Book Title: Kasaypahudam Part 09
Author(s): Gundharacharya, Fulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
Publisher: Bharatvarshiya Digambar Jain Sangh
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गा० ५८] उत्तरपयडिअणुभागसंकमे वड्डीए अप्पाबहुअं
१५५ ६ ५६७. कुदो ? तव्यदिरित्तासेससम्मत्त-सम्मामिच्छत्तसंतकम्मियजीवाणमवहिदसंकामयभावेणावट्ठाणदंसणादो । एत्थ गुणगारपमाणं अवलि० असंखे०भागमेत्तो घेत्तव्यो ।
8 सेसाणं कम्माणं सव्वत्थोवा अवत्तव्वसंकामया।
६५६८. कुदो ? अणंताणुबंधीणं विसंजोयणापुचसंजोगे वट्टमाणपलिदोवमासंखेजभागमेत्तजीवाणं सेसकसाय-गोकसायाणं पिसव्यावसामणापडिवादपढमसमयमहिद्विदसंखेजोवसामयजीवाणमबत्तव्यभावेण परिणदाणमुवलद्धीदो।।
* अणंतभागहाणिसंकामया अणंतगुणा । ६५६६. कदो ? सबजीवाणमसंखेजभागपमाणत्तादो ।
8 सेसाणं संकामया मिच्छत्तभंगो।। ६५७०. सुगममेदमप्पणासुत्तं ।
एवमोघेणप्पाबहुअं समत्तं । ६५७१. आदेसेण मणुसतिए विहत्तिभंगो । णवरि बारसक०-णवणोक० अणंताणु० भंगो । सेससव्वमग्गणासु विहत्तिभंगो । एवं जाव अणाहारि ति ।
. एवं वड्डिसंकमो समत्तो ।
६५६७. क्योंकि पूर्वोक्त दो पदवाले जीवोंके सिवा सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके सत्कर्मवाले शेष सब जीव अवस्थितसंक्रम करते हुए पाये जाते हैं। यहाँ पर गुणकारका प्रमाण आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण लेना चाहिए।
* शेष कर्मों के अवक्तव्यसंक्रामक जीव सबसे स्तोक हैं।
६५६८. क्योंकि अनन्तानुबन्धियोंके विसंयोजनापूर्वक संयोगमें विद्यमान हुए पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण जीव तथा शेष कषायों और नोकषायोके भी सर्वोपशमनासे गिरते हुए संक्रमके प्रथम समयमें स्थित हुए संख्यात उपशामक जीव अवक्तव्यभावसे परिणमन करते हुए उपलब्ध होते हैं।
* उनसे अनन्तभागहानिके संक्रामक जीव अनन्तगणे हैं। ६५६६. क्योंकि ये सब जीवोंके असंख्यातवें भागप्रमाण होते हैं। * शेष पर्दोके संक्रामक जीर्वोका भङ्ग मिथ्यात्वके समान है। . ६५७०. यह अर्पणसूत्र सुगम है।।
इस प्रकार ओघसे अल्पबहुत्व समाप्त हुआ। ६५७१. आदेशसे मनुष्यत्रिकमें अनुभागविभक्तिके समान भङ्ग है । इतनी विशेषता है कि बारह कषाय और नौ नोकषायोंका भङ्ग अनन्तानुबन्धीके समान है । शेष सब मार्गणाओंमें अनुभाग विभक्तिके समान भङ्ग है।
इस प्रकार वृद्धिसंक्रम समाप्त हुआ।