SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 13
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ करती वखते अवचूरिकारे एक गाथा जणावी छे के-" गंभीर अर्थवाळी एवी मोटी वृत्तिने जोईने में आ प्रगट अर्थवाळी बनावी ( अवचुरी पृष्ठ १२० ) अर्थात् अवचुरीकारे मोटी वृत्तिने अनुसरीने आ अवचुरी रची छे. श्रीवीरगणिये शिष्यहिता नामनी वृत्ति रची छे ते वृत्तिने अनुसरीने आ अवचुरी रचाइ होय एवं कंइ पण अनुमान थाय तेवू नथी. वीरगणि जे. पद्धतिए टीका रचे छे, ते पद्धति मलयगिरि महाराजनी वृत्तिथी तद्दन निराळी छे. परंतु आ अवचुरीकारे जे अवचुरी रची छे, ते मलयगिरि महाराजनी वृत्तिने अनुसरे छे. जे जे स्थळे जोवानी जरुर पडे छे, ते ते स्थळे मलयगिरि महाराजनी वृत्तिने आश्रीने सुधारो करी शकाय छे. सुज्ञजन आ अवचुरिने मलयगिरि महाराजनी वृत्ति साथे जो मेळवशे तो एवां केटलांये स्थळो मळशे के जे मलयगिरि महाराजनी वृत्तिने अक्षरे अक्षर मळतां आवशे, एटले " आ वृत्ति मोटी वृत्तिने अनुसरीने करी छे" एम जणाववाथी मलयगिरि महाराजनी वृत्तिने अनुसरीने करी छे एमज मानी शकाय. कर्ताः-आ अवचुरीना का विधिपक्षगच्छना श्रीजयकीर्तिमरिना शिष्य श्रीक्षमारत्नजी महाराज छे. तेमणे आ अवचूरि क्यारे रची ते विषे खुलासो अवचूरिमा नथी. तेनुं ग्रंथाक पाटणनी जे प्रत आधारे प्रेसकोपी थइ छे तेना आधारे ३००१ नुं छे. ज्यारे जेसलमेरनी प्रतना आधारे ग्रन्थान २८३२ छे. आनी प्रेस कोपी सं. १९८३ मां गुरुदेवश्रीए पाटणमां करावी हती के जेना आधारे आ अवचुरी छपाववामां आवी छे. आ प्रेसकोपी अमारे हींगनघाटमा सं. २०१० मां शुद्ध करवी पडी हती. आनी प्रेसकोपी अने आचार्यश्रीविजयकमळसूरीश्वरप्राचीन हस्तलिखित-पुस्तकोद्धारक तरफथी जेसलमेरनी प्रत उपरथी उतरावेली आ अवचुरीनी प्रत श्रीजैनानंदपुस्तकालय( सुरत )मां Jain Education Inter For Private & Personel Use Only Twww.jainelibrary.org
SR No.600106
Book TitlePind Niryukti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManekyashekharsuri, Kanchanvijay
PublisherDevchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
Publication Year1968
Total Pages396
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_pindniryukti
File Size17 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy