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अनुयोगचन्द्रका टीका सूत्र २०५ अद्धापत्थोपमस्वरूपनिरूपणम्
योजनम्, ऊर्ध्वमुच्वत्वेन तत्रिगुणं सविशेष परिक्षेपेण । तत् खलु परयम् ऐका हिक - द्वैयह्निक- यावद् भृतं वालाग्र कोटीनाम् । तानि खलु वालाग्राणि
अब सूत्रकार अद्धापल्योपम का स्वरूप प्रकट करते हैं'से किं तं अद्धापलिओवमे ' इत्यादि । सूत्र ॥ २०५ ॥ शब्दार्थ - (से किं तं अद्धापलिभोवमे ? ) हे भदंत । पल्पोपम प्रमाण का जो द्वितीय भेद अद्वापल्योपम हैं - उसका क्या स्वरूप है ? उत्तर- (अद्धा पलि भोवमे) अद्धावल्योपम का स्त्ररूप इस प्रकार से है - वह अद्धापल्योपम (दुविहे पण्णत्ते) दो प्रकार का कहा गया है । (तं जहा) उसके वे प्रकार ये हैं - (हमे य वावहारिए घ) एक सूक्ष्म अद्धापल्योपम और दूसरा व्यावहारिक अद्वापत्थोपम (तस्थ णं जे से
हमे से ठप्पे ) इनमें जो सूक्ष्म अद्धा पत्योपम है, वह बाद में प्ररूपिन किया जावेगा । (तत्थ णं जे से बावहारिए से जहानामिए पल्ले सिया) - पहिले जो व्यावहारिक अद्धापल्योपम है, हम उसका वर्णन करते हैं । सुनो, जैसे कोई एक पल्प हो (जोयणं आगामविक्खंभे णं, जोयणं खडुं उच्चतेणं त्रिगुणं सविसेसं परिक्खेवेणं) यह लंबाई में एक योजन का हो और चौंडाई में भी एक योजन की हो तथा इसकी गहराई जो हो वह भी एक योजन की हों । तथा इसकी जो वृत्त-परिषि હવે સૂત્રકાર અદ્ધાપલ્યાપમનું કથન કરે છે.
" से किं तं अद्धापलिओषमे " त्याहि
शब्दार्थ—{से किं तं अद्धापलिओ मे १) हे लढत ! पयेोषभ प्रभा ણુના જે દ્વિતીય ભેદ અદ્ધાપલ્યેાપમ છે તેનુ' સ્વરૂપ કેવુ'. છે ?
उत्तर- (अद्धावलिओ मे ) भद्धापत्येोपमनु स्वरूप या प्रमाणे हे ते, श्रद्धास्योपम (दुविहे पण्णत्ते) मे प्रारा उडेवामां आये छे. (तंजा) ते प्रा प्रभा :- (सुमे य वावहारिए य) मे सूक्ष्म अद्धायथायस याने द्वितीय व्यावहारिक श्रद्धापयेोयभ (तत्थ णं जे से सहमे से ठप्पे ) આમાં જે સૂક્ષ્મ અદ્ધાપલ્યેાપમ છે, તેનું નિરૂપણુ પછી કરવામાં આવશે, (तत्थ णं जे से वावहारिए से जहा नामिए पल्ले सिया) प्रथम ने व्यावहारि અદ્ધાપયેાપમ છે, હવે તેનુ' વર્ણન કરીએ છીએ સાંભળેા, જેમ કોઈ એક પક્ષ્ય હાય. (जोयणं आयामधिक्खंभेण, जोयण' उड्ड उच्चत्तेण तं तिगुण सविसेसं परिक्खेवेण) या संमां थे! योन प्रभाष भने डेजाभ પશુ એક ચાજન પ્રમાણ જેટલે હોય, તેમજ તેની ઊંડાઈ પણ એક ચૈાજન જેટલી હાય તથા તેની વૃત્ત-પરિધિ પણ કંઇક વધારે ત્રણ ચીજન