Book Title: Kasaypahudam Part 09
Author(s): Gundharacharya, Fulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
Publisher: Bharatvarshiya Digambar Jain Sangh

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Page 492
________________ गा० ५८] नत्तरपयडिपदेससंकमे संकमट्ठाणाणि ४६५ कमेण परिवड्डिदसरूवाणि लद्धाणि भवंति, अधापवत्तचरिमसमयम्मि उच्चिणिदूण गहिदपरिणामपंतिआयामादो एत्थतणपरिणामट्ठाणपंतिआयामो उच्चिणिदण रचिदसरूवो असंखेजगुणो। ७६१. संपहि एदस्स किंचि कारणं भणिस्सामो । तं जहा-अधापवत्तकरणचरिमसमयम्मि जहण्णसंतकम्मं जहण्णपरिणामेण संकामेमाणस्स जहण्णसंकमट्ठाणादो तं चेव जहण्गदव्यमुक्कस्सपरिणामेण संकामेमाणस्स उकस्ससंकमट्ठाणमसंखेजलोगभागब्भहियं चेत्र होइ असंखेजगुणब्भहियमण्णं वा ण होइ ति एसो णियमो। कथमेदं परिच्छिण्णमिदि भण्णदे-मिच्छत्तस्स तिसु अद्धासु भुजगारो संकमो पदिदो । उवसमसम्माइट्ठिस्स वा दंसणमोहक्खवणाए वा पुव्वुप्पण्णसम्मत्तमिच्छाइटिणा वा अविणट्ठवेदगपाओग्गेण कालेण सम्मत्ते गहिदे तस्स पढमावलियकालभंतरे भुजगारसंकमो होइ त्ति । एत्थ तदियपयारे मिच्छाइद्विचरिमावलियणवकबंधवसेण. भुजगारप्पयरावद्विदाणं तिण्हं पि संभवो जोजिदो। तत्थ पढमावलियविदियादिसमएसु उदयावलियमणुप्पविसमाणगोवुच्छादो हेट्ठिमसमयम्मि विज्झादेण संकेतदव्वादो च संकमपाओग्गभावेण ढुकमाणणवकबंधस्स केतिएणावि बहुत्तसंभवमस्सिदण भुजगारसंकमो परूविदो, सो च असंखेजभागवड्डीए चेव होदि ति वुत्तं । जइ वुण विज्झादसंकमविसये वि असंखेजगुणवहिणिमित्तपरिणामसंभवो maaaaamanna प्राप्त होते है, क्योंकि अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समयमें उठा कर ग्रहण किये गये परिणामस्थानों की पंक्तिके आयामसे यहाँको परिणामस्थानोंकी पंक्तिका आयाम उठाकर रचा गया असंख्यात गुणा होता है। ६७६१. अब इसके कुछ कारणको कहेंगे। यथा-अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम समयमें जघन्य सत्कर्मको जघन्य परिणामके द्वारा संक्रम करनेवाले जीवके जो जघन्य संक्रमस्थान होता है उससे उसी जघन्य द्रव्यको उत्कृष्ट परिणामके द्वारा संक्रम करनेवाले जीवके उत्कृष्ट संक्रमस्थान असंख्यात लोकका भाग देने पर मात्र एक भाग अधिक होता है। असंख्यातगुणा अधिक या अन्य नहीं होता यह नियम है। शंका-यह नियम किस प्रमाणसे जाना जाता है ? समाधन कहते हैं-मिश्यात्वका तीन कालोंमें भुजगार संक्रम होता है- एक तो उपशम सम्यग्दृष्टिके, दुसरे दर्शनमोहनीयकी क्षपणाके समय और तीसरे जिसने पहले सम्यक्त्वको उत्पन्न किया है ऐसे मिथ्यादृष्टिके द्वारा वेदक सम्यक्त्वके योग्य कालका नाश किये बिना सम्यक्त्व के ग्रहण करने पर उसके प्रथम श्रावलिरूप कालके भीतर मुजगार संक्रम होता है । उनमेंसे यहाँ पर तीसरे प्रकारमें मिथ्यादृष्टिकी अन्तिम आवलिमें हुए नवकबन्धके कारण भजगार, अल्पतर और अवस्थित ये तीनों सम्भव हैं। उनमेंसे वहाँ प्रथम श्रावलिके द्वितीयादि समयोंमें उदयावलिमें प्रविष्ट होनेवाली गोपुच्छासे और अघस्तन समयमें विध्यातसंक्रमके द्वारा संक्रान्त हुए द्रव्यसे संक्रमके योग्यरूपसे प्राप्त हुए नवकबन्धका कितने ही द्रव्यके द्वारा बहुतपनेका आश्रय कर भुजगार

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