Book Title: Savivaran Gyanarnav Prakaranam Gyanbindu Prakaran
Author(s): Yashovijay Gani
Publisher: Jain Granth Prakashak Sabha
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ બેટાનિવાસ સલાત • ફુલચંદભાઇ છગનલાલ તરફથી પોતાના સુપુત્રી હીરાબેનના દીક્ષા મહંત્સવ નિમિત્તે ભેટ સંવત ૨૦૦૩ કાર્તિક વવિદ્ ૧૩ ગુરૂવાર श्री जैन ग्रन्थप्रकाश कस भाग्रन्थाङ्कौ ५७-५८ आसन्नोपकारिणे श्रीमहावीरस्थामिने नमः ॥ ॐ अहे नमः ॥ सकललन्धिसम्धीगौतमस्वामिने नमः ॥ सर्वतन्त्र स्वतन्त्र - शासन सम्राट् - रिचक्र चक्रपति - जगद्गुरु-तपागच्छाधिपति प्रौढप्रभावशालि प्रभूततीर्थोद्वारक- जगदुपकृतिविहितानेकप्रन्यसन्दर्भ- भट्टारकाचार्यमहाराजाधिराज श्रीविजयनेभिसूरीश्वरसद्गुरुभ्यो नमः ॥ निजप्रतिभाच दातसंस्मारितातीत पूर्वश्रुत के ब लिभगषद् न्यायविशारद - न्यायाचार्य कू चलसरस्वती - पूर्वधरासन्न काल पति-पतु चत्वारिंशदुत्तरचतुर्दशशतसंख्यभवविरहाङ्कमन्यप्रासादसूत्रधार श्रीहरिभद्रसूरिपुङ्गव लघुबान्धवप्रभृति विशबिरुदावलीविभूषित - तार्किकशिरोरत्नमहामहोपाध्याय - श्रीयशेो विजयगणिप्रणीते ॥ सविवरणं श्रीज्ञानार्णवप्रकरणं - श्री ज्ञानबिन्दुप्रकरणञ्च ॥ विवरणं श्रीज्ञानप्रकरणमिदं दुष्प्रापखण्डिताबस्यै हपुस्तकन पत्र प्रकाशतामानीतं, ते चेमे प्रकरणे राजनगरस्थ प्रीजैन ग्रन्थप्रकाकसभा कार्यवाहक श्रेष्ठि-ईश्वरदासमूलचन्द्रेण भावनगरस्थ भीआनन्दनाम्नि मुद्रणालये तदधिपति मेष्ठिगुलाबचन्द्र देवचन्द्रद्वारा मुयित्वा प्रकाशिते ॥ अक्षय तृतीया विक्रम सं. २००१ बीर सं. २४७२ प्रतयः ७५० सन् १९४६ ७ ॥ मूहवं रूप्यकपश्च रुम् ॥ मुल Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ " गाथानुक्रमणिकाना पत्र पछीनुं अनुसंधान छे. " पंक्ति गाथादिपाद गाथांक पत्र पंक्ति गंतुमसंखेज्जाओ २ ३ ४ १६ १६ २७ गावादिपाद गावांक पत्र अणुससमयमणंतरियं ३६८ ७९ गहणावेक्खाए तओ १६९७९ निसिरिज्जइ नागहियं ३७० ७९ गहणं मोक्खो भासासमयं ३७१७९ गहणं मोक्खो भासागहण ३७२७९ गहणनि सम्गपयत्ता ३७३ ७९ तिथिहम्मि सरीरम्मि ३७४ ८० ओरालियवेउब्विय ३७५ ८० सच्चा हिया सतामिह ३७६ ८० अर्णाहगया जातीसु बि३७७ ८० कहहिं समयेहिं लोगो ३७८ ८० उहिं समयेहिं लोगो ३७९ ८० कोई मंदपयत्तो ३८० ८१ १. ६ १२ १३ १९ २० २ ३८१ ८१ भिन्नाई सहुमाये ३८२ ८१ जणसमुग्धायगइए ३८३ ८१ पठमसमये चि यजओ ३८४ ८१ मंथंतरेहि तइये ३८१ ८१ दिसिर्वाट्ठियस्स पढमो ३८६८१ होइ असंखेज्जइभे १ ४ १३ १४ ११ २१ ३ ३९० ८२ कत्थई सम्ह ३८८ ८३ समयमज्झगणे ३८७ ८३ समयविग्ग हे स ि३८९ ८३ आपूरियम्मि लोगे ३९१ ८८ भासासमसेटोओ ३११८३२१ ३९२ ८४ न समुग्वायगइये ८ ११ १३ १३ नावादिपाद जइणेण पराषाओ बंध विवीससाए एगदिसमाइसमये ईहा अपोह वीमंसा ३९६८९ होइ अपोहोडवाओं ३९७८६ मइपन्नाभिणिबोहिय ३९८ ८९२ १ सव् वाभिणिबोहिय ३९९ ८९ उग्गहणमोक्षेत्तिय ४०० ८६ अवगमणमवाओ त्तिय ४०१ ८६ तं पुण चउन्विहं नेय ४०२८६ आएसोत्ति पगारो खेत्तं लोगालोगं आएसोत्ति व सुतं गाथांक पत्र पंक्ति * * * * * * * * * * * ३९३ ८४ ११ ३९४ ८४ १२ ३९५ ८४ २७ ६ : ८ ४०३ ८६ २७ ४०४ ८६ २८ ४०५८७ १ Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ FORBA ॥ सविवरण श्रीज्ञानार्णव तथा ज्ञानबिन्दु अंगे प्रकाशकीय निवेदन ।। RRENERATORSHAIR ज्ञानपीयूषपिपासु सहृदय सौजन्यशालि विद्वानोना करकमलमां प्राप्त थतो एक जैन ज्ञानकोषोना भूगर्भमा छुपाइ रहेल अणमोल रत्न तुल्य स्वोपज्ञ विवरण समेत श्री ज्ञानार्णव नामनो आ प्रकरणग्रंथ प्रतिभाप्रभावथी पूर्व श्रुत. ल केवली भगवंतोनी स्मृति करावनार अनेक लक्ष श्लोकोप्रमाण ग्रंथोना प्रणेता, भवविरहाकविभूषित चौदसो चुम्मालीश ग्रंथ. | प्रासादोना सूत्रधार भगवान् श्रीहरिभद्रसूरिजीना लघु बांधव तरीके ख्याति पामेला, न्यायविशारद, न्यायाचार्य, कूर्चालसरस्वती विरुदधारक महोपाध्याय श्री यशोविजयजी महाराजे रचलो छे. ते निर्विवादनिर्णीत सिद्ध वस्तु आग्रन्थने मंगलपच "ऐन्दवीं तां कलां स्मृत्वा, धीमाच्यायविशारदः । ज्ञानार्णवसुधास्नानपवित्राः कुरुते गिरः ॥१॥" तथा प्रथम तरंगना अन्तिम प्रशस्तिपद्य 'प्रौढिं ये विवुधेषु जीतविजयप्राज्ञाः परामैयरु-स्वत्सातीर्थ्यभृतो नयादिविजयप्राज्ञाः श्रयन्ति श्रियम् ॥ तेषां न्यायविशारदेन शिशुना ज्ञानार्णवे निर्मिते, पूर्णो माष्यवचोमृतैरतितरामायस्तरङ्गोऽभवत् ॥ २॥" तथा तेओश्रीना पोताना ज रचेला शाखवार्तासमुच्चयबृत्ति,स्याद्वादकल्पलता, न्यायालोक, ज्ञानविन्दु विगरे अनेक ग्रन्थोमा "अधिक मत्कृतज्ञानार्णवादवसेयं" इत्यादि वाक्यो पूर्ण साक्षि आपे छे. वळी प्रायः एकाद ग्रंथ अपवादरूप बाद करी तेओश्रीना सर्व ग्रंथोनी B ASABHA ADHA Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशकीय * है अन ते मुद्रित R प्रकाशोनी जैम विगेरे नामोथी पने अनुसरतुं GURUMEROLAGE प्रारंभ ऐंकार पद(सरस्वती बीजक)थी थाय छे तेम आ ग्रंथमा देखातुं होवाथी आ ग्रन्थ तेओश्रीनो ज छे ते निःसंदेह छे. निवेदनम् ॥ __ अर्णव- समुद्र जेम घणा तरंगोथी विभूषित होय छे तेम आ ज्ञानार्णवमा पण ग्रंथकार भगवंते अनेक तरंगोनी रचना करी छे, जो के आज ज्ञानार्णव नामनो एक ग्रंथ दिगम्बरीय साहित्यमा शुभचंद्राचार्य रचेलो विद्यमान छे अने ते मुद्रित पण RAMMARATHI छे, परंतु तेमां कलिकालसर्वज्ञ भगवंत श्रीहेमचंद्रसूरिजीनिर्मित योगशास्त्रना प्रकाशोनी जेम मुख्यतया योगस्वरूप विगेरेनुं निरूपण होवाथी तेने योगार्णव-योगप्रदीप-ध्यानशास्त्र विगेरे नामोथी ओळखाववामां आव्यो छे, ज्यारे आ श्री ज्ञानार्णव प्रकरण- ग्रन्थान्तर्गत अभिधेयने अनुसरतुंज निःशंक यथार्थ नाम राखवामां आव्युं छे. प्रस्तुत ग्रन्थकारे एक ज्ञानबिन्दु नामर्नु | प्रकरण पण रच्यु छे, जे आ साथे संयुक्त छ तेमा सामान्यतः चार ज्ञानोनुं निरूपण करी मुख्यत्वे केवळज्ञान केवळदर्शनना है विषयमा सम्मति गाथाओना अनुसारे अभेदपक्षनुं समर्थन कर्या बाद नयभेदथी विचारो आपतां शासनप्रभावक धुरंधर श्री सिद्धसेन दिवाकरजी, श्रीमल्लबादिजी, श्रीजिनभद्रगणिक्षमाश्रमणजी ए त्रणेय प्रभावक आचार्यभगवंतोना विचारोनो समन्वय कों छे. आ ज्ञानार्णवमा पांचेय ज्ञानोनो यथार्थ तवरूप केवळ अमृत प्रवाहज भरेलो छे. आज्ञानार्णव ग्रंथर्नु अगाध गांभीर्य माहात्म्य यथार्थ वर्णवq ते विशाल अटवीनो पगथी चाली पार लेवा इच्छता पांगळा माणसनी जम अमो पामरनी बुद्धिने अगोचर छ. आ ग्रंथर्नु अगाध अर्थ गांभीर्य स्वरूप जाणी पोतेज स्वोपज्ञ विवरण रच्युं छे. परम खेदनो विषय तो एटलोज के आ ग्रंथ वचमा वचमां तेमज अंतभागमा त्रुटितरूपे उपलब्ध थयो छे. साथे परम हर्ष स्थान ए छे के-हजु पण भव्यजीवोना परमभाग्योदये शासनस्तंभ समा पूर्वेना महापुरुषोए रचेला जगदुपकारक शासन- HI REARSHRES Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रभावक अबाधित ग्रंथो विश्वमां विद्यमान छे जेना आलम्बनथी पुण्यात्माओ आत्मकल्याणना मार्गे प्रवर्ती रह्या छे. हालमां यावदुपलब्ध सविवरण आ प्रकरण प्रकाशित कयुं छे. आ ज्ञानार्णवनो प्रथम तरंग जे पत्र २७ मे पूर्ण थयो छे ते तो श्री संघना प्रबळ पुण्योदये परिपूर्ण अखंड छे, बीजा तरंगना सविवरण १६ पद्यो सुधी पण अखंड छे. सत्तरमा पद्यना विवरणांशथी २४ मा पद्यना विवरणांश सुधी खंडित छे. सहृदय सुज्ञ वांचकोने अर्थानुसंधानमां क्षति न थाय ते खातर तेमना प्रणीत न्यायालोक ग्रंथ विगेरेथी ते भाग संयोजित करी यथामति संगत कर्यों छे, जे संयोजित पाठ ३५ मा पत्रना बीजा पृष्ठनी पंक्ति अग्यारथी ३७ मा पत्रना प्रथम पृष्ठनी बीजी पंक्ति सुधी [ ] आवा काटखुण कौंसथी चिन्हित करी आ पुस्तकमा छपायेल छे तेवीज रीते ज्यां ज्यां संयोजित पाठो जोडवामां आव्या छे त्यां त्यां सर्वत्र ते ज प्रमाणे काटखूण काँसम दाखल कर्या छे तेज बीजा तरंगना चालीसमा पद्यना चोथा चरणना 'यद्दृष्टं' ए पदथी प्रारंभी बीजो आखोय तरंग अने श्रीजा तरंगना चोथा पद्यना विवरणांश सुधीनो खंडित भाग विशेषावश्यक महाभाष्यनी गाथाओ तथा तेना विवरणानुसारे योजित कर्यो छे ते भाग ४७ मा पत्रना प्रथम पृष्टनी आठमी पंक्तिथी प्रारंभी ६० मा पत्रना प्रथम पृष्ठनी वारमी पंक्ति सुधी जोडवामां आव्यो छे. बळी त्रीजा तरंगना २० मा पद्यना विवरणांशथी २९ मी गाथाना विवरणांश सुधी खंडित छे से पण एकोतेरमा पत्रना प्रथम पृष्ठनी बारमी पंक्तिथी प्रारंभी ज्याशीमा पत्रना प्रथम पृष्ठनी आठमी पंक्ति सुधी जोडयो छे. ते पछी त्रीशमा पद्यना विवरणांशथी आगळनो सर्व ग्रंथ खंडितज छे ते स्थाने दिशामूचन मात्र पंचाशीमा पत्रना बीजा पृष्ठनी नवमी पंक्तिथी प्रारंभी सत्याशीमा पत्रना प्रथम पृष्ठ संपूर्ण सुधी अर्थसूचक पाठ जोड्यो छे, कुल ६० पृष्ठप्रमाण योजित पाठ छे Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशकीय ॥ २ ॥ བོར༔ 4% 4 མ ཐུད པམེང་4དུ་བེད་པུང་པཆུ་སཏ आमुद्रित ८७ पत्र एटले १७४ पृष्ठ प्रमाण ग्रंथ भागमां मतिज्ञान प्ररूपणा पण अधूरी रही छे. शेष श्रुतज्ञानादि प्ररूपणानो तो अव्यक्त गंध पण आवी शक्यो नथी जेथी तेना जिज्ञासुओनी तत्रबोधेच्छा पूर्ण करवाने पूज्यचरण तेजश्रीनुं प्रणीत ज्ञानार्णव पीयूषना बिन्दुतुल्य (आपणा माटे तो ते पण अर्णवांशज छे) ज्ञानविन्दु नामनुं प्रकरण जोडवामां आव्युं छे. आ बेउ थम आवतो विषय प्रतिपृष्ठ आपेल होवाथी जुदो प्रयास कर्यो नथी. मात्र एकज प्रति उपरथी छपाएल आ ग्रन्थोना संशोधनमां पूज्य मुनिमहाराजश्री शिवानन्दविजयजी विगेरेए यथाक्षयोपशम प्रयास कर्यो छे. शुद्धिपत्रक आप्युं छे. छतां पण छद्मस्थ जीवोने भूल थवी सुलभज छे, विगेरे कारणोथी टाइपोना वर्णाना स्थानथी खसी जवाना कारणथी, ह्रस्व, दीर्घ, इकार, एकार, ऐकार, ओकार, औकार रेफ विगेरेनी उपरनी पांखडीओ खसी जवाथी तेम ज घ+ध, प+ष-व-व-म+भ-य-थ विगेरे प्रायः समान आकृतियाळा वर्णोंना फेरफार थई जवा विगेरे कारणोथी थएली अशुद्धिओ विद्वान् पुरुषो सुधारी वांचशे अने ते बदल अमोने श्री संघ क्षमा आपशे, तेम श्री श्रमण संघ पासे नम्रभावे क्षमा प्रार्थनापूर्वक आ निवेदन पूर्ण करवामां आवे छे. लि. श्रीसंघ चरणकमलोपासिका श्री जैन ग्रंथप्रकाशक सभा - राजनगर ( अमदावाद ) निवेदनम् ॥ ॥ २ ॥ Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ % 3D CREECRECRECRUGGRECORCH ज्ञानार्णववृत्तिगतानां योजितपाठगतानां च साक्ष्योद्धृतानां भाष्यगाथानामनुक्रमः । (पंक्तिसंख्यांकः द्वयोः पृष्ठयोः सम्मील्य कृतः॥) गाथादिषाद पाक पत्र पंक्ति गावादिषाद गाांक पत्र पक्ति गाथादिषाद गाांक पत्र पक्ति जं सामिकाल कारण ८५ १ १२ | जमभिणिबुज्झइतमभिणि ९८ ६ २२ । कज्जतया णउ कमसो ११० ९ ९ मइपुव्बं जेण सुयं ८६ १ २१ सुयकारणं नओ सो ९९ ६ २४ दवसुअं मइपुव्वं १११ ९ कालविवजयसामि ८७ १ २२ मइ सुअमक्खणमेयं १.१ ७ १३ दव्वसुअं बुद्धीओ ११२ ९ २५ अंते केवलमुत्तम ८ १ २३ | भावसुयं भासासाय १०२ ७ १५ | भावसुअं मइपुव्वं ११२ १. २ जीवो अक्खो अस्थव्वा ८९ २ ३ जह सुहमं भाविदिय १०३७ १७ सुअविनाणप्पभवं ११३ १. देसिं चि इंदियाई ९१ २ १० एवं सवपसंगो १०४ ७ अविसेसिया मइच्चिय ११४ १० उवलद्धा तत्थाया ९२ २ १२ मइपुवं सुयमुत्तं १०५ ८ २० | सदसदविसेसणाओ ११५ ११ इंदियमणोणिमित्तं ९३ २ १७ पूरिज्जइ पाविज्जइ १०६ ८ २२ भेयकयं च विसेसण ११६ १२ १० पंगतेण परोक्त्रं ९५ ४ | नाणाणण्णाणाणिय १०७ ८ २८ इंदियविभागओ वा ११६ १२ १४ सामिताइविसेसा ९६ ५ ३ इह अद्धिमइसुयाई १०८ ९ १ सोइंदिओवलही होइ ११७ १२ इंदियमणोनिमितं जं १.०५ ९ सोऊण जा मई इभे १०९ ९ ७ । (पूर्वगत गाथा) PSSSCRISPUR Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एतद्ग्रन्थस्थविशेषा वश्यक ॥ ३ ॥ सो ओवलद्धि जइ सुयं ११८ १२ २४ सोइंदियोबलद्वी चेव १२२ १३ केई बितरस सुयं ११९ १३ किंवा नाणेहिगये १२० १३ ओ. सुणओ व सुअं १२१ १३ तु समुच्चयवयणाओ १२३ १३ पत्ताइये सुयका १२४ १४ भावसु अमक्खणं १२५ १४ जइ सुअमक्खरलाभो १२५ १४ १५ १२७ १९ सो विहु सुअक्खराणं १२६ दन्त्रअं भावसु बुद्धि अत्थे (पूर्वगतगाथा ) १२८ १५ ५ ११ २६ ३ १३ १६ ६ ८ १३ जे अबुद्धिि इयरत्थवि होज्ज सुअं इयरत्थवि भावसुये सह उवलद्धीए वा के बुद्धिद्दि किं सद्दो मइरुभयं ४ ५ १७ २४ २५ १ ११ १७ अहव मइ दव्वसुअ १३६ १७ इरम्मि वि महनाणे १३७ १७ १९ १३८ १८ १३९ १८ १० ११ सहो ता दव्वसु भासापरिणइकाले इयरत्थ वि मइनाणे १२९ १९ २१ १२८ १६ १३० १६ १३१ १६ कह महसुलद्धा तीरंति ण बोतुं जे १३२. १६ १३२ १६ १३३ १६ १३४ १७ १३५ १७ २५ कत्तो एत्तियमेत्ता १४० १८ १४ पण्णवणिज्जा भावा १४१ १८ १६ अं चोद्दस पुत्रधरा १४२ १८ अक्खरलंभेण समा १४३ १८ २७ जे अक्खराणुसारेण १४४ १९ केइ अ भासेज्जंता १४९ १९ किह मइसुअनाणविउ १४६ १९ १ १२ १२ सामन्ना वा बुद्धी १४७ १९ २४ मसहियं भावसु २५ जे भासइ एयं तअं ६ एवं घणिपरिमाणं ७ इयरं ति इन्नाणं अभिलप्पाणभिलप्पा १४८ १९ १४९ २० १५० २० १११ २० १५२ २० १३ १९ SPISTE भाष्यगाथानुक्रमः ॥ ३ ॥ Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ AAAAPSPSE जं भासइ तंपि नओ १५३ २. १७ | अह सुयओ विविवेगं १६५ २४ २० | उग्गहइहवाओ य १७८ २८ अन्ने मन्नंति मह १५४ २२ १४ मइकाले वि जइ सुर्य १६६ २४ २२ | मत्थाणं उम्गहणं १७९ २८ भावसुआभावाओ १५५ २२ १६ मह सुयनिस्सियमक्खर १६७ २४ २४ सामण्णत्थावग्गहण १८० २८ कप्पेज व सो भाव १५६ २२ २३ भरनित्थरणसमत्या ९४३ २४ २८ सामनविसेसस्स वि १८१ २८ असुयक्खरपरिणामा १५७ २२ २४ जह तं सुयेण ण तओ १६८ २५ ५ ईहा संसयमेत्तं १८२ २९ इह इं जेणाहिगओ १५८ २२ २६ पुचि सुयपरिकम्मिा १६९ २९ . जमणेगत्यालंबण १८३ २९ ण य दव्वभावमेत्तेवि १५८ २३ ४ उभयं भावक्खरओ १७० २५ १६ | तं चिय सयत्यहेऊ १८४ २९ जह बग्गा सुंवत्तण १५९ ३३ ५ सपरपञ्चायणमओ १५१ २६ ३| केइ तयन्नविसेसा १८५ २९ अह उवयारो कीरइ १६० २३ कासइ तयन्नवइरेग १८६ ३० भावसुयं तेण मइ १६१ २३ ९ न परप्पवोहयाई १३ २६ ६ सयो वि य सोवाओ १८७ ३० अन्ने अणक्खरक्खर १६२ २३ २९ ! दब्बसुभयसाहारण १७५ २६ २७ काणुवओगंमि घिई १८८ ३० जइ महरणक्खरश्चिय १६३ २३ २७ | सा वा सहत्थो थिय १.५ २६ २८ | नणु साऽवायम्भहिया १८९ ३१ सुयनिस्सियघयणाओ १६४ २४ ५ | महसुमनामविसेसो १७६ २७ २४ तं इच्छंतस्स तुहं १९.३१ UAROBAR ३ Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ B PUCE भाग्यमाथानुक्रम एतद्ग्रन्थ स्थविशेषावश्यक ॥४॥ UPiroiRUCH तुज्झं बहुअरभेया १९१ ३१ १५ | नयणमणोदजिविय २.४ ३३ १४ | सव्वगओ त्ति य बुद्धी २१६ ३७ १५ ता भिन्नलक्खणा वि हु१९२ ३१ १७ जुज्जइ पत्तविसयया २०५ ३३ २३ सव्यासव्वागहण २१६ ३९ तत्थोग्गहो दुरूवो १९३ ३१ २४ पाति सद्दगंधा २०५ ३३ २५ दळामणो विन्नाया २१७ ४२ बंजिज्जइ जेणत्थो, १९४ ३२ जंते पोग्गलमइया २०६३४ २ करणतणओ तणुसं २१८ ४२ अन्नाणं सो बहिरा १९५ ३२ ६ धूमोव्व संहरणओ २०७ ३४ २ | नज्जइ उबघाओ से २१९ ४२ तकालंमि वि नाणं १९६ ३२ ९ गेइंति पत्तमत्थं २०८ ३४ २६ जइ दम्वमणोतिबलो २२० १२ । जइ वन्नाणमसंखेच्च २०० ३२ १४ लोयणमपत्तविसयं २०९ ३९ नीउं आगरिसिउं वा २२२ ४२ २२ जं सहा ण वीसुं २०१ ३२ १६| डझेज पाविउ रवि २१. ३५ ९ सो पुण सयमुवधायण २३३४२ २४ समुदाये जइ नाणं २०२ ३२ २१ गंतु ण रूवदेसं २११ ३५ १. इट्ठाणिट्टाहार २२१ ४३ ८ तंतू पडोश्यारी २०३ ३२ २२ | नइ पत्तं गेण्हेजउ २१२ ३६ १५ सिमिणो ण तहारूवो २२४ ४३ कहमवत्तं नाणं. १९७ ३३ १ गंतुं नेएण मणो २१३ ३७४ | इह पासुत्तो पेच्छइ २२५ ४३ १८ लक्खिज्जइ त सिमिणा १९८ ३३ ३ | नाणुग्गहोवघाया २१४ ३७ ६ | दीसन्ति कासइ फुडं २२६ ४४ जगतो विन याणइ १९९ ३३६ दव्वं भावमणो का २१५ ३७ ११ । न सिमिणचिन्नाणाओ २२७ ४४ REARRIER ॥४॥ Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ BROBARHETASKARE सिमिणे वि सुरयसंगम २२८ ४४ ९ । तद्देतचिंतणे होज २४११८ १५ नइ सद्बुद्धिमत्तय २५४ ५२ | सो अझवसाणकओ २२९ ४४११ | समये समये गिण्हइ २४२ ४८ २१ | थोवमियं नाबाओ २५५ ५२ १३ सुरयपडिबत्ति रइसुह २३० ४४ १२ होइ मणोवावारो २४३ ४८ इय सुवहुणाथि काले २५६ ५२ नणु सिमिणगओ वि कोइ २३१ ४४ २० नेयाउ च्चिय जं सो २४४ ४९ १२ किं सदो किमसद्दो २५७ ५२ जं पुण विन्नाणं तप्फलं २३२ ४४ २२ जह नयणिदियमपत्त २४५ ४९ २१ | किं तं पुरुवं गहियं २५८ ५३ १ देहप्फुरणं सहसोइयं च २३३ ४४ २५ विसयपरिमाणमनियय २४६ ४९ २६ | अत्थोग्गहओ पुब्वं २५९,५३ सिमिणमिव मन्नमाणस्स २३४ ४५ ६ अस्थगहणेसु मुज्झइ २४७ ५० ६ | जइ सद्दोत्ति न गहियं २६० १३ १५ पोग्गलमोअगदन्ते २३५ ४७ १ कम्मोदयओ व सहा २४८ ५० ११ | सव्यस्थ देसयंतो २६१ ५३ २० जह देहरथं चक्खु २३५ ४७ सामत्याभावाओ २४९ ५० अहवसुए च्चिय भणिय २६२ ५३ २४ विसयमसंपत्तस्स वि २३७ ४७ तोए ण मछग पिव २५० ५० अहव मइ पुवं चिय २६३ ५४ ।। समयेमु मणोदव्बाई २३८ ४७ २. दव्वं भाणं पूरिय २५१ ५१ ५ अस्थि तथं अव्वत्तं २६१ ५४ | देहादणिग्गयस्स वि २३९ ४७ २७ | सामन्नमणिद्देसं. २५२ ५१ ११ अथोत्ति विसयगहणं २६५ ५४ | गिज्झस्स जणाणं २४० ४८ ३ । सद्दे त्ति भणइ वत्ता २५३ ५१ २० । जेणत्थोग्गहकाले २६६ ५४ २० ORROR Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भाष्यगाथा स्थविशेषावश्यक PREPETROPORNER सामण्णतयण्णविसे २६७ १४ २४ । खिप्पेयराइमेओ २८० १७ १६ | थाणुपुरिसाइकुठु २९३ ६२ १५ अण्णे सामण्णग्गह २६८ ५५ १ स किमोग्गहोत्ति भण्णइ २८१ ५७ २७ एवं चिय सिमिणाइसु २९४ ६३ १३ तदवत्थमेव तं पुन्ब २६९ ५५ ५ | सामण्णमेत्तगहणं २८२ ५८ ११ उक्कमओऽइक्कमओ २९५ ६३ ११ | अत्थोग्गहो न समयं २७० १५ ११ | सो पुणरीहावाया २८३ १८ १२ ईहिज्जइ णागहियं २९६ ६३ १३ एगो वाऽवाओ च्चिय २७१ ५५ १२ | तत्तोणतरमोहा २८४ ५८ १३ एत्तो चिय ते सव्वे २९७ ६३ सामण्णं च विसेसो २७२ ५५ १३ | सव्वत्थेहावाया २८५ ५८ २३ | अब्भत्थेवाओ च्चिय २९८ ६३ १८ केइदिहालोयणपुव्व २७३ ५६ २ । तरतमजोगाभावे २८६ १९ उप्पलदलसयवेहे व्ब २९९ ६४ तं वंजणोगगहाओ २७४ ५६ ९ सहोत्ति य सुयभणियं २८७ ५९ सोइंदियाइभेएण ३०० ६४ अत्थोग्गहो विजवं २७६ ५६ १५ खिप्पेयराइभेओ २८८ ५९ ८ अठ्ठावीसइभेयं एयं ३०१ ६४ तं च समालोयणम २७६ ५६ २१ | इय सामण्णग्गहणा २८९ ५९ २० केइत्तु वंजणोग्गह ३०१ ६४ २० आलोयत्ति नामं २७७ ५६ २६ महुराइगुणत्तणओ २९० ६. १ | अस्सुयणिस्सियभेयं ३०२ ६४ २० गहियं व होउ तहियं २७८ ६७ ३ वयणतरं तयत्था २९१ ६. ६ | चउवइरित्ताभावा ३०३ ६४ २२ अत्थानमाइसमये २७९ ५७ ७ | सेसेसु वि इवाइसु २९२ ६२ ११ | किह पडिकुकुडहीणो ३०४ ६४ २४ Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ৬৬AB:৬ল৬ जह उग्गहाइसामा १०५ ६५ अठ्ठावीस ३०६ ६५ ६६ जं बहुबहुविहखिप्या ३०७ ६१ नाणा सद्दसमूहं ३०८ ६६ खिष्पमचिरेण तं चिय ३०९ तोचि पडिवखं ३१० निस्सिये विसेसो वा ३१० ६६ एवं बज्झभंतर इह संस्यादणंत ६६ २११ ६७ नणु संदिद्धे संसय इह सज्झमोग्गहाइ ३१२ ६७ ३१३ ६७ ३१४ ६७ तहविणाम अब्भुव ३१४ ६८ वत्थुस्स देसगमग ३१९६८ २ ८ १८ १९ १६ १८ ૨૦ ४ १० ११ २३ ܘܐ १० इह वत्थुमत्थवयणा ३१६ ६८ अहवा ण सव्वधम्मा ३१७ ६८ जइ एवं ते तु ३१८ ६८ एवं जाणं सव्वं जे संखयाइगम्मा ३२० ६९ ३२१ ६९ पज्जायमासयन्तो १२२६९ निण्णयकाले वि जओ ३२३ ६९ कटुयरं नाणं ३२४ ६९ अहवा अहिंदनाणो ३२९ ७० तुछमिणं मिच्छस्स वि ३२६ ७० जं निण्णओवओगे वि ३२७ ७० अहवा जह सुयनाणा ३२८ ७० एसा सम्माणुगया ३२९ ७१ ११ १२ १९ १ १२ १३ १८ २० १५ १९ २० २८ १ विवरीयवत्युगहणे ३३० ७१. जइ सो वि तस्स धम्मो ३३१ ७१ जग्गा जोगविसेसं ३३२ ७१ काले सिक्ख नाणं (वृत्ति ) १७१ काले य भक्त्तपा " २ ७१ एवं समायरन्तो " ३ ७१ सयलसुरासुरपणमिय ४ ७१ " सत्तट्ठभवाहण " ५ ७१ तत्थ य जरजम्मणमरण,, ६ ७१ उग्गहो एवं समयं अत्थोग्गहो जहन्नो ३३३ ७२ ३३४ ७२ सोत्ताइणं पत्ताइ पुणे स ३३९७२ ३.३६ ७२ < १९ २० ૧૪ २५ २५ २६ २७ २८ ९ १२ २२ २३ नद्यःः ः Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ SBEEG I PES POमाण्यगाथा नुक्रमा॥ एतद्ग्रन्थ पुढे रेणुं व तणुंमि ३३७ ७२ २४ एगवीस खलु लक्खा,२७४ १९ गिण्हइ य काइएणं ३५९ ०६१६ स्थविशेषा बहुसृहुमभावुगाइ ३३८ ७२ २९ इति नयणविसयमाणं ॥३.४ २० गिव्हिज्ज काइएणं ३५६ ७६ वश्यक 118| फरिसाणतरमत्त ३३९ ७२ २६ | लक्खेहिं एकबोसाए ३४५ . २६ | वाया न जीवनोगो ३५. ०६ १८ जेणं जया मणूसा (टोका)१ ४३ नयणिदियस्स तम्हा ३४६ ७४ २७ भह सो तणुसरंभो ३५८ ७६ परम णू तसरेणू , २ ७३ जंजह सुत्ते भणियं १(टो.) ७५ किं पुण तणुसरंभेण ३५९ ७७ उस्सेहंगुलमेगं , ३ ७३ सुत्ताभिप्पाओऽयं ३४७ ७५ . तणुजोगो च्चिय मणवइ ३६० ७७ भायंगुलेण वत्थु , ४ ७३ बारसहिंतो सोत्तं ३४८ ७५ तुल्ले तणुनोगत्ते ३६१ ७७ २१ अप्पत्तकारि नयणं ३४० ७३ दवाणमंदपरिणा ३४९ ७१ कायकिरियाइरितं ३६२ ७७ २४ नणु भणियमुस्सयंगुल ३४१ ७३ संखेजइभागाओ ३५० अहवा तणुनोगाहिय ३६३ ७८ जं तेण पंचधणुसय ५४२ ७३ २७ | भासासमसेटोओ ३५१ ७६ . तह तणुवाबाराहिय ३६४ .८ . इंदियमाणे वि तयं ३४३ ७४ ५ | सेढी पएसपंतो ३५२ ०६ ९| जह गामाओ गामो ३६५ ८८ १. तणुमाण चिय तेणं ३४४ ७४ १२ भासासमसेठिओ १५१ ७६ केह एगंतरिय १६६ ७८ १५ सीयालीससहस्सा (टोका)१७४ १६ । भणुसेडिगमणामो ३५४ ७६ १२ | आह सुये चियनिसिरइ ३६७ ७९ BLOROSORRBA UAEGORESPEC ॥६॥ Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ BRICAURIOAKTOR ૫-૦] – શ્રી જૈન ગ્રન્થ પ્રકાશક સભા પ્રકાશિત ગ્રન્થ - ૧ હરિભદ્રાષ્ટકત્તિ ૩૩ સંવાદ-પાઠપુત- | ૧૨ હૈમધાતુમાલા ૪-૦] ૩૧થી ૩૪ ભાષારહસ્ય પ્રકરણુ મટીર, વાગવિવૃત્તિ 3 પેપર ૩-૦ ૧૪ જનતત પરીક્ષા શિક વ્યાખ્યા, તત્ત્વવિવિવરણ સમેતએઝપ૫ ૨-૮] ૧૪ તેમાનું. ૨ સંબંધ બારણ ઉપદ્રષ્ટાન્તવિશદકરણ પ્રકરણ, નિશાબતે - ૨૪-૨૫ પગદષ્ટિ ધામબિયટી ૨-૮ ૩ હરિભદ્રસૂરિમન્યસંગ્રહ સ્વરૂપો દૂષિતત્વવિચાર ૨-૦ ૨૬૧૨૫-૧૫-૩૫૦ માથાનાગિર સ્તવન, ૩૫ જ્ઞાનાર્ણવ પ્રકરણ મૂલ જ * હારિભદ્રાષ્ટક પ્રકરણમૂિલ] દ્રવ્યગુણ પર્યાયરાસ, સમ્યકત્વથીગદષ્ટિ, ૫ સ્વાદાદરહસ્ય પત્ર સટીક સંગમશેવિ સઝાય, સ્તવન વિયારા'દ ૩૬ થી ૪૬ શ્રી યશોવિજયવાચક ગ્રન્યસંગ્રહ, ૬ ન્યાયાલક સટીક સયંત્રશ્રેણિયંત્રાદિ વિવિધ સંગ્રહ ૭-૮ પાતંજલગનવિવરણ, નયરહસ્ય, ૭ અષ્ટસહસ્ત્રીતા-વિવરણ સપ્તભંગીનયનપ્રદીપાદિ ૧૧ ૨–૦ ૨૭ પારમષ સ્વાધ્યાય સંગ્રહ [બુક) - ૮ અમુધાતતત્વ ૪૭ સવિવરણ ધમપરીક્ષા ટિપયા ૪૨૮ પારમણે સ્વાધ્યાય ગ્રન સંગ્રહ ૯ જન જાય મુક્તાવલી સટીક ૪૮ અનેકાન્ત વ્યવસ્થા પ્રકરણ ન તર્ક - ( ૯ મન્ચે પત્રકારે ૮ | , સમુ. જેમા ૧૯ સમ્મત્તિકરણ સટી ૪૮ થી ૫ર. ઉત્પાદાદિસિદ્ધિવિવરણ ૧૦ નવ તત્વ વિસ્તરાથી ૩-૦ પ્રથમ વિભામ વાદમાદિ ૪ ગ્રન્ય પ્રહ ૧-૮ ૧૧ દંડ વિસ્તરાઈ ૧ | a૦ યોગદયાદિતવમ પારાદિ ૦-૬ | ૫૩ જમedવ મીમીયા -૧૨ - ૫૪ જિયુકત મદન ૧-૪, ૫૫ પારમ ભાખ્યાનમાળા ભેટ, હિતેમ ન સ્તવનાદિ સંમત ૦-૮, ૫૭-૫૮ જ્ઞાનાવ સટીક – જ્ઞાનબિનખ્ય (૨) પ-૦, ૫૯-૬૦ માગ પરિશુહિક-યતિલક્ષણસમુ: સંસ્કૃત છાયા સહિત ૭-૮ ૬૧ ધૂતખાન સંસ્કૃત -૧૨ પ્રાપ્તિસ્થાનઃ-શેઠ ઇશ્વરદાસ મૂલચંદ. ભટ્ટની પોળ-અમદાવાદ રરરરરર Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ स्याद्वाद महात्म्य ॥ स्याद्वादकल्पलतान्तर्गतस्याद्वादमाहात्म्यतपद्यकुसुमाञ्जलिः ॥ व्यालाश्चेद् गरुडं प्रसर्पिगरलज्वाला जयेयुर्जवाद्, गृह्णीयुर्द्विरदाश्च यद्यतिहठात् कण्ठेन कण्ठीरवम् । सूरं चेत् तिमिरोत्कराः स्थगयितुं व्यापारयेयुर्बलं बघ्नीयुर्बत दुर्नयाः प्रसृमराः स्याद्वादविद्यां तदा ॥ १ ॥ नयाः परेषां पृथगेकदेशाः, क्लेशाय नैवाईतशासनस्य । सप्तार्चिषः किं प्रसृताः स्फुलिङ्गा, भवन्ति तस्यैव पराभवाय ॥ २ ॥ एका नगम्यत इह न्यायेषु बाह्येषु यो, देशप्रेक्षिषु यश्च कश्चन रसः स्याद्वादविद्याश्रयः । यः प्रोन्मीलितमालतीपरिमलोद्वारः समुज्जृम्भते, स स्वैरं पिचुमन्दकन्दनिकरक्षोदाद् न मोहावहः ॥ ३ ॥ अभ्यास एकः प्रसरद्विवेकः स्याद्वादतच्चस्य परिच्छिदाप्यः । कषोपलाद् नैव परः परस्य निवेदयत्यत्र सुवर्णशुद्धिम् ॥ ४ ॥ माध्यस्थ्यमास्थाय परीक्ष्यमाणाः क्षणं परे लक्षणमस्य किञ्चित् । जानन्ति तानन्तिमदुर्नयोत्था कुवासना द्राक् कुटिलीकरोति ||१५|| अतो गुरूणां चरणार्चनेन कुवासनाविनमपास्य शश्वत् । स्याद्वादचिन्तामणिलब्धिलुब्धः प्राज्ञः प्रवर्तेत यथोपदेशम् ॥ ६ ॥ चार्वाकयमतावकेशिषु फलं नैवास्ति बौद्धोक्तयः, कर्कन्धूपमितास्तु कण्टकशतैरत्यन्तदुःखप्रदाः । उन्मादं दधते रसैः पुनरमी वेदान्ततालद्रमाः, गीर्वाणद्रुम एव (प) तेन सुधिया जैनागमः सेव्यताम् न काकैश्चार्वाक सुगततनयैर्नापि शशकै केनद्वैतज्ञैरपि च महिमा यस्य विदितः । मरालाः सेवन्ते तमिह समयं जैनयतयः, सरोजं स्वाद्वादप्रकरमकरन्दं कृतधियः ॥ ७ ॥ ॥ ८ ॥ कचिद् भेदच्छेदः क्वचिदपि हताऽभेदरचना कचिद् नात्मख्यातिः क्वचिदपि कृपास्फातिविरहाः । कलङ्कानां शङ्का न परसमये कुत्र १ तदहो ! श्रिता यत् स्याद्वादं सुकृतपरिणामः स विपुलः ॥ ९ ॥ पद्यकुसुमाञ्जलिः || 61 || Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ U G Andamannanormananmaamne AECEMENT ॥ॐ अई नमः॥ अनन्तकब्धिमिधानाय सकलविघ्नविच्छिदे श्रीगौतमस्वामिने नमो नमः ॥ सर्वतन्त्रस्वतन्त्र-शासनसम्राट-सरिचक्रचक्रवति-जगद्गुरु-तपागच्छाधिपति-प्रौढप्रभावशालि-अभूततीयोडारक भट्टारक-आचार्यमहाराजाधिराजश्रीमद् विजयनेमिसूरीश्वरसद्गुरुभ्यो नमो नमः ॥ प्रौढप्रतिभावदातसंस्मारितातीतपूर्वश्रुतकेवलिभगवद्-न्यायविशारद-न्यायाचार्य-कूर्चालसरस्वतीपूर्वधरनिकटकालवर्तिश्रीहरिभद्रसारिपुङ्गवलघुवान्धवप्रभूत्यनेकविशदाबरुदावलीविभूषितमहामहोपाध्याय-श्रीयशोविजयगणिसन्दृन्धं स्वोपजविवरणसमलङ्कृतम् ॥ श्रीज्ञानार्णवप्रकरणम् ॥ ऐन्दवीं तां कलां स्मृत्वा, धीमाझ्यायविशारदः॥ज्ञानार्णवसुधास्नान-पवित्राः कुरुते गिरः ॥१॥ स्पष्टम् ॥१॥ तत्र पूर्व ज्ञानानि निरूपयितुं तद्विभागमाहज्ञानं पञ्चविधं प्रोक्तं, मतिः श्रुतमथावधिः॥ मनापर्यवसंज्ञं च, केवलं चेति नामतः॥२॥ अत्र स्वाम्यादिनिरूपणसाम्यात् तद्भाव एव शेषज्ञानोत्पत्तेश्चादौ मतिश्रुतयोरुपन्यासः । यदाह भाष्यकार:-"जं सामिकालकारण-विसयपरोक्खत्तणेहिं तुल्लाई । तम्भावे सेसाणि य, तेणाईए मइसुआई ।। ८५ ॥ ति" [यत्स्वामिकालकारण मङ्गलाचरणम् | मतिभुता१४ वधिमनापर्व वकेवलमेदेन *ज्ञानस्य पद्ध| विधत्वं मतिश्रुतयोरादा वुपन्यासे हेतुकयनं | तत्र भाष्यसम्मतिश्च ॥ UGUAGRUKECE Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सक्किरणं श्रीज्ञाना अकरबम्।। ॥१॥ अHI159133* विषयपरोक्षत्वैस्तुल्यानि॥ तद्भावे शेषाणि च, तेनादौ मतिश्रुते] । अत्र प्राच्यो हेतुरेकत्रोपन्यासेऽन्त्यस्त्वादावुपन्यासे इति ध्येयम् । भाष्यसस्वाम्यादिसाम्यं चैवम् । मतिश्रुतयोः स्वामी तावदेक एव । 'जन्थ मइनाणं तत्थ सुअनाणं ।' इति वचनात् म्मत्या कालोऽप्यनयो नाजीवापेक्षयानाद्यनन्तः, एकजीवापेक्षया च नैरन्तर्येण सातिरेकषट्षष्टिसागरोपमप्रमाणस्तुल्य एव ।। कारण मतिश्रुतयोमपीन्द्रियमनाक्षयोपशमादिरूपं द्वयोस्तुल्यम् । सर्वद्रव्यविषयत्व-परनिमित्तत्वाभ्यां विषय-परोक्षत्वयोरपि तुल्यतेति।।ततः राग्रुप-यासकालेनोक्तरूपेण, विपर्ययेणाज्ञानापत्तिरूपेण, स्वामित्वेन स्वस्वामिनोरभेदाश्रयणादेकस्वामिकत्वेन, लाभेन च युगपत्रयाणा हेत्वादिनिमपि लाभसम्भवेन साधादवधेः ॥ तत छद्मस्थस्वामिकत्व-पुद्गलमात्रविषयकत्व-क्षायोपशमिकत्वादिसाधान्मनः रूप्य क्रमपर्यवज्ञानस्य ॥तत उत्तमयतिस्वामित्वसाम्यादवसान एव लाभाच्चान्ते केवलज्ञानस्योपन्यासः॥ आह च-"मइपुव्वं जेण सुयं, ण चावधितेणाईए मई, विसिट्ठो वा ॥ मइभेओ चेव सुयं, तो मइसमणतरं भणियं ॥८६॥ काल-विवजय-सामित्त-लाभसाहम्मओ मन:पर्यववही तत्तो॥ माणसमित्तो छउमत्थ-विसय-मावादिसामना ॥ ८७॥ अंते केवलमुत्तम-जइसामित्तावसाणलाभाओ ॥ एत्थं च केवलानामुमइसुयाई, परोक्खमियरं च पञ्चक्खं ॥८८॥" [मतिपूर्व येन श्रुतं तेनादौ मतिः ॥ विशिष्टो वा मतिभेद एव श्रुतं, ततो पन्यासे बीज मतिसमनन्तरं भणितम् ॥ कालविपर्ययस्वामित्वलामसाधर्म्यतोऽवधिस्ततः ॥ मानसमित छबस्थविषयभावादिसामान्यात ॥ १४ दर्शितं, मति लश्रतयोः परोअन्ते केवलमुत्तमयतिस्वामित्वावसानलाभात् ॥ अत्र च मतिश्रुते परोक्षमितरच प्रत्यक्षम् ॥] इदश्च पूर्वानुपूर्व्या निरूपणप्रयो | क्षत्वमन्येषां जकेच्छया विषयोपवर्णनं, अन्यथेच्छाविशेषेण पश्चानुपूर्व्यादिनापि निरूपणसम्भवादन चान्यथा निरूपणस्यासाम्प्रदायि प्रत्यक्षत्वच॥ कत्वेनानिष्टसाधनत्वान्नान्यादृशेच्छया तदिति ध्येयम् ॥ २॥ अथ प्रत्यक्षत्वपरोक्षत्वाभ्यां तद्विलक्षणव्यवस्थामाह ॥१॥ Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ FREE तत्मत्यक्ष परोक्षंच, प्रत्यक्षं त्वक्षमात्रजम् ॥ यत्त्विन्द्रियोपलब्धिस्त-तन्न, यत् स्पष्टतैव सा ॥३॥ प्रत्यक्षपरोक्ष तद् ज्ञानं द्वेधा,प्रत्यक्षं परोक्षं चेति,तत्राश्नुते व्याप्नोति ज्ञानात्मना सर्वार्थान् , अनाति स्वःसमृद्धथादीन, पालयति भुक्ते भेदेन ज्ञानवेति 'उणादिनिपातनाद्'अक्षो जीवस्तं प्रति साक्षाद्गतमिन्द्रियनिरपेक्षं वर्चते यत् तत्प्रत्यक्षम् । आह च-"जीवो अक्खोअथव्वा विध्यं, व्युवणभाअणगुणनिओ जेण ॥ तं पइ वट्टइ नाणं, जं पञ्चक्खं तयं तिविहं ॥८९ ॥ ति॥"[जीवोऽक्षोऽर्थव्यापन-भोजनगुणान्वितो प्तस्वनुसायेन ॥ तं प्रति वर्तते ज्ञानं, यत्प्रत्यक्षं तत्रिविधम् ]। इत्थं चेदं व्युत्पत्तिनिमित्तमेव । नैश्चयिक प्रवृत्तिनिमित्तं तदेव च लक्षणम्, रेण प्रत्यक्ष'उत्पत्चाविन्द्रियमनोनिरपेक्षत्वम्' पर्यवस्यति । तेनावध्यादेः क्षयोपशमभावापरकर्मपुद्गलजन्यत्वेऽपि तस्य न क्षतिर्वस्तुतस्त लक्षणम् ,गौदेतोरितिन्यायात्स्वाभिमगुणजन्यत्वमेव तस्य । तेन न वक्ष्यमाणपरोक्षलक्षणातिव्याप्तिरिति ॥ एवं च 'आत्ममात्रजन्यत्वम् इति १५ तमसम्मताया यथाश्रुतमेव ज्यायः। न च सांव्यवहारिकप्रत्यक्षेऽव्याप्तिस्तस्यालक्ष्यत्वाचत्रोपचारेणैव प्रत्यक्षत्वव्यवहाराद्, न हि वाहीको गोव्य इन्द्रियोपवहाराद् गौरेव।।यत्त्विन्द्रियोपलब्धिःप्रत्यक्षमित्यक्षपादमतानुयायिनःप्रचक्षतेतन्न, इन्द्रियाणामचेतनत्वेनोपलब्ध्य लब्धेः तत्त्वं भावात्तद्विगमेऽपि तदुपलब्धार्थस्मरणनात्मन एव ज्ञातृत्वात् ।। उक्तश्च-"कोसिंचि इंदिआई, अक्खाइं तदुवलद्धि पञ्चक्खं ।।तो ताई खंडितम् जमचेअणाई, जाणंति ण घडो व्व" ॥९१॥ [केषाश्चिदिन्द्रियाणि, अक्षाणि तदुपलब्धिः प्रत्यक्षम् ।। तन्न तानि यदचेतनानि, जान एवामीन्द्रवन्ति न घट इव] 'उवलद्धा तत्थाया, तद्विगमे तदुवलद्धसरणाओ।|गेहगवक्खोवरमेवि तदुवलद्धाणुसरियाव॥९॥त्ति' [उपलब्धा तत्रा जन्यज्ञानत्मा,तद्विगमे तदुपलब्धस्मरणात्।। गेहगवाक्षोपरमेऽपि,तदुपलब्धानुस्मतेव] अथेन्द्रियजन्यज्ञानमेव प्रत्यक्षमिति तदपिन समीचीनम्, त्वस्य च ॥ तस्य परजन्यत्वेनाऽतथात्वात्, न चेन्द्रियजन्यज्ञानत्वमेव प्रत्यक्षत्वं अवध्यादौ तु तदौपचारिकमिति वाच्यम्, लिङ्गाद्यजन्य S EX Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना र्णवप्रकरणम् ॥ ॥ २ ॥ त्वेन तस्य प्रत्यक्षत्वावश्यकत्वात्प्रत्यक्ष परोक्षातिरिक्तज्ञान स्यालीकत्वात् । अपि चेन्द्रियमनोनिमित्तं ज्ञानं परोक्षं संशयविपर्ययानध्यवसायसम्भवाद्विनिश्वयसम्भवाद्वा साभासानुमानवत्सम्यगनुमानवच्चेति हेतोस्तस्य परोक्षत्वसिद्धौ न प्रत्यक्षत्वम् ॥ आह च“इंदिअमणोणिमित्तं, परोक्खमिह संसयादिभावाओ । तकारणं परोक्खं, जहेह साभासमणु माणं ।। ९३ ।। ति” [ इन्द्रियमनोनिमित्तं, परोक्ष मिह संशयादिभावात् ॥ तत्कारणं परोक्षं, यथेह साभासमनुमानम् ]। एवं च संशयादिप्रतिबन्धकतावच्छेदकतया सिद्धं प्रत्यक्षत्वमवध्यादिष्वेव व्यवस्थितमिति भावः । ननु तद्वत्ताज्ञानं प्रति तद्विरुद्वनिश्चयत्वेनैव प्रतिबन्धकता ऽसिद्ध विरुद्धानैकान्तिकैश्वानुमितिरेव प्रतिबद्ध्यते न त्वनुमित्यनन्तरं सन्देह एवाधीयत इति चेत्, न, तथापि साक्षात्कृतेऽर्थे सन्देह सामग्रया एवानवतारादित्याशय इत्याहुः॥ वस्तुतइन्द्रियजन्यज्ञानत्वं न प्रत्यक्षत्वं, तन्मते ज्ञानमात्रस्य मनोरूपेन्द्रियजन्यत्वात्, न चेन्द्रियत्वेनेन्द्रियजन्यत्वं विवक्षितं इन्द्रियत्वस्म प्रत्यक्षघटितत्वेन तेन रूपेणा हेतुत्वात्पृथिवीत्वादिना साङ्कर्येण तस्य जातित्वादीश्वरज्ञानेऽव्याप्तेश्व, नापि ज्ञानाकरणकज्ञानत्वं जन्यप्रत्यक्षस्याऽदृष्टद्वाराऽस्मदादिज्ञानस्येश्वरज्ञानस्य वा जन्यत्वेनाव्याप्तिवारणायादृष्टा द्वारकत्वाविशेषेणदानस्य [SSवश्यकत्वेऽपि निदिध्यासनद्वारा मननजन्ये तत्वज्ञानेऽव्याप्तेः, विजातीयादृष्टद्वारा मननस्य तद्धेतुत्वापेक्षया विजातीय निदिध्यासनद्वारैव तद्धेतुत्वौचित्यात्, नापि जन्यधीजन्यमात्रवृत्तिजातिशून्य ज्ञानत्वं जन्यधमात्रस्यादृष्टद्वारा जन्यधीजन्यत्वात्, साक्षातज्जन्यत्वविवक्षणे च स्मृतावतिव्याप्तेरहष्टाद्वारकत्वविशेषणे जन्यपदवैयर्थ्यात्, अनुमित्यादेरप्यदृष्टद्वारा हविर्विषयकव्याप्तिज्ञानादिजन्यत्वाच्च, अदृष्टव्यापारानिरूपितजन्यधीजन्यतावन्मात्रवृत्तिजातिमत्वविवक्षणे ऽपि जन्यधी मात्रस्य कालि केन जन्यधीजन्यत्वात् सामानाधिकरण्यप्रत्यासच्या जन्यत्वविवक्षावश्यकत्वे जन्यपदवैयर्थ्यात् । किञ्चैतानि लक्षणानीतरभेदोपयोगीनि न तु व्यवहारोपयोगीनि, अथो भयोपयोगि साक्षात्कारित्वमेव इन्द्रियमनोजन्यज्ञाने परोक्षत्वेऽनु मानं दर्शितं, इन्द्रियजन्य ज्ञानत्वस्य | प्रत्यक्षलक्षणत्वे दोषोपदर्शनं, ज्ञानाकरणकज्ञान त्वादीनां प्रत्यक्षलक्षणानां खंडनम् ॥ ॥ २ ॥ Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ T ReKOREA तल्लक्षणमस्तु, तच्च साक्षात्करोमीतिप्रतीतिसिद्धो जातिविशेषो निर्विकल्पकेश्वरज्ञानयोश्च धर्मिग्राहकमानसिद्धं तदिति चेव, नून साक्षात्कास्पष्टतैव तत् साक्षात्करोमि स्पष्टमवैमीतिप्रतीत्योरेकाकारत्वात्केवलं कपर्धनम्युपगमाद् ज्ञानावरणक्षयोपशमविशेषजन्यतावच्छेद रित्तस्य कत्वेन तत्क्षयजन्यतावच्छेदकत्वेन च स्पष्टताद्वयसिद्धिः। स्पष्टतात्वेनानुगतीकृता च स्पष्टता तल्लक्षणमिति ॥ न च प्रत्याभिज्ञाया स्पष्टतास्वमतिव्याप्तिः, तस्याः केवलेन्द्रियसंस्काराजन्यत्वेन स्मृतिव्यावृत्तपरोक्षधीरूपत्वादिति वाच्यम् , तस्या अस्पष्टत्वादिदन्तोल्लेखमात्रे रूपस्य प्रत्यस्पष्टताया अनियामकत्वात्, उक्तश्च-" भवति च परोक्षस्यापि साक्षादिवाध्यवसाये प्रत्यक्षसर्वनाम्ना परामर्श इति । " स्पष्टत्वेन क्षलक्षणत्वं तत्प्रतीतिस्तु सन्निहितविषयत्वादिकमवगाहते, यत्त्विन्द्रियजन्यत्वेन तस्याः प्रत्यक्षत्वमेव लाघवादिन्द्रियजन्यत्वस्यैव प्रत्यक्ष प्रत्यभिज्ञाया त्वप्रयोजकत्वात्, न च संस्कारजन्यत्वेन स्मृतित्वापत्तिः, विशिष्टानुभवं प्रत्यव्यवहितविशेषणज्ञानस्य हेतुत्वेन प्रत्यभिज्ञायाः पूर्व | अस्पष्टत्वानियमतस्तत्तास्मृतिकल्पनेन तस्याः संस्काराजन्यत्वादिति, तदसत्, तत्र नानास्मृतिकल्पनापेक्षया विशेषणज्ञानजन्यतावच्छेदकप्रत्यक्षत्वाभावस्यैव कल्पयितुमुचितत्वात् प्रत्यभिजानामीत्यनुगतप्रतीतिसाक्षिकजातिविशेषस्य च चाक्षुषत्व-वाचत्वादिना साङ् त्परोक्षत्वं, कर्यभिया प्रत्यक्षव्यावृत्तत्वाच्च, अस्माकं तु तत्तांशे उपनय इतरांशे च सन्निकर्षा हेतुरिति प्रत्यभिज्ञायां न कारणान्तरकल्पनागौ तत्र प्रत्यक्षखम्, भवतां तु प्रत्यभिज्ञात्वावच्छेदेन कारणान्तरकल्पनागौरवम् तत्तासंस्कारस्यैव तत्तोपनायकत्वाच्च नोक्तनानास्मृतिकल्पनागौ- दत्वाम्युपगमः रखमपि, इन्द्रियनिरपेक्षसंस्कारजन्यत्वस्यैव स्मृतित्वप्रयोजकत्वात्, प्रयोजककल्पनायाः कारणविशेषकल्पनानुपजीव्यत्वेन परस्य तद्गौरवस्यादोषत्वादिति चेत, न, स्मृतिप्रत्यभिज्ञयोर्विषयतावैलक्षण्यस्य कारणवैलक्षण्याधीनत्वेन तत्र विलक्षणहेतुकल्पनाव- खण्डितः॥ श्यकत्वात्, अत एवासनिकृष्टेऽपि विषये स एव वहिरनुमीयते स एवार्थः कथ्यत इत्यादि प्रत्यभिज्ञानम, एवं चेन्द्रियार्थ Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ साविकरणं श्रीज्ञाना वप्रकरणम् ॥ तववक्षाधीनावित्यतिशत चेत्, न, प्रनिन्तिानस्य तत RECAPES सन्निकर्षोऽपि तत्र संस्कारोबोधकसदृशदर्शनादिहेतुतयोपक्षीयते, तदिदमभिप्रेत्योक्तं " अनुभूततया परोक्षमप्येकं साक्षादिवाध्यवस्यतः पश्यतश्चापरं प्रत्यभिज्ञैवेयमिति"। अन्यथा प्रत्यक्षत्वपरोक्षत्वयोः साङ्कर्यप्रसङ्गाज्जातेरव्याप्यवृत्तित्वे स्पष्टताया विषयताविशेषरूपत्वे वा किञ्चिदशे परोक्षत्वं किश्चिदशे च तस्याः प्रत्यक्षत्वम्, साक्षादिवेत्यस्य साक्षात्कारसामग्रीसम्पत्ताविवेत्यर्थः, अनुमानादेः सर्वथा परोक्षत्वं चासनिकृष्टांश एव, एवं च प्रत्यभिज्ञात्वमपि तदेवेति विषयताविशेष एच मिथोऽन्तर्भावानन्तर्भावौ च विवक्षाधीनावित्यपि वदन्ति । ननु तथापि संशयादीनां लक्ष्यत्वे संशयानध्यवसाययोरस्पष्टयोरव्याप्तिः, अलक्ष्यत्वे च स्पष्टे भ्रमेऽतिव्याप्तिरिति चेत्, न, प्रतिनियतवर्णसंस्थानाद्याकाराभिव्यङ्गथायाः स्पष्टतायास्तत्राभावात्तत्र स्पष्टताप्रतीतेभ्रमत्वात, न च भ्रान्तभ्रान्तिज्ञसाङ्कर्यम्, भ्रान्तिज्ञानस्य तत् स्पष्टतांशे भ्रमत्वेऽपि विषयांशेऽतथात्वात्, न च सांव्यवहारिकावग्रहेऽव्याप्तिस्तत्र प्रतिनियतमनुष्यत्वाद्याकाराभिव्यङ्गयस्पष्टताया निरपायत्वात् । नन्वेवं सांव्यवहारिकत्वं यदि व्यवहारनयाभिमतत्वं तदाऽतिप्रसङ्गोऽवध्यादावपि स्पष्टत्वेन तद्व्यवहारात्, अथापारमार्थिकत्वं तदपि तथा कास्न्यैनास्पष्टत्वरूपस्य तस्य विकलप्रत्यक्षेऽभावात् क्षायोपशमिकत्वरूपस्यापि तस्य तथात्वात् परजन्यत्वस्यापि तथात्वाद् । वस्तुतोऽवध्यादेर्गुणजन्यत्वे च मतिश्रुतयोरपि लब्धीन्द्रियगुणजन्यत्वात्पारमार्थिकगुणजन्यत्वाभावस्योभयत्र तुल्यत्वात् । अथेन्द्रियव्यवहितात्मजन्यत्वं तदिति चेत्, न, कुडथादेर्घटस्येवेन्द्रियस्यात्मनोऽव्यवधायकत्वादिति चेत्, न, इन्द्रियजन्यस्य सांव्यवहारिकत्वेनावधिमनःपर्याययोस्तु विकलप्रत्यक्षत्वेन परिभाषणात्, कथमित्थमिति चेत्, न, स्वतन्त्रपरिभाषाया अपर्यनुयोज्यत्वादाभोगकरणे परानपेक्षत्वं वाऽपारमार्थिकत्वविवक्षायां तन्त्रमिति दिग् ॥३।। परोक्षलक्षणमाह स्पष्टताकक्षणस्य भ्र. मेऽतिव्याप्तेरवग्रहेऽव्याप्तेश्च परि. हारः सांव्यवहारिकत्वस्य प्रश्नप्रतिविधा नाम्यां निर्णयः॥ mardan Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ %BCle परोक्षं च परापेक्ष-मनुमानादि सर्वथा ॥ येन संव्यहारेणा-ध्यक्षमैन्द्रियकं स्मृतम् (जगुः) ॥४॥ परोक्षस्य - परापेक्षं परोक्षं, तत्वं चात्मातिरिक्तजन्यत्वं उत्पत्चाविन्द्रियाद्यपेक्षत्वं वाऽस्पष्टत्वं तदिति तु व्यावहारिकाः, तच्चोक्तस्प ४क्षणम्, एकाष्टत्वाभावो विषयताविशेषो वेत्यन्यदेतत्, नियतवाद्याकारणाप्रतिभानमिति तु प्राञ्चः,तत्रैकान्ततः परोक्षमनुमानादिकम इन्द्रिय दन्तेन परोक्षजन्यज्ञानस्य सांव्यवहारिकप्रत्यक्षत्वेनातथात्वात्, एवञ्चैकान्ततः प्रत्यक्षमप्यवध्यादिकमेवेति स्थितम् । आह च-"एगंतेण परोक्खं त्वमनुमानालिंगिअ-मोहाइअंच पञ्चक्खं ॥ इंदिअमणोभवं जं, तं संववहारपञ्चक्खं ।। ९५ ॥ ति" [एकान्तेन परोक्षं लैङ्गिकं. अवघ्यादिकं च दः अवध्याप्रत्यक्षं । इन्द्रियमनोभवं यत्तत्संव्यवहारप्रत्यक्षम्]। नन्वस्मदादिसाक्षात्कारस्य कुतो नैकान्ततः प्रत्यक्षत्वं विवक्षामात्रस्य वस्तुस्वभा देरेकान्तेन वस्याकर्तुमन्यथाकर्तुं वाऽशक्यत्वादिति चेत्, न, अत्र प्रत्यक्षपरोक्षपदयोस्तद्व्यवहारविषयपरत्वात्, न च निश्चयस्य न व्यवहारोप प्रत्यक्षत्वं योगित्वमिति वाच्यम्,शब्दाभिलापरूपव्यवहारे तस्याप्युपयोगित्वात्, यत्तु व्यवहारनिश्चयाभ्यामेवास्य स्पष्टास्पष्टत्वं भेदाभेदवदिति, परोक्षतदसत, सतोरेव भेदाभेदयोस्ताभ्यामवगाहनात्तयोरसत्करणाक्षमत्वात्, अन्यथा विकल्पव्यवहारेण शशशृङ्गमपि सिद्धयेत, सिद्धये देवेति चेत्, न, खण्डशः प्रसिद्धेरेव तत्र तत्र सिद्धयर्थत्वात्, अन्यथा "असतो णत्थि णिसेहो" इत्यादि भाष्यविरोधप्रसङ्गादिति वयमुत्पश्यामः॥ यदि व्यवहारेण न स्पष्टतासिद्धिरपि तु संशयाधनवतारनियामकत्वेन तदाप्यस्यैकान्तपरोक्षत्वमुक्तरीतिं विना न निवा | यमनोजन्यरयितुं शक्यम्, एतेन 'वस्तुस्वभावो निश्चयाधीनो व्यवहारस्तु व्यवहाराधीन' इत्युक्तावपि न क्षतिः ॥ नन्वन्द्रियकज्ञानस्य परो ज्ञानस्य संव्य वहारेण क्षत्वप्रतिपादनमुत्सूत्रं, सूत्रे तस्य प्रत्यक्षत्वेनैव प्रतिपादनाद् । यदार्षम्-" पञ्चक्खं दुविहं पण्णत्तम् । तं जहा-इन्दियपच्चरखं जोइन्दियपञ्चक्खं चेति," तब, "परोक्खं दुविहं पण्णत्तम् । तं जहा-आमिणिबोहिअनाणपरोक्खं सुअनाणपरोक्खं चेति" ॥ | प्रत्यक्षत्व। स्यापोन्द्रि Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं [ श्रीज्ञाना णेव प्रकरणम्॥ ॥४॥ [ प्रत्यक्षं द्विविधं प्रज्ञतं । तद्यथा-इन्द्रियप्रत्यक्षं च नोइन्द्रियप्रत्यक्षं च ॥] [परोक्षं द्विविध प्रज्ञप्तं । तद्यथा-आमिनिबोधिकज्ञानपरोक्षं श्रुतज्ञानपरोक्षं चेति ॥ ] प्रदेशान्तरे तस्य परोक्षत्वेनापि प्रतिपादनाव,न चाभिनिबोधकत्वस्य सामानाधिकरण्येन परोक्षत्वप्रतिपादनान सूत्रविरोधः, ऐन्द्रियकस्य तस्य प्रत्यक्षत्वेऽपि लैङ्गिकस्य तस्य परोक्षत्वात् । एवं हि 'इंदिअपचक्खेंइत्यत्र प्रत्यक्षपदे न लक्षणाऽक्षप्रतिगतत्वस्य व्युत्पत्तिनिमित्तत्वेऽपि स्पष्टताया एव प्रत्यक्षपदप्रवृत्तिनिमित्तत्वात्, अत एवाक्षपदस्येन्द्रियार्थकत्वेऽपि न क्षतिः, प्रतिपूर्वादक्षिशब्दाचव्ययीभावापत्यैव न तादृशं रूपं 'अर्श आदेरचोऽसार्वत्रिकत्वात्'इत्याहुः। ज्ञानस्य स्वसंविदितत्वेन प्रत्यक्षेऽपि प्रत्यक्षवृत्तेस्तदपीष्टमित्यन्ये, विषयताया वृत्त्यनियामकत्वादिदमयुक्तमित्यपरे, तादृशादपि प्रत्यक्षशब्दात् प्रत्ययान्तरमिच्छन्त्येके, न च लक्षणवाधाल्लक्षणाऽऽवश्यकी, लक्षणासिद्धौ लक्षणबाधस्तत्सिद्धौ च सेत्यन्योन्याश्रयादिति चेत्, न, व्यवहारेण तथाबोधसम्भवेऽपि व्युत्पत्तिनिमित्तमेव प्रवृत्तिनिमित्तं व्यवस्थापयता निश्चयेन तथाबोधाऽसम्भवादुक्तव्यवस्थयैव सूत्रोपपत्तेः,तदिदमभिप्रेत्योक्तं 'तथा च सति मतिश्रुतयोः परोक्षत्वे तस्यापि पारमार्थिकं परोक्षत्वमेवेति' सामानाधिकरण्येन बाधानवताराच्च न सामाधिकरण्येन बोधकल्पनापीति प्रतिभाति । यत्तु नोइन्द्रियप्रत्यक्षामित्यत्र नोइन्द्रियपदस्य मनोथेकत्वात्तन्निमित्तकं ज्ञानं प्रत्यक्षमेवेति, तदनागमिक, तत्र नोइन्द्रियपदस्येन्द्रियाभावार्थकत्वादन्यथाऽपयोतावस्थायामपि भाविनोऽवधिज्ञानस्यामनस्कप्रत्यक्षस्य चासाहप्रसङ्गादिति ॥ ४॥ नन्वेवं कृता सप्रसङ्ग विभागव्यवस्था, न चेयमुपपत्तिमती मतिश्रतयोः स्वाम्यादिसाधर्म्यप्रतिपादनेन तदभेदशङ्काया एवोदयात, न च भेदगर्भसाधर्म्यज्ञानान तदुदय इति वाच्यम, असाधारणधर्मज्ञानेन तदुदयादित्यत आह इन्द्रियनज्ञानस्य परोक्षस्वकथनमुत्सूत्रमिति प्रश्न प्रतिविधानम् , तत्रा न्यपि शङ्कासमा धानाम्या चर्चितम् ॥ . LAPLOMAN ॥४ ॥ Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भिन्ने स्वाम्यादिसाधर्म्या - यद्यपि मतिश्रुते ॥ लक्षणादिकृतो भेद - स्तथापि स्फुटमेतयोः ॥ ५ ॥ साधर्म्य खल्वभेदो वैधर्म्यं च भेदः, न चानयोरसमावेशः, प्रमेयत्वादिना सर्वेषां साधर्म्येऽपि मिथो भेददर्शनात्, एवं च मदि श्रुतयोः स्वाम्यादिसाम्येऽपि लक्षणभेदादविरुद्धो भेदः । उक्तञ्च - "सामित्ताइविसेसा - भावाओ महसुएगया णाम । लक्खणभेआइकयं, णाणत्तं तयविसेसेवि ॥ ९६ ॥" [ स्वामित्वादिविशेषाभावाद्मतिश्रुतैकता नाम । लक्षणभेदादिकृतं नानात्वं तदविशेषेऽपि ] अथ भेदे लक्षणादिकृतत्वं तज्ज्ञानज्ञाप्यत्वं साध्यसाधनयोरभेदे न सम्भवतीति चेत्, न, श्रुतलक्षणेन श्रुते मतिवैधर्म्यरूपस्य तस्य मत्यवृत्तिधर्मत्वेन साध्यत्वे तदविशेषाच्छ्रते श्रुतत्वग्रहेऽपि मत्यवृत्तित्वेन तदग्रहेसि द्वसाधनानत्र का शादिति ॥ ५॥ अथ लक्षणादयश्व लक्षण - हेतु-फल-भाव-भेदे-न्द्रियविभाग - वल्का - Sक्षर - मूकेतराणि, तत्र 'यथोद्देशं निर्देश' इति न्यायात्प्रथमं लक्षणभेदमेवाह – श्रुतं श्रुतानुसार स्यान्मतिरन्यत्परोक्षजम् ॥ श्रुतं शब्दात्मकं गौणं, व्युत्पत्यर्थात्तु ( तु) लक्षणे || ६ || श्रुतानुसारि ज्ञानं श्रुतं, तदननुसारित्वे सतीन्द्रियमनोजन्यं च ज्ञानं मतिः । एवं च - "इन्दियमणोनिमित्तं, जं विभाणं सुआणुसारेणं ।। णिययत्थुत्तिसमत्थं तं भावसुअं मई सेसं ॥१००॥ " [ इन्द्रियमनोनिमित्तं, यद्विज्ञानं श्रुतानुसारेण ।। निजकार्थोक्तिसमर्थ, तद्भावश्रुतं मतिः शेषम् ॥ ] इत्यत्र इन्द्रियमनोनिमित्तमिति विशेषणं शेषमित्यत्र योज्यं श्रुतानुसारित्वस्यैव श्रुतलक्षणत्वे निजकार्थोक्तिसमर्थत्ववत्तस्य स्वरूपविशेषणत्वेनाऽव्यावर्त्तकत्वात् श्रुताननुसारित्वस्यावध्यादाव - |तिप्रसक्तत्वेन तद्वारणाय मतिलक्षणे तु तदुपयुक्तमिति, अथ किं तत् श्रुतानुसारित्वं न तावच्छन्द जन्यत्वं शब्दावग्रहादीनामपि तथात्वात् नापि तद्धीजन्यत्वं तदनुव्यवसायेऽतिव्याप्तेः, नाऽपि पदजन्यपदार्थोपस्थितिजन्यत्वं शाब्दातिरिक्त श्रुतज्ञानाऽव्याप्तेः, भाष्यसंवादेन |मतिश्रुतयोः स्वाम्यादि साधर्म्याद भेदेऽपि क क्षणादिकृतो भेद:, मति श्रुतयो लक्षणभेदनिरूपणं, श्रतानुसा रिवे प्रश्नश्व || Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना प्रकरणम्॥ नापि पदधीजन्यत्वाव्यभिचारिजातिमत्त्वं, शाब्दोपमित्यतिरिक्ताव्याप्तेः, श्रुतनिश्रितमतिज्ञानेऽतिव्याप्तेश्च । स्यादेतव, श्रुतत्वजातिः साक्षात्परम्परया वा पदधीजन्यत्वं न व्यभिचरति, अभिलापप्लावितानां घटत्वादीनामपि पचरागत्वादेरिवोपदेशसहकृतेन्द्रियवेद्यत्वात्, अन्यथा कदाचिदप्यनाकलितघटपदसकेतानां घटत्वादिग्रहप्रसङ्गात्, अथ पद्यरागत्वादिकमप्युपदेशासहकृतेन्द्रियवेद्यमेव 'कान्तिविशेषवान्मणिः पाराग' इत्युपदेशस्तु पद्मरागपदवाच्यत्वोपमितावुपयुज्यत इति चेत. न, एवं सत्यनाकलितोपदेशानां पद्मरागमहं वेद्यीत्यनुव्यवसायप्रसङ्गात्पबरागपदाभिलापप्रसङ्गाच्च, मतिज्ञानं तु न तथेति न तत्रातिव्याप्तिः। न च तथापि पदधीजन्यत्वाव्यभिचारिश्रुतनिश्रितत्वजातिमति मतिज्ञानेऽतिव्याप्तिस्तस्य सङ्केतग्रहशाब्दबोधप्रसूतसंस्कारजन्यत्वनियमात्संस्काराद्वारकजन्यत्वविवक्षणे शब्दानुभूतस्मरणाव्याप्तरिति वाच्यम् , जातिपदस्य ज्ञानत्वसाक्षादव्याप्यजातिपरत्वे दोषाभावात् , श्रुतनिश्रितस्यापि संस्कारद्वारा श्रुताजन्यत्वाच, अन्यथा तस्य स्मृतित्वापत्तेः, अथ "पुवि सुअपरिकम्मिअ-मइस्स जं संपयं सुआईअं। तं सुअनिस्सि" इत्यागमेन व्यवहारकाले श्रुताननुसारित्वे सति श्रताभ्यासपाटवप्रमतत्वस्य निश्रार्थत्वे मतेर्दृढतरसंस्कारद्वारा श्रुतजन्यत्वं तस्य निर्वाधमिति चेत्, न, तत्राऽभ्यासपाटवपदस्य क्षयोपशमपाटवार्थकत्वात्, अन्यथा संस्कारस्यानुभूतमात्रोपनायकतया श्रुतनिश्रिते श्रुताननुभूतानां नानाधर्माणामभानप्रसङ्गाद्, एवं सूत्रेऽपि परिकार्मितपदं पटकृतपरं, मतिपदं मतिलब्धिपरमिति न कोऽपि दोषः, अन्यथा तत्र श्रुतातीतत्वस्यानुक्तिसहत्वात्कालव्यवधानस्य विविच्य दुहत्वात्, मैवं, पदधीप्रयोजकविवक्षारूपश्रुतज्ञानस्य पदज्ञानाजन्यत्वेन श्रुतत्वस्य पदधीजन्यत्वव्यमिचारित्वात्परागत्वादिग्रह इव घटत्वादिग्रहेऽप्युपदेशानपेक्षणाच्च, नापि साभिलापत्वं, तद्धि साकारत्वं वा शन्दविषयत्वं वामिलाप तत्र शब्दज न्यत्वशब्द धीजन्यत्वपदजन्यपदा योऽपस्थितिजन्यत्वपदधीजन्यत्वाव्यभिचारिजातिमत्वानां श्रुता नुसारित्व रूपताया: खण्डनम् । ॐ Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ योग्यत्वं वा, त्रितयस्य तस्य साकारत्वाच्छन्दविषयत्वादभिलापयोग्यत्वादिदमव घ्यादावतिव्याप्तं भाषावर्गणादिमतोऽभिलाप्यज्ञानस्यैवाभिलाप्यप्रयोजकत्वाच्च, अथ शब्दोपरागेणार्थावगाहित्वं तत्, तदुपरागश्च संज्ञास्मृतिजन्यतावच्छेदको विषयताविशेषः स च नावध्यादौ तस्य स्मृत्यजन्यत्वाद्, अस्ति च श्रुतज्ञाने सर्वत्र सः पूर्वं शब्दार्थयोः सङ्केतग्रहादर्थदर्शनोबुद्धसंस्कारेण प्रतिसम्बन्धिशब्दस्मरणोत्तरमेव तदभ्युगमात्, अत एव घटमनुभवामीति शब्दोपरागेणैव तदनुव्यवसाय इति चेत्, न, ईहादिरूपमतिज्ञानातिव्याप्तेः, संज्ञास्मरणाजन्यशाब्दबोधादावव्याप्तेरवग्रहोत्तरं संज्ञास्मरणाविलम्बेनैवेहादिदर्शनाच्च, एतेन " शब्दानुपरागेणाऽर्थावग्राह्मवृत्तिज्ञानत्वसाक्षाद्व्याप्यजातिमत्त्वं तत्' इत्यपि निरस्तमिति चेत्, अत्रोच्यते, पदधीविषयकधीजन्यत्वाव्यभिचारिजातिमत्त्वं तत्, विवक्षारूप श्रुतस्यापि पदेष्टसाधनताधीरूपपदविषयकधीजन्यत्वादुपदेश निरपेक्षेन्द्रियजन्यज्ञानस्य च मतिज्ञानरूपत्वेनालक्ष्यत्वात् यद्वा व्यक्तश्रुतस्यैव लक्ष्यत्वेनाऽव्यक्तश्रुताव्याप्त्यभावात्, अथवा शब्दानुपरागेणार्थावग्राह्यवृतिज्ञानत्वसाक्षाद्व्याप्यजातिमत्त्वं तद् अस्ति हि सर्वत्र श्रुतेऽर्थदर्शनोबुद्धसंस्कारप्रमृतशब्दोपरागशालित्वम्, न तु मतिज्ञानादौ, अवग्रहादिरूपे तत्र तदभावात् न च संस्कारजन्यत्वेन स्मृतित्वापत्तिः प्रत्यभिज्ञाया इव संस्कारजन्यस्यापि श्रुतविशेषस्यातथात्वसम्भवात्, न च संस्कारेणेहाद्युत्पत्तिकाले स्मृत्युत्पत्त्यापत्तिः स्मृतिसामग्रयपेक्षयाऽनुभवसामग्रथा बलवत्वाद्, अथवा श्रुतज्ञानावरण कर्मक्षयोपशमप्रयोज्य एव सर्वत्र श्रुते शब्दोपरागः, अत एवैकेन्द्रियाणां तादृशसंस्कारविरहेऽपि न क्षतिरिति । अर्थावभासिनि श्रुते समानसंवित्संवेद्यतयैव पदोपराग इत्यपरे, प्रत्यक्षे विद्यमानत्वमिव श्रुतज्ञाने पदवाच्यत्वं संसर्गतयैव भासते स एव शब्दोपराग इत्यन्ये, यत्तु शब्दाननुविद्धं ज्ञानमेव नास्ति । तदुक्तं " न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके, साकारत्वशब्दविषय. स्वाभिलाप योग्यत्वशदोपरागेणार्थावगाहित्यै तदन्यतमरू पस्य साभिळापत्वस्य श्रु तानुसारित्व रूपतायाः, खण्डनं तत्प्रति विधानं च । Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना प्रकरणम् ॥ RECEIRECEKAR यः शब्दानुगमाहते ॥ अनुविद्धमिव ज्ञानं, सर्व शब्देन गम्यते ॥१॥" इति वैयाकरणमतं तदसत्, केवलार्थदर्शनं विना संस्कारोबोधाभावेन शब्दानि सादर्थभासकसामग्रथैव शब्दावभासाभ्युपगमे चाव्युत्पन्नानामपि तदवभासप्रसङ्गात, व्युत्पन्नानां विविच्य पदोपरागेणार्थप्रत्ययोऽव्युत्पन्नानां तु सामान्यत इति चेत्, अर्थविशेषे भासमाने शब्दविशेषनिर्मासस्यैव प्रत्यक्षसिद्धत्वादिति दिग् । ननु यद्येते मतिश्रुतलक्षणे तदा, 'अभिणिबुझइत्ति आभिणियोहिअं, सुणेइ ति सुति सूत्रोक्ते लक्षणे कथं समगसातामिति चेत्, अत्रासाधारणधर्मरूपलक्षणोक्तस्तत्र च व्युत्पत्तिनिमित्तरूपतदुक्तेः, तथापि श्रूयत इति श्रुतमिति कर्मव्युत्पत्त्या शब्द एव श्रुतं स्यात्, न चायमात्मभाव इति चेत्, वक्तृमुखनिर्गतस्य तस्य श्रोतृश्रुतज्ञानकारणत्वेन वक्तृश्रुतोपयोगस्य च व्याख्यानादौ शब्दकारणत्वेनोपचारादेव तस्य श्रुतत्वाभिधानात्, परमार्थतस्तु श्रुणोतीतेि श्रुतमिति कर्तृव्युत्पच्या जीवानन्यश्रुतोपयोगस्यैव श्रुतपदप्रवृत्तिनिमित्ताक्रान्तत्वात ॥ आह च-"जमभिणिबुज्झइ तमभिणिबोहो जं सुणइ ते सुअंभणि ॥ सई सुणइ जइ तओ नाणं तो नाऽऽयभावो तं ॥९८॥ [यदभिनिबुध्यते तदभिनिबोधो यत् शृणोति तत् श्रुतं भणितं ॥ शब्दं शृणोति यदि सको ज्ञानं ततो नात्मभावस्तत् ] सुअकारणं जओ सो सुअंच तकारणं ति तो तम्मि ॥ कीरइ सुओवआरो, सुअं तु परमत्थओ जीवो ।। ९९॥" [श्रुतकारणं यतः स श्रुतं च तत्कारणमिति ततस्तस्मिन् ॥ क्रियते श्रुतोपचारः श्रुतं तु परमार्थतो जीवति ॥ अत्रापि व्युत्पत्त्यर्थमुपजीव्य जातिगर्भलक्षणे न दोषः ॥६॥ __ यथाश्रुतं लक्षणमव्याप्तिप्रसङ्गपरिहाराभ्यां समर्थयति ॥ कथमेकेन्द्रियाणां तद्, नूनं सुप्तयतेरिव ॥ भाषाओंत्राद्यभावेऽपि, क्षयोपशमसम्भवम् ॥७॥ शब्दाननविद्धं ज्ञानमिव नास्तीति बैयाकरणमतस्य खण्डनम्, प्रकृतमतिश्रुतलक्षणविलक्षणसूत्रोक्त लक्षणसङ्गतत्वोपवर्णनं OMG Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यद्यप्येकेन्द्रियाणामव्यक्तं श्रुतं नोक्तलक्षणाक्रान्तं तथापि सुप्तयतिश्रुतस्योक्तजातिगर्भलक्षणाक्रान्तत्वाद् व्यक्तयुतस्यैव लक्ष्यत्वाद्वा न दोषः ।। न चाव्यक्तश्रुते मानाभावः १, स्वापाद्यवस्थोत्तरमपि व्यक्तीभवद् भावश्रुतं दृष्ट्वा पयसि सर्पिष इव प्रागप्यव्यक्तश्रुतस्यानुमानात् इति सम्प्रदायः॥ ननु भावश्रुतव्यक्ती भावस्य न तज्जातीयशक्त्यनुमापकत्वं पर्यायव्यक्तेद्रव्यरूपशक्तेरेव व्याप्यत्वात्, तावतैव सदसत्कार्यवादनिर्वाहात्, अन्यथाऽस्मदादीनामपि केवलज्ञानव्यक्तिजातीयतच्छा क्तप्रसङ्गात्, इति चेत, न, भावश्रुतेन तदा स्वकारणक्षयोपशमानुमाने तेन तत्कार्याव्यक्तश्रुतानुमानमित्याशयाद्, वस्तुतः सुषुप्ताद्यवस्थायामाप श्वासप्रश्वासादिसन्तानोऽव्यक्तचैतन्यप्रयुक्त एवेति तेन तदनुमानम्, अत एव सुप्तमूच्छितादीनां जलसेकादिप्रतिकारेणाऽव्यक्तचैतन्यमेवाभिव्यज्यत इति अनुभवः, सुषुप्तोत्थितस्य ' सुखमहमस्वाप्तं न किञ्चिदवेदिषम्' इत्यनुभवस्तु नकिञ्चित्पदोपरागेणाऽव्यक्तज्ञानमेवावगाहते । स्यादेतत् इन्द्रियवृत्तिनिरोधेन सुषुप्तौ ज्ञानमनुपपन्नं, न च तदैवाघ्राणोपनीत कुसुमगन्धादि - मानापतिः, जन्यज्ञानत्वावच्छिन्नं प्रति त्वङ्मनोयोगस्य विजातीयात्ममनोयोगस्य वा हेतुत्वेन तदानीं तदभावे जन्यज्ञानमात्रस्यैवानुपपत्तेरिति, मैवं, द्रव्येन्द्रियोपरोधेऽपि तदानीं भावेन्द्रियज्ञानसम्भवाद्दर्शनावरणकर्मप्रकृतिविशेषरूपायाः सुषुप्तेर्व्यक्तचक्षुर्दर्शनादेरेवोपघातित्वात्,अत एव ‘'भाषा श्रोत्रलब्धिविरहेण सुप्तयतेरिवै केन्द्रियाणां भावश्रुतं न भवति' इत्यपि परास्तं, द्रव्येन्द्रियोपरोधेऽपि भावेन्द्रियज्ञानवद् भाषाश्रोत्रलब्धिद्रव्यश्रुतादिवैकल्ये ऽपि तेषां भावश्रुतसम्भवाद्, वृद्धिसङ्कोचनादिनिधान मूलनिधानकामिनीस्पर्शजनितातिशयलिङ्गकाहार भयपरिग्रहमैथुनसञ्ज्ञानां तेषु साक्षादुपलम्भाच्च । आह च भाष्यकार:- "जइ सुअलक्खणमेयं, तो न तमेगिंदिआण संभवइ ॥ दव्त्रसुझाभावम्मि वि, भावसुअं सुतजइणो व्व ॥ १०१ ॥ " [यदि श्रुतलक्षणमेतत्ततो न तदेकेन्द्रियाणां २ लक्षणभेदाम्मतिश्रुतयोर्भेदप्रसङ्गे श्रुतो लक्ष णस्याव्या प्त्यादिपरि हारेण निष्ट ङ्कनं, एकेन्द्रियेष्वपि श्रुतसिद्धिश्व ॥ Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विवरणं श्रीज्ञानाजैवप्रकरणम्। ॥७॥ सम्भवति ॥ द्रव्यश्रुताभावेऽपि, भावश्रुतं सुप्तयतेरिव ] “ भावसुखं भासासो - अलद्विणो जुखए ण इयरस्स || भासाभिम्नुहस्स जयं, सोऊण य जं हवेज्जाहि ॥ १०२ || ” [ भावश्रुतं भाषाश्रोत्र - लब्धेर्युज्यते नेतरस्य । भाषाभिमुखस्य यत् श्रुत्वा च यद् भवेत् ] “ जह सुडुमं भाविंदिअ - नाणं दुव्विदिआवरोहे वि ।। तह दव्वसुआभावे, भावसु पत्थिवाईणं ॥ १०३ ॥ " [ यथा सूक्ष्मं भावेन्द्रियज्ञानं द्रव्येन्द्रियावरोधेऽपि ॥ तथा द्रव्यश्रुताभावे, भावश्रुतं पृथिव्यादीनाम् ] ति ॥ परममुनि · वचनप्रामाण्याचेदमित्थमवगन्तव्यम् । यत्त्वर्थग्रहणशक्तिरूपस्य लब्धीन्द्रियस्यार्थग्रहणे व्यापाररूपेणोपयोगेन्द्रियेण व्यवधानादहेतुत्वम्, आकरे व्यवस्थापितं च सुषुप्तौ ज्ञानानुत्पत्तिनिर्व्वाहायार्थग्रहणव्यापाररूपत्वमुपयोगस्य, तत्प्रमाणनिरूपणप्रस्तावाद् व्यक्तज्ञानमाश्रित्यावसेयम्, अन्यथा सामग्रीसत्त्वे उपयोगाभावोऽपि तदानीं कुत इत्यत्र किमभिधानीयं स्याद् विना क्षयोपशमवृत्यलाभं, तदभावे तु क्षयोपशमविशेषस्यैवोपयोगहेतुतया 'तद्धेतोः' इति न्यायेनान्ततस्तद्वारार्थग्रहणहेतुत्वकल्पनौचित्यात् ॥ स्वत एव केवलिनो विहाय शेषसंसारिणां तारतम्येन द्रव्येन्द्रियेष्वसत्स्वपि लब्धीन्द्रियपश्ञ्चकावरणक्षयोपशमनिष्पमा मतिरस्त्येवेति परममुनिवचनम् ॥ ७ ॥ नन्वेवमेकेन्द्रियाणामव्यक्तमतिश्रुते इव विनिगमनाविरहादव्यक्तावध्यादिप्रसङ्ग इत्याशङ्कायामाह - न चाध्यादिकं तत् स्या- दागमानुपदेशतः । तत्कारणगुणाभावा- दक्षजन्यतया तथा ॥ ८ ॥ न खल्वेकेन्द्रियाणामव्यक्तं ज्ञानमवष्यादिकं भवितुमर्हति, केवलज्ञानस्य तावत् क्षायिकत्वाद्, अवधिमनःपर्याययोश्च क्षयोपशमस्य तत्कार्यादर्शनेन तेष्वनुपदेशात् उक्तश्च - "एवं सव्वपसंगो, न तदावरणाणमक्खओवसमा || महसुअनाणावरण एकेन्द्रियेण्य व्यक्तमति श्रुतसमर्थनं, तेषु च मति श्रुतवदवध्यादिसंभबाशंकानिरा सश्व ॥ ॥७॥ Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्खओवसमओ मइसुआई ।। १०४ ॥ " [ एवं सर्वप्रसङ्गः न - तदावरणानामक्षयोपशमात् ॥ मतिश्रुतज्ञानावरण-क्षयोपशमतो मतिश्रुते ] चि ॥ अपि चावध्यादौ गुणस्य हेतुत्वात्, तद्विरहादेव नैकेन्द्रियेषु तदुत्पत्तिसम्भवः, व्यक्तावधित्वादेर्गुणजन्यतावच्छेदकत्वकल्पने चातिगौरवात् न च व्यक्तमत्यादिकल्पनेऽपि व्यक्तमत्यादाविन्द्रियादिहेतुत्वकल्पने समानं गौरवमिति वाच्यम्, मीतलब्ध्यादावनुगतप्रत्यासत्तिविरहेण, इन्द्रियत्वादिनाऽहेतुत्वे विशिष्यतद्धेतुत्वावश्यकत्वात्, अत्र चानुगतस्य गुणस्य हेतुत्वेन तदसाम्यात्, स्यादेतद्, अवधिज्ञानस्य भवप्रत्ययकत्व - गुणप्रत्ययकत्वाभ्यां द्वैविध्यात्, विजातीयावधिज्ञान एव गुणस्य हेतुत्वात्, तद्विजातीयमव्यक्तं तदेकेन्द्रियाणां भविष्यति, युक्तं चैतत् मतिश्रुतयेोर्द्वयोर व्यक्तत्वकल्पनापेक्षयैकस्यैवावस्तस्वकल्पनौचित्यात्, मैवम्, भवप्रत्ययिकेऽपि तत्र गुणस्य हेतुत्वात्तत्र भवनिमित्ततामात्रेणैव तत्प्रत्ययकत्वव्यवहाराद्, भवस्य हेतुत्वेऽपि देवभवादेर्विशिष्यैव हेतुत्वात्, प्रत्येकमादायोक्तगौरवस्याविशेषाच्च, किश्वावध्यादेरात्ममात्रजन्यत्वं व्यवस्थितम्, न चैकेन्द्रियाणां ज्ञानोत्पत्तावात्ममात्राधिकार इति न तेषामवध्यादिकमित्याद्यूहनीयम् ॥ ८ ॥ उक्तो लक्षणभेदान्मतिश्रुतयोर्भेदः, अथ हेतुफलभावाचद्भेदमुपदर्शयति श्रुतस्य मतिपूर्वत्वं श्रुतमित्यनयोर्भिदा || यौगपद्यं तु तलब्ध्यो- रिष्टमेवोपयोगयोः ॥ ९ ॥ 'मइपुव्वगं सुतम्' इत्यागमेन हि श्रुतस्य मतिहेतुकत्वं प्रतिपाद्यते, पूर्वपदस्य हेतुत्वार्थकत्वात्, 'सम्यग्ज्ञानपूर्विका पुरुषार्थसिद्धिः' इत्यादौ तथादर्शनात् पृधात्वर्थस्य कारण एवान्वयात्, तथाहि कारणेनैव सताऽनुप्रेक्षादिकालीनोहापरपर्यायेण मतिज्ञानेन श्रुतज्ञानं पूर्यते वृद्धि नीयत इति यावत्, एवश्च दृढस्मृतिरूपश्रुतज्ञाने ऊहस्य हेतुत्वं पर्यवस्यति, तथाभूतमत्यैव एकेन्द्रियेष्व वध्यादिज्ञा नाभावसम र्थनं, हेतुफ लभावान्म |तिश्रुतयोर्भेदोपदर्शनोप क्रमश्व Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ह 191 सविवरणं | Pचान्यतस्तत्प्राप्यते, गृह्यते परोपदेशश्रवणादिरूपमतरेव तदाहितसंस्कारद्वारा श्रुतहेतुत्वाद्, एवं च श्रुतमात्र एव द्रव्यश्रुतग्रहणस्य श्रीज्ञाना- हेतुत्वं लभ्यते, तथाभूतयैव च तयाञ्यस्मै तद् दीयते व्याख्यायते, एवञ्च व्याख्यानुकूलश्रुतसङ्कल्पे तदिष्टसाधनतामते हेतुत्वं व्यज्यते तथाभूतयैव च मत्या परावर्त्तनचिन्तनद्वारा गृहीतं श्रुतं स्थिरीक्रियते, इत्थं चाविस्मृत्यनुकूलधारणाच्या - प्रकरणम्॥ पाररूपाया मतेरुत्तरकालिकपरिस्फूर्तिरूपश्रुतहेतुत्वं व्यवस्थाप्यते, यद्यपि 'पृपालनपूरणयोः' इतिपाठात्प्राप्त्यादर्नेतद्धात्वर्थत्वम् , तथापि प्राप्तिदानयोः पूरणविशेषत्वाद् न किञ्चिदनुपपनम् , एवञ्च मतिश्रुते कार्यकारणभावादेव परस्परं भिद्यते ॥ अभेदे सव्येतरगोविषाणयोरिव कार्यकारणभावाभावात , आह च-"महपुव्वं सुअमुत्तं, ण मई सुयपुब्बिआ विसेसोयं ॥ पुचि पालणपूरण-भावाओ जे मई तस्स ॥ १०५॥" [मतिपूर्व श्रुतमुक्तं, न मतिः श्रुतपूर्विका विशेषोऽयम् । पूर्व पालनपूरणभावात् यन्मतिस्तस्य ] " पूरिज्जइ पाविजइ, दिजइ वा जं मईइ नाऽमइणा ॥ पालिज्जइ अ मईए, गहियं इहरा पणस्सेज्जा ॥१०६॥" [पूर्यते प्राप्यते दीयते वा यन्मत्या नाऽमत्या ॥ पाल्यते च मत्या गृहीतं, इतरथा प्रणश्येत् ॥] यद्यपि प्रागभावावच्छिनकालसम्बन्ध एवं पूर्वपदार्थो नतु कारणत्वं गौरवात् , अकारणेऽपि पूर्वपदव्यवहाराच्च, तथाप्यन्वयव्यतिरेकाम्या मतेः | श्रुतहेतुत्वावधारणादत्र पूर्वपदस्य कारणत्वे लक्षणा, न चात्र बीजाभावस्तात्पर्यान्यथानुपपत्तरेवैतद्वीजत्वात्, तथातात्पर्य विनतदभिधानस्य निष्प्रयोजनत्वात्, ननु ज्ञानाज्ञानरूपयोर्मतिश्रुतयोः पृथक् समकालमेव लाभोपदेशात् कथं तयोर्हेतुहेतुमद्भाव, अन्यथाप्रतिपत्तों तु मतिज्ञानलाभकाले श्रुतज्ञानालाभात, श्रुताज्ञानानिवृतिप्रसमादन्यज्ञानस्याज्ञानानिवत्तेकत्वादिति चेत्, लब्धिरूपमतिश्रुतयोर्लाभस्यैव योगपद्योक्तः, उपयोगयोस्तु तथास्वाभाब्यात्क्रमोत्पत्तेरेव व्यवस्थितत्वात्, आह च-"नाणाण हेतुफलमावान्मतिश्रुत यो)दोपदर्शनं तत्र पृधात्वर्थप्रपञ्चनं तत्र भाष्यसंवादः पूर्वपदस्य ५ कारणत्वेलक्षणायां बीजप्रदर्शन CARE ॥ ८ Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 3 ण्णाणाणि य, समकालाई जओ महसुआई ॥ तो न सुझं मइपुवं, मइनाणे वा सुअन्नाण।।१०७॥ इह लद्धिमइसुआई, समकालाई, मतिश्रुतलनतूबओगो सिं ।। मइपुवं सुमिह पुण, सुओवओगो मइप्पभवो ॥१०८॥ त्ति ॥ [ज्ञाने अज्ञाने च समकाले यतो मतिश्रुते । १५व्योः समततो न श्रुतं मतिपूर्व मतिज्ञान वा श्रुताऽज्ञानम् ॥ इह लब्धिमतिश्रुते समकाले, नतूपयोगोऽनयोः । मतिपूर्व श्रुतमिह पुनः, श्रुतो- कालत्वेन तपयोगो मतिप्रभवः] ॥९॥ अथ श्रुतस्य मतिपूर्वत्वमिव मतेरपि श्रवणजन्यायाः श्रुतपूर्वत्वमस्तीत्यविशेष निराकर्तुमाह- 12 योरित्यत्र न भावश्रुतजन्यापि, द्रव्यश्रुतभवा मतिः॥ न तस्यामस्ति वैजात्य-मुत्कर्षो वा पुरस्कृतः॥१०॥ भाष्यसंवाद: परस्माच्छब्दं श्रुत्वा प्रादुर्भवन्ती मतिर्न भावश्रुतजन्या किं तु द्रव्यश्रुतप्रभवैव, श्रवणानुकूलक्षयोपशमोद्बोधकस्य शब्द- मते: भावस्यैव तद्धेतुत्वाद्, अन्यादृशश्रुतपूर्वत्वं तु मतेने वारयामः श्रुतोपयोगाच्च्युतस्य मत्युपयोग एवावस्थानाद् ॥ आह च-"सोऊण जा श्रुतजन्यत्वमई मे, सा सुअपुन्च त्ति तेण ण विसेसो ॥ सा दव्वसुअप्पभवा, भावसुआओ मई णत्थि ॥१०९॥"[श्रुत्वा या मतिर्भवतां, सा शङ्गाऽपाकरभुतपूर्वेति तेन न विशेषः॥ सा.द्रव्यश्रुतप्रभवा, भावतान्मतिर्नास्ति।]"कज्जतया ण उ कमसो, कमेण को वा मई णिवारेइ॥ णम् द्रव्यजं तत्थावत्थाणं, चुअस्स सुत्तोवोगाओ ॥११०॥" [कार्यतया न तु क्रमशः, क्रमेण को वा मति निवारयति ॥ यत्तत्रावस्थान, च्युतस्य श्रुतोपयोगात् ॥]त्ति ॥ यद्यप्यनयोरविशिष्टमपि पौपियं भेदकमेव, तथापि वस्तुगत्यनुरोधेनायं प्रयास इति ऋजवः, सम्मतिः एकजातीयत्वेऽपि व्यक्तिपौर्वापर्यसम्भवाज्जात्यैव पौर्वापर्यस्य भेदकत्वात् तनिर्वाहककार्यकारणभावव्यवस्थापन, तनिहाय च विशेषसमर्थनं सफलमिति यौक्तिकाः॥ कार्यकारणभावेन भेदनिरूपणापयिकप्रासङ्गिकसूत्रसमर्थनायेदमिति साम्पदायिकाः। ननु मतिर्न श्रुतजन्येत्यसङ्गतं श्रुतनिश्रितमतिज्ञानस्य श्रुतजन्यत्वात्, इति चेत्,न, श्रुतप्रसूतक्षयोपशमविशेषस्यैव तद्धेतु श्रुतमत्वे च विशेषसमर्थनं सफलकिपीर्वापर्यसम्भवाज्जात्यैव पावापायापर्य भेदकमेव, तथापि वस्तुगत्यमा CMC4 Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना र्णव प्रकरणम् ॥ ॥९॥ त्वात्, श्रुतजन्यतावच्छेदकजातिकल्पने मानाभावाद्, अस्तु वा तत्र तद्धेतुत्वम्, तथाप्यत्र सामान् सामान्यतो भेदोपयोगितया ग्राह्यः, अन्यथा सामानाधिकरण्येन भेदग्रहेऽपि सामान्यतो भेदाग्रहेण न्यूनत्वप्रसङ्गाद् अपि च पौर्वापर्येण निरूपणौपयिकोऽपि सामान्यत एवोपजीव्योपजीवकभाव इत्युक्तसूत्रौपयिकतयाप्युक्तोत्कर्ष एव ग्राह्य इति दिग् ॥१०॥ मतिपूर्वं श्रुतमित्यत्र व्याख्यान्तरं विदधतां केषाञ्चिन्मते दूषणमाह her द्रव्यतं प्राहु-मतिपूर्वं न चापरम् ॥ तेषां भावश्रुताभावो निर्बीजा कल्पना पुनः ॥ ११ ॥ मतिपूर्वं श्रुतमित्यत्र श्रुतपदं द्रव्यश्रुतपरं ' न ह्यविवक्षितं कोऽपि भाषते,' यच्च विवक्षाज्ञानं तत्किल मतिरित्येतन्मतिजन्यत्वं द्रव्यश्रुतस्यैव व्यवतिष्ठत इति केषाञ्चिदाशयः, तेषां विवक्षाज्ञाने प्राप्तमपि भावश्रुतलक्षणमुपेक्षमाणानामन्यत्रापि तदपेक्षाया अन्याय्यतया भावश्रुताभाव एव प्रसजेत्, इति निमग्नाऽनयोर्विशेषचिन्ता । आह च - "दव्वसुअं मइपुव्वं, भासह जंनाविचिन्तियं के । भावसु अस्साभावा, पावइ तेर्सि ण य विसेसो ॥ १११ ॥ [ द्रव्यश्रुतं मतिपूर्व, भाषते यद् नाऽविचिन्तितं केचित् ॥ भावश्रुतस्याभावः प्राप्नोति तेषां न च विशेषः ।।] न च मतिशब्दयोरेवात्र भेदचिन्ता सतामौचितीमश्चति तद्भेदस्यासन्दिग्धत्वेनाचिन्तनीयत्वात्, न च मतिपूर्वतया द्रव्यश्रुतस्य ततो भेदोऽपि मतेरपि शब्दपूर्वत्वेनाविशेषाद् । आह च - "दव्वसु बुद्धीओ, सा तओ जमविसेसओ तम्हति [द्रव्यभुतं बुद्धेः सापि ततो यद विशेषतस्तस्मात्।।] वस्तुतोऽनयोः सामान्यतो हेतुहेतुमद्भावाभावेन सामान्यतो भेदाऽसाधनाक्यूनत्वमपि, तस्माद् भावश्रुतं मतिपूर्वमित्येव व्याख्यानं सम्यग्, अन्यथा श्रुतपदस्य शब्दे लक्षणा निर्बीजा स्यात्, तथाहि किमत्रान्वयानुपपत्त्या लक्षणाऽऽश्रीयते, तार्त्यानुपपन्या वा, नाद्यो भावश्रुते जन्यत्वान्वयस्याऽबाधात्, न द्वितीयः, मतौ श्रुत जन्यताव च्छेदकवैजा त्याभाव: स तिपूर्वं श्रुतमित्यत्रोत्क विशेषादरः व्याख्यान्तरें दूषणं तत्र भाष्यस म्मतिः ॥ ॥ ९ ॥ Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 'सुणेइ त्ति सुअं' इत्यत्र व्युत्पत्यर्थगृहीते शब्दे मतिजन्यत्वतात्पर्यानुपपत्त्या तदाश्रयणस्य वक्तुमयुक्तत्वाद्, भेदचिन्ताया अप्रस्तुतत्वेन तत्र तज्जन्यत्वतात्पर्यानाकलनात्, स्यादेतत्, मत्यादीयमानस्य श्रुतस्य शब्दद्वारैव मतिजन्यत्वात्तत्र तत्पूर्वत्वं प्रतिपाद्यमानं श्रुत एव पर्यवस्यतीति, मैवम्, एतादृशमतिपूर्वत्वस्य सर्वत्रासम्भवात् एतेन द्रव्यश्रुते मतिपूर्वत्वप्रतिपादनस्य भावश्रुतभेदचिन्तौ - पयिकतया नार्थान्तरत्वमित्युक्तावपि न क्षतिः, नन्वेवमत्र द्रव्यश्रुते व्युत्पत्त्यर्थानुसरणमप्ययुक्तमनौपयिकत्वात्, इति चेत्, न, भावश्रुतलक्षणत्वेन तस्योपादेयत्वाद् ।। आह च - "भावसु मइपुव्वं, दव्वसुअं लक्खणं तस्स ॥ ११२ ॥ [भावश्रुतं मतिपूर्व, द्रव्यश्रुतं लक्षणं तस्य ] अत्र लक्ष्यते गम्यतेऽनेनेति लक्षणं लिङ्गमित्यर्थ इत्याहुः, वस्तुतो लक्षणं लक्षणघटकमित्यर्थोऽपि प्रागुक्तरीत्याऽनुसरणीयः, एवश्वच कार्यभूतेन लक्षणघटकेन वा शब्देन स्वकारणीभूतस्य स्वघटितलक्षणलक्ष्यस्य वा विवक्षारूपस्य भावश्रुतस्यैव लक्षणात्, तत्र मतित्वप्रतिपादनं परेषां विपरीतमिति ध्येयम् ।। आह च - "सुअविभाणप्पभवं, दव्वसुअमियं जओ विचिन्तेउं ॥ पुबि पच्छा भासह, लक्खिज्जइ तेण भावसु ॥ ११३ ॥ " [भुतविज्ञानप्रभवं द्रव्यश्रुतमिदं यतो 'विचिन्त्य ॥ पूर्वं पश्चाद् भाषते, लक्ष्यते तेन भावश्रुतम् ॥ |]॥ ११ ॥ अथ नन्द्यध्ययने मतिश्रुतयोः कार्यकारणभावेन भेदप्रतिपादनानन्तरं स्वस्थाने सम्यक्त्वमिध्यात्वपरिग्रहात्तयोर्भेदप्रतिपादनायेदं सूत्रमस्ति, तद्यथा । “अविसेसिआ मई मइनाणं मइअन्नाणं च विसेसिआ मई सम्मदिट्ठिस्स मई महनाणं, मिच्छादिट्ठिस्स मई महअन्नाणं || अविसेसिअं सुअं सुअनाणं सुअअन्नाणं च विसेसिअं सुयं सम्मद्दिहिस्स सुअं सुअनाणं, मिच्छदिट्ठिस्स सुअं सुअअमाणंति” [ अविशेषिता मतिर्मतिज्ञानं च मत्यज्ञानं च ॥ विशेषिता मतिः सम्यग्दृष्टेर्मतिर्मतिज्ञानं, मिध्यादृष्टेर्मतिर्मत्यज्ञानं ।। एवं अविशेषितं श्रुतं श्रुतज्ञानं श्रुताज्ञानं च विशेषितं श्रुतं सम्यग्दृष्टेः श्रुतं श्रुतज्ञानं, मिथ्यादृष्टेः व्याख्या न्तरे श्रुत पदस्य द्रव्य श्रुते लक्षणा बीजाभावः व्युत्पत्त्यर्थ नुसरणौपविमिकफले भाप्यसंवादः तयोः सम्बक्त्वमिथ्यात्वे विवेचिते न दिसूत्र वादात् Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना प्रकरणम्॥ RECENCE श्रुताज्ञानम् ] अतोऽत्राप्येनमर्थ भाष्यसम्प्रदायमनुरुन्धानोऽनुविचदिषुराहमतिश्रुते निर्विशेष, ज्ञानाज्ञाने विशेषिते ॥ सम्यग्दृशां हि ते ज्ञाने, अज्ञाने कुदृशां पुनः ॥१२॥ सम्यग्दृष्टिमिथ्यादृष्टिभावेनाऽविशेषिता मतिरेवोच्यते न तु मतिज्ञानं मत्यज्ञानं वा, सामान्यपदेन विशेषानभिधानात्, विशेषाऽभाने सामान्यस्याप्यभानापत्तिः,इति चेतन,तथापि सामान्यरूपेण विशेषभानेऽपि विशेषरूपेण तदभानाद्, एवं चाविशेषि- तामांतरित्यस्य विशेषबोधकसमभिव्याहारविनिर्मक्तमतिपदजन्यबोधविषयो मतिरित्यर्थः, न च मतिज्ञानमत्यज्ञानयोरपि वस्तुतस्ताहशबाधविषयत्वात्, अविशषितमतिव्यवहारापत्तिरित्याशक्यम,मतिज्ञानमविशेषिता मतिरिति व्यवहारोमतिज्ञानत्वावच्छेदेनावादशवाविषयत्वमवगाहते तस्यासम्भवादिति तवम एवं सम्यगदृष्टित्वविशेषिता मतिमंतिज्ञानम, मिथ्यादृष्टित्वविशेषिता च मत्यज्ञान, एव श्रुताप ज्ञेयम्।। आह च-"अविसेसिया मइच्चिय, सम्मद्दिहिस्स सा मइनाण।। मइअन्नाणं मिच्छा-दिद्धिस्स सुअंपि एमव ॥ ११४ ।। [विशषिता मतिरेव सम्यग्दृष्टः सा मतिजानम ॥ मत्यज्ञानं मिथ्यादृष्टेः श्रतमप्येवमेव ।। अत्र मतिज्ञानमत्यज्ञानयोमेतिरिति सामान्यसंज्ञा, मतिज्ञानं मत्यज्ञानश्चेति विशेषसंज्ञा द्रष्टव्या ॥ १२ ॥ ननु यथैव मतिश्रुताभ्यां सम्यग्दृष्टिघटादिकं जानीत व्यवहरति च तथा मिथ्यादृष्टिरपीति कथमेकस्य ज्ञानमपरस्य चाज्ञानमिति व्यवस्थेत्यत्राह आवशषात्सदसतो-भेवहेतुतया तथा ॥ यादच्छिकतयाऽज्ञानं, मिथ्यादृष्टेः फलं विना ॥१३॥ मिथ्यादृष्टिज्ञानं हि सदसतोर्विशेष न प्रतिपद्यते.सर्वथा घट एवायामित्यवधारणे पटगतानामपि प्रमेयत्वादीनामतथात्वेनाध्यवसायात, अन्यथा पटगतधर्मद्वारा पटरूपताया अपि तत्र सम्भवे 'सर्वथा घट एवं' इत्यवधारणानुपपत्तेः, एवं सर्वप्रकारघंटोऽस्त्ये अविशेषि-- तमतिश्रुतयोमतिश्रतवे विशेषितयोश्च तयोः सम्यग्दृष्टेर्मतिश्रुतज्ञा नत्वे मि* थ्यादृष्टर्मत्यज्ञानश्रुताज्ञानत्वे ॥१०॥ Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ RUS वेत्यवधारणे तत्राऽसतामपि पटत्वादीनामध्यवसायः, अन्यथा सर्वथापदत्यागप्रसङ्गाद्, एवं विपर्यस्तत्वादेव भवकारण तत्, भवहेतुषु हिंसादिषु मोक्षहेतुत्वाध्यवसायात, मोक्षहेतुषु वाऽहिंसादिषु भवहेतुत्वाध्यवसायाद्, यादृच्छिकोपलम्भरूपं च तद्, विरतिलक्षणं फलं विना फलशून्यं च, इत्येतेहेतुभिरज्ञानमेवेदम् ॥आह च-"सदसदविसेसणाओ, भवहेउजदिच्छिओवलंभाओं ॥ नाणफलाभावाओ, मिच्छद्दिहिस्स अनाणं ॥११५॥" [सदसदविशेषणाद् भवहेतुत्वाद्यदृच्छोपलंभात् । ज्ञानफलाभावाद् मिथ्यादृष्टरज्ञानम् ॥] त्ति ॥ १३ ॥ ननु घट एवायं घटोऽस्त्येवेत्येवमेवाध्यवसायः परेषामपि नतु सर्वथेत्याकारस्तत्र च विशेषणक्रियासगौवकाराभ्यामन्ययोगव्यवच्छेदात्यन्तायोगव्यवच्छेदयोरेव लाभात्क सदसदविशेष इति चेद् , उच्यते । सर्वथाऽनुपरागेण, घटधीर्ज्ञानमेव नः ॥ कयश्चित्परसत्ताया, आपत्ती चेन्न तद्ग्रहः ॥ १४ ॥ यदि हि घटे कथञ्चिदन्ययोगव्यवच्छेदः कथश्चिदेव चास्तित्वात्यन्तायोगव्यवच्छेदोऽध्यवसीयते तदा ज्ञानमेव तत्, अन्यथा त्वज्ञानमेव, नहि घटभिने पटादौ प्रमेयत्वादिनापि योगो घटे व्यवच्छिद्यते, न वा पटास्तित्वादेरपि घटेऽत्यन्तायोगव्यवच्छेद इति । अथ घटे घटाभिननिष्ठभेदप्रतियोगितावच्छेदकधर्मवचमन्ययोगव्यवच्छेदः, अस्तित्वे च घटनिष्ठात्यन्ताभावाप्रतियोगित्वमत्यन्तायोगव्यवच्छेदः सर्वथास्त्येव, नहि ताशप्रतियोगितानवच्छेदकधर्मवत्वं तदभावः, येन सर्वथात्वव्याघातः, किन्तु तादृशधर्मवत्त्वाभावः। न च तादृशधर्मवति ताशधर्माभावो विरोधादप्रतीतेश्व,नच सर्वेः प्रकारैरिति सर्वथार्थः, किन्तु तदभावानधिकरणत्वे सतीति चेत्,न, प्रतियोगिमत्यपि पररूपेण तदभावात, विशेषग्रहे च कथञ्चितपक्षप्रसङ्गाद्, अधकः स्याद्वादरहस्ये विस्तरः ॥१४॥ ननु तत्रापि कथमेतदज्ञानम, कथञ्चित्पक्षग्रहात.किञ्चैवमप्यवधारणविनिर्मक्तं निर्विकल्पकादिकं कथं मिथ्यादृशां न ज्ञान, ROAAAAAAAMA5 mastamnnamruinod मिथ्यादृष्टेमैतिश्रुतयोरज्ञानत्वेहे| तवो निरूपिताः स भाऽनुपरागे ज्ञानत्वमन्यथा त्वज्ञानत्व मिति | दर्शितम् ॥ MOVALUM Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविकरणं श्रीज्ञाना REK र्णव प्रकरणम्।। ॥११॥ anamaanadaanaamanamnnnnnnnnnnn नचस्यात्पदविनिर्मोकात्तस्याज्ञानत्वं नाम, सम्यग्दृशामपि स्यात्पदविनिर्माण क्वचिदज्ञानदर्शनासंसर्गतया स्यात्पदार्थविषयतायास्त्वन्यत्राऽप्यनिवारणीयत्वात्,सम्यग्दर्शनस्यैव तादृशसंसर्गकज्ञानहेतुत्वम् इति चेत्,न, तथापि सम्यग्दृष्टिसम्बन्धिनोऽसंसर्गकस्यावग्रहस्याज्ञानत्वप्रसङ्गात्, किश्च संवादिप्रवृत्तिजनकतावच्छेदकं तद्वति तत्प्रकारकत्वलक्षणं प्रामाण्यं मिथ्यादृशां ज्ञानेऽतिव्यासं, अव्याप्तं च सम्यग्दृष्टिसम्बन्धिसंशयादौ, इति चढ़े, उच्यते ज्ञानं तदपि संवादि-प्रवृत्तिजनकं यतः॥ अज्ञानं बन्धहेतुत्वा-न्मोक्षाऽहेतुतयाऽथवा ॥१५॥ व्यवहारोपयिकं हि ज्ञानत्वं मिथ्यादृशां ज्ञानेऽस्त्येव, तथापि निश्चयतो बन्धहेतुतावच्छेदकमज्ञानत्वमपि तत्राऽस्तीति ज्ञानमपि तदज्ञानमित्येव निश्चीयते, ननु ज्ञानेज्ञानत्वकल्पने मानाभावो मिथ्यादर्शनविशिष्टज्ञानत्वेनैव विशिष्टबन्धहेतुत्वसम्भवात, इति चेत, न, मिथ्यादर्शनविशिष्टज्ञानत्वेन ज्ञानविशिष्टमिथ्यादर्शनत्वेन वा हेतुतेत्यत्र विनिगमकाभावाद्, मिथ्यादर्शनज्ञानत्वयोः सम्बन्धभेदेन व्यासज्यवृत्त्यवच्छेदकताऽसम्भवात्, अन्यथा दण्डविशिष्टचक्रत्वादिनापि हेतुत्वप्रसगाव, न च ज्ञानत्वाज्ञानत्वयोरसमावेशो पथग्धमयोस्तयोः समावेशाज्जातिसाङ्कयेस्यापि क्वचिददोषत्वाद् ननु मिथ्यादशेनाविरतिकषाययोगानामेव तत्तबग्धहेतत्वोपदेशात्सामान्यतो बन्धविशेष मिथ्यादर्शनत्वेन मिथ्यादर्शनजन्यतावच्छेदकजातिव्याप्यजात्यवच्छिन्नं प्रति चमिथ्यादपित्वेनैव हेतता प्रामाणिकी 'यत्सामान्ययोः' इति न्यायात्, ज्ञानं तु तत्सहभूततया तत्राऽन्यथासिद्धमेवेति न तस्याज्ञानत्वेन तद्धतुतेति चेत्, न, मिथ्यादर्शनद्वाराऽज्ञानस्य हेतुत्वे द्वयोर्हेतुत्वसमर्थनात्, अथवा मिथ्यादृष्टिज्ञाने सम्यक्प्रवृत्यादिद्वारा मोक्षहेतुतावच्छेदकज्ञानत्वाभाव एवाज्ञानत्वं, न चोक्तज्ञानत्वव्याप्यत्वमस्यास्त्विति वाच्यम्,सम्यग्दृष्टिसंशयादौ व्यभिचारात्,न चैकवि मिथ्यादृष्टिज्ञाने व्यवहारौपयिक ज्ञानत्वं निश्चयतोऽज्ञानत्वम् , पर प्रश्नपति|विधानश्च ।। A H ASKAR MERAREP ॥११॥ Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ EKAR शेषवति विशेषान्तराभावेन सामान्याभावाभ्युपगमेऽतिप्रसङ्ग इति वाच्यम्, एकसामान्यवति सामान्यान्तराभावस्यैव स्वीकाराद्, द्वयोः सामान्ययोरेकपदवाच्यतायामेव नयविभागाद्यत्सामान्यवत्येतत्सामान्याभावस्तत्सामान्यमेव मिथ्यात्वोदयजन्यतावच्छेदक, बन्धहेतुतावच्छेदकश्चाज्ञानत्वमेवेति प्राच्यपक्ष एव युक्त इति चेत्,न, अज्ञानत्वेन बन्धाहेतुतायामेतत्पक्षस्यैव युक्तत्वात, इति दिग्॥ इत्थमेव बन्धहेतुत्वादयो हेतवो ज्ञानत्वगमकाः सम्भवेयुरिति सर्वमवदातम् ॥ १५ ॥ उक्तो हेतुफलभावान्मतिश्रुतयोर्भेदः, अथ भेदभेदात्तमभिधातुमाहवक्ष्यमाणभिदाभाजो-रेतयोरथवा भिदा । विशेषनिश्चये जाति-भेदानुमितिगोचरः॥ १६ ॥ मतिज्ञानस्यावग्रहादयोऽष्टाविंशतिर्मेदाः, श्रुतज्ञानस्य चाङ्गानङ्गप्रविष्टादयश्चतुर्दश वक्ष्यन्त इति भेदभेदादनयो दो घटितः, नन्ववान्तरभेदस्य न सामान्यभेदानुमापकत्वम्, अन्यथा पृथिव्याद्यन्यतमभेदस्य द्रव्यभेदानुमापकत्वप्रसङ्गात्, इतिचेत्, न, तत्र साध्याभाववति हेतुसन्देहादननुमितेः, अत्र तु साध्याभाववति हेत्वभावनिश्चयेनानुमित्यप्रतिरोधात् व्याप्तिग्राहकादागमादेव साध्यसिद्धावपि सिसाधयिषया तदग्रहदशायां वाऽनुमानावतारात्पक्षतावच्छेदकावच्छेदेन ॥ आह च-मेयकयं च विसेसण-मवावीसइविहंगमेआई [भेदकृतं च विशेषणमष्टाविंशतिविधाङ्गभेदादिति वैधर्म्यमसिद्धमेव साध्यत इत्यप्याहुः॥१६॥ समर्थितो भेदभेदाद् भेदः, अथेन्द्रियभेदाद् भेदममिधातुमाहअथवेन्द्रियभेदेन, भेदः सिध्येत्तयोईयोः॥ श्रुतं पूर्वगते यस्मात् , तद्भवप्रतिपादनम् ॥१७॥ स्पष्टः॥ आह च-"इंदिअविभागओवा,मइसुअमेओ जओ मिहिआ११६॥" [इन्द्रियविभागतोवामतिश्रुतमेदो यतोऽमि | भेदभेदान्म तिश्रुतयोभैदाभिधानं, इन्द्रियनिभागाद्देशभिधानोरक्रमश्च। CASSAULI Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं भीज्ञाना र्णव प्रकरणम् ॥ हितम् ]त्ति ॥पूर्वगताभिहितं चेदम-"सोइंदिओवलद्धी, होइ सुअं सेसयं तु मइनाणं ॥ मोचूर्ण दव्वसुअं, अक्खरलंभो अ सेसेस ॥११७॥ [ श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिर्भवति श्रुतं शेषकं तु मतिज्ञानम् ॥ मुक्त्वा द्रव्यश्रुतं, अक्षरलंभश्च शेषेषु ॥] ति ॥१७॥ इमामेव गाथां यथाभाष्यं सप्रसङ्गप्रबन्धेन [विवरीषुराह-] श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धीति-पदार्थ व्याप्तिसिद्धये ॥ द्रव्यभावश्रुते ग्राथे, उचिताद्विग्रहद्वयात् ॥१८॥ श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिरित्यत्र श्रोत्रेन्द्रियेण श्रोत्रेन्द्रियस्य वा उपलब्धिः इति तत्पुरुषेण भाव श्रुतम्, श्रोत्रेन्द्रियादुपलब्धियेस्येति बहुव्रीह्याश्रयणेन च द्रव्यश्रुतं सगृह्यते,एवमुपयुक्तस्य वदत उभयश्रुतमपि उभयविग्रहाश्रयणाद् ग्राह्यम् ॥१८॥ श्रोत्रेन्द्रियोलब्धिः श्रुतमित्यस्य सावधारणत्वाद्विपरीतावधारणमवबुध्यमानः शङ्कतेश्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिश्चेत, श्रुतमेवावधार्यते ॥ तद्द्वारकं मतिज्ञान-मुच्छिद्यत तदा न किम् । ॥१९॥ यदि श्रुतमेव श्रोत्रोपलब्धिस्तदा तस्या मतिरूपत्वासम्भवात श्रोत्रावग्रहायभावेन मतेरष्टाविंशतिभेदाः समुच्छिोरन्, यदि च सा मतिस्तदेतदुक्त्यसङ्गतिः, उभयं चेत्सङ्करः। आह च-"सोओवलद्धि जइ सुअंनणाम सोउग्गहादओ बुद्धी ।। अह बुद्धी तो ण सुअं, अहोभयं सङ्करो णाम ॥११८॥ श्रोत्रोपलब्धिर्यदि श्रुतं न नाम श्रोत्रावग्रहादयो बुद्धिः।। अथ बुद्धिस्ततो न श्रुतं, अथोभयं संकरो नाम ] ॥१९॥ अत्रोच्यते श्रोत्रोपलब्धिरेवात्र, श्रुतं न श्रुतमेव सा॥ शब्दः सैवेत्यपव्याख्या, तभेदानधिकारतः॥ २०॥ अत्र हि गभ्य एवकारो विशेषणन सह योज्यते, तन्महिम्ना च 'चैत्रो धनुर्धर, इत्यत्रेवायोगव्यवच्छेद एव प्रतीयत इति. इन्द्रियवि|भागान्मतिश्रुतभेदामि धाने साक्योड़तायाः पूर्वगतगा| याया भा ष्यानुसारि| विवरणम्॥ RECEKAcy | ॥१२॥ Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रोत्रोपलब्धिरेव श्रुतमिति पर्यवसानेऽपि तस्या मतिरूपाया अपि सम्भवानोक्तदोषः॥ आह च-"सोइन्दिओवलद्धी, चेव सुकं न उ तई सुअंचेव ॥सोइन्दिओवलद्धी वि, काइ जम्हा मइनाणं॥१२२॥" [श्रोत्रेन्द्रियोपलन्धिरेव, श्रुतं न तु सा श्रुतमेव ॥श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिरपि,काचिद्यस्मान्मतिज्ञानम् ] केचित्तु 'श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिरित्यत्र केवलबहुव्रीह्याश्रयणेन श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिः भुतमेव शब्द एव,स च ब्रुवतः श्रूयत इति श्रुतं, शण्वतस्तु श्रोतुरवग्रहादिना मन्यत इति मतिरित्युभयमुपपन्नम्,उपपन्नाश्चाष्टाविंशतिरपि मतेर्भेदा' इत्याहुः, तत्र,धात्वर्थमात्रभेदेन शब्दस्य द्रव्यश्रुतमात्रत्वाप्रतिघाते द्वैविध्याभावात्, आह च-"केई बिन्तस्स सुरं, सद्दो सुणउ मइत्ति तंण हवे ॥ सव्वोच्चिअसद्दो, दव्वसुअंतस्स को भेओ?॥११९।।"[केचिठ्वतः श्रुतं शब्दः शृण्वतो मतिरिति तद् न भवेत् ॥ यत्सर्व एव शब्दो, द्रव्यश्रुतं तस्य को भेदः१] वस्तुतस्त्वेतदवधारणोक्तिर्न मतिश्रुतज्ञानयोर्भेदनिरूपणौपयिकी शब्दभेदनिरूपणं त्वनधिकृतमित्यर्थान्तरम, यदि च श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिपदार्थः शब्दविज्ञानमेव कार्यतया चोपचाराच्छब्द एवेत्युच्यते तदापि वक्तृश्रोतगतत्वेन तस्यातिशयाभिधानं श्रुत्वा अवतश्च सैव मतिः, तदेव च श्रुतमिति सार्यम् , पारम्पर्यश्रुतोच्छेदश्च स्यात,आह च-"किंवा नाणेहिगए, सद्देणं जइ असद्दविन्नाणं ॥ गहिअंतो को भेओ,भणओ सुणओ च जो तस्स॥१२०॥" [किं वा ज्ञानेऽधिकृते ? शब्देन यदि च शब्दविज्ञानं ॥ गृहीतं ततः को भेदो, भणतः शृण्वतश्च यस्तस्य] “भणओ सुणओ व सुरं, तं जमिह सुआणुसारि विण्णाणं ॥दोहं पि सुआईअं, जं विण्णाणं तयं बुद्धी ॥१२१॥" [भणतः शृण्वतो वा श्रुतं, तवदिह श्रुतानुसारि विज्ञानं ।। द्वयोरपि श्रुतातीतं, यद्विज्ञानं तद्बुद्धिः] किश्च शब्दविज्ञप्तिः शब्द एवेत्युक्ते किं केन सङ्गतमिति श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धेः शेषाक्षरलाभस्य च शब्दविज्ञानत्वप्रतिपादनेनैव फलतः श्रुतत्वप्रतिपादनमनाकाङ्क्षितमेव श्रोत्रेन्द्रियोपल इन्द्रियविभागान्मतिश्रुतभेदाभिधाने साक्ष्योद्धतायाः पूर्वगतगाथाया भाष्यानुसारिविवरणम् ॥ Koice रासस Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ R सविवरण श्रीज्ञाना ॥१३॥ ब्धौ मतित्वविलक्षणश्रुतत्वसिद्धावेव शेषे मतिजिज्ञासाप्रवृत्तेः, अपि च श्रोत्रद्वारिकाप्युपलब्धिर्न शब्द एव, एककारणपरिशेषापातात् इन्द्रियविभाशब्दाजन्यत्वस्य निरमिलापत्वस्य वा व्यावृत्तिरेव श्रुतत्वव्यापिकावधारणफलमेवेति चेत्,न, तथापि व्यापकधर्मपुरस्कारेण तद्धर्म- गान्मतिश्रुवचानिश्चयस्याहत्य व्याप्यधर्मपुरस्कारेण तद्वत्तासंशयानिवर्तकत्वात्, अन्यथा इदं द्रव्यमेवेति निश्चये इयं पृथिवी न वेतितभेदाभिधासंशयाभावप्रसङ्गात, एवं चशेषन्द्रियाक्षरलाभे मतित्वशङ्कापि न निवर्तेत तत्र तद्विलक्षणश्रुतत्वाप्रतिपादनाचनियतशब्दजन्य- ने साक्ष्योढत्वप्रतिपादने चोक्त एव दोषः, यत्तु श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिपदं सामिलापज्ञानपरम्, इति सामिलापज्ञानं श्रुतमेवेति तद्भिनं तु तायाः पूर्वमतिरेवेत्यत्र तुशब्दस्यैवकारार्थकत्वोपपत्तिः, तबैतद्व्याख्यानस्येन्द्रियविभागानुपयोगित्वात्, न च तद्विभागलभ्याभिधान- गतगाथाया मेवेदम्, अर्थान्तरत्वात, किवं शेषेन्द्रियाक्षरलाभे मतित्वशङ्कानिवृत्तये ' अवखरलम्भो अ सेसेसु' इत्यभिधानौचित्येऽपि भाष्यानुसाशेषपदस्य यथावदर्थानुपपत्तरित्यपव्याख्यानमेतत्, ॥२०॥ तुशब्दश्चात्र समुच्चयार्थक एवेति व्याचष्टे रिविवरमतेरपि श्रोत्रधीत्वात्, तुशब्दोऽत्र समुच्चये ॥ नाऽवधारणवन्ध्यत्व-मेकत्रैवावधारणात् ॥ २१ ॥ णम् ॥ श्रोत्रावग्रहादिरूपाया मतेरपि श्रोत्रोपलब्धिरूपत्वात्, तुशब्दोऽत्र समुच्चयार्थकः, तथा च श्रोत्रावग्रहादिकञ्च श्रोत्रातिरिक्तेन्द्रियजन्य ज्ञानं मतिः, इति पर्यवस्यति, न चात्रावधारणं सम्भवति सप्रयोजनं वा, एकत्रावधारणादेव विभागोपलम्भादेतादृशतुशब्दव्याख्यानादपि स मातिभेदभङ्गानापत्तिं समर्थयति । आह च-"तुसमुच्चयवयणाओवकाई सोइंदिओवलद्धीवि ।। मइरेवं सति सोउग्गाहादओ होन्ति मइभेआ॥॥१२३॥" [तुसमुच्चयवचनाद्वा, काचिच्छ्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिरपि। मतिरेवं सति श्रोत्रावग्रहादयो भवन्ति मतिभेदाः ॥ २१ ॥ ननु शेषं मतिज्ञानमित्युक्ते पत्रादिगतं अक्षरविन्यासरूपं मतिज्ञानं मा प्रसांक्षीदिति "मोत्तूणं SAHARASHTRA ASPBER Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ SHEKS दन्नसुरं" इत्युक्तं तत्र तस्य द्रव्यश्रुतत्वे किं मानं कथञ्च शेषेन्द्रियाक्षरलाभो न मतिरित्याशङ्कायामाह इन्द्रियविभाव्यञ्जनाक्षरवद् द्रव्य-श्रुतं लिप्यक्षरं मतम् ॥भावश्रुतं वर्णलाभः, शेषं तु मतिरिष्यते॥ २२ ॥ गान्मतिश्चलिप्यक्षरं द्रव्यश्रुतं व्यजनाक्षरवदित्यत्र भावश्रुतकारणत्वात्, इतिहेतुर्गम्यः॥ यदाह-"पत्ताइगयं सुअकारणं ति, सद्दो ब्व तभेदाभिधातेण दव्वसुअं॥ भावसुयमक्खराणं, लाभो सेसं मइनाणं ॥१२४॥ [पत्रादिगतं श्रुतकारणमिति शब्द इव तेन द्रव्यश्रुतम् ।।भावश्रुत- हत ने साक्ष्योमक्षराणां, लाभः शेषं मतिज्ञानम् ] ननु द्रव्यश्रुतत्वमत्र साध्यम्, तच्च भावश्रुतकारणश्रुतत्वमेवेति हेतुसाध्ययोरभेद इति चेत्, न, तायाः पूर्वद्रव्यश्रुतव्यवहारीवषयत्वस्यैव साध्यत्वाद्, हेतौ कारणपदस्य नियतान्वयव्यतिरेकप्रतियोगित्वपरत्वाद्वा, ननु भावश्रुतप्रयोजक- १५ गतगाथाया त्वमात्र, व्यभिचारि व्यन्जनाक्षरसाधारणं, परम्परया च न लिप्यक्षरस्य शाब्दज्ञानानुकूलत्वं तादृशानुपूर्वीकलिप्यक्षरज्ञाना- भाष्यानुसाजन्यतादृशानुपूर्वीकव्यञ्जनाक्षरज्ञानोत्तरमेव पदार्थोपस्थित्या शाब्दबोधोदयाद्, न च व्यजनाक्षरेणेव लिप्यक्षरेणाऽपि रिविवरणम्॥ सममर्थस्य सम्बन्धग्रहात्ततोऽप्याहत्य तदुपस्थितिरिति वाच्यम् , अर्थाव्युत्पन्नानां ततः शब्दस्यैवोपस्थित्याज्यत्रापि तदुपस्थितिद्वारैव तस्यार्थोपस्थापकत्वात, साधुत्वाद्यभावेन तस्य शाब्दवोधाहेतुत्वाचेति चेत्, न, व्यजनाक्षरादिव लिप्यक्षरादपि पट्वाकलितसङ्केतानां झटित्येवार्थोपस्थितेः, साधुत्वस्य सर्वत्रातन्त्रत्वादर्थोपस्थितिकारणतत्कारणसाधारणप्रयोजकत्वस्यैव वा व्यवहारानुकूलत्वात्सम्प्रदायभङ्गस्य विपक्षबाधकतर्कत्वादित्याहनीयम्, लब्ध्यक्षरं तु श्रुतानुसारित्वात् , भावश्रुतं न मतिरिति शेष मतिज्ञानमिति सुव्यवस्थितम्॥आह च-"भावसुअमक्खराणं लाभो सेसं मइनाणं ॥" [भावश्रुतमक्षराणां लाभः शेष मतिज्ञानम् ॥]त्ति ॥२२॥ ननु यदि शेषाक्षरलाभोऽपि श्रुतं तर्हि श्रुतं श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिरेवेत्यवधारणं भग्नमित्यत आह HI Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं| श्रीज्ञाना र्णव प्रकरणम्॥ १४॥ ROCRACKECTUREMEMORE श्रुतत्वं न जहात्येव, लब्धिरक्षरगर्भिणी॥श्रोत्रन्द्रियोपलब्धिः सा, यतो योग्यतया स्मृता॥ २३॥ इन्द्रियावमा शेषेन्द्रियद्वारकज्ञानेऽपि प्रतिभासमानमक्षरं श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धियोग्यमिति श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिरेव तत् । आह च-"जह 12 गान्मतिश्रुसुअमक्खरलाभो, न णाम सोओवलद्धिरेव सुअं॥ सोओवलद्धिरेवक्खराई सुइसम्भवाओ" ति ॥१२५॥॥ [यदि श्रुतमक्षरलाभो न [ मदावानाम श्रोत्रोपलब्धिरेव श्रुतम् ॥ श्रोत्रोपलब्धिरेवाक्षराणि अतिसंभवादिति]॥२॥ नन्वेवं द्रव्यश्रुतस्योपलब्धिविषयस्य तथात्व- ने साक्ष्योद्धसमर्थनेऽप्यक्षरोपलब्धस्तथात्वमसमर्थितं न खलु सापि श्रोत्रग्रहणयोग्या, न चाभिलापस्य तथात्वे तदाकारपरिणतज्ञानस्यापि तथा जतायाः पूर्व त्वम् , परिणामपरिणामिनोः सर्वथैकत्वाभावात् , एवं सति केवलबहुव्रीह्याश्रयणप्रसङ्गाच, इति चेत्, उच्यते-शेषाक्षरलाभोऽपि गतगाथाया श्रुतानुसारितया सङ्केतग्रहमपेक्षमाणः साक्षात्परम्परया वा तदनुकूला श्रोत्रजन्यां पदधियमुपजीवतीति श्रोत्रद्वारिकोपलाब्धरेव | भाष्यानुसासा, न चेन्द्रियान्तरमपि तत्र द्वारमित्यवधारणानुपपत्तिः, श्रोत्राद्वारकत्वव्यावृत्तरेव तत्फलत्वादस्मादेवावधारणादिन्द्रियविभाग: रिविवरसङ्गच्छते, अन्यथा द्वयोरपि मतिश्रुतयोः सर्वेन्द्रियापेक्षाया अविशेषादित्याशयेनाह णम् ॥ अवधारणमाश्रित्ये-न्द्रियभेदोऽपि युज्यते ॥ उपेक्ष्यमेव व्याख्यान-मतो निरवधारणम् ।। २४ ॥ तथाविधविरुद्धधर्माध्यासलक्षणभेदोपयिकावधारणेनैव हि मतिश्रुतयोरिन्द्रियभेदो युज्यते, विनाऽवधारणं तदलाभात्, अथ श्रुतं श्रोत्रोपलब्धिरेवेति सावधारणव्याख्याने शेषाक्षरलाभासङ्ग्रहेणानन्वयात् श्रोत्रोपलब्धिपदस्य तद्योग्यत्वार्थकतया 'अक्खरलं- | भोसेसेसु' इत्यभिधानानुपपत्तेः, नच तत्रोत्सर्गव्याप्त मतित्वमपोदितुं तदभिधानं, प्रथमार्थानुपपत्तेः, न चाक्षरलामे श्रुताभेदान्वयादेव तदपवादो, वाक्यभेदप्रसङ्गात्, न च द्वितीयार्थ एवेयं प्रथमा, अक्षरलाभपदस्य श्रुतानुसार्यक्षरलाभपरतया द्रव्यश्रुत इव तत्रापि IP॥१४॥ SHAR Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मुक्त्वेत्यन्वयसम्भवेऽप्यप्रामाणिकावभाक्तिव्यत्ययकल्पनानाचित्यात्, तस्मानिरवधारणव्याख्यानमेव सम्यक् फलतोऽवधारणला- इन्द्रियविभाभाच्चेन्द्रियविभागोपपत्तिरिति चेत्, न, एकाऽवधारणलामेभ्यभजनाशङ्कया तदभिधानात्, अत एवोभयाव्यभिचारस्थलेऽपि निय- गाम्मतिश्रुतमद्वयाभिधानं तत्र तत्रोपवीक्ष्यते ॥२४॥ ननु यदि शेषाक्षरलाभः सर्वोऽपि श्रुतं तर्हि अवग्रहरूपैव मतिः स्यात्, इत्यत आह- भेदाभिधाने भावः श्रुताक्षराणां यः, स एव श्रुतमिष्यते । ईहादयो मतेर्भदा, नोच्छिद्येरन् कुतोऽन्यथा ॥ २५ ॥ साक्ष्योऽधृता यदि सर्वोऽप्यक्षरलाभः श्रुतं तवक्षरानुविद्धा ईहादयोऽपि श्रुतरूपा एव प्रसजेयुरित्यवग्रहैकमूर्तिरेव मतिः पर्यवस्येत्,तस्माच्छ्रता- १४या:"सोइंदिनुसार्यक्षरलाभ एव श्रुतमिति ॥ आह च-" सोवि हु सुअक्खराणं, जो लाभो तं सुअंमई सेसा ॥ जइ वा अणक्खरचित्र, 6 ओवलब्धीसा सव्वा ण पवत्तज्जा।।१२६॥" [सोऽपि खलु श्रुताक्षराणां यो लाभस्तच्छ्रतं मतिः शेषा॥ यदि वाऽनक्षरैव, सा सर्वा न प्रवर्तत] इत्थं | ति"पूर्वगतव्याख्याता 'सोइंदिओवलध्धीति' पूर्वगतगाथा॥२५॥ अथाग्रिमपूर्वगतगाथासम्बन्धाय “दव्वसुअंभावसुअं,उभयं वा किं कहं गाथाया विव होज्जत्ति। को वा-भावसुअंसो, दवाइसुअंपरिणमज ॥१२७॥" [द्रव्यश्रुतं भावश्रुतं, उभयंवा किं कथं वा भवेदिति॥ को वा तवरणसमाप्तिः भावश्रुतांशो द्रव्यादिश्रुतं परिणमेत ] ति ॥ भाष्योक्तां सङ्गतिमनुवदति । भाष्योक्ताद्रव्यभावश्रुते युग्मं, किं कथं वा भवेदिति ॥ कियान् भावभूतस्यांशो-द्रव्यादीत्यनुभाषते ॥२६॥ ग्रिमपूर्वगत द्रव्यश्रुतं भावश्रुतमुभयश्रुतं वा किं कथं च तद्भवेत्कियान्वा भावश्रुतस्य भागो द्रव्यश्रुतमुभयश्रुतं वेत्यनुभाषितुमिमां गाथा- गाथासङ्गमाह-पूर्वगतप्रणयनप्रवण:-"बुद्धिद्दिढे अत्थे, जे भासइ तं सुझं मईसहि ॥ इयरत्थवि होज्ज सुश्र, उवलद्धिसमं जइ भणेज्जा तिश्च। ॥१२८॥[बुद्धिदृष्टऽर्थे यान्भाषते ततश्रुतं मतिसहितम् ॥ इतरत्रापि भवेत् श्रुतं, उपलब्धिसमं यदि मणेत्] ॥२६॥ इमामेव व्याचष्टे Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ RE सविक्रवं श्रीज्ञाना इन्द्रियविभाहै गान्मतिश्रुत भेदाभिधाने 'बुद्धिदिढे अत्थे MUR बुद्धया बुद्धिगतानान् , वदतो युभयश्रुतम् ॥ द्रव्यतोऽनुपयुक्तस्य, भावतो जानतः परम् ॥ २७॥ बुद्धया दृष्टानान् मतिसहितान् यान् भाषते तद्रव्यभावलक्षणमुभयश्रुतम्, अत्र बुद्धिशब्दो मतिशब्दश्च श्रुततात्पर्यकः, निरूपणप्रयोजकविवक्षारूपज्ञानस्य प्रयोगसमकालीनोपयोगस्य च मतिरूपस्यासम्भवात्, उभयत्वं चात्र प्रयोगोपयोगाभ्यां बोध्यम्, न तु विवक्षया, तया सहकविशिष्टापरत्वरूपोभयत्वासम्भवात्, अनुपयुक्तस्यैव वदतो द्रव्यश्रुतम्, अथानुपयुक्तस्यैव प्रयोगो भवति नोपयुक्तस्य, प्रयोगकाल एव तदधीनार्थोपयोगस्यासम्भवात्, तथा च कथमयं विभाग इति चेत्, न, सोपयोगप्रयोगाभिधित्सया केवलप्रयोगाभिधित्सया च प्रयोगद्वैविध्यसम्भवाद्वार्थादिषुच्छिन्नज्वालादृष्टान्तेनैव वोपयोग इति व्यक्तमध्यात्ममतपरीक्षायाम्, तदिदमभिप्रेत्याह-"जे सुअबुद्धिदिढे सुअमइसहिओ पभासई भावे॥ तं उभयसुअंभण्णइ, दब्बसुअं जेउ अणुवउत्तो॥१२९॥"[यान् श्रुतबुद्धिदृष्टान,श्रुतमतिसहितः प्रभाषते भावान्।।तदुभयश्रुतं भण्यते, द्रव्यश्रुतं यांस्त्वनुपयुक्तः] अत्राभाषमाणस्यैव श्रुतबुद्धया पर्यालोचयतस्तु भावश्रुतमेवेति सामर्थ्यगम्यं, सामर्थ्य च न तत् भावश्रुतमेवेति साध्ये द्रव्योभयश्रुतभिन्नत्वे सति श्रुतत्वम्, एवकारेण साध्यार्थस्यापि तादृशस्य पर्यवसाने हेतुसाध्याभेदप्रसङ्गात्, किन्तु प्रयोगाकालीनश्रुतत्वमेवेति बोध्यम् ॥ सूत्रे तु श्रुतपदस्योभयश्रुतपरतयाऽनुपयुक्तस्य वदतो द्रव्यश्रुतमेवेत्यपि सामर्थ्य गम्यमेव, एवश्च द्रव्यश्रुतं भावश्रुतमुभयश्रुतं वा किं कथञ्च भवेदित्याकांक्षाःपूरिताः॥२७॥ अथ द्रव्यश्रुतमुभयश्रुतं वा भावश्रुतस्य कियानंश इत्याकांक्षापूरणोपयिकमुत्तरार्ध व्याख्यायते तात्पर्यत: केवलश्रुतकालेऽपि, तदाऽऽत्मन्युभयभुतम् । भवेद्यधुपलब्धार्थान् , सर्वान् वक्तुं क्षमेत सः ॥ २८ ॥ Sideos इति पूर्वगत गाथाया | भाष्यानुसारिपूर्वार्धविव रणम् ॥ ॥१५॥ Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ KRICKR स्य " इयरत्थ वि होज्ज सुअं उवलद्धिसमं जइ भणिज्जा ॥१२८ ॥" इत्यस्यायमर्थः, इतरत्र भावश्रुते, भवेद्रव्यश्रुतमु-१४ इन्द्रियविभाभयश्रुतं वा, यापलब्धिसमं भणेत् प्राकृतशैल्या सहस्य समभावनिपातनात्समशब्दस्य तुल्यार्थकत्वात्समकालार्थकत्वाद्वो- मान्मतिश्रुतपलब्ध्या सहोपलब्धितुल्यमुपलब्धिसमकालं वा भणेद्, अत्राचन्तयोः सहभावयौगपद्ययोः सामान्येन ग्रहणादीप्सितार्थ- भेदाभिधाने सिद्धिः, तदिदमाह-" इयरत्थवि भावसुए, होज्ज तयं तस्समं जइ भणिज्जा ॥ण य तरइ तत्तियं सो, जमणेगगुणं तयं तत्तो उक्तपूर्वगत. ॥१३०॥"[इतरत्रापि भावश्रुते, भवेत्तत्तत्समं यदि भणेत् ॥ न च तरति, तावत्सःयदनेकगुणं तत्ततः] " सह उपलब्धीए वा, ICIगाथोत्तरार्द्धउपलब्धिसमं तया व जं तुलं । जं तस्समकालं वा, ण सव्वहा तरइ वोतुं जे ॥१३१॥"[सहोपलब्ध्या वोपलब्धिसमं तदा वा यत्तुल्यम् ।। यत्तत्समकालं वा न सर्वथा तरति वक्तुम्] एवञ्च द्रव्यश्रुतादुभयश्रुताच्चानन्तगुणं भावभुतं प्राप्तमिति सम्प्रदायः॥ भाष्यानुव्यक्तीभविष्यति चेदमुपरिष्टात, भावयुते द्रव्यश्रुतमप्रसक्तमिति सूत्रे श्रुतपदं प्रागुक्तश्रुतपदसमानार्थकमुभयश्रुतपरमेव, न चैवं सारिविवतच्छब्देन तस्य परामर्शो युज्येत, सूत्रकृतांगतेर्विचित्रत्वात्, न चैकविशेष विशेषान्तरमापादनाईमिति, इतरत्रेत्यस्य केवलभावश्रुतोत्पत्तिकाल इत्यर्थः । एवञ्च तदा भावश्रुतसामग्रीसत्त्वेऽपि द्रव्यश्रुतसामग्र्यभावादुमयश्रुताभावो, न बुभयमतिरिक्तमस्ति, प्रत्येकातिरिक्तसमुदायाभावादित्येतत्तात्पर्यम् ॥२८॥ अथान केषाश्चिन्मतिश्रुतभेदोपयिक पूर्वार्द्धव्याख्याकौ- 181 शलमपहस्तयितुमुद्भावयति मत्या सह तया दृष्टान, अवतो धुभयश्रुतम् ।। द्रव्यतोऽनुपयुक्तस्य, तदेकालोचनं मतिः ।। २९ ॥ 'बुद्धिद्दिद्वे' इत्यत्र बुद्धया मत्या दृष्टेष्वर्थेषु मध्ये अत्र 'वर्णेषु क्षत्रियः शूर' इत्यत्रेव मध्यार्थे सप्तमी, एकवचनं बहु Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॐ सविवरणं श्रीज्ञाना र्णव प्रकरणम्।। ACCOC5 वचनार्थकं जात्यभिप्रायकं वा, बुद्धया मत्या दृष्टान् यानर्थान् मतिसहितान् भाषत इति सम्मुखीनैव व्याख्या, तच्छ्रतमुपयोगप्रयोगाभ्यामुभयश्रुतं भवति। ननु मतिसाहित्यं कथमर्थानां विशेषणमनन्वयादिति चेत्, अत्राहुः-मईसहियमित्यत्र मत्युपयोगे वर्तमानस्य वक्तुग्रहणात् , तस्य मत्युपयोगसाहित्येनार्थानामपि तदुपर्यत इति। अत एवाह-"केई बुद्धिद्दिद्वे, मइसहिए भासओ सुअंति।"[केचिद् बुद्धिदृष्टान् मतिसहितान्माषमाणस्य श्रुतम् ॥] इदं च भाष्यानुरोधादुक्तम्, सूत्रे तु मइसहियमित्यत्र मतिसाहित्यस्य क्रियाविशेषणत्वलाभान्मत्युपयोगसहितम्, मतिदृष्टार्थभाषणं श्रुतमिति सम्मुखोऽर्थ एव युक्तो, नहि मतिसहिता भाष्यमाणा अर्थास्तव , अपि तु तादृशः शब्द इति ॥ अत एवाह-तत्सहितं यथा भवत्येवं यान् भावान् भाषते इति अनुपक्तस्यैव वदतो द्रव्यश्रुतं, अभाषमाणस्य पदार्थमात्रपफलोचनं तु मतिः,इति मतिश्रुतयोर्भेद इति ॥२९॥ तदेतद्दषयति केचिदाहुरिदं, तन्नो, युक्तं भावश्रुतव्ययात् । नाधिक्यं नान्यथात्वं वा, भाषाव्यापारतो मतेः॥३०॥ ___ तदिदं व्याख्यानमयुक्तं भावश्रुतोच्छेदप्रसङ्गात्, नहि प्रयुज्यमानः शब्दो मतिज्ञानं वा तद्, अत एव नोभयं प्रत्येकाभावे समुदायाभावाद्, आह च-"तत्थ ॥ किं सदो मइरुभय, भावसुअं सव्वहाऽजुत्तं ॥१३२॥ [तत्र किं शब्दो मतिरुभयं, भावश्रुत सर्वथाऽयुक्तम् ] " सदो ता दव्बसु, मइरभिनि-बोहि न वा उभयं ।। जुत्तं, उभयाभावे भावसुअं कत्थ तं किं वा ॥१३३॥ [शब्दस्तावद्रव्यश्रुतं मतिराभिनिबोधिकं नवा उभय।। युक्तं, उभयाभावे, भावश्रुतं कुत्र तत्किं वा] न च भाषापरिणतिकाले मताधिक्यमुपक्षयो वा जायते. न वा भाषारम्भ एवात्र विशेषस्तस्य तत्स्वरूपपरावृत्यसहत्वाव, अन्यथा धावनवल्गनादिक्रियानन्त्यान्मतेरानन्त्यप्रसङ्गात्, अथ द्रव्यश्रुतसामग्रूथा एव भावभ्रतसामग्रीत्वान्मतिदृष्टार्थप्रयोगसमानकालीन उपयोगः श्रुतमेव इन्द्रियविभागान्मतिश्रुतभेदाभिषाने उक्तपूर्वग तगाथाया व्याख्याना न्तरस्य खण्डन | भाष्यानुसा रेण EARCHES Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ BROKARUARok । तस्य च मतिजन्यतया मतित्वं श्रुतत्वं चेत्युभयमप्यविरुद्धमिति चेत्, न,एवं सति श्रुतोहाद्यामिलापस्थलेऽवध्यादिमूलकाभिलापस्थले | च तत्प्रसङ्गात्, तदिदमभिप्रेत्याह-"भासापरिणइकाले, मईए किमाहियमहवनहतं वा-भासासंकप्पविसेसमेतओ वा सुअमजुत्तं ॥१३४ ॥” [भाषापरिणतिकाले मतेः किमधिकमथवाज्यथात्वं वा ॥ भाषासंकल्पविशेषमात्रतो वा श्रुतमयुक्तम् ॥] ॥३०॥ ननु मतेः श्रुतहेतुत्वात् नावध्यादिस्थले तत्प्रसङ्गः, श्रुतानुसाराभावाच नाश्रुताभिलापस्थलेऽपीत्यत आह मत्या श्रुतानुसारस्या-श्रयणाजन्यते श्रुतम् ॥ इति चेच्छतसङ्कल्पः, श्रुतमेवावधार्यताम् ॥ ३१॥ श्रुतमनुसृत्य मतिज्ञानेन यदि श्रुतज्ञानं जन्यते तर्हि भाषासङ्कल्पोऽपि श्रुतानुसारितया श्रुतमेव स्यात्, न तु मतिरिति बुद्ध्या मतिज्ञानेनेति व्याख्यानमनुपपन्नम् ॥३१॥षाश्चिदेवोत्तरार्द्धव्याख्यानमधरयति इतरोत्पत्तिकाले च, श्रुतं स्यादिति दुर्वचम् ॥ भिन्नहेतुकतासिद्धेः, स्वस्वावरणभेदतः॥ ३२ ॥ इतरत्र केवलमतिज्ञानोत्पत्तिकाले, तदा श्रुतं स्याद्यधुपलब्धिसमं भणेदित्याद्यापादनानई, तदा श्रुतज्ञानसामग्रीविरहनिश्चयेन तदनापत्तेः, भिन्नलक्षणावरणत्वेन द्वयोर्व्यवस्थितत्वात्, न च तदा श्रुतलब्धिसत्त्वात्तदापत्तिः, विशेषसामग्र्यभावेन तदभावात्सा च परोपदेशाहद्वचनाद्यनुसाररूपा, अत एवाह-"इयरत्थवि मइनाणे, होज्ज सुअंति किह तं सुअं होइ ॥ किह व सुअं होइ मई, सलक्खणावरणभेआओ ॥१३५॥"[इतरत्रापि मतिज्ञाने भवेच्छ्तमिति कथं तच्छ्रतं भवति ॥ कथं वा श्रुतं भवति मतिः, स्वलक्षणावरणभेदात् ॥] परव्याख्या बाधकत्व(बाधितार्थ)गोचरा भ्रान्तैव निसर्गात इति न किञ्चिदेतत्॥३२।। श्रुतोपलब्धानां तु बहुत्वादेव कात्स्न्येन वक्तुमशक्यत्वं कौशलमादधानस्य मति वश्रुतं न स्यादेव द्रव्यश्रुतत्वं तु तत्र निगद्यमानं हृद्यमपीत्याशयेनाह इन्द्रियविभा गान्मतिश्रुतभेदाभिधाने उक्तपूर्व गाथोत्तराईव्याख्यानान्तरस्य माष्यानुसारिखण्डनम् ॥ Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सावरणं श्रीज्ञाना नवप्रकरणम् ॥ ॥ १७ ॥ साम्प्रतं शब्दहेतुत्वान्मतिद्रव्यश्रुतं भवेत् ॥ शुद्धा तु सा तदा तत्स्याद्, यदि ज्ञप्तिसमं भणेत् ॥३३॥ मतिदृष्टानर्थान्मत्युपयोगेन भाषमाणस्य द्रव्यश्रुतरूपशब्दकारणतया मतिर्द्रव्यश्रुतत्वमास्कन्देदेव, प्रयोगानुकुला च मतिस्तु तथात्वमश्नुवीत, यदि नाम मतिमानुपलब्धिसमं मणितुं शक्नुयात्, आह च - " अहव मई दव्वसुअत्तमेउ, भावेण सा विरुज्झेज्जा ।। जो असुअक्खरलाभौ, तं मइसहिओ पभासेज्जा ।। १३६ ।” [अथवा मतिर्द्रव्यश्रुतत्वमेतु, भावेन सा विरुध्येत ॥ योऽश्रुताक्षरलाभस्तं मतिसहितः प्रभाषेत ।।] “इयरम्मि वि मइनाणे, होज्ज तयं तस्समं जइ भणेज्जा ॥ ण य तरह तत्तियं सो, जमणेगगुणं तयं तत्तो ॥ ॥ १३७ ॥ " [इतरस्मिन्नपि मतिज्ञाने, भवेत्तत्समं यदि भणेत् ॥ न च तरति तावत्स यदनेकगुणं तत्ततः ॥ ] ननु युद्धापि मतिः शब्दकारणत्वात्कुतो न द्रव्यश्रुतं नहि कार्यमजनयतोऽपि कारणस्याकारणत्वं नाम, अरण्यस्थदण्डादेर्घटाहेतुत्वप्रसङ्गात् किञ्चैतद्व्याख्यानस्याविरोधाभिधान सावधानत्वेन मतिद्रव्यश्रुतयोर्भेदनिरूपणोपयिकत्वेऽपि मतिश्रुतयोस्तन्निरूपणानौपयिकत्वमिति चेत्, न, सहकारियोग्यताया एव द्रव्यघटकत्वात् उक्तातिदेशेन श्रुतेऽपि तद्भेदलाभेन प्रयोगभेदेन मतिश्रुतयोरपि भेदलाभाच्च [ चानुना विप्रयोगेऽप्यात्मानमलभमानाः शब्दाः पार्वतिच्छायें] ।। [ अत्राशुध्धमवभासते ] । ननूपलब्धितुल्यं भणितुमशक्यमित्यत्र को हेतुरित्यत आह अस्वाभाव्याद् बहुत्वाच्च, न सर्वत्र गिरां गतिः ॥ अपि प्रज्ञापनीयाना-मनन्तोऽशो न्यबन्धि यत् ||३४|| मत्याद्युपलब्धार्थानामनभिलाप्यत्वस्वभावादेव वक्तुमशक्यत्वं, यद्यपि कतिपयास्तैरप्यभिलाप्या एव तथापि श्रुताविषयत्वेन तेषामनभिलाप्यत्वं बोध्यं, भाष्ये शेषोपलब्धिपदं वा श्रुतोपलब्ध्ययोग्यत्वपरम्, यत्तु कश्चिदाह न सन्त्येवानभिलाप्या भावा इन्द्रियविभागाम्मतिश्रु तभेदाभिधा ने उक्त पूर्व तोत्तरार्ध व्याख्यान विशेषस्य भाष्यानुसा रिहृद्यतोपदर्शनम् ॥ ॥ १७ ॥ Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ৬৬ अभिधेयत्वस्य केवलान्वयित्वात्, इति, तचुच्छं, सर्वमभिधेयं प्रमेयत्वादित्यत्राभिधाविषयत्वस्य साध्यत्वे सिद्धसाधनादनमिलाप्यानामप्यनभिलाप्यपदाभिधेयत्वात्, तत्तत्पदबोध्यत्वप्रकारित्वावच्छिभेच्छाविषयत्वस्य साध्यत्वे क्वचिदेकस्येव सर्वस्यापि सङ्केतग्रहासम्भवेन विपक्षबाधकतर्कविरहेणाप्रयोजकत्वात् न च विपक्षस्याऽभिधानानभिधानाम्यां व्याघात एव तद्बाधकस्तर्कः, अनभिधानेऽपि वस्तुस्वरूपाप्रच्युतेः, अथ न सङ्केतमात्रमभिधा, आधुनिकसङ्केतितेष्वपि तत्प्रसङ्गात् सर्गादौ वाऽस्मदादिसङ्केतानुत्थानाच्च, किन्त्वीश्वरेच्छैव सा, तस्याश्च नित्यतया न कारणविरहप्रयुक्तो विरह इति तद्विषयत्वमेव सार्वत्रिकमनुमेयमिति चेत, न, शाब्दबोधानुकूलसङ्केतमात्रस्यार्थोपस्थापकत्वात्सर्गादेरसिद्धेरीश्वरस्याप्य सिद्धेस्तज्ज्ञानविषयत्वस्येव तदिच्छाविषयत्वस्थ साध्यत्वेऽप्युद्देश्यासिद्धेस्तदिच्छाविशेषविषयत्वस्य साध्यत्वेऽप्रयोजकत्वाद्, अर्थानां बाहुल्येन शब्दानां चाल्पत्वेन सर्वत्र तदप्रसरात्, न हि तत्तत्क्षणेष्वेवानन्तेषु विशेषपदप्रयोगः सम्भवी, किमङ्ग शेषेषु भावेषु, न चोलब्धेष्वपि बहुत्वं हेतुभवितुमुत्सहते, तथापि फलाभावे स्वरूपायोग्यत्वमेव हेतुरिति तत्रास्वाभाव्यमेव हेतुरुक्तः, उपायस्योपायान्तरादूषकत्वाद्वा, तदिदमाह - " कह महसुओवलद्धा, तीरंति न भासिउं बहुत्ताओ ॥ सव्वेण जीविएण वि, भासह जमणंतभागं सो ॥ १३८ ॥” [ कथं मतिश्रुतेापलब्धास्तीर्यन्ते न भाषितुं बहुत्वात् ॥ सर्वेण जीवितेनापि, भाषते यदनन्तभागं सः ।।] "तीरंति ण वोत्तं जे, सुओबलद्धा बहुत्तभावाओ || सेसोवलद्धभावा साभव्वबहुत ओभिहिआ || १३९ ||" [ तीर्यन्ते न वक्तुं श्रुतोपलब्धा बहुत्वभावात् ॥ शेषोपलब्धभावाः स्वाभाव्यबहुत्वतोऽभिहिताः ] ननु मतिश्रुतोपलब्धार्थानां कथमीदृशं बहुत्वं यदनन्तभाग एव कृत्स्नेनायुषा भाष्यत इति चेत्, उच्यते, तदनन्तमागनिबन्धस्यैव सूत्रोक्तत्वात्, आह च " कचो एत्तियमेत्ता, भावसुअमईण पज्जया जेसिं ॥ इन्द्रियविभा गान्मतिश्रुतभेदाभिघा ने सर्वार्थानां .व.मयोग्यत्वं भाष्यानुसारिचचितम् ॥ Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ इन्द्रियविभासविवरणं 18| भासइ अणंतभागं, मण्णइ जम्हा सुए भणिय।।१४०॥"[कुत एतावन्मात्रा भावश्रुतमत्योः पर्याया येषाम् ॥ भाषतेऽनन्तभागं गान्मतिश्रुत. श्रीज्ञानाभण्यते यस्माच्छ्तेऽभिहितम्] "पणवणिज्जामावा, अणंतभागो उ"अणभिलप्पाणं ।। पण्णवणिज्जाणं पुण, अणंतभागो सुअनिबद्धो" * भेदाभिधाने र्णव॥१४१॥ [ प्रज्ञापनीया भावा अनन्तभागस्त्वनभिलाप्यानाम् ॥ प्रज्ञापन यानां, पुनरनन्तभागःश्रुतनिबद्धः॥] एवं च ४ मतिश्रुतोपलभागकारेण गुणकारानुमानादनन्तगुणत्वं तेषां सिद्धमिति भावः ॥३४॥ उक्तमेवोपपादयितुमाहप्रकरणम् ॥ ब्धार्थानन्तअत एव च पूर्वज्ञा, नूनं षट्स्थानगामिनः।। समाक्षरा अप्यसमाः, श्रुताभ्यन्तरया धिया ॥ ३५॥ भाग एध यतोऽभिलाप्यभावानामनन्तभाग एव सूत्रे निबद्धोऽत एव पूर्वज्ञानां॥"अणतभागहीणे वा,"असंखिज्जभागहीणे वा,संखिज्ज भाष्यतइत्यभागहीणे वा, संखेज्जगुणहीणे वा, असंखज्जगुणहीणे वा, अणतगुणहीणे वा" इति सूत्रोक्तं हीनत्वघंटितं, "अणंतभागन्महिए वा, स्य भाष्याअसंखेजभागब्भहिए वा, संखेज्जभागब्भहिए वा, संखेज्जगुणब्भहिए वा, असंखेज्जगुणन्महिए वा, अणतगुणब्भहिए वा" इति | सूत्रोक्तं चाधिक्यघटितं षट्रस्थानगामित्वं सगच्छते। सर्वश्रुतार्थनिबन्धे च सर्वेषां साम्यापत्तिः।। ननु हीनाधिकभावः कथं सर्वेषां नुसार्युपपाचतुर्दशपूर्ववित्त्वे । उच्यते, तावदक्षरलाभाविशेषेऽपि तदभ्यन्तरमतिवैषम्यान, नन्वेवमपि श्रुतापेक्षया न पटूस्थानोपनिपातोऽपि तु दनम् ॥ मत्यपेक्षयेति चेत्, न, श्रुताभ्यन्तरमतेरपि श्रुतानुसारितया श्रुतस्वरूपत्वात् ।।तदिदमाह-"जं चोद्दसपुव्वधरा, छट्ठाणगया परोप्परं होति ॥ तेण उ अणतभागो, पन्नवाणिज्जाण जं सुत्तं ॥ १४२ ॥" [यच्चतुर्दशपूर्वधराः षट्रस्थानगताः परस्परं भवन्ति । तेन त्वनन्तभागः, प्रज्ञापनीयानां यत्सूत्रं ॥] " अक्खरलंभेण समा ऊणहिआ हुँति मइविसेसेहिं । ते उण(विय)मईविसेसे, सुअनाणमंतरे जाण ।। १४३ ॥ [ अक्षरलाभेन समा ऊनाधिका भवन्ति मतिविशेषैः ।। तानपि च मतिविशेषान्, श्रुतज्ञानाभ्यन्तरे ॥१८॥ RESTAURUGRE ER Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ KARA दुः॥ ३५ ॥ ननु पदजन्मंशात्, इति चेत, उच्यने वा मिथस्तयोः ॥ ३६त्वा जानीहि ॥"जे अक्खराणुसारेण, मईविसेसा तयं सुझं सव्वं ॥ जे उण सअणिरवेक्खा, सुद्धं चिय तं मइमाणं ॥१४४॥" इन्द्रियविभा[येऽक्षरानुसारेण, मतिविशेषास्तच्छ्रतं सर्वम् ॥ ये पुनः श्रुतनिरपेक्षाः, शुद्धमेव तन्मतिज्ञानम् ॥] अत्र 'सुअनाणं चेव 15 गान्मतिश्रु. जाणाहि ॥[श्रुतज्ञानमेव जानीहि ] इति पाठमुपेक्ष्य 'सुअनाणमंतरे जाण' [ श्रुतज्ञानाभ्यन्तरे जानीहि ] इति पाठकरणं तभेदाभिधाचैवयोवैयर्थ्याच्छन्दोभङ्गभयादङ्गाभ्यन्तरादिपदवदभेदार्थकस्याभ्यन्तरपदस्यातिसानिध्यव्यञ्जकत्वाच्छ्तपदस्य चतुर्दशपूर्वश्रुतार्थ ने साक्ष्योद्ध तायाः पूर्वकत्वेऽभ्यन्तरपदस्य तज्जातीयत्वबोधकत्वाद्वेत्याहुः॥ ३५॥ ननु पदजन्यं ज्ञानमेव श्रुतं, तदुपजीविज्ञानान्तरं तु मतिरेव, नहि गतगाथावा तदपजीवित्वेन तत्वं नाम, प्रत्यक्षोपजीवित्वेनानुमानस्यापि प्रत्यक्षत्वप्रसङ्गात्, इति चेत्, उच्यते भाष्यानुसा श्रुतानुसारिणी बुद्धि-मतिरेव यदीष्यते ॥ तदा षट्स्थानता भज्येत्, स्वस्थाने वा मियस्तयोः ॥३६॥ रिविवरयदि पदजन्यो बोध एव श्रुतं तदनुसारिविशेषमानं तु मनसोपनीयमानं मतिरेव, तर्हि श्रुतस्यापि मननलक्षणेन मतित्वातदुच्छेदप्रसङ्गे कथं मतिश्रुतयोः षट्स्थाननिवेशव्यवस्था,अस्तु वा तत् श्रुतं तथापि तस्य प्रयोगाधीनत्वात्प्रयोगस्य सङ्ख्येय णम् ॥ वर्षायुषां सङ्ख्येयविषयस्यैव सम्भवात स्वस्थाने सङ्ख्येयेनैव न्यूनाधिकभावव्यवस्था स्यान्मतिज्ञानस्य च सर्वदा प्रयुज्यमानानन्तगुणविषयत्वान्मतिश्रुतयोमिथोऽनन्ततैव सा स्यादिति श्रुतस्य स्वस्थाने मतिश्रुतयोश्च मिथः षट्स्थानोपनिपातोच्छेदः॥ आह च-“केइ अभासेजता, सुअमणुसरओ वि जे मइविसेसा ।। मण्णंति ते मइ चिय, भावसुआभावओ तमो ॥१४५॥ किह मइसुअनाणविऊ, छट्ठाणगया परोप्परं होजा ॥ भासिज्जंतं मोत्तुं, जइ सब्बं सेसयं बुद्धी ॥ १४६ ॥" [ केचिदभाष्यमाणाः श्रुतमनुसरतोपि ये मतिविशेषाः ॥ मन्यन्ते तान्मातेरेख भावश्रुताभावतस्तमो ॥ कथं मतिश्रुतज्ञानाविदः षट्स्थानगताः परस्परं NEERI Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना JOKES र्णव प्रकरणम् ॥ ॥१९॥ PRECAMERCULOSE भवेयुः॥ भाष्यमाणं मुक्त्वा यदि सर्व शेषकं बुद्धिः॥] एवं च श्रुतादवगतमिदमिति प्रत्ययाऽविशेषाच्छाब्दबोधस्येव हत इन्द्रियविभातदनुसारिणोऽपि श्रुतत्वं निर्बाधं तस्य स्मृतित्वानुमितित्वादिना सहभावाविरोधात्, न चैवमनुमानस्यापीन्द्रियापेक्षया गान्मतिश्रु| ऐन्द्रियकत्वं स्याद् , इष्टत्वात्, केवलं श्रुतानुसारिणि श्रुतस्येव तत्रेन्द्रियाणां नातिशयेनापेक्षेति तत्वम् ॥३६ ॥ तदेवं श्रुतस्वरूपा-४ तभेदाभिधाभिधानप्रकारेण बुद्धिद्दिटे इत्यादिगाथा व्याख्याता, अथ भाष्यकारोक्तया दिशा मतिश्रुतभेदोनयनानुकूलतयेयमेव व्याख्यायते-ट ने साक्ष्योढ़ बुद्ध्या सामान्यया दृष्टान् , भाषते सम्भवेन यान् ॥ श्रुतोपयुक्तस्ते तस्य, अतमन्या मतिः स्मृता॥ ३७॥ तायाः पूर्व ___'बुद्धिद्दिढे' इत्यत्र बुद्धिशब्दो मतिश्रुतसामान्यबुद्धयर्थको, 'मतिसहितमित्यत्र' मतिशब्दश्च श्रुततात्पर्यकः, भाषत इत्यत्र गतगाथाया योग्यत्वमाख्यातार्थस्तच्च तद्धे तुविकल्पाश्रयत्वं श्रुतपदञ्च भावश्रुतार्थकमिति श्रुतोपयुक्तः सन् बुद्धिदृष्टयदर्थभाषणानुकूलविक- भाष्यानुसाल्पवान् यस्तस्य तेा विषयविषयिणोरभेदोपचाराद् भावश्रुतं भवन्तीति पर्यवसितोऽर्थः॥ इयं धनभिलाप्यविषयिणी श्रुतमन रिविवरनुसृत्यैवामिलापविषयिणी चेति सामान्यबुद्धि दृष्टत्वं चार्थानां श्रुतदृष्टानामपि मतिदृष्टत्वनियमात्सम्भवति । एवञ्च श्रुतोपयुक्तस्यैव णम् ॥ विकल्पयतो भावश्रुतं, तदनुपयुक्तस्यैव तु मतिरिति तयोर्भेदात्तथात्वम् ॥आह च-“सामन्ना वा बुद्धी, मइसुअनाणाई तीइ जे दिडा ॥ भासइ सम्भवमेतं, गहिन उ भासणाभित्तं ॥ १४७ ॥ मइसहि भावसुअं, तं निययमभासओ वि मइरना ॥ मइसहियंति जमुत्र, सुओवउत्तस्स मावसुअं॥१४८॥" [सामान्या वा बुद्धिमतिश्रुतज्ञाने तया ये दृष्टाः ॥ भाषते सम्भवमात्रं गृहीतं न तु भाषणामात्रम् ।। मतिसहितं भावश्रुतं तबियतमभाषमाणस्यापि मतिरन्या ॥ मतिसहितमिति यदुक्तं | श्रुतोपयुक्तस्य भावश्रुतम् ॥] 'सहितमित्यस्य' क्रियाविशेषणत्वे तु भाषणयोग्यत्वस्य धात्वर्थत्वाद्यद्विषयकश्रुतोपयोगस * ॥१९॥ AAAAAAAA Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ wwwwwwwwwwcom PAKKAKEKORECAUSA हितभाषणयोग्यतावान् यस्तस्य ते मावश्रुतमित्यर्थः ॥३७॥ अवधारणविधिमुपदर्य फलितमुपदर्शयति इन्द्रियविभाश्रुतमेव न ते किन्तु, श्रुतं भाषत एव यान् । परिणामो ध्वनेरेव, श्रुतं तद्भजनामतेः ॥३८॥ गान्मतिश्रुतयान सम्भवतो भाषत एव तच्छ्रतमित्यवधारणं युक्तम्, न तु ते श्रुतमेवेति अमिलाप्यगोचरया मत्यापि तदवगाहनात, 18. भेदाभिधाने न च श्रुतोपयोगेन भाष्यमाणाः श्रुतमेवेति कुतो न वक्तुं युक्तं, तेषामेव कदाचिन्मत्यापि भाषणसम्भवात, एवं च श्रुतं ध्वनि- सादयोध्धृता. परिणाम एव श्रुतोपनीतशब्दगोचरस्यास्यांतल्पविकल्पत्वनियमान्मतिज्ञानं त्वमिला यानभिलाप्यविषयकमिति तत्र तद्- याः पूर्वगतभजनेत्यनेन वैधयेणानयोर्मेदः ॥ आह च-"जे भासइ चेव तयं, सुरंतु नउ भासओ सुअं चेव ॥ केइ मईए वि दिट्ठा, जं गाथाया भादव्वसुअचमुक्यन्ति ॥ १४९ ॥ एवं धणिपरिणाम, सुअनाणं उभयहा मइमाणं । भिमसहावाइ, ताई तो भिण्णरूवाई | प्यानुसारि॥ १५० ॥"[यान् भाषत एव तत्, श्रुतं तु न तु भाषमाणस्य श्रुतमेव ॥ केचिन्मत्यापि दृष्टा यद्रव्यश्रुतत्वमुपयान्ति ॥ विवरणम् ॥ एवं ध्वनिपरिणाम, श्रुतज्ञानमुमयथा मतिज्ञानम् ॥ यद्भिवस्वभावे ते ततो भिन्नरूपे ॥]॥ ३८ ॥ इयरत्थवीत्यादि व्याचष्टे इतरत्रापि शब्दस्य, परिणामाद् भवेच्छूतम् ॥ मत्या श्रुतोपलब्ध्या वा, यदि नाम समं भणेत् ॥ ३९॥ इतरत्र मतिज्ञाने शब्दपरिणामरूपश्रुतधर्मदर्शनाच्छ्रतत्वं तदा कल्प्येत यदि तत्र यावन्त उपलब्धिविषया अर्थास्तावन्तो भणनयोग्या मवेयुः, न च भणनयोग्याभणनयोग्योभयविषयत्वान्मतर्मतिश्रुतोभयरूपत्वमस्त्विति वाच्यं, भणनयोग्यानामप्यर्थानां मतिज्ञानेन श्रुतापलब्ध्येव श्रुतानुसारेणाभाषणात, तदिदमाह-"इयरं ति मइनाणं, तओ वि जइ होइ सहपरिणामो ॥ तो तम्मि वि किंन सुअं, भासइज नोवलद्धिसमं ॥१५॥" [इतरदिति मतिज्ञानं ततोऽपि यदि भवति शब्दपरिणामः ॥ ततस्तस्मिन्नपि किं न श्रुतं Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञानात्र - प्रकरणम् ॥ ॥ २० ॥ भाषते यद् नोपलब्धिसमं] "अभिलाप्पाणभिलप्पा, उवलद्वा तस्समं च नो भणइ ।। तो होउ उभयरूवं, उभयसहावंति काऊणं ।। १५२ ।। " [ अभिलाप्यानभिलाप्या, उपलब्धास्तत्समं च नो भणति । ततो भवतूभयरूपं, उभयस्वभावमिति कृत्वा ॥ ] "जं भासह तं पिजओ, ण सुआदेसेण किं तु समईए || ण सुओवला द्वैतुल्लंति, वा जओ गोवलासमं ॥ १५३ ॥” [यद्भाषते तदपि यतो न श्रुतादेशेन किन्तु स्वमत्या | न श्रुतोपलब्धितुल्यमिति वा यतो नोपलब्धिसमं ॥ |] || ३९ ॥ मतिज्ञाने न शब्दपरिणामरूपश्रुतसाधर्म्येण श्रुताशङ्कयेतर त्रेत्याद्यभिधानं श्रुतत्वाभावव्याप्य श्रुतोपयोगासाहित्यनिर्णये तदनुत्थानात्, किन्तु शब्दपरिणामरूपसाधारणधर्मदर्शनात्तदाशङ्कयेत्यतोऽपरथा व्याचष्टे तदा श्रुतोपयोगः स्याच्छ्रुतविज्ञप्तिहेतुभिः || प्रयोगः स्याद् यदा (च) यंतु, नाक्षराय (रस्या) नुसारतः॥ ४० ॥ सम्भवेन फलतो वा प्रयोगकाले मतिज्ञानस्य श्रुतोपयोगस्तदा स्याद् यदि श्रुतधीहेतुसन्निधानं स्यात्, तदेव चात्र नास्ति, अभिलाप्येऽनभिलाप्ये वा मतिविषयेऽक्षरानुसाररूपसह कारिविरहात्, नहि सह कारिसन्निधानानुद्बुद्धश्रुतलब्ध्या श्रुतोपयोगः स्यादिति तद्विरहेणैव तत्र तद्नापत्तिरिति भावः एवञ्च इयरत्थवीत्यादौ श्रुतपदं श्रुतोपयोगपरं, उपलब्धिसममिति च श्रुतोपलसिमहेतुकमित्यर्थकं क्रियाविशेषणं, भणेदित्यत्र मतिज्ञानोपयुक्त इतिशेषः || ४ ० ॥ नन्वत्र भाष्यकारव्याख्याने श्रुतोपयुक्तस्य भाषासम्भवः श्रुतमित्येतावदेवास्तु, विषयग्रहणं पुनरनतिप्रयोजनमितिचेत्, न, वि षयभेदेन तद्भेदोपदर्शनार्थं तद्ग्रहणादित्याशयेनाह - भेदो विषयभेदेन, हेतुभेदोपजीवि वा ॥ नूनं मतिश्रुते भेत्तुं दर्शितो व्याख्ययाऽनया ॥ ४१ ॥ स्पष्टः ।। ४१ ।। अथ विषयता भेदाचद्भेदप्रतिपादनार्थमियमपरथा व्याख्यायते— इन्द्रिय विभागान्मतिश्रु तभेदाभिघा ने साक्ष्योड़ ताया: पूर्व गतगाथाया भाष्यानुसारिविवर पम् ॥ ॥ २० ॥ Page #57 -------------------------------------------------------------------------- ________________ PUCCASHARASIC श्रुतमेव श्रुतं ज्ञेयं, भाषासम्भवशालि वा ।। इतरत्र तदापत्ति-भिन्नाऽनुभववदूगिरा !॥ ४२ ॥ इन्द्रियविभाश्रुतोपयुक्तः सन् श्रुतसहितं यथा स्यात्तथा श्रुतसहितान् वा बुद्धिदृष्टान् यानर्थान् सम्भवतो भाषतेऽन्तर्जल्पविकल्पे ज्ञेयाका-18| गान्मातश्रु रतया परिणामयति तथापरिणामापन्नास्ते तस्य श्रुतमेव, नहि श्रुतविषयता न श्रुतमिति, नन्वेवमभिलाप्यविषयकं मतिज्ञानमपि तभेदाभिधाश्रुतज्ञानसमानाकारमिति तत्रापि कथं न श्रुतत्वं, उच्यते, मतिश्रुतयोः स्फुटमेव विषयतावैलक्षण्यानुभवेन समानाकारताया एवा ने साक्ष्योसिद्धेः, न च विषयाभेदे कथं विषयताभेद इति वाच्यम, ज्ञानस्वरूपाया विषयतायास्तदभेदेऽपि ज्ञानसामग्रीभेदेन मेदात, अनुभवेन न तभेदोऽनुभूयत इति चेत्, न, कालविशेषाद्यवभासभेदस्य प्रत्यक्षसिद्धत्वात्, तथा चात्र बुद्धिपदं बुद्धिसामान्यार्थक, वंगतगाथाश्रुतपदं च श्रुतोपयोगार्थक, भाषत इति च भाषणयोग्यतावानित्यर्थकं, अध्याहियमाण एवकारश्च श्रुतमित्यनन्तरं योज्यः । या भाष्यानुतत्पदश्च नार्थमात्रपरामर्शकंते श्रुतमेवेत्यस्य बाधात्, किन्तु भाषासङ्कल्पविषयत्वविशिष्टार्थपरामर्शकं, इतरत्रेति च मतिज्ञानकाल सारिविवरइत्यर्थक, श्रुतपदं च भावश्रुतार्थकं, उपलान्धसमामिति च समानानुव्यवसायत्वार्थकं साम्यं च सावधिकमिति सनिधिसिद्धतया णम् ॥ मतिज्ञानमेवावधित्वेनोपतिष्ठते, भणेदित्युत्तरं च श्रुतमित्यनुषज्यत इति मतिज्ञानकाले श्रुतज्ञानं भवेद्, यदि मतिज्ञानसमानानुव्यवसायकं श्रुतं कश्चिदपि भणेदित्युत्तरार्द्धार्थः, एवं च विषयतावलक्षण्येन कारणभेदानुमानाचत्र कारणाभावनिश्चयेन कार्योत्पत्तिशंकोच्छेद इतिभावः, अथवा श्रुतमिति भावप्रधाननिर्देशाश्रयणादितरत्र मतिज्ञाने श्रुतत्वं तदा स्यादित्याद्यर्थो बोध्यः ॥४२॥ हेतुविषयभेदोन्नयनानुकूलेन प्रकारान्तरेण व्याचष्टेअथवा बुद्धिदृष्टेऽर्थे, श्रुतं मत्यै(सत्ये)व भासते ॥ इतरत्राप्ययं न्यायो, द्वयोः साम्ये परं भवेत् ॥४३॥ RREARSHREFRESHERE Page #58 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना-5 र्णवप्रकरणम् ॥ ॥२१॥ 'बुद्धिद्दिष्टे अत्थे' इति सप्तम्येकवचनान्तं विशेषणविशेष्यपदद्वयं,जे इति पादपूरणार्थों निपातः, भासइ भासते, तत्पदं प्रसि-४ इन्द्रियविभाद्धार्थकं प्रक्रान्तार्थकं वा, भुतपदं भावश्रुतार्थकं, 'मइसाहियं' इत्यत्र मतिः सहिता कारणत्वेन यस्य तदिति विग्रहः, पौर्वापर्यभावे गान्मतिश्रुतमत्या सहितमित्येव वा, एवञ्च बुद्धिदृष्टेऽर्थे सति तच्छ्रतं मतिहेतुकमेव भासत इति समुदायार्थः॥ न चात्र बुद्धिदृष्टेऽर्थे सती-2 भेदाभिधाने त्यभिधानमनतिप्रयोजनं, अस्य मतिसाहित्योपपादनार्थत्वाद् बुद्धिशब्दस्यात्र मत्यर्थकस्य ग्रहणात् श्रुतविषयोपदर्शिका मतिं श्रत- | साक्ष्योद्धृतमवश्यमपेक्षत इत्यनेन समर्थ्यते, अथवा सप्तमी 'तत्र निष्पुल(ण्य)को हत' इत्यत्रेवान सप्तम्या निमित्तत्वाद्विशिष्टे निमित्तत्वस्य पूर्वगतगाथाविशेष्यबाधे विशेषणमात्रपर्यवसायित्वात्तच्छरपसापेक्षत्वेन यदित्यध्याहाराद् बुद्धिष्टार्थदर्शननिमित्तं यदिति श्रुतस्वरूपमनूध तत्र | या भाष्यानुमतिसाहित्यनियमविधानमाभिधानीय, ये इति यदित्यर्थकमित्यपि कश्चित्, अन्यत्रापि मतिज्ञानेऽपि भवेत् श्रुतपूर्वकत्वनियम सारिविवरइत्यर्थाद् गम्यते यदि श्रुतज्ञानं उपलब्धिसमं मतिज्ञानतुल्यं भणेत, तच्च न भणितं तयोः परस्परं षटयानोपनिपातोपदेशात, णम् ॥ एवञ्चानभिलाप्यविषयकमतिज्ञाने कथश्चिदपि श्रुतापेक्षाया अभावाद् व्यभिचारेण न तस्य तद्धेतुकत्वमिति भावः ॥४३॥ उभयश्रुतमतिभेदपरतया व्याचष्टेज्ञात्वा वा श्रुतदृष्टार्थान, ब्रुवतो युभयश्रुतम् ॥ भवेन्मत्युपयुक्तस्य, श्रुतं यदि समं भणेत् ॥४४॥ बुद्ध्या श्रुतबुद्धथा, दृष्टान् यानर्थान् मतिसहितं श्रुतोपयोगेन, भाषते तत् श्रुतं उभयश्रुतमेव,इतरत्र मत्युपयोगकाले, भवेत् श्रुतपदानुषङ्गात् उभयश्रतं, यापलब्धिसमं मतिसमानाकारश्रुतं श्रुतानुसार, भणेत्कोऽपि कथयेत, श्रुतं भणेदनुसरेदिति वा, एवं चोभयभेदे सिद्धे प्रत्येकभेदः सुसाधः, उभयभेदकसामग्रीभेदस्यैव प्रत्येकभेदकत्वात्, अथवा मति ॥२१॥ InnnnnnnnnnnnnnnnnAAAAAN BRUMUSIC Page #59 -------------------------------------------------------------------------- ________________ साहितामत्यस्य श्रुतानुसारेणेत्यर्थकत्वादग्रे एवकारयोजनाच श्रुतानुसारेणैव भाषमाणस्योभयश्रुतमित्यर्थः, इत्थं चाग्रे इतरत्र बल्कसुम्वमतिज्ञाने भवेच्छ्तानुसारो यदि स्वोत्प्रेक्षामात्रमतितुल्यं भुतं मणेत्तदभणनाच्च न तदनुसारः, तं विना च न त्वदेकजीवितमुभय अष्टान्तेन मश्रुतमिति भावः॥ ४४ ॥ प्रकारान्तरेण व्याचष्टे तिश्रुतभेदोश्रुतं मत्युपलब्धार्थ, मतिसङ्गतमेव तत् ॥ तादृशं स्यात् तदान्यत्तु, श्रुतं यदि समं भणेत् ॥४५॥ ___पपादनं, बुद्धया मतिलक्षणया, दृष्टा विवक्षिता, येास्तान् भाषमाणस्य, मतिसहितमेव द्रव्यश्रुतं भवेत्, इतरत्र श्रुत १४ तत्र परविप्रविवक्षितप्रयोगस्थले च मतिसङ्गतं श्रुतं तदा स्यात् यदि श्रुतं मतितुल्यं कथयेत्प्रेक्षावान्, तच्च न कथ्यते श्रुतानुसाराननु तिपत्तिखसाराभ्यां तद्विशेषप्रतिपादनात, अथ चेतरत्र तत्तदा स्याद् यदि श्रुतं मतिसमकालं भणेत्कश्चित्तदेव च भणितुमशक्यं उपयोग१४ योगपद्यनिषेधात्, एवञ्च श्रुतोपयोगकाले मत्युपयोगाभावादेव न मतिसहितश्रुतमित्यर्थः, अथवेतरत्र मतिसङ्गतं श्रुतं तदा स्याद् यदि मत्या सह श्रुतं भणन्मत्युपयोगेन शब्दमुच्चरेदि त्यर्थः ॥ ४५ ॥ तदेवं सप्रसङ्गं पूर्वगतगाथाद्वयव्याख्यानेन समर्थित इन्द्रियभेदान्मतिश्रुतयोर्मेदः, अथ वल्कसुम्बोदाहरणात मभिघित्सुः प्रथमं परेषां तदुदाहरणोपन्यासविधि निराकुरुते केचिदाहुवल्कसमां, मति, सुम्बसमं श्रुतं ॥ तदयुक्तं तथाऽभेदे, श्रुतोच्छेदादिदूषणात् ॥४६॥ केचिद् वदन्ति वल्कसदृशी मतिरेव सुम्बसदृशशब्दसन्दर्भकाले श्रुतत्वमास्कन्दति, तथा च श्रुतपदं कर्मव्युत्पच्या शब्दार्थकमिति, तदसत्, मत्युत्तरं शब्दमात्रस्य भावेऽपि भावश्रुतस्याभावाच्छब्दसन्निधिमात्रेण मतेः श्रुतत्वोपगमेऽतिप्रसङ्गात्साकर्यप्रसङ्गानिर्विशेषभावे विशेषाभिधायकश्रुताप्रामाण्यप्रसङ्गाच्च । आह च-"अन्ने मन्नति मई, वाय(वग्ग)समा सुंबसरिसयं सुत्तं ॥ ण्डनम् ॥ coommonsoonnnnnnn PRASTAR Page #60 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना - प्रकरणम् ।। ॥ २२ ॥ दिट्टंतोयं जुतिं, जहोवणीओ ण संसहइ ॥ १५४ ॥ " [ अन्ये मन्यन्ते मतिर्वल्कसमा सुम्बसदृशं सूत्रम् ॥ दृष्टान्तोऽयं युक्तिं यथोपनीतो न संसहते]. “भावसुआभावाओ, संकरओ णिन्विसेसभावाओ | पुव्युत्तलक्खणाओ, सलक्खणावरण आओ || १५५॥” [ भावश्रुताभावात् संकरतो निर्विशेषभावात् ॥ पूर्वोक्तलक्षणात्स्वलक्षणावरणभेदात् ] ॥ ४६ ॥ अनेनैव दृष्टान्तेन द्रव्यभावश्रुतयोर्मतिद्रव्य श्रुतयोश्च भेदनिरूपणाभिप्रायमधरयति — द्रव्यभावश्रुते भेत्तुं युज्येत नैतया दिशा ।। मतिद्रव्यश्रुते वा यद्, ज्ञानभेदेऽत्र मृग्यते ॥ ४७ ॥ भावश्रुतं वल्कसमं कारणत्वात् कार्यत्वाच तज्जनितः शब्दः सुम्ब इति नेत्थमनयोर्भेदोऽभिधेयः । मतिश्रुतभेदचिन्तावसरे तद्भेदस्यानधिकृतत्वात्, एवमश्रुतानुसारिणी मतिर्वल्कसमा तज्जनितः शब्दः सुम्बसमः श्रुतानुसारिणी मतिस्तु श्रुतमित्यपि बचो नोच्चार्यमाणं चारुतामञ्चति, अनेनोदाहरणेनाधिकृतं मतिश्रुतयोर्भेदमुपेक्ष्य भेदान्तरसाधनेनाऽर्थान्तरप्रसङ्गात् । आह च“कप्पेज्जेज्ज व सो भाव- दव्वसुत्तेसु तेसु विण जुत्तो ॥ महसुयभेआवसरे, जम्हा किं सुअविसेसेण ॥ १५६ ॥ " [ कल्प्येत वा स भावद्रव्यश्रुतयोस्तयोरपि न युक्तः ॥ मति श्रुतभेदावसरे, यस्मात्किं श्रुतविशेषेण ।।] “असुयक्खरपरिणामा, व जा मई वग्गकप्पणा तम्मि ॥ दव्यमुयं सुम्बसमं, किं पुण तेसिं विसे सेणं १ ॥ १५७ ॥ " [अश्रुताक्षरपरिणामा वा या मतिर्वल्ककल्पना तस्याम् || द्रव्यश्रुतं सुम्बसमं, किं पुनस्तयोर्विशेषेण ] "इह ई जेणाहिगओ, नाणविसेसो ण दव्वभावाणं । नयदव्वभावमितेबि, जुज्जए सोऽसमंजसओ।। १५८।।” [ इह येनाधिकृतो ज्ञानविशेषो न द्रव्यभावयोः ॥ न द्रव्यभावमात्रेपि युज्यते सोऽसमञ्जसतः ] ॥ ४७ ॥ किश्च भेदघटितकार्यकारणभावशालिनोरनयोर्न वल्कसुम्बोदाहरणं परमार्थतः सम्भवतीत्युपदिश्य वास्तवव्याख्याप्रकारमाह वल्कसुम्बोदाहरणेन म विश्रुतमेद निरूपणे पर विप्रतिपत्ति खण्डनम् ॥ ॥ २२ ॥ Page #61 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Heal नायं न्याय: पृथग्भावे, तयोर्गुणकथा वृथा ॥ मतिर्वल्कं ततो भाव-श्रुतं सुम्वमिति स्थितिः ॥ ४८ ॥ सुम्बवल्कदृष्टान्तो हि कार्यकारणयोरमेदमपेक्ष्य व्यवस्थितः कथं चेतनाचेतनधर्मयेोर्ज्ञानशब्दयोर्वक्तुमवकाशं लभेत १, ' अथ आयुर्धृतम्' इतिवद्भिन्नयोरपि तन्मयत्वव्यवहारो नानुपन्न इतिचेत्, न, तथापि सम्भवति मुख्यार्थ उपचारकल्पनाऽयोगात्तस्माद्वल्कसमा मतिः सुम्बसमं तु भावश्रुतं तस्य तत्पूर्वकत्वस्या (मा) गमे व्यवस्थितत्वादिति तदुन्नयनं युक्तम् ।। आह च - "णय दव्वभावमेते वि, जुज्जए सोऽसमंजसओ ॥ १५८ ॥ " [ न च द्रव्यभावमात्रे ऽपि युज्यते सोऽसमञ्जसतः ॥] "जह वग्गा सुबत्तण- सुर्वेति सुंबं च तं तओणनं ॥ ण मई तहा धणित्तण-मुवेह, जं जीवभावो सा ॥१५९॥” [यथा वल्काः सुम्बत्वमुपयान्ति सुम्बं च तत तोऽनन्यत् । न मतिस्तथा ध्वनित्वमुपैति यज्जीवभावः सा ।] "अह उवयारो कीरs, पभवइ अत्यंतरं पि जं जत्तो ॥ तं तम्मयं ति भण्ण, तो मइपुब्वं जओ भणियं ॥ १६० ॥" [ अथोपचारः क्रियते प्रभवत्यर्थान्तरमपि यद्यस्मात् ॥ तचन्मयमिति भण्यते ततो मतिपूर्वं यतो भणितम् ॥ ]" भावसुअं तेण मई, वग्गसमा सुँबसरिसयं तं च ॥ जं चिंतिऊण तया, तो सुअपरिवाडि - मणुसरइ ॥१६१||”[भावश्रुतं तेन मतिर्वल्कसमा, सुम्बसदृशं तच्च ॥ यच्चिन्तयित्वा तया ततः श्रुतपरिपाटिमनुसरति || ] ||४८ || नन्वेतदभिधानस्य हेतुफलभावेन भेदाभिधानात्को विशेष इत्याह दृष्टान्तेनामुनाऽभेदा- श्लिष्टभेदप्रदर्शनम् ॥ विशेषोऽस्य ततो हेतु-फलभावप्रदर्शनात् ॥ ४९ ॥ हेतुफलभावेन हि भेदमात्रं साध्यते, अनेन तु भेदाभेद इत्यनयोविंशेषः, तथाहि श्रुतं मत्यभिन्नत्वे सति तद्भिनं, एकद्रव्यत्वे सति तद्धेतुकत्वात्, यद् यदेकद्रव्यत्वे सति यद्धेतुकं ततदभिन्नत्वे सति ततो भिन्नं यथा वल्कैकद्रव्यं सुम्बं वल्क मतिश्रुतभेदनिरूपणे वरकसुम्ब दृष्टान्तस्य वास्तवाभिप्रायप्रकटी करणम् ॥ Page #62 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना - प्रकरणम् ॥ ॥ २३ ॥ हेतुकमिति तदभिन्नत्वे सति ततो भिन्नमिति, न च भेदमात्रस्याकांक्षितत्वादधिकाभिधाने निग्रहः एकद्रव्यत्वेनाऽभेदोपस्थितौ कथमभेदे भेद इत्याशङ्कायामेतदभिधानाद्, अथवाऽभेदे कार्यकारणभाव एव कथं मतिश्रुतयोः ?, इत्याशङ्कोत्थानादेतदभिधानं, तदुच्छेदश्च वल्कसुम्बयोरिवाऽनुकृतान्वयव्यतिरेकयोस्तयोरभेदेऽपि कार्यकारणभावानुमानाद्, न चार्थान्तरं भेदग्राहकहेतुफलभावग्रहौपयिकत्वादेवास्य ।। ४९ ।। वल्कसुम्बोदाहरणान्मतिश्रुतयोर्भेदमभिधायाक्षरानक्षरतस्तमभिधित्सुः परमतं दूषयति— अनक्षराक्षरभेदा-दुक्ताव(द्भिन्दन्त्य) न्ये मतिश्रुते ॥ तदसत्, साभिलापा य-न्मतिरेवं विलीयते ॥ ५० ॥ मतिज्ञानमृनक्षरमेव, श्रुतज्ञानं तु श्रुतरूपमक्षवदुच्छ्वसितादि चानक्षरमित्युभयात्मकमित्यनयोर्भेद इति केचिदाहुः, तत्रैव सत्ययं स्थाणुर्वा पुरुषो वेति विकल्परूपाया ईहामत छेदप्रसङ्गात्, न हि शब्दनिर्मासं विना विकल्पत्वं नाम, किञ्चैवमवग्रहवदीहादीनामन्वयव्यतिरेकधर्मपरामर्शित्वरूपो विवेको न स्यात्, अथ सप्रकारकज्ञानत्वेनैव विवेचकत्वं, नतु साक्षरत्वेनेति, ईहादेः सप्रकारकत्वेऽपि नाक्षरानुगतत्वमिति चेत्, तर्हि श्रुतस्यापि साक्षरत्वे प्रमाणमन्वेषणयं, किञ्च ज्ञानविषययोः स्वरूपविशेष एव प्रकारता, इतीहादौ शब्द एव विशेषः प्रकारताख्यामाविभर्तीति कथमस्यानक्षरत्वं, न चातिरिक्तैव प्रकारतेति युक्तं, 'धर्मिकल्पनातो धर्मकल्पना लघीयसी' इति न्यायेन ज्ञाने शब्दाकारपरिणाम रूपाया एव तस्याः कल्पयितुं युक्तत्वात्, तदिदमाह - "अन्ने अणबखरऽक्खर–विसेसओ मइसुआई भिदति ॥ जं मइनाणमणक्खर - मवखरमियरं च सुयनाणं ।। १६२ ||" [अन्येऽनक्षराक्षरविशेषतो मतिश्रुते भिन्दन्ति ॥ यन्मतिज्ञानमनक्षरमक्षरमितरच्च श्रुतज्ञानम् ।। ] " जइ मरणक्खरच्चिय, हवेज्ज नेहादओ णिरभिलप्पे ॥ थाणुपुरिसाइपज्याय-विवेगो किह णु होजाहि १ ॥ १६३ ॥” [ यदि मतिरनक्षरैव भवेन्नेहादयो निरभिलाप्ये ॥ स्थाणुपुरुषादि अक्षरानक्षरतो मतिश्रुतभेदनिरूपणे परविप्रति पत्तिखण्ड नम् !! ।। २३ । Page #63 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अक्षरानक्ष PERIERREGISTRI रतो નનનનનનન पर्यायविवेकः कथं नु भवेत् १ ॥ ५० ॥ अथैवं प्रान्तस्योचरं निराकुरुते श्रुतनिश्रितभावेन, मतिरेषा यदि श्रुतम् ॥ तवग्रहरूपैव, मातिरन्यच्छ्रतं भवेत् ॥५१॥ श्रते हि मतिर्विधोपदिष्टा श्रुतनिमित्तमबग्रहादिचतुष्टयमश्रुतनिश्रितमौत्पत्तिक्यादिचतुष्टयं चेति ॥ तत्र चाक्षररूपतया श्रुतब्यापारात्मकं श्रुतनिश्रितमीहादिकं श्रुतमेव, मतिस्त्वन्यैवेत्यनक्षरमय्येव सेति पराशयोऽयुक्तः, अवग्रहरूपाया एव मतेः पर्यवसानप्रसङ्गादक्षररूपायाः श्रुतव्यापारात्मकत्वेन श्रुतत्वाद्, आह च-" सुअनिस्सिअवयणाओ, अह सो सुयओ मओ ण बुद्धीओ ॥ जइ सो मुअवावारो, तओ किमनं मइमाणं ॥ १६४ ॥" [श्रुतनिश्रितवचनादथासौ श्रुततो मतो न बुद्धेः ॥ यदि स श्रुतव्यापारः ततः किमन्यन्मतिज्ञानम् ॥]॥५१॥ अभिप्रायान्तरं निराकुरुते श्रुतोदितविवेकश्चे-न्मतिरेवं श्रुतोच्छिदा ॥ योगपद्यं द्वयोर्भावे, एकदा चोपयोगयोः ॥५२॥ यदि हि मत्यमावभिया श्रुतानुसारी ईहादिविशेषोऽप्यक्षरात्मकत्वान्मतिरेवेष्यते तद्दनक्षरमेव श्रुतं मृगयमाणस्य कथं तदाशापूर्तिस्तस्यैवाभावाच्छूतजन्यस्याप्यक्षरात्मकत्वेन मतित्वाद् । अथ स्थाणुपुरुषविवेककाले तदा मतिः श्रुतं चेत्युभयं स्वीक्रियते केवला तु मतिरनक्षरैव भविष्यतीति चेत्, न, एवं सति उपयोगयोगपद्यप्रसङ्गाद्,एकतरोत्पत्तिस्वीकारे च 'सावकाशानवकाशयोरनवकाशो विधिबलीयान् इति न्यायनान्यत्रानवकाशस्य मतिज्ञानस्यैव स्वीकर्तुं युक्तत्वादिति प्राञ्चः॥ नन्वयं नात्रोपयुज्यते विधिविषयत्वात्तस्य, तथाहि निर-सहशब्दयोनिर्धनः सधन इत्यत्रेवाल्पबहुत्ववाचकत्वाद् 'बहुविषयादल्पविषयो विधिर्बलीयान्' इत्यर्थः, एवं च वृक्षरित्यत्र पस्मपि'एबहुस्मोसि इति(सिद्धहैम १-४-४)सूत्रं बहुविषयत्वाद् बाधित्वा पूर्वमप्यल्पविषयं 'भिस मतिश्रुतभेदनिरूपणे परविप्रतिपत्तिखण्ड नम् ॥ E Page #64 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना णेवप्रकरणम् ॥ ॥२४॥ अक्षरानक्ष रतो मतिश्रुतमेदनिरूपणे परविप्रतिपत्तिखण्ड नम॥ ऐस' इति (२) सूत्रमुपतिष्ठत इत्युपपादितं भवति तथा च परादीनां बलवत्वव्याप्तौ सावकाशभिन्नत्वं सङ्कोचकविशेषणं देयमिति व्युत्पादितं भवति,एवं च निरवकाशस्थले सावकाशप्रवृत्तेरसाधुत्वज्ञापकतयाऽस्योपयोगो नतु तत्प्रवृत्तिप्रतिबन्धकतया,अज्ञेनभ्रान्तेन वा कृतस्य तादृशप्रयोगस्य साधुत्वप्रसङ्गात्, तदसाधुत्वज्ञापकान्तरकल्पने गौरवाद्, व्युत्पन्नस्य तथाप्रयोगकारणविधटकतया तदुपयोग इत्यपि कश्चित् ॥ किश्चाऽवग्रहस्थले सावकाशं मतिज्ञानमपि कथं कल्पनीयमिति चेत्, न, क्लप्तश्रुतकारणाभावात् क्लृप्त मतिकारणसच्चाच्च, मतिज्ञानमेव तदोत्पत्तुमर्हतीति तात्पर्यात, अपि चाऽक्षरानुगता श्रुतनिश्रिता मतिः, अन्या त्वश्रुतानिश्रितेत्यम्युपगमे औत्पत्तिक्यादेरपि श्रुतनिश्रितत्वप्रसङ्गादपसिद्धान्तः॥ आह च-"अह सुयओ वि विवेगं, कुणओ ण तयं सुअं सुझं णत्थि ॥ जो जो सुअवावारो, अनो वि तओ मई जम्हा ॥ १६५॥"[अथ श्रुततोऽपि विवेकं, कुर्वतो न तच्छृतं श्रुतं नास्ति । यो यः श्रुतव्यापारोऽन्योऽपि सको मतिर्यस्मात् ] "मइकाले वि जइ सुअं, तो जुगवं मइसुओवओगा ते ॥ अह नेवं एगयर, पवज्जओ जुज्जए ण सुअं॥१६६॥" [मतिकालेऽपि यदि श्रुतं ततो युगपन्मतिश्रुतोपयोगी ते ॥ अथ नैवमेकतरं प्रपद्यमानस्य युज्यते न श्रुतम् ] "जइ सुअनिस्सिअमक्खर-मणुसरओ तेण मइचउक्कं पि ॥ सुअनिस्सिअमावलं, तुह तंपि नमक्खरप्पभवं ॥१६७ ॥" [यदि श्रुतनिश्रितमक्षरमनुसरतस्तेन मतिचतुष्कमपि ॥ श्रुतनिश्रितमापनं तव तदपि यदक्षरप्रभवम् ] ॥ ५२॥ ननु यद्यक्षरानुगतत्वं न श्रुतनिश्रितत्वं तर्हि किमन्यदिति जिज्ञासायामाह श्रुताऽभ्याससमुद्बुद्ध-क्षयोपशमसम्भवम् ॥ श्रुतानुसारहीनं प-तदेव श्रुतनिश्रितम् ॥५३॥ श्रुतानुसारहीनं श्रुतनिश्रितमित्युक्ते औत्पत्तिक्यादावतिन्याप्तिस्तद्वारणाय श्रुताभ्यासेति विशेषणं, यद्यपि "भरनित्थरण CEREGIOUS R ॥ २४॥ Page #65 -------------------------------------------------------------------------- ________________ %%%%%%%%% समत्था, तिवग्गसुचत्थगहियपेयाला | | उभओलोगफलवई विणयसमुत्था हव बुद्धी । । ९४३ ॥ | " ( आव ० भाष्य [भरनिस्तरणसमर्था त्रिवर्गसूत्रार्थगृहीतसारा ( प्रमाणा) ।। उभयलोकफलवती विनयसमुत्था भवति बुद्धिः ] इतिवचनाद् वैनयिक्यामश्रुतनिश्रितायामपि भुताभ्यासापेक्षास्ति, तथापि श्रुतानुबुद्धक्षयोपशमजन्यावृत्तिश्रुतानुसारह निवृत्तिजातिमज्ज्ञानत्वं श्रुतोद्बुद्धक्षयोपशमजन्यत्वाव्यभिचारि तादृशजातिमज्ज्ञानत्वं वा श्रुतनिश्रितत्वमित्यत्र तात्पर्यम्, अत एवाह “किन्तु सकृच्छुतनिश्रितत्वे सत्यपि बाहुल्यमङ्गीकृत्याश्रुतनिश्रितं तदुच्यत इत्यदोष" इति इदमेवाभिप्रेत्य चाह भाष्यकारः ॥ “जइ तं सुएण ण तओ, जाणइ सुअनिस्सिअं कह भणियं ॥ जं सुअकओवयारं, पुव्वि इण्हिं तयणवेक्खं ॥ १६८ ॥ | " [ यदि तत् श्रुतेन न स जानाति श्रुतनिश्रितं कथं भणितं १ ॥ यत् श्रुतकृतोपचारं, पूर्वमिदानीं तदनपेक्षम् ] “पुव्वि सुअपरिकम्मिअ- मइस्स जं संपयं सुआईयं ॥ तं निस्सिअमियरं पुण, अणिसिअं महचक्कं तं ॥ १६९ ॥ [ पूर्व श्रुतपरिकर्मितमतेर्यत्सांप्रतं श्रुताततिम् ॥ तन्निश्रितमितरत् पुनरनिश्रितं मतिचतुष्कं तत् ।।] यद्यपि विशेषणधीत्वेन श्रुतानुसारो विशिष्टेऽश्रुतनिश्रितेऽपि पदधत्वेन च न श्रुतनिश्रितेऽपि तथापि श्रुतादवगतमिदमिति प्रतीतिसाक्षिको विषयताविशेष एव श्रुतानुसारोऽत्र ग्राह्यः ॥ ५३ ॥ नन्वेवं यदि श्रुतनिश्रिताऽश्रुतनिश्रिता वा मतिरवग्रहरूपा निरभिलापा, हादिरूपा च साभिलापा, श्रुतमपि च प्रागुक्तरीत्या द्विविधं तर्हि कोऽनयोर्भेद ? इति सुहृद्भावेन पृच्छाम इति चेत्, उच्यतेद्विविधापि मतिस्तस्माद्, द्विरूपैवेति का भिदा । तद् द्रव्याक्षर भेदेन, भावनीया भिदाऽनयोः ॥ ५४ ॥ यद्यपि भावाक्षरेणाऽवग्रहादिरूपमतेर्भावद्रव्याक्षराभ्यां च श्रुतस्य द्वैविध्यमापततोऽविशिष्टं, तथापि मतौ पुस्तकादिगतं ताल्वादिव्यापारजन्यं च द्रव्यश्रुतं नास्त्येव द्रव्यश्रुतस्य द्रव्यमतित्वेनारूढत्वादिति, द्रव्याक्षरेणाऽनक्षरैव मतिः, श्रुतं तु द्रव्यश्रुत अक्षरानक्षरतो मति श्रुतमेदनिरूपणे श्र. निश्रित त्वानि श्रितत्वयोर्निरूपणम् ॥ Page #66 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरण | श्रीज्ञाना र्णव प्रकरणम् ॥ 115411 त्वेनापि रूढं तदपि शब्दरूपमक्षरमयम्, उच्छ्वसितादिरूपं चानक्षरं भावश्रुतमपि विकल्पात्मकत्वाद् भावाक्षरेण साक्षरं, द्रव्याक्षरास्वभावत्वाच्च तेनानक्षरमित्यनयोर्भेदः ॥ तदिदमाह -" उभयं भावक्खरओ, अणक्खरं होज वंजणक्खरओ || मइनाणं सुतं पुण, उभयं पि_ अणक्खरक्खरओ ॥ १७० ॥ " [ उभयं भावाक्षरतोऽनक्षरं भवेद्व्यञ्जनाक्षरतः ॥ मतिज्ञानं श्रुतं पुनरुभयमप्यनक्षराक्षरतः ] ।। ५४ ॥ पर्यवसितार्थमाह द्रव्यश्रुतव्यवहृते-र्भावाभावे विभिन्दतः ॥ मतिश्रुते इतरथा, व्यवहारस्य सङ्करात् ॥ ५५ ॥ मतिज्ञानस्य द्रव्यश्रुतव्यवहाराविषयत्वादेव श्रुतज्ञानाद् भेदः, अन्यथा द्रव्यश्रुतमितिवद् द्रव्यमतिरिति व्यवहारः स्यादर्थाऽभेदाद्, अथ भेदेऽपि मतिकारणे शब्दे द्रव्यमतित्वेनाव्यवहारे इच्छेव बीजमित्यभेदेऽपि व्यवहर्तुरिच्छेव नियामिकेति चेत्, न, भेदेऽसाधारण्येनापेक्षाया व्यवजिहीर्षा बीजत्वाद्, अभेदे तदसम्भवाद्, एवं च मतिज्ञानं श्रुतज्ञानाद् भिद्यते द्रव्यश्रुतव्यवहाराविषयत्वाद्, अवधिज्ञानवत्, श्रुतज्ञानं वा मतिज्ञानाद् भिद्यते द्रव्यश्रुतव्यवहारविषयत्वाद्, व्यतिरेकेऽवध्यादिदृष्टान्त इति प्रयोगः । न च द्रव्यश्रुतव्यवहारविषयत्वं शब्द एवेत्यपक्षधर्मत्वं हेतोस्तथात्वेऽपि हेतौ पक्षीयसाध्यान्यथानुपपत्तिप्रतिसन्धानेन पक्षीयसाध्यसिद्धेः, अत एव जलचन्द्रेण नभश्रन्द्रानुमानमितिप्राञ्चः ॥ अस्तु वा द्रव्यश्रुतव्यवहारघटककारणतानिरूपितकार्यताशालित्वादिति हेत्वर्थः ॥५५॥ उक्तोऽक्षरानक्षरभेदान्मतिश्रुतयोर्भेदः, अथ मूकेतरभेदात्तमभिधित्सुस्तदर्थमुपन्यस्यापाततो दूषयतिस्वपरज्ञप्तिहेतुत्वा-त्तयोर्मुकान्यवद्भिदा । चेष्टादिमतिहेतोर -प्यन्यार्थत्वान्न युज्यते ॥ ५६ ॥ द्रव्याक्षररूपस्य श्रुतस्य परप्रतीतिजनकत्वान्मतेस्तु तदभावेनात्ममात्रप्रत्यायकत्वान्मूकामूकयोरिव तयोर्भेदमन्येऽभिदधति, अक्षरानक्ष रतो मतिश्रुतभेदनिरूपणसमा. प्तिः मूकेत रभेदान्मति श्रुतभेदनि |रूपणम् ॥ ।। २५ ।। Page #67 -------------------------------------------------------------------------- ________________ GIRMALKARNIRACLECRECRUCT तच्चिन्त्यम्, यतः श्रुतज्ञानं हि न स्वतः परप्रत्यायकं किं तु श्रुतज्ञानकारणे शब्दे तदुपचारं कृत्वा तस्य परप्रत्यायकत्वमभिधीयत इति परत एव तत्तथा, एवं च करवक्त्रसंयोगादिका अपि चेष्टा अनक्षररूपत्वेन मतिहेतुतां भजन्त्यः परस्मिन् भुजिक्रियादिप्रतीतिं जनयन्ति, इति मतेरपि परतः परप्रत्यायकत्वमविशिष्टम् । आह च-"सपरपञ्चायणओ, भेओ मूएतराण वाभिहिओ॥ जं मृअंमइनाणं, सपरप्पञ्चायगं सुत्त॥१७॥" [स्वपरप्रत्यायनतो भेदो मुकेतरयोरिवाभिहितः॥ यद् मूकं मतिज्ञानं, स्वपरप्रत्यायक श्रुतम् ] "सुअकारणंति सद्दो, सुअमिह सो य परवोहणं कुणइ । मइहेअवो वि हि परं, बोहिंति कराइचेट्ठाओ ॥ १७२॥" [श्रुतकारणमिति शब्दा, श्रुतमिह स च परबोधनं करोति ॥ मतिहेतवोऽपि हि परं बोधयन्ति करादिचेष्टाः ] "न परप्पबोहयाई, जं दोवि सरूवओ मइसुआई ॥ तक्कारणाई दोण्ह वि, बोहिंति तओ ण भेओ सिं ॥ १७३ ॥" [न परप्रबोधके यद् द्वे अपि स्वरूपंतो मतिश्रुते ॥ तत्कारणानि द्वयोरपि बोधयन्ति ततो न भेदोऽनयोः॥] ॥ ५६ ॥ वस्तुस्थितिमुपदर्शयतिपरप्रत्यायने शब्दो, ह्यसाधारणकारणम् ॥ चेष्टापि शाब्दहेतुळ (त्वात्), तदियं युज्यते गतिः॥५७॥ यद्यपि द्रव्यश्रुतं श्रुतज्ञानं जनयितुमान्तरिकान्मतिविवर्तानवग्रहेहादीन् जनयति तथाप्यक्षररूपतया मुख्यत्वात् श्रुतज्ञानस्यैव तदसाधारणं कारण, करादिचेष्टास्तु न मतिज्ञानस्यैवासाधारणं कारणं, 'भोक्तुमिच्छत्ययम्' इत्यादिश्रुतानुसारिविकल्पस्यापि जनकत्वात्, अथवाऽऽचारादिपुस्तकाक्षरस्य गुरुजनोदीरितशब्दस्य वा श्रुतस्य यथा मोक्षं प्रत्यसाधारणकारणानां क्षायिकज्ञानदर्शनचारित्राणां कारणत्वं न तथा परप्रत्यायिकानां चेष्टादीनामिति विशेषः ॥ वस्तुतः शब्दस्येव चेष्टादीनामप्यर्थविशेषेण सह सम्बन्धग्रहात्पदार्थोपस्थितिद्वारा शाब्दप्रतीतिजनकत्वमेव, न तु मतिज्ञानजनकत्वं, मुकेतरभेदान्मतिश्रुतभेदनिरूपणेऽन्याभिप्रेतमपाकत्य स्वाभी ष्टस्योपदर्शनम् ॥ SEC4%955 Page #68 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं भीज्ञाना र्णवप्रकरणम् ॥ ॥२६॥ 1593GESK अत एव शब्दोदीरणासामर्थ्याभावे प्रतिपिपादयिषवस्तथा तथा चेष्टमाना दृश्यन्ते, न च चेष्टादिना व्याप्तिप्रतिसन्धानपुरस्सरमनुमितिरेव जन्यते, न तु शाब्दबोध इति वाच्यम्, एवं सति शब्दादप्यर्थप्रतीतिरनुमानेनैवेति गतं शब्दप्रमाणचर्चयैव ॥ अथ शाब्दबोधे पदोपस्थित एवार्थों भासते नतूपस्थितमात्रं, अन्यथा घटपदात्सम्बन्धितयोपस्थितस्याकाशस्य शाब्दबोधप्रवेशप्रसङ्गात्तथा च चेष्टोपस्थितोऽर्थः कथं शाब्दबोधे निविशतामिति चेत, न, सङ्केतग्रहाधीनोपस्थितिकस्यैव तत्प्रवेशनियमात, अथ चेष्टादिना शब्दानुमानादेव शाब्दबोधस्तस्यैव तद्धेतुत्वेन क्लप्तत्वाद् , अन्यथा लिप्यक्षरादेरपि तद्धेतुत्वकल्पने गौरवादिति, तदिदमभिप्रेत्योक्तं "प्रयत्नजन्या शरीरतदवयवक्रिया चेष्टा सा च नाट्यशास्त्रादिसमयबलेन पुरुषाभिप्रायविशेष अर्थविशेषं च गमयन्ती नागमाद् भिद्यते लिप्यक्षरादर्थप्रतिपत्तिवदिति" इति चेत्, न, चेष्टायाः शरीरवृत्तित्वेन शब्दस्य चाकाशवृत्तित्वेन तत्र व्याप्तिग्रहासम्भवात्, चेष्टया तदभिप्रायस्थः शब्दः कल्प्यते, इत्यपि वार्तम् ॥ आकाशं घटमानयेतिशब्दवदित्यनुमित्याद्याकलितशब्दस्येव तस्य स्वतन्त्रानुपस्थितत्वेन शाब्दबोधाहेतुत्वात, किश्चैतादृशव्याप्तिप्रतिसन्धान विनापि चेष्टादेराहत्यार्थप्रतीतिदर्शनात्तस्याः स्वतन्त्रतयैव हेतुत्वं युक्तम्, अथ चेष्टाजन्यज्ञानस्य शाब्दत्वे शब्दात्प्रत्येमीति तत्र प्रतीतिः स्यान्न तु संज्ञया प्रत्येमीति चेत्, न, तस्य ज्ञानस्य शाब्दत्वेऽपि शब्दाजन्यत्वात्, तादृशप्रतीतो शब्दजन्यत्वस्य नियामकत्वात्, अत एव चेष्टायां लक्षणाभावेऽपि व्यजनयैव बोधकत्वमित्यालङ्कारिकाः॥ तदिदमखिलं चेतसि निधाय बभाषे भगवान् भाष्यकार:“दव्वसुअमसाहारण-कारणओ परविबोहयं हुजा ।। रूढं ति व दबसुयं, सुअंति रूढा ण दव्वमई ॥ १७४ ॥" [ द्रव्यश्रुतमसाधारणकारणतः परविवोधकं भवेत् ॥ रूढमिति वा द्रव्यश्रुतं श्रुतमिति रूढा न द्रव्यमतिः ॥]“सा वा सद्दत्थो च्चिय, तया मूकेतरभेदान्मतिश्रु|तभेदनिरूपणे चेष्टाया: शाब्द जनकत्वं व्यवस्थापितम् ॥ ॥२६॥ Page #69 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विजं तंमि पच्चओ होइ ॥ कत्ता वि हु तदभावे, तदभिप्पाओ कुणइ चिट्ठ॥ १७५॥" [सा वा शब्दार्थ एव तयापि यत्तस्मिन्प्रत्ययो भवति ॥ कर्तापि खलु तदभावे तदभिप्रायः करोति चेष्टाम् ॥] अत्र शब्दार्थ इति शब्दो वक्तुः समुदीरितवचनरूपस्तस्यार्थः शब्दार्थः श्रोतृगतज्ञाने प्रतिभासमानस्तदभिधेयवस्तुस्वरूपः श्रुतज्ञानमिति तात्पर्य, तथा च कारणे कार्योपचार आश्रयणीय इति हृदयम् । वस्तुतः शब्दस्यार्थः प्रयोजनमिति सम्मुख एवार्थः ॥ ननु मूकेतरभेदस्याऽवधारणगर्भोऽयमर्थः कुतो न स्याद्यत श्रुतज्ञानं मुखरमेव मतिज्ञाने तु न नियम इति चेत्, न, श्रुतज्ञानस्यापि सर्वस्यामुखरत्वादनन्तभागस्यैव निबन्धादियोग्यतया मुखरत्वोक्तौ चाभिलाप्यानभिलाप्यविषयविभागादनतिरेकप्रसङ्गादितिदिग् । ननु तथापि खपरप्रत्यायकत्वा प्रत्यायकत्वाभ्यां मतिश्रुतहेतूनामेव विशेष उक्तोन तुमतिश्रुतयोः न च श्रुतमपि शब्दप्रयोगद्वारा परप्रत्यायकमितिवाच्यम्,मतिज्ञानस्यापि तद्वारा तथात्वादितिचेत्,न,स्वकारणद्वारा परस्मै स्वसमर्पकत्वस्य विशेषकत्वात् । असार्वत्रिकमिदमभेदकमिति चेत्, न, तजातीयत्वस्य सार्वत्रिकस्य भेदकत्वात् ॥५७॥ उक्तो मूकेतरभेदान्मातश्रुतयोर्भेदस्तत्प्रतिपादनेन च कृतं सर्वप्रकारैर्भेदनिरूपणमित्याह मियो मतिश्रुतभिदा, तदेवं सर्वहेतुभिः ॥ दिशा प्रदर्शिताकम्प-सम्प्रदायपवित्रया ॥ ५८॥ स्पष्टः॥ नवरं प्रदर्शितेति क्तप्रत्ययबलेन मतिश्रुतभेदस्य सिद्धत्वज्ञानेन प्रतिवन्धकजिज्ञासानिवृत्त्या मतिस्वरूपनिरूपणप्रयोजकजिज्ञासा शिष्याणां कृता भवति ॥ ५८॥ सविवरणे श्रीज्ञानार्णवप्रकरणे प्रथमस्तरङ्गः सम्पूर्णः॥ प्रौढिं ये विबुधेषु जीतविजयप्राज्ञाः परामैयरु-स्तत्सातीर्थ्यभृतो नयादिविजयप्राज्ञाः श्रयन्ति श्रियम् ॥ तेषां न्यायविशारदेन शिशुना ज्ञानार्णवे निर्मिमते, पूर्णे भाष्यवचोमृतैरतितरा-माद्यस्तरङ्गोऽभवत् ॥१॥ मूकेतरमेदामतिश्रुतभेदनिरूपणसमाप्तिसर्वप्रकारैर्मति श्रुतभेदनिरूपणो४ पसंहारः॥ CRORROCESSTORESE RECk सर Page #70 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञानापर्णव प्रकरणम् ॥ ॥ २७ ॥ ग्रन्थान्तरं रत्नजिघृक्षयाऽन्ये, जडास्तडागं परिशीलयन्ति । रत्नाकरं जैनवचोरहस्यं वयं तु भाष्यं परिशीलयामः ॥ २ ॥ नमोऽस्तु भाष्यकाराय, भगवन्मतभानवे ॥ पराहतेषु तकेंषु, भाष्यजीवातुदायिने ॥ ३ ॥ ॥ इति श्रीज्ञानार्णवे न्यायविशारदविरचिते मतिश्रुतभेदचिन्ताधिकारः प्रथमस्तरङ्गः सम्पूर्णः ॥ अथ द्वितीयस्तरङ्गः ॥ अथावसरसङ्गत्या मतिज्ञाननिरूपणं प्रतिजानीते । भेदपर्यायसुव्यक्त-मथ तत्त्वनिरूपणात् ॥ निरूप्यते मतिज्ञान-मुद्देशक्रमसङ्गतम् ॥ १ ॥ ५९ ॥ अथ ' यथोद्देशं निर्देश ' इति न्यायात् पूर्वं मतिज्ञानमुद्दिष्टमिति तदेव पूर्व निर्दिश्यते, एवं चोद्देष्टुरिच्छ्योद्देशक्रमः, उद्देशक्रमाच्च निर्देशक्रम इति लभ्यते उद्देश इव निर्देशऽपीच्छेव नियांमिकाऽसाम्प्रदायिकत्वेन बलवदनिष्टानुबन्धित्वज्ञानाच्च नोद्देशक्रमविपरीतक्रमेण निर्देशेच्छेति तु युक्तं, अत्राऽथेत्यनेन प्रतिबन्धकजिज्ञासापगमलक्षणाऽवसरसङ्गतिद्यत्यते, तथा चासङ्गताभिधानशंका निवर्तिता भवति, प्रतिज्ञया च शिष्यावधानं कृतं भवति । तथाह च भाष्यकारोऽपि - "मइसुअनाणविसेसो, भणिओ तल्ल वखणाइभरणं ॥ पुव्वि आभिणिबोहिय-मुद्दिहं तं परूविस्सं । १७६ ॥ [मतिश्रुतज्ञानविशेषो भणितस्तल्लक्षणादिभेदेन || पूर्वमाभिनिबोधिकमुद्दिष्टं तत्प्ररूपयिष्ये ] ॥ १॥ तत्र निरूपणं तावत्तत्त्व भेदपर्यायैः कर्तव्यं तत्र तस्य भात्रस्तत्त्वमिति निरुक्त्या तत्त्व सामान्यलक्षणं तच्च पूर्वं कृतमेवेति भेदनिरूपणमवसरप्राप्तं चिकीर्षुराह - प्रथमतरङ्गसमाप्तिः द्वितीयतर ङ्गारम्भ:, तत्र मतिज्ञानतत्त्व निरूपण प्रतिज्ञा ॥ ॥ २७ ॥ Page #71 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मतिभेदप्रभे दनिरूपणं तत्र अवग्र हादीनां लक्षणम् ॥ FIN नवरं पारिणामिका य, धारणा एव होत ज्ञानस्य भेदवस्तूनि समाचार्यो भेद' इति, एव भवस्तूनि, तेन भेदस्य FOLKATHAHARIBAGAR श्रतनिश्रितमन्यच्च, तद्विधाऽवग्रहादिभिः॥ औत्पत्तिक्यादिकैर्भेदै-कैकं स्याचतुर्विधम् ॥२॥६॥ तन्मतिज्ञानं द्विविधं श्रुतनिश्रितमश्रुतनिश्रितं च, तत्स्वरूपं च प्रागुक्तं, तदपि प्रत्येकं चतुर्विधं, श्रुतनिश्रितमवग्रहहापायधारणालक्षणं,अश्रुतनिश्रितश्चौत्पत्तिकी-वैनयिकी-कार्मिकी-परिणामिकीलक्षणं चेति, यद्यप्यश्रुतनिश्रितेऽप्यवग्रहादिकमस्ति तथापि'असाधारणेन व्यपदेश' इति न्यायादित्थं विभागः प्रदर्शितः॥२॥ आदिपदेन संक्षिप्योपदर्शितं प्रभेदं प्रपञ्चयति भिदाश्च ताश्चतस्रोऽव-ग्रहहापायधारणाः॥ औत्पत्तिकी वैनयिकी, कार्मिकी पारिणामिकी ॥३॥६॥ स्पष्टः॥ नवरं पारिणामिकीत्यस्यान्ते चेतीतिशेषः, अत्रच श्रुतनिश्रिताधिकारादवग्रहादिभेदानामेवाधिकारः॥ आह च निर्यक्तिकार:-"उग्गह-ईह-वाओ य, धारणा एव होंति चत्तारि ।। आभिणिबोहिअनाणस्स, भेअवत्थू समासेणं।।१७८॥" [अवग्रह ईहाऽपायश्च धारणेव भवन्ति चत्वारि ॥ आभिनिबोधिकज्ञानस्य भेदवस्तूनि समासेन], अत्र चकारोऽवग्रहेहादेः पर्यायत्वनिरासेन स्वातन्त्र्यप्रदर्शनार्थः, तत्प्रदर्शकत्वं चास्य भेदार्थत्वादवसेयं, अनुशास्यते च 'चार्थों भेद ' इति, एवकारश्च अवगृहीतमेवेद्यते ईहितमेव निश्चीयते, निश्चितमेवावधार्यत इति क्रमद्योतनार्थः ॥ भेदा एव वस्तूनि विविक्तवस्तुस्वरूपाणि भेदवस्तूनि, तेन भेदस्य | पदार्थान्तरत्वनिरासः, समासेनेति विस्तरेणाधिकानामपि सम्भवादितिभावः ॥३॥ अवग्रहादीनां लक्षणमाह- अपग्रहोऽवग्रहः स्या-दीहा भेदगवेषणम् ।। इदमेवेत्यपायो धी-र्धारणा तदविच्युतिः ॥४॥६२॥ अपकृष्टः सामान्यमात्रावभासी ग्रहोऽवग्रहो निष्प्रकारकं ज्ञानमित्यर्थः, भेदगवेषणं तद्व्याप्यान्वयव्यतिरेकधर्मसम्भवग्रहणमीहा, इदमित्थमेवेत्यवधारणमपायो,निश्चिताऽर्थाविच्युतिर्धारणा,अविच्युतिस्मृतिवासनारूपाणां तिसृणामपि धारणानां विच्युतिविरोधित्वा RAKAR Page #72 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञानार्णव प्रकरणम् ॥ ॥ २८ ॥ न्नाव्याप्तिः। आह च नियुक्तिकारः ॥“अत्थाणं उग्गहणं, अवग्गहं तह विआलणं ईहं ।। ववसायं च अवायं, धरणं पुण धारणं चिंति ॥ १७९॥।" [अर्थानामग्रहणमवग्रहं तथा विचारणमीहां । । व्यवसायं चापायं धरणं पुनर्धारणां ब्रुवते ] “अत्थाणं उग्गहणम्मि उग्गहो” इतिपाठे विभक्तिव्यत्ययो द्रष्टव्यः । भाष्यकारोऽप्यभ्यधात् -" सामण्णत्थावग्गहण - मोग्गहो भेअमग्गण महेहा ॥ तस्सावगमोsवाओ, अविच्चुई धारणा तस्स ॥ १८० ॥" [ सामान्यार्थावग्रहणमवग्रहो भेदमार्गणमथेहा ॥ तस्यावगमो ऽपायोऽविच्युतिर्धारणा तस्य ] एतेषां लक्षणानां निष्कर्षमग्ने वक्ष्यामः ॥ ४ ॥ अत्र चावग्रहादारभ्य परैः सह बह्रयो विप्रतिपत्तयः सन्तीत्यवग्रहविषयान्तां तावन्निरोकरोतिअवग्रहेऽपि सामान्य-विशेषं विषयं परे ।। प्राहुस्तेषा मपायस्य, प्रवृत्तिरतिदुर्घटा ॥ ५ ॥ ६३ ॥ सामान्यमात्रावगाहिज्ञानत्वं नावग्रहत्वं शब्दादिसामान्यविशेषग्रहस्यापि तथात्वात्, किन्तु इदं तदिति वेत्याकारकविमर्शपूर्व भाविज्ञानत्वमेव, प्रवर्तते च शब्दोऽयमिति ज्ञानोत्तरं किमयं शांखः शाङ्गों वेत्यादिविमर्श इति, सोऽप्यवग्रह इति केचिदाहुः, तन्न, तादृशविमर्शानुपरमेनापायस्य कदाप्यप्रवृत्तिप्रसङ्गाद्, ईहाया अपीहान्तरपूर्व भावित्वेनाऽवग्रहत्वप्रसङ्गात्, सामान्यविशेषभानस्यापि सामान्यमात्रभानं विनाऽसम्भवाद्विशेषधर्मभानेऽर्थावग्रहस्य हेतुत्वादित्यादि बहुतरं वक्ष्यते, आह च - " सामन्नविसेसस्स वि, केइ उग्गहणमुग्गहं बिंति ॥ जं मइरिदं तयं ति च तन्नो बहुदोसभावाओ || १८१ ॥ " [सामान्यविशेषस्यापि केचिदवग्रहणमवग्रहं ब्रुवते ।। यन्मतिरिदं तदिति च तन्नो बहुदोषभावात् ] ॥ ५ ॥ ईहाविषयिणीं विप्रतिपत्तिं निरस्यति ईहां संशयमेवाहुः, परे तत्प्रकृतासहम् ॥ हेतूपपत्तिव्यापारा, न नेहा संशयात्मिका ॥ ६ ॥ ॥ ६४ ॥ मतिभेदप्रमेदनिरूपणेs वग्रहादि लक्षणे निर्यु चिभाव्यसं वाद: अवग्रहेहाविषवविप्रतिपत्तिनिरासः ॥ ॥ २८ ॥ Page #73 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मतिनिरूपणे ईहासंशययोल क्षणमेदतो भेदस्य व्यवस्थापनम्।। ARCHCAREGICASCIENDAR स्थाणुर्वा पुरुषो वेत्यनिश्चयात्मकं संशयमेवेहां केचिदुपयन्ति, ते भ्रान्ताः,ज्ञानाधिकारज्ञानरूपाया ईहाया उपन्यासायोगाद्, आह च-"ईहा संसयमेतं, केई न तयं तओ जमनाणं । मइनाणंसा चेहा, कहममाणं तई जुत्तं ॥१८॥[ईहा संशयमात्र केचिक तत्स यदज्ञानम् । मतिज्ञानांशश्चहा-कथमज्ञानं सा युक्तम्] संशयेहयो(लक्षण्यं न वीक्षामहे इति चेत्, सोऽयं पुरुषदोषो न तु वस्तुदोषस्तयोर्भेदस्यानुभविकत्वात्, तथाहि 'एकत्र विधिनिषेधोभयज्ञानं संशयः, 'हेतूपपत्तिव्यापारप्रवणं ज्ञानमीहा' इति लक्षणभेदादनयोर्भेदः,यदाह-"जमणेगत्थालंवण-मपज्जुदासपरिकुंठियं चित्तं ॥सेय इव सव्वप्पयओ,तं संसयरूवमण्णाण।।१८३॥" [यदने कार्थालम्बनमपयुदासपरिकुंठितं चित्तम्॥ शेत इव सर्वात्मतस्तत्संशयरूपमज्ञानम्] "तं चियसयत्थहेऊ-ववत्तिवावारतप्परममोहं ॥ भूआभूअविसेसा-याणच्चायाभिमुहमीहा।।१८४॥"[तदेव सदर्थहेतूपपत्तिव्यापारतत्परममोघम् ॥ भूताभूतविशेषादानत्यागाभिमुखमीहा] अत्रानेकार्थालम्बनमित्यत्रालम्बनपदैनकालम्बनत्वविवक्षणाद्,अनेकार्थपदेन विरुद्धार्थत्वलाभाद्, “एकविशेष्यकं विरुद्धधर्मप्रकारकं ज्ञानं संशय" इति लक्षणं, अपर्युदासपरिकुंठितमिति च स्वरूपाभिधानानुपलक्षणादविधिपरिकुंठितत्वमपि द्रष्टव्यं, 'सय' इत्यादि च, सं सर्वात्मना शेत इवेति संशय इति व्युत्पत्त्यर्थाभिधानं, अत्र विरुद्धनानाधर्मप्रकारकत्वं परस्परग्रहप्रतिबन्धकग्रहविषयतावच्छदकनानाधर्मप्रकारकत्वं विवक्षितं, तेन तदभावव्याप्तिपर्यवसायिनो विरोधस्य संशयेऽभानेऽपि न क्षतिः, न वा इदं रजतमेतद्रपवच्चेति ज्ञानस्य संशयत्वापत्तिः, यत्तु 'एकथर्मिकतत्तदभावोभयप्रकारकज्ञानमेव संशय' इति, तन्न, अयं स्थाणुः पुरुषो वेति भावाभावानात्मकविरुद्धधर्मद्वयप्रकारकज्ञानस्यापि संशयत्वात् , तत्र चतुष्कोटिकसंशयस्यासिद्धत्वादिति दिग् ॥ यच्च ज्ञानं स्वार्थहेतूपपत्तिव्यापारतत्परं तदीहा, भृताभृतेत्यादिकं च स्वरूपकथनं, तत्र हेतुव्यापारः स्थाणुरयं वल्ल्युपसर्पणकाकादि " इति लक्षण, अपर्दैनकालम्बनत्वविवश्वोत्पपत्तिव्यापारतत्पश्चया ॐॐॐ Page #74 -------------------------------------------------------------------------- ________________ SARANA सविवरणं श्रीज्ञाना मतिनिरूपणे ईहाया अपायाभेद: अपायधारणाविप्रतिपत्तिनिरासश्च॥ प्रकरणम्।। ॥२९॥ निलयादित्याकारः, उपपत्तिव्यापारश्च सम्भवपयोलोचनं यथा सूर्यास्तसमये महति तमिस्र स्थाणुरयं सम्भाव्यते नत पुरुषः, तस्यासम्भवादिति, न चाशुनश्वरज्ञाने कथमेतावत्पर्यालोचनमिति वाच्यं, ईहाया बहुसामायिकत्वाद्, अत एव बहुकालममुमर्थमनुभवामीति प्रतीतिः सगच्छते, एवञ्च हेतूपपत्योः परमार्थत एकरूपत्वात्तत्संशयविरोधितव्याप्यधर्मवत्ताज्ञानमेव तदीहेत्यायाति, तत्संशयविरोधिता च तदभावानवगाहित्वेन विवक्षितेति न व्याप्यव्याप्यवत्तापरामर्शप्रसूतव्याप्यवत्तानुमितेरपायरूपाया ईहात्वापत्तिः, तत्संशयनिवर्तकापायानुकूलपरामर्शत्वं चेहालक्षणं, तेन न तर्काद्यतिव्याप्तिः,स्यादेतत्,तदभावाप्रकारकत्वे सति तत्प्रकारक ज्ञानं निश्चयः, स एव चापायः, ईहापि संशयभिन्नत्वाचादृश्येवेतीहापाययोः को भेद ? इतिचेत्,न,इदमित्थमेवेत्यनुभवसाक्षिकविषयताविशेषवतोऽपायादतादृश्या ईहाया भिन्नत्वात् । तादृशविषयताभावः संशयत्वेन व्याप्त इतिचेत्,न,अवग्रहेण व्यभिचारात. स्पष्टज्ञानत्वविशिष्टः स तथेतिचेत्,न, तादृशव्याप्तौ मानाभावाद्,अपि चामुमर्थ विचारयामि, अमुमर्थं च निश्चिनोमीति प्रतीतिभ्यामीहात्वापायत्वयोः स्फुटमेव स्वतन्त्रतया भानमिति दिग् ॥ ६॥ अपायधारणागतविप्रतिपत्तिनिरासाय परमतमुपदर्शयति केचिदन्यविशेषस्या-ऽभावव्यवसितिं जगुः ॥ अपायमिदमेवेति, निश्चयं धारणां पुनः॥७॥६५॥ 'ववसायंमि अवाओ' इत्यत्र विशेषेण एककोटिव्याप्यधर्माभावप्रकारेणावसायो ज्ञानमिति यथाश्रुतार्थभ्रान्ताः पुरुषत्वव्याप्यशिकण्डयनादिधर्माभाववानयमित्यादिज्ञानमपायं, 'धरणं पुण धारणं विति' ति यथाश्रुतार्थभ्रान्ताश्च तदुत्तरोत्पन्नं स्थाणुरेवाडयमित्यादिज्ञानं धारणां केचिदाहुः॥आह च-"केइ तयन्नविसेसा-वणयणमित्तं अपायमिच्छति ॥ सम्भृयत्थविसेसा-वधारणं धारणं विति॥१८५॥" [केचित्तदन्यविशेषापनयनमात्रमपायमिच्छन्ति । सद्भूतार्थविशेषावधारणं धारणां ब्रुवते ॥] ॥७॥ तद्दषयति ASSACCHOREO RSSCROLX ।२९॥ Page #75 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अन्वयाद् व्यतिरेकाद - प्यन्वयव्यतिरेकतः ॥ अपायस्योदयासन्नो, भिदाः पञ्च स्युरन्यया ॥ ८ ॥ ६६ ॥ अन्वयधर्मवत्ताज्ञानाद्व्यतिरेके धर्मवत्ताज्ञानादुभयधर्मवत्ताज्ञानाच्चाविशेषेणहीतापायस्यैव प्रवृत्तेरसद्भूतधर्मनिषेधाकलनर्माहा, तज्जन्यनिश्चयश्चापायः, परमित्युक्तेऽन्वय धर्मगवेषणजन्या धारणा न स्यात् । आह च "कासह तयन्नवइरेग - मेतओवगमणं भवे भ्रूए ॥ सन्भूअसममयओ, तदुभयओ कासह ण दोसो || १८६ ॥ सब्बो वि य सोवाओ, भेए वा होंति पंच वत्थूणि ।। आहेवंचिय चउहा, मई तिहा अमहा होइ || १८७ ॥ [ कस्यचित्तदन्यव्यतिरेकमात्रतोऽवगमनं भवेद् भूते ।। सद्भूतसमन्वयतस्तदुभयतः कस्यचिन दोषः॥ सर्वोऽपि च सोऽपायो भेदे वा भवन्ति पंच वस्तूनि ॥। आहैवमेव चतुर्धा मतिस्त्रिधाऽन्यथा भवति ।। ] ननु स्थाणुत्वव्याप्यवक्रकोटरादिमानयमित्यन्वयधर्मज्ञानात् स्थाणुरेवायमित्यपायोस्तु पुरुषत्वव्याप्यकरचरणाद्यभाववानयमितिव्यतिरेकधर्मज्ञानात्तु कथं सः, नहि तदभावोऽन्वयेन व्यतिरेकेण वा स्थाणुत्वव्याप्यो घटादौ व्यभिचारात्, न च पुरुषत्वव्यापककराद्यभाववत्तानिश्चयादेव पुरुषत्वाभावज्ञानाभावप्रतिपत्तिः, व्यापकाभावज्ञाने व्याप्याभावज्ञानावश्यंभावनियमादिति वाच्यम् । एवं सत्ययं न पुरुष इत्यपायेऽपि अयं स्थाणुरेवेत्यपायाऽभावात्, न चोक्ताभावविशिष्टसाधारणधर्मवत्ताज्ञानमेव तदपायजनकमिति वाच्यम्, संशयहेतोः साधारणधर्मवत्ताज्ञानस्य तदानीमननुसरणादितिचेत्, न, एक कोटिनियतधर्माभावज्ञानस्याप्यपरकोटिनिश्चायकत्वाद्, अथवोक्ताभावज्ञानानन्तरं पुरुषत्वाभावज्ञानात्तद्विशिष्टसाधारण धर्मवत्ताज्ञानादेवायं स्थाणुरेवेति निश्वयस्तत्र तावदालोचनरूपाया ईहाया अनुभवसिद्धत्वादिति दिग् । ननु व्यतिरेकधर्म गवेषणमीहेत्यस्य व्याप्यधर्मवत्ताज्ञानमपायोऽसावित्यर्थः तच्चान्वयेन व्यतिरेकेणान्वयव्यतिरेकेण वास्तु, तज्जन्ययथाभूतार्थज्ञानं तु धारणा इत्युक्तौ को दोषो येन स्वमतव्यावर्णनमेव भ्राजमानं भवेत्, उच्यते, व्याप्य मतिनिरूपणेऽपायधारणाविप्रतिपत्तिनि रासः ॥ Page #76 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञानार्णवप्रकरणम् ॥ ॥ ३० ॥ 1949 धर्मव्यवसितेर्जायमानो निश्चयो यदि धारणाख्यामाविभृयात्तदा स्मरणस्यादुरुपह्नवत्वेनावग्रह ईहाऽपायो धारणं स्मरणञ्चेति मतिज्ञानस्य पश्च भेदाः प्रसजेयुः, एवञ्चागमविरोधः, किश्चैवं धारणाजनकं व्याप्यधर्मवत्ताज्ञानमपाय एवेतीहासंशय एव स्यात्तथा|चोक्तदोषप्रसङ्गः । अथ व्यतिरेकधर्मज्ञानाज्जायमानो निश्चयोऽपायोऽन्वयधर्मज्ञानाज्जायमानस्तु धारणेति चेत्, न, उभयधर्मज्ञानाज्जायमानस्य निश्वयस्योभयरूपत्वप्रसङ्गादुक्तदोषप्रसङ्गाच्च, एतेन व्यतिरेकधर्मावगाही निश्चयोऽपायोऽन्वयधर्मावगाही तु धारणेत्यपि निरस्तम् ॥ ८ ॥ ननु धारणा नामाऽविच्युतिस्मृतिवासनालक्षणं मतिभेदान्तरं नास्तीत्यपायविशेष एव स इति न मम भेदपश्चकप्रसङ्गो व्यक्तिभेदमनादृत्य जातिभेदान्वेषण निष्ठानां भवतामेव प्रत्युत भेदत्रयप्रसङ्ग इत्याशङ्कते— अविच्युतिरपायो हि, संस्कारो ज्ञानमेव न ॥ अन्योऽपायः स्मृतिस्तेन, चतुर्भेदा मतिः कथम् ? || ९ ||६७|| इह तावद्घटादिके वस्तुनि अवग्रहेहापायरूपतयान्तर्मुहूर्तिक एवोपयोगो जायते तत्रापायोत्पत्त्युत्तरं उपयोगसातत्यलक्षणा चाऽविच्युतिर्भवद्भिः स्वीक्रियते सा तावत्तावत्कालीनापायस्वरूपान्नातिरिष्यते नहि कालभेदेन वस्तुभेदो नाम क्षणभङ्गप्रसङ्गात् या चोपयोगोपरमे सति संख्येयमसंख्येयं वा कालं वासनाऽवतिष्ठत इत्यभ्युपगम्यते सा किं वस्तुविकल्पो वा स्मृतिज्ञानावरणकर्मक्षयोपशमो वा तज्ज्ञानजननशक्तिर्वा, नाद्य एतावन्तं कालं तद्वस्तुविकल्पायोगात् नोत्तरौ अज्ञानरूपत्वेन तस्य मति - भेदत्वाऽसम्भवाद्, या चानुभूतस्य कालान्तरोपयोगलक्षण स्मृतिराविर्भवति साप्यन्वयधर्मेणापि निश्चयोऽपाय एवेति त्वदभ्युपगमादपायान्तरमेवेति अवग्रह ईहाऽपायश्वेति तिस्र एव मतेर्भिदाः सम्भवन्तीति कथं न विभागवाक्यविरोधः । आह च'काणुवओगम्मि धिई, पुणोवओगे अ सा जओवाओ । तो णत्थि धिई ॥ ति ॥ ९ ॥ [ कानुपयोगे धृतिः पुनरुपयोगे च 46 मतिनिरूपणेऽपायधारणाविप्र तिपत्तिनि रासः ॥ ॥ ३० ॥ Page #77 -------------------------------------------------------------------------- ________________ RECOREA CSCRIKEKetc | सा यतोऽपायः ? ॥ ततो नास्ति धृतिः ॥ १८८ ॥ ]त्ति ॥ ९॥ अत्रोच्यते है मतिनिरूपणे | अविच्युतिनिधारा, वासना ज्ञानकारणम् ॥ स्मृतिश्चेदं तदेवेति, धीरतः किन्नु दूषणम् ॥१०॥६८॥ 15 अविच्युति यत्तावदुक्तं उपयोगसातत्यलक्षणाऽविन्मुतिरपायानातिरिच्यत इति, नदयुक्तम् , प्रथमापायोत्पत्त्युत्तरं काचिदुत्पद्यमानस्य ५ स्मृतिवासनास्थाणुरेवायं स्थाणुरेवायमित्याकारस्यान्तर्मुहूर्तमविव्युतस्य धारावाहिकापायसन्तानस्य प्रथमापायादभ्याधिकत्वात्, न च गृहीत- नांधारणा ग्राहित्वादस्याप्रामाण्यं, अन्यान्यकालविशिष्टत्वेन स्पष्टस्पष्टतरस्पष्टतमभित्रधर्मकवासनाजनकत्वेन वा भिन्नस्यैव वस्तुनो ग्रहणा- त्वव्यवस्थादिति प्राश्चः, वस्तुतो गृहीतग्राहित्वं नाप्रमात्वे तन्त्रं, अपि तु 'तदभाववति तत्प्रकारकत्वम्' इति न तस्याप्रामाण्यं इति दिग् । पनम् ॥ वासना च यद्यपि स्वतो न ज्ञान तथाप्यपायकार्यत्वात्स्मृतिकारणत्वाचोपचारतस्तस्य ज्ञानत्वं, 'इदं वस्तु तदेव, यत्प्रागुपलब्धं मया' इत्याकारिका स्मृतिरपि वस्तुनिश्चयमात्रफलादपायादतिरिच्यते, पूर्वापरदर्शनानुसन्धानरूपा हि सेति, तस्मादविच्युतिस्मृतिवासनालक्षणानां तिसृणामपि धारणानां व्यवस्थितत्वान्न विभागव्याघातः। आह च-"भण्णइ इदं तदेवेति जाबुद्धी॥१८८ानणु साध्वायम्महिआ, जओ असा वासणाविसेसाओ॥जा यावायाणन्तर-मविच्चुई सा धिईणाम ॥१८॥"[भण्यते इदं तदेवेति या बुद्धिः॥ ननु सापायाभ्यधिका यतश्च सावासनाविशेषात् ॥ या चापायानन्तरमविब्युतिः सा धृतिर्नाम] यदि चोक्तरीत्यापायविशेष एव धारणाभ्युपगम्यते स्मृतिरपि चाधिकाऽभ्युपेयते तदा भेदपश्चकप्रसङ्गो वज्रलेपायत एव । आह च-" तं इच्छंतस्स तुहं, वत्थूणि य पंच, नेच्छमाणस्स ॥ किं होउ सा अभावो, भावो नाणं व तं कपरं ॥१९०॥"[ तामिच्छतस्तव वस्तूनि च पंच, नेच्छतः ॥ किं भवतु साऽभावो भावो ज्ञानं वा तत्कतरत् ] ननु भातामपि धारणानां त्रिरूपत्वाद्विभागातिकम इति चेत्, न, Page #78 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं भज्ञाना र्णव प्रकरणम् ॥ ॥ ३१ ॥ धारणात्वेन सर्वासामप्येकीकृत्य ग्रहणाद्, यथा द्विरूपयेारप्यवग्रहयोरवग्रहत्वेन ग्रहणम्, आह च - "तुब्भं (झ) बहुयरभेआ, भणइ मई होइ धिइबहुत्ताओं || ममइ न जाइभेओ, इट्ठो मज्झं जहा तुज्झ ॥ १९१ ॥ " [ तव बहुतरभेदा भणति मतिर्भवति धृतिबहुत्वात् ॥ भण्यते न जातिभेद इष्टो मम यथा तव ॥ ] " सा भिन्नलक्खणा वि हु, धिइसामभेण धारणा होइ ॥ जह उग्गहो दुरूवो, उग्गहसामनओ इक्को ॥ १९२ ॥ " सा भिन्नलक्षणापि खलु धृतिसामान्येन धारणा भवति ॥ यथाऽवग्रहो द्विरूपोऽवग्रह सामान्यत एकः ] नन्वपायसन्ततिरूपाऽविच्युतिः कथं धारणेति चेत्, अपायजन्यत्वाद्धारयामीत्यनुभवाच्च, स्मृतेरिव प्रत्यभिज्ञाया अपि धारणात्वात्तिसृणां धारणानां ग्रहणे न्यूनत्वमिति चेत्, न, स्मृतिपदेन तत्ताविषयकज्ञानविशेषग्रहणादिति दि ॥ १० ॥ तदेवं विप्रतिपत्तीर्निराकृत्य विभागं व्यवस्थाप्य प्रागुद्दिष्टमवग्रहं निरूपयति तत्र द्विधाऽवग्रहः स्याद् - व्यञ्जनार्थावलम्बनः ॥ तत्रेन्द्रियार्थसम्बन्धो - व्यञ्जनावग्रहः स्मृतः ॥ ११ ॥ ६९ ॥ तत्रावग्रहेहापायादिषु मतिभेदेषु, अवग्रहो द्विविधो व्यञ्जनावग्रहोऽर्थावग्रहश्च तत्र प्रथमोपदिष्टत्वाद् व्यञ्जनावग्रहः प्राग्निरूपणीय इत्यत आह तत्रेति, आह च - " तत्थोग्गहो दुरूवो, गहणं जं होज्ज वंजण-त्थाणं ॥ वंजणओ य जमत्थो, तेणाईए | बुच्छं ॥ १९३ ||" [ तत्रावग्रहो द्विरूपो ग्रहणं यद् भवति व्यञ्जनार्थयोः ॥ व्यञ्जनतश्च यदर्थस्तेनादौ तकं वक्ष्ये ||] इन्द्रियार्थ - सम्बन्ध इति तत्समयभावीति तात्पर्यार्थः, योगार्थमाह-स्वयं व्यज्यते प्रकटीक्रियतेऽर्थोऽनेनेति व्यञ्जनं, कदम्बकुसुमगोलकधान्यमसूरकाहलाक्षुरप्राकारमां सगेालकरूपाणामन्तर्निर्वृत्तीन्द्रियाणां शब्दादिविषयपरिच्छेदहेतुशक्ति विशेषलक्षणमुपकरणेन्द्रियं शब्दादिपरिणतद्रव्यनिकुरम्बम्, तदुभयसम्बन्धश्च ततश्च व्यञ्जनेनेन्द्रियेण व्यञ्जनस्यार्थस्य तत्सम्बन्धस्य वाऽवग्रहो व्यञ्जना मतिनिरूपण प्रसङ्गे अवग्रहभेदनि रूपणं तत्र व्यञ्जना वग्रद्दलक्ष गोपदर्श नम् ॥ ॥ ३१ ॥ Page #79 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॐ मतिनिरूपण प्रसङ्गे व्यञ्जनावग्रहस्य ज्ञानस्वब्यवस्थापनम् ॥ PAGE वग्रह इति मध्यमपदलोपेन समास आश्रयणीया,अर्थभेदेऽपि पदसारूप्येणैकशेषाश्रयणाद्,एकशेषेण व्यञ्जनानामवग्रह इत्यपि स्यात् ॥आह च "जिज्जइ जेणत्थो,घडोव दीवेण वंजणं तं च॥ उवगरणिदियसद्दाइ-परिणयहब्बसम्बन्धो ॥ १९४ ॥"व्यज्यते येनार्थो घट इव दीपेन व्यञ्जनं तच्च।। उपकरणेन्द्रियशन्दादिपरिणतद्रव्यसम्बन्धः। नन्वयं व्यञ्जनावग्रहो न ज्ञानमित्यत आहस तदन्ते ज्ञानभावा-दव्यक्तं ज्ञानमिष्यते(ताम् )।अन्यथा प्रागलाभं त-दन्तेऽपि न जनुर्लभेत् ॥१२॥७॥ ___व्यञ्जनावग्रहसमयो ज्ञानवान्, ज्ञानोत्पत्तिघटकान्त्यसमयशालित्वात्, यदन्त्यसमये ज्ञानमुत्पद्यते स कालो ज्ञानवान्, यथा ईहाद्यसमयः,इत्यनुमानाद् व्यञ्जनावग्रहस्य ज्ञानत्वसिद्धिः। आह च-"अनाणं सो बहिरा-इणं व तकालमणुवलंभाओ॥ण,तदंते तत्तोच्चिय, उवलंभाओ तओनाणं ॥१९५॥"[अज्ञानं स बधिरादीनां वा तत्कालमनुपलम्भात् ।। न, तदन्ते तत एवोपलम्भात्स ज्ञानम्] ननु यदि व्यञ्जनाऽवग्रहो ज्ञानं तर्हि बधिरादीनामपि शब्दादिज्ञानापत्तिस्तत्कालेऽपि तदुपलम्भापत्तिश्चेतिचेत्,न,बधिरादीनांव्यञ्जनव्यञ्जनपूर्तिघटकशक्त्यभावादच्यक्तत्वेन तदनुपलम्भसम्भवाच्च, आह च-"तकालम्मि वि नाणं, तत्थस्थितणुं ति तो तमव्वचं ।। बहिराईणं पुण सो, अनाणं तदुभयाभावा ॥ १९६ ॥" [ तत्कालेऽपि ज्ञानं तत्रास्ति तनु इत्यतस्तदव्यक्तम् ॥ बधिरादीनां पुनः सोऽज्ञानं तदुभयाभावात् ॥] एतेन 'यदन्त्यसमये ज्ञानमुत्पद्यते स कालो ज्ञानवानिति न व्याप्तिः, अवग्रहाकाले व्यभिचाराद्'इति निरस्तं, ज्ञानसामग्रीसम्पनत्वस्य हेतुविशेषणत्वाद् , अत एव सर्वेषु शब्दादिद्रव्यसम्बम्धसमयेषु ज्ञानमस्ति ज्ञानोपकारिशब्दादिद्रव्यसम्बन्धसमयसमुदायकदेशत्वादर्थावग्रहसमयवदित्यपि प्रयोगः,यदि च कारणसाम्राज्येऽपि प्राक्समयेषु ज्ञानोत्पत्तिर्न स्यात्पर्यन्त्यसमयेऽपि न स्यादविशेषाद्, आह च-"जइ वाणमसंखज-समयसदाइदव्वसम्भावे । किह चरिमसमयसद्दाइ RUGALO Aamaanaamana Page #80 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना र्णव सेमतिनिरूपण प्रसङ्गे व्यञ्जानावग्र हस्य ज्ञानत्व व्यवस्थापनम् ॥ प्रकरणम् ॥ CORRESPERIENCE दबविण्णाणसामत्थं ॥ २००॥" [यदि वाज्ञानमसंख्येयसमयशब्दादिद्रव्यसद्भावे ।। कथं चरमसमयशब्दादिद्रव्यविज्ञानसामयम् ॥] "जंसबहाण वीसुं, सब्बेमुवि तं न रेणुतेल्लं व ॥ पत्तेयमणिच्छंतो, कहमिच्छसि समुदये नाणं ॥२०१॥"[यत्सर्वथा न विष्वक्सर्वेष्वपि तन्न रेणुतलमिव । प्रत्येकमनिच्छन्कथमिच्छसि समुदये ज्ञानम् ॥] ननु समुदायनिष्पीडनमा न तैलजनकं येन सिकतासमुदायनिष्पीडनातैलानुद्भवदर्शनेन प्रत्येकशक्त्यभावः समुदायशक्त्यभावे प्रयोजकः स्यात्, किन्तु तिलसमुदायनिप्पीडनमेव तज्जनकमिति विषमो दृष्टान्तः, अन्यथा दण्डचक्रादिसमुदाये घटोद्भवदर्शनादण्डादिप्रत्येकसत्वेऽपि सूक्ष्मघटोत्पत्तिप्रसङ्गादिति चेत्,न,कारणसमुदयाधीनसाकल्यशालिनि कार्य देशस्य देशोपकारितायामेतदृष्टान्ताभिधानस्य न्याय्यत्वाद्॥अत एवाह-" समुदाये जइ नाणं, देखणे समुदये कहं णत्थि? ॥ समुदाए वाऽभूयं, कह देसे होल तं सयलं ? ॥२०॥"[समुदाये यदि ज्ञानं, देशोने समुदये कथं नास्ति ॥समुदाये वाऽभूतं, कथं देशे भवेत् तत्सकलम् ॥] "तंतू पडोवयारी, ण समत्तपडोय| समुदिआ ते उ ॥ सब्बे समत्तपडओ तह नाणं सव्वसमएसु ॥२०३॥"[ तन्तुः पटोपकारी, न समस्तपटश्च समुदितास्ते तु ॥ सर्वे समस्तपटकस्तथा ज्ञानं सर्वसमयेषु ॥] ननु सहस्रतन्तुकपटादौ सहस्रतन्तूनां तत्संयोगानाच हेतुत्वात्, द्वितन्तुकपटादौ च तन्तुद्वयसंयोगादीनां हेतुत्वादस्तु तत्र खण्डपटोत्पत्तिक्रमणाखण्डपटोत्पत्तिः, अत्र तु ज्ञानस्य निरवयवत्वात्कथं खण्डज्ञानोत्पत्तिक्रमणाखण्डज्ञानोत्पत्तिरिति चेत्, न, असङ्ख्यातसमयानिष्पाचे सांशे महति ज्ञानेऽङ्सख्यातानामंशानां हेतुत्वाद्,अत एव महज्ज्ञानमेवाभिव्यज्यते महत्तेजोवन तु सूक्ष्ममेकतेजोञयवदिति व्यञ्जनावग्रहस्य सूक्ष्मत्वं ज्ञानान्तराणां च महत्त्वमुपपद्यते, नन्वव्यक्तं ज्ञानं दृष्टविरुद्धमिति चेत्, न, सुप्तमचादिसक्ष्मबोधस्याऽव्यक्तस्य दृष्टत्वाद्, ज्ञानं विना स्वापावस्थायां वचनचेष्टा SPERMAKALUKARACT ॥३२॥ Page #81 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | धनुपपत्तेः, अन्यथा काष्ठादीनामपि तत्प्रसङ्गाद, आह च-"कहमवत्वं नाणं, च सुत्तमत्ताइसुहुमबोहु च ॥ सुत्तादओ सयं चि य, विनाणं नावबुज्झति ।। १९७॥" [कथमव्यक्तं ज्ञानं च, सुप्तमत्वादिसूक्ष्मबोध इव ॥ सुप्तादयः स्वयमपि च, विज्ञानं नावबुद्ध्यन्ते ] "लक्खिजइ तं सिमिणा-यमाणवयणदाणाइट्ठाहिं ॥ ज नाऽमइपुवाओ, विलंते वयणचेट्ठाओ॥ १९८॥" [लक्ष्यते तत्स्वमायमानवचनदानादिचेष्टाभ्यः ॥ यद् नाऽमतिपूर्ण विद्यन्ते वचनवेटाः] ॥ ननु सुपे स्वीयं चेष्टितं कुतो न स्वस्य ज्ञानगोचर इति चेद्, ज्ञानावरणवैचित्र्यात्, नहि जाग्रतापि सर्वस्वीयं चेष्टितं ज्ञायते, मुहूर्तेनाप्यसंख्याताध्यवसायोल्लङ्घनाद् कस्यचिदेव कदाचिदेव वा तदभिव्यक्तः, आह च-"जग्गतो वि न याणइ, छउमत्थो हिअयगोरं सव्वं ।। जं तज्झवसाणाई, जमसंखेज्जाई दिवसेण ॥१९९॥ [जाग्रदपि न जानाति, छद्मस्थो हृदयगोचरं सर्वम् ॥ यत्तध्यवसानानि यदसंख्ये यानि दिवसेन] एवञ्च यथाऽध्यवसायस्थानान्यसंख्येयानि सूक्ष्माण्यपि केवलिदृष्टतया श्रद्धेयानि तथा व्यञ्जनावग्रहज्ञानमपीति भावः ॥ १२॥ अथ व्यञ्जनावग्रहतत्वं निरूप्य तद्भेदानिरूपयतिस चतुर्धा भवेच्चक्षु-मनोवर्जेन्द्रियोद्भवः ॥ उपघातानुग्रहाभ्यां प्राप्यकारीणि तानि यत् ॥१३॥ ७१ ॥ सचव्यञ्जनावग्रहश्चतुर्विधोघागरसनश्रोत्रत्वग्लक्षणेन्द्रियभेदात्, नन्वेतेषामेवेन्द्रियाणां व्यञ्जनावग्रहो नतु नयनमनसोरित्यव किं प्रमाणमिति चेत्, तेषां कर्कशकम्बलादिस्पर्शने त्रिकटुकाद्यास्वादने अशुव्यादिपुद्गलाघ्राणे भेर्यादिशब्दश्रवणे चोपघातदर्शना चन्दनद्रवादिस्पर्श क्षीरशर्कराधास्वादने कर्पूरपुद्गलाद्याघ्राणे मृदुमन्त्रशब्दाद्याकर्णने चानुग्रहदर्शनात्प्राप्यकारवासः, नयनमनसोस्तु जलज्वलनायवग्रहेणानुग्रहोपघातादर्शनादतथात्वाद्, आह च-"नयणमगोवजिदिन-भाओवंजगोग्गहो चउहा।।उवधा मतिनिरूप णे व्यञ्जनावग्रहस्य ज्ञा नत्वव्यवस्थापनं तभेदनिरूपणञ्च॥ kic CHAR C Page #82 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरण मीज्ञाना र्णवप्रकरणम्॥ RKARI मतिनिरूपणे व्यञ्जनावग्रहभेद निरूपणे घ्राणादीनां चतुर्णा याणग्गडओ. जंताई पत्तकारीणि॥२०॥[नयनमनोवर्जेन्द्रियभेदादयञ्जनावग्रहश्चतुर्धा।।उपघातानुग्रहतो यत्तानि प्राप्यकारीणि] नन्वनुग्रहोपघातौ यदि सुखदुःखविशेषौ न तर्हि तौ प्राप्यकारित्वलिङ्गे यदि तु विषयेन्द्रियसंयोगकार्यविशेषौ तदा ताभ्यां घाणादीनां स्वहेतुभूतं प्राप्तिमात्रं सिध्यतु न तु प्राप्यकारित्वं,तद्धि वस्तु प्राप्यैव ज्ञानजनकत्वमिति चेत् न, श्रोत्रादीनां प्राप्यकारित्वानुमाने नयनमनसोश्चाप्राप्यकारित्वानुमाने नुग्रहोपघातव्यावर्णनस्य विपक्षबाधकतर्कप्रदर्शनार्थत्वात, एवञ्च श्रोत्रादीनि प्राप्यकागीण नयनमनोमिन्द्रियत्वाद् व्यतिरेके नयनमनोवीदत्यनुमानमप्यवदातमितिदिग॥१३॥श्रोत्रघ्राणयोरप्राप्यकारित्वं निराकुरुतेदूरार्थग्रहणाच्छोत्र-घाणे अप्राप्यकारिणी ॥ स्यातां न ते शब्दगन्धौ,यदि प्राप्नुवतः स्वयम् ॥१४॥७२॥ श्रोत्रघ्राणे अप्राप्यकारिणी असम्बद्धार्थग्राहकत्वात्, न चायमसिद्धो हेतुः, दूरस्थस्यापि भेर्यादिशब्दस्य श्रवणाद् दरस्थस्यैव कुसुमादेः परिमलग्रहणाच्च, न चाचान्यतरकर्मणोभयकर्मणा वेन्द्रियविषययोः संयोगोऽनुभूयत इति केचिदाहः। आह च"जुज्जड पत्तविसय या, फरिसणसणे ण सोत्तघाणेसु ॥गिण्हंति सविसयमिओ, जं ताई भिन्नदेसंपि।।२०५॥"[युज्यते प्राप्तविषयता स्पर्शनरसनयोर्न श्रोत्रघाणयोः । गृहीतः स्वविषयमितो यत्ते भित्रदेशमपि] तदिदं तदा युज्येत यदि शब्दगन्धयोः स्वकर्मणेन्द्रियप्राप्तिन स्यात, तथा च दूरस्थावपि तौ तत्रागत्यैव ज्ञानं जनयत इति न किञ्चिदनुपपन्नम् ।। उक्तं च-"पावंति सहगंधा, ताई गंत सयं न गिण्हंति" ॥२०६॥ [प्राप्नुतः शब्दगन्धौ, ते गत्वा स्वयं न गृणीतः ]ति॥१४॥ तयोः सक्रियत्वे प्रमाणमाह-। सक्रियौ तौ संहरणाद, वायुना वहनादपि ॥ द्वारानुपाताच्छैलादि-प्रतिघातात्समूर्तिकौ ॥ १५॥ ७३ ॥ संहरणाद् गृ(गु)हादिषु पिण्डीभावाद्, वहनादपि वायुना नयनात्, तौ (शब्दगन्धौ)सक्रियो समूर्तिकौ च धूमवद्वि | प्राप्यकारि| त्वं चक्षुमन सोरप्राप्य कारित्वञ्च ॐॐॐॐ निरूपितम्।। K E ५ ॥३३॥ Page #83 -------------------------------------------------------------------------- ________________ P C RAKAKARRORKERA शेषेण, द्वारानुपाताद्वा जलवद् वेगवद्विरलद्रव्यस्य पवनाभिमुखमेव प्रसप्रेणादनयोः प्रायो द्वारानुधावनमिति बोध्यं, पर्वतादिषु प्रतिस्खलनाद् वा तौ तथा पाषाणवद्, आह च-"जं ते पोग्गलमइआ, सक्किरिया वाउवहणाओ ॥ २०६ ॥ धृमोव्व संहरणओ, दाराणुविहाणओ विसेसणं ॥ तोयं व णितंबाइसु, पडिघायाओ य वाउव्व ॥२०७॥" [यत्तौ पुदगलमयौ सक्रियो वायवहनात ॥ धूम इव संहरणतः द्वारानुविधानतो विशेषेण ॥ तोयमिव नितम्बादिषु, प्रतिघाताच्च वायरिव ॥] ननु पवनोपनीतगन्धवद्र्व्याणां घ्राणेन सह संयोगोऽस्तु शब्दस्त्वाकाशगुण इति न श्रोत्रेण तस्य मंयोगः प्रत्यासत्तिः किंतु श्रोत्रस्य कर्णशकुल्यवच्छिमाकाशरूपत्वाच्छब्दस्य च तद्गुणत्वात्समवाय एव, गतिस्तु तत्र पवनगतैवारोप्यते न तु स्वाभाविकी, स्वाभाविकगतेरन्यगत्यनुविधानानुपपत्तरिति चेत्, न, प्रतिघातजनकत्वेन तस्य द्रव्यत्वसिद्धेः, न च तीव्रतरपवमानस्यैव प्रतिघातजनकत्वं न तु शब्दस्येति वाच्यम्, भर्यादिशब्दजनकपवनसदृशपवनान्तरेणापि बाधिर्याद्युदयप्रसङ्गात्, अपि च श्रोत्रमपि नाकाशं बाधिर्याद्यभावप्रसङ्गारिकन्तु मूर्तमेवेन्द्रियमिति न तस्य शब्दो गुणः॥ किश्च शब्दस्याकाशगुणत्वे सर्वस्य सर्वशब्दग्रहणापत्तिः श्रोत्रसमवायाविशेषात्, तत्पुरुषीयकर्णशष्कुल्यवच्छिन्नसमवायसम्बन्धावच्छिन्नाधारतायास्तत्पुरुषीयशब्दग्रहं प्रति हेतुत्वकल्पने महागौरवात्, द्रव्यत्वे तु संयोगेनैव श्रोत्रेण ग्रहणोपपत्तौ न किञ्चिदनुपपन्नं, एवं च शब्दस्य द्रव्यत्वे समवायसमवेतसमवायप्रत्यासत्यकल्पनया लाघवं द्रष्टव्यं, शब्दस्य मूर्तत्वे तत्साक्षात्कारो न स्याद्विषयतया मूर्तप्रत्यक्षत्वावच्छिनं प्रति समवायेनोभृतरूपवश्वस्य हेतुत्वादिति चेत्, न, द्रव्यप्रत्यक्षत्वावच्छिन्नं प्रति योग्यताविशेषस्यैव हेतुत्वात्स च व्यावृत्तिविशेषः शक्तिविशेषो वेत्यन्यदेतव, श्रोत्रेन्द्रियव्यवस्थापकत्वेन शब्दस्याम्बरगुणत्वसिद्धिरिति तु मन्दं, इन्द्रियान्तराग्राह्यग्राहकत्वस्यैव भिमोन्द्रियत्वव्या मति० व्य. श्रोत्रघ्राणयोरप्राप्य. कारित्वस्य खण्डनं शब्दे आकाशगुणत्वस्य खण्डनश्च Page #84 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना र्णवप्रकरणम् ॥ ॥३४॥ प्यत्वात्, तत्र गुणप्रवेशस्य गौरवकरत्वात, एतेन 'श्रोत्रेन्द्रियं द्रव्याग्राहक रूपस्पर्शाग्राहकबाहिरिन्द्रियत्वाद् रसनवद्' इत्यपि IIDuमति. व्य. निरस्तं, अप्रयोजकत्वाद् द्रव्यग्रहप्रयोजकप्रत्यासत्यभिधानेन तद्विरहरूपविपक्षवाधकतर्कानुत्थानात् । इत्थं च शब्दो न पौद्ग- शब्दस्यालिका स्पर्शशून्याश्रयत्वाद्, अतिनिधिडप्रदेशप्रवेशनिर्गमयोरप्रतिघातात्, पूर्व प्रधाना(चा)ऽवयवानुपलब्धः, सूक्ष्ममूर्तान्तराप्रेरक- लकाशगुणत्व त्वाद् , गंगनगुणत्वाचेति हेतवो निरस्ता वेदितव्याः, भाषावर्गगादेस्तदाश्रयस्य पर्शवत्वेन स्पर्शशुन्याश्रयत्वस्यासिद्धेः,भि- खण्डने शब्दे चादिकमुपभिद्य प्रसर्पिणा मृगमदादिद्रव्येण द्वितीयस्याऽनै कान्तिकवान, तृतीय चतुर्थयोधोरकादिना धूमादिना च तथात्वात, पौगालिकत्वा पञ्चमासिद्बतायास्तु प्रदर्शितत्वात, उखलनैयायिकास्तु" निमित्तपवनस्पैव गुगः शब्दः, अत एव निमितपवनना भावसाधकशात्तन्नाशः, समायिकारणनाशस्य समवेतकार्यनाशं प्रति हेतुत्वाव, कर्णसंयुक्तनिमित्त पवनसमवायाच तद्ग्रहः, न च वीणा हेतूनामव्वावेणुमृदङ्गादेरेव कुतो नायं गुण इति वाच्यं, तेषां अननुगतत्वात, निमित्तपवनस्यैवानुगतत्वेन समवायिकारणत्वौचित्यात, तेषां करणशब्दस्य निमित्तकारणत्वे क्लप्तेऽपि समधायिकारणत्वाकल्पनासम्बन्धभेदेन कारणतामेवाद्" इत्याहुः, तदसत्, पानगुणत्वे शब्दस्य पवनगुणत्वतत्स्पर्शस्येव स्पार्शनप्रसङ्गात, तस्य सार्शनप्रतिबन्धकलकलने च महागौरवात, शब्दगुगसाशनजनकतावच्छेदकजात्यभावा खण्डनश्च। न दोष इति चेत्, न, तादृशजातेरसिद्धेः, गुगचाक्षुपजनकतावच्छोदिकया साकर्यादिति दिग। अधिकं स्याद्वादरहस्येऽनुसन्धेयम् ।। तस्माच्छ्रोतघ्राणे अपि प्राप्पकारिणी इति व्यवस्थितम्।। आह च-"गण्हंति पत्तमत्थं, उपधायाणुग्गहोलद्वीपोवाहिजहणासारिसादओ कहमसंबद्धे ॥२०८॥" [गृहणीतः प्राप्तमर्थ उपघातानुग्रहोपलब्धेः॥ बाधिर्षपूतिनासार्शादया कयमसम्बद्धे]॥१५॥ तदेवं नयनमनोवर्जेन्द्रियाणां प्राप्यकारित्वं व्यवस्थापितम् । अथ नयनमनसोरप्राप्यकारित्वस्य व्यवस्थापनीयतया मनो वेणुमृदङ्गादेरेव कुतालमपि समायि कारणासन्धककराने निमित्तकारणत्व निससा, सि,गुगवान आह च REKRISHARE ॥३४॥ Page #85 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तिनिरूपणे RECERRORESEARS दृष्टान्तेन तावच्चक्षुषोप्राप्यकारित्वं व्यवस्थापयतिअप्राप्यकार्यधिष्ठाना-सम्बद्धग्राहि लोचनम् ॥ अनुग्रहोपघाताभ्यां, विषयाद् भाव्यमन्यया ॥१६॥७४॥ चक्षुरमाप्यकारि अधिष्ठानासम्बध्धार्थग्राहकेन्द्रियत्वाद्, मनोवद्, अधिष्ठानेत्यादिविशेषणेन स्पर्शनादाविन्द्रियपददानेन च प्रदीपप्रभायां व्यभिचारः परिहतः, न चापयोजकत्वं सम्बद्वार्थग्राहकावे तस्य करवालजलावलोकनादिनोपघातानुग्रहप्रसङ्गात्, न चासिद्ध एव तस्योपघातानुग्रहाभावो भूयो भूयः सूरकरावलोकनेन जलावलोकनेन च दाहशैत्यलक्षणतदर्शनादिति वाच्यम्, अवलोकनानन्तरं चक्षुर्देशं प्राप्तेन मूर्तेन रविकरादिनोपघातस्य सम्भवाजलावलोकनादौ चोपघाताभावेनानुग्रहाभिमानात् स्वतस्तद्देशं प्राप्तेन च चन्द्रमरीचिनीलादिनाऽनुग्रहोऽपि भवत्येव, यदि च चक्षुः स्वत एवानुग्राहकोपघातकवस्तुनी संसृज्यानुग्रहोपघातौ लभेत तर्हि सूरकरावलोकनादिव करवालावलोकनादप्यभिघातः स्यात्, तदिदमाह-"लोअणमपत्तविसयं, मणोव्य जमणुग्गहाइसुन्नति ॥ जलसूरालोआइसु, दीसन्ति अणुग्गहविधाया ॥२०९।। डझेज पाविउ रवि-कराइणा फरिसणं व को दोसो ॥ मन्नेज अणुग्गह | पिवु-बघायाभावओ सोम्मं ॥२१०॥ गंतुंण स्वदेसं, पासइ पत्तं सयं व णियमायं ॥ पत्तेग उ मुत्तिमया, उवघायाणुग्गहा ₹ होजा ॥२११॥" [लोचनमप्राप्तविषयं, मन इव यदनुग्रहादिशून्यमिति ॥ जलपरालोकादिषु दृश्येते अनुग्रहविघातौ ॥ दयेत प्राप्य रविकरादिना स्पर्शनमिव को दोषः॥ मन्येतानुग्रहमिवोपघाताभावतः सौम्य ॥ गत्वा न रूपदेशं, पश्यति प्राप्तं स्वयं वा नियमोयं ॥ प्राप्तेन तु मूर्तिमतोपघातानुग्रहौ भवेताम् ॥]॥१६॥ननु नयनान्नायना रश्मयो निर्गत्य प्राप्य च वस्तु रविरश्मय इव प्रकाशमादधति सूक्ष्मत्वेन तैजसत्वेन च तेषां वह्नयादिभिर्दाहादयो न भविष्यन्तीति चेत्, न, चक्षुषस्तैजसत्वस्यैवासिद्धेः, तथाहि | व्यञ्जनाकग्रहनिरूपणे | चक्षुषोप्राप्यकारित्वव्यवस्थाप नम् ॥ PPECRECIP AnnanAAAAAAAAD ES Page #86 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना र्णव प्रकरणम् ॥ ॥ ३५ ॥ अदृष्टकल्पनापत्ति-स्तैजसत्वे हि चक्षुषः ॥ न च तत्साधकं किञ्चिद्- बलवन्मानमीक्ष्यते ॥ १७ ॥ ७५ ॥ चक्षुषस्तैजसत्वकल्पनेऽनुद्भूतरूपानुद्भूतस्पर्शतेजोन्तरं कल्पनीयमित्यदृष्टकल्पनापत्तिः परमते, न च तत्तैजसत्वसाधकं किञ्चिद्बलवत्प्रमाणमीक्षामहे, न च चक्षुस्तैजसं रूपादिषु मध्ये रूपस्यैवाभिव्यञ्जकत्वात्प्रदीपवदित्यनुमानात्तत्सिद्धिः, स्वस्पर्शव्यञ्जकत्वेन प्रदीपदृष्टान्तस्य साधनवैकल्याद्विषयेन्द्रिय संयोगेनानैकान्तिकत्वाद्, द्रव्यत्वे सतीति विशेषणेऽप्यञ्जनविशेषेणानैकान्तिकत्वाच्च, एतेन “रूपसाक्षात्कारासाधारणकारणं तैजसं रसाव्यञ्जकत्वे सति स्फटिकाद्यन्तरितप्रकाशकत्वात्प्रदीपवद्" इत्यपि निरस्तम् ।। अञ्जनादिभिन्नत्वे सतीति विशेषणदाने चाप्रयोजकत्वाच्चक्षुः प्रदीपयोरेकया जात्या व्यञ्जकत्वासिद्धेः । एतेन "स्वप्नादिकमिवाञ्जनादिकं सहकृत्य मनसैव साक्षात्कृते निध्यादौ चाक्षुषत्वभ्रम एवैत्युक्तावपि न क्षतिः ॥ किं चैवं तवाऽञ्जनादेः पृथक्प्रमाणत्वापत्तिः, मनो यदसाधारणं सहकार्यासाद्य बहिर्गोचरां प्रमां जनयति तस्य प्रमाणान्तरत्वनियमात् न च पटपटलाच्छन्नचक्षुषामञ्जनादिजनितो निध्यादिसाक्षात्कारो न प्रमेत्युक्तिर्युक्तिसहा, यथार्थप्रवृत्तिजनकत्वेन तत्प्रमात्वस्य व्यवस्थितत्वात् न च कारणबाधादप्रमात्वं, तस्यैवासिद्धेः,न च स्वप्नादिवदञ्जनादेर्निध्यादिसुचकत्वमेवेति युक्तं व्याप्तिग्रहादिकं विनाऽनुमितिरूपतत्सूचनाऽसम्भवात्, स्वमादिस्थले तु व्याप्तिग्राहकस्वमशास्त्राद्यनुसरण नियमादिति दिग् । ननु चक्षुर्यदि न प्राप्यकारि तदाऽसन्निहितत्वाऽ[विशेषात्कुड्यादिव्यवहितस्यापि ग्रहणप्रसङ्ग इति चेत्, न, अतिसन्निहितस्य गोलकादेरिव भित्त्यादिव्यवहितस्यापि योग्यताऽभावादेवाग्रहात् । नन्वग्रावच्छेदेनैव चक्षुः संयोगस्य ग्राहकत्वान्न मूलावच्छेदेन तत्संयुक्त गोलकादिग्रहप्रसङ्गः । कुड्यादिव्यवहितानां स्वरूपयोग्यता च स्थैर्यपक्षे न परावर्तते, क्षणिकत्वपक्षेऽप्यप्रत्यासन्नानां सहकारिणां नातिशयजनकत्वं, प्रत्यासत्तिश्च परेषां निरन्तरोत्पादः अस्माकं तु संयो मतिनिरूपणे व्यञ्जनावग्र हनिरूपणे परकल्पितस्य चक्षुषस्तैज सत्वस्य ख ण्डनम् ॥ ॥ ३५ ॥ Page #87 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गः, तदुभयमपि कृष्णसारस्यार्थेन न सम्भवतीति चेत्, न, शक्तिप्रत्यासन्यैवातिशयाधानाल्लोहाकर्षकायस्कान्तादावतिरिक्तप्रत्यासत्यदर्शनात्सामीप्यविशेषस्य तत्र सम्बन्धत्वे चात्रापि तेनैवोपपत्तेः । युक्तं चैतत् संयोगादिनानाप्रत्यासत्त्यकल्पनलाघवात्, न “चैवमप्राप्यकारित्वभङ्गः, चक्षुः संयोगस्य चाक्षुषाजनकत्वेनैव तदुपपत्तेः । वस्तुतः सन्निहितविषयग्रहे व्यवधानाभावकूट एव विषयनिष्ठा योग्यता व्यवहितविषयग्रहे चाञ्जनादिनिष्ठैव शक्तिलक्षणा योग्यता हेतुः, विषयपुरुषादिभेदेन तद्वैचित्र्यात । अत एवास्मदादीनामालोकापेक्षयैव विषयग्रहः पेचकादीनां तु न तथेत्युपपद्यते । इत्थं चाव्यवहितचाक्षुषसाक्षात्कारे चक्षुर्व्यवधानाभावादीनां व्यवहितचाक्षुषे च चक्षुरञ्जनादीनां विलक्षणशक्तिमत्त्वेन हेतुत्वान्न किञ्चिदनुपपन्नम्, भित्त्यादेश्चक्षुः संयोगप्रतिबन्धकत्वे तु स्फटिकादीनामपि तथात्वप्रसङ्गात्तद्व्यवहितानामप्यनुपलब्धिप्रसङ्गः । प्रसादस्वभाववतां स्फटिकादीनां न नायनरश्मिगतिप्रतिबन्धकत्वमिति चेत्, तर्हि भित्त्यादीनां चक्षुःप्राप्तिप्रतिबन्धकत्वापेक्षया लाघवाच्चाक्षुषप्रतिबन्धकत्वमेव कल्प्यताम् । स्वप्राचीस्थपुरुषसाक्षात्कारे स्वप्रतीचीवृत्तित्वसम्बन्धेन भित्त्यादीनां तत्त्वसम्भवात् । यदि च तत्तत्क्रियातत्तदुत्तर देशादीनामेव संयोगनियामकत्वेनानतिप्रसङ्गाद्भिन्त्यादीनां न प्रतिबन्धकत्वमिति विभाव्यते तदा 'तद्धेतोः' (तद्धेतोरेव तदस्तु किं तेन ) इति न्यायेन लाघवात्तत्तन्नयनोन्मीलनस्यैव तत्तच्चाक्षुषहेतुत्वमस्तु किमनन्तसंयोगादिकल्पनया, इन्द्रियसम्बन्धत्वेन प्रत्यक्षहेतुत्वकल्पनात्फलमुखं गौरवं न दोषायेति चेत्, न, इन्द्रियसम्बन्धत्वस्यैकस्याभावेन तथाहेतुताया एवासिद्धेः । तथापि द्रव्य चाक्षुषत्वाद्यवच्छिन्नं प्रति चक्षुःसंयोगत्वादिना हेतुत्वमनुगतमेव । तदुक्तं-मणिकृता 'प्रत्यक्षविक्षेषे इन्द्रियार्थसन्निकर्षविशेषो हेतुरनुगत एवेति' इति चेत्, न, परमाण्वाकाशादौ व्यभिचारात् । न च महत्त्वसमानाधिकरणोद्भूतरूपवत्त्वस्यापि सहकारित्वान्न दोष इति वाच्यम्, समा मतिनिरूपणे व्यञ्ज नावग्रह प्रस्तावे चक्षुषः प्राप्यकारित्व स्य खण्डनम् ॥ Page #88 -------------------------------------------------------------------------- ________________ S सविवरणं RECE श्रीज्ञाना र्णव प्रकरणम्॥ ९ कलितसकलनेत्रगोलकस्य दूरासन्नतिमिररोगावयविन उपलम्भप्रसङ्गात्, आह च-"जइ पत्तं गेण्हेज उ, तग्गयमंजणरओमलाईयं ।। मतिनिरू पणे व्यञ्जपेच्छज्ज जंन पासइ, अपत्तकारि तओ च ॥ २१२॥” [यादे प्राप्तं गृह्णीयाचद्गतमञ्जनरजोमलादिकम् ।। प्रेक्षेत यन्न पश्यति, अप्राप्तकारि ततश्चक्षुः ॥] अत्यन्तासत्यभावस्यापि सहकारित्वे चाधिष्ठानसंयुक्ताञ्जनशलाकाया अप्यप्रत्यक्षत्वप्रसङ्गात्, अग्रा नावग्रह प्रस्तावे वच्छेदेन चक्षुःसंयोगस्य हेतुत्वेऽप्युदीची प्रति व्यापारितनेत्रस्य काश्चनाचलोपलम्भप्रसङ्गात्, दूरत्वेन नेत्रगतिप्रतिबन्धे च । शशधरस्याप्यनवलोकनप्रसङ्गात् । तदभीषुभिरिव तिग्मकराभीषुभिरपि तदभिवृद्धश्चाविशेषात्, तिग्मत्वेन तिग्मकररश्मीनां तत्प्रति - चक्षुषः प्रा प्यकारित्वघातकत्वे च तदालोकपरिकलितपदार्थमात्राभानप्रसङ्गादिति रत्नप्रभाचार्यप्रभृतयः(रत्नाकरावतारिकाद्वतयिपरि. सूत्र ५) इन्द्रियसम्बन्धत्वेन प्रत्यक्षहेतुत्वेऽपि सामीप्यविशेषेण संयोगस्यान्यथासिद्धिरित्यपि युक्तमुत्पश्यामः॥ प्राप्यकारित्वे स्य खण्डच चक्षुषः शाखाचन्द्रमसोयुगपद्ग्रहानुपपत्तिः, युगपदुभयसंयोगाभावात् । न च शतपत्रशु वेधव्यतिकरण तत्र यौगपद्याभिमा नम् ॥ न एव क्रमेणैव वेगातिशयादुभयसंयोगेनोभयसाक्षात्कारजननादिति वाच्यम्,चन्द्रज्ञानानुव्यवसायसमये शाखाज्ञानस्य नष्टत्वेन शा-1 खाचन्द्रौ साक्षात्करोमीत्यनुव्यवसायानुपपत्तेः, न च क्रमिकतदुभयानुभवजानतसंस्काराभ्यां जनितायां समूहालम्बनस्मृताववानुभवत्वारोपात तथानुव्यवसाय इति साम्प्रतम्, तादगारोपादिकल्पनायां महागौरवात् । न च तिर्यग्भागावस्थितयोः शाखाचन्द्रमसोयुगपत्संयोग इति साम्प्रतम्, सन्निहितव्यवहितयोर्युगपत्संयोगेतिप्रसङ्गात् । नयनान्निःसरता नायनेन तेजसाऽर्थसंसर्गसमकालमेव बाह्यालोकसहकारेणान्यचक्षुरारम्भाच्छाखाचन्द्रमसोर्युगपग्रह इत्यपि तुच्छम् उद्धृतरूपवत्तेजःसंसर्गेणानुद्भूतरूपवत्तेजस आरम्भानभ्युपगमावाह्यचक्षुषा पृष्ठावस्थितवस्तुग्रहप्रसङ्गाच्चत्यधिकंमत्कृतस्याद्वादरहस्यादवसयम् (न्यायालोकादुध्धृतम्) |॥ ३६॥ ग्रहानुपपत्तिः, युगपदुभवादात वाच्यम् चन्द्रज्ञानानुव्यवनिताया समूहालम्बनस्मृतावनामा ECROSHASIRS SARASHTRANSAR यात् । नयनान्निासरता नायमणानुद्भूतरूपवतेजस ॥३६॥ Page #89 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मतिनिरूपणे व्यञ्जनावग्र हप्रस्तावे मनसः प्राप्यकारिक स्य खण्ड COMMUMROSAREE द्धृतम्)।।किश्च मनोप्राप्यकार्याप प्रतिनियतस्यैव ग्राहकम् ननु मनसोऽपि सर्वग्राहकत्वप्रसङ्गतो नाप्राप्यकारित्वं किन्तु प्रतिनियतग्राहित्वेन तत्प्राप्यकारि स्यादिति चक्षुषोऽप्राप्यकारित्वसाधने दृष्टान्तीकृतस्य मनसः साध्यसाधनाभयवैकल्यामति चेत्, न, ज्ञेयसम्पर्क कृतानुग्रहोपघातलक्षणलिङ्गाभावेन तस्य तत्सम्पर्कासिद्वेः,अन्यथा जलज्वलनादिचिन्तया तस्य क्लेददाहादिप्रसङ्गः, अमुकत्र गतं मे मन इति प्रयोगस्य च गत्यर्थानां धातूनां ज्ञानार्थत्वेनैतदर्थग्रहणाय व्याप्तं मे मन इत्यर्थः ॥ आह च-"गंतुं नेएण मणो, संवज्झइ जग्गओ व सिमिणे वा ।। सिद्धमिदं लोमिवि, अमुगत्थगओमणो मित्ति ॥२१३॥"[गत्वा ज्ञेयेन मनः, सम्बध्यते जाग्रतो वा स्वमे वा ।। सिद्धमिदं लोकेऽपि अमुकत्रगतं मनो मे इति॥] "नाणुग्गहोवधाया-भावाओ लोअणं व, सो इहरा । तोयजलगाइ चिंतणकाले जुजेज दोहिंपि।।२१४॥"[नानुग्रहोपघाताभावाल्लोचनमिव तदितरथा। तोयज्वलनादिचिन्तनकाले युज्येत द्वाभ्यामपि]॥१७॥ किश्च भावमनो द्रव्यमनो वा बहिर्गत्वा ज्ञेयेन सम्बध्यत इति विकल्प्य दोषमाहकिञ्च भावमनो गच्छेद-बहिर्द्रव्यमनोऽथवा ॥ नाद्यः शरीरवृत्तित्वा-दात्मनोऽनिर्गमाद बहिः॥२५॥८३॥ ___उक्तविकल्पद्वये हि प्रथमविकल्पो न प्रथते भावमनसाश्चिन्ताज्ञानपरिणामरूपस्य जीवानन्यत्वाज्जीवस्य च शरीरमात्रवृत्तित्वेन तपादीनामिव बहिनिर्गमासम्भवाद्,आहच-"दव्वं भावमणोवा, वएज्ज जीवो अहोइ भावमणो॥ देहव्वावित्तगओ, न देहबाहिं तओ जुत्तो।।२१५॥"[द्रव्यं भावमनोवा बजेज्जीवश्च भवति भावमनः॥देहव्यापित्वान देहबहिस्ततो युक्तः ॥२५॥ नन्वात्मनः शरीरव्यापित्वमेवासिद्धं सर्वगतत्वादिति चेद्, उच्यते-[प्रतावस्येह द्वे पत्रे सप्तगाथाश्च गता इति लिखित्वापरावृतिश्च कृता] कर्तृत्वं व्योमवन्न स्यात्-सर्वगत्वे किलात्मनः॥ प्रकृतेरेव कर्तृत्वं, युज्यते न कथञ्चन ॥२६॥८॥ COMCHIRAGAL Page #90 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विवरणं श्रीज्ञानार्णवअकरणम् ।। ॥ ३७ ॥ आत्मनः सर्वगतत्वे ह्याकाशवत् कर्तृत्वभोक्तृत्वादिकं न स्यात्सर्वगतत्वस्याकर्तृत्वादिव्याप्तत्वाद्, आहच - "सव्वगओ त्ति य बुद्धी, कत्ताभावाइदोसओ तो ॥ २१६ ॥ । [ सर्वगत इति च बुद्धिः कर्त्रभावादिदोषतस्तन्न ] | अत्र सांख्याः सङ्गिरन्ते- कूटस्थनित्यत्वश्रुतेरात्मा तावदकारणमकार्य च, कारणत्वेऽपि तस्यानित्यकार्य परिणामित्वेनानित्यत्वप्रसङ्गाद्, अत एव जन्यधर्मानाश्रयत्वं कूटस्थपदार्थो गीयते । तदुक्तं - "न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः "इति, आदिकारणं च प्रकृतिरेव । । तदुक्तं - "मूलप्रकृतिरविकृतिरिति" अचेतनत्वेन चेयं परिणामिनी ततो महदहङ्कारन्द्रियतन्मात्रमहाभूतानां सर्गः न च पुरुषार्थप्रयोजकत्वात्प्रकृतिपरिणामस्य तदनुगुणशब्दादिपरिणाम एवास्तु किमान्तरालिकमहदादित वेनेति वाच्यम्, तत्सर्गस्य विषयबन्धनार्थत्वात् न च चितिरेव विषयसम्बन्धस्वभावा, स्वभावस्यानुच्छेद्यत्वेनानिर्मोक्षप्रसङ्गात् न च प्रकृतिरेव तदीयभोगोपकरणसम्पादनस्वभावा, नित्यत्वेन तस्याः कदाचिदप्यात्मनो निरुपाधिकत्वाभावेन तत एव न च घटादिरेवाहत्य तदीयो, दृष्टादृष्टविभागानुपपत्तेः, नापीन्द्रि प्रणालिकयैव चिद्विषयसम्बन्धः, व्यासङ्गायोगात्, नापीन्द्रियमनोद्वारा, स्वप्नदशायां वराहव्याघ्राद्यभिमानिनो नरस्यापि नरत्वाभिमानानुदयात्, नह्ययं बाह्येन्द्रियवृच्त्यभावकृतो जाग्रदवस्थायामपि तस्य तन्निरपेक्षत्वदर्शनात्, न च मनोविरहकृतः, तस्य स्वप्नेऽपि व्यापारात्, तस्माद् यद्विरहकृतः स्वप्नेऽभिमानानुदयस्तदतीन्द्रियं तत्कारण महङ्कारतन्वमवश्यमभ्युपेयमिति, न चाहङ्कारपर्यन्तव्यापारेणैव चिद्विषय सम्बन्धस्वभावः, सुषुप्त्यवस्थायां तद्व्यापारविरामेऽपि श्वासप्रश्वासप्रयत्नसन्तानावस्थानात्, तद् यदेतास्ववस्थास्वनुवर्त्तमानमेकं सव्यापारमवतिष्ठते यदाश्रया चानुभववासना तद्बुद्धितत्त्वाख्य मन्तःकरणमिन्द्रिय मनोऽहङ्कारपरम्परयोपारूढोऽर्थः पुरुषस्य भोगाय भवति । तदुक्तं - "एते प्रदीपकल्पाः, परस्परविलक्षणा गुणविशेषाः । पुरुषस्यार्थं स्वच्छं, प्रकाश्य बुद्धौ मतिनिरूपणे व्यञ्जनावग्र प्रस्तावे मनसः प्रा प्यकारित्वखण्डने आ |त्मनो विभु वखण्डने सांख्यप्रश्नः ॥ ॥ ३७ ॥ Page #91 -------------------------------------------------------------------------- ________________ SAGAREKAR प्रयच्छन्ति ॥३६॥"इति, तस्मिन्नचेतनेऽपि चेतनत्वाभिमानोऽकर्तरि च चेतने पुरुषत्वाभिमानो भेदाग्रहादेव शरीर आत्मत्वाभिमानवत । तदक्तं-"तस्मात्तत्संयोगा-दचेतनं चेतनावदिव लिङ्गम् ॥ गुणकर्तृत्वे च तथा, कर्नेव भवत्युदानिः ॥२०॥" इति, कर्मवासनापि च बुद्धितत्त्व एव, पुरुषस्त्वनुभवतद्वासनातत्फलैः कर्मतद्वासनातत्फलैश्च निर्लेप एव, आलोचनमिन्द्रियाणां व्यापारी विकल्पस्तु मनसः, अभिमानोऽहङ्कारस्य, 'ममेदं कर्तव्यम्' इति कृत्यध्यवसायश्च बुद्धेः, अत्र हि पुरुषोपरागो विषयोपरागो व्यापारावेशश्चेति त्रयोंशाः, तत्र ममेति पुरुषोपरागो दर्पणस्येव मुखोपरागो भेदाग्रहादताविको, यद्यपि ममत्यभिमानो न बुद्धधर्मस्तथापीदमा प्रतिनिर्दिष्टस्य विषयस्य ममेत्यत्र पुरुषस्यैव ग्राहकत्वेनाभिमानः पुरुषोपराग एव, इन्द्रियप्रणालिकोपनीतपरिणतिभेद इदमिति विषयोपरागः, मुखनिश्वासोपहतस्य मुकुरस्य मलिनिमोपराग इव पारमार्थिकः, एतदुभयोपपचौ च कर्तव्यमिति व्यापारावेशोऽपि, अस्यायं बुद्धौ विषयोपरागो ज्ञानं, दर्पणप्रतिबिम्बितमुखस्य तद्गतमलिम्नैव पुरुषोपरागस्य विषयोपरागेण सह सम्बन्ध उपलब्धिरिति, बुद्ध्युपलब्धिज्ञानानां नानान्तरत्वं, तदेवमष्टावपि धर्मा बुद्धेरेव सामानाधिकरण्येनाध्यवसीयमानत्वात्, न च बुद्धिरेव स्वभावतश्चेतना परिणामित्वाद्, उक्तश्च-अध्यवसायो बुद्धि-धर्मो ज्ञानं, विराग ऐश्वर्यम् ॥ सात्त्विकमेतद्रपं,तामसमस्माद्विपर्यस्तम् ॥२३॥ इति बुद्धयादयो नैयायिकाभिमता आत्मविशेषगुणा अप्यत्रैवान्तर्भवन्ति, अध्यक्तस्यैव ज्ञानस्य स्मृतिजनकत्वाभ्युपगमेन केवलं वासनाया एवानभ्युपगमात्,एवं आत्मा न कर्तेत्यभिमतमेवारमाकमिति चेत्॥ तदेतदखिलं पवनप्रेरिततूलवत्तरलतरमेव।। कृतिचैतन्ययोः सामानाधिकरण्यानुभवेन चेतनस्यैव कर्तृत्वात्, न चायं भ्रमो, बाधकाभावात्,न चाऽऽत्मनः कर्तृत्वे परिणामित्वप्रसङ्गो बाधकः, बुद्धेः कृतिसमवायेऽपि तस्य बाधकत्वात् परिणामिनो घटादेरकर्तृत्वस्य दृष्टत्वाद् दृष्टविरोधादयमदोष इति तु तुल्यं, कर्तु मतिनिरूपणे व्यञ्जनावग्रह प्रस्तावे आत्मविभुस्वखण्डने सांख्यमतस्योपवर्ण नपूर्वकं खण्डनम् ॥ Page #92 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरण श्रीज्ञाना नव HALCHEO प्रकरणम् ।। ॥३८॥ रचेतनकार्यत्वादचेतनत्वापत्तिर्वाधिकेति चेत्, न, 'वीतरागजन्मादर्शनाद्' इति न्यायेन तस्यानादित्वस्यैव सिद्धः, बुद्धरनित्यत्वेन तत्र मतिनिरूनानाभवार्जितवासनावस्थानायोगात्प्रकृतश्च पूर्वबुद्धिवासनानुवृत्त्यभ्युपगमेऽपसिद्धान्ताद् बुद्धिनिष्ठवासनाया अनियामकत्वाच,नच |पणे व्यञ्जसम्बन्धविशेषान्नियमोपपत्तिः, स्थूलरागे सूक्ष्मवासनाया अप्रयोजकत्वात्, न च प्रकृतौ सूक्ष्मतदभ्युपगमेऽपि प्रमाणमस्ति, अन्यथा |x नावग्रहसूक्ष्मरागादियोगाद् भावाष्टकसम्पन्नतया प्रकृतिरेव बुद्धिर्भवेत्, स्थूलतद्योग एव बुद्धित्वनियत इति चेत्, तथाप्यप्रामाणिक प्रस्तावे सूक्ष्मतदभ्युपगमे घटादावपि तदापत्तिः, तस्य प्रकृतिकार्यत्वात्कारणधर्माणां च कार्ये सक्रमाभ्युपगमात् स्थूलबुद्धिविलयेऽपि आत्मविभुसूक्ष्मतत्सत्वाभ्युपगमानानुपपत्तिरिति चेत्, न, मुक्तावपि तत्सवप्रसङ्गात्, अधिकाराभावान्नायमिति चेत्, नन्वयमाधिकारोऽपि त्वखण्डने धर्माधर्मवासनायोगः, धर्माधर्मी च बुद्विधर्माविति कथं तत्सचे तद्विलयः, स्थूलतद्विलय एव निरधिकारित्वमिति चेन,तर्हि स्थल सांख्यमतस्य बुद्धयनुत्पादसमये सूक्ष्मबुद्धिसचाभ्युपगमेऽपि तस्या निरधिकारित्वेन कार्याजनकतया संसारोच्छेदप्रसङ्गः, अन्यथा तु मोक्षो खण्डनम्॥ च्छेदप्रसङ्गः । किञ्चैवमधिकार एव संसारहेतुरस्तु किं प्रकृत्या,बुद्धिस्तु चेतनैव न तत्वान्तरं, मानाभावात्, न च दर्पणे मुखस्येव | बुद्धौ पुरुषस्योपरागः सम्भवति,अतान्त्रिकस्य सम्भवे शशशृङ्गस्यापि सम्भवप्रसङ्गात्, असतो विज्ञानस्याप्यभावात्तज्ञानिकाकारस्यापि दुरुपपादत्वाद्,अन्यथा सर्वदेवासद्भावानापत्तेः, विषयोपरागोऽपि न तत्र सम्भवी,अन्यथा मेवादिज्ञाने मेाद्याकारोपि तत्र स्यात्, तस्माद् बुद्ध्युपलब्धिज्ञानशब्दानां पर्यायत्वमेव युक्तं,अहङ्कारोऽपि विकल्परूपो मानस एव व्यापारोऽन्यथा स्वप्ने यथार्थाहङ्कार इव विपरीताहङ्कारोऽपि न स्याद् , इदं पुनरवशिष्यते यत्कस्यचिदहमिति सङ्कल्पात्स्वगुणाभवङ्गपरगुगद्राहेपारणाम : समुज्जृम्भते कस्यचित्तु नेत्यत्र किं नियामकमिति,तत्र तु मानं मोहनीयकर्मण उदयाऽनुदये एव तन्त्रे,एकस्यापि कषायमोहनीय- ॥३८॥ R GARCARECASS Page #93 -------------------------------------------------------------------------- ________________ GORIESAKARAN कर्मणः क्रोधादिव्यापारमेददर्शनेन भेदकल्पनात, एवं च कृत्यादीनां चेतनासामानाधिकरण्ये सिद्ध बुद्वयादितत्वकल्पना युक्तिही- 1मतिनिरूपले नैवेति सङ्क्षपः ॥स्यादेतद् , आत्मनो जन्यधर्माश्रयत्वे कौटस्थ्यविरोधो धर्मधर्मिणोरभेदे कार्यानित्यत्वेन कारणस्थाप्यनित्यत्वप्र- व्यञ्जनावसमात्, न च तयोरभेद एव युक्तो विरुद्धधर्माध्यासलक्षणस्य भेदस्य घटपटयोखि प्रत्यक्षसिदत्वादिति वाच्यं, श्यामवर- ग्रहप्रस्तावे क्तत्वाभ्यां वैधयेऽपि घटस्येव गुणगुणिभावन गुणगुणिनोरन्योन्याभावायोगादिति, मैवं, आत्मनो नित्यानित्यत्तस्यैव मनसः प्रायुक्तिसिद्धत्वाद् धर्मधर्मिणो दाभेदस्य सप्रपञ्चं स्याद्वादरहस्ये व्यवस्थापितत्वात्, कूटस्थत्वं तु तत्र समानजातीयद्व्यपर्या- | प्यकारित्वयद्वारा परिणामित्वं अना(आ)त्मेतरभिन्नत्वं वेति सर्वमतदातम् ॥ २६ ॥ सांगतत्वे दूषणान्तरमप्याह *खण्डने आसर्वासर्वग्रहोऽप्येवं, नित्यस्यान्यानपेक्षणात् ॥ अपेक्षणेऽपि देहस्या-पेक्षायामतिगौरवात् ॥२७॥ ॥८५॥ मविभुत्वस्व ____ आत्मनः सर्वगतत्वे त्रिभुवनभवनोदरसञ्चारिपदार्थसार्थप्राप्त्यवश्यम्भावात् मनसः प्राप्यकारित्ववादिनः सर्वोपलब्धिप्रसङ्गः, | खण्डनम् ॥ प्राप्त्यविशेषेऽपि कतिपयार्थानुपलम्भे चाविशेषात्सर्वानुपलम्भप्रसङ्गः, यदुक्तं-"सबासधग्गइण-प्पसंगहोसाइो वावि ॥२१६॥"[सर्वासर्वग्रहणप्रसङ्गदोषादितो वापि] अथ मनसो बहिरस्वातन्त्र्याद् बहिरर्थग्रहसामग्रीनियमादेव मनसो बहिरर्थग्रहनियम इति चेत्, तथापि शरीरावच्छेदेनैव सुखादिकमुपलभ्यते न घटाद्यवच्छेदेनेत्यत्र किं नियामकं, आत्मनः स्वगुणजनने शरीरस्यापि सहकारित्वान्नान्यत्र तदुत्पत्तिरिति चेत्,न,नित्यस्य सहकार्यपेक्षायोगात्, तथाहि, सहकारिणा किं तत्र कश्चिदतिशयः क्रियते न वा, क्रियते चेत्, स किं अर्थान्तरभूतोऽनर्थान्तरभूतो वा, आये न किश्चित् कृतं स्यात्, अन्त्ये तु तदनन्तरभूतातिशयकरणे तस्यापि करणप्रसङ्गः ।अकरणपक्षे तु न तस्य सहकारित्वम्, अन्यथा जगतोऽपि सहकारित्वप्रसङ्गादित्याहुः, ननु सह ASS Page #94 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विवरणं श्रीज्ञानार्णवअकरणम् ॥ ॥ ३९ ॥ कारित्वं नातिशयजनकत्वं कार्यजन्माजन्मनोः सहकारिसन्निधानास भिधानाभ्यामेवोपपत्तावतिशय स्याकल्पनात्, किं त्वेककार्यकारित्वं, तच्च नित्यत्वेऽप्यात्मनः शरीरे निराबाधमिति चेत्, न, तथापि ज्ञानादावनन्तशरीरादिहेतुत्वकल्पने गौरवात्, आत्मनः शरीरव्यापित्वकल्पनस्यैव युक्तत्वात् ॥ २७॥ न चाऽऽत्मनो विभुत्वसाधनसावधानं बलवत्प्रमाणमपि जरीजृम्भत इत्याह-विभुत्वसाधकं किञ्चित् प्रमाणमपि नेक्ष्यते ॥ स्वसम्बन्धविशेषेणा-दृष्टं यत्कार्यमर्जति ॥ २८ ॥ ८६ ॥ नादृष्टस्य कार्यमात्रं प्रति हेतुत्वात्तस्य च स्वाश्रयसंयुक्तसंयोगेनैव हेतुत्वकल्पनादात्मनो विभुत्वासिद्धिः, प्रध्वंसे व्यभिचारात् कालिकादिसम्बन्धेनैव तस्य तत्र हेतुत्वौचित्याद्, वस्तुतस्तु कार्यत्वं कालिकसम्बन्धेन घटत्वपटत्वादित्त्ववमननुगतमिति न कार्यतावच्छेदकं न च कार्यमात्र हेतुत्वे तस्य प्रमाणमस्तीति सुखदुःखयोरेव धर्माधर्मरूपस्यादृष्टस्य हेतुत्वमास्थेयम्, अथ वनेरूर्ध्वज्वलनादावदृष्टमवे नियामकम् । तदुक्तम् । “न ज्वलत्यनलस्तिर्यग्, यदूर्ध्वं वाति नाऽनिलः । अचिन्त्यमहिमा तत्र, धर्म एव निबन्धनम् ॥१॥" न च शरीरख्यापित्वे प्राणिनोऽदृष्टस्य वन्यादिसम्बन्धः सम्भवतीति तस्य विभुत्वमेव युक्तमिति चेत्, न, स्वाश्रयसंयुक्तसंयेाग सम्बन्धनादृष्टस्य घटादावपि सत्त्वाद्, वह्नित्वविशिष्टस्वाश्रय संयुक्तः सयोग सम्बन्धेन तस्य हेतुत्वे तु स्वाश्रयसंयुक्तः संयोगविशिष्टवह्नित्वसम्बन्धेन तथात्वे विनिगमनाविरहात्सम्बन्धविशेषेणैव तद्वैतुत्वौचित्यात्, एतेन ( यदपि ) " शत्रुजिघांसया कृतेन श्येनयोगेन यज्वन्येवादृष्टविधानात्तस्य च शत्रावसम्बन्धात्कथमात्मविभुत्वं विना तत्फलोपपत्तिः (तदपि न, शक्तिविशेषरूपस्य कारणत्वस्यासम्बन्धेऽप्यविरोधात्सम्बन्धघटितत्वे वा तस्य प्रकृते सम्बन्धविशेषकल्पनावश्यकत्वाद्) इति " परास्तम् ॥ २८ ॥ विभ्रुत्वसाधकान्तरं निराकरोति— मतिनिरूपणे व्यञ्जनाव ग्रहप्रस्तावे मनसः प्रा. प्यकारित्व खण्डने आत्मविभुत्वस्य खण्डनम् ॥ ॥ ३९ ॥ Page #95 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अथ नित्य महत्त्वेन, व्योमवद्विभुतास्य चेत् । नैवं तत्परिमाणं हि यदुत्कर्षापकर्ष भाक् ॥ २९ ॥ ८७ ॥ अथ परे प्रतिपादयेयुरात्मनो महत्त्वं तावनिर्विवादं द्रव्यचाक्षुषं प्रति कल्पनीय हेतुभावस्य महत्त्वस्य लाघवेन जन्यद्रव्य साक्षात्कारत्वावच्छिन्नं प्रत्येव हेतुत्वकल्पनात्, आत्मसाक्षात्कार निर्वाहायात्मनि महत्वस्यावश्यकत्वात्, तच्च महत्त्वं न जन्यं, कार्य हि महत्त्व अवयव बहुत्वजन्यं स्यात्तन्महत्त्वजन्यं वा प्रश्चयजन्यं वा, न च त्रितयमपि निरवयवस्यात्मनः सम्भवतीति । एवं चायं प्रयोगः, आत्मा विभुर्नित्यमहत्वादाकाशवदिति चेत्, अश्रोच्यते-अत्र हि परमप्रकृष्टपरिमाणवत्त्वलक्षणं विभुत्वं साध्यते, न च नित्यमहत्त्वस्य परमप्रकर्षविपक्षबाधको जागर्ति तर्कः, अपकृष्टत्वे तस्य जन्यत्वापत्तिर्बाधिका, गगनमहत्त्वाबधिकापकर्षस्य बहुत्वजन्यतावच्छेदकत्वादिति चेत्, न, परमाणुपरिणाम साधारणतया तस्य कार्यतानवच्छेदकत्वात् परमाणुपरिमाणे व्यभिचारेण त्रुटिमहत्वावधिकोत्कर्षेण समं साङ्कर्यात्तादृशापकर्षस्य जातित्वा सिद्धथा बहुत्वजन्यतानवच्छेदकत्वाच्च, वस्तुत आत्मपरिमाणमपि प्रचयविशेषादुत्कर्षापकर्षो भजज्जन्यमेवेति है तारेव ॥ सिद्धिः ॥ २९॥ नन्वेवमात्मनः सावयवत्वापत्तिरिति चेत्, किन चातः । सावयवत्वे सति तस्य कार्यत्वं स्यादिति चेत्, किमिदं कार्यत्वं प्रागसतः सत्तालाभः पूर्वाकारपरित्यागेनोत्तराकारोपादानं वा, नाद्यः, असत उपाय सहसेणाप्युत्पादयितुमशक्यत्वात्, अन्यथा शशविषाणस्याप्युत्पत्तिप्रसङ्गात्, अन्त्ये तु तादृशं कार्यत्वमात्मन इष्टमेवेत्यभिप्रेत्याह एवं सावयवत्वं तन्नित्यत्वं नैव बाघते ॥ कथञ्चित्परिणामित्वं, विना तन्न घटेत यत् ॥ ३० ॥८८॥ न हि सावयवत्वेनात्मनः कथञ्चित्परिणामित्वलक्षणेऽनित्यत्वे द्रव्यकरूप्यलक्षण नित्यत्वव्याघातः येन प्रतिसन्धानाद्यभावप्रसङ्गः,नच सावयवत्वे तस्य प्राक्प्रसिद्धसमानजातीयावयवारम्यत्वप्रसक्तिः, अवयवजन्य एव कार्येऽवयवानां जनकत्वात्, अस्य मतिनिरूपणे व्यञ्जनावग्रहप्रस्तावे मनसः प्राप्यकारित्व खण्डने आरमविभुत्वस्थ खण्डनम् ॥ Page #96 -------------------------------------------------------------------------- ________________ U सविवरणं श्रीज्ञाना र्णवप्रकरणम्॥ ॥४०॥ RGA त्वतथात्वात्, न च तादृशकार्येऽपि घटादौ प्राक्प्रसिद्धसमानजातयिकपालसंयोगारभ्यत्वं दृष्टं, कुम्भकारादिव्यापारान्वितान्मृत्तिण्डात्प्रथममेव पृथुवुध्नोदराद्याकारस्योत्पत्तिप्रतीतेरित्यप्याहुः ॥३०॥ प्रमाणसिद्धेऽर्थे न किञ्चिदन्पदाधकमित्यन्यत्रातिदिशति मूर्तत्वादिप्रसङ्गोऽपि, वारणीयोऽनया दिशा ॥ मानराजादरे दुष्टा, हन्तापत्तिने पत्तिवत् ॥३१॥८॥ एवञ्च मूर्तशरीरानुप्रवेशेनात्मनो मृतत्वापत्तिरपि परास्ता, यतः किमिदं मृतत्वं इयत्तावच्छिन्नपरिमाणपोगो रूपादिसत्रिोशो वा, आये इष्टापतिः, न ह्यविभुद्रव्यस्य मृतत्वं न मन्यते कश्चिद्विपश्चित, नान्त्यो मृानुप्रवेशिनो रूपादिमचव्याप्तिविरहान्मनस्येव व्यभिचारात,न च मूर्तमहत्येनापि तद्व्याप्तिरस्ति,अप्रयोजकत्वाद्,एवमात्मनो मूर्तद्रव्यत्वेऽचेतनत्वापत्तिरपि परास्ता, सहचारदर्शनमात्रेण व्याप्त्यग्रहाद्, अन्यथा विभुत्वेऽप्याकाशादिवत्तथात्वं स्यात्,एवं चबालयुवशरिपरिमाणभेदेनात्मनो भेदापत्तिः,परिमाणभेदे द्रव्यभेदावश्यम्भावात्, तथाचान्यदृष्टस्पान्यस्य स्मरणानुपपत्तिरित्यधरीकृतं, कथञ्चिद्भेदेऽपि तस्याभेदाभ्युपगमात्सर्पस्येव सफणविफणावस्थयोः,अत्यन्तभेदे तु प्रत्यभिज्ञाद्यनुपपत्तिरित्यन्यत्र विस्तरातथा शरीरखण्डने शरीरव्यापिनो जन्तोरपि खण्डनप्रसङ्ग इत्यप्यसमीक्षिताभिधानं,शरीरखण्डने कथञ्चित् तत्खण्डनस्येष्टत्वाच्छररिसम्बद्धात्मप्रदशेभ्यो हि कतिपयात्मप्रदेशानां खण्डितशरीरप्रदेशानुप्रवेश आत्मनः खण्डनं, तच्चात्र विद्यत एव, अन्यथा खण्डितशरीरप्रदेशस्य कम्पोपलब्धि स्यात्.नह्यात्मविभुत्ववादेपि शरीर तदवयवं विना वाऽन्यत्रात्मगुणोपलब्धिः,न चखण्डितशरीरप्रदेशोपिशरीरमेव,अथ पूर्वावयवसंयोगाविशेषेऽपि संयोगान्तरेणाऽदृष्टवशात् खण्डशरीरद्वयोत्पत्तेर्न दोष इति चेत्, न, एकदा शरीरद्वयोत्पत्तेविरोधादविरोधे वैकदोभयत्र मनःसंयोगविरहात् कथश्चैकदेव तयोः कम्पोपलब्धिः, अदृष्टवशात् खण्डितशरीरे मनोन्तरप्रवेशाभ्युपगमात्र दोष इति चेत्, न, तथाप्यात्माविशेषगुणयोग मतिनिरूपणे व्यञ्जनावग्रहप्रस्तावे मनसः प्राप्यकारित्वस्य खण्डने आत्मविभुत्वस्य | खण्डनम् ॥ -- ASSIS: RECRUCUOEMCHUCk ॥४०॥ Page #97 -------------------------------------------------------------------------- ________________ CHECK CATEGO पद्यानभ्युपगमसिद्धान्तविरोधात्, अवच्छेदकभेदेन विभुविशेषगुणानामपि युगपदुत्पत्चिरिष्टैव, शब्दस्थले दृष्टत्वादिति चेत्, न,तथापि मतिनिरूपमुहूर्तानन्तरमपि छिन्नगोधाशरीरे कम्पोपलब्धिप्रसङ्गात्, तदानीं ततो मनोविगमः कल्प्यत इति चेत्, न, एतादृशकष्टकल्प णे व्यञ्जनानापेक्षया तत्रात्मप्रदेशानुप्रवेशोऽदृष्टवशाच कालान्तरे तत्सङ्घट्टनमिति कल्पनाया एव युक्तत्वादिति दिग् ॥ एवमदृष्टादात्मसं- वग्रहप्रस्तावे योग विना परमाणुष्वाधकर्मानुपपत्तावन्त्यसंयोग विना तन्निमित्तशरीरानुत्पत्तौ शरीरव्यापित्ववादे सर्वेषामनायाससिद्धो मोक्षः मनसःप्राप्यस्यादित्यप्युन्मत्तभाषितप्राय, विभुत्ववादेऽपि सकलपरमाणुग्रहणाभावस्यादृष्टस्वभावाधीनत्वेन शरीरव्यापित्ववादेऽप्यसम्बद्धानाम कारित्वखपि परमाणूनां स्वभावत एव नियतानां ग्रहणानियतशरीरोत्पत्तेराविरुद्धत्वात्, तदेवमसमुद्धतस्यात्मनः शरीर एवं वृत्तिः, १५ण्डने आत्मसमुद्घातमहिम्ना तु बहिरपीति सुव्यवस्थितम् ॥३१॥ विभुत्वनये तु महतीयमनुपपत्तिरित्याह विभुत्वस्व विभुत्वे पुनरात्मा स्या-देक एवान्तरिक्षवत् ॥ उपपत्तेर्व्यवस्थाया, विविधोपाधिभेदतः ॥ ३२॥९॥ | खण्डनम् ॥ __ आत्मनो विभुत्ववादे ह्येकात्मपरिशेषापत्तिरेकत्रैव नानात्मकार्योपपत्तेः, एकत्रव्योम्न नानाघटसंयोगवदेकौवात्मनि नानामन:शरीरेन्द्रियसंयोगानामेकाकाशसमवेतनानाशब्दवच्चकात्मसमवेतनानासुख दुःखादीनां युगपदुत्पत्तिसम्भवात् , अथावच्छेदकतासम्बन्धेन शब्दोत्पत्तौ संयोगादिरूपस्यासमवायिकारणस्य नियामकत्वादेकत्रापि व्योम्नि देशभेदेन नानाशब्दोत्पायुज्यतामत्र तु कथमिति चेत्,न, अत्राप्यवच्छेदकतासम्बन्धेनात्मविशेषगुणत्वावच्छिन्नं प्रति प्राणशरीरसंयोगादेरसमवायिकारणस्य नियामकत्वात् सुषुप्तिकाले ज्ञानानुत्पत्तिनिहाय च त्वङ्मनोयोगस्य शरीरनिष्ठतया हेतुता वाच्या, त्वयाप्यात्मनिष्ठतया तद्धेतुताकल्पनात्,एवं च परामर्शादीनामपि शरीरनिष्ठतयैवानुमित्यादिहेतुत्वान्न चैत्रशरीरावच्छेदेन परामर्शान्मैत्रशरीरावच्छेदनानुमित्याद्या COMMENT R .56 Page #98 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरण श्रीज्ञाना वप्रकरणम्॥ ॥११॥ RAASAR पत्तिः, वस्तुतक्षेत्रपरामर्शसमवायिनि मैत्रे न चैत्रशरीरावच्छिन्नानुमित्यापत्तिः, कार्यतानवच्छेदकरूपेणापत्त्यभावात्, न च तवैकैकात्मस्थलेऽनन्तशरीराणां तत्त्वतत्त्वेन तत्तदात्मगुणं प्रति हेतुता वाच्या, मम तु समवायेन तदात्मसमवेतगुणत्वावच्छिन्नं प्रति तादात्म्यसम्बन्धेन तदात्मत्वनावच्छेदकतया तं प्रति च तदात्मशरीरत्वेन हेतुताद्वयं युक्तमेव कल्पनीयं, अथ तदात्मीयत्वं न तदात्मसंयोगोऽतिप्रसङ्गात्किन्तु तदात्मादृष्टोपगृहीतत्वं तच्चाननुगतमेवेति तवापि नानैव हेतुत्वमिति चेत्, न, स्वसमवेतादृष्टोपगृहीतत्वसम्बन्धेन तदात्मव्यक्तिवच्छरीरत्वेनानुगतस्यैव हेतुत्वादिति वाच्यं, शब्दादौ तच्छरीरावच्छिन्न प्रति तच्छरीरत्वेन हेततया बलप्तयैव निर्वाहोद्धतुत्वान्तराकल्पनया ममैव लाघवात्, अथवाऽवच्छेदकतया कार्योत्पत्तावपि प्रागभाव एव नियामक इति न किञ्चि- | दनुपपन्नम्, अथादृष्टफलयोः प्रतिनियमदर्शनानानात्मानो व्यवस्थाप्यन्तेऽन्यशरीरजनितस्यादृष्टस्यान्यशरीरावच्छेदेन फलजनकत्वेऽतिप्रसङ्गान्नियामकान्तरस्य चादर्शनादिति चेत्, न, तच्छरीरजनिताऽदृष्टस्य तजन्यशरीरावच्छेदेन फलजनकत्वेऽतिप्रसङ्गाभावात, एवं च जननमरणादिनियमोऽप्युपपादित इति दिग् ॥ नन्विदं भवतामपि समं दूषणं शरीरव्यापिनानात्मकल्पनापेक्षया विभोरेकस्यैवात्मनःकल्पनौचित्यात्, सिद्धान्तविरोधस्त्वावयोःसमान एव,एकात्मवादे मोक्षार्थितया कस्यापि प्रवृत्तिर्न स्यात्किञ्चिच्छरीरावच्छेदेन सकलदुःखध्वंसलक्षणस्य मोक्षस्य सिद्धत्वात्सिद्दे इच्छाविरहात्, तच्छरीरावच्छेदेन दुःखध्वंसे तु नेच्छा, सर्व दुःखं नश्यत्विति कामनयैव परिव्रज्यादौ प्रवृत्तरिति समाधानमप्यावयोः समानमिति चेत्,न, सिद्धिपदप्राप्तीच्छयैव तदुपायेषु प्रवृत्तेः, प्रेत्यभावादिव्यवस्थया च नानात्मनां भेदस्याविभुत्वस्य च सिद्धोभयनिरासे तात्पर्यात, नहि दुःखध्वंसार्था पुरुषाणां प्रवृत्तिरपि तु सुखाथैवेति सर्वमवदातम् । तदेवं भावमनो बहिर्गत्वा वस्तुप्रकाशयेदिति विकल्पो निरस्तः ॥३२॥ मतिनिरू|पणे व्यञ्चनावग्रहप्रस्तावे मनसःप्राप्य कारित्वस्य___ खण्डने आत्म विभु त्वस्य ख| ण्डनं, तत्रै. कात्मवादापत्तिश्च ॥ Page #99 -------------------------------------------------------------------------- ________________ TERROREA मतिनिरूपणे व्यञ्जनाव ग्रहप्रस्तावे मनसःप्राप्य कारित्वस्य खण्डनम् ॥ अथ द्रव्यमनो बहिर्गत्वा प्रकाशयिष्यतीति द्वितीयविकल्पं निराकरोतिबदिव्यमनो गच्छे-त्किं यद्धीहेतुरेव न ॥ निमित्तमपि नो तस्या-करणं वा बहिर्गतम् ॥३॥११॥ काययोगसाचिव्येन जीवगृहीतचिन्ताप्रवर्तकमनोवर्गणान्तःपातिद्रव्यनिकुरुम्बलक्षणं द्रव्यमनापुद्गलस्कन्धत्वादात्मधर्मस्य ज्ञानस्य जनकमेव न भवति कथश्चित्, अत एव हेतुहेतुमद्भावारिक तद्बहिर्निर्गमचिन्तयाजागलस्तनायमानया । अथ तवापि चक्षुरादिनेव प्रेरितो जन्तु नं जनयतीति प्रदीपवत्तत्करणं स्यादिति चेत्, तथापि स्थितेनैव तेन ज्ञानं जननीयं स्पर्शनादिवत्करणत्वादेव च तन्त्र बहिरेति स्पर्शनादिवदिति सुव्यवतिष्ठते, एवं च शरीरस्थितस्यापि तस्य पानालतन्तुन्यायेन बहिनिःसरणं भविष्यतीति शङ्का परास्ता । आह च-"दव्यमणो विमाया, ण होइ गंतुं वि किं तो कुणह।। अह करणभावओ तस्स. तेण जीवो विाणिज्जा ॥२१७॥" [ द्रव्यमनो विज्ञात, न भवति गत्वा च किं ततः करोतु ॥ अथ करणभावतस्तस्य, तेन जीवोऽपि विजानीयात "करणचणओ तणुसंठिएण, जाणेज फरिसणेणं व ॥ एचोश्चिय हेऊओ, न नीइ बाहिं फरिसणं व ॥२१८॥" किरणत्वतस्तनुसंस्थितेन, जानीयात्स्पर्शनेनेव ।।इत एव हेतोर्ने निर्गच्छति बहिःस्पर्शनमिव ॥२१८॥] ॥३३॥ नन्वनुग्रहोपघाताभा. वान्मनोप्राप्यकारीति प्राप्रतिज्ञातं स एव चाऽसिद्धचिन्ताहर्षादिना तदुपघातानुग्रहानुमानादितिभ्रान्तस्याशङ्कां निराचिकीर्घराह चिन्ताहर्षादिना जीवो-पघातानुग्रही यदि ॥ किं ताभ्यां ज्ञेयसंसर्गा-न ह्येतो मनसो यतः॥३४॥९२॥ परः खल्वेवमनुमन्यते यदौर्बल्योरःक्षतादिलिङ्गैमनसः शरीरापचयप्रयोजक आर्तरौद्राभिवृद्धिमहिम्ना च हृद्रोगादिप्रयोजक उपघातो रोमाञ्चोदयाद्यनुमेयो हर्षादिरूपश्चानुग्रहो भवतीति तस्य तदभावाभिधानमसङ्गतमिति । यदाह-"नजइ उवधाओ से, SEARNE Page #100 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना र्णवप्रकरणम्॥४ ॥४२॥ RECECANCECAUSHALAKARAN मतिनिरूपणे व्या नावग्रहप्रस्तावे मनस. प्राप्यकारित्वस्व खण्डनम् ॥ दोब्बल्लोरक्खयाइलिंगेहि।।जमणुग्गहो य हरिसा-इहि तो सो उभयधम्मो, ॥२१९॥" [ज्ञायते उपघातस्तस्य दौर्बल्योरःक्षतादिलिङ्गैः।। यदनुग्रहच हर्षादि-भिस्ततः स उभयधर्मा तदसङ्गतं, यतो द्रव्यमनस्तावन्मनस्त्वपारणतानि पुद्गलसङ्घातरूपं शोकादिपीडया हृदयदेशाश्रितनिविडमरुग्रन्थिवज्जीवं पीडयेत् तदेव चमनस्त्वपरिणतेश्च पुद्गलसङ्घातरूपं हर्षाभिनिवृत्त्या भेषजवजीवमनु गृह्णीयाचावता ज्ञेयनिमित्तकमनोनुग्रहोपघातकृताभिधानमिदम्।यदाह-"जइ दव्यमणोतिबली,पीलिजा हिययनिरुद्धवाउव्व । तयणुग्गहण हरिसा-दओव्व नेएण किं तत्थ।।२२०॥[यदि द्रव्यमनोतिबलि,पीडयेद् हृनिरुद्धवायुरिव ॥ तदनुग्रहेण हर्षादय इव ज्ञेयस्य किं तत्र] अन्तःकरणं हि न बहिर्गत्वा ज्ञेयमर्थ जानाति न वा तत्स्वसमीपमानीय प्रकाशयति न वा ज्ञेयकृतानुग्रहोपघातभाग् भवतीति भुजमुत्क्षिप्य वयं वदामो,न तु तजीवस्यानुग्रहोपघातावपि जनयतीति वयं वदामः, पुद्गलेभ्य एव तेन तल्लाभात्तथा चेदमस्मान् प्रत्यनिष्टोपदर्शनं वादिनोऽविचार्यवादितामेव व्यञ्जयति। यदाह "नीउं आगरिसिउं वा, न नेप्रमालंबइ त्ति णियमोऽयं ॥तनेयकया जेऽणु-ग्गहोवघायाय ते नत्थिा॥२२२॥[निर्गत्याकृष्य वा न ज्ञेयमालम्बत इति नियमोऽयम्।।तज्ज्ञेयकृतौ यावनुग्रहोपघातौ च तौ न स्तः]"सो पुण सयमुवघायण-मणुग्गहं वा करेज को दोसो।। जमणुग्गहावेघाया, जीवाणं पोग्गलेहितो ॥२२३॥"[तत्पुनः स्वयमुपघातमनुग्रहं वा कुर्यात्को नाम दोषः। यदनुग्रहोपघातौ, जीवानां पुद्गलेभ्यः ] ॥३४॥ । ननु चिन्तनीयवस्तुसंसर्गादेव हर्षशोकरूपावनुग्रहोपघातौ भविष्यतो न तु द्रव्यमनस इति चेत्,न,एवं सत्योदनादिचिन्तया बुभुक्षाद्यपगमप्रसङ्गात् । ननु तर्हि द्रव्यमनसस्तद्धेतुत्वे किं प्रमाणमित्यत आह देहोपचयदौर्बल्ये, मनःपुद्गलहेतुके । आहारपुद्गलादीनां, तद्धेतुत्वेन निश्चयात् ॥ ३५॥९३ ॥ CHERS ॥४२॥ Page #101 -------------------------------------------------------------------------- ________________ CELECTRONICS56 शरीरस्य पुष्टिहानी तावत्पुद्गलजन्ये इष्टानिष्टाहाराभ्यवहारेण तदर्शनाद्,अथेष्टादप्याहाराद्रोगिणां पुष्टयदर्शनादनिष्टादपि च*मतिनिरूपणे भेषजादेस्तदर्शनाद् व्यभिचार इति चेत्,न, धातुसाम्यवैषम्यद्वारा तयोस्त तुत्वात्, तदिह चिन्ताहर्षसमये जायमाने शरीरपुष्टिहानी व्यञ्जनावपुद्गलसम्बन्धमपेक्षमाणे उपस्थितत्वान्मनःपुद्गलसम्बन्धकल्पनायैव प्रभवतो,नचौदर्यामिपरिपाकजनितातिशयानामेवाहारपद्रलानां ग्रहप्रस्तावेतद्धेतुत्वावधारणान्नानीदृशानां मनःपुद्गलानां तद्धेतुत्वमिति वाच्यम्, स्वत एवातिशयितानां मनःपुद्गलानां तद्धेतुत्वौचित्यात, स्वप्नदृष्टांतेन अन्यथा हृद्ग्रन्थेरपि दौर्बल्यजनकत्वं न स्यात् , ननु चिन्ताहर्षयोरेव साक्षाचजनकत्वमस्तु किं नानामनापुद्गलकल्पनया?,वदति मनसःप्राप्यच-"चिन्तया वत्स ! ते जातं, शरीरकमिदं कृशम्" इति चेत्, न, एकशक्तिमत्त्वेन पुद्गलत्वेन तदेतृत्वकल्पनात्प्रमाणावरोधेन कारित्वव्यवतत्यागायोगात्तयोरपि मनोजन्यत्वेन मनस एव तद्धेतुत्वकल्पनौचित्याच्च, आकाशवदमूर्तयोश्चिन्ताहर्षयोर्न तजनकत्वमिति प्राञ्चः॥ स्थापयितुः चिन्तयेत्यादिकश्च प्रयोग औपचारिक इति दिग् ॥ तदिदमभिप्रेत्याह-" इटाणिहाहार-भवहारा होन्ति पुडिहाणीओ। खण्डनम् ॥ जह तह मणसो ताओ, पोग्गलगुणओत्ति को दोसो ॥२२१॥" [इष्टानिष्टाहाराभ्यवहारे भवतः पुष्टिहानी । यथा तथा मनसस्ते पुद्गलगुणत इति को दोषः॥ ] स्यादेतव, शोकहर्षव्यापारनैरन्तर्येण नाडीविशेषप्रयत्नप्रेरितद्रव्यान्तरादेव तदुपपत्तौ किं मन:कल्पनयेति, मैवं, शोकहर्षादिकार्यजनकानां मनोद्रव्याणामेव कल्पनात्तत्र संज्ञामात्र एव परेषां विवादात्, इष्टानिष्टमनोद्रव्योपादाननियम एव कृत इति चेत्, अदृष्टवशादेवेति सर्वमवदातम्॥३५॥ स्वमविज्ञानेन मनसः प्राप्यकारित्वं सेत्स्यतीति निराकर्तुमाह मनसः प्राप्यकारित्वं,स्वप्नेनापि न सिद्धयति ॥ यदसौ न तथारूपो,व्यभिचारादिदर्शनात् ॥३६॥९४ ॥ 'मम मनो मेरौ गते' इति स्वप्नविज्ञानदर्शनान्न मनसा प्राप्यकारित्वं सिद्धथति तस्याप्रमाणत्वात्प्रबोधे तद्विपरीतदर्शनात, 363 Page #102 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना र्णव न प्रकरणम्॥ ॥४३॥ REGISTEREOS नचाशुगमनागमनशीलस्य मनसस्तदा तत: परावृत्या तद्विपरीतदर्शनमुपपत्स्यत इति वाच्यं, स्वप्नस्य प्रामाण्यानिश्चयेन तथा- 1 मतिनिरूकल्पनाघ्योगात्तेन शरीरस्यापि तत्प्राप्तिग्रहात, न च सापि सम्भवति, कुसुमपरिमलाबजनितश्रमाद्यनुग्रहोपघाताभावादिह स्थितैःपणे व्यञ्चनासप्तस्यात्रैव दर्शनाच,तदिदमाह-"सिमिणोणतहारूवा,वभिचाराओ अलायचक्कं वविभिचारोअसदसण-मुवघायाणुग्गहाभावा वग्रहप्रस्तावे॥२२४॥" [स्वप्नो न तथारूपो व्यभिचारादलातचक्रमिव ॥ व्यभिचारश्च स्वदर्शना-दुपघातानुग्रहाभावात्] "इह पासुत्तो पेच्छइ, | स्वमदृष्टांतेन सदेहमन्नत्थ णय तओ तत्थ॥णय तग्गयोबघाया-णुग्गहरूवं विबुद्धस्स ॥२२५॥ [इह प्रसुप्तः प्रेक्षते स्वदेहमन्यत्र न च सकस्तत्र ।। मनसःप्राप्यन च तद्गतोपघातानुग्रहरूपं विबुद्धस्य]॥३६॥ ननु प्रबुद्धस्य हर्षविषादोन्मादमाध्यस्थ्यदर्शनात् स्वप्नेऽपि जिनस्नात्र-तदपाय- कारित्वकामिनीकुचकलशसम्पर्कसंस्तारस्वरूपदर्शनाद्यर्थक्रियानुमानात् न तस्य व्यभिचारित्वं भविष्यतीत्यत आह व्यवस्थाहर्षादिकं ज्ञानफलं, स्वमे नैव क्रियाफलम् ॥ तत्सम्भवे बुभुक्षापि, क्षीयेतौदनदर्शनात् ॥३७॥९५॥ पयितुर्मत न खलु स्वमे जिनस्नात्रादिकरणादेव प्रबुद्धस्य हर्षादिप्रादुर्भावः केनापि स्वप्ने तत्क्रियाऽदर्शनार्तिक तु रागादिमहिम्ना खण्डनम्।। तदभिमानादेव, दृश्यते हि जाग्रतोऽपि दूराजरतीमपि मदिरोन्मादविघूर्णमाननयनां गतिविलासविडम्बितकलहंसगमनां ससम्भ्रमं निज जोत्क्षेपविहितपीवरकुचकलशानमनामादरेण तरुणीमिव पश्यतस्तरुणस्य हर्षोन्मादादिप्रादुर्भावस्तस्मादिष्टप्राप्त्यादेरिव तदभिमानस्यापि सुखादिहेतुत्वमास्थेय। अत एव रागसहकृतस्यैव तस्य तज्जनकत्वातद्विरहिणो मुनेः स्वमे कामिनीदर्शनादिनापि न हर्षाद्युदयोऽपि तु माध्यस्थ्यमेव, मोहहीनस्य स्वम एव न' इति तु न वक्तुं युक्तम्, मोहविगमाधीननिर्मोहत्वस्य दर्शनावरणोदयप्रसूतनिद्राद्यविरोधित्वात्, यदि तु स्वमेऽपि सुखादिकं क्रियाफलमिति क्रियैव स्यान्नान्यथा, तदा तदानीमोदनादिदर्शनाद् चुभु Page #103 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्षाविलयप्रसङ्गे बुभ्रुक्षाक्षामकुक्षेर्निद्रायामेव प्रवृत्तिः स्यान्न तु पाकादाविति विपरीतमेतद्, आह च - "दीसन्ति कासइ फुड, हरिसविसायादओ विबुद्धस्स || सिमिणाणुभूअसुह- दुक्ख - रागदे । साइलिंगा ॥ २२६॥”[दृश्यन्ते कस्यचित्स्फुटं हर्षविषादादयो विबुद्धस्य ।। स्वनानुभूतसुखदुःख - रागद्वेषादिलिङ्गानि ] "न सिमिणविन्नाणाओ, हरिसविसायादओ विरुज्झति । किरियाफलं तु तित्ती - मदवहबंधादओ णत्थि ॥ २२७॥ |” [न स्वमविज्ञानाद् हर्षविषादादयो विरुध्यन्ते ॥ क्रियाफलं तु तृप्तिमदवधबन्धादयो न सन्ति ] ननु कान्तादर्शनजन्ये सुखे तद्दर्शनमात्रं हेतुरस्तु, मोदकभक्षणादिजन्यं तु सुखं कथं स्वमे मोदकज्ञानमात्रादितिचेत, न, अनन्यगत्या स्वप्नजनितेष्टप्राप्त्यभिमानस्यापि विलक्षण सुखहेतुत्वस्वीकारात् प्रबुद्धस्य तु स्वमशुभत्वज्ञानस्य तथात्वादिति दिग् ॥ ननु स्वप्नेऽपि कामिनीसुरतादिक्रियाफलं व्यञ्जनविसर्गादि प्रबोधावस्थायामपि साक्षात् दृश्यत एव तत्कथं स्वप्ने क्रियाफलं नास्तीत्युच्यत इति चेत्, न, जाग्रतोऽपि तीव्रमोहाध्यवसायेन व्यञ्जनविसर्गदर्शनात्, स्वप्नेऽपि तस्य तद्धेतुकत्वेन क्रियाफलत्वासिद्धेः, अन्यथा स्वप्नविषयीकृतकामिनीनां गर्भाधानादिप्रसङ्गाद्, आहच - "सिमिणे वि सुरयसंगम-किरियासंजणि अर्वजण विसग्गो । । पडिबुद्धस्स वि कस्सइ, दीसह सिमिणाणुभ्रूअफलं ॥ २२८ ॥ | [ स्वप्नोऽपि सुरतसङ्गम - क्रियासञ्जनितव्यञ्जनविसर्गः ॥ प्रतिबुद्धस्यापि कस्यचित्, दृश्यते स्वप्नानुभूतफलं ] "सो अज्झवसा कओ, जागरओपि जह तिव्वमोहस्स || तिव्वज्झवसाणाओ, होइ विसग्गो तहा सुमिणे ॥२२९॥ [ सोऽध्यवसान कृतो जाग्रतोऽपि यथा तीव्रमोहस्य || तीव्राध्यवसानाद् भवति विसर्गस्तथा स्वप्ने] "सुरयपडिवत्तिरहसुह-गन्भाहाणाइ इहरहा होज्जा ॥ सुमिणसमागयजुवईए, ण य जओ ताई तो विफला ॥ २३० ॥” [सुरतप्रतिपत्तिरतिसुखगर्भाधानादीतरथा भवेत् ॥ स्वप्नसमागतयुवतेः न च यतस्तान्यतो विफला ] ननु व्यन्जनविसर्गस्य क्रियापूर्वकत्वदर्शनात्कथमध्यवसान मतिनिरूपणे व्यञ्जनावग्रह प्रस्तावे - स्वप्नदृष्टान्तेन मनसः प्राप्यकारित्व व्यवस्था पयितुर्मत खण्डनम् ॥ Page #104 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना र्णव प्रकरणम् ॥ ॥ ४४ ॥ % जन्यत्वमिति चेत्, न, तीव्रवेदाध्यवसायजन कबहु तरमनोद्रव्य प्रेरितजीवप्रयत्नादेव तदुपपतेर्दृष्टार्थस्य बाधितुमशक्यत्वात् ॥३७॥ ननु भाविराज्यादिस्वप्नस्य सत्यत्वदर्शनान्मनसो मेरुप्राप्तिस्वप्नोऽपि कथं न तथेत्यत आह स्वप्नोऽपि न मृषा कश्चि न तु सर्व इतिस्थितिः ॥ तेन न प्राप्यकारित्वं, मनसः स समर्थयेत् ॥३८॥९६॥ नहि भाविराज्यादि सूचक स्वप्नस्यार्थक्रियाकारित्वेन प्रामाण्यमिति मेरुगमनादिस्वप्नस्यापि तथात्वं स्यात् अर्थक्रियाकारित्वाभावेन तस्य स्फुटमेवाप्रामाण्यान ह्येकजातीयस्य कस्यचित्प्रामाण्ये सर्वस्य तथात्वं नाम, घटादिचाक्षुषस्य प्रामाण्ये रङ्गे रजत बुद्धेरपि तथात्वप्रसङ्गाद्, आह च - "नणु सिमिणओ वि कोइ, सच्चफलो फलइ जो जहादिहो । नणु सिमिम्मि णिसिद्धं, किरिया किरियाफलाई च ॥२३१॥" [ननु स्वप्नोऽपि कश्चित्सत्यफलः, फलति यो यथादृष्टः । ननु स्वप्ने निषिद्धं, क्रिया क्रियाफलानि च ] "जं पुण विन्नाणं, तप्फलं च सिमिणे विबुद्धमेत्तस्स ॥ सिमिणयणिमित्तभावं, फलं च तं को णिवारे ॥ २३२ ॥ |” [यत्पुनर्विज्ञानं, तत्फलं च स्वप्ने विबुद्धमात्रस्य । स्वप्ननिमित्तभावं, फलं च तत्को निवारयति ?] ननु स्वमः सर्वेऽप्यप्रमैव निद्रादोषजनितत्वाद्, भा विराज्य स्वप्नादीनां तु देहस्फुरणसहसोदितवद् भाव्यर्थानुमापकत्वादेव प्रामाण्यं तत्तच्छाखात्तथाविधव्याप्तिग्रहात्, तदुक्तम्" देहप्फुरणं सहसोइअं च, सिमिणो अ काइआईणि ॥ सगयाई निमित्चाई, सुभासुभफलं णिवेदंति || २३३ || "त्ति० [ देहस्फुरणं सहसोदितं च, स्वप्नश्च कायिकादीनि ॥ स्वगतानि निमित्तानि, शुभाशुभफलं निवेदयन्ति ] कथं कश्चिदेव स्वप्नः प्रमा नतु सर्व इत्यभिधीयत इति चेत्, न, 'आरोपे सति निमित्तानुसरणं नतु निमित्तमस्तीत्यारोप' इति न्यायेन क्वचिदेव कस्यचिद्दोषत्वकल्पनात्, न च तदिति स्थले इदमिति भानात्तस्याप्रमात्वं, स्मृतिप्रामाण्यव्यवस्थापितत्वात्, सर्वत्र स्वप्ने तथाभानाभावाद्, मतिनिरूपणे व्यञ्जनावग्रहप्रस्तावे - स्वप्रदष्टान्तेन मनसः प्रा प्यकारित्व व्यवस्था पयितुर्मत खण्डनम् ॥ ॥ ४४ ॥ Page #105 -------------------------------------------------------------------------- ________________ BRUARKARKECICK दृष्टार्थस्य कथं स्वप्ने भानमिति चेद् , एतन्महिम्नेति संक्षेपः॥ ३८॥ ननुस्त्यानर्द्धिनिद्रोदये द्विरदरदनोत्पाटनादिप्रवृत्तमनस: प्राप्यकारित्वव्यञ्जनावग्रही सेत्स्यत इत्यत आह-- स्त्यानधों श्रवणादीनां, व्यञ्जनावग्रहादयः॥ भवेयुन तु चित्तस्य, स्वप्नोऽयमिति जानतः॥३९॥९७॥ स्त्यानर्षिनिद्रोदये हि प्रेक्षणकरङ्गभूम्यादौ गीतादिकं भवतः योन्द्रियादीनामेवावग्रहो भवति, न तु नयनमनसो,तत्प्राप्यकारिताया युक्तिरिक्तत्वात्, नन्वेवं बाह्यन्द्रियव्यापारे प्रबुद्धस्य स्वप्नोऽयमिति ज्ञानं कथमिति चेत्, गाढनिद्रोदयपारवश्येन तथाभिमानाद्, आह च-"सिमिणमिव मन्नमाणस्स, थीणगिद्धिस्स वंजणोग्गहया । होज व ण उसा मणसो, सा खलु सोइंदिआईणं ॥ ॥ २३४ ॥" [स्वममिव मन्यमानस्य, स्त्यानगृद्धेळञ्जनावग्रहता । भवेद्वा न तु सा मनसः सा खलु श्रोत्रेन्द्रियादीनाम्] ननु निद्रोदये कथमीशी विशिष्टचेष्टेति चेत्, तदुदयसमये चक्रिबलार्द्धबलसम्पत्तेः ॥ श्रूयन्ते यत्रोदाहरणानि-ग्रामे वचन कोऽप्यासी-स्कौटुम्बिकशिरोमणिः॥ यस्य जिहवा पलपास-रसव्यसनतत्परा॥१॥ मांसानि खानिर्दोषाणां, यत्र यत्र स पश्यति ॥ और्वानल इवाम्भोधौ, चेतस्तत्रास्य धावति ॥२॥ एष धर्मेधसां दाहे, वन्यदावाग्निरन्यदा ॥ आनीयोपशमं वाग्भि-मेघधाराभिरञ्जसा ॥३॥ दुर्नीतिदलनान्वीक्षा, दीक्षां दत्त्वा महात्मभिः।।स्थविरैः स्थिरतां नीतो, जगद्गीतयशोभरैः ॥४॥ तेनान्यदा विहरता, ग्रामे वचन घातितः। सौनिकैर्महिषो दृष्टो, महिषध्वजमन्दिरे ॥५॥ अभिलाषस्तदा तस्य, तदीयामिषभक्षणे ॥ प्रावतत हहा कर्म-स्थितिर्हि दुरतिक्रमा ॥६॥न न्यवर्चत तस्यासौ, व्यासङ्गेऽपि क्रियान्तरे ॥ कान्तासगं विना याति, न नाम विरहज्वरः ॥७॥ तेनैव चाभिलाषेण, स्वापमाप दुराशयः ॥ तस्य तत्सहकारेण, स्त्यानर्द्धिरुदियाय च ॥८॥ महिषध्वजवत् मतिनिरूपणे व्यञ्जनावग्रह प्रस्तावे त्यानधिनिद्राप्रकारेण मनसः प्राप्यकारित्वव्यञ्जनावग्रहस्थापक्रमतखण्डनम् ॥ ASS Page #106 -------------------------------------------------------------------------- ________________ साविवरणं श्रीज्ञाना प्रकरणम् ॥ ४ ॥४५॥ क्रूर-स्ततश्चोत्थाय शक्तिमान्॥ महिषामिषपिण्डार्थी,ययौ महिषमण्डलम्॥९॥तत्र व्यापाद्य महिषं,मांसलंमांसलम्पटः।मांस भुक्त्वा न्यदानीय, चिक्षेपोपाश्रयोपरि ॥१०॥ पुनः सुष्वाप पापा स, प्रत्यूषे च प्रबुद्धवान् ॥ स्वप्नोऽयमिति विज्ञाय, तज्जगाद गुरोः पुरः॥११॥ उपाश्रयोपरि प्रैक्षि, साधुभिश्च तदा पलम् ।। पाटलं परिपाकेण, स्त्यानगृद्धिलताफलम् ॥१२॥ न्यवेदि तच्च गुरवेतेन लिङ्गेन तैस्तदा ॥ धूमेनाग्निरिवाज्ञायि, तस्य स्त्यानर्द्धिसम्भवः ॥१२॥ सङ्घन स द्रुतं लिङ्ग-मपहत्य विसर्जितः ॥ भस्मच्छन्नोऽपि नैवाग्निः, स्थाप्यते केलिवेश्मनि ॥१४॥ इति स्त्यानर्युदये प्रथमं मांसोदाहरणम्।। अथ द्वितीयं मोदकोदाहरणमुच्यते-भिक्षार्थ पर्यटन प्रामे, कोऽपि साधुळलोकत ।। भाजने स्थापितान् दिव्यान्, मोदकान् मन्दिरे क्वचित् ॥ १॥ सुरभिस्निग्धमधुरा-नुग्रीव तानिमालयन् ॥ स पाप नहि साधनां, याञ्चापूर्वः प्रतिग्रहः ॥२॥ विच्छेदं न जगामास्याभिलाषस्तु तदाश्रयः ॥ अविच्छेदेन सुप्तस्य, स्त्यानद्धिरुदियाय च ॥ ३ ॥ रजन्यां तद्गृहं गत्ला, महाद्विप इवाऽथ सः।। अभाक्षीत्तकपाटानि, वृक्षाणीव मदोद्धतः ॥४॥ गत्वान्तः कवलीकृत्य, स्वैरं मोदकमण्डली ॥ शेषं पतद्ग्रहे क्षिप्त्वो-पाश्रवं तूर्णमाययौ ॥५॥ स्थाने निधाय सुष्वाप, तं पतद्ग्रहकं पुनः ॥ स्वप्नं ज्ञात्वा बभाषेऽथ, प्रबुद्धस्स गुरोः पुरः॥६॥ भाजनप्रत्युपेक्षायाः, समये तत्प्रतिलेखने ।। ददृशे मोदकश्रेणी,स्त्यानद्धिरिव पिण्डिता।।७।गुर्वादिभिस्ततो ज्ञात्वा,तस्य स्त्यानर्द्धिदुष्टताम् ॥लिङ्गं पाराश्चि-| के दवा, तथैवायं विसर्जितः ॥८॥ उक्तं द्वितीयम्।। अथ तृतीयं दन्तोदाहरणमुच्यते॥एकः साधुर्दिवा कश्चित, खदितः करिणारिणा, प्रचण्डकरदण्डेन, नीरदेनेव गर्जता ॥१॥ पलाय स ततः कष्टा-न्मृगो दावानलादिव।। क्रोधोद्धरमनास्तूर्ण-मुपाश्र- | यमुपाययौ ॥ २ ॥ ज्वलतैव स कोपेन, रात्री स्वापमवीभजत् ॥ तदा सहचरीवास्य, स्त्यानगृद्धिरुपाययौ ॥३॥ REMECORDS मतिनिरूपणे व्यञ्जनावग्र हप्रस्तावे मनसः प्राप्यकारित्वारेकायां दशितानिस्त्यानmदाहरणागि। wwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwww ॥ Page #107 -------------------------------------------------------------------------- ________________ SA AWARE केशवाईबलेनाथ, मन्यमानस्तृणं जगत् ॥ भक्त्वा पुरकपाटानि, पर्पटानीव तत्क्षणात् ॥४॥ गत्वा च हस्तिनः स्थान, मतिनिरूपणे केसरीव स हस्तिनम् ॥ व्यापाद्य दन्तमुशल-द्वयं जग्राह शक्तिमान् ॥ ५ ॥ क्रोधाग्निमपनीयाऽथ, द्विपवरनिवारणात ॥ व्यञ्जनावप्रआगत्योपाश्रयद्वारि, क्षिप्त्वा तत् स्वपिति स्म च ॥ ६ ॥ उज्ज्वलं रुधिराद्र त-दन्तिनो दशनद्वयम् ॥ सपल्लवकषायद्र-शा- हप्रस्तावे खाद्वयमिवाबभौ ॥ ७ ॥ प्रबुद्धः स तथारूपं, स्वयं स्वप्नममन्यत ॥ स्त्यानर्दोर्जेम्मितं चास्य, साधवो विविदुः क्षणात ॥८॥ न मनसः प्राहि स्त्यानपिाथोधि-तरङ्गप्रसरं विना।।डिण्डीरपिण्डसङ्काश-दन्तिदन्तग्रहो भवेत् ॥९॥स्त्यानधैरुदयाद्ग्रस्त-गुणमेनमवेत्य च॥ | प्यकारित्वाविससर्ज द्रुतं सङ्घो, लिङ्गमादाय धर्मधीः ॥ १० ॥ उक्तं तृतीयम् ॥ अथ चतुर्थ कुम्भकारोदाहरणमुच्यते-कश्चिदेकरकायां स्त्याकुम्भकारो, गच्छे स्वच्छतरे गुणैः ।। प्रव्रज्यां खलु जग्राह, कुतश्चिदपि कारणात् ॥१॥अन्यदा च प्रसुप्तं तं, स्त्यानर्द्धिरुपतस्थुषी।। नयुदाहरपूर्वाभ्यासं ततोऽस्मान्मृत्पिण्डत्रोटनश्रमम्॥२॥ ततस्तदेकव्यापार-चिन्तासन्तापतापितः॥ शिरांस्यभांक्षीत्साधूनां, मृतपिण्डानिव णानि ॥ दुष्टधीः॥शातद्रक्तरक्तधाराभि-धौते(पापो)ऽप्येतस्य चेतसि।।अवर्द्धताहो नितरां,सर्वतः पङ्कसङ्करः ॥४॥ साधवोऽपसताः कोचत, पाप्मनोऽस्मारतो भियानिहि ज्वलति दावाग्नी, वने स्थातुं किलोचिती ॥५॥ उदेक्षन्त च ते प्रातः, पाप्मनोऽस्य विजम्भितम् ।। सर्वतः पृथिवीं दृष्ट्वा, मुण्डमण्डलमण्डिताम् ॥६|| स्मशानवेश्मार्चनतो, नराणां मुण्डमण्डलैः॥ स्मशानवास एवास्य, श्रेयानिति विचिन्त्य तम् ॥७॥ सङ्घः सद्धर्मनिरत-श्वकर्षांपाश्रयाद्वहिः ॥ दूषणस्य फलं मुख्य-माश्रयभ्रंश एव हि।।८॥ उक्तं चतुर्थम्॥ अथ वटशाखाभञ्जनोदाहरणं पञ्चममुच्यते-साधुामान्तरात्कश्चि-द्भिक्षा लात्वान्यवर्तत।। तापेनाभिहतश्चैष, क्षुत्ङ्मयां बाधितस्तराम् ॥ १॥ छायां तां सेवितुं स्निग्धां, शीतला वटभूरुहः॥ कामोपतापहतये, कामिनीमिव कामुकः ।।२।। आगच्छन् SAHARSANSARE Page #108 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरण श्रीज्ञाना र्णव प्रकरणम्॥ ॥४६॥ RKKKRSS शाखया नीचै-रुपतापातिविह्वलः।। अपराद्धो हियेवासी, खेदं मेदस्विनं दधौ॥शाअविच्छिन्नेन कोपेन, ततो गत्वा प्रतिश्रयम्।। मतिनिरूक्रमेणावश्यकीः कृत्वा, क्रियाः सुष्वाप पापधीः ॥४॥ रजन्यां महतीं शक्ति, स्त्यानविभ्रदुचकैः ॥ अभाङ्क्षीद् बटशाखा तां, | पणे व्यजसह धर्मशाखया ॥५॥ तामानीयाश्रयद्वारि, क्षिप्त्वाऽशेत पुनर्भशम् ॥ बुद्धः स्वप्नाभिमानी च, जगौ सर्व गुरोः पुरः ॥६॥ नावग्रहद्वारि तां महतीं शाखां, स्त्यानर्द्धिमिव रूपिणीम ॥ अवेक्ष्य लिङ्गमादाय, गुरुणा स विसर्जितः ॥७॥ उक्तं पञ्चमम्।। तदेव प्रस्तावे *पतान्युदाहरणान्यन्यत्र सझेपत एवम्प्रदर्शितानि मनसः प्रा[२] पकः कौटुम्बिको ग्रामे, मांसमेवात्यनेकधा ॥ श्रुत्वा धर्म स केषाश्चित्, समीपे व्रतमग्रहीत ॥ १॥ विचरंश्च प्यकारिवाक्वचिद्ग्रामे, महिर्ष पिशितार्थिभिः॥ विभिचमानमत्राक्षीत्ततोऽभूत्तत्र सस्पृहः ॥ २॥ सोऽन्युच्छिन्नतदाकांक्षोऽभुक्तो यातो बहि सरकायां स्त्याभुवम् ॥ सूत्रस्य पौरुपी चान्स्यां, चके सुप्तस्तथा निशि ॥३॥ जातस्त्यानधिरेषोऽथ, गत्वा महिषमण्डलम् ॥ हत्येकं भुक्तवान्, शेष- नयुदाहमेत्य शालो मात्रयस्योपरि ग्यधात्॥४॥हनष्टः प्रगे स्वप्न, इत्यालोचितवान्गुरोः ॥ दिशो विलोकने तच्च, मुनिमि- रणानि ॥ मौसमीक्षितम् ॥५॥ सोऽथ स्त्यानधिमान् ज्ञात्वा, लिङ्गपाराश्चिकः कृतः ॥ इति प्रथमम् [२] साधुभिक्षांभ्रमन्कोऽपि, मोदकान्वीक्ष्य कुत्रचित् ॥६॥ घिरमैक्षिष्ट गृखस्तानलभषाऽशेत तन्मनाः ॥ जातस्त्यानधिकत्थाय, गत्वा तद्भवनं निशि ॥७॥ भित्त्या कपाटमत्तिस्म, मोदकानुद्धृतानथ ॥ पात्रे कृत्वाचये प्राप्तः, प्रातः स्वप्नं न्यवेदयत् ॥ ८ ॥ दृष्टाः पादोनपौरुभ्यां, ते पात्रप्रतिलेखने ॥ लिङ्गपाराञ्चिकः सोऽपि, ततो गुरुभिरादधे ॥९॥ इति द्वितीयम् ॥[३] एकः साधुर्गती भिक्षा त्रासितः करिणा ततः। पलायितः कथमपि, तस्मिन् रुष्टश्च सुप्तवान्॥१०॥जातस्त्यानधिकत्थाय गत्वा व्यापाच त गजम् ॥ आनीय इन्तमुशले, विन्यस्योपाश्रयोपरि ॥११॥ पुनः सुप्तः प्रगे स्वप्नं,व्याचक्रेऽथ तपोधनैः। दृष्ट्वा दन्तान्स विज्ञातो,लिङ्गपाराञ्चिकः कृतः ॥१२॥ इतितृतीयम् [0] गच्छे महति कस्मिचित्,प्रावामीत्कुम्भकारकासुप्तः स्थानधिभायात्रौ, मृत्तिकाभ्यासतस्ततः।।१३ ॥समीपस्थितसाधूनां, छेदं छेदं शिरां ॥४६॥ WEBSIKSE Page #109 -------------------------------------------------------------------------- ________________ K ERSANECTED मेतानि दर्शितानि स्त्यानध्युदये पश्चापि समयप्रसिद्धान्याहरणानि ॥ आहच-"पोग्गलमोअगदन्ते, फरुसगवडसालभञ्जणेचेव। थीणद्धिअस्स एए, आहरणा होन्ति णायव्वा ॥२३५॥" [पुद्गलमोदकदन्ताः कुलालवटशालभञ्जने चैव ॥ स्त्यानधैरेतान्युदाहरणानि भवन्ति ज्ञातव्यानि]||वदेवं जागरे स्वप्ने स्त्यानौं वा मनसःप्राप्यकारिता निषिद्धा,अमुकत्र मे गतं मन इति प्रयोगस्त्वन्यार्थकत्वेन समर्थितो,वस्तुतस्त्वयं प्रयोगो भ्रान्तिमूलक एव, चक्षुर्मे चन्द्रं गतमिति प्रयोगवत, नहि सर्वे लौकिकप्रयोगाः सत्या एव, आह च-"जह देहत्थं चक्, जंपइ चंदं गयंति णय सच्च।।रुढं मणसो वितहा,ण य रूढी सच्चिआ सव्वा॥२३६॥"[यथादेहस्थं चक्षुर्यत्प्रति चन्द्रं गतमिति न च सत्यम् ॥ रूढं मनसापि तथा, न च रूढिः सत्या सर्वा] ॥ तदेवं व्यवस्थापिते मनसोऽ प्राप्यकारित्वे पुनः परकृतामाशङ्कां परिहरति॥[*प्रतावत्र सवृत्तिषट्पञ्चाशद्गाथायुतानि दश पत्राणि गतानीति लिखितमितियोजतम्] सर्वासर्वग्रहापत्ति-ने चित्तेमाप्यकारिण॥ दृष्टस्यानुपपत्ती, यददृष्टं [परिकल्प्यते ॥४०॥९८॥ अप्राप्यकारिणि अप्राप्यकारितया सैद्धान्तिकाभ्युपगते चित्ते मनसि, प्रतिबन्दी गृह्णता परेणोद्भाविता सर्वासर्वग्रहा५ पत्तिः यदि विषयमप्राप्यैव मनो गृह्णीयादप्राप्तत्वाविशेषात्सर्वस्य ग्रहणं स्यात, अप्राप्तत्वाविशेषेऽपि यदि कस्यचिदर्थस्याग्रहणं स्यधीः ॥ एकान्ते न्यक्षिपत्तानि शीर्षाणि च वपूंषि च ॥१॥ शेषा अपमृता भूयः, सुप्तः स्वप्नं प्रगेऽवदत् ।। मृतान्वीक्ष्याथ साधून्स लिङ्गपाराञ्चिकः कृतः॥१५॥ इतिचतुर्थम् ॥ [4] बटस्याऽधोऽध्वना कधि-शिक्षाचर्यागतो मुनिः॥भृतपात्रो वलन्वेगात् , क्षुत्तडग्रीष्मार्कतापितः ॥ १६॥ तच्छाखायामास्फलितो, सहस्तस्यामसौ निशि ॥ स्त्यानर्युदयतो गत्वा, भक्त्वा शाखां समागतः ॥१७॥ विन्यस्योपायबारे सुप्तः स्वप्नं न्यवेदयत् ।। प्रातः स्त्यानधिमान् ज्ञात्वा लिङ्गपाराश्चिकः कृतः ॥१८॥ इतिपश्चमम् ॥ केऽप्याहुः प्राग बनेभोऽभूत,सोऽथ स्त्यानधिमानरः ॥ सम्जातप्राग्भवाभ्यासाद्, बटशाखां ततोऽभनक् ॥ १९ ॥ इति ॥ KAKKASASHASHRSHRECREASON (योजितः पाठः) मतिनिरूपये व्यञ्जनावग्रहप्रस्तावे मनसः प्राप्यकारित्वस्थापनाब परसतारेकायाः परि हारः॥ Page #110 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं भीज्ञाना र्णव प्रकरणम् ॥ ॥ ४७ ॥ तदा तथैवापरस्याप्यग्रहणमिति, सर्वाग्रहणं वा स्यादित्येवंरूपा, न, यद् यस्मात्कारणात्, दृष्टस्यप्रतिनियतार्थग्रहणस्यानुपपत्तौ सत्यां तदुपपत्तये, अदृष्टं तत्कारणतया क्षयोपशमविशेषाख्यं, परिकल्प्यते, न चैवं प्राप्यकारित्वपक्षेऽप्येवमस्त्वितिवाच्यम्, अनेकप्राप्तिकल्पनेऽपि क्षयोपशम विशेषस्य तत्कारणतयाऽवश्यं कल्पनीयत्वेनिष्फलस्य गौरवस्यतत्कल्पनापरिपन्थिनः सद्भावाद्, अप्राप्यकारित्वे तु प्राप्तकल्पनाल्लाघवस्यानुकूलत्वादिति बोध्यम् ||४०|| मनसो विषयप्राप्त्यभावेऽपि कदाग्रहावेशाद्व्यञ्जनावग्रहं प्रतिपादयन्पर आह“ विसयमसंपत्तस्स वि, संविज्जह वंजणोग्गहो मणसो ॥ जमसंखेज्ज समइओ, उवओगो जं च सव्वेसु ॥ २३७॥ समएस मणोदव्वाई, गिण्हए वंजणं च दव्वाई ॥ भणियं संबंधो वा तेण तयं जुज्जए मणसो ॥ २३८ ॥ " व्याख्या - मेर्वादिविषयमप्राप्य गृह्णतोऽपि मनसो व्यञ्जनावग्रहो युज्यते, यस्मात् 'च्यवमानो न जानाति' इत्यादिवचनात्सर्वोऽपि छद्मस्थोपयोगोऽसङ्ख्येयसमयो निर्दिष्टः समये, न त्वेकद्वयादिसमयकः, यस्माच्च तेषूपयोगसम्बन्धिष्वसङ्ख्येय समयेषु सर्वेष्वपि प्रत्येकमनन्तानि मनोद्रव्याणि मनोवगणाभ्यो गृह्णाति जीवः, द्रव्याणि च तत्सम्बन्धो वा प्रागत्रैव भवद्भिर्व्यञ्जनमुक्तं, तेन तत् द्रव्यं तत्सम्बन्धो वा व्यन्जनावग्रहो मनसो युज्यते । श्रोत्रादेरप्यसङ्ख्येयसमयगृह्यमाणशब्दादिपरिणतद्रव्याणि न्धो वा व्यञ्जनावग्रहः, स मनसोऽषि समान इति तथा किं नेष्यत इति पराभिप्रायः ।। २३७ - २३८ ।। तत्सम्ब विषयाप्राप्तावपि मनसो व्यञ्जनावग्रहमवस्थाप्येदानीं तत्प्राप्त्या तं समर्थयन्नाह देहादणिग्गस्स वि, सकायहिययाइयं विचिंतयओ ॥ नेयस्स वि संबंधे, वंजणमेयं पि से जुतं ॥ २३९ ॥ व्याख्या - देहादनिर्गतस्यापि तत एव मेर्वाद्यर्थमगतस्यापि स्वकायहृदयादिकमतिसािन्नहितत्वात्सम्बद्धं चिन्तयतो मनसो ( योजित: पाठ: ) मतिनिरूपणे व्यञ्जनाव ग्रहप्रस्तावे मनसोऽ प्रा प्यकारित्वे सिद्धेऽपि व्य अनावग्रह स्वस्थाप नायाभिनिबेशिशङ्का प्रदर्शनम् ॥ ॥ ४७ ॥ Page #111 -------------------------------------------------------------------------- ________________ AKKACCORRECECONDS ज्ञेयेन स्वकायस्थितहृदयादिना सम्बन्धेऽपि तस्य मनसो व्यञ्जनावग्रहो युक्त उक्तप्रकारेणेत्यर्थः ॥ २३९ ॥ उक्तप्रकाराभ्यां परेण मनसो व्यञ्जनावग्रहे समर्थिते तत्र प्रथमपक्षे प्रतिविधानमाचार्य आहगिझस्स बंजणाणं, जं गहणं वंजणोग्गहो स मओ ॥ गहणं मणो न गिज्झं, को भागो वंजणे तस्स ॥२४॥ व्याख्या-स्वपक्षपरपक्षरागद्वेषग्रहाविष्टचित्तेन परेण 'विसयमसंपत्स्स वि' इत्यादि यदुक्तं तदसम्बद्धमेव, यतः श्रोत्रादीन्द्रियचतुष्टयग्राह्यस्य शब्दादेस्सम्बन्धिनां व्यञ्जनानां तद्पपरिणतद्रव्याणां यदुपादानलक्षणं ग्रहणं स व्यञ्जनावग्रहोऽस्माकं सम्मत इति परो जानात्येव, एवञ्च चिन्ताद्रव्यरूपं मनो यदि ग्राह्यं स्यात्स्यात्तदा तद्व्यञ्जनं मनसो न त्वेवं, किन्तु अर्थपरिच्छेदकरणस्वरूप ग्रहणं मनो न ग्राह्यं, अतः को भागः कोऽवसरस्तस्य करणभृतस्य मनोद्रव्यराशेर्व्यञ्जनावग्रहेऽधिकृते, न कोऽपीत्यर्थः ॥२४०॥'देहादणिग्गयस्स वि ' इत्यादिना मनसो व्यञ्जनावग्रहप्रसाधनायोक्तो द्वितीयपक्षोऽपि न सङ्गतः, स्वस्य स्वदेशेन सम्बन्धसर्वस्यापि, स्वदेशेन सहासम्बन्धे वस्तुनोऽसत्त्वमापद्येत, न च तावन्मात्रेण मनःप्राप्यकार्युपगन्तुं शक्यम, तथा सति ज्ञानमात्रस्य स्वदेशात्मसम्बद्धस्य प्राप्यकारिता प्रसज्येत, तस्मात्स्वदेशं, परित्यज्य बाह्यार्थापेक्षयैव प्राप्यकारित्वाप्राप्यकारित्वचिन्ता फलवती, बाह्यार्थश्च मनसाप्राप्त एव गृह्यत इति तस्याप्राप्यकारित्वनियमे न व्यभिचारः, मनसः स्वकीयहृदयादिचिन्तायां प्राप्यकारित्वाभ्युपगमेऽपि वा न व्यञ्जनावग्रहसम्भव इति दर्शयनाहतइसचिन्तणे होज, वंजणं जइ तओन समयम्मि । पढमे चेव तमत्थं, गेण्हेव न वंजणं तम्हा ॥२४१॥ व्या० स्वकीयहृदयादिदेशचिन्तने सति भवेन्मनसो व्यञ्जनावग्रहः यदि प्रथमसमय एव तं स्वकीयहृदयादिकमर्थ न (योजितः पाठः) मतिनिरूपणे व्यञ्जनावग्रहप्रस्तावे मनसोप्राप्यकारित्वेसिद्धेप्यभि निवेशतो व्यजनावग्रमहत्वस्थापनादय परकतारेकायाः परिहरणम् ॥ Page #112 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना-16 ISGARIES व प्रकरणम् ॥ ॥४८ गृह्णीयात्, न चैवम्, यतो मनसः प्रथमसमय एवार्थावग्रहो जायते न तु श्रोत्रादीन्द्रियस्येव प्रथमं व्यञ्जनावग्रहः, क्षयोपशमापाटवेन श्रोत्रादीन्द्रियस्य प्रथमं नार्थोपलन्धिरिति युज्यते तस्य व्यञ्जनावग्रहः, चक्षुरिन्द्रियस्येव पटुक्षयोपशमत्वान्मनसोऑनुपलब्धकालाभावेन प्रथममर्थावग्रह एव जायत इति न व्यञ्जनावग्रहस्यावसरः, अत्र चानुमानप्रकार इत्थम्, इह यस्य ज्ञेयसम्बन्धे सत्यप्यनुपलब्धिकालो नास्ति न तस्य व्यञ्जनावग्रहः, यथा चक्षुषस्तथा मनसः, तस्मान तस्य व्यजनावग्रहः, व्यतिरेके तु श्रोत्रादिदृष्टान्तस्तस्य ज्ञेयसम्बन्धेर्थानुपलम्भकालसम्भवाद, तत्र व्यञ्जनावग्रहाभ्युपगमः, एवञ्च परोक्तपक्षद्वयस्याप्यघटमानत्वान्मनसो व्यञ्जनावग्रहासम्भवमुपसंहरति । 'न बंजणं तम्हचि, ' तस्मादुक्तप्रकारेण मनसो न व्यञ्जनावग्रहः ॥२४१॥ प्रथमसमय एव मनसोऽर्थग्रहणम्भवतीत्यत्रोपपत्तिमुपदर्शयनिसमए समए गिण्हइ, दव्वाइं जेण मुणइ य तमत्थं ॥जं चिंदिओवओगे वि, वंजणाऽवग्गहेतीते ॥२४२॥ होइ मणोवावारो, पढमाओ चेव तेण समयाओ॥ होइ तदत्यग्गहणं, तदण्णहा न प्पवत्तेजा ॥२४३॥ ____ व्याख्या-येन कारणेन कस्यचिदर्थस्य चिन्तावसरे प्रतिसमयं मनोद्रव्याणि गृहाति मनोद्रव्यग्रहणशक्तिसम्पनो जीवः चिन्तनीयञ्च तथा जानाति, एतत्प्रथमगाथापूर्वार्थेन सह द्वितीयगाथाद्वितीयतृतीयचरणार्थी सम्बन्धनीयौ । ततश्च तेन कारणेन प्रथमसमयादेव भवति चिन्तनीयार्थस्य ब्रहणमित्यर्थः।अर्थानुपलब्धिकालस्त्वेकोऽपि समयो नास्ति, कुन तस्य व्यञ्जनावग्रहइति भावः । नन्विन्द्रियव्यापाररहितस्य जीवस्य मनोमात्रेणैवार्थान्पर्यालोचयतो मा भवतु मनसो व्यञ्जनावग्रहः श्रोत्रादीन्द्रियेणार्थान् गृहतस्तु जीवस्य मनोऽपि तत्र व्यापिपर्तीति तत्र प्रथममनुपलब्धिकालसम्मवाद् व्यजनावग्रहः किन स्यादित्यत आह, (योजितः पाठः) मतिनिरूपणे व्यअनाव| ग्रहप्रस्तावे पटुक्षयोपश| मत्वाच्चक्षुष इव मनसा प्रथमत एवा थग्राहकत्वेन व्य नावग्रहाभाव एवेति | प्रदर्शनम्॥ ॥४८॥ RSAs Page #113 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Annuamane.winnar RAMREKACICICIRC 'जं चिंदिओवओगे वि' इत्यादि, यस्मात् श्रोत्रादेः शब्दाद्यर्थग्रहणलक्षणोपयोगकालेऽपि व्यञ्जनावग्रहेऽतीते सति मनसो व्यापारो || (योजितः भवति,यथा केवलेन मनसायचिन्तनेविग्रहादारभ्यैव मनोव्यापारस्तथा श्रोत्रादीन्द्रियेण सहापि तस्य व्यापारोावग्रहादारभ्यैव पाठः) न तु व्यजनावग्रहसमय इति न मनसस्तत्रापि व्यञ्जनावग्रहः । तत्र मनसो व्यञ्जनावग्रहे व्यापाराभ्युपगमे स व्यञ्जनावग्रहो मतिनिरूपमनसोऽपीति मतेरष्टाविंशतिभेदभिन्नता न स्यात्, तस्मात्प्रथमसमयादेव तस्यार्थग्रहणमभ्युपगन्तव्यम् । एवमनभ्युपगमे दण्डमाह-* णे व्यञ्जना'तदण्णहा न पवत्तेजत्ति, यदि प्रथमसमयादेव मनसोर्थग्रहणं नेष्यते तदा तस्य मनस्त्वेन प्रवृत्तिरेव न स्यादनुत्पत्तिरेव स्यादि वग्रहप्रस्तावे त्यर्थः, यथा भाषाऽवध्यादीनां भाषमाणावबुद्धथमानलक्षणान्वर्थमुपादायैव प्रवृत्तिस्तथा प्रथमसमयादारभ्य मननलक्षणान्वर्थ मनसोप्रामुपादायैव मनस्त्वेन मनसः प्रवृत्तिः, अन्यथा नस्यादेव मनोऽवध्यादिवत्, तस्मादर्थानुपलब्धिसमयाभावान्न तस्य व्यञ्जनावग्रहः, प्यकारित्वं श्रोत्रादीन्द्रियव्यापारकाले व्यञ्जनेऽतीत एव मनसो व्यापार इत्यत्राऽऽगमस्यापि संवादः। तदुक्तं कल्पभाष्य-"अत्थाणं | मनः शब्दातरचारी, चित्तं निययं तिकालविसयंति ॥ अत्थे उ पडुप्पन्ने, विणिओगं इंदियं लहइ ॥१॥" अर्थे-शब्दादौ श्रोत्रादीन्द्रियव्यञ्जना- न्वर्थनिरूवग्रहण गृहीतेऽनन्तरमर्थावग्रहादारभ्य चरति प्रवर्तते इत्यर्थानन्तरचारि मनः, न तु व्यञ्जनावग्रहकाले तस्य प्रवृत्तिरिति भावा, पणेनागम"त्रिकालविषयं चित्तं,साम्प्रतकालविषयं त्विन्द्रियम्" ॥ २४२-२४३ ॥ मनसोऑनुपलब्धिकालासम्भव सयुक्तिकं भावयन्नाह- | संवादेनच नेयाउ चिय जं सो, लहइ सरूवं पईवसद्दव्व ॥ तेणाजुत्तं तस्सा-संकप्पियव्वंजणग्गहणं ॥२४४॥ १४ निष्टङ्कितम॥ व्याख्या-यस्माज्ञयादेव चिन्तनीयवस्तुन एव मनः स्वरूपं लभते नान्यतः, तस्माद्यदि प्रथमसमयमेव तज्ज्ञेयं नावगच्छेत् तर्हि ततो ज्ञेयादुत्पत्तिरप्यस्य न स्यात्, मनुते मन्यते वा मन इत्येवं सान्वर्थक्रियावाचकशब्दाभिधेयस्य मनसः, प्रदीपयतीति Page #114 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं भीज्ञाना र्णव प्रकरणम्॥ ॥४९॥ RAKAKAR प्रदीपा, शब्दयति भाषत इति शब्दः, दहतीति दहनः, तपतीति तपनः इत्येवं सान्वर्थक्रियावाचकशब्दाभिधेयप्रदीपादेः प्रदी-||मतिनिरू. पनादिलक्षणार्थक्रियां कुर्वत एवात्मलाभो नान्यथा, तद्वन्मननादिक्रियां कुर्वत एवात्मलाभः, यथा च प्रदीपस्याप्रदीपनं भाषा- पणे व्यञ्चनायाश्चाशब्दनमयुक्तं तथा मनसोऽप्यमननमयुक्तं, तेन कारणेन असङ्कल्पितशब्दादिविषयभावपरिगतद्रव्यलक्षणव्यञ्जनग्रहणं ४ वग्रहप्रस्तावे. मनसोऽयुक्तम्, किन्तु सङ्कल्पितानामेवार्थावग्रहद्वारेणावगतानामेव शन्दादिद्रव्याणां ग्रहणं युक्तम्,अतोऽर्थानुपलब्धिकालासम्भ- चक्षुर्मनसोरवान मनसो व्यञ्जनावग्रहसम्भव इति ।। २४४॥ प्राप्यकारि-.. । उक्तरीत्या नयनमनसोरणाप्यकारित्वे विस्तरेण प्रसाधितेऽपि नयनस्याप्राप्यकारित्वे दुषणम्पश्यन्पर आह स्वेव्यवस्था| जइ नयणिन्दियमपत्त-कारि सव्वं न गिण्हए कम्हा? ॥गहणागहणं किं कय-मपत्तविसयत्तसामन्ने ॥२४५॥ | फ्तेिपिमनो.. व्याख्या-यदि नयनेन्द्रियमप्राप्तकारि, तर्हि सर्वमपि त्रिभुवनान्तर्वति वस्तुनिकुरम्बं कस्मान्न गृह्णाति, अप्राप्तत्वस्य दृष्टान्तेनचसन्निहित इवान्यत्राप्यविशिष्टत्वात्, अप्राप्तविषयत्वसामान्ये सति कस्यचिद्वस्तुनो ग्रहणं कस्यचिद्वस्तुनोऽग्रहणमित्येवं ग्रहणा- क्षुषोपिविष- - ग्रहणं किं कृतं स्यात्, प्राप्यकारित्वे तु येन सह सम्बन्धस्तस्य ग्रहणं येन च तदभावस्तस्याग्रहणामित्युपपद्यत इति ॥२४५॥ यमानाभावा ___तस्मादप्राप्यकारित्वपक्षे चक्षुषो विषयपरिमाणनियमाभाव आपद्यत इत्याह [॥२४६॥ | पत्तिरितिपविसयपरिमाणमनियय-मपत्तविसयंति तस्स मणसोच। मणसोवि विसयनियमो,न कमइ जओ स सव्वत्थ ६ रोक्तदोषदर्श व्याख्या-तस्य चक्षुषोऽपरिमितं विषयपरिमाणं प्राप्नोति, अस्या प्रतिज्ञायां हेतुमाह,अप्राप्तविषयमिति कृत्वा, मनस इवेति नम् ।। दृष्टान्तः, अत्रानुमानप्रयोग इत्थम्, यदप्राप्तमपि विषयं परिच्छिनत्ति, न तस्य तत्परिमाणं युक्तम्, यथा मनसः, अप्राप्तञ्च ॥४९॥ RECE Page #115 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ce KिARKELKARA विषयमवगच्छति चक्षुः, तस्मान तस्य तत्परिमाणं युक्तमिति । अत्र प्रतिज्ञाहेत्वोरनुपदर्शनश्चावयवत्रयवादिनो मीमांसका- (योजितः दयोऽप्यत्र चक्षषः प्राप्यकारित्वमभ्युपगच्छन्तो वादितां बिभ्रतीत्यभिप्रायेण, यदि नैयायिकोऽत्र वादी भवेत्तदा चक्षुर्न नियत पाठः) विषयपरिमाणं स्यादिति प्रतिज्ञा, अप्राप्तविषयपरिच्छेदकत्वादिति हेतुश्चोपदर्शनीयौ, अप्राप्तविषयपरिच्छेदकत्वलक्षणहेतुमतोऽपि मतिनिरूपणे मनसो नियतविषयपरिमाणत्वेन तदभावलक्षणसाध्यवैकल्यादुक्तानुमाने मनसो दृष्टान्तता न सम्भवतीति सूरिक्त्तरयति-मनसो व्यञ्जनावदृष्टान्तीकृतस्याप्राप्तकारिणो विषयनियमोऽस्त्येव, यतस्तदपि मनः सर्वेष्वर्थेषु न कामति न प्रसरतीति ॥२४६॥ एतदेवोपदर्शयति है ग्रहप्रस्तावेअत्थगहणेसु मुझइ, संतेसु वि केवलाइगम्मेसु ॥तं किं कयमग्गहणं, अपत्तकारित्तसामन्ने ॥ २४७॥ चक्षुषोप्राप्यव्याख्या-अर्था एव मतेर्दुष्प्रवेश्यत्वाद् गहनानि अर्थगहनानि,वेष्वनन्तेषु,सत्स्वपि विद्यमानेष्वपि,केवलज्ञानावध्याऽऽगमादि १५कारित्वे परोगम्येषु कस्यचिन्मन्दमतेर्मनो मुह्यति कुण्ठीभवति,तान्सतोऽप्यर्थान् न गृह्णातीति तात्पर्यम् , तदेतदर्थानां मनसोऽग्रहणं किं कृतम् , रक्तदूषणान्तः | अप्राप्तकारित्वसामान्ये तुल्येऽपि,इति परम्प्रति सूरेः पृच्छा, तस्मात्साध्यविकलो दृष्टान्त इति ॥२४७॥ अप्राप्तत्वाविशेषेऽपि यत भापतिमनोएव कारणाद्विषयपरिमाणनियमं मनसि परो यातत एव चक्षुष्यपि विषयपरिमाणनियमस्सूपपाद इत्याशयवान् सरिराह ५ दृष्टान्तेऽपि कम्मोदयओ व सहा-वओ व नणु लोयणे वि तं तुल्लं ।।तुल्लो व उवालंभो, एसो संपत्तविसए वि ॥२४८॥ | विषयनियम_ व्याख्या-यत्केषाश्चिदर्थानां मनसोऽग्रहणं तत् तदावरणकर्मोदयाद्वा, स्वभावाद्वा, इति परो यात् , नन्वेतल्लोचनेऽपि सद्भावेनासतुल्यम् , यतस्तदप्यत्राप्यकारित्वे तुल्येऽपि कर्मोदयात् , तत्स्वाभाव्याद्वा कांश्चिदेवार्थान् गृहाति न सर्वानिति न परोक्तदूषणम् , तिनिरूपअथवा “यत्रोभयोस्समो दोषः,परिहारोऽपि वा समः।। नैकापर्यनुयोज्यः स्यात, तादृश्यर्थविचारणे ॥१॥" इति वचनात् चक्षु णम् ॥ Page #116 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना - प्रकरणम् ।। ॥ ५० ॥ मनसोः प्राप्यकारित्वमभ्युपगच्छतो मते चक्षुषाऽतिसम्प्राप्ताज्ञ्जनादेः किमिति न ग्रहः मनसैकदैव सम्प्राप्तानां घटपटादीनां किमिति न ग्रहो मेर्वादेरतिव्यवहितस्यापि ग्राहकस्य मनसो न कुत्राप्यसम्प्राप्तिरिति दोषोद्धाराय कर्मोदयस्य स्वभावस्य वा प्रतिनियतग्रहणे नियामकत्वं परेण तदुभयप्राप्यकारित्ववादिना वाच्यं तन्नयनस्याप्राप्यकारित्ववादिनाऽपि वक्तुं शक्यमेवेति दोष परिहारयोस्समत्वेन नात्र वादिना यत्नो विधेय इति भावः ॥ २४८ ॥ ततश्च यद्वयवस्थितं तदाहसामत्थाभावाओ, मणोव्व विसयपरओ न गिव्हेइ ॥ कम्मक्खओवसमओ, साणुग्गहओ य सामत्थम् ॥२४९॥ व्याख्या-चक्षुः सिद्धान्तनिर्दिष्टनियतविषयपरिमाणात्परतो न गृह्णातीति प्रतिज्ञा, सामर्थ्याभावादिति हेतु:, मनोवदिति दृष्टान्तः, तदावरणकर्मक्षयोपशमात्स्वानुग्रहतश्च सामर्थ्यं येष्त्रप्राप्तेष्वर्थेषु चक्षुषस्समस्ति तेषामप्राप्तानामपि चक्षुषा ग्रहणम्, येषु चाप्राप्तेषूक्तसामर्थ्यं नास्ति तेषां चक्षुषा न ग्रहणमित्यर्थापच्या लभ्यते, अनुग्रहथ चक्षुषो रूपालोकमनस्कारादिसामग्रीतो भवति, तस्माद्व्यवस्थितमप्राप्यकारित्वं नयनमनसोः, स्पर्शनादीनां चतुर्णामेवेन्द्रियाणां व्यञ्जनावग्रह इति तस्य चतुर्विधत्वम् ॥ २४९ ॥ " व्यञ्जनावग्रहस्य स्वरूपं नन्द्यध्ययनागमसूत्रे प्रतिबोधक मल्लको दाहरणाभ्यां "वंजणोग्गहस्स परूवणं करिस्सामि पडिबोहगदिŚतेण मल्लगदिद्वंतेण य ” इत्यारभ्य " जाहे तं वंजणं पूरियं होइ, ताहे हुं ति करेइ, नो चेव णं जाणाइ के वेस सद्दाइ ' इत्यन्तग्रन्थेन प्रतिपादितं, तदेवमस्य व्यञ्जनावग्रहस्वरूपप्रतिपादकस्य नन्दि सूत्रस्य शेषं प्रायः सुगममिति मन्यमानो भाष्यकार: 'जाहे तं वंजणं पूरियं होइ " इत्येतद्व्याचिख्यासुराह— तोरण मल्लगं पिव, वंजणमापूरियं तिजं भणियं ॥ तं दव्वामंदियं वा, तस्संजोगो व न विरुद्धम् ॥ २५० ॥ मतिनिरूपणे व्यञ्जनावग्र • हमस्तावे मनोविषयनियमत्वे पराभिप्रेतहेत्वोनेंत्रेपि स मत्वेन परदो परिहारः, नयनमनसो विना व्यज्ज नावग्रहचतु विधत्वनि टङ्कनम् ॥ ॥ ५० ॥ Page #117 -------------------------------------------------------------------------- ________________ व्याख्या- 'जं भणियं ' यदुक्तं नन्दिसूत्रकारेण, किं तत्, इत्याह, व्यञ्जनमापूरितमिति, केन किंवत्, इत्याह- तोयेन जलेन मल्लकं शरावं तद्वदिति, तस्मिन् सूत्रकारभणिते व्यञ्जनं द्रव्यं गृह्यते, इन्द्रियं वा तयोर्वा द्रव्येन्द्रिययोः संयोगः सम्बन्धः, इति सर्वथाऽप्यविरोधः, त्रिष्वपि व्यज्यते प्रकटीक्रियतेऽर्थोऽनेनेति व्यञ्जनमित्यस्या व्युत्पत्तेर्घटनात् ॥ २५० ॥ व्यञ्जनशब्दवाच्येषु त्रिष्वपि द्रव्यादिषु प्रत्येकमापूरितत्वे विशेषमुपदर्शयति दव्वं माणं पूरिय - मिंदियमापूरियं तहा दोन्हं ॥ अवरोप्परसंसग्गो, जया तया गिण्हइ तमत्थं ॥ २५१ ॥ व्याख्या - दव्वंति, द्रव्यव्यञ्जनेऽधिकृते 'जाहे तं वंजणं पूरियं होइ' इत्यस्यार्थः शब्दादिद्रव्यस्य प्रमाणं प्रतिसमयप्रवेशेन प्रभूतीकृतत्वात् स्वप्रमाणमानीतं प्रकर्षमुपनीतं स्वग्राहकज्ञानोत्पादे समर्थीकृतमिति यावत्, अथेन्द्रियमितीन्द्रियव्यञ्जनेऽधिकृते तु तदर्थः तदा पूरितं व्याप्तं भृतं वासितमित्यर्थः, द्वयोः द्रव्येन्द्रिययोः सम्बन्धलक्षणव्यञ्जनेऽधिकृते पुनः, तयोः परस्परं सम्यक्सम्बन्ध इति तदर्थः, द्रव्येन्द्रियसम्बन्धलक्षणव्यञ्जनपक्षे द्रव्येन्द्रिययोः परस्परमतीवसंयुक्तता वा अङ्गाङ्गीभावेन परिणाम एव सम्बन्धलक्षण व्यञ्जन - स्यापूरणम्, यदोक्तप्रकारत्रयेण त्रिविधमपि व्यञ्जनमापूरितं भवति, तदा तं नामजात्यादिकल्पनारहितं विवक्षितं शब्दाद्यर्थं गृह्णाति, एतच्च 'ताहे हुं ति करेइ' इत्यस्य व्याख्यानं, अयमेवार्थावग्रह एकसामयिकः, व्यञ्जनात्रग्रहस्तु द्रव्यप्रवेशादिरूपत्वादान्तर्मौहूर्तिकः इति ।। २५१ ॥ अर्थावग्रहो यादृशमर्थं गृह्णाति तमुपदर्शयति सामन्नमणिद्देसं, सरूवनामाइकप्पणारहियं ॥ जइ एवं जं तेणं, गहिये सद्देत्ति तं किह णु । ॥ २५२ ॥ व्याख्या - सामान्यविशेषात्मकस्य वस्तुनो रूपादेः स्वरूपनामजातिगुणक्रिया द्रव्य कल्पनारहितत्वेन शब्दानभिलाप्यं सामा (योजित: पाठः) मतिनिरूपणे व्यञ्जनावमहम स्तावे नन्दसूत्रोतपाठपठित व्यञ्जन शब्दस्य भाष्यकार व्याख्यानेन द्रव्येन्द्रियस |म्बन्धरूपत्रि विधवाच्यत्व प्रदर्शनम् ॥ Page #118 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं भीज्ञाना नवप्रकरणम्॥ ॥५१॥ 444444xtex न्यरूपमेवैकसामयिकत्वेन विशेषग्रहणाऽसमर्थोविग्रहो गृह्णाति, एवमुक्ते पर आह-यद्येवं व्याख्यायते भवद्भिः तहिं यन्नन्ध- 13योजितःपाध्ययनसूत्रे प्रोक्तं "तेणं गहिये सद्देत्ति" उपलक्षणत्वादित्थं सम्पूर्ण द्रष्टव्यम्-"से जहा नामए केइ पुरिसे अन्वत्वं सदं सुणेजा ठः) मतिनितेणं सदेत्ति उग्गहिए, न उण जाणइ के वेस सद्दाइति" 'तं किह णु ति तदेतत्कथमविरोधेन नीयते, उपदर्शितनन्दिसूत्रे तन रूपणे अर्थाप्रतिपत्रार्थावग्रहेण शब्दोऽवगृहीत इति प्रतिपाद्यते भवद्भिस्तु शब्दाद्युल्लेखरहितं सामान्यमवगृह्णातीत्युच्यत इति विरोधः स्पष्ट | वग्रहविएवेति भावः ॥ २५२ ॥ अनोत्तरमाह षयनिरूपणं सद्दे त्ति भणइ वत्ता, तम्मत्तं वा न सद्दबुद्धीए । जइ होइ सद्दबुद्धी, तोऽवाओ चेव सो होज्जा ॥ २५३ ॥ तत्रपरकृत व्याख्या-शब्दस्तेनावगृहीत इति यदुक्तं तत्र शब्द इति वक्ता प्रज्ञापकः सूत्रकारो वा भणति प्रतिपादयति अथवा तन्मात्रं विरोधाशशब्दमात्रं रूपरसादिविशेषव्यावृत्याऽनवधारितत्वाच्छन्दतयाऽनिश्चितं गृह्णातीति, एतावतांशेन शब्दस्तेनावगृहीत इत्युच्यते, न ङ्कापरि. पुनः शब्दबुद्धथा, शब्दोऽयमित्यध्यवसायेन तच्छन्दवस्तु तेनावगृहीत, शब्दोल्लेखस्यान्तर्मुहूर्तिकत्वात्, अर्थावग्रहस्य त्वेकसा हारश्च ॥ मयिकत्वादसम्भव इति भावः, यदि भवति शब्दबुद्धिरावग्रहे शब्दनिश्चयस्स्यात्, तदा, अपाय एवासी भवेत् , न त्वर्थावग्रहः, निश्चयस्यापायरूपत्वात्, एवं सत्यर्थावग्रहेहयोरभाव एव स्यात्, न चैवं दृष्टमभ्युपगम्यते वा ॥ २५३ ॥ ____ननु प्रथमसमय एव शब्दोऽयमिति ज्ञानमर्थावग्रहः, ततः माधुर्यादयः शङ्खशब्दधर्मा इह घटन्ते न तु खरकर्कशत्वादयः शार्ङ्गधर्मा इति विमर्शबुद्धिरीहा, तस्माच्छाल एवायं शब्द इत्यपाय इत्येवमभ्युपगमेनावग्रहेहयोरभावप्रसङ्गः 'तेणं सद्देत्ति उग्गहिए' इति यथाश्रुतार्थक एवोपपद्यते 'नो चेव णं जाणइ ' इत्यादिरप्पविरोधः, इत्येतत्परोक्तमन्य मरिष्यति- . ॥५१॥ Page #119 -------------------------------------------------------------------------- ________________ KARNAREGASAX जह सदबुद्धिमत्तय-मवग्गहो तब्विसेसणमवाओ॥ नणु सदो नासद्दो, न य रूवाई विसेसोऽयम् ॥ २५४॥ व्याख्या-यदि शब्दोऽयमिति निश्चयज्ञानमप्यवग्रहः शाल एवायं शब्द इत्यादिविशेषज्ञानमवायो भवताऽङ्गीक्रियते, तर्हि मतिज्ञानस्य प्रथमभेदोऽवग्रहो न स्यादेव, विशेषज्ञानस्यापायरूपतया भवताऽपि स्वीकृतत्वेन शब्दोऽयमिति निश्चयस्य शब्द- स्खलक्षणविशेषग्राहकत्वेनापायत्वस्यैव भावात् , यथा च शब्दत्वस्थावान्तरसामान्यरूपतया शाङ्घत्वादिकं विशेष इति तज्ज्ञानस्यापायता, यतः शासत्वेनाशाङ्खव्यवच्छेद इति कृत्वा शाङ्खत्वं विशेष इति, तथैव महासामान्यस्यावान्तरसामान्यतया शब्दत्वादिकमपि विशेषस्तेनापि नाशब्दो न रूपादिरयमित्येवमन्यविशेषव्यावृत्तिः क्रियत इति तज्ज्ञानस्यापायतैवेत्याह-'नणु' इत्यादि, नन्वित्यक्षमायां, परामन्त्रणे वा, शब्दत्वस्य रूपत्वादिना विरोधात्तनिश्चयेन रूपादिरिति निश्चयस्यावश्यम्भावादित्याह-न च रूपादिरिति रूपादिव्यावृत्तिनिश्चयबलादेव रूपोऽयमिति निश्चयस्ततो नारूपोऽयमिति निश्चयस्ततोऽपायत्वेऽस्य निणीतेऽवग्रहाभावप्रसङ्गः, अवग्रहत्वेन कक्षीकृतस्यापायत्वस्यैव भावादिति भावः ॥ २५४ ॥ स्तोकविशेषग्राहकत्वेन शब्दोऽयमिति निश्चयस्यावग्रहत्वं ततोऽधिकविशेषग्राहकत्वेन शाल एवायमितिनिश्चयस्यापायत्वमित्येवमवग्रहापाययोर्विषयविभागमवलम्ब्यावग्रहसमर्थनं यदि परः कुर्यात्तदा शाङ्खोऽयमितिनिर्णयस्यापि तदुत्तरोत्तरमन्द्रमधुरत्वादितरुण-मध्यम-वृद्ध-स्त्री-पुरुषसमुत्थत्वावगाहिनिर्णयापेक्षया स्तोकविशेषग्राहकत्वेनावग्रहत्वमेव स्यादित्यपायाभावप्रसङ्ग इत्याहथोवमियं नाऽवाओ, संखाइविसेसणमवाओ ति ॥ तब्भेयावेक्खाए, नणु थोवमेवे त्ति नावाओ ॥ २५५॥ अवतरणावेदितार्थेय गाथेति ॥ २५५ ॥ उत्तरज्ञानापेक्षया स्तोकविशेषग्राहिणो निर्णयस्यावग्रहत्वाभ्युपगमे उत्तरोचरज्ञान ARCHASEE (योजितः पाठः) मतिनिरूपणे अर्थावग्रहविषयनिरूपणे पुनःपरकृतयुक्त्यापायाभावापत्तिदोषोपदर्शनम् ॥ Page #120 -------------------------------------------------------------------------- ________________ EX सविवरणं श्रीज्ञाना र्णव प्रकरणम्।। ॥५२॥ स्यापि तदुत्तरोत्तरज्ञानापेक्षया स्तोकविशेषग्राहकत्वेनावग्रहत्त्वप्राप्तौ विशेषाणामनन्तत्वेन यदपेक्षयोत्तरविशेषो न भवत्येवेत्यस्यासम्भवेनोत्तरोत्तरविशेषनिर्णयेऽपि तदुत्तरोतरविशेषाकासायास्सद्भावतोन्तिमविशेषावगमोऽयमेवेति निर्णयस्य कर्तुमशक्यत्वेन शाङ्खोऽयमित्यादिज्ञानानामपि स्वोत्तरविशेषग्राहिज्ञानापेक्षया स्तोकविशेषग्राहकत्वेनावग्रहत्वेऽपायाभावप्रसङ्गस्सुस्पष्ट एवेत्याहइय सुबहुणावि काले-ण सव्वभेयावहारणमसझं ॥जम्मि हवेज अवाओ, सब्वो चिय उग्गहो नाम ॥२५६॥ ___व्याख्या-इति शब्द उपदर्शनार्थः, यथा शाङ्खोऽयं शब्द इति बुद्धौ शब्दगतविशेषावधारणमिदानीमसाध्यं मन्द्रत्वाधुत्तरोत्तरबहुविशेषसद्भावात् , तेन स्तोकविशेषग्राहित्वेनेयं नापायः किन्त्ववग्रहस्तथा सुबहुनापि कालेन सर्वेणापि पुरुषायुषा शब्दगतमन्द्रत्वाद्युत्तरोत्तराविशेषावधारणं तद्भेदानामनन्तत्वेनासाध्यं, यस्मिन्विशेषावधारणेऽन्यविशेषाकाङ्क्षानिवृत्त्याऽपायत्वम्भवेत, तस्मात्सर्वोऽपि विशेषावगम उत्तरोत्तरापेक्षया स्तोकत्वाद्भवदभिप्रायेणार्थावग्रह एव स्याच्छब्दोऽयमिति निश्चयवनापाय इति ॥२५६॥ अथ शब्द एवायमितिज्ञानमर्थावग्रहतया परसम्मतमपि तदीहापूर्वकमेव ततो नास्यार्थावग्रहत्वसम्भव इत्याहकिं सहो किमसदो-तणीहिए सद्द एव किह जुत्तं ॥ अह पुव्वमीहिऊणं, सहोत्ति मयं तई पुब्वं ॥ २५७ ॥ व्याख्या-किं शब्दोऽयम्, आहोस्वित अशब्दो रूपादिः,इत्येवं पूर्वमनीहितेऽकस्मादेव शब्द एवेति निश्चयज्ञानं कथं युक्तम् , विमर्शपूर्वकस्य तस्य तमन्तरेण न सम्भवः, अन्यव्यावृत्तिग्रहणे सत्येव विशेषरूपेण निश्चयः, अन्यव्यावृत्तिग्रहणश्च न विमर्श विना विमर्शश्वेहेति, अथ निश्चयकालात्पूर्वमीहित्वा शब्द एवायमिति निश्चयज्ञानं भवतोऽप्यभिमतं तहिं निश्चयज्ञानात्पूर्वमीहा भवद्वच| नतोऽपि सिद्धा ॥ २५७ ॥ ततः किमित्यपेक्षायामाह (योजित पाठः) मतिनिरूपणे | अर्थावग्रहविषयनिरूपणे शङ्कापरिहारादिप्रदर्शनम् ॥ aamrriramirmirmarwarrior anAmnesnnained ॥५२॥ Page #121 -------------------------------------------------------------------------- ________________ SHARECHAKALCOME किं तं पुव्वं गहिय, जमीहओ सद्द एव विण्णाणं ॥ अह पुव्वं सामण्णं, जमीहमाणस्स सद्दोत्ति ॥२५८ ॥ __ व्याख्या-शब्द एवायमिति निश्चयस्येहापूर्वकत्वे त्वयाऽभ्युपगते तत्र वक्तव्यं किमीहायाः पूर्व तद्वस्तु प्रमात्रा गृहीतं यस्मिनीहिते शब्द एवायमिति निश्चयप्रवृत्तिः ज्ञात एव वस्तुनि भवतीहा नाज्ञात इत्याशयः, उत्तरदानेऽसमर्थे परे स्वयमेवोत्प्रेक्ष्य तन्मतमाशङ्कते, अथ-वयात्पर सामान्यं नामजात्यादिकल्पनारहितं वस्तुमात्रमीहायाः पूर्व गृहीतं, यदीहमानस्य शब्द इति निश्चयज्ञानमुत्पद्यत इत्यर्थः ॥ २५८ ॥ अत्र सूरिः स्वसमीहितसिद्धिमुपदर्शयन्नाह अत्थोग्गहओ पुब्वं, होयव्वं तस्स गहणकालेणं । पुब्वं च तस्स बंजण-कालो सो अस्थपरिसुण्णो ॥२५९॥ व्याख्या-ईहायाः पूर्व यत्सामान्यग्रहणन्तदस्मन्मतेऽर्थावग्रह एकसामायिकः तस्य कालो य एकसमयस्तेनैव ग्रहणकालेन भवताऽपि सामान्यग्रहणकालस्य व्यवहृतावस्मन्मतसिद्धार्थावग्रह एव भवतोऽप्यभिमत इति न शब्दोऽयमिति ज्ञानस्यार्थावग्रहत्वं स्यादतस्तदनुरोधेनास्मदभिमतार्थावग्रहात्पूर्वमेव भवदभिमतेन ईहायाः पूर्व गृह्यमाणस्य सामान्यस्य ग्रहणकालेन भवितव्यं, अस्मदभिमतार्थावग्रहस्य पूर्व व्यञ्जनकालः व्यञ्जनानां शब्दादिद्रव्याणामिन्द्रियमात्रेणादानकाला, सोऽर्थपरिशून्यः न हि तत्र सामान्यरूपो विशेषरूपो वाऽर्थः प्रतिभाति, तदा मनोरहितेन्द्रियमात्रव्यापारात्, अत ईहायाः पूर्व यत्सामान्यग्रहणमर्थावग्रहत्वेनास्माभिरुपेयते तत्तथैव भवताऽप्युपेयमिति, तस्यार्थावग्रहत्वे सिद्धं शब्द एवायमिति निर्णयस्यान्वयव्यतिरेकधर्मपर्यालोचनरूपेहोत्तरकालभाविनोऽपायत्वमिति ॥ २५९ ॥ "न उण जाणइ के वेस सदोति" इति नन्दिसूत्रानुरोधाच्छब्दोऽयमिति ज्ञानं प्रथमतोऽभ्युपगमनीयमेव अन्यथा तथा सूत्रनिर्दिष्टस्यायुक्तत्वं स्यादित्याशयेन पर आह SHARE (योजितः का पाठः) मतिनिरूपणे * अर्थावग्रह विषयनिरूपणे परकतारेकापरिहारादिप्ररूपणम् ॥ Page #122 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं भीज्ञाना जैवप्रकरणम्॥ ॥५३॥ SHASTRI ANILKAKKASH जह सदोति न गहियं, न उजाणहजंक एस सहोत्ति॥तमजुत्तं सामण्णे, गहिए मग्गिजा विसेसो ॥२६॥ (बोजितः व्याख्या-यदि प्रथममेव शब्दोऽयमित्येवं तद्वस्तु न गृहीतं, तर्हि 'न उण जाणइ के वेस सदोत्ति इति यत् नन्दिसूत्रे ___पाठः) निर्दिष्टं तदयुक्तं, यतः शब्दसामान्ये रूपादिव्यावृत्ते गृहीते सति पश्चान्मृग्यतेऽन्विष्यते विशेषः, 'किमयं शब्दः शाखः उत शाङ्ग मतिनिरूपणे इति, 'न उण' इत्यादिना सूत्रे विशेषस्यैवापरिज्ञानमुक्तं, शब्दसामान्यमात्रग्रहणं त्वनुज्ञातमेव, सामान्याग्रहणे विशेषमार्गणासम्भवात, अर्थावग्रहविशेषजिज्ञासायां सामान्यज्ञानस्य कारणत्वात् ।। २६० ॥ अत्रोत्तरमाह विषयनिरूसव्वत्थ देसयंतो, सहो सहोत्ति भासओ भणइ । इहरा न समयमेत्ते, सद्दोत्ति विसेसणं जुत्तम् ।। २६१॥ १७ पणे परकृता. व्याख्या-सर्वत्र पूर्वस्मिन् अत्र च सूत्रावयवे, अवग्रहस्वरूपं प्ररूपयन भाषकः प्रज्ञापक एव शब्दः शब्द इति वदति, न रेकापरिहात्ववग्रहे शब्दप्रतिभासोऽस्ति, अन्यथा समयमात्रेऽवग्रहकाले शब्द इति विशेषणं न युक्तम्, शब्दनिश्चयस्यान्तर्मुहर्तिकत्वात, रादिप्ररूसांव्यवहारिकार्थावग्रहमाश्रित्य वा सूत्रमिदं व्याख्यास्यते ।। २६१ ॥ सूत्रावलम्बिनम्प्रति सौत्रमेव परिहारमाह पणम् ॥ अहव सुए चिय भणियं, जह कोई सुणेन्ज सहमव्वत्तं ॥ अव्वत्तमणिसं, सामण्णं कप्पणारहियं ॥२६॥ व्याख्या-अथवा सूत्र एव भणितं प्रथममव्यक्तस्यैव शब्दोल्लेखरहितस्य शब्दमात्रस्य ग्रहणम्, तत्प्रतिपादकसूत्रावयवमुल्लि| खति-'जह कोई सुणेज सद्दमव्वत्तं 'ति अस्य नन्द्यध्ययन इत्थमुपन्यासः “से जहा नामए केइ पुरिसे अव्वत्तं सई सुणेज्जत्ति " तत्राव्यक्तमित्यनिर्देश्य, तदपि सामान्यं, तच्च नामजात्यादिकल्पनारहितम्, शाखशार्ङ्गभेदापेक्षया शब्दोल्लेखस्याप्यव्यक्तत्वमिति नाशङ्कनीयं, सूत्रेऽवग्रहस्यानाकारोपयोगरूपतयैव भणनात्, अनाकारोपयोगो हि सामान्यमात्रविषयक एव, KASH ॥ ५३ Page #123 -------------------------------------------------------------------------- ________________ BAMLODISASRISTMASA किश्च शब्दोऽयमित्यस्य प्रथममेव स्वीकारे तस्यापायरूपत्वेन तत्पूर्वनियतयौरवग्रहहयोरभावप्रसङ्ग इत्यस्य पूर्वमुपदर्शितत्वाच्च न प्रथमं तस्य भावः ॥ २६२ ॥ अथ सूरिरुत्प्रेक्ष्य पराभिप्रायमाशङ्कते__ अहवमई, पुवंचिय, सो गहिओ वंजणोग्गहे तेणं॥जं वंजणोग्गहम्मि वि, भणियं विपणाणमव्वत्तं ॥२६॥ व्याख्या-अथवा परस्यैषा मतिः यदुत सोऽव्यक्तोऽनिर्देश्यादिस्वरूपः शब्दोऽर्थावग्रहात्पूर्वमेव व्यञ्जनावग्रहे तेन श्रोत्रा गृहीतः, यस्माद्व्यञ्जनावग्रहेऽपि भवद्भिरव्यक्तं विज्ञानमुक्तम्, ज्ञानस्याव्यक्तता चाव्यक्तविषयग्रहण एवोपपद्यत इति भावः ॥ २६३ ॥ अत्रोत्तरमाहअस्थि तयं अव्वत्तं, न उतं गिण्हइ सयपि सो भणियं ।। न उ अग्गहियम्मि जुज्जइ,सहोत्ति विसेसणंबुद्धी २६४ व्याख्या--अस्ति श्रोतुर्व्यञ्जनावग्रहे, तद्,अव्यक्तं ज्ञानं, न पुनरसौ श्रोताऽतिसौक्ष्म्यात् तत् स्वयमपि गृह्णाति संवेदयते, एतच्च प्रागपि भणितम् “ सुत्त-मत्ताइसुहुमबोहोव्व" इति वचनाव, तथा, "सुचादओ सयं पि य विनाणं नावबुझंति" इति वचनाच, तस्माद्वयञ्जनमात्रस्यैव तत्र ग्रहणं, न शब्दस्य, व्यञ्जनावग्रहत्वान्यथानुपपत्तेरेव, न च सामान्यरूपतयाऽव्यक्ते शब्देऽगृहीतेऽकस्मादेव शब्दः इति विशेषणबुद्धियुज्यते,अनुस्वारस्यालाक्षणिकत्वं,अस्याःप्रथमतो भावेऽवग्रहकालेऽप्यपायप्रसङ्गः।२६४ व्यञ्जनावग्रहेऽव्यक्तशब्दरूपार्थभाने दोषमुपदर्शयति-- अथोत्ति विसयगहणं,जइ तम्मिवि सोनवंजणं नाम ॥ अत्थोग्गहोच्चिय तओ,अविसेसोसंकरोवावि॥२६५॥ व्याख्या-अर्थावग्रहे अर्थ इत्यनेन विषयस्य रूपादिभेदेनानिर्धारितस्याव्यक्तस्य शब्दादेग्रहणममिप्रेतम् , यदि च तस्मि (योजितः पाठः) मतिनिरूपणे | अर्घावग्रहविषयनिरूपणे परकृतारेकापरिहारादिप्ररूपणम् ॥ GREEGA Page #124 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 22 सविवरणं भीवाना वप्रकरणम् ॥ अपि व्यञ्जनावग्रहेऽसावव्यक्तशब्दः प्रतिभासत इत्यभ्युपगम्यते, तदा न व्यञ्जनं नाम व्यञ्जनावग्रहो न स्यादित्यर्थः, एवञ्च व्यञ्जनावग्रहकथैवोच्छिद्येत, व्यञ्जनमात्रसम्बन्धस्यैव तत्रोक्तत्वात , भवता तु तत्राव्यक्तशब्दरूपार्थग्रहणस्याभिधीयमानत्वात् , अव्यक्तशब्दग्रहणेत्वसावावग्रह एव, एवमपि सूत्रोक्तत्वाद् व्यञ्जनावग्रहत्वे द्वयोरपि व्यञ्जनार्थावग्रहयोरविशेषः स्यात्, मेचकमणिप्रभावात्सङ्करो वा स्यादिति ॥ २६५ ॥ एतावता व्यञ्जनावग्रहे व्यञ्जनसम्बन्धमात्रम्, अर्थावग्रहे त्वव्यक्तशब्दाद्यर्थस्थैव ग्रहणं न तु व्यक्तशब्दाद्यर्थग्रहणमिति प्रतिपादितम् , इदानीमर्थावग्रहे युक्त्यन्तरेण व्यक्तशब्दाद्यर्थसंवेदनं निराकरोति जेणत्थोग्गहकाले, गहणेहावायसंभवो नत्थि ॥ तो नत्थि सद्दबुद्धी, अहत्यि नावग्गहो नाम ॥२६६ ॥ व्याख्या-येनार्थावग्रहकाले क्रमोत्पित्सुस्वभावानामर्थग्रहणेहापायानां मतिज्ञानभेदानां सम्भवो नास्ति, ततोऽर्थावहे नास्ति शब्द इति विशेषबुद्धिः, तस्या अपायरूपाया अर्थग्रहणेहापूर्वकत्वात् , अथास्त्यसौ तत्र, तर्हि नायमर्थावग्रहः किन्त्वपाय एव स्यात् , तथाप्युपगमे त्वर्थावग्रहेहयोरभाव एव स्यात् ॥ २६६ ॥ अर्थावग्रहे शब्द इति विशेषबुद्धथुपगमे दोषान्तरमाहसामण्णतयण्णविसे-सेहा-वजण-परिग्गहणओ से ॥ अत्याग्गहेगसमओ-वओगवाहुल्लमावण्णं ॥ २६७॥ व्याख्या-अर्थावग्रहैकसमये भवतोपगम्यमाना निश्चयरूपा शब्द इति विशेषबुद्धिरकस्मादनुपजायमानाऽव्यक्तशब्दसामान्यग्रहणशब्दसामान्यविशेषशब्दान्यरूपादिविशेषधर्मालोचनलक्षणेहारूपादिविशेषधर्मपरिवर्जनशन्दविशेषधर्मपरिग्रहणतः श्रोतुरुपजायत इत्यर्थावग्रहकसमये उपयोगबाहुल्यमापनम, न चैतद्युक्तम्, उपयोगयोगपद्याभावप्रतिपादकागमविरोधादिति नार्थावग्रहकाले शब्द इति विशेषबुद्धिः किन्तु शब्द इति प्रज्ञापको भणतीति सिद्धम् ॥२६७।। अथास्मिन्नेवार्थावग्रहे परवाघभिप्राय निराचिकीर्षुराह (योजितः | पाठः) मतिनिरूपणे अर्थावग्रहविषयनिरू पणे परकता रेकापरहारादिपरू पणम् ॥ RECERORS | ॥५४॥ FREE Page #125 -------------------------------------------------------------------------- ________________ AUSHASHAN CaCOCCARRASSAUC5 अण्णे सामण्णग्गह-णमाहु बालस्स जायमेत्तस्स।समयम्मि चेव परिचय-विसयस्स विसेसविन्नाणं॥२६८॥ अन्ये वादिन एवमाहुः-जातमात्रस्य तत्क्षणजातमात्रस्य बालस्य सङ्केतादिविकलत्वेनापरिचितविषयस्य सामान्यमात्रस्याशेषविशेषविमुखस्याव्यक्तस्य सामान्यस्य ग्रहणमालोचनम्, परिचितविषयस्य तु, समय एवाद्यशब्दश्रवणसमय एव, विशेषविज्ञानं जायते, ततस्तमाश्रित्य "तेणं सद्दे ति उग्गहिये" इत्यादि यथाश्रुतमेव व्याख्यायते न कश्चिद्दोष इत्याशयः॥२६८॥अत्रोत्तरमाहतदवत्थमेव तं पुव्व-दोसओ तम्मि चेव वा समये ॥ संखमहराइसुबहुय-विसेसगहणं पसज्जेजा।। २६९॥ जेणत्थोग्गहकाले 'इत्यादि 'सामण्णतयण्णविसेसेहा' इत्यादिग्रन्थोक्तपूर्वदोषतस्तदेतत्परोक्तं, तदवस्थमेव दृषितावस्थमेव, नान्यदृषणाभिधानप्रयासोऽत्राभिधेय इत्याशयः, वा अथवा, तस्मिन्नेव समये शब्दोऽयमित्येकोपयोगसमय एव शङ्खमधुरादिसुबहुविशेषग्रहणं प्रसज्येत, 'न पुण जाणइ के वेस सद्दे' इतिसूत्रावयवस्य सर्वप्रमातृन्प्रत्यविशेषेण प्रवृत्तस्य विरोधेन कस्यचित्प्रथमसमये एव सर्वविशेषविषयकं ग्रहणम्भवत्येवेत्यम्युपगन्तुमशक्यमेव,शब्दरूपमिंग्रहणमन्तरेण प्रकृष्टमतेरप्युत्तरोत्तरबहुधर्मग्रहणत्वासम्भवादिति ॥ २६९ ॥ एकसमये शब्दोऽयमितिविज्ञानमभ्युपगच्छन्तम्प्रति समयविरोधादिदोषान्तरमुपढौकयतिअत्योरगहो न समय,अहवासमओवओगबाहुल्लं॥सव्वविसेसग्गहणं, सव्वा वि महरवग्गहो गिझो ॥२७०॥ एगो वाऽवाओ चिय, अहवा सोऽगहियणीहिए पत्तो । उक्कम-वइक्कमा वा पत्ता धुवमोग्गहाईणं ॥२७१॥ सामण्णं च विसेसो, सो वा सामण्णमुभयमुभयं वा ॥ न य जुत्तं सव्वमियं, सामण्णालंबणं मोत्तुं ॥२७२॥ विशेषविज्ञानस्यासङ्ख्येयसामायिकत्वेनार्थावग्रहे विशेषविज्ञानाभ्युपगमे " उग्गहो एक्कं समयं” इति सिद्धान्तनिर्दिष्टः ॥ द्वितीयः तरङ्गः॥ (योजितः पाठः) मतिनिरूपणे अर्थावग्रहविषयक पर कतारेका| परिहारादिप्ररूपणम् ॥ SANGEE* Page #126 -------------------------------------------------------------------------- ________________ || द्वितीयः सविवरणं मीज्ञाना REGAR प्रकरणम्॥ ॥५५॥ सामयिकोऽसौ न स्यात, अथवा “ सामण्ण-तयण्णविसेसेहा ॥२६७॥" इत्यादिपूर्वग्रन्थोक्तं समयोपयोगवाहुल्यं स्यात्, अथवा परिचितविषयस्य विशेषविज्ञानेऽभ्युपगम्यमाने परिचिततरविषयस्य तस्मिन्नेव सर्वविशेषग्रहणमनन्तरोक्तं प्रसज्येत, अथवा सर्वाऽपि मतिरवग्रहो ग्राह्यः प्राप्तः स्यात्, विशेषविषयकत्वेन वा सर्वाऽपि मतिरपाय एव स्यात् , एवं सत्यपायस्यैकसामयिकत्वप्राप्तौ "ईहावाया मुहुत्तमन्तं तु" इति विरुध्यते । अथवा तथाऽभ्युपगमेऽनवगृहीतेऽनीहितेऽपायः प्राप्तः। एवञ्चावगृहीते ईहिते चाऽपाय इत्युपपादकस्य सिद्धान्तस्य विरोधः, अथवा पाटववैचित्र्येणावग्रहहाऽपायधारणानां ध्रुवमुत्क्रमव्यतिक्रमौ स्याताम् , 'पश्चानुपूर्वीभवनमुत्क्रमः,' 'अनानुपूर्वीभावस्तु व्यतिक्रमः,' एवमुपगमे “उग्गहो ईहा अवायो य, धारणा एव होन्ति चत्तारि" इति परममुनिनिर्दिष्टस्य तेषां क्रमस्य विरोधः स्यात, तथा यत्प्रथमसमये गृह्यते स विशेष इतिनियमाऽभ्युपगमे सामान्य | विशेषस्स्यात प्रथमसमये सामान्यस्यैव ग्रहणात् , अथवा प्रथमसमये सामान्यमेव गृह्यत इति वस्तुस्थितिमाश्रित्य भवन्मते प्रथमसमये गृह्यमाणो विशेषः सामान्यं स्यात्, अथवा सामान्यं विशेषश्चेत्युभयं, उभयं वा स्यात्, सामान्यं सामान्यविशेषोभयरूपं, विशेषश्च सामान्यविशेषोभयरूपः स्यात्, तथाहि, ' अव ईषत् सामान्यं गृह्णातीत्यवग्रह' इतिव्युत्पत्त्या वस्तुस्थितिसमायातं यत्सामान्यं तत्स्वरूपेण तावत्सामान्यं भवदम्युपगमेन तु विशेष इत्येकस्यापि सामान्यस्योभयरूपता, तथा योऽपि भवदभ्युपगतो विशेषः सोऽपि त्वदभिप्रायेण विशेषः, वस्तुस्थित्या तु सामान्यम्, इति विशेषस्याप्येकस्योभयरूपता, अर्थावग्रहस्य सामान्यमालम्बनं मुक्त्वा न च युक्तं सर्वमिदम्, अघटमानकत्वात्, पूर्वोक्तस्यापि दूषणस्यात्र प्रसङ्गायातत्वेन न पौनरुक्त्यावहत्वमिति ॥ २७०-२७१-२७२ ॥ प्रथमं सामान्यमात्रग्राहि आलोचनाज्ञानं तदनन्तरं रूपादिविशेषव्यावृत्तशब्दत्वग्राही अर्थावग्रह (योजितः पाठः) मतिनिरूपणे अर्थावग्रहविषयक पर कृतारेकापरिहारादिप्ररूपणम् ॥ ॥५५॥ Page #127 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५ ॥ द्वितीय भ GAKARKORERAKAR इति केषाश्चिन्मतं निराकर्तुमुपन्यस्यतिकेइदिहालोयणपु-व्वमोग्गहं बेति तत्थ सामण्णं ॥ गहियमहत्थावग्गह-काले सद्देत्ति निच्छिण्णं ॥२७३॥ तरङ्गः॥ केचिद्वादिन इहास्मिन् प्रक्रमे आलोचनपूर्वमालोचनं पूर्व यत्र स तथा तं आलोचनपूर्वकमित्यर्थः । तथाभूतमवनहं ब्रुवते || ( योजितः प्रथममालोचनाज्ञानं ततोऽर्थावग्रह इत्येवं व्याचक्षते, तथा च तैरुक्तम्-"अस्ति ह्यालोचनाज्ञानं, प्रथमं निर्विकल्पकम् ॥ पाठः) बालमूकादिविज्ञान-सदृशं शुद्धवस्तुजम् ॥१॥" इति तत्र आलोचनाज्ञाने सामान्यमव्यक्तं वस्तु गृहीतं, प्रतिपत्रेति गम्यते, अथानन्तरम्, अर्थावग्रहकाले निच्छिन्नं पृथक्कृतं रूपादिभ्यो व्यावृत्तं शब्दविशेषणविशिष्टं तदेव, गृहीतमित्यनुवर्तते, अर्थावग्रहएवमुपगमे "से जहानामए केइ पुरिसे अव्व सई सुणेजा" इत्येतदालोचनाज्ञानापेक्षया नीयते 'तेणं सद्दे त्ति उग्गहिए' एतत्त्व- | विषयनिरूविग्रहापेक्षयेति सर्व सुस्थम् ।। २७३ ॥ तदेवं वादिनमीषद्गर्वाध्मातमझं विज्ञाय परं मार्गावतारणाय विकल्पयन्नाह सूरिः हैपणे पुनरन्यतं वंजणोग्गहाओ, पुवं पच्छा स एव वा होना । पुव्वं तदत्यवंजण-संबन्धाभावओ णत्थि ॥२७४॥ | कृतयुक्त्यातद्भवदुत्प्रेक्षितमालोचनं व्यञ्जनावग्रहात्पूर्व पश्चात्स एव वा भवेत् , स्थानान्तराभावात्, अर्थव्यञ्जनसम्बन्धाभावात्पूर्व ऽऽलोचनातावतानास्ति, अर्थः शब्दादिविषयभावेन परिणतद्रव्यसमूहा, व्यञ्जनं श्रोत्रादीन्द्रियं, तयोस्सम्बन्धस्य सामान्यविषयग्राह्यालोच- पूर्वकत्वंनस्य सर्वत्र सर्वदोत्पत्तिप्रसङ्गपरिहाराय तत्कारणतयाऽवश्यमभ्युपेयत्वेन तदभावे तदसम्भवात्, यद्युक्तालोचनोत्पत्त्येऽर्थव्यञ्जन तस्येतिमतं सम्बन्धाभाव उपेयते तदा तत्स्वरूपस्य व्यञ्जनावग्रहस्यैवोक्तालोचनात्पूर्व सत्त्वं न त्वालोचनस्य व्यञ्जनावग्रहात्पूर्व सत्त्वमिति विकल्प्य प्रथमविकल्पो नात्मानमासादयेदित्याशयः ॥ २७४ ॥ व्यञ्जनावग्रहात्पश्चादुक्तालोचनं भवतीति द्वितीयविकल्पमाधिकृत्याह परास्तम्॥ STRO Page #128 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना र्णवप्रकरणम् ।। ॥ ५६ ॥ अत्थोग्गहो विजं वं-जणोग्गहस्सेव चरमसमयम्मि ॥ पच्छा वि तो न जुत्तं, परिसेसं वंजणं होता || २७५ || अर्थावग्रहोsपि यस्माद्वयञ्जनावग्रहस्यैव चरभसमये भवतीति निर्णीतं प्राग्, तस्मात्पश्चादपि व्यञ्जनावग्रहादालोचनज्ञानं न युक्तं, व्यञ्जनार्थावग्रहान्तरालकालस्यैवाभावेन तदानीं तदुत्पतेर्वक्तुमशक्यत्वात्तदेवं पूर्वपश्चात्कालयोस्तत्सच्वनिषेधे पारिशेष्यान्मध्यकालवर्ती तृतीयविकल्पोपन्यस्तो व्यञ्जनं व्यञ्जनावग्रह एव भवताऽऽलोचनाज्ञानत्वेनाभ्युपगतो भवेत्, एवं च न कश्विदोषः, नाममात्र एव विवादात् || २७५॥ किञ्च तद्व्यञ्जनकालेऽभ्युपगम्यमानमालोचनं किमर्थस्य व्यञ्जनानां वा, प्रथमपक्षे व्यञ्जनावग्रहत्वाभावान्न व्यञ्जनावग्रहस्य नामान्तरमप्यालोचनमिति, द्वितीयपक्षेऽर्थविषयकत्वाभावादन्वर्थादालोचन संज्ञाभावप्रसङ्ग इत्याहतं च समालोयणम-त्थदरिसणं जइ न वंजणं तो तं ॥ अह वंजणस्स तो कह-मालोयणमत्थ सुण्णस्स ॥ २७६ ॥ तत्समालोचनं यदि सामान्यरूपस्यार्थस्य दर्शनमिष्यते, ततस्तर्हि न व्यञ्जनं व्यञ्जनावग्रहात्मकं भवति व्यञ्जनावग्रहस्य व्यञ्जनसम्बन्धमात्ररूपत्वेनार्थशून्यत्वात्, अथ व्यञ्जनस्य शब्दादिविषयपरिणतद्रव्य सम्बन्धमात्रस्य तत्समालोचनमिष्यते, तर्हि कथमालोचनं कथमालोचकत्वं तस्य घटते, तत्र हेतुः अर्थशून्यस्येति, व्यञ्जन सम्बन्धमात्रान्वितत्वेन सामान्यार्थालोचकत्वानुपपतेरित्यर्थः ॥ २७६ ॥ नन्वेतदालोचनाज्ञानं शास्त्रान्तरे प्रसिद्धमस्ति तत्किं स्वरूपमुररीकृत्येत्यत्र प्रतिविधानं वक्तव्यमित्यत्राह - आलोयणन्ति नामं, हवेज तं वंजणोग्गहस्सेव ॥ होज कहं सामण्ण-ग्गहणं तत्थत्यसुण्णमि ॥ २७७ ॥ तस्मादालोचनमिति यन्नाम् तदन्यत्र निर्गतिकं सत् पारिशेष्यात् व्यञ्जनावग्रहस्यैव द्वितीयं नाम भवेत्, एवं सति भवतो यदभिमतं सामान्यमात्रग्रहणमालोचनन्तन्न तत्, यतः प्रागुक्तयुक्तिभिः अर्थशून्ये तत्र कथं सामान्यग्रहणं भवेत्, तस्मादर्थावग्रह ॥ द्वितीयः तरनः ॥ (योजित: पाठः) मतिनिरूपणे अर्धावग्रहवि | घयनिरूपणं तत्र पुनरन्यसम्मतालो चनापूर्वकत्वं विकल्प्य परिहृतम् ॥ ॥ ५६ ॥ Page #129 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥ द्वितीयः MU एव सामान्यार्थग्राहका, “अस्ति ह्यालोचनाज्ञानम्" इत्याद्यपि तमाश्रित्यैव घटत इति ॥ २७७ ॥ 'तुष्यतु दुर्जन' इति न्यायेन व्यञ्जनावग्रहे सामान्यं गृहीतमित्युपगम्याप्याहगहियं व होउ तहियं, सामण्णं कहमणीहिए तम्मि ।। अत्थावग्गहकाले, विसेसणं एस सद्दो त्ति ॥२७८॥ अथवा भवतु तस्मिन्व्यञ्जनावग्रहे सामान्यं गृहीतम् , तथापि कथमनीहितेऽविमर्शिते तस्मिन्नकस्मादेवार्थावग्रहकाले शब्द एषः इति विशेषणं विशेषज्ञान युक्तम्, न हि निश्चयो झगित्येवेहामन्तरेण युज्यते, तस्मानार्थावग्रहे शब्द इत्यादिविशेषबुद्धियुज्यते ।। २७८ ॥ अर्थावग्रहसमय एवेहापायौ भविष्यत इति मन्यमानम्परम्प्रत्याह अत्यावग्गहसमए, वीसुमसंखेजसमइया दो वि॥तक्का-वगमसहावा, ईहा-ऽवाया कहं जुत्ता ? ॥२७९॥ ____ अर्थावग्रहसम्बन्धिन्येकस्मिन् समये कथमीहापायौ युक्तौ ? इति सम्बन्धः, यतः तर्कावगमस्वभावौ, तर्को विमर्शस्तत्स्वभावेहा, अवगमो निश्चयस्तत्स्वभावोऽपायः, द्वावपि चैतौ पृथगसङ्खयेयसमयौ, तथा च यदिदमर्थावग्रहसमये विशेषज्ञानं त्वयेध्यते सोपायः स चावगमस्वभावो निश्चयस्वरूपः, या च तत्समकालमीहाऽभ्युपगम्यते सा तर्कस्वभावानिश्चयात्मिका, तथा च विरुद्धनिश्चयानिश्चयस्वभावयोरनयो कस्मिन्नवग्रहसमये भावो युक्तः परस्परपरिहारव्यवस्थितत्वात् , इत्येकानुपपत्तिः। तथा, अवग्रहस्यैकस्समयः, अनयोश्च पृथक् पृथक् असंख्येयाः समयाः, एवश्च पृथगसंख्येयसमययोरीहापाययोरेकस्मिन् समये भावोऽपि समयविरोधान सम्भवति, इति द्वितीयानुपपत्तिः ॥ अतोऽत्यन्तासम्बद्धत्वादुपेक्षणीयमेतत् ॥ २७९ ॥ ___सामान्यमात्रग्राहित्वेऽवग्रहस्य ग्रन्थान्तरोक्तक्षिप्रेतरादिभेदासम्भवाद्विशेषग्राहित्व एव तस्य घटनाद्विशेषग्राह्यवग्रह इति निः (योजितः पाठः) दू मतिनिरूपणे परस्यार्थावग्रहसमकालमीहापा ययोः सत्त्वसम्भावना युक्त्या पहस्तयति। SHAIR, Page #130 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं मीज्ञाना FOR प्रकरणम्॥ संख्यप्रेरकान्तर्गतप्रेरकविशेषस्यावशिष्टामाशङ्कामपहस्तयितुं सूरिरुपन्यस्यति-- ॥ द्वितीयः खिप्पेयराइभेओ, जमोग्गहो तो विसेसविण्णाणं । जुजा विगप्पवसओ, सद्दोत्ति सुयम्मि जं केह ॥२८॥ क्षिप्रेतरादिभेदो यस्मादवग्रहः, ततः शब्द इति विशेषविज्ञानं युज्यते, अर्थावग्रहे इति प्रस्तावाल्लभ्यते, तेणं सहे ति (योजितः उग्गहिए । इत्यादिवचनात् यत्सूत्रे निर्दिष्टमिति शेषः, विशेषविज्ञानत्वे हेतुः विकल्पवशतः इहान्यत्रोक्तनानात्ववशतः, पाठः) अवग्रहस्य द्वादशभेदोपदर्शनार्थमिह शास्त्रान्तरे तत्त्वार्थादौ चैवमुक्ति:-क्षिप्रमवगृह्णाति १, चिरेणावगृह्णाति २, बह्ववगृह्णाति अर्थावग्रहे ३, अबह्ववगृह्णाति ४, बहुविधमवगृह्णाति ५, अबहुविधमवगृह्णाति ६, एवमनिश्रितं ७, निश्रितं ८, असन्दिग्धं ९, सन्दिग्धं १०, क्षिप्राक्षि ध्रवम् ११, अध्रुवमवगृह्णाति १२ इति ॥ ततः क्षिप्रं चिरेण वाऽवगृहातीति विशेषणान्यथानुपपत्त्या ज्ञायते नैकसमयमात्रमान पादिभेदा सम्भवतो एवार्थावग्रहः, किन्तु चिरकालिकोऽपि, तथा बहूनां श्रोतृणामविशेषेण प्राप्तिविषयस्थे शङ्खमेर्यादिबहुतूर्यनिर्घोषे क्षयोपशम विशेषग्रावैचित्र्यात कोऽप्यबहु सामान्यमवगृह्णाति,अन्यो बह्ववगृह्णाति भिन्नांस्तांस्तान् शब्दान्गृह्णाति,अपरः स्त्रीपुरुषवाद्यत्वादिबहुविधविशेषधर्मविशिष्टत्वेन बहुविधमवगृह्णाति, तदन्यस्त्वबहुविधविशिष्टत्वादबहुविधमवगृह्णाति, अत एतस्माद् बहुबहुविधायनेकविकल्प क्तमितिप्रेनानात्ववशादवग्रहस्य क्वचित्सामान्यग्रहणं क्वचित्तु विशेषग्रहणमित्युभयमप्यविरुद्धं, ततो यत् सूत्रे 'तेणं सद्दे त्ति उग्गहिए' | रकविशेषाइतिवचनात् शब्दः इति विशेषविज्ञानमुपदिष्टम् , तदप्यर्थावग्रहे युज्यत एव, इति केचित् ॥ २८० ॥ अत्रोत्तरमाह-- रेकायाः स. स किमोग्गहो त्ति भण्णइ, गहणेहाऽवायलक्खणत्ते वि॥अह उवयारो कीरइ, तो सुण जह जुज्जए सो वि॥२८१॥ ६ माधानम् ॥ बहुशः समाहितमप्यर्थ पुनः पुनः प्रेरयन्तं प्रेरकं साक्षेपं काक्वा सुरिः पृच्छति, किंशब्दः क्षेपे, स पूर्वोक्तो विशेषावगमः, हित्वमेव यु Page #131 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अवग्रहोऽर्थावग्रहो भण्यते ग्रहणेहापायलक्षणत्वेऽपि, क्षेपार्थककिंशब्दसमभिव्याहारात्कथं ग्रहणहापायलक्षणत्वे सत्यपि बहुबहुविधादिविशेषग्राहकत्वेन निश्चयरूपतयाऽपायः समर्थावग्रह इति भण्यते १, ग्रहणहयोः पूर्व भावित्वेन अपायस्य स्वस्वभावत्वेनापायलक्षणत्वं बोध्यम्, स्वस्वरूपस्यापि च लक्षणत्वं भवत्येव । यदाह ॥ “विषामृते स्वरूपेण, लक्ष्येते कलशादिवत् । एवं च स्वस्वभावाभ्यां, व्यज्येते खलसज्जनौ || १ ||" इति || बहुबहुविधादिग्रहणस्योक्तलक्षणत्वबलादपायत्वे कथं शास्त्रान्तरेऽवग्रहादीनां बह्वादिग्रहणमुक्तम् १, सत्यमुक्तम्, किन्तूपचारतः बह्वादिग्राहकस्यापायस्य कारणेष्ववग्रहादिषु योग्यतया कार्यस्वरूपमस्तीति कृत्वोपचारतस्तेऽपि बह्नादिग्राहकाः प्रोच्यन्ते, अथ यदि उक्तन्यायेन त्वयाऽप्युपचारं कृत्वा विशेषग्राहकोऽर्थावग्रह इत्युच्यते स वाङ्मात्रेण तव न युज्यते, " यत्र मुख्यार्थो न घटते तत्र प्रयोजने सति उपचारः प्रवर्तते, " त्वया त्ववग्रहस्य विशेषविषयकत्वोपपादनाय यद्यदुक्तं तदन्यथैव समर्थितमिति प्रयोजनाभावान्नोपचारो युक्तः, यदि मां शिष्यो भूत्वा पृच्छसि त्वं 'कथमुपचारः क्रियमाणो घटत इति १ ततः शृणु समाकर्णय, सोऽपि यथा युज्यते तथा कथयामि ।। २८१ ॥ यथाप्रतिज्ञातमेव सम्पादयन्नाह सामण्णमेत्तगहणं, नेच्छइओ समयमोग्गहो पढमो ॥ तत्तोऽणंतरमीहिय-वत्धुविसेसस्स जोऽवाओ ||२८२ ॥ सो पुणावाया - sवेक्खाओ वग्गहोत्ति उवयरिओ || एस्सविसेसावेक्खं, सामण्णं गेण्हए जेणं ॥ २८३ ॥ तत्तोऽणतरमीहा, तत्तोऽवाओ य तव्विसेसस्स ।। इय सामण्णविसेसा - वेक्खा जावंतिमो भेओ ।। २८४ ॥ कसमयमाश्रमानो नैश्वयिको निरुपचरितः सामान्यवस्तुमात्र ग्राहकोऽर्थावग्रहः प्रथमः, निश्चयवेदिपरमयोग्यवगम ॥ द्वितीयः तरङ्गः ॥ ( योजितः पाठ: ) मतिनिरूपणे अर्थावय हे प्रेरकवि शेषारेकां निरस्य व हादिया हित्वोपचा रोपपादनम् || Page #132 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना र्णव प्रकरणम् ।। ॥ ५८ ॥ विषयत्वामैश्चयिकोऽयमुच्यते, ततो नैश्वयि कार्थावग्रहादनन्तरमीहितस्य वस्तुविशेषस्य योऽपाय स पुनर्भाविनीमी हामपायं चापेक्ष्योपचरितोऽवग्रहोऽर्थावग्रहः स छद्मस्थव्यवहारिभिर्व्यवह्रियमाणत्वाद्वयावहारिको र्थावग्रहः, उपचारे निमित्तान्तरमाह-एस्सेत्यादि यो भावी योन्यो विशेषस्तदपेक्षया येन कारणेनायमपायोऽपि सन् सामान्यं गृह्णाति, सामान्य ग्राहित्वात्प्रथमनैश्चविकार्थावग्रहवदयमर्थावग्रहः, ततस्सामान्येन शब्दनिश्चयरूपात्प्रथमापायादनन्तरं किमयं शाङ्खः शब्दः शार्ङ्ग वेत्यादिरूपेहा भवति, ततस्तद्विशेषस्य शाङ्खत्वादेरीहितस्य शाङ्ख एवायमित्यादिरूपेणापायश्च निश्चयरूपो भवति, अयमपि च भावितद्विशेषेहामपायञ्चापेक्ष्य सामान्यालम्बनत्वादुपचरितोऽर्थावग्रहः, इयं च सामान्यविशेषापेक्षाऽसम्भवत्स्वाविशेषान्तरान्त्यविशेषं यावद्भवति, अथवा यतो विशेषात्परतः प्रमातुर्विशेषजिज्ञासा निवर्तते तमन्त्यविशेषं यावत् व्यावहारिकार्थावग्रहेहापायार्थं सामान्यविशेषापेक्षा कर्तव्या एवमिहोपचारघटना युज्यते ॥ २८२-२८३-२८४ ॥ उक्तगाथात्रय पर्यवसितमर्थमुपदर्शयति सव्वत्थेहावाया, निच्छयओ मोतुमाइसामण्णं ॥ संववहारत्थं पुण, सव्वत्थाऽवग्गहोऽवाओ || २८५ ।। आदिसामान्यमव्यक्तं सामान्यमात्रालम्बनमेकसामयिकं ज्ञानं मुक्त्वा सर्वत्र विषयपरिच्छेदे कर्तव्ये निश्वयतः परमार्थत ईहापायौ भवतः, ईहा, पुनरपायः, पुनरीहा, पुनरप्यपाय, इत्येषंक्रमेण यावदन्त्यो विशेषः, न त्वर्थावग्रहः, अर्थावग्रहस्तु सामान्यमात्रालम्बनमेकसामयिकं प्रथमज्ञानमेव, न तदीहाऽपायो वा संव्यवहारार्थं पुनः सर्वत्र यो योऽपायः स स उत्तरेहापायापेक्षयैष्य विशेषापेक्षया चोपचारतोऽर्थावग्रहः ॥ २८५ ॥ यावतारतम्येनोत्तरोत्तरविशेषाकांक्षा प्रवर्तते तावदवग्रहः, तरतम योगाभावे त्वपायएव भवति न तस्यावग्रहत्वमिति दर्शयति ॥ द्वितीयः तरङ्गः ॥ ( योजित: पाठ: ) मतिनिरूपणे अर्थावग्रहे गाथात्रयेण हादिया हित्वोपचा र उपपादि तः, गाथात्रयैदम्पर्या र्थव निरूपितः ॥ ॥ ५८ ॥ Page #133 -------------------------------------------------------------------------- ________________ PRECA तरतमजोगाभावे-वाओ चिय धारणा तदंतम्मि||सब्वत्थ वासणा पुण, भणिया कालंतरे सई य॥२८६॥ ॥ द्वितीया तरतमयोगाभावे ज्ञातुरतनविशेषाकाङ्घानिवृत्तावपाय एव भवति, तस्यावग्रहत्वाभावात्तनिमित्तानामीहादीनामभावे तदन्ते तरङ्गः ॥ धारणा तदर्थोपयोगाप्रच्युतिरूपा भवति, वासना वक्ष्यमाणरूपा कालान्तरे स्मृतिश्चेति धारणाभेदद्वयं पुनः सर्वत्र भवति ॥२८॥ (योजित: पासांव्यवहारिकार्थावग्रहापेक्षयेदानी " तेणं सद्दे ति उग्गहिए' इत्यादिसूत्रं विशेषविज्ञानपरतयाप्युपपादयितुं शक्यत इत्याह ठः) मतिनिसद्दो त्ति व सुयभणियं, विगप्पओ जइ विसेसविण्णाणं॥घेप्पेजतं पि जुज्जइ,संववहारोग्गहे सव्वं ॥२८७॥ रूपणे अर्था वा अथवा, शब्द इति सूत्रभणितं शब्दस्तेनावगृहीत इति सूत्रे प्रतिपादितं यदि विकल्पतो विवक्षावशतो विशेषविज्ञानं गृह्येत, वग्रहस्यनैश्चसंव्यवहारोपग्रहे गृह्यमाणे सति सर्व तदपि युज्यते ॥ २८७ ।। व्यावहारिकार्थावग्रहाभ्युपगमे सविशेष गुणमुपदर्शयन्नाह यिकव्यावखिप्पेयराइभेओ, पुब्बोइयदोसजालपरिहारो॥ जुज्जइ संताणेण य, सामण्णविसेसववहारो ॥२८८॥ हारिकभेदो क्षिप्रेतरादिभेदं यत्पूर्वोदितदोषजालमेकसामयिकसामान्यमात्रग्राहकनैश्चयिकार्थावग्रहव्याख्यातारम्प्रत्येकसामयिकत्वेऽस्य कथं व्युत्पाद्या क्षिप्रचिरग्रहणविशेषणं ? सामान्यमात्रग्राहकत्वे च कथं बहुबहुविधादिविशेषणोक्तं विशेषग्रहणं?, तथाऽस्यैव विशेषग्राहकत्वे वग्रहतत्व समयोपयोगबाहुल्यमित्यादिस्वरूपम्, तस्य परिहारो व्यावहारिकार्थावग्रहे सति युज्यते,नैश्चयिकार्थावग्रहवादिभिरपि उपचाराव्या निष्टङ्कनम्॥ वहारिकार्थावग्रहस्यासंख्येयसमयनिष्पन्नविशेषग्राहकज्ञानरूपस्य स्वीकृतत्वेन तत्र क्षिप्रेतरादिभेदस्य बहु-बहुविधादिविशेषणोक्त- 18 विशेषग्राहकत्वस्य सम्भवात्,तस्य चाऽसंख्येयसामयिकत्वेनैकसमयोपयोगबाहुल्यस्यावकाश एव नास्ति, एवं च क्षिप्रेतरादिविशेषणकलापो मुख्यतया सांव्यवहारिकार्थावग्रह एव घटते कारणे कार्यधर्मोपचारतस्तु नैश्चयिकावग्रहेऽपीत्युक्तं प्राग,सन्तानेन च k U CRACCIRCE Page #134 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना र्णव प्रकरणम् ॥ ।। ५९ ।। सामान्यविशेषव्यवहारो लोकरूढोऽपि व्यावहारिकार्थाऽवग्रहे युज्यते, लोके विशेषोऽप्यपेक्षया सामान्यं, यत्सामान्यं तदप्यपेक्षया विशेषः, इत्येवमन्त्यविशेषं यावत्, एतच्चौपचारिकावग्रहे सत्येव घटते, नान्यथा, ' यदनन्तरमीहादि प्रवृत्तिः सोऽवग्रह' इत्येवमवग्रहलक्षणस्य नैrfaraग्रह इव विशेषग्राहिज्ञानेऽपायरूपे औपचारिकार्थावग्रहतया स्वीक्रियमाणेऽपि भावात् ॥ २८८ ॥ ॥इति सविवरणे श्रीज्ञानार्णवे मतिज्ञानाऽऽद्यमेदलक्षणद्विविधावग्रहतत्त्व प्ररूपणात्मको द्वितीयस्तरङ्गःसम्पूर्णः।। अथ तृतीयस्तरङ्गः ॥ अथ मतिज्ञानद्वितीय भेदलक्षणामीहां व्याचिख्यासुराह इय सामण्णग्गहणा-णंतरमीहा सदत्थवीमंसा । किमिदं सद्दोऽसद्दो, को होज्ज व संख-संगाणं १ ॥ २८९ ॥ इत्येवं प्रागुक्तेन प्रकारेणाभिहिताऽव्यक्तवस्तुमात्रग्रहणलक्षणनैश्वयि कार्थावग्रहशब्दादिसामान्यग्रहणलक्षणव्यावहारिकार्थावग्रहात्मकसामान्यग्रहणानन्तरमीहा प्रवर्तते सा सदर्थमीमांसा, सतस्तत्र विद्यमानस्य गृहीतार्थस्य विशेषविमर्शद्वारेण मीमांसा विचारणा, किमिदं वस्तु मया गृहीतं शब्दोऽशब्दो वेत्येवंस्वरूपा, इयं विचारणां निश्चयार्थावग्रहानन्तरभाविनी, वा अथवा शाङ्खशार्ङ्गन्योर्मध्ये कोऽयं भवेत् शब्दः शाङ्खः शाङ्गों वा, इयं विचारणा व्यवहारार्थावग्रहानन्तरभाविनी, यद्यपीत्थं विचारणा संशयात्मिका नेहा, तथाप्यनयाऽनन्तरभावी व्यतिरेकधर्मनिराकरणपरः अन्वयधर्मघटनप्रवृत्तश्चापायाभिमुख एव बोध उपलक्षित ईहा ॥ तद्यथा-“अरण्यमेतत् सवितास्तमागतो, न चाधुना सम्भवतीह मानवः । प्रायस्तदेतेन खगादिभाजा, भाव्यं स्मरारातिसमाननाम्ना ।। १ ।। " इति । एतेन स्थाणुर्वा पुरुषो वेति संशयानन्तरं पुरुषधर्मव्यतिरेकतः स्थाणुधर्मसमन्वयतश्च प्रायः स्थाणुरेवायमिति बोध ईहेत्युपदर्शितम्भवतीति ।। २८९ ॥ अथ मतिज्ञानतृतीय भेदस्यापायस्य स्वरूपमाह - ( योजित: पाठ: ) द्वितीय तरङ्गो पसं हारः । तृतीय तरङ्गोपक्रमः ॥ मतिज्ञान निरूपणे द्वि तीयभेद - रूप-ईहा तत्वनिरू पणम् ॥ ।। ५९ । Page #135 -------------------------------------------------------------------------- ________________ MO A अस्तित्वनास्तिस्त्वनिषेकभावतः इति, पुरोवत्वचस्यैवार्य शब्दो न शृङ्गस्य इत्यादाओ, अणुगमवरेगा पादिरिति ॥ महाराविग्रहानन्ताभावात् तत्राविद्यमान विशेषविज्ञानं सोडगा महुराइगुणत्तणओ, संखस्सेव त्ति जं न संगस्स ।। विण्णाणं सोऽवाओ, अणुगमवइरेगभावाओ ॥ २९॥ व्याख्या-मधुरस्निग्धादिगुणत्वात् शङ्खस्यैवायं शब्दो न शृङ्गस्य इत्यादि यद्विशेषविज्ञानं सोऽपायो निश्चयज्ञानरूपः, तत्र हेतुः, अनुगमव्यतिरेकभावतः इति, पुरोवर्त्यर्थधर्माणामनुगमभावात् तत्राविद्यमानार्थधर्माणां व्यतिरेकभावात्, अनुगमव्यतिरेको अस्तित्वनास्तित्वनिश्चयौ । अयं च व्यवहारार्थावग्रहानन्तरभावी अपाय उक्तः। निश्चयावग्रहानन्तरभावी तु श्रोत्रग्राह्यत्वादिगुणतः शब्द एवायं न रूपादिरिति ॥ २९० ।। अथ मतिज्ञानतुरीयभेदलक्षणां धारणा सभेदामाहतयणंतरं तयत्था-विच्चवणं जो य वासणाजोगो । कालंतरे य जं पुण-रणुसरणं धारणा सा उ ॥२९१॥ ___व्याख्या-तस्मादपायादनन्तरं यत्तदर्थादविच्यवनम्, उपयोगमाश्रित्याभ्रंशः, यश्च वासनाया जीवेन सह योगः सम्बन्धः, यच्च तस्यार्थस्य कालान्तरे पुनरिन्द्रियैरुपलब्धस्यानुपलब्धस्य वा एवमेव मनसाऽनुस्मरणं स्मृतिर्भवति, सेयं पुनस्त्रिविधाऽप्यर्थस्यावधारणरूपा धारणा विज्ञेया, वासना च तदावरणक्षयोपशमरूपा ज्ञेया॥ २९१ ॥ इदमत्रैदम्पर्य-धारणाया अविच्युतिलक्षणभेदस्य दधिोपयोगमाश्रित्याभ्युपगमादेव पराभ्युपगतनिरन्तरसमानविषयकज्ञानसन्तानलक्षणधारावाहिकज्ञानफलस्य स्थिरार्थग्रहणस्योपपत्तौ निष्प्रयोजनमेव धारावाहिकज्ञानकल्पनं, पूर्वज्ञानमुत्पाद्य व्युपरतव्यापारस्य कारणस्य पुनर्व्यापारान्तराभावेन कारणाभावाच न निरन्तरज्ञानसन्तानलक्षणधा(सप्तचत्वारिंशपत्रादिह यावद्योजितःपाठः) रावाहिकज्ञानाभ्युपगमो युज्यते न चैकापायोत्पत्तावपि सामग्रीसच्चात्पुनस्तदुत्पत्तेरवारणीयत्वात्तत्सन्तानोत्पत्ति सङ्गतेति वाच्यम्, अपायस्यापायोत्पत्तिप्रतिबन्धकत्वात्प्रागभावस्य तद्धेतुत्वाद्वा पुनस्तदुत्पत्यापत्तेरभावात्, अन्यथैकवारं घटोत्पादेऽपि सा ॥ तृतीय तरजः॥ (योजितः पाठः) मतिज्ञानलनिरूपणे अ पायस्वरूप ४ तृतीयभेदस्य धारणास्व रूपचतुर्थ |भेदस्य तद्भे दस्य च * R UMAMAL * Page #136 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना वप्रकरणम्॥ ॥६ ॥ KRRERAKAR मग्रीमहिम्ना कपाले पुनस्तदुत्पत्त्यापत्तिप्रसङ्गादिति चेत, उच्यते, घटोऽयं घटोऽयमित्यनुभवधारादर्शनेन तदपलापो दुष्करोऽपाय- तृतीय स्तर सत्त्वेऽपायान्तरोत्पत्तिप्रतिबन्धस्याप्रामाणिकत्वात् स्पष्टस्पष्टतरस्पष्टतमवासनाजनकत्वेनापायजन्यापायपरम्पराया अवश्याम्युपे मतिज्ञानयत्वादीहावग्रहादिभेद इवापायनानात्वेऽप्युपयोगभेदानापत्तरेकसन्ततिकैकविषयकज्ञानस्यैवोपयोगत्वाव , तस्य च नानात्वेऽप्ये निरूपणे कत्वाविरोधात् ततश्चापायसमानाकारस्मृतिजननी स्मृतिज्ञानावरणकर्मक्षयोपशमरूपा वासना विजृम्भते, कालान्तरे च तद्विषयिणी धारणास्वस्मृतिः प्रवर्त्तते इति,यद्यपीयं भिन्नोपयोगरूपत्वाभावानाधिकीभवितुमुत्सहते, तथापि क्षयोपशममहिम्नाऽव्यक्ततया स्थितं पूर्वज्ञान- रूपचतुर्थमेवोद्बोधकवशात् स्मृत्युपयोगरूपतामास्कन्दत्कथञ्चिदभेदोपविद्धं सन्तानगामित्वलक्षणं भेदमास्कन्दतीति द्रष्टव्यं, ननु स्मृतिने भेदावान्तर प्रमाऽतीतश्यामत्वे वर्तमानावगाहिन्याः पाकरक्ते श्यामोऽयमिति प्रतीरिवातीततत्तांशे वर्तमानत्वावगाहिन्यास्तस्या अयथार्थत्वा- 18 भेदतत्त्वतत्ताविशिष्टस्यानागतवर्तमानस्य वर्तमानत्वानुभवबलादननुभूतस्य वा तत्र वर्तमानत्वस्य ज्ञानसामग्रीमहिम्नैव भानात्, अन्यथा निरूपणम्॥ विषयस्य वर्तमानत्वाज्ञाने तत्र प्रवृत्त्यनुपपत्तिप्रसङ्गादत एव यदा धूमस्तदा वहिरिति व्याप्त्यप्रतिसन्धानेऽपि ज्ञानसामग्रीमहिम्नैव वन्यनुमितो वहुनेवर्तमानत्वज्ञानात्तत्र निःशङ्क प्रवृत्तिरिति चेत, न.पाकरक्ते श्यामोऽयमिति प्रतीतेरयथार्थत्वासिद्धेरिदानीमयं श्याम इत्याकाराभावेन तत्र श्यामतांशे वत्तेमानत्वानवगाहनात, अथ प्रकारतया तत्र विद्यमानत्वाभावेऽपि विशेष्यावच्छेदककालावच्छिन्नविशेषणसम्बन्धस्य संसगेत्वात्संसर्गतया तभानात्सा प्रतीतिरयथार्थेति चेत, तथापि पूर्व श्याम इत्यत्रातीतश्यामतायामिव स घट इत्यत्राऽप्यतीतधर्मवैशिष्ट्यरूपायां तत्तायां विद्यमानत्वप्रतिसन्धानायोगेन स्मृतियाथार्थ्यस्य बाधितुमशक्यत्वात्कादाचित्कसम्बन्धपुरस्कारेणातीतधर्मज्ञानस्याप्यप्रामाण्ये च कादाचित्कसम्बन्धेन सत्प्रतिपक्षितत्वज्ञाने हेतुरपि हेत्वाभासतां भजेत्, अपि KKRASHREE Page #137 -------------------------------------------------------------------------- ________________ GESABSE ॥ मतिज्ञानचानुभवस्मरणयोर्विषयकृतविशेषाभावेऽपि प्रत्यक्षज्ञानस्येदम्पदप्रयोगहेतुत्वात्संस्कारजन्यज्ञानस्य तच्छब्दप्रयोगहेतुत्वात्तदुभया मेदधारणामिलापवलक्षण्यात्स्मतेरप्रामाण्येऽनुभवस्याप्यप्रामाण्यापत्तिः, स्मृतेर्याथार्येऽप्यनुभवप्रमात्वपारतन्त्र्यादप्रमात्वमितिचे,न,अनुमि प्ररूपणाप्रतेरपि व्याप्तिज्ञानादिप्रमात्वपारतन्त्र्येणायथार्थत्वप्रसङ्गाद्, अनुमितरुत्पत्तौ पसपेक्षा विषयपरिच्छेदे तु स्वातन्त्र्यमेवेति चेत, न, सङ्गेन पस्मृतेरप्युत्पत्तावेवानुभवसव्यपेक्षत्वात्स्वविषयपरिच्छेदे तु स्वातन्त्र्यात,अनुभवविषयीकृतभावावभासिन्याः स्मृतेर्विषयपरिच्छेदेऽपि राभिमतन स्वातन्त्र्यमिति चेत्, तर्हि व्याप्तिज्ञानादिविषयीकृतानर्थान् परिच्छिन्दन्त्या अनुमितेरपि प्रामाण्य दूर एव, नैयत्येनाभात एवार्थोऽनुमित्या विषयीक्रियत इति चेत्, तहिं तत्तयाऽभात एवार्थः स्मृत्या विषयीक्रियत इति तुल्यमिति न किञ्चिदेतत ॥ स्मृत्यप्रामा ण्याशंका. वस्तुतः स्मृतित्वप्रमात्वे जन्यत्वप्रयोज्यत्वरूपं नानुभवप्रमात्वपारतन्त्र्यं यदृच्छोपकल्पितं स्वप्रयोजकं, यदि वा परिहारः नुभूतधर्माश्रयत्वरूपा तत्ता स्मृतौ भासते इदन्तशि उद्बुद्धसंस्कारस्यैव तत्तांशे स्मारकत्वात्फलबलेन तथात्वकल्पनाद्धर्मविशेष अनुमितिमादाय सहप्रयोगस्य समर्थनाद्,अनुभवस्मरणयोर्विषयकृतविशेषाभावेऽपि संस्कारजज्ञानत्वेन स्मृतेस्तच्छब्दप्रयोगहेतुत्वे तु निदर्शनेन प्रमुष्टतत्ताकस्मरणादपि तच्छब्दोल्लेखप्रसङ्गात् अनुभवे यद्धर्मवशिष्टयभानं तस्यातीतत्वं तत्ता स्मृतौ भासत इत्यभ्युपगमे चानाग युक्त्या च तविषयकस्मरणादौ तत्तांशेऽप्ययथार्थत्वप्रसङ्गादिति विभाव्यते, तदाप्यनुभूतधर्मे विद्यमानत्वस्याबाधान तस्या अयथार्थत्वम् ॥5/ तत्प्रामाण्यसम्प्रदायानुसारिणस्त्वनुभूयमानत्वलक्षणेदन्तानुभवे भासतेऽनुभूतत्वरूपा च तत्ता स्मृतौ भासतेऽत एव स घट इति स्मृ. व्यवस्थापन त्यभिलापस्य यः प्रागनुभूत इति विवरणं सङ्गच्छते, इदन्ताविषयकानुभवादेव च तत्ताविषयकं स्मरणमुन्मीलति तं विना तु प्रमुष्ट साम्प्रदायिकतत्ताकं तत्, न चानुभूतत्वमेव यदि तत्वा तदा तदवगाह्यनुमितावपि तत्तोल्लेखप्रसङ्ग इति वाच्यम् , उल्लेखो यदि विषयता * तत्त्वप्रदर्शनंच Page #138 -------------------------------------------------------------------------- ________________ CH सविवरण भीज्ञाना व तदा तदभ्युपगमेऽविवादात्, यदि पुनरमिलापस्तदा संस्कारजज्ञानत्वेन तद्धेतुत्वेन तदापत्यभावात्, तथाप्यनुभूतो घटोऽनुभूयमानो घट इत्यनुभवप्रभवस्मरणे तत्तोल्लेखप्रसङ्ग इति चेत्, न, पूर्वानुपस्थितानुभूतत्वानुभूयमानत्वयोरेव तत्तेदन्तापदार्थत्वात्, प्रागनुभूतस्यापि कस्यचित् संसर्गत्वस्येव प्रकारत्वस्यापि सम्भवादित्याहुः, इदन्तानुल्लेख्यनुभवप्रभवस्मरणेऽपि | तत्वाभानात्स्वसामग्रीमहिम्नैव तत्र तत्ता भासत इत्यन्ये, यत्तु तदन्ते स्मृत्यनुभवभासिनी अखण्डे एव वस्तुनी, एवं चेदन्तासंस्कारेणेदन्तैव तत्तया स्मयते प्रमुष्टतत्ताकं तु स्मरणं नास्त्येव ।। हरिहराद्यनुचिन्तनं(ना) च कविकाव्यमूलज्ञानवन्मनःप्रभवेति सर्वा स्मृतिरयथार्थैव, न च क्वचित्प्रमितस्यैवान्यत्रारोपात्कथमन्यत्राप्रमितायास्तचायाः स्मृतावारोप इति वाच्यम्, इदन्तायाः पृथग्भानेन विषयकत्वेन प्रत्यभिज्ञायां तत्तायाः प्रमितत्वात् स्मृताविदन्तायां तत्वारोपसम्भवात्, न च स्मृतेभ्रमत्वे तनियामकनानादोषकल्पने गौरवमिति वाच्यम्, इदन्तांशे उद्बुद्धसंस्कारस्यैव दोषत्वात्, इदन्तानुल्लेख्यनुभवप्रभवस्मरणेऽपि तत्तया धर्मान्तरस्यैवावगाहनान्न तस्या याथार्थ्यमिति, तत्तुच्छं, तत्तास्मृतेः पूर्वमिदन्तोपस्थिति विना तदारोपासम्भवादिदन्तोल्लेखानन्तरमेव तदारोप इत्यत्र मानाभावाद्, भावे वा इदन्तात्वेन तदुल्लेखे विशेषदर्शनादारोपस्यैवाऽसम्भवात, अपि चेदन्ताविषयकसंस्कारस्य स्वरूपत एव तत्ताविषयकस्मृतित्वावच्छेदेनैव हेतुत्वात स्मृतौ तत्तयेदन्ताभानासम्भवः, तत्तावच्छिन्नप्रकारताकस्मृतित्वावच्छेदेन तद्धेतुत्वकल्पने तु तत्र तत्तया जगद्विषयकत्वप्रसङ्मात्,तत्वावच्छिन्नेदम्ताप्रकारकत्वस्य च स्वरूपतस्तत्ता प्रकारकत्वापेक्षया गौरवात्, अपि च तत्ताया अखण्डत्वे स्वरूपतस्तत्प्रकारकत्वावच्छिन प्रत्येव प्रत्यभिज्ञानसाधारण्येनेदन्तांशे उबुद्धसंस्कारस्य हेतुत्वमुचितम्, न च प्रकारतयाऽनुभवत्वावच्छिन्नं प्रति विषयतया ज्ञानत्वेनैव हेतुत्वात्, अन्यथा दण्डाज्ञानेऽपि ॥ तृतीयतरङ्गः मति| ज्ञाननिरू| पणप्रसङ्गे युक्त्या धारणाभेदरूपस्मृति प्रामाण्य व्यवस्था CGPSC GAKELAMMA ॥६१। Page #139 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तत्संस्कारादण्डीतिबुद्धिप्रसङ्गात, तत्ताज्ञानं विना कथं तदनुभव इति वाच्यम्, प्रकारतया संस्काराजन्यज्ञानत्वावच्छिमं प्रत्येव विषयतया ज्ञानत्वेन हेतुत्वात्, इत्थं च तच्छब्दप्रयोगहेतुतापि तत्ताप्रकारकज्ञानत्वेनैवेति स्मृतिप्रत्यभिज्ञयोस्तत्तोल्लेख इति न किश्चिदेतत, किंबहुना ? स घटः सोऽयं घट इति स्मृतिप्रत्यभिज्ञानयोस्तत्तांशे समानाकारत्वात्प्रत्यभिज्ञायाः प्रामाण्ये स्मृतेरपि प्रामाण्यं,स्मृतेरप्रामाण्ये च तथा प्रत्यभिज्ञाया अपि तथात्वं प्रसजेदिति दुरुद्धरा प्रतिबन्दी,न चेदन्तासंस्कारस्यातीततत्तद्धर्मवैशिष्टयस्मृतावेव हेतुत्वमिति युक्तं,एकाकारत्वभङ्गप्रसङ्गाद् गौरवाच्च, यत्तु स्मृतेर्याथार्थेऽपि न प्रमात्वं यथार्थानुभवत्वस्यैव तत्त्वात्, अन्यथा स्मृतेः प्रमात्वे तदसाधारणकारणस्य संस्कारस्य पृथक्प्रमाणत्वप्रसङ्गे मुनिप्रणीतप्रमाणविभागव्याघातप्रसङ्गादिति', तत्तु स्वगृह एव प्रोच्यमानं भ्राजमानतां भजेन तु कथायां, अस्माकंतु प्रत्यक्षत्वपरोक्षत्वाभ्यां द्विधैव प्रमाणविभागाभिधानात्, स्मृतेः परोक्षकुक्षावेव निक्षिप्तत्वान्न किश्चिदनुपपन्नं ।। तस्मात्सत्यप्रवृत्तिजनकत्वादनुभवस्येव स्मृतेरपि प्रामाण्यस्य निराबाधत्वात् साधूक्तमवग्रहेहापायधारणाभेदाच्चतुर्विधं मतिज्ञानमिति, अत्र चावग्रहादीन् शब्दोदाहरणेन सूत्रकारः प्रतिपाद्य " एवं एएणं अभिलावेणं अव्वत्तं स्वं रसं गंधं फासं" इत्याद्यतिदेशसूत्रमाह,ईहादीनामुभयवस्त्ववलम्बनं प्रति नियमकारणं पूरयंस्तदेवानुवदतिस्म भाष्यकार:-"सेसेसु वि रूवाइसु, विसएसु हुन्ति रूवलक्खाई ॥ पायं पच्चासन्न-तणेणमीहाइवत्थूणि ॥२९२॥ [ शेषेष्वपि रूपादिषु, विषयेषु भवन्ति रूपलक्षाणि ॥ प्रायः प्रत्यासन्नत्वेनेहादिवस्तूनि ॥ ] प्रायः 'प्रत्यासत्तिर्हि बहुभिर्द्धमैः सादृश्यं' तत्प्रतियोग्यनुयोगिनावेव धर्मिणावालम्ब्येहादीनां प्रवृत्तिस्वभाव इति, किमयं स्थाणुरुत पुरुष इतिवत्किमयं स्थाणुरुतोष्ट्र इति नेहोदयः, उष्ट्रे स्थाणुप्रत्यासत्यभावादत एव श्रोत्रेन्द्रियप्रत्यासन्नवस्तूपदर्शनं बहुशः प्रदर्शितमिति शेषेन्द्रियप्रत्यासन्नवस्तूनि MA%ECEMACROMANSAR मतिज्ञाननिरूपणप्रसङ्गेस्मृतेः प्रामाण्ये प्रमाणविभागव्याघाताशंकापरिहारः तदुपसंहारः। AKAKISANKRISHRSS Page #140 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तृतीयस्त सविवरणं भीज्ञाना वप्रकरणम्॥ ॥६२॥ SRUSSS रङ्गः मति प्यज्ञानमीत्पू र्वकहाया अप्रवृत्तेरित्याहस्य तद्धेतुत्वान्न दोष TA ACCOMCALCULATEEKAR सञ्जिघृक्षुराह-" थाणुपुरिसाइकठ्ठ-प्पलाइसंभियकरिल्लमंसाइ ॥ सप्पुप्पलणालाइ व, समाणरूवाई विसयाई ॥ २९३ ॥" [स्थाणुपुरुषादिकुष्ठोत्पलादिसम्भृतकरीलमांसादि ॥ सर्पोत्पलनालादिवत्समानरूपादिविषयाणि ॥ ] संभियकरिल्लत्ति संभृतानि संस्कृतानि, करीलानि वंशजालफलानि, स्पष्टमन्यत्॥४॥ ननु प्रत्यासत्तिर्यदि स्वरूपसतीहानिबन्धमं तर्खे कत्र धर्मिणि दृष्टे सकलसत्प्रत्यासत्रवस्त्ववलम्बीहोदयप्रसङ्गोऽविशेषाद, न च प्रत्यासत्तिग्रहस्य तद्धेतुत्वान्न दोष इति वाच्यम्, सद्गर्भायाः सादृश्यरूपप्रत्यासत्तेऽहे संशयाभावात्तत्पूर्वकेहाया अप्रवृत्तेरित्यत आह सारूप्यज्ञानमीहादौ, कोटिस्मारकतां भजत् ॥ नियन्तुं प्रभवत्युच्चै-रुभयस्यावलम्बनम् ॥५॥ स्थाणुपुरुषयोः सादृश्यज्ञाने सति हि स्थाणुदर्शनोतरमुबुद्धसंस्कारेण स्थाणुत्वपुरुषत्वोभयकोटिस्मरणेन तदुभयसहचरितधर्मवत्ताज्ञानेन दोषमहिम्नाऽसंसर्गाग्रहाच्च संशयोत्पत्तावहादिप्रादुर्भावात्रोमयावगाहित्वं नानियतं, एतेन 'भ्रमसंशयोत्तरप्रत्यक्षं प्रत्येव विशेषदर्शनस्य हेतुत्वात्सर्वत्र प्रत्यक्षनिर्णये ईहाया हेतुत्वमप्रमाणिकमिति' निरस्तं, संशयोत्तरमेव निर्णयाभ्युपगमाद्, वस्तुतः संशयोत्तरप्रत्यक्षत्वं न विशेषदर्शनकार्यतावच्छेदकं, संशयोचरत्वस्य दुर्वचत्वात्, संशयोत्तरं विशेषदर्शनं विनाऽपि संशयानुत्तरप्रत्यक्षप्रसङ्गाच, संशयानुत्तरप्रत्यक्षे संशयामावस्य हेतुत्वकल्पनेऽतिगौरवात् प्रत्यक्षनिश्चयत्वावच्छिन्नं प्रतीहाया हेतुत्वस्यैव युक्तत्वात्, ॥५॥ अथ " से जहा णामए केइ पुरिसे अवत्तं सुमिणं पासिजा" इत्यादि सूत्रमनुस- | त्येन्द्रियाणामिव मनसोऽप्यवग्रहादयः स्वप्नादौ सम्भवन्तीत्याह स्वप्नादावपि शब्दादि-विषयाऽवग्रहादयः ॥ मनसोऽपि लसन्त्येव, हृषीकव्यापृति विना ॥६॥ ज्ञाननिरूपणप्रस नेहादिनिरूपणे दृष्टान्तीकृतप्रत्यासन्नवस्तु. प्ररूणं प्रत्यासत्तिस्वरूपं च ॥ न विशेषनिर्णय मानानोमपालपुरुषसोमवावल ASSISARLS ॥६२॥ Page #141 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मनसोऽपि स्वमादाविन्द्रियव्यापारं विनाऽवग्रहादयः प्रादुर्भवन्ति, तथाहि स्वप्ने गीतादिश्रवणे प्रथममव्यक्तशब्दज्ञानं भवति, ततः किमयं शब्दोऽशब्दो वेतीहा प्रवर्तते, ततः शब्द एवायमित्यपायः, ततश्च धारणेति ॥ एवं जाग्रतोऽपि मनसैव बहलतमे तमसि घटादिपदार्थपर्यालोचनदशायां मानसा अवग्रहादयो द्रष्टव्या । आह च - " एवं चिय सिमिणाइसु, मणसो सद्दाइ बिसएस || होन्तिदियवावारा- भावे वि अवग्गहादीया ॥ २९४ ॥ " [ एवमेव स्वप्नादिषु मनसः शब्दादिषु विषयेषु । भवन्तीन्द्रिय व्यापारा - भावेऽप्यवग्रहादयः ॥ ] ॥ ६ ॥ अथावग्रहादीनां सूत्रोक्तक्रमनियमे हेतुमाह व्यतिक्रमोत्क्रमौ नैतै- नैतेषां तत्त्वनिर्णयः । नेदृग् ज्ञेयस्वभावोऽपि तदेते नियतक्रमाः ॥ ७ ॥ अनानुपूर्वीभवनं व्यतिक्रमः, पश्चानुपूर्वीभवनमुत्क्रमः, अन्यतरवैकल्यं शून्यत्वमेतैर्वस्तुनस्तच्चनिर्णयो न स्यात्, तदेते एव वस्तुनिर्णयाय सर्वेऽपि क्रमनियमेनान्वेषणीयाः, न ह्यनत्रगृहीतमीझते, धर्मिणोऽप्रसिद्धौ निरालम्बनविचाराप्रवृत्तेः, न चानीहितं निश्चीयते, तस्य विचारपूर्वकत्वात् न च विचारं विनाऽपि कारणमहिम्ना तदुत्पादो युक्तो विचारस्यापि तत्कारणत्वेन तद्विरहे कारणमहिम्न एवासिद्धेः, न चानिश्चितं धार्यते, अन्यथा सन्देहादपि तत्प्रसङ्गादिति, वस्तुनोऽपि च सामान्यविशेषरूपः स्वभावस्तथा ज्ञानयोग्यतयैव व्यवस्थित इति तस्य तथाभावो युक्तः ॥ यदाह - " उक्कमओइकमओ, एगाभावे विवाण वत्थुस्स ॥ जं सम्भावाहिगमो, तो सब्वे णियमियकमा य ॥ २९५ ॥ " [ उत्क्रमतोऽतिक्रमत, एकाभावेऽपि वा न वस्तुनः ॥ यत्स्वभावाधिगमः, ततः सर्वे नियमितक्रमाश्च ।। ] " ईहिज्जर णाऽगहियं, णज्जह नाणीहियं न याणायं ॥ धारिज्जइ जं वत्युं, ते कमोवग्गहाई ॥ २९६ ॥ " [ईझते नाऽगृहीतं ज्ञायते नानीहितं न चाज्ञातम् ॥ धार्यते यद्वस्तु तेन, क्रमोऽवग्रहादिकः ] ॥ मतिज्ञानप्रसङ्गे स्वभ दृष्टान्तेन मानसाव ग्रहादिप्ररूपण, अवग्रहार्दिक्रम कारणप्रद र्शनं च ॥ Page #142 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं भीखाना प्रकरणम्॥ " एतो चिय ते सव्वे, भवन्ति भिन्ना य व समकालं ॥ न वइकमो य तेसिं, ण अन्नहा नेयसन्मावो । २९७॥" [इत एव ते सर्वे भवन्ति भिन्नाश्च नैव समकालं ॥ न व्यतिक्रमश्च तेषां, नान्यथा ज्ञेयसद्भावः] ॥७॥ नन्वभ्यस्ते पुरुषेऽयं पुरुष इति प्रथममेव निर्णयः समुन्मीलति, अनुभूते च संस्कारोबोधात्प्रथममेव स पुरुष इति स्मृतिरुल्लसत्यनुभूयते च झटित्येवायं पुरुषों निरणायि, झटित्येव चैनमस्मार्षमिति च, तथा च कथमन्यतराभावे न वस्तुभावज्ञानम् ॥आह च-"अब्भत्थेवाओ चिय, कत्थइ लक्खिज्जइ इमो पुरिसो ॥ अण्णत्थ धारण चिय, पुरोवलद्धे इमं तं ति ॥२९८॥"[अभ्यस्तेऽपाय एव क्वचिल्लक्ष्यतेऽसौ पुरुषः ॥ अन्यत्र धारणैव पुरोपलब्धे इदं तदिति ॥] अत्रोच्यते अभ्यस्ते निर्णयस्मृत्यो-लेक्ष्यः सौम्येण न क्रमः॥ पद्मपत्रशतच्छेदे, यथा वाऽन्यत्र बुद्धिषु ॥ ८॥ उक्तापायस्मृत्योरवग्रहेहादिष्वीहादेः कालसौक्षम्यादलक्षणेऽप्युक्तक्रमस्य प्रमाणसिद्धत्वान्न तत्र तदपलापः कर्तुं शक्यः, न हि पद्मपत्रशतच्छेदे सत्यपि कालभेदे तदलक्षणेन तदभावो नाम, न वा दीर्घशुष्कशष्कुलीभक्षणे तद्रपदर्शनतज्जनितशब्दश्रवणतद्गन्धाघ्राणतद्रसास्वादनतत्स्पर्शोपलब्धीनां योगपद्याभिमानेऽपि कारणक्रमनियतस्तत्क्रमो प्रमाणसिद्धोऽपि नास्तीति वक्तुं शक्यते, एकदैकोपयोगस्वभावत्वान्मनसः सर्वेन्द्रियेषु तदसम्बन्धादाशुसञ्चारित्वेनैव तेनाशुकार्यजननात्, तथा च पारमर्ष-"जो मणे देवासुरमणुआणं, तंसि तंसि समयंसित्ति ॥" ननु भवतां मनसः शरीरव्यापित्वेन सर्वदा सर्वेन्द्रियसंयोगायुगपदनेकज्ञानोत्पत्तिर्दुर्वारा तदणुत्वाभ्युपगम एवेन्द्रियेषु तत्संयोगक्रमेण ज्ञानक्रमसम्भवादिति चेत्, न, अणुत्वाभ्युपगमेऽपि तस्य रसनेन्द्रियसंयोगकाले स्वसंयोगस्य दुनिंवारत्वाद् युगपदुभयज्ञानोत्पत्तेरनिवार्यत्वात्, अदृष्टवैचित्र्यमहिम्नैव तद्वारणे च चित्तोपयोगक्रमादेव ज्ञानक्रम ॥ तृतीयः तरङ्गः॥ | मतिज्ञानप्रसङ्गे अबहादिक्रमहेतु प्रदर्शनं तत्र ८ चाभ्यस्ते क. माभावशंका परिहारश्च ॥ SHESHASHEMA ॥ ६३॥ Page #143 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ALANKARI इति युक्तमभ्युगन्तुमिति दिग्॥ तदिदमभिप्रेत्याह-"उप्पलदलसयवेहे ब्व, दुब्विभावतणेण पडिहाई ॥ समयं व सुक्कसक्कुलिदसणे, विसयाणमुवलद्धी ।। २९९ ॥" [ उत्पलदलशतवेध इव दुर्विभावत्वेन प्रतिभाति ।। समयं वा शुष्कशष्कुलीदशने विषयाणामुपलब्धिः॥] अभ्यासस्थलेऽप्ययं पुरुष इति निर्णयेऽयं पुरुष इति प्रयोगे कुत इति कस्यचिदाकाङ्क्षायां करचरणादिमत्त्वादिति प्रयोगात्तदनुगुणेहादेरनुमानात्तत्र तत्सत्त्वं सिद्धथतीत्यप्याहुः ॥ ८॥ अथ 'भेयवत्थू समासेणं' ति नियुक्तिगाथाsवयवेनावग्रहादयो मतिज्ञानस्य सामान्यभेदा इत्युक्तमिति विशेषभेदाः किमधिका अपि सम्भवन्तीति शिष्याकाङ्क्षायामाह- श्रोत्रादिभेदात् षोढा स्यु-र्यदर्थावग्रहादयः॥ चतुर्दा व्यञ्जनं तेन, स्युरष्टाविंशतिर्भिदाः॥९॥ श्रोत्रादीन्द्रियपञ्चकं नोइन्द्रियश्च मन आश्रित्यार्थावग्रहादयश्चत्वारो भेदाः षड्भिः संगुणिताश्चतुर्विशतिर्भवन्ति तत्र च नयनमनोवर्जेन्द्रियभेदाच्चतुर्विधव्यञ्जनावग्रहप्रक्षेपे पूर्वोक्तभेदचतुष्टयापेक्षया विस्तरेण वक्ष्यमाणभेदापेक्षया च सक्क्षेपेणाष्टाविंशतिः श्रुतनिश्रितमतिज्ञानस्य भेदाः सम्पद्यन्ते । आह च-" सोइंदिआइभेएण, छव्विहावम्गहादओऽभिहिया ॥ ते हुन्ति चउव्वीसं, चउव्विहं वंजणोग्गहणं ॥३००॥ अठ्ठावीसइभेयं एयं सुअणिस्सि समासेणं ति ॥ [ोत्रेन्द्रियादिभेदेन षड्विधा अव ग्रहादयोऽभिहिताः॥ ते भवन्ति चतुर्विंशतिश्चतुर्विध, व्यञ्जनावग्रहणम् ॥ अष्टाविंशतिभेदमेतच्छृतनिश्चितं समासेन ॥] ॥९॥ अथ केचित्तु चतुर्विधव्यञ्जनावग्रहस्थले औत्पत्तिक्यादिभेदेन चतुर्विधमश्रुतनिश्रितं प्रक्षिप्य सामान्यतो मतिज्ञानस्याष्टाविंशतिभेदानुपपादयन्ति तन्मतं पूर्वमनूध पयति- , व्यञ्जनावग्रहस्थाने, चतुर्दा श्रुतनिश्रितम् ॥ केचित् क्षिपन्ति तवस-तदन्तर्भूतिसम्भवात् ॥१०॥ ॥ मतिज्ञान प्ररूपणप्रस सामान्यतो विशेषतश्व मतिज्ञानभेदप्रदर्शनं तत्र परारेका परिहारश्च ॥ KARANG Page #144 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना DECE प्रकरणम् ।। ।।६४ ॥ न खलु व्यञ्जनावग्रहार्थावग्रहाववग्रहत्वेन रूपेणैकीकृत्योत्पत्तिक्यादिभेदचतुष्टयप्रक्षेपेण श्रुतनिश्रिताश्रुतनिश्रितसाधारण्येनाष्टाविंशतिभेदपरिगणनं युक्तं, औत्पत्तिक्यादीनां चतुर्णा भेदानामवग्रहादिष्ववान्तर्भावात, तथा हि 'द्वितीयकुर्कुटमन्तरेण मदीयः कुर्कुटो योद्धव्य' इति राज्ञादिष्टे परीक्षापात्रस्य भरतस्यौत्पत्तिकी प्रादुर्बभूव, तत्र दर्याध्मातत्वादयं स्वप्रतिविम्बं दृष्ट्वा युध्येतेत्यवगृह्यते, तत्प्रतिबिम्बं किं तडागपयःपूरादिगतं तदनुगुणीभवति दर्पणादिगतं वेति तदनन्तरमीह्यते, ततः कल्लोलादिभिः प्रतिक्षणमपनीयमानत्वादस्पष्टत्वाच्च जलादिगतं बिम्ब न तथा, स्थिरत्वेन स्पष्टत्वेन चरणघाताद्यन्वीक्षणयोग्यत्वेन च दर्पणगतमेव तत्तथेति निश्चीयते इति । आह च-"केइत्तु वंजणोगह-वज्जे छोद्णमेयम्मि ॥३०१॥ अस्सुअणिस्सिअमेयं, अठ्ठावीसइविहन्ति भासन्ति ॥ जमवग्गहो दुभेओ-वग्गहसामन्नो गहिओ ।। ३०२ ॥" [ केचित्तु व्यञ्जनावग्रहवर्जे क्षिप्त्वैतस्मिन् ॥ अश्रुतनिश्रितमेवमष्टाविंशतिविधमिति भाषन्ते ।। यदवग्रहो विभेदोऽवग्रहसामान्यतो गृहीतः॥]" चउवइरित्ताभावा, जम्हा ण तमोग्गहाइओ भिन्न ॥ तेणोग्गहाइसाम-मओ अतं तग्गयं चेव ॥३०॥"[चतुर्व्यतिरिक्ताभावाद्,यस्मान तदवग्रहादयः॥ भिन्नं तेनावग्रहादिसामान्यतश्चतत्तद्गतमेव ।।] किह पडिकुकुडहीणो, जुज्झे बिबण वग्गहा ईहा।। किं सुसिलिट्ठमधाओ, दप्पणसंकंतबिम्ब ति ॥३०४॥" [कथं प्रतिकुर्कुटहीनो युध्येत बिम्बेनावग्रह ईहा ।। किं सुश्लिष्टमपायो दर्पणसंक्रान्तप्रतिविम्बमिति । ] नन्ववग्रहादिभ्य औत्पत्तिक्यादीनामपि कथञ्चिभेदोऽस्त्येव सर्वथा भेदस्त्ववग्रहोत्तरविशेषाणामपि नास्त्येवावग्रहत्वेन तयोरभेदादिति चेत्, न, अश्रुतनिश्रितविभाजकोपाधीनामवग्रहादिविभाजकोपाध्यव्याप्यत्वेनोत्तरभेदासम्भवात्, औत्पत्तिक्यादिभेदेन मतिज्ञानस्य साक्षाद्विभागे तु न्यूनत्वापातात, अवग्रहायन्तर्भावेन विभागे त्वाधिक्यान् व्याप्यव्याप्योपाधिना साक्षाद्विभागाऽयोगाच्च, अत एव श्रुत SAN SAHU तृतीयस्तर गतिज्ञानप्ररूपणप्रस ऽष्टाविंशतिसंख्यापू. ग्णाय परकल्पितस्यौ त्पत्तिक्या| दिक्षेपणस्य तेषामवनहादिष्वन्तभर्भावेन परिहरणम् ॥ ॥६४॥ ॐ Page #145 -------------------------------------------------------------------------- ________________ निश्रितत्वाश्रुतनिश्रितत्वाभ्यां मतिज्ञानत्वसाक्षाद्व्याप्योपाधिभ्यां द्विघा तद्विभागः सूत्रोक्तो न विशीर्येत, मतिज्ञानत्वेन तयोरभेदेऽपि प्रातिस्विकरूपाभ्यां भेदसम्भवाद, अवग्रहत्वेनाभिन्नानामिव श्रोत्राद्यवग्रहाणाम् ॥ तदुक्तम् - " जह उग्गहाइसामण्णए वि, सोइंदिआइणा भयो | तह ओग्गहाइसामण्णए वि, तमणिस्सिया भिण्णं ॥ ३०५ ॥ " [ यथाऽवग्रहादि - सामान्येऽपि श्रोत्रेन्द्रियादिना भेदः ॥ तथाऽवग्रहादिसामान्येऽपि तदनिश्रितत्वाद् भिन्नम् ॥ ] एवं च श्रुतनिश्रितविभाजकोपाधिमिरौत्पत्तिकीत्वादिभिस्तस्यापि चतुर्द्धा विभागः सङ्गच्छते । तस्मान्मतिज्ञानस्य श्रुतनिश्रितत्वा श्रुतनिश्रितत्वाभ्यां सामान्यतो द्विधाविभागः, श्रुतनिश्रितस्य चाष्टाविंशतिर्भेदैरश्रुतनिश्रितस्य च चतुर्भिर्भेदैर्विशेषविभाग इति विवेकः, अत एव सम्पूर्ण श्रुतनिश्रितं प्ररूप्य 'से किं तं अस्सुअणिस्सिअं ' इत्यादिना ग्रन्थेन सूत्रेऽश्रुतनिश्रितप्ररूपणं प्रत्यज्ञायि, अन्यथा तु प्रागेव तदनिरूपणे न्यूनत्वप्रसङ्गः । आह च- 'अट्ठावीसहमेअं, सुअणिस्सि अमेव केवलं तम्हा || जम्हा तम्मि समचे, पुरस्अणिस्सिअं भणिअं ॥ ३०६॥ [ अष्टाविंशतिभेदं श्रुतनिश्रितमेव केवलं तस्मात् ॥ यस्मात्तस्मिन्समाप्ते, पुनरश्रुतनिश्रितं भणितम् ।। ] ननु मतिज्ञानस्यावग्रहादयश्वत्वार एव भेदा अवग्रहादिभेदास्तु प्रभेदा इति कथमुच्यतेऽष्टाविंशतिर्मतेर्भेदा इति, सत्यम्, प्रभेदानामपि भेदत्वेन विवक्षणादाधिक्येऽपि तावतां भेदानां तावदन्यतरत्वेन मतिज्ञानत्वव्यापक(प्य) त्वाद्विभागवचनस्याव्याघाताच्च सम्प्रदायानुरोधादिकं विनैव हि क्वचिदेतादृशविभागस्याप्रामाणिकत्वमिति, अथवा 'समासेन भेदवस्तूनि' इत्यत्र भेदवस्तुत्वे समासेनेत्यनुकूलं विशेषणं प्रभेदास्तु बहवोऽपि भवन्तीत्यर्थः ॥ १० ॥ अथैवमष्टाविंशतिविधत्वं मतिज्ञानस्योपदर्श्य प्रकारान्तरेण प्रभेदबाहुल्यघटितं बहुभेदत्वमुपदर्शयति — ॥ मतिज्ञान प्ररूपणप्रस ङ्गेऽष्टाविंश तिसंख्या पूरणाय पर कल्पितस्य अश्रुतनि श्रितभेद क्षेपणस्य तेषामवग्रहा दावन्तर्भावप्रदर्शनास्परिहारः ॥ Page #146 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं भीज्ञाना प्रकरणम् ॥ ॥६५॥ सEिWS नाना-नानाविध-क्षिप्रा-ऽनिश्रिता-निश्चित-ध्रुवैः ॥ षद्भिशच्छतभेदाः स्युः सेतरावग्रहादिभिः ॥११॥ अवग्रहादयः प्रागुक्तदिशाष्टाविंशतिभेदभाजो बहुबहुविध(धादिभिः)नानानानाविधक्षिप्राऽनिश्रितानिश्चितध्रुवैः सप्रतिपक्षैः द्वादशभिर्भेदैर्गुणिताः षट्त्रिंशदधिकानि त्रीणि शतानि भेदा भवन्ति । अत्र बहुबहुविधेतिस्थाने नानानाविधेति बन्धानुलोम्यादुक्तम् । तदाह-"जं बहुबहुविहखिप्पा-णिस्सिअणिच्छियधुवेयरविभिन्ना ॥ पुणरुग्गहादओ तो, तं छत्तीसतिसयभे ॥३०७॥" [यद् बहुबहुविवक्षिप्राऽनिश्रितनिश्चितधुवेतरविभिन्नाः।। पुनरवग्रहादयस्ततस्तत्पत्रिंशत्रिशतभेदम् ॥]॥११॥ अथ बवादीनां स्वरूपमाह नानार्थानां बहुत्वं हि, पृथग्जात्यवभासिता ॥ नानात्वान्नैवत्वेन न) तज्ज्ञप्ति-रबहुत्वं प्रचक्षते ॥१२॥ प्रत्येकं बहुधर्माणां, ज्ञानं बहुविधं मतम् । प्रत्येकं स्वल्पधर्माणां, विज्ञानं तद्विपर्ययः ॥ १३ ॥ क्षिप्रं त्वरितमुत्पन्न-मक्षिप्रं तु विलम्बितम् ॥ अनिश्रितमलिङ्गोत्थं, निश्रितं लिङ्गसम्भवम् ॥ १४ ॥ निश्चितं संशयातीतं, तेन ग्रस्तमनिश्चितम् ।। सर्वदा यत्तथाग्राहि, ध्रुवं तच्चान्यदाऽध्रुवम् ॥१५॥ बहूनां विषयाणां प्रातिस्विकधर्मप्रकारकग्रहो बहुज्ञान, यथा तत्त्वं बहुत्वं च 'सकलस्वविषयनिष्ठयावदसाधारणधर्मप्रकारकत्वं,' साकल्यञ्चानेकाशेषत्वं, न त्वशेषत्वमात्र, यावत्वं च व्यापकत्वं, तेन घटोऽयमित्याद्यव्यावहारिकावग्रहेऽशेषस्वविषयनिष्ठाशेषधर्मग्राहिण्यपि बहुत्वव्यवहाराभावे न क्षतिर्न वा नानातूर्यजनितेषु शब्देषु कतिपयविशेषावभासेऽपि बहुत्वव्यवहारः, कतिपयविशेषावभासेऽपि ततः स्वल्पविशेषापेक्षया बहुत्वव्यवहाराद् , यावत्त्वमनेकत्वमेव वा विवक्षित, नैश्चयिकार्थावग्रहापेक्षयाऽऽद्य व्यावहारिकार्थावग्रहेपि बहुत्वव्यवहारे तु साकल्यमप्यशेषत्वमेव, अबहुत्वं च तद्भिज्ञानत्वं,' तत्त्वं चासाधारणधर्मानुपरागेण CREATEGORIGI ॥ तृतीयः तरङ्गः ॥ मतिज्ञानप्ररूपणप्रसविशेषतो मतिज्ञानप्रभेदबहुस्वप्रदर्शनार्थं बहु| बहुविधादि| भेदनिरू पणं ॥ ॥६५॥ Page #147 -------------------------------------------------------------------------- ________________ R ॥मतिज्ञान| प्ररूपण प्रसङ्गे बहु| बहुविधादि५ भेदानां लक्ष. णानि तात्पयंप्रकाशन AAAAAAECERE बहुविषयग्राहित्वं 'नानाशब्दा एते' इत्यादिसामान्यज्ञानं हि तदिति, एवम् 'अशेषस्वविषयनिष्ठानेकासाधारणधर्मव्याप्यबहतरधर्मावगाहिज्ञानं बहुविधं, न चैवं बहुविधस्यापि बहुत्वापत्तिस्तल्लक्षणसत्त्वादिति वाच्यम्, उपधेयसङ्करेऽप्युपाध्योरसङ्कराद्विवक्षाद्वैविध्येन तत्र द्विधाव्यवहाराच, अबहुविधत्वं च न बहुविधभिन्नज्ञानत्वं, बहुज्ञानेऽतिव्याप्तेः, किन्त्वव विधमित्यत्र नञः पर्युदासाश्रयणाद् अशेषस्वविषयनिष्ठानेकासाधारणधर्मव्याप्यस्वल्पतरधर्मावगाहित्वं' तदिति, बहुज्ञानेन पृथग्भिन्नजातीयतया गहीतेषु नानाशक्खपणवादिशब्देषु एकैकं शलभेर्यादिशब्दमाश्रित्य स्निग्धत्वमधुरत्वतरुणमध्यमवृद्धपुरुषवाद्यत्वादिबहुविधधर्मवशिष्टचं गृण्हदेव हि बहुविधज्ञानमुदायिते, तत्र स्निग्धमधुरत्वादिस्वल्पधर्मवैशिष्टयज्ञानश्चाबहुविधमिति । क्षिप्रत्वं च नाविलम्बितोत्पत्तिकत्वम्, अक्षिप्रत्वञ्च न विलम्बितोत्पत्तिकत्वं, सामग्रीसनिधानासन्निधानाभ्यां सर्वस्यापि विलम्बिताविलम्बितोत्पत्तिकत्वात्,नापि विमर्शानपेक्षोत्पत्तिकत्वं क्षिप्रत्वम्, अपायस्य सतो विमर्शसव्यपेक्षत्वनियमात, किन्तु 'झटित्युपनतसामग्रीकत्वं' क्षिप्रत्वं, अतादृशत्वं त्वक्षिप्रत्वमिति॥'झटिति सामग्रयुपनिपातनियामकादृष्टजन्यतावच्छेदकजातिविशेषवत्वं' क्षिप्रत्वमित्यपि कश्चित्, 'प्रबलतरसंस्काराधीनझटित्युपस्थितिकविमर्शजन्यत्वं' तत्त्वमित्यन्ये । अनिश्रितं लिङ्गानपेक्षोत्पत्तिकं पताकादिनिश्रया देवकुलादिदर्शनवद्, यन लिङ्गनिश्रामपेक्षते यद्यप्यन्वयव्यतिरेकधर्मान्वेषणरूपामीहामपेक्षमाणः सर्व एवाऽपायो लिङ्गमपेक्षत एव तथाप्यनुमितिसामग्रीसम्पत्तिरूपा लिङ्गनिश्रा यत्र नास्ति तदनिश्रितं, अन्यत्तु निश्रितमिति ध्येयम् ॥ निश्चितत्वमसन्दिग्धविषयकत्वं 'प्रामाण्यसंशयादिरूपविषयसंशयसामग्रथनास्कन्दितत्वम्', तद्विपरीतत्वमनिश्चितत्वं, ध्रुवत्वं च 'सर्वकालमेकजातीयसामग्रीसमुत्पाद्यत्वम्', अतादृशत्वं त्वध्रुवत्वमिति । आह च | विलम्बिताविलम्बितोतया पक्षप्रत्वं, अतादृशावत्रसंस्काराधीनझटित्युपस्थितिवामपक्षते यमप्यन्वयध्यवित्र नास्ति तदनिश्रित, है ECEBCALCARRIERICA Page #148 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं भीज्ञाना प्रकरणम्॥ ASSAUL " नाणासइसमूह, बहुं पिहं मुणइ भिन्नजातीयं ॥ बहुविहमणेगमेयं, एक्ककं णिमहुराइ ॥ ३०८॥ [नानाशब्दसमूह, बहु पृथग्जानाति भिन्नजातीयम् ।। बहुविधमनेकमेदमे-कैकं स्निग्धमधुरादिम् ॥] "खिप्पमचिरेण तं चिय, सरूवओजं अणिस्सिअमलिंगं ।। निच्छियमसंसयं जं, धुवमचंतं न य (उ) कयाइ ॥३०९॥" [क्षिप्रमचिरेण तमेव स्वरूपतो यमनिश्रितमलिङ्गम् । निश्चितमसंशयं ध्रुवमत्यन्तं नतु कदाचित् ॥ ] "एत्तो च्चिय पडिवक्खं साहिजा [एतस्मादेव प्रतिपक्षं कथयेद् ]॥३१०॥" निश्रितानिश्रितयोश्चायमपि विशेषः, यद् 'अतस्मिंस्तद्धर्मग्रहो निश्रितं' यथा गव्यश्वत्वग्रह इति, इतरचानिश्रितमिति ॥ आह च"निस्सिए विसेसो वा ॥ परधम्मेहि विमिस्सं, निस्सिअमविणिस्सियं इयरं ॥३१०॥" [निश्रिते विशेषो वा, परधर्मविमिश्र निश्रितमविनिश्रितमितरत् ] स्यादेतत् , बवादयो भेदाः स्पष्टार्थग्राहकष्वपायादिषु सम्भवन्तु, अस्पष्टार्थग्राहिण्यर्थावग्रहे तु कथं तत्सम्भवः । न च नैश्चयिकार्थावग्रहे तदसम्भवेऽपि व्यावहारिकार्थावग्रहे तत्सम्मवान्न दोष इत्युक्तमिति वाच्यम्, तथापि व्यञ्जनावग्रहे सर्वथा तदसम्भवेनोक्तसङ्ख्याव्याघातादिति, मैवं, व्यञ्जनावग्रहादीनामप्यपायादिकारणत्वेन तद्गतबहुत्वादिविशेषस्य योग्यतया व्यञ्जनावग्रहादिष्वपि सत्त्वाद्, 'नद्यविशिष्टात् कारणाद्विशिष्टं कार्यमुत्पत्तुमर्हति' कोद्रवीजादेरपि शालिफलादिप्रसवप्रसङ्गादिति सम्प्रदायः। ननु कार्यगतयावद्धर्माणां कारणगतत्वाभ्युपगम एव सूक्ष्मतारूपयोग्यतया तत्र तत्सत्त्वमभ्युपगमाहे स्यात्, तच्च साङ्ख्यप्रक्रियादृषण एव दक्षितं 'अविशिष्टात् कारणाद्विशिष्टकार्यानुत्पत्तिस्तु' तादृशातिशयव्यतिरेकाद्वा तथाविधसहकारिव्यतिरेकाद्वेत्यन्यदेव, तथा च कथमेतदुक्तमिति चेत्, न, एकसन्तानगामित्वरूपयोग्यतां पुरस्कृत्य बह्वादिविशेषस्य व्यञ्जनावग्रहादिषु सम्भवाभिप्रायेण तदभिधानात् । नन्वेवंविधं वैचित्र्यं मतिज्ञानस्य विवक्षाभेदादनवस्थितमित्यनवस्थितो विभागा ॥ तृतीयः तरङ्गः॥ मतिज्ञानप्ररूपणप्रसङ्गे बहुबहुविधादि| भेदलक्षणसंवादः तत्र चारेकापरिहारादिप्ररूपणं च ॥ Page #149 -------------------------------------------------------------------------- ________________ स्यादिति चेत्, सत्य, सामान्यविशेषभावेन विभागस्य विवक्षाधीनव्यवस्थितिकत्वाद् बाह्यनिमित्तस्यालोकविषयादिकस्य स्पष्टाव्यक्तमध्यमाल्पमहत्त्वसन्निकर्षप्रकर्षादिभेदेन वैचित्र्यादभ्यन्तरनिमित्तस्य चावरणक्षयोपशमोपयोगोपकरणोन्द्रयरूपस्य शुद्धाशुद्धमतिभेदेन वैचित्र्यान्मतिज्ञानस्य नानात्वसम्भवाद् यथोक्तनिमित्तद्वयस्य केनचिद्रूपेण विशेषे तु मतिज्ञानवतां जीवानामनन्तत्वात्तेषां क्षयोपशमादिभेदेन मतिज्ञानस्यानन्तत्वात् ,आह च-"एवं बज्झन्भन्तर-णिमित्तवइचित्तओमइबहुत्तं ।। किंचिम्मचविसेसेणं,भिज्जमाणं पुणोणतं ॥३११॥"[एवं बाह्याभ्यन्तरनिमित्तवैचित्र्यतो मतिबहुत्वम् ।। किञ्चिन्मात्रविशेषेण, भिद्यमानं पुनरनन्तम् ॥] नन्ववग्रहादयः स्पष्टार्थनिर्भासाभावान ज्ञानं,न च संशयाधनन्तर्भावात्तेषां ज्ञानत्वमनुमानवदिति वाच्यम्,असिद्धेः,तथाहि, सन्दिग्धे ज्ञानसंशयस्तावद् व्यक्त एव ज्ञानप्रामाण्यसंशयमहिम्ना जनितस्यापि विषयसंशयस्यैकोपयोगसन्तानान्तर्भावित्वेन निश्चयस्वरूपपरावर्तकत्वात्सन्दिग्धे च कदाचिनिश्चयाद्विपर्ययोऽपि भवत्येव, दोषमहिम्ना विपरीतविशेषदर्शनेन सत्यकोटिज्ञानप्रतिवन्धेडर्थात्तत्सम्भवात्, अथवेहैव स्पष्टं संशयरूपां गामश्वत्वेनावगाहमानं निश्रितज्ञानं च व्यक्तं विपर्यय एवेति किमितरगवेषणया, नैश्चयिकोऽर्थावग्रहश्च स्पष्टमनध्यवसाय एवानिर्देश्यसामान्यमात्रग्राहित्वादिति ॥ आह च-"इह संसयादणन्त-भावाओ वग्गहादओ नाणं ॥ अणुमाणमिवाह,ण सं-सयाईसब्भावओ तेसुं ।।३१२॥ नणु संदिद्ध संसय-विवजया संसओत्थ चेहा वि।। वच्चासो वा निस्सिअ-मवग्गहोऽणज्झवसि तु ॥३१३।। "[इह संशयाद्यनन्तर्भावादवग्रहादयो ज्ञानम् ॥ अनुमानमिवाऽऽह,न,संशयादिसद्भावतस्तेषु ॥ ननु संदिग्धे संशय-विपर्ययौ संशय इह चेहापि ॥ व्यत्यासो वा निश्रितमवग्रहोऽनध्यवसितं तु] अत्राहुमा यदुक्तम्'सन्दिग्धे संशयविपर्ययाविति। तदयुक्तम्-वस्त्वप्रापकसन्दिग्धत्वस्य तत्राभावात्, अन्यादृशसन्दिग्धत्वमात्रेण चाज्ञानतानापत्ते CLASSAULACES मतिज्ञान प्ररूपण ४प्रसङ्गे तद्भे दानां निमित्त भेदाद्विभाग४ वैचित्र्यं, अ वग्रहादीनां ज्ञानत्वव्यवस्थापनं च ॥ Page #150 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं भीज्ञाना र्णव प्रकरणम्॥ ॥६७॥ KHABAR ॥ तृतीयः तरङ्गः ॥ मतिज्ञानप्ररूपण प्रसङ्गे तत्र परोक्तारेकापरि-. रन्यथा व्यवहारोच्छेदप्रसङ्गात्, न खलु धूमबलाकादेः सकाशात्सम्यग्दहनजलादौ निश्चितेऽपि मुखेन तनिश्चयं अवतामपि सर्वषां प्रमातृणां चेतसि शङ्कामात्रविनिवर्तनेन च ते सर्वेऽपि निश्चितं वस्तु न प्राप्नुवन्तीति ॥ वस्तुतः सन्दिग्धस्थले सन्देहाननुविद्धस्वरूपो निश्चय एव वस्तुप्रापको ज्ञानप्रामाण्यसंशयाद्विषयसंशयस्तु भिन्नोऽप्यन्तर्गत एवेति, न तत्र निष्कम्पप्रवृत्तिजनकतावच्छेदकनिश्चयत्वाभावोऽपि सुवचः, ईहायाश्च संशयत्वं प्रागेव निराकृतं, निश्चयादन्यज्ञानमात्रस्यैव संशयत्वेनाज्ञानताभ्युपगमे निश्चयोपादानलक्षणस्यापि सर्वथाऽज्ञानत्वप्रसङ्गे निश्चयस्याप्यज्ञानतापत्तिः,'न ह्यविशिष्टात् कारणात्कार्योत्पत्तिः' इति परधर्ममिश्रं च निश्रितं यद्यत्र संगृह्यते तदा तत्र तटस्थतयैव परधर्ममिश्रितत्वं विवक्षणीयं, यथा गौरेवायं केवलमश्व इव प्रतिभातीति न त्वत्यन्तोपरागेणेति, न, तदप्यज्ञानं परधर्माणामाशंकामात्रमेव विमिश्रणम् , अनिश्रिते तु वस्त्वभावस्यैवाशंका न तु परधर्माणामित्यस्याप्ययमेवार्थः, उक्तोदाहरणे इवार्थसादृश्यस्यैव भानात् , अवग्रहश्च नाऽनध्यवसाय एकोपयोगान्तर्भूतत्वलक्षणयोग्यतया तत्राध्यवसायसम्बन्धात, अतिमत्तमूच्छितानामेव ज्ञानस्य योग्यतयाऽप्यध्यवसायमस्पृशतोऽनध्यवसायत्वाभ्युपगमाद्, आह च-"इह सज्झमोग्गहाई-णं संसयाइत्तणं ॥३१४॥"इह साध्यमवग्रहादीनां संशयादित्वम् ] यद्यपीयं वस्तुस्थितिस्तथाप्यभ्युपगम्योच्यते न निश्रितादयोऽज्ञानं, ज्ञानं यत्संशयादयः॥ वस्त्वेकदेशग्राहित्वं, समानं निश्चयेऽपि नः॥१६॥ संशयादयोऽपि हि ज्ञानमेव वस्त्वेकदेशगमकत्वाद् , इह हि घटादिकं वस्तु मृन्मयत्वाद्यर्थपर्यायैर्घटकुम्भकलशादिवचनपर्यायैः परव्यावृत्तिपर्यायश्चानन्तधर्मांशकं न तु निरंशं, तस्य चैकैकदेशपरिच्छेदं संशयादयोऽपि कुर्वन्त्येवेति तेपि ज्ञानमेव, अथ समस्तवस्तुग्राह्येव ज्ञानं न तु तदेकदेशग्राहकमिति चेत्, तर्हि निर्णयोऽपि ज्ञानं न स्याद्, गौरयमित्याद्याकारस्य तस्य TECONNECRECIESCORE हारेण वस्तुव्यवस्था ध्यवसायमस्पृशतापीयं वस्तुस्थितिमपि ना पनम् ॥ CHECRECE Page #151 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नियतत्वात्स दृष्टिसम्बन्धानध्यवसायाश्चेति मतिज्ञानस्य सप्तमदातव्यम्, अन्यथा संशयादिकाले सम्मान चानेन | रेण वस्तु Cassette गोत्वादिवस्त्वेकदेशनाहित्वात्, देशग्रहणद्वारा तदभिन्नवस्तुग्रहणं च संशयेऽपि तुल्यं, अथ निर्णयेन तथाभूत एवार्थो गृह्यत ॥मतिज्ञानइति तज्ज्ञानं, संशयादीनां त्वतथाभूतार्थग्राहित्वान्न ज्ञानत्वमिति चेत्, न, अर्थग्राहित्वेनैव तेषां ज्ञानत्वाद्, विशेषाभावस्य प्ररूपणप्रससामान्याभावनियतत्वात्स्यग्दृष्टिसम्बन्धासादितनैश्चयिकज्ञानत्वरूपस्य मतिज्ञानसामान्यस्यैवात्र निरूपयितुमुपक्रान्तत्वात् ॥ परोक्तारेन चैवमवग्रहहापायधारणाः संशयविपर्ययानध्यवसायाश्चेति मतिज्ञानस्य सप्तभेदप्रसङ्ग इति वाच्यम् । अनध्यवसायस्यायग्रहे, कापरिहासंशयस्येहायां, विपर्यासस्य चापाये व्यक्तमन्तर्भावात्, इत्थं चैतदवश्यमङ्गीकर्तव्यम्, अन्यथा संशयादिकाले सम्यग्दृशामज्ञानित्वप्रसङ्गः, एवञ्च-"सम्मदिट्ठी णं भंते ! किं नाणी अन्नाणी ?, गोयमा! नाणी नो अन्नाणी" इत्याद्यागमविरोधः, न चानेन व्यवस्थासूत्रेण सम्यग्दर्शनसामानाधिकरण्येनैव ज्ञानित्वप्रतिपादनान्न दोष इति वाच्यम् ॥ च्युतसम्यक्त्वस्य मिथ्यात्वं प्राप्तस्य | पनम् ॥ तत्सामानाधिकरण्येन ज्ञानसत्त्वाद् ज्ञानित्वप्रसङ्गः। "मिच्छट्ठिीणं भंते ! नाणी अन्नाणी,गोयमा ! नो नाणी नियमा अन्नाणी" इत्याद्यागमविरोधस्य दुरुद्धरत्वाद् , ज्ञानस्य कालतः सम्यक्त्वनियतत्वप्रतिपादनात्संशयादीनामपि ज्ञानत्वमेव प्रामाणिकं, तदि-१४ दमभिप्रेत्याह-"तहवि णाम ॥ अब्भुवगन्तुं भण्णइ,नाणं चिअ संसयाईआ॥३१४॥ वत्थुस्स देसगमगत्त-भावओ परमयप्पमाण व॥किह वत्थुदेसविण्णाण-हेयवो सुणसु ते वोच्छम् ॥३१५।। इह वत्थुमत्थवयणाइ-पजवाणंतसत्तिसम्पन्न ॥ तस्संगदेसविच्छेयकारिणो संसयाईआ ॥३१६॥ अहवा ण सव्वधम्मा-वभासया तो न नाणमिट्ठन्ते ॥ नणु निण्णओ वि, तद्देस-मेत्तगाहित्ति अन्नाणं | ॥३१७॥" [तथापि नाम ॥ अभ्युपगम्य भण्यते,ज्ञानमेव संशयादयः॥ वस्तुनो देशगमकत्वभावतः परमतप्रमाणमिव ॥ कथं वस्तुदेशविज्ञानहेतवः, श्रृणु तद् वक्ष्ये ॥ इह वस्त्वर्थवचनादिपर्यायानन्तशक्तिसम्पन्नम् ॥ तस्यैकदेशविच्छेदकारिणः संशयादयः ।। Page #152 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं भीज्ञाना प्रकरणम्॥ १६८॥l S+MASSURESS अथवा न सर्वधर्मावभासकास्ततो न ज्ञानमिष्टं ते ॥ ननु निर्णयोऽपि तद्देशमात्रग्राहीत्यज्ञानम् ॥] ॥१६॥ ननु सम्यग्दर्शनकाल इव मिथ्यादर्शनकालेऽपि ज्ञानसामान्यसत्त्वात्कथमयं विभाग इत्यत्राहज्ञानं मिथ्यादृशां सर्व-मज्ञानमुपवर्णितम् ।। एकग्रहेपि सर्वस्य, ज्ञानं सम्यग्दृशां ग्रहात् ॥ १७॥ मिथ्यादृशां हि संशयादिरूपमतथाभूतं वा सर्वमेवाज्ञानमिति "सदसदविसेसणाओ" इत्यत्र सप्रपञ्चं व्यवस्थापितमिति, अत्र पुनस्तदुपदर्शनं पिष्टमेव पिनष्टि,अत एव "जइ एवं तेण तुई, अन्नाणी कोवि नत्थि संसारे(री) | मिच्छदिट्ठीणं ते, अन्नाणं नाणमियरेसिं॥३१८॥"[यद्येवं तेन तवाज्ञानी कोऽपि नास्ति संसारे(री)। मिथ्यादृष्टीनां तेज्ञानं ज्ञानमितरेषाम् ]इति प्रतिज्ञाय भाष्यकारोपि 'सदसदविसेसणाओ' इति गाथामेवानेडितवान् ,सम्यग्दृशस्त्वकं वस्तु गृह्णतः सर्वग्रहात् ज्ञानमेव सर्वोऽपि बोधः,तथाहि, इह तावदेकैकं वस्तु समस्तत्रिभुवनमयं अनन्ताऽनन्तानां स्वपर्यायाणामिवान्यव्यावृत्तिरूपाणां परपर्यायाणामपि तत्र वृत्तः,तथापि परे पदार्थाः कथं तत्र वर्तिष्यन्त इति चेत्,अभाववृत्तिद्वारा प्रतियोगिनामपि तवृत्तित्वाद्, अभावस्य तत्र विशेषणत्वलक्षणः साक्षात्सम्बन्धः प्रतियोगिनां तु स्वाभाववृत्तित्वलक्षणः परम्परासम्बन्धः, इत्येव हि विशेषः, एवश्च याथात्म्येनैकवस्तुज्ञाने सर्ववस्तुज्ञानमिति नियमः,सर्ववस्तुज्ञान एव चैकवस्तुज्ञानमिति नियम इति ॥ “जे एगं जाणइ से सव्वं जाणइ, जे सम्बं जाणइ से एगं जाणइ ॥" इत्यागमो व्यवस्थितः,तथा चैकं वस्तु गृह्णतः सर्ववस्तुग्रहो निराबाध एव,अथैवंविधं परिज्ञानं केवलिन एव सम्मवति, नतु सूक्ष्मव्यवहितार्थाग्राहिण छद्मस्थस्येतिचेत्,न,साक्षात्तस्य तथापरिज्ञानाभावेऽपि “जो एगंजापई'इत्याद्यागमप्रामाण्याभ्युगमद्वारा तस्यापि तथा परिज्ञानात् तस्माजाग्रतः स्वपतस्तिष्ठतश्चलतो वा परमगुरुप्रणीतयथोक्तवस्तुस्वरूपाभ्युपगमस्य चेतसि सर्वदेवाविचलनात् ॥ तृतीयः तरङ्गः।। मतिज्ञानप्रसड़े सम्यग्वशां ज्ञान मिथ्यादृशां चाज्ञानमित्युपपादनम् ॥ P ॥६८॥ Page #153 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 2 - 4 सम्यग्दृष्टिः सर्वदा ज्ञान्येव, आह च-"एगं जाणं सव्वं, जाणइ, सव्वं च जाणमेगंति ॥ इय सब्वमयं सव्वं सम्मदिद्विस्स जं वत्थु ॥३२०॥ [एक जानन्सर्व जानाति सर्व च जाननेकमिति ॥ इति सर्वमयं सर्व सम्यग्दृष्टेः यद्वस्तु] ॥१७॥ तस्मातत्त्वाभ्युपगमविशिष्टस्य ग्रहणमात्रस्यैव ज्ञानत्वात्स्थाणौ व्यावृत्तिरूपाणामपि पुरुषत्वादिपर्यायाणां पररूपतया ग्रहेऽपि अनन्तपर्यायस्यापि वस्तुनः प्रयोजनवशादेकपर्यायग्रहेऽपि याथात्म्याभ्युपगमस्य निरुपप्लवत्वात्सम्यग्दृशो न ज्ञानं प्रच्यवत इत्याह तत्त्वोपगममाहात्म्यान, ज्ञानमेवास्य संशये ॥ प्रयोजनवशादेक-पर्यायग्रहणेऽपि च ॥१८॥ न खलु व्यवहारमात्रेणाज्ञानरूपा अपि सम्यग्दृशः संशयादयो निश्चयतो न ज्ञानं, तत्त्वोपगमविशेषितवस्तुधर्मग्रहणस्य तत्रान| पायासिद्धान्तनियन्त्रितेन समभिरूढनयेनैवम्भूतार्थाबाधेन तादृशस्यैव ज्ञानस्याभ्युपगमाद्,नचैकपर्यायमात्रग्रहे वस्तुनोऽन्यथाग्रहात्तस्याज्ञानित्वप्रसङ्गः, यतः प्रयोजनवशादनन्तधर्मात्मकेपि वस्तुनि यद्यप्यसावेकं पर्यायमासादयति यथा सौवर्णघटे दृष्टे घटार्थी घटत्वमध्यवस्यति सुवर्णार्थी तु सुवर्णत्वं जलानयनार्थी तु जलभाजनत्व मिति व्यवस्यति, उपलक्षणं चेदं, अभ्यासपाटवप्रत्यासत्यादिभिरपि पर्यायविशेषग्रहाद् यथा ब्राह्मणे द्वारि दृष्टे कोऽप्यभ्यासवशाद् भिक्षुकोऽयमिति जानाति, अन्यस्तु पाटववशाद् ब्राह्मणोऽयमिति, अपरस्तु यस्तदभ्यर्णे भणति स प्रत्यासत्तिवशान्मदुपाध्यायोऽयमिति, तथापि तदानीं तस्य भावतोऽनन्तपर्यायात्मकतया वस्तुग्रहणपरिणामो न क्षीयत इति, तदाह-"जे संसयाइगम्मा, धम्मा वत्थुस्स ते वि पज्जाया ॥ तदहिगमत्तणओ ते, नाणं चिय संसयाईआ॥ ३२१॥ पज्जायमासयन्तो, एक पि तो पओअणवसाओ ।। तत्तियपज्जायं चिय, तं गिण्हइ भावओ वत्थु ॥३२२ ॥" [ये संशयादिगम्या धर्मा वस्तुनस्तेऽपि पर्यायाः ॥ तदधिगमत्वतस्ते ज्ञानमेव संशयादयः॥ मतिज्ञाननिरूपणप्रसङ्गे सम्यग्दृशां संश यादयोऽपि ज्ञानमित्युपपादनम् ॥ SARASWACES हाइ यथा ब्राह्मणे द्वारपालभाजनत्व मिति व्य ३ ब्राह्मणोऽयमिति, GUREGISEKASS Page #154 -------------------------------------------------------------------------- ________________ S सविवरणं भीवानानव प्रकरणम् ॥ SRECORRECIPARSECRE पर्यायमाश्रयन्नेकमपि तक प्रयोजनवशात् ॥ तावत्पर्यायमेव तद् गृह्णाति भावतो वस्तु ॥] ननु भावतस्तथा ग्रहणं न सार्वत्रिक १५ ॥ तृतीयघटाधुपयोगकाले तदुपयोगानियमादत एव तथाविधागमप्रामाण्याऽभ्युपगमोऽपि न तथेति तद्विशेषितं ग्रहणं ज्ञानमिति पर्यवसि- है तरङ्गः मतितार्थानुपपत्तिः, नचाऽभ्युपगमपदेनात्र तद्योग्यतैव विवक्षणीया, सा च सम्यग्दर्शनरूपैवेति सम्यग्दर्शनविशेषितमेव ज्ञानं नैश्चयिक | ज्ञाननिरूज्ञानं, अत एव “निन्नयकाले विजओ, ण तहारूवं विदन्ति ते वत्थु॥ मिच्छदिट्ठी तम्हा, सव्वं चिय तेसिमन्नाणं ॥ ३२३॥" पणप्रसङ्गे [निर्णयकालेऽपि यतो न तथारूपं विदन्ति ते वस्तु ॥ मिथ्या दृष्टयस्तस्मात्सर्वमेव तेषामज्ञानम् ] इति गाथया मिथ्यादृशां निर्णयकाले- | सम्यग्दां ऽपि ज्ञानत्वनियामक तत्त्वाभ्युपगमयोग्यताभावभणनाद् ज्ञानाभावलक्षणमज्ञानमुक्तं,यदुक्तं "कट्ठयरं वनाणं,विवज्जओचे मिच्छ- सर्व ज्ञानरूदिट्ठीणं ॥ मिच्छाभिणिवेसाओ, सव्वत्थ घडेव्व पडबुद्धी ॥३२४॥" [कष्टतरं वाऽज्ञानं, विपर्ययत एव मिथ्यादृष्टीनां । मिथ्या- १६ पमेव मिथ्याभिनिवेशात्सर्वत्र, घट इव पटवुद्धिः] इति गाथया चाभिनिवेशव्यपदेश्यमिथ्यादर्शनरूपायास्तदयोग्यताया एव कष्टतरत्वात्तज्ज्ञान- है दृशां चाज्ञान जनकसम्यग्दर्शनविरोधि मिथ्यादर्शनजन्यं स्वतन्त्रमेवाज्ञानमुक्तं कष्टतरपदेनातिदुस्सहमहादुःखहेतुत्वाभिधानात्तत्वाभ्युपगमाभावनियामकत्वोक्तावपि तस्य स्वतः संसाराहेतुत्वात् , विपर्ययनियामकमिथ्याभिनिवेशोक्त्या फलतस्तद्धेतुभूतमिथ्यादर्शन पादनम् ॥ सत्ताभिधानाज्ञाननियामकत्वे मिथ्याभिनिवेशयोग्यताविशिष्टस्वरूपज्ञानस्य तत एवातिप्रसङ्गादिति वाच्यम् , सम्यगृदृष्टौ सम्यग्दर्शनविशिष्टज्ञानस्य प्रसिद्धत्वेन तमुद्दिश्य सम्यग्दर्शनविशिष्टज्ञानस्य प्रश्नप्रतिवचनाऽभावप्रसङ्गाद्विशिष्याज्ञातस्यैवार्थस्य प्रश्नारोहात् , न चापर्याप्ताद्यवस्थायां सम्यक्त्वकालेऽपि ज्ञानाभावशङ्कया प्रश्नावतारो मनोव्यापाररूपस्य व्यक्तज्ञानस्य तदानीमभावेऽपि ज्ञानसामान्यस्याप्रत्यृहत्वाच्च निर्वचनं फलवदिति वाच्यम् , तथापि विशेषमन्तर्भाव्य निर्वचनस्याऽनतिप्रयोजन- || ६९।। पडबुद्धी ॥३२४॥मानमुक्त,यदुक्तं "कद्वयमा मिथ्यादृशां निर्णयको EKASAMROADGAON मित्युप Page #155 -------------------------------------------------------------------------- ________________ SUDAN+335 त्वात् , न च निर्वचनेनैव विशेपान्तर्भाव इति शङ्कनीयं, मिथ्यादृष्टिसूत्रानुरोधेन तत्र विशेषान्तर्भावावश्यकत्वात् , न च मोक्ष- ४॥ मतिज्ञानहेतोः सम्यग्दर्शनविशिष्टज्ञानस्य सम्यग्दृष्टो विशेष्यशङ्काप्रयुक्तशङ्कया प्रश्नस्तन्निर्वचनश्च सङ्गच्छेते इति वाच्यम्, सम्यग्- प्ररूपणाप्रदर्शनविशिष्टज्ञानत्वेन मोक्षाहेतुत्वाद्विशिष्टज्ञानत्वेनैव तथात्वात्सामान्यपदेन विशेषप्रश्नानौचित्याच्च, अपि च सम्यग्दृष्टिसूत्रस्थप्र- सो सम्यनवाक्यद्वये ज्ञानपदस्यैकरूपस्यैव निवेशात्कथं निर्वचनसूत्रयोविशेषगर्भवं प्रश्नसमानाकारस्यैवोत्तरस्य युक्तत्वात् , नहि भूतले ४ दृशां संशघटोस्ति नवेति प्रश्ने भूतले नीलघटोऽस्तीत्युत्तरमुदश्चन्ति विपश्चितः, एवश्च स्वस्थितशङ्काविरहेऽपि शिष्यजिज्ञापयिषोत्थापित. यादीनामपि शङ्कया प्रश्न इत्युक्तिरपि न युक्तेति चेत, न,सम्यगदर्शनविशिष्टज्ञानस्यैव मोक्षौपयिकतया नैश्चयिकज्ञानत्वात्प्रश्ननिर्वचनवाक्ययोस्तु ज्ञानत्वं मिसामान्यपदगर्भयोरपि विशेषाभिप्रायप्रयुक्ततया विशेषे पर्यवसानात, तथाहि, निश्चयाभिप्रायेण सम्यग्दृष्टिानी नवेति प्रयुक्तस्य ४थ्यादृशांचाप्रश्नवाक्यस्य सम्यग्दृष्टिर्मोक्षौपयिकज्ञानवान वेत्यर्थात् ततः सम्यग्दृष्टिान्येवेति निर्वचनवाक्यस्य सम्यग्दृष्टिर्मोक्षौपयिकज्ञान- ज्ञानत्वमिवानेवेत्यर्थात् यदभिप्रायेण प्रश्नस्तदभिप्रायेणैवोत्तरप्रदानात्, एवं मिथ्यादृष्टिसूत्रेऽपि भावनीयं, न च विशेषाभिप्रायेणापि प्रयुक्तात ति युक्त्यसामान्यपदान्न विशेषोपस्थितिरिति शङ्कनीयं, भोजनाभिप्रायेण सैन्धवप्रश्ने तदुत्तरवाक्यस्थसैन्धवपदाल्लवणानुपस्थितिप्रसङ्गा- न्तरेणाप्युदिति दिग् ॥१८॥ अथ प्रकारान्तरेण संशयादिकालेऽपि सम्यग्दृशो ज्ञानं मिथ्यादृशश्च निर्णयकालेऽप्यज्ञानं समर्थयति पपादनम् ।। सम्यग्दृशः संशयो वा, ज्ञानं ज्ञानोपयोगतः ॥ मिथ्यादृशां किलाज्ञानं, सर्वो बोधस्तमन्तरा ॥१९॥ सम्यग्दृशः संशयः, उपलक्षणाद्विपर्यासानध्यवसायौ च ज्ञानमेव ज्ञानोपयोगात्, 'यो यदुपयुक्तः स तन्मयो' यथेन्द्रज्ञानोपयुक्तो दरिद्रोऽपीन्द्र एव, वर्तते च सम्यग्दर्शनलाभकाल एव मत्यादिज्ञानलाभात्सम्यग्दृशः सर्वदैव ज्ञानपरिणामरूपज्ञानोपयोग Page #156 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना र्णवप्रकरणम् ॥ ॥ ७० ॥ मात्रं, तस्मात्तस्य संशयादिकालेऽपि मौलज्ञानोपयोगयोगादप्रत्यूहमेव ज्ञानमिति । तदाह - "अहवा जहिंदनाणो- ओगओ तम्मयत्तणं होई ।। तह संसयाइभावे, नाणं नाणोवओगाओ ॥ ३२५॥।" [ अथवा यथेन्द्रज्ञानोपयोगतस्तन्मयत्वं भवति । तथा संशयादिभावे ज्ञानं ज्ञानोपयोगात् ] मिथ्यादृशस्तु निर्णयकालेऽपि सम्यग्दर्शनाविनाभाविज्ञानोपयोग योर (स्या) भावादज्ञानमेव, उपयोगग्राहिणा नयेन तत्कार्यान्तरमनपेक्ष्य तदुपयोगेनैव तन्मयत्वव्यवस्थापनादिन्द्रपदार्थ परमैश्वर्यमनपेक्ष्यैवेन्द्रोपयोगवत इन्द्रत्वाभ्युपगमात् । तदाह - " तुल्लमिणं मिच्छस्स वि, सो सम्मत्ताइभावसुन्नोत्ति ।। उवओगंमि वि तो तस्स, णिच्चमन्नाणपरिणामो || ३२६ || जं निनओवओगे वि, तस्स विवरीयवत्थुपडिवत्ती । तो संसयाइकाले, कत्तो नाणोवओगो से || ३२७|| ” [तुल्यामिदं मिथ्यादृष्टेर पि स सम्यक्त्वादिभावशून्य इति । उपयोगेऽपि ततस्तस्य नित्यमज्ञान परिणामः ॥ यन्निर्णयोपयोगेऽपि तस्य विपरतिवस्तुप्रातिपत्तिः । ततः संशयादिकाले कुतो ज्ञानोपयोगस्तस्य ।।] ।। १९ ।। तदेवं साधितमभ्युपगम्यानिश्रितादीनां संशयादिरूपत्वेऽपि सम्यग्दृशां ज्ञानत्वम्, अथ सामान्यतो ज्ञानाज्ञानरूपाया एव मतेर्निरूपणीयत्वान्न किञ्चिद्दष्यतीत्याह सामान्यतो निरूप्यत्वा-न्मतेः कापि न च क्षतिः । ज्ञानाज्ञानविभागस्तु ज्ञेयो फलविभागतः ॥ २० ॥ इह हि 'आभिणिबोहियनाणं, सुअनाणं च' इत्यादिगाथायां श्रुतज्ञानं तावद् योगार्थमात्र पुरस्कारेण ज्ञानज्ञानोभयसाधारणमेव निर्दिष्टमिति, यथा-'अक्खरसन्भीसम्म' इत्यादिनाऽभिधास्यमानेषु चतुर्दशसु तद्भेदेषु मिथ्या श्रुतस्यैषां ग्रहप्रसङ्गाद् एवं च मतिज्ञानमपि सङ्ग्रहलाघवाद् ज्ञानाज्ञानोभयसाधारणमेवोक्तमिति सम्यग्दृष्टिसम्बन्धिनां संशयादीनामज्ञानत्वेऽपि न क्षतिरिति। तदाह"अहवा जह सुयनाणा - वसरे सामन्नदेसणं भणिअं || तह मइनाणावसरे, सन्त्रमइनिरूवणं कुणइ || ३२८||” [ अथवा यथा श्रुतज्ञा तृतीयस्तरङ्गः मतिज्ञाननिरू पणप्रस ड्रेन सम्य ग्दृशामुपयो गप्रकारेण ज्ञानत्वं मि यादृशां चाज्ञानत्वमितिसमर्थितम् ॥ ।। ७० ।। Page #157 -------------------------------------------------------------------------- ________________ G त ORAKASRAGACASSES नावसरे सामान्यदेशनं भणितम्।।तथा मतिज्ञानावसरे, सर्वमतिनिरूपणं करोति ज्ञानाज्ञानविभागचिन्तायां तु सम्यक्त्वानुगता सम्यग्दृशां मतिमतिज्ञानं, मिथ्यात्वविशेषिता तु सा मत्यज्ञानमिति द्रष्टव्यं, 'अविसेसिया मह' इत्यादिसूत्रेण प्राक्तथाविवेचितत्वाद्॥आह च- मोक्षफलसा"एसा सम्माणुगया, सव्वा नाणं विवज्जए इय।।अविसेसिया मइ च्चिय, जम्हा णिहिट्ठमाईए॥३२९॥ [एषा सम्यक्त्वाऽनुगता, १५धकत्वेन ज्ञासर्वा ज्ञानं विपर्यये इतरत् ।। अविशेषिता मतिरेव यस्मानिर्दिष्टमादौ॥ नन्वेतत्सूत्रव्यावर्णन एव मतिज्ञानपदं सम्यग्दृष्टित्वविशषि- न मिथ्याटशा तायामेव मतौ प्रवर्तत इत्युक्तम्, तत्कथमाभिनिबोधिकज्ञानपदेन ज्ञानाज्ञानोभयरूपाया मतेः सङ्ग्रह इति चेत्, सत्यम्-रूढिपुर- मतदसाधकत्वेस्कारेणैव सम्यग्दृष्टित्वविशेषितं मतिज्ञानं ज्ञानमित्युक्तेोगार्थमादायोभयसमहाविरोधात्,योगार्थस्य साधारणत्वेऽपि मोक्षसंसार- | न चाज्ञानलक्षणफलभेदेनैव सम्यग्मिथ्यादृष्टिसम्बन्धिनोर्ज्ञानयोरनाद्यलौकिकसङ्केतलक्षणज्ञानाज्ञानपदरूढिप्रवृत्तेनिश्चयेन फलवत एव मिति समथिवस्तुनोऽभ्युपगमाव, अत एवाह-"विवरीयवत्थुगहणे, जं सो साहणा विवज्जयं कुणई ।। तो तस्स अन्नाणफलं, सम्मढिस्स नाण" | तम् ॥ लेखफलं॥३३०॥" [विपरीतवस्तुग्रहणे, यत्स साधनविपर्ययं करोति ॥ ततस्तस्याऽज्ञानफलं सम्यग्दृष्टेनिफलम् ॥] विपरीतवस्तु- पुस्तकेज ग्रहणशीलो हि मिथ्यादृष्टियागीयीहंसादिकं संसारसाधनमपि मोक्षसाधनत्वेनाध्यवस्यतीति विपरीतफलकत्वेन तदज्ञानमिति गाथा इतोपरिभाष्यते, सम्यग्दृष्टिस्तु यथावद्द्वात्वा यथास्थानं साधनं विनियुक्त इति फलवचात्तदीयो बोधो ज्ञान xxx Sष्टपञ्चाशद्वि(योजितः पाठः)[मेवानिनु सर्वमयं सर्वमेव बस्त्विति भवत्सिद्धान्ततो मोक्षसाधनस्य सम्यग्ज्ञानादित्रिकस्य सम्यग्ज्ञानादि शीर्णावृत्तिवन्मिथ्याज्ञानादिरपि धर्म इति सम्यग्दृष्टिना मोक्षसंसिद्धये ।यस्य साधनस्य धर्मोऽङ्गीकृतः मिथ्यादृष्टिनापि तस्यैव सङ्गऽताः" धर्मस्तत्सिद्धये स्वीकृतः, धर्मग्रहणद्वारेण च तस्य धर्मिणोऽपि कथञ्चिद्ग्रहणं समस्त्येवेति न मिथ्यादृष्टेविपरीतत्वमिति चेत्, न, इतिलिखित मस्ति ॥ Page #158 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं भीज्ञाना बप्रकरणम्॥ ॥७१॥ नभवे ॥ धन सहाणविणविशेषमजानन्यापारयश्च सम्या यतोऽनन्तधर्माऽध्यासितस्यापि वस्तुनो न सर्वेऽपि धर्मा एकमर्थ साधयन्ति, किन्तु यो धर्मो यत्रार्थे योग्यस्स एव तमेवार्थ (योजितः साधयति यथा कलशमल्लकार्दानां मृद्धर्मत्वे समानेऽपि कलश एव मङ्गलादिकार्येषु व्याप्रियते, एवं यद्यपि मोक्षादिसाधनस्य ४पाठः) तृमिथ्याज्ञानादिकोऽपि व्यावृत्तिरूपतया धर्मः, तथापि नासौ मोक्षस्य साधकः, किन्तु तद्विपक्षभूतस्य संसारादिकस्यैव, मोक्षा- तीयस्तरङ्गः देस्तु तत्साधनयोग्यः सम्यग्ज्ञानादिको धर्म एव साधक इति वस्तुस्थिती मोक्षेऽयोग्यं मिथ्याज्ञानादिकमयोग्यतयाऽपश्यंस्तत्र मतिज्ञानव्यापारयति मिथ्यादृष्टिरतस्साधनविपर्ययं कुर्वतोऽस्याज्ञानमेव, तदाह भाष्यकार:-"जइ सो वि तस्स धम्मो, किं विवरीयत्तणं प्ररूपणप्रसतितं न भवे ॥ धम्मो वि जओ सब्यो, न साहणं किंतु जो जोग्गो॥३३१॥जोग्गाजोग्गविसेस, अमुणतो सो विवजयं कुणइ ॥ झे सम्यग्दसम्मस्ट्रिी उण कुणई, तस्स सटाणविणिओगं॥३३२॥” [यदि सोऽपि तस्य धर्मः किं विपरीतत्वमिति तन्न भवेत् ।। धर्मोऽपि यतः शां ज्ञानस्य सर्वो न साधनं किन्तु यो योग्यः।। योग्यायोग्यविशेषमजानन् स(मिथ्यादृष्टिः) विपर्ययं करोति । सम्यग्दृष्टिः पुनः करोति, तस्य मोक्षसाधकस्वस्थानविनियोगम्] इति । योग्यमयोग्यश्च धर्म जानन स्थाने व्यापारयश्च सम्यग्दृष्टिः सम्यगाराधको भूत्वा समीहितफलमा त्वं तदनुकूग्भवति ॥ उक्तं च-"काले सिक्खइ नाणं, जिणभणिअं परमभत्तिराएण। दसणपभावगाणि अ,सिक्खइ सत्थाई कालम्मि ॥१॥ लाऽनुष्ठान काले य भत्तपाणं, गवेसए सयलदोसपरिसुद्धं ॥ आयरियाईणट्ठा, पवयणमायासु उवउत्तो ।। २ ॥ एवं समायरंतो, काले कालं क्रमोपदर्शविसुद्धपरिणामो ॥ असवन्तजोगकारी, सलाहणिज्जो य भुवणम्मि ॥३॥ सयलसुरासुरपणमिय-जिण-गणहरभाणियकिरिय नञ्च ॥ विहिकुसलो ॥ आराहिऊण सम्म-त्त-नाण-चरणाई परमाई ।। ४ ॥ सत्तट्ठभवग्गहण-भतरकालम्मि केवलन्नाणं । उप्पाडिऊण गच्छइ, विहुयमलो सासयं मोक्खं ॥५॥ तत्थ य जर-जम्मण-मरण-रोग-तण्हा-छुहा-भय-विमुक्को । साइ अपज्जवसाणं, १४॥७१॥ ASHLILASS Page #159 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कालमणतं सुहं लहइ ॥६॥" इति ॥[काले शिक्षते ज्ञानं, जिनमणितं परमभक्तिरागेण ।। दर्शनप्रभावकाणि च शिक्षते शास्त्राणि काले । काले च भक्तपानं, गवेषयेत्सकलदोषपरिशुद्धम्।।आचार्यादीनामर्थाय, प्रवचनमातृधूपयुक्तः ॥ एवं समाचरन्काले काले विशुद्धपरिणामः ॥ अस्रवद्योगकारी श्लाघनीयश्च भुवने ॥ सकलसुरासुरप्रणतजिन-गणधरभाषितक्रियाविधिकुशलः ॥ आराध्य सम्यक्त्वज्ञानचरणानि परमाणि ॥ सप्ताष्टभवग्रहणाभ्यन्तरकाले केवलज्ञानम् ॥ उत्पाद्य गच्छति विधुतमला शाश्वतं मोक्षम् ॥ तत्रच जराजन्ममरणरोगतृष्णाक्षुधाभयविमुक्तः ॥ साद्यपर्यवसानं कालमनन्तं सुखं लभते ।।] तेषु मतिज्ञानभेदेषु चतुषु अर्थावग्रहादिषु एकसमयोऽर्थावग्रहः, समयः सर्वजघन्यः कालविशेषः, ईहापायावन्तमुहूर्तम्, व्यञ्जनावग्रहव्यावहारिकार्थावग्रहावपि तथैव, अविच्युतिस्मृतिवासनाभेदात् त्रिविधा धारणा, तत्राविच्युतिः स्मृतिश्च प्रत्येकमन्तर्मुहूर्त भवति, स्मृतिबीजभूता तदर्थज्ञानावरणक्षयोपशमरूपा वासना तु संख्येयवर्षायुषां सत्त्वानां संख्येयं कालम्, असंख्येयवर्षायुषां तु पल्योपमादिजीविनाम | | संख्येयं कालम्भवति, तदुक्तं नियुक्तिकृता ॥ “ उग्गहो एक्कं समयं, ईहा-वाया मुहुत्तमंतं तु ॥ कालमसंखं संखं च, धारणा होइ नायव्वा ॥ ३३३ ॥” इति [ अवग्रह एकं समयं, ईहापायौ मुहूर्तान्तस्तु ॥ कालमसंख्यं संख्यं च धारणा भवति ज्ञातव्या ] नैश्चयिकार्थावग्रह एकसमयः, वासनारूपधारणाम्मुक्त्वाज्ये व्यञ्जनावग्रह-व्यावहारिकार्थावग्रहापायाविच्युतिस्मृतिरूपा मतिभेदाः पृथगेकमेवान्तर्मुहूर्त भवन्ति । यदाह भाष्यकारः॥"अत्थोग्गहो जहनो, समयं सेसोग्गहादओ वीसुं । अंतोमुहुत्तमेगं तु, वासनाधारणं मोत्तुं ॥३३४॥" [अर्थावग्रहो जघन्यः समयं शेषाऽवग्रहादयो विश्वक् अन्तर्मुहूर्तमेकं तु बासनाधारणां मुक्त्वा] इति स्थितिविचारः॥ नयनमनोमिन्नानां श्रोत्रादीनां चतुर्णामिन्द्रियाणां प्राप्यकारित्वव्यवस्थापनतस्तेषां REASARASHISHASIRSASARIORK (योजितः पाठः) । मतिज्ञानप्ररूपणप्रसनेऽअर्थावग्रहादीनां कालमानप्रद र्शनं ॥ Page #160 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना ( योजितः पाठः) ॥ तृतीयः जव प्रकरणम्॥ ।। ७२॥ PECIPEDUCLk व्यञ्जनावग्रहश्चतुर्धा नयनमनसोरप्राप्यकारित्वव्यवस्थापनतस्तयोर्न व्यञ्जनावग्रहः, इत्येवं पूर्वमेव निर्णयः कृतः, इदानीं तेषु तत्र विशेष उपदयते-श्रोत्रं स्पृष्टमात्राण्येव शब्दद्रव्याण्युपलभते, तानि घाणेन्द्रियादिविषयीभूतद्रव्येभ्यः सूक्ष्माणि, बहूनि, भावुकानि च, विषयपरिच्छेदे घ्राणेन्द्रियादिगणात्पटुतरं च श्रोत्रेन्द्रियम्, घ्राणरसनस्पर्शनेन्द्रियाणि स्वस्वाविषयं बद्धस्पृष्टं गृह्णन्ति, घ्राणस्य विषयो गन्धः, रसनाया विषयो रसः, स्पर्शनस्य विषयः स्पर्शः। स्पृष्टमित्यालिङ्गितं, बद्धं तु गाढतरमाश्लिष्टमात्मप्रदेशैः, घाणेन्द्रियादिविषयभूतानि गन्धादिद्रव्याणि शब्दद्रव्यापेक्षया स्तोकानि,बादराणि,अभावुकानि च,विषयपरिच्छेदे श्रोत्रापेक्षयाऽपनि च घ्राणादीनि,अत एव बद्धस्पृष्टमेव स्वस्वविषयं गृहन्ति,न स्पृष्टमात्रम्,चक्षुरिन्द्रियन्तु अप्राप्तमेव विषयं गृह्णाति, अप्राप्तत्वाविशेषे कथं न सर्वस्य ग्रहणमिति नाशङ्कथं, यतोऽप्राप्तमपि योग्यदेशस्थमेव पश्यति, नायोग्यदेशस्थमिति, उक्तार्थोपोद्वलिकां 'पुढे सुणेइ सई' इत्यादिनियुक्तिगाथां सम्बन्धयन्नाऽऽह भाष्यकारः॥ “सोत्ताईणं पत्ताइ-विसयया पुन्बमस्थओ भणिया ।इह कंठा सट्ठाणे, भण्णइ विसयप्पमाणं च ॥३३५॥ पुढे सुणेइ सई, रूवं पुण पासइ अपुढे तु ॥ गन्धं रसं च फासं च, बद्धपुढे वियागरे।।३३६॥” इति, 'पुढे सुणेइ सई' इति नियुक्तिगाथाव्याख्यानरूपाश्चेमा भाष्यगाथाः, तद्यथा-"पुढे रेणुं व तणुम्मि, बद्धमप्पीकयं पएसेहिं ।। छिकाई चिय गिण्हइ, सहदव्वाई जं ताई॥३३७॥बहुमुहुमभावुगाई, जं पटुयरं च सोचविण्णाणं ॥ गंधाईदबाई, विवरीयाई जओ ताई।।३३८॥ फरिसाणंतरमत्त-प्पएसमीसीकयाई घेप्पंति ।। पड्डयरविण्णाणाई, जंच न घाणाइकरणाई॥३३९॥"[श्रोत्रादीनां प्राप्तादि-विषयता पूर्वमर्थतो भणिता।।इह कण्ठात्स्वस्थाने,मण्यते विषयप्रमाणं च।।स्पृष्टं श्रृणोति शब्दरूपं पुनः पश्यत्यस्पृष्टं तु॥ गन्धं रसं च स्पर्श च बद्धस्पृष्टं व्यागृणीयात् ।। स्पृष्टं रेणुरिव तनौ बद्धमात्मीकृतं प्रदेशैास्पृष्टा SHRESTRICKKKR मतिज्ञान प्ररूपणमें प्रसने इन्द्रि याणां विषय६ ग्रहणस्वरू* पोपदर्शनम्॥ ॥ ७२॥ Page #161 -------------------------------------------------------------------------- ________________ न्येव गृह्णाति,शब्दद्रव्याणि यत्तानि। आत्माहगुलेन लक्षमतिरिक्तं योजनानां तु ॥ बहुसूक्ष्मभावुकानि यत्पटुतरं च श्रोत्रविज्ञानम् ॥ गन्धादिद्रव्याणि विपरीतानि यतस्तानि ॥ स्पर्शानन्तरमात्मप्रदेशर्मिश्रीकृतानि गृह्यन्ते ॥ पटुतरविज्ञानानि यच न घ्राणादिकरणानि ॥] इति ॥ स्पष्टाश्चेमा माथाः । नयनं मनश्चाप्राप्तस्यैव वस्तुनः परिच्छेदकारि, तेन नयनं रूपमस्पृप्टमेव पश्यति, नयनस्य चात्मागुलेन सातिरेकं योजनलक्षमुत्कृष्टतोऽपि विषयपरिमाणमागमेऽभिहितं, तेनाप्राप्तत्वाविशेषेऽपि परतो न पश्यति, आत्माङ्गुलोच्छ्याङ्गुलप्रमाणागुलभेदेनाङ्गुलं त्रिविधं । तत्राचं “जेणं जया मणूसा, तेसि जं होइ माणरूवं तु ॥ तं भणियमिहायंगुल-मणिययमाणं पुण इमं तु ॥१॥" द्वितीयं तु "परमाणू तसरेणू , रहरेणू अग्गयं च वाल- | स्स ।। लिक्खा जूया य जवो, अडगुणविवडिया कमसो ॥२॥” इत्यादिग्रन्थोक्तम्, तृतीयं तु-"उस्सेहंगुलमेगं, हवइ पमाणगुलं सहस्सगुणं॥तंचव दुगुणियं खलु, वीरस्सायंगुलं भणियं ॥३॥आयंगुलेण वत्थं, उस्सेहपमाणओ मिणसु देहानग-पुढवि-विमाणाई, मिणसु पमाणंगुलेणंति॥४॥ [ये यदा मनुष्यास्तेषां यद् भवति मानरूपं तु तदभणितमिहात्माश्गुल-मनियतमानं पुनरिदं तु।।परमाणुखसरेणू, रथरेणुरग्रकं च वालस्य।।लिक्षा युका च यवोऽष्टगुणविवर्धिताःक्रमशः।। उत्सेधागुलमेकं,भवति प्रमाणागुलं सहस्रगुणम्॥ तदेव द्विगुणितं खलु, वीरस्यात्मागुलं भणितम्।। आत्माल्गुलेन वस्तु, उत्सेध(धागुल)प्रमाणतो मिनु देहम्।। नगपृथ्वीविमानानि, मिनु प्रमाणागुलेनेति ।।] उक्तोपपत्तिप्रदर्शिका च भाष्यगाथा यथा-"अप्पत्तकारि नयणं, मणो य, नयणस्स विसयपरिमाणं॥ आयंगुलेण लक्खं, अइरितं जोयणाणं तु ॥ ३४०॥" [अप्राप्तकारि नयनं मनच, नयनस्य विषयपरिमाणम् । आत्मागुलेन लक्षमतिरिक्तं योजनानां तु ॥] इति ॥ ननु" उस्सेहपमाणो मिणे देहं" इतिवचनादेहस्य तावदुच्छ्याङ्गुल (योजितः पाठः) मतिज्ञानविषयमान| निरूपणप्र| स्तावेऽङ्गुलभेदत्रिकस्य तदूगोचर स्य च प्रदर्शनम्। Page #162 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं| श्रीज्ञाना 12 र्णव प्रकरणम्॥ MONISHALAUR प्रमाणत्वं सिद्धमेव, देहग्रहणस्योपलक्षणत्वात्तत्रस्थमिन्द्रियं तद्विषयश्च गृह्यत इति चक्षुषस्तद्विषयस्य चोच्छ्याङ्गुलप्रमाणमेयत्वे. नात्माङ्गुलेन नयनविषयपरिमाणकथनमयुक्तमिति चेत्,न, देहग्रहणस्योपलक्षणार्थत्वास्वीकारेण देहस्यैवोच्छ्याङ्गुलप्रमाणमेयत्वे. नेन्द्रियविषयपरिमाणस्यात्माङ्गुलेनैव मेयत्वात, तदुक्तं भाष्यकृता"नणु भणियमुस्सयंगुल-पमाणओ जीवदेहमाणाइ ।। देहपमाणं चिय तं, न उ इंदियविसयपरिमाणं ॥३४१॥" [ननु भणितमुच्छ्या -गुलप्रमाणतो जीवदेहमानानि ॥ देहप्रमाणमेव तद्, न त्विन्द्रियविषयपरिमाणम् ] इति, युज्यते चेन्द्रियविषयपरिमाणमात्माङ्गुलेनैव, न तु उच्छ्याङ्लेन, यतः पश्चार्धपञ्चमधनु:शतादिप्रमाणानां भरतादीनां चायोध्यादिनगर्यः स्कन्धावारश्चात्माङ्गुलेन द्वादशयोजनायामतया सिद्धान्ते निीताः, भरतचक्रवाद्यात्मागुलं च प्रमाणाङ्गुलं तद् उच्छ्याङ्गुलात्सहस्रगुणं " उस्सेहंगुलमेगं हवइ पमाणंगुलं सहस्सगुणं" इति वचनात्, ततश्चायोध्यादिनगर्यः स्कन्धावारश्च उत्सेधाङ्गुलेन पुनरनेकानि योजनसहस्राणि भवन्ति, एवञ्चायुधशालादिषु ताडितभेर्यादिशब्दश्रवणं सर्वेषामिन्द्रयविषयस्योछ्याङ्गुलमेयत्वपक्षे न प्रामोति, यतः श्रोत्रं "बारसहिं जोअणेहिं, सोयं अभिगिण्हए सई" इत्यादिवचनात् द्वादशभ्य एव योजनेभ्यः समागतं शब्दं शृणोति न परतः, उक्तपक्षे च एतानि द्वादशयोजनानि | किलोच्छ्याङ्गुलेन मीयन्ते, अत उच्छ्याङ्गुलनिष्पन्नेभ्योऽनेकयोजनसहस्रेभ्यः समागतं भेर्यादिशब्दं कथं श्रोत्रं गृह्णीयात्, इष्यते च भरतादिनगरीस्कन्धावारेषु तच्छ्रवणम्,अत आत्माङ्गुलेनैवेन्द्रियाणां विषयपरिमाणं नोत्सेधाङ्गुलेनेतिसिद्धम् , तदुक्तं भाष्यकता "जं तेण पंचधणुसयनराइ-विसयववहारवोच्छेओ॥ पावइ सहस्सगुणियं, जेण पमाणंगुलं तत्तो ॥३४२ ॥" [ यत्तेन पञ्चधनुःशतनरादिविषयव्यवहारव्यवच्छेदः ॥ प्रामोति सहस्रगुणितं, येन प्रमाणाङ्गुलं ततः॥] इति ।। AHABHAIBAREIGNERASHIOS BI (योजितः पाठः) तृतीयस्तरङ्गः देहम्योत्सेधाङ्गलप्रभाणत्वाद्देहस्थत्वेनेन्द्रियाणां तद्वि षयस्य च तन्मेयत्व मेवोचितमित्यारेकाया युक्त्यादिभिरपाकरणम् ॥ ॥७३॥ Page #163 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किश्च देहस्यात्मभूतान्यपीन्द्रियाणि सर्वाणि नोच्छ्रयाङ्गुलेन मीयन्ते यदा तदा कैव कथा तद्विषयाणामुच्छ्रया ङ्गुलमेयत्वस्य, यतः स्पर्शनेन्द्रियमेकमुच्छ्रयाङ्गुलेन मीयते शेषाणि तु द्रव्येन्द्रियाण्यात्माङ्गुलेनैव मीयन्ते, त्रिगन्यूतादिमानानां युगलधर्मिणां जिह्वेन्द्रियादिमानस्योच्छ्रयाङगुलेन ग्रहणे क्षुरप्राकारतयोक्तस्य जिह्वेन्द्रियस्य विशालदेहानुसारित्वेन विशालमुखगतत्वेन विशालस्याङ्गुल पृथक्त्वलक्षणो विस्तारो गृह्येत, एवञ्चात्यल्पतया सर्वामपि जिह्वां न व्याप्नुयात्, तदव्याप्तौ च सर्वया जिह्वया रसवेदनलक्षणो व्यवहारो न घटेत, तस्मादात्मागुलेनैव जिह्वादिमानं घटत इति, तदुक्तं भाष्यकृता "इंदियमाणेवि तयं, भयणिज्जं जं तिगाउआई || जिभिदियाइमाणं, संववहारे विरुज्झेज्जा ॥ ३४३ ||” [इन्द्रियमानेऽपि तद् भजनीयं यत् त्रिगव्यूतादीनाम् । जिह्वेन्द्रियादिमानं संव्यवहारे विरुध्येत ।। ] इति, चक्रवर्ति भरतनगर्यादिषु भेर्यादिशब्दश्रवणव्यवहारस्य युगलधर्मिणां रसवेदनव्यवहारस्य चाभावप्रसङ्गेनेन्द्रिय विषय परिमाणस्येन्द्रियपरिमाणस्य नोच्छ्रयाङ्गुलमेयत्वं किन्त्वात्माङ्गुलमेयत्वमेवेति व्यवस्थितौ " उस्सेह पमाणओ मिणे देह" इत्यत्र देहशब्देन देहमानमेव पारिशेष्याद् गृह्यते, किञ्च परस्येन्द्रियतद्विषयपरिमाणयोरुच्छ्रयाङ्गुलमितत्वेऽर्थापत्तिरेव प्रमाणं न त्वागमवचनं, आगमे तु “ इच्चेएणं उस्सेहंगुलप्पमाणेणं नेरइअ - तिरिक्खजोणिय - मणुस्स - देवाणं सरीरोगाहणाओ मिअंति " [ इत्येतेनोच्छ्रयाङ्गुलप्रमाणेन नैरयिकतिर्यग्योनिकमनुष्यदेवानां शरीरावगाहना मीयन्ते ] इत्यस्मिन् शरीरावगाहनैवोच्छ्रयाङ्गुलमेयत्वेनोक्ता न त्विन्द्रियविषयपरिमाणं, ततस्तदात्माङ्गुलेनैवेति, तदाह भाष्यकृत् - " तणुमाणं चिय तेणं, हविज भणियं सुए वि तं चैव ॥ एएण देहमाणाई, नारयाईण मिजंति ।। ३४४ ॥" [ तनुमानमेव तेन भवेद् भणितं श्रुतेऽपि तदेव ॥ एतेन देहमानानि, नारकादीनां मीयन्ते ॥] इति । ननु पुष्करवरद्वीपस्य मानुषोत्तरपर्वतद्विधाकृतस्य अवग्भागवर्ति ( योजितः पाठ: ) देहस्पर्शने - न्द्रिययोरेवोत्सेधाङ्गु लमेयत्व मन्येन्द्रिय तद्विषया णामात्माङ्गु लभ्यत्वं व्यवस्थापितम् ॥ Page #164 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरण भीवाना पंचप्रकरणम्॥ ॥७४॥ (योजितः न्यधैं मानुषोत्तरसन्निधावुत्कृष्टे दिवसे कर्कटकसंक्रान्त्यामुदयेऽस्तमये च सातिरेकैरेकविंशतिलौर्योजनानां व्यवस्थितं सूर्य मनु- पाठः)तृप्याः पश्यन्ति, यदुक्तं "सीयालीससहस्सा, दो य सया जोयणाण तेवढी ।। एगवीस सट्ठिभागा, कक्कडमाइम्मि पेच्छ नरा ॥१॥" तीयस्तरङ्गः [ सप्तचत्वारिंशत्सहस्राणि द्वे शते योजनानां त्रिषष्टिं । एकविंशतिं षष्टिभागान्कर्कादौ प्रेक्षन्ते नराः] इति, यथान तथा नयनविपुष्कराःऽपि मानुषोत्तरसमीपे प्रमाणाङ्गुलनिष्पन्नैः सातिरेकैकविंशतियोजनलक्षैर्व्यवस्थितमादित्यं तत्र दिने तनिवासिनो षयप्रमाण लोकाः समवलोकयन्ति, तदुक्तम्-" एगवीसं खलु लक्खा, चउतीसं चेव तह सहस्साई ॥ तह पंच सया भणिया, स्य यथा५ सत्त साए अइरित्ता ॥१॥ इति नयनविसयमाणं, पुक्खरदीवद्धवासिमणुआणं ।। पुव्वेण य अवरेण य, पिहं पिहं होइ 15 सूत्रामिहि नायव्वं ॥२॥" इति । [ एकविंशतिः खलु लक्षाणि चतुस्त्रिंशदेव तथा सहस्राणि ॥ तथा पश्च शतानि भणितानि सप्त- तत्वं तथा त्रिंशतातिरिक्तानि ॥ इति नयनविषयमानं पुष्करद्वीपार्धवासिमनुजानाम् ॥ पूर्वेण चापरेण च पृथक् पृथक् भवति ज्ञातव्यम् ॥] त्मोत्सेधातस्मान्नयनेन्द्रियस्य सातिरेकयोजनलक्षस्वरूपं विषयपरिमाणं यथा प्रज्ञापनादिसूत्रे भिहितं तथाऽऽत्माङ्गुलोत्सेधागुल गलप्रमाणाप्रमाणाङ्गुलानामेकेनापि गृह्यमाणं न युक्तं, प्रमाणाङ्गुलनिष्पन्नस्यापि योजनलक्षस्य तनिष्पन्नसातिरेकैकविंशतियोजनलक्षेभ्य न्यतमेनाएकविंशतितमभागवर्तित्वेन बृहदन्तरत्वात, तस्मादकत्र सातिरेकं लक्षम, अन्यत्र तु सातिरेकैकविंशतिलक्षाणि योजनानां नयन पि न युक्त स्य विषयप्रमाणं त्रुवतः सूत्रस्य पूर्वापरविरोधः, तदाह भाष्यकृत्-"लक्खेहिं एक्कवीसाए, साइरेगेहिं पुक्खरद्धम्मि ।। उदये त्वमित्यापेच्छन्ति नरा, सूर उक्कोसए दिवसे ॥३४५॥ नयणिदियस्स तम्हा, विसयपमाणं जहा सुएभिहियं ॥ आउस्सेहपमाणं-गुलाण शङ्कनम् ॥ एकण वि न जुत्तं ॥ ३४६ ॥" [लक्षेरेकविंशत्या, सातिरकैः पुष्करार्धे ॥ उदये प्रेक्षन्ते नरा, सूर्यमुत्कृष्ट ।। ७४॥ Page #165 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रतिक्षेपः, दिवसे ॥ नयनेन्द्रियस्य तस्मा-द्विषयप्रमाणं यथा श्रुते भणितम् ॥ आत्मोत्सेधप्रमाणा-कुलानामेकेनापि न युक्तम् ॥] (योजितः इतीति चेत्, न, सातिरेकयोजनलक्षं नयनविषयप्रमाणं प्रतिपादयतः सूत्रस्याभिप्रायापरिज्ञानात, तथाहि-स्वयं तेजोरूपप्रकाशरहि- पाठः) तत्वात्परप्रकाशनीये पर्वतगर्तादिवस्तुन्येव सातिरेकयोजनलक्षं नयनविषयप्रमाणं, न तु स्वयमेव तेजोयुक्तत्वेन प्रकाश्ये चन्द्रार्का- | सूत्राभिमादिके प्रकाशके वस्तुनि, तत्र त्वनियम एव, "व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्ति तु सन्देहादलक्षणम्" इति न्यायाद् व्याख्यानात्सूत्रं दयोपवर्णनेनोविषयविभागेन धरणीयं न तूभयपक्षोक्तिमात्रभ्रमितस्तद्विरोध उद्भावनीयः, तदुक्तं-" जं जह सुत्ते भणिय, तहेव जइ तं विया क्ताशकालणा नत्थि ।। किं कालियाणुओगो, दिवो दिटिप्पहाणेहिं ॥१॥" [यद्यथा सूत्रे भणितं, तथैव यदि तद् विचारणा नास्ति ।। किं कालिकानुयोगो, दृष्टो दृष्टिप्रधानः] ॥ इति, इदमेवात्र प्रतिविधानमुपाददे भाष्यकार:-"सुत्ताभिप्पाओऽयं, पयासणिज्जे तयं न प्रविभज्य उ पयासे ॥ वक्खाणओ विसेसो, न हि संदेहादलक्खणआ॥३४७॥"[सूत्राभिप्रायोऽयं. प्रकाशनीये तन तु प्रकाशे ॥ व्याख्यान तो विशेषो, नहि सन्देहादलक्षणता ॥] इति । श्रोत्रं मेघगर्जितादिशब्दमुत्कृष्टतो द्वादशयोजनेभ्यः समायातं गृह्णाति, घ्राणरसस्पर्श श्रोत्रादिविनानीन्द्रियाणि तु गन्धरसस्पर्शलक्षणमर्थमुत्कर्षतो नवयोजनेभ्यः प्राप्तं गृहन्ति, अतः परतोऽप्यायातं शब्दादिकमेतानि न गृहन्ति, षयपरिमाणयथा प्रथमप्रावृषि मेघगर्जितादिविषयश्शब्दः प्रथममेघवृष्टौ सत्यां मृत्तिकादिगन्धश्च दूरादप्यागतो गृह्यमाणः समनुभूयते प्रदर्शनञ्च ॥ तथैव दादागतानां गन्धद्रव्याणां रसोऽपि रसनया सम्बन्धे सति केनचिद् गृह्यत एव, अत एव कटुकस्य तीक्ष्णादेर्वा वस्तुनः | सम्बन्धी अयं गन्ध इति वक्तारो भवन्ति, दादपि सरित्समुद्रादेमध्येनायातस्य वातादेः स्पर्शोऽपि शीतादिरनुभूयत एव, | तदाह भाष्यकार:-"बारसहिंतो सोनं, सेसाई नवहिं जोयणेहितो॥ गिव्हंति पत्तमत्थं, एत्तो परओ न गिण्हंति ॥३४८॥" SAGAR Page #166 -------------------------------------------------------------------------- ________________ KAGE EMI पाप चरः, ता" [द्रव्याणां मन्दपरिणामोदरग्राहकस्य जघन्यनाङ्गुलमयतत्वाभावात्केव (योजितः सविवरणं १४ [द्वादशभ्यः श्रोत्रं, शेषाणि नवम्यो योजनेभ्यः । गृह्णन्ति प्राप्तमर्थ-मितः परतो न गृह्णन्ति ॥] इति।। द्वादश-नवयोजनेभ्यः परतः पाठः) समागतानि शब्दगन्धादिद्रव्याणि मन्दपरिणामभावेन स्वस्वज्ञानानुकूलपरिणामानासादनतो न श्रोत्रघ्राणादिविज्ञानं जनयन्ति तृतीयस्तश्रीज्ञानाश्रोत्रादीन्द्रियाण्यपि तथाविधसामर्थ्याभावान परतः समागतानि शब्दादिद्रव्याणि गृहीत्वा स्वविज्ञानं जनयन्ति, तदिदं विष श्रोत्रादीयपरिमाणमुत्कृष्टत इन्द्रियाणां ज्ञेयं, जघन्येन तु नयनभिन्नेन्द्रियाणां असङ्ख्याततमादगुलासंख्येयभागादागतो विषयो ग्रहणगोप्रकरणम् ॥ न्द्रियविषय चरः, तदुक्तं भाष्यकृता“दव्वाण मंदपरिणा-मयाए परओ न इंदियबलंपि ॥ अवरमसंखेज्जंगुल-भागाओ नयणवज्जाणं ॥ ७५॥ परिमाणमु॥३४९॥" [द्रव्याणां मन्दपरिणामतया, परतो नेन्द्रियबलमपि ॥ अपरमसंख्येयांगुल-भागाद् नयनवर्जानाम् ।।] कृष्टतो वि. नयनस्य त्वतिसन्निकृष्टाञ्जनशलाकादेरग्राहकस्य जघन्येनाङ्गुलसङ्ख्येयभागाद्विषयपरिमाणनियमः, मनसस्तु मृर्तामूर्तसम- ६ भागेनोपदस्तविषयकस्यानियमेन दूरे आसन्ने च प्रवर्तमानस्य पुद्गलमात्रनिबन्धनियतत्वाभावात्केवलज्ञानवन्नास्त्येव विषयपरिमाणम्, पुद्ग- श्य जघन्येन लमात्रनिबन्धनियतश्रोत्रादीन्द्रियप्रभवयोमतिश्रुतज्ञानयोरपि विषयपरिमाणस्य सद्भावान्न ताभ्यां व्यभिचार इति बोध्यम्, तदुक्तं 18| तदुपदर्शित भाष्यकृता" संखेजइभागाओ. नयणस्स, मणस्स न विसयपमाणं ।। पोग्गलमिचनिबन्धा-भावाओ केवलस्सेव ॥ ३५०।" C नयनस्य तत्र [संख्येयभागतो नयनस्य, मनसो न विषयप्रमाणम् ।। पुद्गलमात्रनिबन्धा-ऽभावात्केवलस्येव॥ इति, श्रोत्रस्य प्राप्तकारित्वेऽयमपि विशेषः, म ६ नसो विषय. विशेषो ज्ञेयः, यदुत, भाषकस्यान्यस्य वा भेर्यादेः समश्रेणिव्यवस्थितः श्रोता भाषकभेर्यादिसम्बन्धिनं भाषकोत्सृष्टशब्दद्रव्याणि | परिमाणातद्वासिताऽपान्तरालस्थद्रव्याणि चेत्येवं मिश्रं शब्दद्रव्यराशिं शणोति न तु वासकं वास्यमेव वा केवलम्, विश्रेणिव्यवस्थितः 18 नियमः श्री. श्रोता तु भाषकोत्सृष्टशब्दद्रव्यैः भेर्यादिशब्दद्रव्यैर्वा वासितानि समुत्पन्नशब्दपरिणामानि द्रव्याण्येव शृणोति, न तु भाषकाधु ने विशेषा| न्तरश्च ॥ ।। ७५॥ SHAREKAR R Page #167 -------------------------------------------------------------------------- ________________ LARS त्सृष्टानि, तेषामनुश्रेणिगामित्वेन विदिग्गमनासम्भवात, कुब्यादिप्रतिघाततोऽपि न तेषां विदिक्षु गमनमतिसूक्ष्मत्वात, लेष्ट्रादिवादरद्रव्याणामेव ततो विदिक्षु गमनात्, निसर्गसमयानन्तरश्च समयान्तरेषु तेषां भाषापरिणामेनानवस्थानादेव न स्वतो विदिक्ष गमनसम्भवः "भाष्यमाणैव भाषा भाषा, भाषासमयानन्तरं भाषाऽभाषेव" इतिवचनात्, द्वितीयादिसमयेषु भाषाद्रव्यैर्वासितानि समुत्पन्नशब्दपरिणामानि द्रव्यान्तराण्येव भाषा तामुपादायैव " चउहि समयेहि लोगो भासाए निरंतरं तु होइ फुडो" इति वचनप्रवृत्तिरविरुद्धा, समश्रेणिव्यवस्थितः श्रोता वक्तृनिसृष्टं शन्दं शृणोति, विश्रेणिस्थः तद्वासितानि द्रव्याणि द्वितीयसमये विदिक्षु गतानि शब्दस्वभावमापन्नानि शृणोतीत्येवं समयभेदेऽपि तदनुपलक्षणमतिसौक्ष्म्यात् । घ्राणादीन्द्रियग्राह्याणां मिश्रस्वभावानां गन्धादिद्रव्याणां बादरत्वेनानुश्रेणिगमननियमो नास्तीति, तदुक्तं नियुक्तिकृता "भासासमसेढीओ, सई जं सुणइ मीसयं सुणइ । वीसेढी पुण सई, सुणेइ नियमा पराघाए ॥३५१॥" इति, भासासमसेढीओ इति गाथार्थोपोलकं भाष्यगाथात्रयं यथा “सेढी पएसपंती, वदतो सव्वस्स छद्दिसिं ताओ । जासु विमुक्का धावइ, भासा समयम्मि पढमम्मि ॥ ३५२ ॥ भासासमसेढिठिओ, तम्भासामीसियं सुणइ सदं ॥ तद्दव्वभावियाई, अण्णाई सुणइ विदिसत्थो ॥ ३५३ ॥ अणुसेढीगमणाओ, पडिधायाभावओऽनिमित्ताओ ॥ समयंतराणवत्था-णओ य मुक्काई नसुणेइ ॥३५॥" [भाषासमश्रेणीतः, शब्दं यं शृणोति मिश्रकं शृणोति । विश्रेणिः पुनः शब्द, शृणोति नियमात्पराधाते ॥श्रेणिः प्रदेशपंक्तिर्वदतः सर्वस्य षट्सु दिक्षु ताः॥ यासु विमुक्तो धावति भाषासमये प्रथमस्मिन् ॥ भाषासमश्रेणिस्थितस्तद्भाषामिश्रितं शृणोति शब्दम् ॥ तद्व्यभावितान्यन्यानि, शृणोति विदिकस्थः ॥ अनुश्रेणिगमनात्प्रतिघाताभावादनिमित्तात् ॥ समयान्तरानवस्थानाच मुक्तानि न शृणोति ॥ ] ॥ इति ॥ व्यक्तार्थमदः॥ AASARGICARK (योजितः पाठः) श्रोत्रविषय शब्दतो घाणादिया. ९ ह्यगन्धादीना मनुश्रेणिगमननियमाभावो विशेष उपपादितः। Page #168 -------------------------------------------------------------------------- ________________ हैं सविवरणं भीवाना (योजितः पाठः) । तृतीयस्त प्रकरणम्॥ ॥ ७६॥ RERABADASACRECIES वाग्द्रव्याणामादानोत्सर्गावेवम्, सर्व एव वक्ता कायिकेन योगेन शब्दद्रव्याणि गृहाति वाचिकेन च योगेन निसृजति, प्रतिसमयं गृह्णाति मुश्चति चेति, उक्तं च नियुक्तिकृता"गिण्हइ य काइएणं, निसिरह तह वाइएण जोएणं ।। एगंतरं च गिण्हइ, निसिरइ एगंतरं चेव ॥ ३५५॥” इति, विवेचिता चेयं गाथात्रयेण भाष्यकृता, तद्यथा-"गिव्हिज काइएणं, किह निसिरह वाइएण जोएणं ॥ को वाध्यं वइजोगो, किंवाया, कायसंरंभो ॥३५६॥ वाया न जीवजोगो, पोग्गलपरिणामओ रसाइन्च ॥ न य ताए निसिरिजइ, स च्चिय निसिरिज्जए जम्हा॥३५७॥अह सो तणुसरंभो, निसिरइ तो काइएण वत्तव्व।।तणुजोगविसेस चिय, मण-चइजोगत्ति जमदोसो ॥३५८॥"[गृह्णाति च कायिकेन, निसृजति तथा वाचिकेन योगेन ।। एकान्तरं च गृह्णाति निसृजत्येकान्तरमेव ।। गृहीयात्कायिकेन कथं निसृजति वाचिकेन योगेन । को वाऽयं वाग्योगः किं वाग्वा कायसंरम्भः॥ वाग न जीवयोगः, पुद्गलपरिणामतो रसादिरिव ॥न च तया निसृज्यते, सैव निसृज्यते यस्मात् ।। अथ स तनुसंरम्भो, निसृजति ततः कायिकेन | वक्तव्यम् । तनुयोगविशेषावेव मनोवाग्योगाविति यददोषः] अत्र सार्धगाथाद्वयं परप्रश्नरूपं तदनन्तरमुत्तरम् , अत्र चेत्थं बृहद्वृत्ति:-"अत्र परः प्राह-ननु 'गिण्हइ य काइएणं' इति यदुक्तं तन्मन्यामहे, यतो गृह्णीयात् कायिकेन योगेन वान्द्रव्याणि भाषका, नेदमयुक्तं कायव्यापारमन्तरेण तद्ग्रहणायोगात्, यत्पुनरुक्तं 'निसिरइ तह वाइएण जोएणं' इति तदेतन्नावगच्छामः, यतः कथं नाम निसृजति वाचिकेन योगेन, गृह्यमाणाया वाचो जीवव्यापाररूपयोगाभावान्नैतद् घटत इत्यर्थः, इति संक्षेपेणोक्त्वा विस्तराभिधित्सया प्राह-को वाऽयमित्यादि, वेत्यथवा, किमनेन संक्षेपेण, विस्तरेणापि पृच्छामः, कोऽयं नाम वाग्यांगः, येन निसृजतीत्युक्तं, किं वायत्ति वागेव निसृज्यमाना भाषापुद्गलसमृहरूपो वाग्योगः १, किंवा कायसंरम्मः कायव्यापारस्त मतिज्ञाननिरूपणप्रसङ्के इन्द्रियविषयमाननिरूपणं तत्र च शब्दद्रव्यादानोस्सर्गप्रक्रियोपवर्णनम्॥ ॥७६॥ Page #169 -------------------------------------------------------------------------- ________________ निसिरइ तह वाइएण जायते, किन्तु तनुयोगविश निसर्गहेतुर्वाग्योगः २, इति विकल्पद्वयम् , तत्र प्रथमविकल्पपक्षं निराकुर्वाह-'वाया न जीवजोगो' इत्यादि, योगोऽत्र (योजितः शरीरजीवव्यापारः प्रस्तुतः, स च वाग् न भवति, पुद्गलपरिणामत्वात्तस्याः, रसगन्धादिवत्, यस्तु जीवव्यापाररूपो योगः स I पाठः) पुद्गलपरिणामोऽपि न भवति, यथा जीवाधिष्ठितकायव्यापारः, अपि च न य ताएत्ति' न च तया वाचा किश्चिन्निसृज्यते, मतिज्ञानतस्या एव निसृज्यमानत्वात्, न च कर्मैव करणं भवति, अतो वागेव वाग्योग इति प्रथमविकल्पो न घटते, अथ द्वितीयमधि- प्रसङ्गे इन्द्रिकृत्याह- अहेत्यादि' अथासौ वाग्योगस्तनुसंरम्भः कायव्यापारः, ततः कायिकेन निसृजति इत्येवमेव वक्तव्यं स्यात्, अतः यविषयप्ररूकिमुक्तं 'निसिरइ तह वाइएण जोएणं' इति, अत्रोत्तरमाह 'तणुजोग' इत्यादि, ननु द्वितीयविकल्प एवात्राङ्गीक्रियते, केवलम पणप्रस्तावे विशिष्टः काययोगो वाग्योगतया नास्माभिरिष्यते, किन्तु तनुयोगविशेषावेव कायव्यापारविशेषादेव मनोवाग्योगाविष्येते, यद् | वाग्योगमनोयस्मात्, ततोऽयमदोषः, न हि कायिको योगः कस्याश्चिदप्यवस्थायां शरीरिणां जन्तूनां निवर्तते, अशरीरिणां सिद्धानामेव योगयोस्ततन्निवृत्तेरिति, अतो वाग्निसर्गादिकालेऽपि सोऽस्त्येवेति भावः ॥ ३५६, ३५७, ३५८ ॥ परमार्थतस्सर्वत्र कायिकस्य योगस्य ६त्त्वनिर्णवः॥ सद्भावेऽप्युपाधिभेदाधोगत्रयविभजनं नानुपपन्न, तथाहि, येन संरम्भेण मनोवारद्रव्याणामुपादानं करोति स कायिको योगः, येन तु संरम्भेण वाग्द्रव्याणि मुञ्चति स वाग्योगः, येन च मनोद्रव्याणि चिन्तायां व्यापारयति स मानसिको योग इत्येवमपाधिभेदात्रिधा विभक्तः कायिको योगः,तदाह भाष्यकृत् "किं पुण तणुसंरम्भेण,जेण मुंचइ स वाइओजोगो।।मण्णइ य स माणसिओ, तणुजोगो चेव य विभत्तो॥३५९॥" [किं पुनस्तनुसंरम्येण, येन मुञ्चति स वाचिको योगः। मन्यते च स मानसिक-स्तनुयोग एव च 8. विभक्तः ॥] इति,अनुमानाच्च मनोवाग्योगोभयस्य तनुयोगरूपत्वं,प्रयोगश्च,मनोवाग्योगौ काययोगस्वरूपौ,कायेनैव तद्रव्यग्रहणात् | जन्तूनां निवर्तते, अशा Page #170 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं भीज्ञाना र्णवप्रकरणम् ।। ॥ ७७ ॥ प्राणापानवदिति, न च दृष्टान्तासिद्धिः, प्राणापानव्यापारस्य तनुयोगत्वाभावे योग चतुष्टयप्रसङ्गात्, तदिदमाह भाष्यकृत् " तणुजोगो च्चिय मण-वह-जोगा कारण दव्वगहणाओ || आणापाणव्व न चे, तओ वि जोगंतर होआ || ३६०||" [ तनुयोग एव मनोवायोगी कायिकेन द्रव्यग्रहणात् । आनप्राणवद् न चेत्सोऽपि योगान्तरं स्यात् ।।] इति, तुल्येऽपि तनुयोगत्वे प्राणापानयोगस्य न पृथग्ग्रहणं मनोवाग्योगयोश्च पृथग्ग्रहणमित्यत्र लोकलोकोत्तररूढतया व्यवहारप्रसिद्धिरेव नियामकं, लोके लोकोत्तरे च कायिकवाचिक मानसिकयोगानामेव त्रयाणां व्यवहारो न प्राणापानयोगस्य, तदिदमुक्तं भाष्यकृता " तुल्ले तणुजोगते, कीस व जोगंतरं तओ न कओ ॥ मण - वइजोगा व कथा, भण्णइ ववहारसिद्धत्थं || ३६१ ||" [तुल्ये तनुयोगत्वे कस्माद्वा योगान्तरं स न कृतः ॥ मनोवाग्योग वा कृतौ भण्यते व्यवहारसिद्धयर्थम् ||] इति, कायक्रियातिरिक्तं स्वाध्यायविधान- परप्रत्यायनादिकं वाचः, धर्मध्यानादिकं मनसश्च विशिष्टं स्फुटं फलं यथोपलभ्यते नैवं प्राणापानयोरित्यस्मात् कारणात्प्राणापानयोगस्य न पृथग्व्यवहारः, किन्तु मनोवाग्योगयोरेव, जीवत्यऽसाविति प्रतीतिजननादिलक्षणं फलञ्च प्राणापानयोगस्य न पृथग्योगत्वप्रयोजकं, तथा सि धावति वल्गतीत्यादिप्रतीतिफलजननाद्भावन वल्गनादिव्यापारस्यापि पृथग्योगत्वं प्रसज्येतेति, तदाह भाष्यकारः " कायकिरियाइरिसं, नाऽऽणापाणफलं जह वईए । दीसह मणसो य फुडं, तणुजोगब्र्भतरो तो सो ॥३६२॥” [ कायक्रियाव्यतिरिक्तं, नाऽऽनप्राणफलं यथा वाचः । दृश्यते मनसश्च स्फुटं तनुयोगाभ्यन्तरस्ततः सः ॥ ] इति, तनुयोगान्तर्गतत्वेऽपि वाग्योगमनोयोगयोरुपाधिभेदेन पृथगभिधानमित्येकः पक्षो व्यावर्णितः, अस्ति चात्र स्वतन्त्रावेव वाग्योगमनोयोगाविति तयोः पार्थक्येन विभजनमिति द्वितीयोऽपि पक्षः । स चैव - काय व्यापारगृहीतेन वाग्द्रव्यसमूहेन सहकारिणा वाग्निसर्गार्थं जीवस्य व्यापारो वाग्योगः, कायव्या ( योजित: पाठ: ) तृतीय स्तरङ्गः ॥ वाग्योगमनोयोगयोस्त नुयोगत्वेऽपि पथग्ग्रहणं न प्राणापानयोगस्य तथात्वमित्य त्र युक्तिरुपदर्शिता । ॥ ७७ ॥ Page #171 -------------------------------------------------------------------------- ________________ HE AAM AMUDARSHRECEMUSAHAk पारगृहीतेन मनोद्रव्यसमूहन सहकारिणा वस्तुचिन्तनाय जीवस्य व्यापारो मनोयोगः, प्रथमेन परप्रत्यायनं द्वितीयेन जिन (योजितः मृर्त्यादिचिन्तनमित्येवं स्वतन्त्रावेव तौ, यद्यपि प्राणापानद्रव्यसाचिव्यात्तन्मोचने जीवव्यापारः प्राणापानयोग इति सोऽपि पाठः) स्वातन्त्र्येण पृथग् व्यपदेष्टुं शक्यस्तथापि लोकलोकोत्तररूढव्यवहारसिद्धयर्थ तयोरेव पार्थक्येनाभिधानं न तु स्वतन्त्रस्यापि ते स्वतन्त्रत्वाप्राणापानयोगस्येति बोध्यम् , अत्रार्थे गाथाद्वयं भाष्यस्य यथा-"अहवा तणुजोगाहिअ-वइदब्वसमूहजीववावारो ।सो वइजोगो देव वाग्योभण्णइ, वाया निसिरिजए तेणं ॥३६३॥ तह तणुवावाराहिअ-मणदव्वसमूहजीववावारो ।सो मणजोगो भण्णइ,मण्णइ नेयं जओ 18 गमनोयोगतेणं ॥३६४॥"[अथवा तनुयोगाहृत-वाग्द्रव्यसमूहजीवव्यापारः स वाग्योगो भण्यते वाग् निसृज्यते तेन । तथा तनुव्यापाराहृत- योः पार्थमनोद्रव्यसमूहजीवव्यापारः। स मनोयोगो मण्यते, मन्यते ज्ञेयं यतस्तेन ।।] इति, प्रतिसमयं गृह्णाति मुश्चतीत्येवमेकान्तरं गृहणाति क्येन विभमुञ्चतीत्येतत्स्वरूपं प्रागुक्तं तत्कथमित्यपेक्षायामुच्यते, यथैकस्माद् ग्रामादन्योऽनन्तरितोऽपि लोकरूढ्या ग्रामान्तरमुच्यते, पुरुषा १४ जनं न तु माद्वाऽन्यः पुरुषोऽनन्तरोऽपि पुरुषान्तरमभिधीयते तथेहापि एकस्मात्समयादन्यः समयोऽनन्तरोपि समयान्तरमुच्यते णापानयोगतेनानुसमयमेव गृह्णाति मुश्चति चेति सिद्धं भवति, तदुक्तं भाष्यकृता-" जह गामाओ गामो, गार्मतरमेवमेग एगाओ ॥15तिविचार एगंतरंति भण्णइ, समयादणतरो समओ ॥ ३६५ ॥” [यथा ग्रामाद् ग्रामः, मामान्तरमेवमेक एकस्मात् ॥ एकान्तरमिति भण्यते, समयादनन्तरः समयः ॥ ] इति, ये तु मन्यन्ते ग्रहणं विसर्जनं च शब्दद्रव्याणामेकैकेन समये हाति मुञ्चनान्तरितमित्येकान्तरमिति, तेषामेवम्मननं न युक्तं तथा सति अन्तराऽन्तरा विच्छिन्नरत्नावलीरूपो ध्वनिः स्यात, एवञ्चाविच्छेदेन तीत्येतद्विशन्दग्रहणानुपपत्तिप्रसङ्गः, प्रतिसमयग्रहणप्रतिपादकत्वेन प्रतिसमयनिसर्गप्रतिपत्तितात्पर्यकस्य " अणुसमयमविरहिअं निरंतरं चारश्च ॥ RECECARRC Page #172 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरण भीवाना प्रकरणम्॥ ॥७८ ॥ गिम्हइ" इति सूत्रस्य विरोधश्च, तदाह भाष्यकार:-"कई एगंतरियं, मष्णन्तेगंतरं ति तेसि च ॥ विच्छिमावलिरुवा,होइ धणी,* (बोजितः सुयविरोहो य ॥३६॥"केचिदेकान्तरितं मन्यन्ते, एकान्तरमिति तेषां च॥ विच्छिमावलीरूपो, भवति ध्वनिः श्रुतविरोषवा] पाठः) इति, ननु "संतरं निसिरह नो निरंतरं निसिरह, एगेणं समएणं गिण्डइ, एगेण समएणं निसिरह" इत्यादि प्रज्ञापनोक्तसूत्रमस्म ॥ तृतीयः त्पक्षसमर्थकमपि समस्तीति तत्कथमुच्यते अनुसमयं गृह्णाति मुञ्चति चेति चेत्, उच्यते, अनुसमयग्रहणेऽनुसमयनिसर्गोऽपि युक्त तरङ्गः॥ एवं गृहीतस्यावश्यमेवानन्तरसमये निसर्गात, न चैवं 'संतरं निसिरई' इत्यस्यासङ्गतता, विषयविभागेन तदुपपत्तेः, निसर्गो हि ग्रहण अनुसमयं मपेक्ष्य भवति, यस्मिन् प्रथमादिसमये यानि भाषाद्रव्याणि गृहीतानि न तानि तस्मिन्नेव ग्रहणसमये नैरन्तर्येण निसृजति, किन्तु गृहाति मुग्रहणसमयादनन्तरसमये निसृजति,यथा प्रथमसमयगृहीतानां न तस्मिन्नेव समये निसर्गः,किन्तु द्वितीयसमय एव, एवं द्वितीयसमय पति चेति गृहीतानां तृतीयसमये, तृतीयसमयगृहीतानां चतुर्थसमये इत्यादि, तदेवं ग्रहणापेक्षया निसर्गः सान्तर एव, द्वितीयादिषु सर्वेष्वपि सिद्धान्ते प्र. समयेषु निरन्तरं तद्भावात्समयापेक्षया तु निसर्गो निरन्तर एच,नागृहीतं कदापि निसृज्यत इति नियमाद् ग्रहणपरतन्त्रतया निसर्गस्ये | ज्ञापनापाठ विरोधापति 'संतरं तेणं ति' प्रज्ञापनायां ग्रहणान्तरितत्वेन निसर्जनं सान्तरमुक्तं, नानिसृष्टं गृह्यत इति नियमस्य तु प्रथमसमये निसर्गमन्तरे त्तिपरिहाणापि ग्रहणसद्भावतोऽभावेन स्वतन्त्रं ग्रहणमिति विषयविभागेन "संतरं निसिरई" इत्युपपद्यते, 'न निरंतरं' इत्यपि निरन्तरशब्दस्य रेण तत्त्वोसमशन्दपर्यायत्वेन न ग्रहणसमकालं निसृजति किं तु पूर्व पूर्व गृहीतमुत्तरोत्तरसमयेषु निसृजतीत्येवंपरतयोपपद्यते " एगणं पपादनम् ।। समयेणं गिण्हइ, एगेणं समयेणं निसिरह" इत्यपि आयेनकेन समयेन गृह्णात्येव न निसृजति, द्वितीयादिसमयादारभ्यैव निसर्गस्य भावाद्, पर्यन्तवर्तिना त्वेकेन समयेन निसृजत्येव न तु गृह्णाति भाषाभिप्रायोपरमादित्येवं परतया एकेन पूर्वपूर्वसमयेन ॥ ७८॥ PRECASTAARAKSHRUGAT Page #173 -------------------------------------------------------------------------- ________________ GORAKA गृह्णाति, एकेनोत्तरोत्तरसमयेन निसृजतीत्येवम्परतया वोपपद्यत इति, तमिममर्थ प्रतिपादयति भाष्यगाथाचतुष्टयं यथा"आह, सुए च्चिय निसिरइ, संतरियं न उ निरंतरं भणियं ॥ एगेण जओ गिण्हइ, समयेणेगेण सो मुयइ ॥३६७।। अणुसमयमणं- तरियं, गहणं भणियंजओ विमुक्खो वि ॥ जुत्तो निरंतरो च्चिय, भणइ, कह संतरो भाणओ ॥३६८॥ गहणावेक्खाए तओ, निरंतर जम्मि जाई गहियाई न वि तम्मि चेव निसिरइ, जह पढमे निसिरणं नत्थि ॥३६९।। निसिरिजइ नागहियं, गहणतरियंति संतरं तेणं ॥ न निरंतरंति न समयं, न जुगवमिह होति पजाया ॥ ३७० ॥" [आह, श्रुत एव निसृजति, सान्तरितं न तु निरन्तरं भणितम् ॥ एकेन यतो गृणाति, समयेनकेन स मुश्चति ॥ अनुसमयमनन्तरितं, ग्रहणं भणितं यतो विमोक्षोपि ॥ युक्तो निरन्तर एव, भणति कथं सान्तरो भणितः१॥ ग्रहणापेक्षया तको, निरन्तरं यस्मिन्यानि गृहीतानि ॥ नापि तस्मिन्नेव निसृजति, यथा प्रथमे निसर्जनं नास्ति ॥ निसृज्यते नाऽगृहीतं, ग्रहणान्तरितमिति सान्तरं तेन ॥ न निरन्तरमिति न समय, न युगपदिह भवन्ति पर्यायाः॥]इति, ग्रहणादेजघन्यमुत्कृष्टश्च कालमानमेवं प्रतिपत्तव्यं, तथाहि-ग्रहणनिसर्गभाषा इत्येवं त्रीण्यपि प्रत्येक जघन्यत एकसमयानि भवन्ति, ग्रहणनिसर्गोभयन्तु प्रथमसमये ग्रहणं द्वितीयसमये निसर्ग इति कृत्वा द्विसमयम, निसर्गादभेदेऽपि भाषाया भाष्यमाणैव भाषा न तु गृह्यमाणेति निसर्गस्यैव भाषात्वं न तु ग्रहणनिसर्गोभयस्येत्येतत्प्रतिपत्तये पृथगभिधानं, उभयस्य भाषात्वे द्विसमयत्वापत्तिः, ग्रहणस्य तु भाषाव्युत्पत्तिनिमित्ताभावादेव न भाषात्वं, भाषायाः पृथगग्रहणे तु कश्चित्तदुभयस्यापि योग्यतया भाषात्वं प्रतिपद्येत, तत्र 'भासिजमाणा भासा' इत्यागमविरोधः, निसर्गभाषयोरभेदेऽपि मन्दधियः निसर्गकालमानानुक्तिभ्रमोन्मूलनार्थ निसर्गस्यापि पृथग्वचनम्, सर्वाण्यप्येतानि उत्कृष्टतः प्रत्येकमन्तर्मुहूर्वकालं ( योजितः पाठः) अनुसमय गृहाति मुच तीत्येतत्संवादकं भाष्यवचनं ग्रहणादेर्जघन्य मुत्कृष्टश्च कालमानमुपपादितम् ॥ R १४ E Page #174 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना र्णव प्रकरणम् ॥ ॥ ७९ ॥ भवन्ति, अन्तर्मुहूर्तमपि महाप्रयत्नस्य लघु भवति अल्पप्रयत्नस्य तु बृहत्प्रमाणं भवतीति, उक्तार्थसंवादिन्यौ भाष्यस्येमे गाथे" गहणं मोक्खो भासा, समयं गह-निसिरणं च दो समया ॥ होंति जहण्णंतरओ, तं तस्स च बीयसमयम्मि ॥ ३७१ ॥ गहणं मोक्खो भासा, गहणविसग्गा य होंति उक्कोसं ॥ अंतोमुहुतमेतं पयत्तभेएण भेयो सिं ॥ ३७९ ॥ [ ग्रहणं मोक्षो भाषा समर्थ, ग्रह - निसर्जनं च द्वौ समयौ ॥ भवन्ति जघन्यान्तरतस्तत् तस्य द्वितीयसमये । ग्रहणं मोक्षो भाषा ग्रहणविसर्गौ च भवन्त्युत्कर्षतः ।। अन्तर्मुहूर्तमात्रं प्रयत्नभेदेन भेद एषाम् ॥] इति, प्रथमसमये ग्रहणमेव चरमसमये निसर्ग एव, मध्यसमये तु द्वावपि भवतः, एकस्मिन् समये कथं तदुभयं विरोधादिति नाशङ्कनीयम्, यस्यैव यस्मिन् समये ग्रहणं तस्यैव तस्मिन्नेव समये निसर्ग इत्युपगमे स्याद्विरोधः, न चैवमुपगमः, किन्तु प्रथमसमये यस्य ग्रहणं तस्य द्वितीयसमये निसर्गोऽन्यस्य च तदानीं ग्रहणमित्येवमुत्तरोत्तरसमयेऽभ्युपगमे विषयभेदेन विरोधाभावात्, एकस्मिन् समये उपयोगद्वयस्यैवासम्भवो न तु क्रियाद्वयस्य " जुगवं दो नत्थि उवओगा " इतिवचनादागमे उपयोगद्वयस्यैव यौगपद्यनिषेधो न तु क्रियाद्वयस्य, “भंगियसुयं गणतो, वट्टइ तिविहे विज्झामि " इत्यादिवचनेन वाङ्मनः कायक्रियाणामेकत्र समये प्रवृत्तिरभ्युपगतैव, अगुल्यादिसंयोगविभागक्रिययोः, संघातपरिसाटक्रिययोः, उत्पादव्ययक्रिययोश्चैकत्र समयेऽनेकस्थानेष्वागमेऽनुज्ञा विहितैव तथाऽध्यक्षतोऽपि जिनप्रतिमामर्चयतः पुंसः एकस्मिन् समये करणभेदेन घण्टिका चलन धूपदानप्रतिमादिवीक्षणस्तुतिपठनादीनां बह्वीनामपि क्रियाणां युगपत् प्रवृत्तिर्दृश्यत इति ॥ तदाह भाष्यकारः " गहणविसग्गपयत्ता, परोप्परविरोहिणो कहं समए । समए दो उवओगा, न होज, किरियाण को दोसो ॥ ३७३ ॥ " [ ग्रहणविसर्गप्रयत्नौ, परस्परविरोधिनौ कथं समये १ ॥ समये द्वावुपयोगौ न भवेतां क्रियाणां को दोष ( योजितः पाठ: ) ग्रहणादेर्मघन्योत्कृष्टकालमानोपदर्शने भाष्य संवादः एक समये क्रिया यौगपद्या विरोधे भाष्य संवादश्व ॥ ७९ ॥ Page #175 -------------------------------------------------------------------------- ________________ (योजितः पाठः) औदारिक क्रियाहार कान्यतम शरीरवान् भाषकः स. त्यादिचतु इति, कायिकेन योगेन भाषापरिणमनयोग्यानि द्रव्याणि प्रथमसमये गृहातीति सामान्येनोपदर्शितं परमत्र औदारिकवैक्रियाहारकतैजसकार्मणभेदेन पञ्चविधेषु कायेषु औदारिकवैक्रियाहारकशरीरेषु जीवप्रदेशाः भवन्ति नान्यत्र, तैर्जीवप्रदेशैर्जीवाभिन्नैर्भाषणाभिप्रायादिसामग्रीपरिणामे सति भाषापर्याप्तिमान् भाषको वाग्द्रव्यनिकुरम्बं गृहीत्वा सत्यां सत्यामृषां मृषां असत्यामृषां चेत्यन्यनमा भाषां भाषते निसृजति, तथा चौदारिकशरीरवान् वैक्रियशरीरवान् आहारकशरीरवान् वा जीवो ग्रहाति मुञ्चति चेति पर्यवसितम्, तदुक्तं नियुक्तिकृता“तिविहम्मि सरीरम्मि, जीव-पएसा हवंति जीवस्स ॥जेहि उगेण्हइ गहणं, तो भासइ भासओ भासं ॥३७४ । ओरालिय वेउब्विय-आहारओ गेण्हइ मुयइ भासं ॥ सच्चं सच्चामोसं, मोसं च असच्चमोसं च ॥३७५।" [त्रिविधे शरीरे जीव-प्रदेशा भवन्ति जीवस्य ।। यैस्तु ग्रहणाति ग्रहणं,ततो भाषते भाषको भाषाम्।। औदारिको वैक्रियआहारकः गृह्णाति मुश्चति भाषाम् । सत्यां सत्यामृषां मृषां चासत्यामृषां च ॥] इति, तत्र सद्धयः साधुभ्यो मुनिभ्यो हिता इहपरलोकाराधकत्वेन मुक्ति प्रापिका अथवा सद्भयो मूलोत्तरगुणरूपेभ्यो गुणेभ्यो जीवादिपदार्थेभ्यो वाविपरीतयथावस्थितस्वरूपप्ररूपणेन हिता सत्या & भाषा १, विपरीतस्वरूपा तु मृषाभाषा २, तदुभयस्वभावा सत्यामृषा ३, या तूक्तत्रितयलक्षणानन्तर्भाविनी आमन्त्रणाज्ञापना दिविषयो व्यवहारपतितः शब्द एव केवलः साऽसत्यामृषा ४, एताश्चतस्रोऽपि भाषाः सभेदलक्षणोदाहरणा दशवैकालिकनियुक्त्यादिकसूत्रतोऽवसेयाः, तथा चाह भाष्यकारः "सच्चा हिता सयामिह, संतो मुणओ गुणा पयत्था वा ।। तव्विवरीआ मोसा, मीसा जा तदुभयसहावा ॥ ३७६ ॥ अणहिगया जा तीसु वि, सद्दो च्चिय केवलो असचमुसा । एया सभेयलक्खण-सोदाहरणा जहा सुत्ते।।३७७॥"[सत्या हिता सतामिह, सन्तो मुनयो गुणाः पदार्था वा ॥ तद्विपरीता मृषा, मिश्रा या तदुभयस्वभावा । अनधि RALIACALCAREERICA भैदान्यतमभाषां गृह्णा ति मुञ्चतीत्यत्र नियु क्तिगाथा| संवादः स| त्यादिनिरु कौ भाष्यसंवादश्च ॥ Page #176 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना SABSC (योजितः पाठः) कस्यचिवक्तुर्भाषा चतुमिस्समयैर्लोक व्या प्रकरणम् ॥ ॥८ ॥ मोति न सा कृता या तिसृष्वपि शब्द एव केवलोऽसत्यमृषा ॥ एताः सभेदलक्षण-सोदाहरणा यथा सूत्रे ॥] इति, औदारिकादिशरीरवता जीवेन मुक्ता भाषा समस्तमपि लोकं व्यामोति, तेन द्वादशभ्योऽपि योजनेभ्यः परतो गतिरस्त्येव शब्दद्रव्याणां, यथा स्वविषयद्वादशयोजनाभ्यन्तरे नैरन्तर्येण तद्वासनासामर्थ्य, तथा बहिरपि केषाश्चिच्छन्दद्रव्याणां कृत्स्नलोकव्याप्तानां,चतुर्दशरज्वात्मका क्षेत्रलोकश्चतुर्मिस्समयैः कस्यचित्सम्बन्धिन्या भाषया पूर्यते, लोकस्य पर्यन्तवहँसङ्ख्येयभागे च समस्तलोकव्यापिन्या भाषाया अपि चरमान्तोऽसंख्ययभागो भवति, तदिदमाह शङ्कासमाधानाभ्यां नियुक्तिकार:-"कईहिं समएहिं लोगो, भासाए निरंतरं तु होइ फुडो । लोगस्स य कइभाए, कइभाओ होइ भासाए ॥३७८॥ चउहिं समयेहिं लोगो, भासाए निरंतर तु होइ फुडो । लोगस्स य चरिमंते, चरिमंतो होइ भासाए ॥३७९॥"[कतिभिः समयैर्लोको भाषया निरन्तरं तु भवति स्फुटः,॥ लोकस्य च कतिभागे कतिभागो भवति भाषायाः॥ चतुर्भिः समयैर्लोको,भाषया निरन्तरं तु भवति स्फुटः।। लोकस्य च चरमान्ते चरमान्तो भवति भाषायाः] इति, सर्वस्यापि वक्तुर्भाषा न लोकं व्यामोति किन्तु कस्यचिदेव, तथा हि-वक्ता द्विविधस्तत्रैकः उक्षताद्युपेतत्वेन मन्दप्रयत्नो वक्ता सर्वाण्यपि भाषाद्रव्याण्यभिन्नानि निसृजति, अन्यस्तु नीरोगतादिगुणस्तावप्रयत्नो वक्ता भाषाद्रव्याणि आदाननिसर्गप्रयस्नाभ्यां सूक्ष्मखण्डीकृत्य मुश्चति,अनन्तभाषाद्रव्यस्कन्धाश्रयभूतक्षेत्रविशेषरूपावगाहना वर्गणा असंख्येया गत्वा ततो मन्दप्रयत्नवक्तृनिसृष्टान्यभिन्नानि भाषाद्रव्याणि भिद्यन्ते, संख्येयानि च योजनानि गत्वा ध्वंसन्ते, उक्तश्च प्रज्ञापनायां भाषापदे 'जाई अभिन्नाई निसिरइ, ताई असंखेजाओ ओगाहणाओ गंता भेयमावजंति, संखिजाई जोयणाई गंता विद्धसमागच्छंति" यानितु महाप्रयत्नो वक्ता प्रथमत एव भिन्नानि निसृजति तानि सूक्ष्मत्वात् बहुत्वाचानन्तगुणवृद्धया वर्धमानानि षट्सु दिक्षु लोकान्तमाप्नु सर्वस्य तथेत्यस्योपपादकंनियुक्ति वचनं तथा । प्रज्ञापनावचनश्च RIBE Page #177 -------------------------------------------------------------------------- ________________ жааха-ха-х UCKIECRUCTOBACKBAROO ( योजितः वन्ति, शेषन्तु तत्पराघातवासनाविशेषाद्वासितया भाषयोत्पन्नभाषापरिणामद्रव्यसंहतिरूपया सर्व लोकं निरन्तरमापूरयन्ति, उक्तश्च पाठः) "जाई भिन्नाई निसिरइ ताई अणंतगुणपरिवड्डीए परिवड्डमाणाई लोयंत फुसन्ति" इति, तदाह भाष्यकार:-"कोई मंदपयत्तो, भाषया निसिरइ सयलाई सव्वदव्बाई । अन्नो तिव्वपयचो, सो मुंचइ भिंदिउं ताई ॥३८०॥ गंतुमसंखेजाओ, अवगाहणवग्गणा अभि- लोकपूर्ती बाई ।। 'भिज्जंति धंसंति य, संखिज्जे जोयणे गंतु ॥३८१॥ भिन्नाई सुहुमयाए, अणंतगुणवडिआई लोगतं ।। पावंति पूरयंति य, भाष्यसंवाभासाए निरंतरं लोग।।३८२॥" [कोऽपि मन्दप्रयत्नो निसृजति सकलानि सर्वद्रव्याणि॥ अन्यस्तीवप्रयत्नः, स मुश्चति भित्त्वा तानि॥ द: केवलिसगत्वाऽसंख्येया अवगाहन-वर्गणा अभिन्नानि ॥ भिद्यन्ते ध्वसन्ते च संख्येयानि योजनानि गत्वा । भिन्नानि सूक्ष्मतयाऽनन्तगुणव- है मुद्धातदिशा धितानि लोकान्तम्।प्राप्नुवन्ति पूरयन्ति च,भाषया निरन्तरं लोकम्]॥ इति,दण्डं प्रथमे समये, कपाटमथ चोत्तरे तथा समये । मन्था- | चतुर्भिस्स| नमथ तृतीये, लोकव्यापी चतुर्थे च।।१।।इत्यादिग्रन्थोक्तेन केवलिसमुद्घातक्रमेण चतुर्भिः समयैः सर्वोऽपि लोको भाषाद्रव्यैरापूर्यत १४ मयैर्लोकपूरइति केचित्,त्रिभिः समयैः सर्वो लोकः पूर्यत इत्यन्ये,तत्रैवं क्रमः-लोकमध्यस्थितेन महाप्रयत्नभाषण मुक्तानि भाषाद्रव्याणि प्रथम- | णमिति मतं समय एव षट्सु दिक्षु लोकान्तमाप्नुवन्ति 'जीवसूक्ष्मपुद्गलानामनुश्रेणिगमनात्,' ततो द्वितीयसमये त एव षट् दण्डाश्चतुर्दिशमे तथा त्रिभिकैकशोऽनुश्रेण्या वासितद्रव्यैः प्रसरन्तः षड् मन्थानो भवन्ति, तृतीयसमये तु मन्थान्तरैः पूरितैः पूरितो भवति सर्वोऽपि लोका, समयैरितिस्वयम्भूरमणपरतटवर्तिनि लोकान्तेऽलोकस्यात्यन्त निकटीभूय भाषमाणस्य भाषकस्य त्रसनाड्या बहिर्वा चतसणां दिशामन्यत मतं तत्क्रममस्यां दिशि भाषमाणस्य भाषकस्य चतुर्भिस्समयैर्लोकः सर्वोऽपि पूर्यते। तदुक्तं भाष्यकृता "जइणसमुग्धायगईए,केई भासंति श्वेत्युभयत्र चउहि समएहि ।। पूरइ सयलो लोगो, अण्णे उण तीहि समएहिं ॥३८३॥ पढमसमए चिय जओ, मुक्काई जति छदिसिं ताई ॥ भाष्यसं वादः॥ атаах Page #178 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं मीबाना (योजितः पाठ) लोकान्तव प्रकरणम्॥ W GRICUCKOCKS बितियसमयम्मि ते चिय, छ इंडा होति छम्मंथा ॥ ३८४ ॥ मंथंतरेहिं तईए, समये पुनेहिं पूरिओ लोगो॥ चउहि समएहि पूरइ, लोगते भासमाणस्स ॥ ३८५॥" [जैनसमुद्घातगत्या, केचिद् भाषन्ते चतुर्मिः समयैः ॥ पूर्यते सकलो लोकोऽन्ये पुननिभिः समयैः ॥ प्रथमसमय एव यतो मुक्तानि यान्ति षट्सु दिक्षु तानि ॥ द्वितीयसमये त एव, षड्दण्डा भवन्ति षड्मन्थानः ॥ मन्थान्तरैस्तृतीये समये पूर्णैः पूरितो लोकः ॥ चतुर्भिः समयैः पूर्यते लोकान्ते भाषमाणस्य॥] इति ।। अथ लोकान्तवर्तिनवसनाडीबहिर्व्यवस्थितस्य वा भाषकस्य भाषाद्रव्यैश्चतुर्भिः समयैलॊकपूरणं प्रतिपादितं त्रसनाडीबहिर्विदिग्व्यवस्थितस्य च पञ्चभिः समयैर्लोकापूरणं भवति तदेतत्सर्वं कथं मिलतीति चेत्, अत्रार्थे सविवरणे भाष्यगाथे एव तत्स्वरूपप्रदर्शिके प्रदश्येते, तथाहि-"दिसिवट्ठियस्स पढमोऽतिगमे तेचेव सेसया तिन्नि ।। विदिसि ट्ठियस्स समया, पंचातिगमम्मि जं दोण्णि ॥३८६॥" व्याख्या-त्रसनाड्या बहिश्चतसृणां दिशामन्यतमस्यां दिशि व्यवस्थितस्य भाषकस्य प्रथमः समयोऽतिगमे नाडीमध्यप्रवेशे भवति । शेषसमयत्रयभावना तुं 'होइ असंखेजइमे भागे' इत्यादिवक्ष्यमाणगाथावृत्तौ कथमिति चेदित्यादिना वक्ष्यते । लोकान्तेऽपि स्वयम्भूरमणपरतटवर्तिनि चतसृणां दिशामन्यतमस्यां दिशि व्यवस्थितस्य भाषकस्योर्ध्वाधोलोकस्खलितत्वाद्भाषाद्रव्याणां प्रथमः समयोऽतिगमे लोकमध्यप्रवेशे, यस्तु समयाः शेषास्तथैव, सनाडीबहिर्विदिग्व्यवस्थितस्य तु भाषकस्य भाषाद्रव्यैः सर्वलोकापूरणे पञ्च समया लगन्तीति विशेषः। कुतः' इत्याह-'अतिगमम्मिजं दोण्णि त्ति' विदिशः सकाशाद्भाषाद्रव्याणि त्रसनाडीबहिरेव प्रथमे समये दिशि समागच्छन्ति, द्वितीये तु लोकनाडीमध्ये प्रविशन्ति इत्येवं यस्मादतिगमे नाडीमध्यप्रवेशे द्वौ समयौ लगतः। शेषास्तु त्रयः समयाश्चतुःसमयव्याप्तिवद् द्रष्टव्याः, इत्येवं पञ्चसमयाः सर्वलोकापूरणे प्राप्यन्त इति ॥३८६॥ तित्रसनाडी. बहिर्व्यव. स्थितवक्तभाषाद्रव्यैश्चतुस्समौर्लोकपूरणं त्रसनाडीवहिदिस्थितवक्तृभाषया पञ्चसमयै लॊकपूरणमित्युपदर्शनम् ॥ Page #179 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अथ शेषसमयत्रयभावनार्थं ‘होइ असंखेअहंमे भागे ' इत्यादि यदुक्तं तदाह-किश्च नियुक्तिकृता 'लोगस्स य कइभाए कहभाओ होइ भासा' इति यत्प्रतिपादितं तद्वयाचिख्यासुर्भगवान् भाष्यकार आह " होइ असंखेजइमे, भागे लोगस्स पढमबिइएस || भासा असंखभागो, भयणा सेसेसु समयेसु ।। ३९० ।। " व्याख्या - चतुर्दशरज्जूच्छ्रितस्य लोकस्याऽसंख्याततमे भागे भाषाया अपि समस्तलोकव्यापिन्या असंख्याततम एव भागो भवति । कदा १, इत्याह- प्रथमद्वितीयसमययोः । इदमुक्तं भवति - त्रिसमयव्याप्तौ चतुःसमयव्याप्तौ, पञ्चसमयव्याप्तौ च प्रथमसमयद्वितीयसमययोस्तावद् नियमेन सर्वत्र लोकासंख्येयभागे भाषा संख्येयभागलक्षण एव विकल्पः सम्भवति, नान्यः । त्रिसमयव्याप्तौ हि प्रथमसमये दण्डषट्कं भवति, द्वितीयसमये तु पद् मन्थानः सम्पद्यन्ते । एते च दण्डादयो दैर्येण यद्यपि लोकान्तस्पर्शिनो भवन्ति, तथापि वक्तृमुखविनिर्गतत्वात्तत्प्रमाणानुसारतो बाहल्येन चतुरङ्गुलादिमाना एव भवन्ति, चतुरादीनि चाङ्गुलानि लोका संख्येय भागवर्त्तिन्येव । इति सिद्धविसमयव्याप्तौ प्रथमद्वितीयसमययोर्लोक संख्येयभागे भाषा संख्येयभागः । चतुः समयव्याप्तावप्येतदित्थमवगम्यत एव प्रथमसमये लोकमध्यमात्र एव प्रवेशात्, द्वितीयसमये तु वक्ष्यमाणगत्या दण्डानामेव सद्भावादिति । पञ्चसमयव्याप्तिपक्षे तु सुबोधमेव, प्रथमसमये भाषा द्रव्याणां विदिशो दिश्येव गमनात् द्वितीयसमये तु लोकमध्यमात्र एव प्रवेशात् । तस्मात् त्र्यादिसमयव्याप्तौ सर्वत्र प्रथम - द्वितीयसमययोर्लोक संख्येयभागे भाषाया असंख्येयभाग एव भवति । ' भयणा सेसेसु समएसुति' उक्तशेषेषु तृतीयचतुर्थपश्चमसमयेषु भजना विकल्परूपा बोद्धव्या, क्वापि लोकासंख्येयभागे स एव भाषा संख्येयभाग एव भवति, ( योजितः पाठ: ) भा पाया: त्रि चतुःपञ्चसमयलोकव्या तिषु प्रथम द्वितीयस मययोर्लो कासंख्येय भागे भाषासंख्येयभागस्य नियमो ऽन्यत्र तु भजनेत्युपपादितम् ॥ Page #180 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं श्रीज्ञाना गंव BREAK प्रकरणम्॥ ॥८२ क्वचित्पुनर्लोकस्य संख्येयभागे भाषासंख्येयभागः, क्वापि समस्तलोकव्याप्तिः । तथा हि-त्रिसमयव्याप्तौ तृतीयसमये भाषायाः समस्तलोकव्याप्तिः, चतुःसमयव्याप्तिवतीयसमये तु लोकसंख्येयभागे भाषासंख्यभागः । कथं १, इति चेद्, उच्यते-स्वयम्भरमणपश्चिमपरतटवर्तिनि लोकान्ते त्रसनाडीबहिर्वा पश्चिमदिशि स्थित्वा ब्रुवतो भाषकस्य प्रथमसमये चतुरङ्गुलादिवाहल्यो रज्जुदी| दण्डस्तिरश्चीनं गत्वा स्वयम्भूरमणपूर्वपरतटवर्तिनि लोकान्ते लगति, ततो द्वितीयसमये तस्माद्दण्डाद् ग्धिश्चतुर्दशरज्जूच्छ्रितः पूर्वापरतस्तिरश्वीनरज्जुविस्तृतः पराघातवासितद्रव्याणां दण्डो निर्गच्छति, लोकमध्ये तु दक्षिणत उत्तरतश्च पराघातवासितद्रव्याणामेव चतुरङ्गुलादिबाहल्यं रज्जुविस्तीर्ण दण्डद्वयं विनिर्गत्य स्वयम्भूरमणदक्षिणोत्तरवर्तिनोर्लोकान्तयोर्लगति । एवं च सति चतुरङ्गुलादिबाहल्यं सर्वतोऽपि रज्जुविस्तीर्ण लोकमध्ये वृत्तच्छत्वरं सिद्धं भवति, तृतीयसमये तू/धोव्यवस्थितदण्डाच्चतुर्दिशं प्रसृतः पराघातवासितद्रव्यसमूहो मन्थानं साधयति, लोकमध्यव्यवस्थितः सर्वतोरज्जुविस्तीर्णाच्छत्वराधिःप्रसृतः पुनः स एव सनाडी समस्तामपि पूरयति, एवं च सति सर्वापि सनाडी उधिोव्यवस्थितदण्ड- मथिभावेन तदधिकं च लोकस्य पूरितं भवति । एतच्चतावत्क्षेत्र, तस्य संख्याततमो भागः । तथा च सति चतुःसामयिक्या व्याप्तेस्तृतीयसमये लोकस्य संख्याततमे भागे भाषाया अपि समस्तलोकव्यापिन्याः संख्याततमो भाग इति स्थितम् ॥ पश्चसामयिक्यास्तु व्याप्तेस्तृतीयसमये लोकासंख्येयभागे भाषाऽसंख्येयभागः । कुतः १, इति चेत्, उच्यते-तस्यां तस्य दण्डसमयत्वात् , तत्र च संख्येयभागवर्तित्वस्य प्रागेव भावितत्वादिति । चतुर्थसमये चतु:सामयिक्यां व्याप्तौ मन्थान्तरपूरणात्समस्तलोकव्याप्तिः । पञ्चसामयिक्यां तु व्याप्तौ चतुर्थसमये लोकसंख्येयभागे भाषासंख्येयभागः, तस्यां तस्य मथिसमयत्वात्, तत्र (योजितः पाठः) भाषायास्तिचतुःपञ्चसमयलोकव्याप्तिषु तृतीयसमयादौ भजनाप्रकार उपवर्णितः॥ RAKASHASKACCU ।।८२॥ Page #181 -------------------------------------------------------------------------- ________________ REAAWAcces च संख्येयभागवर्तित्वस्य प्रागेव भावितत्वादितिीपञ्चमसमये तु पश्चसामयिक्यां व्याप्तौ मन्थान्तरालपूरणात्समस्तलोकव्याप्तिरिति॥ एवं तृतीयचतुर्थपञ्चमसमयेषु भाविता भजना, तद्भावने च व्याख्यातं 'भयणा मेसेसु समयेसु' इति । एतच महाप्रयत्नवक्तृनिसृष्टद्रव्यापेक्षयैवोक्तं, मन्दप्रयत्नवक्तृनिसृष्टानि तु लोकासंख्येयभाग एव वर्तन्ते, दण्डादिक्रमेण तेषां लोकपूरणाऽसम्भवादिति । अथ यद्युक्तप्रकारेण त्रिभिश्चतुर्भिः पञ्चभिश्च समयैर्वाग्द्रव्यैर्लोकः पूर्यते तर्हि चतुर्दशपूर्वविदा श्रुतकेवलिना नियुक्तिकारेण भगवता भद्रबाहुस्वामिना 'चउहिं समएहिं लोगो, भासाए निरंतरं तु होइ फुडो॥ इति किमिति निर्धार्य चतुःसमयग्रहणमेव कृतमिति चेत्, सत्यम् , तुलादण्डग्रहणन्यायेन चतुःसमयग्रहणात् त्रयाणां पञ्चानामपि समयानां ग्रहणस्य नियुक्तिकृता विहितत्वादेव ॥ व्यवहारे यथा तुलादण्डमध्यभागग्रहणेन तदाद्यन्तभागयोरपि ग्रहणं विहितमेव, एवमत्रापि विज्ञेयं, सूत्रेऽप्येवंविधो न्यायो दृश्यते, यतो भगवतः सूत्रस्य विचित्रा प्रवृत्तिः॥ उक्त-"कत्थइ देसग्गहणं, कत्थइ घेप्पन्ति गिरवसेसाई । उक्कमकमजुत्ताई, कारणवसओ णिउत्ताई ॥ ३८८॥" [कुत्रचिद् देशग्रहणं, कुत्रापि गृह्यन्ते निरवशेषाणि ॥ उत्क्रमक्रमयुक्तानि, कारणवशतो नियुक्तानि॥ न चैतादृशदेशनिबन्धः श्रुते न दृष्टो भगवत्यामष्टमशते महाबन्धोद्देशके सत्यपि चतुःसामयिके विग्रहे त्रिसामयिकस्यैव तस्य निबन्धाद, आह च-"चउसमयमझगहणे, तिपंचगहणं तुलाइमज्झस्स ॥ जह गहणे पज्जंत-ग्गहणं चित्ता य सुत्तगई ॥३८७॥" [चतुःसमयमध्यग्रहणे, त्रिपञ्चग्रहणं तुलादिमध्यस्य ॥ यथा ग्रहणे पर्यन्तग्रहणं चित्रा च सूत्रगतिः॥] नयू/धोगतदण्डादन्यद्रव्याणां पराघातो नास्ति ॥ " चउसमयविग्गहे सति, महल्लबन्धमि तिसमयो जह वा ॥ मोत्तुं तिपंचसमए, तह चउसमओ इह णिबद्धो ॥३८९॥" [चतुःसमयविग्रहे सति महाबन्धे GARCARBHASKAR ( योजितः पाठः) चतुर्भिस्समयैर्माषाद्रव्यैर्लोकपूरणमितिनियुक्तिकारनिर्धारितचतुस्समयग्रहणतोऽपि त्रिपञ्चसमयव्याप्त्योर्लाभ उपपादितः॥ Page #182 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरण भीवाना व ॥८३॥ त्रिसमयो यथा वा ॥ मुक्त्वा त्रिपञ्चसमयांस्तथा चतुःसमय इह निबद्धः] यदि पुनरेवं व्याख्यायते चतुर्भिरपि समयैर्लोको निरन्तरं स्पृष्टो व्याप्तो भवति, तुरप्यर्थ एवानुक्तत्रिपञ्चसमयसमुच्चये, तदेप्सितार्थलाभो न्यायाश्रयणादिप्रयासं विनेति द्रष्टव्यं, तुरेवकारार्थ एव, तस्य च निरन्तरमित्यत्राव्यवहितान्वयो भाषयेत्यस्य च कस्यचित्सम्बन्धिन्या भाषयेति विवक्षितमित्यप्याहुः, लोकस्य च चरमान्ते सर्वलोकव्याप्तिविशिष्टाया भाषायाश्चरमान्तो भवति यदाहुः।। "आपूरियम्मि लोगे दोण्ह, वि लोगस्स तह य भासाए ॥ चरिमंते चरिमंतो, चरिमे समयम्मि सञ्वत्थ ॥ ३९१ ॥" [आपूरित लोके द्वयोरपि लोकस्य तथा च भाषायाः॥ चरमान्ते चरमान्तश्चरमे समये सर्वत्र ॥] अत्र विवक्षयाऽऽदेरप्यन्तत्वाच्चरमग्रहणमिति तु पक्षद्वयेऽपि सम्मुखम् ॥ २९ ॥ अथ जैनसमुद्घातगत्या चतुर्भिः समयैर्भापाद्रव्यैर्लोकः परिपूर्यत इत्यादेशस्यानादेशत्वं ख्यापयितुमाहसर्ववेदिसमुद्घात-गतिरत्र न युज्यते ॥ एकदा षड्दिशां व्याप्तिः, पराघातेन तत्र यत् ॥ ३०॥ जैनसमुद्घातगत्या हि भाषाद्रव्याणां लोकव्याप्तावङ्गीक्रियमाणायां प्रथमसमये ऊर्ध्वाधोगाम्येव दण्डः स्यान्न तु षदिक इति पूर्वपश्चिमदक्षिणोत्तरदिक्षु विदिक्ष्विव वक्तृनिसृष्टद्रव्याणामगमनेन पराघातवासितद्रव्याणामेव श्रवणान्मिश्रशब्दश्रवणं न स्यात् ॥ श्रूयते च-"भासासमसेढीओ, सदं जं सुणइ मीसय सुणइ ॥३५१॥" [भाषासमश्रेणीतः शब्दं यच्छृणोति मिश्रकं शृणोति] इत्यादावविशेषेण सर्वासु दिक्षु मिश्रशब्दश्रवणमेवेति ।। अथ विदिक्षु नियमेन पराघातवासितशब्दश्रवणाभिधानादिक्ष्वनियमेन तत्पर्यवस्यतीत्यनियमोपपादनाय मिश्रशब्दश्रवणं समभिधीयत इत्यूर्वाधोदिशोर्मिश्रश्रवणमन्यासु च दिक्षु पराघातवासितश्रवणमिति व्याख्यानतो विशेषः प्रतिपद्यत इति चेत्, न, यो धूमवान् सोनिमानित्यत्रेव भाषासमश्रेणीतो यं शब्दं शृणोति तं मिश्र जैनसमुद्घातगत्या भाषाद्रव्यलॊकपूरणमित्यादेशस्यानादेशत्वख्यापनम् ॥ AGARIKARAN UNSPIRS ॥ ३ ॥ Page #183 -------------------------------------------------------------------------- ________________ शृणोतीत्यत्र यत्तच्छब्दाभ्यां नियमाभिधानादनियमानुपपत्तेः अपि चोर्ध्वाधोगमनसमय एव भाषा चतुर्दिशमप्यविशेषेण शब्दप्रायोग्यद्रव्याणि पराहत्य द्वितीयसमये मन्थानं साधयतीति त्रिभिरेव समयैस्तस्या लोकव्याप्तिः सम्भवति, न च जीवप्रदेशानामिव भाषाद्रव्याणामपि लोकव्याप्तौ प्रथमसमये दण्डो द्वितीयसमये कपाटं तृतीयसमये मन्थाश्चतुर्थसमये चान्तरालपूरणमिति वाच्यम् || भाषाद्रव्याणां पराघातसम्भवेनोर्ध्वाधोगमनोत्तरं द्वितीयसमये चतुर्दिक्ष्वनु श्रेणिगमनसमये सर्वतः पराघातवासितद्रव्याणां मथिभावेन कपाटव्याघातात् । न चैतेषां लोकव्याप्तौ चतुर्दिक्ष्वनु श्रेणिगमनपराघातस्वभावेभ्योऽधिकं नियामकमस्ति केवली तु द्वितीयसमये केवलज्ञानरूपयेच्छया गुणदोषपर्यालोचनाद् भवोपग्राहिकर्मवशात्स्वभावाद् वा द्वितीयसमये मन्थानं न करोति किन्तु कपाटमेवेति तस्य चतुःसामयिकी लोकव्याप्तिः, अचित्तमहास्कन्धस्तु विस्रसापरिणामेनैव लोकमापूरयतीति द्वितीसमये तस्य कपाटमात्र भावाच्चतुःसामयिकी व्याप्तिर्विासा परिणामस्य पर्यनुयोगानर्हत्वाद्, अथवाऽसौ निजपुद्गलैरेव लोकमापूरवति, नतु पराघातेनान्यद्रव्याणामात्मपरिणामं जनयतीति तस्य चतुःसामयिक्येव व्याप्तिर्निजपुद्गलजन्ये मथि निजपुद्गल - जन्य कपाटस्य हेतुत्वात्तं विना तदभावाद, आह च "न समुग्धायगईए, मीसयसवणं मयं च दंडंमि ॥ जड़ तो वि तीहिं पूरइ, समएहिं जओ 'पराषाओ ।। ३९२ ॥ जइणे ण पराघाओ, स जीवजोगो य तेण चउसमओ || हेऊ होज्जाहि तहिं, इच्छा कम्मं सहावो वा ।। ३९३ ।। खंधो वि वीससाए, ण पराघाओ अ तेण चउसमओ ।। अह होज पराघाओ, हविज तो सो वि तिसमइओ || ३९४ || " [न समुद्घातगत्या, मिश्रकश्रवणं मतं च दण्डे । यदि ततोऽपि त्रिभिः पूर्यते समयैर्यतः पराघातः ॥ जैने न पर। घातः, स जीवयोमश्च तेन चतुः समयः ॥ हेतुर्भवेत्तत्रेच्छा कर्म स्वभावो वा ।। स्कन्धोऽपि विवसया न पराघातश्च तेन चतुःसमयः। अथ भवेत्पराघातो जैनसमु दूघातगत्या भाषाद्रव्यै कपूर - मित्यादे शस्याड नादेशत्वख्यापनम् ॥ Page #184 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं भीज्ञाना | प्रकारान्तरे|ण चतुर्मिसमर्भािषाद्रव्यैर्लोक प्रकरणम् ॥ ॥८४॥ समये पमन्यात दिक् ॥ ३० क्त्यागमक्ष AAAAAACHAR भवेत्ततः सोऽपि त्रिसामयिकः॥] स्यादेतत-मथिमात्र एव कपाटं कारणमिति कपाटं विना मथोऽभावाच्चतुःसामयिक्येव भाषाया लोकव्याप्तियुज्यते, मैवं, मध्यनुकूलविस्तारे कपाटस्येव पराघातस्यापि शक्तत्वादुभयोरप्येकशक्तिमत्त्वेन मथिहेतुत्वाद् अत एवापराघातस्य स्कन्धस्य लोकव्याप्तौ कपाटापेक्षेति सिद्धान्तः, अथ जातस्यैव दण्डस्यैव विस्तारे पराघातः क्षमो नतूत्पद्यमानस्य तस्य न वोदासीनद्रव्यमात्रस्यान्यथा द्वितीयसमय एव लोकव्याप्तिप्रसङ्गात्, न च स्वभावमात्रं समयविलम्बनियामकमतिप्रसङ्गादिति चेत्, तर्हि प्रथमसमये भाषाद्रव्याणां षड्दण्डास्त एव प्रसमरा द्वितीयसमये षष्मन्थानस्तृतीयसमये चान्तरालपूरणमिति प्रागुक्ता वस्तुस्थितिरभ्युपगम्यता, अपराघातद्रव्याव्याप्तावेव दण्डकपाटमन्थानहेतुत्वादिति दिक् ॥ ३० ॥ प्रसगादनादेशान्तरं दूषयति- दण्डमेकदिशं कृत्वा, चतुर्भिः समयैः परे ॥ लोकपूरणमिच्छन्ति, न च युक्त्यागमक्षमम् ॥ ३२॥ परे प्रत्युत भाषाद्रव्याणां चतुभिः समयैर्लोकपूरण इमां प्रक्रियामाहुः, प्रथमसमये ताव दिशि दण्डो भवति, द्वितीयसमये च तत्र मन्थाः, अधोदिशि पुनर्दण्डं, तृतीयसमये चोर्ध्वदिश्यन्तरालपूरणमधोदिशि तु मन्थाः,चतुर्थसमये तु तत्राप्यन्तरालपूरणालोकव्याप्तिरिति, तन्मतं न युक्तिं क्षमते, अनुश्रेणिगमनस्वभावानां पुद्गलानामेकयैव दिशा गमनं नान्यत्रेत्यत्र नियामकाभावात्, न च वक्तृमुखताल्वादिव्यापाराभिमुख्यमेव नियामकं विश्रेण्यभिमुखे भाषके विश्रेणावपि गमनप्रसगात्, पटहादिशब्दपुद्गलानां वक्तृमुखव्यापारनिरपेक्षतया चतु:समयानियमप्रसङ्गाच्च, न चात्र कश्चिदागमोऽप्यस्ति यबलात्तथाव्याप्तिस्वभावः कल्पयितुं शक्येत।। आह च-"एगदिसमाइसमए, दंड काऊण चउहिं पूरेइ ।। अन्ने भणन्ति, पि य, नागमजुत्तिरकम होइ ॥३९५॥" [एकदिक्कमादिसमये, दण्डं कृत्वा चतुर्भिः पूरयति ॥ अन्ये भणन्ति तदपि च नागमयुक्तिक्षम भवति ॥] ॥ ३२॥ rama पुरणमित्याछ देशस्य वस्तु तोऽनादेशस्य खण्ड नम् ॥ ॥८४॥ Page #185 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तदेवं सप्रसङ्गं व्याख्यातं भेदतो मतिज्ञानं, अथ तत्पर्यायानभिधित्सुराह suit च मीमांसा, मार्गणा च गवेषणा ॥ संज्ञा स्मृतिर्मतिः प्रज्ञा, सर्वमाभिनिबोधिकम् ॥ ३३ ॥ हाऽन्वयव्यतिरेकधर्मगवेषणा, अपोहो निश्चयो, मीमांसा विमर्शोऽपायात्पूर्व ईहायाश्चोत्तरः सम्भवसम्प्रत्ययः, मार्गणमन्वयधर्मान्वेषणं, गवेषणं व्यतिरेकधर्मालोचनं, संज्ञाऽवग्रहोत्तरभावी मतिविशेष एव स्मृतिः पूर्वानुभूतार्थानुसन्धानम्, मतिः कथचिदर्थपरिच्छित्तावपि सूक्ष्मधर्मालोचनरूपा बुद्धिः, प्रज्ञा विशिष्टक्षयोपशमजन्या प्रभूतवस्तुयथातच्चालोचनं, सर्वमिदं कथञ्चिद्भेदेऽप्याभिनिबोधिकमेव मन्तव्यम् । यदाह परममुनिः - [ नियुक्तिगाथा] "ईहा अपोह वीमंसा, मग्गणा च गवेसणा ॥ सण सई मई पण्णा, सव्वमाभिणिवोहियं ॥ ३९६ ॥” [ईहाऽपोहो विमर्शो, मार्गणा च गवेषणा।। संज्ञा स्मृतिर्मतिः प्रज्ञा, सर्वमाभिनिबोधिकम् || ] भाष्यकृदप्याह - " होइ अपोहोऽवाओ, सई धिई सन्धमेव महपन्ना । । ईहा सेसा, सव्यं इदमाभिणिबोहियं जाण ।। ३९७ ।। भवत्यपोहोपायः स्मृतिर्धृतिः सर्वमेव मतिप्रज्ञे ॥ ईहा शेषाणि सर्वमिदमामिनिवोधिकम् ] अत्र मतिप्रज्ञाऽभिनिबोधिक बुद्धिलक्षणाश्चत्वारः शब्दा वचनपर्यायास्तैर्मतिज्ञानसामान्याभिधानाद्, अवग्रहादिशब्दाश्चाऽर्थ पर्यायास्त| देकदेशाभिधानादू, अथवा सर्वेषामपि वस्तूनामभिलापवाचकाः शब्दा वचनपर्यायाः, तदभिधेयार्थस्यात्मभूता भेदास्त्वर्थपर्याया; यथा कनकस्य कटककेयूरादयः, तदाह - " महपन्नाभिणिबोहिय - बुद्धीओ होन्ति वयणपजाआ । जा ओग्गहाइसना, ते सब्बे अत्थपञ्जाया ।। ३९८ ॥” [ मतिप्रज्ञाभिनिवोधिकबुद्धयो भवन्ति वचनपर्यायाः ॥ या अवग्रहादिसंज्ञा ते सर्वे अर्थपर्यायाः ॥ ] नव पर्यायास्तावद् भेदा एव तन्निरूपणं चात्राप्रकृतं शब्दमेदादर्थमेदभ्रमनिरासाय मतिपर्यायज्ञानशब्दाभिधानस्यैवात्र १५ मतिज्ञानपर्यायकथनं ईहादीनामाभिनिबोधि कत्वे भाष्य संवाद: मतिप्रज्ञादीनां वचनपर्याय त्वमवग्रहादीनामर्थ - पर्यायव चेतिप्ररूपणम् ॥ Page #186 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरणं भीज्ञाना न व प्रकरणम्॥ MAKARAVASREKORS (योजितः प्रकृतत्वात , यथा न्यायनये "बुद्धिरुपलब्धिर्ज्ञानमित्यऽनन्तरम् " इति सांख्याभिमतस्य शब्दभेदादर्थभेदस्य निरा पाठः) साय ज्ञानपर्यायाभिधानम्, एकरूपेणैकार्थबोधकशब्दद्वयं च पर्याय:, अन्यथा पृथिवीघटशब्दयोरपि पर्यायत्वव्यवहारप्रस ईहापोहागादिति, तथा च कथमीहापोहादीनां मतिज्ञानपर्यायत्वमिति चेत्, सत्यं-अवग्रहणादियोगार्थभेदेऽप्यवग्रहादिशब्दानां | दोनां मतिमतिसामान्यप्रवृत्तिकत्वेन पर्यायत्वात् योगार्थभेदस्यापि पर्यायत्वप्रतिपन्थित्वे घटकलशादिपदानामपि तत्वं न स्यात् , ज्ञानपर्याय न चैवमवग्रहेहादिसङ्करप्रसङ्गः, अवग्रहादीनां सामान्या दिग्राहित्वेऽप्यव्यक्तव्यक्ततत्तदवभासविशेषेण विशेषात् , नहि यथा- स्वस्थावग्रभृतमवग्रहे सामान्यमात्रार्थस्यावग्रहणं तथाभूतमेवेहायां, किन्तु विशिष्टं, विशिष्टतरं विशिष्टतमं चाऽपायधारणयोः, यथाभूता ४ हणादिताचेहायां मतिचेष्टा ततो विशिष्टतरा विशिष्टतमा चाऽपायधारणयोः, अविशिष्टतरा चाऽवग्रहे, अर्थावगमनमप्यपायाद्विशिष्टं रतम्यस्य धारणायां, अविशिष्टमविशिष्टतर चेहावग्रहयोः, अर्थधारणमप्यवग्रहहापायेभ्यः सर्वप्रकृष्टं धारणायामिति ॥ तदिदमाह-xxx च व्ववस्था[इयानेवोपलब्धोयं ग्रन्थः,अग्रेतनः समाप्ति यावत्प्रभूततमो ग्रन्थभागः खण्डित इति तद्बुभुत्सूनां किञ्चिद्दिक्सूचकप्रायं प्रदश्यते] पनम् । सर्व [सव्वं वाभिणिबोहिय-मिहोग्गहाइवयणेण संगहिय।।केवलमत्थविसेसं,पइ भिन्ना उग्गहाईया॥३९९॥ [सर्व वाभिनिबोधिक- | म्याभिनिमिहावग्रहादिवचनेन सगृहीतम् । केवलमर्थविशेष प्रति भिन्ना अवग्रहादयः] अथावग्रहेहापायधारणानामविशिष्टविशिष्टविशिष्टतर- बोधिकस्याविशिष्टतमार्थप्रतिपादकत्वेन कथं तत्तच्छब्देनाभिनिबोधिकं सगृह्यत इति चेत्, अत्राह-अविशिष्टयौगिकार्थाश्रयणेन सर्वेषामप्येक | वग्रहादिशवाचकत्वेनाभिनिवोधिकत्वेऽविरोधात् ! इदमुक्तं भवति, अवग्रहणमवग्रह इतिव्युत्पत्तिमाश्रित्य सर्वमप्याभिनिवोधिकमवग्रहा,यथा ब्देन सम. हि, कमप्यर्थमवग्नहोऽवगृह्णाति,तथेहापि कमप्यर्थमवगृह्णात्येव, एवमपायधारणे अपि कमप्यर्थमवगृहीत इति सर्वमप्याभिनिवोधिकं होपपादनच R॥५॥ Page #187 -------------------------------------------------------------------------- ________________ AK ASAHAKAR सामान्येनावग्रह उच्यते । एवमीहनमीहा मतिचेष्टेतीहाया व्युत्पत्ति, अवगमनमवायोऽर्थावगम इत्यवायस्य, धरणं धारणा अर्थस्या- FCI (योजितः विच्युत्यादिस्वरूपमिति धारणायाश्च व्युत्पत्तिमवलम्ब्याषग्रहापायधारणानामपि मतिचेष्टाविशेषरूपत्वात्सामान्यत ईहात्वे अवग्र- ___ पाठः) हेहाधारणानामप्यर्था वगमात्मकत्वात्सामान्यतोऽपायत्वे अवग्रहहापायानां सामान्यतोयधरणस्वरूपत्वाद्धारणात्वे न कश्चिद्विरोधः, १४ सर्वेषामवन| यथैतेषामवग्रहादीनां सङ्करप्रसङ्गो न भवति तथा प्रागेवोपपादितं पूज्यैरित्यलमतिपल्लवितेन । तदिदमाह भाष्यकारः॥"उग्गहण- हादीनां प्रमोरगहो ति य, अविसिमवग्गहो तयं सव्वं ॥ ईहा जं मइचेट्ठा, मइबावारो तयं सव्वं॥४०॥अवगमणमवाओत्ति य. अत्थाव- त्येकमवनगमो तयं हवइ सव्वं ॥ धरणं च धारणत्ति य, तं सव्वं धरणमत्थस्सा॥४०१॥"[अवग्रहणमवग्रह इति, चाविशिष्टमवग्रहस्तत्सर्वम् ।। हादित्वं तद्ईहा यद मतिचेष्टा,मतिच्यापारस्तत्सर्वम्।।अवगमनमवाय इति चावगमस्तद् भवति सर्वम् ॥ धरणं च धारणेति च तत्सर्व धरणम- |पस्याभिनिर्थस्य अथैवं तत्त्वभेदपर्यायाख्यातस्वरूपस्यास्याभिनिवोधिकज्ञानस्य समासतो ज्ञेयभेदेन चातुर्विध्यं,यन्नन्दिसूत्रं "तं समासओ बोधिकस्य चउन्विहं पन्न, तंजहा-दव्वओ, खिचओ, कालओ, भावओ। तत्थ दव्वओ णं आभिणिबोहियनाणी आएसेणं सव्वदन्वाई ज्ञेयभेदेन जाणइ न पासई" इत्यादि [तत्समासतश्चतुर्विधं प्रज्ञप्तं तद्यथा-द्रव्यतः,क्षेत्रतः, कालतो, भावतः।। तत्र द्रव्यत आभिनिबोधिकज्ञानी चातुर्विध्ये आदेशेन सर्वद्रव्याणि जानाति न पश्यति] अथास्तु पदार्थानां द्रव्यक्षेत्रकालभावभिन्नत्वेन चतुर्विधत्वाज्ञयचातुर्विध्यं ततो ज्ञान- नन्दिसूत्रस्य चतुर्विधत्वे किमायातमिति चेत्, उच्यते, ज्ञानन्तावद्विषयाधीनसत्ताक विषयमवगच्छदेव ज्ञानं ज्ञानत्वमृच्छति, तथा चाभिनियो- संवादश्च धिकमादेशेन द्रव्यादिभेदेन चतुर्विधमपि विषयमवगृहातीति विषयभेदेन ज्ञानस्यापि चतुर्विधत्वं सिद्धम् । तदाह-"तं.पुण चउन्विहं ने-य भेयओ तेण जं तदुवउत्तो। आदेसेणं सव्वं,दब्वाइ चउब्विहं मुणइ ॥४०२॥" [तत्पुनश्चतुर्विधं ज्ञेय-भेदतस्तेन यत्तदुपयुक्तः।। A DAKI-Ekax Page #188 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरण श्रीज्ञाना र्णव प्रकरणम् ।। ॥ ८६ ॥ आदेशेन सर्व द्रव्यादि चतुर्विधं जानाति ।।] ननु द्रव्यादिचतुर्विधमाभिनिबोधि कज्ञानी जानातीत्युक्तं तत्केन स्वरूपेण, न च किंज्ञानस्य ज्ञातव्यप्रकार भेदोऽस्तीति स्वरूपं पृच्छसीति वाच्यं ज्ञातव्यप्रकारस्य द्वैविध्यात्, तथाहि, ओघादेशो विभागादेशश्च सामान्यप्रकारो विशेषप्रकारचेति तदर्थः, अतः केन स्वरूपेणेति प्रश्नः, अत्रोत्तरं, ओघादेशेन सामान्यप्रकारेण, तथाहि द्रव्य सामान्येन असंख्येयप्रदेशात्मको लोकव्यापको मूर्तः प्राणिनां पुद्गलानां च गत्युपष्टम्भन हेतुर्धर्मास्तिकाय इत्यादिना सामान्यप्रकारेण कियत्पर्यायविशिष्टानि षडपि धर्मास्तिकायादीनि सर्वद्रव्याणि सामान्येनाभिनिवोधिकज्ञानी जानातीति तचम विभागादेशेन विशेष प्रकारेण पुनः सर्वैः पर्यायैः केवलिष्टैरवच्छिन्नानि सर्वद्रव्याणि न जानाति केवलज्ञानावसेयत्वात्सर्व पर्यायाणामिति, एवं क्षेत्रमपि सर्वसामा न्यतः कियत्पर्यायावच्छिन्नं सामान्यादेशेन जानाति न विशेषादेशेन सर्व पर्यायविशिष्टं, कालमपि सर्वाद्वा रूपं अतीतानागतवर्तमान मे दतस्त्रिविधं वेत्यादिरूपेण, भावतस्तु सामान्येन सर्वभावानामनन्तभागं, औदयिक क्षायि कौनशमि कक्षायो समिकारिणामिहान्त्रा पञ्चभावान्सामान्यादेशेन जानाति न परतः। एतावत एवाभिनिवोधिकविषयत्वात् ।। इह क्षेत्रकालयो। सामान्येन द्रव्यान्तर्गतत्वेSपि भेदेन रूढत्वात्पृथगुपादनं कृत ।। सूत्रार्थत्वे वाऽऽदेशस्य सूत्रादेशतः श्रुतोपलब्धेष्वर्थेषु सर्वद्रव्यादिविषयं मतिज्ञानं प्रवर्तते । न च तोपलब्धेष्वर्थेषु ग्राहकत्वेन प्रवृत्तस्य ज्ञानस्य श्रुतज्ञानत्वमेव न्याय्यं न मतिज्ञानत्वमिति साम्प्रतम्, इह पूर्व परिकर्मितमतेश्रु रपि साम्प्रतमाभिनिबोधिकज्ञानस्य श्रुतोपयोगमृते तदुपलब्धेष्वर्थेषु तद्वासनामात्रेणैव प्रवृत्तत्वात् यदवादि, “पुत्रि सुयपरिकम्मिय-मइस्स जं संपयं सुयाईये" इत्यादि, सर्वमप्येतद्द्भाष्यकारोऽप्याह - “आएसोत्ति पगारो, ओहादेसेण सन्दव्वाई || धम्मत्थि - काइयाई, जाण न उ सव्वभेएणं ॥ ४०३ || खेतं लोगालोगं, कालं सव्वद्धमहव तिविदं ति ।। पंचोदइयाईए, भावे जं नेयमेवइयं (योजित: पाठः) द्रव्यादि चतुर्विधमा भिनिबोधि कज्ञानी सामान्यप्र कारेण सर्वं जानाति न विशेषप्रका - रेण सर्वमि ति प्रपञ्च तम् । ॥ ८६ ॥ Page #189 -------------------------------------------------------------------------- ________________ PRASTRIBE ॥४०४॥ आएसोत्ति व सुचं, सुओबलद्धेसु तस्स मइनाणं । पसरइ तब्भावणया, विणा वि सुत्तानुसारेण ॥४०५॥" [आदेश इतिप्रकार ओघादेशेन सर्वद्रव्याणि ।। धर्मास्तिकायिकादीनि जानाति न तु सर्वभेदेन ॥ क्षेत्रं लोकालोकं कालं सर्वाद्धामथवा त्रिविधमिति ॥ पञ्चौदयिकादीन्भावान्यज्ज्ञेयमियन् ।। आदेश इति वा सूत्रं श्रुतोपलब्धेषु तस्य मतिज्ञानं ॥ प्रसरति तद्भावनया विनापि सूत्रानुसारेण।। तदेवं मतिज्ञानस्य तवभेदपर्यायनिरूपणं द्रव्यादिविषयप्ररूपणं च प्रदर्शितम् ॥ अथ सत्पदप्ररूपणतादिभिर्नवभिरनुयोगद्वारैर्मतिज्ञानं विचार्यते, अनुयोगद्वाराणि च गत्यादिमार्गणाभेदेषु विधीयन्ते, अतः पूर्व द्वाराणि मार्गणाभेदाश्चोच्यन्ते तत्र सत्पदप्ररूपणता, द्रव्यप्रमाणं, क्षेत्रं, स्पर्शना, काला, अन्तरं, भागः, भावः, अल्पबहुत्वं चीत नवानुयोगद्वाराणि, अनुयोगो व्याख्यानं तस्य द्वाराणीव द्वाराणि व्याख्यानपुरप्रवेशमार्गाः, मार्गणाश्च 'गइ इंदिय काये' इत्यादिगाथोक्ताः, सत्पदायनुयोग. द्वारावतारस्थानानि, एतेषां स्वरूपं प्रतिपद्यमानप्रतिपन्नजीवानां मार्गणाविचारोऽनुयोगद्वारविचारश्च महाभाष्यतवृत्त्यादिभ्यो विशेषजिज्ञासुनाऽवधेयः । तत्र महाभाष्ये षडुत्तरचतुःशततमगाथात आरभ्य त्रिचत्वारिंशदाधिकचतुःशततमी यावदष्टात्रिंशता गाथाभिस्सत्पदप्ररूपणतादिभिरनुयोगद्वारैमतिज्ञानं चिन्तितम्॥ ततः षट्पष्टयुत्तरपञ्चशततमी गाथां यावत्रयोविंशत्य:धिकशतसंख्यगाथाभिः श्रुतज्ञानं निरूपितम् ॥ ततोऽष्टोत्तराष्टशततमी गाथां यावद्विचत्वारिंशदधिकद्विशतप्रमाणाभिर्गाथाभिरवधिज्ञानं प्ररूपितम् ॥ ततो द्वाविंशत्युत्तराष्टशततमी गाथा यावच्चतुर्दशभिर्गाथाभिर्मन:पर्यायज्ञानप्ररूपणा कृता ॥ ततः षट्त्रिंशदुत्तराष्टशततमी गाथां यावच्चतुर्दशभिर्गाथामिः केवलज्ञानं निरूपितम् ॥] ॥ न्यायविशारद-न्यावाचार्य-महोपाध्यायश्रीयशोविजयगणिप्रणीतं त्रुटितावस्थोपलब्धं श्रीज्ञानार्णवप्रकरणं समाप्तम्॥ SAHARASHASARANEEA सत्पदप्ररूपणताद्यनुयोगद्वारैतिज्ञानप्ररूपणस्य श्रुत ज्ञानादीनां चतुर्णा प्रतिपत्तयेमहा भाष्यनिरूपितप्रतिनियतगाथा नां च संसू चनम् Page #190 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मीज्ञानबिन्दु प्रकरणम् ॥ ॥ ८७ ॥ || इयता ज्ञानार्णवग्रन्थविभागेन मतिज्ञानप्ररूपणमप्यवशिष्टमिति मुतादीनां तत्वबुभुत्सापूरणाय पूज्यप्रणीतमेव तदीयविषयविन्दुरूपत्वान्नाम्ना श्री ज्ञान बिन्दुप्रकरणमन्यत्र पूर्व द्विधा मुद्रितमध्येत संलग्नता सत्यापनायेह प्रकाश्यते ॥ ॥ अथ श्रीज्ञानबिन्दु प्रकरणम् ॥ ऐन्द्रस्तोमनतं नत्वा, वीरं तत्त्वार्थदेशिनम् ॥ ज्ञानविन्दुः श्रुताम्भोधेः सम्यगुद्धियते मया ॥ १ ॥ तत्र ज्ञानं तावदात्मनः स्वपरावभासकोऽसाधारणो गुणः, स चाभ्रपटलविनिर्मुक्तस्य भास्वत इव निरस्तसमस्तावरणस्य जीवस्य स्वभावभूतः केवलज्ञानव्यपदेशं लभते । तदाहुराचार्या :- " केवलनाणमणतं, जीवसरूवं तयं निरावरणं ॥” इति । तं च स्वभावं यद्यपि सर्वंघातिकेवलज्ञानावरणं कारस्र्त्स्न्येनैवावरीतुं व्याप्रियते, तथापि तस्यानन्ततमो भागो नित्याऽनावृत एवावतिष्ठते, तथास्वाभाव्यात् || (नन्दी सूत्र ) 'सब्वजीवाणं पि य णं अवखरस्स अनंततमो भागो णिच्चुग्घाडिओ चिट्ठह, सोविअ जइ आवरिज्जा, तेणं जीवो अजीवत्तणं पाविजा " इति पारमर्षप्रामाण्यात् । अयं च स्वभावः केवलज्ञानावरणावृतस्य जीवस्य घनपटलच्छन्नस्य खेखि मन्दप्रकाश इत्युच्यते । तत्र हेतुः केवलज्ञानावरणमेव । केवलज्ञानव्यावृत्तज्ञानत्वव्याप्यजातिविशेपावच्छिन्ने तद्धेतुत्वस्य शास्त्रार्थत्वात् । अत एव न मतिज्ञानावरणक्षयादिनापि मतिज्ञानाद्युत्पादनप्रसङ्गः । अत एव चास्य विभावगुणत्वमिति प्रसिद्धिः । स्पष्टप्रकाश प्रतिबन्ध के मन्दप्रकाशजनकत्वमनुत्कटे चक्षुराद्यावरणे वस्त्रादावेव दृष्टं न तूत्कटे यादाविति कथमत्रैवमिति चेत्, न, अभ्राद्यावरणे उत्कटे उभयस्य दर्शनात्, अत एवात्र (नन्दी ) "सुट्ठ वि मेघसमुदए, होंति पभा चंदराणं ||" इत्येव दृष्टान्तितं पारमर्षे, अत्यावृतेऽपि चन्द्रसूर्यादौ दिनरजनीविभागहेत्वल्पप्रकाशवञ्जीवेऽप्यन्यव्यावर्तकचै | मङ्गलं ज्ञान निरूपणे के वलज्ञानस्व रूपोपदर्श.. नं, जीवस्व-भावस्य ज्ञानस्यानन्ततमभागो नि त्यानावृत ए |वेत्यस्य व्य. वस्थापनम् । ॥ ८७ ॥ Page #191 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तन्यमात्राविर्भाव आवश्यक इति परमार्थः । एकत्र कथमावृत्तानावृतत्वमिति त्वर्पितद्रव्यपर्यायात्मना भेदाभेदवादेन निर्लोठनीयम् । ये तु चिन्मात्राश्रयविषयमज्ञानमिति विवरणाचार्यमताश्रयिणो वेदान्तिनस्तेषामेकान्तवादिनां महत्यनुपपत्तिरेव, अज्ञानाश्रयत्वेनानावृतं चैतन्यं यत्तदेव तद्विषयतयाऽवृत्तमिति विरोधात् । न चाऽखण्डत्वाद्यज्ञानविषयः, चैतन्यं त्वाश्रय इत्यविरोधः, अखण्डत्वादेश्चिद्रपत्वे भासमानस्यावृतत्वायोगात्, अचिद्रूपत्वे च जडे आवरणायोगात् । कल्पितभेदेनाखण्डत्वादि विषय इति चेत्, न, भिन्नावरणे चैतन्यानावरणात् । परमार्थतो नास्त्येवावरणं चैतन्ये, कल्पितं तु शुक्तौ रजतमिव ततत्राविरुद्धं, तेनैव चचिवखण्डत्वादिभेदकल्पना 'चैतन्यं स्फुरति नाखण्डत्वाद्' इत्येवंरूपाऽऽधीयमाना न विरुद्धेति चेत्, न, कल्पितेन रजतेन रजतकार्य वत्कल्पितेनावरणेनावरण कार्यायोगात् । 'अहं मां न जानामि' इत्यनुभव एव कर्मत्वांशे आवरणविषयकः कल्पितस्यापि तस्य कार्यकारित्वमाचष्टे, अज्ञानरूपक्रियाजन्यस्यातिशयस्यावरणरूपस्यैव प्रकृते कर्मत्वात्मकत्वात्, अत एवास्य साक्षिप्रत्यक्षत्वेन स्वगोचरप्रमाणापेक्षया न निवृत्तिप्रसङ्ग इति चेत्, न, 'मां न जानामि' इत्यस्य विशेषज्ञानाभावविषयत्वात्, अन्यथा मां जानामीत्यनेन विरोधात् दृष्टश्वेत्थं 'न किमपि जानामि' इत्यादिर्मध्यस्थानां प्रयोगः । किश्व विशिष्टाविशिष्टयोर्भेदाभेदाभ्युपगमं विनाऽखण्डत्वादिविशिष्ट चैतन्यज्ञानेन विशिष्टावरण निवृत्तावपि शुद्ध चैतन्य प्रकाशप्रसङ्गः, विशिष्टस्य कल्पितत्वादविशिष्टस्य चाननुभवात्, महावाक्यस्य निर्घर्म कब्रह्मविषयत्वं चाग्रे निर्लोठयिष्यामः । एतेन 'जीवाश्रयं ब्रह्मविषयं चाज्ञानम्' इति वाचस्पतिमिश्राभ्युपगमोऽपि निरस्तः । जीवब्रह्मणोरपि कल्पितभेदत्वात्, व्यावहारिकभेदेऽपि जीवनिष्ठाविद्यया तत्रैव प्रपश्चोत्पत्तिप्रसङ्गात् । न चाहङ्कारादिप्रपञ्चोत्पत्तिस्तत्रेष्ठैव, आकाशादिप्रपञ्चोत्पत्तिस्तु विषयपक्षपातिन्या अविद्याया ईश्वरे स ज्ञानस्य कथ - त्वानावृतत्वं, चिन्मात्रा श्रयविषयम ज्ञानमिति | विवरणाचामतस्य जी. वाश्रयं ब्रह्मविषयवा ज्ञानमि तिवाचस्प | तिमिश्रमत स्य च खण्ड नम् । Page #192 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भीज्ञानबिन्दु प्रकरणम् ।। 11 66 11 वेन तत्रैव युक्तेत्यपि साम्प्रतम्, अज्ञातब्रह्मण एवैतन्मते ईश्वरत्वेऽप्यज्ञातशुक्ते रजतोपादानत्ववत्तस्थाकाशादिप्रपञ्चोपादानत्वाभिधानासम्भवात्, रजतस्थले हीदमंशावच्छेदेन रजताभावाऽज्ञानम्, इदमंशावच्छेदेन रजतोत्पादकामेति त्वया क्ल शुक्त्यज्ञानं त्वदूरविप्रकर्षेण तथा, प्रकृते तु ब्रह्मण्यवच्छेदासम्भवान्न किञ्चिदेतत्, अवच्छेदानियमेन हेतुत्वे चाह ङ्कारादेरपीश्वरे उत्पत्तिप्रसङ्गादिति किमतिप्रसङ्गेन तस्मादनेकान्तवादाश्रयादेव केवलज्ञानावरणेनावृतोऽप्यनन्ततमभागावशिष्टोऽनावृत एव ज्ञानस्वभावः सामान्यत एकोऽप्यनन्तपर्यायकीमरितमूर्तिर्मन्दप्रकाशनामधेयो नानुपपन्नः, स चापान्तरालावा स्थितमतिज्ञानाद्यावरणक्षयोपशमभेदसम्पादितं नानात्वं भजते, घनपटलाच्छन्नरवेर्मन्दप्रकाश इवान्तरालस्थकट कुट्याद्यावरण विवरप्रवेशात् ॥ इत्थं च जन्मादिपर्यायवदात्मस्वभावत्वेऽपि मतिज्ञानादिरूपमन्दप्रकाशस्योपाधिभेदसम्पादितसत्ताकत्वेनोपाधिविगमे तद्विगमसम्भवान्न कैवल्यस्वभावानुपपत्तिरिति महाभाष्यकारः, अत एव द्वितीयापूर्वकरणे तात्रिकधर्म सन्न्यासला क्षायोपशमिकाः क्षमादिधर्मा अप्यपगच्छन्तीति तत्र तत्र ( योगदृष्टिसमुच्चयादौ ) हरिभद्राचार्यैर्निरूपितम् । निरूपितं च योगयलकर्मनिर्जरणहेतुफल सम्बन्धनियतसत्ताकस्य क्षायिकस्यापि चारित्रधर्मस्य मुक्तावनवस्थानम् । न च वक्तव्यं केवलज्ञानावरणेन बलीयसावरीतुमशक्यस्यानन्ततमभागस्य दुर्बलेन मतिज्ञानावरणादिना नावरणसम्भव इति, कर्मणः स्वावार्थावारकतायां सर्वघा तिरसस्पर्ध कोदयस्यैव बलत्वात्, तस्य च मतिज्ञानावरणादिप्रकृ तिष्वप्य विशिष्टत्वात् । कथं तर्हि क्षयोपशम इतिचेत्, अत्रेयमर्हन्मतोपनिषद्वेदिनां प्रक्रिया - इह हि कर्मणां प्रत्येकमनन्तानन्तानि रसस्पर्धकानि भवन्ति, तत्र केवलज्ञानावरण - केवलदर्शनावरणा-ऽद्य द्वादशकपाय - मिथ्यात्वे - निद्रलक्षणानां विंशतेः प्रकृतीनां सर्वघातिनीनां सर्वाण्यपि रसस्पर्धका नि 1 अनेकान्त वाद एव ज्ञा नस्वभाव स्यावृतत्वा नावृतस्वोप पत्तिः, मन्द प्रकाशस्य तस्य नाना त्वं क्षयोपशमप्रक्रियोप क्रमश्च ॥ ॥ ८८ ॥ Page #193 -------------------------------------------------------------------------- ________________ SAEKAKKAREAK सर्वघातीन्येव भवन्ति, उक्तशेषाणां पञ्चविंशतिघातिप्रकृतीनां देशघातिनीनां रसस्पर्धकानि यानि चतुःस्थानकानि यानि च त्रिस्थानकानि तानि सर्वघातीन्येव, द्विस्थानकानि तु कानिचित् सर्वघातीनि कानिचिच्च देशघातीनि, एकस्थानकानि तु सर्वाण्यपि देशघातीन्येव । तत्र ज्ञानावरणचतुष्कदर्शनावरणत्रयसञ्चलनचतुष्कान्तरायपश्चकपुवेदलक्षणानां सप्तदशप्रकृतीनामेकद्वित्रिचतुःस्थानकरसा बन्धमाश्रित्य प्राप्यन्ते, श्रेणिप्रतिपत्तेर्वागासां द्विस्थानकस्य त्रिस्थानकस्य चतुःस्थानकस्य वा रसस्य बन्धात् । श्रेणिप्रतिपत्तौ त्वनिवृत्तिबादराद्धायाः संख्येयेषु भागेषु गतेष्वत्यन्तविशुद्धाध्यवसायेनाशुभत्वादासामेकस्थानकरसस्यैव बन्धात, शेषास्तु शुभा अशुभा वा बन्धमधिकृत्य द्विस्थानकरसास्त्रिस्थानकरसाश्चतुःस्थानकरसाश्च प्राप्यन्ते, न कदाचनाप्येकस्थानकरसाः । यत उक्तसप्तदशव्यतिरिक्तानां हास्याद्यानामशुभप्रकृतीनामेकस्थानकरसवन्धयोग्या शुद्धिरपूर्वकरणप्रमत्ताप्रमत्तानां भवत्येव न, यदा त्वेकस्थानकरसवन्धयोग्या परमप्रकर्षप्राप्ता शुद्धिरनिवृत्तिवादराद्धायाः संख्येयेभ्यो भागेभ्यः परतो जायते, तदा बन्धमेव न ता आयान्तीति ॥ न च यथा श्रेण्यारोहेऽनिवृत्तिवाद राद्धायाः संख्येयेषु भागेषु गतेषु परतोऽतिविशुद्धत्वान्मतिज्ञानावरणादीनामेकस्थानकरसबन्धः, तथा क्षपकश्रेण्यारोहे सूक्ष्मसम्परायस्य चरमद्विचरमादिसमयेषु वर्तमानस्यातीवविशुद्धत्वात् केवलद्विकस्य सम्भवद्वन्धस्यैकस्थानरसबन्धः कथं न भवतीति शङ्कनीयम् । स्वल्पस्यापि केवलद्विकरसस्य सर्वघातित्वात , सर्वघातिनां च जघन्यपदेऽपि द्विस्थानकरसस्यैव सम्भवात्, शुभानामपि प्रकृतीनामत्यन्तशुद्धौ वर्तमानश्चतुःस्थानकमेव रसं बध्नाति, ततो मन्दमन्दतराविशुद्धौ तु त्रिस्था| नकं द्विस्थानकं वा, सइक्लेशाद्धायां वर्तमानस्तु शुभप्रकृतीरेव न बनातीति कुतस्तद्गतरसस्थानकचिन्ता । यास्त्वतिसक्लिष्टे CHAR सर्वधातिप्र१ कृतिरसस्प कानां सर्व| घातित्वमेव देशघातिनाच रसस्पर्धकेषु सर्वदेशघातित्वव्यवस्थोपपादनं रसस्पर्धकेषु चतु:स्थानकादिनियमानियमप्रदर्श नश्च मवतीति शङ्कनीयम नरमादिसमयेषु वर्तमान युद्धत्वान्मतिज्ञानावर Page #194 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मीज्ञान शुभप्रकृतीनां | नकस्थानरसवत्त्वमि प्रकरणम् ॥ ॥८९॥ त्युपपादनं RUARY मिध्यादृष्टौ नरकगतिप्रायोग्या वैक्रियतेजसाद्याः शुभप्रकृतयो बन्धमायान्ति, तासामपि तथास्वाभाव्याज्जघन्यतोऽपि द्विस्था-2 नक एव रसो बन्धमायाति नैकस्थानक इति ध्येयम् । ननूत्कृष्टस्थितिमात्रं सक्लेशोत्कर्षेण भवति, ततो येरेवाऽध्यवसायैः शुभप्रकृतीनामुत्कृष्टा स्थितिर्भवति तैरेवैकस्थानकोऽपि रसः किं न स्यादिति चेत्, उच्यते-इह हि प्रथमस्थितेरारभ्य समयसमयवृद्ध्या संख्येयाः स्थितिविशेषा भवन्ति, एकैकस्यां च स्थितावसंख्येया रसस्पर्धकसङ्घातविशेषाः, तत उत्कृष्टस्थितौ बध्यमानायां प्रतिस्थितिविशेषमसंख्यया ये रसस्पर्धकसङ्घातविशेषास्ते तावन्तो द्विस्थानकरसस्यैव घटन्ते नैकस्थानकस्येति न शुभप्रकतानामुत्कृष्टस्थितिबन्धेऽप्येकस्थानकरसक्न्धः। उक्तंच-"(पंचसंग्रह)उकोसठिईअज्झव-साणेहिं एगठाणिओहोइ। सुभिआणतन जंठिई, असंखगुणिआ उ अणुभागा॥३-६४ ॥ इति" । एवं स्थिते देशघातिनामवधिज्ञानावरणादीनां सर्वघातिरसस्पर्धकेषु विशद्धाध्यवसायतो देशघातितया परिणमनेन निहतेषु, देशघातिरसस्पर्धकेषु चातिस्निग्धेष्वल्परसीकृतेषु, तदन्तर्गतकतिपयरसस्पर्धकभागस्योदयावलिकाप्रविष्टस्य क्षये, शेषस्य च विपाकोदयविष्कम्भलक्षणे उपशमे, जीवस्यावधिमनःपर्यायज्ञानचक्षु दर्शनादयो गुणाः क्षायोपशमिकाः प्रादुर्भवन्ति । तदुक्तम्-"णिहएमु सव्वघाई-रसेसु फडेसु देसघाईणं । जीवस्स गुणा जाय-ति ओहीमणचरकुमाईआ।॥३-३०॥" निहतेषु देशघातितया परिणमितेषु ॥ तदावधिज्ञानावरणादीनां कतिपयदेशघातिरसस्पर्धकक्षयोपशमात कतिपयदेशघातिरसस्पर्धकानां चोदयात् क्षयोपशमानुविद्ध औदयिको भावः प्रवर्तते, अत एवोदीयमानांशक्षयोपशमवृद्ध्या वर्धमानावधिज्ञानोपपत्तिः । यदा चावधिज्ञानाऽऽचरणादीनां सर्वघातीनि रसस्पर्धकानि विपाकोदयमागतानि भवन्ति तदा तद्विषय औदयिको भावः केवलः प्रवर्तते । केबलमवधिज्ञानावरणीयसर्वघातिरसस्पर्धकानां देशघातितया तत्संबादिपंचसङ्ग्रहग्रन्थपाठः, क्षयोपशमविचारश्च ॥ KASHREE २ ॥ Page #195 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पार CAMERCESCENE परिणामः कदाचिद्विशिष्टगुणप्रतिपक्या कदाचिव तामन्तरेणैव स्यात्, भवप्रत्ययगुणप्रत्ययभेदेन तस्य द्वैविध्योपदर्शनात । मनःपर्यायजानावरणीयस्य तु विशिष्टसंयमाप्रमादादिप्रतिपचावेव तथास्वभावानामेव बन्धकाले तेषां बन्धनात, चक्षुर्दर्शनावरणादेरपि तत्तदिन्द्रियपर्याप्त्यादिघटितसामग्र्या तथापरिणामः । मतिश्रुतावरणाचक्षुदेशनावरणान्तरायप्रकृतीनां तु वनाश सदैव देशघातिनामेव रसस्पर्धकानामुदयो न सर्वघातिनां, ततः सदैव तासामौदयिकक्षायोपशमिको भावी सम्मिश्री प्राप्येते. न केवल औदयिक इति उक्तं पञ्चसङ्ग्रहमूलटीकायाम् । एतच्च तासां सर्वघातिरसस्पर्धेकानि येन तेनाध्यवसायेन देशघातीनि कर्तुं शक्यन्ते इत्यभ्युपगमे सति उपपद्यते, अन्यथा बन्धोपनीतानां मतिज्ञानावरणादिदेशघातिरसस्पर्धकानामानिवृत्तिबादराद्धायाः संख्येयेषु भागेषु गतेष्वेव सम्भवाचदर्वाग् मतिज्ञानाद्यभावप्रसङ्गर, तदभावे च तदललभ्यतदवस्थालाभानु-1 पपत्तिरित्यन्योऽन्याश्रयापातेन मतिज्ञानादीनां मूलत एवाभावप्रसङ्गात् । एवं मतिश्रुताज्ञानाचक्षुर्दर्शनादीनामपि क्षायोपशमिकत्वेन भणनात्सर्वघातिरसस्पर्धकोदये तदलाभादेशघातिरसस्पर्धकानां चार्वागबन्धादध्यवसायमात्रेण सर्वघातिनो देशघातित्वपरिणामानभ्युपगमे सर्वजीवानां तल्लाभानुपपत्तिरिति भावनीयम् । ननु यदि येन तेनाध्यवसायेनोक्तरसस्पर्धकानां सर्वघातिनां देशपतितया परिणामस्तदाग्दिशाय । तद्वन्ध एव किं प्रयोजनमिति चेत्, तत्कि प्रयोजनक्षतिभिया सामग्री कार्य नायतीति वक्तुमध्यवसितोऽसि । एवं हि पूर्णे प्रयोजने दृढदण्डनुनं चक्रं न भ्राम्येत, तस्मात्प्रकृते हेतुसमाजादेव सर्वघातिरसस्पर्धकबन्धौपयिकाध्यवसायेन तद्धन्धे तत्तदध्यवसायेन सर्वदा तद्देशघातित्वपरिणामे च बाधकामाकः। तदेवं ज्ञानावरणदर्शनावरणान्तरायाणां विपाकोदयेऽपि क्षयोपशमोऽविरुद्ध इति स्थितम् । मोहनीयस्य तु मिथ्या क्षयोपशम प्रक्रियायां चमत्यावर रणादीनां सर्वघातिर. सस्पर्धकान्यपिदेशघातितयैवोपभु ज्यन्ते तत्र च परकृतारिका तत्परिहारश्च ॥ Page #196 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भीज्ञान R बिन्दु प्रकरणम् ॥ ॥९ ॥ त्वानन्तानुवन्ध्यादिप्रकृतीनां प्रदेशोदये क्षायोपशमिको भावोऽविरुद्धो, न विपाकोदये, तासां सर्वघातिनीस्पेन तद्रसस्पर्धकस्य तथाविधाध्यवसायेनापि देशघातितया परिणमयितुमशक्यत्वाद्, रसस्य देशघातितया परिणामे तादात्म्येन देशघातिन्या हेतुत्वकल्पनात् । विपाकोदयविष्कम्भणं तु तासु सर्वघातिरसस्पर्धकानां क्षायोपशमिकसम्यक्त्वादिलब्ध्यभिधायकसिद्धान्तबलेन क्षयोपशमान्यथानुपपत्त्यैव तथाविधाध्यवसायेन कल्पनीयम् । केवलज्ञानकेवलदर्शनावरणयोस्तु विपाकोदयविष्कम्भा:योग्यत्वे स्वभाव एव शरणमिति प्राञ्चः। हेत्वभावादेव सदभावस्तद्धेतुत्वेन कल्प्यमानेऽध्यवसाये तत्क्षयहेतुत्वकल्पनाया एचौचित्यादिति तु युक्तं, तस्मान्मिथ्यात्वादिप्रकृतीनां विपाकोदये न क्षयोपशमसम्भवः, किं तु प्रदेशोदये । न च सर्वघाति. रसस्पर्धकप्रदेशा अपि सर्वस्वघात्यगुणघातनस्वभावा इति तत्प्रदेशोदयेऽपि कथं क्षायोपशमिकभावसम्भव इति वाच्यम्, तेषां सर्वघातिरसस्पर्धकप्रदेशानामध्यवसायविशेषेण मनाग्मन्दानुभावीकृतविरलवेद्यमानदेशघातिरसस्पर्धकेष्वन्तःप्रवेशिताना यथास्थितस्वबलप्रकटनासमर्थत्वात् । मिथ्यात्वाद्यद्वादशकषायरहितानां शेषमोहनीयप्रकृतीनां तु प्रदेशोदये विपाकोदये वा क्षयोपशमोऽविरुद्धः, तासां देशघातिनीत्वात, तदीयसर्वघातिरसस्य देशघातित्वपरिणामे हेतुश्चारित्रानुगतोऽध्यवसायविशेष एव द्रष्टव्यः, परं ताः प्रकृतयोऽध्रुवोदया इति तद्विपाकोदयाभावे क्षायोपशमिके भावे विजृम्भमाणे प्रदेशोदयवत्योऽपि न ता मनागपि देशघातिन्यः। विपाकोदये तु वर्तमाने क्षायोपशमिकमावसम्भवे मनाग्मालिन्यकारित्वादेशघातिन्यस्ता भवन्तीति सक्षेपः॥ विस्तरार्थिना तु मत्कृतकर्मप्रकृतिविवरणादिविशेषग्रन्था अवलोकनीयाः। उक्ता क्षयोपशमप्रक्रिया । इत्थं च सर्वघातिरसस्पर्धकवन्मतिज्ञानावरणादिक्षयोपशमजनितं मतिश्रुतावधिमनःपर्यायभेदाच्चतुर्विध क्षायोपशमिकं ज्ञानं, पञ्चमं च क्षायिक ABHA SABSCASHRECEMP3 मोहनीयप्रकृतिषु क्षयोपशमव्यवस्थोपपादनं क्षयोपपशमप्रक्रि योपसंहारथ॥ चतुविधं ज्ञानं क्षायोपशमिकं पंचम च क्षायिकमिति निपंकनं च ॥ Page #197 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तन मतिज्ञानत्वं श्रुतानयाप्तिः । श्रुतानुसारलाधारणात्म के मानदर्शनात, तत्मानोऽ मतिज्ञानलक्षणोपदर्शनं तत्र श्रुतानुसारित्वं ल क्षित र ASISAMAGES केवलज्ञानमिति पञ्च प्रकारा ज्ञानस्य ॥ तत्र मतिज्ञानत्वं श्रुताननुसार्यनतिशयितज्ञानत्वं, अवग्रहादिक्रमबदुपयोगजन्यज्ञानत्वं वा, अवध्यादिकमतिशयितमेव, श्रुतं तु श्रुतानुसार्यवेति न तयोरतिव्याप्तिः । श्रुतानुसारित्वं च धारणात्मकपदपदार्थसम्बन्धप्रतिसन्धानजन्यज्ञानत्वं, तेन न सविकल्पकज्ञानसामग्रीमात्रप्रयोज्यपदविषयताशालिनीहापायधारणात्मके मतिज्ञानेन्याप्तिः। ईहादिमतिज्ञानभेदस्य श्रुतज्ञानस्य च साक्षरत्वाविशेषेऽप्ययं घट इत्यपायोत्तरमयं घटनामको न वेति संशयादर्शनात्, तत्तनाम्नोऽप्यपायेन ग्रहणात, तद्धारणोपयोगे 'इदं पदमस्य वाचकं, अयमर्थ एतत्पदस्य वाच्य इति पदपदार्थसम्बन्धग्रहस्यापि धौव्येण तज्जनितश्रुतज्ञानस्यैव श्रुतानुसारित्वव्यवस्थितः । अत एव धारणात्वेन श्रुतहेतुत्वात् “मइपुव्वं सुझं" इत्यनेन श्रुतत्वावच्छेदेन मतिपूर्वत्वविधिः, “न मई सुअपुब्बिया" इत्यनेन च मतित्वसामानाधिकरण्येन श्रुतपूर्वत्वनिषेधोऽभिहितः सङ्गच्छते । कथं तर्हि श्रुतनिश्रिताश्रुतनिश्रितभेदेन मतिज्ञानद्वैविध्याभिधानमिति चेद्, उच्यते-स्वसमानाकारश्रुतज्ञानाहितवासनाप्रबोधसमानकालानत्वे सति श्रुतोपयोगाभावकालीनं श्रुतनिश्रितमवग्रहादिचतुर्भेदं, उक्तवासनाप्रबोधो धारणादाययोपयुज्यते, श्रुतोपयोगाभावश्च मतिज्ञानसामग्रीसम्पादनाय, उक्तवासनाप्रबोधकाले श्रुतज्ञानोपयोगबलाच्छ्तज्ञानस्यैवापत्तेः, मतिज्ञानसामय्याः श्रुतज्ञानोत्पत्तिप्रतिबन्धकत्वेऽपि शाब्देच्छास्थानीयस्य तस्योत्तेजकत्वात् । मतिज्ञानजन्यस्मरणस्य मतिज्ञानत्ववत् श्रुतज्ञानजन्यस्मरणमाप च श्रुतज्ञानमध्य एव परिगणनीयम् । उक्तवासनाप्रबोधासमानकालीनं च मतिज्ञानमौत्पत्तिस्यादिचतुर्भेदम श्रुतनिश्रितमित्यभिप्रायेण द्विधाविभागे दोषाभावः । तदिदमाह महाभाष्यकार:-"पुचि सुअपरिकम्मिय-मइस्स जं संपयं सुपआईअं॥ तं निस्मियमियरं पुण, आणिस्सि मइचउकं तं ॥ १६९ ॥ (ज्ञानार्णव पत्र २५) इति"। अपूर्वचैत्रादिव्यक्ति बुद्धौ त्वौत्पचिकीत्वमेवाश्रयणीयम् । श्रुतनिश्रितभेदेन मतिदैविध्योपपादनञ्च ॥ Page #198 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पशिान प्रकरणम्॥ RECHAHEECHESHASHREEGREEKASAR ऐन्द्रियकश्रुतज्ञानसामान्ये धारणात्वेन तदिन्द्रियजन्यश्रुते तदिन्द्रियजम्यधारणात्वेनैव वा हेतुत्वात । प्रागनुपलब्धेऽर्थे | शाब्दबोध. श्रुतज्ञानाहितवासनाप्रबोधाभावेन श्रुतनिश्रितज्ञानासम्भवात्, धारणायाः श्रुतहेतुत्व एव च मतिश्रुतयोर्लब्धियोगपद्येऽप्युपयोगक्रमः परिकरीभूसङ्गच्छते, प्रागुपलब्धार्थस्य चोपलम्भे धारणाहितश्रुतज्ञानाहितवासनाप्रबोधान्वयाच्छूतनिश्रितत्वमावश्यकम, धारणादिरहिताना- तबोधमामेकेन्द्रियादीनां त्वाहारादिसंज्ञान्यथानुपपत्यान्त ल्पाकाराविवक्षितार्थवाचकं शब्दसंस्पृष्टार्थज्ञानरूपं श्रुतज्ञानं क्षयोपशममात्रजनितं त्रस्य श्रुतत्वं जात्यन्तरमेव, आप्तोक्तस्य शब्दस्योहाख्यप्रमाणेन पदपदार्थशक्तिग्रहानन्तरमाकाङ्क्षाज्ञानादिसाचिव्येन जायमानं तु ज्ञानं स्पष्टधा- पदार्थबोधारणाप्रायमेव, शाब्दबोधपरिकरीभूतश्च यावान् प्रमाणान्तरोत्थापितोऽपि बोधः सोऽपि सर्वः श्रुतमेव । अत एव " पदार्थवाक्यार्थ- 13 दिचतुर्विमहावाक्याथैदम्पर्यार्थभेदेन चतुर्विधवाक्यार्थज्ञाने ऐदम्पर्थिनिश्चयपर्यन्तं श्रुतोपयोगव्यापारात् सर्वत्र श्रुतत्वमेव" इत्यभियुक्त- तू | धवाक्यार्थरुक्तमुपदेशपदादी। तत्र "सव्वे पाणा सव्वे भूआ सब्वे जीवा सव्वे सत्ताणहंतव्वा" इत्यादौ यथाश्रुतमात्रप्रतीतिः पदार्थबोधः । बोधस्य श्र. एवं सति हिंसात्वावच्छेदेनानिष्टसाधनत्वप्रतीतेराहारविहारदेवार्चनादिकमपि प्राणोपघातहेतुत्वेन हिंसारूपत्वादकर्तव्यं स्यादिति तत्वमुपपावाक्यार्थबोधः । यतनया क्रियमाणा आहारविहारादिक्रिया न पापसाधनानि, चित्तशुद्धिफलत्वात्, अयतनया क्रियमाणं तु सर्व दितम् । हिंसान्तर्भावात् पापसाधनमेवेति महावाक्यार्थबोधः । 'आज्ञैव धर्मे सार' इत्यपवादस्थलेऽपि गीतार्थयतनाकृतयोगिकारणपदैनिषिद्धस्याप्यदुष्टत्वं, विहितक्रियामात्रे च स्वरूपहिंसासम्भवेऽप्यनुबन्धहिंसाया अभावान्न दोषलेशस्याप्यवकाश इत्यैदम्पर्यार्थबोधः । एतेषु सर्वेष्वेकदीर्घोपयोगव्यापारान श्रुतान्यज्ञानशङ्का, ऐदम्पर्यबोधलक्षणफलव्याप्यतयैव श्रुतस्य लोकोत्तरप्रामाण्यव्यवस्थितेर्वाक्येऽपि क्रमिकतावद्धोधजनके तथात्वव्युत्पत्तिप्रतिसन्धानवति व्युत्पत्तिमति पुरुषे न विरम्यव्यापारादिक्षणावकाशः। ॥९१॥ RECARSHIRISHNA Page #199 -------------------------------------------------------------------------- ________________ KERASHASHA सोऽयमिषोरिख दीर्घदीर्घतरो व्यापारो, 'यत्पर शन्दः स शब्दार्थ' इति नयाश्रयणात् । एतेन 'न हिंस्यादित्यादिनिषेधविधौ सव्वे पाणा विशेषविधिवाधर्यालोचनयाऽनुमितौ व्यापकतानवच्छेदकेनापि विशेषरूपेण व्यापकस्येव शाब्दबोधे तत्ताद्विहिततरहिंसात्वेन सव्वे भूआवृत्स्यनवच्छेदकरूपेणापि निषेध्यस्य प्रवेश' इति निरस्तम् । उक्तबाधपर्यालोचनस्य प्रकृतोपयोगान्तर्भावेऽस्मदक्तप्रकारस्यैव पण हंतव्वाइसाम्राज्यात, तदनन्तर्भावे च तस्य सामान्यवाक्यार्थबोधेन सह मिलनाभावेन विशेषपर्यवसायकत्वासम्भवात् । अव्यवहितद्वित्र- ४ त्यादौपदार्थक्षणमध्ये एकविशेषवाधप्रतिसन्धानमेव सामान्यवाक्यार्थस्य तदितरविशेषपर्यवसायकमिति कल्पनायां न दोष इति चेत, न, बोधादिचद्विवक्षणाननुगमात्, पटुसंस्कारस्य पश्चषक्षणव्यवधानेऽपि फलोत्पत्तेश्च, संस्कारपाटवस्यैवानुगतस्यानुसरणौचित्यात, तच्च तुर्विधवागृहीतेऽर्थे मतिश्रुतसाधारणविचारणोपयोग एवोपयुज्यते, अत एव सामान्यनिषेधज्ञाने विरोधसम्बन्धेन विशेषविधिस्मृतावपि क्यार्थबोधविचारणया तदितरविशेषपर्यवसानम् । अपि च 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यत्र यथा परेषां प्रथम स्वर्गत्वसामानाधिकरण्येनैव स्योपपाद. यागकार्यताग्रहोऽनन्तरं चानुगतानतिप्रसक्तकार्यगतजातिविशेषकल्पनं, तथा प्रकृतेऽपि हिंसात्वसामानाधिकरण्येन पापजनकत्व नम्। बोधेऽनन्तरं तद्गतहेतुतावच्छेदकानुगतानतिप्रसक्तरूपकल्पने किं बाधकं, सर्वशब्दबलेन हिंसासामान्योपस्थितावपि तद्गतहेतुस्वरूपानुबन्धकृतविशेषस्य कल्पनीयत्वात् । सैव च कल्पना वाक्यार्थबोधात्मिकेति न तदुच्छेदः॥ किश्च पदार्थबोधाद्धिसासामान्येऽनिष्टसाधनत्वग्रहे आहारविहारादिक्रियास्वनिष्टसाधनत्वव्याप्यहिंसात्वारोपेणानिष्टसाधनत्वारोपलक्षणतर्कात्मक एव वाक्यार्थबोधः, तस्य युक्त्या विपर्ययपर्यवसानात्मको महावाक्यार्थबोधा, ततो हेतुस्वरूपानुबन्धत्रयविषय एव हिंसापदार्थ इत्यैदम्पर्यार्थबोधः, इत्येते बोधा अनुभवसिद्धत्वादेव दुर्वाराः । श्रुतज्ञानमूलोहादेश्च श्रुतत्वं प्रसक्तकार्यगतजातिवन कि बाधकं, सवेशदन तदुच्छेदः ॥ ABHISHISHASHASTRORS मात्वारोपणानिष्टसा Page #200 -------------------------------------------------------------------------- ________________ है मीशान बिन्दुः प्रकरणम्॥ ॥९ ॥ RUNNINGHARRINGS मतिज्ञानमूलोहादेमंतिज्ञानत्ववदेवाभ्युपेयम् । अत एव श्रुतज्ञानाभ्यन्तरीभूतमतिविशेषैरेव षट्स्थानपतितत्वं चतुर्दशपूर्वविदामप्याचक्षते सम्प्रदायवृद्धाः। तथा चोक्तं कल्पभाष्ये-" अरकरलंभेण समा, ऊणहिया हुंति मइविसेसेहिं । ते वि य मईविसेसा, सुअनाणभंतरे जाण ॥१॥" (विशे. गा.१४३ ज्ञानार्ण०प०१८) यदि च सामान्यश्रुतज्ञानस्य विशेषपर्यवसायकत्वमेव मतिज्ञानस्य श्रुतज्ञानाभ्यन्तरीभूतत्वमुपयोगविच्छेदेऽप्येकोपयोगव्यवहारश्च फलप्राधान्यादेवेति विभाव्यते, तदा पदार्थ बोधयित्वा विरतं वाक्यं वाक्यार्थबोधादिरूपविचारसहकृतमावृत्या विशेष बोधयदैदम्पर्यार्थकत्वव्यपदेशं लभत इति मन्तव्यम् । परं शब्दसंसृष्टार्थग्रहणव्यापृतत्वे पदपदार्थसम्बन्धग्राहकोहादिवत्तस्य कथं न श्रुतत्वम् , "शब्दसंसृष्टार्थग्रहणहेतुरुपलब्धिविशेष: (त्रिकाल सा)धारणसमानपरिणामः श्रुतम्" इति नन्दीवृत्त्यादी दर्शनात ॥ [नन्दीवृत्तावयं पूर्णपाठः-तथा श्रवणं श्रुत वाच्यवाचकभावपुरस्सरीकारेण शब्दसंस्पृष्टार्थग्रहणहतुरुपलब्धिविशेषः, 'एवमाकारं वस्तु जलधारणाद्यर्थक्रियासमर्थ घट. शब्दवाच्यम् ' इत्यादिरूपतया प्रधानीकृतत्रिकालसाधारणसमानपरिणामः शब्दार्थपर्यालोचनानुसारीन्द्रियमनोनिमितोऽवगमविशेष इत्यर्थः] "सोइंदिओवलद्धी, होइ सुझं सेसयं तु मइनाणं ॥ मोत्तणं दब्बसुअं, अस्करलंभो अ सेसेसु ॥११७॥" (ज्ञानार्ण०प०१२)इति पूर्वगतगाथायामप्ययमेव स्वरसो लभ्यते। तथा चास्या अर्थः-श्रोत्रेन्द्रियेणोपलब्धिरेव श्रुतमित्यवधारणं, । न तु श्रोत्रेन्द्रियेणोपलब्धिः श्रुतमेवेति । अवग्रहहादिरूपायाः श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धेरपि मतिज्ञानरूपत्वात् । यद्भाष्यकार:"सोइंदिओवलद्धी,चेव सुअंन उतई सुअंचेव । सोइंदिओवलद्धी,विकाई जम्हा मइनाणं ॥१२२॥"(ज्ञाना०प०१३) शेषं तु यच्चक्षुरादीन्द्रियोपलब्धिरूपं तन्मतिज्ञानं, तुशब्दोऽनुक्तसमुच्चयार्थः, स चावग्रहेहादिरूपां श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिमपि समुच्चिनोति, यभा श्रुतज्ञानम्लोहादेः श्रु| तत्वं, ततः श्रुतज्ञानाम्य न्तरीभूत| मतिविशेषरेव पूर्वविदांषट्स्थानपतितत्वं तत्र संवादोपदर्शनञ्च ॥ ॥९ अर Page #201 -------------------------------------------------------------------------- ________________ PRECAKAVACANAGAR प्यकारः-"तु समुच्चयत्रयणाओ, काई साइंदिओवलद्धी वि । मई एवं सइ सोउ-ग्गहादिओ होति मईभेया॥१२३॥"(ज्ञानाना०प० १३) अपवादमाह-मुक्त्वा द्रव्यश्रुतं पुस्तकपत्रादिन्यस्ताक्षररूपं,तदाहितायाः शब्दार्थपोलोचनात्मिकायाः शेषेन्द्रियोपलब्धेरपि श्रुतत्वात् । अक्षरलाभश्च यः शेषेष्वपीन्द्रियेषु शब्दार्थपर्यालोचनात्मकः, न तु कालः, तस्येहेहादिरूपत्वात्, तमपि मुक्वेति सोपस्कार व्याख्येयम् । नन्वेवं शेषेन्द्रियेषप्यक्षरलाभस्य श्रुतत्वोक्तेः श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिरेव श्रुतमिति प्रतिज्ञा विशीर्यत, मैत्रम्, तस्यापि श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिकल्पत्वादिति बहवः। श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिपदेन श्रोत्रेन्द्रियजन्यव्यञ्जनाक्षरज्ञानाहिता शाब्दी बुद्धिः, द्रव्यश्रुतपदेन च चक्षुरादीन्द्रियजन्यसंज्ञाक्षरज्ञानाहिता सा, अक्षरलाभपदेन च तदतिरिक्तश्रुतज्ञानावरणकर्मक्षयोपशमजनिता बुद्धिाद्यत इति सर्वसाधारणो धारणाप्रायज्ञानवृत्तिः शब्दसंसृष्टार्थाकारविशेष एवानुगतलक्षणम् । त्रिविधाक्षरश्रुताभिधानप्रस्तावेऽपि संज्ञाव्यजनयोर्द्रव्यश्रुतत्वेन, लब्धिपदस्य चोपयोगार्थत्वेन व्याख्यानात् । तत्र चानुगतमुक्तमेव लक्षणमिति । इह गोवपन्यायेन त्रिविधोपलब्धिरूपभावश्रुतग्रहणमिति त्वस्माकमाभाति । अवग्रहादिक्रमवदुपयोगत्वेनापि च मतिज्ञान एव जनकता,न श्रुतज्ञाने तत्र शाब्दोपयोगत्वेनैव हेतुत्वात्, मतिज्ञाने च-"नानवगृहीतमाद्यते, नानीहितमपेयते, नानपेतं च धार्यते,"इति क्रमनिबन्धनमन्वयव्यतिरेकनियममामनन्ति मनीषिणः। तत्रावग्रहस्येहायां धर्मिज्ञानत्वेन, तदवान्तरधर्माकारेहायां तत्सामान्यज्ञानत्वेन वा। ईहायाश्च तद्धर्मप्रकारतानिरूपिततद्धर्मिनिष्ठसिद्धत्वाख्यविषयतावदपायत्वावच्छिन्नेतद्धर्मप्रकारतानिरूपिततर्मिनिष्ठसाध्यत्वाख्यविषयतावदीहात्वेन,घटाकारावच्छिन्नसिद्धत्वाख्यविषयतावदपायत्वावच्छिन्ने तादृशमाध्यत्वाख्यविषयतावहात्वेन वा,धारणायांचापायस्य समानप्रकारकानुभवत्वेन, विशिष्टभेदे समानविषयकानुभवत्वेन वा कार्यकारणभावः। तत्रावग्रहो द्विविधो व्यञ्जनावग्रहाविग्र श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धेः श्रु| तत्वं द्रव्य श्रुतं मुक्त्वा# शेषेन्द्रियोउपलब्धेर्मति६ स्वमुपपादिहै तम्, मतिज्ञा ने अवग्रहा६ दीनां का र्यकारण__ भावोप व-नान्वष्टायां धर्मिज्ञानत्वेन, तदवान्तानिरूपिततर्मिनिष्ठसाध्यतरणायांचा- दर्शनम् । Page #202 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मोबान অঞ্জনাথী (लू वग्रहभेदे प्रकरणम्॥ ॥९३ ॥ नावग्रहदैविध्यं व्य ORGARH जनस्वरू हभेदात्। तत्र व्यञ्जनेन शब्दादिपरिणतद्रव्यनिकुरम्बेण व्यञ्जनस्य श्रोत्रेन्द्रियादेरवग्रहः सम्बन्धो व्यञ्जनावग्रह,सच मल्लकप्रतिबोधकदृष्टान्ताभ्यां सूत्रोक्ताभ्यामसङ्ख्येयसमयभावी । तस्यामप्यवस्थायामव्यक्ता ज्ञानमात्रा, प्रथमसमयेऽशेनाभवतश्चरमसमये भवनान्यथानुपपत्त्या भाष्यकृता प्रतिपादिता । युक्तं चैतत् , निश्चयतोऽविकलकारणस्यैव कार्योत्पत्तिच्याप्यत्वाद्, अविकलं च कारणं ज्ञाने उपयोगेन्द्रियमेव, तच्च व्यञ्जनावग्रहकाले लब्धसत्ताकं कथं न स्वकार्य ज्ञानं जनयेदिति, अयमुपयोगस्य कारणांशः । ननु व्यञ्जनावग्रहः प्राप्यकारिणामेवेन्द्रियाणामुक्तो नाप्राप्यकारिणोश्चक्षुर्मनसोरिति तत्र कः कारणांशो वाच्यः १, यद्यर्थावग्रहस्तहि सर्वत्र स एवास्त्विति चेत्, न, तत्राप्यर्थावग्रहात्याग् लब्धीन्द्रियस्य ग्रहणोन्मुखपरिणाम एवोपयोगस्य कारणांश इत्यभ्युपगमात् । न च सर्वत्रैकस्यैवाश्रयणमिति युक्तम्, इन्द्रियाणां प्राप्यकारित्वाप्राप्यकारित्वव्यवस्थाप्रयुक्तस्य इस्वदीर्घकारणांशभेदस्यागमयुक्त्युपपन्नत्वेन प्रतिबन्दिपर्यनुयोगानवकाशात् । अर्थावग्रहः सामान्यमात्रग्रहः, यतः किश्चिदृष्टं मया न तु परिभावितमिति व्यवहारः, स चैकसामयिका, तत ईहोपयोग आन्तौहार्तकः प्रवर्तते, स च सद्भुताऽसद्धृतविशेषोपादानत्यागाभिमुखबहुविचारणात्मकः पर्यन्ते तत्तत्प्रकारेण धर्मिणि साध्यत्वाख्यविषयताफलवान् भवति । अत एव "फलप्रवृत्ती ज्ञानप्रामाण्यसंशयवत्करणप्रवृत्तावपीन्द्रियादिगतगुणदोषसंशयेन विषयसंशयादिन्द्रियसाद्गुण्यविचारणमपीहयैव जन्यते, केवलमभ्यासदशायां तज्झटितिजायमानत्वात् कालसौक्ष्म्येण नोपलक्ष्यते, अनभ्यासदशायांतु वैपरीत्येन स्फुटमुपलक्ष्यत" इति मलयगिरिप्रभृतयो वदन्ति । एवं सति स्वजन्यापाये सर्वत्रार्थयाथात्म्यनिश्चयस्येहयैव जन्यमानत्वात् "तदुभयमुत्पत्तौ परत एव, ज्ञप्तौ तु स्वतः परतश्च" इत्याकर (प.१-२०) सूत्रं विरुध्येत,तदुभयं प्रामाण्यमप्रामाण्यं च,परत एवेति कारणगतगुणदोषापेक्षयेत्यर्थः,स्वतः पद्वैवि ध्यव्यञ्जनावग्र| हनिरूपणचततोऽर्थावग्रहादीनां निरूपणम्। - - - ॥९३॥ - Page #203 -------------------------------------------------------------------------- ________________ REC RECEMBER परतश्चेति. संवादकबाधक ज्ञानानपेक्षया जायमानत्वं स्वतस्त्वं, तच्चाभ्यासदशायां, केवलक्षयोपशमस्यैव तत्र घ्यापारात, तदपेक्षया जायमानत्वं च परतस्त्वं, तच्चानभ्यासदशायां, अयं च विभागो विषयापेक्षया, स्वरूपे तु सर्वत्र स्वत एव प्रामाण्यनिश्चय इत्यक्षरार्थ इति ।" ईहयैव हि सर्वत्र प्रामाण्यनिश्चयाभ्युपगमे कि संवादकप्रत्ययापेक्षया ?, न खल्वेकं गमकमपेक्षितमिति गमकान्तरमप्यपेक्षणीयम् । न चेहाया बहुविधत्वाद्यत्र न करणसाद्गुण्यासाद्गुण्यविचारस्तत्रैवोक्तस्वतस्त्वपरतस्त्वव्यवस्थेति वाच्यम ईहायां क्वचिदुक्तविचारव्यभिचारोपगमे आभ्यासिकापायपूर्वेहायामनुपलक्ष्यमाणस्यापि तद्विचारस्य नियमकल्पनानुपपत्तेः । न चोक्तविचार ईहायां प्रमाजनकतावच्छेदको न तु तज्ज्ञप्तिजनकतावच्छेदक इत्यपि युक्तम् , करणगुणादेव प्रमोत्पत्तौ | तस्यातथात्वात् । न च भाविज्ञानस्यासिद्धत्वादुक्तविचारवत्यापीहया तगतप्रामाण्याग्रह इत्यपि साम्प्रतम् , विचारेण करणसाद्गुण्यग्रहे भाविज्ञानप्रामाण्यग्रहस्यापि सम्भृतसामग्रीकत्वादित्यादिविचारणीयम् । ननु भवतां सैद्धान्तिकमते उपयोगेडवग्रहादिवृत्तिचतुष्टयच्याप्यत्वं, एकत्र वस्तुनि प्राधान्येन सामान्यविशेषोभयावगाहित्वपर्याप्त्याधारत्वं वा, तार्किकमते च प्रमेयाव्यभिचारित्वं प्रामाण्यमयोग्यत्वादभ्यासेनापि दुग्रह, समर्थप्रवृत्त्यनौपयिकत्वेनानुपादेयं च । पौद्गलिकसम्यक्त्ववतां सम्यक्त्वदलिकान्वितोऽपायांश:प्रमाणं, क्षायिकसम्यक्त्ववतांच केवलोऽपायांश इति तत्त्वार्थवृत्त्यादिवचनतात्पर्यपर्यालोचनायां तु सम्यक्त्वसमानाधिकरणापायत्वं ज्ञानस्य प्रामाण्यं पर्यवस्यति,अन्यथाऽननुगमात्,तत्र च विशेषणविशेष्यभावे विनिगमनाविरहः। ज्ञानं प्रमाणमितिवचनं विनिगमकमिति चेत्, तदपि समर्थप्रवृत्त्यौपयिकेन रूपेण विनिगमयेत् न तु विशिष्टापायत्वेनानीदृशेन, 'सम्यक्त्वानुगतत्वेन ज्ञानस्य ज्ञानत्वं, अन्यथा त्वज्ञानत्वं' इति व्यवस्था तु नापायमात्रप्रामाण्यसाक्षिणी, सम्यग्दृष्टिसम्बन्धिना विज्ञानप्रामाण्यग्रहस्यापि सान्येन सामान्यविशेषोभयावगाहापादेयं च । पौद्गलिकसम्यक्त्ववता R BASSANA मलयगिरिप्रभृत्यमिप्रायेण स त्रेहयैवप्रामाण्यनि श्चयोपगमे रत्नाकरसूत्रविरोध उप दर्शिता, जैनाभिमते प्रामाण्या प्रामाण्यस्वतस्त्वपरतस्त्वानकान्ते दोषोपदर्शनम् ।। Page #204 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ok भीज्ञान विन्दुप्रकरणम्॥ ।।९४ ॥ उपयोगेज ग्रहादिवृत्ति संशयादीनामपि ज्ञानत्वस्य महाभाष्यकृता परिभाषितत्वात् । न च सम्पत्वसाहित्येन ज्ञानस्य रुचिरूपत्वं सम्पद्यते, रुचिरूपं चतुष्टयव्याच ज्ञानं प्रमाणमिति सम्यक्त्वविशेषणोपादानं फलादित्यपि साम्प्रतम्, एतस्य व्यवहारोपयोगित्वेऽपि प्रवृत्यनुपयोगत्वात् । प्यत्वादिन च घटाद्यपायरूपा रुचिरपि सम्यक्त्वमिति व्यवहरन्ति सैद्धान्तिका, जीवाजीवादिपदार्थनवकविषयकसमूहालम्बनज्ञान लक्षणं सम्यविशेषस्यैव रुचिरूपतयानातत्वात् , केवलं 'सत्संख्यादिमार्गगास्थानस्तन्निर्गयो भावसम्यक्त्वं,' 'सामान्यतस्तु द्रव्यसम्यक्त्व. क्त्वसमानाम्' इति विशेष इति । न च घटाद्यपायेऽपि रुचिरूपत्वमिष्टमेव, सदसद्विशेषणाविशेषणादिना सर्वत्र ज्ञानाज्ञानव्यवस्थाकथनात् , तदेव त |धिकरणापाच प्रामाण्यमप्रत्यूहमिति वाच्यं,अनेकान्तव्यापकत्वादिप्रतिसन्धानाहितवासनावतामेव तादृशोधसम्भवात्,तदन्येषां तु द्रव्यसम्य. यत्वादिलक्षक्त्वेनैव ज्ञानसद्भावव्यवस्थितेः । अत एव "चरणकरणप्रधानानामपि स्वसमयपरसमयमुक्तव्यापाराणां द्रव्यसम्यक्त्वेन चारित्र- | एणं च प्रामाव्यवस्थितावपि भावसम्यक्त्वाभावः" प्रतिपादितः सम्मती महावादिना । द्रव्यसम्यक्त्वं च, "तदेव सत्यं निःशंक यजिनेन्द्रैः ण्यं न प्रवृप्रवेदितमिति"ज्ञानाहितवासनारूपं,माषतुषाद्यनुरोधाद् 'गुरुपारतंत्र्यरूपं वा' इत्यन्यदेतत् । तस्मान्नैते प्रामाण्यप्रकाराःप्रवृत्यौप- त्यौपयिकं योगिकाः । तद्वति तत्प्रकारकत्वरूपं ज्ञानप्रामाण्यं तु प्रवृत्यौपयिकमवशिष्यते, तस्य च स्वतोग्राह्यत्वमेवोचितम् ।न्यायनयेऽपि ४ तादृशं चतज्ञाने पुरोवर्तिविशेष्यताकत्वस्य रजतत्वादिप्रकारकत्वस्य चानुव्यवसायग्राह्यतायामविवादात , इमं रजतत्वेन जानामीति प्रत्य- इति तत्प्रकायात् , तत्र विशेष्यत्वप्रकारत्वयोरेव द्वितीयावृतीयार्थत्वात् , तत्र पुरोवर्ति इदन्त्वेन रजतत्वादिनापि चोपनयवशाद्भासताम् । न | रकत्वं स्वचेदन्त्ववैशिष्टयं पुरोवर्तिनि न भासत इति वाच्यम् , विशेष्यतायां पुरोवर्तिनः स्वरूपतो मानानुपपत्तेः तादृशाविशेषणज्ञानाभावात् , तो ग्राह्यमेवेअन्यथा प्रमेयत्वादिना रजतादिज्ञानेऽपि तथाज्ञानापतेः, जात्यतिरिक्तस्य किश्चिद्धर्मप्रकारेणैव भाननियमाच । किञ्च प्रामाण्य - ति प्रश्नः। ॥९ ॥ Page #205 -------------------------------------------------------------------------- ________________ AUGUGUSIC प्रवृत्त्यौपविकनिरुक्तप्रामाण्यस्य ज्ञप्तौं स्वतस्वमेवेति प्रश्ननिगमनम्॥ संशयोत्तरमिदं रजतं न वेत्येव संशयो, न तु रजतमिदं न वा, द्रव्यं रजतं न वेत्यादिरूप इति, यद्विशेष्यकयत्प्रकारकज्ञानत्वावच्छेदेन प्रामाण्यसंशयस्तद्धर्मविशिष्ट तत्प्रकारकसंशय इति नियमादिदन्त्वेन धर्मिभानमावश्यकं,इदन्त्वरजतत्वादिना पुरोवर्तिन उपनयसत्त्वाच तथाभानमनुव्यवसाये दुर्वारमिति किमपरमवशिष्यते प्रामाण्ये ज्ञातुम् । न चैकसम्बन्धेन तद्वति सम्बन्धान्तरेण तत्प्रकारकज्ञानव्यावृत्तं, तेन सम्बन्धेन तत्प्रकारकत्वमेव प्रामाण्यं, तच्च दुग्रहमिति वाच्यं, व्यवसाये येन सम्बन्धेन रजतत्वादिकं प्रकारस्तेन तद्वतोऽनुव्यवसाये भानात् , संसर्गस्य तु तत्वेनैव भानात् । तत्प्रकारकत्वं च वस्तुगत्या तत्सम्बन्धावच्छिन्नप्रकारताकत्वमिति प्रकारताकत्वकुक्षिप्रवेशेनैव वा तद्भानम् । अत एवेदं रजतमिति तादात्म्यारोपव्यावृत्तये मुख्यविशेष्यता प्रामाण्ये निवेशनीयेति मुख्यत्वस्य दुर्ग्रहत्वमित्युक्तेरप्यनवकाशो, वस्तुगत्या मुख्यविशेष्यताया एव निवेशात , तादात्म्यारोपे आरोप्यांशे समवायेन प्रामाण्यसत्त्वेऽप्यक्षतेश्च । एतेन 'तद्वद्विशेष्यकत्वे सति तत्प्रकारकत्वमात्रं न प्रामाण्यं,'इमे रङ्गरजते' 'नेमे रङ्गरजते' इति विपरीतचतुष्क-2 भ्रमसाधारण्यात् , किं तु तद्वद्विशेष्यकत्वावच्छिन्नतत्प्रकारकत्वं, तच्च प्रथमानुव्यवसाये दुर्ग्रहम्' इत्यपि निरस्तम् ।। वस्तुगत्या तादृशप्रकारताकत्वस्य सुग्रहत्वादेव तद्बहेऽनुव्यवसायसामग्रयाऽसामर्थ्यस्य व्यवसायप्रतिबन्धकत्वस्य वा कल्पनमभिनिवेशेन स्वबुद्धिविडम्बनामात्रं,तथाकल्पनायामप्रामाणिकगौरवात् । एतेन 'विधेयतयाऽनुव्यवसाये स्वातन्त्र्येण प्रामाण्यभाने व्यवसायप्रतिबन्धकत्वकल्पनापि' परास्ता। तत्र तद्वद्विशेष्यकतोपस्थितितदभाववाद्विशेष्यकत्वाभावोपस्थित्यादीनामुत्तेजकत्वादिकल्पने महागौरवात् । यदि च विशेष्यत्वादिकमनुपस्थितं न प्रकारः, तदा विशेष्यतासम्बन्धेन रजतादिमत्चे सति प्रकारितया रजतत्वादिमत्त्वमेव प्रामाण्यमस्तु । एतज्ज्ञानमेव लाघवात्प्रवृत्त्यौपयिकं । तस्माज्ज्ञप्तौ प्रामाण्यस्य स्वतस्त्वमेव युक्तम् । Page #206 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भावानबिन्दु प्रकरणम्॥ SAR अप्रामाण्यं तु नानुव्यवसायग्राह्य, रजतत्वाभाववत्त्वेन पुरोवर्तिनोऽग्रहणे तथोपनीतभानायोगात, रजतत्वादिमत्तया शुक्त्यादिधी-12 विशेष्यकत्वं रजतत्वप्रकारकत्वं च तत्र गृह्यते, अत एव, 'अप्रमापि प्रमत्येव गृह्यते' इति चिन्तामणिग्रन्थः 'प्रमेतीत्येव अप्रामाण्यव्याख्यातस्तांत्रिकैः इत्यप्रामाण्यस्य परतस्त्वमेव । न च प्रामाण्यस्य स्वतस्त्वे ज्ञानप्रामाण्यसंशयानुपपत्तिः, ज्ञानग्रहे टू स्य तु परतो प्रामाण्यग्रहात्तदग्रहे धर्मिग्रहाभावादिति वाच्यं, दोषात् तत्संशयाद्धमीन्द्रियसन्निकर्षस्यैव संशयहेतुत्वात् । प्राक् प्रामाण्याभावो- ग्राह्यत्वमेपस्थितौ धर्मिज्ञानात्मक एव वाऽस्तु प्रामाण्यसंशय इति स्वतस्त्वपरतस्त्वानेकान्तः प्रामाण्याप्रामाण्ययोज॑नानां न युक्त इति । वेति प्रामाचेद्, अत्र ब्रूमः। रजतत्ववद्विशेष्यकत्वावच्छिन्नरजतत्वप्रकारताकत्वरूपस्य रजतज्ञानप्रामाण्यस्य वस्तुतोऽनुव्यवसायेन ग्रहणात् । |ण्याआमा. स्वतस्त्वाभ्युपगमेप्रामाण्यस्यापि स्वतस्त्वापाता, रजतभ्रमानुव्यवसायेनापि वस्तुतो रजतत्वाभाववद्विशेष्यकत्वावच्छिन्नरजतत्व- ण्ययोः स्वप्रकारताकत्वस्यैव ग्रहात, तत्र चास्माभिरनेकान्तवादिभिरिष्टापत्तिः कर्तुं शक्यते, द्रव्यार्थतः प्रत्यक्षस्य योग्यद्रव्यप्रत्यक्षीकर 10 तस्त्वपरणवेलायां तद्गतानां योग्यायोग्यानां धर्माणां सर्वेषामभ्युपगमात्, 'स्वपरपर्यायापेक्षयाऽनन्तधर्मात्मकं तत्त्वम्' इति वासनावत ६ तस्त्वानेकाएकज्ञत्वे सर्वज्ञत्वध्रौव्याभ्युपगमाच, (आचाराङ्ग) “जे एगं जाणइ से सव्वं जाणइ, जे सव्वं जाणइ से एगं जाणइ ति" पारमर्षस्येत्थमेव स्वारस्यव्याख्यानात् । अवोचाम चाध्यात्मसारप्रकरणे-(प्रवन्ध २) "आसचिपाटवाभ्यास-स्वकार्यादिभिरा न युक्त इति श्रयन् ।। पर्यायमेकमप्यर्थ, वेत्ति भावाद् बुधोऽखिलम् ॥वै. भेदप्र.३०॥” इति । न चेयं रीतिरेकान्तवादिनो भवत इति प्रतीच्छ प्रश्नपतिप्रतिबन्दिदण्डप्रहारम् । ननु रजतत्ववद्विशेष्यकत्वरजतत्वप्रकारत्वयोरेव ज्ञानोपरि मान, अवच्छिन्नत्वं तु तयोरेव मिथा संसर्गः, विधान एकत्र भासमानयोईयोर्धमयोः परस्परमपि सामानाधिकरण्येनैवावच्छिन्नत्वेनाप्यन्वयसम्भवादित्येवं प्रामाण्यस्य स्वतस्त्वं, KARI RECE२ ॥९५ ॥ Page #207 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अप्रामाण्यस्य तु न तथात्वं रजतत्वाभावस्य व्यवसायेऽस्फुरणेन तद्वद्विशेष्यकत्वस्य ग्रहीतुमशक्यत्वात् ज्ञानग्राहकसामय्यास्तूपस्थितविशेष्यत्वादिग्राहकत्व एव व्यापारादित्येवमदोष इति चेत्, न, प्रामाण्यशरीरघटकस्यावच्छिन्नत्वस्य संसर्गतया भानोपगमे कार्त्स्न्येन प्रामाण्यस्य प्रकारत्वासिद्धेः, अंशतः प्रकारतया भानं च स्वाश्रय विशेष्यकत्वावच्छिन्न प्रकारतासम्बन्धेन रजतत्वस्य ज्ञानोपरि मानेऽपि सम्भवतीति तावदेव प्रामाण्यं स्याद् ॥ अस्त्वेवं ज्ञानग्राहक सामय्यास्तथाप्रामाण्यग्रह एव सामर्थ्यात्, अत एव नाप्रामाण्यस्य स्वतस्त्वमिति चेत्, न, एवमभ्युपगमे अप्रमापि प्रमेतीत्येव गृह्यते इत्यस्य व्याघातात्तत्र रजतत्वस्य ज्ञान - पर्युक्तसम्बन्धासम्भवात्, कम्बुग्रीवादिमान्नास्ति वाच्यं नास्तीत्यादावन्वयितावच्छेदकावच्छिन्नप्रतियोगिताया इव प्रकृते उक्तसम्बन्धस्य तत्तदवगाहितानिरूपितावगाहितारूपा विलक्षणैव खण्डशः सांसर्गिकविषयतेति न दोष इति चेत्, न, तत्रापि लक्षणादिनैव बोधः, उक्तप्रतियोगितायास्तु घटो नास्तीत्यादावेव स्वरूपतः संसर्गत्वं, उक्तं च मिश्र :- " अर्थापत्तौ नेह देवदत्त इत्यत्र प्रतियोगित्वं स्वरूपत एव भासत इत्येवं समर्थनात् " वस्तुतोऽस्माकं सर्वापि विषयता द्रव्यार्थतोऽखण्डा, पर्यायार्थतश्च सखण्डेति सम्पूर्ण प्रामाण्यविषयताशालिबोधो न संवादकप्रत्ययं विना, न वा तादृशाप्रामाण्यविषयताकबोधो बाधकप्रत्ययं विना, इत्युभयोरनभ्यासदशायां परतस्त्वमेव, अभ्यासदशायां तु क्षयोपशमविशेषसधी चीनया तादृशतादृशेहया तथा तथोभयग्रहणे स्वतस्त्वमेव, अत एव प्रामाण्यान्तरस्यापि न दुर्ब्रहत्वं, स्वोपयोगापृथग्भूते हे। पनीतप्रकारस्यैवापायेन ग्रहणात् तादृशी च प्रामायविषयता नाव ग्रहमात्रप्रयोज्यत्वेन लौकिकी, नापि पृथगुपयोगप्रयोज्यत्वेनालौकिकी, किन्तु विलक्षणैवेति न किञ्चिदनुपपन्नमनन्तधर्मात्मकवस्त्वभ्युपगमे । अत एव 'वस्तुसदृशो ज्ञाने ज्ञेयाकारपरिणाम' इति विलक्षणप्रामाण्याकारवादेऽपि न क्षतिः । एवञ्च प्रामाण्यस्य ज्ञप्तौ स्वत स्वमेवा प्रामाण्य स्य परतस्त्वमेवेति मुरा रिमिश्रम तस्य खण्डनं अनम्यासदशायामुभयोः परतस्त्व मम्यासदशाया स्वतस्त्वम् || Page #208 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सविवरण श्रीज्ञाना र्णव प्रकरणम् ॥ ॥९६॥ स्योपसंहारः, ज्ञप्तौ प्रामाभ्रमरजतनिमित्तो रजताकारः, संवृतशुक्त्याकारायाः समुपात्तरजताकारायाः शुक्तेरेव तत्रालम्बनत्वात्, प्रमायां तु रजतनिमित्त दाण्याप्रामाइत्याकारतथात्वस्य, परतास्वतोग्रहाभ्यां 'प्रामाण्याप्रामाण्ययोस्तदनेकान्त' इति प्राचां वाचामपि विमर्शः कान्त एवेति द्रष्टव्यम् । ण्ययोः स्व. न्यायाभियुक्ता अपि “यथाऽभावलौकिकप्रत्ययस्तद्धर्मस्य प्रतियोगितावच्छेदकत्वमवगाहमान एव तद्धर्मविशिष्टस्य प्रतियोगित्व- तस्त्वपरतमवगाहते, तथा ज्ञानलौकिकसाक्षात्कारोऽपि तद्धर्मस्य विशेष्यताद्यवच्छेदकत्वमवगाहमान एव तद्धर्मविशिष्टस्य विशेष्यतादि स्त्वानेकान्तकमवगाहत इति इदन्त्वविशिष्टस्यैव विशेष्यत्वमवगाहेत, इदन्त्वस्य विशेष्यतावच्छेदकत्वात्, न तु रजतत्वादिविशिष्टस्य, रजतत्वादेरतथात्वाद, इत्थं नियमस्तु लौकिके। तेनोपनयवशादलौकिकतादृशसाक्षात्कारेऽपि न क्षतिः" इति वदन्तो विनोपनयं अपायस्य प्राथमिकानुव्यवसायस्य प्रामाण्याग्राहकत्वमेवाहुः। यदेव च तेषामुपनयस्य कृत्यं तदेवास्माकमीहायाः साध्यमिति कृतं प्रसङ्गेन ।। निरूपण प्रकृतमनुसरामः। एताववग्रहहाख्यौ व्यापारांशी, ईहानन्तरमपाय: प्रवर्तते 'अयं घट एवेति,' अत्र चासत्यादिजनित तस्योत्तरक्षयोपशमवशेन यावानीहितो धर्मस्तावान् प्रकारीभवति, तेनैकत्रैव 'देवदत्तोऽयं ब्राह्मणोयं 'पाचकोऽयं' इत्यादिप्रत्ययभेदोपप विशेषाव. त्तिः। इत्थं च रूपविशेषान्मणिः पद्मराग इत्युपदेशोत्तरमपि तदाहितवासनावतो रूपविशेषाद् 'अनेन पद्मरागेण भवितव्यम्' इतीहो गमापेक्षया त्तरमेव 'अयं पद्मराग' इत्यपायो युज्यते, उक्तोपदेशः पद्मरागपदवाच्यत्वोपमितावेवोपयुज्यते । अयं पद्मराग इति तु सामान्यावग्रहे व्यावहारिहाक्रमेणैवेति नैयायिकानुयायिनः । घट इत्यपायोत्तरमपि यदा किमयं घटः सौवर्णो मातॊ वेत्यादिविशेषजिज्ञासा प्रवर्तते, *काथोंग्रहत्त्वतदा पाश्चात्यापायस्योत्तरविशेषावगमापेक्षया सामान्यालम्बनत्वाद्वयावहारिकावग्रहत्वं, ततः सौवर्ण एवायमित्यादिरपाया, तत्राप्युत्तरोत्तरविशेषजिज्ञासायां पाश्चात्यस्य पाश्चात्यस्य व्यावहारिकावग्रहत्वं द्रष्टव्यम् । जिज्ञासानिवृत्तौ त्वन्त्यविशेषज्ञानमवाय | प्रदर्शनम् ॥ ॥९६॥ KURES Page #209 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एवोच्यते नाऽवग्रहः, उपचारकारणामावात् । अयं फलांशः॥ कालमानं त्वस्यान्तर्मुहूर्तमेव, सौदामिनीसम्पातजनितप्रत्यक्षस्य मतिज्ञाननिचिरमननुवृत्तळभिचार इति चेत्, न, अन्तर्मुहूर्तस्यासङ्ख्यभेदत्वात्, अन्त्यविशेषावगमरूपापायोत्तरमावच्युतिरूपा धारणा रूपणे व्याप्रवर्तते, साप्यान्तमौहर्तिकी । अयं परिपाकांशः ॥ वासनास्मृती तु सर्वत्र विशेषावगमे द्रष्टव्ये । तदाह जिनभद्रगणिक्षमा- वहारिकाश्रमणः, सामनमित्तगहणं, णेच्छइओ समयमोग्गहो पढमो॥ तत्तोणंतरमीहिय-वत्थुविसेसस्स जोवाओ।।२८२॥सो पुणरहिावाया ऽवग्रहत्ववेरकाए ओग्गहोत्ति उवयरिओ ।। एस विसेसावेरकं, सामनं गिण्हए जेणं ॥२८३।। तत्तोणतरमीहा, तओ अवाओ अ तबिसे- मवायस्य, सस्स ॥ इह सामनविसेसा-वेरका जावंतिमो भेओ ॥ २८४॥ सन्चत्यहावाया, णिच्छयओ मोत्तुमाइसामन्त्रं ॥ संववहारत्थं प्रण, अविच्युतेरसव्वत्थावग्गहोवाओ ॥ २८५॥ तरतमजोगाभावे-वाओ चिय धारणा तदंतमि ।। सव्वत्थ वासणा पुण, भणिया कालन्तरे सई पायात्पार्थय॥२८॥" (ज्ञानार्णवप.५८-५९)ति ॥ न चाविच्युतेरपायावस्थानात्पार्थक्ये मानाभावा, विशेषजिज्ञासानिवृत्त्यवाच्छिमस्वरू क्य; मतिपस्य कथञ्चिद्धिमत्वाद, अवगृहामि, ईहे, अवैमि, स्थिरीकरोमीतिप्रत्यया एव च प्रतिप्राण्यनुभवसिद्धा अवग्रहादिभेदे प्रमाण, ज्ञाननिरूस्मृतिजनकतावच्छेदकत्वेनैव वाऽविच्युतित्वं धर्मविशेषः कल्प्यते, तत्तदुपेक्षान्यत्वस्य स्मृतिजनकतावच्छेदककोटप्रवेशे पणतःश्रुतमौरवादिति धर्मविशेषसिद्धौ धर्मिविशेषसिद्धिरित्यधिक मत्कृतज्ञानार्णवादवसेयम् ॥ तदेवं निरूपितं मतिज्ञानं ॥ ज्ञाननिरूप तनिरूपणेन च श्रुतज्ञानमपि निरूपितमेवादयोरन्योऽन्यानुगतत्वात्तथैव व्यवस्थापितत्वाच । अन्ये वोपाङ्गादिपरिज्ञान- १५मातिदेशः। मेव श्रुतज्ञानमन्पच मतिज्ञानमित्यनयोरपि भजनैव, यदुवाच वाचकचक्रवर्ती"एकादीन्येकस्मिन्माज्यानि वाचतुर्य इति" | IPI(वार्य ०१-३१) शब्दसंसृष्टार्थमात्रमादित्वेन श्रुतत्वे त्ववाहमात्रमेव मतिज्ञानं प्रसस्पेत,पारणोवरंससमानाकारश्रुतावश्य UCRECORECALC । Page #210 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रीज्ञान बिन्दु प्रकरणम् ॥ ॥ ९७ ॥ भभावकल्पनं तु स्ववासनामात्र विजृम्भितं, शब्दसंसृष्टाया मतेरेव श्रुतत्वपरिभाषणं तुं न पृथगुपयोगव्यापकमिति शाब्दज्ञानमेव भुतज्ञानं न त्वपरोक्षमिन्द्रियजन्यमपीत्याहुः । नव्यास्तु "श्रुतोपयोगो मत्युपयोगान्न पृथक्, मत्युपयोगेनैव तत्कार्योपपत्तौ तत्पार्थक्यकल्पनाया व्यर्थत्वात् । अत एव शब्दजन्यसामान्यज्ञानोत्तरं विशेषजिज्ञासायां तन्मूलकमत्यपायांशप्रवृत्तौ न पृथगवग्रहकल्पनागौरवं, शाब्दसामान्यज्ञानस्यैव तत्रावग्रहत्वात् । न चाशाब्दे शाब्दस्य तत्सामय्या वा प्रतिबन्धकत्वधौव्यान्नेयं कल्पना युक्तेति वाच्यम्, अशाब्दत्वस्य प्रतिबध्यतावच्छेदकत्वे प्रतियोगिकोटौ शब्दमूलमतिज्ञानस्यापि प्रवेशात्, अन्यथा श्रुताभ्यन्तरीभूतमतिज्ञानोच्छेदप्रसङ्गात् । किश्च शाब्दज्ञानरूपश्रुतस्यावग्रहादिक्रमवतो मतिज्ञानाद्भिन्नत्वोपगमेऽनुमानस्मृतितर्कप्रत्यभिज्ञानादीनामपि तथात्वं स्यादित्यतिप्रसङ्गः, सांव्यवहारिकप्रत्यक्षत्वाभावस्यापि तेषु तुल्यत्वात् । यदि चावग्रहादिभेदाः सांव्यवहारिक प्रत्यक्षरूपस्यैव मतिज्ञानस्य सूत्रे प्रोक्ता अनुमानादिकं तु परोक्षमतिज्ञानमर्थतः सिद्धमितीष्यते, तर्हि श्रुतशब्दव्यपदेश्यं शाब्दज्ञानमपि परोक्षमतिज्ञानमेवाङ्गीक्रियतां किमर्धजरतीयन्यायाश्रयणेन । मत्वा जानामि श्रुत्वा जानामीत्यनुभव एवानयोर्भेदोपपादक इति चेत्, न, अनुमाय जानामि स्मृत्वा जानामीत्यनुभवेनानुमानस्मृत्यादीनामपि भेदापत्तेः । अनुमितित्वादिकं मतित्वव्याप्यमेवेति यदीष्यते, शाब्दत्वमपि किं न तथा १ । मत्वा न जानामीति प्रतीतिस्तत्र बाधिकेति चेत्, न, वैशेषिकाणां नानुमिनोमीति प्रतीतेवि शाब्दे तस्या विशेषविषयत्वात् । नच निसर्गाधिगमसम्यक्त्वरूप कार्य भेदान्मतिश्रुतज्ञानरूपकारणभेद इत्यपि साम्प्रतम्, तत्र निसर्गपदेन स्वभावस्यैव ग्रहणात् । यद्वाचकः - ( प्रशमरति ) “शिक्षागमोपदेश - श्रवणान्ये कार्थिकान्यधिगमस्य । एकार्थः परिणामो, अवंति निसर्गः स्वभावश्च ॥ २२३ ॥ इति" । यत्रापि मतेः श्रुतभिन्नत्वेन ग्रहणं तत्र गोबलीवर्दन्याय एवाश्रयणीयः । तदिदमभिप्रेत्याह महा श्रुतज्ञाननिरूपणे श्रु तस्य मतिज्ञानादभि न्नत्वमेवेतिनव्यमतस्यो पदर्शनम् ॥ ।। ९७ ।। - Page #211 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वादी सिद्धसेनः(निश्चयद्वात्रिंशिका)"वैयर्थ्यातिप्रसङ्गाम्यां,न मत्यभ्यधिकं श्रुतम्।।१२।इति।" इत्याहुः॥इतिश्रतज्ञानम्।। "अवधिज्ञानत्वं रूपिंसमव्याप्यविषयताशालिज्ञानवृत्तिज्ञानत्वव्याप्यजातिमत्त्वम्।।" रूपिसमव्याप्यविषयताशालिज्ञान परमावधिज्ञानं "रूवगयं लहइ सव्वं" (गा.६८५) इतिवंचनाद तवृत्तिर्ज्ञानत्वव्याप्याजातिरवधित्वमवधिज्ञानमात्र इति लक्षणसमन्वयः समव्याप्यत्वमपहाय व्यापकत्वमात्रदाने जगद्व्यापकविषयताकस्य केवलस्य रूपिव्यापकविषयताकत्वं नियमात तवृत्तिकेवलत्वमादाय केवलज्ञानेऽतिव्याप्तिः, समव्याप्यत्वदाने त्वरूपिणि व्यभिचारात्केवलज्ञानविषयताया रूप्यव्याप्यत्वात्तन्निवृत्तिः।नच परमावधिज्ञानेऽप्यलोके लोकप्रमाणासङ्ख्यारूप्याकाशखण्डविषयतोपदर्शनादसम्भवः । यदि तावत्सु खण्डेषु रूपिद्रव्यं स्यात्तदा पश्येदिति प्रसङ्गापादन एव तदुपदर्शनतात्पर्यात् । न च तदंशे विषयबाधेन सूत्राप्रामाण्यं, स्वरूपबाधेऽपि शक्तिविशेषज्ञापनेन फलावाधात् । एतेनासद्भावस्थापना व्याख्याता बहिर्विषयताप्रसञ्जिका तारतम्येन शक्तिवृद्धिश्च लोकमध्य एव सूक्ष्मसूक्ष्मतरस्कन्धावगाहनफलवतीति न प्रसङ्गापादनवैयर्थ्यम् । यद्भाष्यं-"वढंतो पुण बाहिं, लोगत्थं चेव पासई दब्बं ॥ सुहमयरं सुहुमयरं, परमोही जाव परमाणु ॥ ६०६॥" इति । अलोके लोकप्रमाणासङ्ख्येयखण्डविषयतावधेरिति वचने विषयतापदं तर्कितरूप्यधिकरणताप्रसञ्जिततावदधिकरणकरूपिविषयतापरमिति न स्वरूपबाधोपीति तत्त्वम् । जातौ ज्ञानत्वव्याप्यत्वविशेषणं ज्ञानत्वमादाय मत्यादावतिव्याप्तिवारणार्थम् । न च संयमप्रत्ययावधिज्ञानमनःपर्यायज्ञानसाधारणजातिविशेषमादाय मनःपर्यायज्ञानेऽतिव्याप्तिः,अवधित्वेन साङ्कर्येण तादृशजात्यसिद्धेः। नच 'पुद्गला रूपिण' इति शाब्दबोधे रूपिसमव्याप्यविषयताकेऽतिव्याप्तिा, विषयतापदेन स्पष्टविशेषाकारग्रहणादिति सोपः ॥ इत्यवधिज्ञानप्ररूपणम् ॥ .. | अवविज्ञान निरूपण तत्रावधिज्ञानरूक्षणे विरोंषणानां व्यावृत्त्युपदर्शनम् ।। RECERE S Page #212 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रीज्ञान बिन्दु- प्रकरणम् ॥ ॥९८॥ अ KARLECTRIC "मनोमात्रसाक्षात्कारि मनःपर्यायज्ञानम्।" न च तादृशावधिज्ञानेऽतिव्याप्तिः,मनःसाक्षात्कारिणोऽवधेःस्कन्धान्तरस्यापि साक्षात्कारित्वेन तादृशावधिज्ञानासिद्धः। न च मनस्त्वपरिणतस्कन्धालोचितं बाह्यमप्यर्थ मनःपर्यायज्ञानं साक्षात्करोतीति तस्य मनोमात्रसाक्षात्कारित्वमसिद्धमिति वाच्यम्, मनोद्रव्यमात्रालम्बनतयैव तस्य धर्मिग्राहकमानसिद्धत्वात् , बाह्यार्थानां तु मनोद्रव्याणामेव तथारूपपरिणामान्यथानुपपत्तिप्रसूतानुमानत एव ग्रहणाभ्युपगमात्। आह च भाष्यकार:-" जाणइ बज्झेणुमाणेणं ति"(गा.८१४)वाह्यार्थानुमाननिमित्तकमेव हि तत्र मानसमचक्षुर्दर्शनमङ्गीक्रियते,यत्पुरस्कारेण सूत्रे मनोद्रव्याणि जानाति पश्यति चैतदिति व्यवडियते । एकरूपेऽपि ज्ञाने द्रव्याद्यपेक्षक्षयोपशमवैचित्र्येण सामान्यरूपमनोद्रव्याकारपरिच्छेदापेक्षया पश्यतीति, विशिष्टतरमनोद्रव्याकारपरिच्छेदापेक्षया च जानातीत्येवं वा व्याचक्षते । आपेक्षिकसामान्यज्ञानस्यापि व्यावहारिकावग्रहन्यायेन व्यावहारिकदर्शनरूपत्वात् । निश्चयतस्तु सर्वमपि तज्ज्ञानमेव, मनःपर्यायदर्शनानुपदेशादिति द्रष्टव्यम् । नव्यास्तु बाह्यार्थाकारानुमापकमनोद्रव्याकारग्राहकं ज्ञानमवधिविशेष एव, अप्रमत्तसंयमविशेषजन्यतावच्छेदकजातेरवधित्वव्याप्याया एवं कल्पनाधर्मि(कल्पनात)इति न्यायात्। इत्थं हि जानाति पश्यतीत्यत्र दृशेरवधिदर्शनविषयत्वेनैवोपपत्तो लक्षणाकल्पनगौरवमपि परिहृतं भवति । सूत्रे भेदाभिधानं च धर्मभेदाभिप्रायम् । यदि सङ्कल्पविकल्पपरिणतद्रव्यमात्रग्राह्यभेदात्तग्राहकं ज्ञानमतिरिक्तमित्यत्र निर्बन्धस्तदा द्वीन्द्रियादीनामपीष्टानिष्टप्रवृत्तिनिवृत्तिदर्शनात्तजनकसूक्ष्मसङ्कल्पजननपारणतद्रव्यावषयमपि मनःपर्यायज्ञानमभ्युपगन्तव्यं स्यात् ,चेष्टाहेतोरेव मनसस्तग्राह्यत्वात्। न च तेन द्वीन्द्रियादीनां समनस्कतापत्तिः, कपर्दिकासत्तया धनित्यस्येव,एकया गवा गोमवस्येव(वा),सक्ष्मेण मनसा समनस्कत्वस्यापादयितुमशक्यत्वात् , तदिदमभिप्रेत्योक्तं निश्चयद्वात्रिंशिकायां महाका मन:पर्यावज्ञाननिरूपणे तलक्षणेऽतिव्याप्त्यादिदोषोद्धारः, मनःपर्यायझानस्याक विज्ञानत्व मेवेतिनव्यमतस्योपदर्शनम् ॥ PAPER .॥९८॥ Page #213 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पर्यायवाद्यभिमताभ्युपगमे तु तत्र वस्तुसम्बन्धिवतमानप्रकारकत्वावान्छिताव्यसम्मेदेन RBACANCERSHe दिना-"प्रार्थनाप्रतिघाताभ्यां, चेष्टन्ते द्वीन्द्रियादयः॥ मनःपर्यायविज्ञानं, युक्तं तेषु न चान्यथा ॥१॥" इति । न चैवं ज्ञानस्य पञ्चविधत्वविभागोच्छेदादुत्सूत्रापत्तिा, व्यवहारतश्चतुर्विधत्वेनोक्ताया अपि भाषाया निश्चयतो द्वैविध्याभिधानवनपविवेकेनोत्सूत्राभावादिति दिक् (इत्याहुः) ॥ इतिमनःपर्यायज्ञानप्ररूपणम् ॥ "सर्वविषयं केवलज्ञानम् ॥"सर्वविषयत्वं च सामान्यधर्मानवच्छिन्ननिखिलधर्मप्रकारकत्वे सति निखिलधर्मिविषयत्वम् । प्रमेयवदिति ज्ञाने प्रमेयत्वेन निखिलधर्मप्रकारकेऽतिव्याप्तिवारणायानवच्छिन्नान्तं, केवलदर्शनेऽतिव्याप्तिवारणाय सत्यन्तं, विशेष्य| भागस्तु पर्यायवाद्यभिमतप्रतीत्यसमुत्पादरूपसन्तानविषयकनिखिलधर्मप्रकारकज्ञाननिरासार्थः । वस्तुतो" निखिल याकारवचं केवलज्ञानत्वं" केवलदर्शनाभ्युपगमे तु"तत्र निखिलदृश्याकारवचमेव",न तु निखिल याकारवचमिति नातिव्याप्तिान च प्रतिस्त्रं केवलज्ञाने केवलज्ञानान्तरवृत्तिस्वप्राकालविनष्टवस्तुसम्बन्धिवर्तमानत्वाद्याकाराभावादसम्भवः, स्वसमानकालीननिखिलज्ञेयाकारवखस्य विवक्षणात् । न च तथापि केवलज्ञानग्राह्ये आद्यक्षणवृत्तित्वप्रकारकत्वावच्छिन्नविशेष्यताया द्वितीयक्षणे नाशो, द्वितीयक्षणवृत्तित्वप्रकारकत्वावच्छिन्नविशेष्यतायाश्चोत्पादः, इत्थमेव ग्राह्यसामान्यविशेष्यताधौव्यसम्भेदेन केवलज्ञाने त्रैलक्षण्यमुपपादितमित्येकदा निखिलज्ञेयाकारवचासम्भव एवेति शङ्कनीयम् , समानकालीनत्वस्य क्षगगर्भत्वे दोषाभावात् , अस्तु वा निखिलज्ञेयाकारसक्रमयोग्यतावचमेव लक्षणं,प्रमाणं च तत्र'ज्ञानत्वमत्यन्तोत्कर्षववृत्ति, अत्यन्तापकर्षववृत्तित्वात,परिमाणत्ववद्' इत्याद्यनुमानमेव । न चाप्रयोजकत्वं ज्ञानतारतम्यस्य सर्वानुभवसिद्धत्वेन तद्विश्रान्तेरत्यन्तापकर्पोत्कर्षाभ्यां विनाऽसम्भवात् । न चेन्द्रियाश्रितज्ञानस्यैव तरतमभावदर्शनात्तत्रैवान्त्यप्रकर्षों युक्त इत्यपि शक्कनीयं, अतीन्द्रियेऽपि मनोज्ञाने शास्त्रार्थावधारणरूपे शास्त्रभावना- | WिR केवलज्ञान निरूपये तल्लक्षणाना मुपदर्शनं तत्रातिव्याप्त्यादिदोषोद्धार केवलज्ञाने प्रमाणोपदर्शनञ्च ॥ च तथापि केवलज्ञानग्रास इत्यमेव ग्राह्यसामान्यविशयगर्भवे दोपाभावात् पारमाणत्ववद्'इत्याद्य ASTRA Page #214 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बवान "९९॥ SARKARI केवलज्ञाननिरूपणे केवलज्ञानस्थ भावनाजन्यत्वे दोषोपदशकः प्रश्न: प्रकर्षजन्ये शास्त्रातिक्रान्तविषयेऽतीन्द्रियविषयसामर्थ्ययोगप्रवृत्तिसाधनेऽध्यात्मशास्त्रप्रसिद्धप्रातिभनामधेये च तरतमभावदर्शनात् । नन्वेवं भावनाजन्यमेव प्रातिभवत्केवलं प्राप्तं, तथा चाप्रमाणं स्यात् , कामातुरस्य सर्वदा कामिनीं भावयतो व्यवहितकामिनीसाक्षात्कारवद्भावनाजन्यज्ञानस्याप्रमाणत्वव्यवस्थितेः, अथ न भावनाजन्यत्वं तत्राप्रामाण्यप्रयोजकं, किंतु बाधितविषयत्वं, भावनानपेक्षेपि शुक्तिरजतादिभ्रमे बाधादेवाप्रामाण्यस्वीकारात् , प्रकृते च न विषयबाध इति नाप्रामाण्यं, न च व्यवहितकामिनीविभ्रमादौ दोषत्वेन भावनाया: क्लृप्तत्वातजन्यत्वेनास्याप्रामाण्यं, बाधितविषयत्ववदोषजन्यत्वस्यापि भ्रमत्वप्रयोजकत्वात, तथा चोक्तं मीमांसाभाष्यकारेण-'यस्य(त्र) च दुष्टं कारणं यत्रच मिथ्येत्यादिप्रत्ययः स एवाऽसमीचीनो नान्य इति । वार्तिककारेणाप्युक्तम-"तस्माद्बोधात्मकत्वेन,प्राप्ता बुद्धेः प्रमाणता।। अर्थान्यथात्वहेतूत्थ-दोषज्ञानादपोद्यते॥१॥इति"अत्र हि तुल्यवदेवाप्रामाण्यप्रयोजकद्वयमुक्तं, तस्माद्वाधाभावेऽपि दोषजन्यत्वादप्रामाण्यमिति वाच्यं, भावनायाः क्वचिद्दोषत्वेऽपि सर्वत्र दोषत्वानि | श्चयात् , अन्यथा शङ्खपीतत्वभ्रमकारणीभूतस्य पीतद्रव्यस्य स्वविषयकज्ञानेऽप्यप्रामाण्यप्रयोजकत्वं स्यादिति न किश्चिदेतत् , क्यचिदेव कश्चिदोष इत्येवागीकारात् , विषयबाधेनैव दोषजन्यत्वकल्पनाच्च, दुष्टकारणजन्यस्याप्यनुमानादेविषयाबाधेन प्रामाण्याभ्युपगमात्, अन्यथा परिभाषामात्रापत्तेः। मीमांसाभाष्यवार्तिककाराभ्यामपि बाधितविषयत्वव्याप्यत्वेनैव दुष्टकारणजन्यत्वस्याप्रामाण्यप्रयोजकत्वमुक्तं न स्वातन्त्र्येणेति चेत्,मैवम्, तथापि परोक्षज्ञानजन्यभावनाया अपरोक्षज्ञानजनकत्वासम्भवात् । न हि वहथनुमितिज्ञानं सहस्रकृत्व आवृत्तमपि वह्निसाक्षात्काराय कल्पते। न चाभ्यस्यमानं ज्ञानं परमप्रकर्षप्राप्तं तथा भविष्यतीत्यपि शङ्कनीयं, लङ्घनादकतापादिवदभ्यस्यमानस्यापि परमप्रकर्षायोगात् । न च लङ्घनस्यैकस्यावस्थितस्याभावादपरापरप्रयत्नस्य पूर्वपूर्वातिशयि ॥९९॥ Page #215 -------------------------------------------------------------------------- ________________ R R तलधनोत्पादन एवं व्यापाराधावल्लचयितव्यं तावनादावेव श्लेष्मादिना जाड्यात्कायो लङ्वायतुं शक्नोत्यभ्यासासादितश्लेष्मक्षयपटुभावश्चोत्तरकालं शक्नोतीति तत्र व्यवस्थितोत्कर्षता, उदकतापे त्वतिशयेन क्रियमाणे तदाश्रयस्यैव क्षयान तत्राप्यग्निरूपतापत्तिरूपोऽन्त्योत्कर्षः, विज्ञानं तु संस्काररूपं शास्त्रपरावर्तनाद्यन्यथानुपपत्योत्तरत्राप्यनुवर्तत इति तत्रापरापरयत्नानां सर्वेषामुपयोगादत्यन्तोत्कर्षों युक्त इति तद्वता भावनाज्ञानेनापरोक्षं केवलज्ञानं जन्यत इति टीकाकृदुक्तमपि विचारसहं, तस्य प्रमाणान्तरत्वापत्तेः, मनो यदसाधारणमिति' न्यायात,अन्यथा चक्षुरादिव्याप्तिज्ञानादिसहकृतस्य मनस एव सर्वत्र प्रामाण्यसम्भवे प्रमाणान्तरोच्छेदापत्तेः। चक्षुरादीनामेव(वा)साधारण्यात्प्रामाण्यमित्यभ्युपगमे भावनायामपि तथा वक्तुं शक्यत्वात् । एवञ्च परोक्षभावनाया अपरोक्षज्ञानजनकत्वं तस्या प्रमाणान्तरत्वं चान्यत्रादृष्टचरं कल्पनीयमिति महागौरवमिति चेद्,अनुक्तोपालम्भ एषः, प्रकृष्टभावनाजन्यत्वस्य केवलज्ञानेऽभ्युपगमवादेनैव टीकाकृतोक्तत्वात् । वस्तुतस्तु तज्जन्यात्प्रकृष्टादावरणक्षयादेव केवलज्ञानोत्पत्तिरित्येव सिद्धान्तात्(न्तः)। यैरपि योगजधर्मस्यातीन्द्रियज्ञानजनकत्वमभ्युपगम्यते,तैरपि प्रतिबन्धकपापक्षयस्य द्वारत्वमवश्यमाश्रयणीयम्, सति प्रतिबन्धके कारणस्याकिश्चित्करत्वात् ,केवलं तैर्योगजधर्मस्य मनःप्रत्यासत्तित्वं,तेन सन्निकर्षण निखिलजात्यंशे निरवच्छिन्नप्रकारताकज्ञाने षोडशपदार्थविषयकविलक्षणमानसज्ञाने वातत्त्वज्ञाननामधेये मनसः करणत्वं, चाक्षुषादिसामग्रीकाल इव लौकिकमानससामग्रीकालेऽपि तादृशतत्त्वज्ञानानुपपत्तेस्तत्त्वज्ञानाख्यमानसे तदितरमानससामग्र्याः प्रतिबन्धकत्वं, तत्त्वज्ञानरूपमानससामग्र्याश्च प्रणिधानरूपविजातीयमनःसंयोगघटितत्वं कल्पनीयमित्यनन्तमप्रामाणिककल्पनागौरखम् । अस्माकं तु दुरितक्षयमानं तत्र कारणमिति लाघवम् । अत एव इन्द्रियनोइन्द्रियज्ञानासाचिक्येन केवलमसहायमिति' प्राञ्चो व्याचक्षते । स चावरणाख्यदुरित केवलज्ञान निरूपणे उक्तमश्ने टोकाल्दुक्तैरपाकरणम्, उकतप्रश्नपति विधानम्, ISHIDARG SSORERA भावनाजन्यप्रकष्टावरणक्षयतः केवलोत्पत्ति व्यवस्थापनम् ॥ Page #216 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भीमान बिन्दु प्रकरणम्॥ ॥१०॥ क्षयोऽपि भावनातारतम्याचारतम्येनोपजायमानस्तदत्यन्तप्रकर्षादत्यन्तप्रकर्षमनुभवतीति किमनुपपन्नम् । तदाहाकलकोऽपि-"दो-13 निरूपणे र पावरणयोर्हानि-निःशेषास्त्यतिशायनात् ॥ क्वचिद्यथा स्वहेतुभ्यो, बहिरन्तर्मलक्षय इति ॥१॥" न च निम्बाद्यौषधोपयोगाचरतम - आवरणाख्य भावापचीयमानस्यापि श्लेष्मणो नात्यन्तिकक्षय इति व्यभिचारः, तत्र निम्बाद्यौषधोपयोगोत्कर्षनिष्ठाया एपापादायतुमशक्यत्वात, दुरितक्षयातदुपयोगेऽपि श्लेष्मपुष्टिकारणानामपि तदेवासेवनात् , अन्यथौषधोपयोगाधारस्यैव विनाशप्रसङ्गाव, चिकित्साशास्त्रं द्युद्रिक्तधातु- त्यन्तिकत्वे दोषसाम्यमुद्दिश्य प्रवर्तते, न तु तस्य निर्मूलनाशं, अन्यतरदोषात्यन्तक्षयस्य मरणाऽविनाभावित्वादिति द्रष्टव्यम् । रागावावरणापाये समन्तभद्रसर्वज्ञज्ञानं वैशद्यभाग्भवतीत्यत्र च न विवादो रजोनीहाराघावरणापाये वृक्षादिज्ञाने तथा दर्शनात् । न च रागादीनां कथमावर संवादः णत्वं, कुड्यादीनामेव पौद्गलिकानां तथात्वदर्शनादिति वाच्यम् , कुड्यादीनामपि प्रातिभादावनावारकत्वात् , ज्ञानविशेषे तेषामावर रागादीन णत्ववच्चातीन्द्रियज्ञाने रागादीनामपि तथात्वमन्वयव्यतिरेकाभ्यामेव सिद्धम् । रागाद्यपचये योगिनामतीन्द्रियानुभवसम्भवात्पौरलिकत्वमपि द्रव्यकर्मानुगमेन तेषां नासिद्धम् । स्वविषयग्रहणक्षमस्य ज्ञानस्य तदग्राहकताया विशिष्टद्रव्यसम्बन्धपूर्वकत्वानियमात्पी- त्वं तेषांकतहृत्पूरपुरुषज्ञाने तथादर्शनादिति ध्येयम्।वार्हस्पत्यास्तु-"रागादयो न लोभादिकर्मोदयनिवन्धनाः, किंतु ककादिप्रकातहतुका। | फादिहेतुकतथाहि, कफहेतुको रागः, पित्तहेतुको द्वेषा, वातहेतुकश्च मोहः । कफादयश्च सदैव सन्निहिताः, शरीरस्य तदात्मकत्वात् , ततो १५ त्वस्य प्रतिन सार्वज्ञमूलवीतरागत्वसम्भव" इत्याहुः। तदयुक्तम् , रागादीनां व्यभिचारेग ककादिहेतुकवायोगात् , दृश्यते हि वातप्रकृते क्षेपः॥ रपि रागद्वेषौ, कफप्रकृतेरपि द्वेषमोहौ, पित्तप्रकृतेरपि मोहरागाविति । एकैकस्याः प्रकृतेः पृथक सर्वदोषजननशक्त्युपगमे च सर्वेषां समरागादिमत्त्वप्रसङ्गात् । न च स्वस्वयोग्यक्रमिकरागादिदोषजनककफाद्यवान्तरपरिणतिविशेषस्य प्रतिप्राणि कल्पनानायं दोष D१००। तत्रावरण Page #217 -------------------------------------------------------------------------- ________________ RE इति वाच्यम्, तदवान्तरबैजात्यावच्छिन्नहेतुगवेषणायामपि कर्मण्येव विश्रामात् । किं चाभ्यासजनितप्रसरत्वात्प्रतिसंख्याननिवर्तनीयत्वाच्च न कफादिहेतुकत्वं रागादीनाम् । एतेन 'शुक्रोपचयहेतुक एव रागो नान्यहेतुक इत्याद्यपि चिरस्तम्, अत्यन्तस्त्रीसेवापरस्य क्षीणशुक्रस्यापि गगोद्रेकदर्शनात, शुक्रोपचयस्य सर्वस्त्रीसाधारणामिलापजनकत्वेन कस्यचित् कस्याश्चिदेव रागोद्रेक इत्यस्यानुपत्तश्चेप। न चासाधारण्ये रूपमेव हेतुः, तद्रहितायामपि कस्यचिद्रागदर्शनात् । न च तत्रोपचार एव हेतुः, द्वयेनापि विमुक्तायां रागदर्शनात् । तस्मादभ्यासदर्शनजनितोपचयपरिपाकं कर्मैव विचित्रस्वभावतया तदा तदा तत्तत्कारणापेक्षं तत्र तत्र रागादिहेतुरिति प्रतिपत्तव्यम् । एतेन 'पृथिव्यम्बुभ्यस्त्वे रागः, तेजोवायुभूयस्त्वे द्वेषा, जलवायुभूयस्त्वे मोह इत्यादयोऽपि प्रलापा निरस्ताः, तस्य विषयविशेषापक्षपातित्वादिति दिक । कर्मभृतानांरागादीनां सम्यग्ज्ञानक्रियाभ्यां क्षयेण वीतरागत्वं सर्वज्ञत्वं चानाविलमेव। शौद्धोदनीयास्तु-"नैरात्म्यादिभावनैव रागादिक्लेशहानिहेतु:, नैरात्म्यावगतावेवात्मात्मीयाभिनिवेशाभावेन रागद्वेवोच्छेदात संसारमूलनिवृत्तिसम्भवात,आत्मावगतौ च तस्य नित्यत्वेन तत्रस्नेहाचन्मूलतृष्णादिना क्लेशानिवृत्तेः।। तदुक्तम्-"य:पश्यत्यात्मानं,तत्रा| स्याहमिति शाश्वतः स्नेहः।। स्नेहात्सुखेषु तृष्यति,तृष्णा दोपांस्तिरस्कुरुते ॥११॥ गुणदर्शी परितृप्य-त्यात्मनि तत्साधनान्युपादत्त ॥ तेनात्माभिनिवेशो, यावत्तावच्च संसारः॥२॥ इति"। ननु यद्येवमात्मा न विद्यते, किंतु पूर्वापरक्षगाटतानुसन्धाना: पूर्वहेतुप्रतिबद्धा ज्ञानक्षणा एव तथा तथोत्पद्यन्त इत्यम्युपगमस्तदा परमार्थतो न कश्चिदुपकार्योपकारकस्वभाव इति कथाच्यते "भगवान् सुगतः करुणयासकलसत्त्वोपकाराय देशनां कृतवान्" इति,क्षणिकत्वमपि यद्येकान्तेन, तर्हि तत्ववेदी क्षणोऽनन्तरं विनष्टः सन्न कदाचनाप्यहं भयो भविष्यामीति जानानः किमर्थ मोक्षाय यतत इति?,अत्रोच्यते-"भगवान् हि प्राचीनावस्थायां सकलमपि जगदःखितं SHARE SECRECISAKAL केवलज्ञाननिरूपणे शु कोपचवादीनां रागादिहेतुत्कपतिक्षेप -- राम्यादिभावनाया रागादिक्षयहेितुत्वमिति बौद्धभतोपक्रमः॥ तसम्भवात्, आत्मावगतात.तष्णा दोपास्तिरस्कृत तु पूर्वापरबगाटतानुसार भगवान् R - Page #218 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भज्ञान बिन्दुप्रकरणम् ।। ॥ १०१ ॥ पश्यंस्तदुद्दिधीर्षया नैरात्म्य क्षणिकत्वादिकमवगच्छमपि तेषामुपकार्यसश्वानां निष्क्लेशक्षणोत्पादनाय प्रयतते, ततो जातसकलजगत्साक्षात्कारः समुत्पन्न केवलज्ञानः पूर्वाहितकृपा विशेषसंस्कारात् कृतार्थोऽपि देशनायां प्रवर्तते, अधिगततत्तात्पर्यार्थाश्च स्वसन्ततिगत विशिष्टक्षणोत्पत्तये मुमुक्षवः प्रवर्तन्ते, " इति न किमप्यनुपपन्नमित्याहुः ''तदखिलमज्ञानविलसितम् । आत्माभावे बन्धमोक्षा'काधिकरणत्वायोगात् । न च सन्तानापेक्षया समाधिः, तस्यापि क्षणानतिरेके एकत्वासिद्धेः, एकत्वे चन्द्रव्यस्यैव नामान्तरत्वात् सजातीयक्षणप्रबन्धरूपे सन्ताने च न कारकव्यापार इति समीचीनं मुमुक्षुप्रवृत्त्युपपादनम् । अथाक्लिष्टक्षणेऽक्लिष्टक्षणत्वेनोपादानत्वमिि सजातीयक्षणप्रबन्धेोपपत्तिः, बुद्धदेशितमार्गे तु तत्प्रयोजकत्वज्ञानादेव प्रवृत्तिरिति चेत्, न, एकान्तवादेऽनेन रूपेण निमित्तत्वमनेन रूपेण चोपादानत्वमिति विभागस्यैव दुर्वचत्वात् । अक्लिष्टक्षणेऽक्लिष्टक्षणत्वेनैवोपादानत्वे आद्याक्लिष्टक्षणस्यानुत्पत्तिप्रसङ्गादन्त्य - क्लिष्टक्षणसाधारणस्य हेतुतावच्छेदकस्य कल्पने च क्लिष्टक्षणजन्यतावच्छेदकेन साङ्कर्याञ्जन्यजनकक्षणप्रबन्धकोटावेकैकक्षण शपरित्यागयोर्विनिगमकाभावाच्च । एतेन ' इतरव्यावृत्त्या शक्तिविशेषेण वा जनकत्वम्' इत्यप्यपास्तम् । न चैतदनन्तरमहमुत्पन्न. मेतस्य चाहं जनकमित्यवगच्छति क्षणरूपं ज्ञानमिति न भवन्मते कार्यकारणभावः, नापि तदवगमः, ततो याचितकमण्डनमेतदेकसन्ततिपतितत्वादेकाधिकरणं बन्धमोक्षादिकमिति । एतेन ' उपादेयोपादानक्षणानां परस्परं वास्यवासक भावादुत्तरोत्तरविशिष्टविशिष्टतरक्षणोत्पत्तेः मुक्तिसम्भव' इत्यप्यपास्तम्, युगपद्भाविनामेव तिलकुसुमादीनां वास्यवासकभावदर्शनात् । उक्तञ्च - " वास्यवासकयोश्चैव-मसाहित्यान्न वासना ॥ पूर्वक्षणैरनुत्पन्नो, वास्यते नोत्तरक्षणः ॥ १ ॥ इति" । कल्पित शुद्धक्षणैकसन्तानार्थितयैव मोक्षो पाये सौगतानां प्रवृत्तिः, तदर्थैव च सुगतदेशनेत्य म्युपगमे च तेषां मिथ्यादृष्टित्वं, तत्कल्पितमोक्षस्य च मिध्यात्वं स्फुटमेव, अधिकं प्रवे केवलज्ञान निरूपणे निरुक्तबौद्ध मतस्य खण्ड नं, बौद्धमते आत्माऽभावे बन्धमोक्षैकाधिकर ण्यासम्भवः कार्यकारण भावाद्यसम्भ वश्व | ९ ॥ १०१ ॥ Page #219 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अ AKASHA लतायाम् । एतेन ' अखण्डाद्वयानन्दकरसनमज्ञानमेव केवलज्ञान, तत एव चाविद्यानिवृत्तिरूपमोक्षाधिगम' इति वेदान्तिमतमपि निरस्तम्, तादृशविषयाभावेन तज्ज्ञानस्य मिथ्यात्वात्, कीदृशं च ब्रह्मज्ञानमज्ञाननिवर्तकमभ्युपेयं देवानांप्रियेण, न केवलचैतन्यं,तस्य सर्वदा सत्त्वेनाविद्याया नित्यनिवृचिप्रसङ्गात् ततश्च तन्मलसंसारोपलन्ध्यसम्भवात्सर्वशास्त्रानारम्भप्रसगादनुभवविरोधाच, नापि वृत्तिरूपं, वृत्तः सत्यत्वे तत्कारणान्त:करणाविद्यादेरपि सत्त्वस्यावश्यकत्वेन तया तन्निवृत्तेरशक्यतया सर्ववेदान्तार्थविप्लवापत्तेः, मिथ्यात्वे च कथमज्ञाननिवर्तकता । न हि मिथ्याज्ञानमज्ञाननिवर्तकं दृष्टम्, स्वमज्ञानस्यापि तत्त्वप्रसगात् । न च "सत्यस्यैव चैतन्यस्य प्रमाणजन्यापरोक्षान्तःकरणवृत्त्यभिव्यक्तस्याज्ञाननिवर्तकत्वाद्वृत्तेश्च कारणतावच्छेदकत्वेन दण्डत्वादिवदन्यथासिद्धत्वेन कारणत्वानङ्गीकारात् , अवच्छेदकस्य कल्पितत्वेऽप्यवच्छेद्यस्य वास्तवत्वं न विहन्यते, यद्रजतत्वेन भातं तच्छुक्तिद्रव्यमितिवद, तार्किकैरप्याकाशस्य शब्दग्राहकत्वे कर्णशष्कुलीसम्बन्धस्य कल्पितस्यैवावच्छेदकत्वाङ्गीकारात्, संयोगमात्रस्य निरखयवे नभसि सर्वात्मना सत्त्वेनातिप्रसञ्जकत्वात् । मीमांसकैश्च कल्पितइस्वत्वदीर्घत्वादिसंसर्गावच्छिन्नानामेव वर्णानां यथार्थज्ञानजनकत्वोपगमाद्ध्वनिधर्माणां ध्वनिगतत्वेनैव भानात् , वर्णानां च विभूनामानुपूर्वीविशेषाज्ञानादतिप्रसङ्गात , वर्णनिष्ठत्वेन इस्वत्वादिकल्पनस्य तेषामावश्यकत्वात् , तद्वदस्माकमपि कल्पितावच्छेदकोपगमे को दोष" इति मधुसूदनंतपस्विनोऽपि वचनं विचारसह, मिथ्यादृग्दृष्टान्तस्य सम्यग्दृशां ग्रहणानौचित्यात् , नैयायिकमीमांसकोक्तस्थलेपि अनन्तधर्मात्मकैकवस्तुस्वीकारे कल्पितावच्छेदककृतविडम्बनाया अप्रसरात,विस्तरेणोपपादितं चैतत्सम्मतिवृत्तौ । न चोक्तरीत्या वृत्तेरवच्छेदकत्वमपि युक्तं,प्रतियोगितयाज्ञाननिवृत्तौ सामानाधिकरण्येन समानविशेष्यकसमानप्रकारकवृत्तरेव त्वन्मते हेतुत्वस्य युक्तत्वात्। अत एव SARKABRAHARASHRESI केवलज्ञाननिरूपणे ब| ह्मज्ञानलक्ष णकेवलज्ञानस्याविद्यानिवृत्तिलक्षणमोक्षहेतुत्वमितिवेदा. न्तिमतस्य खण्डनं,तत्रमधुसूदनोकेरपाकरण Page #220 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रीज्ञान बिन्दु प्रकरणम् ॥ ॥१०२ RECRACK स्वयमुक्तं तपस्विना सिद्धान्तविन्दौ-'द्विविधमावरणं, एकमसचापादकमन्तःकरणावच्छिन्नसाक्षिनिष्ठ, अन्यदभानापादकं विष- केवलझानयावच्छिन्नब्रह्मचैतन्यनिष्ठ, घटमहं न जानामीत्युभयावच्छेदानुभवाद्, आद्यं परोक्षापरोक्षसाधारणप्रमामात्रेण निवर्तते, अनुमितेऽपि निरूपणे नास्तीति प्रतीत्यनुदयात् , द्वितीयं तु साक्षात्कारेणैव निवर्तते, यदाश्रयं यदाकारं ज्ञानं तदाश्रयं तदाकारमज्ञानं नाशयतीति वयादौ वेदान्तिमत. नियमाद्' इत्यादि, तत्किमिदानी क्षुत्क्षामकुक्षेः सद्य एव विस्मृतं ? येनोक्तवृत्तेरवच्छेदकत्वेनान्यथासिद्धिमाह, एवं हि घटादावपि १४ खण्डने मधुदण्डविशिष्टाकाशत्वेनैव हेतुतां वदतो वदनं का पिदध्यात् ?, अनयैव भिया "चैतन्यनिष्ठायाः प्रमाणजन्यापरोक्षान्तःकरणवृत्तरेवा सूदनोक्तके ज्ञाननाशकत्वाङ्गीकारेऽपि न दोषः, पारमार्थिकसत्ताभावेऽपि व्यावहारिकसत्ताङ्गीकारात्। न च स्वमादिवन्मिथ्यात्वापतिः, स्व | दान्तप्रक्रिरूपतो मिथ्यात्वस्याप्रयोजकत्वात, विषयतो मिथ्यात्वस्य च बाधाभावादसिद्धे, धूमभ्रमजन्यवह्वयनुमितेरप्यबाधितविषयतयाऽ मयाया अपाप्रामाण्यानङ्गीकाराच्च,कल्पितेनापि प्रतिविम्बेन वास्तवविम्बानुमानप्रामाण्याच्च,स्वमार्थस्याप्यरिष्टादिसूचकत्वाच्च क्वचित्तदुपलब्ध. करणम् ॥ मन्त्रादेर्जागरेऽप्यनुवृत्तेरवाधाचेति" तपस्विनोक्तमिति चेत्,एतदप्यविचाररमणीयम्,त्वन्मते स्वप्नजागरयोर्व्यवहाराविशेषस्यापि कर्तुमशक्यत्वात्, बाधाभावेन ब्रह्मण इव घटादेरपि परमार्थसचस्याप्रत्यूहत्वाच, प्रपञ्चासत्यत्वे बन्धमोक्षादेरपि तथात्वेन व्यवहारमूल एव कुठारदानात् । एतेन 'अज्ञाननिष्ठाः परमार्थव्यवहारप्रतिभाससच्चप्रतत्यिनुकूलास्तिस्रः शक्तयः कल्प्यन्ते, आद्यया प्रपञ्चे पारमार्थिकसत्त्वप्रतीतिः, अत एव नैयायिकादीनां तथाभ्युपगमः, सा च श्रवणाद्यभ्यासपरिपाकेन निवर्तते, ततो द्वितीयया शक्त्या व्यावहारिकसचं प्रपञ्चस्य प्रतीयते, वेदान्तश्रवणादभ्यासवन्तो हि नेम प्रपञ्चं पारमार्थिकं पश्यन्ति,किंतु व्यावहारिकमिति,सा च तस्वसाक्षात्कारेण निवर्तते, ततस्तृतीयया शक्त्या प्रातिमासिकसत्चप्रतीतिः क्रियते,सा चान्तिमतत्वबोधेन सह निव- P॥१० ॥ Page #221 -------------------------------------------------------------------------- ________________ PORAN तते,पूर्वपूर्वशक्तरुत्तरोत्तरशक्तिकार्यप्रतिबन्धकत्वाचन युगपत्कार्यत्रयप्रसङ्गा,तथा चैतदभिप्राया श्रुतिः-"तस्यामिध्यानाद् यो- IPाकेवलज्ञानजनात्तत्वभावाद्भ्यश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिरित"।अस्या अयमय-"तस्प परमात्मनः,अभिमुखायानाच्छणाम्यासपरि- निरूपणे पाकादिति यावत्, विश्वमायाया विश्वारम्भकाविद्याया निवृत्तिः, आद्यशक्तिनाशेन विशिष्टनाशाह, युज्यतेऽनेनेति योजनं तत्व- वेदान्तिमतज्ञानं तस्मादपि विश्वमायानिवृत्तिः, द्वितीयशक्तिनाशेन विशिष्टनाशाद, तत्त्वभावो विदेहकैवल्यमन्तिमः साक्षात्कार इति यावत्, खण्डने, तत्र तस्मादन्ते प्रारब्धक्षये सह तृतीयशक्या विश्वमायानिवृत्तिः,अभिध्यानयोजनाम्यां शक्तिद्वयनाशेन विशिष्टनाशापेक्षया भूय:- दृष्टिस्टष्टिवाशब्दोऽभ्यासार्थक इति इत्यादि"निरस्तम्,अभिध्यानादेःप्रागपरमार्थपदादौ परमार्थसचादिप्रतीत्यभ्युपगमेऽन्ययाख्यात्यापातात् । दमाशक्य न च तत्तच्छक्तिविशिष्टाज्ञानेन परमार्थसचादि जनयित्वैव प्रत्याय्यत इति नायं दोष इति वाच्यम्, साक्षात्कृततत्त्वस्य न किमपि नव्यवेदावस्त्वज्ञातमिति प्रातिभासिकसचोत्पादनस्थानाभावात्, ब्रह्माकारवृत्या ब्रह्मविषयवाज्ञानस्य नाशिता, तृतीयशक्तिविशिष्ट न्त्युपेक्षि. त्वज्ञानं यावत्प्रारब्धमनुवर्तत एवेति ब्रह्मातिरिक्तविषये प्रातिमासिकसचोत्पादनादविरोध इति चेत्, न, धर्मसिद्धयसिद्विभ्यां तत्वेन खव्याघातात् , विशेषोपरागेणाज्ञाते तदुपगमे च ब्रह्मण्यपि प्रातिमासिकमेव सचं स्यात् , तत्वज्ञे कस्यचिदज्ञानस्य स्थितौ विदेह- ण्डितवान्। कैवल्येऽपि तदवस्थितिशङ्कया सर्वाज्ञानानिवृत्तौ मुक्तावनाश्वासप्रसङ्गाच्च । अथ दृष्टिसृष्टिवादे नेयमनुपपत्तिा,तन्मते हि वस्तु. सद् ब्रह्मैव, प्रपञ्चश्च प्रातिभासिक एव, तस्य चाभियानादेः प्राक् पारमार्षिकसचादिना प्रतिभासः पारमार्थिकसदाद्याकारज्ञाना - भ्युपगमादेव सूपपाद इति चेत्, न, तस्य प्राचीनोपगतस्य सौगतमतप्रायत्वेन नव्यैपक्षिवत्वाद, व्यवहारवादस्यैव तैराहतत्वात् , व्यवहारवादे च व्यावहारिकं प्रपञ्च प्रातिमासिकत्वेन प्रतीपता तयज्ञानिनामत्पन्तभ्रान्तत्वं दुर्निवारमेव । अथ व्यावहारकस्याप RECG Page #222 -------------------------------------------------------------------------- ________________ माज्ञानबिन्दु ॥१.३॥ SARKARISHABAD प्रपञ्चस्य तत्वज्ञानेन बाधितस्यापि प्रारब्धवशेन बाधितानुवृत्या प्रतिभासः तृतीयस्याः शक्तः कार्यम्, तेन बाधितानुवृत्त्या प्रतिमासानुकूला तृतीया शक्तिः प्रातिमासिकसत्वसम्पादनपटीयसी शक्तिरुच्यते, सा चान्तिमतत्त्वबोधेन निवर्तत इत्येवमदोष इति चेत्, न, बाधितं हि त्वन्मते नाशितं, तस्यानुवृत्तिरिति वदतो व्याघातात् । बाधितत्वेन बाधितत्वावच्छिन्नसत्या वा प्रतिभासस्तत्व:ज्ञप्रारम्धकार्यमिति चेत्,तृतीया शक्तिर्व्यर्था, यावद्विशेषाणां बाधितत्वे तेषां तथाप्रतिभासस्य सार्वज्ञाभ्युपगम विनानुपपत्तेश्व, द्वितीय शक्तिविशिष्टाज्ञाननाशात् सहितकर्म तत्कार्य च नश्यति, ततस्तृतीयशच्या प्रारम्धकार्ये दग्धरज्जुस्थानीया बाधितावस्था जन्यते, इयमेव बाधितानुवृत्तिरिति चेत्,न,एवं सति घटपटादौ तत्त्वज्ञस्य न बाधितसवधीः, न वा व्यावहारिकपारमार्थिकसत्त्वधीरिति तत्र किञ्चिदन्यदेव कल्पनीयं स्यात,तथा च लोकशास्त्रविरोध इति सुष्ठतं हरिभद्राचार्यैः-(घोडशक १६) "अग्निजलभूमयो यत्,परितापकरा भवेऽनुभवसिद्धाः ॥रागादयश्च रौद्रा, असत्प्रवृत्यास्पदं लोके ॥८॥ परिकल्पिता यदि ततो, न सन्ति तस्वेन कथममी स्युरिति ॥ परिकल्पिते च तत्त्वे, भवभवविगमौ कथं युक्तौ ॥ ९॥ इत्यादि । तस्माद्वृत्तेर्व्यावहारिकसचयापि न निस्तारः । प्रपञ्चे परमार्थदृष्टयेव व्यवहारदृष्टयापि सत्तान्तरानवगाहनादिति स्मर्तव्यम्। किं च "सप्रकारं निष्प्रकार वा ब्रह्मज्ञानमज्ञाननिवर्तकमिति वक्तव्यं, आये निष्प्रकारे ब्रह्मणि सप्रकारकज्ञानस्यायथार्थत्वाबाजाननिवर्तकता, तस्य यथार्थत्वे वा नाद्वैतसिद्धिः, द्वितीयपक्षस्तु निष्प्रकारकज्ञानस्य कुत्राप्यज्ञाननिवर्तकत्वादर्शनादेवानुद्भावनाहः।। "किं च निष्प्रकारकज्ञानस्य कुत्राप्यज्ञाननिवर्तकत्वं न दृष्टमिति शुद्धब्रह्मज्ञानमात्रात्कथमज्ञाननिवृत्तिः, न च सामान्यधर्ममात्राप्रकारकसमानविषयप्रमात्वमज्ञाननिवृत्तौ प्रयोजक, अत्र प्रमेयमिति ज्ञानेऽतिव्याप्तिवारणाय सामान्येति, प्रमेयो घट इत्यादावव्याप्तिवारणाय मात्रेति, तेनेदं विशेषप्रकारे निष्प्रकारे केवलज्ञाननिरूपणे वेदान्तिमनखण्डने तत्त्वज्ञानानन्तरं मायानवत्तेः खण्डने, तत्र लोकशास्त्रविरोधे ह. रिभद्रसूरिसंवादो ब. ह्मज्ञानस्याज्ञाननिवर्तकत्वासम्भवश्च ॥ P॥ १०३ ॥ Page #223 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चानुगतमिति निष्प्रकारक ब्रह्मज्ञानस्यापि ब्रह्माज्ञाननिवर्तकत्वं लक्षणान्वयात् । न च सामान्यधर्ममात्रप्रकारकज्ञानेऽव्याप्तिः, इदमनिदं वा, प्रमेयमप्रमेयं वेत्यादिसंशयादर्शनेन ( संशयाद्यदर्शनात्सामान्यमात्रप्रकारकाऽज्ञानानङ्गीकारेण ) तदनिवर्तकस्य तस्यासङ्ग्रहादिति वाच्यम्, निष्प्रकार कसंशयाभावेन निष्प्रकारकाज्ञानासिद्धया निष्प्रकारक ब्रह्मज्ञानस्यापि तन्निवर्तकत्वायोगात्, एकत्र धर्मिणि प्रकाराणामनन्तत्वे प्रकारनिष्ठतया निरखच्छिन्नप्रकारतासम्बन्धेनाधिष्ठानप्रमात्वेन तया तदज्ञाननिवर्त कत्वौचित्यात् । अधिष्ठानत्वं च भ्रमजनकाज्ञानविषयत्वं वाऽज्ञानविषयत्वं वाऽखण्डेोपाधिर्वा १, न च विषयतयैव तवं युक्तम्, प्रमेयत्वस्य च केवलान्वयिनोऽनङ्गीकारान्न प्रमेयमिति ज्ञानादू घटाद्याकाराज्ञाननिवृत्तिप्रसङ्ग इति वाच्यम्, द्रव्यमिति ज्ञानात्तदापत्तरवारणात् । न च तस्य द्रव्यत्वविशिष्टविषयत्वेऽपि घटत्वविशिष्टाविषयत्वात्तद्वारणं, द्रव्यत्वविशिष्टस्यैव घटावच्छेदेन घटत्वविशिष्टत्वात्, सच्वविशिष्टब्रह्मवत् विशिष्टविषयज्ञानेन विशिष्टविषयाज्ञाननिवृत्यभ्युपगमेऽपि च ब्रह्मणः सच्चिदानन्दत्वादिधर्मवैशिष्टयप्रसङ्गः । एतेन " अन्यत्र घटाज्ञानत्वघटत्वप्रकारकप्रमात्वादिना नाश्यनाशकभावेऽपि प्रकृते ब्रह्माज्ञाननिवृत्तित्वेन ब्रह्मप्रमात्वेनैव कार्यकारणभावः, न तु ब्रह्मत्वप्रकार के तिविशेषणमुपादेयं गौरवादनुपयोगाद्विरोधाच्च " इत्यपि निरस्तम्, विशिष्टब्रह्मण एव संशयेन विशिष्टाज्ञान निवृत्यर्थं विशेषोपरागेणैव ब्रह्मज्ञानस्यान्वेषणीयत्वात्, शुक्तिरजतादिस्थले - पि विशिष्टाज्ञानविषयस्यैवाधिष्ठानत्वं क्लृप्तमित्यत्राप्ययं न्यायोऽनुसर्तव्यः । किं च ब्रह्मणो निर्धर्मकत्वे तत्र विषयताया अप्यनुपपत्वाद्वषयज्ञानत्वमपि तत्र दुर्लभं विषयता हि कर्मतेति तदङ्गीकारे तस्य क्रियाफलशालित्वेन घटादिवज्जडत्वापत्तेः, तद्विषयज्ञानाजनकत्वे व तत्र वेदान्तानां प्रामाण्यानुपपत्तिः । न च तदज्ञान निवर्तकतामात्रेण तद्विषयत्वोपचारः, अन्योऽन्याश्रयात् । केवलज्ञाननिरूपणे वे दान्तिमत खण्डने तत्र ब्रह्मज्ञानस्या ज्ञाननिर्वत्त कत्वासम्भ वे ब्रह्मणो ज्ञानविषय त्वासम्भवीपपादनम् ॥ Page #224 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बीज्ञान VA न च कल्पिता विषयता कर्मत्वाप्रयोजिका, वास्तवविषयतायाः कुत्राप्यनङ्गीकाराव्यावहारक्याश्च तुल्यत्वात् । न च ब्रह्मणि ज्ञान विषयताऽसम्भवेऽपि ज्ञाने ब्रह्मविषयता तद्विम्बग्राहकत्वरूपाज्या वा काचिदनिर्वचनीया सम्भवतीति नानुपपत्तिः, विषयतैवाकार प्रकरणम्॥ प्रतिविषयं विलक्षणः, अत एव ब्रह्माकारापरोक्षप्रमाया एवाज्ञाननिवर्तकत्वं, अज्ञानविषयस्वरूपाकारापराक्ष मात्वस्य सर्वत्रानुग॥१०४॥6 तत्वात् । न चेदमित्याकारं घटाकारमिति शकितुमपि शक्यं, आकारभदेस्य स्फुरतरसाक्षिप्रत्यक्षासिद्ध त्वादिति वाच्यम्, ज्ञाननिष्ठाया अपि ब्रह्मविषयताया ब्रह्मनिरूपितत्वस्यावश्यकत्वेन ब्रह्मणि तनिरूपकत्वधर्मसत्वे निर्धर्मकत्वव्याघातात, उभयनिरूप्यस्य विषयविषयिभावस्यैकधर्मत्वेन निर्वाहायोगात् । न च ब्रह्मग्यपि कल्पितविषयतोपगमे कर्मत्वेन न जडत्वापात:, स्वसमानसत्ताकविषयताया एव कर्मत्वापादकत्वात्, घटादौ हि विषयता स्वसमानसताका, द्वयोरपि व्यावहारकबाद, ब्रह्मणि तु परमार्थसति व्यावहारिकी विषयता न तथेति स्फुटमेव वैषम्यादिति वाच्यम्, सत्ताया इव विषयताया अपि ब्रह्मणि पारमार्थिकत्वोक्तावपि बाधकाभावात्, परमार्थनिरूपितधर्मस्य व्यावहारिके व्यावहारिकत्ववव्यावहारिकनिरूपितस्य धर्मस्य पारमार्थिक पारमार्थिकताया अपि न्यायप्राप्तत्वात् । सत्ताद्युपलक्षणभेदेऽप्युपलक्ष्यमेकमेवेति न दोष इति चेद्, विषयतायामप्येष एव न्यायः । एवं चानन्तधर्मात्मकधर्म्यभेदेऽपि ब्रह्मणि कौटस्थ्यं द्रव्यार्थादेशादव्याहतमेव । तथा चान्यूनानतिरिक्तधर्मात्मद्रव्यस्वभावलाभलक्षणमोक्षगुणेन भगवन्तं तुष्टाव स्तुतिकारः(सिद्धसेनद्वात्रिंशिका ४) "भवबीजमनन्तमुज्झितं, विमलज्ञानमनन्तमार्जितम् ॥ न च हीनकलोऽसि नाधिका, समतां चाप्यतिवृत्य वर्तसे ॥ २९ ॥ इति"। एतेन "चैतन्यविषयतैव जडत्वापादिका, न तु P वृत्तिविषयतापि, “यतो वाचो निवर्तन्ते," "न चक्षुषा गृह्यते, नापि वाचा," "तं त्वौपनिषदं पुरुष पृच्छामि" "नावेदविन्मनुते तं केवलज्ञाननिरूपणे वेदान्तिमतखण्डने बह्मज्ञानस्याज्ञाननिवर्त्त कत्वास५ म्भवे ज्ञाने ब्रह्मनिरूप| तविषयत्वा भावव्यवस्थापनं द्र | व्यादेशाद ब्रह्मकौटस्थ्ये | सिद्धसेनमूरिसंवादः॥ REP ॥१० ॥ Page #225 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बृहन्तं वेदेनैव यद्वेदितव्यम्" इत्याद्युभयविधश्रुत्य नुसारेणेत्थं कल्पनात् "फलव्याप्यत्वमेवास्य, शास्त्रकृद्भिर्निवारितम् ।।" ब्रह्मण्यज्ञाननाशाय, वृत्तिव्याप्तिरपेक्षिता ॥ १ ॥ " इति कारिकायामपि फलपदं चैतन्यमात्रपरमेव द्रष्टव्यं प्रमाणजन्यान्तःकरणवृत्यभिव्यक्तचैतन्यस्य शास्त्रे फलत्वेन व्यवह्रियमाणस्य ग्रहणे तद्वयाप्यताया अन्वयव्यतिरेकाभ्यां जडत्वापादकत्वे ब्रह्मण इव साक्षिभास्यानामपि जडत्वानापतेः, चैतन्यकर्मता तु चिद्भिनत्वावच्छेदेन सर्वत्रैवेति सैव जडत्वप्रयोजिका, न च वृत्तिविषयत्वेऽपि चैतन्यविषयत्वं नियतं वृत्तेश्चिदाकारगर्भिण्या एवोत्पत्तेः, तदुक्तम्- "वियद्वस्तुस्वभावानुरोधादेव न कारणात् || वियत्सम्पूर्णतोत्पत्तौ कुम्भस्यैवं द(दृ)शा धियाम् ||१|| घटदुःखादिहेतुत्वं धियो धर्मादिहेतुतः । स्वतः सिद्धार्थसम्बोध-व्याप्तिर्वस्त्वनुरोधतः ॥२॥ इति,” तथा च जडत्वं दुर्निवारमिति वाच्यम्, वृच्युपरक्तचैतन्यस्थ स्वत एव चैतन्यरूपत्वेन तद्वयाप्यत्वाभावात् फले फलान्तरानुत्पत्तेस्तद्भिन्नानां तु स्वतो मानरहितानां तद्वयाप्तेरवश्याश्रयणीयत्वाद् इत्यादि" मधुसूदनाक्तमप्यपास्तम्, वृचिविषयताया अपि निर्धर्म के ब्रह्मण्यसम्भवात्, कल्पितविषयतायाः स्वीकारे च कल्पितप्रकारताया अपि स्वीकारापत्तेः, उभयोरपि ज्ञानभासक साक्षिभास्यत्वेन चैतन्यानुपरञ्जकत्वाविशेषात्, ज्ञानस्य स्वविषयानिवर्तकत्वेन प्रकारानिवृत्तिप्रसङ्गभयस्य च विषयताद्यानिवृत्तिपक्ष इव धर्मधर्मिणोर्जात्यन्तरात्मकभेदाभेदसम्बन्धाश्रयणेनैव सुपरिहरत्वात्, कृतान्तकोपस्त्वेकान्तवादिनामुपरि कदापि न निवर्तत इति तत्र कः प्रतिकारः । यदि च दृग्विषयत्वं ब्रह्मणि न वास्तवं, तदा सकृद्दर्शनमात्रेणात्मनि घटादाविव हगपगमे ऽपि द्रष्टृत्वं कदापि नापैतीत्यु (त्याद्युक्तं न युज्यते । तथा च "सकृत्प्रत्ययमात्रेण, घटश्रेद्भासते तदा । स्वप्रकाशोऽयमात्मा किं, घटवच्च न भासते ॥ १ ॥ स्वप्रकाशतया किं ते, तद्बुद्धिस्तव वेदनम् ॥ बुद्धिश्र क्षणनाश्येति, चोद्यं तुल्यं घटादिषु ||२|| घटादौ निश्चिते बुद्धिर्नश्यत्येव यदा घटः ।। केवलज्ञान निरूपणे वेदान्तिमतखण्डने ब्रह्म णि पञ्चदशीवचनतो वृ त्तिविपयत्व व्यवस्थापि काया मधु सूदनो के खण्डनम् ॥ Page #226 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मौज्ञानबिन्दु प्रकरणम्। ॥ १०५ ॥ (इ)ष्टी नेतुं तदाशक्य, इति चेत्सममात्मनि ॥३॥ निश्चित्य सकृदात्मानं, यदापेक्षा तदैव तम् ।। वक्तुं मन्तुं तथा ध्यातुं शक्रोत्येव हि तत्त्ववित्॥४॥ उपासक इव ध्यायें - लौकिकं विस्मरेद्यदि । विस्मरत्येव सा ध्याना-द्विस्मृतिर्न तु वेदनात् ॥ २५ ॥ इत्यादि ध्यानदीपवचनं विप्लवेतेति विमतिविस्तरेण । तस्माद्ब्रह्मविषया ब्रह्माकारा वा वृत्तिरविवेचितसारैव । कथञ्चास्या निवृत्तिरिति वक्तव्यं, स्वकारणाज्ञाननाशादिति चेत्, अज्ञाननाशक्षण इवावस्थितस्य विनश्यदवस्थाज्ञानजनितस्य वा दृश्यस्य चिरमप्यनुवृत्तौ मुक्तावनाश्वासः । उक्त प्रमाविशेषत्वेन निवर्तकता दृश्यत्वेन च निवर्त्यतेति दृश्यत्वेन रूपेणाविद्यया सह स्वनिवर्त्यत्वेऽपि न दोषः, निवर्त्यतानिवर्तकतयोरवच्छेदकैक्य एव क्षणभङ्गापत्तेरिति चेत्, प्रमाया अप्रमां प्रत्येव निवर्तकत्वदर्शनेन दृश्यत्वस्य निवर्त्यताऽनवच्छेदकत्वात् । न च ज्ञानस्याज्ञाननाशक तापि प्रमाणसिद्धा, अन्यथा स्वमाद्यध्यास कारणीभूतस्याज्ञानस्य जागरादिप्रमाणज्ञानेन निवृत्तौ पुनः स्वमाध्यासानुपपत्तिः, तत्रानेकाज्ञान स्वीकारे स्वात्मन्यपि तथासम्भवेन मुक्तावनाश्वासः, मूलाज्ञानस्यैव विचित्रानेकशक्तिस्व । कारादेकशक्तिनाशेऽपि शक्त्यन्तरेण स्वभान्तरादीनां पुनरावृत्तिः सम्भवति, सर्वशक्तिमतो मूलाज्ञानस्यैव निवृत्तौ तु कारणान्तरासम्भवात्, द्वितीयस्य च तादृशस्यानङ्गीकारान्न प्रपञ्चस्य पुनरुत्पत्तिरिति तु स्ववासनामात्रं, चरमज्ञानं वा मूलाज्ञाननाशकं क्षणविशेषो वेत्यत्र विनिगमकाभावादनन्तोत्तरोत्तरशक्तिकार्येष्वनन्त पूर्वपूर्वशक्तीनां प्रतिबन्धकत्वस्य, चरमशक्तिकार्ये चरमशक्तेः, तन्नाशे च चरमज्ञानस्य हेतुत्वकल्पने महागौरवात्, पूर्वशक्तिनाश इव चरमशक्तिनाशेऽपि पण्डमूलाज्ञानानुवृस्यापत्यनुद्वाराच्चेति न किश्चिदेतत् । एतेन "जागरादिभ्रमेण स्वमादिभ्रमतिरोधानमात्रं क्रियते, सर्पभ्रमेण रज्ज्वां धाराभ्रमतिरोधानवत्, अज्ञाननिवृत्तिस्तु ब्रह्मात्मैक्यविज्ञानादेव” इत्यपि निरस्तम् । एवं सति ज्ञानस्याज्ञान निवर्तकतायां प्रमाणानुपलब्धेस्तनिवृत्तिमूलमोक्षानाश्वासाद् माभूदुदाह केवलज्ञाननिरूपणे वेदान्तिमत खण्डने बह्माकारवृत्ति नाशकख ण्डने ज्ञान स्याज्ञाननाशकत्व खण्डनम् ॥ ।। १०५ ।। Page #227 -------------------------------------------------------------------------- ________________ CER RASHAKAKARॐ केकलज्ञानरणोपलम्मा,श्रुतिः श्रुतार्थापत्तिचैतदर्थे प्रमाणतामवगाहेते एव । तत्र श्रुतिस्तावत्-"तमेव विदित्वातिमृत्युमेति"मृत्युरविद्येति निरूपणे शाने प्रसिद्धं,तथा"तत्त्वभावाद्भ्यश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः"स्मृतिश्च-(गीता अ०७) देवी ह्येषा गुणमयी,मममाया दुरत्यया। वेदान्तिममामेव ये प्रपद्यन्ते, मायामेतां तरन्ति ते॥१४॥ (अ०५)ज्ञानेन तु तदज्ञानं, येषां नाशितमात्मनः॥ तेषामादित्यवज्ज्ञानं, प्रकाशयति तखण्डने तत्परम् ॥१६॥" इत्यादि । एवं "ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति" "तरति शोकमात्मवित्," "तरत्यविद्या वितता हृदि यस्मिन्निवेशिते ।। ज्ञानस्याज्ञायोगी मायाममेयाय,तस्मै ज्ञानात्मने नमः॥१॥"इति “अविद्यायाः परं पारं तारयसि" इत्यादिः, श्रुतार्थापत्तिश्च-"ब्रह्मज्ञानाद् ननिवर्तकत्वे ब्रह्मभावः श्रयमाणस्तद्वयवधायकाज्ञाननिवृत्तिमन्तरेण नोपपद्यत इति ज्ञानादज्ञाननिवृत्तिं गमयति"। " अनृतेन हि प्रत्यूढाः" प्रमाणतया "नीहारेण प्रावृताः,"अन्ययुष्माकमन्तरं," (गीताअ०५) "अज्ञानेनावृतं ज्ञानं,तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥१५॥" इत्यादिश्रुतिस्मृ- | वेदान्त्युपद तिशतेभ्योऽज्ञानमेव मोक्षव्यवधायकत्वेनावगतम्, एकस्यैव तत्त्वज्ञानेनाज्ञाननिवृत्त्यभ्युपगमाच्च, नान्यत्र व्यभिचारदर्शनेन ज्ञान- | शितयोःश्रुP स्याज्ञानीनवर्तकत्वबाधोऽपीति चेत्, न, एतस्यैकजीवमुक्तिवादस्य श्रद्धामात्रशरणत्वात्, अन्यथा जीवान्तरप्रातभासस्य स्वामिक- तिश्रुतार्थाप जी वान्तरप्रीतभासवद्विभ्रमत्वे जीवप्रतिभासमात्रस्यैव तथात्वं स्यादिति चार्वाकमतसाम्राज्यमेव वेदान्तिना प्राप्तं स्यात् । उक्तश्रु- त्योरेकनोवतयस्तु कर्मण एव व्यवधायकत्वं क्षीणकर्मात्मन एव च ब्रह्मभूयं प्रतिपादयितुमुत्सहन्त इति किं शशशृङ्गसहोदराज्ञानादिकल्पनया है वादखण्डनेतदभिप्रायविडम्बनेन । निर्विकल्पकब्रह्मबोधोऽपि शुद्धद्रव्यनयादेशतामेवावलम्बताम्, सर्वपर्यायनयविषयव्युत्क्रम एव तत्प्रवृत्तेः, न जैनेष्टकन तु सर्वथा जगदभावपक्षपातितामिति सम्यग्दृशांवचनोद्गारः ॥ शाब्द एव स इत्यत्र तु नाग्रहः, यावत्पर्यायोपरागासम्भववि- मंगतमुक्तिचारसहकृतेन मनसैव तद्ग्रहसम्भवात्, न केवलमात्मनि, किं तु सर्वत्रैव द्रव्ये पर्यायोपरागानुपपचिप्रसूतविचारे मनसा निर्विकल्पक | व्यवधायक. परतयानवनम् ॥ ARTHA KISARG Page #228 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रीज्ञान विन्दु प्रकरणम्॥ ॥१०६॥ D SECRUAEOSUGAUR केवलज्ञान निरूपणे एव प्रत्ययोऽनुभूयते ।उक्तंचसम्मतौ-"पज्जवणयवुकंतवत्यू दव्वट्ठियस्स वत्तव्वं ॥जाव दविओवओगो अपच्छिमवियप्पनिव्व- वेदान्तिमतयणो ॥१-८॥ इति"। पर्यायनयेन व्युत्क्रान्तं गृहीत्वा विचारेण मुक्तं, वस्तुद्रव्यार्थिकस्य वक्तव्यं, यथा घटो द्रव्यमित्यत्र खण्डने निघटत्वविशिष्टस्य परिच्छिन्नस्य द्रव्यत्वविशिष्टेनापरिच्छिन्नेन सहाभेदान्वयासम्भव इति मृदेव द्रव्यमिति द्रव्यार्थिकप्रवृत्तिः, तत्रापि विकल्पकबसूक्ष्मक्षिकायामपरापरद्रव्यार्थिकप्रवृत्तियविद्रव्योपयोगः, न विद्यते पश्चिमे उतरे विकल्पनिर्वचने सविकल्पकधीव्यवहारौ ह्मबोधस्य यत्र स तथा शुद्धसङ्ग्रहावसान इति यावत, ततः परं विकल्पाचनाप्रवृते इत्येतस्या अर्थः।। "तचमसि" इत्यादावप्यात्मनस्त- |शुद्धद्रव्यनतदन्यद्रव्यपर्यायोपरागासम्भव विचारशतप्रवृत्तावेव शुद्धद्रव्यविषयं निर्विकल्पकमिति शुद्धदृष्टौ घटज्ञानाद्रमज्ञानस्य को भेदः । यादेशतासएकत्र सदद्वैतमपरत्र च ज्ञानाद्वैतं विषय इत्येतावति भेदे त्वौत्तरकालिक सविकल्पकमेव साक्षीति सविकल्पकाविकल्पकत्वयोर- ४ामर्थनेसाक्षि. प्यनेकान्त एव श्रेयान् । तदुक्तम्-" सविअप्पणिधिअप्पं, इय पुरिसं जो भगेज अविअप्पं ॥ सविअप्पमेव वा णि-छएण ण तयादर्शिता स णिच्छिओ समए ॥१-३५॥ इति"।न च निर्विकल्पको द्रव्योपयोगोऽवग्रह एवेति तत्र विचारसहकृतमनोजन्यत्वानुपपत्तिः, है यास्सम्मविचारस्येहात्मकत्वेनहाजन्यस्य व्युपरताकाङ्क्षस्य तस्य नैश्वीयकापायरूपस्यैवाम्धुपगमात्, अपाये नामजात्यादियोजनानि तिगाथाया यमस्तु शुद्धद्रव्यादेशरूपश्रुतनिश्रितातिरिक्त एवेति विभावनीयं स्व समयनिष्णातैः। ब्रह्माकारबोधस्य मानसत्वे "नावेदवि अर्थः, निर्वि कल्पकदव्योन्मनुते तं बृहतं वेदेनैव तद्वेदितव्यं" "तं त्वौपनिषदं पुरुष पृच्छामि"इत्यादिश्रुतिविरोध इति चेत्, शाब्दत्वेऽपि “यद्वाचानम्यू. पयोगस्य दितं," "नचक्षुषा गृह्यते, नापि वाचा," "यतो वाचो निवर्तन्ते" इत्यादिश्रुतिविरोधस्तुल्प एव । अथ वाग्गम्यत्वनिषेधश्रुतीनां मानसत्वमुख्यवृत्त्याविषयत्वावगाहित्वेनोपपत्ति हदजहालवणयैव ब्रह्मणि महावाक्पगम्यत्वप्रतिपादनात्, मनसि तु मुख्यामुख्यभदाभावात् ५ समर्थनश्च॥ RAME Page #229 -------------------------------------------------------------------------- ________________ UPSECRECRUAROUGH " यन्मनसा न मनुते " इत्यादिविरोध एव ॥ " सर्वे वेदा यत्रैकं भवन्ति स मानसीन आत्मा मनसैवानुद्रष्टव्यः " इत्यादि. श्रुती मानसीनत्वं तु मनस्युपाधावुपलभ्यमानत्वं, न तु मनोजन्यसाक्षात्कारत्व, मनसैवेति तु कर्तरि तृतीया आत्मनोऽकर्तृत्वप्रतिपादनार्था मनसो दर्शनकर्तृत्वमाह, न करणतां, औपनिषदसमाख्याविरोधात् । “कामः सङ्कल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरधृतिहींर्धा रित्येतत्सर्व मन एव"इति श्रुती मृद्घट इतिवदुपादानकारणत्वेन मनःसामानाधिकरण्यप्रतिपादनात , तस्य निमित्तकारणत्वविरोधाचेति चेत्, न, कामादीनां मनोधर्मत्वप्रतिपादिकायाः श्रुतेर्मनःपरिणतात्मलक्षणभावमनाविषयताया एव न्याय्यत्वात्, "मनसा ह्येव पश्यति, मनसा शृणोति" इत्यादौ मनःकरणस्यापि श्रुतेर्दीर्घकालिकसंज्ञानरूपदर्शनग्रहणेन चक्षुरादिकरणसत्त्वेऽपि तत्रैवकारार्थान्वयोपपत्तेः, वन्मतेऽपि ब्रह्मणि मानसत्वविधिनिषेधयोवृत्तिविषयत्वतदुपरक्तचैतन्याविषयत्वाभ्यामुपपत्तेश्च । शब्दस्य त्वपरोक्षज्ञानजनकत्वे स्वभावमङ्गप्रसङ्ग एव स्पष्टं दूषणम् । नच प्रथमं परोक्षज्ञानं जनयतोऽपि शब्दस्य विचारसहकारेण पश्चादपरोक्षज्ञानजनकत्वमिति न दोष इति वाच्यम्, अर्धजरतीयन्यायापातात् । न खलु शब्दस्य परोक्षज्ञानजननस्वाभाव्यं सहकारिसहस्रेणाप्यन्यथाकतुं शक्यं, आगन्तुकस्य स्वभावत्वानुपपत्तेन च संस्कारसहकारेण चक्षुषा प्रत्यभिज्ञानात्मकप्रत्यक्षजननवदुपपत्तिः, यदंशे संस्कारसापेक्षत्वं तदंशे स्मृतित्वापातो यदंशे च चक्षुःसापेक्षत्वं तदंशे प्रत्यक्षापात इति मियैव प्रत्यभिज्ञानस्य प्रमाणान्तरत्वमिति जैनैः स्वीकारात् । “स्वे स्वे विषये युगपज्ज्ञानं जनयतोश्चक्षुःसंस्कारयोरार्थसमाजे. नैकज्ञानजनकत्वमेव पर्यवस्यति, अन्यथा रजतसंस्कारसहकारणासनिकृष्टेऽपि रजते चाक्षुषज्ञानापत्तेरन्यथाख्यात्यस्वीकारभङ्गप्रसग" इति वदस्तपस्वी तूमयात्मकैकज्ञानाननुव्यवसायादेव निराकर्तव्या,अन्यथा रजतप्रमेऽप्युभयात्मकतापत्ते,पर्वतो वहिमा केवलज्ञान निरूपणे ॐ वेदान्तिमत खण्डने ब्रह्मज्ञानस्य न मानसत्वं किन्तु शाब्दत्वमेवेति वेदान्तिप्रश्नपतिविधाने तस्य मानसत्वस्थापनं शब्दस्य परोक्षज्ञानजनकत्वमेवेति स्थापनश्च। दशे स्मृतिमा उपपत्तेः । न च त्वमिति जैन RECE Page #230 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रीज्ञानबिन्दु प्रकरणस् । ॥ १०७ ॥ नित्यनुमितावपि उभयसमाजादंशे प्रत्यक्षानुमित्यात्मकतापत्तेश्च । अथ मनस इव शब्दस्य परोक्षापरोक्षज्ञानजनन स्वभावाङ्गीकाराददोषः, मनस्त्वेन परोक्षज्ञानजनकता, इन्द्रियत्वेन चापरोक्षज्ञानजनकतेत्यस्ति मनस्यवच्छेदकभेद इति चेत्, शब्दस्यापि विषयाजन्यज्ञानजनकत्वेन वा ज्ञानजनकत्वेन वा परोक्षज्ञानजनकता योग्यपदार्थनिरूपितत्वम्पदार्थाभेदपरशब्दत्वेन चापरोक्षज्ञानजनकतेति कथं नावच्छेदकभेदः । धार्मिकस्त्वमसीत्यादौ व्यभिचारवारणाय निरूपितान्तं विशेषणं, इतरव्यावर्त्य तु स्पष्टमेव । एतच्च ' दशमस्त्वमसि ' 'राजा त्वमसि' इत्यादिवाक्याद्दशमोऽहमस्मि राजाहमस्मीत्यादिसाक्षात्कार दर्शनात्कल्प्यते, नाहं दशम इत्यादिभ्रमनिवृत्तरत इत्थमेव सम्भवात् । साक्षात्कारिभ्रमे साक्षात्कारिविरोधिज्ञानत्वेनैव विरोधित्वकल्पनात् । न च तत्र वाक्यात्पदार्थमात्रोपस्थितौ मानसः संसर्गबोध इति वाच्यम्, सर्वत्र वाक्ये तथा वक्तुं शक्यत्वेन शब्दप्रमाणमात्रोच्छेदप्रसङ्गादिति चेत्, मैवम्, दशमस्त्वमसीत्यादौ वाक्यात्परोक्षज्ञानानन्तरं मानसज्ञानान्तरस्यैव भ्रमनिवर्तकत्वकल्पनात्, धार्मिकस्त्वमसीत्यादौ विशेष्यांशस्य योग्यत्वादेव योग्यपदार्थनिरूपितेत्यत्र योग्यपदार्थतावच्छेदकविशिष्टेत्यस्यावश्यवाच्यत्वेन महावाक्यादपि तत्पदार्थतावच्छेदकस्यायोग्यत्वेना परोक्षज्ञानासम्भवाच्च, अयोग्यांशत्यागयोग्यांशोपादानाभिमुख लक्षणावस्त्वमेव योग्यपदार्थत्वमित्युक्तौ च धार्मिकस्त्वमसीत्यादावपि शुद्धापरोक्षविषयत्वे तद्वयावर्तकविशेषणदानानुपपत्तिः, तथा च योग्यलक्ष्य परत्वग्रहे उदाहरणस्थान दौर्लभ्यं । अयं च विषयोऽस्माकं पर्यायविनिर्मोकेण शुद्धद्रव्यविषयतापर्यवसायकस्य द्रव्यनयस्येत्यलं ब्रह्मवादेन ॥ किञ्च त्वम्पदार्थाभेदपरशब्दत्वेनापरोक्षज्ञानजनकत्वोक्तौ 'यूयं राजान' इत्यतोऽखिलसम्बोध्यविशेष्यकराजत्वप्रकारकापरोक्षशाब्दापत्तिः, तत्र तादृशमानसाभ्युपगमे चान्यत्र को पराधः । एतेन " एकवचनान्तत्वम्पदार्थग्रहणेऽपि न निस्तारः, "एकस्मिन्नेव ॥ केवलज्ञाननिरूपणे वेदान्तिम तखण्डने पु नह्मापरो क्षज्ञानजन कत्वस्य श न्दे व्यवस्था पनपक्षे वेदा न्त्याशङ्को |न्मूलिता || 11 200911 Page #231 -------------------------------------------------------------------------- ________________ केवलज्ञानत्यमिति प्रयोगेजगतेच, एकाभिप्रायकत्वम्पदब्रहणे च तदमित्रायकभन्दत्वेन वचच्छाब्दबोधहेतुत्वमेव युक्तम् । अत एव 'वाक्यादपि निरूपणे द्रव्यादेशादखण्डः,पदादपि च पर्यायार्थादेशात् सखण्डः शान्दबोध' इति जैनी शास्त्रव्यवस्था । तस्मात्र शब्दस्यापरोक्ष-६ वेदान्तिमतज्ञानजनकत्वम् । एतेन अपरोक्षपदार्थामेदपरशब्दत्वेनापरोक्षज्ञानजनकत्वं,अत एव शुक्तिरियमिति वाक्यादाहत्य रजतभ्रमनिवृत्तिः, | खण्डनेऽपएवं च चैतन्यस्य वास्तवापरोक्षत्वादपरोक्षज्ञानजनकत्वं महावाक्यस्य" इत्यपि निरस्तम्, वास्तवापरोक्षस्वरूपविषयत्वस्य त्वन्नीत्या रोक्षाभेदपरतत्त्वमस्यादिवाक्ये सम्भवेऽपि 'दशमस्त्वमसि'इत्यादावसम्भवाद, निवृत्ाज्ञानविषयत्वस्य च शाब्दबोधात्पूर्वमभावात् यदा कदाचि त्वेन प्रमात्रभिवृत्ताज्ञानत्वग्रहणे पर्वतो वद्धिमानित्यादिवाक्यानामप्यपरोक्षस्वरूपविषयतयाऽपरोक्षज्ञानजनकत्वप्रसङ्गात् " यतो वा इमानि भेदविषयत्वेभूतानि जायन्ते" "सत्यं ज्ञानमनन्तं" इत्यादिवाक्यानामपरोक्षस्वरूपविषयतयाऽपरोक्षज्ञानजनकत्वे महावाक्यवैयापाताच ॥ न च शब्दकिश्चैवं घटोऽस्तीतिशाब्दे चाक्षुषत्वमप्यापतेव,अपरोक्षपदार्थाभेदपरशब्दादिवापरोक्षपक्षसाध्यकानुमितिसामग्रीतोऽपरोक्षानुमितिरपि स्यापरोक्षच प्रसज्येत । एवं च भिन्नविषयत्वाद्यप्रवेशेनैवानुमितिसामग्र्या लाघवादलवत्त्वमिति विशेषदर्शनकालीनभ्रमसंशयोत्तरप्रत्यक्षमा ज्ञानजनकत्रोच्छेद इति बहुतरं दुर्घटम् । एतेन"प्रमात्रभेदविषयत्वेनापरोक्षज्ञानजनकत्वम्" इत्यपि निरस्तम्, 'सर्वज्ञत्वादिविशिष्टोऽसि'इत्यादि त्वमितितवाक्यादपि तथाप्रसङ्गात् , ईश्वरो मदभिन्नः, चेतनत्वाद्, मद्, इत्यनुमानादपि तथाप्रसङ्गाच्चेति । "महावाक्यजन्यमपरोक्षं त्पश्नपतिशुद्धब्रह्मविषयमेव केवलज्ञानम्" इति वेदान्तिनां महानेव मिथ्यात्वाभिनिवेश इति विभावनीयं सूरि(सुधी)भिः॥ विधानं वेइदमिदानी निरूप्यते-केवलज्ञानं स्वसमानाधिकरणकेवलदर्शनसमानकालीनं न वा,''केवलज्ञानक्षणत्वं स्वसमानाधि दान्तिमतकरणदर्शनक्षणाव्यवहितोत्तरत्वव्याप्यं न वा ? ' एवमाद्याः क्रमोपयोगवादिनां जिनभद्रगणिक्षमाश्रमणपूज्यपादानां, खण्डनसमाप्तिः॥ la BASTI Page #232 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मीज्ञान विन्दु प्रकरणम्॥ ॥१०८॥ जिनभद्रगणि MOS *नां योगपद्य RECORECARE IY केवलज्ञान दर्शनयोंमें दाभेदविचारे युगपदुपयोगवादिनां च मल्लवादिप्रभृतीनां, 'यदेव केवलज्ञानं तदेव केवलदर्शनम्' इतिवादिनां च महावादिश्रीसिद्धसे. भेदेपिक्रमनदिवाकराणां साधारण्यो विप्रतिपत्तयः॥ यत्तु युगपदुपयोगवादितं सिद्धसेनाचार्याणां नन्दिवृत्तायुक्तं तदम्युपग | वादि पूज्य मवादाभिप्रायेण, न तु स्वतन्त्रसिद्धान्ताभिप्रायेण, क्रमाक्रमोपयोगद्वयपर्यनुयोगानन्तरमेव स्वपक्षस्य सम्मतावुभावितत्वा- 15 दिति द्रष्टव्यम् । एतच्च तत्त्वं सयुक्तिकं सम्मतिगाथाभिरेव प्रदर्शयाम:-"मणपज्जवनाणंतो, नाणस्स य दरिसणस्स य क्षमाश्रमणाविसेसो।।केवलनाणं पुणदं-सणंति नाणंति य समाण।।काण्ड२-३॥"युगपदुपयोगद्वयाभ्युपगमवादोऽयम्-मन:पर्यायज्ञानमन्तः पर्यवसानं यस्य स तथा, ज्ञानस्य दर्शनस्य च विश्लेषः पृथग्भाव इति साध्यम्।अत्र च छद्मस्थोपयोगत्वं हेतुर्द्रष्टव्या, वादिमल्ल तथा च प्रयोगः-चक्षुरचक्षुरवधिज्ञानानि चक्षुरचक्षुरवधिदर्शनेभ्यः पृथकालानि, छमस्थोपयोगात्मकज्ञानत्वातू, श्रुतमन:- || वादिप्रभृ. पर्यायज्ञानवत् । वाक्यार्थविषये श्रुतज्ञाने, मनोद्रव्यविशेषालम्बने मनःपर्यायज्ञाने चादर्शनस्वभावे मत्यधिजादर्शनोपयोगा- *तोनाम्, अनिकालत्वं प्रसिद्धमेवेति टीकाकृतः । दर्शनत्रयपृथकालत्वस्य कुत्राप्येकस्मिन्नसिसाधयिषितत्वात् , स्वदर्शनपृथकाल त्वस्य च | भेद एवं सिसाधयिषितस्योक्तदृष्टान्तयोरभावात्सावरणत्वं हेतुः, व्यतिरेकी च प्रयोगः, तजन्यत्वं वा हेतुः, 'यद्यजन्यं तत्ततः पृथकालम्' || तयोरितिइति सामान्यव्याप्तौ यथा दण्डात् घट इति च दृष्टान्त इति तु युक्तं, केवलज्ञानं पुनर्देशनं दर्शनोपयोग इति वा ज्ञानं ज्ञानो- | तदैक्यवादि सिद्धसेनपयोग इति वा समानं तुल्यकालं तुल्यकालीनोपयोगद्यात्मकमित्यर्थः, प्रयोगश्च-केवलिनो ज्ञानदर्शनोपयोगावेककालीनौ. दिवाकराणां युगपदाविर्भूतस्वभावत्वात, यावेवं तावेवं, यथा रखेः प्रकाशतापौ । अयमभिप्राय आगमविरोधीति केषाश्चिन्मतं, तानविक्षिपनाह | विचारास्त(सम्मतिः)-" केई मणति जइया, जाणइ तइआ ण पासह जिणो ति ॥ सुत्तमवलंबमाणा, तित्यपरासायणामीरू ॥२-४॥" त्र सम्मतितात्पर्यम् ॥ ॥१.८॥ Page #233 -------------------------------------------------------------------------- ________________ % ESC केवलज्ञाननिरूपणे केवलज्ञानदर्शनोपयो गविषये ऋ मोपयोगवा C धभिमत केचिन्जिनभद्रानुयायिनो भणन्ति-'यदा जानाति तदान पश्यति जिन' इति । सूत्रं-"केवली गं मते इमं रयणप्पमं पुढवि आयारहिं पमाणांह हेऊहिं संठाणहिं परिवारहिं जं समयं जाणइ णोतं समयं पासइ, ईता गोयमा! केवलीण" इत्यादिकं अवलम्बमानाः। अस्य च सूत्रस्य किलायमर्थस्तेषाममिमत:-'केवली सम्पूर्णबोधः, णमिति वाक्यालकारे । भते इति भगवन् ! इमारत्नप्रभामन्वर्थाभिधानां पृथ्वीमाकारैः समनिम्नोत्रतादिभिः,प्रमाणेादिभिः, हेतुभिरनन्तानन्तप्रदेशिकैः स्कन्धः,संस्थानः परिमण्डलादिभिः, परिवारैर्धनोदधिवलयादिभिः । जं समयं णा तं समयमिति च 'कालाधनोरत्यन्तसंयोगे' (पा.२-३.५.) इति द्वितीया सप्तमीवाधिका,तेन यदा जानाति न तदा पश्यतीति भावः। विशेषोपयोगः सामान्योपयोगान्तरितः, सामान्योपयोगध विशेषोपयोगान्तरितः,तत्स्वाभाच्यादिति प्रश्नार्थः ।उत्तरं पुनःहिंता गोयमा 'इत्यादिकं प्रश्नानुमोदकं तेत्येतनिगमनप्रकारण, गौतमेति गोत्रेणामंत्रणं प्रश्नानुमोदनार्थ पुनस्तदेव सूत्रमुच्चारणीयं हेतुप्रश्नस्य चात्र सत्रे उत्तरं । “सागारे से नाणे हवइ, अणागारे से दंसणे" इति,साकारं विशेषावलमि अस्य केवलिनो ज्ञानं भवति, अनाकारमतिकान्तविशेष सामान्यावलम्बि दर्शनं । न चानेकप्रत्ययोत्पतिरेकदा निरावरणस्यापि तत्स्वाभाव्यात् । न हि चक्षुर्शिनकाले श्रोत्रज्ञानोत्पत्तिरुपलम्यते । न चावृतत्वात्तदा तदनुत्पत्तिः, स्वसमयेऽप्यनुत्पत्तिप्रसङ्गात् । न चाणुना मनसा यदा यदिन्द्रियसंयोगस्तदा तज्ज्ञानमिति क्रमः परवायभिमतोऽपि युक्तिमान्?, सर्वाङ्गीणसुखोपलम्भायुपपत्तये मनोवर्गणापुद्गलानां शरीरव्यापकत्वस्यैव कल्पनात सुषुप्तौ ज्ञानानुत्पत्तये त्वङ्मनोयोगस्य ज्ञानसामान्ये हेतुत्वेन गसनकाले त्वाचरासनोभयोत्पत्तिवारणस्येत्थमप्यसम्भवाच्च । ततो युगपदनेकप्रत्ययानुत्पत्तों स्वभाव एव कारणं नान्यत्, सन्निहितेऽपि च द्वयात्मके विषये सर्वविशेषानेव केवलज्ञानं गृह्णाति, सर्वसामान्यानि च केवलदर्शन मिति स्वभाव ज्ञापनाविंशतितमपदम् वार्थः,क्रमो पयोगसाफकोपपत्त्युपदर्शनं च ॥ CRecent ११ Page #234 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मौज्ञानबिन्दु प्रकरणम् ॥ ॥ १०९ ॥ एवानयेोरिति । एते च व्याख्यातारस्तीर्थ कराशातनाया अभरिव तीर्थकरमाशातयन्तो न विभ्यतीति यावत् । एवं हि निःसामान्यस्य निर्विशेषस्य वा वस्तुनोऽभावेन न किश्विजानाति केवली न किञ्चित्पश्यतीत्यविक्षेपस्यैव पर्यवसानात् । न चान्यतर मुख्य पसर्जनविषयतामपेक्ष्य। भयग्राहित्वेऽप्युपयोगक्रमाविरोधः, मुख्योपसर्जन भावेनोभयग्रहणस्य क्षयोपशमविशेषप्रयोज्यत्वात्, केवलज्ञाने छद्मस्थज्ञानीय यावद्विषय तोपगमेऽवग्रहादिसङ्कीर्ण रूपप्रसङ्गाद्, उक्तसूत्रस्य तु न भवदुक्त एवार्थः, किं त्वयं, 'केवलमां रत्नप्रभां पृथिवीं यैराकारादिभिः समकं तुल्यं जानाति, न तैराकारादिभिस्तुल्यं पश्यतीति किमेवं ग्राह्यं १, हंता - एवमि त्यनुमोदना, ततो हेतौ पृष्टे सति तत्प्रतिवचनं भिन्नालम्बनप्रदर्शकं तज्ज्ञानं साकारं भवति यतो दर्शनं पुनरनाकारमित्यतो भिन्नालम्बनावेतौ प्रत्ययाविति' टीकाकृतः । अत्र यद्यपि जं समयं इत्यत्र जं इति अम्भावः प्राकृतलक्षणात्, यत्कृतमित्यत्र जं कयमिति प्रयोगस्य लोकेऽपि दर्शनादिति वक्तुं शक्यते, तथापि तृतीयान्तपदवाच्यैराकारादिभिर्लुप्त तृतीयान्तसमा सस्थयत्पदार्थस्य समकपदार्थस्य चान्यूनानतिरिक्तधर्मविशिष्टस्य रत्नप्रभायां भिन्नलिङ्गत्वादनन्वय इति यत् समकमित्यादिक्रियाविशेषणत्वेन व्याख्येयम् । रत्नप्रभाकर्मकाकारादिनिरूपितयावदन्यूनानतिरिक्तविषयताकज्ञानवान् न तादृशतावदन्यूनानतिरिक्तविषय ताकदर्शनवान् केवलीति फलितार्थः । यदि च तादृशस्य विशिष्टदर्शनस्य निषेध्यस्याप्रसिद्धेर्न तन्निषेधः " असतो णत्थि णिसेहो " (विशे. १५७४ ) इत्यादिवचनादिति सूक्ष्ममीक्ष्यते, तदा 'क्रियाप्रधानमाख्यातम्' इति वैयाकरणनयाश्रयणेन रत्नप्रभाकर्मकाकारादिनिरूपित यावदन्यूनानतिरिक्तविषयताकं ज्ञानं, न तादृशं केवलिकर्तृकं दर्शनमित्येव बोधः, सर्वनयात्म के भगवत्प्रवचने यथो पपन्नान्यतरनयग्रहणे दोषाभावादिति तु वयमालोचयामः । हेतुयौगपद्यादपि बलेनोपयोगयोगपद्यमापततीत्याह - "केवलनाणा केवलज्ञाननिरूपणे केवलज्ञानदर्शनोपयोगविषये युगप दुपयोगहय बादि तदभेदवादिम तेनोक्तस् त्रार्थ:, तद्वि.. पयारेकाप्रतिविधानं च ॥ ॥। १०९ ॥ Page #235 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वरण-खयजायं केवलं जहा नाणं। तह दंसणं पि जुज्जइ,णियआवरणक्खयस्संते ॥२-५॥" स्पष्टा,नवरं निजावरणक्षयस्यान्त इति दर्शनावरणक्षयस्यानन्तरक्षण इत्यर्थः । न चैकदोभयावरणक्षयेऽपि स्वभावहेतुक एवोपयोगक्रम इत्युक्तमपि साम्प्रतं, एवं सति स्वभावेनैव सर्वत्र निर्वाह कारणान्तरोच्छेदप्रसङ्गात् , कार्योत्पत्तिस्वभावस्य कारणेनैव तत्क्रमस्वभावस्य तत्क्रमणैव निर्वायत्वाच्च । एतेन "सर्वव्यक्तिविषयकत्वसर्वजातिविषयकत्वयोः पृथगवावरणक्षयकार्यतावच्छेदकत्वादर्थतस्तदवच्छिन्नोपयोगद्वयसिद्धिः" इत्यायपास्तम् । तत्सिद्धावपि तत्क्रमासिद्धेरावरणद्वयक्षयकार्ययोः समप्राधान्येनार्थगतेरप्रसराच्च । न च मतिश्रतज्ञानावरणयोरेकदा क्षयोपशमेऽपि यथा तदुपयोगक्रमस्तथा ज्ञानदर्शनावरणयोर्युगपत्क्षयेऽपि केबलिनामुपयोगक्रमः स्यादिति शङ्कनीयं, तत्र श्रुतोपयोगे मतिज्ञानस्य हेतुत्वेन शाब्दादौ प्रत्यक्षादिसामग्याः प्रतिबन्धकत्वेन च तत्सम्भवात् । अत्र तु क्षीणावरणत्वेन परस्परकार्यकारणभावप्रतिबध्यप्रतिबन्धकभावाद्यभावेन विशेषात् । एतदेवाह-"भण्णइ खीणावरणे, जह मइनाणं जिण ण संभवद ॥ तह खीणावरणिज्जे, विसेसओ देसणं णत्थि ॥२-६॥" भण्यते निश्चित्योच्यते, क्षीणावरणे जिने यथा मतिज्ञानं मत्यादिज्ञानं अवग्रहादिचतुष्टयरूपं वाज्ञानं न सम्भवति, तथा क्षीणावरणीये विश्लेषतो ज्ञानोपयोगकालान्यकाले दर्शनं नास्ति क्रमोपयोगत्वस्य मत्याद्यात्मकत्वव्याप्यत्वात्सामान्याविशेषोभयालम्बनक्रमोपयोगत्वस्य चावग्रहाद्यात्मकस्वव्याप्यत्वात्केवलयोः क्रमोपयोगत्वे तत्त्वापत्तिरित्यापादनपरोऽयं ग्रन्थः । प्रमाणं तु-"केवलदर्शनं केवलज्ञानतुल्यकालोत्पत्तिक, तदेककालीनसामग्रीकत्वात् , ताशकार्यान्तरवत्", इत्युक्ततर्कानुगृहीतमनुमानमेवेति द्रष्टव्यम् । न केवलं क्रमवादिनोऽनुमानविरोधः, अपि त्वागमविरोधोऽपीत्याह-"सुचमि चेव साइ-अपज्जवसियं ति केवलं वुत्तं । सुत्तासायणभीरू-हितं च ददुव्वयं केवलज्ञाननिरूपणे केवलज्ञानदर्शनयोरुपयोगयोगपद्यसमर्थनं क्रमवादिनोनुमानाम मादिविरोध द प्रदर्शनज॥ **PA Page #236 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भीज्ञान 'प्रकरणम् ॥ ॥११ ॥ होइ ॥२-७॥" सायपर्यवसिते केवलज्ञानदर्शने सूत्रे प्रोक्त.क्रमोपयोग त द्वितीयसमये तयोः पर्यवसानमिति कृतोऽपर्यवसिक्ता ? केवलज्ञानतेन सूत्राशातनाभीरुभिः क्रमोपयोगवादिभिस्तदपि द्रष्टव्यं । चोऽप्यर्थः । न केवलं "केवली ण भते इमं रयणप्पमं पुढविं' निरूपणे इत्याधुक्तसूत्रयथाश्रुतार्थानुपपत्तिमात्रमिति भावः । न च द्रव्यापेक्षयाऽपर्यवसितत्वं समाधेयं, द्रव्याविषयप्रश्नोत्तराश्रुतेः । न च केवलज्ञान'अर्पितानर्पितसिद्धेः' इति तत्त्वार्थ (५१०३१) सूत्रानुरोधेन द्रव्यार्पणयाऽश्रतयोरपि तयोः कल्पनं युक्तं,अन्यथा पर्यायाणामुत्पाद दर्शनयोः विगमात्मकत्वाद् भवतोऽपि कथं तयोरपर्यवसानतेति पर्यनुयोज्यम?, यद्धर्मावच्छिन्ने क्रमिकत्वप्रसिद्धिः तद्धर्मावच्छिन्नेऽपर्यवसि साधनन्ततत्वान्वयस्य निराकांक्षत्वात् , अन्यथा ऋजुत्ववक्रत्वे अपर्यवसिते इति प्रयोगस्यापि प्रसङ्गात् , मम तु रूपरसात्मकैकद्रव्यवदक्रम- स्थितिकत्वे. भाविभिन्नोपाधिकोत्पादविगमात्मकत्वेऽपि केवलिद्रव्यादन्यतिरेकतस्तयोरपर्यवसितत्वं नानुपपन्नम् । अथ पर्यायत्वावच्छेदकधर्म- नापि युग विनिर्मोकेण शुद्धद्रव्यार्थादेशप्रवृत्तेः क्रमैकान्तेऽपि केवलयोरपर्यवसितत्वमुपपत्स्यते, अत एव पर्यायद्रव्ययोरादिष्टद्रव्यपर्यायत्वं दुपयोगव्यक सिद्धान्ते गीयते । तत्तदवच्छेदकविनिर्मोकस्य विवक्षाधीनत्वादिति चेत, किमयमुक्तधर्मविनिर्मोकस्तत्तत्पदार्थतावच्छेदकविशिष्टयो स्थापनं ।। रभेदान्वयानुपपच्या शुद्धद्रव्यलक्षणया, उत उक्तधर्मस्य विशेषणत्वपरित्यागेनोपलक्षणत्वमात्रविवक्षया । आधे आद्यपद एव लक्षणायां शुद्धद्रव्यं शुद्धात्मद्रव्यं वाऽपर्यवसितमित्येव बोधः स्यात्, सादित्वस्यापि तत्रान्वयप्रवेशे तु केवलिद्रव्यं सायपर्य-15 वसितमित्याकारक एव, उभयपदलक्षणायांतु शुद्धद्रव्यविषयको निर्विकल्पक एव बोध इति केवलज्ञानदर्शने साद्यपर्यवसिते इति बोधस्य कथमप्यनुपपत्तिः । अन्त्ये च केवलत्वोपलक्षितात्मद्रव्यमात्रग्रहणे तत्र सादित्वान्वयानुपपत्तिः, केवलिपर्यायग्रहणे च नवविधोपचारमध्ये 'पर्याये पर्यायोपचार' एवाश्रयणीयः स्यादिति समीचीनं द्रव्यार्थादेशसमर्थनं। नियतोपलक्ष्यतावच्छेदकरूपा- ११०॥ RECIPECITIERGAR Page #237 -------------------------------------------------------------------------- ________________ R भावपि सम्मुग्धोपलक्ष्यविषयकतादृशबोधस्वीकारे च 'पर्यायोपर्यवसित' इत्यादेरपि प्रसक्तिद्रव्यार्थतया केवळज्ञानकेवलदर्शनयोरपर्यवसितत्वाभ्युपगमे द्वितीयक्षणेऽपि तयोः सद्भावप्रसक्तिः, अन्यथा द्रव्यार्थत्वायोगात् । तदेवं क्रमाम्युपगमे तयोरागमविरोध इत्युपसंहरबाह-"संतमि केवले दं-सणम्मि नाणस्स संभवो णत्थि । केवलनाणम्मि य दं-सणस्स तम्हा अनिहणाई ॥२-८॥" स्वरूपतो द्वयोः क्रमिकत्वेऽन्यतरकालेज्यतराभावप्रसङ्गः, तथा चोक्तवक्ष्यमाणदषणगणोपनिपाता,तस्माद् द्वावप्युपयोगी केवलिनः स्वरूपतोऽनिधनावित्यर्थः । इत्थं ग्रन्थकूदक्रमोपयोगद्वयाभ्युपगमेन क्रमोपयोगवादिनं पर्यनुयुज्य स्वपक्षं दर्शयितुमाह "दंसणनाणावरण-खए समाणम्मि कस्स पुचयरा(रं) ॥ होज व समओप्पाओ, हंदि दुवे णस्थि उवओगा ॥२-९॥" | सामान्यविशेषपरिच्छेदावरणापगमे कस्य प्रथमतरमुत्पादो भवेत ? अन्य तरोत्पादे तदितरस्याप्युत्पादप्रसङ्गात् , अन्यतरसामच्या अन्यतरप्रतिबन्धकत्वे चोभयोरप्यभावप्रसङ्गात् " सव्वाओ लद्धीओ सागारोवओगोवउत्तस्सेति” वचनप्रामाण्यात्प्रथमं केवल ज्ञानस्य पश्चात्केवलदर्शनस्योत्पाद इति चेत्, न, एतद्वचनस्य लब्धियोगपद्य एवं साक्षित्वादुपयोगक्रमाक्रमयोरोदासीन्यात् । योगपद्येनापि निवाऽर्थाद्दर्शनेऽनन्तरोत्पश्यासिद्धेः एकक्षणोत्पत्तिककेवलज्ञानयोरेकक्षणन्यूनाधिकायुष्कयोः केवलिनो। क्रमिकापयोगद्वयधाराया निर्वाहयितमशक्यत्वाच । अथ ज्ञानोपयोगसामान्ये दर्शनोपयोगत्वेन हेतुतेति निर्विकल्पकसमाधिरूपच्छमस्थकालीनदर्शनात प्रथमं केवलज्ञानोत्पत्तिः केवलदर्शने केवलज्ञानत्वेन विशिष्य हेतुत्वाच्च द्वितीयक्षणे केवलदर्शनोत्पत्तिः, ततथ क्रमिकसामग्रीद्वयसम्पच्या क्रमिकोपयोगयधारानिर्वाह इति, एकक्षणन्यूनाधिकायुष्कयोस्त्वेकक्षणे केवलज्ञानोत्पत्यस्वीकार एव गतिरिति चेत् ,न, "दसणपुब्बं नाणं (२-२२)” इत्यादिना तथाहेतुत्वस्य प्रमाणाभावेन निरसनीयत्वात् , उत्पन्नस्य केवलज्ञानस्य FOCALCREARCAREECRETAR IA केवलज्ञान निरूपणे केवलज्ञान दर्शनयोरू पयोगाक्रम वादिमतेन क्रमवादिमनं कानिरस्य ज्ञान: दर्शनयोः के वलिन्यैक्स मिति स्क | सिद्धान्त मर्थनेक क्षणविषमा हूँ युदृष्टान्तेन क्रमपक्षनि रासश्च। RCCESARKA Page #238 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रीज्ञानबिन्दुअकरमम् ॥ ॐ १११ ॥ क्षायिकभावत्वेन नाशायोगाच्च । न च मुक्तिसमये क्षायिकचारित्रनाशवदुपपत्तिः क्षायिकत्वेऽपि तस्य योगस्थैर्य निमित्तकत्वेन निमित्तनाशनाश्यत्वात्, केवलज्ञानस्य चानैमित्तिकत्वादुत्पत्तौ ज्ञप्तौ चाबरणक्षयातिरिक्तनिमित्तानपेक्षत्वेनैव तस्य स्वतन्त्रप्रमाणत्वव्यवस्थितेः, अन्यथा ‘सापेक्षमसमर्थम्' इति न्यायात्तत्राप्रामाण्यप्रसङ्गात् । एतेन 'केवलदर्शनसामग्रीत्वेन स्वस्यैव स्वनाशकत्वमिति केवलज्ञानक्षणिकत्वम्' इत्यप्यपास्तम्, अनैमित्तिके क्षणिकत्वायोगात्, अन्यथा तत्क्षण एव तत्क्षणवृतिकार्ये नाशक इति सर्वत्रैव सूक्ष्मर्जुसूत्र नय साम्राज्यस्य दुर्निवारत्वादिति किमतिपल्लवितेन ? । नन्वियमनुपपत्तिः क्रमोपयोगपक्ष एवेत्यक्रमौ द्वावुपयोगौ स्तामित्याशङ्कते मल्लवादी, "भवेद्वा समयमेककालमुत्पादस्तयोरिति" तत्रैकोपयोगवादी ग्रन्थकृत् सिद्धा न्तयति, हंदि ज्ञायतां, द्वावुपयोग नैकदेति, सामान्य विशेषपरिच्छेदात्मकत्वात्केवलज्ञानस्य, यदेव ज्ञानं तदेव दर्शनमित्य - त्रै निर्भरः, उभयहेतुसमाजे समूहालम्बनोत्पाद स्यैवान्यत्र दृष्टत्वान्नात्रापरिदृष्टकल्पना क्लेश इति भावः । अस्मिन्नेव वादे केवलिनः सर्वज्ञतासम्भव इत्याह--" जइ सव्वं सायारं, जाणइ एकसमएण सव्वष्णू || जुज्जइ सया वि एवं, अहवा सव्र्व्वं न जाणाइ ॥। २ - १० ॥" यदि सर्व सामान्यविशेषात्मकं जगत्, साकारं तत्तजातिव्यक्तिवृत्तिधर्मविशिष्टं । साकारमिति क्रियाविशेषणं वा । निरवच्छभतत्तज्जातिप्रकारतानिरूपिततत्तद्वयक्ति विशेष्यतासहितं परस्परं यावद्द्रव्यपर्याय निरूपितविपयतासहितं वा यथा स्यात्तथेत्यर्थः । जानात्येकसमयेन सर्वज्ञः पश्यति चेति शेषः, तदा सदापि सर्वकालं युज्यते, एवं सर्वज्ञत्वं सर्वदर्शित्वं चेत्यर्थः । अथवेत्येतद्वैपरीत्ये, सर्व न जानाति सर्वं न जानीयादेकदेशोपयोगवर्त्तित्वान्मतिज्ञानवदित्यर्थः । तथा च केवलज्ञानमेव केवलदर्शनमिति स्थितम्। अव्यक्तत्वादपि पृथग्दर्शनं केवलिनि न सम्भवतीत्याह - " परिसुद्धं सायारं, अविअत्तं दंसणं अणायारं ॥ ण य खीणा - केवलज्ञाननिरूपणे केवलज्ञान दर्शनयोरै क्यमित्यस्मि न्यक्ष एव सर्वज्ञतास म्भवस्य युचित: साधनम् ॥ ।।। १११ ।। Page #239 -------------------------------------------------------------------------- ________________ CARRIERSPEok बरजिजे. जजह स(स)वियत्मवित्तं ॥२-११॥" ज्ञानस्य हि व्यक्ततारूपं, दर्शनस्य पुनरव्यक्तता। न च क्षीणावरणेऽर्हति व्यक्तताऽव्यक्तते युज्यते,ततः 'सामान्यविशेषज्ञेयसंस्पश्युभयकस्वभाव एवायं केवलिप्रत्यया',न च ग्राह्यद्वित्वाद्वाहकद्वित्वमिति सम्भावनापि युक्ता, केवलज्ञानस्य ग्राह्यानन्त्येनानन्ततापत्तेः, विषयभेदकृतो न ज्ञानभेद इत्यभ्युपगमे तु दर्शनपार्थक्ये का प्रत्या. शा. आवरणद्वयक्षयादुर्भयैकस्वभावस्यैव कार्यस्य सम्भवात् । न चैकस्वभावप्रत्ययस्य शीतोष्णस्पर्शवत्परस्परविभिन्न स्वभावद्वयविरोधः, दर्शनस्पर्शनशक्तिद्वयात्मकैकदेवदत्तवत्स्वभावद्वयात्मकैकप्रत्ययस्य केवलिन्याविरोधात् । ज्ञानत्वदर्शनत्वधर्माभ्यां ज्ञानदर्शनयोर्भेदः, न तु धर्मिभेदेनेति परमार्थः । अत एव तदावरणभेदेऽपि स्याद्वाद एव, तदुक्तं स्तुती ग्रन्थकृतव (निश्चयद्वात्रिंशिका) "चक्षदर्शनविज्ञानं, परमाणावौष्ण्यरौक्ष्यवत् । तदावरणमप्येकं, न वा कार्यविशेषतः ॥८॥" इति । परमाणावुष्णरूक्षस्पर्शद्व. | यसमावेशवच्चाक्षुष ज्ञानत्वदर्शनत्वयोः समावेश इत्यर्थः । इत्थं च चाक्षुषज्ञानदर्शनावरणकर्मापि परमार्थत एकं, कार्यविशेषत उपाधिभेदती वा नैकमिति सिद्धम् । एवमवधिकेवलस्थलेऽपि द्रष्टव्यम् । तदाह-"चक्षुर्वद्विषयाख्याति-वधिज्ञानकैवले ॥शेषवृत्तिविशेषात, ते मते ज्ञानदर्शने ॥३०॥ इति"। चक्षुर्वचाक्षुषवद्विषयाख्यातिः स्पृष्टज्ञानाभावः अस्पृष्टज्ञान इति यावत्, भावाभावरूपे वस्तुन्यभावत्वाभिधानमपि दोषानावहं, शेषा वृत्तयोऽस्पृष्टज्ञानानि ताभ्यो विशेषः, स्पृष्टताविशेषेण वक्ष्यमाणरीत्या स्पृष्टा- विषयवृत्तित्वव्यङ्गयेन, तस्मात्ते अवधिकेवले ज्ञानपदेन दर्शनपदेन च वाच्ये इत्येतदर्थः॥ क्रमाक्रमोपयोगद्यपक्षे भगवतो यदापद्यते तदाह-" अहिटुं अण्णायं, च केवली एव भासइ सया वि॥ एगसमयम्मि हंदी, वयणविगप्पो ण संभव।।।२-१२॥" आद्यपले जानकालेऽदृष्ट,दर्शनकाले चाज्ञातं, द्वितीयपक्षे च सामान्यांशेऽज्ञातं विशेषांश चादृष्टं,एवमुक्तप्रकारेण केवली सदा निरूपणे ज्ञानदर्शनयोळक्ताsव्यक्तरूपत्वेन भेदवादिमतं वेलिनि तर. नुपपत्तिप्र दर्शनेन कम Page #240 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रीज्ञान CIRECADEMOR अकरणम्॥ ॥११२॥ केवलज्ञान निरूपणे भाषते तत “एकस्मिन् समये ज्ञातं दृष्टं च भगवान भाषते," इत्येष वचनस्य विकल्पो विशेषो भवदर्शने न भवतीति गृह्यतां । क्रमतोऽक न चान्यतरकालेऽन्यतरोपलक्षणादुपसर्जनतया विषयान्तरग्रहणाच्चोक्तवचनविकल्पोपपत्तिः, एवं सति भ्रान्तच्छवस्थेऽपि तथाप्रयो- IXमतो वोपयो गप्रसङ्गात् । यदा कदाचित् शृङ्गग्राहिकया ज्ञानदर्शनविषयस्यैव पदार्थस्य तद्बुद्धावनुप्रवेशादिति स्मर्तव्यम् । तथा च सर्वत्रत्वं गद्याम्यु न सम्भवतीत्याह-"अण्णायं पासतो, अदिटुं च अरहा वियाणतो॥ किं जाणइ किं पासइ, कह सव्वण्णू ति वा होइ॥२-१३॥" गमे भगक अज्ञातं पश्यन्नदृष्टं च जानानः किं जानाति किं वा पश्यति न किञ्चिदित्यर्थः । कथं वा तस्य सर्वज्ञता भवेत् ? तो ज्ञातरन कथमपीत्यर्थः । ज्ञानदर्शनयोविषयविधयैकसंख्याशालित्वादप्येकत्वमित्याह-"केवलनाणमणतं, जहेव तह दंसणं पि पण्णत्तं ।। टमाषित्वा सागारग्गहणाहि य, णियमपरितं अणागारं ॥२-१४॥" यद्येकत्वं ज्ञानदर्शनयोर्न स्यात्तदाऽल्पविषयत्वादर्शनमनन्त न स्यादिति ६ समवदोक "अणते केवलनाणे अणते केवलदंसणे" इत्यागमविरोधः प्रसज्येत. दर्शनस्य हि ज्ञानाद्भदे साकारग्रहणादनन्तविशेषवर्ति- स्य निरु ज्ञानादनाकार सामान्यमात्रावलम्बि केवलदर्शनं, यतो नियमेनकान्तेनैव परीतमल्पं भवतीति कुतो विषयाभावादनन्तता। न च णम् ॥ किउभयोस्तुल्यविषयत्वाविशेषेऽपि मुख्योपसर्जनभावकृतो विशेष इति वाच्यं, विशेषणविशेष्यभावेन तत्तत्रयजनितवैज्ञानिकसम्बन्धा षयसंख्या वच्छिन्नविषयतया वा तत्र कामचारात । आपेक्षिकस्य च तस्यास्मदादिवद्धावेवाधिरोहात । एतच्च निरूपितं तत्वं "जंजं जे जे भावे" विचारेणाइत्यादि(आवश्यक)नियुक्ति(२८२)गाथाया नयभेदेन व्याख्याद्वयेऽनेकान्तव्यवस्थायामस्माभिः(पत्र ८४२) अक्रमोपयोग पि ज्ञानदर्शद्वयवादी तु प्रकृतगाथायां साकारे यद्ग्राणं दर्शनं तस्य नियमोऽवश्यम्भावोयावन्तो विशेषास्तावन्त्यखण्डसखण्डोपाधिरूपाणि जाति नयोरैक्य रूपाणि वा सामान्यानीति हेतोस्तेनापरीतमनन्तमित्यकारप्रश्लेपेण व्याचष्टे, क्रमवादे ज्ञानदर्शनयोरपर्यवसितत्वादिकं नोपपद्यत इति | समर्थनच॥ -OL RORIES Page #241 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Rel वान् दर्शनवांश्च तदपि न भावः । इयांस्तु विशाल प्राढिवादः, वस्त REARRAarat यदुक्तं तत्राक्षेपमुक्य समाधत्ते-" भण्णइ जह चउनाणी, जुज्जइ णियमा तहेव एवं पि । भण्णइ ण पंचनाणी, जहेव अरहा तहेयं केवलज्ञान म पि ॥२-१५॥" भण्यते आक्षिप्यते यथा क्रमोपयोगप्रवृत्तोऽपि मत्यादिचतुर्बानी तच्छक्तिसमन्वयादपर्यवसितचतुर्बानो र्जानो निरूपणे ॐ ज्ञातदृष्टभाषी ज्ञाता द्रष्टा च नियमेन युज्यते । तथैतदप्येकत्ववादिना यदपर्यवसितत्वादिक्रमोपयोगे केवलिनि प्रेयते, तदपि सावं. पयोगक्रम दिककेवलज्ञानदर्शनशक्तिसमन्वयादुपपद्यत इत्यर्थः । भण्यतेवोत्तरं दीयते-यथैवाहन पञ्चज्ञानी, तथैवैतदपि क्रमवादिना वादिविहियदुच्यते, 'भेदतो ज्ञानवान् दर्शनवांश्च,' तदपि न भवतीत्यर्थः । मत्याद्यावरणक्षयेऽप्येकदेशग्राहिणो मतिज्ञानादेवि, दर्शनावरण- तस्य दोको क्षयेऽपि तादृशदर्शनस्य केवलिनि भेदेनानुपपत्तेरिति भावः । इयांस्तु विशेष: यदभेदेनापि केवलज्ञाने दर्शनसंज्ञा सिद्धान्तसम्मता, 11४द्धारस्य सान तु मतिज्ञानादिसंज्ञेति, तत्र हेतू अन्वर्थोपपत्यनुपपत्ती एव द्रष्टव्ये । अयं च प्रौढिवादः, वस्तुतः क्रमवादे यदा जानाति तदा क्षेपं परि पश्यतीत्यादेरनुपपत्तिरेव, आश्रयत्वस्यैवाख्यातार्थत्वात् । लब्धेस्तदर्थत्वे तु घटादर्शनवेलायामपि घटं पश्यतीतिप्रयोगप्रसङ्गात् । हरणं. घटदर्शनलब्धेस्तदानीमपि विद्यमानत्वात् । चक्षुष्मान् सर्व पश्यति, न त्वन्ध' इत्यादौ त्वगत्या लब्धेर्योग्यताया वाऽऽख्या- | तार्थत्वमभ्युपगम्यत एव, न तु सर्वत्राप्ययं न्यायः, अतिप्रसङ्गात । न च सिद्धान्ते विना निक्षेपविशेषमप्रसिद्धार्थे पदवृत्तिरवधार्यते, षट्षष्टिसागरोपमस्थितिकत्वादिकमपि मतिज्ञानादेर्लब्ध्यपेक्षयैवेति दुर्वचं, एकस्या एव क्षयोपशमरूपलब्धस्तावकालमनवस्थानात , द्रव्याद्यपेक्षया विचित्रापरापरक्षयोपशमसन्तानस्यैव प्रवृत्त्युपगमात् । किं त्वेकजीवावच्छेदेनाज्ञानातिरि क्तविरोधिसामग्रयसमवहितषट्पष्टिसागरोपमक्षणत्वव्याप्यस्वसजातीयोत्पत्तिकत्वे सति तदधिकक्षणानुत्पत्तिकस्वसजातीयत्वरूपं तत्पारिभाषिकमेव वक्तव्यं, एवमन्यदप्यूह्यम् । क्रमेण युगपद्वा परस्परनिरपेक्षस्वविषयपर्यवसितज्ञानदर्शनोपयोगी केवलिन्यसा Page #242 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रीज्ञान प्रकरणम्॥ । ११३॥ RECEABLAKCERawat र्थत्वान्मत्यादिज्ञानचतुष्टयवधस्त इति दृष्टान्तभावनापूर्वमाह-"पण्णवणिज्जा भावा, समत्तसुअनाणदंसणाविसओ। ओहिमणपज्ज- केवलज्ञानवाण य, अण्णोण्णविलक्खणाविसओ ॥२-१६॥ तम्हा चउविभागो, जुज्जइ ण उ नाणदंसण जिणाणं । सयलमणावरणमणं- निरूपणे तमक्खयं केवलं जम्हा॥२-१७"प्रज्ञापनीया शब्दामिलाप्या भावा द्रव्यादयः समस्तश्रुतज्ञानस्य द्वादशाङ्गवाक्यात्मकस्य न केनलज्ञानदर्शनाया दर्शनप्रयोजिकायास्तदुपजाताया बुद्धेः विषय आलम्बन, मतेरपि त एव शब्दावसिता विषया द्रष्टव्याः, शब्दपरिक ॐदर्शनयोरनामणाहितक्षयोपशमजनितस्य ज्ञानस्य यथोक्तभाव विषयस्य मतित्वान्मतिश्रुतयोरसर्वपर्यायसर्वद्रव्यविषयतया तुल्यार्थत्वप्रातिपाद- ६ बरणत्वादिनाच,अवधिमनःपर्याययोः पुनरन्योन्यविलक्षणा भावा विषया, अवधे रूपिद्रव्यमानं, मनःपर्यायस्य च मन्यमानानि * समस्वरूपद्रव्यमनासीत्यसर्वार्थान्येतानि ॥ तस्माचतुर्णां मत्यादीनां विभागो युज्यते तत्तत्क्षयोपशमप्रत्ययभेदात, न तु जिनानां 13 त्वेनाध्यक्यज्ञानदर्शनयोः। 'नाणदसण त्ति' अविभक्तिको निर्देशः सूत्रत्वात् । कुतः पुनरेतदित्यत आह, यस्मात् केवलं सकलं परिपूर्ण । | मितिसमर्थितदपि कुतः १ यतोऽनावरणं,न बनावृतमसकलविषयं भवति। न च प्रदीपेन व्यभिचारः,यतोऽनन्तमनन्तार्थग्रहणप्रवृत्त । तदपि तम् ॥ कतः? यतोऽक्षयं,क्षयो हि विरोधिसजातीयेन गुणेनस्याचदभावे तस्याक्षयत्वं,ततश्चानन्तत्वमनवद्यमिति भावः। तस्मादक्रमोपयोगद्यात्मक एक एव केवलोपयोगः । तत्रैकत्वं व्यक्त्या, द्वयात्मकत्वं च नृसिंहत्ववदांशिकजात्यन्तररूपत्वमित्येके । माषे स्निग्धोष्णत्ववद्याप्यवृत्तिजातिद्वयरूपमित्यपरे । केवलत्वमावरणक्षयात्, ज्ञानत्वं जातिविशेषो, दर्शनत्वं च विषयताविशेषो, दोषक्षयजन्यतावच्छेदक इति तु वयम् । ननु भवदुक्तपक्षे 'केवली णं' इत्यादिसूत्रे 'जं समयं' इत्यादौ यत्समकमित्याद्यर्थो न सर्वस्वरससिद्धा,तादृशप्रयोगान्तरे तथाविवरणाभावात्,तथा (भगवतीशतक १८ उद्देश १०)'नाणदंसणठ्याए दुवे अहं' इत्याद्या. ६॥ ११३ ॥ Page #243 -------------------------------------------------------------------------- ________________ PECIPES गमविरोधोऽपि, यद्धर्मविशिष्टविषयावच्छेदेन भेदनयार्पणं तद्धर्मविशिष्टापेक्षयैव द्वित्वादेः साकांक्षत्वात्, अन्यथाऽतिप्रसङ्गादित्याशय यक्तिसिद्धा सूत्रार्थो ग्राह्यस्तेषां स्वसमयपरसमयादिविषयभेदेन विचित्रत्वादित्यभिप्रायवानाह-" परवत्तव्वयपक्खा, अविसद्धा तेस तेस अत्थेसु । अत्थगइओ अ तेसिं, विअंजणं जाणओ कुणइ ॥२-१८॥” परेषां वैशेषिकादीनां यानि वक्तव्यानि तेषां पक्षा अविशुद्धास्तेषु तेष्वर्थेषु सूत्रे तत्तमयपरिकर्मणादिहेतोर्निबद्धाः। अर्थगत्यैव सामर्थेनैव तेषामर्थानां व्यक्तिं सर्वप्रचादमूलद्वादशाङ्गाविरोधेन ज्ञको ज्ञाता करोति। तथा च 'जं समयं' इत्यादेर्यथाश्रुतार्थे केवली श्रुतावधिमनःपर्यायकेवल्यन्यतरो ग्राह्यः, परमावधिकाधोवधिकच्छवस्थातिरिक्तविषये स्नातकादिविषये वा तादृशसूत्रप्रवृत्तौ तत्र परतीथिकवक्तव्यताप्रतिवद्धत्वं वाच्यमेवमन्यत्रापीति दिक् । केवलनाणे केवलदंसणे' इत्यादिभेदेन सूत्रनिर्देशस्यैकार्थिकपरतैवेत्यभिप्रायेणोपक्रमते-" जेण मणोविसयगया-ण दंसणं णत्थि दब्बजादाणं ॥ तो मणपजवनाणं, नियमा नाणं तु णिदिटुं॥२-१९॥" यतो मनःपर्यायज्ञानविषयगतानां तद्विषयसमूहानुप्रविष्टानां परमनोद्रव्याविशेषाणां बाह्यचिन्त्यमानार्थगमकतापयिकविशेषरूपस्यैव सद्भावाद्दर्शनं सामान्यरूपं नास्ति, तस्मान्मनःपयोयज्ञानं ज्ञानमेवागमे निर्दिष्टं ग्राह्यसामान्याभावे मुख्यतया तहणोन्मुखदर्शनाभावात् । केवलं तु सामान्यविशेषोभयोपयोगरूपत्वादुभयरूपकमेवेति भावः। सूत्रे उभयरूपत्वेन परिपठितत्वादप्युमयरूपं केवलं, न तु क्रमयोगादित्याह(द्विषयभेदाढेत्यभिप्रायवानाह)-" चक्खुअचक्खुअवधिक-वलाण समयम्मि दंसणविअप्पा ॥ परिपठिआ केवलना-णदसणा तेण विय(ते) अण्णा ॥२-२०॥" स्पष्टा । चक्षुरादिज्ञानवदेव केवलं ज्ञानमध्ये पाठात् ज्ञानमपि, दर्शनमध्ये पाठाच्च दर्शनमपीति परिभाषामात्रमेतदितीति ग्रन्थकृतस्तात्पर्यम् । मतिज्ञानादेः क्रम इव केवलस्याक्रमेऽपि केवलज्ञाननिरूपणे केवलज्ञानदर्शनयोरभेदवादिनं प्रत्या पादितस्म भगवतीविरोधस्व सो. पपत्तिकः परिहारः निर्देशभेदस्य तात्पर्य ALLABCC Page #244 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भीज्ञानबिन्दु प्रकरणम्॥ ॥१४॥ Recent सामान्यविशेषाजहद्वृत्त्यैकोपयोगरूपतया ज्ञानदर्शनत्वमित्येकदेशिमतमुपन्यस्यति-"दसणमुग्गहमेतं,घडोत्ति निव्वत्रणा हवइ केवलज्ञान नाणं ।। जह इत्थ केवलाण वि,विसेसणं इत्तियं चेव ॥२-२१॥" अवग्रहमानं मतिरूपे वोधे दर्शनं,इदं तदित्यव्यपदेश्य,घट इति दर्शनयोमें निश्चयेन वर्णना तदाकारामिलाप इतियावत । कारणे कार्योपचाराच घटाकाराभिलापजनक घटे मतिज्ञानमित्यर्थः । यथाऽत्रैवं(कं) दाभेदविचारे तथा केवलयोरप्येतावन्मात्रेण विशेषः।एकमेव केवलं सामान्यांशे दर्शनं विशेषांशे चबानमित्यर्थः। एकदेश्येव क्रमिकमेदपक्षं एकदेशीयम् दूषयति-"दसणपुव्वं नाणं, नाणणिमित्तं तु देसणं णत्थि ॥ तेण सुविणिच्छयामो, दंसणनाणा ण अण्णत्वं ॥२-२२।।" तेन मतिज्ञादर्शनपूर्व ज्ञानमिति छद्मस्थोपयोगदशायां प्रसिद्धम् । सामान्यमुपलभ्य हि पश्चात्सर्वो विशेषमुपलभत इति, ज्ञाननिमित्तं तु | नदृष्टान्त दर्शनं नास्ति कुत्रापि, तथाप्रसिद्धेः । तेन सुविनिश्चिनुमः 'दसणनाणा' इति दर्शनझाने नान्यत्वं न क्रमापादितभेदं ज्ञानदर्शनयो केवलिनि भजत इति शेषः । क्रमाभ्युपगमे हि केवलिनि नियमाज्ज्ञानोत्तरं दर्शनं वाच्यं, सर्वासां लब्धीनां साकारोपयोगप्राप्त(प्य)- भेदविचारः त्वेन पूर्व ज्ञानोत्पत्त्युपगमौचित्यात् । तथा च ज्ञानहेतुकमेव केवलिनि दर्शनमभ्युपगन्तव्यं, तच्चात्यन्तादर्शनव्याहतमिति भावः। यत्तु १४ क्रमिकपक्ष क्षयोपशमनिवन्धनक्रमस्य केवलिन्यभावेऽपि पूर्व क्रमदर्शनातज्जातीयतया ज्ञानदर्शनयोरन्यत्वमिति टीकाकद्वयाख्यानं, तत्स्व- निरासश्च ।। भावभेदतात्पर्येण सम्भवदपि दर्शने ज्ञाननिमित्तत्वनिषेधानतिप्रयोजनतया कथं शोभत इति विचारणीयम् । ननु यथा परेषा कल्पितः क्रमो वर्णनिष्ठो बुद्धिविशेषजनकतावच्छेदकोऽस्माकं च भिन्नाभिन्नपर्यायविशेषरूपः, तथा केवलिज्ञानदर्शननिष्ठस्तादृशा क्रम एवावरणक्षयजन्यतावच्छेदकः स्यादिति नोक्तानुपपत्तिरिति चेत्, न, वर्णक्रमस्य क्रमवत्प्रयत्नप्रयोज्यस्य सुवचत्वेऽप्यक्रमिकावरणक्षयप्रयोज्यस्य केवल्युपयोगक्रमस्य दुर्वचत्वादनन्यगत्याक्रमिकादप्यावरणद्वयक्षयात् क्रमवदुपयोगोत्पत्त्यभ्युपगमे ११४॥ KKARE Page #245 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ि ** च तन्नाशकारणाभावादविकलकारणात्तादृशोपयोगान्तरधाराया अविच्छेदाच " सव्वस्स वि केवलिणं) जुगवं दो णत्थि उवओगा" (आव०नि० गाथा ९७९) इति वचनानुपपत्तिः । न च ज्ञानस्य दर्शनमेवार्थान्तरपरिणामलक्षणो ध्वंस इत्युपयोगाऽयौगपद्यं साम्प्रतम्, साद्यनन्तपर्याय विशेषरूपध्वं तस्यैवावस्थितिविरोधित्वादर्थान्तरपरिणाम लक्षण ध्वंसस्यातथात्वात् । अन्यथा तत्तत्संयोगविभागादिमात्रेणानुभूयमानघटावस्थित्युच्छेदापत्तेः । न च “ जुगवं दो णत्थि उवओगा ” इत्यस्योपयोगयोर्युगपदुत्पत्तिनिषेध एव तात्पर्य, न तु युगपदेवस्थानेऽपीत्युपयोगद्वयधाराणां नाशकारणाभावेन सहावस्थानेऽपि न दोष इति साम्प्रतं, अक्रमवादिनाप्येवं क्रमावच्छिन्नोपयोगद्वययौगपद्यनिषेधपरत्वस्य वक्तुं शक्यत्वात्, सूत्रासङ्कोचस्वारस्यादरे “यदेव ज्ञानं तदेव दर्शनम्" इत्यस्मदुक्तस्यैव युक्तत्वादिति दिक् ॥ मतिज्ञानमेवावग्रहात्मना दर्शनं, अपायात्मना च ज्ञानमिति यदुक्तं दृष्टान्तावष्टम्भार्थमेकदेशिना तदूषयन्नाह - " जइ उग्गहमित्तं दं-सणंति मण्णसि विसेसिया नाणं || मइनाणमेव दंसण- मेवं सइ होइ णिष्फन्नं ।। २-२३॥ " यदि मतिरेवावग्रहरूपा दर्शनं विशेषिता ज्ञानमिति मन्यसे, तदा मतिज्ञानमेव दर्शनमित्येवं सति प्राप्तं । न चैतद्युक्तं, “स द्विविधोऽष्टचतुर्भेद" इति ( तस्वार्थ अध्याय २ सूत्र ९ ) सूत्रविरोधान्मतिज्ञानस्याष्टाविंशतिभेदोक्तिविरोधाच्च - " एवं सेसिंदियदं- समि नियमेण होइ ण य जुत्तं ॥ अह तत्थ नाणमित्तं घेप्पड़ चक्खुमि वि तदेव ॥ २-२४ ।। " एवं शेषेन्द्रियदर्शनेष्वप्यवग्रह एव दर्शनमित्यभ्युपगमेन ( गमे नियमेन ) मतिज्ञानमेव तदिति स्यात्, तच्च न युक्तं, पूर्वोक्तदोषानतिवृत्तेः । अथ तेषु श्रोत्रादिष्विन्द्रियेषु दर्शनमपि भवज्ज्ञानमेव गृह्यते, मात्रशब्दस्य दर्शनव्यवच्छेदकत्वात्, तद्वचवच्छेदश्च तथाव्यवहाराभावात्, केवलज्ञाननिरूपणे केवलज्ञानदर्शनोपयोगयौगपद्यवा दिमतेन क्रम वाद्यक्तदोष- परिहारः व स्तुतोऽभेद पक्षसमर्थन तत्र चैकदेशि मतनिरस नश्च ॥ Page #246 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भीमान बिन्दु प्रकरणम्॥ ॥११५॥ CARROTECCURRECTEDORE श्रोत्रज्ञानं घ्राणज्ञानमित्यादिव्यपदेश एव हि तत्रोपलभ्यते, न तु श्रोत्रदर्शनं घ्राणदर्शनमित्यादिव्यपदेशः क्वचिदागमे प्रसिद्धः, तर्हि चक्षुष्यपि तथैव गृह्यतां चक्षुर्ज्ञानमिति. नतु चक्षुर्दर्शनमिति । अथ तत्र दर्शनम्, इतरत्रापि तथैव गृह्यतां, युक्तेस्तुल्यत्वात् । | कथं तर्हि शास्त्रे चक्षुर्दर्शनादिप्रवाद इत्यत आह-"नाणमपुढे जो अविसए अ अथमि दंसणं होई ।। मुत्तूण लिंगओ जं, अणागयाईयविसएसु ॥२-२५॥" अस्पृष्टेऽर्थे चक्षुपा य उदेति प्रत्ययः स ज्ञानमेव सच्चक्षुदर्शनमिन्युच्यते, इन्द्रियाणामविषये च परमाण्वादावथै मनसा य उदेति प्रत्ययः स ज्ञानमेव सदचक्षुर्दर्शनमित्युच्यते । अनुमित्यादिरूपे मनोजन्यज्ञानेऽतिप्रसङ्गमाशङ्कयाऽऽह, अनागतातीतविषयेषु यल्लिङ्गन्तो ज्ञानमुदेति 'अयं काल आसन्नभविष्यवृष्टिकस्तथाविधमेघोन्नतिमत्त्वात,' 'अयं प्रदेश आसन्नवृष्टमेघः पूरविशेषवत्त्वाद्' इत्यादिरूपं तन्मुक्त्वा । इदमुपलक्षणं, भावनाजन्यज्ञानातिरिक्तपरोक्षज्ञानमात्रस्य तस्यास्पृष्टाविषयार्थस्यापि दर्शनत्वेनाव्यवहारात् । यद्यस्पृष्टाविषयार्थज्ञानं दर्शनमभिमतं, तर्हि मनःपर्यायज्ञानेऽतिप्रसङ्ग इत्याशङ्कथ समाधत्ते-"मणपञ्जवनाणं दं-सणं ति तेणेह होइ ण य जुत्तं ।। भन्नइ नाणं णोई-दियंमि ण घडादओ जम्हा ॥२-२६॥" एतेन लक्षणेन मनःपर्यायज्ञानमपि दर्शनं प्राप्तं, परकीयमनोगतानां घटादीनामालम्ब्यानां तत्रासत्त्वेनास्पष्टेऽविषये च घटादावर्थे तस्य भाना(वा)त, न चैतद्युक्तं, आगमे तस्य दर्शनत्वेनापाठात् । भण्यतेत्रोत्तरम-नोइन्द्रिये मनोवर्गणाख्ये मनोविशेषे प्रवर्तमानं मनःपर्यायबोधरूपं ज्ञानमेव, न दर्शन, यस्मादस्पृष्टा घटादयो नास्य विपय इति शेषः, नित्यं तेषां लिङ्गानुमेयत्वात् । तथा चागमः (विशेषावश्यक गाथा ८१४)-"जाणइ बज्झे णुमाणाओ ति" मनोवर्गणास्त परात्मगता अपि स्वाश्रयात्मस्पृष्टजातीया एवेति न तदंशेऽपि दर्शनत्वप्रसङ्गः। परकीयमनोगतार्थाकारविकल्प एवास्य ग्राह्या, तस्य चोभ केवलज्ञाननिरूपणे केवलज्ञानदर्शनोपयोगप्रसङ्गे मतिज्ञानदर्शनदृष्टान्तेन तत्त्वनिरूपणम् ॥ ACCIDEN ५। ११५॥ Page #247 -------------------------------------------------------------------------- ________________ GARRERSORRECEN यरूपत्वेऽपि छाअस्थिकोपयोगस्यापरिपूर्णार्थग्राहित्वान्न मनःपर्यायज्ञाने दर्शनसम्भव इत्यप्याहुः। किं च-"मइसुअनाणणिमित्तो, कवलज्ञान: छउमत्थे होइ अत्थउवलंभो ॥ एगयरंमि वि तेसिं, ण दसणं दसणं कत्तो ॥२-२७॥" मतिश्रुतज्ञाननिमित्त छद्मस्था निरूपणे नामर्थोपलम्भ उक्त आगमे । तयोरेकतरस्मिन्नपि न दर्शनं सम्भवति । न चावग्रहो दर्शन तस्य ज्ञानात्मकत्वात, केवलज्ञानततः कुतो दर्शनं, नास्तीत्यर्थः । ननु श्रुतमस्पृष्टेऽर्थे किमिति दर्शनं न भवेत्तत्राह-"जं पच्चक्खग्गहणं, ण इंति सुअनाणसमिया मदर्शनोपयोगअत्था ॥ तम्हा दंसणसदो, ण होइ सयले वि सुअनाणे॥२-२८॥" यस्माच्छ्रतज्ञानप्रमिता अर्थाः प्रत्यक्षग्रहणं न यान्ति, ४ प्रसङ्गे मतिअक्षजस्यैव व्यवहारतः प्रत्यक्षत्वात् । तस्मात्सकलेऽपि श्रुतज्ञाने दर्शनशब्दो न भवति । तथा च ' व्यञ्जनावग्रहा- ज्ञानादिदृष्टाविषयार्थप्रत्यक्षत्वमेव दर्शनत्वम्' इति पर्यवसन्नम् । प्रत्यक्षपदादेव श्रुतज्ञानवदनुमित्यादेावृत्तौ परोक्षभिन्नत्वे सतीति विशेषणं न्तेनतत्त्वन देयम् "मुत्तूण लिंगओ जं" इत्युक्तस्याप्यत्रैव तात्पर्य द्रष्टव्यम् । इत्थं चाचक्षुर्दर्शनमित्यत्र नञः पयुदासार्थकत्वादचक्षु प्ररूपणम् ॥ दर्शनपदेन मानसदर्शनमेव ग्राह्य, अप्राप्यकारित्वेन मनस एव चक्षुःसदृशत्वान्न घ्राणदर्शनादीति सर्वमुपपद्यते । तथाचावधि दर्शनमपि कथं सङ्गच्छते, तस्य व्यञ्जनावग्रहविषयार्थग्राहित्वेऽपि व्यवहारतः प्रत्यक्षत्वाभावादित्याशङ्कायाः प्रत्यक्षपदस्य व्यवहारनिश्चयसाधारणप्रत्यक्षार्थत्वात् , अवधिज्ञानस्य च नैश्चयिकप्रत्यक्षत्वाव्याहतेः परिहारमभिप्रयन्नाह-"जं अप्पुट्ठा भावा, ओहिन्नाणस्स होंति पञ्चक्खा ॥ तम्हा ओहिनाणे,दसणसद्दो वि उवउत्तो॥२-२९॥ स्पष्टा। उपयुक्तः लब्धनिमित्तावकाशः।। केवलज्ञानेऽपीदं लक्षणमव्याहतमित्याह-"जं अप्पुढे भावे, जाणइ पासइ य केवली णियमा ॥ तम्हा तं नाणं दं-सणं च अविसेसओ सिद्धं ॥२-३०॥" यतोऽस्पृष्टान भावान्नियमेनावश्यन्तया केवली चक्षुष्मानिव पुरःस्थितं जानाति SATARRIERSPECIAL Page #248 -------------------------------------------------------------------------- ________________ REC धीज्ञान प्रकरणम्॥ CREATERPREKX पश्यति चोभयप्राधान्येन, तस्मात्तत्केवलज्ञानं दर्शनं चाविशेषत उभयाभिधानानिमित्तस्याविशेषात्सिद्धं । मनःपर्यायज्ञानस्य तु व्यन्जनावग्रहाविषयार्थकप्रत्यक्षत्वेऽपि वाह्यविषये व्यभिचारेण स्वग्राह्यतावच्छेदकावच्छेदेन प्रत्यक्षत्वाभावाम दर्शनत्वमिति निष्कर्षः । अत्र यहीकाकृता "प्रमाणप्रमेययोः सामान्यविशेषात्मकत्वेऽप्यपनीतावरणे युगपदुभपस्वभावो बोधः, छद्मस्थावस्थायां त्वनपगतावरणत्वेन दर्शनोपयोगसमये ज्ञानोपयोगाभावादप्राप्यकारिनयनमनःप्रमवार्थावग्रहादिमतिज्ञानोपयोगप्राक्काले चक्षुरचक्षुर्दर्शने, अवधिज्ञानोपयोगप्राकाले चावधिदर्शनमाविर्भवति" इति व्याख्यातं तदर्धजरतीयन्यायमनुहरति, प्राचीनप्रणयमात्रानुरोधे श्रोत्रादिज्ञानात् प्रागपि दर्शनाभ्युपगमस्यावर्जनीयत्वात् , व्यञ्जनावग्रहार्थावग्रहान्तराले दर्शनानुपलम्भा तदनिर्देशाच्च, असङ्ख्येयसामयिकव्यञ्जनावग्रहान्त्यक्षणे "ताहे हुंति करेइ" इत्यागमेनार्थावग्रहोत्पत्तेरेव भणनात्, व्यञ्जना वग्रहप्राकाले दर्शनपरिकल्पनस्य चात्यन्तानुचितत्वात् ॥ तथा सति तस्येन्द्रियार्थसन्निकर्षादपि निकृष्टत्वेनानुपयोगप्रसङ्गाच्च, प्राप्यकारीन्द्रियजझानस्थले दर्शनानुपगमे चान्यत्रापि भिन्नतत्कल्पनेन किश्चित्प्रमाणं, 'नाणमपुट्टे' इत्यादिना ज्ञानादभेदेनैव दर्शनस्वभावप्रतिपादनात, "चक्षुर्वद्विषयाख्यातिः(द्वा-१०-३०)इत्यादिस्तुतिग्रन्थैकवाक्यतयापि तथैव स्वारस्याच्च । छद्मस्थज्ञानोपयोगे दर्शनोपयोगत्वेन हेतुत्वे तु चक्षुष्येव दर्शनं नान्यत्रेति कथं श्रद्धेयं ? तस्माच्छीसिद्धसेनोपज्ञनव्धमते न कुत्रापि ज्ञानादर्शनस्य कालभेदः, किं तु स्वग्राह्यतावच्छेदकावच्छेदेन व्यञ्जनावग्रहाविषयीकृतार्थप्रत्यक्षत्वमेव दर्शनत्वमिति फलितम् । यदि च चाक्षुपादावपि ज्ञानसामग्रीसामर्थ्यग्राह्यवर्तमानकालायंशे मितिमात्रायंशे च न दर्शनत्वव्यवहारस्तदा विषयताविशेष एव दर्शनत्वं, स च क्वचिदंशे योग्यताविशेषजन्यतावच्छेदकः, क्वचिच्च भावनाविशेषजन्यतावच्छेदकः, केवले च सर्वाशे आवरण केवलज्ञान निरूपणे केवलज्ञानदर्शनोपयोग| प्रसङ्गे मतिज्ञानादिदृष्टान्तेन तत्त्वप्ररूपणं नव्य| तार्किकमतनिष्कर्षश्च ॥ RECARD ॥ ११६॥ Page #249 -------------------------------------------------------------------------- ________________ HARREARCA-NCREAGER. क्षयजन्यतावच्छेदक इति प्रतिपत्तव्यं । न च अथेनैव घियां विशेष' इति न्यायादर्थाविशेषे ज्ञाने विषयताविशेषासिद्धिरिति शङ्कनीयं, अर्थेऽपि ज्ञानानुरूपस्वभावपरिकल्पनात् , अर्थाविशेषेऽपि परैः समूहालम्बनाद्विशिष्टज्ञानस्य व्यावृत्तये प्रकारिताविशेषस्याभ्युपगमाच्च । न हि तस्य तत्र भासमानवैशिष्टयप्रतियोगिज्ञानत्वमेव निरूपकविशिष्टज्ञानत्वं वक्तुं शक्यं, दण्डपुरुषसंयोगा इति समूहालम्बनेऽतिप्रसङ्गात् । न च भासमानं यद्वैशिष्टयप्रतियोगित्वं तद्वत् ज्ञानत्वमेव तथा, दण्डपुरुषसंयोगप्रतियोगित्वानुयोगित्वानीति ज्ञाने दण्डविशिष्टज्ञानत्वापत्तेः । न च स्वरूपतो भासमानमित्याधुक्तावपि निस्तारः, प्रतियोगित्वादेरतिरिक्तत्वे प्रकारित्वादेाननिष्ठस्य कल्पनाया एव लघुत्वात् । अनतिरेके तु दण्डदण्डत्वादिनिर्विकल्पकेऽपि दण्डादिविशिष्टज्ञानस्वापत्तेः। एतेन 'स्वरूपतो भासमानेन वैशिष्टयेन गर्भितलक्षणमपि'अपास्तम्, संयुक्तसमवायादेः सम्बन्धत्वे स्वरूपत इत्यस्य दुर्वचत्वाच्च । तस्मात्पराभ्युपगतप्रकारिताविशेषवदाकारविशेषः स्याद्वादमुद्रयाऽर्थानुरुद्धस्तदननुरुद्धो वा ज्ञाने दर्शनशन्दव्यपदेशहेतुरनाविलस्तत्समय एवार्थज्ञानयोरविनिगमेनाकाराकारिभावस्वभावाविर्भावादित्येष पुनरस्माकं मनीषोन्मेषः ॥ तस्माद्वयात्मक एक एव केवलावबोध इति फलितं स्वमतमुपदर्शयति-"साईअपज्जवसियं, ति दोवि ते ससमयं हवइ एवं।।परतित्थियवत्तव्यं, च एगसमयंतरुप्पाओ ॥२-३१॥" साद्यपर्यवसितं केवलमिति हेतो· अपि ज्ञानदर्शने ते उभयशब्दवाच्यं तदिति यावत् । अयं च स्वसमयः स्वसिद्धान्तः। यस्त्वेकसमयान्तरोत्पादस्तयोभण्यते, तत्परतीर्थिकशास्त्रं, नाहेद्वचन, नयाभिप्रायेण प्रवृत्तत्वादिति भावः । 'एवम्भूतवस्तुतत्वश्रद्धानरूप' सम्यग्दर्शनमपि सम्यग्ज्ञानविशेष एव, सम्यग्दर्शनत्वस्यापि सम्यग्ज्ञानत्वव्याप्यजातिविशेषरूपत्वाद्विषयताविशेषरूपत्वाद्वेत्याह-"एवं जिणपण्णत्ते, सद्दहमाणस्स भावओ भावे ॥ पुरिसस्सा PUNAULOSECRECASUAL ५॥ केवलज्ञान निरूपणे केवलज्ञानद४ शनद्वयात्मक है एक एव केवलोपयोग इति निश्चितश्री सिद्धसेन दिवाकर मतफलितप्रदर्शनम् ॥ Page #250 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रीज्ञानबिन्दुप्रकरणम् ।। ॥ ११७ ॥ A১৮ भिणिबोहे, दंसणसद्दो हवाइ जुत्तो ॥२- ३२||” जिनप्रज्ञप्तभावविषयं समूहालम्बनं रुचिरूपं ज्ञानं मुख्यं सम्यग्दर्शनं तद्वासनो पनीतार्थविषयं घटादिज्ञानमपि भाक्तं तदिति तात्पर्यार्थः ॥ ननु सम्यग्ज्ञाने सम्यग्दर्शननियमवद्दर्शनेऽपि सम्यग्ज्ञाननियमः कथं न स्यादित्यत्राह - "सम्मन्नाणे नियमे ण दंसणं दंसणे उ भयणिज्जं ॥ सम्मन्नाणं च इमं, ति अत्थओ होइ उववण्णं ।। २-३३ ।। " सम्यग्ज्ञाने नियमेन सम्यग्दर्शनं, दर्शने पुनर्भजनीयं विकल्पनीयं सम्यग्ज्ञानं एकान्तरुचौ न सम्भवति, अनेकान्तरुचौ तु समस्तीति । अतः सम्यग्ज्ञानं चेदं सम्यग्दर्शनं चेत्यर्थः, अर्थतः सामर्थ्येने (र्थ्यादे)कमेवोपपनं भवति । तथा च सम्यक्त्वमिव दर्शनं ज्ञानविशेषरूपमेवेति निर्व्यूढम् । ( अथ ग्रन्थकृत्प्रशस्तिः ) प्राचां वाचां विमुखविषयो-न्मेषसूक्ष्मेक्षिकायां, येऽरण्यानी- भयमधिगता नव्यमार्गानभिज्ञाः ॥ तेषामेषा समयवणिजां सम्मतिग्रन्थगाथा, विश्वासाय स्वनयविपणिप्राज्यवाणिज्यवीथी । १ ॥ भेदग्राही (हि) व्यवहृतिनयं संश्रितो मल्लवादी, पूज्याः प्रायः करणफलयोः सीम्नि शुद्धसूत्रम् ॥ भेदोच्छेदोन्मुखमधिगतः सग्रहं सिद्धसेन - स्तस्मादेते न खलु विषमाः सूरिपक्षास्त्रयोsपि (मी) ॥२॥ चित्सामान्यं पुरुषपदभाक्केवलाख्ये विशेषे, तद्रूपेण स्फुटमभिहितं साद्यनन्तं यदेव || सूक्ष्मैरंशैः क्रमवदिदमप्युच्यमानं न दुष्टं तत्सूरीणामियममिमता मुख्यगौणव्यवस्था ॥ ३ ॥ तमोऽपगम चिज्जनुःक्षणभिदानिदानोद्भवाः, श्रुता बहुतराः श्रुते नयविवादपक्षा यथा ॥ तथा क इव विस्मयो भवतु सूरिपक्षत्रये, प्रधानपदवी धियां क नु दवीयसी दृश्यते ॥ ४ ॥ केवलज्ञान निरूपणे केवलज्ञान दर्शनयोर मि. न्नत्वप्ररूपकसम्मति गाथाकदम्बोपसंहारः प्रशस्तौ च स्याद्वादमते | नयभेदेन पक्षत्रयनिर्दो षताप्ररूपण. मकान्त माहात्म्य प्रदर्शनञ्च ॥ ॥ ११७ ॥ Page #251 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रसह्य सदसत्त्वयोर्न हि विरोधनिर्णायक, विशेषणविशेष्ययोरपि नियामकं यत्र न ॥ गुणागुणविभेदतो मतिरपेक्षया स्यात्पदा, किमंत्र भजनोजिते स्वसमये न सङ्गच्छते ॥ ५ ॥ प्रमाणनयसङ्गता स्वसमयेऽप्यनेकान्तधी-र्नयस्मयतटस्थतोल्लस दुपाधिकिर्मीरिता ।। कदाचन न बाधते सुगुरुसम्प्रदायक्रमं समञ्जसपदं वदन्त्युरुधियो हि सद्दर्शनम् ॥ ६ ॥ रहस्यं जानन्ते किमपि न नयानां हतधियो, विरोधं भाषन्ते विविधबुधपक्षे यत खलाः ॥ अमी चन्द्रादित्यप्रभृ(कृ) ति विकृतिव्यत्ययगिरा (रो), निरातङ्काः कुत्राप्यहह न गुणान्वेषणपराः ॥७॥ स्याद्वादस्य ज्ञानबिन्दोरमन्दा-न्मन्दारद्रोः कः फलास्वादगर्वः ॥ 'द्राक्षासाक्षात्कारपीयूषधारा दारादीनां को विलासश्च रम्यः ॥ ८ ॥ 'गच्छे श्रीविजयादिदेव सुगुरोः स्वच्छे गुणानां गणैः, प्रौढिं प्रौढिमधानि जीतविजयाः प्राज्ञाः परामैयरुः ॥ तत्सातीर्थ्यभृतां नयादिविजयप्राज्ञोत्तमानां शिशु स्तत्वं किञ्चिदिदं यशोविजय इत्याख्याभृदाख्यातवान् ९ ॥ इति श्रीज्ञानविन्दुप्रकरणं समाप्तम् ॥ प्रभूतावधानधारि-क्रूर्चीलसरस्वती - न्यायविशारद - न्यायाचार्य - महेोपाध्यायश्रीयशोविजयगणिप्रणीते अपूर्णावस्थं सविवरणं १ श्रीज्ञानार्णवप्रकरणं २ पूर्ण श्रीज्ञानबिन्दुप्रकरणं च सम्पूर्णे | छ स्वाद्वादमा हात्म्यं ग्रन्थ कृतो गुरुपरम्पराप्रशस्तिश्र ॥ Page #252 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ज्ञानार्णव शुद्धिपत्रकम् शानबिन्दु // सूचना-पंक्त्यङ्कः चतुर्दशसंख्यां यावत् प्रथमपृष्ठस्य, तदुपरितनी च संख्या द्वितीयपृष्ठस्य // ॥श्री ज्ञानार्णव-ज्ञानबिन्दु ग्रन्थद्वयशुद्धिपत्रकम् // 0000000ww अशुद्धम् शुद्धम् पत्रं पंक्ति अशुद्धम् शुद्धम् पत्रं पंक्तिः | अशुभम् स्वार्थशषेण स्वविशेषण 223] निरूपणोपाय निरूपणोपपि 17 22 बन्ध बन्धन बोधकत्वस्य बोधिकत्वस्य 416 बद्विरा बद्रिरा(भङ्गुरा)२१ 1 निश्चित निधितं वृति ज्ञानस्य वृत्तिज्ञानत्व होमवृति हीनतृत्ति. 25 3 न्यदेव, न्यदेतत्, श्रुतस्यो श्रुतस्येष तस्यो 7 यावदिति 32 27 भ्युनम भ्युपगम रे व्यब रेण्यषस्थापित, व्यव७ पयुक्ता पव" इत्युक्ता 35 21 विपरीत विपरीत न च व्यक्त न चाऽध्यक्त हङ्कोन्द्रिय कारेन्द्रिय ज्ञानज्ञानो ज्ञानाज्ञानो तापानुर तात्पर्यानुप कचिदज्ञान द्रापारीणाम द्रोहपरिणाम 38 वचिदान पतितया घातितया योपळब्धिः भवनादेरस बोलब्धिः भवनोदरस 39 मधे तयात्वाद,' तथावाद, गम्य एष गम्यमान पत्र योगेन यागेन नयस्याकृत्य नयस्य कृत्य स्पायु सत्तिर्यु नुपतधेप नुपपत्तेध तन्न, पतद जिग्गस्स जिग्गयस्त तीपय त्तद्विषय बुद्धया बुद्धया 1614 तन अर्भारवः अभीरतः अनुप- अनुपयु 2. विशेष्याव विशेष्यताब 6. 25 | बडयेन स्यतन 000000000 तत्र तमेतद् 118 //