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क्षमा
संपादकीय निवेदन ।
रत्नीया
वर्यपेता
श्री. पिण्डनियुक्तिः।
आवी छे, ते क्षमारत्नजीवाळी ज छे. तेमज पाटणनी प्रत परथी जे प्रेसकोपी थई छे, के जेनो उपयोग अमे आ अवचूरि छपाववामां कयों छे. ते पण तेमनी ज छे. आथी ए त्रणे स्थळनी प्रतो जे अन्य वृत्तिना नामे निर्देश करी छे, ते भिन्न न होतां क्षमारत्नजीवाळी अवचूरि केम न होय १
शंका:-आचार्य श्रीहरिभद्रमूरिए ' स्थापना' द्वार सुधीनी शिष्यहिता नामनी टीका रची, तेने वीराचार्ये संपूर्ण करी, एम वीरगणि पोतानी टीकानी शरुआतनी ६-७-८' गाथाथी जणावे छे. ज्यारे पोते एटले ईश्वर गणिना शिष्य वीरगणिए
७६११' प्रमाण अहिं परिशिष्ट ९ मा आयंत भागमा आपेलो छे. एवी वृत्ति रची छे. तेओ उपली वृत्तिने अनुसरिने आ रचुं छु, एम टीकानी १०'मी गाथामां बोल्या छे. बळी टीकानी पूर्णाहुति तथा प्रशस्तिनी समाप्ति करतां शिष्यहिता एवं नाम बे स्थानमा बोले छे. तो शिष्यहितावृत्ति पू. हरिभद्रसूरिनी के आ वीरगणिनी ? विज्ञा एवा प्रमाणम् .
प्रकाशकीय निवेदनमा परिशिष्ट ९ वाळी टीकाने ३१०० श्लोकवाळी शिष्यहितानो आद्यतभाग छे, एम प्रकाशके जणाव्यु छे. पण खरी रीते आ ७६११ श्लोक प्रमाणनी वीरगणिनी वृत्तिनो छे.
सुधारो:-परिशिष्ट ९ ना हेडींगमा वीराचार्यना स्थाने वीरगणि एम पांचवू.
फंड तरफथी आ अवचुरी छपाववानुं नक्की बया पछी सं. २०१०ना हींगनघाटमां मुनिराज श्रीक्षेमकरसागरजीने आनी प्रेसकोपी सोपवामां आवी तेथी में तेमन तेमणे प्रेसकोपीने शुद्ध करवानें कार्य कयु. जे वात पूर्व जणावी छे. तेने शुद्ध करी सं. २०११ मां मुनिमहाराज श्रीगुणसागरजी महाराजने सोंपी अने तेमणे फंडने मुंबाइ रवाना करी. तेने पछी संस्थाए |
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