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वृत्तिने जोड़ने में आरची छे. जुओ परि० १० पृ. १७७ प्र० लो० २. एटलुं ज नहि पण मने मेळवतां एवं देखाय छे के दीपिकानो घणो ज मोटो भाग मलयगिरि महाराजनी वृत्तिना अक्ष अक्षर ज छे. ते बात चोक्कस छे के दीपिकाकारे कईक कईक संक्षेप कर्यो छे.
परिशिष्ठ १०मां आपेलो दीपिकानो आदिअंतभाग छे. ते पूनानी प्रत परथी उतरविवामां आव्यो छे. ते प्रत त्रिपाठी के पंचपाठीवाली होवी जोइए. कारण के तेनी प्रेसकोपी मूळ गाथाओना गुच्छक साथेनी छे. मारा हाथमां आ प्रत आवेली नथी, पण प्रेसकोपी परथी ए जोई शकाय तेवुं छे. आ प्रत पडिमात्रानी होय तेवो संभव छे. ए प्रत कोई संयोगोमां दरेक पाने तुटेली या घसाइ गयेली छे. जेथी जगो जगो पर चालु दीपिकामां त्रुटकता थई जाय छे आने जणाववा माटे अमे त्यां xx eg चिह्न आप्युं छे.
कोई शंका करे के आदि ने अंतभाग आपको अने तेमां वळी आवुं तुटकपणुं आपकुं, ते कांइ योग्य छे ? आवुं कहेनारने जणाववुं पडे के जे अवचूरि छपावीए छीए ते पंचांगीना अमुद्रित साहित्यने मुद्रित कराववाना उद्देशथी छे, एटले आ दीपिका भंडारोमां पडेली अमुद्रित हती अने ते आ स्वरूपनी छे, ते जणाववा माटे आ अमारो प्रयत्न छे. कोई भाग्यशाळी परिशिष्ट ९ अने १० मां आवेली वृत्ति अने दीपिकाने संपूर्ण छपाववानुं करीने ज्ञान उपासनानो लाभ लेशे, एवी मारी आशा खोटी न गणाय जे एक वृत्तिनो प्रोफेसर वेनलकरमा जे निर्देश करवामां आवे छे, के जेनुं प्रमाण ४००० श्लोक गणाववामां आवे छे अने जेमां जेसलमेर, पाटण, सुरतनो निर्देश करवामां आवे छे. ते खरेखर ४००० श्लोकप्रमाण नहि परंतु ३००० लोकना प्रमाणनी अने क्षमारत्नजीवाळी अवचूरि ज होवी जोईए. कारण के जेसलमेरनी प्रत परथी जे प्रत उतरावीने सुरत मूकवामां
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