________________
श्वमारत्नीया
.
७
वचूर्युपेत
श्री
४७९
पिण्डनियुक्ति
गाथायाः प्रतिकम् इंधनधूमेगंधे० इक्को उ असम्भावे इक्खागवंस भरहो इट्टगछणमि परि० इट्ठगपगाईणं इय अविहीपरिहरणा इयरोऽवि य पंतावे इरियं नऽवि सोहेई उउबद्ध धुवण बाउस उक्कोस मज्झिम उक्खि निक्खप्पड़ उक्खेवे निक्खिवे उम्गम उम्गोवण
॥१२२॥
गाथाङ्क: पत्रम् | गाथायाः प्रतिकम् २५८ ५१ | उम्गमकोडिअवयव
उम्गमकोडीअवयव ८७ / उग्गमदोसा सोलस ४६६ ८५ उम्गाइ कुलेसुवि
उच्चचाए दाणं
उच्छुक्खीराइयं ३२६ ६१ | उड्डाह कायपडणं ६६४ ११८ | उड्डमहे तिरियपि य
२४ ६ | उणहिय दुब्बलं वा ३४६ ६५ | उद्देसियं समुद्देसियं ३४० ६४ | उप्पायणाए दोसे ५७० १०२ | उब्मट्ठपरिन्नायं ८५ १८ | उन्भिज पिज्ज कंगु
गाथा: पत्रम् । गाथायाः प्रतिकम् २४७ ४९ उब्भिन्ने छक्काया
उभयाइरित्तमहवा
उभयेऽवि य पच्छन्ना ४४१ ८२ | उवओगमि य लाभं ३२२ ६१ | उवसयबाहिं ठाणं २८० ५४ उबट्टिया पयोर्स ५८३ १०५ उबट्ठणिऽसंसत्तेण ३६३ ६८ उसिणस्स छड्डणे ३२७ ६२ | उसिणोदगंपि घेप्पइ २२९ ४६ उसिणोदगमणुवत्ते
उसुआइएहिं मंडेहि २८१ ५४ ऊसव मंडणवम्गा ६२४ ११२ | एए उ अणाएसा
गायाः पत्रम् | गाथानाम३४८ ६५ कारादि
क्रमः। ४३२ ११६ २४
३२ ७९ ४२० ६०३ १०८ ६३८ ११३ ५५३ १००
४२४ ७८ २२५ २० ५
- ॥१२२॥
For Private & Personal use only
Jain Education Interface
www.jainelibrary.org