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________________ 卐 ) HTHHTHHTH // पूज्यपाद आगमोद्धारक आचार्य श्रीमत् सागरानन्दसूरीश्वर-चरणकमलेभ्यो नमः / / // पंन्यास श्री मतिसागर विरचितम् // // सदेववत्सकुमारचरित्रम् // :: संशोधक-शास्त्री मणिशंकर छगनलाल :: :: प्रथमावृत्ति वीर संवत् 2458 ] . पण्यम् अमूल्यम् [ विक्रम संवत् 1988 मुद्रकः शा. रतिलाल केशवनाल : : मुद्रणस्थान : श्री वीरशासन प्रीन्टींग प्रेस, रतनपोळ-अमदावाद. כתבה TE
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________________ / प्रस्तावना // अई // आसंसारमागरमां, मनुष्य जन्मरूपरत्ननी प्राप्ति यवा अतीव दुर्लन छे / कारण के ? ज्या अनेक नवोपार्जित पुण्यनो उदय थाय छे, त्याज मनुष्यजन्मनीप्राप्ति थाय छे / / मनुष्यजन्मी धर्म अर्थ काम अने मोक्ष। चार पुयायी साधी शकाय छ। माटे मनुष्यजन्मनी प्राप्ति थर्श अत्यन्त दुर्लभ छे / तो ज्या सुधी शुद्ध जेन धमनी प्रालि न पाय, त्यां सुधी मनुष्य जन्म मल्या छतां न मल्या जेवो वृथा टेनेथीज जिने वाला शासनमा द्रव्यानुयोग-गणितानुयोग-चरणकरणानुयोग-तथा धर्मकथानु योग ए चार योग! प्रसिद्ध छे। शुद्धजेन वर्मनी प्राप्ति थवामां घणुकरीने धर्मकथानुयोगज सर्व भव्य जीवाने उपकारक श्राय छ / तेमज वर्मकथानुयांगना वीजा त्रण योगो अलंगे मग देवाला / नेयी पूर्वना आचार्योर पण धर्मकथानुयोजना विषयमा वा अन्यो ग्चेलाने, ए अनुभवगम्यछे / तो आ सदैववत्सुमार चरित्र पण एक धर्मकथानुयोग विषयनुजछे / आ चरित्रनी अंदर छा रसोनुं वर्णन संक्षेपथी करबुंछे। तेमज आ चरित्रमा सदैववत्सकुमारना
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________________ KE शौर्य-धैर्य-गांभीर्य-औदार्य-परोपकारित्व-न्यायवर्तित्व- निर्लोभता-अभयदान-दातृत्व-सत्त्वादि-व्यवहारिक KE गुणोनुं तथा पारमार्थिक गुणोनुं वर्णन कर्या पछी तेने जे प्रकारे शुद्ध जैन धर्मनी प्राप्ति थइ छ, K ते बाबत वर्णन करेलुं छे। तेमज वच्चे वच्चे तेनी पत्नी सावलिंगना प्रसंगे सती स्त्रीओना धर्मनो महिमा वर्णव्यो छे / तो संसारनी माया कपटजालनी ओलखाण करावी वैराग्यभावना जाग्रतकर नारा आवा महात्मापुरुषोना चरित्रो सांभलवाथी घणा भव्यजीवो बोध पामे छे। तेथी आवा चरित्रो Ka वक्ता तथा श्रोता जनोना इदयने आनंद आपनारा थाय छे। आवा हेतुथीज आ चरित्र पण छपावी प्रगट करेलुं छे। आ चरित्रने बनतो प्रयास करी शोधाव्युंडे। छतां शोधकना प्रमादथी अथवा बापK वाना दोषी को कोइ स्थले अशुद्धिरहेली होयतो सत्पुरुषोए कृपा करी शुद्धकरीने वाचवू / / या चरित्र रांधनपुरनगरमा विक्रम संवत् 1986 ना माघ मासनी पूर्णिमाने दिवसे संपूर्ण | कर्युठे। इति शुभं भूयात् // संवत् 1988 ना वर्षमां आ चरित्र छपावी प्रसिद्ध कर्युठे. //
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________________ श्रीजिनाय नमः अथ श्रीसदैववत्सचरित्रं प्रारभ्यते॥ मूलगयकर्ता-श्रीहर्षवर्धनगणी // तपागच्छ नभोनभोमणि आगमोद्धारक जैनाचार्य श्री सागरानंदमूरीश्वरजी गुरुभ्यो नमोनमः / / संयोजकः-अनुयोगाचार्य पन्यास श्री मतिसागरजी महाराज // धर्माजन्म कुले शरीरपटुता सौभाग्यमायुबलं / धर्मेणैव भवंति निर्मलयशोविद्यार्थसंपत्तयः // KE कांताराच्च महाभयाच्च सततं धर्मः परित्रायते / धर्मःसम्यगुपासितो भवति हि स्वर्गापवर्गप्रदः // 1 // दानं तु पात्रेविशदं च शीलं तपोविचित्रं शुभभावना चाभवार्णवोत्तारणसंतरंडं धर्म चतुर्धा मुनयो वदन्ति। नो शीलं परिपालयति गृहिणस्तप्तुंतपो न क्षमा। आर्तध्यानवशागतोज्ज्वलधियस्तेषां व सद्भावना॥ - इत्येवं निपुणेन हंत मनसा सम्यग् मया निश्चितं / नोत्तारो भवकूपतोऽस्ति गृहिणां दानंविना कहिँचित३ - सर्वतोऽपि ततो मुख्यं दानं च कथितं भुवि / तत्पुनः पंचधा प्रोक्तं सुविचार्य महात्मभिः // 4 // // अभयं 1 सुपत्तदाणम् 2 / अणुकम्पा 3 उचिय 4 कित्तिदाणं 5 च // दोहिंमुखो भणिउ / तिन्नि अ भोगा इयंदिति
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________________ चरित्रम् श्री सदैवब-स आद्यदानद्वयं तत्र कथितं मोक्षहेतुकम् / मुख्यधर्मातरूपत्वाद्वर्ण्यते विविधास्पदम् 5 // केवलाभयदानेऽत्र पात्रदाने च प्रस्तुता / कथा व्याख्यायतेऽस्माभिः सदयवत्सभूपतेः // 6 // लक्षाष्टादशसंयुक्तद्विनवतिसहस्रेषु / ग्रामेषु मालबोनाम देशोऽस्ति ह्यभिरामकः // 7 // प्रचंडेवें रिवृन्दैश्च न ग्राह्यो वर्ततेभुवि / विषममंडप ईगै मध्यभागे सुमण्डितः // 8 // संत्रस्तजनरक्षार्थ पितृगेहोपमः स्मृतः / उज्जयिनी पुरी तत्र वर्तते सर्वतोऽधिका // 9 // प्राकारपरिखाकूपकासारारामराजिता। बालकोलाहलाकीर्णसौधदेवकुलाकुला // 10 // | अगण्यपण्यसंपूर्णैरापणैर्भूषितांतरा / केन वर्णयितुं शक्या सा पुरी विस्मयावहा // 11 // KE कूटमेकमपित्याज्यं सा त्रिकूटात्वसाविति / सकलंका ध्रुवं लंका मेने यन्मानवैन कैः // 12 // विस्फरत्कन्दलावल्ल्यः सरोगा हंससारसाः। विरुद्धाः शाखिनः सर्वे न च लोकाः कदाचन // 13 // तस्यां पुरि महाराजः प्रभुवत्सोमहीपतिः / राज्यं करोति सन्मान्यः पितृवत् पालयन् प्रजाः // 14 // नमन्नृपतिसंघातैः सेव्यमानपदाम्बुजः / प्रजावात्सल्यवान् दानी परोपकृतिकारकः // 15 // यस्यपरोपकारित्वमपूर्वं वर्ण्यते कथम् / वैरिणोऽपि समे येन प्रापिताः स्वर्गसंपदम् // 16 //
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________________ तस्य राज्ञी महालक्ष्मी नाम रूपवती सती सौंदर्यशीलसंपन्ना यतो देवांगनाधिका // 17 // - तस्याः पुत्रोऽभवद्राझ्याः सदयवत्ससंज्ञकः / रूप सौभाग्य लावण्य गुणयुतो महामतिः // 18 // द्विसप्ततिकलादक्षो रंजयामास स्वं पुरम् / बाह्यादपिपरं द्यूतक्रीडायां रसिकश्चसः // 19 // द्यूतस्य व्यसनंचातिप्रोक्तं दोषनिधानकम् / इतिपित्रोपदिष्टोऽपि मुंचति बहुधा न सः / / 20 // शशिनि खलु कलंक कंटकाः पह्मनाले / जलधिजलमपेयं पंडितेनिर्धनत्वम् // दयितजनवियोगो दुर्भगत्वं सुरूपे / धनवति कृपणत्वं रत्नदोषी कृतांतः // 21 // | क्रमेण यौवनं प्राप रम्यं सर्वमनोहरम् / व्यूढोरस्कः वृषस्कन्धो दृढभुजो महाबली // 22 // इतस्तस्मिंश्चकाले हि नवलक्षप्रमाणकैः / ग्रामैः संशोभिते देशे महाराष्ट्रसुनामके // 23 // E गोवत्सरीनदीतीरे दक्षिणापथमण्डनम् / समस्ति नगरं नाम्ना प्रतिष्ठानपुरंमहत् // 24 // E यत्र स्वर्णमयेदण्डैः कलशैश्चापिशोभिताः / पंचशतानि विद्यन्ते दशाधिकानि शोभनाः // 25 // प्रासादा गगने लग्ना विराजन्ते जिनप्रभोः / सहस्राधिकसंख्यानि ह्यन्यदेवालयानि च // 26 // यत्र कोटीश्वराणां च सुविंशतिसहस्रकाः। निवासा द्रव्यसंयुक्ता विद्यन्ते परमाद्भता: 27 //
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________________ चरित्रम् श्री सदैववत्स सुमेरोराहृतानीव शृंगाणि कनकोत्कराः / गृहे गृहेऽपिदृश्यन्ते यत्र दारिद्यतस्कराः // 28 // - द्विपंचाशद्भटानां च स्थानं तद् विद्यते महत् / शूद्रकोकिलकादीना मन्यदप्युज्वलंबहु // 29 // योगिनीनां चतुःषष्टे निवासस्य शुभास्पदम् / नानाचित्रमयं रम्यं नानामणिविराजितम् // 30 // पुरेऽत्र प्रतिसामंतप्रणत्योन्नतविक्रमः / सीलवाहनभूपोऽस्ति जैनो निर्जितशात्रवः // 31 // गन्तःपुरदेवीनां प्रधाना कमलावती / सती राझो वरा राज्ञी सीलवाहनभूपतेः // 32 // | सीवलिंगा सुता तस्या बहुसुतेभ्य उत्तरम् / जाता निर्जितरम्मा वै रूपेण प्राणवत् प्रिया // 33 // अखिलानां जनानांच नयनमृगवागुरा / पितृभातृहृदाह्लादकारिणीन्दुमुखाम्बुजा // 34 // Ide| यस्याःपदांगुष्ठनखो मुखं च बिभर्ति पूर्णदुचतुष्टयंचाकलाचतुःषष्टिरुपैतुवासंतस्यांकथंसुभ्रविनोकुर्मायाम्।। | पाणिग्रहविधानाय तस्या राज्ञा सुकारितः / सर्वोपस्करसंयुक्तः स्वयंवरस्य मण्डपः // 36 // E तत्र राजकुमारा वै मिलिता आहृतास्तदा / एतच्छ्रुत्वा प्रधानाद्याः प्रभुवत्समथाऽब्रुवन् // 37 // अन्ये राजकुमारा वै स्वयंवरस्य मण्डपे / गता युष्मत्कुमारस्य ह्याकारणाय को पि न // 38 // अद्याप्यागतवान् राजन् स्वतस्तं प्रेषय प्रभो / उत्तमा नैवगच्छन्ति ह्यनाहृताः सुमेलने // 39 //
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________________ इत्युक्तवान्नृपस्ताँश्च पश्यन्दोषंसमाहितः / अनाहूतस्यसंवेशे जनानांसंगमे खल्लु // 40 // | यःप्रविशत्यनाहूतोऽपृष्टश्चबहुभाषते / अदत्तमासनंभेजे स पार्थ पुरुषाधमः // 41 // | उत्सुका नैव जायन्तां सावधाना भवन्तु भोः। सचिवा नूनमत्रापि नरःसत्वागमिष्यति // 42 // एवं वदत एवाग्रे तस्यराज्ञः समागमत् / दूतोऽधिगुणसंपन्नस्तेनोक्तं देव कर्ण्यताम् // 43 // सदयवत्समत्राहमाह्वयितुं नृपागतः / सीलवाहनभूपेन प्रेषितः सुधियाऽस्मि भोः // 44 // ततो राज्ञा कुमारोहि प्रेषितोमन्त्रिभिःसह / बहुसैन्यसमायुक्तो भूषणायैरलंकृतः // 45 // राज्ञोक्तं मन्त्रिणे सम्यग् व्ययार्थ यद्यसौसुतः मार्गयति धनंयद्यदर्पणीयं सुखेन तत् // 46 // कृपणत्वं न कर्तव्यं दानशौण्डे समागमे / कार्पण्यं क्रियमाणं वै यतोमहापकीर्तये !! 47 // औदार्यगुणयुक्तेषु कृपणो नैव शोभते / भद्रजातिगजेंद्रेषु यथा गर्दभमण्डलम् // 48 // राज्ञाच शिक्षितः सम्यग् मन्त्रीवै कृपणः सुधीः / स्तोकं स्तोक मदाद्दद्रव्यं कुमाराय व्ययाय वै॥४९ ऋणादपिमहान्कंपो दानस्यावसरेभवेत् / भीमः संकुचितोगात्रे दानदातव्यशङ्कया // 50 // कौरवहृतगोवालं कर्तुंगच्छंश्चवायुजः / हषादुल्लसितोधीरः सन्नाहं लातुमुद्यतः // 51 //
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________________ चरित्रम् श्री सदैववत्स तदेहे नागतः सर्वे पाण्डवा व्याकुलास्तदा / कृष्णन्यवेदयन् देहे नैति सन्नाहकः खलु // 52 // किं कर्तव्यं च भोकृष्ण धीरा भवत चाह सः / कृष्णो ब्राह्मणवेषेण याचनार्थं गतस्तदा // 52 // भीमस्तुवस्त्वभावेन नैवकिंचिच्चदत्तवान् / स संकुचितगात्रोऽभूत् खेदात् सन्नाह आगतः // 54 // विष्णुः स्वं प्रकटीच ह्येवंराजकुले व्ययम् / दर्बलोजायते दृष्टा भाण्डागारिक आगतम् // 55 // - इति न्यायं प्रबुध्यैव कुमारो मनसि व्यथाम् / आप तेन परं किंचिन्नाकथयत् स धीरधीः // 56 // - अर्थसंपत्तिकाले यः स्वजनैः कलहायते। तदों भ्रस्यते नूनं प्रतिष्टा तस्य हीयते // 57 // - कुटुम्बसमवायेन यत्कार्य क्रियते शुभम् / कालेन भवति प्रायस्तत्परिणामसुंदरम् // 58 // कुटुम्बकलहे न स्यात् कदा कार्य महागुणम् / अचिरेणैव कालेन भवेत्तदुःखदायकम् // 59 // विग्रहः खलु कुलेन नोचितो मोदतेऽरिकुलकल्पपादपः।कश्चरन्णभरेण सिंहयोःप्रीतिमेति न वने वनेचर... रंजयित्वा गतः सर्व स सौभाग्यादिभिर्गुणैः / नृपाणांसमुदायं वै सीवलिंग्याश्च धैर्यवान् // 61 // तत्र सदयवत्सो हि विवाहं कृतवान्गुणी / ब्राह्मणेभ्योधनंदत्वा वहुहर्पमयापच // 62 / / यस्ययोऽस्तिवरोभावी पूर्वकर्मप्रभावतः। सएवभवतिप्रायो नात्रकार्याविचारणा // 63 //
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________________ जोजस्सकएघडिऊ संघडइसुदूरगोविसोतस्स / वच्चंतिविंझगिरि संभवावि रायंगणे करिणो // 1 // सीलवाहनराजेन करस्य मोचने ततः / तस्मै गजतुरंगादि दत्तं सुबहुमानतः // 64 // तत्पश्चातसदयस्तत्र बहुकोटीधनव्ययात् / नामधेयं स्वकीयं स संस्थाप्य कमशः पुरम् // 65 // - स्वकीयमाजगामाथ चक्रे राज्ञा महान् महः / प्रवेशाय सुवीरस्य बहुधनव्ययेन हि // 66 // ततोऽनुरूपदारैश्च राज्यलीलां सुखेन वै / पितुश्चबहुमानेन सोऽनुभवति चोत्तमाम् // 67 // द्युतासक्ताय तस्मै च ह्येकदा धीरबुद्धिना। धनव्ययविधानेन ह्यस्थानेकृतवानतः // 68 // जिदूनत्वेन कुमाराय शिक्षाचहितकांक्षया / भूपतिना प्रदायीति यतो राज्यं स्थिरं भवेत् // 69 // वत्स नो वेत्सि किं राज्यं बहुकार्यनिरंतरम / स्वार्थंककरणव्यग्रपरिवारसमावृतम् // 70 // सावधानतया चिंत्यं करंडस्थभुजंगवत् / नियंत्रणियं कपिवद्गुणैः स्थानांतरंबजत् // 71 फलितक्षेत्रवन्नित्यं रक्षणीयं प्रयत्नतः / नव्याराम इवस्थित्या सेवनीयं मुहर्मुहः // 72 // अनीतिजलकल्लोलै रुच्छाटय क्षणतो ध्रुवम् / व्यसनाख्योनदीपूर पातयेद्राज्यपादपम् // 73 // एतदेवहि पाण्डित्यं यदा तदाल्पको व्ययः / अत्रोदाहरणं स्पष्टं मुनिनाथकमंडलुः // 74 //
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________________ श्री सदैवव चरित्रम् नित्यं कृतव्ययः स्वैरं मेरुरप्यपचीयते / तेजसीवगतेवित्ते नरों गारसमो भवेत् // 75 // बंधुर्बधुरधीस्तावत्तावद्भार्या मनोनुगा / सर्वः कलकल स्तावद्यावद्दद्रव्यसमागमः // 76 // निर्द्रव्यं च नरंनूनं संत्यजत्यनुजीविनः / मुंचन्ति विहगाः सद्यस्तडागमिव निर्जलम् // 77 // K अद्यश्वोवातवैवायं राज्यभारोवतिष्ठते / तन्निर्वाहक्षम विद्वन् साधारणं गुणं श्रय // 78 // अत्यासक्तिश्चदाने हि द्यूतेऽपि दोष एव च / सर्व च क्रियमाणंहि युक्त्या गुणाय जायते // 79 // - अन्यथानर्थहेतुस्तन्नात्र कार्या विचारणा / निदर्शनं तु पुत्र त्वं शृणु मत्तः सुबोधकृत् // 8 // - तरुदाहोऽतिशीतेन दुर्भिक्षमतिवर्षणात् / अतिद्युतादनौचित्यमति कुत्रापि नेष्यते // 8 // Hएकोरविरतितेजा अतिशूरः केसरी वनवासी / अतिविपुलं खं शून्यमतिगंभिरोंऽबुधिः क्षार // 82 // अतिदानाद्दलिर्बद्धो ह्यतिदण रावणः / अतिरूपाहृता सीता ह्यति सर्वत्र वर्जयेत् // 83 // ॥जिहिं न मुणिजाइदेव-गुरु जिहिं नविकज अकज्ज / तणुसतावणकुगइ पदकुणइ तिणिछयरमिंजा // | रक्षणीयः सदा दक्षैः पुरेऽपि व्यसनी वसन् / पापानांव्यसनंमूलं पापंदुःखततेरिव // 84 // - धर्मस्याव्यसनंमूलं धर्मः सर्वसुखश्रियाम् / व्यसनैः सुखमिच्छन्ति मूढाः शैत्यमिवानले // 85 //
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________________ सर्वव्यसनमुक्तेः स्युः सुकृतोसवकर्तियः / पुरुषे व्यसनत्यागे रचनीया रतिस्ततः // 86 // सतां संगः सदा पूज्य: पूज्यतामधिगच्छति / जनोयस्य प्रतापेन ह्यत्रोदाहरणं बहु // 87 // शिरसा सुमनःसंगाद्धार्यते तंतवोऽपि हि / तेऽपिपादेनमृद्यते पटेषु मलसंगताः॥ 88 // शिक्षाप्राप्य च तस्याह कुमारस्तात मन्यताम् / राज्ञांलक्ष्मीरनंता हि किमेवंगण्यतेत्वया // 89 // राजोचे बहुहेम स्याद् विधीयन्ते च शृंखलाः / तदा खलु महिष्या वै तैलं च बहु चेत्तदा // 90 // स्निह्यन्ते गिरयोनूनं पादशौचं विधीयते / तथामृतं बहुस्यादै युक्यैवंवारितोऽपि सः // 91 // तिष्ठति खलु नासौ नो प्रतिवक्तिच नोचितम् / व्यसनासक्तचित्तानां मनः प्रलुभ्यते खलु // 92 // सुवर्णैः पट्टकुलैश्च शोभंते वारयोषितः / पराक्रमेण दानेन राजते राजनन्दनाः // 93 // अनुकूले विधौ देयं यतः पूरयिता हि सः / प्रतिकूले विशेषेण यतः सर्व स नेष्यति // 94 // दातव्यं भोक्तव्य सति विभवे संचयो न कर्तव्यः / पश्येह मधकरीणां संचितमर्थ हरन्त्यन्ये // 15 // | राजा पुनश्चतंप्राह यदासीत्तस्य सूचितम् / प्राय सतां च चित्ते हि चिंतनं सत् सदा वसेत् // 96 // द्युतपोषी निजद्वेषी धातुवादी तथालसः / आयव्ययमनालोची यस्तदेहे वसाम्यहम् // 97 //
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________________ चरित्रम् श्री सदैववत्सा दारिद्र्यवचनंचेदं कविभिः कथितं भुवि / शुभभाग्यप्रधानं तु ह्यन्यच्छृणु रमावचः // 98 // गुरवोयत्र पूज्यंते धान्यं यत्र सुसंचितम् / अदंतकलहो यत्र तत्र शक्र वसाम्यहम् // 99 // वाक्प्रपंचैश्चराज्ञा वै निरुत्तरीकृतेन वै / रुष्टेन स स्वसौधाद्धि बहिःकृतोत्पमानतः॥ 100 // युतं योयमदूताभं हालं हालाहलोपमम् / पश्येदारान् यथांगारान् स भवेद्राजवल्लभः // 101 // प्रोक्ते प्रत्युत्तरं नाह विरुवं प्रभुणाच यः / न समीपेहसत्युच्चैः स भवेद्राजवल्लभः // 102 // ततः स शिक्षितोमात्रा चोत्तरंनैवदीयते / पितुः संमुखमप्येव मुक्तमेतच्चसूरिभिः // 103 // // पडिवयणंचियगुरुणो-मुम्मुरजलणुव्वदहइ भनतं-परिणामे पुणच्चिय दावानल इव विणासइणेहम् / / // किं बहुणा विणउच्चिय अमूलमंतं जएवसीकरणम् / इहलोए परलोए देइसुहाण मणबंठिय फलाणम् // अर्थपतौ भूमिपतौ बाले वृद्धे तपोधिके विदुषि // योषिति मूर्ख गुरुषु विदुषा नैवोत्तरंदेयम् // 104 // मातृपित्राप्तराजार्यातिथिभातृतपोधनैः / वृद्धवालाबलावैद्यापत्यदायादकिंकरैः // 105 // Ka स्वसृसंश्लिष्टसंबंधिवयस्यैः सार्धमन्वहम् / वागविग्रहमकुर्वाणो विजयते जगत्रये // 106 // मुख्यसौधादहिभूत: सभायोऽसौतदा ततः / सुतनिष्कासनादूना तन्माता निकटेऽवसत् // 107 //
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________________ वधूपुत्रयुतायाश्च तस्या राजा व्ययंसदा / पूरयति कुमारश्च द्युतस्थानेषु क्रीडति // 108 // नगरे यत्रतत्रापि व्यसनं कस्य सुत्यजम् / एवं च हारितं तेन सकलमपि वै धनम् // 109 // इभ्येभ्यस्तत आदाय धनं द्युतं करोति सः / मत्वा ते च कुमारं तं राज्ञोधनं हि भाविनम् // 110 // राज्याधिकारिणं चैव ज्ञात्वा यच्छन्ति रागतः / विचारयन्ति चासौ वै यदा राजा भविष्यति // 111 // - कलान्तरयुतं सर्व प्राप्स्यामःसकलंधनम् // अस्माच्चनैव संदेहो महापूजाविधानकम् // 112 // A- स्वामी संभावितैश्वर्यः सेव्यःसेव्यगुणान्वितः / सुक्षेत्रविजवत कालांतरेऽपिस्यान्ननिष्फलः // 113 // K एवं समाधियुक्तस्य गच्छन्ति दिवसानि वै / इतश्चतत्र पुर्या वै कोऽपिवित्रः समागतः // 114 // ज्योतिर्विद्याविदांमुख्यो महादेवश्चनामतः। अस्ति कर्मवशाद्वै सः दारिद्येण च पीडितः॥ 115 // - दग्धं खाण्डवमर्जुनेन विपिनंदिव्यैद्रुमैर्वासितम् / दग्धा रावणसीवता हनुमता दिव्याच लंकापुरी // दग्धः पंचशरः पिनाकपतिना लोकत्रयीवल्लभो / दारिद्यं जनदुःखदायि यदि नो दग्धं तदाकिंकृतम् // जाईविजारूवंतिन्निविनिवडंतुकंदराविवरे / इक्कोविहवउअछो जेणगुणापायडाडंति // 0 // इत्यादिविद्ययासौ झुपालंभान् ददाति च / दैवाय ज्योतिषांवेसा चैकस्मिन् समये तदा // 117 //
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________________ श्री सदैवत्स चरित्रम् | तस्मै तस्य कलत्रेण प्रोक्तं स्वामिश्च ते कदा। विद्यास्त्वयाहि सुज्ञाताः कस्मिन्नर्थेफलं भवेत् // 11 // विद्यायाश्चप्रतापेन पुष्कलं प्राप्यते धनम् / एतद्बहप्रकारेण गीतं च मुनिभिः सदा // 119 // | विद्वत्वं च नृपत्वंच नैवतुल्यं कदाचन / स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते // 120 // अतोऽहं च ब्रवीमि त्वां विद्याहीनः पशुः पुमान् ! एतनिश्चितमाख्यातं ज्ञात्वा कार्य समाचर // 121 // आहारनिद्राभयमैथुनानि सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणां / ज्ञानविशेषः खलु मानुषाणां ज्ञानेन हीनाः / पशवो मनुष्याः // 122 // | अतोऽहं चब्रवीमि त्वं विद्यापारंगतोऽपि सन् / किमेवं पीड्यसे विद्वन् दारिद्येण भृशं पुनः // 123 // | तच्छृत्वा ब्राह्मणेनोक्तं बूषे सत्यं पतिवृते / किमहंचकरोमि व गच्छामीति न दृश्यते // 124 // बहुवस्तुनि लातेपि गृहं दुष्पूरमेव च / सा वक्ति न गृहं नाथ पूर्ण भवति यत्नतः // 125 // | अग्निर्विनों यमो राजा समुद्रोह्युदरंगृहम् / सप्तैतानि न पूर्यन्ते पूर्यमाणानि नित्यशः // 126 // | भार्याऽब्रवीत्ततस्तस्य पुरेऽस्मिन् कर्णतस्समः। नृपतिर्विद्यते दाने न कोपितेन सत्तमः // 127 // विद्यावतां च दारिद्यं चूर्णीभवति राजतः / द्रव्यं मार्गय गत्वा त्वं ब्राह्मणानां न याचनम् // 128 / /
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________________ लज्जाकारि यतोविद्वन नैवकोटीश्वरोपि वा। विप्रजनो यतो धीवन याचमानो न लज्जते // 129 // विप्रस्याजीविका सृष्टा दानादानेन वेधसा / तेन तदगृहणे नैव लज्जते ब्राह्मणोनृपः॥ 130 // | स्वप्नेऽपि याचमानो विप्रजनो भ्रमतिभूतले सततम् / यो यत्करणेरसिकःप्रायःस्वप्नेऽपि तत् कुरुते 131 तत्र च देवि यानेन नैवकिंचित्प्रयोजनम्। अधिकंलभ्यतेनैव भाग्यादितिद्विजोऽत्रवीत् // 132 // विकटाटव्यामटनं शैलारोहणमपानिधेस्तरणम्। क्रियते गुहाप्रवेशस्तदापि न भाग्याधिकं लभ्यम॥१३३॥ - पुनःसा प्राह हे स्वामिन् भवता किं निगद्यते / उद्योगः सर्वतो मुख्यः क एतन्न प्रपद्यते // 134 // उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैतिलक्ष्मीदेवेनदेयमितिकापुरुषा वदंति / दैवंनिहत्यकुरुपौरुषमात्मशक्त्या यत्नेकृतेयदिनसिध्यतिकोऽत्रदोषः // 135 // इतिवाक्यस्तयासौवै प्रेरितोगतवान्खलु / राज्ञः सदसि शीघंहि गत्वा च तत्र भूभुजे // 136 // आशीर्वादं नवानां वै ग्रहाणांसोऽवदत्सुधीः / मार्तण्डश्च शशांकश्च क्षोणिसूनुस्तथैवच // 137 // - इन्दुसूनुगुरूंश्चैव दैत्याचार्यस्तथैव च // शनैश्चरश्चराहुश्च केतुश्चापि सदा खल्लु // 138 // तारासंगैश्चनक्षत्रै रश्विन्यायैस्तथैव च // स्वामियुक्तैश्चकल्याणं नित्यारोग्यं तथैव च // 139 //
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________________ चरित्रम् श्री सदैववत्स लक्ष्मीमायुश्चकुर्वन्तु पुत्राप्तिं वस्तथैव च // राज्ञा पृष्टं ततस्तस्मै कुतोदेशाच्चहेद्विजाः // 140 // यूयमत्रसमायातास्तन्मेकथयत द्रुतम् // स प्राहनगरेऽत्रैव राजंस्तव वसाम्यहम् // 141 // तहींयंति दिनानिवै कथंनात्रसमागताः // कारणं किं प्रजेशेन पृष्टो विप्रः समावदत् // 142 // न हेतुरत्रकोप्यस्ति केवलं भवितव्यता // छायेव निजदेहस्य लंध्यते जातु नो नरैः // 13 // कर्मणामर्गला भग्ना पापमयक्षयंगतम् // भाग्येन दर्शनंजातंतवाद्यैव महीपते // 144 // - राजा प्रोवाच भोविप्र यदीयत्समयं भवान् // समायातो न किं तर्हि दूषणं मम हेद्विज // 145 // विप्रश्चप्राहभोदेव न चैतद्विषये तव // दूषणं विद्यते किंचिदुक्तं चैतत् सुसूरिभिः // 146 // - नोलूकोप्यवलोकतेयदिदिवा सूर्यस्य किं दुषणं // पत्रंनेवयदाकरीरविटपे दोषोवसंतस्य किम् // 147 // - वर्षा नैव पतंति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणम् // यत्पूर्व विधिनाललाटलिखितंतन्मार्जितुंकःक्षमः॥१४॥ राजावदच्चभोविप्र वार्ताकामपिबोधसि // शास्त्रस्येतितदावोचद द्विजोपि बहप्रेमतः // 149 // करोति दृषदंरत्नं पातु वः सा सरस्वती // प्राज्ञेतरपरिच्छेदं वचसैवकरोति या // 15 // उपकाराय या पुंसां न परस्य न चात्मनः // पत्रसंचयसंभारैः किं तया भारविद्यया // 151 //
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________________ अनुष्ठानने रहिता पाठमात्रेण केवलम् // रंजयत्येव या लोकं किं तया शुकविद्यया // 152 // गोप्यते या कृतज्ञस्य मूर्खस्याग्रे प्रकाश्यते // न दीयते सुशिष्येभ्यः किं तया शुष्कविद्यया // 153 // | परोत्कर्ष समासाद्य विक्रयाय प्रसार्यते // या मुहुर्धनिनामग्रे किं तया पथ्यविद्यया // 154 // न तीर्यते यया घोरः संसारमकराकरः / / नित्यं चिंतानुषंधिन्या किं तया मोहविद्यया // 155 // न विवेकांचितांबुद्धिं न वैराग्यमयं मनः // संपादयति या पुंसः किं तया कष्टविद्यया // 156 // - परमात्सर्पशल्येन व्यथा संजायते यया // सुखनिद्रापहारिण्या किं तया शूलविद्यया // 157 // परसूक्तापहारेण स्वसुभाषितवादिना // स्वोत्कर्षः स्थाप्यते यस्याः किं तया चौरविद्यया // 158 // | लोभः प्रभतवित्तस्य रागः प्रव्रजितस्य च // न यया शांतिमायाति किं तया शोकविद्यया // 159 // गृहेचैव प्रगल्भेत सभायां न प्रवर्तते // प्रतिभासोऽन्यथा यस्याः किं तया दोषविद्यया // 160 // - यया भूपतिमादृत्य परेषां गुणनिंदकः // दानमानोन्नति हंति किं तया मृकविद्यया // 161 // रसायनी जराजीर्णश्चिररोगी यया भिषक ॥धातुवादी दरिद्रश्च किं तया हास्यविद्यया // 12 // परोपतापः क्रियते वश्यादिकरणैर्यया // यंत्रतन्त्रानुसारिण्या किं तया काकविद्यया // 13 //
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________________ चरित्रम् श्री सदैववत्सा कंठस्था या भवेद्विद्या सा प्रशस्या सदा बुधैः // या गुरौ पुस्तके विद्या तया मूढः प्रतार्यते // 164 // त्रिजगतस्तुवाताव ह्यहं स्वकण्ठवासया // विद्यया वेनि राजेन्द्र नैव कार्योऽत्रसंशयः // 165 // ज्योतिश्शास्त्रे विशेषेण ह्यधीत्यस्मि परंनृप // तत्रत्रैव सुसूक्तानि गृहचारं च सर्वशः // 166 // चक्रालेश्चसुचारंवै ह्युत्पातानां दशांतथा // आगामिवत्सरस्यापि भावंनष्टजनेस्तथा // 167 // वर्तनं चन्द्रसूर्याणा भुपरागं च तत्वतः // तन्मानं चापिभूतस्य भाविनश्चापि तत्वतः॥ 168 // समयस्यापि सम्यग्वै स्वरूपज्ञानमर्थतः // पदार्थस्यापिनष्टस्य प्रकटनं च सत्यतः // 169 // अन्यदपि च जानामि नैव किंचिच्च शिष्यते ॥सर्वज्ञ इति सम्यङ्मे जाता ख्यातिः सुदुर्लभा // 17 // अतिरेकस्य वाक्यं तदेवं श्रुत्वा नृपस्तदा // चुकोप बहुशश्चित्ते ह्यहो गर्वगिरिःकियान् // 11 // असारस्य पदार्थस्य प्रायेणाडंबरो महान् // नहि स्वणे ध्वनिस्तादृक् यादृक्कांस्ये प्रजायते // 17 // उत्क्षिप्य टिदिभिः पादमास्ते भंगभयाद्भुवः // स्वचित्तकल्पितोगर्वः कस्यकस्य न विद्यते // 173 // ततो राजाह हे विप्र कथा अन्यभवाश्चयाः॥ तास्ततिष्ठन्तु किं ताभिनव यासां च विद्यते // 17 // स्वरूपाणां च विज्ञानं कामपिमेपुरस्तप्तः // आसन्नां च कथां सम्यक भविष्यन्तीं वद द्विज // 175 //
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________________ समयेऽस्मिस्तुराज्यस्यश्रियोऽलंकरणंमहत् तत्र पदृगजेन्द्रोहि राज्ञःप्रणतयेखनु // 176 // | लीलया सचभूपाग्रे समागाजयमंगलः // शास्त्र आयुगजानां वै वर्षाणां श्रूयते शतम् // 177 // - पृष्टं विप्रायतस्मै वै तदायुरेवतत्वतः // भूपतिना च तेनापि लग्नं दृष्ट्वा विशेषतः // 178 // प्रोक्तं च शृणु राजेन्द्र वक्तव्यसदृशं नहि // कुतोराजाह तेनोक्त मप्रीतिजननात्तव // 179 // अप्रीतिकरणे राज्ञो महानुपद्रवो भवेत् // यात्मनश्चैवभोराजन्नुत्पादितस्ततस्त्यजेत् // 180 // // जोपव्वया सिरसाभितुमिछे सुतंवसीहं पडिवोहएजाजो बाध्येसति अगोपहारं एसोवमायायणयागुरूणम् // // - राज्ञोचे वद भूदेव यथा दृष्टं त्वयानघ // विप्रेणोक्तंच हे राजन् गजवाः शृणु ध्रुवम् // 181 // आगामिदिवसे नूनं प्रहरद्वयकालतः // गजस्यास्य महाराज मरणं च भविष्यति // 182 // R- राजारुष्टस्ततोऽनेन स्वेष्टगजवियोगिना // वचनेनचविप्रश्च सभाजनैश्चनिंदितः // 183 // विप्रः कारागृहेक्षिप्तो रक्षणार्थ च तस्यवै // जना मुक्ता जनाः सम्यग हसन्ति सकला द्विजम्॥१८॥ गजस्य मरणं ज्ञातं दैवज्ञेन परं नहि // कारागृहे निजस्याहो पातो ज्ञातो न तेन च // 185 //
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________________ चरित्रम् श्री सदैववस - गगनेगणयतिगणकश्चंद्रेण समागमं विशाखायाः // अन्यासक्तांगृहिणीं कथमपिमूढोनजानाति // 186 // राजा वक्ति च कूटं ते वचो यदि भविष्यति // तदा तव ललाटेहि झंपां चहृदये तथा // 187 // E- दापयिष्येयवध्यत्वाद्ब्राह्मणस्य श्रुतं मया // राज्ञा गजेन्द्ररक्षार्थ यत्नो नूनं सुकारितः // 188 // गजवैद्या स्तथाकार्य दर्शितः स सुनिश्चितम् // तैरुक्तंदेव देहोऽस्य निरामयोगजस्य वै // 189 // अपायःकोपिनेवास्ति नानाहारैः स पोप्यताम् // लोहस्य श्रृंखलाभिश्च सम्यग्निगडितोगजः // 190 // आलानस्यततः स्तम्भे नूनंबद्धो महागजः // व्यतीयाय सुखं रात्रिः प्रभातेऽगान्नृपस्ततः // 191 // गजवृत्तं ततः पृष्टाः हस्तिपकाः सुखी गजः // एवमितिचतैरूक्तं प्रथमः प्रहरोगतः // 192 // द्वितीयप्रहरे हस्ती मदोन्मतो ववह // आलानस्तम्भमुन्मूल्य शृंखलाः खण्डशः कृताः // 193 // - आषाढके च मासेहि सजलाभ्रसमानकम् // गर्जन निःमृत्य शालातः पुरेचैवनिरंकुशः // 194 // C हहाहालानि च भ्राम्यन् पातयति चतुष्पथे // सौगन्धिकंचहट्टस्थं कर्पूरंसुमहत्तथा // 195 // कस्तुरिकांतथासम्यगगुरुकंचगन्धवत // तैलादि चैव सर्व स तथा दलितवान् करी // 196 // तेषां लवोऽपिदष्प्राप आसीच्चनैवसंशयः // ततैलस्यभाण्डानि स्फोटितानि च तेनवै // 197 //
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________________ नद्यवहत्ततस्तेषां कर्पटंचैव शोभनम् / / पढेंचापि दुकुलंच शाटिकादितथैवच // 198 // अन्यान्यपिचवस्त्राणि ह्युच्छालितानिसर्वतः // यथैकच्छाय मुद्भूतं नगरं तञ्चस्वदभुतम् // 199 // | नैस्तिकेषुचहट्टेषु ह्युतक्षितैः पूगसंचयैः // दन्तुरमिवसंजातं चतुष्पथं च सर्वतः॥ 20 // | ताम्बूलिकापणात्तेन ताम्बूलानां हि संचयाः // गजेनोच्छाल्य सर्वत्र प्रस्तारिता जनैस्ततः // 201 // Pal कृतबुम्बारवै नूनं नश्यनिनगरंमहत् // कलकलयुतंजातं भीत्या तस्य गजस्य हि // 202 // इत्थं सर्वप्रकारेण सकलं नगरं गजः कुर्वन्गजःसनिस्सारं ब्राह्मणपाटके गतः // 203 // कस्यापि तत्र तावद्धि भार्यायाश्चद्विजन्मनः // पंचशब्दस्य वाद्यानि सीमंतस्य महोत्सवे // 204 // नाटयपूर्व च वाद्यंते सीमंतिनी च सा पुनः // पितृगेहात गृहंपत्यु बजन्त्यासीदितश्चसः // 205 // मदोन्मतोगजश्चापि तत्रायातश्चतंगजम् // प्रत्यक्षंयमदूताभं दृष्ट्वा परिजनस्ततः // 206 // / सकलोऽपिभयत्रस्तोदिशोदिशंननाशह // गर्भभाराच्च सा बाला शाटिकामुकुटादितः // 207 // बहुनेपथ्यभाराच्च ह्यशक्ता सा पलायने // धृता गजेन संगत्य स्वदन्तमूशलोपरि // 208 // हाहाकारश्चसंजातो जनानां सुमहांस्तदा // भीत्या खेदपराणां वै तस्याश्चपतिरुच्चकैः // 209 //
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________________ श्री सदैववत्स चरित्रम् शब्देन खलु कुर्वन्स बुम्बारवंचनिर्गतः // सदयवत्स द्यूनःसन्नग्रे धावन् स वक्तिच // 210 // - उच्चैः क्रंदंश्चभीतोहि यः कोऽपि सुभटोमम // अहो वै गृहिणीधीरःसम्यक् च रक्षयिष्यति // 211 // हारं च कुंडले चापि तस्मै दास्यामि भूषणम् / परपीडितपुंसां यो रक्षायाः करणेक्षमः // 212 // मात्रा च जनितोवीरः श्रुत्वा तद्वचनं ततः। द्यूतस्य तेन शालीतः सदयवत्ससूरिणा // 213 // पुरुषाय च तस्मै वै पृष्टं भो पुरुषर्षभ / किं जात कि च जातं वै सत्वरं वद मां नर // 214 // | तदाविप्रः स तस्मै वै कथयामास हस्तिनः / स्वरूपं तस्यतच्छत्वा सदयेन विचारितम् // 215 // किं पौरुषं रक्षति येन नार्तान् / किं तद्धनं नार्थिजनाय यत्स्यात् // सा का क्रिया या न हितानुबन्धा / किं जीवितं साधुविरोधकृद्यत् // 216 // विचार्याथ गजं गच्छन् सदयवत्सराट् खल्छ / कथयति च हे दुष्ट हत्याया ब्राह्मणस्त्रियः // 217 // कारक गज मुश्चमा वराका दीनलोचनाम् / न मुंचति च तां हस्ती ह्यूक्तो बहप्रकारतः // 218 // द्धनाथ कुमारेण खडधाताद गजस्य वै / शिरश्छित्वा बलात्सा च मोचिता तेन सर्वतः // 21 // सकलमपिजातं वै स्वस्थं च नगरं खलु / हृष्टो राजापि सच्चके तमुपद्रवमोचनात् // 220 //
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________________ पुरजनोहि हृष्टःसन् पौरुषस्य गुणैः खलु / कुमारस्य समंतेन मौक्तिकाद्युपहारतः // 221 // राजानं पूजयामास राजापि तस्य वै ततः / स्वपुत्रस्य विशेषण सन्मानं च करोति सः // 222 // | ज्योतिर्विदपि राज्ञा स कारागृहात्ततः किलः निष्कास्य पूजितः सम्यक् तज्ज्ञानस्य चमत्कृतेः॥२२३॥ ग्रामादिदानतो विप्रः संतोषं तेन प्रापितः / तत्प्रभावोहि विद्याया कथितः कोविदैः खलु // 224 // मातेवरक्षति पितेव हिते नियुक्त कांतेव चाभिरमयत्यपनीय खेदम् // कीर्ति च दिक्ष वितनोति तनोति लक्ष्मी किकिं न साधयति कल्पलतेव विद्या // 225 // कन्याजीवितदानेन तन्मातृपक्षगामिनः श्वसुरपक्षनिष्ठाश्च व्हटा विप्रजनास्ततः // 226 // एकावल्यादिहारैश्च प्रजयन्तिस्म तं खलु / कुमारं चापि राज्ञो वै सत्कृत्य विधिरूपतः॥२२७॥ सा बालापि कुमारस्य तस्य च निजहस्ततः भालस्थले विधायाथ तिलकं मौक्तिकाक्षतैः // 228 // कृत्वा वर्धापयामास राजा च तदनंतरम् / गुणशालिकुमाराय युवराजस्य वै पदम् // 229 // दत्वा सुखेन राज्यं स करोति न्यायतः खलु / चिन्तयति च मन्त्रीशो जातं मानमियत्खलु // 230 // | कुमारस्य तदा राज्ञो बभूव मम वै पुनः / सूत्रं विनष्ट मेवायं मया पूर्व यतोह्यसौ // 231 //
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________________ श्री सदैववत्स चरित्रम् पाणिग्रहणकाले वै धनं दत्तं न कोपितः / याचमानोऽपमानं वै प्रापितोऽस्ति ततोऽधुना // 232 // करिष्यति स तेनातस्तद्वैरज्ञोधनं खल। चिंतितं च प्रधानेन मनसि विकृतं महत् // 233 // पातःशुन इवाज्ञस्य विस्मयेन क्रमांतरे / सिंहस्येव न वीरस्य कदापि पर संभवः // 234 // प्रियं वा विप्रियं वापि सविशेषं पुरार्पितम् / प्रत्यर्पयंति के नात्र दृष्टांत उर्वरा खलु // 235 // अतश्चप्रसरन्धीरो नोपेक्ष्यो भूतिमिच्छता / अन्यथा खलु नाशःस्यादत्र का वै विचारणा // 236 // य उपेक्षेत शत्रु स्वं प्रसरंतं यथेच्छया / रोगानालस्यसंयुक्तः स शनैस्तेन हन्यते // 237 // | तथा चाटुवचस्त्वेन ममापराध एवहि / मनसि रक्षितोऽनेन चेयन्ति दिवसानि वै // 238 // अवसरं च जानाति राजनीतिबुधो यतः / कृतं वेत्ति किलायं वै अवश्यं संविधास्यति // 239 // वहेदमित्रं स्कंधेन यावत्कालविपर्ययः आगतेतुनिजे काले भिंद्याद् घटमिवाश्मनि // 240 // // जिमजिम केसरि पायउहढे-जिमजिम विसहर नउलीवटे दीणवयण जइ जंपेसूर-तेहडवक्कउ देसेपूर // 0 // ममाधुना ततो रुष्ट मिव दिनं च दृश्यते / विपरीतानि पश्यामि लक्षणानि न संशयः // 241 //
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________________ 0 // दीहारूढा तं करे-जं वइरी नकरती // दीहपालट्टइ रावणह पछर नीरतरंति // 0 // परं भवतु संजातं सन्मानं च नृपस्य वै / निजबुध्ध्या च तन्नाशं करिष्यामि हि सत्वरम् // 243 // - यस्यबुद्धि बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम् / वने सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः // 244 // - स्वबुद्धिवैभवात्तेन मन्त्रिणेतावता ध्रुवम् / निष्कासनं कुमारस्य सूपायो वै निरूपितः // 245 // - अतिमलिने कर्तव्ये भवति खलाना मतीवनिपुणाधीः। तिमिरेऽपि कौशिकानां रूपं प्रतिपद्यते दृष्टिः।।२४६॥ माषेण पूरितं लौहं पात्रं राज्ञे सुमन्त्रिणा / कृष्णवस्त्रयुगेनाथ सहितमुपदीकृतम् // 247 // प्रोढेंगालकयुक्तंच दृष्ट्वाराजावदरत्वलु // तदपूर्वचभोमंत्रिन् किमेतत्प्राह देव सः // 248 // - अहंचतामकार्ष भो एते लोका यथोपदाम् // कुर्वन्ति नृप उचे वै हीदक् प्राभृतकं क्व न // 249 // दृष्ट मन्त्र्याह राजान मीदृगेव तवाधुना / प्राभृतं दृश्यते राजा कस्मादाह सुवक्ति सः // 250 // वैद्यो गुरुश्च मंत्री च यस्य राज्ञः प्रियंवदाः / शरीर धर्म कोशेभ्यः क्षीप्रंस परिहीयते // 25 // - सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः / अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः // 252 // अप्रियाण्यपि पथ्यानि ये वदंति नृणामिह / त एव सुहृदः प्रोक्ता अन्ये ते नामधारकाः // 253 //
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________________ बीम चरित्रम् ब्र वीमि वचनं चैवं कठोर मत एवहि / सकलराज्यसार स हे राजन् जयमंगलः // 254 // गजः सोपि कुमारेण ह्येकररू यर्थकृते हतः / तस्यापि च कुमारस्य त्वं मानं च ददासि हि // 255 // स्थाने कोपविधानस्य यौवराज्यं ददासि वै / वैरिजयोऽपिचानेन गजेन वै पुनर्भवेत् // 256 // स धनी यस्य भूमिः स्याद्यस्याश्वास्तस्यमेदिनी / विजयी यस्य मातंगा यस्यदुर्गः स दुर्जयः॥१५७॥ इग्गजमहारत्नं चतुरंगचमूवरम् / अतःपरं च तेषां वै वैरिणां गेहमण्डले // 258 // भवन्तःसूत्सवाः सन्ति कुत्रत्यो देव वै गजः समये समये योहि मदमत्तो न जायते // 259 // परमेवंविधरत्नं गजरूपं न तिष्ठति / बहुभाग्यवता मेव गेहे तिष्ठति नान्यतः // 260 // अल्पएव च कार्येऽस्मिन् को लाभो हनने मतः / परं विनाशकाले हि विपरीता मतिर्भवेत् // 261 // न निर्मिता केन च दृष्टपूर्वा न श्रूयते हेममयी कुरंगी / तथापि तृष्णा रघुनन्दनस्य विनाशकाले विपरीतबुद्धिः // 26 // इत्यादिवाक्य सूचीभिः कर्णेऽसौ पीडितोः नृपः / स्वकर्णदुर्बलत्वेन स तद्वचनपद्धतिम् // 263 // मन्यममानः सुसत्यं तत कुमारस्य निजस्य वै / देशनिष्कासनं कोपादादिशद् भूपतिस्तदा // 26 //
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________________ 0 // दुब्बलकन्ना वंकमुहा-खंधगालासरोज // जेतागुणतुरंगम तेता माणसदोष // 1 // अकर्णदुर्बलः शूरः कृतज्ञः सात्विको गुणी // वदान्यो गुणरागी च प्रभुः पुण्यैरवाप्यते // 265 // पाषाणजालझढिनोऽपिगिरिविशालः संभिद्यते प्रतिनिशं वहता जलेन // कर्णेजपोक्तवचनैः परिपीड्यमानाः॥ | के वा न यांति विकृति दृढ सौहृदोऽपि // 266 // कुमारं प्रति राजोचे गजरत्नं समानय // नोचेत्त्यज च नो देशं कुमार ओमिति द्रुतम् // 267 // उक्त्वा प्रणम्य निर्यातः सभामध्यात्तदैवच // | तेजस्वी नैव संसहते तर्जनमथ सोऽबवीत् // 268 // देशांतरदिदक्षापि पूर्यतां मम संप्रति // भूपतिरपि जानातु स्वमूनो रभिमानताम् // 269 // // माणपणट्ठइ जछावणु-तादेस मउ चइज्ज मादुजण करपल्लवेदंसिजंतु भमिज्जा // 2 // | संपदि यस्य न हों विपदि विषादो रणे च धीरत्वम् // तं भुवनत्रयतिलकं जनयति जननी सुतं विरलम् // 270 // नैव च गतवान् धीरो विषादं लेशतोऽपि सः॥ कदापि महतां चित्तं नैव याति हि विक्रियाम् // 271 //
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________________ चरित्रम् 13 तत्स्वरूपं च चेष्टां च मन्त्रिणोऽकथयच्च सः॥ मातुर तदा माता विदेशयानवार्तया // 272 // पीडिता सा सुतं प्राह ह्यश्रुभिः पूर्णलोचना // त्वं प्रसादय राजानं पतित्वा पादयोधुवम् // 27 // | उत्तमाना प्रकोपश्च प्रणामान्तो हि दृश्यते // प्रसादयामि तं नूनं कुमारो वक्ति मातरम् // 274 // नैव यास्यति भूपः स प्रसादं च तथापि भोः // मातरिति च सत्यं हि दृश्यते मम मानसे // 275 // निमितमुदिइन हि पः अकुप्पति भुवं स तस्यापगमे प्रसीदति // अकारणाद द्वेषपरोहि यत्र कथं नरोऽसौ परितोषमेति // 26 // मातोचे वत्स सत्यं ते वचनं नैव संशयः // स्वभावेनैव राजानः शक्याश्चालयितुं नहि // 277 // जलधेरपिकल्लोला श्चापल्यानि कपेरपि // शक्यन्ते यत्नतो रोऽधुं न पुनः प्रभुचेतसाम् // 27 // | किंचिद्वै कथयित्वाहं विलोकयामि वत्सक // एकांते वक्ति राजानं देव चैको हि सद्यताम् // 279 // अपराधः सुतस्यापि सर्वेषा मेष निश्चयः // अन्यथा वाच्यतां याति हे राजन् मन्यतां त्वया // 20 // दोषेणैकेन न त्याज्यः सेवकः सुगुणोऽधिपैः // धूमदोषतया वन्हिः किमु केनाप्यपास्यते // 281 / / तयेत्यादि बहुक्तेऽपि वचनं नाप्यमन्यत // राजा ततश्च सा प्राह यदेवं देव नाहति // 282 //
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________________ प्रागलन्येनैव संवक्तुं नूनं च महिलाजनः // त्रियो हि विनयैर्युका अल्पभारिण्य एव च // 23 // सलज्जाश्चैव शोभंते तासां धाष्टयं तु वाच्यताम् // संयोजयति नूनं हि नैव कायोऽत्र संशयः // 283 // आतिगृहीतया चैवं मयाकुलेन चेतसा // भिहितं च राजेन्द्र इत्युक्या निगेता च सा // 285 // यदि त्वं कथयत्यम्बा कुमारं प्रति चास्वसि / / ततश्चापि तदाहं गमिष्यामि त्वया सह // 28 // वदंतीति कुमारेा वारिता सा नतिपति // अपि च वत्ति सा सत्यं या यहि विचारितम् // 26 // 0 // महिलाण होईसरण-पइर पुत्तोव जीवलोगंमि // पाइधुत्तविरहिआउजीवंतिउ मउगम ताउ। आह हे पुत्र शीघ्रं वै पश्चादागत्य निश्चितम् / तर पादौ नमस्यामि नेत्र काचों संशयः // 20 // तीर्थानामष्टषष्टिा प्रोता म्वृनिए भारत // तेषु नागिरथी श्रेष्ठा नतोऽपि जननी मता // 28 // अपष्टिवतीर्थानि त्रयस्त्रिशंदेवताः / / अटाशीतिः सहस्त्राण मातुः पाद वसति हि // 20 // उत्तम हि व्यासेन यात्रैन बलिष्ठ नोः // जनरेः विदेशे हि ब्रामणं शयनं भुवि // 21 // पाद संचरणेनैव दुःखिता त्वं भविष्यसि // तत्र दुग्वं मया साकं मा सहस्व दयां कुरु // 292 // | पादवन्धेन दुःखं वै त्वया साई ममापि च // पर्यवसाप्य सम्यक् सा संस्थापिता च तत्र वै // 293 //
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________________ चरित्रम् श्री सदैववत्स पीडिता वक्ति सा नूनं परं चित्तेऽथ वत्स हे // | | ॥इक्केण विणा पियमाणसेण सभाव नेह सहिएण // जणसंकुलांवि पुहवि पुत्तय सुन्ने व पडिभाइ॥० प्रत्यूषे च ततो मात्रा प्रातराशं स कारितः // 294 // मातृहत्तुलनां चैव कोहि कारयितुं क्षमः // सुघामधुविधुज्योत्स्नामृद्वीकाशर्करादपि // 295 // वेधसा सार मुध्धृत्य विहितं जननीमनः // अखण्डितरसैर्युक्तं मंगलाथै स भोजितः // 296 // दधिकर्पूरचूर्णादियुतं च पत्रवीटकम् // तस्मै ददौ प्रणामं स विधाय मातरं प्रति // 297 // आदिश्य च वधूसाराकरणं निर्गतो हि सः // यावत्तावच्च निर्याता पतिमन्यैव तद्वधूः // 298 // वारिताऽपिकुमारेण सुकुलीना च वक्ति सा // प्राणाः कुलस्त्रियो नूनं पत्याधीना भवन्ति हि // 299 // देशान्तरे गते पत्यौ जीवन्त्यपि मृतवे सा // लोकान्तरे गते पत्यौ साप्यनुम्रियते खलु // 30 // शोकेन मुंचति शृंगारं सम्मतं विदुषां खलु // शशिना सह याति कौमुदी सह मेघेन तडिद् विलीयते॥ प्रमदाः पतिवम॑गा इति प्रतिपन्नं हि विचेतनैरपि // 30 // आपत्कालेऽपि संप्राप्ते यन्मित्रं मित्र मेव तत् // वृद्धिकाले तु संप्राप्ते उर्जनोऽपि सुहृनवेत् // 30 //
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________________ सा सती या दिया भतुः संमुखे दिवसेऽनुगा // तनुच्छायेव धैर्यण प्रयातेऽस्मिन् पुरो भवेत्॥३०३॥ सरसीव पयःपूर्णे सर्वमृष्ठौ समं भवेत् // ज्ञेयः स्वपरयो मेंदः शुष्कस्मिन्नुच्चनीचवत् // 30 // पंगुं मूकं च कुब्जं च कुष्टांगं व्याधिपीडितम् // आपत्सु च गतं नाथं न त्यजेत्सा महासती // 305 // वाक्ययुक्तिं च तस्या वै श्रुत्वावाच कुमारकः॥ हे प्रिये कन्दरास्वबं गिरिष्वरण्यकेष्वपि // 306 // भ्रमिष्यामि यथाहं वै कथं त्वं तु भ्रमिष्यसि // सा प्राह नाथ हे मे त्वं वल्लभ प्रियकारक // 307 // छाया देहस्य किं विद्वन् नान्यत्र चैव तिष्ठति // विना त्वां नैव हे राजन्नहं स्थास्यामि निश्चितम्॥३०८॥ // रणंपि होई वसिअं--जस्सहिअ वल्लहो जणो वसइ // पिय विरहियाण वसिअंपि होइ अडवीइसारिछं // // ततस्तस्या निशम्याथ सार्थागमननिश्चितम् // चलनायानुमेने वै ततः सार्थे कुमारकः // 309 // सावलिंगा च वैश्वधू प्रतिजगाद रागतः॥ कदाचिद्यन्मया मातः त्यक्तवधूटीधर्मया // 31 // युष्माकमपराधो वै कृतो भवेत्प्रमादतः // भवतीभिश्च सोढव्य इत्यभिधाय पपात सा // 311 // पादयोर्विधिवत्तस्याः पत्यनुगमनाय च // अनुमन्यस्व मामेवं कथयित्वा चचाल सा // 312 //
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________________ श्री सदैववत्स 15 चरित्रम् वध्वा सह कुमारस्य चलनानंतरं खलु // कुमारस्य ततो माता विलापान् कुर्वती तदा // 313 // नानाविधांश्च लग्ना वै रोदितुं क्रमशश्चसा / आश्वासिता सखीभिश्च निवृत्तिं रोदनाद्गता // 31 // अथ सर्वेऽपि ते प्रेम्णा स्वजनाश्च परस्परम् // मंत्रिणः कीदृशी चेष्टा प्रोचुरहो दुरात्मनः // 315 // | पात्रमपात्रं कुरुते गुणांश्च स्नेहमाशु नाशयति // अमले मलं प्रयच्छति दीपज्वालेव खलप्रकृतिः३१६ केप्याहुनृपतिश्चापि ह्यहो विमर्शतो विना // निष्कासनं कुमारस्य करोति मूढधीः खलु // 317 // आयुषा राजाचत्तस्य पिशुनस्य धनस्य च // खलस्नेहस्य दहस्य नास्ति कालो विकुवेतः // 31 // आहश्च पुनरेके वै दुष्टेन मन्त्रिणा खल // उत्पातो विहितो नूनं एष नैवात्र संशय // 319 // एके सत्पुरुषाः परार्थ घटकाः स्वार्थ परित्यज्य ये॥सामान्यास्तु परार्थ मुद्यमभृतःस्वार्थाविरोधेन ये॥ तेऽमी मानुषराक्षसाः परहितं स्वार्थाय निघ्नंति ये॥ ये तु नंति निरर्थकं परहितं ते के न जानीमहे३२० 0 // सुयणो कहलहइ मुदं जछखलो सामिकन्न पडिलग्गो // तच्छए हृयदोसो खलाण पुणहि मगाणंदो॥०॥ जएविजं न हृअं नहुहोही जं च नेव खलु सुअं॥ तं चिय जपंति तहापिसुणा जह होइ सच्चसारिछं॥०॥
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________________ खलजण सह संगेणं पडंति सुजणाण मछएणछ // दहवयण कयवराहे रयणनिही वंधणं पत्तो // // | विच्छायतां वहसि किं सहकारवृक्ष-निःशेषलोककमनीयसमृद्धिसार // // प्राप्ते वसंतसमये तव सा विभूति भुवि भविष्यतितरामचिरादवश्यम् // 321 // इत्यादिश्च वदन्तस्ते ह्यश्रुभिः पूर्णनेत्रकाः // स्वस्वस्थानं च जग्मु वै सदयवत्सराडपि // 322 // शुभशकुनतः प्रैषं प्राप्तोऽथ भार्यया सह // अग्रे चचाल भर्तारं सावलिंगाऽथ पृच्छति // 323 // | अथावां कुत्र यास्यावो हे स्वामिन् कृपया वद // वदति सदयवत्सश्च देशाः सन्ति मनोहराः॥३२४॥ वहवो गमनार्हा वै पत्नी प्राहाथ हे प्रिय // तत्सत्यं नैव संदेहः परमन्यच्च शिष्यते // 325 / / बालराज्यं भवेटाच दैरान्यं यत्र वा भवेत् // स्त्रीगज्यं मूर्खराज्यं च यत्र म्यानत्र नो वसेत् // 326 // कुदेशं च कुग्रामं च कुसंबंधं कुसुहृदम्॥ कुभार्या च कुपुत्रं च दूरतः परिवर्जयेत् // 327 // // तिण देसडे न जाइये जिण अप्पणो न कोई-सेरीसेरी हीडीए-वात न पूछे कोई // एवं श्रुत्वा कुमारश्च प्रवक्ति शृणु हे प्रिये // शास्त्रसारं समालम्ब्य जनो याति सुबुद्धिमान् // 328 //
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________________ चरित्रम् श्री सदैववत्स कोऽतिभारः समर्थानां किंदूरं व्यवसायिनाम् // कोविदेशो विदग्धानां कः परः प्रियवादिनाम् // 329 // - कोवीरस्य मनस्विनस्स्वविषयः को वा विदेशः स्मृतः॥ यं देशं श्रयते तमेव कुरुते स्वीयं गुणोपार्जितम् // यदंष्ट्रानखलांगुलप्रहरणः सिंहो वनं गाहते। तस्मिन्नेव हतद्विपेंद्रपिशितैः स्वं पुष्यति निर्भयः॥३३०॥ भार्या ब्रूते च भोस्वामिन् सर्व सत्यं तथापि चेत् // मम पितृगृहे वासः प्रतिष्ठानपुरे वरम् // 33 // राज्यश्रियं च मे पिता दास्यति तव सत्वरम् // - तुंगात्मनां तुंगतमाः समर्था मनोरथान् पूरयितुं न नीचाः // धाराधरा एव जनुर्धराणां शक्ता निदाघोपशमे न नद्यः // 332 // श्रुत्वा प्राह कुमारस्तन्नेयं वचनपद्धतिः // समीचीना प्रिये भाति नैवात्र कोऽपि संशयः // 333 // Pa on वियलियकलाकलाउ चंदोसूरस्स मंडलं पत्तो॥निस्सरिउ तारिसउ-गयविहवो को समुद्धरइ०॥ Kon वेउकारउभे विकरिचंद पयासइलोइ-धणहीणउ मिताण घरिमा जइजउकोवि // गहणं कलंकफसणं-तेजसहरणं क्यं च चंदस्स-हरिहर धनंतर बंधवेहि किं होई पत्कणमा अहं सत्यं प्रिये वच्मि नैव यास्यामि ते पितुः॥ समीपे देवि विज्ञस्य यतो गमने विडंबना // 335 //
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________________ वरं मृत्यु बरं भिक्षा वरं वासश्च वैरिषु // देवाद्विपदि जातायां श्वशुराभिगमो नतु // 336 // | उत्तमाः स्वगुणैः ख्याता मध्यमास्तु पितुर्गुणैः // अधमा मातुलैः प्रोक्ताःश्वसुरैस्त्वधमाधमाः // 337 // | तावदेवपुमान् श्लाघ्यस्तावदेव गुणालयः॥ यावत् परमुखं नैव प्रेक्षते स्वात्मनः कृते // 338 // चिन्तयति प्रियायाश्च पुनस्तद्वचनं खल्नु // प्रमाणमेव युक्तत्वात् भवतु च यथा गृहे // 339 // इमां च सावलिंगां वै तस्याः पितुश्च संनिधौ॥ अहं मुस्कलपादो वै पश्चान्मुक्त्वा निजेच्छया॥३४०॥ | भूमि विलोकयिष्यामि तेन ज्ञानं भविष्यति // विद्यां वित्तं शील्पं तावन्नाप्नोति मानवो नूनम् // 34 // . यावद्भ्रमति न भूमौ देशाद् देशांतरं हृष्टः॥ नानाश्चर्यमयीं पृथ्वीं यो न पश्यति कातरः // 342 // निजापत्याग्रतः कानि कौतुकानि स वक्ष्यति // सर्वेषां पंडितानां च मतमेतन्न संशयः // 353 // एवं स्वप्रिययायुक्तः सदयोऽ थ ततः क्रमात् // इति विचिन्त्य धीरः स प्रतिष्ठानपुरस्य वै // 344 // मार्गे चचाल तत्रापि चिन्तयति स धीरधीः // येयं मम प्रिया प्राग्वै सावलिंगा सुखासनम् // 345 // विना चेपा कदाचिच्च वहिनिस्सरणं मता // साऽधुना पादचारेण चलति दुःखतः खलु // 346 // | यस्याः पूर्व च सूर्येण मुखं तु नावलोकितम् // रोषेण सच तेनैव स्वोग्रकरैश्चता रविः // 347 //
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________________ सदैववत्स चरित्रम् 17 ताडयतीदृशे कष्टे मुखच्छाया च कीदृशी // एतस्या इति वीक्षां वै कर्तुं तस्या रविश्च सः // 348 // संमुखीनोस्तिपूर्वं च मया पाटलसीकरैः // वासितहिमसंकाशैः जैले दूरीकृता तृषा // 349 // | यस्याश्च सावलिंगा सा ह्यधुना पथि तोयतः // रिक्ता खेदातुरा जाता सामान्येनापि निश्चितम्॥३५०॥ संचरतोस्तयोरेक मिति मार्गे जलं विना // रणमागाच्च सा देवी सावलिंगा तु तृष्णया // 351 // आक्रान्तापि जलं पत्युर्दुःखभवनशङ्कया // न मार्गयति सा किन्तु स्वामिनं भिन्नरीतितः॥३५२॥ प्रतिवक्ति च हे स्वामिन्मयोक्तं शृणु सत्वरम् // ॥स्वामि कुरंगा रणथले जलविण किमु जीवंत तेनोक्तं॥ हिउं सरोवर प्रेमजल नयणे नीर अनंत०॥ तच्छ्रुत्वा सदयः सोपि चितज्ञः प्राह हे प्रिये // तव तृम् बाधते किं च साह बाढमिति द्रुतम् // 353 // चिंतयति स तच्छ्रुत्वा ह्यहो विधिविलासकम्॥ | // निवधूया सुकुमाला-तिएहादुहपीडिता निविडता वे चंकमणं चरणेहिं हीहीविही विविलसी वि समम् //
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________________ - शफरीव जलाभावे नूनमियं मरिष्यति // विलोकयामि ताबद्वै ततो जलं च सत्वरम् // 354 // - चिन्तयित्वेति सोग्रे च निकटे कस्यचित् पुरः॥ गच्छन् दुरात्प्रपामेकां शीतलजलतो भृताम् // 355 // ददर्श तत्र चैका स्त्री प्रप्रायाः पूरिका खलु // वृद्धासच्चि कुमारोथ हृष्टः सन् दयितां ततः // 356 // मुक्त्वाग्रे खलु तत्रैव शीघ्रं गत्वा पुनश्चताम् // जोत्कारपूर्वकं प्राह जरती मे जलं द्रुतम् // 657 // हे मातदेंहि भार्यामे तृषाकान्तास्ति वै पथि // पतिता सा च तच्छ्रुत्वा वृद्धा प्राह प्रपा खलु॥ देव्यास्तु हरसिद्धेश्च पुण्ये पापे समे ह्यतः // 358 // आवहतः कुमारस्तत्त छ्रुत्वा पृच्छति तत्कथम // वृद्धा वदति हे वत्स यावन्मानं च शोणितम॥३५९॥ तस्य तापजालं वीर योऽत्र स्वत्य प्रयच्छति // नाश्चिकं दीयते राजन् यतो नेयं प्रपा सलु // 360 // पुण्यार्थ किंतु शोणार्थ तबूत्वा स कुमारकः हे मातः प्राह यद्येवंरुधिर मूह्यतो जलम् // 361 // 5 विधिनैवं समीचीनं लभ्यते चेत्तदा वरम् // Kor कीरइ समुदतरणं पइसजइहुअ वह मिजालाए॥ एवं लहि झरमरणं किं दुलहं अइसिणेहस्स०॥
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________________ चरित्रम् श्री सदैववत्सा तच्छ्रुत्वा सा च वृद्धा स्त्री पात्रं जलभृतं तदा // 362 // गृहित्वा तेन सार्द्ध वै चलिता सोऽवदत्तदा // सदयवसको धीरो हेमातर्मे समर्पय // 363 // जलपात्रमिदं त्वं च वृद्धत्वाद्गन्तुमक्षमा // शीघ्रं सा च पुनमें वै भार्या नास्ति विलम्बनम् // 364 // - सोढुं शक्ता च ततत्वा सा वृद्धा प्राह निश्चितम् // यापयिण्यामि तम्यै च तवैवाहं जलं दुतम्॥३६५॥ ततः शीघ्रतरं वत्सो व्रजति सापि वेगतः // चलन्ती च कुमारस्य पृष्ठत एव निश्चितम् // गच्छति सोथ वत्सश्च तदैव मानसे स्वके // 366 // चिन्तयति किलाहो वै वृद्धापि मिलितैव च ॥ममागच्छति किं तत् स पत्नीपावे ततो गतः // 36 // उक्तं च तेन हे प्राणवल्लभे त्वत्कृते मया // जलमानीतमस्तीह वृद्धया च ततस्तया // 368 // तजलभृतपात्रं वै तस्यै तत्र समर्पितम् // मुखक्षालनपूर्व सा तत्तोयं च पपौ खलु // 369 // स्वस्था चैव जलेनासौ जाता वृद्धा ततश्चसा // मार्गयति यदा शोणं कुमारेण तदा स्वकाम् // 370 / / | समुद्धाय्य नसं तत्र चक्रे शोणितकर्षणम् // परंतु रुधिरं नैव निःसरति ततस्तदा // 371 //
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________________ विषण्णचित्त आहाथ मातरं प्रत्यहं शिरः॥ स्वस्य छेदं कृत्वापि दास्याभि रुधिरं च ते // 372 // मन्दभाग्यात कदाचिच्च मम न रुधिरं यदि // निःसरेत् तदपि त्वं वै मम भार्यासकाशतः // 373 // नैव याच्यं वराकेयं त्वया मोच्या शुभानने // तच्छत्वा प्राह सा वृद्धा ह्येवमस्तु ततश्च सः // 374 // यावत् शिरसि खङ्गं वै वाहयति ततश्च सा // तावकाऽबला सा हि कुंडलादिस्वलंकृता // 375 // सा प्रत्यक्षीवभूवाथ युवाच मधुरं वचः।। असमसाहस त्वं भो मा कुरु साहसं मनाक् // 376 // उज्जयिनीपूरस्याहं प्रतिष्टानपुरस्य च // अधिष्ठात्री च नाम्नाऽस्मि हरसिद्धिश्च देविका // 377 // उज्जयिनीतश्च युष्माकं पुण्यानुभावतः खलुः // त्वत्साहाय्यविधानार्थ साध तवागतास्मिन चा३७८॥ तव सत्वपरीक्षायै महााक्षाररणं मया // विकुर्वितं च तावद्वै तव पत्न्यास्तपापि च // 379 // मुखशोषो भया वै भो प्रपापि च विकुर्विता // टस्त्वं च परं विद्वन् सात्विकानां शिरोमणिः // 38 // स्ववाचा पालने शूरो यतो जलं गृहीतवान् // रुधिरं मूल्यतो वै त्वं कलत्राा निजस्य च // 381 // दुष्करं यजगत्यां च स्नेहभाजः परं खलु // अंगीकुर्वन्ति सिद्धे च कार्य तद्गणयन्त्यपि // 382 // अंगीकृतंतु मन्यन्ते निःसत्वा स्तृणवच्च तत् // उपाध्यायश्च वैद्यश्च प्रतिभू (क्तनायिकः // 383 // FARE
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________________ श्री सदैववत्स | मृतिका दृतिका चैव सिक्के कार्ये तृणोपमाः // त्वं तु धीमन स्ववाक्यस्य पालकत्वात्सुवीरकः // 38 // // जे आवइसु धीरा विहमि अगदिआ अमछरिणो // परवसणे सुसहाया पुरिसा पुहविलंकरणम् लेन हवस ते तुष्टा सहसम्मि ततो वम // शृणु स प्राह हे देवि कृतार्थी दर्शनेन ते // 385 // संपन्नोऽग्नि ह्यतो जाने किमयागाये // देवी प्राह न मोघं वै देवानां दर्शनं किल // 386 // द्यूताधिकरसःप्राइम नर..!! तुटा नदा मल गृत त्वं संग्राम तथैव च // 387 // जयं देहि ततःसा के दादी का पार पायकलोह जरी चैव कपर्दिकां च शोभिताम् // 388 // तस्मै समर्पयामास सार्यादितके यः // जयो कपर्दयते च कपर्दिका बलात्तथा // 389 // वैरिलक्षरणे चापि क्षुरिकातो भविष्यति // ऊचे परं च हे राजन् अन्यस्मिन् दुःखदायक // 390 // मरेत्कायपि मां ननं सैवमुक्त्वा तिरोदधे // ततोसो सुवनो गच्छन् चिन्तयति च मे वरम् // 39 // तं दारिद्रयहारिच॥ राज्यप्रदायि तच्चैव नैवं टं श्रुतं न च // 322 // अहो मया मुभाग्येन येन लब्धं गुणाकरः // समुद्रश्च पापाणाकर एच॥ प्रलादो देवनपानां पंच प्रन्ति दरिद्रताम् // 393 //
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________________ मार्गे पत्नी स्वभारं पृच्छत्यथ प्रभो खलु // शोणितयाचनं किं भो तदोवाच कुमारकः // 39 // एतद्वारि मया भार्ये शोणितमूल्यतः किल // आनीतं न मुधा तद्वै श्रुत्वा पन्याह किं त्वया॥३९५॥ एवंविधप्रकारेण चानीतं तजलं खलु // अनर्थकारिणी पत्युत् धिङ्गमा मिति निन्दितः // 396 // आत्मा ततश्च सा प्राह ह्येवंविधेन कष्टतः // स्वामिन्नेतत्त्वया कस्मादानीतं स उवाच ताम् // 39 // स्नेहो न ज्ञायते देवि प्रणामाच्च मृदूक्तिभिः // ज्ञायते तु क्वचित्कार्ये सद्यः प्राणप्रदानतः॥३९८॥ तृषितापि च सा भर्तुः क्षुधिता तदनन्तरम् // पावे किंचिन्न वत्सस्य मार्गयति च तौ ततः॥३९९॥ KE एवंविधासमस्नेही गच्छतः स्म सुरागतः // ke on चंदो जए पयासइ पुन्निमया तहपुन्निमावि चंदेण // समसुहदुखाइ जए पन्नेणविणा न पावति // 0 // 2 एवं क्रमेण गच्छद्न्यां दृष्टं रम्यं वनं किल // ताभ्यामेकं सुवृक्षैश्च नानाविधैः सुशोभितम् // 400 // 0 // पूगाशोककदम्बचूतवकुलाः रवर्जूरिकादिद्रुमाः // चंचरपुष्पफलौघपल्लवयुताः शाखो पशाखान्विताः //
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________________ श्री सदैववत्स चरित्रम् 20 यत्रांतर्जलवापिका जलभृतः पद्मावलीभि र्बभुः क्रीडति प्रसभं चकोरबतका हंसा मयूरादिकाः॥४०१॥ समासन्नं च तस्याथ सर एकं जलेन वै // पूर्णमासीच्च शोभाढयं फलपुष्पद्रुमादिभिः // 402 // कलहंसकुलै रम्यं जलकुर्कुटसंकूलम् // उल्लसद्भिश्च कल्लोलेः पालिभन्नैः सुशोभितम् // 403 // सोपानैः परितो बद्धं पद्मिनीखंडमंडितम // सेतुयुक्तं जलापूर्ण राजते तत्सरोवरम् / / 404 // संजातमजनेच्छः स कान्तया सह तत्र वै // रम्यां कृत्वा जलक्रीडा पाल्युपरि विवश च // 405 // सहकारसुवृक्षस्यांतिसुपक्वफलैस्तदा // प्राणवृत्तिं विधायाथ तच्छायाया मुपाविशत् // 406 / / तत्रातिनिकटे स्वर्गभुवनशोभकं खलु // श्रीयुगादीशप्रासादं सुवर्णकलशैस्तथा // 407 // कृतश्रेणिसुशोभाभियुतं मण्डपपंक्तिभिः // कृतपरंपराभिश्च सुस्थितशालभंजिकम् // 408 // द्वासततिसुराणां च कुलिकाभि मनोहरम् // स ददर्श ततो चित्ते चिन्तयति च निश्चितम् // 409 // प्रासादो जिनदेवानां दृश्यतेऽत्र सुशोभनः // इति ध्यात्वा स आनन्दयुतस्तत्र गतो द्रुतम् // 410 // देवतायाश्चनत्यर्थ मितः प्रासादमध्यतः ॥णकलकलारावं श्रुत्वा जाले व्यलोकयत् / / 411|| ज्य मिव दृष्ट्वा स प्रासादान्तः कुमारकः // पन्नी प्राहाथ हेभायें कथं तत्र व्रजाम्यहम् // 412 //
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________________ | हेदेवि ललनामध्ये गमनं मे शोभनं नहि // अतस्त्वं व्रज तत्राथ विलोकय द्रुतं च का // 413 // वर्तते नायिका मुख्या किमर्थ तत्र सन्ति ताः ॥स्थिता एव मिति झात्वा नत्वा देवं तथा पुनः॥४१४॥ समागच्छेति सा भर्तु रादेशं प्राप्य मध्यतः // प्रासादस्य जगामाथ वीणानादयुतं खलु // 415 // तत्र काश्चन गायन्ति पूजयन्ति च देवताम् // काश्चन केसरेणाथ चन्दनेन तथैव च // 416 // पूर्णकच्चोलहस्तास्ता स्तद्देवं पूजयन्ति च // लीलावती च तास्वेका रूपनिर्जितरम्भिका // 417 // | बाला स्त्रीणां तथाग्रे च ह्युपविष्टा ध्यायति शुभम् // सावलिंगा समासन्ना पंचांगैश्च प्रणामतः // तस्यास्तत्र युगादीशं नत्वा स्तौति च देवताम् // 418 // - नान्यं वदाभि न भजामि नवाश्रयामि // नान्यं शृणोमि न यजामि न चिंतयामि // लब्ध्वा त्वदीयचरणांबुज मादरेण श्रीवीतराग भगवन् भज मानसं मे // 419 // ततोऽसौ सावलिंगा वै ध्यानस्थां तामुवाचह // हेसखि त्वामहं वन्दे सावलिंगां तदा खल्लु // 420 // नवीनां च सुरूपां च वैदेशिकी तथैव च // ज्ञात्वा मुमोच सा वाला निजध्यानं विधानतः // 421 // | अनिनवजनालोके विदेशवार्तादिकौतुकप्रश्ने // देशाचारविचारे कस्य मनो नोत्सुकीभवति // 422 //
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________________ चरित्रम् श्रो सदैववत्सा - वानकी ततोऽसौवै योजयित्वा स्वहस्तकौ // सावलिंगां च वन्दित्वा कुतः पृच्छति हे सखि॥४२३॥ आगतात्र कथं चैव ने काकिनी च दृश्यते // प्राहाहं सावलिंगा वे मालवे शुभदेशके // 424 // उज्जयिनीपुरीमध्या दागता नैककास्म्यहम् // मया साकं च मे भर्ताऽस्तीत्युक्त्वा च सा पुनः॥४२५।। पृच्छति त्वं च का किंच शुन्यारण्ये स्थितात्र वै॥ जिनप्रासादके वाले ध्यानलीना कथं तथा // 426 // ततः सा प्राह हेवाले मद्धृतान्तं शृणु प्रिये // पञ्चक्रोश इतो द्वारापुरीति नगरं खल्लु // 427 // भारतीस्पर्धया यत्र लक्ष्मीः प्रतिगृहे स्थिता // यं ब्राह्मी सगुणं चक्रे श्रीराश्लिष्यति तं खल // 428 // धरवीरश्च राजा वै विद्यते तत्करेषु च // असिलतावधूः शत्रून् बहून् नाप्नोति हे सखि // 429 // गृहणंती नासतीभावं तस्य राज्ञश्च धारणी // पट्टराझ्यस्ति नाम्ना वै तस्याः कुक्षौ च पुत्रिका // 430 // पश्चन्यश्च सुतेभ्योऽनुजाता लीलावती खबु // क्रमेण यौवनं प्राप्ता पितुर्वरस्य चिन्तनम् // 431 // शल्यं च दातुमर्हाऽहमभवं नैव संशयः // जणयं दुरंतचिंता पारावारं लिखिवइ बटुंति // इक्काविधुवंकन्ना ससालहि अयं कुणइ निच्चम् // पुत्रीचिन्ता नवत्येव पितुश्च कष्टदायिनी // 432 // सभाया मन्यदा राज्ञां राजांकेऽहं तु संस्थिता बन्दिजनमुखान्नुनं प्रभुवलसुतस्य च // 433 //
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________________ सदयवत्सराजस्य रूपसौभाग्यसंयुजः // शौर्यगुणादिकस्याथ वर्णनस्य प्रपंचकम् // 43 // अश्रोषं च गुणागारं मनसि चिन्तितं मया // एवंविधगुणानां वै पात्रं यद्यस्ति धैर्यवान् // 435 // तदा स च वरो मेऽस्तु तत्प्राप्तिकृतनिश्चया // मयात्रास्थायि षण्मासा व्यतीताः सन्ति हे सखि // 436 // कामितसंप्रदं तीर्थ मस्याधिष्ठायकः खलु // देवः सर्वजनानां वै प्रपूरयति कामितम् // 437 // मया च सखि मे चित्ते निश्चयो विहितोऽस्ति वै // यदि षण्मासमध्ये स सदयवत्सराड् खल्लु // 438 // मिलिष्यति न चेत्तर्हि ह्यहं च काष्ठभक्षणम् // करिष्याम्यद्य षष्ठस्य मासस्यैकोनविंशकम् // 43 // दिनं जातं परं मे स स्वकर्मदोषतः खलु // मिलितो नैव राजेन्द्रः कोऽपराधः प्रभोः सखि // 440 // - समीहितं यन्न लभामहे वयं प्रभो न दोषस्तव कर्मणो मम // दिवाप्युलूको यदि नावलोकते तदा स दोषः कथमंशुमालिनः // 441 // // जहवि वसंतमासे ऋद्धिं पावंति सयलवणराई // ज न करीरे पत्तं ताकिं दोसो वसंतस्स // अतोऽद्यश्वो हि वाहं च सखि काष्ठस्य भक्षणम् ॥करिष्यामि स्वरूपं स्वं कथयित्वा च सा पुनः॥४४२॥ अपृच्छत् सावलिंगां वै नामास्ति तव किं सखि // भार्यासि कस्य चैवं त्वं सावलिंगाऽवदत्तदा // 443 //
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________________ श्री सदैववत्स चरित्रम् 22 सावलिंगाभिधाना वै प्रियास्मि तस्य भूपतेः // त्वं कर्तुं चैव भर्तारं वाञ्छसि स च मे पतिः॥४४४॥ | अत्रागतोऽस्ति तच्छत्वा लीलावती ससंभ्रमा // पुल कांकितदेहा च जाता स्नेहवशाखलु // 445 // | आचारः कुलमाख्याति देशमाख्याति भाषितम् // संभ्रमः स्नेहमारव्याति वपुराव्याति भोजनम् // 446 // लीलावती ततः सा वै सावलिंगां जगाद हे // सखि प्रियः स मे राजकुमारोत्रागतः कथम् // 447 // | सावलिंगा तदोवाच त्वदाराधनतुष्टितः / / देवेनैव पितुः कोप मुत्पाद्य तव हस्तकम् // 448 // | गृहीतु मत्र चानीतः सोस्ति स्रीपुंजकं सरिव दृष्ट्वा नात्र समायातः प्रासादे विनयान्वितः // 449 // बहिःस्थितोऽस्ति तच्छ्रुत्वा लीलावती चमत्कृता // सा वक्त्यहो प्रभावो वै श्रीयुगादीश सुप्रभोः // 450 // षण्मासाभ्यंतरे भक्तेः चिंतितपतिसंगमः // लाभोऽभूच्च सुभाग्येन सखि मे सत्वरं खलु // 451 // ततः सा सावलिंगापि गत्वा प्रासादतो बहिः // लीलावतीसमाचारं द्रुतं साऽकथयत्खनु // 452 //
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________________ पुरः सदयवत्सस्य सदयवत्सराट् तदा // प्रतिवक्ति यदि त्वं वै प्रियासि तर्हि किं तया // 453 // त्वं चेत् प्रिया चकोराक्षि तदा स्वर्गसुखेन किम् / / त्वं चेत् स्थितासि मे चित्ते तदालं परभार्यया // 45 // सावलिंगा ततः प्राह हे स्वामिन् सा परं तु वै / / वाञ्छति त्वां पतिं कर्तुं त्वदर्थं च तया खलु // 455 // पण्मासान् श्रीयुगादीशसेवाकृतास्ति निश्चितम् // कुमारः प्राह हे देवि तदा तस्या भविष्यति // 456 // विवाहे तव वैरं वै यतो दुखं च जायते // अन्यासक्तं पतिं वीक्ष्य प्रत्यक्षं हरिणीदशः // 457 // तदुःखं भवति यन्न प्रवक्तुमपि शक्यते // वरं हृता मृता वा स्याद् वरं जन्मविवर्जिता // 458 // वरं विषधरग्रस्ता व शलानरोपिता // वरं दग्धाग्निना कुक्षी तीक्ष्णशल्यादिता वरम् // 459 // तिच्छयराणपहत्तं नेहो बलदेव वासुदेवाणम् // साववीणं वयरं तिणिहवि परभागपत्ताणि // 460 // सा प्राह नाथ तत्सर्वं सत्यमेव परं तव // बहुस्त्रीसंग्रह मे न चिते वैरं मनागपि // 461 // आयास्यति तदा प्राह कुमारस्तां प्रति प्रभुः // शृणु देवि मया प्रोक्त मतिप्रेमप्रभावतः / / 462 / / भूपः स्वकीयं यदि सर्वराज्यं ददाति मे स्वीयसुतासमेतम् // नेच्छामि भार्यामपरां तथापि वृष्टिं क इच्छेत्परमान्नतृप्तः // 463 // रा
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________________ चरित्रम् श्री सदैववत्स - पुनरपि तया चाथ कथिते स तु तत्र न // स्थितः किंतु चचालाग्रे सावलिंगा ततश्चसा // 464 // हे स्वामिन्नेव मेतां वै त्वदेकस्नेहतत्पराम् / / लीलावतीं त्वयाग्रे च ह्यवगणय्य युज्यते // 465 // न गंतुं च यतः सा वै त्वदेकमानसा परा // त्ववियोगेनात्मधात मंगीकरिष्यते खलु // 466 / / स्त्रीहत्यादषणं चेति महत्तव भविष्यति // लीलावत्यापि तत्राथ सदयवत्सधीमतः // 467 // आगमनस्य विज्ञप्त्य दासी च पितुरन्तिके निजैका पिता नूनं सत्वरं स्नेहनापतः / 468 // जनन्या धारिणीराझ्या स्वभर्तुरग्रतः खल्लु // प्रोक्तं च नाथ हे राजन् षण्मासावधिकः खलु // 469 // पूर्णाजातः सुताया वै कथमपि च यत्नतः // अथ तां यूयमत्रापि पश्चादानयत प्रभो // 470 // राजाह हे प्रिये सात्र स्वचिन्तितैकमानसा // दुढं जाता कथं पश्चादायास्यतीति हे प्रिये // 471 // गतियुगलकमेवोन्मत्तपुष्पाकराणां हतशिरसि निवासः क्ष्मातले वा निपातः // | विमलकुलभवानामंगनानां शरीरं निजपतिकरजो वा सेवते वा हुताशः // 472 // सदयवत्सराजा वै स्वचित्तेऽथ तया तथा // स्वभर्तृत्वेन बुद्धिमान् स्वीकृतोस्तीह वल्लभे // 473 // तस्य राज्ञश्च न प्राप्तौ शरणं वह्निरेव वै // तस्यास्तव सुतायाश्च भविष्यति न संशयः // 474 //
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________________ राजाथ निजमन्त्रिभ्य आह मंत्रिवरा वराः // उज्जयिन्याश्च यः कश्चिदागतो यदि निश्चितम् // 475 // - स्यात्तदा लभ्यते शुद्धिः सदयवत्सधीमतः // वार्ता च कौतुकवती विशदा च वार्ता लोकोत्तरः // परिमलश्च कुरंगनाभः // तैलस्यविन्दुरिव वारिणि दुर्निवार मेतत्रयंप्रसरतीति किमत्र चित्रम् // 476 / / नरेन्द्रः पुनरूचे वै श्रुयते तस्य तत्पिनुः // कृतापमानतः पुर्या निर्गमनं लोकवादतः / / 477 // मानधना नरा ननं तथा च धन्यपुमपाः / / व्याकलीनचिताश्च स्वस्थानं च त्यजन्ति हि // 478|| त्रयः स्थानं न मुंचन्ति काकाः कापुरूषा मृगाः // अपमाने त्रयो यान्ति // सिंहाः सत्पुरुषा गजाः // 479 // परं चासौ कुमारश्च यत्र यत्र हि यास्यति // गुणवांस्तत्र तत्रैव तस्य भानं भविष्यति // 48 // पूगीफलानि पत्राणि राजहंसास्तुरंगमाः // स्थानभ्रष्टास्तुशोभन्ते सिंहा सत्पुझ्या गजाः॥ 481 // सदयवत्सराजस्य शुद्धिश्चत्वापि लभ्यते // आकारणाय तस्याथ तदा च प्रेष्यते जनः // 482 // तावत्तत्रस्थ एको वै भट्ट उवाच हे नृप // अद्यैवोज्जयिनीतश्च समागतोस्मि भूमिप // 483 // राज्ञा प्रोक्तं च भोभट्ट चेत्त्वं जानासि वै तदा // सदयवत्सराजस्य स्वरूपं वद तत्वतः // 44 //
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________________ श्री सदैववत्स चरित्रम् नट्टोऽवक् देव तेनाथैकब्राह्मण्याः कृते खलु // रक्षायाः सदृशो हस्ती चैरावणेन मारितः // 485 // मानितोऽपिच राज्ञा स बहुस्तथापि वैरिणा // पूर्वेण दोषयुक्तेन मन्त्रिणा विहितश्च सः // 486 // उपायो येन राजा वै तस्मै कोपं चकार ह // कुमारं तं स्वदेशाद्वै ह्यास निर्वासयां तथा // 487 // कविर कविःपटुर पटुः शृरी भीरुश्चिरायुरल्पायुः // कुलजः कुलेन हानो भवति नरो नरपतेः कोपात् // 488 / / एवं राजकुमारे च विदेशे हि गते सति // तस्य भट्टा निराधारा विदेशे च चमन्ति हि // 489 // पुष्पफलसमृद्धया वै प्रीणितपक्षियूथके // वृक्षे सति समुच्छिन्ने तदाधारा विहंगमाः // 490 // दिशो दिशं च गच्छंति चाकलीभतमानसाः॥ छायासुप्तमृगः शकुंतनिवहेविश्वग विल्लुप्तच्छदः // कीटे रावृत्तकोटरः कपिकुलैः स्कंधे कृतप्रश्रयः॥ विश्रब्धं मधुपैनिपीतकसमः श्लाध्यः सतां यस्तरु क्षीणेऽस्मिन् बहुजीवसंघसुखदे यांति निराशा अमी // 491 // | अथ राजा पुनस्तं च पृच्छति भट्टराज भो॥ स च राजकुमारो वै यातो निर्गत्य कुत्र च // 492 / / भट्टो वक्ति स कस्यां वै सपत्नीकोऽस्ति निर्गतः // दिशि देव परं चेति नाहं वेनि मनागपि // 493 //
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________________ इत्येवं कथयित्वाऽसौ विरतो भट्टराज सः॥ तस्मिन्नेव च काले वै लीलावत्यास्तु प्रेषिता // 494 // दास्यपि तत्र शीघ्रं वै भूपति तमथो खलु // तथा वर्धापयामास यथा स्नेहोऽन्ववर्धत // 495 // सुतया तव राजेन्द्र यत्कृते पूजितः प्रभुः॥ श्रीयुगादीशसेवा वै षण्मासी च यथा कृता // 496 // सदयवत्सनामा च तस्मिंश्च मिलितोस्ति हि॥ तीथें तस्याः कुमारश्च हृष्टः श्रुत्वा च तन्नृपः // 497 // मन्त्र्यादीन् प्राह राजा च यदि तस्या वरःसच॥ अभीप्सितो मिलितोऽस्ति तत्र गत्वा च सत्वरम् 498 - अस्माभिरपि कार्योसौ विवाहस्योत्सवो मुदा // धर्मारंभे ऋणच्छेदे कन्यादाने धनागमे // 499 // शत्रुघातेऽग्निरोगे च कालक्षेपं न कारयेत् // इति विमृश्य राजा वै सपरिवारकस्तदा // 500 // / KS गच्छतिस्म च तत्राथ क्रमेणाग्रे च गच्छतः // पथ्येव मिलितो राज्ञः सदयवत्सधीरधीः // 501 // भट्टेनोपलक्ष्य राज्ञे वै वृत्तं सर्व निवेदितम् // सदयवत्सराजासौ भट्ट वक्ति तदा पुनः // 502 // K भट्ट नूनं च संभ्रान्तस्त्वं भो नाहं च राट खल्लु॥ मालवाधीशसुतोऽस्मि सदयवत्सभूपतिः // 503 // K कथयति तदा भट्ट स्त्वं स एवेति वेड्यहम् // मालवाधिपतेः पुत्रः सदयवत्स नामकः // 504 // कुमारः प्राह भो भट्ट सदयवत्स नामकाः // सप्तशतपुमांसो वै वर्तन्ते धरणीतले // 505 //
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________________ श्री सदैववत्स चरित्रम् 25 भट्टो वक्ति च भो राजपुत्र वृथा भवान् कुतः॥ संगोपयसि स्वात्मानं कीर्तिमान् भूमिभूषणः॥५०६॥ // विमलजसो दुच्चरिअं मयणो कप्पूरं च वमयनाहि॥ गयणं गणं पत्रायं पडणं किं ठाई अंतरई॥०॥ त्वंमया नैकशो राजन् याचितश्च त्वया खलु // वारंवारं धनं मह्यं दत्तमस्ति न संशयः // 507 // नाकार मुगिरसि नैव जहासि कालं // दत्वा न शोचयसि नैव विकत्यसे त्वम् // निःशब्दवर्षणमिवांबुधरस्य दातुः // संदृश्यते फलित एव तव प्रसादः // 508 // किं च प्रच्छन्नदत्तानि ह्यपि सन्ति कुमारक // प्रकटीभूतदानानि शतधा विस्तृतानि च // 509 // छल्लीछन्नद्रुम श्व मृत्स्नाच्छादितसमस्तबीजमिव // प्रायः प्रछन्नकृतं शतशाखतामेति // 510 // ततस्तं स्वसुताया वै विज्ञायेष्टं वरं शुभम् // सदयवत्सराजा वै राज्ञा पश्चात् स वालितः // 511 // - पृष्टं च भो कुमारेन्द्र गोपायति कुतो भवान् // आत्मानं चैव तच्छ्रुत्वा भट्टः प्राह नृपं प्रति // 512 // विदेशे चतुरो राजन् प्रकाशयति न स्वकम् // इत्येवं शास्त्रविख्यातं श्रूयते बहुधा भुवि // 513 // गृहदुश्चरितं मंत्रं वित्तायुमर्मवचनम् // अपमानं स्वदोषं च नात्मानं च प्रकाशयेत् // 514 //
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________________ श्रीयुगादिजिनेशस्य प्रासादैमंडिते खलु // सदयवत्सराजेन साकं तीर्थे सुशोभनः // 515 // Kलीलावत्याः स्वपुत्र्या वै चके परिणयोत्सवः // करमोचनकाले च बहुकनककोटयः // 516 // - राजाऽमन्यत पश्चाच्च चिंतयामास वत्सकः // अत्रैव मुदा मे पार्श्वे प्रातर्गिणपुंजकाः॥ 517 // धनस्य मार्गणार्थं च ह्यागमिष्यन्ति निश्चयम् // करगतकनकालादास्येहं खलु किं पुनः॥ 518 // तेभ्योऽहं पूर्वकीर्तस्तु नूनं म्लानि भविष्यति // अन्यायेनार्जयित्वा यद्दीयते श्रेयसे न तत् // 519 // - दत्तः खल्पोऽपि भद्राय यस्यार्थो न्यायसंचितः // अन्यायाच्च पुनर्दत्तः पुष्कलोऽपि कलोज्झितः॥५२०॥ तृणं लघु तृणात्तूलस्तूलादीप च याचकः // याश्चाभंगस्य कर्ता च ततोऽप्युल्लाघलाघवः // 521 // याचमान जनमानस वृत्तेः पूरणाय बत जन्म न यस्य॥ तेन भूमिरतिभारवयं नद्रुमैर्नगिरिभिर्नसमुद्रैः / ततो व्याकुलचितेन कुमारेण निशिस्मृता // हरसिद्धिश्च सागत्य प्रोचे मा कुरु वत्स हे // 523 // चिंतां च ते प्रभातेऽहं दास्ये बहु हिरण्यकम् // इत्युक्तवा सा गता देवी कुमारं प्रति सिद्धिदा // 52 // भगिनीपतिना साकं अथ नृपकुमारकाः // छूतेन क्रीडयित्वा वै स्वहस्तकलया च तम् // 525 // निर्जित्य तत्सकाशाच्च ह्यभावादन्यवस्तुनः // गृहीष्यामोऽस्य वै तीक्ष्णं वयं खङ्गं ततः स च // 526 //
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________________ श्री सदैववत्स चरित्रम् | मार्गयिष्यति स्वखङ्गं पतित्वा पादयोः खलु // तदा तदर्पयिष्यामो नान्यथेति विचारितम् // 527 // | हास्याय चिंतयित्वेति प्रातत्सस्य पार्श्वतः // गत्वा कृत्वा प्रणामं च कुमारमूचिरे तदा // 528 // | भोकुमारेन्द्र साकं त्व मस्माभिः सह खेलनम् // द्यूतस्य कुरु राजेन्द्र सोऽवददेवमस्तु तत् // 529 // पणमोचनकं किं तत् परमत्र भविष्यति // ते प्राहुस्तवखङ्गश्च ह्यस्माकं तु हिरण्यकम् // 530 // तदा वत्सेन स्वचित्ते चितितं नृपपुत्रकाः // हास्याय शालका नूनमागता मे समीपतः // 531 // भाव्यते मे जयो भावी ह्येते जिताः सुवर्णकम् // नार्पयिष्यं स्तेषां तु हास्यमेव भविष्यति // 532 // हस्तगतं हिरण्यं मे इति ध्यात्वा कुमारकः // तेन तान् प्रत्यवक् शूरो नृपपुत्राः करोमि भोः॥५३३।। यूयं स्वर्णं च मे पार्श्वे धीरा अत्रैव मुञ्चत // तथाकृते ततस्तैश्च देवीवरप्रभावतः // 534 // द्यूते तेषां समीपाच्च सदयवत्सधीमता // अर्जिता द्रव्यकोटि गृहीता तेन सत्वरम् // 535 // पक्वान्नं प्रीतिदानं च द्यूतद्रव्यं कुशोदकम् // सुभाषितं वचोर्थ च सद्यो गृह्णन्ति पंडिताः॥ 536 // स्वर्णेन तेन राजाथ सदयवत्सधीरधीः // प्रीणयतिस्म हर्षेण मार्गणानां गणं मुदा // 537 // | यैश्चदत्तानि दानानि पुनर्दातुं च ते क्षमाः // शुष्कोऽपि हि नदीमार्गः खन्यते सलिलार्थिभिः // 538 //
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________________ | अथ राजा स तेनाथ जामात्रा सह पत्तनम् // आगान्मानेन सोऽस्थापि कियंति दिवसानि वै // 539 // अथैकदा स राजा वै जामातृसहितो ब्रजन् // राज्ञश्च वाटिकायां वै वनमध्ये च निश्चितम् // 540 // श्रीधर्मघोषसूरीशान् परिच्छदयुतान् गतः॥ दृष्टवा तद्वन्दनायाथ गुरवस्तेन वन्दिताः // 541 // | स्वधर्मातिथये पूर्व धर्मोपदेशदानकम् // कुर्वन्ति यतयो हीति ध्यात्वा तैः गुरुभिस्तदा // 542 // तस्य धर्मोपदेशो वै दत्तश्च तस्य वाञ्छया // वाञ्छा सजनसंगमे परगुणे प्रीतिरौ नम्रता // 543 // विद्यायां व्यसनं स्वयोषिति रति र्लोकापवादाभयम् // भक्तिश्चार्हति शक्तिरात्मदमने संसर्गमुक्तिः खले // येष्वेते निवसंति निर्मलगुणास्तैरेव भूर्भूषिता // 544 // पुण्यादेवसमीहितार्थघटना नो पौरुषात्प्राणिनां यद् भानोभ्रंमतोऽपि नांबरपथे स्यादष्टमः सैंधवः // - स्वस्थानात्पदमेक मप्यचलतो विंध्यस्य वा नेकशो जायंते मदपालिपालितयशःश्रीलंभिनः कुंभिनः॥ अपि लभ्यते सुराज्यं लभ्यते पुरवराणि रम्याणि // नहि लभ्यते विशुद्धः सर्वज्ञोक्तो महाधर्मः // 546 // - दारिद्रयासमा धर्माः परे स्वल्पफलप्रदाः // कुत्रिकापणतुल्यस्तु जिनधर्मः सतां मतः // 547 // ME स्वल्पोपि जिनधर्मो वै विहितः सुधिया च यः॥ मृगांकस्येव तस्याथ परमसौख्यकारणम् // 548 //
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________________ चरित्रम् श्री सदैववत्स 27 | वाराणस्यां च पूर्व वै जिनंदत्ताभिधः पुरि // व्यवहारेषु मुख्यश्च वसतिस्म धनी महान् // 549 // | जिनधर्मेण वासितसप्तघातुः सुधीः स च // श्रीकान्ता खल्लु नाम्ना वै भार्यासीद्धर्मचारिणी // 55 // शीलादिगुणपंक्तिभिः संविभूषितमात्रिका // 551 // अथैकदा विना पुत्रं दुःखपूर्णां नताननाम् // दृष्टवोवाच धनी भायें श्यामाननं च दृश्यते // 552 // किमद्य ते च सा प्राह पुत्ररत्नं विनास्ति किम् // अपरं कारणं स्वामिन् श्रेष्ठी प्राह प्रिये च किम्॥५५३॥ दुःखकरणे न संसिद्धिरिष्टस्य पुण्यतः खलु // रम्येषु वस्तुषु मनोहरतां गतेषु रेचित्त रवेद मुपयासि // वृथा किमेवम् // पुण्यं कुरुष्व यदि तेषु तवास्ति वाञ्छा पुण्यं विना नहि नवंति समीहितार्थाः // 554 // तेन हि हे प्रिये पुण्यं कुरु चेति तत स्तथा // श्रेष्ठी स्वनार्यया साकं श्रीजिनपूजनादिकम् // 555 // ke नित्यं करोति तेनाथ क्षयं जगाम चोभयोः // अप्यन्तरायकर्मैव सा श्रीकान्तैकदा खलु // 556 // षोडशकलाभिः पूर्ण मृगांक शुद्धबिंबकम् // रात्रौ स्वप्ने ददर्शाथ प्रातस्तत् स्वप्नवृत्तकम् // 557 // श्रेष्ठिनेऽकथयद्धर्षात्तस्याः सोपि तदा खलु // 558 // पुत्रजन्मफलं वक्ति स्म सापि हृष्टा सती // पुण्याधिकं ततः कालाद् गर्भे तत्पुत्ररत्नकम् // 559 //
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________________ बभार नवमासैश्च पुत्ररत्नमसूत सा // एकादशेऽथ संप्राते दिने स्वप्नानुसारतः // 560 // तस्य मृगाङ्कनामापि चक्रे श्रेष्ठी तदा मुदा // मातापित्रो मंगाकोऽसौ ह्यत्यन्ताहाददायकः // 56 // - वर्धमानः क्रमेणाथ कलानां ग्रहणे कमः // कलाभ्ययनकार्याय पित्रासौ च ततः खलु // 562 // | उपाध्याय सोऽर्पितः पुरे तत्राथ शोभनः // अर्हदासोऽस्ति नाम्ना च व्यवहारी जिनस्य च // 563 // मते हि परमा श्रद्धा धनिनो यस्य विद्यते // तस्य शीलवती नाम्ना पत्नी च विद्यते खलु // 564 // बहुपुत्रोपरि जाता पद्मावती च नामतः॥ यस्या रूपेण सुन्दर्यो देवानामपि निर्जिताः // 565 // एवं सा गुणलावण्या पुत्री बभूव पुण्यतः // कलाभ्यासकृते सापि शालायां लेखनाय वै // 566 // यतः=ज्ञानाद्विदन्ति खलु कृत्यमकृत्यजातं, ज्ञानाच्चरित्रममलं च समाचरन्ति / ज्ञानाच्च भव्यभविनः शिवमाप्नुवन्ति, ज्ञानं हि मूलमतुलं सकलश्रियां तत् // 567 // | ज्ञानं स्यात् कुमतान्धकारतरणि आनं जगल्लोचनं, ज्ञानं नीतितरङ्गिणीकुलगिरि र्ज्ञानं कषायापहम्॥ ज्ञानं निवृत्तिवश्यमन्त्रममलं ज्ञानं मनःपाक्नं, ज्ञानं स्वर्गगतिप्रयाणपटहं ज्ञानं निदानं श्रियः // 56 //
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________________ श्री सदववत्स चरित्रम् काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् // व्यसनेन हि मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा // 569 // आहारनिद्राभयमैथुनानि, सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् // ज्ञानं विशेषं खलु मानुषाणां, ज्ञानेन हीनाः पशवो मनुष्याः // 570 // रूपयौवनसंपन्ना विशाल कुलसंभवाः // विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः // 571 // विद्या ददाति विनयं विनयाद्यति पात्रताम् // पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मस्ततःसुखम् // 572 // तत्पित्रा प्रहिता प्रीत्या झुपाध्यायस्य पार्श्वतः॥ तौ द्वावप्येकशालायां पठतःस्म च तावुभौ // 573 // प्रज्ञायाश्च प्रकर्षेण याभ्यां खलु चमत्कृते // जनानां हृदये नूनं तो दावपि मिथः खलु // 574 // | मैत्रीभाजौ च संजातौ भक्ष्यादिकं भवेच्च यत्॥आनीतं खलु ताभ्यां च मिलित्वा सकलं च तौ // 575 // भक्षयतः क्रमेणैव मतीव प्रीतिभाजनौ // परस्परं सुसंजातौ पद्मावत्यथ सैकदा // 576 // मार्जनाय गृहे स्वस्य पट्टिकायाः समागता // तत्पित्राकारिता पृष्ठं तत्रस्थया च पुत्रि भोः // 577 // पठितं किं त्वया किं वै स्वपठनस्वरूपकम् // जगौ च सकलं सापि पित्रा हृष्टेन वै तदा // 578 //
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________________ तृतीयं लोचनं ज्ञानं द्वितीयो हि दिवाकरः // अर्पिता रागतस्तस्यै वै नवतिः कपर्दकाः // 579 // सा मुदिता तु तद्रव्यं बद्धवा वस्त्रांचले तदा // गृहीत्वा तच्च पाठार्थ लेखशालां पुनर्गता // 1 // स्थापयित्वा तु तत् क्वापि हस्तलेखं लिलेख सा // मृगांकेन च तद् दृष्टं गृहीतं पूर्वभावतः॥२॥ छोटयित्वा कपर्दास्तान् गृहीत्वाऽतिप्रहर्षतः // तामज्ञाप्य च तेनैव ह्यानीतं भक्ष्यमुत्तमम् // 3 // भक्षितं तत् सुखं ताभ्यां पद्मावत्या ततःक्षणे // संभालिताः कपर्दास्ते नैव दृष्टास्तया तदा // 4 // NS तया पृष्टो मृगांकश्च दृष्टा भवता कपर्दकाः // तेनोक्तं वै मया नीता दत्वा तान् सुखभाक्षिका // 5 // आवाभ्यां भक्षिता सा तु तच्छ्रुत्वा साऽवदत्ततः // अहमासंश्चिकीर्षुस्तै रलंकारान् मनोहरान् // 6 // मृगांकेन पुनः पृष्टं मुग्धे वद सविस्तरम् // कतिमूल्या जवन्त्येते तदा सोचे विचक्षणा // 7 // एकया बुद्धिमत्या वै स्त्रिया पञ्चकपर्दकैः // कृतानि स्नेहतो ब्रीहीमूटकानां शतान्यपि // 8 // विचारितं मृगांकन तद् द्रव्यं तु मया हृतम् // अतोऽस्य रोचते नैव गर्हितं कर्म मत्कृतम् // 9 // विमृश्यैवं नवानन्यानानीय स कपर्दकान् // दातुं तस्य यदा लग्नो नागृह्णात् सा तदा तु तान् // 10 // areAR
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________________ चरित्रम् 29 श्री सदैववत्स कियत्कालेन तत् सर्व पद्मावत्याऽपि विस्मृतम् // पूर्ववत्प्रेमभावस्तु समाश्नितस्तयोरभूत् // 11 // परंतु हृदयं तस्य खेदातुरं ततोभवत् // कालेनाथ पठित्वा तो झुत्तीर्णौ शास्त्रमभ्यतः॥१२॥ | अनन्तर मुपाभ्यायोऽपृचत् पित॒स्तयोर्द्वयोः // विवाहार्थ च तैरुक्तं योग्याभावे स्थिता वयम् // 13 // उक्तं तेन विचार्येवं भवद्भयो रोचते यदि // सुरूपं सुगुणं चैव कथयामि वरं परम् // 14 // तैरुक्तं तर्हि यूयं तत् कार्य कुरुत सज्जनाः // भवद्भिर्यत् कृतं कृत्य मस्माकं संमतं सदा // 15 // ततस्तेन तयोः पित्रोः समृद्धिसदृशः शुभः // गुणिनोरुनयो श्चैव विवाहः संप्रमेलितः // 16 // उत्सवोऽपिमहान् जातो जनानन्दकरस्तयोः॥ प्रीतिरपि तथैवासीत् प्रत्यहं पूर्वतोऽधिका / / 17 // A अथैकदा सुहृद्गोष्ठयां स्वधनोपार्जने मतिम् // कृत्वा तेन मृगांकेन पृष्टौ स्वापितरौ यदा // 18 // सिंहलदिप मिलामि गंतुं मित्रैः सहाधुना // उचतुस्तौ तदा पुत्र अलं द्रव्यार्जनेछया // 19 // | एक एव सुतोऽसि त्व मस्माकं धन मुत्तमम् // असंख्यातं गृहे स्थित्वा भुंव भोगान् यथासुखम् // 20 //
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________________ पित्रे बोधितः सोऽपि विदेशगमनबया // बाढं समुत्सुको नित्यं पितरं तदयाचत // 21 // चिन्तितं तु तदा पित्रा विदेशगमनोत्सुकः // नून मयं गृहे नैव स्थास्यतीतिविभाव्यते // 22 // विचार्येवं च पित्रासावनुज्ञातः क्रयाणकैः // दशाष्टौ पूरयामास स्नेहात्प्रवहणान्यपि // 23 // ततः सोऽति विदेशाय प्रियानुज्ञामयाचत // अनुयास्यामि छायेव तदा सोचे मुदान्विता // 24 // - स्वामिनोक्तं मया सार्द्ध गमनं ते सुदुष्करम् // मरणं जीवितव्यं वा व्यसनं यद् भविष्यति // 25 // | भवत्वित्यपि सा वक्ति स्वामिनं मधुरं वचः // तथाप्यहं त्वया सार्द्ध मागमिष्यामि हे प्रभो // 26 // - तच्छूत्वा बहुधा तेन बोधिता साऽपि न स्थिता // मृगांकन समं भा चचाल हृष्टमानसा // 27 // अथ तं स्वजना यान्तं पन्थानं शुभलक्षणम् // जलाशयावधिं प्राप्य संप्रेष्य वलिता गृहम् // 28 // प्रेरितानि सुवातेन वाधों प्रवहणान्यपि // जग्मुरन्तःसमुद्रश्च योजनानां शतानि वै // 29 // अन्तीपागमे चाथ पञ्जरीस्थो नरो यदा // जलादिग्रहणायैवं द्वीपोऽसावित्युवाच ह // 30 // लोकेरुक्तं तदा मून मत्रोतीर्थ जलादिकम् // गृहीष्यामो वयं सर्वे तच्छ्रुत्वा नाविकैस्ततः॥३१॥
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________________ उपकण्ठमवाप्य प्रवहणस्थापनं कृतम् // जनाः सर्वेऽपि तत्तीरे युतीर्णा स्नानतत्पराः // 32 // श्रीसदेववत्सब लतागृहे मृगांकश्च सुप्तो तस्य प्रियाऽपि सा // तत्र सुप्ता सुखेनैव निद्रिता च ततः क्रमात् // 33 // तावत्पूर्वभवस्यैव कर्मणो वशतां गतः // मृगांकश्चिंतयामास गूढरोषान्मनस्यपि // 34 // त्यजाम्येनामिहैवाह मिति तेन कपर्दकैः // पञ्चभिः सह पत्रिका लिखिता कोमलाक्षरैः // 35 // अत्र स्नेहादलंकारा कर्तव्या इति शोभने // बद्धवा वस्त्रांचले तस्या स्ततोऽसा वुत्थितस्ततः // 36 // | प्रबन्नः सन् त्वरायुत स्तीरेरुदन् समागतः // रोदिषि किं जनैः पृष्ट स्तदोक्तं तेन मत्प्रिया // 37 // भक्षिता राक्षसैरत्र यूयं नश्यत नश्यत // तदा लोका भयभ्रान्ताश्चेनुः प्रवहणैः सह // 38 // मायया शोकसंविग्नो मित्रै राश्वासितः स च // कियत् कालान्तरे तत्र पद्मावत्यपि जागृता // 39 // अनालोक्य निजनाथं पश्यन्ती सर्वतोदिशम् // रुदन्ती वक्ति नूनं त्वं समुद्र शत्रुतां गतः॥४०॥ अतस्त्वयि पतित्वाद्य स्वप्राणान्नाशयाम्यहम् // दृढीकर्तुं स्वयं लग्ना स्ववस्त्रं पतनाय सा // 4 // | तदा तस्याः करे लग्नो ग्रंथिः किमिति चिन्तितम् // ततस्तं छोटयित्वापि तया तत्र विलोकितम् // 42 // सा लेरवपत्रिका दृष्टा सह पञ्चकपर्दकैः॥ वाचनेनाथ विज्ञातं तत्रस्थं तत् समीरतम् // 43 //
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________________ अभिमानी नरः प्रायो गूढान्तर्बद्धवैरभाक् // सत्यं तद्वचनं जातं भाषितं सुजनैर्भुवि // 44 // अहो पूर्व मया प्रोक्तं बहुकालेन यद्वचः // स्मृतिपथे समानीतं तेनाद्य दीर्घरोषिणा // 45 // एतावदिनपर्यंतं धारितं तत् कथं हृदि // ईदृशं दीर्घरोषित्वं नृणां गूढं धिगस्तु तत् // 46 // ततो मानवती सापि तत्रावलम्ब्य साहसम् // स्वहृदि चिन्तयामास ह्यहंभावतया तदा // 47 // - स्वामी मे यदि राजास्ति तदाहमपि भक्तितः // गुरुप्रज्ञाभिमानेन स्वोन्नतिं साधयामि वै // 48 // इति विचिंत्य सा तत्र विधाय मृत्तिकामयीं // जिनमूर्ति प्रतिष्ठाप्य नमोमंत्रैरपूपुजत् // 49 // उपसर्गाः क्षयं यान्ति छिद्यन्ते विघ्नवल्लयः // मनः प्रसन्नतामेति पूज्यमाने सुरेश्वरे // 50 // शुचि भूत्वा स्तुतिं कृत्वा सैकध्यानपरऽभवत् / / भत्तया पुष्पैः फलैश्चापि जगवन्तं समार्चयत् // 51 // प्रत्यहं पूजयित्वा सा चिन्तयन्ती स्वकर्मणाम् // विपाकं निजपापं च निर्जरयति धर्मतः // 52 / / - सागरान्तरटन्नौस्थजनज्ञापनसिद्धये // तृणानां पूलकं बद्धवा वंशाग्रे सा ततः स्वयम् // 53 // वंशमुत्तंभयामास रात्रौ श्वापदभयेन च // वृक्षाने मालकं कृत्वा स्वपिति तत्र जाग्रती // 54 // दिनानि सा फलाहारात् प्रत्यहं प्रत्यवाहयत् // ततः कर्मवशात्तस्याः सिंहलद्वीपमध्यतः // 55 //
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________________ चरित्रम् श्री सदैववत्स श्रेष्ठिनः सार्थवाहस्य तत्र पद्माभिधस्य च // सप्त नावः समाजग्मुः सागरान्तः प्रयासिनीः // 56 // उडुपस्थजनरुक्तं दृष्ट्वा चिहं ध्वजात्मकम् // नूनमत्र मनुष्योऽस्ति शरणार्थीति दृश्यते // 5 // दुःखी चेदत्रसोऽस्माभि रानीयते तदा वरम् / / अन्यथास्माक मेतस्मिन् क्षेमं नस्याजलाध्वनि // 58 // इत्येवं मानसे कृत्वा प्रधानव्यवहारिणा // ततस्तां शीघ्र मानेतुं प्रेषिताः स्वजनाः स्वयम् // 59 // KE तत्समीपं समागत्य प्राहुस्ते प्रणयान्विताः // भो भगिनि त्वमस्मत्तो बिभीहि मा मनागपि // 6 // Ka नेतुं समुद्रपारं त्वां वयं त्वत्र समागताः // इत्युक्त्वा तां समानीय दत्तातै र्व्यवहारिणे // 61 // तेनाऽपि तत् तथाभूतं तस्यै पृष्ठं ततस्तया // पोतभंगादिकं मिथ्या कथितं दुःखिता यतः // 62 // Kaपतित्यजनवार्तापि न कृता च ततः परम् // भोजनाच्छादनं कामं दत्तं तस्यै प्रमोदतः // 3 // Ka तत्रस्था सा स्वधर्मेणप्रभुध्यानपराऽभवत् // एकान्तरोपवासेन करोति स्म परं तपः // 64 // क्रमेणाथ धनी तस्या रूपात् कामवशंगतः // उवाच शृणु मद्वाक्यं पतिर्मग्नस्तवोदधौ // 65 // ततस्त्वं मत्प्रिया भूत्वा मुंश्व भोगान् यथासुखम् // वितथं न करिष्यामि दासवद्वचनं तव // 66 // एवं प्रार्थयतस्तस्य वचनानि पतिव्रता // शीलालंकृतदेहा सा श्रवणाभ्यां शृणोति न // 67 //
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________________ | साथ स्वदेहलावण्यक्षयाय क्षपणद्वयम् // कृत्वा च नीरसाहारं भुंक्ते प्राणार्थमात्रकम् // 6 // सोद्वेजयति तां कामात् प्रत्यहं प्रार्थयन्नपि // तेन खिन्ना सती सापि प्रार्थयामास सुप्रभुम् // 69 // हे नाथ ऋषभ स्वामिन् दुष्कर्मचूरक प्रभो // पूजाकाश्चमे दुःख मीहग द्रुतं विनाशय // 7 // ततश्चक्रेश्वरी देवी तूर्ण प्रादुरभूच्छिवा // साचेदं तां प्रति प्राह वत्से शुभगुणान्विते // 71 // तव शीलप्रभावेण पातिव्रत्यव्रतेन च // जिनभक्तया च तुष्टाहं तव पावं समागता // 72 // उक्तं तयाथ मे मातः शीलरक्षा यथा भवेत् / / तथा त्वं कुरु हे देवि प्रीताऽसि यदि चेन्मयि // 73 // KE ततो वातप्रयोगेण देव्या स्वशक्तितस्तया // प्रवहणानि सप्तैव भग्नानि वार्धिवारिणि // 4 // | पद्मावती तदा दैवाखब्धैकफलकाश्रया // जलधिजलकबोले रुच्छालिता दिनत्रयम् // 75 // सागरान्तः प्रपातेन भूयो मत्स्यै रुपद्रुता // पूर्वकर्मविपाकेन देवतयाऽपि नोद्धता // 76 // प्रतिकारश्च पापानां क्रियते न सुरैरपि // जलगजेन सोसाटय क्षिप्ता नभोंऽगणे ततः // 77 // वैताळ्यपर्वते चास्ति रथनूपुरपत्तनम् // विद्याधरपती राजा नाम्नासौ माणिकुंडलः // 7 // तेनाथ नभसो दृष्टा पतंती सा महोदधौ // गृहीत्वा दुःखितां तां च स स्वपुरे समानयत् // 79 //
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________________ चरित्रम् श्री सदैववत्स सहस्रपाकतैलाद्यभ्यंगेन सा मनोरमा // सजदेहा कृता तेन मनोज्ञाहारतस्तदा // 8 // अथास्याः पूर्ववद्रूपम् प्रादुर्भूतं मनोहरम् // दृष्ट्वा विद्याधरेन्द्रोऽपि मुमोह मदनाश्रयः // 81 // कामवाणैः सुसंविको रागान्धः सन्नपत्रपः प्रार्थयामास भोगाय तां विविधप्रियोक्तिभिः // 82 // सुंदरि स्वीकुरु त्त्वं मां विद्याधरीसुसेविता // मुंव भोगान् मया सार्द्ध पञ्चेन्द्रियसुखप्रदान् // 83 // Ka यतः॥ नवि अच्छि नविय होहि / सो जीवोति हुयणमि सयलंमि // जो जीवण मणुपत्तो / वियारहि उसयाहो॥ मांसं मृगाणां दशना गजानां चर्म द्विपारेः सुफलं तरूणाम् // वित्तं नराणां वपुरङ्गनानां गुणाधिका वैरकरा भवन्ति // 84 // तयोक्तं तातरूपस्त्वं जीवितदानमात्रतः // जातोऽसि मे तवाहं च पुत्री तुल्याऽस्मि सांप्रतम् // 85 // रम्यरूपा भवद्रामाः सन्ति किं प्रार्थने मम // पादयोस्ते पतित्वाहं प्रार्थयामि पुनः पुनः // 86 // अतः पुत्रीसमं कार्य मया साई कुरुष्व भोः // इति तद्वाक्यचातुर्यशीलादिगुणरंजितः // 87 // हृदये प्रतिबुद्धस्तां पुत्रीत्वेन प्रपन्नवान् // संतुष्टः स ददौ तस्यै परममौषधीद्वयम् // 8 //
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________________ तयोरेका स्वरूपस्य परावृत्तिविधायिनी // द्वितीयाऽपि तथैवासीदिष्टार्थसिद्धिदायिनी // 89 // अदृश्यीकरणं तेन तथैवांजनमर्पितम् // अंगुलीयं ततो दत्तं तस्यै विघ्नहरं शुभम् // 9 // अथैकदा तया तस्मै कथितं शुद्धभावतः॥ पतिमोचनकर्मादि मुलतः स्वस्वरूपकम // 9 // विज्ञप्तं चाथ भो तात मुञ्च मां सिंहलाध्वनि // तत्र स्वस्वामिनो बुद्धिवैभवं दर्शयाम्यहम् // 92 // | तच्छ्रुत्वा तेन सा मुक्ता सुसुमारपुरे ततः // औषध्या नररूपं स्वं कृत्वा च प्राविशत् पुरम् // 13 // स दिव्यरूपनेपथ्यधरोऽसौ हट्टमार्गगः // श्रेष्ठिनः कस्यचिद्धटे गत्वा चोपाविशत्तदा // 9 // | वार्तालापैश्च हृष्टेन तेन स व्यवहारिणा // सत्कृत्य तं पुनश्चापि भोजनाय निमन्त्रितः॥९५॥ तदोक्तं तेन हे श्रेष्ठिन्नहं कार्यप्रसंगतः॥ कियत्कालं समाश्रित्य स्थातु मिच्छामि सांप्रतम् // 16 // तस्माद्रसवतीकाः गृहं दर्शय मे स्त्रियः // कियत्कालं सुखेनैव तत्र तिष्ठाम्यहं यथा // 97 // श्रेणिना तत् कृतं कार्य तत्र गत्वा स तांप्रोत // ऊचे रसवतीकर्ती भोमातः प्रणमाम्यहम् // 18 // यतः शीलवता पुंसा स्त्रियं दृष्ट्वा तया सह // वाक्सम्बन्धस्त्रिधा तत्र कर्तव्यः क्षेम मिच्छता // 99 // वृक्षां प्रति तु मातेति समानां भगिनीति च // लध्वी प्रति सुतेत्येवं प्रोक्तव्यं धर्मतः सदा // 10 //
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________________ चरित्रम श्री सदैवक्स पुत्रत्वेन तया चापि स्वीकृतः सतु बुद्धिमान् // सहसांकाभिधां चक्रे स्वीयां लोकविचक्षणः॥१०१॥ KE अथ स निजरूपेण बुद्धिगुणकलादिभिः // सर्व विस्मापयामास पूरीलोकं विचक्षणः // 102 // Ke तेनापि कथितं तस्यै मातरेतद्धनं मम // गृहाण तालवृतं च पञ्चवर्ण समानय // 103 / / ततस्तयाऽपि मूल्येन समानीय समर्पितः // तदा तेनाऽपि तत्पुरं कलाभिस्तत्र चित्रितम् // 104 // करितुरग शालादि हट्ट श्रेणी समन्वितम् // प्रेक्षकानां यथा चित्ते दष्ट्वा चमत्कृति भवेत् // 10 // ततस्तस्यै तया प्रोक्तं-हेमातरय मुज्वलः // तालवृतस्त्वया पुर्या विक्रेतव्यो हि मूल्यतः // 106 // अष्टोत्तरशतेनैव रूपकानां न चाल्पतः // यदि कोऽपि न गृह्णाति प्रत्यानेयस्तदा स च // 107 // तालघृतं समादाय हट्टश्रेण्यां गताथ सा // दृष्ट्वा तं विस्मिता लोकाः द्रव्याधिक्यान्न जगृहुः // 108 // अल्पार्थे खलु कः कुर्यान् महद्र्व्यव्ययं जनः॥ क्रमादुच्चार्यमाणा सा वार्ता राजसभां गता॥१०९॥ तच्छ्त्वा नगरस्वामी नरवर्मा व्यचारयत् // मत्पुराद् यास्याति पश्चात् वस्तु चेद् विक्रयं विना॥११०॥ तदा मे मानहानिः स्यात् कृत्वैवमुक्तवांस्ततः॥ भांडागारिन् त्वयानेय स्तालवतः स मुल्यतः // 11 //
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________________ भांडांगारी तदा तस्यै मूल्यं दत्वा समानयत् // सत्वरं तालवृतं च तस्मै राज्ञे समापर्यत्॥११२॥ अथ राजाऽपि तं दृष्ट्वा तालतं चमत्कृतः // अवदच्चास्य कर्तारं मत्समीपे समानय // 113 // सा भाण्डागारिणा वृद्धा नृपाये स्थापिता तदा // राज्ञा पृष्टं च भोवृद्धे केनेयं चित्रिता कला // 114 // E सावदच्चापि हे स्वामिन् ममांगजेन तत्कृतम् // नृपेणोक्तं च भोवृद्धे यदि पुत्रोऽस्ति तादृशः // 115 // / एतावदिनपर्यन्तं प्रादूर्भूतः कथं न सः // वृद्धा जगाद हे स्वामिन्नायं मे सत्यपुत्रकः // 116 // वैदेशिको मया कोऽपि वचनेनांगजीकृतः // राजा प्राहाथ जोमातः सोऽत्र त्वया ममान्तिके // 11 // द्रुतं प्रेष्य स्तदा साप्योमिति कृत्वा गृहं गता // प्रेषितोऽथ तया सोऽपि सहसांको महाद्युतिः॥११८॥ द्रुतं राजजनैः सार्द्ध नृपपार्श्व समागतः // मुदितेन नृपेणाथ कलाज्ञानं प्रशंसितम् // 119 // पूजितश्चमहास्नेहात् प्रोक्तश्चासौ महामतिः॥ सहसांक त्वया चात्र प्रत्यहं राजसन्निधौ // 120 // समागन्तव्य मित्युक्त्वा राज्ञा सोऽपि विसर्जितः // हर्षयुक्तो निजावास माजगाम स बुद्धिमान् // 12 // अथ स सहसांकोऽपि नित्यं राजसभां प्रति // प्रामोदयन्नृपं गत्वा भृशं शास्त्रविनोदतः // 122 // | कदाचिद्धर्षपूर्णेन राज्ञोक्तं भो महायुते // अन्यां कांकां कलां वेत्सि सहसांक वदाधुना // 123 //
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________________ श्री सदैववत्स 34 चरित्रम् अवदत्सोऽपि हे स्वामिन् चतुःषष्टिः कलाः क्रमात् // स्त्रीणां च पुरुषाणां च द्वासप्ततिः कला अपि 124/ | वेम्यहं तत्वतः सर्वा नाज्ञातं किं जगत्यपि॥ तच्छ्रुत्वा नृपतिः प्राह भो अध्यापय मत्सुताम् // 125 // इति नृपाझ्या सोऽथ छन्दोलक्षणसंयुतं // शास्त्र मध्यापयामास सुता मल्पै दिनैरपि // 126 // अथोवाच नृपस्तुष्टः सहसांकं प्रति प्रभुः // भो विद्वन् दीयते यत्तत् सर्व स्तोकं भवत्कृते // 12 // तथापि त्वं गृहाणेदं देशग्रामादिकं स्वकम् // एवमुक्तोऽप्यसौ तस्मान्-न गृहणाति मनागपि // 128 // उक्तं पुनः पुना राज्ञा तद्ग्रहणाय सोऽवदत् एवं चेदाग्रहो राजन् शुल्कमण्डपिकां मुदा // 129 // यावद्वर्षत्रयं देहि संतुष्टोऽसि मयि प्रभो॥ ततो राज्ञापि सा दत्ता तस्मै लेखसमन्विता // 130 // इति लिखापितं तत्र सहसांकेन राजतः॥ द्रव्यं मण्डपिकाशुल्का दुत्पन्नं यावदेवतत् // 231 // सर्व महं गृहीष्यामि कस्याऽपि व्यवहारिणः॥ मदिच्छया च त्यक्ष्यामि शुल्कं सर्व मथापरम् // 132 // असत्यवादिनः सर्व गृहीष्यामि तथा धनम् // राझा तद्विषये रावा श्रोतव्या नहि कस्यचित् // 133 // एवं विलिख्य तत्सर्व राज्ञा तस्मै समर्पितम् / अधिकृत्यं हि शुद्धकस्य यावद्वर्षत्रयं भवेत् // 134 // अथैवं शुल्कद्रव्यस्य ग्रहणेन महाधनी // संजातः स्तोककालेन सुपरिजनसंयुतः // 135 //
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________________ बहुकोटिमितं द्रव्यं वर्षद्वयेन चार्जितम् // स्त्रीयोग्याश्च ततस्तेन ह्यलंकाराश्च कारिताः // 136 // स्वनाम्नांकिताश्चापि पुरुषाणा मतिप्रियाः // तथैव विविधाकाराः कारिता द्रव्यतस्तदा // 137 // एकदा भूपतेः पुत्री नाम्ना या सुरसुंदरी // तस्य रूपं समालोक्य कामरागवशं गता // 138 // बभूव सोत्सुका साऽपि तत्पाणिग्रहणाग्रहा // तज्ज्ञात्वा तद्विवाहाय राज्ञा स प्रार्थितस्तदा // 139 // प्रकाशयति नात्मानं स्त्रीभावान्मन्यते न तत् // परं राजाग्रहं दृष्ट्वा विचार्य तेन स्वीकृतम् // 14 // अष्टादश महातीर्थ यात्रायां मदभिग्रहः // अस्ति पश्चात् करिष्ये तदेवमाश्वासितो नृपः // 14 // परं चेतस्तृतीयाब्दे षण्मासेषु गतेषु सः // मृगांकः सिंहलद्वीपात् तत्रागात् धनलब्धिमान् // 142 // तत्रादत्वा यतः शुक्लं गम्यते नाग्रतो जनैः॥ रत्नाकरोपकण्ठे च स्वनावः स्थापितास्ततः // 143 // भृगांकोऽपि पुरे तस्मिन् समागत्य विवेकतः // नृपं नत्वा जगामाथ मण्डपिकाधिपं क्रमात् // 144 // मृगांकेन नृरूपत्वात् तदा सा नोपलक्षिता // सहसांकं प्रति प्रोक्तं भो शुल्काधिपते मम // 145 // शुल्कमेव गृहीत्वा प्रवहणमोचनं कुरु // अग्रतो गम्यतेऽस्माभि यथावस्थानुसारतः // 14 // विलम्बकांक्षिणा तेन तच्छ्रुत्वा बाढमादृताः // मृगांकसहिताः सर्वे भोजनाय निमन्त्रिताः // 147 //
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________________ श्रो सदैववत्स भोजनानन्तरं चाथ सहसांकोऽपि तैः समम् // उपकण्ठं समुद्रस्य गत्वा तत्र व्यलोकयत् // 148 // - ज्ञापितं तेन तेभ्योऽपि यूयं सत्यं वदिष्यथ // तदा शुल्कार्धमूल्येन छुटिष्यथान्यथा नहि // 149 // | स्वल्पं चेद् यदि कूटं स्यात् समूलं तर्हि यास्यति ॥युष्माभिः सत्यमेवैतत् वाच्यं लेख्यं विशुद्धये॥१५०॥ - तेनोक्ता अपि ते सर्वे मृगांकप्रमुखास्तदा // सांयात्रिका महालुब्धा वणिग्विद्याप्रकाशकाः // 151 // प्रवहणपदार्थानां स्तोकं मूल्यं जगुस्तदा // लिलिखुश्च तथा लेख्ये स्वर्ण मौक्तिक सुस्थले // 152 // - मंजिष्टादिभृताः पेटाः प्रोक्ता लिखापिताश्चतैः / सहसांकेन तन्मध्यात् स्वप्रत्ययाय तरक्षणम् // 153 // उद्घाटिता यदा पेटास्तदा दृष्टं महऊनम् // कुद्धेनं तेन तेभ्योऽपि परूषं गदितं बह // 154 // अर्ध शुल्के मयोक्तेऽपि लोभात्सत्यं न पालितम् // युष्माभिश्च कृतं कूटं तत्फलं दर्शयाम्यहम् // 155 // | वाढं तॉस्तयित्वेति सर्वान् बद्धवा चतुष्पथे // समानीय स चिक्षेप कारागारे महाधनान् // 156 // तवृत्तान्ताद् विदेशेऽपि स्वापकीर्तिभयादथ // राज्ञा विज्ञप्य तं ते तु कारागाराद् विमोचिताः॥१५॥ | सर्वेऽपि सहसांकेन भोजनाय निमन्त्रिताः // स्नान देवार्चनाद्याभिः पूजाभिः पूजितास्तदा // 158 // ततस्तान् प्राणयामास पक्वान्नादिसुभोजनैः // प्रवहणस्थितं वस्तु स्वगृहे स्थापितं मुदा // 159 //
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________________ मृगांकः सहसांकं च विज्ञपयति भोप्रभो // द्वित्रिगुणात् शुल्कदानात् मुक्तात्मानं कुरुष्व माम् // 16 // K परं न मन्यते सोऽपि प्रत्युत भापयत्यथ // जीवन्तं त्वां न मुञ्चामि शपथेन वदाम्यहम् // 161 // Ka तहृदयगतं भाव मजानन्नतिभीस्कः // वदति मम सर्वस्वं गृहीत्वा मुञ्च मामितः // 162 // तेनैवं प्रार्थितः सोऽपि कमप्येकं न मुक्तवान् // ततश्चिन्तापराः सर्वे कर्तव्यमूढतां ययुः // 163 // सततं सहसांकस्तु मृगांकादीन् समादरात् // संतोषयति सुस्नेहात् भोजनाच्छादनादिना // 164 // सर्वेषां सुखशय्यादीन खावासेऽकारयत् सुधीः // यथासुखं विहर्तव्य मित्युवाच प्रहर्षतः // 165 // एकदा सहसांकेन मृगांको निजसन्निधौ // शय्यायां शायितो रात्रौ वार्ताभिस्तोषितो बह॥१६॥ अर्थेवं महती रात्रि व्यतिता वार्तया तयोः // तत्प्रस्तावे मृगांकश्च सहसांकमुवाचह // 16 // अथास्माकं प्रकारेण केनाऽपि त्वत्समीपतः // भविष्यति नवा मोक्षो कृपां कृत्वा वदाधुना // 16 // सहसांकेन हास्येन प्रोक्तं पादतले मम // उद्वर्तयसि हस्ताभ्यां घृतं शेरमितं यदा // 169 // भविष्यति तदा मोक्षो नान्यथाकरणेन हि // मृगांकेनाऽपि तत्सर्व पारवश्याच स्वीकृतम् // 17 // K अथातो सहसकिस्य सुप्तस्य पादयोघृतम् // शेरमितं यदा लग्नः समुद्रर्तयितुं क्रमात् // 17 // reORTER
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________________ श्रीसदैववत्सम यामकं तेन तद्धृष्टं निष्टितं स्तोकमेव तत् // सहसांकोऽपि कापटयात् संजात इव निद्रितः // 17 // निद्रितं तं विलोक्याथ मृगांकः श्रममाश्रितः // शेषं घृतं स्वयं पातुं प्रवृत्तो बहुदुःखितः // 173 // | इतः कपटनिद्रातः प्रबुद्धेनेरितं वचः // रंक इव धृतं रात्रौ पिबंति व्यवहारिणः // 17 // मृगांकस्तर्जितस्तेन श्याममुखो बभूव ह // अथापवरके गत्वा सौषधीबलतः स्वयम् // 175 // स्त्रीरूपं पूर्ववत्कृत्वा स्वाभरणैः स्वलंकृतम् // सहसांको मृगांकस्य पार्श्वमागाद्बहिर्दुतम् // 176 // उक्तं तया मृगांक प्रत्युपलक्षयथाथ माम् // किं तदैव मृगांकन पद्मावत्युपलक्षिता // 177 // अहो संजातमेतत् किं सोऽचिंतयञ्चमत्कृतः स्वप्ने पश्यामि किं साक्षाद्वेमां पद्मावती महम् // 178 // अतीव विस्मितो यावत् स तां किमपि पृच्छति // तत्पादयोः पतित्वा साक्षामयामास तं तदा॥१७९॥ - प्रोक्तं तयाथ हे स्वामिन् बाढं मया विगोपितः॥ खेदितश्चासि तत्सर्व क्षन्तव्यं कृपया त्वया // 18 // मद्वचःपालनायैवं चैतत् सर्व मया कृतम् // गृहमध्येऽथ तं नीत्वा स्वकीया सकला तया // 18 // समृद्धिदर्शिता सोऽपि दृष्ट्वा ता मतिविस्मितः // मृगांकः स तदा तत्र परां लज्जा मवाप्तवान् // 182 // | तेन पृष्टा स्वकीयं सा वृत्तान्तमवदत्ततः॥ क्षमयित्वा मृगांकोऽपि प्रसन्नः सन्नुवाच ताम् // 183 //
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________________ प्रिये मयाऽपि मूढेन त्वं क्षिप्ता निर्जने स्थले // निराधारा महारोषात् संदिग्धे जीविते तथा // 14 // Kजीविता वं स्वभाग्येन केवलं पूर्वपुण्यतः // समृद्धिं महतीं प्राप्य महो नाशितस्त्वया // 18 // अथ प्रातर्मगांकस्य सुहृदः सर्व एव तत् // ज्ञात्वा धिक्कारयामासु भृगांकं तत्स्वरूपतः // 186 // KE कथयति धिगेनं यो ह्यपराधं विना प्रियाम् // कथयन्निर्जने द्वीपे तत्याज निद्रितां यतः // 187 // KE क्रमेणार्थेष वृत्तांतो राज्ञा ज्ञातो जनाननात् // नृपाने कथयामास मंत्र्येकः कश्चिदेवहि // 188 // मंडपिकाधिकारी यो स्त्रीरूपोऽभूत् स्वरूपतः // चमत्कृतेन राज्ञा तच्छ्रुत्वा पृष्टं समूलकम् // 189 // मंत्रिनिह भवे वापि स्त्रीरूपोऽभूत् परे भवे // प्राह स्वामिन्भवेऽत्रैव जातोऽस्ति स्त्रीस्वरूपकम् // 19 // तदा राजा तमानेतुं कौतुकाकुलमानसः॥ मन्त्रिणं प्रेषयामास सहसांकगृहं प्रति // 191 // ततो मन्त्री तदावासे गत्वा स्त्रीरूपधारिणम् // मंडपिकाधिकारिंस्त्वा माह्वयति नराधिपः // 192 // तयोक्तं चाथ भो मन्त्रिन् पूर्ववन्नृपसन्निधौ // मत्समागमनं चातः परं नैव भविष्यति // 193 // मंत्रिणाऽपि तदा तत्र गत्वा प्रोक्तं तयेरितम् // तामानेतुं नृपेणापि स्त्रीवर्गःप्रेषितः शुभः॥१९४॥ सुखासने स्थिता ताभिः सह पद्मावती तदा // हर्षेण साभवत् पूर्णा राजगृहं समागता // 195 //
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________________ चरित्रम् 37 श्री सदैववत्सराशा पृष्टा तत तापस राज्ञा पृष्टा ततः सापि सर्व पद्मावती तदा // तस्याने कथयामास मूलतः स्वस्वरूपकम् // 196 // E भूपति रपि तच्छ्त्वा चेतस्यतिचमत्कृतः // तामुवाच मया पुत्री दत्ता ते किं भविष्यति // 197 // | सोचे राजॅस्तदा तत्र ममासीद् धृदि तत्पतिः // तेनैषाऽपि प्रिया भूयात् मत्पत्युर्मानिता सदा॥१९८॥ | भगिनीं गणयिष्यामि ह्यहं प्रीतिपराथ ताम् // भवते रोचते यर्हि तदा त्वां प्रवदाम्यहम् // 199 // मत्पतिना समं राजन् तत्पाणिग्रहणं शुभम् // कारय त्वं प्रमोदेन यथारुच्यन्यथा कुरु // 20 // | श्रुत्वाऽपि सर्वसभ्यैस्तदुक्तं स्वामिन् महामतिः // व्यवहारी मृगांकोऽतः पुच्या विवाह मर्हति // 201 // | सभ्यानां वचनाद्राज्ञा मृगांकन समं तदा // स्वसुताया विवाहश्च महोत्सवेन कारितः // 20 // तस्मै दत्तं बहु द्रव्यं राज्ञाऽपि करमोचने // भोजितं तन्मृगांकेन स्वभार्यावचनात्पुरम् // 203 // K मृगांकोऽथ कियत्कालानंतरं स्वपुरं प्रति // गमनायोत्सुको भूत्वा नावो द्रव्यै रपूपुरत् // 204 // तस्मिन्नवसरे राज्ञा स्वपुत्री स्नेहभावतः // बहुधनप्रदानेन पद्मावत्यपि सत्कृता // 205 // | मृगांकः सह पत्नीभ्यां वेगेन स्वपुरं गतः // भुंक्ते विविधसौख्यानि दानधर्म करोति च // 206 // ज्ञानवद्गुरुसंयोगं समासाद्य कदा शुभम् // निजपूर्वभवं तस्मै पप्रच्छाथ महामतिः // 207 //
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________________ मतिसागरनामाथ गुरुरप्याह तं प्रति // जो मृगांक स्थिरो भूत्वा तव पूर्वभवं शृणु // 208 // पुरा धन्यपुरे ग्रामे एको वीरांगदाभिधः // क्षत्रियोऽतिदरिद्री च ह्यासीद वीरमतीपतिः // 209 // अथ नामान्तरं गच्छन्नेकदा सोऽतिनिर्धनः // वटवृक्षजटां दृष्ट्वा रक्तवर्णा स्वबुद्धितः // 20 // K मत्वा स्वर्णनिधिं तत्र चखान तदधस्तलम् // परं तेन ततो लब्धः केवलं स्वर्णटंककः // 211 // Ke शेषास्त्वंगारका दृष्टा मनसि चिन्तितं तदा // चातकोऽपि महावृष्टौ लभते नाधिकं जलम् // 212 // E स्वर्णटंकं गृहीत्वासौ ततः स्वगृहमागतः // तदिने तेन शाल्यन्नं कारितं घृतमिश्रितम् // 213 // उपविशत्यसौ यावद् भोजनाय गृहं प्रति // तावत्तत्र समायातो जयदत्तो महामुनिः // 214 // सच मासोपवास्यासी दाहाराय समुत्सुकः // वीरांगदेन तं दृष्ट्वा भक्त्याथ पूजितो बहु // 215 // भावनापूर्वकं तस्मै परमान्नं समर्पितम् // तदनु मोदयामास दृष्ट्वा वीरमती सती // 216 // / | अपत्यार्थ परं किंचिदपि नोद्धरितं मया // इति स्वमानसे कृत्वा किञ्चिदुद्वेगमादधौ // 217 // एवं ताभ्या मपि द्वाभ्यां सुपात्रदानतस्तदा // मनुष्यभवसंबन्धि भोगफलमुपार्जितम् // 18 // ततो मृत्वा मृगांकोऽभूः जीवो वीरांगदस्य यः // इयं पद्मावती भार्या बभूव वीरमत्यपि // 219 //
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________________ रिम् 38 श्री सदैववत्स - मुनिदानक्षणे किंचिदुद्वेगकरणेन तत् // निर्मानुषे समुद्रान्तीपे तन्मोचनं ह्यभूत् // 220 // - त्वद्वियोगजलद्विपोल्लालनादिभवं तया // दुःखं सोढमतः प्रोक्तं भुज्यते पूर्वकर्मजम् // 221 // निजपूर्वभवस्यैवं श्रुत्वा वृत्तांतमेव तत् // समुत्पन्नं तयोर्जातिस्मरणशान मद्भुतम् // 222 // | गुरोर्मुखारतावथ देवधर्म स्वीकृत्य चाराधतया स्वकाले // विमान मारुह्यदिवं प्रयातौ प्रयास्यतो मोक्षमपिक्रमेण // 223 // | संसारदावानलमेघतुल्या मेवं सकर्णस्पृहणीयवर्णाम् // श्रुत्वा गुरूक्तां सदयः कुमारः सुदेशनां श्रावकधर्ममाप // 224 // ततः सर्वे गुरुं नत्वा जग्मुः स्वस्वगृहेषु च // राजा सदयवत्साय स्वराज्यं दातु मिच्छति // 225 // न गृह्णाति परं चासौ कुमारो हि महामतिः // अथैकदा समुत्साही राजानं प्रत्युवाच ह // 226 // पर्यटन महं कर्तुं राजनिच्छामि सांप्रतम् // तेनाधुना सुतेयं ते सुखेनात्रैव तिष्ठतु // 227 // KE अवस्थानं मम क्वापि भविष्यति यदा तदा // एना माकारयिष्यामि तत्रेत्युक्तवा चचाल ह // 228 // विदेशेऽथ चलंतं तं कुमार मुक्तवान्नृपः // व्रज त्वमश्वरथ्यादि महाडम्बर संयुतः // 229 //
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________________ कुरुते नादरं कोऽपि विनाडंबरमत्र वै // आडंबराणिं पूज्यन्ते सर्वत्र न गुणा जने // 230 // सभायां व्यवहारेषु शत्रुमध्ये जनेषु च // आडंबरेण पूज्यत्वं स्त्रीषु राजकुलेषु च // 231 // भवेत् परिभवस्थानं पुमानाडंबरं विना // विशेषाडंबरस्तेन कर्तव्यः सुधिया सदा // 232 // वपुर्वचन वस्त्राणि विद्या विनय वैभवाः // वकारषट्रहीनो हि नरो नार्हति गौरवम् // 233 // श्रुत्वा सदय वत्सस्तत् प्राह चेत्थं नराधिपम् // कदापि वाग्विलासोयं चेतसि मे न रोचते // 23 // एकोऽहमसहायोऽहं कृशोऽहमपरिच्छदः // स्वप्नेऽप्येवंविधा चिन्ता मृगेन्द्रस्य न जायते // 235 // RE राजन् मम सहायस्य किमपि न प्रयोजनम् // सावलिंगासमायुक्तश्चचालासौ ततः स्थलात् // 236 // KE अथ मार्गे समागच्छन् शब्दान् शुश्राव स कचित् // अहो कैते मनुष्याणां श्रूयन्तेऽतिमहारथाः॥२३७॥ विचिन्त्येति चलन् यावत् विलोकयति सर्वतः // तेनैका कंदरा दृष्टा तावत् क्वापि नगोपरि // 238 // तत्र शब्दानुसारेण सभार्यः सदयो गतः // यावदेकमना भूत्वा कर्ण दत्त्वा शृणोत्यसौ // 239 // KE कंदराया मुखे तत्र प्रौढशिलाऽस्ति सुस्थिता // तेन कोलाहलः श्रुतो जनानां तदधस्तले // 24 // गच्छतांतः स्वहस्ताभ्यां सा शिलोत्पाटिता यदा // तत्स्थले कंदरा दृष्टा प्रौढसौधसमा तदा / / 241 //
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________________ चरित्रम् श्री सदैववत्स - पुरुषाः पञ्च तत्रासन् वार्तालापपरा अपि॥ तेन दृष्टास्ततस्तेऽपि दृष्ट्वा तं विस्मयं गताः // 24 // - सुंदर्या नार्यया साक मागतं तं विलोक्य ते // स्वचित्ते चिंतयामासुः पुरुषा पञ्च चेत्यपि // 243 // शिलया पिहितद्वारां कथमिमा समागतः // सामान्यः पुरुषो नायं किंतु कोऽपि नृपांगजः // 244 // - सुरांगनासमां भार्या दृष्ट्वाथ तैः परस्परम् // आलोचितं गृहिष्यामो ह्येनं हत्वा प्रियामिमाम् // 245 // - तेषां मध्यात्तदैकेन जनेनोक्तं सुहृद्वराः // स कथं मार्यते मिथ्या ह्युपायः क्रियतां वरः // 246 // श्रियते स्वयमेवायं यथा कुर्मस्तथैव तत् // इति विचार्य तैस्तत्र निश्रितं कारणं परम् // 247 // गृहीष्यामः शिरो तस्य जित्वैनं ततो वयम् // मृते तस्मिन्नियं देवी ह्यात्मीयैव भविष्यति // 248 // - इति विमृश्य तैस्तत्र प्रीतिपोषकवाक्यतः // भो मित्र स्वागतं तेऽस्तु स्नेहादित्याहतः परः 249 // - श्रुत्वा सदयवत्सोऽपि निजभार्यायुतस्तदा // तत्प्रीतिवचनेनाथ तेषां स निकटे गतः // 250 // तैरपि चासनं दत्वा तत्रोपावेशितस्तदा // त्वं द्यूतरमणं वेत्सि भो मित्र इत्युचुस्ततः // 251 // कुमारेणोक्तमहं वेद्मि तैरुक्तं तर्हि सत्वरम् // रमयस्व त्व मस्माभिः सह द्यूतं मनोहरम् // 25 // प्राह सोऽपि वरं चेति परं त्वहं करोमि किम् // मोचनाय पणस्यापि मत्पाबें वर्तते न किम् // 253 //
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________________ मस्तकमेव सर्वेषां पणोऽस्तु चेत्युचुश्च ते // कौटिल्येन वदन्त्येते कुमारेणापि चिन्तितम् // 254 // आकारै रिंगितैर्गत्या चेष्टया भाषणेन च // नेत्रवक्त्रविकारैश्च लक्ष्यतेऽन्तर्गतं मनः // 255 // परं तेषा मिदं पापं दुःखदं च भविष्यति // विचार्येति कुमारेण प्रोक्तं भो एव मस्तु तत् // 256 // ततो छूतेऽपि तत्काले हरसिद्धिप्रभावतः // तेषां शिरांसि पञ्चानां कुमारेण जितानि वै // 25 // तैरुक्तं चाथ भो मित्र गृहाण त्वं शिरांसि नः॥ तदाऽवदत् कुमारोऽपि शृणुत सुहृदो वचः // 258 // सुहृद्भिातृवर्गेश्च प्रीत्यैव रम्यते समम् // तं प्रायस्ततोयूयं मया बन्धुसमा मताः // 259 // सहोदरः सहाध्यायी मैत्र्यवान् रोगपालकः // मार्गे वाचा कृतप्रीतिः पञ्चैते बन्धवो मताः // 260 // विस्मितै स्तैस्ततः प्रोक्तं भोमित्र श्रूयतां वचः // अस्माभिः पापभिद्रोह चिंतितोऽभूत्तवोपरि // 261 // KE परं त्वनाग्ययोगेन नः संतापकरोऽजनि // यः करोति स तद् भुंक्ते ह्यत उक्तं जगत्यपि // 262 // E द्रुह्यन्ति ये महात्मभ्यो द्रुह्यत्यात्मानमेव ते // पूर्णेन्द्रुग्राहकृद्राहुः शीर्षशेषोऽभवन्न किम् // 263 // E सौम्ये विरूपचिंताया मपि स्वस्य विपनरः // दधिमन्थचिकीर्मन्थाः स्त्रीभिर्बद्धो निरीक्ष्यताम् // 264 // | पृच्छत्यथ कुमारोऽपि भोसुहृदो ममोपरि // युष्माभि चिंतितो द्वेषः कथं सत्यं वदन्तु नः // 265 //
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________________ चरित्रम् श्री सदैववत्सा खचिकीर्षितदुष्कृत्यं तस्याग्रे कथितं तदा // अहितं कृतमस्माभिः परं देवेन रक्षितः // 266 // - अथ प्राह कुमारस्तान् यूयं के व्रत सजनाः // कुतश्चात्र समायाता गुप्तस्थाने वदन्तु तत् // 267 // विद्यासिद्धा वयं चौरा इत्युक्त्वातेऽभिधां जगुः // अर्जक आमयः शूली सेवालश्चचतुर्थकः // 26 // घोरांधकार इत्येवं पञ्चनामानि सन्ति नः // चौर्याल्लोकधनं हत्वा विलसामो वयं सदा // 269 // अथासौ चलितुं तस्मात् प्रारभते यदा तदा // तैरुक्तं जो महाबुद्धे त्वमस्माकं समीपतः // 270 // गृहाण सिद्धिदां विद्या कामपि पार्थितश्चतैः // किंचिदपि स्वयं तेभ्यो गृहीतुं नहि वाञ्छति // 27 // तेषां मध्यादथैकेन पद्मिनीपत्रवेष्टितः // तुष्टेन कंचुको बद्धः उत्तरीयांचले तदा // 272 // लक्षमूल्येन रत्नेन मौक्तिकैः खचितः स च // तमजानन् कुमारोऽपि ततो गंतुं मनो दधे // 273 // तैरुक्तं चाथ हे मित्र कस्मिन् कष्टे समापतेः // कदापि यदित्वं क्वापि तदास्मान् सत्वरं स्मरेः॥२७॥ सिद्धिर्जनानामथ वै रसानां युद्धे जयानां-जलतारकाणाम् // गिरेविदारिण्यरिमर्दिनी-घ ह्याकाश गामिन्यपि नः समीपे 190 त्वमस्माकं परं मित्रं यतोऽसीह सुसंगतः // अतोऽवश्यं सहायं त्वां कर्तु मुत्कण्ठिता वयम् // 276 // 0
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________________ | क्षीरेणात्मगतोदकाय सुगुणा दत्ता पुरा तेऽखिलाः क्षीरे तापमवेक्ष्य तेन पयसा ह्यात्मा कृशानौ हुतः॥ गंतुं पावक मुन्मना स्तदभवत् दृष्ट्वा तु मित्रापदं युक्तं तेन जलेन शाम्यति पुनमैत्री सतामीदृशी // 277 // उक्तं तदा कुमारेण भवत्वेवं भवछचः // युष्मानहं स्मरिष्यामि यत्र तत्र विपद्गतः // 278 // अग्रे गच्छन्नथैकं स शून्यं पुरं ददर्शह // पुरमध्ये गतश्चापि धनधान्यादिसंभृताम् // 279 // चतुष्के निर्जनां दृष्ट्वा हश्रेणी मचिंतयत् // यदि कोऽपि मनुप्यो मां मिलत्यत्र महामतिः // 280 // निर्मनुष्यपुरस्यास्य पृच्छामि तं स्वरुपकम् // परं तत्र तदा तेन कोऽपि दृष्टो नरो नहि // 281 // Hel ततो भ्रमन्नसौ संध्याकाले राजगृहं गत : // गत्वा च सप्तमी भूमिं स्थितस्तत्र महाबलः // 282 // निद्रिता सावलिंगा च रात्रौ तत्र सुखाश्रया // जागरूकः कुमारश्च रक्षायै सुस्थितोऽभवत् // 283 // मध्यरात्रौ समीपस्य निवासे तेन संश्रुतम् // कस्या अपि स्त्रियो गाढं करुणस्वररोदनम् // 28 // जिज्ञासया कुमारोऽपि तत्रावासे गतस्तदा // रोदनं कुर्वती दृष्टवा स्त्रियं पप्रच्छ कारणम् // 285 // रोदिषि सुंदरि त्वं किं निर्मानुषे पुरे स्थिता // सा वक्ति भो महाबुद्धे शृणु तत् कथयाम्यहम् // 286 // यस्य कस्य समीपे स्वं वृत्तं न कथयेन्नरः // परं भाग्याधिको भासि तवाग्रेऽतो वदाम्यहम् // 287 //
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________________ चरित्रम् श्री सदैववत्स अधुना वर्तते रात्रि स्तत्र वाच्यं न कस्यचित् / / रहस्यं ज्ञानिभिः प्रोक्तमिति नीतावपि स्थितम् // 28 // 41 दिवा निरीक्ष्य वक्तव्यं रात्रौ नैवच नैवच // संचरन्ति महाधूर्ता वटे वररुचिर्यथा // 289 // स्त्रिया प्रोक्तं वचः श्रुत्वा कुमारोऽवददन्मनाः॥ भो सुंदरि कथं चैतत् सा प्राहाथ समुत्सुका // 290 // उज्जयिन्यां महापुर्यां विक्रमार्को नराधिपः // सभा तस्य महारम्या प्राज्ञैः पंचशतै वृता // 291 // सभागारभूतोऽपि वररुचिः सुपंडितः // यश्चतुर्दशविद्यानां पात्रमासीन्महामतिः // 292 // - राज्ञः कीडाशुकोऽप्यासीत् विदग्धमुखमंडनः एकदान्यनृपस्याग्रे नृपेण प्रेषितः स च // 293 // | लेखदानाय कीरः सोऽप्यगच्छत् गगनाध्वना // गत्वाथ कृतकार्योऽसौ परावृतः ततः स्थलात् // 294 // अध्वनि पद्मिनीपुरे कस्यापीभ्यस्य सद्गृहे // वेदिकाभित्तिभागे स विशश्राम श्रमाकुलः // 295 // रंभाकारं च तत्रासौ कन्यावृन्दं व्यलोकत // तन्मध्यादेकया प्रोक्तं भोसख्योऽयंशुकः शुभः // 296 // | नृपस्य विक्रमार्कस्य जीवितादपि वल्लभः // अर्थतो नामतश्चास्ति विदग्धमुखमंडनः // 297 // तत्सखिभिस्ततः पृष्टं भोसखि त्वं वदाधुना // वृत्तांतं तं कथं वेत्सि हर्षपूर्णाऽवदत्तदा // 298 // - उज्जयिनीपुरीमध्ये मातुलस्य गृहं मम // प्रसंगेन शुको दृष्टो प्रागसौ तत्स्थया मया // 299 //
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________________ तवृत्तांतः श्रुतस्तत्र ह्यत्रास्ति मत्पितुहम् // ततोऽतीव सुसंहृष्टा प्रोवाच सा शुकं प्रति // 30 // मम पावे समागत्य ममोत्संग मलंकुरु // तस्यास्तन्मधुरं श्रुत्वा वचः शुकेन तत्कृतम् // 301 // KE अंगसंवाहनं तस्य कुशलपश्नपूर्वकम् // प्रमुदिता सती कृत्वा कन्याऽपि सावदत्तदा // 302 // शुकराज सनाथास्मि ह्यद्याहं तव दर्शनात् // आगतोऽसि सुभाग्येन नूनं मे दृष्टिगोचरम् // 203 // अथ विक्रमराज्ञे त्वं मदीयमेकवाचिकम् // प्रसादं मयि कृत्वा च कथयेः सत्वरं शुभम् // 304 // * अन्यथा यदि ते पापं स्त्रीहत्याया भविष्यति // इत्युक्त्वाथ तयैकस्मिन् पत्रखंडे शुभाक्षरम् // 305 // श्लोकमेकं लिखित्वा तत् पत्रं तस्मै समर्पितम्॥ कथितं पत्र मेतच्च विक्रमाय समर्पयेः // 306 // E पद्मतुलारदौ रक्तौ तिलकं मंजरीयुतम् // मुखे दशांगुलीक्षेपः कथमेतत्तवानघ // 307 // इत्यासीलिखितं तत्र श्लोकरुपं गूढाक्षरम् // अथ तत्पत्र मादाय स शुकोऽपि ततः स्थलात् // 308 // K द्रुतमुड्डीय तत्पुर्या मुज्जयिन्यां समागतः॥ तेनाऽपि श्लोकपत्रं तद् विक्रमाय समर्पितम् // 309 // राजाऽपि वाचयित्वा तं श्लोकं चित्ते चमत्कृतः // पंडितेभ्यो ततस्तत्र तदर्थ परिपृष्टवान् // 310 // उज्जयिन्या मितश्चैको वसतिस्म महाधनी // महिराजाभिधो नाम्ना तत्पुत्रोऽस्ति महामतिः // 311 //
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________________ चरित्रम् श्री सदैववत्स 42 धनाप्तये गृहीत्वासौ हेम्नामाभूषणदिकम् // क्षत्रियैकसहायेन देशान्तरे चचाल ह // 312 // मागेंस्थगच्छता तेन सहायीभूतपाप्नना // धनलोभान्महारण्ये हन्तुं बद्धः स बुद्धिमान् // 313 // व्यवहारिसुतेनोक्तं भो मित्र त्वं धनं मम // गृहीत्वा मुंच जीवंतं प्रार्थितोऽपि मुमोच न // 31 // ततो वणिकसुतश्चासौ निजबुद्धिप्रभावतः // स्ववैरवालनायैव गृहीतंच पुनर्धनम् // 315 // - स्वपितुरर्पणायैव संदेशं च गुढाक्षरम् // कथयित्वा स तस्याग्रे तं प्रतिज्ञामकारयत् // 316 // मयि प्रसद्य भोमित्र संदेशो मत्पितुः पुरः॥ कथनीयो त्वयैकोऽय मित्युक्त्वा सो वदत्ततः // 317 // अप्रशिखेतितच्छ्रुत्वा क्षत्रियेण विचारितम् // एतावत् कथनेनापि मे पायो न भविष्यति // 318 // | ततोऽसौमारयित्वा तं गृहीतं सकलं धनम् // कियत्कालेन तत्रैव भ्रमन् स्वनगरे गतः // 319 // तेन पापात्मना तस्य गृहे गत्वा पितुः पुरः // तत्पुत्रमरणं प्रोक्तं मान्यादिना करोमि किम् // 320 // अप्रशिखेति तेनोक्तः संदेशः कथितस्तदा // इत्युक्त्वा स खलस्तस्मादुत्थाय स्वाश्रमं गतः // 321 // पुत्रस्य मरणं श्रुत्वा महाशोकातुरश्च सः // दिनानि कानिचिच्छोकादथ श्रेष्ठयतिवाहयत् // 322 // क्रमेण गच्छता सोऽपि कियत्कालेन बुद्धिमान् // स्तोकीभूतमहाशोकः संदेशार्थेऽकरोन् मतिम् // 323 //
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________________ आहृय पंडितान् श्रेष्ठान् संदेशार्थ स पृष्टवान् // परं संदेशवर्णार्थः केनापि कथ्यते नहि // 324 // ततः श्रेष्ठी नृपस्याग्रे गत्वा तां चतुरक्षराम् // कथयामास हृत्पंक्ति मप्रशिखेतिसंज्ञिताम् // 325 // तस्मै तदर्थ चापृच्छत् राजाऽपि विस्मयाकुल: // पञ्चशतीमितेभ्यः स्वपंडितभ्यो हि पृष्टवान् // 326 // परं कोऽपि तदर्थस्य कथनेऽभून्नशक्तिमान् // हृदयालिद्वयस्यार्थबोधायाथ नृपेण च // 327 // पंडितानां सभामध्ये दत्तो दिनत्रयावधिः // विचारः क्रियतां चास्य श्लोकार्थस्य हि शास्त्रतः॥३२८॥ हृदयालीद्वयस्यार्थ यूयं न कथयिष्यथ // भविष्यत्यपि सर्वेषां देशनिष्काशनं तदा // 329 // अथ ते पंडिताः सर्वे गत्वा वररुचेः पुरः॥ तस्य श्लोकद्वयार्थस्य विचारकरणे स्थिताः // 330 // दिनद्वयं गतं चैव परमों न लक्षितः // खिन्नाः कर्तव्यमूढास्ते पश्यन्ति स्म परस्परम् // 331 // प्रहेलिका समस्यां च निधानं हृदयालिकाम् // गर्भोत्पत्तिं विपतिं च नैव जानंति मानवाः // 332 // कदापि ज्ञानयोगेन देवस्योत प्रसादतः // जानन्ति मानवा नूनं दैवतांशा भवन्ति ते // 333 // अथार्थाज्ञानतो नूनं प्रभाते नो भविष्यति // देशनिष्काशनं चैव स्वमानभंगपूर्वकम् // 334 // इति विचिंत्य ते सर्वे प्राज्ञा भयातुरांःपुरात् // बहिर्निर्गत्य संध्यायां रात्रौ च कुत्रचित् स्थिताः॥३३॥
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________________ चरित्रम् 43 श्री सदैववत्स | वररुचिः स्थितो गत्वा श्मशानवटकोटरे // अथ तस्मिन् वटे रात्रौ प्रेतयूथं समागतम् // 336 // कुर्वन्ति वार्तया सर्वे विनोदं च परस्परम् // एकेनोक्तं प्रभाते वै नूनमस्मात् पुराद् बहिः // 337 // प्राज्ञनिष्काशनेनात्र विडंबना भविष्यति // तच्छ्रुत्वैको लघुप्रेतस्तं वृद्धं प्रति प्रच्छति // 338 // हेतुना केन भो तात पुरान्निष्काशनं बहिः // श्लोकार्थाज्ञानतो वत्स मिथ्यानासाच्च सोऽवदत्॥३३९॥ लघुप्रेतस्तदोवाच भो तातार्थोऽस्ति कस्तयोः // प्राह वृद्धस्तदर्थेन किमस्माकं प्रयोजनम् // 340 // | इत्युक्तोपि लघुप्रेतो मुमोच न कदाग्रहम् // अत उक्तं जगत्यस्मिन् नीतिग्रन्थेषु पंडितैः॥३४१॥ KE बालनारीनरेन्द्राणा ग्रहो अथिलसंनिभः // कंकपत्रीकृते येन वल्लभीभंग ईरितः // 342 // | महामत्याश्च सीताया जाते हेममृगाग्रहे // रावणेन समं युद्धं रामस्यापि बभूव ह // 343 // | स्वाराज्ये पांडुपुत्राणां कौरवाणां क्षयोऽभवत् // लघुप्रेताग्रहं दृष्ट्वा वृद्धप्रेतोऽवदच्णु // 344 // पद्माख्यं तु पुरं पद्मं वणिक्पुत्री तुला स्मृता // तिलकमंजरी ख्याता रदौ दंतौ प्रकीर्तितौ // 345 // रक्तावोष्ठौ तयोः पाणिग्रहणात्संगमो भवेत् // मुखे दशांगुलीक्षेपं कृत्वा विज्ञापयामि भोः // 346 // अथैतद्विषये राजंस्तव चित्ते यथा भवेत् // ममोपरि कृपां कृत्वा ज्ञापनीयं त्वयानघ // 347 //
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________________ वररुचिः स शुश्राव श्लोकार्थ कोटरस्थितः // चतुर्णामक्षराणां स वृद्धोऽथं तं ततोऽवदत् // 348 // अनेन तव पूत्रस्य प्रसुप्तस्य वनान्तरे // शिखा माक्रम्य पादेन खड्रेन शिरसि हतः // 349 // | हृदयालिकयोरर्थ श्रुत्वाथैवं तयोर्द्वयोः // हर्षोत्कर्षाल्लसद्गात्रो वररुचिर्गृहं गतः // 350 // सकलेऽपि पूरे तत्र पंडितग्रहणाय च // भ्रमंति सैनिका द्रुतं नृपादेशादितस्ततः // 351 // - तै धृताः पंडिताः केऽपि वररुचिस्तदावदत् // धियंते सर्व एवैते मुधैव पंडिताः कथम् // 352 // नूनं प्रश्नोत्तरं दास्ये नृपस्योत स सत्वरम् // सभां गत्वा जगादार्थ हृदयालिकयोरपि // 353 // तच्छ्रुत्वा सकला हृष्टा नृपयुता सभा तदा // अतिप्रशंसयामास वररुचिं महामतिम् // 354 // - सर्वेऽपि पंडिता हृष्टाः मुक्ताः संतो महाभयात् // वरं वर्धापयामासु वररुचिं महागुणम् // 355 // तत्र पद्मपुरे गत्वा विक्रमोऽपि वणिक्सुताम् // परिणिनाय हर्षेणं स तां तिलकमजरीम् // 356 // श्रेष्ठिनापि नृपादेशात् निगृह्य दुष्टक्षत्रियम् // वालितं पुत्रवैरं तत् पुनः प्राप्तं स्वकं धनम् // 357 // | उत्साही कौतुकालोके लघुप्रेतोऽवदत्ततः // पंडितानां न जातं तत् निष्काशनं कथं पुरात्॥३५८॥ | तेनाथ प्रेतवृद्धेन स्वावधिज्ञानतस्तदाः // वररुचेरवस्थानं विज्ञायोक्तं तदग्रतः // 359 //
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________________ चरित्रम् श्री सदैववत्स, मदुक्तार्थं स वै श्रुत्वा कथयामास तं नृपम् // पंडितानां पुनर्मानं जातं तेन सभासु च // 360 // - अत उक्तं मया भूमन् तथोक्तं सुजनैरपि // वक्तव्यो गुप्तवृत्तांतो रात्रौ नैव च नैव च // 36 // तदा सदयवत्सोऽसौ प्राह हे सुभगे मम // अपि समुत्सुकस्यैवं वृत्तांतं ते वदाधुना // 362 // - तयोक्तं चाथ हे श्रीमन् शृणु तर्हि कथां मम // राझो नंदाभिधस्याहं लक्ष्मीरस्मि प्रतिष्ठिता // 363 // जाताऽधुनाऽस्मि निर्नाथा करोमि रोदनं ततः // अथ त्वया सनाथाहं भवामीति समुत्सुका // 36 // Kउक्तं सदयवत्सेन खेदं मा कुरु सर्वदा // नाथोऽहं ते भविष्यामि लक्ष्मी न वृणुते हि कः // 365 // - कुमारः प्राह भोदेवि जातं शून्यं पुरं कथम् // कौतुकं यदि ते चित्ते शृणु तहीति साऽवदत्॥३६६॥ अत्र वीरपूरे ह्यासीत् भीमसेनाभिधो नृपः // तस्य लक्ष्मी रितिख्याता प्रिया राज्ञी बभूव ह॥३६७॥ रूपसौभाग्यसंपत्त्या सातीवाभून् मनोहरा // एकदा तत्पुरे कोऽपि तपस्वी सुसमागतः // 36 // दंभाजयितुं लोकान् स्त्रीमुखं नावलोकते // मासक्षपणकर्मान्ते पारणेऽसो निमन्त्रितः // 369 // कंवाधरैर्नरैमाँगें स्त्रियो दूरीकरोति सः // श्रुत्वा तत् कापि वेश्यका स्वमनसीत्यचिंतयत् // 30 // Ka अहो अयं महाधूर्तस्तपस्वी कपटे पटुः // मूर्खाणा रंजनायैव माडंबरं करोति सः // 371 //
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________________ मन्यमानेति सा तस्य चैकदा गलतोऽध्वनि // वेत्रिभिर्वार्यमाणापि स्वहस्तेन शिरोस्पृशत्॥३७२॥ तदासावप्यति क्रुद्धोविष्णुर्विष्णुरिति स्मरन् // स्नानार्थं लोकदृष्टोसौ प्रत्यावृत्तस्तदा ततः // 373 // वृतान्तं तमथ श्रुत्वा राजाऽपि कुपितो भृशम्॥ तां च वेश्यां समाहृय सूपालंभं स दत्तवान्॥३७४॥ वेश्योवाच महाराज तापसः कपटे पटुः॥ प्रत्ययो भवतां नो चेत् परीक्षां कुरुत स्वयम् // 375 // तयेत्थं प्रेरितो राजा तत्स्वरूपं विलोकितुम् // तापसं स्वगृहे तं च पारणाय न्यमन्त्रयत् // 376 // महताडंबरेणाथ तापमं तं समागतम् // राज्ञी स्वर्णासनं दत्वा लग्ना भोजयितुं क्रमात् // 377 // पक्वान्नं परिवेष्याथ राज्ञी तस्य पुरःस्थिता // करोति वातप्रक्षेपं व्यजनेन प्रहर्षिता // 37 // राज्ञी मनोरमा दृष्टा तावत्तद्रूपमोहितः // कामाहिदष्ट एवासौ संजातस्तापसोऽपि सन् // 379 // | नामापि स्त्रीति संहादि विकरोत्येव मानसम् // किं पुनदर्शनं तस्या विलासोल्लसितभ्रुवः // 380 // उत्थितस्तापसस्तस्मादथ विस्मृतभोजनः // भोगार्थ प्रार्थयद्राज्ञीं तदा रुष्टा नृपप्रिया // 38 // | ब्रूते दूरं द्रुतं याहि त्वमितस्तापसाधम // पापात्मन् कुत आयातो मुखं दर्शय मा तव // 382 // | राझ्या तिरस्कृतः क्रोधादपि काममदान्वितः // न विरमत्यसौ पापी यतः स्वदुष्टचेष्टितात् // 383 //
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________________ चरित्रम् श्री सदैववत्स तावन्महत्त्वपांडित्ये कुलीनत्वं विवेकता // यावज्ज्वलति नांगेषु हंत पंचेषुपावकः // 38 // 45 सिक्तोप्यंबुधरवातैः प्लावितोऽप्यंबुराशिभिः // न शान्ति यात्यहो चित्ते कामवह्निः प्रदीपितः॥३८॥ | बंबारवः कृतो राझ्या तं श्रुत्वा नृप आगतः॥ चुकोप तापसं दृष्ट्वा तथाविधं मनस्यति // 386 // अपराधसहस्त्रेऽपि योषिविजतपस्विषु // न वधो नांगविच्छेदो देशनिर्वापनं परम् // 387 // इति जानन्नपि राजा तिरस्कृत्य जधान तम् // स मृतो राक्षसो भूत्वा पूर्ववैरं समस्मरत् // 388 // राजानं मारयामास तिरस्कृत्य ततः परम् // परूषैस्तां तिरस्कृत्य स राज्ञी मप्यमारयत् // 389 // A राक्षसेन ततस्तेन रोषेण सकलं पुरम् // कृतं शुन्यमतः कोऽपि वासयति पुनर्नहि // 390 // तेनैव हेतुना राजन् शून्यं पुरं हि वर्तते // कविभि श्वाप्यतः प्रोक्तं कलहे कारणं स्त्रियः // 391 // अकीर्तेः कारणं योषिद् योषिद् वैरस्य कारणम् // संसारकारणं योषिद् योषितः परिवर्जयेत् // 392 // इत्युक्त्वा सा स्थिता तूष्णी लक्ष्मीदेवी ततः परम् // वृत्तांतं सकलं श्रुत्वा कुमारश्चिंतयत्यपि // 393 // ये रामरावणादीनां संग्रामग्रस्तमानवाः // श्रूयंते स्त्रीनिमित्तेन तेषु कामो निबन्धनम् // 394 // | विषयतृष्णया चेत्थं देवैरपि नरैरपि // स्वीकृते बहुसंग्रामाः क्रियतेऽन्यकथात्र का // 395 //
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________________ | हरसिद्धिप्रभावेन राक्षसं परितोष्य च // संप्राप्यानुमतिं तस्य वासयिष्याम्यहं पुरम् // 396 // विचिंत्येति कुमारोऽपि प्रत्यावर्त्य ततः स्थलात् // सावलिंगा स्थिता यत्र प्रत्यागात्तत्र सस्वरम्॥३९७॥ अमन्त्रमक्षरं नास्ति नास्ति मूलमनौषधम् // निर्धना पृथिवी नास्ति भाग्यमेकं हि चेद् भवेत् // 398 // निरीहस्य निधानानि प्रकाशयति मेदिनी // अंगोपांगानि डिंभानां न गोपायति कामिनी // 399 // | अवं चिंतयता तेन कियत्कालादनंतरम् // ताम्रचूडेरिताः शब्दाः श्रुतास्तत्र महात्मना // 400 // KE अरूणः प्रकटीभूतः कासारे कमलान्यपि // अवं जाते प्रभातेऽसौ गतनिद्रो बभूव ह // 1 // सावलिंगा विनिद्रापि जाता पश्चादसौ ततः // विलोकयति नेत्राभ्यां यावच्च सर्वतोदिशम् // 2 // सौवर्णमणिमाणिक्यमौक्तिककोटि संयुतम् // लक्ष्मीलीलायितं दृष्ट्वा प्रीत्योवाच प्रियां प्रति // 3 // बलिपूजां विना सर्व गृहीतुं नोचितं धनम् // समयेऽतो गृहिष्यामि बलिविधानपूर्वकम् // 4 // Ka अत्वरा फलदा ज्ञेया त्वरा कार्यविनाशिनी // त्वरमाणेन मूर्खेण मयूरो वायसीकृतः // 5 // कस्मिन्नपि महाग्रामे दरिद्रेणाथ केनचित् // द्विजेनाराधितो यक्षस्तुष्टस्य याचितं धनम् // 6 // तदा यक्ष उवाचेदं विप्र भाग्ये धनं न ते // द्विजेनोक्तं तथापि त्वं देहि मे तन्महद्धनम् // 7 //
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________________ चरित्रम् 16 श्री सदैववत्स यक्षेणोक्तं च भी विप्र प्रातःकाले ममालये // सर्वदा मयूरो हेम्न एको नृत्यं करिष्यति // 8 // स्वर्णपिच्छं तदा तस्य पुच्छतोऽधः पतिष्यति // एकैकं सर्वदा ग्राह्यमित्युक्तः स करोति तत् // 9 // कालेन कियतैवं स धनाढ्यः संबभूव ह // ततस्तेन कलापाना मेकत्र भारकः कृतः // 10 // अतिलोभाभिभूतेन कालक्षेपासहिष्णुना // धृतस्तेन मयूरोऽपि यक्षः कुछोऽभवत्ततः // 11 // अथ रुष्टेन यक्षेण मयूरो वायसः कृतः // अनूवन् काकपिच्छानि द्विजेन मेलितान्यपि // 12 // तेनातिलोभिना चैवं धनं नाप्तं मनागपि // अतीवाकुलितश्चिते स जातो खेदमावहन् // 13 // ततः सदयवत्सोऽपि मनस्येवं विचिंत्य सः // तद्धनग्रहणायाने चलितोऽनुत्सुकीभवन् // 14 // गन्तव्य मुक्तंच शतं पुराणां ज्ञेयानि विज्ञानशतानि चैव सेव्यं शतं चाथ नराधिपानां स्थानांतरं भोग्य मतः प्रयुक्तम् // 415 // एवं कृत्वा गतो मार्ग कौतुकानि विलोकयन् // ततः पञ्चदिनप्रांते पुरमेकमवाप्तवान् // 16 // | सुंदरीसहितं तत्र दृष्ट्वा तं ग्रामनायकः // कोऽपि भट्टोऽवदद्वाचं भो कुमार क्व यास्यसि // 17 // गमिष्यामि प्रतिष्ठानपुरेऽह मित्युवाच सः // भट्टेनोक्तं हि संध्यायां गमनमुचितं नहि // 18 //
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________________ आचारेण तमाकृत्या कुलीनं गुणशालिनम् // तत्र वासीय भट्टोऽसावाग्रह मकरोत्तदा // 19 // - विचारितं कुमारेण नवेत् क्वापि स्थितिः पुरः // अतो भट्टाग्रहान्नूनं निवासो मे शुभंकरः // 20 // विचार्यैवं स्थितस्तत्र भट्टेन स्थापितो गृहे // स्नान भोजन ताम्बूलैः सद्भक्या मानितः स च // 21 // रात्रौ मनोज्ञशय्यायां शायितोऽतिप्रशंसितः / वार्ताभि विविधाभिश्च तोषितो पुण्यवान् यतः॥२२॥ श्रान्तस्य मानं तृषितस्य पानं भक्तंकुधार्तस्य भयस्य रक्षा // एतानि यस्योपनयंति काले तं लक्ष णज्ञाः प्रवदन्ति धन्यम् // 23 // | दद्यात् सौम्यां दृशं वाच मभ्युत्थानमथासनम् // शत्तया भोजनताम्बूले शत्रावपि गृहागते // 24 // अस्य भट्टस्य सौजन्यं प्रिये पश्येति सोऽवदत्॥ साह स्वामिन् भवन्त्येवंविधा नूनं सुसज्जनाः॥४२५॥ सजनः सर्वदा स्थानं गुणोघानां भवेत्खलु // पाथसामिव पाथोधी रत्नानामिव रोहणः // 26 // Ka पुनः प्राह कुमारस्तां सावलिंगां हितं वचः // पञ्चक्रोशैः प्रतिष्ठानपुर दूरमितः परम् // 27 // पादचारेण निःश्रीके नयनं ते पितुर्गेहे // घातकं मे प्रतिष्ठायाः सुवस्त्राभरणं विना // 28 // तेन त्वां स्थापयित्वात्र प्रतिष्ठानपुरं प्रति // त्वत्कृते प्रथमं मत्वा वाहनाद्यानयाम्यहम् // 29 //
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________________ चरित्रम् श्रो सदैववत्स 47 तत्र मे केवलं पञ्च लगिष्यन्ति दिनानि हि // तावदत्र सुखं तिष्ठ तच्छ्रुत्वा सावदत् ततः // 30 // हेनाथ हृदयं ते किमस्ति वज्रमयं खलु // मामत्रैकाकिनी मुक्तवा वाञ्छसि गमनं पुरे // 31 // त्वद्विरहे न शक्नोमि जीवितुं क्षणमप्यहम् // तर्हि पञ्च दिनानां का वार्ता स्वामिन्नितः परम् // 32 // | स्वामिन् पतिव्रता नारी सेवते देववत्पतिम् // सा नूनं तत्कृते स्वस्य प्राणांस्त्यजति सत्वरम् // 33 // | परंतु पुरुषो दुःखं वज्रकठिनमानसः // तस्याः स्वमनसि प्रायो नानयति मनागपि // 34 // | अन्यत्र स्वेच्छया चैव रमयत्यपि स्वं मनः // एवंविधां प्रियावाचं श्रुत्वा तेनेरितं वचः // 35 // | प्रिये नरब्रुवस्यैतत्केवलं लक्षणं स्मृतम् // न दृष्टं न श्रुतं क्वापि ह्युत्तमस्य नरस्य वै // 36 // स्वाधीनेऽपि कलत्रे नचिः परदारलंपटो भवति // परिपूर्णेऽपितडागे काकः कुंभोदकं पिबति // 37 // उत्तमस्तुनरः स्त्रीतो योजनानां शतान्यपि // दुरं गतः प्रियां स्वस्य विस्मरति न चित्ततः // 38 // // निज महिला मुहकमलं पुत्तमुहं धूलि धूसरच्छायम् // सामिमुहं सुपसन्नं जोयणसहवि न विसरइ॥३९॥ | नरो गतो विदेशेऽपि यत्र निजप्रिया स्थिता // निजशक्त्या पुनस्तत्र पश्चादागच्छति द्रुतम् // 40 //
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________________ अर्जितं स्वर्णमौकिक्तमाणिक्यादि शुभं धनम् // स्वप्रियायाः करे सर्व मर्पयति प्रहर्षतः // 41 // प्रयाति न हि विश्वासं मातृ भातृ सुतादिषु // अर्पणे किंतु तैः सार्ध महाक्लेशं करोति च // 42 // Ka प्रिये तव वियोगो मां बाधते किं करोम्यहम् // पावे समागमिष्यामि नूनं ते पंचमे दिने // 43 // KE जड वचसि यच्च तुमं कोवारड जमनाह जंतस्स ॥तुह्ममणे महमरणं सिहियं होही कहं तस्य // 44 // ke आश्वासितापि सा वक्ति वाक्य मेवं महासती // आश्वासयति सैवं तां शपथानां शतैरपि // 45 // तदा सोवाच हे नाथ द्वियामं पंचमे दिने // मार्ग विलोकयिष्यामि यावत्तेऽहं समुत्सुका॥ 46 // भवन्तो नागमिष्यन्ति ततः परं निरुत्सुका // स्वदेहं पावके धृत्वा ज्वालयिष्यामि सत्वरम् // 47 // | अथैवं तं वचोबद्धं विधायोवाच सा पुनः // स्वामिंस्तत्र पुरेऽनेके द्यूतकारा वसन्ति वै // 48 // धूर्ताश्चौरा जना ग्रन्थिछोटका वंचकाः खलाः // कायस्थादिमहादुष्टा वसन्ति कपटान्विताः // 49 // निवासोऽस्ति चतुःषष्ठी योगिनीनां पुनः पुरम् // क्रीडास्थानं द्विपञ्चाशद्वीराणां लोकविश्रुतम् // 50 // K व्यवहारं स्वसंज्ञाभिस्तत्र कुर्वन्ति मानवाः // बहुबुद्धिसनाथोऽपि जनस्तत्र विमुह्यति // 51 // कायस्थेनोदरस्थेन मातुर्मासं न भक्षितम् // मा दयां तत्र जानीहि तत्र हेतुरदन्तता // 52 //
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________________ चरित्रम् श्री सदैववत्स लेखनीकृतकर्णस्य कायस्थस्य न विश्वसेत् // यमोऽपि वंचितोऽनेन गकारांतररेखया // 53 // 48 विश्वासो नैव कस्यापि कर्तव्यो हि महीतले // तथा चोक्तं विवेकादिविलासे कविना खलु // 54 // विश्वासो नैव कस्यापि कार्य एषां विशेषतः॥ पाखण्डिनां तथा क्रूरसत्वप्रत्यंतवासिनाम् // 55 // धूर्तानां प्रागविरुद्धानां बालानां योषितां तथा // स्वर्णकार जलाग्नीनां नखिनां प्रभुणामपि // 56 // नीचानामलसानां च पराक्रमवतां तथा // कृतघ्नानां च चौराणां नास्तिकानां च जातुचित् 57 // // शिक्षा मुक्त्वा स्वभार्यायां स्थितायां सदयोऽवदत् // नूनं मेवंविधे पुरे गन्तु मिच्छामि बुद्धितः // 18 // Ka तत्रैव मे महान् लाभोऽपि भविष्यति हे प्रिये // कुमारेणाथ तं भट्ट माकार्य कथितं वचः // 59 // भोभट्ट ते गृहे मुक्त्वा मम भार्या मिमा महम् // प्रतिष्ठानपुरे गंतु मिच्छामि दिनपंचकम् // 6 // अतोऽवश्यं त्वया कार्य मे प्रियायाः सुरक्षणम् // भट्टेन पान्थ मुञ्चोक्तं निश्चिताय मगृहे // 6 // सावलिंगा तदोवाच स्वामिन्नेकाकिनी स्वयम् // अत्र भट्टनिवासेऽहं स्थास्यामि तु कथं यतः // 6 // पुस्तिका खटिका नारी परहस्तगता सती // नष्टा ज्ञेयाथवा पुंसा धृष्टा भुक्ता च लभ्यते // 3 // सदयेन तदा तस्य भट्टस्य दृष्टिगोचरम् // स्वप्रियां प्रत्युक्तं सच्छृणु हितकरं वचः // 64 // 48
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________________ क्षत्रियराजपुत्राणां भट्टा बन्धुसमाः स्मृताः // लोकोक्तिरस्ति सर्वत्र ह्यपरं च वदाम्यहम् // 65 // संग्रामे राजपुत्राणां मृतानां दाहको यदि // तत्संबन्धी न कोपि स्यात् तदा भट्टा दहन्ति वै // 66 // | संबंधिनो हि भट्टानां यतस्ते पतिता नृपाः // किंचैते लोकसंसिद्धप्रौढिभावकराः स्मृताः // 7 // शूरसभासु वीराणां संति चर्याप्रकाशकाः // यशःस्फातिकरा स्तेषां भवंति तेन हे प्रिये // 8 // अहं त्वामात्मनो बंधुगृहे मुक्तवाऽस्मि संत्रजन् // अतस्त्वया मनोचिंता कार्या नहि मनागपि // 69 // | इत्यायुक्त्या समाश्वास्य तां मुक्त्वा तत्र बुद्धिमान् // चलितः सदयो हर्षात्प्रतिष्ठानपुरं प्रति // 70 // क्रमेणाथ पुरासन्नतटाकस्य तटे गतः // जलपानाय तत्रासौ ददर्श जलहारिणीः // 71 // Kजलेन हस्तपादादि क्षालयन्तं विलोक्य तम् // जलं पात्रषु गृह्णन्त्य उचतुस्ताः परस्परम् // 72 // एकयोक्तमयं पान्थो भोसख्यः सुमनोहरः॥ हस्तादिक्षालनं कुर्वन् पिबतीदं जलं कथम् // 73 // | परयोक्तं तदा मुग्धे त्वं स्वयं बुद्धियोगतः॥ अत्रत्यापि न जानासि ह्येतावन्मात्रकं कथम् // 74 // स्वपुरादेष आमच्छन् स्वस्त्रियं विरहातुराम् // वारयामास तस्याश्च कज्जलेन समन्वितम् // 75 //
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________________ श्री सदेववत्स चरित्रम् Ka बुंछितवान् स्वहस्ताभ्या मश्रुपातं यदा तदा // स्नेहतो धौतवान्नायं स्वहस्तौ कज्जलाविलौ॥७६ // तेनानुमीयते चास्य पान्थस्य स्वप्रियां प्रति॥ वर्तते सुमहान् स्नेहो धन्या यत्पतिरीदृशः / / 77 // | वार्तालाप मथैतासां श्रुत्वाऽतीव चमत्कृतः॥ स्वहृदि चिंतयत्येवं कुमारो हर्षमाश्रितः // 78 // | अहो एतत्पूरस्थाना मंगनानां विशेषतः // चातुर्य वर्तते कीदगिति कृत्वा चचाल ह // 79 // पुरं प्रविशतोऽस्यैकष्टुंटुकश्छिन्ननासिकः // सन्मुखोऽभूत् कुमारस्तं दृष्ट्वा चिंतातुरोऽभवत् // 8 // प्रथमे कवले जातं मक्षिकापातवन्मम // अत्रापशकुनं मे भूत् प्रवेशे प्रथमे पुरे // 1 // वलित्वाऽसौ ततः पश्चात् निकटस्थानवर्तिनि // गत्वा च समुपाविष्टो हेरम्बदेवमंदिरे // 8 // Rs तावता तेन टुंटेन नरेण चिंतितं मम धिक् कुरूपं हि लोकाना मपशकुनकारणम् // 83 // अथाहमस्य पांथस्य कथंचिच्छकुनै शुभम् // कुवेऽत्रेति विचिंत्यासौ पुष्पपत्रफलादिभिः // 4 // जगाम सम्मुखं तस्य पात्रं भृत्वा सुवस्तुभिः // तत्पात्रं तत्पुरो मुक्त्वा सोवाच मधुरं वचः // 5 // सन् शुभशकुनायैतत् समानीतं मया मुदा // अतस्त्वं शकुनं नत्वा हर्षादिदं गृहाण च // 86 // विचारितं कुमारेण ह्येषकोऽपि सुबुद्धिमान् // नूनमस्ति सदाचारी महाकुलसमुद्भवः // 87 //
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________________ तेनाहं दृष्टपूर्वो न तथापि हितकाम्यया // मांगल्ये मे महाभक्तिं विदधाति ह्ययं पुमान् // 88 // पद्माकरं दिनकरो विकचीकरोति चन्द्रो विकाशयति कैरवचक्रवालम्॥ नान्यर्थितो जलधरोऽपि जलं ददाति संतः स्वयं परहितेषु कृताभियोगाः // 89 // - लुटकोऽपि स्वचित्तेऽथ चिंतयति महामतिः // नृपादिकुलसंभूतो यद्यष संभविष्यति // 10 // | नृपार्हपुष्पपत्रेषु क्षेप्स्यति स्वकरं तदा // अन्यथा खाद्यवस्तुषु लोलुपो हि भविष्यति // 11 // | तन्मध्यात् केवलं पुष्पं ताम्बूलेन समन्वितम् // गृहीतं च कुमारेण स्वशुभशकुनाय वै // 92 // सजना ये भुवि प्रोक्ताः कस्यापि ते जनस्य च // कदाप्यभ्यर्थनां नैव कुवैति विफलां यतः // 13 // निःशेषशकुनं नत्वा कुमारेण समर्पितम् // निश्चितं लुटकेनापि ह्ययं राजकुलोद्भवः // 9 // अथ पृष्टं कुमारेण कोऽसि त्वं भो महाजन // पवित्रीकुरु कर्णो मे वृत्तांतकथनेन ते // 15 // सुरसुंदरनामास्मि सिंहलद्वीपभूपतेः // सुतोऽहं भो महाराज तदैवं टुंटको वदत् // 16 // योगिनीनामिदं स्थानं वीरादीनां तथैव च // आस्ति पुरं महाराज कौतुकैः बहुनिर्युतम् // 97 //
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________________ चरित्रम् श्री सदैववत्सSE इत्यादि लौकिकं श्रुत्वा विलोकनसमुत्सुकः // स्वर्णकोटियुतोऽत्रागां साद्धं पंचशतै गजैः // 98 // इतकारैः परं कृत्वा कपटं सर्वमद्धनम् // गृहीतं हस्तनासादि प्रांते शस्त्राणि चापि मे // 99 // नगरेऽस्मिन् महाधुर्तेः कपटनाटकान्वितैः // विदेशिनो जनाः सर्वे मुष्यंते क्षणमात्रतः // 500 // महाधूर्तस्य कस्यापि ह्यागंतुकजनस्य च // कापि शक्तिर्महाबुद्धे चलति नहि तत्पुरः // 1 // Ka तृणच्छन्ने महाकू मधुलिप्तै महासिभिः // कैतवैश्च मुखे सौम्यै दुर्दशां को न नीयते // 2 // इत्येवं भो कुमारेन्द्र राजपुत्रोऽपि बुद्धिमान् // अत्रागत्य महादुःखे पतितोऽस्मिहि पश्य माम् // 3 // यूतेन धन मिच्छंति मान मिच्छंति सेवया // भिक्षया भोग मिच्छति ते दैवेन विडबिताः // 4 // अथाहं किं च भो भद्र व्यंगितोऽतिविडंबितः // पश्चान्मम पुरे गंतुं नोत्सहे लज्जयान्वितः॥ 5 // श्रुत्वावदत् कुमारोपि द्यूतकारैः प्रयोजनम् // अस्ति तद् ये न जानन्ति ते नरा कुशला नहि // 6 // Ke अज्ञाताततत्वस्य भवत्येव पराभवः // परं तद्द्यूतमेवास्ति सर्वाभिष्टप्रदं मम // 7 // Kज्ञानिनोऽपि नरा नित्यं वर्णयंति पुन पुनः // अस्त्यात्मसुखं सर्व द्यूतरसोपमं भुवि // 8 // - यद् दाये यूतकारस्य यत् प्रियायां वियोगिनः // यद्राधावेधिनो लक्ष्ये तद्ध्यानं मे त्वयि प्रभो // 9 //
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________________ | अज्ञानं खलु कष्टं क्रोधादिन्योऽपि सर्वपापेभ्यः॥अर्थ हितमहितं वा न वेति येनाहतो लोकः // 10 // KE कुमारोक्तं समाकर्ण्य पूर्वोक्तं तेन चिंतितम् // पुनरपि कुमाराय तेन प्रोक्तं हितं वचः // 11 // Kजानीहि भो महाबुद्धे वच्म्यहं ते हितं वचः॥ यूतासक्तो हि मा भूयात् दृष्ट्वा मां कोऽपि सज्जनः // 12 // यो युतधातुवादादि संवेधै धन मिलति // स मषीकूर्चकै धाम धवलीकर्तु मिलति // 13 // सदयः प्राह भो मित्र सर्व सत्यं भवद्वचः // परं मम द्यूतेनैव बहुलाभो भविष्यति // 14 // Ka टुटः प्राह कुमारेन्द्र कथं त्वं खेलयिष्यसि // तव पाश्वे विना खड्गं किमपि दृश्यते न हि // 15 // कुमारः प्राह भोमित्र कौतुकं त्वं विलोकयन् // तत्र तिष्ठेः शुभं सर्व क्षणमात्रात् भविष्यति // 16 // तयो परस्परं प्रीति र्जातातीव सुभाषणात् // ततः परं समुत्थाय द्वावपि जग्मतुः पुरम् // 17 // Ka एकत्र सूर्यप्रासादे लोककलकलारवम् // कुमारः पृच्छति श्रुत्वा भोमित्र श्रुयतेऽत्र किम् // 18 // सोऽवदन् मित्र ते चित्ते यद्यस्ति कौतुकं महत् // त्वं तदैतच्च वृत्तांतं समाकर्णय सत्वरम् // 19 // देताकश्रेष्ठिनः पुत्रः सोमदंताभिधः पुरे // वसति कामसेना च वेश्यापि सुमनोहरा // 20 // | अतिरूपवती वेश्या राज्ञा चातीव मानिता // वीजयति नृपं गत्वा चामराणि सभासु सा // 21 //
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________________ चरित्रम् श्री सदैववत्स च तस्या गृहे नरः कोऽपि समागबति सा तदा // गृह्णाति षोडशाधिकं द्रम्मपंचशतात्मकम् // 22 // अथैकदा तया स्वप्ने वेश्यया स्वगृहागतः // सोमदंतो यदा दृष्टो रेमे तेन समं च सा // 23 // ततः सा मेलयित्वा स्वं समूहं प्रातरेव तत् // स्वरूपं कथयामास ताभ्यस्ता अप्युचुस्तदा // 24 // सोमदंतगृहे गत्वा शीघ्रं तस्य समपितः // नियमितं धनं स्वीयं गृहाण त्वं समाश्रया // 25 // तच्छ्रुत्वाथ तया तस्य गृहे सद्व्यवहारिणः // मार्गयितुं च तद् द्रव्यं निजाका प्रेषिता स्वयम्॥२६॥ तत्र गत्वा हि तद्रव्यं मार्गितं नार्पितं परम् // तदा समुपविष्टा सा लंघयितुं तदालये // 27 // KE अर्धद्रव्यप्रदानेन जनै रुक्तं प्रतोषय // मुधैवाहं कथं द्रव्यं यच्छामि धनिको वदत् // 28 // पश्यामि च कथं कूटं कृत्वेषा पार्श्वतो मम // द्रव्यं गृह्णाति तेनोक्तं कोलाहलप्रयोजनम् // 29 // अद्यैवं तद्विवादस्य दिनं जातं तृतीयकम् // द्वयोरेकोऽपि लोकोक्तं वचो नांगीकरोति वै // 30 // E तच्छ्रुत्वा कौतुकोत्साही कुमारो वक्ति तं प्रति // भोमित्र गम्यते तत्र कौतुकं च विलोक्यते // 31 // | इत्युत्तवासौ गतस्तत्र समित्रस्तं स्थिता जनाः // दृष्ट्वा कथयितुं लग्ना निर्णयोऽयं करिष्यति // 32 //
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________________ एषकोऽपि नवीनोऽस्ति तत्तत्त्वं कथयिष्यति // करिष्यतीति किं तस्यै पप्रच्छस्ते जनास्तदा // 33 // सापि तं सदयं दृष्ट्वा कुमारं नवयौवनम् // नूनमेष मदोन्मत्तो वेश्यापक्षं करिष्यति॥ 34 // इति मत्वाऽवदद् वेश्या भो लोकाः श्रुयतां वचः // नवीनपुरुषस्यैव प्रमाणं वचनं मम // 35 // इत्युक्त्वा सा स्वचित्तेऽपि चिंतयति पुनः पुनः // एवंविधा नरा वेश्याऽनुरक्ता भवंति हि // 36 // | स्थविरो यदि कोऽपि स्याद् वैराग्यान्मदपक्षगः // ममैष न्यायकतॆव लाभदोऽतो भविष्यति // 37 // ततः सर्वैरपि लोके स्तदेवांगी कृतंवचः // तत्रोपावेशयित्त्वा तं विवादः कथितश्चतैः // 38 // सर्वैरपि मिलित्वोक्तं भोकुमार अथास्य त्वम् // वृत्तान्तस्य कुरु न्याय मित्युक्ते सदयोऽवदत् // 39 // भोलोका यदि युष्माभिर्मे न्यायकरणं मतम् // मद्धचो लंघनीयं न तैरपि स्वीकृतं तदा // 40 // कुमारः प्रथमं प्राह वेश्यायै त्वं तृतीयकम् // द्रव्याधं वा गृहीत्वैतद् विवादशमनं कुरु // 41 // तयोक्तं न गृहीष्यामि न्यूना मेकां कपर्दिकाम् // गृहीत्वा मद्धनं सर्व स्थानाद्यास्यामि नान्यथा॥४२॥ ततः प्राह कुमारोऽपि सोमदंतं प्रति क्रमात् // एषा वै राजमान्यत्वान्मन्यते न मयेरितम् // 43 // अतोऽवश्यं त्वया वेश्या नापमान्या नृपाश्रया // अन्यथैवंविधे कार्ये महापत्तिर्भविष्यति // 44 //
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________________ श्री सदैववत्स चरित्रम् यो स पूजयते गर्वाबुसमाधममध्यमान् // भूपमान्यान् स प्राप्नोति ह्यापदं दंतिलो यथा // 45 // मंत्री दंतिलनामासीत् वसंतनगरे वसन् लोकनृपहितं कुर्वस्तोषयति सदा जनान् // 46 // अथैकदा सेन पुत्रस्य विवाहे बहु सत्कृताः // राजलोकाश्च पौराश्च स्वन्नवस्त्रादिभिर्भृशम् // 47 // तदा तस्य नृपस्यैको गोरंभारव्यो महामतिः // गृहसन्मार्जको भृत्योऽनुचितस्थान माश्रितः // 48 // मंत्रिनिदेशतः केन टेकेन किंकरेण सः // गले धृत्वा ततः स्थानाद् बहिनिष्कासितस्तदा // 49 // तदादितः स गोरंभो स्वयं दूनो मनस्यति // निजापमानतो निद्रां सुखेन लभते न हि // 50 // मनसि चिंतयत्येव महं केनाप्युपायतः॥ पातयामि महादुष्ट मेनं मन्त्रिणमापदि // 51 // - अर्थेकदा स गोरंभो ह्यल्पनिद्राप्तभूतृतः // संनिधौ मार्जयन् प्राह दंतिलोऽस्ति महाखलः // 52 // गुप्तं राजगृहे गत्वा ह्यालिंगति नृपप्रियाम् // तच्छृत्वा सत्वरं प्राह गोरंभं प्रति भूपतिः // 53 // सत्यं वदसि गोरंभ दंतिलेन प्रिया मम // आलिंगिता कदा कुत्र त्वया दृष्टा मनस्विनी // 54 // गोरंभेण तदा प्रोक्तं जागरणवशादिदम् // राजन्नुक्तं न जाने किं निद्रालुना मयाधुना // 55 //
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________________ स्वमनसि तदा सेयं चिंतयामास भूपतिः // अबाधितप्रचारोऽस्ति नूनं मंत्री ममालये // 56 // दंतिनालिंगिता दृष्टा कदाचिदपि मत्प्रिया // अनेन हेतुना तेन कथितमस्ति सांप्रतम् // 57 // अप्येतदविषये स्त्रीणां कामविह्यलचेतसाम् // कः संदेहो विचिंत्यैवं राजातिखेदमाप्तवान् // 58 // राजा तदादितस्तस्मिन् प्रसादविमुखोऽजनि // निषिद्धः स्वगृहे मन्त्रिप्रवेशोऽपि हि भूभृता // 59 // तदा स्वविमुखं दृष्ट्वा दंतिलोऽपि तथा नृपम् // हेतुना केन मत्तोऽयं पराङ्मुखो बभूव ह // 60 // INE नराधिपविरुद्धं किमपि नाचरितं मया // तथापि किमिदं जात मिति चिंतातुरोऽभवत् // 61 // अथैकदा राजकार्यार्थं समायान्तं नृपान्तिके // दंतिलं द्वारपालैस्तं रुद्धं दृष्ट्वा विहस्य सः // 6 // KE गोरंभः प्राह सर्वेषां निग्रहानुग्रहक्षमः // द्वारपाला अयं मन्त्री स्वयमेवास्ति दंतिलः // 6 // निषिद्धेऽस्मिन् सति स्थानात् कदाचिद् भवतामपि॥स्वाधिकाराद् बहिर्मद्वन् निष्काशनं भविष्यति 64 E अकुलीनोऽपि मूर्योऽपि भूपालं यो निषेवते // अपि सन्मानहीनोऽपि स हि सर्वत्र पूज्यते // 65 // KE इत्येवं मानसे कृत्वा विलक्ष्यास्यः स दंतिलः // वस्त्रयुग्मेन गोरंभं सत्कृत्याह शुभं वचः // 66 // भोभद्र त्वं तदा रोषान्नासीः निस्सारितो मया // अमात्यादिस्थले किंतु निविष्टत्वान्मया कृतम् // 6 //
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________________ श्री सदेववत्स 53 तदपि क्षम्यतां भ्रात रहं भ्रातास्मि तेऽनघ // गोरंभोऽपि प्रसन्नः सन् प्राह तं तद्धितं वचः // 6 // मंत्रिवर पुना राजप्रसादाय तवोपरि // क्रियते कार्यते चाथ पश्य मे बुद्धिवैभवम् // 69 // स्तोकैरेव दिनै राजप्रसन्नता यथा भवेत् // तथाहं कारयिष्यामि श्रुत्वा मंत्री गृहं गतः // 7 // अथैकदा स गोरंभः पुनर्निद्राजुषोऽन्तिके // राज्ञोऽपवरके कुर्वन् मार्जनं सन्निदं जगौ // 71 // KE पुरीषोत्सर्गकालेऽपि भुक्तेऽयं चिर्भटान्नृपः // अविवेको महानस्ति खल्वस्मन्नृपते र्यतः // 72 // तच्छ्रुत्वोत्थाय गोरंभं सक्रोधं प्राह भूपतिः॥ रे मूर्ख किं त्वया मौढयाद् अथिलवद् विजल्पितम् // 73 // - त्वामेव सेवकं ज्ञात्वा केवलं चिरकालिनम् // नाहं व्यापादयाम्यद्य वद दृष्टः कदा त्वया // 4 // सोऽपि पूर्ववदेवाह तदा राज्ञा विचारितम् // नूनं मनोविकारोऽस्य जातोऽस्तीति विभाव्यते // 75 // यथा तेनाधुना मिथ्या मामुद्दिश्यैव जल्पितम् // पूर्व मपि तथैव स्यान् मन्त्रिणि जल्पितं ततः॥७६॥ राज्ञा तदादितो मन्त्री पूर्ववदेव मानितः // ब्रवीम्यहमतो वेश्या पूजनीया नृपाश्रया // 77 // अतो हे सोमदंताख्य वेश्योक्तं द्रव्यमानय // सदयोक्तं वचः श्रुत्वा वेश्या चित्तेऽतिहर्षिता // 7 //
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________________ न्यायं कुर्वस्त्वमेवं भो सज्जन मद्धनं मुधा // निर्गमयसि कस्मात्त्वं सोमदंतोऽब्रवीत्तदा // 7 // कुमारः प्राह भो श्रेष्टिन् यदि त्वं वचनं मम // नोवंधयिष्यसि न्यायं करिष्यामि तदा तव // 8 // एव मुक्त्वा कुमारेण तावन्मितं धनं ततः // आनायितं बलात्कारादादर्शन समन्वितम् // 81 // परं कोऽपि न जानाति यदयं बुद्धितः कथम् // न्यायं करिष्यति स्वच्छमिति जातं स्वभावतः // 8 // REआदर्शाग्रे धनं मुक्त्वा ततः प्रोक्तं मनस्विना // वेश्ये धनं गृहाणेद मादर्शप्रतिबिम्बितम् // 3 // समीपस्थं धनं किन्तु हस्तेनापि मनाक् त्वया // न स्पृष्टव्यमिति श्रुत्वा वेश्या प्राह धनार्थिनी // 4 // कथमेवंविधो न्यायः सत्पुरुष त्वया कृतः॥ उक्तं तदा कुमारेण मदीयं वचनं श्रृणु // 85 // व्यवहारिसुतोऽयं ते किं स्वप्नेनागतो गृहे // प्रत्यक्षेणाथ वा सत्यं वद वेश्ये सविस्तरम् // 86 // प्रत्यक्षेणागतोऽयं चेत् प्रत्यक्षस्थमिदं धनम् // यदि स्वप्नसमायातो गृहाण प्रतिबिम्बितम् // 8 // भवति सदृशं कार्य यत् स्वप्नप्रतिबिम्बयोः // अनुभवं स्वयं कृत्वा जानाति विमलो जनः // 8 // श्रुत्वा चैवंविधं न्यायं सभ्याः सर्वे चमत्कृताः॥ साध साध वदंतोऽस्य शशंसबद्धिकौशलम् ॥रणा वेश्यां विगोपयंतस्ते सर्वे लोका उचुस्तदा अस्माभिः कथितं वेश्ये गृहाण त्वं धनार्धकम् // 10 //
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________________ चरित्रम् 54 श्री सदैववत्स तदा न मानितं पूर्ण धनमद्य गृहाण तत् // मा त्वमप्यथ गृह्णीया नूनमेककपर्दकम् // 11 // मर्मविद्धवचोजिस्ता मित्येवं जहसुर्जनाः // कुमारस्योपकारं च श्रेष्ठयपि बह्वमन्यत // 12 // ततो धनी धनं सर्वं गृहीत्वा स्वालये गतः // नेत्रे प्रमार्जयंती स्वे साकापि स्वगृहे गता // 93 // कामसेनाथ तां दृष्टवा चिंतयति स्वमानसे // अनया दृश्यते नून मानितमेव तद्धनम् // 14 // आगतायै तदभ्याशे तस्यै पृष्टं तया ततः // मातराप्तं धनं सर्व मभुक्त्वा तदिनत्रयम् // 15 // तया प्रोक्तं सुतेऽहंतु समक्षं पश्यतां नृणाम् // वैदेशिकेन केनापि बाढं तत्र विगोपिता // 9 // | पृच्छति कामसेना तां मातः कथं विगोपिता // तदाक्कयापि सर्वोपि न्यायस्तस्यै निवेदितः // 97 // कामसेनाथ चित्ते स्वे चिंतयति पुनः पुनः॥ पुरुषं बुद्धिमन्तं तं पश्याम्यह मपि स्वयम् // 98 // KE कामसेना विचार्येति नाटकस्य मिषेण सा // गताथ सूर्यप्रासादे प्रारब्धं नाटकं तया // 99 // तत्र नाटयं सृजंती सा कुमारं तं विलोक्य तु // चिते चिंतयति स्वीये बहुहर्षवती सती // 600 // // आस्यं पूर्णशशी विलोचनयुगं विस्मेरमिंदीवरम् // कण्ठः कंबु सुरश्च कांचनशीला स्कन्धी च पूर्णों घटौ //
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________________ बाह शौर्यगजेन्द्रयन्त्रणमहालानो करौ चारुणांभोजे वर्म सुधांजनं नयनयोः केनेष सृष्टो युवा // 601 // ध्यायंतीति कुमारं तं पश्यति सा यथा तथा // कामज्वरोऽऽधिकं चास्या अपीडयत्तथा तथा // 602 // K कामज्वराकुला सैवं पपात मूञ्छिता सती // द्रुतं भूमौ विनिश्चेष्टा क्रमेण स्त्री बभूव च // 603 // तत्र स्थितैर्जनस्तस्या उत्थापनाय सत्वरम् // बहुपायाः कृताः सर्वे तेऽपि विकलतां गताः॥६०४॥ मृतेव नहि जागर्ति नचोत्तिष्ठति सा परम् / / तदोत्पाटय जनैः सर्वैः समानीता च तद्गृहे // 605 // Ka आकारितो द्रुतं वैद्यो ह्यकया भयभीतया // अतिवृद्धो महाबुद्धि श्चतुरो वैद्यकर्मणि // 606 // जरा चालंकरोतीह राजानं भिषजं गुरुम् // विडंबयति पण्यस्त्रीमलगायकसेवकान् // 6 // 7 // अथ स कामसेनाया दृष्ट्वा देहं जगाद हे // मातरस्याः शरीरं तु नीरोगमस्ति सांप्रतम् / / 608 // k कामज्वरं शरीरेऽस्या विलोक्यामि केवलम् // इत्युक्त्वा वैद्यराजः स पप्रच्छ मातरं प्रति // 609 // - हेमातरनया कोऽपि रूपसौभाग्यवान्नरः॥ दृष्टः किमधुना सा तमुवाचोमिति सूत्तरम् // 610 // वैद्येनोक्तमियं तर्हि नूनं कामज्वराकुला // दृष्ट्वा तं पुरुषं जाता ह्यन्यो रोगो न विद्यते // 611 // अतो मातः समं तेन कारयास्याः समागमम् // यथा सा पूर्ववदेहा द्रुतं सजीभविष्यति // 612 //
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________________ चरित्रम् 55 अक्काप्युवाच भोवैद्य सर्व सत्यं भवद्वचः॥ घिसृष्टोऽथ तया वैद्यो जगाम स्वालयं प्रति // 613 // श्री सदैववत्स ततोऽक्कया द्रुतं दासी कुमारानयने वरा // प्रेषिता सूर्यप्रासादे सा गत्वोवाच तं प्रति // 614 // त्वां सज्जनाव्हयत्यक्का स्वामिनी स्वालये मम // कुमारश्च तदा चित्ते चिंतयति स्वबुद्धितः // 615 // Ka अन्यत्रापि मयाकापि यावत् पञ्चदिनावधि // स्थातव्यमेव सन्मानादाव्हयति तु मामियम् // 616 // तस्या एव गृहे गत्वा ततस्तिष्ठामि तद्वरम् // इति विचार्य तन्मित्रं कुमारः सोऽब्रवीद्वचः // 617 // अथाहं कामसेनाया गृहे यास्यामि साम्प्रतम् // तच्छूवा सत्वरं प्राह कुमारं सुरसुंदरः // 618 // मित्र ते गमनं तत्र श्रेयस्करं न विद्यते // धनालाभादियं दुष्टा दुःखे त्वां पातयिष्यति // 619 // KE हसित्वोक्तं कुमारेण शृणु मित्र ममाङ्गजम् // सा स्पृष्टुमपि वालाग्रं न शक्नोति परं च किम् // 620 // श्रुत्वा तद्वचनं प्राह कुमारं सुरसुंदरः॥ विश्वासो नैव वेश्यानां करणीयः कदापि वै // 621 // जएण जुवर्णणय-घेसा संगणद्युत्तमित्तेण कोदीसइ नरोजए-अवसाणे जो नहुविगुत्तो // // // आंखे रमइ मनहसे जणजाणे एरत्त पण ते मारे पुरुषने जं कठं करवत्त // // कुमारः प्राह भो मित्र चैतासां चरितं त्वहम् // सर्व वेनि त्वया चित्ते भेतव्यं न मनागपि // 22 //
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________________ इत्युक्त्वा तेन मित्रेण समं वेश्यागृहे ययौ // कामसेनाऽपि तं दृष्ट्वा पुनश्चैतन्यमागता // 623 // सातिहृष्टा सती तस्या मानमर्दनभोजनैः // सत्कारं सत्वरं सर्व चकार स्नेहपूर्वकम् // 624 // | गतकामज्वरा वेश्या चलितुं तं समुत्सुकम् // द्वितीये दिवसे प्राह कुमारं प्रति भावतः // 25 // कारणं किं समुद्दिश्य हे प्राणप्रिय यास्यसि // उक्तं तेनाह मन्यत्र गमिष्याम्यधुना प्रिये // 26 // तच्छ्रुत्वोक्तं तया स्वामिन् मदीयं शोभनं गृहम्-यत्त्वदीयं तदेवास्ति तेनात्र त्वं सुखं वस // 27 // कुमारोऽपि तदा तस्या दृष्ट्वा तीव्राग्रहं परं // दिनानि तत्र चत्वारि तस्थौ प्रेमपरिप्लुतः // 28 // ततोऽसौ छूतकाराणां स्थाने जगाम सत्वरम् // बहवो मिलिता आसंस्तत्र द्यूतपराः खलाः // 29 // | कुमारं तं च ते दृष्ट्वा कथयामासुरत्र किम् // मित्र त्वं छूत मुद्दिश्य ह्यागतोऽसि वदाधुन // 30 // सदयेनोमिति प्रोक्तं तदा पृष्टं पुनश्चतैः // परं भो मित्र ते पार्श्वे धनं क्वास्ति प्रदर्शय // 31 // Kg तेनोक्तं मे पणं खङ्गं स्वर्ण च भवतां पणम् // तैरुक्त मेवमेवास्तु द्यूतारंभो ततोऽभवत् // 32 // देवीदत्तवरस्याथ प्रसादात्तान् विजित्य सः॥ भूरि स्वर्ण ततः प्राप तैरेवं चिन्तितं तदा // 33 // अधुनामुं वयं सर्वे जेष्यामो द्यूतखेलने // परं बहुपणं कृत्वा प्रांते तैहरितं धनम् // 34 //
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________________ श्री सदेववत्स चरित्रम् कुमारेणाथ मित्राय स्वर्ण दत्तं कियत्ततः // गृहीत्वासौ ततः स्वर्ण हदृश्रेण्यां गतः स्वयम् // 35 // स्वयोग्यानि सुवस्त्राणि च स्वपत्न्युचितान्यपि // वस्त्रव्यापारितस्तेन क्रीतानि बहुमूल्यतः॥३६॥ ततो गांधिकहढाच कस्तूरीकुंकुमादिकम् // कपरं च गृहीत्वासौ गतोऽसौ वणिकालये // 37 // ततस्तेन गृहीतानि विविधाभूषणान्यपि // सोमदत्तगृहे सर्व कृत्वैकत्र मुमोच सः // 38 // तस्मै च कथितं श्रेष्ठिन् यदैतन् मार्गयाम्यहम् // तदा सर्व त्वया देयमिति कृत्वा चचाल सः // 39 // वेश्यायै कामसेनायै शेषं स्वर्ण स दत्तवान् // चतुर्भिर्दिवसैरेवं प्राप लक्षमितं धनम् // 40 // पंचमे दिवसे सोऽथ ह्युत्थाय प्रातरेव यत् // गृहीत्वा स्वोत्तरीयं च प्रवृत्तश्चलितुं ततः // 41 // कामसेना तदोवाच हे प्रिय त्वं क्व गच्छसि // विदेशं प्रति यास्यामि तेनोक्तमथ तां प्रति // 42 // तयोक्तं चाथ स्वामिन् मे मरणं चलिते त्वयि // भविष्यत्येव गंतुं त्वा नैव दास्याम्यहं ततः // 43 // इति तया निषिद्धोऽपि प्रवृत्तश्चलितुं यदा // तदा सा प्राह वेश्यापि स्वामिनं घटितं वचः // 4 // Ka वसिऊण मझ हिअए-जीअंगहि ऊणकच्छधलि // ऊसि-हापियहियं अमंमण पुणी वित्थ कल पेहामि // इत्युक्तोऽपि कुमारः स यदा न तत्र तिष्ठति // उत्तरीयं ततस्तस्य गृहीतं कामसेनया // 45 //
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________________ न मुंचति घ सोऽप्येव माकृष्यमाणवाससः पपात गुन्बकं चैकं पद्मिनीपत्रवेष्टितम् // 46 // औत्सुक्यात्तद् गृहतिं च तावतोद्वेष्टितं तया॥ जटितो मोक्तिकैः रत्नैः कंचुको निसृतस्ततः॥४७॥ कंचुकं तं महामूल्यं दष्ट्वा कुमारपार्श्वतः॥ वेश्या लोभाभिभूता सा मार्गयतिस्म कंचुकम् // 48 // चिंतितमथ कुमारेण कंचुकोऽयमजानतः // बद्धो मे पञ्चवीरस्तै रिति संभाव्यते खलु // 649 // / KE ततः सदयवत्सेन दानवीरेण कंचुकः // प्रार्थनातः स वेश्यायाः हर्षात्तस्यै समर्पितः // 650 // कियती पंचसहस्री कियती लक्षापिकोटिरपि कियती॥औदायोन्नतमनसां रत्नवती वसुमती कियती अथापमानदुष्टापि साऽक्का हर्षवती सती // दृष्ट्वा तदानशौंडत्वं तस्मै शुभाशिषं ददौ // 652 // कामसेनाथ सोत्साहा स्थापयितुं तमाग्रहात् // बभूवापि कुमारस्तु तिष्ठति न प्रियोस्सुकः // 653 // Kगमने निश्चयं ज्ञात्वा कामसेनाथ प्राह तम् // दास्यामि नैव भो गंतुमभुक्त्वा स्वामितः परम् // 654 // इति वेश्याग्रहं दृष्ट्वा भोजनाय स्थितोऽप्यसौ // द्यूतस्य समयं ज्ञात्वा छूतस्थाने गतो द्रुतम् // 655 // दास्या रसवती कर्तु मारब्धा तावता च सा // दास्यै भोजनमादिश्य गंतुं लग्ना नराधिपम् // 66 // तदा तया स कंचुको वस्त्राणि विविधान्यपि // भूषणानि शरीरे स्वे सम्यगारोपितानि च // 657 //
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________________ सदैववत्स पर्यकिकामथारुह्य राजमार्गे चचाल सा // पटं नाच्छादयामास यानबेश्या ह्यपत्रपा // 658 // IS एवं चोद्भटवेषा सा व्रजन्ती भूपसन्निधौ // चतुष्पथे स्थितैः सर्वैर्जनै रपि विलोकता // 659 // E केनापि श्रेष्ठिना दृष्टः कंचुकः स तया धृतः॥ विचारितं मनस्येवं नूनं मे एष कंचुकः // 660 // गतोऽस्ति क्षात्रपातेन पूर्व सैव मयाधुना // दृष्ट इति विचार्यासौ स्वहट्टादुत्थितस्ततः // 661 // Ke पुनस्तन्निश्चयं कर्तुं वेश्यापार्श्वे जगाम सः तस्याः पर्यकिकादंडलग्नो मार्गे व्रजत्यथ // 662 // मुखेन च तया साधं वार्तालापं करोति सः // पश्यति नयनाभ्यां च तमेव स्वीयकंचुकम् // 663 // = पृष्टं तेन ततस्तस्यै वर्तते कंचुकस्त्वयम् // अतिमनोहरो वेश्ये त्वयैषोऽधिगतः कुतः // 664 // इत्यादिकपटालापैः स्वकीयमेव कंचुकम् // निश्चित्य तं स्वहढे स व्यवहारी समागतः // 665 // KE अकत्र तेन सर्वेऽथ मेलिता व्यवहारिणः // स्वकंचुकस्वरूपं च तेभ्यः प्रोक्तं सुबुद्धिना // 666 // | ततश्च श्रेष्ठिन: सर्वे मिलित्वा ते महाजनाः // सालवाहनराजाने गता द्रुतं समुत्सुकाः // 667 // राज्ञापि बहुमानेन तेभ्यः पृष्टं महाजनाः // ममानाकारिताः पार्श्वे यूयं कस्मात्समागताः // 668 // तैरुक्तं भेा महाराज विज्ञप्त्यै वयमागताः॥ पराभवति राज्ञोक्तं भवतामपि कोऽपि किम् // 669 // 57
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________________ तैरुक्तं हे नराधिप नः सति स्वामिनि त्वयि // कः पराभवितुं शक्तः कुतःभास्वति संतमः // 670 // परं नाथ निवासाय नःस्थानं देहि चापरम् // विस्मितःसन् नृपःप्राह किं यूयमनवस्थिताः // 671 // केनापि पीड्यमाना न यदि यूयं महाजनाः // तदान्यत्र निवासाय मार्गयथ कथं स्थलम् // 672 // केनापि पीड्यमानाःस्थ यदि चेदुचितं परम् // कथयत ततो यूयं सम्यक् स्वागमकारणम् // 673 // | तदा समश्यया श्रेष्ठी रामदेवोऽवदन्नुपम् // कृषिकैः पात्यते क्षेत्रे चौरेस्तन्नगरे कृतम् // 674 // ततो बुद्धिप्रभावेण कल्पयित्वा महामतिः // पतितमस्ति क्षात्रं किं कापीत्युवाच भूपतिः // 675 // उक्तं महाजनेनैवमेव स्वामिन् भवत्पुरे // चौरोपद्रवतः स्थातुमस्माभिः शक्यते नहि // 676 // भूपो वृक्षः स्वप्रजास्तस्य मूलं भृत्याःपर्णा मंत्रिण स्तस्य शाखाः // तस्माद्राज्ञा स्वप्रजा रक्षणीया- मूले गुप्ते नास्ति वृक्षस्य नाशः // 77 // विचिंत्येति तदा राजा प्रजानां रक्षणे हितम् // तलारक्षकमाकार्य प्रोवाच भीतिदं वचः // 7 // || रे रे निस्त्रप रक्षकाधम मम प्राणप्रिया या प्रजा, प्रेतेशप्रतिमेन सेयमानशं स्तेनेन निःपीड्यते // स्वं चादाय मदीयवेतनधनं खार्थीव बुब्धः सदा, त्यक्त्वा नागररक्षणव्यतिकरं निद्रायसे रे सुखम्॥७९॥
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________________ श्री सदैववत्स चरित्रम् तलारक्ष उवाचेदं हेस्वामिन् मत्ससमीपतः // कर्तुकामोऽसि यं दण्डं सुखेन कुरु तं नृप // 40 // | विलोकितोऽपि सर्वत्र मम चौरो न लभ्यते // किं करोमि महाराज खर्परचौरवद्भुवि // 1 // राजा प्राह तलारक्ष चौरोऽस्ति खर्परश्च कः // तलारक्षोऽपि तद्रूपं कथयति नृपं प्रति // 82 // KE स्तंभतीर्थे धनी कोऽपि भद्रनामाऽवसत्पुरा // जिनदासः सुतस्तस्य तत्पुरे परिणायितः 83 // तद्वासालयपार्श्वस्थे कोऽप्येको वटपादपे // वसतिस्म महायक्षस्तेन दृष्टा वणिग्वधूः // 84 // तस्यामतीवलुब्धःसन् भोक्तुमिच्छुः पुनः पुनः॥ आगतोऽपि न शक्नोति स्पृष्टुं तत्पतितेजसा // 85 // प्रयत्नं कुर्वतस्तस्य यक्षस्यैवं मनोरथात् / / वर्षाणि च व्यतीतानि बहुनि व्यर्थचेष्टया // 86 // अथ प्रवहणारूढो जिनदासो महाधनी // द्वीपांतरं गतो दूरे व्यापाराय महामतिः // 7 // तद्भार्या च गृहे स्थित्वा स्वपिति स्वालये स्वयम् // तदा स समयं प्राप्य यक्ष एवं चकार ह // 8 // द्वितीयदिवसे यक्षो जिनदासस्वरूपकम् // विधाय तत्पितुः पावे समागत्य ननाम सः // 89 // पित्रा पृष्टं तदा वत्स कथं पश्चात्समागतः // जिनदासस्वरूपोऽसौ यक्षो वदति तं वचः // 10 // K मया तु प्रागनभ्यासान्नौकायां स्थीयते नहि // तेन चाहं परावृत्तो ह्यन्यो हेतुर्न विद्यते // 91 //
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________________ प्रवहणस्थवस्तूनां विक्रयाय मया पितः॥ प्रधाननाविकायास्ति दत्ता शिक्षा विभागशः // 92 // पिता वदति हे पुत्र त्वयैतच्छोभनं कृतम् // ततो यक्ष स्तया वध्वा निःशकं रमतेऽनिशम् // 93 // Ke एवं गतानि वर्षाणि त्रिचतुराणि नोगतः // गोत्पत्ति रभूत्तस्या वैक्रियौदारिकांगजा // 9 // कियत्कालेन स श्रेष्ठी जिनदासोऽपि सोत्सुकः॥ पश्चागृहे समायातो ह्यर्जयित्वा धनं बहु // 95 // लोकैश्च तस्य पित्रेऽथ दत्ता वर्धापनी यथा // हे श्रेष्ठिन्नद्य ते पुत्रः कुशलेन समागतः // 96 // चिंतयति तदा श्रेष्ठी मुग्धा एते जना ध्रुवम् // न जाति सुतं मे तु कुशलोऽस्ति गृहे सदा // 9 // अथ तमागतं दृष्ट्वा यक्षो नष्ट्वा गतः स्थलम् // स्वसुतमागतं दृष्ट्वा श्रोष्ठनाथ विचारितम् // 90 // अहो केनापि दुष्टेन व्यंतरेण मदात्मकम् // पुत्ररूपं विधायाहं छलितोऽस्मीति निश्चितम् // 19 // E एवं ध्यात्वाथ स श्रेष्ठी श्याममुखो बभूव ह // लोकापवादभीत्या च ह्यतिचिंतातुरोऽजनि // 700 // एवं तं पितरं दृष्ट्वा तेन पृष्टं पितः शृणु // अहं बहुविधे काले धनं लब्ध्वा समागतः // 701 // तेन च तव चित्तेऽद्य हर्षोत्पत्ति ध्रुवं भवेत् // तथापि त्वं मनस्येवं जातः शोकातुरः कथम् // 702 / / | यक्षस्य कपटं सर्व पित्रा प्रोक्तं सुताय तत् // जिनदास उवाचेदं ज्ञातं तात मया पुरा // 703 //
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________________ श्री सदैववत्स चरित्रम् पितोवाचाथ हे वत्स विदेशं व्रजता सुखम् // मदने तस्य वृत्तान्तः कथ नं कथितस्त्वया // 704 // पुत्रः प्राहाथ हे तात केवलं लज्जयैव सः॥ मया सर्वोऽपि वृत्तान्तस्तवाये कथितो नहि // 705 // श्रेष्ठिनोक्तं विधेयं किं वद वत्स स्वबुद्धितः // त्वधुनाहं महाचिंतासमुद्रे बुडितोऽस्मि भोः // 706 // पुत्रेणोक्तं त्वया चिंता न विधेया मनागपि // जातमात्रस्त्वसौ त्याज्यः प्रच्छन्नं बहिरेव सः॥७०७॥ तस्य भाग्यवशात् किंचिद्भवेत्तद्भवतु स्वयम् // अथ क्रमेण संपूर्णे काले बालोद्भवोऽभवत् // 708 // तदा स श्रेष्ठिना रात्रौ जुकूलाबादितः सुतः॥ प्रच्छन्नं वाटिकामध्ये मुक्तो जानाति कोऽपि न // 709 // तदेवोज्जयिनीपुर्या गवंती गगनाध्वना // हरसिद्धि रधिष्ठात्री ददर्शाधः स्वयानतः // 710 // लक्षणालंकृतं तत्र पतितं वस्त्रवेष्टितम् // स्वपुत्रत्वेन तं बालं दृष्ट्वा सांगीचकार वै // 11 // - पश्चादेनं समादास्ये विचिंत्येति तयाथ सः // खर्परेण समाच्छाद्य रक्षितो निर्भयस्थले // 12 // प्रत्यागत्य तया स्नेहाद् गृहीतो बालको द्रुतम् // पालितुं वाटिकाभ। मालिकाय समर्पितः // 13 // खर्पराच्छादितत्त्वात् स स्वर्पर इति नामकः // तेन प्रोक्तः क्रमेणाथ वृद्धिं नित्यं समाप्नुवन् // 14 // सप्ताष्टवार्षिको जातो देव्याऽसौ पायितो रसैः॥ ततस्तस्मै वरो दत्त स्तया देव्या सहाशिषा // 15 //
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________________ अयप्रभृति भोवत्स यामिन्यां सबलो भवान् // वासुदेवबलेनापि त्वमजेयो भविष्यसि // 16 // दिन स्वेकतृणेनापि परं मृत्युमवाप्स्यसि // इति देव्या वरं दत्त्वा सोज्जयिन्यां निवासितः // 17 // - उज्जयिन्याः समारभ्य हरसिद्धिप्रभावतः // गिरिनारनगं यावत् सुरंगा तेन खानिता // 18 // दिवा तत्र सुरंगायां तिष्ठति खर्परोह्यसौ // भ्रमति नगरे रात्रौ व्यसनी चौरकर्मणः // 19 // चौर्य कृत्वा सुरंगाया तिष्ठत्यहि स खर्परः // दुःखं प्राप्ता स्ततो लोकाः स्वद्रव्यस्यापहारतः // 20 // पूत्कारं च जनाश्चक्रु गत्वा ते विक्रमं नृपम् // तलारक्षं तदाकार्य राज्ञाप्याक्रोश्य भाषितम् // 21 // समानय द्रुतं चौरं लोकोपद्रवकारकम् // गवेषयति तं रक्षः परं क्वापि न लभ्यते // 22 // इतस्तैलपदेवस्य तिलंगाधिपते रभूत् // श्रृंगारसुंदरी नाम्नी पुज्यतीव मनोहरा // 23 // - तस्याः पाणिग्रहं कर्तुं जगाम तत्र विक्रमः // उज्जायन्याश्च कुवैति रक्षण मत्र मंत्रिणः // 24 // परिणीयाथ तां राजा विक्रमोऽपि समागतः // कालेन कियता स्वस्य पुरस्य सन्निधौ मुदा // 25 // नगर्या बहिल्याने मुहूर्ताभावतः स्थितः // मांत्रप्रभृतयस्तस्य मिलनाय समागताः // 26 // प्रणम्य चोपविष्टानां राज्ञा पृष्टं सुशान्तिकम् // तैरुक्तं नगरे राजन् नधुमोपद्रवो महान् // 27 //
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________________ श्री सदैववत्स चरित्रम् चौरैः संतापिताः पौराः सर्वतः सन्ति भूपते // तदा क्रुद्धो नृपः प्राह मंत्रिज्यः सत्वरं वचः // 28 // रक्षा भो मंत्रिण स्तर्हि किं कुर्वन्ति सदा पुरे // तैरुक्तं भो महाराज प्रयत्न स्तैः कृतो महान् // 29 // परं चौरोपलब्धिस्तु न जातापि कथं प्रभो // तच्छ्रुत्वा भुपतिनाथ प्रतिज्ञा महनी कृता // 30 // पुरे नाहं प्रवेक्ष्यामि ह्यकृत्वा चोरनिग्रहम् // ततो राजा नवोढां तां प्रेषयामास मंदिरे // 31 // मंत्रिभिः सह गच्छन्ती प्रदोषेऽन्तःपुरेऽथ सा // सुखासने समारूढा भटैश्चाध्वनि संवृता // 32 // इतःस खर्परश्चौरो ज्ञात्वा वृत्तान्तमेव तम् // तत्रागत्याध्वतो राज्ञी माजहार स्वयुक्तितः // 33 // ततो निजसुरंगायां मुक्त्वा तां चापरैः सह // पंचचौरैः स्थितो देव्याः प्रासादमत्तवारणे // 34 // मंत्रिभ्यस्वप्रियालोपं श्रुत्वा राज्ञाथ चिंतितम् // अरे निजप्रियारक्षा क्रियते न मया यदि // 35 // तदा निजप्रजारक्षा विधास्येहं कथं सदा // इति खिन्नमना भूत्वा सावधानोऽभवद् द्रुतम् // 36 // | स्मृत्वाऽसा वग्निवेतालं निजसान्निध्यकारिणम् // अंधकारपटेन स्व माच्छाद्य खड्गपाणिकः // 37 // | अकाकी च स्वयंचौरग्रहणाय पुरं प्रति // रात्रौ भ्रामन् क्रमेणाथ हरसिद्धिस्थले गतः // 38 // | चौररूपं कृतं राज्ञा दृष्ट्वा तां चौरमंडलीम् // चौर्यस्य विविधां वाती चक्रुस्ते मिलिता स्ततः // 39 //
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________________ खर्परेणाथ वार्तायां तं चौरवेषधारिणम् // पृष्टं मित्र निवासःक्व किंच ते नाम विद्यते // 40 // तेनोक्तमह मासन्नग्रामस्थो विकुसंज्ञकः // चौर्येणैव च निर्वाहो नवति मम सर्वदा // 11 // तैरुक्तं तर्हि भोमित्र विकोऽस्माभिः सहाधुना // पुरेऽस्मिन् भार मुद्रोढुं स्वं किं समागमिष्यसि॥४२॥ लोत्रमध्याद् वयं भागं दास्यामस्तेऽपि हर्षतः // निशम्येति वचस्तेषां राज्ञापि स्वीकृतं तथा // 43 // अथैवं मिलिता श्चौरा नगरान्तः प्रविश्य ते॥जग्मुः कांदविकायाश्च मांकुनाम्न्या गृहं द्रुतम् // 44 // सा मांकुः प्रतिपन्नासीत् भगिनीत्वेन तैः सदा // स्वादं स्वादं च तैस्तत्र भक्षिता सुखभक्षिका॥ सुभोजन मिदं भ्रात विको त्वमपि भक्षय // नृपेणोक्तं मयाऽऽकण्ठं भोजनं स्वगृहे कृतम् // 46 // नाधुना भक्षयिष्यामि कुधोऽभावान् मनागपि // तदा पृच्छति मांकुस्तान कोऽय मद्य समागतः४७ चौरै रुक्तं नवीनोऽयं भगिनि चौरवृत्तिकः // अस्माकमत्र मित्रत्वात् मिलितोऽस्ति सहायदः // 48 // तयोक्तमस्य किंनाम नवीनस्याथ विद्यते // तैरुक्तं विकुनामाय मासन्नग्रामवासकः // 49 // चौरशिरोमणि श्वास्ति तदैवं चौरभाषितम् ॥निशम्य सा महाधूर्ता चिंतयामास मानसे // 50 // नूनमेते महामूर्खा जाति विक्रमं नहि // यतोऽद्य भूपतिः कृत्वा प्रतिज्ञा भ्रमति स्वयम् // 51 //
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________________ चरित्रम् श्री सदैववत्स स एव मिलितो नून मेषु संभाव्यते मम // विचायति नृपप्रीत्यै प्रोक्तं तया विदग्धया // 52 // भ्रातरो भागिनेयोऽस्ति ममाय मपि सांप्रतम् // युष्माभिः रक्षणीयोऽसौ भागो देयश्च लोप्त्रतः॥५३॥ Ka तैरुक्तं तत् करिष्याम इति कृत्वा तदालयात् // निःसृत्य मार्ग यागत्य चौराः प्रोचुःपरस्परम् // 54 // भगिन्या भागिनेयत्वादस्माक मप्ययं तथा // निशीथेऽथमहाचौरास्ते राजभवनं गताः // 55 // राजा तु सकलं तेषां सर्वेषां दुष्टकर्मणाम् // चराचरं समीपस्थो विलोकयति तत्परः॥ 56 // पूर्वगृहीतसंकेताः महिष्यः पञ्च तावता // समीपे चौर्यकर्तृणां सशृंगाराः समागताः // 57 // षष्ठचौरनिमित्तं ते रेका राझ्यपरापि च // आकारिता पर तत्र नागता सा पतिव्रता // 58 // तयोक्तं रे महामूर्खा विक्रमं च नृपोत्तमम् // संप्राप्य मम भोगेच्छा कथं स्यादपरैः सह // 19 // अथ राजा तु तत्सर्व विलोक्य चौरचेष्टितम् // विस्मितो मौन मादाय तत्रैव संस्थितःस च // 60 // IAS रत्नपेटी गृहीत्वा ते ततः सर्वेऽपि निर्गताः॥ उत्पाटनाय ताः सर्वा विक्रमाय समर्पिताः // 1 // नपेणापि च ताः वहिवेतालाय समर्पिताः॥सांगायां च संप्राप्ता दकित्य शिलां ततः॥१२॥ - एतावता गता रात्रिरथ दिनोदये नृपः // द्वारस्थांश्चतुरो हत्त्वा बभाण खपरं प्रति // 3 //
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________________ विक्रमोऽहं नृप श्चास्मि त्वय्यद्य रुष्टतां गतः॥ अतः खङ्गं गृहाण त्वं तच्छ्रुत्वाऽभूत् भयाकुलः // 6 // Ka यावदितस्ततो भीतो विलोकयति खर्परः // तावदाज्ञा स खड्नेन हतो मुनि पपात कौ // 65 // ततो लोकान् समाकार्य भूपतिना स्वकं धनम् // तेभ्यः समर्पितं तत्तु गृहीतं ते नृपाज्ञया // 66 // ke शोकातुरा सुरंगायां स्थिता श्रृंगारसुंदरी // महिष्यपि समाश्वास्य स्वांतःपुरे च प्रेषिता // 7 // प्रतिज्ञा पूरणाद्धृष्टो नृपोऽथ समहोत्सवम् // प्रवेश मकरोत्पुर्या प्रसन्ना भूत् ततः प्रजा // 6 // al नृपेण पंच राझ्यस्ता दुष्टा निष्कासिता गृहात् // पट्टराज्ञी शुशीला सा कृता या तु पतिव्रता।।६९॥ चौरोपद्रवमुक्तास्ते जना हर्ष मवाप्नुवन् // राजश्वौरोऽस्ति दुर्ग्राह्यो ह्ययं खर्परचौरवत् // 7 // एवंविधं तलारक्षवाक्यं श्रुत्वा नराधिपः॥ चौरेण किं गृहीतं व इत्यपृच्छन् महाजनम् // 7 // तदा महाजनै रुक्तं पूर्वमिव समश्यया // स्वामिस्तद्वस्तु कंदर्पघमूरःस्थलमंडनम् // 72 // राज्ञा तेषां वचोभावं विज्ञायोक्तं महाजनाः हृद्यस्ति कामसेनायाः कंचुकः किं स चोरितः // 3 // E दक्षचूडामणी राजन्नसीत्युक्तं महाजनैः // खल्वेष कंचुकः पूर्व कामदेवगृहे स्थितः // 74 // क्षात्रं पपात तन्मध्ये गतश्चौरकरे तदा // सोऽस्माभिरद्य दृष्टोऽय मुपलक्षित इत्यपि // 75 //
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________________ श्री सदैववत्स चरित्रम् 62 अभिज्ञानेन तेनास्य गतं ज्ञेयं त्वया धनम् // कामसेना ततो राज्ञा पृष्टा सत्यं वद ध्रुवम् // 76 // केनायं कंचुको दत्तो तवास्ति बहुमूल्यकः // सा प्राह हे महाराज शृणु सत्यं वदाम्यहम् // 77 // गृहेऽस्माकं नटा श्चौरा विटादिबहवो जनाः // समागच्छन्ति चान्येऽपि नागरा रसिका जनाः॥८॥ किंचनायं न आचारः कदाचिदस्ति भूपते // यत् कस्यचित् स्वरूपं तु पुरः कस्यापि कथ्यते // 7 // तविषये मनस्तेषां जानात्यस्माकमेव च // विषयेऽस्मिन् महाराज सत्येवं तु किमुच्यते // 8 // कस्यापि गुप्तं संबंध कथयामो वयं यदि // तदास्माकं गृहे कोऽपिऽनागन्छेत् जीव्यते कथम् // 1 // सामादिनेदतो राज्ञा ततः पृष्टापि सा यदा // तत्कंचूकस्वरूपं तु नाकथयन्मनागपि // 2 // तदा रुष्टो महाराजः प्रत्याह दण्डपाशिकान् // कुरुतास्या महादंडं शूलिकारोपणं ध्रुवम् // 83 // तद्विषये पुनश्चाहं पृष्टव्यो नैव सर्वथा // यतश्चास्या गृहे चौरास्तिष्ठन्ति लोकदुःखदाः // 4 // चौराणा माश्रयं नित्य मियमेव प्रयच्छति // पृष्टापि चोत्तरं सम्यङ् न ददाति मनागपि // 85 // तोषिता दानमानाच्या मप्येषा कुलटा बहु // तथापि दुष्टजातित्वान्नैवात्मीया मनागपि // 86 // पासा वसा अग्नि जल ठग ठक्कुर सोनार // ए दस न होय आपणा मंकड बडुअ विडाल //
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________________ Ke अथैवं तां दृढं बध्ध्वा तलारक्षो भूपाज्ञया // गृहीत्वाऽयाद्वधस्थानं शूलिकारोपणाय च // 8 // ज्ञातं तस्याः स्वरूपं तत् तदाक्या जनाननात् // तदाऽपृच्छज्जनांस्तत्र मदीयाऽऽरोप्यते कथम् // 8 // - तेरुक्तं शृणु तत्सर्व तत्परिहितकंचकः // चोरितवस्तुरूपोऽस्ति नृपाग्रे कथितं जनैः // 89 // राज्ञा पृष्टापि सा तस्य वदति दातृनाम न // तेनेयं चौरवच्छलिकाया मारोप्यते जनैः ॥ए०॥ तन्निशम्याकया प्रोक्त मत्रास्ति चौर एव सः॥ तस्मिन् जीवति मिथ्यैव सा तत्रारोप्यते कथम् // 91 // इत्युक्त्वा सा तदैवाका यूतस्थाने गता द्रुतम् // तत्र स्थितं कुमारं तं क्रोधाग्निज्वलिताऽवदत् // 12 // - अरे चौर महादुष्ट ज्वलय तव कंचुकम् // येनैव कामसेनाया प्राणनाशकरं ध्रुवम् // 13 // . समुद्भूतं महद्दुःखं वत्सः प्राह कथं कथम् // तदाकयापि तत्सर्व तस्मै प्रोक्तं स्वरूपकम् // 14 // IR कथितं चाधुना सैषा कामसेना सुता मम // तलारक्षेण नीतास्ति शूलीस्थानमतो व्रज // 95 // निशम्यैतत् कुमारस्तु स्वयमेव ततः स्थलात् // शुलिकायाः प्रति स्थानं धावितोऽतित्वरान्वितः९६ Kखङ्गमपि गृहीतुं स्वं वेश्यालये गतो न सः॥ विलम्बात् कामसेनायाः प्राणहानिर्भवेद्यतः // 97 // तत्र गत्वा कुमारोऽथ तलारक्ष मुवाच सः // नहीयं चौरदण्डार्हा तच्चौरश्वाह मस्मि भोः // 98 //
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________________ सो सदैववत्स स- मुंघमां त्वमतो रक्ष प्रष्टव्यं तत्र यद्भवेत् // किमपि तन्ममैव त्वं सर्व प्रच्छ सविस्तरम् / / 99 // सदयवत्स इत्युक्त्वा बलात्कारेण सत्वरम् // बन्धनं कामसेनाया दूरीकृत्य मुमोच ताम् // ततो यावत्तलारक्षस्तं मारणाय धावति // लोहच्छरिकया छिन्ना वत्सेन तस्य नासिका // 801 // ka रेऽष्ट दययैव त्वं जीवन् मुक्तोऽसि केवलम् // यतो रंकस्य घातेन ममापकीर्ति रेव स्यात् // 802 // अथ त्वं स्वमुखं लात्वा द्रुतं मिल कुटुम्बकम् // जीवन् सन्नन्यथैवाद्य मरणं ते भविष्यति // 803 // - गत्वा कथय ते राज्ञे चौरस्तु मिलितः स्वयम् / अस्तीत्युक्त्वा कुमारस्तु तत्रैव निर्भयः स्थितः 804 तस्याथ नासिकाछेदं निशम्य नागराः जनाः॥ केऽपीति कथयामासु हृष्टाः सन्तः परस्परम् // 805 // इदं तु सुंदरं जातं दुष्टोऽयं रक्षकः सदा // बलात्कारेण लोकाना महरद् वृषभादिकम् // 806 // अथ रक्षो नृपं गत्वा दर्शयामास स्वं मुखम् // राज्ञा पृष्टं तलारक्ष जातमिदं तवापि किम् 807 तलारक्षोऽपि सर्व तज्जगाद नृपतेः पुरः॥ तन्निशम्य बभूवाथातीव रुष्टो नराधिपः // 808 // बहुकटकसंयुक्तं स्वसैन्याधिपतिं तदा // कुमारनिग्रहायैव प्राहिणोत्स महीपतिः॥८०९॥ ततः सेनापतिस्तत्र गत्वा स्वकटकेन तम् // संवेष्ट्रय मारणायैव स्वयं युद्धं चकार सः // 810 //
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________________ FACTREATRAAT हरसिझिमहादेवीप्रसादादथ तत्क्षणम् // तत्सकलं बलं भग्नं वत्सस्तु निर्भयः स्थितः // 11 // तच्छस्त्राणि गृहीत्वैव सैनिकेषु तदादिपत् // पुरलोकस्तु सर्वोऽपि कौतुकाय समागतः // 12 // नागराःकथयामासुदृष्ट्वाथ तत्पराक्रमम् // एष सर्वबलेनापि चौरो जेतुं न शक्यते // 13 // | तावता सोमदन्तेन दृष्टोऽसौ व्यवहारिणा // स्वहृदि चिंतितं नून मयंतु सैव बुद्धिमान् // 14 // विवादे येन वेश्यायाः स्वबुध्ध्या प्रथमं मम // उपकारः कृतस्तस्माद् गच्छामि तस्य संनिधौ // 15 // पृच्छामि यत् किमेतत्ते मनसीतिविचिंत्य सः // तलारक्षानुमत्यासौ कुमारसन्निधौ गतः // 16 // सोमदंतः कुमारं त मुवाच भो नरोत्तम // उपलक्षयसि त्वं किं तेनोक्त मेव मेव तत् // 17 // अनर्थाय समारब्धं भो सज्जन कुतस्त्वया // दत्तं चौरकलंकं ते केन वेति स पृष्टवान् // 18 // तन्निशम्य कुमारः स हर्षोत्फुलाननोऽवदत् // केवलं कौतुकायैतत् सर्व मंगीकृतं स्वयम् // 19 // तदाकावदड्रेष्ठी त्वया तु सुंदरं कृतम् // परमेवंविधे कृत्ये नूनं प्राणस्य संशयः // 20 // तदा कस्तव निर्वाहं करिष्यति नरोत्तम // तेनोक्त मत्र मा चिन्तां कुरु श्रेष्ठिन् मनागपि // 21 // सर्व निर्वाहयिष्यामीति श्रुत्वा भाषते वणिक् // दक्षेणापि विरूपं तत् कृतमस्ति त्वया यतः // 22 //
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________________ चरित्रम् / सदैववत्स 64 अव्यापारेषु व्यापारं कर्तु मिच्छति यो नरः // स शीघ्र निधनं याति कीलोत्पाटीव वानरः // 23 // कुमारोऽकथयच्छ्रेष्ठिन् खेदं मनसि मा कुरु // नहि कश्चिदनर्थोऽयं मनसि मे कौतुकं परम् // 24 // इतश्चेद् गन्तुमिच्छामि तदेषां पश्यतां ध्रुवम् // हस्ततालमहं दत्त्वा व्रजामि स्वात्मनेप्सितम् // 25 // परं तु कामसेनाया गतेऽनों भवेन्मयि // परं तद्रक्षणायैवाह मत्रास्मि सुसंस्थितः // 26 // किंचिदपि मम त्वत्र दुःखं नहि भविष्यति // अतोऽस्मिन् भवता चिंता न विधेया मनागपि // 27 // अस्त्येकं मे परं कार्य तत्कर्तुं युज्यते त्वया // तेन त्वयोपकारो मे महान् कृतो भविष्यति // 28 // अत्र घेवंविधो मेऽन्यः कोपि न त्वां विना सुहत् // यस्याग्रे कथ्यते कार्य मिति श्रुत्वाऽवदद् धनी // 29 // भोनरोत्तम किं कार्य करणीयं वदाधुना // तच्छुत्वा हर्षितो वत्सः सोमदंतमुवाच सः // 30 // आसन्नवर्तिनि ग्रामे मयात्रागच्छता स्वयम् // विश्वरूपस्य भट्टस्य गहे मुक्तांगना मम // 31 // तस्या अग्रे मया प्रोक्तं यदहं पंचमे दिने // पाश्वे तवागमिष्यामि सत्यमेव वदाम्यहम् // 32 // तदा तयापि मे प्रोक्तं यदि त्वं पंचमे दिने // न प्रहरद्वयातीतेऽप्यत्र समागमिष्यसि // 33 // तदा ज्वलच्चितायां स्वां ज्वालयिष्याम्यहं तनुम् // एवं तया प्रतिज्ञात मस्ति च मम सन्निधौ // 34 //
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________________ अधुनाऽवेक्ष्यमाणा सा द्रुतमागमनं मम // भृशं तेन समाकुला संजाता वै भविष्यति // 35 // तेन लेखं लिखित्वा त्वं भो श्रेष्ठि स्तत्र सत्वरम् // प्रेषय कमपि स्वीयं नूनमेवं च ज्ञापय // 36 // E पाढं कार्यविशेषेण स्थितोऽस्ति पतिरत्र ते // ततोऽधृति च मा कुर्याः प्रातः खल्वागमिष्यति // 37 // चौयं कृत्वा स किं चात्र स्थितोऽस्तीति च मा लिखेः // अन्यथा स निजप्राणानपिवियोजयि ष्यति // 38 // इत्येवं तद्वचः श्रुत्वा कृतज्ञश्च दयापरः // स्वचित्ते चिंतयामास सोमदंतो वणिग्वरः // 39 // नरोत्तमोऽस्त्ययं वत्सो नूनं ममोपकारकः // अतः प्रत्युपकाराय वर्ततेऽवसरो मम // 40 // अन्यथापि समर्थो यः परकष्टं धनादपि // न स्फेटयति साफल्यं तदा तस्य धनस्य किम् // 41 // KI दत्तं न वित्तं करुणा निमित्तं लोभे प्रवृत्तं कृतमेव चित्तम् // यः संचयः केवल मत्र क्लृप्तः शोचं ति ते पातक मात्मक्लृप्तम् // 42 // इति विचित्य स श्रेष्ठी प्राह चैनं नरोत्तमम् // एवं चेदस्ति कार्य तद् याहि तत्र त्वमेव वै // 43 // कार्यमिद महं वीर भनदानादिनापि च // सर्व निर्वतयिष्यामि यत उक्तं महात्मभिः // 44 //
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________________ सदैववत्स चरित्रम् 65 नहि तद्विद्यते किंचिद्यदर्थेन न सिध्यति // वर्धतेस्म क्रियाः सर्वाः पर्वतेभ्य इवापगाः // 45 // इति श्रेष्ठिवचः श्रुत्वा कुमारो वदति स्म तम् // श्रेष्ठिस्त्वां संकटे क्षिप्त्वा गंतुमिच्छाम्यहं नहि // 46 छायार्थी सेवते वृक्षं श्रान्तो गजपतिर्यथा // पातयत्येव तं वृक्षं तथा नीचजनोऽपि हि // 47 // स्वस्यैवाश्रयदातारं पातयति च संकटे // गजतुल्यो यतो नास्मीति श्रुत्वोवाच तं धनी // 48 // सत्यं भो सजनाद्यात्र स्थाने स्थास्याम्यहं तव // कार्य स्वं च निजं कृत्वा ह्यागच्छेरत्र सत्वरम् // 49 // तत्प्रतिपद्य वत्सेनापि प्रोक्तं तं तदा वचः // कल्येऽत्र भो महाश्रेष्ठिन्नागमिष्याम्यहं खलु // 50 // तदा श्रेष्ठी तलारक्षमाकार्य विनयेन सः॥ नम्रीभूयावदद्रक्षं नृपं गत्वा वदाधुना // 51 // चौरस्य प्रतिभू भूत्वा यदेकं याचते दिनम् // कृत्त्वैवं सोमदंतः स तं मोचयितुमिच्छति // 52 // आगामिनि दिने चौरश्चात्रागंतुं वदत्यपि // आगमे प्रतिभूस्तस्य धनी मुक्तो भविष्यति // 53 // यदि चेत् स पुनश्चौरः कल्ये नात्रागमिष्यति // तदा क्षात्रे गतं सर्व धनं श्रेष्ठथर्पयिष्यति // 54 // किञ्चाधिकं नृपस्यापि लदस्वर्ण प्रदास्यति // ज्ञापयित्वेति राज्ञे त्वं शीघ्र मादेश मानय // 55 // तलारक्षण गत्वाथ नृपस्य सन्निधौ द्रुतम् // श्रेष्ठिनो वाचिकं सर्व कथितं स्वाधिकारतः // 56 //
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________________ मंत्रिणः संमतिः प्रष्टा राज्ञा तद्विषये तदा // मंत्री प्राह महाराज ह्यत्र शृणु मतं मम // 57 // जातोऽस्ति सोमदंतः स मत्तो धनमदेन हि // तेनाद्य मोचितश्चौरः किं पुनरागमिष्यति // 8 // क्षात्रादि श्रेष्ठिनः किं च सर्व निर्वाहयिष्यति // भवेन्नैव कदाप्येवं तेन शिक्षास्य सुस्थिता // 59 // यावदस्य महाशिक्षा लग्ना नैव भविष्यति // चौराश्रयप्रदानान्न तावत् स विरमिष्यति // 6 // तदेहि मोधनादेश मिति राज्ञापि मानितम् // रक्षस्य दत्त आदेश श्चौरस्य भोचनाय च // 61 // तेनापि तत्र गत्वाथ सोमदंताय भूपतेः // आदेशः कथितस्तस्मान्मुक्तश्चौरश्च बन्धनात् // 62 पौरस्थाने स्थितः श्रेष्ठी गच्छन्तं तं जगाद च // पश्चात् कुमार मा गच्छे भलिण्यामीदमप्यहम् // 3 // परं तत्तु कुमारेण अनुज्ञातं न तद्वचः // अथ तस्य गतो हट्टे सोमदंतस्य हर्षतः // 64 // स्थापनिकां गृहीत्वा स्वां प्रियामरणशंकया // मुत्तवासिफलकं तत्र सोऽभुक्तो धावितो द्रुतम् // 65 // द्वियामानंतरं तत्र निजपत्युरनागमात् // खिन्ना सा सावलिंगा तं विश्वभट्ट मुवाच ह // 66 // हे भ्रातर्मत्पतेः पन्था द्वित्रायाम विलोकितः॥ परमथापि नायात स्तेनास्य कुशलं नहि // 67 // यतोऽस्ति तच्चतुःषष्टि योगिनीस्थानकं पुरम् // नूनममंगला शंका जाता चित्ते ततो मम // 8 //
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________________ चरित्रम् 66 समयातिकमान्नूनं प्राणप्रियजनस्य न // धारयति धृति चेतस्ततः काष्ठानि देहि मे // 69 / / श्री सदैववत्स विश्वभट्टस्तदा प्राह भवसिं कथमुत्सुका // स्वसर्दिनांतपर्यंतं तं विलोकय सुव्रते // 7 // ज्ञात्वैव स प्रतिज्ञा ते गतोऽस्ति तत्र त्वत्पतिः // कृतकार्यस्ततो नून मत्राधुनागमिष्यति // 7 // Keमरणानंतरं चासौ यद्यागच्छेत्पति स्तव // तदा किं तस्य यच्छामि प्रत्युत्तर महं शुभम् ||72 // इति निशम्य सा प्राह भ्रातस्तदा पुरो मम // कृता तेन प्रतिज्ञाऽभूत् प्रहरद्वय माश्रिता // 73 // तुर्ययामोऽधुना जातो विलम्बं कुरु मा मनाक् / / त्वं चेत् मे सत्यभ्रातासि तदा काष्ठानि देहि मे 74 | K कथमप्यथ नैवाहं स्थास्यामि भो महीतले // इत्येवमाग्रहं ज्ञात्वा तस्या भट्टेन मानितम् // 75 // | क्षिप्तानि काष्ठखंडानि तेन ग्रामावहिस्तदा // सापि तत्र शुचिर्भूत्वा प्रहर्षेण समागता // 6 // कालक्षपाय तत्रत्यैर्भट्टभृत्यैः शनैः शनैः॥ चिताथ चिता पश्चात् प्रज्वालिता चिताग्निना // 7 // | चिताया निर्गतो धूमश्चाकाशं व्यानशे भृशम् // यावद्वत्सो द्रुतं धावन्नागाद् ग्रामस्य संनिधौ // 78 // | बहुलधूममाकाशं तावद् दृष्ट्वाकुलोऽभवत् // अश्रुपाताविले तस्य नेत्रे चापि बभूवतुः // 79 // | चिंतयति ततः सैवं धूमेनतेन ज्ञायते // निश्चयेन चितायां सा प्रविष्टास्ति विलम्बतः // 80 //
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________________ हृद्येवं पीडितो वत्सो धावति स्म द्रुतं द्रुतम् // ततोऽत्र सावलिंगा सा चितासन्नं समागता // 1 // यावद्भवति सा तत्र झंपां दातुं समुत्सुका // प्रतीक्षस्व क्षणं तावल्लोकैरुक्तं त्वं सांप्रतम् // 8 // यतः कोऽपि जनः संज्ञां कुर्वन् पटभ्रमणेन वै // दुराद द्रुतं द्रुतं धावन्नागच्छन्नस्ति संन्निधौ // 8 // तदा भट्टेन झंपातः रक्षिता सा बलादपि // तावता सदयः सोऽपि द्रुतं तत्र समागतः // 4 // समागतं च तं दृष्ट्वा भट्टो लोकाश्च हर्षिताः // सावलिंगां पतिः प्राह किमिदं च त्वया कृतम् // 85 // तयोक्तं च प्रतिज्ञातं त्वया तु प्रहरद्वयम् // मया प्रतीक्षितं स्वामि स्तथापि प्रहरत्रयम् // 86 // आग्रहतोऽप्यस्य भट्टस्य दिनांतोऽभूत् प्रतीक्षया // उक्तं तदा कुमारेण शृणु प्रिये वचो मम // 7 // ग्रामे गतस्य वेलापि लगति प्रहराधिका // कदाचित् सहसा कर्तु परमेव न युज्यते // 88 // कुमारोक्तं वचः श्रुत्वा सावलिंगाऽवदत्ततः // विलंब सहते नैव पत्युर्या तु पतिव्रता // 89 // चन्द्रेण रहिता नूनं श्यामास्या रजनी भवेत् // स्वामिनो विरहे सत्यास्तथैव मरणं स्मृतम् // 9 // अथैवं समये तस्य चागमनाद्धर्षोऽभवत् // भट्टेनापि तयो श्चक्रे प्रवेशस्य महोत्सवः // 91 // सामग्री कारिता चापि महता भोजनादिना // ततः सर्व कुमारेण खप्रियायै समर्पितम् // 92 //
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________________ श्री सदैववत्सम चरित्रम् आनीतं पुरतो वस्त्रभूषणादि मनोहरम् // बभूव सापि तल्लब्ध्वा महाहर्षवती सती // 93 // यौवनान्वितनारीणां स्वामी सौभाग्यसुंदरः // मनोज्ञाभूषणानि च वस्त्राणि सुखदानि वै // 9 // प्रभातेऽथ कुमारेण प्रोक्तं निजप्रियां प्रति // ममासिफलके हर्षात्तत्रैव विस्मृते मया // 95 // तेनाद्य तत्र गत्वाहं समानयामि ते प्रिये // सोवाच तर्हि हे नाथ पुनः कदाऽऽगमिष्यसि // 96 // - कल्ये समागमिष्यामि नून मेव मुवाच सः // यामाधिकः कदाचित् स्याद् विधेयं पूर्ववन्नहि // 97 // Kउक्तं तयापि भो स्वामिन् वचो वरतरं च ते // परं तत्र विलंबो न विधेयो भवता मनाक् // 98 // अथैवं तां समाश्वास्य प्राणप्रियां ततः स्थलात् // पुनश्च चलितो वत्सः प्रतिष्ठानपुरं प्रति // 99 // / द्रुतं धावन् स तत्पुर्यां समागत्य प्रहर्षतः / / सामदंतस्थितो यत्र वत्सस्तत्र समागतः // 900 // श्रेष्ठिनं प्रति तेनोक्तं सोमदत्त अहं खलु // आगतोऽस्मि प्रतिज्ञातवेलायां तव सन्निधौ // 1 // गत्वा राज्ञः समीपे त्वं स्वात्मानं मुक्तलं कुरु // श्रेष्ठिनोक्तं पुनः कस्मान्मरणाय त्वमागतः // 2 // आगतो माभविष्यश्चेत्त्व मत्र वै तदा धनात् // एन मुपद्रवं दूरेऽकरिष्यं सर्वमप्यहम् // 3 // अभविष्यच मे कीर्तिर्यथाऽनेन दयावता // चौरो धनठययेनापि मोचितो व्यवहारिणा // 4 //
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________________ // भूतानुकम्पा प्रियवागयाचा लजा क्षमौचित्य मुदारता च // K कृतज्ञतान्योपकृतिः सुशीलं स्थानानि की देश कीर्तितानि // 5 // सत्यीकर्तुं च स्वात्मानं भो पुरुषोत्तम त्वया // अत्रागत्य तु मत्कीर्ते विनाशश्च परं कृतः // 6 // इत्येवं सोमदंतस्य श्रुत्वा वाक्य मुवाच सः॥ एवं वक्तुं च युक्तं च कर्तु मेव भवादृशाम् // 7 // उपकर्तुं प्रियं वक्तुं कर्तुं स्नेहमकृत्रिमम् // सजनानां खभावोऽयं केनेन्दुः शिशिरीकृतः // 8 // धननाशं मुधा श्रेष्ठिन् कथं ते कारयाम्यहम् // किंतु नीचस्वभावोऽय मुपकर्तृविनाशकः॥ 9 // छिनत्त्यंबुजपत्राणि हंसस्तजीवितोऽपि हि // संतोषयति तान्येव दूरस्थोऽपि दिवाकरः // 10 // | भो श्रोष्ठिंस्त्वं सुखेनैव गत्वेतो नृपसंनिधौ / व्यवहारप्रसिध्यथै स्वात्मानं मुक्तलीकुरु // 11 // नृपं विज्ञापयामास श्रेष्ठी गत्वा सभां प्रति // हे स्वामिन्नस्ति चौरः स पुनरत्र समागतः // 12 // तेनाहं मुत्कलो राजन् जातोऽस्मि संप्रति ध्रुवम् // तच्छूवा विस्मिताः सर्वे ह्युचु स्तेऽपि नृपादयः॥१३॥ सोमदंत स किं चौरः पुनरत्र समागतः // एवमेवास्ति हे राजनित्युक्तं व्यवहारिणा // 14 // तदा सर्वसभा वक्ति सती चातिचमत्कृता व्याख्यामहे वयं सत्वं श्रोष्ठन् कस्योभयोरपि // 15 //
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________________ श्री सदैववत्स चरित्रम 68 सत्वमस्ति प्रशंसाह मेके प्रोचुयोरपि // चौरोऽपि सत्यवादित्वपालनाय समागतः // 16 // | समयातिक्रमस्तेन मुत्कलेन कृतश्च न // मृत्युन्जयेन यो नष्ट्वा दूरदेशं गतश्च न // 17 // मृत्युभीतस्त्यजत्येव पितृमातृप्रियासुतान् // वज्रीत्या त्यजन् सर्व मैनाकोऽब्धौ पपात ह // 18 // प्रोक्तं तेन ततो राज्ञा चौरोऽयं निश्चयात्मकः॥ प्रतिज्ञापालनान्नूनं संभाव्यते महाकुलः // 19 // | नीचानां वचनं मिथ्या भवत्येव तु सर्वथा // प्रतिज्ञां पालयंत्येवं महाकुलसमुद्भवाः // 20 // दिग्गजकूर्म कुलाचल फणिपति विघृतापि चलति वसुधेयम् // प्रतिपन्न ममलमनसां न चलति पुंसां युगान्तेऽपि // 21 // // मार्तण्डान्वयजन्मना क्षितिभृता चांडालसेवा कृता, रामेणाद्भुतविक्रमेण सहसा संसेविताः कंदराः॥ | भीमाद्यैः शशिवंशजै नृपवरै र्दास्यं कृतं रंकवत्, स्वीयोक्तप्रतिपालनाय पुरुषैः किं किं न वांगीकृतम् // स्वस्थाने ततः प्राप्तः सोमदंतो नृपाज्ञया // कुमारोऽथ तलारक्षं प्रत्याह विनयान्वितः // 22 // | भोतलारक्ष राज्ञो यस्तवादेशो भवेयथा // तथा तं कुरु शीघ्रं त्वं विभमि न मनागपि // 23 //
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________________ Kयतोऽहमुक्तवेलायां स्वस्थानगमनोत्सुकः // इत्येवं तद्वचः श्रुत्वा हसति नागरा जनाः // 24 // चौरस्याप्युक्तवेलायां यदहो स्वगृहं प्रति // संप्रत्यपि दृढीभूतो गन्तु मस्ति मनोरथः // 25 // ततस्तेन समं युद्धं नृपादेशाद् बभूवह // बहुजनक्षयं दृष्ट्वा चिंतयति नृपो हृदि // 26 // अहो मम भटानां तु भवत्यत्र क्षयो महान् // चौरस्य मनसि क्षोभो भवति न मनागपि // 27 // तथैव तस्य वालाग्रखंडनं शस्त्रतोऽपि न // अतो मम द्विपञ्चाशद्वीरानुत्थापयाम्यहम् // 28 // तेषां त्वद्यापि वीराणां निद्रोहीना परं न हि // वीरान् संतोषयामास बलिदानादिना नृपः // 29 // ततस्तेऽपि नृपादेशात् सदयेन समं तदा // युद्धं कर्तुं प्रवृत्ताः स वत्सोऽपि तैः समं तथा // 30 // | समर्था नाभवन् जेतुं वत्सं तेऽपि महाबलाः॥ युद्धं दृष्ट्वा जनाः सर्वे मनस्यतीव विस्मिताः 31 // विद्यासिक इतः कोऽपि नारदेन समस्तदा // युद्धस्य कौतुकी तत्र विलोकनाय चागतः // 32 // वत्समेकाकिनं दृष्ट्वा सोऽपृच्छद् भोमहाभट // पक्षे सहायकर्ता ते किं कोऽपि दृश्यते नहि // 33 // असहायः समर्थोऽपि तेजस्वी किं करिष्यति // निर्वाते पतितो वह्निः स्वयमेव प्रशाम्यति // 34 // तेनोक्तं पंच वीरा मे धनदगिरिवासकाः // सन्ति सहायकर्तारः परं मे न प्रयोजनम् // 35 //
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________________ श्री सदैवक्स - श्रुत्वैनमथ वृत्तांतं नारदवत् स कौतुकी // गत्वा तत्र गिरौ वीरानकथयच्च तान् प्रति // 36 // - युष्ममित्रस्य भोवीरा कंचुकस्य प्रदानतः॥ प्रतिष्ठानपुरे शूलारोपणं जायते ध्रुवम् // 37 // स्वशक्त्या तेन युष्माभिः सहाय स्तस्य युज्यते // कर्तुं यतोऽधुना कालो भवतामस्ति शोभनः॥३८॥ विण सिस्सपरिस्का सुहपरिस्काय होइ संगामे // वसणे मित्तपरिस्का दाणपरिस्काय दुक्काले // जानीयात्प्रेषणे नृत्यान् बांधवान् व्यसनागमे // मित्रमापदि काले च भार्यां च विभवक्षये // 39 // तन्निशम्याथ ते वीराः प्रतिष्ठानपुरं प्रति // कुमारस्य सहायार्थ पंचापि च समागताः // 40 // गजाश्वरथपत्यादि स्वविद्याया बलेन तैः // नृपसैन्यं विकुर्वितं तत्सैन्यं चाप्ययुध्यत // 11 // KE भग्नं राजबलं प्रान्ते छिपंचाशद् भटा अपि // हरसिद्धिप्रसादात्ते प्राप्तास्तत्र पराजयम् // 42 // संग्रामे सुभटानां च कवीनां कविमंडले // दीतिर्वा दीप्तिहानिर्वा मुहर्तादेव जायते // 43 // स्वकीयं सकलं सैन्यं भग्नं दृष्ट्वातिचिन्तितम् // अहो केनापि सैन्यं मे भग्नं नाभूत् पुरा मनाक् // 44 // अधुना मे द्विपंचाशद्वीरयुतबलस्य हि // विनाशोऽभूत क्षणं यावदेवं चिंतातुरो नृपः॥ 45 // पश्यन्नितस्ततस्तस्थौ ततोऽस्य लक्षणादिकम् // अपूर्वरुपलावण्यं दृष्ट्वा चित्ते व्यचारयत् // 46 //
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________________ नूनं नायं न चौरोऽस्ति सामान्यमानवश्च वा // किंतु संभाव्यते कोऽपि वीरेभ्योऽप्यधिको महान्॥४७॥ अथवा कोऽपि देवोऽस्ति महाविद्याधरश्च वा // अनेन सह मे युद्धं तस्माच्छेयस्करं नहि // 48 // - युद्धं निषेधयामास विचार्येति महीपतिः // वत्समुवाच हे वीर स्वात्मानं त्वं प्रकाशय // 49 // IS निजसत्यस्वरुपं न सैवं प्रकटयत्यपि // कामसेनां सतो भूपः सर्व माकार्य पृच्छति // 50 // दिवसाः कति संजाताः वसतोऽस्य गृहे तव // तथैव तत्कुलं गोत्रं वेश्ये ज्ञातं न वा त्वया // 51 // तदा सा प्राह हे स्वामिन् गृहे समागतस्य मे // केवलमस्य चत्वारि जातान्यहानि संति वै // 52 // किंचास्य कुलगोत्रादि न वेद्मि किंचिदप्यहम् // विद्यते परमस्यासि र्नामांकितो गृहे मम // 53 // | तच्छ्रुत्वासिस्ततोराज्ञाऽऽनायितश्च विलोकितः // तत्र दृष्टं कुमारस्य खगोऽयमिति चित्रितम् // 54 // | स्वर्णवांस्तदा दृष्ट्वा प्राह राजातिविस्मितः // अभिज्ञानेन नूनं त्वमनेन सदयोऽसिभोः // 55 // प्रकटय त्वमात्मानं विधायातः कृपां मयि // वत्सेनोक्त महो राजश्चातुरी ते वरीयसी // 56 // मालवाधीशपुत्रः क्व क्व चाहं चौरपुंगवः // राज्ञोक्तमसिमध्ये तु नामास्ति लिखितं तव // 57 // वत्स उवाच तत्सत्यं खङ्गोऽयं सदयस्य हि // वत्सं जित्वा गृहीतोऽस्ति स्वद्यूतकलया मया // 58 //
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________________ श्री सदैववत्स - हेतुना तेन हे राजस्तन्नामाप्यत्र वर्तते // तन्निशम्य नृपश्चैतन् मन्त्र्यादीनां पुरोऽवदत् // 59 // KE पृथिव्यां कोऽपि नास्त्येव सदयं यश्छलेन च // बलेन कलया जित्वा तस्यासिग्रहणे प्रभुः // 96 // नूनमेष कुमारोऽस्ति परमत्रातिलजितः // श्वसुरवर्गसद्भावान् नात्मा तेन प्रकाश्यते॥१॥ | अन्यस्य क्वेशी शक्तिपिंचाशझटानपि // जयेत् किंतु पितुः कोपाद् दृष्टापमान आगतः // 62 // त्रयः स्थानं न मुंचंति काकाः कापुरुषा मृगाः अपमाने त्रयो यांति सिंहाः सत्पुरुषा गजाः // 3 // एवंविधनृपोक्तानि निशम्य ते सभासदः॥ देव संभाव्यते सत्य मेवमेवेति चाबुवन् // 64 // ततो राजा जगादास्ति युक्तिः किं कापि सा यया // कथमपि विना युद्धं जीवन् सन्नेष गृह्यते॥६५॥ - महानदीप्रतरणं महापुरुषविग्रहम् // महाजनविरोधं च दरतः परिवर्जयेत् // 66 // विलोक्य निजशक्तिं च विधेयं कार्यमत्र वै // अशक्यानि च कार्याणि नैव कुर्याद विचक्षणः // 67 // मुख्यमंत्री निशम्यैतद् ब्रूतेस्म देव अस्ति हि // सुकरं ग्रहणं तस्य गजाग्रे सबलोऽपि किम् // 66 // स धनी यस्य भूभागो यस्याश्वास्तस्य मेदिनी // स जयी यस्य मातंगा यस्य दुर्गःस दुर्जयः // 69 // जयत्येकोऽपि हि गजो वाजिलक्षचतुष्टयम् // तस्माद् गजवलं यस्य कथं तस्य पराजयः // 7 //
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________________ ततः सर्वान् समानाय्य प्रत्येकं चैव हस्तिनः / / स्वैः स्वैः कुंभस्थलैः कार्यः प्राकारस्तद्धटात्मकः // 7 // | तत्र प्रक्षिप्य वीरोऽयं गृह्यते यदि तद्वरम् // इति मन्त्रिवचः श्रुत्वा सुष्ठपायो नृपोऽवदत् // 72 // | गजघटा समानीता तया वत्सश्च वेष्टितः // अथासन्ना विधीयन्ते हस्तिनस्ते शनैः शनैः // 73 // | | एवं वत्सोऽपि संकीर्णहस्तिमध्ये पपातह // क्वाधुना यास्यसि त्वं भो इत्युचुस्ते नृपादयः // 74 // | | हसित्वाथ कुमारः स सिंहनादं तथाऽकरोत् // त्रस्ता गजा यथाऽधावन् दिशोदिशं भयाकुलाः // 7 // हस्तिपकैः गजाः सर्वे ह्यंकुशैस्ताडिता भृशम् // अपि ते संमुखास्तस्य न बभूवुः कथंचन // 7 // यद्गजानां बलात्तस्य ग्रहणे हषों महानभूत् // नृपस्य ते ततो भीता दूरं याता गजा अपि // 7 // | अजासमूहवन्नष्ट्वा दुरं च करिणो गताः // अथ चिंतातुरं प्रोचु मन्त्रिणस्तेनृपं वचः // 7 // स्वामिन्नसौ प्रकारैः कैरपि धर्तुं न शक्यते // तन्निशम्य बभूवातिचमत्कृतमना नृपः // 79 // | सन्नाद्यायुधं त्यक्त्वा च पादचारेण भूपतिः // प्रवृत्तः सन्मुखं गंतुं कुमारस्य त्वरान्वितः // 8 // कुमारोऽपि तथा दृष्ट्वा स्वयं गत्वाथ प्राणमत् // यतश्च सुकुलोद्भूतो भंस्यति विनयानहि // 81 // नृपः सस्नेहमालिंग्य ज्ञात्वा वत्सं पराक्रमात् // स्वागतोदंतमापछद् बहुमानेन हर्षतः // 8 //
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________________ यो सदैववत्स तस्य पराक्रमं दृष्ट्वा पौरलोकाश्चमत्कृताः / अहोऽयं धीर इत्येवं जल्पति स्म परस्परम् // 3 // आत्मानं प्रकटीचक्रे न पूर्व कथमप्यसौ // स्वयं प्रकटयामास स्वात्मानमेव विक्रमात् // 84 // अकृत्वा पौरुषं या श्री विकाशिन्यपि किं तया // नरद्वोऽपि चाश्नाति दैवाद्भूमिगतं तृणम् // 85 // Ke पृष्टस्ततो भूपतिना कुमारो रूपं स वीराप्तिकंचुकस्य // विज्ञापयामास च तातकृत्यं मंत्रीरितं क्रोधवशादि सर्वम् // 86 // तच्छ्रुत्वा नृपतिः प्राह ह्यहोऽस्य पितुरद्भुतः // स्नेहो विलोक्यते पुत्रो यल्लोकोक्त्या वहिष्कृतः॥८॥ वत्सो जगाद हे राजन् कोऽपराधः पितुर्मम // विषयेऽस्मिन्नयं दोषो ह्यस्त्येव मम कर्मणः // 8 // जगति प्राणिनः सर्वे कर्मणां वशवर्तिनः // भुंजते तादृशं कर्म यादृशं समुपार्जितम् // 89 // प्रददात्युत्सवे शोकं शोके संमदसंपदम् / अन्यथा विदधत् सर्व बलीयः कर्म केवलम् // 90 // AE अवश्यंभाविभावानां प्रतीकारो भवेद्यदि // तदा दुःखैर्न बाध्यते नलरामयुधिष्ठिराः // 91 // राजाप्याह कुमारेन्द्र त्वयोक्तं सत्यमेव तत् // न पूर्वमर्जितं कर्म कोऽपि लंघयितुं क्षमः // 92 // लक्ष्मी माता पिता विष्णुः स्वयं च विषमायुधः // तथापि शंभुना दग्धः प्राककृतं केन लंध्यते // 93 //
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________________ उअणं भुवण क्वमण अच्छमणं तहयणादिवसंमि // सरस्सवितिन्नि दासा का गणणा इवरलोगस्स सभ्यास्ततोऽपरेप्रोचुः स्वामिस्तद्दष्टमंत्रिणः // कीदृशं चेष्टितं राज्ञा प्रोक्तमेवंविधाः खलाः // 9 // - सर्पः क्रूरो हि जीवेषु सास्क्रूरतरः खलः // मन्त्रौषधवशात् सर्पः खलः केनोपशाम्यते॥९५॥ राजोवाच ततो वत्सं सावलिंगा क्व मे सुता // आसन्नग्रामभट्टस्य गृहे स्थितेति सोऽवदत् // 16 // - तच्छ्रुत्वा भूपतिश्चाथ तामानेतुं सुखासनम् // स्वपुत्रं शक्रिसिंहं च प्रेषयामास सत्वरम् // 97 // ननाम सोऽपि गत्वा स्वां भगिनीं तत्र हर्षतः // त्वमजरामरो भूया इत्याशिषं ददौ च सा // 98 // | हसित्वा प्राह तां सोऽपि हे भगिनि वयं सदा // प्रसादादेव पत्युस्ते जाताः स्मो ह्यजरामराः॥९९ // तया विस्मितया पृष्टं भ्रातरेवं कथं वद // तदा तेनापि संप्रोक्तं सर्व युद्धस्वरुपकम् // 1000 // सावलिंगा ततो भ्रात्रा सह हर्षवती सती // सुखासनस्थिता द्रुतं प्रतिष्ठानपुरं गता // 1 // तत्रागत्य च सा स्वस्य ननाम पितरं मुदा // पितापि हर्षतस्तस्यै ददावित्याशिषं तदा // 2 // सुते सौभाग्ययुक्ता च सपुत्रायुष्मती भव // वत्सोऽथ प्रियया सार्द्ध तत्र सुखेन तिष्ठति // 3 // यावद्वर्षाचतुर्मासी सुखेन तत्र स स्थितः // ततो विचारयामास स्वमनसीति चैकदा // 4 //
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________________ सदैववत्स 72 चरित्रम् श्वसुरस्य गृहे वासश्चिरं श्रेयस्करो नहि // भवति तद्गृहे स्थित्या मनोदुःखं च जायते // 5 // लज्जया पारवश्यादि हेतुभिः सर्वदा सताम् // तथा लोकापवादश्च भवतीति बहु श्रुतम् // 6 // शिरसा धार्यमाणोऽपि सोमः सौम्येन शंभुना // सर्वदा कृशतां याति कष्टः खलु पराश्रयः // 7 // सैवं मनोविनोदाय विद्वद्गोष्ठीसुखप्लुतः // तदाति वाहयामास दिनानि कतिचित्तथा // 8 // संगीतं सुकवित्वं तांबूलं प्रियजनस्य संदेशः॥ सुचरित्र मिष्टगोष्टी नवरसवसतयः षडिमाः // 9 // | अन्यदासौ कुमारश्च श्लोकत्रयं समीरितम् // केनचित् कविनाऽौषीत् कर्णाभ्या मित्थमदभुतम् 10 मित्रवान् साधयत्यर्थान् दुःसाध्यानपि तद्युतः // तस्मान् मित्राणि कुर्वीत सामान्यानात्मनः खलु 11 आपन्नाशाय विबुधैः कर्तव्याः सुहृदोऽमलाः // न तरत्यापदं कश्चिद्यो मित्रेण विवर्जितः // 12 // | कुर्वीत बहुमित्राणि सबलान्यबलनिवा // गजराजो वने बद्धो मूषकेण विमोचित H // 13 // | उंदिरेण वने क्वापि गजराजः सखा कृतः // अथैकदा करी प्रीत्या प्राह तं मूषकं प्रति // 14 // भामूषक कमस्माक मुपकारं करिष्यसि // तेनोक्तं भो कदाचिद्धि कार्य स्याल्लघुनाप्यतः॥ 15 // असाध्यं गुरुभिः किंचित्कार्य कुर्याबघुः क्षणात् // व्यसाध्यं तमो भूमिगृहे दीपः क्षिपेन्न किम् // 16 //
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________________ वार्तालापेन संजाता प्रीतिरेवं तयोः सदा // मूषकश्च सदा तस्यानुगमनं करोति हि // 17 // एकदा करिराजोऽथ गजग्रहणलोलुपैः // तृणाच्छादितगर्तायां रचितायां पपात सः // 18 // Raबहुकालेऽप्यनायातं विलोक्य मूषकोऽधृतिः // विलोकितुं गजं द्रुतं बभ्राम स इतस्ततः // 15 // - क्रमेण तेन गर्तायां गजो दृष्टस्तथाविधः // विलोक्य मूषकस्तं च प्रवृत्तो रोदितुं तथा // 20 // गजेनोक्तं तदा मित्र प्रीत्या किं मे फलं तव // तच्छ्रुत्वा मूषकः प्राह भो मित्र शृणु मद्वचः // 21 // मोचयितुं ममाद्यैव त्वां समयोऽस्ति संकटात् // इत्युक्त्वा मूषको जातिं तत्राकारितवान्निजाम् // 22 // ते गजेन्द्र प्रति प्रोक्तं जातिभक्त वयं सदा // श्वान इव गजेन्द्र स्मो न निजजातिविद्विषः // 23 // इत्युक्त्वा मूषकाः सर्वे मिलिला ते स्वशक्तिभिः // निजपादैश्च गर्तायां घूलिपटलमक्षिपन् // 24 // रात्रेर्यामे चतुर्थे ते धूलिपटलपूरिता // गर्ता तेन गजो द्रुतं ततोऽपि बहिरागतः // 25 // कार्यकरा भवत्येवं समये लघवोऽपि हि // इति विचार्य तेनैकः सज्जनः स्वसुहृत्कृतः॥२६॥ एकं मित्रममित्रेषु ह्येकं सूनुमसूनुषु // एकं नेत्रमनेत्रेषु जगमित्राणि तत्कुरु // 27 // श्रुत्वेत्थं वृद्धवाक्यं स श्लोकस्थार्थ विचार्य च // चकार त्रिणि मित्राणि साहसबलवन्ति च // 28 //
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________________ चरित्रम् श्री सवार इह जगति मित्राणि चतुर्धा च भवंति हि // तेषु मित्रद्वयं सर्वेः खीकर्तव्यं सदा यतः // 29 // त्यजेन्मालासमं मित्रं त्यजेन् मित्रं तुलासमम् // न त्यजेन् मेरुसदृशं नदीतुल्यं च न त्यजेत् // 30 // विचार्येति कुमारेण वणिविप्रौ तृतीयकः // क्षत्रियः सुपरीक्ष्येवं तदा मित्रत्रयं कृतम् // 31 // ते त्रयोऽपि कुमारेण सुहृदोऽथ दिवानिशम् // साई गच्छन्ति तिष्ठन्ति चानुकूल्येन हर्षतः // 32 // यतो धनादिभिः पूणे सदौदार्यगुणेन च // प्रख्यातकीर्तिके तस्मिन् के नेच्छंति हि मित्रताम् // 33 // द्रविणैः कृपणो याति सेव्यतां महता मपि // सेव्यः स्वर्णाद्रि रुन्निद्रैः किं सदैव न दैवतैः // 34 // KET सरोऽपि मेरुं परितो भ्रमन्नो स्वर्णस्य मासं लभते कदापि॥ तथापि नो मुंचति तत्समीप माज्ञा बलिष्ठा किल जंतुवगें // 35 // धनवान् जडचित्तोऽपि भुवि कैः कै नै सेव्यते // जलैः पूर्णस्तटाकोऽत्र सेव्यते विश्वजंतुभिः // 36 // अथैकदा कुमारस्य स्वस्थाने सुस्थितस्य च // नानाविधसुखाप्तस्य प्राप्तो वैदेशिको जनः // 37 // भ्रमणाद्दहुदेशेषु वीक्षिताश्चर्यसंततिः॥ आगतं सहसा दृष्ट्वा तं वत्सः परिपृच्छति // 38 // भवान् कुतः समायातो वद त्वं भो महामते // तुंबवनपुरादत्र तेनोक्त मागतोऽस्म्यहम् // 39 //
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________________ - वत्सेनोक्तं त्वया तत्र दृष्टं किमपि कौतुकम् // काप्यपूर्वा श्रुता वार्ता भवेन्चेन्मे तदा वद // 40 // अनेकदेशदृश्वानो विविधाश्चर्यदर्शिनः // यतो नरा भवंति हि श्रुत्वेति सोऽवदत्ततः // 41 // - भो कुमार मया दृष्टं तत्रैकं कौतुकं महत् // तच्च शृणु पुरे तस्मिन् नेको धनपतिर्महान् // 42 // व्यवहारी द्विधा चापि यथार्थनामकः स्वयम् // वसति स्म सदा कुर्वन् व्यापारं सर्वतोऽधिकम् // 43 // | तस्य पिता मृतो वृद्ध श्चितायां ज्वालितोऽपि सः // गृहमध्ये समागत्य प्रातः सुप्तः पुनस्तथा // 44 // प्रज्वालितः पुनः सोऽपि तागत्य निजेगृहे // तथा सुप्तः पुनारात्रौ जातमेवं पुनः पुनः // 45 // वर्षमेकमभूत्तस्य कुर्वतश्च गतागतम् // तत्पुरे कोऽपि विद्यावान् नास्ति यस्तं निवारयेत् // 46 // | अस्ति दृष्टं मया तत्र ह्येवं भो वत्स कौतुकम् // चिंतयत्येतदाकर्ण्य कुमारोऽतिचमत्कृतः॥४७॥ | अदृष्टा वर्तते नून मियं वार्ता न कर्हिचिद् // मया दृष्टा श्रुता पूर्व मतो दृष्टुं समुत्सुकः // 48 // | ततः सर्वमनापृच्छय कौतुकालोकनोत्सुकः॥ मित्रत्रययुतस्तत्र वत्सोऽसौ नगरे गतः // 49 // यत उक्तं जना ये वै कौतुकालोकनार्थिनः // तेऽलसा न भवंत्येव चित्तेऽतीव चमत्कृताः॥५०॥ अथ तत्र पुरे पूर्व प्रवेशाचिंतितं च तैः // अभुक्त्वा नगरे नूनं नहि गम्यं कदाचन // 51 //
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________________ चरित्रम् 34 हृदये वृद्धवाक्यं तद् विधाय नगराइहिः // भोजनाय स्थले क्वापि पेचुस्ते धान्य मुत्तमम् // 52 // श्री सदैववत्स ततो भुक्त्वा च ते स्वस्थीभूता उक्तमतोऽग्रगैः // स्मरणपथमायाति कार्य भुक्तेरनंतरम् // 53 // लज्जा स्नेहः स्वरविशयता बुद्धयः सौमनस्यम् // प्राणोऽनंगवचनसमता दुःखहानिर्विलासाः // 54 // धर्मशास्त्रं सुरगुरुनतिः शौचमाचारचिन्ता // शस्यैः पूणे जठरपिठरे प्राणिनां संभवन्ति // 55 // पटहस्य ध्वनिश्चागात् तेषां कर्णपथे तदा // वदत्येवं जनस्तत्र पटहध्वनिकारकः // 56 // वणिग्धनपतेर्यो वै पितरं ज्वालयिष्यति // तस्य निजां सुतां स्वर्णलक्षयुतां स दास्यति // 57 // एवंविधध्वनिं श्रुत्वा पटहं स्पृष्टवांस्तदा // स्वमित्रं सदयः प्रेष्य पूर्व ज्ञातस्वरूपकः // 58 // ज्वालं ज्वालं स खिन्नश्च पितरं बहुदुःखितः // ततो वत्सं समित्रं तं स्वगृहे स समानयत् // 59 // गच्छताथ कुमारेण स्त्रीणां गीतिसमुन्नवः // महान् कलकलः श्रुतः पथ्येकस्मिन् गृहे तदा // 6 // Ke पृष्टं तदा कुमारेण तं व्यवहारिणं प्रति // मंडित मस्ति भो श्रेष्ठिन् किंकिमप्यत्र मंडलम् // 6 // Ka यदेवं श्रूयते स्त्रीणां गीतकोलाहलध्वनिः // धनपतिरथोवाच शृणु त्वं भो नरोत्तम // 62 // अस्यापि शंकरारव्यस्य मद्वद् विप्रस्य मंदिरे / मंडितमंडलस्यास्य वर्षमेकमजायत // 3 // 70
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________________ K, पृष्टं तेन कुमारेण स्वगृहे केन हेतुना // मंडलमत्र तेनापि मंडितमस्ति तद्वद // 64 // - व्यवहारी जगादास्य सुता विप्रस्य वर्तते // सुंदरीनामधेयका यथास्ति सुरसुंदरी // 65 // अस्ति चन्द्रमुखी सा च निलाब्जपत्रलोचना // बन्धूकुसुमवद्रक्तकांतदन्तच्छदाशया // 66 // दुष्टसीकोतरीग्रस्ता सर्वदा सा विचेष्टते // मोचनाय ततस्तस्या उपाया वहवः कृताः // 67|| प्रतिकाराँश्च कुर्वन्ति भूयसो मंत्रवादिनः // परं सीकोत्तरी सा तां मुञ्चति न कथंचन // 6 // तेन भुक्ते न सा कन्या नच शेते महीतले // उपविश्यैव खटवायां त्यक्तलजा च तिष्ठति // 69 // स्वरक्तलोचनान्यां च सा सर्वान्भापयत्यपि // प्रत्यहं गीतगानादि कारयत्यंगनाजनात् // 70|| यदि तस्याः समीपे न कापि गायति सा तदा // भृकुटी भीषणां कृत्वा ब्रूते पित्रादिकं प्रति // 7 // रे ममाग्रे न यूयं चेद् गायनं कारयिष्यथ // तदाहं मारयिष्यामि सर्वान् संमद्य सत्वरम् // 72 // | तेनाग्रे गायनं तस्याः कारयतोऽस्य सांप्रतम् // वर्षमेकमभूत्तस्मादतिरिवन्नो द्विजोत्तमः // 73 // | पटहोद्घोषणापूर्व लोकानां भाषते पुरः // कोऽपि जन इमां पुत्रीं मम सज्जीकरिष्यति // 7 // तस्यैतां मम दास्यामि स्वर्णलक्षयुतां सुताम् // परमद्यापि तां कोऽपि सज्जीकर्तुं नहि प्रभुः // 75 //
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________________ श्रो सदैववत्सा चरित्रम् | व्यवहारिमुखात्तस्याः श्रुत्वा वृत्तान्तमेव तत् // तेनोक्तं भो गृहे पश्चादायास्यामि धनिस्तव // 7 // पूर्वमस्य गृहे गत्वा मुक्तां सीकोत्तरीगृहात् // विधास्ये सत्वरं चैनां तच्छ्त्वा धनिकोऽवदत् // 77 // भो नरोत्तम तत्रापि यास्यसि त्वं पुनः कुतः // तत्र तु तेऽपि सामर्थ्य स्वल्पं न प्रभविष्यति // 7 // मंत्रविनिरनेकैः सा ह्येषाऽसाध्यप्रतिक्रिया // कृत्वेत्यस्ति परित्यक्ता तच्छ्रुत्वा सोऽवदत्ततः // 79 // शृणु त्वं भो महाश्रेष्ठिन्नल्पशक्क्या कदापि मे // तस्या अप्युपकारःस्यात्तथा कार्यो मया खलु // 8 // | भविष्यत्यन्यथा नो चेत् कौतुकस्य विलोकनम् // अतो वरतरं तत्र दृश्यते गमनं मम // 8 // इत्युक्त्वा स कुमारोऽथ तेनैव व्यवहारिणा // ब्राह्मणस्य गृहे तस्य जगाम सत्वरं मुदा // 8 // | हरसिद्धिं ततः स्मृत्वा यावन्निजमनस्यसौ // याति तस्याः पुरस्तावत् तेजो दृष्टं तदंगजम् // 3 // | सोढुमशक्तया शीघ्रं तयाथ भयभीतया // बझवांजलि कुमारस्य पादयोः प्रणतिः कृता // 8 // | कुमारः प्राह रे दुष्टे ब्रह्मस्त्रीबालघातिनि // अपसर द्रुतं दूरे इत्युक्तवा सा गले धृता // 85 // आच्छोटय पातिता भूमौ समुत्थाय तदा पुनः // सा कुमारं प्रति प्राह दास्यस्मि नरोत्तम // 86 // अतो मारय मा मां त्वं ब्रूते वत्स स्तदा च ताम् // यावद्दष्टे स्वया वर्ष वराकीयं च कीलिता // 87 //
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________________ सातीवपीड्यमानास्ति त्वया भोगाश्च त्याजिताः॥ कुटुम्बं दुःखितं दृष्ट्वा नोत्पन्नः करुणालवः // 8 // मारणार्हसि नूनं त्वं तेन रे दुष्टचारिणि // मुंचेमां त्वं द्रुतं नो चेत् छेत्स्यामि कर्णनासिकम् // 89 // ततः सीकोत्तरी प्राह भीता सा जातवेपथुः // अहमेनां विमुंचामि यास्यामि च नरोत्तम // 10 // आयास्यामि पुनर्नाह मित्युक्त्वा तच्छरीरतः // क्षणादेव गता दुरे नष्ट्वा सा दुष्टचारिणी // 91 // ततश्च ब्राह्मणी सज्जा तदैव सा बभूव ह // उत्थाप्य मंडलं तेन गायनाश्च विसर्जिताः // 12 // | पित्रा बालापि सा स्नानानंतर भोजिता द्रुतम् // सकुटुंबो द्विजो हृष्टस्तुष्टाव सदयं तदा // 93 // - अद्य मे सुबहोः कालात् श्लाधनीयमभूदिदम् // त्वत्पादपद्मसंस्पर्शसंपन्नानुग्रहं गृहम् // 94 // ब्राह्मणेनाथ सा पुत्री कुमाराय समर्पिता // वत्सेनापि स्वमित्राय द्विजाय परिणायिता // 95 // - दत्तं द्विजेन वत्साय स्वर्ण लक्षमितं तदा // एतद् दृष्ट्वा धनी सर्व स्वचित्ते तिचमत्कृतः // 96 // वत्सं विज्ञापयामास द्रुतं गत्वा गृहे मम // ममापि तन्महद् दुःखं स्फेटय कृपया तथा // 97 // - सह तेन कुमारोऽपि ततो द्रुतं गतो गृहे // दर्शितः स्वपिता तस्मै स्वगृहे व्यवहारिणा // 98 // सुप्तं मृतकरूपं तं दृष्ट्वोक्तं तेन भो धनिन् // प्रज्वालयामि यद्येनं तदा किं मम दास्यसि // 99 //
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________________ चरित्रम् श्री सदैववस 76 श्रेष्ठी जगाद हे वत्स प्रज्वालनेन किं भवेत् // यावत्सोऽयं मया वर्ष प्रज्वालितो बहु बईः // 1100 // प्रज्वालितः पुनश्चायं गृहे मे नागमिष्यति // सुवर्णस्य द्विलक्षी स्वां सुतां दास्याम्यहं तदा // 1 // वरमुक्त्वा कुमारस्तं शवं लात्वा दिनान्तगे // रवौ मित्रैः समं गच्छन् श्रेष्ठिनं प्रत्युवाच भोः // 2 // पितुरन्तिमसंस्कारान् कर्तुं त्वं चंदनादिकम् // कर्पूरागुरुयुक्तं च समानय शुभेच्छया // 3 // श्रेष्ठिनोक्तमरे थाह मानयनेन सर्वथा // भग्नोऽस्मीति वचः श्रुत्वा तेनोक्तं शृणु मद्वचः // 4 // | पूर्वेषां सदृशो नाहं ज्वालकानां कदाचन // तच्छ्रुत्वा श्रेष्ठिनानीय द्विगुणं तत् समर्पितम् // 5 // कथितं च कुमाराय श्रेष्ठिना भोनरोत्तम // प्रज्वाल्य कथमप्येनं नागच्छेच्च तथा कुरु // 6 // ज्वालं ज्वाल महं त्वेनं निर्विण्णोऽस्मि भृशं खलु // तेनोक्तं कुरु मा चिंतां समीचिनं भविष्यति // 7 // कुमारोऽथ स्वमित्रैः स गृहीत्वा तं शवं ततः // श्मशानस्य गतो भूमौ संध्या च तावताऽभवत् // 8 // कुमारश्च ततः स्वस्य प्राह मित्रत्रयं प्रति // श्मशानेऽत्र वसंत्येव प्रबला व्यंतरादयः // 9 // संभाव्यते विदं नूनं व्यंतराधिष्ठितं शवम् // अस्य समीचिनं नास्ति प्रज्वालनं ततोऽधुना // 10 //
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________________ एनं मुक्त्वा ततोऽत्रैव तु प्रतिप्रहरं वयम् // जागरणं करिष्याम अन्यथैतत् पुनस्तथा // 11 // Ke चतुरो वंचयित्वाऽस्मान् व्यंतराधिष्ठितं शवम् // यास्यतीति कुमारस्य स्वीकृतं वचनं चतैः // 12 // तत्राथ प्रथमे यामे तेषां मध्याद् वणिक्सुतः // जागर्त्यपि त्रयः सुप्तास्तदाऽभूत् कौतुकं महत् // 13 // KE दूरे कस्याः श्रुतस्तेनाऽपि स्त्रियो रुदनध्वनिः // वणिक्पुत्रेण तच्छूत्वा चिंतितं चात्रकाऽधुना // 14 // | करोति रुदनं रात्रौ विलोयकाम्यहं च ताम् // ततोऽसावुत्थितस्तस्मात् स्वचित्ते चिंतयन् पुनः॥१५॥ अत्रैव मृतकं शुन्यं मुक्वा यास्यामि चेदहम् // तदेदं वंचयित्वा मां पुनः पश्चात् प्रयास्यति // 16 // विचायति शवं तं स बद्धवा पृष्टे स्वयंतदा // ययौ तत्रानसारेण महिला रुदनध्वनेः // 17 // शुलीप्रोत मथैकं स तत्र चौरं ददर्श ह // करोति महिला चैका तत्पार्श्वे रुदनं महत् // 18 // Ka महिलायाः करे तस्या घृतपूरादिभोजनैः // स्थालोऽस्ति संभृतस्तां स दृष्ट्वा पृच्छति सत्वरम् // 19 // निशाया मंगने कासि करोषि रुदनं कथम् // त्वयानीतं कुतः स्थाले घृतपूरादि भोजनम् // 20 // एवं तस्य वचः श्रुत्वा तया प्रोक्तं शृणोतु तत् // वृत्तांत मेष शुलाया मारोपितोऽस्ति मे पतिः // 21 // जीवति सांप्रतं चायं तत्स्नेहवशगाऽऽगता // तस्य भोजनदानाय करोमि किं परं त्वहम् // 22 //
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________________ श्री सदैववत्स 77 ME अतीवोद्धं स्थितः स्वामी प्रलंबितकराप्यहम् // तन्मुखे भोजनं दातुं समर्था न भवाम्यतः // 23 // | करोमि रुदनं चाहं श्रुत्वा वृत्तांत मेव तत् // तेन दयालुना प्रोक्तं सुंदरि शृणु मद्वचः // 24 // मम स्कंधं समारुह्य पतिं सुखेन भोजय // स्कंधोपरि समारूढा तच्छृत्वा सा द्रुतं तदा // 25 // | वणिकपुत्रस्य तस्यैकः कियत्कालादनंतरम् // पतितो मांसखंडश्च स्कंधे तेन चमत्कृतः // 26 // | उद्धं पश्यत्यसौ यावत् तावत्तच्चौरदेहतः // छित्वा मांसस्य खंडांश्च दृष्टा सा भक्षयंत्यपि // 27 // | भुमावास्फालयामास रुष्टो सौ तां वणिक्सुतः // उत्थाय भुमितः सापि द्रुतं लग्ना पलायितुम् // 28 // | तस्याश्च छेदितो हस्त स्तेनैकः स्वासिना तदा // भुमिगतं करं हस्ते गृहीत्वा पश्यति स्वयम् // 29 // | तावददर्श तं रत्नसुवर्णकंकणान्वितम् // चिंतित मप्ययं नूनं महर्धिकस्त्रियः करः // 30 // | वालुकायां करं छिन्नं संगोप्य स पुनः स्थितः // स्वस्थाने मृतकं मुक्तं तेनोत्तार्य पुनश्च कौ // 31 // | द्वितीयप्रहरे विप्रो जागृतोऽथ वणिकसुतः // सुप्तस्तावत्समायातो राक्षसः श्यामदेहकः // 32 // तस्याग्रे सप्ततालोच्चो भूत्वाथ चलितः पुरम् // गच्छन्तं तेन दृष्ट्वा तं ब्राह्मणेन विचिंतितम् // 33 // पश्यामि क्वैष यातीति सोऽपि साहसिकस्ततः // स्वपृष्टे मृतकं बद्धवाऽनुजगाम च राक्षसम्॥३४॥
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________________ भूपतिभुवने गत्वा राज्ञः सुतां स राक्षसः // शीघ्र मेव समादायाथ पश्चाद्वलितस्ततः // 35 // Ke पर्वतस्य गुहायां तां मुक्त्वा द्वारे स्वयं स्थितः // प्रार्थयामास कामांधः सँश्चाटुवचनैश्च सः // 36 // K नहि मेने परं सा तु कथमपि तदाग्रहम् // ततोऽसौ राक्षसो रुष्टो वक्ति राज्ञः सुतां प्रति // 37 // | यदि न मन्यसे दुष्टे तदा ते स्मर रक्षकम् // अधुना तव छेत्स्यामि मस्तकं च ममासिना // 30 // | अथ राक्षसपृष्टेऽपि प्रच्छन्नं स द्विजः स्थितः // विलोकयति तत्सर्वं राक्षसस्य विचेष्टितम् // 39 // पश्यति राजपुत्री च तं सन्मुखस्थितं द्विजम् // परंतु राक्षसः पृष्ट स्थितं द्विजं न पश्यति // 40 // ततो राजकुमार्योक्तमात्मना यस्तृतीयकः // ममात्र शरणं सोऽस्तु तेनेति तद्वचः श्रुतम् // 41 // यावत् स राक्षसः पश्चाद् लोकयति तदा द्विजः॥ जघान स्वासिना दुष्टं पंचत्वं च ततोऽगमत् // 42 // | एवं तं राक्षसं दुष्टं मृतं विज्ञाय सा सुता // नृपस्यातीव हृष्टाऽभूत ततो विप्र उवाच ताम् // 43 // | सुंदरि वद सत्यं त्वं कासि कस्य सुतासि च // सा प्राह विक्रमस्यास्मि लीलावत्यभिधा सुता // 44 // तच्छ्रुत्वा तां समाश्वास्य द्रुतं मुमोच तद्गृहे // ततः पश्चात् समागत्य मुक्तं तन्मृतकं च कौ // 45 // स्वमित्रस्य स्थितः पाश्वे पूर्णो यामोऽभवत्तदा // क्षत्रियस्य सुतो यामे तृतीये जागृतोऽथ सः // 46 //
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________________ श्री सववत्स चरित्रम् 78 / सुप्ताः शेषा स्त्रयः सन्ति तृतीयाहरेत्य ते // स्वसाधैं प्रथमं नीतो ह्यग्नि निर्वाणतां गतः॥४७॥ क्षत्रियेण ततस्तेन चिंतितं पावको यदि // विध्यातोऽस्य तदापातालनं केन संभवेत् // 48 // अतोऽग्नि मानयामीति कुतश्चित् स्थानतोऽधुना // क्षत्रियोत्थ विमृश्यैवं पश्यति स इतस्ततः // 49 // Ka तावत्तेन दूरे दृष्टः प्रज्वलन् पावको महान् // ततस्तन्मृतकं बध्वा सोऽपि तत्र ययौ तथा // 50 // तत्राथ मिलिता दृष्टा स्तेन च बहवो भूताः // ते क्षिप्रचटिकां प्रोढे मृत्पात्रे च पचंति हि // 51 // परितश्चोपविष्टास्ते सर्वे तत्र महाखलाः // किंचिद् दूरे च तैर्बद्धाः पुरुषाः सप्त रज्जुभिः // 52 // कुर्वति रुदनं ते च पीडया करुणस्वरम् // महासाहसवान् सोऽथ सजोऽभूत् क्षत्रियस्तदा // 53 // तान् प्रति धावितो लात्वा चुल्हकादेक मुल्मुकम् // भयभीतास्तदा सर्वे भृता नष्टास्ततः स्थलात्५४ साहसिकं जनं कोऽपि न पराभवितुं प्रभुः // साहसमपि कर्तव्य मित्युक्तं समये यतः // 55 // उद्यमः साहसं धैर्य वलं बुद्धिः पराक्रमः॥ षडेते यस्य विद्यन्ते तस्माद्देवोऽपि शङ्कते // 56 // तत् क्षिप्रचटिकापात्रं भग्नं तेन ततोऽश्मना // सप्तापि पुरुषास्तेन कृतास्ते मुक्तबन्धनाः // 57 // प्रणेमुस्तेऽतिहण पतित्वा तस्य पादयोः॥ क्षत्रियेण ततस्तेभ्यः पृष्टं तेषां स्वरूपकम् // 18 //
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________________ के कुमारवरा यूयं बद्धा आसंश्च तैः कथम् // तदाकाथ ते प्रोचुः शृणु त्वं भो नरोत्तम // 59 // Ka कुमाराः स्मो वयं सर्व नगरस्यास्य भूपतेः॥ हठादानीय बद्धाः स्मो भूतै रत्र वयं च तैः // ५९अ॥ तेषां शाकपदेऽस्माकं कर्तु मिच्छा तु भोजने // आसीत् परं वयं मुक्ताः कृपालो बन्धनात्त्वया // 60 // | जीवितव्ये परं चातःप्रसादोस्ति तवैव नः // क्षत्रियेणाथ ते मुक्ताः प्रासादे नगराबहिः // 61 // | स्वस्थाने ते ततः प्राप्ताः क्षत्रियोऽपि गतश्च सः॥ सुहृदो यत्र सुप्तास्ते श्मशाने तत्र सत्वरम् // 6 // | सुहृदस्ते त्रयोप्येवं स्वस्वं नैव परस्परम् // वृतान्तं कथयामासुः पूर्णोऽभूत् प्रहरश्च सः // 63 // | सदयोऽथ समुत्तस्थौ चतुर्थप्रहरे स्वयम् // सुप्ताः संति त्रयोऽपि ते तदाऽभूत् कौतुकं महत् // 6 // इतस्तन्मृतकं प्राह चोत्थाय सदयं प्रति // भो पुरुष मया साधे द्यूतं त्वं रमसे नवा // 65 // | सदयः प्राह वेताल प्रतिज्ञास्ति यथा मम // इति कोऽपि संग्राम द्यूतं वा प्रार्थयत्यपि // 66 // | तस्य न प्रार्थनाभंगो विधेयो हि कदा मया // द्यूतक्रीडां करिष्यामि तेनाहं तु त्वया सह // 6 // परं तु सारिकापटं नास्ति तद्रम्यते कथम् // तदोक्तं मृतकेन त्वं मुंच मामानयाम्यहम् // 6 // कौतुकिना कुमारेण चोक्त मेवं तदा कुरु // परं तु पूर्ववत् पश्चाद् गमनं ते न चेद्भवत् // 69 //
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________________ श्री सदैववत्स चारत्रम तदा मुंचामि वेताल मृतकं प्राह तं ततः॥ अत्रस्थ आनयिष्यामि त्वं न मुंचसि मां यदि // 7 // उवाच विस्मतो वत्सः कुरु तर्हि त्वमेव तत् // तेनाथ मृतकस्थेन वेतालेनाद्भुतं कृतम् // 7 // स्वर्णस्य पट्टिकां स्वर्णसारिकाः पाशकादिकम् // विधाय प्रति लंबं स्वं बाहुमानीतमग्रतः // 2 // आनीयाथ कुमारस्य हस्ते दत्त्वाऽवदच्च तम् // कुमार अधुना द्यूतं रमस्व त्वं मया सह // 73 // चिंतयत्यथ वत्सोऽसौ वेतालो मृतके स्थितः॥ वदत्यस्य पुनर्गतुं गृहे शक्तिर्विभाव्यते॥७४॥ अतश्चेदेष वेताल एव निगृह्यते मया // वरं तदैव विचार्येति कुमारः प्राह तं प्रति // 75 // गुह्यक रम्यते नास्ति पार्श्व मे पणमोचनम् // तदा ब्रूते स वेतालो ह्यसिरेव पणेऽस्तु ते // 76 // उवाचाथ कुमारोऽसावपरेण पणेन किम् // आवयो मस्तके एव सुखेन भवतां पणे // 77 // तच्छ्रुत्वा मृतकस्थेन वेतालेन विचिंतितम् // ग्रहीष्यामि शिरोऽस्यैव जित्वा तं दिव्यशक्तितः // 78 // | चिंतितं तु कुमारेण वेतालस्यास्य मस्तकम् / / ग्रहीष्याम्यह मेवाद्य हरसिद्धिप्रभावतः // 79 // स्वस्वचित्ते विचिंत्यैव मारब्धं यूतकं तदा // कुमारेण जितं तस्य मस्तकं शक्तिशक्तितः॥ 8 // वत्सेन स्वासिना छिन्नं मस्तकं तत्र संस्थितः // वेतालो व्यंगदेहत्वान् नष्ट्वा दूरे गतस्तदा // 1 //
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________________ आधाररहितं द्रुतं पपात को कलेवरम् // वत्सेनावसरं प्राप्य ज्वालितं मृतकं तदा // 8 // भस्मीभूतं क्षणेनैव शुष्करंडककाष्ठवत् // सात्विकानां तु दुःसाध्यं किमस्ति भूतले यतः // 83 // प्रभाता रजनी तावत् सूर्यो भूमौ समुद्ययौ // उत्थिताः सुहृदस्तेऽपि कुमारं प्रति चाब्रुवन् // 84 // प्रज्वाल्यतेऽथ भोमित्र मृतकं यत्समाहृतम् // तस्य प्रज्वालितस्याभूहह्वी वेलेति सोऽवदत् // 85 // प्राहुस्तेऽथ त्वया कस्मात्तदा नोत्थापिता वयम् // वत्सेनोक्त मियत्कायें बहुनां किं प्रयोजनम् // 86 // ततस्ते सुहृदः सर्वे स्नानं कृत्वा स्वकं स्वकम् // अन्योन्यं रात्रिवृत्तान्तं कथयंतो गृहे गताः॥८॥ तैः प्रोक्तं चाथ भो श्रेष्टिं स्त्वमस्माकं स्वकन्यकाम् // स्वर्ण लक्षद्वयं चैव देहि कार्यमभूत्तव // 8 // श्रीष्टिप्रष्टस्तदाऽजल्पदेव मेवं भवद्वचः // सत्यं चेदर्पयिष्यामि परं न ज्ञायतेऽत्र किम् // 89 // कियतीभिः सुकन्याभिर्डिलक्ष्यः मृतकस्य तु // अभाविष्यन् मया दत्ता यतः सर्वे रियत् कृतम् // 10 // आगत्य मृतकं चेदं स्वापिष्यति गृहे पुनः // अतोऽस्य प्रकटं रूपं कल्ये विज्ञास्यते खलु // 91 // KE उक्तं तदा कुमारेण दिनानीयंति ते गृहे / समागतं पुनश्चातः परं नैव भविष्यति // 92 // | श्रेष्टी प्रोचे तदा पान्थाः पूर्वे रप्येव मेव मे // प्रोक्त मासीत्तथाप्येतत् पुनः स्थितं गृहे मम // 9 //
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________________ श्री सदैववत्स चरित्रम् तेन दास्ये भवद्भयो यद् देयमस्ति श्वरेव तत् // तच्छत्वा कथयामासुः श्रेष्ठिनं प्रति ते वचः // 94 // श्रेष्टिन् वयं तु पांथाः स्मःश्वः कस्य त्वं च दास्यसि॥ ज्ञायते नैव चास्माकं कुत्र वासो भविष्यति॥१५॥ मागें गढद्भि रस्माभि रेतत्कार्य कृतं तव // अस्मभ्यं देहि तत्सर्व त्वयोक्तं च ततोऽधुना // 96 // श्रेष्ठिनोक्तं बलात्काराद् यूयं चेत्तद्ग्रहीष्यथ // तदाधुना गृहतिं तदित्येवं कलहोऽजनि // 9 // दुर्बलानामनाथानां महाकलहकारिणाम् // उपद्रुतानां स्तेनाद्यैः सर्वेषां पार्थिवो गतिः 98 // विचार्येति ततः श्रेष्ठी गतः पावें महीपतेः // मृतकज्वालनं सर्व कथयामास भूपतिम् // 99 // / अपरं च महाराज बहुभिर्जालनं कृतम् // आगच्छति परत्वेव पिता पुनः पुनर्गहे / / 1200 // एतैश्च ज्वालनं तस्य कृतमद्यैव भूपते // द्रव्यमयैव तदेयं कन्यादि मार्गयंति च // 1 // कथयामि च तेभ्योऽहं यत् कल्ये चेत् पुनर्नहि // आगमिष्यति युष्मभ्यं देयं दास्ये ह्यहं तदा // 2 // अथ श्रेष्ठिवचः श्रुत्वा भूपतिः प्राह तान् प्रति // युक्तमेवास्ति भोःपान्थाः श्रेष्ठिना कथितं वचः॥३॥ कुमारः प्राह हे राजन्नाहं पूर्वसमः खलु // राज्ञोक्तं तर्हि भो मंत्रिन् नवं किं ज्वालने तव // 4 // स आह हे महाराज प्रकारोऽपूर्व एव मे // राझोक्तं तर्हि वृत्तांतं सविस्तरं निवेदय // 5 //
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________________ तदा तैरपि वृत्तांतं स्वं स्वं प्रोक्तं तदन्तिके // राजा जगाद भोमंत्रिन् प्रत्येमि वचनान्नहि // 6 // अभिनवसेवकवचनैः प्राघूर्णकोक्तैर्विलासिनीरुदितैः॥धूर्तजनवचननिकरै, रिहकश्चिदवंचितो नास्ति॥७॥ ततः किमपि वः पार्श्वेऽभिज्ञानं चेद् भवेत्तदा // तदर्शयत येनाहं सत्यं मन्ये भवद्वचः॥८॥ नृपस्येतिवचः श्रुत्वा प्रथमप्रहरे च यः // जागरितो वणिक्पुत्रः समानयच्च तं करम् // 9 // रत्नेन जटितं चापि सुबर्णकंकणान्वितम् // नृपाय दर्शयामास राजापि विस्मितोऽभवत् // 10 // राजोवाच करं दृष्ट्वा पट्टराझ्याः करो मम // आभरणान्यतः संति कारितानि करे मया // 11 // ततोऽतिश्रद्दधानस्तां राज्ञामाकारयन्नृपः // दासी प्रेष्य तदा दासी द्रुतं गत्वा समागता // 12 // प्रोवाच सा महाराज राज्ञी वासे न विद्यते // राजा गवेषयामास सर्वत्र तां चमत्कृतः // 13 // परं क्वापि न सा लब्धा राजाथ चिंतयत्यपि // नूनं राज्ञी मदीया या सीकोत्तरिरभूञ्च सा // 14 // एतदपि वरं जातं नानया नक्षिता वयम् // ईदृशी यदि दुष्टा च गता गच्छतु सा तदा // 15 // - अहो स्त्रीणां चरित्रं तु ज्ञातुं प्रज्ञोऽपिन प्रभुः // यतःज्ञास्त्रेषु विद्वद्भिस्तच्चरित्र मुदाहृतम् // 16 // ME रविचारअं गहचरियं ताराचरियं च राहुचरिअं च॥ जाणंति बुद्धिमता महिला चरियं न जाणंति //
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________________ श्री सदैववत्स // विहविलसियाण खलमासियाण तहकूमहिल चरिआणं // // मणचिंति आरपारं जाणइ जश् होइ सव्वन्नू / / राज्ञोऽग्रे मन्त्रिणा प्रोक्तं स्वामिन् स्त्रीणां चरित्रकम् // दुरधिगम्य मेवास्ति शृणु शास्त्रे प्रदर्शितम् // 17 // श्रीपुरेऽभून् महाश्रेष्ठी यथा श्रीपतिनामकः // अकदा देहचिंताथै स्वयमेव बहिर्गतः // 18 // ki तेनेकं पतितं दृष्टं कुत्रचिन्नृकपालकम् // तत्रास्त्ययं नरो जीवन् शतनृवधकारकः // 19 // भविष्यति मृतोऽयं त्वेकोत्तरशतघातकः // विधिना लिखिता तेन लिपि दृष्टा च वाचिता // 20 // KE तदा तेन कपालं तत् कौतुकाक्षिप्तचेतसा // दुकूलवेष्टितं कृत्वा क्षिप्रं क्षिप्तं करंडके // 21 // समानीय गृहे प्रोक्तं भार्यायै तेन हे प्रिये // त्वया नोद्घाटनीयोऽयं कदापीति करंडकः // 22 // उद्घाटितः करंडोऽथ प्रच्छन्नमेकदा तया // तन्मध्ये चैतया दृष्ट्वा नृकपालं विचिंतितम् // 23 // ka नूनं मत्स्वामिनोऽतीव वल्लभाया इदं स्त्रियः // कस्याश्चित्तु मृतायाश्च संभाव्यते कपालकम् // 24 // तत्प्रेमप्रतिबद्धेन तेनेदं च करंडके // दुकूलवेष्टितं कृत्वा रक्षितं सुप्रयत्नतः // 25 // ति विद्यार्य कोपेन ज्वालितं चुल्हके तया // तस्य रक्षां पयोमध्ये क्षिप्त्वा पीतं च तत्पयः // 26 //
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________________ | सा च तेन सगर्नाऽभूत् परिणतं च तत्र तत् // तद्रसभावितो गो भूत्वा कालेन निर्गतः // 27 // KE कमलाख्यः सुतो जातो यौवन माप्तवान् क्रमात् // व्यापाराय गतो दूरे क्रमेण कनके पुरे // 28 // इतश्च नगरे तस्मिन् कनकसेनभूपतेः // एकदैको महामत्स्यः केनापि प्राभृतीकृतः॥२९॥ दास्या हस्तेन भूपेन प्रेषितोऽतःपुरे स च // जीवन्तं चाथ दृष्ट्वा तं राशीभीः कथितं तदा // 30 // | पुंलिंगधारकः कोपि नृपं विना सचेतनः // प्रवेशं लभते नात्रेति पश्चादस्ति प्रेषितः // 31 // दास्यापि स महामत्स्यः पश्चाल्लात्वा नृपान्तिके // मुक्त स्तदा नृपेणोक्तं मानीतोऽयं कुतस्त्वया // 32 // दास्या प्रोक्त मपि स्वामिन् सर्वा राझ्यः प्रतिव्रताः // संत्यन्यपुरुषं तेन स्वप्नेऽपि न स्पृशंत्यपि // 33 // तच्छ्रुत्वा स महामत्स्यो जहासाट्टाहासतः // चकितेन भयाद्राज्ञा तदा पृष्टाः बहुश्रुताः॥३॥ तद्विचारं परं कोऽपि न हि वेत्ति मनागपि // हेतुजिज्ञासुना राज्ञा पटहो वादितस्तदा // 35 // - हास्यहेतुप्रवकेऽध राजा राज्यं प्रदास्यति // घोषणा कारिता तत्र लोकानां ज्ञानहेतवे // 36 // पटहोद्धोषणं श्रुत्वा तत्रस्थकमलेन तत् // पृष्टं कुत इयं हेतोर्भवति घोषणा नराः // 37 // K| तस्मै तत्कारणं प्रोक्तं पूर्वोक्तं च जनैरपि // तं स्पृष्ट्वा कमलो राज्ञा कारितोऽथ समागतः॥ 38 //
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________________ चरित्रम् 82 श्री सदैववस K- तस्मै राज्ञापि मीनस्य पृष्टं हास्यस्य कारणम् // वृत्तांतांतो नवै ग्राह्यो राजन् कोऽपीत्युवाच स // 39 // गद् गृह्णन्ति कार्यस्य ये पारं पुरुषाघमाः // ते सीदंति क्षणार्धेन यथा मूखौं द्विजांगजौ // 40 // तदा राजाह नोः पान्थ कौ तौ द्विजांगजौ वद // कमलः प्राह हे राजन् वृत्तांतं तं शृणुत भोः॥४१॥ / कस्यचिद्विप्रवर्यस्य नंदिग्रामनिवासिनः // अभूतां द्वौ सुतौ राजन्नैकाग्रहपरावपि // 42 // ग्रामांतरं च गछन्तौ मागें नद्या मुपस्थितौ // वटकान् भक्षयित्वा तो हृष्टौ प्रवाह आगतान् // 43 // वर्णयामासतू राजन् तद्रसस्वाद मेव तौ // तत स्तन्निर्णयार्थं च ह्यनुनदीतटं गतौ // 44 // शुलायां रोपितस्यैकपुरुषस्य शरीरतः // निर्गतान् रक्तबिन्दुस्तौ पानीयपतितांस्तदा // 45 // वहतो वटकीभूय लोकयामासतुः पुरः // ततः संजात शोकाश्चयौं तौ केनापि बोधितौ // 46 // भो वत्सौ पुरुषोऽयं तु भाग्यवानेव ज्ञायते // करोत्येवंविधावस्थ उपकारं च भोजनात् // 17 // तेनैवं बोधितौ चापि मृतस्य रुधिरादनात् // स्वात्मानावधमौ मत्वा झंपातस्तत्र तौ मृतौ // 48 // राजन् कस्यापि कार्यस्य नांतो ग्राह्य स्ततः स्मृतः // शास्त्रेषु बहुधाप्राज्ञैः कीर्तितश्च पुनःपुनः // 49 // - इत्येवं बोधितस्तेन यावन्मासं स भूपतिः॥ न मुमोच परं राजा स च निजकदाग्रहम् // 50 //
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________________ | कमलेन पुनः प्रोक्तं हे राजन् भवदन्तिके // प्रकटीकरणेनास्य महानर्थो भविष्यति // 1 // | मुंचतातः कृपां कृत्वा यूयं जवत्कदाग्रहम् // राजोवाच द्रुतं तस्य त्वं प्रकटय कारणम् // 52 // तव तद्विषये कोऽपि ह्यपायो न भविष्यति // एवं नृपाग्रहं दृष्ट्वा कमलस्तत्परोऽभवत् // 53 // पादद्वयसमुल्लंघ्या गर्ता तेनाथ खानिता // आकारितं ततः तत्र सर्वमंतःपुरं च तत् // 54 // | तद्वचसा च सर्वास्ता लंघते तामपि द्रुतम् // एकोत्तरशतं चैव राज्ञीनां लंघने गतम् // 55 // | सप्तापि पुरुषा आसंस्तासु स्त्रीरूपधारिणः / चतुर्नवति रेवासन् राझ्यः स्तत्र परीक्षिताः॥ 56 // | तेनाथ प्रकटीकृत्य पुरुषाः सप्त दर्शिताः // दृष्ट्वा सभासमक्षं तत् सर्वे जनाश्चमत्कृताः // 57 // स्त्रीपुरुषविशेषोऽयं ज्ञातो भो कमल त्वया // कथमिति नृपस्योक्तिं श्रुत्वा स कमलोऽवदत् // 58 // गाया लंघने स्त्रीणां वामपादस्तु भूपते // उत्पतति नराणां च दक्षिणः कथितो बुधैः॥ 59 // एवं चैतत् परीक्षातो विभागः कल्पितो मया // मत्स्यहास्यमपि ज्ञेयं हे राजन् कारणादतः // 6 // स्त्रीमाया गहना प्रोक्ता देवानां कौतुकप्रदा // हसितं व्यंतरेणातो मत्स्यमुखेऽवतीर्य तत् // 61 // श्रुत्वा वृत्तांत मित्यादि भूपतिनापि सत्वरम् // प्रदत्तं कमलायाध स्वीयं राज्यं प्रहर्षतः // 62 //
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________________ चरित्रम श्री सदैववत्स क्षिप्तास्तेनाथ गाया मेकोत्तरशतस्त्रियः / / अंगीकृतं तपो राज्ञा परमं च ततः स्वयम् // 63 // | कमलस्य ततः पित्रा विज्ञाते तत्स्वरूपके // कपाललिखितं तच्च निर्णीयोक्तं स्वबुद्धितः // 64 // ka ललाटलिखिता पुंसां नैव दैवी लिपिवृथा // एकोत्तरशतं हन्तेत्येषा शिर्षास्थिगा यथा // 65 // K एकत्कथानक श्रुत्वा राजा प्राह महामतिः // नूनं स्त्रीणां चरित्राणि चैवंविधानि सत्यपि // 66 // कुलमप्यवमन्यन्ते मन्यन्ते ह्यधमाधमम् // विचारयंति नाकृत्यं परपुंसि रताः स्त्रियः // 67 // अथ विप्रो नृपादेशाद् द्वितीयप्रहरस्थितः // वक्ति राजन् समानाय्य सुतां ते प्रच्छ मत्कृतिम् // 18 // ततो राज्ञा समाहृय पृष्टा निजसुताथ सा // पुरुषमपि तं दृष्ट्वा प्राह स्वपितरं प्रति // 69 // जीवितव्यस्य दातैष पुरुषो मम हे पितः // राज्ञा पृष्टं कथं पुत्रि तदोक्तं सर्वकर्म तत् // 70 // स्वप्रतीत्यै ततो राज्ञा गुहायां निजसेवकाः // प्रेषिता स्तत्र दृष्टस्तै द्विखंडीकृत राक्षसः // 71 // तैरागत्य यथा दृष्टं प्रोक्तं भूपतयेऽथ तत् // तदातीव प्रसन्नोऽसौ राजा प्राह जनान् प्रति // 72 // रात्रौ पुरं प्रतोली न भयेनोद्घाटिता दणम् // लोकाश्चैकाकिनो नैव निःसरंति पुरावहिः // 73 // | राक्षसस्य भयं तच्च ह्यनेनैव विनाशितम् // नूनमेतेन लोकाना मुपकारः कृतो महान् // 74 //
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________________ राज्ञाथ क्षत्रियः पृष्ट स्तृतीययामयामिकः ! सोऽवदन्मम वृत्तांतं पृच्छाहूय सुतास्तव // 75 // K तदा राज्ञापि पुत्राणा माकारणाय सेवकाः॥ प्रेषितास्ते समागत्य प्राहुस्तं विनयान्विताः // 76 // स्वामिन् सर्वेऽपिते पुत्रा अद्यापि निद्रिता गृहे // अथोत्थाय समानीताः सभायां ते नृपाज्ञया // 77 // K राज्ञा पृष्टं कथं वत्सा यूयमद्यापि निद्रिताः // ततस्तं क्षत्रियं दृष्ट्वा प्रोक्तं तैस्तात संशृणु // 7 // वीरेणेतेन भूतेभ्यो जीवंतो मोचिता वयम् // राज्ञोक्तं चाथ हे वत्सा तद्धेतुं वदताधुना // 79 // तदा सर्वेऽपिते प्रोचु भूतानां तमुपद्रवम् // एवं स्वपुत्रपुत्रीणां हृष्टोऽनूज्जीवनान्नृपः // 8 // राजोवाचाथ हे सन्या राक्षसा देवयोनयः // श्रयंते मानवै स्तर्हि म्रियंते मारिताः कथम् // 1 // न ते कावलिका हारास्तथा भूतादिदेवताः // ते क्षिप्रचटिकायास्तु कथं कुर्वन्ति रंधनम् // 82 // - कुर्वन्ति व्यंजनार्थ ते जनानां हननं कथम् // तच्छृत्वा मंत्रिणः प्राचुरुद्भूतज्ञानचक्षुषः // 83 // जैनेन्द्रवचनं राजन् श्रुतं तस्य प्रकाशतः॥ ज्ञातसम्यक्वरूपाः स्मस्ततो बुद्धया विविच्यते // 84 // ये देवयोनयस्ते न नियंते मारिता नरैः // तथा क्षिप्रचटिकाया रंधनं क्रीडनं हि तत् // 85 // ये च भूता मनुष्याणां मांसभक्षणलोयुपाः॥ नानाविद्याबलेनैव ये प्रौढरूपधारकाः // 86 //
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________________ श्रीमदेव चरित्रम् 84 राक्षसीसाधनायोगाद्राक्षसरूपधारणात् // नियंते मारिता लोकै राक्षसनामधारकाः // 87 // भतादीनां तथा क्षिप्रचटिकारंधनं मतम् // क्रीडामात्रं यतः प्रोक्तं व्यंतराः कौतुकप्रियाः // 88 // श्रयत एव लोकेषु तैषां च कौतुकं प्रियम् // कथयामि महाराज मया श्रुतं यथा तथा॥ 89 // यथोग्राहणिकां कृत्वा कश्चिच्छ्रेष्टिवरो निशि // गृहद्वारे समागत्य भगिनीं भाषते सदा // 90 // आकार्य नामतः सैवं ले गुणसिरि गांठडी ॥अथास्य गृहपार्श्वे च वटद्रौ व्यंतरोऽवसत् // 91 // गुणसिर्या रूपं तेन कौतुकादेकदा घृतम् // ततः पंचशतद्रम्मग्रंथि लात्वा गतोऽथ सः॥ 92 // गतो रात्रौ गृहे श्रेष्ठी भगिनीं प्रति पृचति // द्रम्मग्रथिर्मया दत्तःमुक्तःक्क भगिनि त्वया // 93 // Ka सा प्रोवाचाथ हे भ्रातः कीदगग्रंथिः स आह सः॥ ग्रंथिः सायं मया हस्ते समर्पितोस्ति तेऽनघे // 9 // सा वक्ति मम हस्ते तु किंचित् केनापि नार्पितम् // चिंतितं श्रेष्ठिना चैषा वक्त्यनृतं कदापि न॥१५॥ Ke नूनं मम ग्रहद्वारसमीपे वटपादपः // वसति व्यंतरस्तत्र तेनाद्य छलितोऽस्म्यहम् // 96 // Kगतोऽथ साहसी द्रुतं श्मशाने नगराद् बहिः॥ पश्यति स यदा तावदपश्यत् भूतमंडलीम् // 97 // उचाल्योहाल्य मुंचंतः परस्परकरात्करे // द्रम्मग्रंथिं वदत्येवं ले गुणसिरि गांठडी // 98 //
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________________ भ्रमंतो वर्तुलाकृत्या तदा श्रेष्ठ्यपि तत्र सः // मिलित्वा तं शनैः प्राप्य ग्रंथिं द्रुतं गतो गृहे // 19 // इत्यादि भूतकौतुकं बहुधा श्रूयते नृप // बालानां वालुकासमक्रीडेवात्रापि संमतम् // 1300 // भूतानां कौतुकं क्षिप्रचटिकारंधनादिकम् // नातः कावलिकाहारा भवंति देवयोनयः // 1 // ka राज्ञाथ सदयः पृष्टश्चतुर्थयामयामिकः // भोः पान्थ सत्वरं तेऽपि ब्रूहि वृत्तांत मेव तत् // 2 // वत्सेनोक्तमहं यावद् यामकीभूय संस्थितः // तावन्मृतक मुत्थाय जगाद मां प्रति प्रभो // 3 // किं करोषि कुमार त्वमत्रागत्य मया सह // द्यूतं रमस्व पाशादि मया प्रोक्तं न विद्यते // 4 // मुंच मामिति तेनोक्तं यथा तदा नयाम्यहम् // ज्वालनानंतरं मुक्तिर्मयोक्तं ते भविष्यति // 5 // तत्रस्थेनैव तेनाथ विस्तार्य स्वभुजं पुरात् // मुक्तं कुतश्चिदानीय स्वर्णपट्टादिकं पुरः // 6 // वेतालेन ततः प्रोक्तं साहसिक मया सह // द्यूतमत्र रमस्व त्वं शिरसी चावयोः पणे // 7 // द्यूतक्रीडा समारब्धा मया तत्कालमेव सः // हरसिद्धिप्रभावाच्च जितः खड्नेन घातितः // 8 // एवं च व्यंगदेहत्वान्मृतकात् स पृथग्गतः // तदैव तच्छवं भूमौ पतितं ज्वालितं मया // 9 // राजोवाचाथ भोवत्स कास्ति पट्टादिकं चतत् // कुमारेणापि तद् द्रुतं तस्मादानीय दर्शितम् // 10 // 15
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________________ श्री सदैववत्स 85 भपतिरपि तद्वीक्ष्य प्राह पट्टादिकं विदम् // सर्व मदीयमेवास्ति कृत्वैवं प्राह विस्मितः // 11 // भांडागारिन् मदीयं तिं स्वर्णपट्टादिकं त्वया // भांडागारे नवा मुक्तं सोऽवादीदेव संशृणु // 12 // मुक्तं मया तु तत्सर्व कपाटतालकान्यपि // स्वहस्तेनैव दत्तानि भांडागारे दृढानि वै // 13 // तस्य रक्षाकृते शिक्षा भाण्डागारस्य रक्षकान् // दत्वा गृहे गतो राजन् ततस्तमाह भूपतिः // 14 // तर्हि तत् स्वर्णपट्टादि ततो द्रुतं समानय // सोऽपि पश्यति गत्वाथ दृष्टं किमपि नो तदा // 15 // राज्ञः पार्श्व समागत्य तदा सोवाच भूपते // स्वर्णपट्टादिकं नास्ति न जाने किमभूत्तथा // 16 // वेतालेनैव हस्तं स्वं विस्तार्य दिव्यशक्तितः // गृहीत मस्ति तत्सर्व दत्तद्वारादपि प्रभो // 17 // श्रुत्वा वृत्तान्त मित्यादि राजादय श्चमत्कृताः // कथयामासुरेतेषां चरित्रं कौतुकप्रदम् // 18 // नूनमेते महासत्वशालिनः संति भूतले // कस्यापि वस्तुनो नास्तिर्नास्तीति दृश्यते यतः // 19 // दाने तपसि शौर्ये च विज्ञाने विनये नये // विस्मयो नैव कर्तव्यो बहुरत्ना वसुंधरा // 20 // सूरा जयंमि विरला उदारचित्ता तउ अविरलयरा // अबला भीरुआणं सरणपरा तेवि विरलयरा // Kaपुना राजा जजल्पाहो मम वेतालराक्षसैः // गृहमेव पराभुत मत्राभूत्कौतुकं महत् // 21 //
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________________ इतश्चैको जनः कोऽपि नारीद्वयसमन्वितः॥ प्रविष्टोऽत्र नृपादेशाद् द्वारपालनिवेदितः // 22 // राज्ञा प्रोक्तं ततस्तस्मै स्वं कार्य त्वं निवेदय // इति राज्ञो वचः श्रुत्वा महिलेकाऽवदन्नृपम् // 23 // मम रूपं विधायायं हे राजन्ननया स्त्रिया // द्वितीयया मम स्वामी स्वायत्तीकृत एव वै // 24 // ममायं भपते भर्ता चावयोरंतरं द्वयोः // भ्रमादेवमजानानश्चिंतातुरः स्थितोऽस्ति हि // 25 // द्वितीयया तदा प्रोक्तं राजन्नेषाऽलिकास्ति वै // अहं सत्यास्मि तद्भार्या चावयो निर्णयं कुरु // 26 // राज्ञाथ विषये तस्मिन् पृष्टाः सर्वेऽपि मंत्रिणः // तन्निर्णयं परं कोऽपि क्षमो वक्तुं नरो नहि // 27 // प्रांते तेनाथ वत्सेन दूरीकृत्य तयोः पतिम् // तयोः प्रोक्तं च भामिन्यौ शृणुतं वचनं मम // 28 // स्थिताऽत्र युवयोर्मध्याद् भर्तुः स्पर्श करिष्यति // सत्यो भर्ताऽस्त्ययं तस्या अन्यालीका च संमता॥२९॥ कुमारेण तदेत्युक्ते सत्या भार्या तु तस्य या // सचिंतीभूय तत्रैव स्थिता तूष्णीं बभूव ह // 30 // व्यंतर्या दिव्यशक्त्या च तत्रस्थयैव दूरतः // निजभर्ता यदा स्पृष्टो वत्सेनाथ परीक्षिता // 31 // व्यंतरी सा कुमारेण खङ्गं निष्कास्य भापिता // स्वयमेव सती द्रुतं ततस्तदा पलायिता // 32 // | नृपादयोऽपि तदृष्ट्वा सर्वे सभ्याश्चमत्कृताः // बुद्धिं प्रशंसयामासुः कुमारस्यातिहर्षतः // 33 //
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________________ चरित्रम् 86 ही सदैववत्स राजोवाचाथ हे श्रेष्ठिनेते च पुरुषोत्तमाः / न संति दांभिका एवंविधसत्याभिज्ञानतः // 34 // अत श्चैतैः कृतं सर्व सत्यं मन्यामहे वयम् // अतो यन्मार्गयंत्येते तत् त्वमद्यैव देहि भोः // 35 // श्रेष्ठी प्रोवाच हे देव सत्यमेव भवद्वचः // अद्यैकत्र करिष्यामि सर्व द्रव्य महं परम् // 36 // मार्गयाम्यहमेतेभ्यो दिनं युष्मदनुज्ञया // अद्यतनं च युक्त्यैव मुदित्वा मागितं ततः // 37 // मध्यस्थं तन्नृपं कृत्वा केवलं तेन तदिनम् // मार्गितं तदिनं तेभ्यस्तस्मै राज्ञाऽपि दापितम् // 38 // नरेषु नापितो धूर्तः कार्पटिश्च तपस्विषु // चतुष्पदेषु गोमायु वणिग् वाणिज्यकारिषु // 39 // द्वितीयेऽथ दिने श्रेष्ठी गृहमध्ये स्वयं पुनः // गत्वा विलोकयामास यदद्यास्ति पिता मम // 40 // Ke पूर्ववत् पुनरागत्य सुप्तोऽस्ति वा न मे पिता // परं तेन पुनस्तत्र दृष्टो न पुनरागतः // 41 // KE अथ स्तौति कुमारादीन् हृष्टीचत्तो वणिग्वरः॥नून मन्यै रसाध्यं यद् युष्माभिःकृतमस्ति तत्॥४२॥ व मार्गे कर्दमदुस्तरे जलभृते गर्ताशतै राकुले, खिन्ने शाकटिके भरेऽतिविषमे दूरं गते रोधसि // शब्देनैतदहं ब्रवीभि महता कृत्वोच्छ्रितां तर्जनी=मीक्षेविषये विहाय धवलं वोढुं भरं कःक्षमः // 43 // कुमार प्रतिभासि त्वं धौरेयधवलो यथा // उक्त्वैवं श्रेष्ठिना तेभ्यो देयं दत्तं प्रहर्षतः // 44 //
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________________ वणिजे श्रेष्ठिनःपुत्री विप्रसुतां द्विजाय च // नृपजां क्षत्रिपुत्राय कुमारोऽदापयन् मुदा // 45 // एवं विवाहयामास मित्रत्रयं महोत्सवात् // स्वौचित्यान्न महात्मानो यतो भ्रस्यति सर्वदा // 46 // महापुरुषसेवापि कस्य न फलदायिनी // स्थानभ्रष्टो महात्मापि भवत्येवान्यपोषकः // 47 // बंधस्थानोऽपि मातंगःपरेषां भरणक्षमः // काकःखच्छंदचारोऽपि स्वोदरेणापि दुःस्थितः // 48 // | महतामाश्रयः पुसा पूज्यतादरवृद्धये // हरिपाणिस्थितःकंबुःपवित्राणां धुरि स्थितः॥४९॥ यो नात्मने न गुरवे न च बांधवाय, दीने दयां न कुरुते नच भृत्यवर्गे // किं तस्य जीवितफलं हि मनुष्यलोके, काकोऽपिजीवति चिरं च बलिं च भुंक्ते // 50 // स्वमनोरथपूर्त्यादिहृष्टा एवं सुहृद्वराः॥ तं सेवंतेस्म सस्नेहं विशेषगुणसेवधिम् // 51 // को न याति वशं लोके कवलै र्मुखपूरितः॥ मृदंगो मुखलेपेन करोति मधुरध्वनिम् // 52 // नोपकारं विना प्रीतिः कथंचित्कस्यचिद्भवेत् // उपयाचितदानेन यतो देवा अपीष्टदाः // 53 // - तावत्प्रीति भवेल्लोके यावदानं प्रदीयते // वत्सःक्षीरक्षयं दृष्ट्वा परित्यजति मातरम् // 54 // पुत्रादपि प्रियं दान महो मन्ये पशोरपि // महिषी न स्मरत्येव खलदानान्निजं सुतम् // 55 //
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________________ श्री सदैववत्स ततो राजादिभि दत्तैः स प्रभूतधनैश्चमूम् // कुमारो योजयामास चतुरंगां यतःस्मृतम् // 56 // धर्मे विवाहे विपदि द्विषःक्षये, प्रियासु नारीष्वदनेषु चैव // यशस्करे कर्मणि मित्रसंग्रहे, धनव्ययोऽष्टासु न गण्यते बुधैः // 27 // कुमारेणाथ यच्छुन्यं पूर्व दृष्टं पुरं महत् // मनुष्यवसतिं तत्र चिकीर्षुः सत्वरं गतः // 58 // हरसिद्धिप्रसादेन पुरोध्वंसकरं स तम् // राक्षसं बहुपूजभिरनुकूलं चकार ह // 59 // | तततस्तदनुमत्या स वासयति स्म तत्पुरम् // तुष्टेन रक्षसा तस्मै राज्यं दत्तं पुरस्य वै // 6 // न श्रीः कुलक्रमायाता शासने लिखितापि न // खङ्गेनाकृष्य भुंजीत वीरभोग्या वसुंधरा॥६१॥ | आरामवाटिकोद्यानवापी कूपसरोवरैः // रमणीयं कृतं तेन पुरं शोभान्वितं ततः // 6 // तत्पुरेऽथ कुमारोऽसौ मध्यभागे वरस्थले // सततं देवतापूज्यचरणनखदीधितेः // 3 // | श्रीमद्वीरजिनेशस्याप्रतिमप्रतिमान्वितम् // जिनप्रासादमीलहशिखरमकारयत् // 6 // वीरकोटपुरं नामास्थापयत् तत्पुरस्य च // नन्दराजश्रियं पूर्वदृष्टां सत्कृत्य चाददे // 65 // - वत्सःसोऽक्षयकोशोऽभूद्राज्यं शास्ति च नीतितः // यतोऽलंक्रियते राज्यं न्यायेनैव सदा भुवि // 66 //
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________________ श्रुतेन बुद्धि विनयेन दक्षता, प्रियेण नारी सलिलेन निम्नगा // निशा शंशांकेन धृतिः समाधिना, नयेन चालंक्रियते नरेन्द्रता // 67 // प्रासादे पूर्णतां याते चतुझं सदयः स च // स्थापितश्रीमहापर्युषणापर्ववरानथ // 68|| गुरून् श्रीकालिकाचार्यान् प्रतिष्ठानपुरान्मुदा // आकार्य महता तत्र विस्तरेण जिनालये // 69 // चरमस्य महावीरप्रभोस्तीर्थकरस्य च // बिंबस्य हि प्रतिष्ठाया विधि हर्षादचीकरत् ॥७०॥युग्मम्॥ वत्सोऽथ सावलिंगां तां प्रियां लीलावती च सः॥ द्रुतमाकारयामास हर्षेण तत्पितुर्ग्रहात् // 7 // प्रियान्यां विलसन्नेवं जिनोपज्ञागमे रतः // स्वराज्यं पालयामास सुरेन्द्र इव कीर्तिमान् // 72 // मंत्रिपदं वणिक्पुत्रे पुरोहितपदं द्विजे // क्षत्रियाय च सैन्यस्य ह्याधिपत्यं समर्पितम् // 73 // a यः सीधं सुहृदं कृत्वा कोटिल्ये न प्रवर्तते / स परां भूति मानोति वंच्यते न कथंचन // 4 // सावलिंगा महाराज्ञी कियत्कालादनंतरम् // पुत्रमजीजनन्नाम्ना वीरभानुं महाबलम् // 75 // लीलावत्यास्तु पुत्रोऽजूद वनवीरो महामतिः // क्रमेण तावभूतां द्वौ द्वासप्ततिकलाश्रयो // 76 // | षट्त्रिंशद्विधदंडाद्यायुधादिषु वरौ मतौ // प्रतिभाशालिनी जातौ स्वल्पकालेन दक्षिणौ // 77 //
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________________ चरित्रम् Ka रूपश्रियाश्विनांपुत्रा विव सर्वसुखावही // परमप्रीतियुक्तो तौ चिक्रीडतुः परस्परम् // 78|| K कोऽपि भट्टोऽन्यदा घेतः सदयभूपतेः पुरः // पपाठापूर्वशब्दार्थी तत्कीर्तिकाव्यमालिकाम् // 79 // सालवाहनराशोऽपि पठितं काव्य मुत्तमम् // यशः स्फुर्तिप्रतापौ च प्रभुवत्सस्य भूपतेः / / 80 // - दत्तं राज्ञाथ तुष्टेन तस्मै तुरंगमादिकम् // पृष्टं च भट्टराज त्वं कुतः स्थानात्समागतः // 8 // भट्टोऽवददहं राजन्नुज्जयिन्याः समागतः॥ श्रुत्वा स्वनगरीनाम सदयो हर्षवानऽभूत् // 82 // स्वदेशपुरबन्धूनां नामश्रवणतो नरः // उल्लासी जायते शीघ्रं किं पुनस्तजनागमे // 3 // - अपृच्छत् कुशलोदन्तं राजा तस्य पुरस्य च // भट्ट उवाच हे देव कुशल मधुनाथ किम् // 84 // - उज्जयिन्या यतोऽतीव विरुपं वर्तते महत् // तन्निशम्य ससंभ्रान्तोऽपृच्छत् किं तद्विरूपकम् // 85 // भट्ट आहाथ हेदेव पूर्व तत्र किमप्यभूत् // सम्यगहं न तद्वेद्मि नवीनोऽहं समागतः // 86 // नगर्या लक्षणावत्या आगत्य तत्र संस्थितः॥ जातं षटुं च मासाना मुजयिनीस्थितेर्मम // 87 // तदा तत्र श्रुतं देव पुरीलोकाननान्मया // भूपतेः प्रभुवत्सस्य सुतेनात्र गजो हतः // प्रेरितेन ततो राज्ञा विद्विष्टमंत्रिणा परम् / अत्यपमानितः पुत्रो विदेशेऽतो जगाम सः // 89 //
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________________ एवं तस्मिन् गते पुत्रे विदेशे च मृते गजे // राज्यं बभूव निःसार मुजयिन्या महीपतेः // 90 // - न दीर्घदर्शिनो यस्य मंत्रिणः स्युर्महीपतेः॥ क्रमायातश्रियस्तस्य ह्यचिरात् स्यात् परीक्षयः॥१॥ मंत्रिरूपा हि रिपवः संभाव्यास्ते मनीषिभिः // यःसन्नयाय मुत्सृज्य नृपं कूटन सेवते // 12 // तस्याथ बलहीनत्वं ज्ञात्वा सीमालराजभिः // मिलित्वा तत्पुरीरोधः कृतोऽस्ति देव सांप्रतम् // 13 // PE तस्मानिर्गमने कोऽपि चागमने क्षमो नहि // तेन चिंतातुरोऽतीव प्रभुवत्सश्च भूपतिः // 9 // 15 स किंकर्तव्यतामूढः पुरीमध्ये स्थितोऽधुना // वाहयत्यतिऽकष्टेन निजदिनानि शोकतः // 5 // जयसंत्रस्तमनसा हस्तपादादिकाः क्रियाः // प्रवर्तते न वाणी च वेपथुश्चाधिको भवेत् // 96 // वैरिनृपाश्च ये सर्वे नगर्याः परितः स्थिताः // कोशक्षयं च कुर्वन्ति पुर्यतरगता जनाः // 17 // a कोशव्ययो न निद्रा च न विलासेषु च स्पृहा / विग्रहासक्तचित्तानां रतिः क्वापि न जायते // 98 // आयांति यांति च परे ऋतवः परत्र, तस्मिन् पुरे तु ऋतुयग्म मगत्वरं हि / वीरेण तेन सदयेन विना | जनानां, वर्षा विलोचनयुगे हृदये निदाघः // 19 // | तस्मिन् पुरे च हे राजन्नेवं व्यतिकरो महान् // अत्रागां खालमार्गेण निर्गत्य ह्यो दिने निशि // 940 //
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________________ श्री सदैववत्स राजाथ तादृशं श्रुत्वा स्वरूपं हृदये पितुः // आहत इव वज्रेण चिंतयत्यतिपीडितः // 1 // अहो दुर्मत्रिणस्तस्य दौरात्म्यं कीदृशं यतः // तत्प्रपंचेन मे देशान्निष्कासनं पुराऽभवत् // 2 // पितुश्चेदृगवस्थाऽभूदत उक्तं महात्मभिः॥ दुर्मत्रिणस्सदा त्याज्या राज्ञा राज्यविवृद्धये // 3 // - मृतिं सुतस्य भार्याया मानभ्रंशं धनदयम् // मित्रं व्यसनसंतप्तं देशभंगं कुलक्षयम् // 4 // परहस्तगतं राज्यं स्वस्थानं परपीडितम् // धन्यास्ते ये न पश्यन्ति बाल्ये मातृवियोजनम् // 5 // युग्मम् / तत्र शीघ्रमतो गत्वा वैरीन् जित्वा महाबलान् // पूर्ववन् मम पुर्यास्तु स्वास्थ्यं सम्पादयाम्यहम्॥६॥ विचार्यैवं नृपो यावद्विधाय सैन्यमेलनम् // इच्छति च प्रयाणाय तावत्पुत्रौ समागतौ // 7 // जनक मुत्सुकौ भूत्वा विज्ञपयांबभूवतुः // मोचयिष्याव आवां वै तत्र गत्वा पितामहम् // 8 // | तिष्ठतात्रैव यूयं तु राजा प्राहाथ हे सुतौ // युवां स्थश्च लघीयांसौ रणकर्मण्यदक्षिणौ // 9 // भवतोऽतः कथं तत्र प्रेषणं च करोम्यहम् // पित्रेत्युक्तावपि स्नेहाजातावाग्रहतत्परौ // 10 // | खलीनविगलबालाप्लवेन फेनिलं बहु // जात्यतुरंगसैन्येन जलपूरं वितन्वता // 11 // पर्यवसाप्य तातं तौ संवृतौ निर्गतौ पुरात् // वत्सेन चिंतितं पश्चात् तेन कतिपयैर्दिनैः // 12 //
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________________ बालौ तु प्रेषितौ तत्र परं वैरिदलं महत् // मानयोस्तेन संग्रामे भूयात्पराजयो मनाक्॥१३॥ कालदेपोऽपि युद्धेन मास्तु बहुदिनैस्तथा // इत्यादि चिंत्या वत्सश्चिंतयत्याकुलो हृदि // 14 // गुणाय न कृतं कार्य तदतिरभसेन यद् // अहं तानाशयिष्यामि जित्वा देविप्रसादतः // 15 // hd शीघ्रकृत्ये समुत्पन्ने विलंबयति यो नरः // तत्कृत्ये देवता तस्य कोपाद्विघ्नं प्रयच्छति // 16 // यस्य यस्य हि कार्यस्य सकलस्य विशेषतः // क्षिप्रमक्रियमाणस्य कालः पिबति तद्रसम् // 17 // - इति विचार्य वत्सोऽसौ पुत्रस्नेहानुबधीः // ततः शीध्र मरीजेतुं चचाल सुतयोरनु // 10 // न स स्यात् पितृषु स्नेहो न देवे नापि सद्गुरौ // न मित्रे नापि वित्तेच यादृक् पुत्रेष्वकृत्रिमः // 19 // वत्सेनाथ जनं प्रेष्य स्वकुमारौ विलंबितौ // ततः सदयवत्सोऽपि क्रमेण मिलितस्तयोः // 20 // पितुश्च पुत्रयोरेवं सैन्यमेकत्र मिलितम् // तावत्तै चिंतितं चैवं विद्वेषिभिर्महाबलैः // 21 // नूनं कोऽपि महान् राजा प्रभुवत्सस्य भूपतेः // सहायकरणायात्र समागतो विलोक्यते // 22 // इति विचार्य सर्वे ते संभूय तमढौकयन् // संग्रामाय तदा तत्र घोरयुद्ध मजायत // 23 // पतिता बहवस्तेच संग्रामे वैरिणो भुवि // क्षणाद्वैरिबलं भग्नं काकनाशं ननाश च // 24 //
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________________ श्री सदेववत्स चरित्रम् पुरमध्यस्थितस्याथ प्रभुवत्सस्य भूपतेः // पुरः केनापि भट्टेन वर्धापन्या निवेदितम् // 25 // हे देव तव पुत्रोऽत्र सदयवत्सभूपतिः // प्रौढसैन्येन संयुक्तः समागतो महाबलः // 26 // तस्मिंश्च युध्यमाने ते वैरिणस्ते बहिः स्थिताः // सर्वे पलायिताः सन्ति तच्छ्रुत्वा मुदितो नृपः 27 ततः शीधं स्वपुत्रस्य मिलनायोत्सको नपः // आदिदेश स्वमंत्र्यादीन तत्प्रवेशमहोत्सवे // 28 // पूर्वमेव स्वयं तस्य मिलनाय पुरावहिः॥ निर्गतो भूपतिश्चाथ बहुस्नेहसमाकुलः // 29 // क्षणमात्रं विलंबोऽपि बहुत्कण्ठावतां नृणाम् // यतो वर्षायते नूनं तच्च स्वानुभवाश्रयम् // 30 // अन्योन्यमिलने हृष्टहृदयौ तौ ततः सुतौ // तुरंगाभ्यां समुत्तीर्याश्लेषवन्तौ बभूवतुः // 31 // E किं चन्दनैः सकपूरै स्तुहिनैः शीतलैश्च किम् // सर्वे ते पुत्रगात्रस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम // 32 // | अमृतस्य प्रवाहैः किं कायक्षालनसंगतैः // चिरात्पुत्रपरिष्वंगो योऽसौ मूल्यविवर्जितः // 33 // धृतमांगल्यसद्वेषाः वत्सावलोकनोत्सुकाः॥ पौराः पौरपुरंध्यश्च सुवर्णपात्रपाणयः // 34 // पुष्पमालाक्षतैः कृत्वा मंगलं तस्य सन्मुखम् // समाजग्मुर्महाहर्षात् गीतवादित्रसंयुताः // 35 // पंचवाद्यनिनादेन चोत्कीर्णिकृतदिग्रजम् // अकार्षीन्नृपतिश्चापि तत्प्रवेशमहोत्सवम् // 36 //
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________________ चामरग्राहिणीवारवधूभिश्चारुचामरैः // अपनीतश्रमस्वेदबिन्दुः स प्राविशत्पुरम् // 37 // .. प्रासादेऽसौ समागत्य ततः स्वमातृपादयोः // चकार प्रणतिं तेन सहर्षा साऽभवत्तदा // 38 // RE] पुत्रवियोगसंतप्ता साधुना पुत्रदर्शनात् // शीतलहृदया जाता स्नातेवामृतवारिणा // 39 // पुत्रजनविप्रयोगो वन्हेरपिदुःसहो न सह्यः स्यात् / / यदर्शनमात्रेण शाम्यति तत्क्षणा देव हृदो दाहः // 40 // ततो वभ्वा वपि श्वश्रूपादौ प्रक्षाल्य दुग्धतः // स्वर्णपुष्पैश्च संपूज्य प्रणमतः स्म पादयोः // 11 // समुपविश्य राजापि कर्पूरादिसुताम्बूलैः // पौरलोकं च सन्मान्य सभायां विससर्ज ह // 42 // स्वस्याविमृश्यकारित्वं पुत्रनिष्काशनं च तत् // निदंश्चकार पुत्रस्य नृपति गुणवर्णनम् // 43 // ता अवमाणं रोसो तावच्चि अपुव्व दोस संभरणम् // उक्कीरिआवहिमए जाव चहुदति नेवगुणा॥ निजसुतं कुमारं तं संस्थाप्य स्वासने शुभे // अतीवाहादितो नृत्वा प्रोवाचाथ महीपतिः // 44 // तदा हे वत्स दुर्बुद्धे मन्त्रिणश्च दुरुक्तिभिः // ममोखलास क्रोधाग्नि र्वात्येव दुर्बलश्रुतेः // 45 // मया च तेन हे तात तदाविमृश्य सत्वरम् // विरूपं ते कृतं नूनं सुतस्य गुणशालिनः // 46 //
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________________ की श्री सदेववत्स पढम चिअ रोषभरे जा वुद्धि होइ सा न कायव्वा // अहकीर ता तीसे न सुंदरो होइ परिणामो॥ K सहसित्ति दिठ दोसो मा पुत्तय विप्पि अंकुलसि ॥शान्ति रोसो परिमि अंतो कालेण रसायणं होइ // विप्रियं विहितं तुभ्यं मया तत्क्षम्यता मिति // मानवाक्यैः समाहृाद्य सुतं राज्ये युयोज सः // 17 // कियद्भिश्च ततो वर्षेः कुमारस्य चकार सः // पट्टाभिषेककार्य च प्रहर्षेण महीपतिः // 48 // प्रभुवत्सो जिनोपज्ञधर्मरतः स्वयं नृपः // प्रांते चाराधनं कृत्वा काले स्वर्गमवाप सः // 49 // दुष्टमंत्रीक्षणादेव नष्टो नदीकुलद्रुवत् // वत्सोऽथ न्यायमार्गेण पालयति प्रजा मुदा // 50 // विविधधर्मकार्येण भावयजिनशासनम् // पृथिव्यां वादयामास स्वयशःपटहं पटु // 51 // स्थापितौ द्वौ च तौ पुत्री करकोटपुरे ततः // अंतरांतर मागत्य तातं प्रणमतः स्म तम् // 52 // अथ श्रीकालिकाचार्यपादाश्च भूमिमंडले // उज्जयिनीपुरोद्याने विहरंतः समागताः // 53 // तत उद्यानपान नृपाग्रे तन्निवेदितम् // तद्गुरुवन्दनायैव सहर्षोऽसौ समागतः // 54 // भवाब्धितारकाणां स विधाय बहुवन्दनम् // भक्तिभरात् स्तुतिं कृत्वा सोपविष्टश्च तत्पुरः // 55 // गुरुभिरपि तत्रैव प्रारब्धा ज्ञानदायिनी // सजलमेघगंभीरध्वनिभिर्देशना तदा // 56 //
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________________ आर्यदेश कुलरूप बलायु बुद्धि बन्धुर मवाप्य नरत्वम् // धर्मकर्म न करोति जडो यः पोतमुज्झति पयोधिगतः सः // 57 // // धम्मायरिएण विणा अलहंता सिद्धि साहणोवायम् // अरयव्व तुंबलग्गा भमंति संसार चक्कंमि॥ इत्यादि देशनांश्रुत्वाऽतीव हृष्टो गुरोर्मुखात् // स्वपूर्वभवजिज्ञासुः कृत्वांजलिं व्यजिज्ञपत् // 58 // केन पुण्यप्रभावेण हे भगवन् ममाऽभवत् // राज्यश्रीर्देवतातुष्टि वरप्राप्ति द्विषजयः // 59 // सर्व मयि कृपां कृत्वा कथयत सविस्तरम् // प्राह श्रीकालिकाचार्यः श्रुतज्ञानोदधिस्तदा // 60 // शृणु राजन् भवं पूर्व गजेन्द्रराशिशोभितः // विंध्याचलाभिधो नाम्ना गिरिवरोऽस्ति भूतले // 1 // बहुयोजनविस्तीर्णा राजादन्यादिपादपैः // संयुक्ता वर्तते पल्ली तत्र लतादिमंडिता // 2 // नगरं वर्तते तत्र पल्ल्यां च गोत्रकाभिधम् // भूपति र्व्याघ्रनामास्ति व्याघ्र इव पराक्रमी // 63 // तस्य धारल्लदेव्याख्या राज्ञी तत्कुक्षिसंभवः॥ गुणसुंदरनामाभूत् पुत्रः प्रकृतिसुंदरः // 6 // | दयागुणाईचित्तः स न्यायगुणसमन्वितः // पठति लेखशालायां छन्दोऽलंकारलक्षणम् // 65 // मत्तद्विरदसंकाशयोवनेऽत्यध्वगामिनि // पुरुषस्याधिरूढस्य न शास्वादन्यदकुशम् // 66 //
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________________ चरित्रम् की सदैववत्सा विनयं राजपुत्रेभ्यः पंडितेभ्यः सुभाषितम् // कपटं पण्यनारीभ्यो धर्म शिक्षेन्मुनिव्रजात् // 67 // साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थभूता हि साधवः // तीर्थ पुनाति कालेन सद्यः साधुसमागमः // 6 // पठितं तेन चाणाक्यनीतिशास्त्रमपि द्रुतम् // क्रीडति श्लोकराशीना मर्थ विज्ञावयन् सदा // 69 // श्यामार्याख्यान् गुरून् दृष्ट्वाऽथैकदोद्यान आगतान् // वन्दनामकरोद्वत्सः शिरसि सुकृतांजलिः // 70 / / | गुरुभि श्चापि तं योग्यं विज्ञाय वर्णितस्तदा // तस्मै जीवदयामूलो धर्मश्च ज्ञानसंयुतः // 71 // न वीतरागादपरोऽस्ति देवो, न ब्रह्मचर्यादपरं तपोऽस्ति / नाभीतिदानात्परमस्तिदानं चारित्रिणो ना परमस्ति पात्रम् // 72 // | उपदेशं गुरो मुखाच्छृत्वा स गुणसुंदरः // चिंतयत्येव मेते हि सत्यधर्मप्ररूपकाः // 73 // गुरव एव पूजाऱ्या विद्यतेऽपि महीतले // अत उक्तं हि शास्त्रेषु ज्ञानिदाने महाफलम् // 7 // ज्ञानयुक्तः क्रियाधारः सुपात्र मभिधीयते // दत्तं बहुफलं तेन धेनुक्षेत्रनिदर्शनात् // 7 // प्रबुद्धःसन् स सम्यक्त्वमूलानि गुरुपार्श्वतः // द्वादश व्रतकर्माणि शीघ्रमङ्गीचकार ह // 7 // धर्मलाभेन दृष्टोऽसावन्यदाऽचिंतयद् हृदि // अतोऽवश्यं च कर्तव्यं सुकृतं भुवि मानवैः // 7 //
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________________ माय पिय सुअ सहोयर पमुहाउकुणंति तंन उवयारम्॥ जं निक्कारणकरुणापरो गुरुकुण जीवाणम् // ततोऽसौ प्रत्यहं जैनमुनीनाकार्य भक्तितः ॥अन्नपानादिभिःस्नेहात् प्रतिलाभयति स्वयम् // 7 // Ka शुभश्चित्तादियोगस्तु सर्वसिद्धिकरः सदा // दानस्य समये भाग्यात् प्राप्यते एव सजनैः // 78 // केसिपि होइ चित्तं वित्तमन्नेसि मुभय मनोसिम्॥चित्तं वित्तं पत्तं तिन्निवि के सिंच धन्नाणम् // 79 K सैवमुपार्जयामास केवलं शुद्धभावतः // मानवभवसंबंधिभोगफलक्रियाः शुभाः // 8 // hd अन्यदा राजपुत्रस्य स्वोद्याने क्रीडतोऽस्य च // इतस्तत्र समायाता श्चत्वारो मिलिता नराः॥८॥ - वार्तालापं कुमारश्च करोति सह तैस्तदा // तैः प्रोक्तं हे कुमारेन्द्र शृणु स्वस्थेन चेतसा // 8 // | स्वभाग्येनैव भूपात्र जीवंतः स्मः समागताः // कथ मुक्तं कुमारेण प्राहुस्ते विनयान्विताः // 8 // |श्तो दूरेऽस्ति वेतालपुरं च पंचयोजनम् // वेतालसदृशा स्तत्र महाहिंसापरा जनाः // 8 // तत्रैका वर्तते देवी नृमांसशोणितप्रिया // सा महिषादि दातृणां पूरयतीप्सितार्थकम् // 85 // Raसा चातिप्रौढकार्येषु नृबलिं याचते जनान् / / मूल्येन गृह्यते बन्दिग्राहिपान्निरस्तदा // 86 // Ea तदर्थ धियते तत्र वैदेशिको बलेन वा // एवंविध मजानाना वयं तत्र पुरे गताः // 7 //
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________________ श्री सदैववत्स 93 तत्रत्यै र्धियमाणाश्च देवीबल्यर्थकं वयम् // अवागता महाकष्टात् पलाय्य पादशक्तितः॥८॥ एतच्छ्रुत्वा महाकष्टं स च महादयापरः // विलोकनाय तत्रागात् कुमारो गुणसुंदरः / / ततोऽसौ तत्र तद्देव्या मंदिरे याति सत्वरम् // तावत्तेन नरो दृष्टो वैदेशिको धृतो जनैः // 89 // कारयित्वा महास्नानं सुवस्त्रपरिवेष्टितः // कणवीरस्य मालाभिः कण्ठे शुशोभितः कृतः॥१०॥ कम्पमानशरीरश्च भयादीनमुखोऽपि सः // मंगलतूर्यघोषण महताडंबरेण च // 11 // जनैरानीयमानोऽसौ वर्धापनपुरःसरम // विलापकारकश्चैवं करुणस्वरतः पथि // 12 // चिंतयति कुमारोऽसौ दृष्ट्वा तं दुःखिनं नरम् // धिगेतान् पापिनश्चौरान् नंत्यल्पार्थे महानरान् // 13 // Kad किंच धिगस्तु देवत्वं तस्यापि यस्य केवलम् // क्रीडामात्रकृते जीवशतघातो विधीयते // 94 // Ka सवेविअ सुहकामी सवेविश्व दुःखभीरूणो जीवा // सवेवि जीविअपिया सवे मरणाउ बीहति // 15 // इक्कस्स कएनिअजीवियस्स बहुआउ // जीवकोडीउ दुःखे ढवंति ज केवि ताणकि सासअंजीअम्॥ यदि चास्य वराकस्य नरस्य पश्यतो मम // प्राणा एव प्रयास्यंति तदा का मे कृपालुता // 16 // तेन सर्वप्रकारेण रक्षणीयोऽस्त्ययं मया // विचार्य हृदये चैवं तेनोक्तं तान् प्रति द्रुतम् // 17 //
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________________ | भोभो नरा नरं यूयं मुञ्चतैनं तु बन्धनात् // तत्स्थाने मां च गृह्णीत तच्छ्रुत्वा तेऽतिविस्मिताः॥९॥ प्रोचुश्च तृणवत्प्राणान् परार्थे गणयत्ययम् // पश्यताहो जनाः सर्वे प्रकृत्यैवोत्तमाः शुभाः // 99 // स्वागदाहेऽपि कुर्वन्ति प्रकाशं दीपिकादशा // इन्धनं दह्यते वह्नौ जनपोषणहेतवे // 1500 // विचायेंत्यपि ते लोकाः प्रोचुस्तं प्रति सत्वरम् // नरोतम वयं त्वेनं त्यक्ष्यामो नैव सर्वथा // 1501 // - तदा राजकुमारोऽपि स्वासि माकृष्य क्रोधनः // त्रासयामास तान् सर्वान् कृतवान् मुक्तलं च तम् 2 Jes ततो राजकुमारोऽसौ स्वयं देव्याः समीपगः // लग्नो वाहयितुं खङ्गं निजकण्ठे प्रहर्षतः // 3 // तावदेवी करे धृत्वा प्राह तं साहसिन् कथम् // स्वासिना स्वशिरः छित्वा पूजनं त्वं करोषि मे // 4 // स ब्रूते भो महादेवि तवाऽहं तुष्टिहेतवे // करोम्येवं निशम्येति प्राह तुष्टा सती च तम् // 5 // KS कुमार तव सत्वेन तुष्टाऽस्म्यतो वरं वृणु // स आह देवि तुष्टासि जीवहिंसां तदा त्यज // 6 // | देव्यापि तन्मुखाद्धर्मश्रवणानंतरं ततः॥ प्रतिबोधं च सा प्राप्ता हिंसां तत्याज सर्वदा // 7 // अथ तेऽपि जनाश्चित्ते कृत्यं दृष्ट्वातिविस्मिताः // चक्रु स्तस्य कुमारस्य प्रशंसां गुणशालिनीम् // 8 // एवं तत्र बहूनां स जीवानां प्राणरक्षणम् // विधाय स्वपुरं यातः कुमारो गुणसुंदरः॥९॥
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________________ चारतम् श्री सदैववत्स 94 प्राय एवं स सर्वत्र जीवरक्षापरायणः // आचरहहवर्षाणि श्रावकधर्म मेव च // 10 // स गुणसुंदरः प्रांते कुमारो गुरुसादिकम् // क्षामणापूर्व माराध्य चाष्टादशविधं पुनः // 11 // पापस्थानं समालोच्य पश्चादनशनेन च // आयुः प्रपूर्य कालेन जोगफलानुभावतः // 12 // त्वमत्रोजयिनीपुयां प्रभुवत्सस्य भूपतेः // सुतोऽजनि महापुण्यात् सदयवत्स नामकः // 13 // त्वया पूर्वभवे सम्यक् श्रद्धाभक्तिपुरःसरम् // सुपात्रजेनसाधुभ्यो दत्तमन्नादिकं महत् / / 14 // तेन चेह भवे राज्यभोगावाप्तिरभूत्तव // कोऽपि पुण्यं करोत्येव मुत्तमं लभते फलम् // 15 // // तवनियमेणय मुखो दाणेणय हुंति उत्तमा भोगा॥ दव्वच्चणेण रजं अणसणमरणेणं इंदत्तं० तेन पुण्येन हे राजन् शुन्यपुरे तवाग्रतः // बहुलक्ष्म्याश्च संप्राप्तिः सांनिध्ये देवतास्तथा // 16 // जनचित्तचमत्कारी महिमा च बभूव ह // वैरिवृन्दैरजेयोऽपि जीवरक्षाप्रभावतः // 17 // निर्भयमानसश्चाभूः सुखसंपत्तिपुत्रवान् // महिमाऽतश्च पुण्यस्य नहि केनापि वर्ण्यते // 18 // निजपूर्वभवं श्रुत्वा सदयः स्वगुरोर्मुखात् // अवाप स्मरणानं जातेस्तत्कालमेव सः // 19 // निजपूर्वभवं साक्षाद् दृष्टवान् कृपया गुरोः // मुदा श्रावकधमे स प्रपद्य गुरुपार्श्वतः // 20 //
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________________ | गुरून् नत्वा प्रहर्षेण स्वगृहे स समागतः // तदादितो विशेषेण धर्मकार्यपरोऽजनि // 21 // गुरवोऽपि ततोऽन्यत्र विहरंति स्म भूतले // गुणायैकत्र साधूनां निवासो न यतः स्मृतः // 22 // नारीणां पितुरावासे नराणां श्वसुरालये // एकस्थाने यतीनां च वासो न श्रेयसे भवेत् // 23 // R // समणाणं सउणाणं भमरकुलाणं च गोउलाणं च // I अनिआउ वसहीउ सा वईआणं च मेहाणम् // | विना विहारं प्रतिबन्धभावो, न चोपकारो लघुता ममत्वम् / न देशभाषावगमो मुनीनां, रत्नत्रय _ स्यापि विराधना भवेत् // 24 // | विहार स्तेन साधूना मनन्तगुणप्राप्तये // उपकाराय लोकानां वर्णितोऽस्ति पुनः पुनः // 25 // श्रावकधर्म मेवं स सदयवत्सभूपतिः // प्रपाल्यांते समाराध्य कालेन स्वर्ग माप्तवान् // 26 // | आगामिन्यां क्रमान्मोक्ष मुत्सर्पिण्यां स यास्यति // मुनिराजवरैः प्रोक्तं सत्यं भवितु मर्हति // 27 // श्रीरत्नशेखरगुरुप्रवरप्रसादात्, हर्षादिवर्धनगणी सुरसैकपात्रम् // चक्रे कथां सदयवत्सकुमारसत्काम्, सत्पात्रदानविमलाभयदानरम्याम् // 28 // / रति सपात्रदाने च विमलाभयदानके / चरित्रमभवत्पूर्ण सदयवत्सभूपतेः // 29 //
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________________ श्री सदैवत्सा सुज्ञान विज्ञान पवित्र मूर्ति श्रीसागरानन्दसूरीश्वराणाम् // प्रणम्य पादाञ् शुभशिष्यकेण ___पन्यासश्रीमन्मतिसागरेण // 1 // गणाधिपं पूज्यसरस्वतीं च, वीरं जिनेन्द्रं ननु खेष्टदेवम् // विद्याप्रदं श्रीगुरुराजवयं, नत्वा कृतोऽयं शुभपद्यबन्धः // 2 // युग्मम् // मूलतः प्राय उध्धृत्य, किञ्चिन्न युनाधिकं तथा // कृत्वा सर्वोपकाराय, पद्यरूपेण निर्मितम् // 3 // विक्रमार्कशकस्याद्दे, रसाष्टग्रंहभूमिते // माघमासे पौर्णमास्यां, द्रङ्गे हि राधनपुरे // 4 // सदैववत्सचारित्रं, प्रापत् पूर्णदशामिदम् // उपकारपरैः सद्भि, कृपां कृत्वा विलोक्यताम् // 5 // युग्मम्।। श्रवणे मनने चास्य, पुण्यप्राप्ति भवेन्नृणाम् // श्रोतव्यं श्रद्धया भव्य, मन्तव्यं शुद्धचेतसा // 6 // ിരിരിരിരിരിരിരിരിരിരിരിരിരിരാളു // इति श्रीसदैववत्सचरित्रं संपूर्णम् //
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________________ // शुद्धिपत्रम् // श्लोकाङ्क অজ पह्मनाके सीलवाहन सीलवाहन सोवलिंगा सीलवाहन 224 233 編我我我明以就以 पद्मनाले सालीवाहन सालीवाहन सावलिंगा सालीवाहन अशुद्धम् विद्याया द्वैरसोधनं सविशेष दरत्वलु उत्तमाना स्वे वहवो पन्नी गृहणती अनोपं प्रियांसि सुरेश्वर श्रेणिना शुद्धम् विद्यायाः बैरशोधनं सविशेष दत्खलु उत्तमानां स्वेवं 274 306 325 बहवो सीवलिंग्याश्च सीलवाहन युक्यैवं जगत्रये सावलिंग्याश्च सालीवाहन युक्त्यै वं जगत्रये 412 430 434 पत्नों गृहंती अौष प्रियासि जिनेश्वरे श्रेष्ठिना - ब वृषे विशेषण विशेषण किल व्रत प्रति
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________________ सदेववत्स लध्वीं तस्य . चरित्रम् कुद्धेनं देवधर्म विमान દરર 677 717 764 पुरुषा निश्रितं दत्ता लवीं क्रुद्धन श्राद्धधर्म सम्यक्त्व पुरुषाः निश्चित दत्ताः क्रीडा नरेन्द्राणां स्तदा भाग्य महाकुपै दुर्दशा र्धाम तस्या शास्वाः दिन तच्छुत्वा / तच्छुत्वा श्वसुर शक्रिसिंह भामूषक दतिरिवन्नो भुमितः भुमिगतं प्रोढे . शाखाः दिने तच्छ्रुत्वा सच्छ्रत्या श्वशुर शक्तिसिंह भो मूषक दतिखिन्नो भूमितः भूमिगतं 997 कीडा नरेन्द्राणा स्तदाः भोग्य 1073 1128 महाकू 1929 दुर्दशां धार्म श्रूयते पुरुषाधमाः श्रुयते श्रुयतां वेशयित्त्वा वरम् यथा तथा श्रूयतां वेशयित्वा 1194 1240 1292 1300 1321 पुरुषाघमाः घृतम् सह्म पराभुत मनसा वरं सत्र पराभूत मनसा यथा यथा