Book Title: Kasaypahudam Part 09
Author(s): Gundharacharya, Fulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
Publisher: Bharatvarshiya Digambar Jain Sangh

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Page 427
________________ ४०० जैयधवलासहिदे कसायपाहुडे [बंधगो ३ मिच्छत्तस्स तप्पाओग्गजहण्णसंकमेणावट्ठाणसंभवो ? वुच्चदे-खविदकम्मंसियलक्खणेणागंतूण पुव्वुप्पण्णसम्मत्तादो मिच्छत्तमुवणमिय तप्पाओग्गेण कालेण पुणो वि वेदगसम्मत्तं पडिवण्णस्स पढमावलियाए विदियादिसमएसु अवद्विदसंकमपाओग्गो होइ, मिच्छाइद्विचरिमावलियणंवकबंधवसेण तत्थागम-णिजराणं सरिसीकरणसंभवादो। तदो तहाभूदसम्माइद्विपढमावलियावलंबणेण पयदसामित्तसमत्थणमेवं कायव्वं । तं जहा-तप्पाओग्ग विदकम्मंसियलक्खणेणागंतूण पुव्वुप्पण्णसम्मत्तादो मिच्छत्तं गंतूण पुणो सम्मत्तं पडिवण्णस्स पढमसमए तप्पाओग्गजहण्णं मिच्छत्तस्स पदेससंतकम्मट्ठाणं होइ । ६६६४. संपहि एत्थ सम्माइट्ठिपढमसमए णिरुद्धसंतकम्मपडिबद्धसंकमट्ठाणाणं कारणभूदाणि असंखेजलोगमेतज्झवसाणट्ठाणाणि होति । तत्थ जहण्णज्झवसाणट्ठाणेण संकामेमाणस्स जहण्णसंकमट्ठाणमुप्पजदि। पुणो तम्मि चेव जहण्णसंतकम्मम्मि असंखेजलोगभागवडिहेदुविदियज्झवसाणट्ठाणेण परिणमिय संकामिजमाणे अण्णं संकमट्ठाणमपुणरुत्तमुप्पजदि। एवमेदेण कमेण तदियादिअज्झबसाणट्ठाणाणि वि जहाकमं परिणमिय संकामेमाणस्सासंखेजलोगभागुत्तरकमेणेगेगसंकमट्ठाणपक्खेववडढीए णिरुद्धजहण्णसंतकम्मट्ठाणम्मि असंखेजलोगमेत्तसंकमट्ठाणाणमपुणरुत्तणमुप्पत्ती वत्तव्वा । ६६६५. संपहि एदेसु संकमट्ठाणेसु सम्माइट्ठिपढमसमयम्मि जहण्णसंकमट्ठाणमवत्तव्यभावेण संकामिय पुणो सम्माइडिविदियसमयम्मि विदियसंकमट्ठाणे संकामिदे जहण्णया वड्डी होइ, परिणामविसेसमस्सिऊण तत्थासंखेजलोगपडिभागेण संकमस्स अन्तिम आवलिमें हुए नवकबन्धके कारण वहाँ पर आय और निर्जराका समान होना सम्भव है। अतः उस प्रकारके सम्यग्दृष्टिकी प्रथम आवलिके अवलम्बन द्वारा प्रकृत स्वामित्वका समर्थन इस प्रकार करना चाहिए । यथा-जो जीव क्षपितकर्मा शिक लक्षणसे आकर और पूर्व में उत्पन्न हुए सम्यक्त्वसे मिथ्यात्वमें जाकर पुनः सम्यक्त्वको प्राप्त हुआ है उसके प्रथम समयमें मिथ्यात्वका तत्प्रायोग्य जघन्य प्रदेशसंक्रमस्थान होता है। ६६६४. यहाँ पर सम्यग्दृष्टिके प्रथम समयमें विवक्षित सत्कर्मसे सम्बन्ध रखनेवाले संक्रम स्थानोंके कारणभूत असंख्यात लोकप्रमाण अध्यवसानस्थान होते हैं । वहाँ पर जघन्य अध्यवसानके द्वारा संक्रम करनेवाले जीवके जघन्य संक्रमस्थान उत्पन्न होता है । पुनः असंख्यात लोकरूप भागवृद्धिके कारणभूत द्वितीय अध्यक्सानरूपसे परिणमन कर उसी जघन्य सत्कर्मका संक्रम क'ने पर दूसरा अपुनरुक्त संक्रमस्थान उत्पन्न होता है। इसी प्रकार इस क्रमसे तृतीय आदि अध्यवसान स्थानोंको भी परिणमाकर संक्रम करनेवाले जीवके असंख्यात लोक भाग अधिकके क्रमसे एक एक संक्रमस्थान प्रक्षेपवृद्धिके आश्रयसे विवक्षित जघन्य सत्कर्मस्थानमें असंख्यात लोकप्रमाण अपुनरुक्त संक्रमस्थानोंकी उत्पत्ति करनी चाहिए। ६६६५. अब इन संक्रमस्थानोमेंसे सम्यग्दृष्टिके प्रथम समयमें जघन्य संक्रमस्थानको अवक्तव्यरूपसे संक्रमाकर पुनः सम्यग्दृष्टिके दूसरे समयमें दूसरे संक्रमस्थानके संक्रमित कराने

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