Book Title: Jaipur Khaniya Tattvacharcha Aur Uski Samksha Part 1
Author(s): Vanshidhar Vyakaranacharya, Darbarilal Kothiya
Publisher: Lakshmibai Parmarthik Fund Bina MP
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शंका १ और उसका समाधान
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प्रवृत्त करती रहती है क्या यह सहयोगका अर्थ है ? किन्तु अपर पक्ष को मह सणा भी असंगत है, क्योंकि आगममें विशिष्ट पर्यायगुक्त द्रव्यको ही कार्यकारी माना गया है ( देखो अष्टसहस्री पृ० १५०, स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा गाथा २३०, श्लोकवार्तिक पृ० ६९ तथा प्रमेयकमलमार्तण्ड पृ० २०० आदि)। श्या क्षेत्रप्रत्यासत्ति या भावप्रत्यासत्तिके होने पर उपादानमें कार्य होता है यह सहयोगका अर्थ है ? किन्तु सहयोगका पह अर्थ करना भी ठीक नहीं है, क्योंकि देशाप्रत्यासत्ति और भावप्रत्मासत्तिक होनेपर अन्य द्रव्य नियमसे अन्यके कार्यको उत्पन्न करता है ऐसा कोई नियम नहीं है ( देखो श्लोकवार्तिक पृ० १५१) ! इस प्रकार सहयोगका अर्थ उक्त प्रकारसे करना तो बनता ही नहीं । उक्त विकल्पोंके आधारपर जितनी भी तर्कणाएँ की जाती है वे सब असत् ठहरती हैं। अब रही कालप्रत्यासत्ति. सो यदि अपर पक्ष बाह्य सामग्री उपादानके कार्य में सहयोग करती है इसका अर्थ कालप्रत्यासत्तिरूप करता है तो उसके द्वारा सहयोगका यह अर्थ किया जाना आगम, तर्क और अनुभवसम्मत है, क्योंकि प्रकृतमें 'कालप्रत्यासत्ति' पद जहाँ कालको विवक्षित पर्यायको सूचित करता है वहाँ वह विवक्षित पर्याययुक्त बाह्याभ्यन्तर सामग्रीको भी सूचित करता है । प्रत्येक समवमें प्रत्येक द्रव्यको अपना कार्य करनेके लिए ऐसा योग निवमसे मिलता है और उसके मिलनेपर प्रत्येक समयमे प्रतिनियत कार्यकी उत्पत्ति भी होती है, ऐसा ही द्रव्यस्वभाव है। उसमें किसीका हस्तक्षेप करना सम्भव नहीं। स्पष्ट है कि प्रकृतमें निमित्त के सहयोगको चर्चा करके अपर पक्षने स्वप्रत्यय और स्व-परप्रत्यय परिणमनोंके विषयमें जो कुछ भी लिखा है वह बागम, तर्क और अनुभवपूर्ण न होने से तत्त्वमीमांसामें ग्राह्य नहीं माना जा सकता ।
___ इस प्रकार पूर्वोक्त विवेचन के आधारपर हमारा यह लिखना सर्वथा युक्तियुक्त है कि 'निमित्त कारणोंमें पूर्वोक्त दो भेद होने पर भी उनकी निमित्तता प्रत्येक द्रव्यफे कार्य के प्रति समान है।' यही जैनदर्शनका आशय है । अनादिकाससे जन संस्कृति इसी आधारपर जीवित चली आ रही है और अनन्त काल तक एकमात्र इसी आधारपर जीवित रहेगी। इससे अपर पक्ष यह अच्छी तरहसे जान सकता है कि जैन संस्कृतिक विरुद्ध अपर पक्षको ही मान्यता है, हमारी नहीं । विचारकर देखा जाय तो हरिवंशपुराण सर्ग ५८ का यह कथन तो जैन संस्कृतिका प्राण है
स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते ।
स्वयं भ्राम्यति संसारे स्वयं तस्माद्विमुच्यते ॥१२॥ यह आत्मा स्वयं अपना कार्य करता है, स्वयं उसके फलको भोगता है, स्वयं ही संसार में परिभ्रमण करता है और स्वयं ही उसमें मुक्त होता है ॥१२॥
__ मालूम नहीं अपर पक्ष पराश्रित जीवनका समर्थनकर किस उलझनमें पड़ा हुआ है, इसे वह जाने । वैज्ञानिकोंकी भौतिक खोजसे हम भलीभांति परिचित हैं । उससे तो यही सिद्ध होता है कि किस विशिष्ट पर्याय युक्त बाह्याभ्यन्तर सामग्रीके सद्भावमें क्या कार्य होता है। हमें मालूम हुआ है कि जापानमें दो नगरोंपर अणुबमका विस्फोट होनेपर जहाँ असंख्य प्राणी कालकलित हुए वहाँ बहुतसे क्षुद्र जन्तु रेंगते हुए भी पाये गये । क्या इस उदाहरणसे उपादानके स्वकार्यकर्तृत्वकी प्रसिद्धि नहीं होती है, अपि तु अवश्य होती है ।
मागे अपर पक्षने हमारे द्वारा उल्लिखित स्वामी समन्तभद्रकी 'बाह्येतरोपाधि' इत्यादि कारिकाको पर्चा करते हुए हमारी मान्यताके रूपमें लिखा है कि सम्भवतः हम यह मानते हैं कि 'उपादान स्वयं कार्योत्पत्ति के समय अपने अनुकूल निमित्तोंको एकत्रित कर लेता है। किन्तु अपर पक्षने हमारे किस कमनके