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विमानस्थान-अ०८. होते उनकी संतान उन्होंके समान गुणवाली,वंशके विस्तार करनेवाली और चिरंजीवी होती है ।। १२५ ॥
अतविपरीतास्त्वसाराः ॥ १२६ ॥ इससे विपरीत गुणोंवाले मनुष्य असार अर्थात् सारहीन होतेहैं ॥ १२६ ॥. मध्यानांमध्यःसारविशेषैर्गुणविशेषाव्याख्याताः। इतिसाराण्यष्टौपुरुषाणांबलप्रमाणविशेषज्ञानार्थानि ॥ १२७॥ मध्यमसार मनुष्यके शरीरमें संपूर्ण लक्षण मध्यम होते हैं ।इस प्रकार मनुष्योंके. वल, प्रमाण, विशेषके ज्ञान के लिये आठ प्रकारके सारोंका वर्णन कियागया१२७॥
कथंनुशरीरमात्रदर्शनादेवभिषमुह्येदयमुपचितत्वाइलवानयमल्पबलाकृशत्वान्महाबलवानयंमहाशरीरत्वादयमल्पशरी. रत्वादल्पबलइति । दृश्यन्तेह्यल्पशरीराःकृशाश्चैकेबलवन्तःतत्रपिपीलिकाभारहरणवसिद्धिः ।अतश्चसारतःपरीक्षेतइत्यु. क्तम् ॥ १२८॥ वद्य रोगीके शरीरमात्रकोही देखकर मोहित न होजाय । जैसे-हृष्टपुष्ट शरीरको देखकर यह बलवान है । कृश शरीरको देखकर यह दुर्वल है । बडे शरीरको देखकर वडा शरीर हानेसे वलवान समझ लेना, छोटा शरीर देखकर निर्बल समझ लेना इत्यादि मोहको न प्राप्त होजाय । क्योंकि छोटे शरीरवाले और कृश शरी: खाले भी बहुतसे बलवान् देखनेमें आतेहैं। जैसे पिपीलिका (चींटी विशेष)बहुत छोटी और कृश शरीर होते हुए भी अपनेसे अधिक भारको उठालेती है । इसी प्रकार सारवान् मनुष्य भी जानना । इसलिये सारद्वारा मनुष्यकी परीक्षा करनी चाहिये यह वर्णन कियागया है ॥ १२८॥
समुदायद्वारा परीक्षा । संहननतश्चतिसंहननसंघातःसंयोजनमित्यकोर्थः ॥ १२९ ॥ वैद्यको चाहिये कि शरीरकी संहननतासे भी परीक्षा करे । संहनन, संघातक. और संयोजन इन तीनों शब्दोंका एक ही अर्थ है । यह शब्द शरीरके संगठनके वाचक हैं ॥ १२९ ॥
तत्रसमसुविभक्तास्थिसुबद्धसन्धिसुनिविष्टमांसशोणितंसुसंहतंशरीरमित्युच्यते । तत्रसुसंहतशरीराः पुरुषाबलवन्तविप