गुणानाह हियाहारा मियाहारा० ॥ ६४८ ॥ व्याख्या-हिताहाराः-शरीरोपकारिभोजिना, तथा मिताहारा-द्वात्रिंशकवलमोजिनः, अल्पाहाराः-द्वात्रिंशत्कवलेभ्यः स्तोकतरभोजिनः, चः समुच्चये, ये केचन नरा-मनुष्याः स्युरिति शेषः, न-नैव तान्हिताहारादिभोजिनः वैद्याः-चिकित्सकाः चिकित्सन्ते-प्रतिजापति, यतः अप्पाणंति आत्मनः स्वस्य षष्ठ्यर्थे द्वितीया, आत्मनेति शेषः, ते-हिता| हारादिभोजिनश्चिकित्सका वैद्याः, (अ)हिताचाहारनिषेधनादेव वर्तत इति शेषः इति श्लोकार्थः ॥ ६४८ ॥ अनंतरश्लोके हिताहार | उक्तः, स चाहितपरिहारपूर्वकः स्यादित्यहितहिताहारौ वाच्यौ, तौ च केवलौ संयोगतश्च स्यातां, तत्र संयोगस्तावदाह दहितिल्लसमाओगा०॥ ६४९ ॥ व्याख्या-दधितैलायोः प्रतीतयोः समायोगो-मलिनं सः अहितः-कुष्टविषविकारादिकारी, श्रूयते च समप्रमाणायास्तैलघृतयोमिलितायाः कियता कालेन विषपरिणतिर्भवतीति सर्वत्रयोगः, तथा क्षीरदधिकांजिकानां प्रतीताना| मन्योन्यं च समायोगो, अहित इत्यनुवर्तनाथ, उपलक्षणत्वात् क्षीरशाकसमायोगादिग्रहः, तथा पथ्यं प्लुतघृतगुडाद्यतिरुक्षद्रव्यमीलन पुनः रोगहरं-व्याधिनाशकं भवति, एनमेवार्थ व्यतिरेकेण समर्थयन्नाह न-नैव, चः पूरणे हेतु:-कारणं भवति-जायते, रोगस्य व्याघेरिति गाथार्थः ।। ६४९ ॥ " बत्तीस किरिकवला — गा. ६४२)" इत्यादिना कवलस्याहारस्य पुरुषाद्याश्रित्य प्रमाणादिकमुक्तमथ तस्यैव सपानस्योदरमाश्रित्य प्रमाणादिकमुक्तं, विभागेन प्रमाणमाह अद्धमसणस्स सवंजणस्स० ॥ ६५० ।। व्याख्या-इह सर्वमेवोदरविवरं षड्भिर्भागैर्निरूप्यते, तत्र द्वे भागौ त्रयं अशनस्य ॥१५४॥ For Private Personal Use Only Jain Education in Page #349 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Interna कूरादेः सव्यंजनस्य तक्रादियुक्तस्य कुर्याद् - विदध्यात्, तस्य द्रव्यस्य कांजिकादेः, द्वौ - द्विसंख्या भागावशौ कुर्यात्, तथा वायुप्रविचरणार्थवायोरितश्चेतश्च संचरणाय छन्भागं शेषं षष्टांशं न्यूनं हीनं कुर्याद् - विदध्यात् साधुः, अन्यथा हि वातः पीडां कुर्यादिति, चलतः पञ्चैव भागाः सदाऽपायो न इति गाथार्थः ॥ ६५० ॥ इदं चाहारमानं कालापेक्षया ( प० १०९) स्यात् स च त्रिधा, तथा चाहसीओ उसिणो साहारणो० ॥ ६५१ ॥ व्याख्या - शीतः - शीतलो उष्णो-धर्म्मवान् साधारणो - मध्यमः, क्रमशो वर्षाकाल उष्णकालः शीतकालय, चः समुच्चये, कालो त्रिधा - त्रिविधः मुणितव्यो - ज्ञातव्यः, व्यवहारेणेदमुक्त, येन वर्षाकालेऽपि श्रावणे स्तोकं भाद्रपदे तु बहुतरं शीतं स्यादित्याद्येवमुष्णसाधारणयोरपि भावनीयं, तथा वर्षाकालेऽपि यदा कादंबिनी नक्षत्रं लगति तदोष्णः, उष्णकालेsपि यदा कादंबिनी वहति तदा शीतलकालः स्यादिति, निश्वयतस्तु वर्षाकालादीनां त्रयाणां मध्ये यत्र समये शीतमधिकं स शीतः, यत्र उष्णं स उष्णः, यत्र द्वयोरपि साम्यं साधारणः कालः स्यात्, किंवा इत्याह- साधारण अनंतरोके काले पूर्वोक्ते, तत्र तेषां शीतादीनां त्रयाणां मध्यात्, आहारे भक्तपानविषया इयं “ अद्धमसणस्से "त्यादि गाथो ( गा० ६५० ) का मात्रा - प्रमाणं स्यादिति शेषः, न त्वनन्तरं वक्ष्यमाणगाथायां त्रिविधस्यापि कालस्य विषयं भागैर्भक्त पानमानं ग्रंथकार एवं भणिष्यतीति, तेनैव स्थानपतितेन साधारणकालस्य विषयित ज्ञास्यते, किमत्र पृथक्तदुक्तमिति !, उच्यन्ते, सुखकारित्वेन तस्य प्राधान्यख्यापनार्थमिति गाथार्थ: ।। ६५१ ॥ त्रिविधमपि कालमाश्रित्य भागैर्भक्त पानैर्मात्रामाद सीए दवस्त एगो० ॥ ६५२ ॥ व्याख्या - इह भागवर्ति [ निकाय]शीतः साधारण उष्णश्चेति कालन्यासः कार्यः, तत्र भक्तपानयोयोरपि पञ्चैव भागाः कार्याः, तत्र शीते पूर्वोक्ते, द्रवस्य कांजिकादेः एकः - एकको मागः स्यादितिशेषः, मक्के चत्वारः - चतुः संख्या परि० ९ वीराचार्य कृतटीका या अन्त्यभागः । Page #350 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयावर्युपेता श्रीपिण्डनियुतिः। परि०९ वीराचार्यकृतटीकाया अन्त्यभागः। भाग इति पंच स्युः, सांधोभॊजनप्रमाणमिति सर्वत्र प्रक्रमः, साधारणो हि द्विधा-शीताऽपेक्षयोष्णपेक्षया च, तत्र यत्र न बहुशीतं स शीताsपेक्षया मार्गशीर्षपोषौ, यत्र तुष्णता च बही स उष्णाऽपेक्षया माधफाल्गुनो, तत्र शीताऽपेक्षतायां तमाह-अथवेति प्रकारान्तरद्योतकः, द्वौ-द्विसंख्यौ भागौ, पाने पूर्वोक्त पानस्येत्यर्थः, से इत्यत्रोत्तरत्र च यथा संभवं शेषः, सेसा उ भत्तस्स इत्यत्रोत्तर च योगादुद्धरितास्त्रयो भागाः, पुनर्भक्तस्येति पंच, तथोष्णे पूर्वोक्ते द्रवस्य जलस्य, तत्र त्रिसंख्या भागाः स्युभवस्य पुनर्बी भागौ स्त इति पंच, उष्णाऽपेक्षया साधारणमाह-दौ-द्विसंख्यौ स्तः, चेति प्रकारान्तरद्योतकः, द्रवस्येति प्रक्रमः, शेषास्तूद्धरिता त्रयो भागाः पुनः भक्तस्यासनस्येति पंचः मागाः इति चत्वारः कालमेदा जाताः, परं त्रय एव ज्ञेयाः, साधारणयोर्द्वयोरपि तत्त्वत एकत्वादिति गाथार्थः ॥६५२॥ भागानां स्थिरचलनां गाथाद्वयेनाह एगो दवस्स भागो० ॥ ६५३ ।। एत्थ उ तइय चउत्था०॥६५४ ॥ व्याख्या-एकः-एककः द्रव्यस्य पूर्वोक्तस्य भागः षष्टांशः अवस्थितो नित्यभावः स्यात् प्रक्रान्तानां पंचानां षष्टांशानां मध्यात् , तथा भोजनस्य पूर्वोक्तस्य द्वौ-द्विसंख्यौ भागौ षष्टांशी स्तः, अवस्थितावित्ति प्रक्रमः, इति त्रयो भागा अवस्थिता वड्डेति वृद्धि गच्छतः, वा-विकल्पे हीयंति-हानि गच्छति, वा पूर्ववत् , दो दोति द्वावेव २ प्रतीतौ साधारणमप्रेतनशब्दलब्धभागौ शेषषष्टांशी तु व्याख्यात एव एकैके पाने भक्ते च, शीतादाराम्य उष्णं यावद्गतस्य पानस्य वढेत भक्तस्य तु हीयेते, उष्णादारभ्यः शीतं यावद्गतस्य तु भक्तस्य वर्द्धते पानस्य तु हीयते, शीतो ह्येको भागो द्रवस्य स्यादभूत्ततः साधारण एको वर्द्धित उष्णे एको वृद्धित इति द्वौ वर्द्धिता एकादावित्यादीति, अत्र त्वेतेषां मध्यात् पुनः चतुर्थी पूर्वोको दुन्नियति द्वावेव प्रतीतो अनवस्थितौ चलौ भवेति भवेता-जायेत भागौ षष्टांशी, तथा पंचमत्ति विभक्तिलोपापंचमः षष्टः प्रथमो द्वितीय ॥१५५॥ Jain Education Intem For Private & Personel Use Only Page #351 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education एते प्रतीता एव, चः समुच्चये, अवस्थिताः - सदावस्थायिनः भागाः षष्टांशाः स्युरितिशेषः, तत्र पंचमः पानविषयः, षष्टो वायुविषयः प्रथमद्वितीयौ भक्तविषयौ तृतीयचतुर्थो भक्तपानविषयौ, इह हि "अद्धमसणस्से "त्यादि गाथानु ( गा० ६५० ) सारतः शीते प्रथमद्वितीयतृतीयचतुर्था भागा भक्तस्य पंचमस्तु पानस्य स्यात्ततः साधारणे प्रथमद्वितीयतृतीयभक्तस्य चतुर्थपञ्चमे तु पानस्य इत्यानंतरोक्तं कालाऽपेक्षया, अत्र काले चतुर्थभागस्य भक्तः निष्काशात्त्यागे प्रवेशाच्चानवस्थितेनैवमुष्णे सा तृतीयस्य तु साधारणे पानानि कोशाद्भके • प्रवेशाच्च सत्वे तृतीयस्यैवेत्थं शीते चतुर्थस्याशेषाणां चतुर्णामपि सर्वकालेषु विद्यमानत्वादवस्थितैव, इह भक्त भागानां वृद्धि बुभुक्षाया वृद्ध्यापि सा यास्तु हान्यित्यादि भावनीयेति गाथायार्थः ॥ ६५३-५६४ ॥ इति वीरगणिविरचितायां पिंडनियुक्तिवृतौ प्रमाणाख्यं पञ्चमं द्वारं समाप्तं ॥ थ || उक्तं प्रमाणद्वारमथाङ्गारधूमाख्यद्वारद्वयाव सरस्तत्राङ्गारधूमौ नामादि मेदाच्चतुर्द्धा तत्र नामस्थापने पूर्ववत्, द्रव्याङ्गारस्तु काष्ठमग्निदयं निर्धूमं ज्वलदग्निरूपं, भावाङ्गारस्तु रागपरिणामः, द्रव्यधूमस्यः काष्ठादेर्दद्यमानस्य सक्तः प्रतीतः, भावधूमस्तु द्वेषपरिणामः, इह तु भाव्याङ्गारभावधूमस्वरूपदोषाभ्यामधिकारस्तथा चाह तं होइ सगालं० ॥ ६५५ ।। व्याख्या - तत्किमप्यशनादिकं भवति जायते अंगारः पूर्वोक्तशब्दार्थश्चारित्रेधनदहनसमर्थो रागपरिणामः, इह यदाश्रित्य साधुस्तेनाङ्गारेण सह वर्तते उपचारात्तदशनादिकमपि तथेति सहाङ्गारेण सागारं यत्किमपि आहारयत्यभ्यवहरति मूर्च्छितो सुष्ठु ममेतदित्यादिरागवान् संभवन्, तदशनादिकं पुनः भवति-जायते, पुनः पूर्वोक्तः शब्दार्थश्चारित्रेन्धनस्य धूमायमानताकरणसमर्थो द्वेषपरिणामः, ततश्च पूर्ववत्सहधूमेन सधूमां यत्किमपि आहारयत्यभ्यवहरति निंदन् क्रूरमेतदित्यादि दोषाद् परि० ९ वीराचार्य कृतटीका या अन्त्य मागः । Page #352 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयावचूर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः । ॥१५६॥ Jain Education Inter 19 गृहनिति गाथार्थः ॥ ६५५ ।। द्रव्याङ्गारधूमयोः स्वरूपमाह - अंगारतमपत्तं० ।। ६५६ ।। व्याख्या - अङ्गारत्वं- द्रव्याङ्गारभावं अप्राप्तं भगतं सन् ज्वलन् - दाइक्रियामनुभवन् इन्धन - कटादि सधूमं तु सधूममेव प्रोच्यत इत्यत्रापि योग:, तथा अंगारइत्यङ्गार एव ध्वनिना प्रोच्यते-भण्यते, तं चियति तदेवेन्धनदग्धं सर्वथा ज्वलितं, तत्स्वरूप विशेषणमाह – गते - सर्वथा ज्वलितत्वेनायाते घूमे द्रव्यधूमे इहाङ्गारसधूमयोर्व्यत्ययेन व्यवधानमुत्पत्तिक्रमांगीकरणाज्ज्ञेयं पूर्वं हि काष्ठादिदख मानमर्धदग्घेषूष्णस्वभावं सधूमं स्यात्ततः सर्वथाज्वलनरूपामङ्गारतां भजतीति गाथार्थः ॥ ६५७ ॥ अथ राग सामर्थ्य माह रागग्गिसंप्रलित्तो० ।। ६५७ ।। व्याख्या - रागः पूर्वोक्तः, स एव चारित्रे (प० ११०) धनदाहकत्वादग्निः ज्वलनस्तेन सम्यक्सामरस्येन पलितो दीप्स्यौ व्याप्त इत्यर्थः, सः साधुः भुञ्जानो - अभ्यवहरन् प्राशुकमपि निश्चेतनमपि न केवलमप्राशुकमित्यर्थः, उपलक्षणत्वादेषणीयमहः आहारं - अशनादिकं निर्दग्धं सर्वथा काष्ठादिदहना निर्धूमा इत्यर्थः, सांगारः द्रव्याङ्गारस्तैर्निभं सतं, ततः करोति - विधत्ते परिणामवसाच्चारित्रमैव दाहास्वादिन्धनं ज्वलन् तत् क्षिप्रं शीघ्रं यथा हाङ्गारैः काष्टादिकार्यं न सिध्यति तथा तेन चारित्रेण कृतदुःखमोक्षो न शीघ्रं लभ्यत इति गाथार्थः ।। ६५७ ।। द्वेषसामर्थ्यमाह - दोगी जलतो० ॥ ६५८ ॥ व्याख्या - द्वेषः पूर्वोक्तः, स एव चरित्रेन्धनदाहकत्वेनाग्निः - ज्वलनः सोऽपि न केवल रागाग्निर्निर्दग्धाङ्गारनिभं करोतीत्यर्थः, ज्वलन्-दाइक्रियां विदधन् अप्रीतिकं रूक्षोऽयमाहार इत्यादिवचनमुच्चारणं तदेव मलिनकारि - त्वसाम्याद्भूमो द्रव्यधूमस्तेन धूमितं धूमायमानीकृत् चरणं - चारित्रं अङ्गारो- द्रव्याङ्गारः स एव तन्मात्रं - तेन सदृशं तुस्मं तत् यावदिति परि० ९ वीराचार्य कृतटीका या अन्त्यभागः । ॥१५६॥ Page #353 -------------------------------------------------------------------------- ________________ M कालावध्युद्देशेन भवति-जायते, निर्दहति-प्लोषति, तावदिति कालावधिनिर्देशः तावन्निर्दहति यावदर्धदग्धमेव स्यादिति भावः, रागेण : परि०९ सर्वथा दग्धेन्धनसमं चारित्रं करोतीति स गुरु दोषोद्यषणत्व]द्वेषोऽर्धदग्धेन्धनसममिति स लघुरिति गाथार्थः ॥ ६५८ ॥ प्रस्तुतद्वारद्वय वीरगणिनिगमनं सर्वदोषसंग्रहं चाह कृत. रागेण सइंगालं० ।। ६५९ ॥ व्याख्या-रागेण पूर्वोक्तेन सांगारं-अङ्गारदोषदुष्टं भोजनमिति प्रक्रमः, तदेवं द्वेषेण पूर्वोक्तेन टीकाया सधूमकं- धूमदोषयुक्त वियाणीहि-बुद्ध्यस्व, तदेवं षट्चत्वारिंशदिति संख्या दोषाः-आधाकर्मादिदूषणानि बोद्धव्याः-ज्ञातव्याः अन्त्यभाजनविधौ-अभ्यवहार करणे, तत्र अध्यवपूरकस्य किश्चित्साम्यात् मिश्रान्तर्भावेन पंचदशोद्गमस्य षोडशोत्पादनाया दशषणायाश्चत्वारो भागः। मंडलीदोषाः पूर्वोक्ताः पंचमस्तु कारणाख्यो वक्ष्यमाणः. ननु किमयं पृथगुक्तः !, इति, उच्यते पूर्वोक्तदोषैः शुद्धोऽप्याहारो नैतद्विना भोक्तव्यं इत्यस्य प्राधानाख्यापनार्थमिति गाथार्थः ॥ ६५९ ॥ कीदृशं किं निमित्तं चाहारं साधवो भुञ्जन्त ! इत्याशंक्याह आहारंति तवस्सी० ॥ ६६० ॥ व्याख्या-बाहारयन्ति-भुञ्जन्ति तपस्विनः-साधवो विगतः अक्रियमाणत्वाष्टो यस्मात्त-IN व्यङ्गार, चः समुच्चये, एवं विगतधूम, चः समुच्चये, तदपि ध्यान-धर्मध्यानादि, अध्ययनं-आचारादिपाठस्तन्निमित्तं-तत्पयोजनं एतद्द्वयं वक्ष्यमाणानां षण्णां वेदनोपशमादीनां मध्यात्षष्ठे धर्मचिन्तारूपे भेदे अवतरति, इह चास्य पृथग्भणनं धर्मचिन्ताया मध्ये प्राधान्यख्यापनार्थ, एषो अनन्तरोक्तो उपदेशः-आज्ञापनं प्रवचनस्य-आगमस्य स्यादिति शेषः, अशेषेषूद्मादिदोषेषु जगत्त्रयकदर्थको रागद्वेषरूपी गुरुतमाविति ख्यापनाय क्रमभणनं, व्यक्तौ तौ दोषौ सदृशावुक्ताविति गाथार्थः ।। ६६० ॥ इति वीरगणिविरचितायां शिष्यहितायां पिंडनियुक्तिवृत्तावङ्गारधूमाख्यं षष्ठसप्तमं द्वारद्वयं समाप्तमिति ॥ २ ॥ Jain EducationX .. For Private & Personel Use Only Page #354 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 4404 परि०९ वीरगणि क्षमारत्नीया. वचूर्युपेता श्रीपिण्डनियुक्तिः टीकाया अन्त्य उक्कमनारधूमाख्यं द्वारद्वयमथ कारणद्वारमभिघित्सुः (आह) छहि कारणेहिं साहू० ॥ ६६१ ॥ व्याख्या-घड्भिः प्रतीतैः कारणैः-प्रयोजनैः साधुः-यतिराहारयन्नपि भुंजानोऽप्यना- हारयन्नेवेत्यप्यर्थः, आचरति-करोति धर्म-पुण्यं, तथा षड्भिश्चैव-षसख्यैरेव कारणे-निमितैः, निव्यूहयन्नपि प्रकृतमाहारं त्यजन्नपि न केवलमाहारयन्नित्यप्यर्थः, आचरति-धर्म करोतीति गाथार्थः ।। ६६१ ॥ तत्राद्यानि कारणान्याह वेयणवेयावच्चे०॥ ६६२ ॥ व्याख्या-वेयणत्ति सूचनाद्वेदनोपशमनार्थ-पीडापगमाय, तथा वेयावच्चेत्ति विभक्तिव्यत्ययाद्वैयावृत्त्यकरणाय आचार्यादिषु भक्तदानार्थ, तथा इरियट्ठाएत्ति सूचनादीर्याशोधनार्थ ईर्यासमितिपालनाय, चः समुच्चये, तथा संवमार्थ प्रत्युपेक्षणादिनिमित्तं, तथेति वाक्योपक्षेपे, प्राणप्रत्ययाय-जीवनायेत्यर्थः, इति पञ्चकारणानि, षष्ठं प्रतीतं कारणं पुनः धर्मचिन्तायै-श्रुतचारित्रधर्मपर्यालोचनार्थ भुञ्जीतेति सर्वत्र शेष इति गाथार्थः ॥ ६६२ ॥ एनामेव गाथां गाथाद्वयेन विवरितुमाह नत्थि छुहाए सारिसा० ॥ ६६३ ।। इरिअं नऽवि सोहेई० ॥ ६६४ ॥ व्याख्या-न-नैव, अस्ति-विद्यते क्षुधा-बुभुक्षा सहशा-तुल्या, अपरेति सामर्थ्यगम्यं, वेयणत्ति वेदना-पीडा यत इति शेषः, भुञ्जीत-अग्नियात्साधुः, तत्पशमनार्थ-वेदनाविनाशाय, तथा छाओत्ति बुभुक्षितो-भोजनरहितः, वैयावृत्यं-आचार्यादिभक्तदानादि न-नैवाचरति-शक्नोति कर्तु-विधातुं यत इति शेषः, अतोऽनेन कारणेन भुञ्जीत-अभ्यवहरेदिति, तथा ईर्यामीर्यासमित्तिं प्रतीतं, चः समुच्चये, न-नैव शोधयति-पालयति, बुभुक्षितशब्दोऽत्रोत्तरत्र च प्रक्रान्तः किंतु प्रथमांतः षष्ठ्यांतश्च यथासंभवं व्याख्येयं इति, बुभुक्षितः सन् , तथा बुभुक्षितः प्रेक्षादिकं-प्रत्युपेक्षणाप्रमार्जनादिकं, चेति समुच्चये, संयमशब्दात्परतो योज्यः, संयम प्रतीतं कर्तु-विधातुं न तरतीति, पाश्चात्यगाथाया अनुवृत्तिः, तथा । वाक्योपक्षेपे, धारियहाएति सूचनादीयांशीधनीडापगमाय, तथा वेयावची ॥१५७॥ १५७॥ Jain Education Interior For Private & Personel Use Only Page #355 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परि०९ वीरगणि टीकाया अन्त्यभागः। बुमुक्षितस्य स्थाम बलं चेति समुच्चये परिहीयते-क्षीयते, तथा बुभुक्षितः गुणऽणुप्पेहासुत्ति नकारलोपाद्गुणनानुप्रेक्षयोः, पूर्वाधीतश्रतस्य परावर्तने-अर्थचिन्तनिकायां च असक्त इति परतो योज्यः, असक्तो-असमर्थः स्यादितिशेषः, यतो मुंजीतेति पाश्चात्यगाथाया सर्वत्रानुवृत्तिरिति गाथाद्वयार्थः॥ ६६३-६६४ ॥ अभोजनकारणानि बिमणिषुस्तत्पस्तावनार्थ षष्ठस्याभोजनकारणस्य विवरणार्थ चाह अहवाण कुजाहारं ॥६६५॥ व्याख्या-अथवेति भोजनकरणापेक्षया विकल्पार्थः, न-नैव कुर्याद-विदध्यात् आहारभोजनं षडभिः प्रतीतैः स्थानैः-करणरूपैः पदैः, संयतः-साधुः, अथ " सर्वत्राप्यनुद्यानस्य मरणाराधनासारे"ति तस्यां महाप्रयत्नो विधेयः इत्यस्यार्थस्य ख्यापनार्थ वक्ष्यमाणमपि षष्ठमभोजनकारणं व्याख्यानयन्नाह-पश्चात्-शिष्यनिष्पत्तिकरणादेरुपरि, प्रथमं हि शिष्य. निष्पादनादिश्रेयः, पश्चिमकाले-वृद्धत्वे, अन्यदा हि प्रायो बुभुक्षाऽऽधिक्यादिनाऽऽझार( प० २२१ )परिहारो दुष्करः स्यात् , कृत्वाविधाय आत्मानमिति शेषः, अल्पा प्रथममेव संलेखनाकरणेन ज्झोषःस्तोकोत्थानादिरूपा क्षमा शक्तिर्यस्य तं समर्थशरीरो याहारपरित्यागे प्राय आर्तध्यानमुपयाति, तथा क्षम-विशेषतः शमयुक्ततयाऽयोग्यमनुपशान्तो हि संलेखनयाऽपि मृतः सुगतेः साधवो न स्यात् , आहारपरिहारे साधुरिति सामर्थ्यगम्यं, यद्वा पच्छा इति अन्तो योज्यमिति, पश्चिमकाले-संलेखनाप्रस्तावे कृत्वा-विधाय आत्मक्षमांशान्तिविशेषत उपशमे स्थितेत्यर्थः, पश्चात्तु परिहरेदिति पूर्ववदिति श्लोकार्थः ।। ६६५॥ प्रस्तावतोऽन्ये वाऽभोजने कारणन्याह आयके उबसग्गे० ॥ ६६६ ॥ व्याख्या-आतङ्के-आकस्मिकरोगे न भोक्तव्यमिति सर्वत्र प्रक्रमः, तथोपसर्गे-स्खलनायां, तथा तितिक्षार्थ पालनायेत्यर्थः, कासामित्याह बंभचेरगुत्तीसुत्ति ब्रह्मचर्यगुप्तीनां-मैथुनविरतिरक्षाविशेषाणां, षष्ठ्यर्थे सप्तमी, तथा प्राणिदयाजीवानुकम्पा, तपः पूर्वोक्तं, त एव हेतुं कारणं तं आश्रित्येति शेषः, तथा शरीरव्यवच्छेदनार्थ-देहत्यागाय, चः समुच्चयार्थों लुप्तो Jain Education Intel For Private & Personel Use Only Call Page #356 -------------------------------------------------------------------------- ________________ RS रत्नीया 0 परि०९ वीरगणि कृतटीकाया अन्त्यभागः। धमा दृश्य इति गाथार्थः ॥ ६६६ ॥ एनामेव गाथां गाथाद्वयेन व्याख्यानयन्नाह आयंको जरमाई०॥ ६६७॥ तवहेउ चउत्थाई० ॥ ६६८ ॥ व्याख्या-आतङ्कः पूर्ववत्, जरमाई इति जरादि, वर्यपेता अजीर्णप्रभृति, मकारः पूर्ववत् भण्यत इति, तत्रेति च शेषः, भवत्यनाहारः साधुरिति सर्वत्र शेषः, उपवासः कुर्वतो हि प्रायो श्री- ा ज्वरादयः (याति), तथा राजा केनाऽपि कारणेन कुपितो नृपतिरनेन प्रतिकूल उक्तः सन्नायकाः प्रत्रज्यामो च नाट्यर्थं अवस्थिताः स्वजना पिण्ड- अनेन त्वनुकूल उक्तः, वा विकरुपे, किमित्याह-उवसग्गोत्ति उपसर्ग-स्खलीकरणं प्रथमा द्वितीयार्थे कुर्वन्तीति शेषः, तत्रेत्यनुवृत्ति, नियुक्तिः। स ह्युपवासाः कुर्वन्तं प्रायस्ते मुञ्चन्ति, तथा ब्रह्मत्रतपालनार्थ उपवासा हि कुर्वतः कामोऽपक्रामति, तथा पाणिदया इति सूचनात्पाणि दयार्थ-सत्त्वरक्षणायेत्यर्थः, वासमहियाई इति विभक्तिव्यत्ययावर्षमहिकादौ-जलवृष्टौ निश्चयतः सचित्तवृष्टिविशेष च, आदिशब्दात् ॥१५॥ सचित्तरजःपातप्रभृतिप्रहः, मेघवृष्ट्याऽऽदौ झुपवासं करोति, येन भिक्षाटनादिजाता कायादिविराधना न स्यादिति, तथा तपोहेतुस्तपोथ, कथंभूतं तप इत्याह-चतुर्थाद्यकाद्युपवासप्रभृति यावद्-कालावधिनिर्देशे, चः पूरणे, षड्भिर्मासैनिष्पन्नं षण्मासिकं, तपः पूर्वोक्तं भवति-जायते, षण्मासिकत्वमणने कारणं-निमित्तं सत्वंति भाणिऊणमित्यादि (!) गाथोक्तं ज्ञेयमिति पञ्चाभोजनकरणानि, तथा षष्ठं प्रतीतं अभोजनकारणं भवतीत्यनुवृत्ति, यत्किमित्याह-शरीरव्यवच्छेदनार्थ-संलेखनाक्रमेण वृद्धभावे मरणाय भवति-जायते अनाहारोनिर्भोजनः साधुरिति गाथाद्वयार्थः ।। ६६७-६६८ ॥ तत् षट्कं निगमयन्नाह *एएहि छहिं ठाणेहि, अणाहारो उ जो भवे । धम्म नाइक्कमे भिक्ख , धम्मज्झाणरओ भवे ॥ ॥ * एषा गाथा श्रीमलय गिरिसूरिप्रणीतवृत्त्यादर्शषु तु बहुषु न दृश्यते श्रीक्षमारत्नसूत्रितावचूरौ(प० ११९) च दृश्यते, अत्र मलयगिरिवृत्त्यानुगताका अतोऽको नोद्धृतः। IS कानावृतः । ॥१५८॥ Jain Education in For Private & Personel Use Only Page #357 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परि०९ वीरगणि कृतटीकाया अन्त्य भागः। एतैरातकादिभिः षड्भिरेव प्रतीतैरवधारणं तुशब्दयोजनाज्ज्ञेयं, स्थानैः पदैरनाहारः-उपवासी, तुर्व्याख्यात एव, यः कश्चित्साधुः भवेत् स्यात् धर्म-पुण्यं ते नैव अतिक्रामेत्-त्यजेत् स इति विशेषः भिक्षुः-साधुः, यदि किमित्याह धर्मध्यानरतः-शुभाध्यवसायासक्तः भवेत्-स्यादिति श्लोकार्थः ॥ ग्रन्थोपसंहारं चिकीर्षुः पूर्वोक्तसमस्तदोषकथनायाह सोलस उग्गमदोसा० ।। ६६९ ॥ व्याख्या-सुगमा केवलं, तु समुच्चये, मकारोऽलाक्षणिकः, इह पूर्वसंस्तवपश्चात्संस्तवाभ्यामेक एव संस्तवाख्यो दोष एव, चूर्णयोगौ तु भिन्नभिन्नौ द्वौ दोषावुक्ती, कापि ग्रन्थे व्यत्ययो दृश्यत, इति सर्वे सप्तचत्वारिंशत्, एतान् दोषान्विशोधयन् साधुः पिण्डं विशोधयति, तद्विशुद्धौ तु चारित्रं निर्मलयति, तन्नर्मल्यात् तु शीलमानं तु सिद्धकृतं निर्वाण, निर्वाणमवाप्नोति, तस्मान्मुमुक्षुणैतैरुद्गमादिदोषः शुद्धो पिण्ड एषितव्य इति गाथार्थः ॥ ६६९ ॥ ग्रन्थस्योपसंहारार्थ स्वमनीषिकारचितत्वपरिहारमपवादं चाह एसो आहारविही० । ६७० ।। व्याख्या-एषः-सकलग्रन्थोक्तः, आहारस्य-पिण्डस्य विधिः-विधान-शुद्धाशुद्धतया निरूपणमित्यर्थः, सः यथा-आधाकादिभेदरूपप्रकारेण भणितः-उक्तः सर्वभावदर्शिभिः-समस्तजीवादिपदार्थावलोककैस्तीर्थकररित्यर्थः, अनेन ग्रन्थस्यादेयता स्यात् , तथा मयाऽपि स्वमतिविभवानुसारतो अन्यतया ग्रन्थीति शेषः, किंबहुना ! धर्म:-श्रुतचारित्ररूपः आवश्यकरूपः-प्रतिदिननियमकरणस्वभावः योगाश्व-प्रत्युपेक्षणादिव्यापारा धविश्यकयोगाः येन केनचित् यथोचित्यमाधाकम्माथासेवारूपप्रकारेण न-नैव हीयन्ते-हानियांन्ति, तत्-तदेव कुर्याद-विधेयात, अनेनोत्सर्गापवदाश्रितेन साधुना भाव्यमित्युक्तं स्यादिति गाथाथः ।। ६७० ॥ केवेत्थमपवादमासेवमानस्य साधोः पृथिव्यादिविराधनापि निर्जराफला स्यादित्येतदेवाह Jain Education Internet For Private & Personel Use Only Page #358 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धमारत्नीयावर्युपेता श्री. पिण्डनियुक्तिः। परि०९ वीरगणिकृतटीकाया अन्त्य ॥१५९॥ . जा जयमाणस्स भवे ।। ६७१ ॥ व्याख्या-या काचित् यतमानस्य-ग्लानाद्यवस्थायां गुरुदोषपरिहारेण लघुदोषासेवां कुर्वतः भवेत् स्यात् विराधना-पथ्यादौ क्रियमाणे पृथिव्याधुपमर्दादि सूत्र-आचारादिकं विधिः-प्रस्तावाद्यथावद् यो विधानं, तयोः समग्रस्य यावद् यः गीतार्थस्येत्यर्थः, सा. विराधना भवति-जायते निर्जराफला-कर्मशोधिका, अध्यात्म-चित्तं तस्य विशोधिःयथौचित्येन प्रवर्त्तनादागद्वेषाभावरूपा निर्मलता तया युक्तः-समन्वितस्तस्य साधोः, इत्युक्ता प्रासैषणा, तदुक्तौ समाप्तैषणा इति गाथार्थः ॥ ६७१ ॥ इति वीरगणिविरचितायां शिष्यहितायां पिण्डनियुक्तिवृत्तौ कारणाख्यामष्टमं द्वारं समाप्तमिति ।। तत्समाप्तौ च । समाप्ता पिण्डनियुक्तिवृत्तिरिति ॥ भो भव्या ! इह हि जन्मजरामरणनीरनिकरपूरिते बहुपकारपरिभवपातालोवणे मोहमहावर्तसंवर्तनदुरुत्तारे कषायवडवानलज्वालाकराले रोगशोकदारिद्रयप्रभृतिकमत्स्यकच्छपमाहादिक्षुद्रसत्त्वसत्त्वसमाकुले विविधव्यसनव्याघ्रसिंहादिश्वपददुःसंचारमार्गे प्रियवियोगाप्रिय. संप्रयोगचलद्वीचिचयनिचिते करणरणरसिकतस्करनिकरनिरुद्धपचारे परमाधार्मिकादिकदर्यमाननारकादिसत्त्वैककालसमुच्छलितकरुणहाहारवघोषाकरे समस्तदुःखनिभृतानि नारकतिर्यग्जन्मनिमजनानि नरामरजन्मोन्मजनानि वाऽनन्तशो यूयं विदधाना संत आधाकर्मादिसप्तचत्वारिंशद्दोषशुद्धिफलकसंघघटितं मनःशुद्धिगाढबंधनबद्धं वाक्शुद्धयुतंभितमहाकूपस्तम्भं कायशुद्धिविस्तारितसितसितपटं निर्लोभतानिर्यामकाधिष्टितं दत्तावधाननररक्षितापायं किमनयोरशुद्धा (!) यन्मिष्टं लभे(भ्येत) तद्भुज्यत' इत्यादिकुतीर्थिकवचननिचयविषय(म). वातायुपसर्गसहस्रोपनिपाताऽक्षोभ्यं श्रीमन्महावीरेण सकलशुद्धप्रवहणनायकेन करुणापरेण समस्तसत्त्वोत्रणाय व्यवस्थापितं पिण्ड Jain Education Inte l ® For Private & Personel Use Only स w w.jainelibrary.org Page #359 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Int निर्युक्तिपतं कथमपि महापुण्यप्राग्भारेण दृष्ट्वा मा विलंबध्वं किं तर्हि ! यथोक्तप्रत्रज्यापालनारोहणेन नरगतिमारुह्य निवृतिपुरं गच्छत, न तत्रानन्तज्ञानदर्शनसुखवीर्यसंयुक्ता निराकुलाः सदैव तिष्ठथेति ॥ श्रीलाटदेश तिलक श्रीवटपद्रक - विशालपुरगतयोः । श्रीभिल्लवालघर्कटया (जा) तिव्योमेन्दुनिर्मलयोः ॥ १ ॥ श्रेष्ठवर वर्द्धमान - शमित्यो (!) स्तीर्थ नाथमुनिनमने । रतयोर्वसन्तनाम्ना जन्मोत्पत्तिं समाश्रित्य ॥ २ ॥ प्रवज्याग्रहणं पुनराश्रित्य विशुद्धसाधुगुणधाम्नां । वसतिविहारि - श्रीचन्द्रगच्छगगनेन्दुकल्पानां ॥ ३ ॥ सत्यापित नाम्नां श्रीसमुद्रघोषाभिधानसूरीणां । वीर इति प्राप्तापरनाम्नाऽत्यन्तं विमुग्धधियां ॥ ४ ॥ दीक्षायाः परिपालनमाश्रित्य तु सकलवसतितिलकानां । श्री सरवालकगच्छस्थ - वाचनाचार्यवर्याणां ॥ ५ ॥ अधीश्वरगणिनाम्नां सुतेन संप्राप्तवीरगणिनाम्ना । एकादशशतोपरि षष्टिकसंवत्सरे ॥ ६ ॥ वटपद्रग्रामे कर्करोणिकापार्श्ववर्त्तिनि प्रवरे । बोधानुसारतोऽकारि पिण्डनिर्युक्तिवृत्तिरियं ॥ ७ ॥ तेषां सेवांवेश्वर (!) गणिनां श्रीमन्महेन्द्रसूरिवराः । सकलागमपारगताः धर्म्म कथाकथन निरताश्च ॥ ८ ॥ अन्येऽपि देवचन्द्राभिधानगणिनः प्रधानमन्त्रज्ञा । उचितज्ञा अभ्यर्थितशूराः संग्रहपराश्च दृढं ॥ ९ ॥ अन्येऽपि देवचन्द्राभिधाख्यगणिनः क्रियापराः सरलाः । क्षान्त्यादिधर्म्मनिचया परहितरतयो विनीताश्च ॥ १० ॥ एते त्रयोsपि शिष्याः, सकलजनानन्ददायिनोऽत्यर्थं । देवानामपि वन्द्या नन्दन्तु चिरंतना वळये ॥ ११ ॥ येषां भक्तप्रदानमुख्योपष्टम्भप्रसादेन । निरन्तरां निराकुलताकारि मयैषा स्फुटा वृत्तिः ॥ १२ ॥ परि० ९ वीरगणि कृतटीकायाः प्रशस्तिः । Page #360 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयावर्युपेता श्रीनेमि चन्द्रसूरिश्रीजिनदत्ताभिधानसूर्याधैः । श्रीमत्यणहिल्लपाटकपुरे यशोधीयमुपयुक्तैः ॥ १३ ॥ पश्यति तथाऽपि यदि कोऽपि दूषणं किञ्चिदल्पमितरद्वा । तन्मयि कृतानुकम्पः स शुद्धधीः शोधयेद्विबुधः ॥ १४ ॥ कस्य न च्छद्मथस्यानाभोगः स्यादतीब विदुषोऽपि । नितरां विमुग्धबुद्धः किं पुनः मादृशजनस्य ॥ १५ ॥ यावच्चन्द्रो यावच्च भास्करो यावदमरगिरिमुख्याः। तिष्ठन्ति जगति तावन्नन्दतु सुतरामियं वृत्तिः ॥ १६ ॥ इति । वृत्तिमिमां कृत्वा यत्किञ्चिदुपार्जितं मया पुण्यं । तेनैतस्या पाठे समुद्यतो भवतु साधुजनः ॥ १७ ॥ एवं सप्तसहस्रा शतषट्कं चैकसप्ततिश्चास्याः । द्वात्रिंशदक्षरमितैः श्लोकैः सर्वप्रमाणमिति ॥ १८॥ प्रन्थाप्रश्लोकसंख्यायां ७६७१ ॥ परि०९ वीरगणि कृतटीकायाः प्रशस्तिः । पिण्ड नियुक्तिः। ॥१६॥ التحالفحة الافقيه للاسعافه لها لفالنفي نفيا مقاله به م له نظره इति वीरगणिविरचिता शिष्यहिता नाम पिण्डनियुक्तिवृत्तिः समाप्तेति ॥ छ । - शिवमस्तु सर्वजगतः ॥ शुभं भवतु ।। छ ।। JronomrinonrmeromeonemomcomromemamrememoG ॥१६०॥ For Private Personal Use Only Page #361 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inter दशमं परिशिष्टम् । माणिक्यशेखरसूरिकृता पिण्डनिर्युक्तिदीपिका | आद्यभागः श्री आचारांगे द्वितीयश्रुतस्कन्धे आयं दशवैकालिके पंचमं पिण्डैषणाध्ययनं, अस्य निर्युक्तिर्महार्थत्वात् श्रीभद्रबाहुणा पृथकृता, सा पिण्डनिर्युक्तिरितिप्रसिद्धा, अस्या अर्थमात्रं कथामात्रं च लिख्यते, या पिण्डेषणानिर्युक्तिर्दशवैकालिकपंचमाध्ययनस्यास्ति सा स्तोकार्था एषा तु विस्तृतार्था, पिण्डैषणाया निर्युक्तिः पिण्डनिर्युक्तिरिति मध्यपदलोपिसमासः, मंगलं तु " वंदितु सबसिद्धे " इत्यादिना आचारनिर्युक्तौ शस्त्रपरिज्ञाध्ययने यच्च श्रीभद्रबाहुणोक्तं विनशांत्यै, अथार्थाधिकारसंग्रहगाथामाह— पिण्डे उग्गम उपाय ● ॥ १ ॥ पिण्डः संघाते, पिण्डनं पिण्डः बहूनां सं ' ( समुदायः ) x x x xXx (सुकुमारिकादीनां खण्डाद्यैः सह योजनं, सा द्विधा द्रव्यभावाभ्यां ४, ततः प्रमाणमाहारस्य वाच्यं, ५, चः समुच्चये, ततः अङ्गारदोषः ६, ततो धूमदोषः ७, ततः कारणाद्याहारस्य भोजन ( क ) भोजनयोर्वाच्यानि ८ अष्टधेति अष्टार्थाधिकारैः पिण्डनिर्युक्ते :पिण्डैषणाया निर्युक्तिर्वाच्या, पिण्डायंस्त्वाद्यो भिन्न एव, पिण्डेषणाध्ययनस्य चत्वार्यनुयोगद्वाराणि उपक्रमादीनि तत्र नामनिष्पन्ने निक्षेपे पिण्डेषणाध्ययनं नाम, तत्राध्ययनं प्राग् द्रुमपुष्पिकाध्ययने व्याख्यातं पिण्ड एषणा च वाच्या, तेन सम्बन्धेनायाता, आदौ पिण्डव्याख्या ॥ १ ॥ तत्त्वमेदपर्यायैव्र्व्याख्येति पिण्डपर्यायानाह १ यस्याः प्रतेरियं प्रतिकृतिः कृताऽस्ति सा जीर्गप्रायत्वादवचूर्या बहुशः स्थानेषु खण्डिता द्रश्यते, अतः तत्र तत्र स्थानेषु एतचिन्हं कृतमस्ति । - परि० १० माणिक्य शेखरीय दीपिकाया आद्यभागः । Page #362 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धमारत्नीयावचूर्युपेता भी'पिण्डनियुक्ति | परि०१० |माणिक्य शेखरीयदीपिकाया आद्यमाग ॥१६॥ पिण्ड निकाय० ॥२॥x (निकायः भिक्षुका )दिसंघाते सम्हे (मनुष्या )दिवृन्दे सपिण्डनः-सेवादीनां खण्डपाकादिनां संयोगे, पिण्डनाऽपि तत्रैव किन्तु मीलनमात्र संयोगे, समवायः-वणिगादिसंघाते, समवसरणः-अर्हतः सदेवनरासुरसमे, निचयः-शूकरादिवृन्दे, उपचयः-पूर्वावस्थातः प्रचुरीभूते संघातभेदे, चयः-इष्टिकारचनायां, युग्म:-पदार्थद्वयसंघाते, राशिः-पूगाद्योघे, वाः समवये, एते शब्दाः किञ्चिद्विशेषेऽपि सामान्येनैकार्थाः व्रजत्वात् ॥ २ ॥ उक्ताः पर्यायाः, पिण्डभेदानाह पिण्डस्स उ निक्खेवो० ॥३॥ पिण्डस्य निक्षेपो नामादिन्यासः, तुः पुनः, चतुष्ककः षट्कको वा कर्तव्यः ॥ ३॥ कुलए चउम्भागस्स०॥४॥ यथा कुडवः-चतुःसेतिकामाने चतुर्भागस्य सेतिका मात्रस्य सम्भवः तत्राऽवश्यं स्यात् , एवं षट्के | निक्षेपेऽवश्यं चतुर्णा निक्षेपस्य चतुष्करूपस्यैवं नियमेन संभवोऽस्ति, तस्मात्षट्कं अहं निक्षिपामि-षट्कनिक्षेपं वच्मि, षटकनिक्षेपेण चतुष्कनिक्षेपस्योक्तत्त्वादेव ॥ ४ ॥ नामंठवणापिण्डो० ॥५॥ नामपिण्डः, स्थापनापिण्डः, द्रव्यपिण्डः, द्रव्यस्य पिण्ड इत्यर्थः, क्षेत्रे क्षेत्रपिण्डः, कालपिण्डः, भावपिण्डश्च, एष उक्तः, खलु, पिण्डस्य प्राकृतत्त्वात् आकारः, निक्षेपः षड्विधः ॥ ५ ॥ नामपिण्डाद्याह गोण्णं समयकयं वा०॥६॥ यत्पिण्डशब्दरूपं नाम स नामपिण्डः, नाम चासौ पिण्डश्चति युक्तः, नाम चतुर्धा गौणं समय तदुभयं अपिशब्दादनुभयजं च, गुणादागतं, तत्र शब्दव्युत्पत्त्यर्थो योऽर्थो, यथा-ज्वलनस्य दीपनं "ज्वल दीप्तौ” इति, स च गुणः, गुणाश्चेह परतन्त्रोक्ताः, न पारिभाषिको रुपादिः, तेन यद्यस्य व्युत्पत्तिकृत् द्रव्यं गुणः क्रिया वा स गुण उच्यते, तत्र द्रव्यं व्युत्पत्तिकृत् दन्ती शृनी, गुणः जातरूपं हेमं स्वादुरसा श्वेत इत्यादौ, क्रिया तपनः श्रमणः दीप्तो हिंस्रो ज्वलन इत्यादी गोजाति म्नो व्युत्पत्त्यै | १६१॥ Jain Education Inten For Private & Personel Use Only Www.jainelibrary.org Page #363 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परि०१० माणिक्यशेखरीयदीपिकाया आद्यभाग। न किन्तु प्रवृत्त्यै यथा गौः गोजातिः गोशब्दो न गच्छतीत्यर्थजः किन्तु एकार्थxxx xxx तरं च ज तेणं । स्यहरणंति पवुचह कारणकजोवयाराओ॥१॥ संजमजोगा इत्थं रओहरा तेसि कारणं जेण। रयहरणं उवयारा भन्नइ तेणं रओ कम्मं ॥२॥" अनुभयजं निरन्वर्थ समया प्रसिद्धं च, यथा कस्यापि दीनस्य तु सिंहः, यद्वा देवा एनं देयासुरिति व्युत्पत्तिहेत्वभावेऽपि देवदत्ताख्या, एवं पिण्ड इति नाम चतुर्विध, नामपिण्डः यदा बहुसजात्यहढद्रव्यपिण्डने पिण्डः स्यात् तद्गौणं, व्युत्पत्तेर्भावात् , यदा समयगिरा अपां पिण्डनामतया तदा समय. लोके दृढदव्यश्लेपे पिण्डाख्या सिद्धा, न तु द्रव्यौधे, ततः पिण्डनं पिण्ड इत्यन्वर्थाभावान्न गौणं, यथा आचारे द्वितीयश्रुतस्कन्धाद्यपिण्डेषणाध्ययनसप्तमोदेशे "से भिख्कू वा भिरूकुणी वा गाहावहकुलं पिण्डवायपडियाए अणुपविढे समाणे जं पुण पाणगं पासेज्जा, तंजहा तिलोदगं वा०" इत्यादि, अपाऽम्भोऽपि पिण्डशब्देना, एतत्समयजं, उभयचं यथा-भिक्षुः ओदनपिण्ड सत्कुपिण्डं वाऽऽप्नोति, इह पिण्डशब्द उभयजः, समयान्वार्थाभ्यां सिद्धत्वात् , यदा तु कस्यापि [न पिण्डाद्वा] (पिण्ड इति नाम) न चांगावयवौध विवक्षा. तदनुभयजें, अथ गाथार्थः-यत् पिण्ड इति नाम गौणं, यद्वा समयकृतं समयपसिद्धं, यद्वा भवेत्तदुभयकृतं-गुणः समय सान्वर्थ समयसिद्धं च, अपिशब्दादानुभयजं निरन्वर्थ समयसिद्धं च । तन्नाम [नाम]पिण्डमात्रं रुदं, यथा देवदत्तः सिंहको नरो, गोपालिका छगणेलिका इंदगोपस्याज्ञादेः मंडपादि॥ ॥ अथ पिण्ड इति नाम गौणं समयकृतश्च व्याख्याति ॥ पिण्डणवहदवाणं ॥ मा०२॥ पिण्डनं सजात्यानां दृढद्रव्याणां यदेकत्र श्लेषः तत्र पिण्ड इति नाम गौणं, तथा प्रतिपक्षणापि | बहुना खरद्रव्याणां मीलनं विना पिण्डनाम प्रवृत्त एवं काचित्तत्र न क्षतिरित्यपेरर्थः, समयपसिध्या पिण्डाख्या पिण्डनाम यत्र स Jain Education a l For Private & Personel Use Only Page #364 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीया वचूर्युपेता श्री पिण्डनिर्युक्तिः । ॥ १६२॥ Jain Education Inter समयकृतः नामपिण्डः, नामनामवतोर मेदोपचारादेवं निर्देशः, उपचाराभावे तु तद्वस्तुनि तत्पिण्ड नाम समयजं, एतद्दर्शयति यद् आचारस्य सूत्रे पिण्डेति पिण्डपातः, "पडियाई” शब्देन प्रतिज्ञाऽहं भिक्षां लप्स्य इति विचारणा- " पिण्डवायपडियाए अणुपविट्ठे " इत्यादि प्रागुक्तं, अयं भावः - अत्र सूत्रे खरद्रव्यश्लेषाभावेऽपि नीरे पिण्डाख्याऽन्वर्थहीना समये प्रयुक्ता इदं समयजं ॥ भा० २ ॥ अथोमयजंजस्स पुण पिंडवाडया० || मा० ३ || यस्य साधोः पुनः पिण्डपातार्थतया पिण्डपात- आहारलाभस्तदर्थं गृहिगृहं प्रविष्टस्य गुडदन Xxx गोण्णसमयाइरितंo || मा० || ५ || इदं पिण्ड इति नाम, अन्यद्वा गौण समय जभिन्नमपिशब्दसूचितमस्ति, यथा कस्यापि मनुष्यस्य पिण्ड इति नाम क्रियते, तद्धि न गौणं बहुद्रव्याश्लेषात् देहावयवौघस्याधीनश्वात् न च समयजं, अत उभयातिरिक्तं ननु समयजोभयातिरिक्तयोर्न विशेषः, उभयत्रान्वर्थस्याशयोत्थताभावात् तरिक द्वे उक्के ! सांकेतिकमेवोच्यतां, एवं द्वयोर्महणं स्यात् । इति चेन्न आशयाज्ञानात् यतो यल्लौकिकं नाम सांकेतिकं तज्जनाः सामयिका आद्रियन्ते, यत्पुनः साङ्केतिकं तत्सामयिका एव न त्वन्ये ॥ भा० ५ ॥ x x इहाभिप्राये इतिपदैकदेशे पदसमुदायोपचारादभिप्रायकृतत्वे तुल्येऽपि समयप्रसिद्धं लोको न गृह्णाति, न कापि समुद्देशशब्देन समयसिद्धेन जनो भोजनं व्यवहरति, यत्पुनर्लोके प्रसिद्धं तत्सामयिका उपचरन्ति एवं समयजोमयातिरिक्तयोर्भेदोऽर्थवान् पृथगात्तः, एवं गौण समय जोरपि स्वभावमेदोक्त्या पृथक्त्वं सार्थकं यतो यदपि गौणोभयजयोः सान्वर्थता त्वर्थत्त्वेनाविशेषं परं जनाः सामयिका गौणं व्यवहरन्ति, उभयजं तु सामयिका एव नान्ये, तेनैषां हेत्व x x x x (अक्खे वराड० ॥ ७ ॥ ) आकारः साक्षादृश्यते सा सद्भावस्थापना पिण्डस्य, यदाऽक्षांदेरेकस्य पिण्डस्वेन स्थापना एष परि० १० माणिक्य शेखरीय दीपिकाया आद्य भागः। ॥१६२॥ Page #365 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परि०१० माणिक्यशेखरीयदीपिकाया आद्यभागः मे पिण्ड इति, तदा तत्र पिण्डाकारस्यादृश्यत्वादसद्भावे स्थापना पिण्डस्य, अयोधस्याक्षादिस्थस्य वा विवक्षणात् , चित्रकर्मण्येक- बिंद्वालिखनेन पिण्डस्थापना, यथेष पिण्ड आलिखित इति, तदा बहुद्रव्यश्लेषाकारादर्शनादसद्भावे पिण्डस्थापना, यदा त्वेकचित्रलेखनेऽपि एष गुडपिण्डादिया लेखि इति विवक्षा तदा सद्भावपिण्डस्थापना ॥ ७ ॥ अत्र मायं इको उ असन्मावे ॥ भा० ७॥ एकोऽक्षो वराटकोऽङ्गुलीयकादिर्वा यदा पिण्डत्वेन स्थाप्यते तदा पिण्डस्थापना सद्भावे, तुरेवार्थे, पिण्डाकृतेरज्ञेयत्वात् , अक्षायेष्वोधस्याविवक्षणात् , यदा तु त्रयाणामक्षादीनां अङ्गुलीयादीनां वा मिथ एकत्रश्लेषे पिण्डत्वस्थापना तदा सद्भावे, पिण्डाकृतेईश्यत्वात , एवं द्वयोर्बहूनां च श्लेषेऽपि पिण्डत्वं, तथा चित्रेष्वेकबिन्द्रालेखादसद्भावे स्थापना, बहुबिन्द्वालेखेन बहुद्रव्यौघात्मकपिण्डस्थापना सा सद्भावस्थापना, पिण्डाकृतस्तत्र दृष्टेः, तथा दारुकलेप्योपलेषु पिण्डाकृतेर्या पिण्डस्थापना स इतर:-सद्भावस्थापना पिण्डः, एवं उक्तः स्थापनापिण्डः ॥ भा०७॥ अथ द्रव्य[ लिङ्ग पिण्डः द्विधा-आगमनोमागमाभ्यां, आगमतः पिण्डशब्दार्थज्ञस्तत्रानुपयुक्तः " अनुपयोगो द्रव्यं ", नोआगमतस्बिधा ज्ञशरीरद्रव्यपिण्डः स शरीरद्रव्य x xx (पुढवी आउक्काओ०॥९॥)xxx चतुरिन्द्रियपिण्डः पञ्चेन्द्रियपिण्डश्च ॥ ९ ॥ एतान्नवमेदान् व्यक्त्याऽऽख्याति पुढवीकाओ तिविहो० ॥१०॥ पृथ्वीकायत्रिविधः-सचित्तो मिश्रोऽचित्तश्च, सचित्तः पुनर्द्विधा-निश्चयतो व्यवहारतश्च, ना॥१०॥ यथा निच्छयओ सच्चित्तो॥११॥ निश्चयतः सचित्तः पृथ्वीकायः धर्मादीनां क्ष्माणां मेर्वादीनां महाद्रीणां बहुमध्यभागे, एवं टंकादीनां च ज्ञेयः, तत्र अचित्तताया मिश्रतायाश्च हेतनां शीतादीनामसम्भवात् , शेषः वक्ष्यमाणमिश्राचित्तवर्णः, निराबाधारण्यभूषु Jain Education For Private Personel Use Only Page #366 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धमा रत्नीया. वचूर्तुपेता श्री. पिण्डनियुक्तिः। ॥१६॥ परि०१० माणिक्यशेखरीया दीपिकाया आघमाग व्यवहारसचित्तः ॥ ११॥ मिश्रपृथ्वीकायमाह खीरदुमहेट्टपंथे ॥ १२ ॥ क्षीरद्रुमाः-वटाश्वत्थाद्यास्तेषामधस्तले पृथ्वीकायः मिश्रः, तत्र क्षीरद्रुमाणां माधुर्येण शस्त्रत्वाभावात् कियान् सचित्तः शीतादिशस्त्राच कियानचित्त इति मिश्रः, अत्र व्याख्यासंशयः (!), [चकादौ] तथा पथि प्रामे पुरवहिर्यः पृथ्वीकायः स मिश्रः, तत्र गन्त्रीचक्राद्युत्खातः स कियान्सचित्तः, शीतवातोधैरचित्तीकृतः कियांश्चेति मिश्रा, कृष्टो हलेनादौ मिश्रस्ततः शीताद्यः कियानचित्तीकृत इति मिश्रः, तथाऽऽर्दोऽम्बुमिश्रः यावतम्बुशस्त्रं पृथ्व्याः, ततो मिश्रो जलार्दोऽन्तर्मुहूर्त ततोऽचित्तः, xxx xxx पः सोऽग्निनैवात्तः सोऽपि स्वकायशवं, एवमन्यान्यपि स्वान्यकायशस्त्राणि ज्ञेयानि, यथा कटुरसो मधुररसस्य स्वकायशस्त्रं इत्यादि, एवं पृथ्वीकायश्चतुर्धाऽचित्त उक्तः, द्रव्यतः स्वान्यकायाभ्यामचित्तता, क्षेत्रतः क्षारादेः क्षेत्रजान्मधुरादिक्षेत्रजस्य, रक्तवर्णस्यान्यवर्णस्य साऽचित्तता, अत्र क्षेत्रप्राधान्यविवक्षा, यथा योजनशतात् पृथ्वीकायस्याचित्तता भिन्नाहारत्त्वात् शीतादिसंगाच्च, क्षेत्रांतरेण परावृत्तेः, इत्थमकायादिष्वप्यचित्तत्वं ज्ञेयं, यथा वनस्पती हरीतक्या औषधाद्यर्थं अचित्तता स्पष्टा, कालेनाचित्तत्वं आयुःक्षयेण, तच्छद्मस्थानामज्ञेयं, अत्र तडागाउंमो दृष्टान्तोऽचित्तत्त्वे श्रीसंदेहः वीरस्य भगवतः, अचित्तता पूर्ववर्णादित्यागादन्यवर्णादित्वं, उक्तोऽचित्तपृथ्वीकायः । एतेन साधुसाध्यमाह-व्युत्क्रांतयोनिना गतयोनिना प्रासुकेनेदं वक्ष्यमाणं प्रयोजनं तेन स्यात् ॥ १३ ॥ यथा अवरिद्धिगविसबंद्धे० ॥ १४ ॥ अपराद्धिको-लूतास्फोटः सर्पादिदंशो वा, विष, तथा दद्वादौ च बंधे उपशमनाय, प्रलेपः अचित्तक्ष्मादानं, गौरमृदः केदारतर्यादेर्वा लानं, लवणेन वाऽचित्ततार्थः, सुरभ्युपलेन गन्धके(पाषाणे)न वा पामाप्रसूतवातादिषातः, अचित्तस्य तु ग्रहणं, यद्वा तेन चि xxx ॥१६॥ Jain Education Inter For Private & Personel Use Only a w.jainelibrary.org Page #367 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परि०१० |माणिक्यशेखरीयदीपिकाया आद्यमागः॥ (धणउदही धणवलया० ॥ १७॥)xxx 'अह' एष सर्वोऽप्कायो निश्चयसचित्तः-एकांतसचित्तः, शेषोऽवटादिक्षेत्रजोऽप्कायः व्यवहारसचित्तः, आदेर्वापीतटाकादिजः, आधाराधेययोरमेदादगडादीति ॥ १७ ॥ उक्तः सचित्तोऽप्कायः, मिश्रमाह उसिणोदगमणुबत्ते ॥ १८॥ दण्डे इति जातावैकवचन, अनुवृत्तेषु दण्डेषत्कालेषूष्णोदकं मिश्रं स्यात्, आधे दण्डे कोऽपि परिणमति कोऽपि नेति मिश्रः १, द्वितीये बहुपरिणमति स्तोको न २, तृतीये सर्वोऽचित्तः ३, ततो दण्डत्रयाभावे सर्वमुष्माम्भो मिश्र स्यात् , तथा वर्षे वृष्टौ पतितमात्रेऽम्भो प्रामादिषु मिश्रं स्यात् प्रमूततिर्यपचारभुवि, ततो मुहान बहूशस्वच्छतायां सचित्तमपि प्रामादेर्बहिः स्तोकं मेधाम्भस्तत्कालं मिमं माकायसनात् , प्रथमतः एतन्मेघाऽम्भो घनमपि मिश्र धमाकायात् , ततो मेघाम्भः पतत् सचिन, मुक्त्वादेशत्रिकं-विकल्पत्रिकं, तन्दुलोद कमबहुप्रसन्नं, अकारलोपो ज्ञेयः ॥ १८ ॥ आदेशत्रिकमाह भंडगपासवलग्गा ॥१९।। तन्दुलोदके-तन्दुलक्षालनभाण्डादन्यस्मिन् भाण्डे प्रक्षिष्यमाणे ये उत्तेडा-बिन्दवः पा xxx ( एए उ अणाएसा० ॥ २० ॥)xxx मिश्रस्याप्यचित्तत्वसंभावनया ग्रहणप्रसनः, स्निग्धे तु परमार्थतोऽचित्तस्यापि बिन्दनपगमे मिश्रत्वसंभवादग्रहणं, तथा बुहुदा अपि खरवाते शीघ्रं [ तिमृदुचाते ] चिरमपि स्युः, ततो द्वितीयादेशवतां खरवाते बुहदशेषे मिश्राम्भसामप्यादानं स्यात् , मृदुवाते त्वचिचाम्भसोऽप्यनादानं मिश्रत्वाशंकायां, तृतीयादेशेऽप्यचिराम्भो भिन्नं चिरं तन्दुलानां महेन्धनैरल्पकालेन सिद्धिः, न वाऽल्पेधसा, स्तोकाम्भोभिन्नास्तु मन्दं सिध्यन्ति, ततो मिश्रादानाचित्तानादानदोषौ इति त्रयोऽनादेशाः ॥ २० ॥ समयादेशमाह जाव न बहुप्पसन्तं० ॥२१॥ यावत्तन्दुलाम्भो बहुपसन्नं नातिस्वच्छीभूतं तावन्मिथ, एषोऽत्र मिश्राधिकारे आदेशो भवति उक्षालनभाण्डादत्त्वसभावनया ग्रहणप्रसा , ततो द्वितीय Jain Education Inte! Www.jainelibrary.org Page #368 -------------------------------------------------------------------------- ________________ IT श्वमारत्नीयावचूर्युपेता भ परि० १० | माणिक्य शेखरीयदीपिकाया आद्यमाग श्री. पिण्डनियुक्तिः। ॥१६४॥ प्रमाणं, यत्तु बहुमसन्नं तदचित्तं ॥ २१ ॥ उक्तो मिश्रोऽष्कायः, अथाचित्तः सीउण्डखारखत्ते ॥ २२ ॥ प्राग्वत् पृथ्वीकायस्थानेऽप्कायो ज्ञेयः, इह स्वान्यकायशस्त्रयोजना, द्रव्यक्षेत्रकालभावैर्वाऽचित्तता प्राग्वत् यथायोगमकायेऽपि योज्या, तथा दधितैलादिघटेषु शुद्धाम्भस ऊर्दू दध्याद्यवयवतरी स्यात् , सा बाह्या चेतदैकया पौरुष्या xxx (उउबद्ध॥२४॥)xxx वासः परिधानमूषितांगो हि विरूपोऽपि रम्यत्वेन दृश्यमाणः स्त्रीणां रत्योऽयमिति प्रार्थ्यः स्यात् , किं पुनः रम्यानः! ततः स्त्रीणां प्रार्थ्यमानानां सललितदर्शिततिर्यकटाक्षानमोटनव्याजदर्शितकक्षामूलकुचविस्तारगम्भीरनामिचिन्तनादवश्यं ब्रह्मणो भ्रंशं धत्ते, तथाऽस्थानस्थापन, चेन्न ब्रह्मभनक्ति तथापि लोकेनास्थाने स्थाप्यते, नूनं काम्ययं, अन्यथा कथं त्वं भूषयति, "नाकामी मण्डनप्रिय "इति, तथा संपातिमानां मक्षिकादीनां क्षालनजले पततां वायोश्च वधः-विनाशः, तथा प्लावने अम्भःपरिष्ठापने क्ष्मायां रैलणेन भूतोपघात:-क्ष्माश्रितकीटिकादिधातः, ततो न ऋतुबद्धे वस्त्रक्षास्यं ॥ २४ ॥ ननु वर्षास्वप्येते दोषाः स्युः, ततः कथं तत्र धावनं चीवराणां, अत्राह अइभार चुडण पणए. ॥२५॥ वर्षासन्ने चेद्वस्वाधावनं तदा दोषाः, अतिभारो-गुरुत्वं वस्त्राणां, यतः वस्त्राणि मलार्द्राणि चेजलकणयुग्वायुना स्पृशन्ते ततो मलो गाढं बस्नेषु लग्यते, किं पुनर्वर्षासु !, सर्वाऽम्भोवद्रूषु (!) क्लिन्नमल्लसंगाद्वासांसि गुरूणि स्युः, तथा चुडणं-वस्त्राणां अधावने मलेन जीर्णता स्यात् , न च वर्षास्वभिनववस्वादानं न चाधिकः परिग्रहस्ततो वस्त्राभावे दोषाः xxx xx x (सम्य )मवर्तमानः कथंचिद्धिसकोऽपि नासौ पापमाक् , नापि तीव्रपायश्चित्ती, सूत्रबहुमानतो यतनया प्रवृत्तत्वात् , नापि बाकुश्य, नास्थानस्थापना, लोकानामपि वर्षास्वधावने दोषात् , न चोक्ता अतिभाराद्या दोषा ऋतुबद्धे वसाधावने स्युः तस्मान ॥१६४॥ in Education Internal For Private Personal Use Only Page #369 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जघन्य प्रक्षारकाले आमाला युज् उपकारे परि०१० माणिक्यशेखरीयदीपिकाया आद्यमाग! तदा क्षालनं ॥ २५ ॥ वर्षाभ्योऽर्वागुपधिमुत्कर्ष जघन्यं प्रक्षाल्यमाह अप्पत्तेच्चिय वासे॥ २६ ॥ अपाते एव वर्षे-वर्षाकाले आर्द्राभात्प्राक सर्वमुपधि जलादिसामग्र्यां उत्कर्षतः घावयंति यतनया यतयः, द्रवस्यासति-अभावे जघन्यतोऽपि पात्रनिर्योगोऽवश्यं क्षास्यः, निपूर्वो युज् उपकारे ततो नियोगः, उपकरण-पात्रस्य पात्रबंधादि सप्तधा ॥ २६ ॥ ननु सर्वर्षीणामुपकरणं वर्षाभ्योऽर्वाक् क्षाल्यन्तेऽत आह___ आयरिय गिलाणाण ॥ २७ ॥ इह ये कृतपूर्विणोऽईदागमाचारादिशास्त्रोपधानान्यधीतिनः स्वसमयेषु ज्ञातिनः सर्वस्वान्य. शास्त्रेषु कृतिनः कारितिनश्च पंचाचारेषु शास्त्रार्थव्याख्याधिकारिणः सद्धर्मदेशका आचार्याः, एवं उपाध्यायादीनां प्रभूणामपि, तथा ग्लानानां पुनः मलिनानि वस्त्राणि धान्यन्ते, हेतुमाह-मा हुर्निश्चये गुरूणां मलिनवस्त्राच्छादने लोकेऽवर्णोऽश्लाघा, यथा निरुषमा अमी, ततः समलदुर्भिगन्धानाः स्वयं, किमेषां पार्श्वगतैरस्माभिः,xxx (पायस्स पडोयारो॥२८॥)x x नत्त्वात् पादपांछनकमिति रूढा, बाह्या निषयोच्यते, एवं त्रिनिषा रजोहरणं स्यात्, तत्र द्वे निषधे, त्रयः पट्टा:-संस्तारोत्तरपटौ चोलपट्टश्च पोतित्ति मुखपिधानवस्त्रं रजोहरणं सदशिकाद्या निषद्या, दण्डिकावेष्टकत्रयपृथुहस्तायामा हस्तत्रिभागायामदशायुता, एता उपकरणभेदान्न विश्रमयेत् नापरिभोग्यान् स्थापयेत्, कुतः! प्रत्यहमेषामवश्यं व्यापारात्, ततो यतनया वस्त्रान्तरितहस्तग्रहणरूपया सङ्कमणा, ततो षट्पदिकानामक्षास्येषु वनेषु संक्रमण, ततो धावनं कुर्यात् ।। २८ ॥ अत्र भाष्यगाथात्रयं पायस्स० ॥ भा०८॥ संथारु०॥ भा०९ ।। एए उन०॥१०॥ तत्र विश्रामाभावे सति यतनया षट्पदिका अन्यत्र समय्य विधिना धावयन्ति ।। भा०८-१०॥ एवमविश्रम्योपयुक्तः, शेषो विश्रम्योपधिः स्यात् , तत्र विधिमाह Jain Education Intl Page #370 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीया चचूर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः । ॥१६५॥ Jain Education Inter atra || २९ ॥ यः पुनः उपधिः प्राप्तेः घावनकाले अनेनाकालधावनेऽईदाज्ञाभङ्गो दर्शितः, विश्रम्यतेनिःशेषयुकाशोषये परिभुक्तो प्रियते, तं उपधिं वीतरागाऽऽज्ञया- अर्हदुपदेशेनार्हदुक्तमित्यवधार्य, एवं वक्ष्यमाणविधिना साधुर्विश्रमयेत् ॥ २९ ॥ विश्रामणविधिमाह — अभितरपरिभोगं० || ३० ॥ साधूनां द्वौ क्षौमो Xxx xxx प्रावृणोति, येन ता क्षुषिता देहे लगन्ति एवं परीक्षणे वाता न स्युस्तदा धावयेत्, अथ स्युस्तर्हि पुनः २ वीक्ष्य यदा न स्युरिति निश्चितं तदा घावयेत् एवं सप्ताहैः कल्पशोधना, एवं शेषोपधेरपि शोधिर्माव्या, इह विश्रामणा क्षास्यस्यापरिभोगरूपा उक्ता, ततो यत्तस्य बहिः प्रावरणादिपरिभोग इति न तदापि विश्रामणा विरुध्यते ॥ ३० ॥ अत्र भाष्यं - धोवत्थं तिनिदिने० ॥ भा० ॥ ११ ॥ विश्रामणाय मतान्तरं केई एकेकनिसिं० ॥ ३१ ॥ केचिदू - एके सूरय एवमाहुरेकैकां निशां त्रिधा त्रिभिः प्रकारैः पूर्वोक्तः संवास्य, कोऽर्थः !, एकां निशां शोध्यः, कल्पं बहिः प्रावृणोति, द्वितीयां संस्तारकान्ते स्थापयति, तृतीयां स्वपन् स्वोर्द्ध लंबमानं अधोमुखं प्रसारितं देहलग्नं प्रादपर्यन्तं स्थापयति, एवं परीक्षन्ते दृशेक्षिताश्वेन दृष्टास्ततः सूक्ष्मयूकाशोषयेऽङ्गे प्रावृण्वन्ति, प्रावृतौ चेन्न लगन्ति न लग्ना दृश्यन्ते यूकास्ततो धावयन्ति, लगन Xxx × × ×रिणामात्, नास्थिते वर्षे तदा मिश्रं नीत्राम्भः पूर्वं निपतितमचित्तीभूतं तत्कालं पतत्सचित्तं इति मिश्रं, ततः स्थिते वर्षे प्रायं, आत्ते तत्र क्षारः क्षेप्यः, येन भूयः सचित्तं न स्यात्, जलं प्रासुकीभूतमपि केवलं यामत्रयोद्धुं सचित्तीस्यात्, ततः क्षारः क्षेपः, परि० १० माणिक्य शेखरीय | दीपिकाया आद्यभागः ॥ ॥ १६५ ॥ Page #371 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परि०१० माणिक्यशेखरीयदीपिकाया आद्यमाग क्षारेण समलमप्यऽम्बु प्रसन्नं स्यात् , स्वच्छाम्भसा बाऽऽचार्यादिवासांसि सुतेजांसि स्युः, एवमपि क्षारः क्षेपः ॥ ३२ ॥ अथ धावनक्रमः गुरुपच्चखाणि ॥ ३३ ॥ गुरुपत्याख्यानिग्लानशक्षादीनां पूर्व धावनं कुर्यात् , ततः आत्मनः, विनयमूलत्त्वार्द्धर्मस्य, अविनीतस्य गच्छवासाभावाचारित्राभावः, ततो धावनप्रवृत्तेनर्षिणाऽऽदौ गुरुणां-आचार्याणां वस्त्राणि क्षाल्यानि, ततः प्रत्याख्यानिना, क्षपकादीनां ततः ग्लानानां, ततः शैक्षाणां-नवदीक्षाणां, आदेर्बालादीनां, मोऽलाक्षणिकः, तत आत्मनः, गुर्वादीनां वस्त्राणि, त्रिधा-यथाकृतान्यल्पपरिकर्माणि परिकर्माणि च, तत्र यानि परिकर्मरहितान्येव तथारूपाणि लब्धानि तानि यथाकृतानि, यान्येकदा खण्डित्वा सीवितानि तान्यरुपपरिकर्माणि, यानि बहुधा खण्डित्वा सीवितानि तानि बहुपरिकर्माणि, तत्र क्रमः, पूर्व सर्वेषां यथाकृतानि xx xxx छायातपे शोषयेत् , परिभोगेषु तथा शोधितेष्वपि कर्हिचिद् यूका स्यात् , धावनेऽपि सा कथञ्चिज्जीविता तदा कश्चितापेन भियते, तद्रक्षायै छायायां शोषयेत् , इतराणि स्वातपे, दोषाऽभावात् , तानि च छायायामातपे च विसारितानि निरन्तर प्रेक्षेत, येन न कोऽपि लाति, इह पूर्वोक्तविधिना यतनया धाव्यमानेषु वस्त्रेषु वायुय्कादिविराधनादोषः स्यादेव, तच्छुयै साधोर्गुरुणा एककल्याणसंज्ञं तपो देयं ॥ ३४ ॥ एवं सप्रपञ्चमकायपिण्डः, तेजस्कायपिण्डमाह तिविहो तेउकाओ०||३५॥ त्रिविधस्तेजस्कायः सचित्तो मिश्रोऽचित्तः, सचित्तः पुनर्द्विधा निश्चयतो व्यवहारतश्च ।। ३५॥ यथा इगपागाईणं०॥ ३६ ॥ इष्टकापाकः स्पष्टः, आदेः कुम्भपाकेक्षुरसपाकादिचुह्याद्यात्तः, तेषां बहुमध्यभागे विद्युदादिषु-विद्युदुकाप्रभृतिषु तेजस्कायो निश्चयतः सचित्तः, शेषोऽशारादिः, अंगारो-ज्वालाहीनोऽग्निः, आदेः ज्वालादिः, व्यवहारसचित्तः, मुर्मुरःकारीषोऽग्निः, आदेर विध्यातादिः, ईदम्मिश्रः ॥ ३६ ॥ अचित्ततेजस्का xxx Jain Education Intimulana For Private & Personel Use Only Page #372 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयावर्यपेता श्रीपिण्डनियुक्तिः। परि०१० माणिक्यः शेखरीयदीपिकाया आद्यमामः। ॥१६६॥ xxx ताग्निकायपिंडेन हेतुमाह-उपयोग एतेषामोदनादीनां मोजनादौ, ततोऽचित्ताग्निना साधूनां कार्य, द्रव्यादिमेदाचतुर्धाऽग्निः प्राग्वद् यथायोगं ज्ञेयः ॥ ३७ ॥ उक्तस्तेजस्कायपिण्डः, अथ वायुकायपिण्डमाह वाउकाओ तिविहो० ॥३८॥ वायुकायस्त्रिविधः, सचित्तो मिश्रोऽचित्तब्ध, सचित्तः पुनर्द्विधा निश्चयतो व्यवहारतश्च ॥३८॥ यथा सवलय घणतणुवाया० ॥ ३९ ॥ सह वलय सवलया, धनवाततनुवाताः, ये नरकभुवां वलयाकारेण स्थिताः, धनवातास्तनु. वाता, अन्ये घनवातास्तनुवाताश्च, वलयाकारेण वा घनवातास्तनुवाताश्च, तथाऽतिहिमे ये वायवोऽतिदुर्दिनेऽन्दतमसि ये वाता एष निश्चयसचित्तो वायुकायः, अतिहिमातिदुर्दिनाभावे प्राचीनादिवातो व्यवहारसचित्तः, यस्त्वाकान्तादि-पवाक्रमायुस्थः, स पंचधा वक्ष्यमाणैरचित्तः ॥ ३९ ॥ यथा____ अकंतचंतघाणे० ॥ ४० ॥ आक्रान्तरङ्गिणा पत्रादौ यो वातः चिदितिशब्दयन् उच्छलति, यश्चाध्माते आस्यवातभृते इत्यादौ, यो वा घाणे -तिलयन्त्रे तिलपीडने सशब्दो निर्यान् xxx xxx मिश्रसचित्तता ज्ञेया, यथा हस्तशतगतिकालं ध्यात्वा एकस्मिन्नपि स्थानेऽम्भोमध्यस्थितस्याचित्तत्वादिकं ज्ञेय, दृतियथा तथा बस्तिः, बस्तिश्च इतिर्यथा तथा बस्तिः, बस्तिश्च इतिरूपः, किंत्वन्यचर्मः स्थगितग्रीवो विवृतमुखपाश्चात्यप्रदेशः, तथा स्थलस्थः स्निग्धं रुक्षं च कालमाश्रित्य, बस्तिर्बस्तिवातः, एवं हतिवातोऽपि स्थलस्थः, यथाक्रमं पौरुषीषु दिनेषु वाऽचित्तादिज्ञेयः ।। ४१ ॥ अथ भाष्यगाथाचतुष्कं नियरो य कालो० ॥ मा० १२ ॥ एगंतसिणि«मी० ॥ मा० १३॥ मज्झिमनिद्धे० ।। मा० १४ ॥ पोरिसिति- १६६ ।। en Education in For Private Personal Use Only Page #373 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परि०१० | माणिक्यशेखरीयदीपिकाया आबभागः॥ गमच्चित्तो०॥ मा०१५। कालः सामान्यतो द्विधा स्निग्धो रुक्षश्च, यः सजकः सशीतश्च स स्निग्धः, उष्णो रुक्षः, स्निग्धोऽपि त्रिधा-एकान्तस्निग्धो मध्यो जधन्यश्च, एकान्तस्निग्धो-ऽतिस्निग्धः, रुक्षोऽपि विधा-जघन्यो मध्य उत्कृष्टः, उत्कृष्टो-ऽतिरुक्षः, तत्रैकान्तस्निग्धे काले बस्तिर्वस्तिगतः एकां पौरुषी यावदचित्तः स्यात् , द्वितीयस्था आदावपि मिश्रः अन्तं यावत् , तृतीयस्यामादित एवं सचित्तः, ततः सचित्त एव, मध्ये स्निग्धकाले द्वे पौरुष्यो अचित्तः, तृतीयस्यां मिश्रः, तुर्यायां सचितः, जघन्ये च स्निग्धे | इत्यादिवातः पौरुषीत्रयं यावदचित्तः, तुर्यायां मिश्रः, पंचम्यां सचित्तः, एवं रुक्षेऽपि xxx xxx पुनर्द्विधा निश्चयतो व्यवहारतश्च ॥४३॥ xxx सर्वो वनस्पतिरर्धशुष्को ज्ञेयः, तत्र योऽशः शुष्कः सोऽचित्तः, शेषः सचित्त इति मिश्रा, लोट्टः-घरट्टादिचूर्णः, तत्र | नखिकाः सम्भवन्ति, ताः सचित्ताः शेषोऽचित्त इति मिश्रः, आदिशब्दात्कालदलितकणिक्कादिः, तत्र कियन्तोऽपरिणताः सचिवाः, कियन्तस्त्वचित्ता इति मिश्रता ॥ ४४ ॥ अथाचित्तवनस्पतिकायः पुष्फाणं पत्ताणं०॥४५ ।। पुष्पाणां पत्राणां शलादुफलानां-कोमलफलाना, हरितानां-व्रीहिकादीनां वृन्ते म्लाने-शुष्कप्राये ज्ञातव्यं, एवं जीवविषमुक्तं ॥ ४५ ॥ अथाचित्तवनस्पतिना कार्य: संथारपायदंडग०॥४६॥ xxx xxx अत्र जातावेकत्वं, द्वित्रिचतुःपञ्चाक्षपिण्डैः कार्यमिदं वक्ष्यते ॥ ४७ ॥ तत्र द्वित्रिचतुष्पिण्डकार्यमाहबेइंदियपरिमोगो० ॥४८॥ साधोत्यक्षायैः कार्य द्विधा-शब्देन देहेन, शब्देन शकुने शंखशब्देन, देहेन कार्य त्रिधा-पूर्णेन For Private & Personel Use Only Page #374 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धमारत्लीयापर्युपेता श्री. पिण्ड नियुक्ति। तदेकदेशेन तत्स्पर्शन च, एषां चतुर्णा कार्याणां मध्ये केषाश्चिद्यतीनां किमप्युपयोगवशात् , केषांचिच्चत्वार्यपि, व्याक्षाणां संपूर्णानानां, IN परि०१० अक्षाणां सशुक्तिशंखयुजां, आदेः कपर्दकादीनां, चक्षुःपुष्पे शंखशुक्तयोऽगदं, त्रीन्द्रियाणां उद्देहिकादि, कोऽर्थः !, उद्देहिकाकृतशकभृत् , | |माणिक्यआदेरन्यत्रीन्द्रिकृतमृत् स परिभोगविषयः साघोः स्यात् , परिभोगः कार्य ज्ञेयं, उद्देहिकादेः सर्पदंशादौ लिप्यते दाहशान्त्यै, यद्वा किमपि वैद्यो वदेत् , यक्षविषये साधूनामौषधं घ्यक्षपिण्डः ॥ ४८॥ शेखरीय दीपिकाया चउरिदियाण मच्छि० ।। ४९ ।। चतुरिन्द्रियाणां मध्ये मक्षिकाणां परिहारो-विष्टा वान्तिशान्त्यौषधं, तथाऽश्वमक्षिकाऽक्षिरोगस्याक्षरस्योद्धाराय स्यात् , पञ्चेन्द्रियपिण्डे उपयोगमाश्रित्य नैरयिका xxx आधभाग। xxx उपदेश उक्तिः, भिक्षादानं साधोः कार्य, आदेर्वसत्यादिदानं, शिरोऽस्थि, लिङ्गे व्याधिशान्त्य, घृष्टं कायें, यद्वा द्विष्टनृपे साधो शाय शिरोऽस्थि कापालिकवेषेऽर्थः, मिश्रस्य मनुष्योपयोगः, सरजस्कस्य सरक्षाकस्य वा सास्थिककापालिकस्य पार्थे पथिपृच्छा ॥ ५१ ॥ अथ सुरोपयोग: खमगाइ कालकजाइ० ॥५२॥क्षपकादेरादेराचार्यादेः, क्षपकस्य तपोवलाकृष्टत्वेन प्राय आसन्ना एव देव्यः स्युरतः क्षपकोक्तिः, कालकार्य-मृतिरित्यादिकार्येषु काश्चिद्, पथिविषयेषु शुभाशुभे-सापावत्वे निरपायस्वे प्रश्ने दिव्य उपयोगः ॥ ५२ ॥ एवं सचित्तादित्रिभेदो द्रव्यपिण्डः प्रत्येकं पृथ्वीकायादिभेदानवधाऽऽख्यातः, अथ एषां नवानां व्यादियोगे मिश्रं द्रव्यपिण्डमाह अह मीसओ य पिण्डो० ॥ ५३ ।। अथेति केवलपृथ्व्यादिपिण्डोक्रनुमिश्रः पिण्डः उच्यते, विजात्यमिश्रणात् झ्यादिसंयोगा ज्ञातव्याः पिण्डः, यथा पृथ्व्यप्कायौ पृथ्वीतेजस्कायौ इत्यादि यावच्चरमो भङ्गो नवयोगे, तत्र द्वियोगे ३६, त्रियोगे ८४, चतुर्योगे ॥१६७॥ ॥१६७॥ Jain Education inte For Private & Personel Use Only Page #375 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परि०१० माणिक्यशेखरीय| दीपिकाया आद्यभागम पढ़विशं शतं, पंचकयोगे १२६, षड्योगे ८४, सप्तयोगे ३६, अष्टयोगे ९, नवसंयोगे एकः, सर्वानं ५०२, एषां मनानामुत्पत्त्यै इयं करणगाथा-" उभयामु xxx xxx नव भक्ताः ९ तदालब्धाः सार्धाश्चत्वारः, ततोऽघोराश्यहविभक्के प्रथमेऽढे लब्धेन सार्धचतुष्केन तस्याधो राश्यबस्योपरितनं अष्टकं गुणयित्वा संयोगमका ज्ञेयाः, एवं सार्धचतुष्कगुणिता अष्ट जाताः ३६, एवं द्वियोगे ३६ भनाः जाताः, अष्टावं भक्त्वा ३६ अंकः कृत ऊर्द्धराशी, ततत्रियोगभंगसंख्यायै अबस्तनराशिद्विकानंतरत्रिकांकेनोर्द्धगशिसप्तकस्य प्रथम पाश्चात्यं ३६ अंक भक्तालब्धाः १२ तेनोकिः सप्तको गुण्यः जाताः ८४ त्रियोगा, आद्योऽकोऽधस्तनानंतरांकेन चतुष्केन भक्ता लब्धाः २१, तैः ऊर्द्धराशिषट्के गुणिता जाताः १२६ चतुर्योगाः, ततः १२६ पंचकेन भक्ता लब्धाः २७, (५) पंचभागेकयुक्ताः, तैरुर्दू पंचको गुण्यः, जाताः १२६ पंचयोगाः, ततः १२६ अधस्तनानंतरेण षटकेन भक्ता लब्धाः २१, तैरुद्ध चतुष्को गुणितः जाताः ८४ षड्योगाः, ततः ते सप्तकेन भक्ता लब्धाः १२ तैरुर्द्धत्रिको गुण्यः, जाताः ३६ सप्तयोगाः, तेऽधस्तनाष्ट केन भक्ताः लब्धाः ४, तैरुद्धृद्विको गुणितः जाताः नव अष्टयोगाः, ऊर्दू एकोमूलेनावस्थितःएकयोगे नव भङ्गा इत्यर्थः, नवयोगे चकः, एते दशअग्रे ४९२ संति योगजातः दशक्षेपे ५०२ यावन्नवयोगे एको भंगः, तथा चाह जाव चरिमो तावद् द्वियोगाद्यो मिश्रः पिण्डो ज्ञेयो यावञ्चरमो नवज एको मिश्रः पिण्डः, स च लेपमाश्रित्योच्यते, अक्षधुरिम्रक्षितायां रजः पृथ्व्याः पृथ्वीकायो लगति, नद्युतारेऽप्कायः, लोहमय xxxx ____ x x x (घृतव)शादि, तेजस्त्रसकायादि, शाकः वत्थुलभर्जिकादि वनस्पतिपृथ्वीकायत्रसकायादिपिण्डः, फलं आमलकादि, पोद्गलं-मांसं, एतानि शाकवज्ज्ञेयानि, लवणं, अप्पृथ्वीकायतेजस्कायाः, गुडौदनौ शाकवत् , इत्याद्यनेके संयोगे पिण्डा ज्ञेयाः, किन्तु Jain Education Page #376 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परि०१० क्षमारत्नीया. वर्युपेता श्री शेखरीयदीपिकाया आद्यमाग पिण्डनियुक्तिः। ॥१६८॥ यो यत्र द्वियोगादावायाति स तवंगे मील्यः ।। ५४ ॥ उक्तः समपञ्चं द्रव्यपिण्डः, क्षेत्रकालपिण्डाबाह तिनि उ पएससमया०॥ ५५ ॥ " नामठवणापिंडे दवे खेत्ते य कालभावे य" इति गाथायाश्चतुर्थपञ्चमपिण्डौ, क्षेत्रंआकाशं, कालः-समयाविवर्तरूपः, तत्र त्रयः प्रदेशाः व्योम्नो मिलिताः क्षेत्रपिण्डः, त्रयः समया मिलिताः पिण्डः, आदाने द्विचतुरादयोऽपि स्युः, एवं निरुपचरितौ मुख्यो क्षेत्रकालपिण्डौ उक्तौ, सोपचारौ गौणावाह-" ठाणहिउ" द्रव्येऽणुस्कंधरूपे स्थानं-अवगाई, स्थितिः-कालं वाश्रित्य यस्तदाऽऽदेशः-क्षेत्रकालाबाश्रित्य क्षेत्रकालपिण्डव्यपदेशः स्यात् , यथा एकपादेशिकः स्कंधः द्वित्रिप्रादेशिक इत्यादि क्षेत्रतः, उक्तः क्षेत्रपिण्डः, एकादिसामयिकः कालपिण्डः, यद्वा त्रिप्रदेशादौ क्षेत्रपिण्डे त्रिसमयादौ कालपिण्डेऽवस्थितः स्कंधः, तदाऽऽदेशात् क्षेत्रकालोपचारात् , क्षेत्रकालपिण्डौ पुनराह-क्षेत्रकालपिण्डौ 'जत्थ जया तप्परुपणया-यत्र व xxx xxx वात्र कालसमयेषु, ननु मिथो वेधः संख्यावाहुल्याभ्यां, यतः क्षेत्रप्रदेशा मिथो मिश्रिता एव सदा, यथा बुझ्या कृते चतुरस्रादिधने क्षेत्रे प्रदेशानां मिथो मैश्यासंख्यावाहुल्यास्पिण्डाख्या, तथा क्षेत्रपदेष्वपि पिण्डशब्दः प्रवर्तमानोऽविमुद्धमिथ्यो बहुसंख्याभावात् , कालोऽपि परमार्थतः सन् , द्रव्यं च, ततः सोऽपि परिणामी, सतः सर्वस्य परिणामीत्वमङ्गीकृते, अन्यथा सत्त्वायोगः, धर्मसंग्रहणीटीकादावेतदुक्तं-अत्र नोच्यते, परिणामी चान्वयी तेन रूपेण परिणममान उच्यते, ततोऽस्ति सांप्रतसमयस्याप्यतीतैष्यसमयाभ्यामनुवेधः, किंतु तो असन्तावपि धिया सन्तौ विवक्षिती, बहुसंख्यात्त्वं च तत्रास्तीति पिण्डत्वाविरोधः ॥ ५६ ॥ क्षेत्रपिण्डाविरोधाय दृष्टान्तः-- जह तिपएसो खंधो० ॥ ५७ ॥ यथा त्रिपदेशिक:-घ्याणुकः स्कंधविष्वप्याकाशपदेशेष्ववगाढो नत्वेकस्मिन् द्वयोर्वा अविभागेन ॥१६८॥ For Private Personal Use Only in Educh an in T Page #377 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education नैरन्तर्येण सम्बद्धः पिण्ड उच्यते, नैरन्तर्यस्थितेः संख्याबाहुल्यतश्च, एवं त्रिप्रदेशस्य अणुकस्कन्ध इव तदाधारस्याणुक स्कन्धाधारः, प्रदेशत्रयरूपः कथं पिण्ड उच्यते !, उच्यतां पिण्ड इति, उभयत्रोक्तनीत्या विशेषाभावात् ॥ ५७ ॥ अथ ' जत्थ जया तप्परूवणया ' इति व्याख्यातुं नामस्थापनाद्रव्यभावानां क्षेत्रकालयोर्गौण पिण्डत्वमाह अहवा चन्ह नियमा० || ५८ | अथवा पूर्वं क्षेत्रकालयोः स Xxx XXX पिण्डोऽपि भावभाववतोः कथंचिद मेदात्साध्वादेर्देहो प्राशस्तत्र संयोगविभागौ नामपिण्ड इव सत्या पिण्डता, क्षेत्रकालपिण्डयोर्न संयोगविभागौ, ततः नामादिपिण्ड एव तत्तत् क्षेत्रनिवासादिपर्यायमुद्भूतरूपं विवक्ष्य क्षेत्रकालपिण्डाख्या ज्ञेया, यथा द्वयोः - क्षेत्रकालयोर्यत्र - वसत्यादौ यदा वाऽऽद्यपौरुष्यादी यः पिण्डो नामादिरूपो वर्ण्यते यश्च गृहादौ गुडपिण्डे मोदकादिर्वा क्रियते, यदाssधयामादौ निष्पाद्यते स वर्ण्यमानो नामादिपिण्डः, क्रियमाणो वा गुडौदनादिपिण्डः क्षेत्रापेक्षया क्षेत्रपिण्डः कालापेक्षया कालपिण्ड उच्यते, यथाऽमुकवसत्यादि क्षेत्रपिण्ड आथपौरुषीपिण्ड इत्यादि ॥ ५८ ॥ उक्तौ क्षेत्रकालपिण्डौ, भावपिण्डमाह दुविहो उ भाव पिडो० ॥ ५९ ॥ भावपिण्डः प्रशस्तोऽप्रशस्तम्ध, एतयोर्द्वयोरपि प्रत्येकप्ररूपणं वक्ष्ये ॥ ५९ ॥ उक्तं गाथाचतुष्केनाह एगविहाइ दसविहो ॥ ६० ॥ नाणं दंसण तवो० ॥ ६१ ॥ पवयणमाया नव० ।। ६२ ।। अपसत्थो य असंजम० ॥ ६३ ॥ प्रशस्तोsप्रशस्तो भावपिण्डः प्रत्येकं दशधा, एकविषादिः यावद्दशधा, यथा एकधा प्रशस्तः संयमः, स च ज्ञा x x x XXX असंयमः - विरस्यभावः, अन्ये दोषा अज्ञानाचा मत्रैवान्तर्भूता ज्ञेयाः, द्विवाऽज्ञानाविरती, चान्मिथ्यात्वमादौ कृत्वा १९ परि० १० | माणिक्य शेखरीय दीपिकाया आद्यभागः। Page #378 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीथा वचूर्युपेता श्री पिण्ड निर्युक्तिः । ॥१६९॥ Jain Education Intel कषायाश्च, त्रिधा - मिथ्यात्वं चाज्ञानाविरती, चतुर्धा कषायाः, पंचधा पंचाश्रवाः प्राणातिपाताचाः, षोढा षट्रायाऽर्दनात्, सप्तघा कर्मणि ज्ञेयः, कर्मबन्धकाऽध्यवसायाः ज्ञेयाः, ते आयुर्वर्ज सप्तकर्मबन्धकाः काषायिका परिणाममेदा जात्यपेक्षया सप्तधा, अष्टकर्मणां बन्धकाः परिणामा जात्याऽष्टधा प्रशस्तभावपिण्डः, नवधाऽगुप्तयो ब्रह्मणि, दशधाऽवर्मो दशधर्मविपक्षः अप्रशस्तो भावपिण्डः ॥ ६०-६३ ॥ प्रशस्ता प्रशस्त भाव पिण्डस्वरूपमिदं - बज्झ य जेण कम्मं० ॥ ६४ ॥ इह येन भावपिण्डेनैकधादिना वर्त्तमानेन कर्म बध्यतेऽष्टधा दीर्घस्थिति च - दीर्घभवो विपाककटुं स सर्वोsप्रशस्तो भावपिण्डः, येनैकविधादिना कर्मणा मुख्यते शनैः २ सर्वात्मना स प्रशस्तो भावपिण्डः, ननु पिण्डो बहुमीलनमुच्यते, भावाध संयमाद्याः, एकस्मिन्नध्यवसाये एकसमये भावात् कथं पिण्डः ॥ ६४ ॥ अथोत्तरं दंसणनाणचरित्ताण० ॥ ६५ ॥ अन्यभागः । Xxx शशकशिशुरिति वा कृत्वा विराधयेत् विनाशयेत्, तथाऽऽहारखरण्टितौ शुष्कौ हस्तौ कर्कशौ भवतः, ततो भिक्षां दत्त्वा पुनर्दाच्या हस्ताभ्यां गृह्यमाणस्य बालस्य पीडाभावात् ततो बालवत्सातोऽपि न प्रायम् ।। ५८६ ।। XXX दानार्थमाचमनं करोति, आचमनेन क्रियमाणे उदकं विराध्यते, अथ न करोत्याचमनं तर्हि लोके छोटिरिति कृत्वा गर्दा स्यात्, तथा घुसुलंती - दध्यादिमध्नती यदि तद्दध्यादिसंसक्तं मध्नाति तर्हि तेन संसक्तदध्यादिना लिप्ते करे तस्या भिक्षां ददत्यास्तेषां रसजीवानां वधो भवति, ततस्तस्या अपि हस्तान्न कल्पते ॥ ९८७ ॥ संप्रति पेषणादिकुर्वत्या दोषानुपदर्शयति परि० १० माणिक्य * शेखरीय दीपिकाया अन्यभागः। ॥१६९॥ Page #379 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परि०१० | माणिक्यशेखरीयदीपिकाया अन्यभाग। दगबीए संघट्टण । ५८८ ॥ पेषणकण्डनदलनानि कुर्वतीनां हस्ताद्भिक्षाग्रहणे उदकबीजसङ्घट्टनं स्यात् , तथाहि-पिंषन्ती यदा भिक्षादानायोत्तिष्टति तदा पिण्यमाणतिलादिसत्काः काश्चिन्नखिका सचिता अपि हस्तादौ लगिताः सम्भवन्ति, ततो भिक्षादानाय हस्तादिप्रस्फोटने भिक्षा वा ददत्या भिक्षासम्पर्कतस्तासां विराधना भवति, भिक्षां च दत्वा भिक्षावयवखरण्टितौ हस्तौ जलेन प्रक्षालयेत् , ततः पेषणे उँदकबीजसञ्चट्टनं, एवं कण्डनदलनयोरपि यथायोगं xxx ___xxx शेषकायेन हस्तादिना सम्मर्दनं सङ्घट्टन, आरभमाणा कुश्यादिना भूम्यादि खनन्ती, अनेन पृथिवीकायारम्भ उक्तः, यद्वा मजंती शुद्धेन जलेन स्नान्ती, अथवा धावंती शुद्धेनोदकेन वस्त्राणि प्रक्षालयन्ती, यदि वा किश्चिद् वृक्षवल्ल्यादि सिञ्चन्ती, एतेनाप्कायारम्भो दर्शितः, उपलक्षणमेतत् , ज्वलयन्ती वा फूत्कारेण वैश्वानरं चस्त्यादिकं वा सचित्तवायुभृतमितस्ततः प्रक्षिपन्ती, एतेनाग्निवायुसमारम्भ उक्तः, तथा शाकादेश्छेदविशारणे कुर्वती, तत्र च्छेदः-पुष्पफलादेः खण्डनं विशारणं तेषामेव खण्डानां शोषणायातपे मोचनं, आदिशब्दात्तण्डुलमुद्गादीनां शोधनादिपरिग्रहः, तथा छिन्दती षष्ठान , फुरुफरूंते इति पोस्फूर्यमाणान् पीडयोद्वेल्लत इत्यर्थः, अनेन त्रसकायारम्भ उक्तः, इत्थं षट्जीवनिकायानारभमाणाया हस्तान्न कल्पते ।। ५८९-५९० ॥ सम्प्रति षट्कायव्यग्रहस्तेति पदस्य व्याख्याने मतान्तरमुपदर्शयति छक्कायवग्गहत्था० ॥५९१॥ केचिदाचार्याः षट्रायव्यग्रहस्तेति वचनत 'कोलादीनि' बदरादीनि, आदिशब्दाकरीर xxx xxx दाव्यादिदोषानाहसंसजिमम्मि देसे०॥ ५९३ ॥ संसक्तिमति-संसक्तिमव्यवति देशे-मंडले संसक्तिमता द्रव्येण लिप्तः करो मात्रं वा यस्याः Jain Education For Private Personel Use Only w w w.jainelibrary.org Page #380 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयावर्यपेता श्रीपिण्डनियुक्तिः। ॥१७॥ परि०१० माणिक्य. शेखरीयदीपिकाया अन्यभाग। सा तथाविधा दात्री भिक्षां ददती करादिलमान् सत्त्वान् हन्ति, तस्मात्सा वय॑ते, तथा महत्पिठरं यदा तदा वा नोत्पाव्यते, नापि यथा तथा वा सञ्चायते, महत्वादेव, किन्तु प्रयोजनविशेषोत्पत्तौ सकृत् , ततस्तदाश्रिताः प्रायः कीटकादयः सत्त्वाः सम्भवन्ति, ततो यदा तपिठरादिकमुद्वर्त्य किञ्चिद्ददाति तदा तदाश्रितजन्तुव्यापादः, एते च दोषा उत्पाट्यमानेऽपि महति पिठरादौ, तत्रापि हि भूयो निक्षेपणे हस्तसंस्पर्शतो वा सञ्चारिमकीटिकादिसत्त्वव्याधातः, अपि च तथाभूतस्य महत उत्पाटने दाव्याः पीडा भवति, तस्मान्न तदुत्पाटनेऽपि भिक्षा कल्पते ॥ ५९३ ।। सम्पति साधारणं चोरितं वा ददत्या दोषानाह साधारणं बहूर्ण० ।। ५९४ ॥ बहूनां साधारणं यदि ददाति तर्हि तत्र यथा प्राक् अनिसृष्टे दोषा उक्तास्तथैव द्रष्टव्याः । तथा चौर्येण भृतके-कर्मकरे स्नुषादौ वा ददति 'ग्रहणादयो ' ग्रहणबन्धनताडनादयो दोषा द्र xxx xxx हि स्वयं प्रायमिति, तर्हि ग्लानाद्यपहणे तस्य कल्पत इति ॥ ५९५ ॥ सम्प्रत्याभोगानाभोगदायकस्वरूपमाह अणुकंपा पडिणीयद्वया ।। ५९६ ।। सदैवते महानुभावा यतयोऽन्तप्रान्तमशनमश्नन्ति तस्मात्करोम्येतेषां शरिरोपष्टम्भाय घृतपुरादीनीत्येवमनुकंपया यदि वा मयैतेषामनेषणीयाग्रहणनियमभक्तो भव्य इति प्रत्यनीकतया जानानोऽपि तानाधाकर्मादिरूपानेषणादो. षान् करोति, द्वितीयस्तु करोति अज्ञानतो अशठभावः ॥ ५९६ ॥ तदेवं व्याख्यातानि चत्वारिंशदपि बालादिद्वाराणि, संप्रति यदुक्तं" एएसि दायगाणं गहणं केसिंचि होइ भइयवं" इत्यादि, तद्व्याचिख्यासुः प्रथमतो बालमाश्रित्य भजनामाह भिक्खामित्वे अवियालणा०॥ ५९७ ॥ मातुः परोक्षे भिक्षामात्रे बालेन दीयमाने यदि वा पार्श्ववर्तिना मात्रादिना सन्दिष्टे का सति तेन बालेन दीयमानेऽविचारणा कल्पते, इदं न वेति विचारणाया अभावः, किन्तु प्रहणं भिक्षाया भवति, अतिबहुके तु बालेन d,१७०॥ Jain Education in For Private Personel Use Only Page #381 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परि०१० माणिक्य. शेखरीयदीपिकाया अन्यभागः | दीयमाने किमद्य त्वं प्रभूतं ददासीति विचारणे xxxx xxx अन्धोऽपि यदि देयं वस्तु अन्येन पुत्रादिना घृतं ददाति स्वरूपेण श्राद्धश्च, यदिवा स एवान्धोऽन्येन विघृतः सन् देयं ददाति तर्हि ततो प्रायं, नान्यथा, पूर्वोक्तदोषप्रसंगात् ।। ५९९ ॥ त्वग्दोषादिपञ्चकविषयां भजनामाह मंडलपरतिकुट्ठी० ॥ ६००॥ मंडलानि-वृत्ताकारददुविशेषरूपाणि प्रसूतिः-नखादिविदारणेऽपि चेतनाया असंवित्तिस्तद्रूपो यः कुष्ठः-रोगविशेषः सोऽस्यास्तीति मंडलपसूतिकुष्ठी स चेद् असागारिके-सागारिकाभावे ददाति तर्हि ततः करप्ते, न शेषकुष्ठिनः सागारिके वा पश्यति, पादुकारूढोऽपि भवत्यचलस्थानस्थितस्तदा कारणे सति करप्ते, तथा च क्रमयोः पादयोर्बद्धो यदि सविचार इतश्चेतश्च पीडामन्तरेण गन्तुं शक्तस्ततो बद्धादपि तस्मात्कल्पते, इतरस्तु य इतश्चतश्च गन्तुमशक्तः स चेदुपविष्टः सन् ददाति न च कोऽपि तत्र सागारिको विद्यते ततोऽपि कल्पते, हस्तबद्धस्तु भिक्षां दातुमपि न शक्नोति, तत्र प्रतिषेध एव, न भजना, उपलक्षणमेतत, तेन छिन्नकरोऽपि यदि सागारिकाभावे ददाति तर्हि कल्पते, छिन्नपादो यद्युपविष्टः सन् सागारिकाऽसम्पाते प्रयच्छति ततस्ततोऽपि कल्पते ॥ ६०० ।। नपुंसकादिसप्तकविषयां xxx . xxx बालवत्सां च सर्वथा परिहरन्ति, एवं भुञ्जानाभर्जमानादलन्तीष्वपि भजना भावनीया, सा चैवं भुजाना अनुच्छिष्टा सती यावदद्यापि न कवलं मुखे प्रक्षिपति तावत्तद्धस्तारकल्पते, भजमानाऽपि यत्सचित्तं गोधूमादि कडिल्लके क्षिप्तं तदा भृष्टोचारितमन्यच्च नाद्यापि हस्तेन गृहाति, अत्रान्तरे यदि साधुरायातो भवति सा चेद्ददाति तर्हि कल्पते, तथा दलयन्ती सचित्तमुद्गादिना दल्यमानेन सह घरट्ट मुक्तवती, अत्रान्तरे च साधुरायातस्ततो यद्युत्तिष्ठति, अचेतनं वा भ्रष्टं मुद्गादिकं दलयति तर्हि तद्धस्ताकस्पते, कण्डयन्त्या कण्ड दुकारूढो डिलमसूतिकुष्ठी स चेद विशेषरूपाणि प्रसूतिः-सा भजना स्ततो बद्धादापानस्थितस्तदा कारणे सागरिकाभावे ददाति in Education ! For Private Personel Use Only Page #382 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीया. वचूर्युपेता परि० १० माणिक्यशेखरीयदीपिकाया अन्यभागः भी पिण्डनियुक्ति। नायोत्पाटितं मुसलं, न च तस्मिन् मुसले किमपि काञ्च्यां बीजं लग्नमस्ति, अत्रान्तरे च समायातः साधुस्ततो यदि साऽनपाये प्रदेशे मुसलं स्थापयित्वा भिक्षा ददाति, तर्हि कल्पते ॥ ६०१ ॥ पिंपत्यादिविषयां भजनामाह पीसंती निपिढे ॥ ६०२ ॥ उज्वट्टणिसंमत्तेण ॥ ६०३ ॥ पिंषन्ती निष्पिष्टे-पेषणपरिसमाप्ती, पासुकं वा पिंषन्ती यदि ददाति तर्हि तस्या हस्ताकल्पते, तथा घुसुलणे असंसक्तं दध्यादिमध्नत्याः कल्पते, तथा कर्त्तने या असङ्घचूर्ण-अखरण्टितहस्तं कृन्तति, इह काचित्सूत्रस्यातिशयेन श्वेतता पाद xxx xxx वेद्यते न सम्भवति, ततः प्रतिपक्षस्याभावे नियमाद् भवति तेष्वग्रहणमिति ।। ६०४॥ उक्तं दायकद्वारम् , अथोन्मिश्रद्वारमाह सचित्ते अचित्ते॥६०५ ।। इह यत् यत्रोन्मिश्यते ते द्वे अपि वस्तुनी त्रिधा, तद्यथा सचिनेऽचित्ते मिश्रे च, तत् उन्मिश्रकेमिश्रणे चतुर्भङ्गी, अत्र जातवैकवचनं, ततस्तिस्रश्चतुर्भन्यो भवन्तीति वेदितव्यं, तत्र प्रथमा सचित्तमिश्रपदाभ्यां, द्वितीया सचित्ताचित्तपदाभ्यां, तृतीया मिश्राचित्तपदाभ्यामिति । तत्र सचित्तमिश्रपदाभ्यामियं-सचित्ते सचित्तं मिश्रे सचित्तं सचित्ते मिश्रं मिश्रे मिश्रमिति, द्वितीया स्वियं-सचित्ते सचित्तं अचित्ते सचित्तं सचित्तेऽचित्तं अचित्तेऽचित्तमिति, तृतीयेयं मिश्रे मित्रं अचित्ते मिश्रं मिश्रेऽचित्तं अचित्ते अचित्तमिति, तत्र गाथापर्यन्ततुशब्दस्यानुक्तसमुच्चयार्थत्वादाद्यायां चतुर्भङ्गीकायां सकलायामपि प्रतिषेधः, शेषे तु चतुर्भजी द्वये प्रत्येकं आदीमेषु त्रिषु २ भङ्गेषु प्रतिषेधः चरमे तु भङ्गे भजना वक्ष्यमाणा ।। ६०५ ॥ अत्रैवातिदेशे xxx xxx साधुदानाह इतरददातव्यं, तच्च सचित्तं मिश्रं तुषादिवा, ते द्वे अपि द्रव्ये मिश्रयित्वा यद्ददाति, यथौदनं कुसनेन दध्या ॥१७१॥ ॥१७१॥ Jain Education in For Private Personal Use Only W withalibrary.org Page #383 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Inte दिना मिश्रयित्वा तद्रुन्मिश्रं, एवंविधमुन्मिश्रलक्षणमित्यर्थः, संहरणं तु यद्भाजतस्थमदेयं वस्तु तदन्यत्र क्वापि स्थगनिकादौ संहृत्य ददाति, ततोऽयमनयोर्भिदः ।। ६०७ ॥ द्वितीय ( तृतीय ) चतुर्भङ्गीसत्कचतुर्भङ्ग भजनामाह — तंपि य के सुकं० ।। ६०८ ।। यद्यचितेऽचित्तं मिश्रयति तत्रापि शुष्के शुष्कं मिश्रितमित्येवं भङ्गाश्चत्वारो यथा संहरणे, तद्यथा - शुष्के शुष्कमुन्मिश्रं, शुष्के आर्द्र, आर्द्रे शुष्कं आर्द्रे आद्रमिति । तत एकैकस्मिन् भङ्गे संहरणे इवाल्पबहुत्वे - स्तोके शुष्के स्तोकं शुकं, स्तोके शुष्के बहुकं शुष्कं बहुके शुष्के स्तोकं शुष्कं बहुके शुष्के बहुकं शुष्कमिति, एवं शुष्के आर्द्रमित्यादावपि भनि प्रत्येकं चतुर्भङ्गी भावनीया, सर्वसङ्ख्यया भङ्गाः षोडश, तथा ' तथैव ' संहरणे इवाऽऽचीर्णानाचीर्णे- करप्याकप्ये उन्मिश्रे ज्ञेये, तद्यथा - शुष्के शुष्कमित्यादीनां चतुर्भङ्गीनां प्र × × × ' दुगमाई सामने || ६११ ।। ' एवं द्विकादिसामान्ये ' म्रात्रादिद्विकादिसाधारणे देयवस्तुनि यद्येकस्य कस्यचिद्ददामीत्येवं भावः परिणमति, न शेषाणां तत् भावतोऽपरिणतं न भावापेक्षया देयतया परिणतमित्यर्थः । अथ साधारणानिसृष्टस्य दातृभावापरिणतस्य च कः परस्परं प्रतिविशेषः !, उच्यते, साधारणानिसृष्टं दायकपरोक्षत्वे, दातृभावापरिणतं तु दायकसमक्षत्वे इति ॥ ६११ ॥ संप्रति गृहीतृविषयं भावापरिणतमाह एगेण वावि सिं० ।। ६१२ ॥ एकेनापि तदपि भावतोऽपरिणतमितिकृत्वा साधूनामग्रायं सज्झिलगेत्यादि, तत्र दातृविषयं भावापरिणतं केनचिदप्रेतनेन पाश्चात्येन वा एषणीयमिति मनसि परिणमितं, न इतरेण द्वितीयेन, शङ्कितत्वात् कलहादिदोष सम्भवाच्च, सम्प्रति द्विविधस्यापि भावापरिणतस्य विषयमाह -- भ्रातृविषयं स्वामिविषयं च गृहीतुविषयं भावापरिणतं साधुविषयम् ॥ ६१२ ॥ परि० १० माणिक्य शेखरीय दीपिकाया अन्यभागः । Page #384 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीया वचूर्युपेता श्री पिण्डनिर्युक्तिः । ॥ १७२ ॥ Jain Education Intern उक्तमपरिणतद्वारं सम्प्रति लिप्तद्वारं वक्तव्यं, तत्र लिप्तं यत्र दध्यादिद्रव्यलेपो लगति, तच्च न ग्राह्यं यत आह घेवडं || ६१३ ॥ ××× xxx ( अनशन ) तपोरूपं क्षपणं कुर्वतः साधोश्चिरकालभावितपोनियमसंयमानां हानिः तस्मान्न यावज्जीवं क्षपणं कार्यं । पुनरपि परः प्राह-यदि सर्वकालं क्षपणं कर्तुमशक्तस्तर्हि ० [ करोतु । ] भूयः शिष्यः यद्येवं तर्हि षण्मासानुपोष्याचाम्लेन भुङ्कां, न क्षमस्तदैकाहादिहान्या तावद्भावयेद्यावच्चतुर्थं कृत्वाचाम्लेन पार्ययेत् एवमप्यक्षमो नित्यालेपाशी स्यात् ।। ६१४ ॥ इदं गाथयाह लितंति भाणि उणं ।। ६१५ ।। लित्तंति लिप्तं सदोषमिति भणिस्वाऽलेपं भोज्यं अर्हन्गण्यनुज्ञातमिति गुरूक्के शिष्यः, षण्मासानुपोष्याचाम्लेन भुङ्कां नैव क्षमस्त काहादिहान्या तावत्तोलयेद्यावच्चतुर्थं कृत्वाऽऽचाम्लेनातां, एवमपि न संस्तरणे अल्पलेपं लायात् ॥ ६१५ ॥ एतद्द्वाथार्थे गाथे । आयंबिलपारणए० ।। ६१६ ।। एवं एक्केकदिणं० ॥ ६१७ ॥ नित्यं क्षपणं कर्तुमक्षमः षन्मासान्निरन्तरं क्षपयित्वा पारणे आचाम्लं करोतु, षण्मासानुपवस्तुमक्षम एकदिनोनान् करोतु, एवं षट्मासादेकैकं दिनं त्यक्त्वा x x x x तिय सीयं समणाणं० ।। ६२० ।। त्रिकं वक्षमाणं शीतं श्रमणानां तेन प्रत्यहमाचामलकृतौ तकाद्यभावेऽनापा केनाजीर्णादिदोषाः स्युः, तदेव त्रयमुष्णं गृहिणां ततोऽम्लकाहारेऽपि न तेषां दोषा अजीर्णाद्याः स्युः, ततस्तेषां तथा यापयतामपि न कश्चिद्दोषः, साधूनां तूक्तनीत्या दोष:, तेन कारणेन तकादिग्रहणं साधूनामनुज्ञातं । इह प्रायो यतिना विकृतिपरिभोगपरित्यागेन सदैवात्मशरीरं यापनीयं, कदाचिदेव च शरीरस्यापाटवे संयमयोगवृद्धिनिमित्तं बलाधनाय विकृतिपरिभोगः, तथा चोक्तं सूत्रे " अभिक्खणं निविगई परि० १० माणिक्य शेखरीय दीपिकाया अन्य भागः । ॥ १७२ ॥ Page #385 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education गया य " इति निर्विकृतिपरिभोगे च तक्राद्येवोपयोगीति तकादिग्रहणं, 'कट्टरादिषु ' घृतवटिकोन्मिश्रतीमनादिषु प्रहणं भाज्यं - विकल्पनीयं, ग्लानत्वादिप्रयोजनोप्तत्तौ कार्य, न शेषकालमिति भावः × × × × Xxx आहारादीनां शीतत्वसम्भवरूपेणोपहन्यते अग्निः - जठरो वह्निः, तस्माच्चोपघाताद्दोषाः ' अजीर्णादयः - अजीर्णेबुभुक्षामान्द्यादयो जायन्ते ततस्तकादिग्रहणं साधूनामनुज्ञातं, तक्रादिनापि हि जाठरोऽग्निरुद्दीप्यते, तेषामपि तथा स्वभावत्वात् ॥ ६२२ ॥ सम्प्रत्यपानि द्रव्याणि दर्शयति ओयण मंडग सत्तुग० ॥ ६२३ ॥ ओदनः तन्दुलादिभक्तं मण्डकाः कणिक्कमयाः प्रतीता एव शक्तवः - यवक्षोदरूपा कुल्माषाः उडदाः, राजमाषाः सामान्यतश्चवलाः श्वेतचवलिका वा, कला-वृत्तचनकाः, सामान्येन वा चणकाः, वल्लाः तुवरी- आढकी मसूराद्विदलविशेषा मुद्गा माषाश्च प्रतीताः चकारादन्येऽप्येवंविधाः धान्यविशेषाः शुष्का अनार्द्रा - अलेपकृताः ।। ६२३ ॥ सम्प्रत्यरूपलेपान्येवं विषद्रव्याणि प्रदर्शयति उन्मञ्ज पिज कंगू० ॥ ६२४ ॥ उद्वेद्या वसुलप्रभृतिशाकभर्जिका पयाः- यूवागूः कंगू:- कोद्रवौदनः तर्क-तकाख्यं उल्लणं नौदनमाद्रकृत्योपयुज्यते सूपः- राद्धमुद्द्रदास्यादिः काञ्जिकं सौवीरं कथितं - तीमनादि, आदिशब्दादन्यस्यैवंविधस्य परिग्रहः, एतानि द्रव्याण्यरूपलेपानि । × × × XXX यथा सं० इस्तः सं० मात्रं सशेषं द्रव्यं १, संसृष्टहस्तमात्रे अशेषं द्रव्यं २, सं० ह० असं० मात्रं शेषं द्र० ३, सं० इ० असं० मा०, अशेषं द्र० ४, असं० इ० सं० मा० सशे० द्र० ५, असं० इ० सं० मा० अशे० द्र० ६, असं० ६० मात्रे सशे० परि० १० माणिक्य शेखरीय दीपिकाया अन्यभागः । Page #386 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयाचचूर्युपेता श्री पिण्डनिर्युक्तिः । ॥१७३॥ Jain Education Inter द्र० ७, असं० इ० मात्रे अशे० द्र० ८, एषु भङ्गेषु नियमाद् ओजस्सु विषमेषु ग्रहणं स्यात्, न समेषु, हस्तमात्राभ्यां संसृष्टाभ्यां पश्चात्कर्म्मणि सशेषद्रव्ये करूप्यं, यतः साध्वर्थ खरण्टितेऽपि परिवेषणार्थमधाविते कल्प्यं, अशेषद्रव्येषु नियमात्पश्चात्कर्म स्यात्, स्थ्यास्यादिघावनात् ॥ ६२६ ॥ उक्तं लिप्तद्वारं, अथ छर्दितद्वारं सच्चित्ते अचित्ते० ।। ६२७ ॥ छर्दितं त्रिधा, सचितमचित्तं मिश्रं च तदपि सचित्ताचित मिश्रेषु छर्द्यते, एवं तिस्रश्चतुर्भङ्गयः, जातावेकत्वं प्राग्वत् सचित [[चितयोः सचिचाचित्तयोः ] ( मिश्रयोः ) सचिता चित्तयोः २ मिश्राचित्तयोः ३, सचिते सचितं छर्दितं, मिश्र सचित्तं, सचिते मिश्र, मिश्र मिश्रमितिप्रथमा, सचित्ते सचितं अचिते सचितं सचितेऽचित्तं अचितेऽचितं इति द्वितीया, मिश्र मिश्र अचित्ते मिश्रं मिश्र अचितं अचित्ते अचित्तमिति तृतीया, सर्वसंख्यया द्वादशभङ्गाः, सर्वेषु च भङ्गेषु सचितः पृथिवीकायः x x x xxx विराध्यन्ते । तत्र पतिते मधुबिंदूदाहरणं बारचपुरं नाम नगरं तत्राभयासनो नाम राजा, तस्यामात्यो वारतकः, अन्यदा चात्वरितमचपलमसम्भ्रान्त मेषणासमितिसमेतो धर्मघोषनामा संयतो भिक्षामčस्तस्य गृहं प्राविक्षत् तद्भार्या च तस्मै भिक्षादानाय घृतखण्ड सम्मिश्रपायसभृतं स्थालमुत्पाटितवती, अन्नान्तरे च कथमपि ततः खण्डसम्मिश्रो घृतबिन्दुर्भूमौ निपततिः, ततो भगवान् धर्मघोषो मुक्तिपदैकनिहितमानसो जलधिरिव गम्भीरो मेरुरिव निष्प्रकम्पो वसुधेव सर्वसहः शंख इव रागादिभिररञ्जनो महासुभट इव कर्मरिपुविदारणनिबद्धकक्षो भगवदुपदिष्टमिक्षाग्रहणविधिविधानकृतोद्यमो भिक्षेयं छर्दितदोषदुष्टा तस्मान्न मे कल्पते इति परिभाव्य ततो निर्जगाम, वारसकेन चामात्येन मत्तवारणस्थितेन दृष्टो भगवान् निर्गच्छन्, चिन्तयति च स्वचेतसि किमनेन भगवता न गृह्यते स्म मे गृहे भिक्षेति, एवं च यावच्चिन्तयति परि० १० माणिक्य शेखरीय दीपिकाया अन्य भागः। ॥ १७३॥ Page #387 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education तावत्तं भूमौ निपतितं खण्डयुक्तं घृतबिन्दु मक्षिकाः समागत्याशिश्रियन्, तासां च भक्षणाय प्रधाविता गृहगोधिका, गृहगोधिकाया अपि वधाय प्रधावितः सरटः, सरटस्यापि च भक्षणाय प्रधावति स्म मार्जारी, तस्यापि च वधाय प्रधावितः प्राचूर्णकः × × × XXX तदुक्तमेवानुष्ठानं मयाऽनुष्ठातव्यमित्यादि विचिन्त्य संसारविमुखप्रज्ञो मुक्तिवनिता श्लेषसुखलंपटः सिंह इव गिरिकन्दराया निजप्रासादाद्विनिर्गत्य धर्मघोषस्य साधोरुपकण्ठं प्रत्रज्याममहीत्, स च महात्मा शरीरेऽपि निःस्पृहो यथोक्तभिक्षाग्रहणादिविधिसेवी संयभानुष्ठानपरायणः स्वाध्याय भावितान्तः करणो दीर्घकालं संयममनुपालय. जातप्रतनुकर्मा समुच्छ लितदुर्निर्वार्य वीर्य प्रसरः क्षेपकश्रेणिमारुह्य घाति कर्मचतुष्टयं समूलघातं इत्वा केवलज्ञानलक्ष्मी मासादिवान्, ततः कालक्रमेण सिद्ध इति ।। ६२८ ॥ उक्तमेषणा द्वारं, संप्रति संयोजनादीनि द्वाराणि वक्तव्यानि तानि च प्रासैषणारूपाणीति प्रथमतो प्रासैषणाया निक्षेपमाह नाठवणा दवि० || ६२९ ॥ प्र सैषणा चतुर्द्धा तद्यथा-नामप्रासैषणा स्थापनामा सैषणा द्रव्ये द्रव्यविषया प्रासैषणा भावेभावविषया प्रासैषणा, तत्र नामग्रासैषणा स्थापनाप्रासैषणा द्रव्यमासेषणाऽपि यावद्भव्यशरीररूपा महणैषणेव भावनीया, ज्ञशरीरभव्यशरीरव्यतिरिक्तायां तु प्रासैषणायां मत्स्योदाहरणं दृष्टान्तः, भावविषया पुनर्मासैषणा द्विघा, तद्यथा - आगमतो नोआगमतश्च तत्रागमतो ज्ञाता तत्र चोपयुक्तः, नोआगमतो द्विधा, तद्यथा प्रशस्ताऽवशस्ता च × × × XXX मांसगन्धमाघ्राय तद्भक्षणार्थं गलस्य समीपमुपागत्य यत्नतः पर्यन्ते २ सकलमपि मांस खादित्वा पुच्छेन च गलमाहत्य दूरतोsपचक्राम, मत्स्यवन्धी च गृहीतो गलेन मत्स्य इति विचिन्त्य गलमाकृष्टवान् पश्यति मत्स्य मांसपेसीरहितं गलं, भूयोऽपि गलं प्रचिक्षेप, तथैव च स मत्स्यो मांसं खादित्वा पुच्छेत च गलमाहत्य पलायितवान् एवं त्रीन् वारान् मत्स्यो मांसं खादितवान् न च परि०१० माणिक्य शेखरीय दीपिकाया अन्य भागः। Page #388 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमारत्नीयावचूर्युपेता ५ परि०१० माणिक्यशेखरीयदीपिकाया अन्यभागः। श्री. पिण्डनियुक्तिः। ॥१७४॥ गृहीतो मत्स्यबंधन ।। ६३०॥ अह मंसंमि पहीणे० ॥ ६३१ ॥ अथ मांसे प्रक्षीणे ध्यायन्तं मात्स्यिकं मत्स्यो भणति, यथा-किं त्वमेवं ध्यायसि-चिन्तयसि !, श्रुणु तावद्यथा-॥ ६३१ ॥ कदाचिदहं बलाकया गृहीतः, ततस्तया मुखे प्रक्षेपार्थमूर्ध्वमुत्क्षिप्तस्ततो मया चिन्तितं-यद्यहमृजुरेवास्या मुखे निपतिष्यामि तर्हि पतितोऽयं मुखे इति न मे प्राणकुशलं, तस्मात्तिर्यग्निपतमी त्येवं विचिन्त्य दक्षतया तथैव कृतं, परिभ्रष्टस्तस्या मुखात् , ततो मूयोऽपि तयोर्ध्वमुरिक्षप्तस्तथैव च द्वितीयमपि वारं मुखात्परिश्रष्टः, तृतीयवेलायां तु जाळे निपतितस्ततो दूरं पलायितःxxx xxx ॥ ६३३ ॥ एतादृशं पूर्वोक्तस्वरूपं मम सत्तं शठं-कुटिलं घट्टितस्य-धीवरादिकृतस्योपायस्य घट्टनं-चालकं, ततस्त्वमिच्छसि मां गलेन ग्रहीतुमित्यहो । ते-तव अहोकता-निर्लजतेति । तदेवमुक्तो द्रव्यप्रासैषणाया दृष्टान्तः, सम्पति भावप्रासैषणायामुपनयः क्रियते-मत्स्यस्थानीयः साधुर्मासस्थानीयं भक्तपानीयं मात्स्यिकस्थानीयो रागादिदोषणः, यथा न छलितो मत्स्य उपायशतेन तथा साधुरपि भक्तादिकमभ्यवहानात्मानमनुशास्तिप्रदानेन रक्षयेत् ।। ६३३ ॥ तामेवानुशास्ति प्रदर्शति- चायालीसेसण । ६३४ ॥ इह एषणाग्रहणेन एषणागता दोषा अभिधीयन्ते ततोऽयमर्थः-द्विचत्वारिंशत्साया ये एषणादोषा गवेषणाग्रहणैषणादौषास्तैः सङ्कटे-विषमे ग्रहणे-भक्तपानादीनामादाने हे जीव ! स्वं नेव छलितः, तत इदानी-सम्पति भुञ्जानो रागद्वेषाभ्यां यथा न छल्यसे तथा कर्तव्यम् ॥ ६३४ ॥ सम्पति तामेव भावग्रासैषणां प्रतिपादयति पासेसणा उ भावे. ॥ ६३५ ।। भावे-भावविषया प्रासैषणा द्विविधा, तद्यथा xxx ॥१७४॥ in Eden in Jww.jainelibrary.org Page #389 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परि०१० माणिक्यशेखरीयदीपिकाया अन्त्य भागः। xxx त्पादनायानुकूलद्रव्यैः सह संयोजनं यत्करोति बहिरेव भिक्षामटन् एषा बाह्या द्रव्यसंयोजना, अभ्यन्तरा पुनर्यद्वसतावागत्य भोजनवेलायां संयोजयति, तथा चाह-'अन्तस्तु' अभ्यन्तरा पुनः संयोजना त्रिधा-त्रिप्रकारा, तद्यथा-पात्रे लम्बने वदने च, नवरं 'लम्बनं ' कवलः, ततोऽस्यास्त्रिविधाया अपि विभाषा-व्याख्या कर्तव्या, सा चैवं यद् द्रव्यं यस्य द्रव्यस्य रसविशेषाधायि तत्तेन सह पात्रे रसगृझ्या संयोजयति, यथा सुकुमारिकादिकं खण्डादिना सह एषा पात्रेऽभ्यन्तरा संयोजना, यदा तु हस्तगतमेव कवलतयोत्पाटितं चूर्ण सुकुमारिकादि खंडादिना सह संयोजयति तदा कवलेऽभ्यंतरा संयोजना, पुनर्वदने कवलं प्रक्षिप्य ततः शालनकं प्रक्षिपति, यद्वा मण्डकादिकं पूर्व प्रक्षिप्य पश्चाद् गुडादिकं प्रक्षिपति, एषा वदनेऽभ्यन्तरा संयोजना, एषा च द्रव्यसंयोजना समस्ताऽप्यप्रशस्ता, यतोऽनयात्मानं रागद्वेषाभ्यां संयोजयति ।। ६३७ ।। तथा चामुमेव दोपं वक्तुकाम आह-- संयोजगाए दोसो० ॥ ६३८ ॥xxx xxx दीर्घतरं संसारं, तस्माच्च भवाद-दीर्धतरसंसाररूपात दुःखं असातं संयोजयति, ततो यो द्रव्यसंयोजनां करोति तस्येत्थमनन्तकालसंवेद्यो दुःखनिपात इति ।। ६३९ ।। सम्प्रत्यस्या एव द्रव्यसंयोजनाया अपवादमाह पत्तेय पउल मे०॥ ६४० ॥ प्रत्येक एकैकं साधुसङ्घाटकं प्रति प्रचुरलाभे विपुलघृतादिप्राप्तौ सत्यां यदि कथमपि भुक्ते सति चःसमुच्चये शेष-उद्धरितं भवति, ततस्तस्य शेषस्य निगमनार्थ दृष्टः-अनुज्ञातस्तीर्थकृदादिभिः खलु संयोगः, उद्धरितादिपरिष्ठापने स्निग्धस्वात् पश्चादपि कीटिकादिसत्यव्याघातसम्भवेन बृहत्तरप्रायश्चित्तसम्भवात् , तत उद्धरितघृतादिनिर्गमनार्थं खण्डाधैर्योजन न दोषाय, एष तावदयमपवादः संयोजनायाः । अथाऽन्योऽपि तस्य संयोगस्यायं वक्ष्यमाणः क्रमः परिपाटीरुपो भवति ।। ६४० ।। तमेवाह Jain Education Intern a l For Private & Personel Use Only Page #390 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा रत्नीयावचूर्यपेता श्री. पिण्डनिर्युक्तिः । ॥ १७५ ॥ Jain Education In रसहेउं पडिसिद्धो० ॥ ६४१ ॥ रसहेतो:-गृद्धया रसविशेषोत्पादनाय संयोगो निषिद्धोऽईदाद्यैः संयोगो ग्लानार्थं ग्लानभव्यत्वाय कल्पते, यद्वा यस्य अभक्तच्छन्दो न क्षुत्, यश्च सुखोचितो - राजपुत्रादिर्यश्चाद्याप्यभावितः - असञ्जातसम्यक्परिणामः शैक्षकस्तन्निमित्तं कल्पते ॥ ६४१ ॥ उक्तं संयोजनाद्वारं, अथाहारप्रमाण x x x x XXX कवलस्य कवलमश्नीयात्, अथवा शरीरमेव कुक्कुटी तन्मुखमण्डकं, तत्राक्षिकपोलभ्रुवां विकृतिमनापाद्य यः कबलो मुखे प्रविशति तत्प्रमाणं । अथवा कुक्कुटी-पक्षिणी तस्या अण्डकं प्रमाणं कवलस्य, भावकुक्कुटी येनाहारेण भक्तेन न न्यून नाप्याध्मातमुदरं भवति धृतिं च समुद्रइति ज्ञानदर्शनचारित्राणां च वृद्धिरुपजायते तावत्प्रमाण आहारो भावकुक्कुटी, अत्र भावस्य प्राधान्यविवक्षणाद् एष प्राक् द्रव्यकुक्कुट्यप्युक्त इह भावकुक्कुट्युक्तः, तस्य द्वात्रिंशत्तमो भागोऽण्डकं, तावान् कवलः ॥ ६४२ ।। एत्तो किणाह हीणं० || ६४३ ॥ एतस्मात् - द्वात्रिंशत्कवलप्रमाणादाहारात् किणाइ इति कियन्मात्रया - एकेन द्वाभ्यां त्रिभिर्वा कबलैः साधोर्दीनं हीनतरं यावदर्द्ध अर्द्धस्याप्यर्द्धमाहारं यात्रामात्राहारं धीराः - तीर्थकृदादयो ब्रुवते, न्यूनं च, एष यात्रामात्राहारः, एष एव चावमाहार इति भावः ॥ ६४३ || तदेवमुक्तमाहारप्रमाणं, सम्प्रति प्रमाणदोषानाहपगामं निगामं च० ॥ ६४४ ॥ यः प्रकामं निकामं प्रणीतं वा x x x x × × × यस्त्रीन् वारान् भुइके, त्रिभ्यो वा वारेभ्यः परवस्तद्भोजनमतिबहुशः, तदेव वारत्रयातीतमतिप्रमाणमुच्यते, अइपमाणेत्यवयवो व्याख्यातः, अत्रैव प्रकारान्तरेण व्याख्यानमाह-भुंक्ते यद्वा अतृप्यन् एष अप्पमाण इत्यस्य शब्दस्यार्थः अप्पमाणे इत्यत्र च नङ्प्रत्ययस्ताच्छील्यवित्रक्ष्या यद्वा प्राकृतलक्षणवशादिति ॥ ६४७ || सम्प्रति प्रमाणयुक्तहीनतरादिभोजने गुणमाह परि० १० माणिक्य शेखरीय दीपिकाया अन्त्य - भागः । ॥१७५॥ Page #391 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परि०१० माणिक्यशेखरीयदीपिकाया अन्त्य . भागः। हियाहारा मियाहारा० ॥ ६४८॥ हितं द्विधा-द्रव्यतो भावतश्च, तत्र द्रव्यतोऽविरुद्धानि द्रव्याणि, भावत एषणीयं, तदाहारयन्ति ये ते हिताहाराः, मितं-प्रमाणोपेतमाहारयन्तीति मिताहाराः, द्वात्रिंशकवलप्रमाणादप्यल्पमल्पतरं वा आहारयन्तीत्यल्पाहाराः, सर्वत्र वा बहुव्रीहिः, हित आहारो येषां ते हिताहारा इत्यादि, एवं विधा ये नरास्तान् वैद्या न चिकित्सन्ति, हितमितादिभोजनेन तेषां रोगस्यैवासम्भवात् , किन्त्वेवं मूलत एव रो xxx xxx कुर्यात् , तथा द्वौ भागी द्रवस्य-पानीयस्य, षष्ठं तु भागं वायुपविचरणार्थमूनं कुर्यात् ॥ ६५० ॥ इह कालापेक्षया तथा तथाऽऽहारस्य प्रमाणं भवति, कालश्च त्रिधा, तथा चाह सीओ उसिणो साहारणो० ॥६५१॥ त्रिधा कालो ज्ञातव्यः तद्यथा-शीत उष्णः साधारणश्च, तत्र तेषु कालेषु मध्ये साधारणे काले आहारे-आहारविषया इयं अनन्तरोक्ता मात्रा-प्रमाणम् । सीए दवस एगो० ॥ ६५२ ॥ शीते-अतिशयेन शीतकाले द्रवस्य पानीयस्यैको भागा कल्पनीयः, चत्वारः भक्ते-भक्तस्य, मध्यमे शीतकाले द्वौ भागौ पानीयस्य कल्पनीयौ त्रयो भागा भक्तस्य, वाशब्दो मध्यमशीतकालसंपूचनार्थः, तथा उष्णे-मध्यमोष्ण काले द्वौ भागो द्रवस्य-पानीयस्य कल्पनीयौ, शेषास्तु त्रयो भागा भक्तस्य, अत्युष्णे च काले त्रयो भागा द्रवस्य शेषौ द्वौ भागौ भक्तस्य, वा शब्दोऽत्रात्युष्णकालसंसूचनार्थः, सर्वत्र षष्ठो भागो वायुप्रविचारणार्थ मुक्तलो मोक्तव्यः ॥ ६५२ ॥ सम्प्रति भागानां x xxx x .xxx प्रमाणद्वारं, अथ साङ्गारसधूमद्वारमाहतं होइ सइंगालं० ॥ ६५५ ।। तद्भवति भोजनं साकारं यत्तद्गतविशिष्टगन्धरसास्वादवशतो जाततद्विषयमूर्छः सन्नहो मिष्टं । Jain Education meaniosa For Private & Personel Use Only Page #392 -------------------------------------------------------------------------- ________________ AN क्षमारस्नीया वचूर्युपेता श्रीपिण्ड नियुक्तिः। ।।१७६॥ अहो सुसम्भृतं ! अहो स्निग्धं! सुपकं सुरसमित्येवं प्रशंसन्नाहारयति, तत्पुनर्भवति भोजनं सधूमं यत्तद्गतविरूपरसगन्धास्वादतो जाततद्वि- परि०१० षयव्य लीकचित्तः सन् अहो । विरूपं कथितमपकमसंस्कृतमलवणं चेति निन्दन्नाहारयति, अयं चात्र भावार्थ:-इह द्विविधा अकाराः, | माणिक्य तद्यथा-द्रव्यतो भावतश्च, तत्र द्रव्यतः कृशानुदग्धाः खदिरादिवनस्पतिविशेषाः, भाव०माह शेखरीया अंगारत्तमपत्तं० ॥ ६५६॥ अङ्गारत्वमप्राप्त जलदिंधनं सधूममुच्यते, तदेवेन्धनं दग्धं धूमे गते सति मङ्गार इति, एवमिहापि दीपिकाया दाचरणेन्धनं रागाग्निना निर्दग्धं साझार इत्युच्यते, द्वेषाग्निना तु दह्यमानचरणेन्धनं सधूमं xxx अन्त्यxxx भगवच्छासनस्य ।। ६६० ॥ तदेवमुक्तं साकारं सधूमद्वारं, अधुना कारणद्वारमाह भागः। छहि कारणेहिं साहू ॥ ६६१॥ xxx षड्भिरेव च कारणवक्ष्यमाणस्वरूपैः भोजनाकरणनिबन्धनैः निज्जहितोऽवित्ति परित्यजन्नप्याचरति धर्म ॥ ६६१ ॥ तत्र यः षड्भिः कारणैराहारमाहारयति तानि निर्दिशति वेयण वेयावच्चे ॥ ६६२ ॥ इह पादैकदेशे पदसमुदायोपचरात् वेयणति क्षुद्वेदनोपशमनाय, तथाऽऽचार्यादीनां वैयावृत्त्यकरणाय, तथा ईर्यापथ संशोधनार्थ, तथा प्रेक्षादिसंयमनिमित्तं, तथा 'प्राणप्रत्ययार्थ' प्राणसन्धारणार्थ, षष्ठं पुनः कारणं धर्मचिन्तार्थ-धर्मचिन्ताऽभिवृद्ध्यर्थं भुञ्जीतेति क्रियासम्बन्धः ॥ ६६२ ।। एनामेव गाथां विवृण्वन्नाह नस्थि छुहाए सरिसा० ।। ६६३ ॥ नास्ति क्षुधा-बुभुक्षया सदृशी वेदना, उक्तं च-" पंथसमा नस्थि जरा दालिदसमो य परिभावो नस्थि । मरणसमं नस्थि भयं छुहासमा वेयणा नस्थि ॥१॥ तं नस्थि ज न बाहर तिलतुसमितंपि एत्थ कायस्स । सन्निझंxxx Ple ॥१७६॥ india akot For Private Personal Use Only Page #393 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Xxx सममैरन्यतमेन वा कारणेनाहारमाहारयन्नातिक्रामति धर्ममिति ॥ ६६४ ॥ सम्प्रति भोजनकारणप्रतिपादनार्थ सम्बन्ध गाथामाह अहवण कुञ्जाहारं० ।। ६६५ ।। अथवा एभिः स्थानैर्वक्ष्यमाणस्वरूपैः संयत आहारं न कुर्यात्, तत्र विचित्रा सूत्रगतिरिति षष्ठं शरीरव्यवच्छेद लक्षण कारणं व्याख्यानयति पच्छा इत्यादि, पश्चात् शिष्य निष्पादना दिसकलकर्त्तव्यतानन्तरं 'पश्चिमे काले ' पाश्चात्ये वयसि ' अध्यक्खमं ' ति संलेखनाकरणेनात्मानं क्षपयित्वा यावज्जीवानशन प्रत्याख्यान ० द्वितीये वा वयसि संलेखनामन्तरेण वा शरीरपरित्यागार्थमनश्नन् (तः ) प्रत्याख्यानकरणे जिनाज्ञाभङ्गमुपदर्शयति ॥ ६६५ ॥ सम्प्रत्यभोजनकारणानि निर्दिशति - आयंके उवसग्गे || ६६६ ॥ आतङ्के ज्वरादावुत्पन्ने सति न भुञ्जीत १, तथा ' उपसर्मे राजस्वजनादिकृते देवमनुष्यतियकृते वा सञ्जाते सति तितिक्षार्थं - उपसर्गसहनार्थ २, तथा ब्रह्मचर्यगुप्तिष्विति, अत्र षष्ठ्यर्थे सप्तमी, ततोऽयमर्थः - ब्रह्मचर्यगुप्तीनां परिपालनाय ३, तथा प्राणिदयार्थं ४, तपोहेतोः तपःकरणनिमित्तं ५ Xxxx X xx x टनं परिहरन् न भुञ्जीत ॥ ६६७ ॥ तत्रहेउ उत्थाई ॥ ६६८ ।। तपोहेतोः- तपःकरणनिमित्तं न भुञ्जीत तपश्चतुर्थादिकं चतुर्थादारभ्य तावद्भवति यावत्पमासप्रमाणं, परतो भगवद्वर्द्धमानस्वामितीर्थे तपसः प्रतिषेधात् षष्ठं पुनः प्रागुक्तेन विधिना चरमकाले शरीरव्यवच्छेदार्थं भवत्यनाद्दारः ॥ ६६८ ॥ तदेवमुक्तं कारणद्वारं, तदुक्तौ चोक्ता प्रासैषणा, तदभिधानाञ्च समाप्ता गवेषणाग्रहणैषणाप्रासैषणाभेदत्रिविधाप्येषणा । परि० १० माणिक्य शेखरीय दीपिकाया अन्त्य - भागः । Page #394 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षमा. रत्नीयावचूर्युप्रेता भी पिण्डनियुक्तिः। ॥१७७॥ सम्प्रत्यस्या एवैषणायाः सकलदोषसङ्कलनमाइ परि० १० सोलस उग्गमदोसा० ।। ६६९ ।। सुगमा, सर्वसङ्ख्यया सप्तचत्वारिंशदेषणादोषाः, एतान् विशोधयन् पिण्डं विशोधयति, INमाणिक्यपिण्डविशुद्धौ च चारित्रशुद्धिः, चारित्रशुद्धौ मुक्तिसम्प्राप्तिः, उक्तं च "एए विसोहयतो पिण्डं सोहेइ संसओ नस्थि । एए अविसोहिते शेखरीय. चरित्तमेयं वियाणाहि ॥ १ ॥ समणत्तणस्स सारो भिक्खायरिया जिणेहिं पन्नता । एत्थ परितप्पमाणं तं जाणसु मंदसंवेगं ॥२॥ नाण- दीपिकाया चरणस्स मूलं भिक्खायरिया जिणेहि पन्नता । एत्थ उ उज्जममाणं तं जाणमु तिब संवेगं ॥ ३ ॥ पिण्डं असोहेयंतो xxxxx अन्त्य ___ जा जयमाणस्स भवे. ॥ ६७१ ॥ यतमानस्य-सूत्रोक्तविधिप्तमग्रस्य सूत्रोक्तविधिपरिपालनपूर्णस्य अध्यात्मविशोधियुक्तस्य, मागः। रागद्वेषाभ्यां रहितस्येति भावः, या भवेत् विराधना-अपवादप्रत्यया सा भवति निर्जरा फला, इयमत्र भावना-कृतयोगिनो गीतार्थस्य कारणवसेन यतनयाऽपवादमासेवमानस्य या विराधना सा सिद्धिफला भवतीति तदेवं निक्षिप्तं पिण्डपदमेषणापदं च, तन्निक्षेपकरणाचामिहितो नामनिक्षेपः, तदभिधानात् समाप्ता-परिपूर्णा पिण्ड नियुक्तिरिति ॥ ६७१ ॥ __ येषा पिण्डनियुक्तियुक्तिरम्या विनिर्मिता । द्वादशांगविदे तस्मै, नमः श्रीभद्रबाहवे ॥ १॥ विषमा पिण्डनियुक्तिर्विवृता येन सूरिणा । तस्मै श्रीमलयगिरिगुरवे प्रणमाम्यहं ॥२॥ शिक्षया तस्य संक्षिप्य विषमार्थविवेचनं । चक्रे श्रीपिण्डनियुक्तः सरिमाणिक्यशेखरः ॥ ३ ॥ श्रीअंचलगच्छनाथाः, श्रीमेरुतुंगसूरयः । शिष्यस्तेषामिमां तेने, संशयध्वान्तदीपिका ॥ ४ ॥ HAMAKAREERI. EEEEXXXIIEIKHAKEEKER ॥ इति श्रीमेरुतुङ्गामरिशिष्यश्रीमाणिक्यशेखरसूरिविनिर्मिता श्रीपिण्डनियुक्तिदीपिका ॥ ixce- LAXMAAHEE.XXKOLARAKA A LEExam-DIARKEEKDAM ॥१७७॥ Jain Education Intel For Private & Personel Use Only शु w w.jainelibrary.org Page #395 -------------------------------------------------------------------------- ________________ For Private & Personel Use Only Page #396 -------------------------------------------------------------------------- ________________ इति श्रीवीरगणिवृत्ति-माणिक्यशेखरदीपिकायोरान्द्यन्त्यभागभूषिता श्रीक्षमारनीयावचूर्युपेता श्रीपिण्डनियुक्तिः समाप्ता॥ mere श्रष्ठि-देवचंद-लालभाई-जैनपुस्तकोद्धारे ग्रन्थाङ्क: 105 / / 35 -FFER ' E For Private Personel Use Only