________________ श्री सदैववत्स चरित्रम् यो स पूजयते गर्वाबुसमाधममध्यमान् // भूपमान्यान् स प्राप्नोति ह्यापदं दंतिलो यथा // 45 // मंत्री दंतिलनामासीत् वसंतनगरे वसन् लोकनृपहितं कुर्वस्तोषयति सदा जनान् // 46 // अथैकदा सेन पुत्रस्य विवाहे बहु सत्कृताः // राजलोकाश्च पौराश्च स्वन्नवस्त्रादिभिर्भृशम् // 47 // तदा तस्य नृपस्यैको गोरंभारव्यो महामतिः // गृहसन्मार्जको भृत्योऽनुचितस्थान माश्रितः // 48 // मंत्रिनिदेशतः केन टेकेन किंकरेण सः // गले धृत्वा ततः स्थानाद् बहिनिष्कासितस्तदा // 49 // तदादितः स गोरंभो स्वयं दूनो मनस्यति // निजापमानतो निद्रां सुखेन लभते न हि // 50 // मनसि चिंतयत्येव महं केनाप्युपायतः॥ पातयामि महादुष्ट मेनं मन्त्रिणमापदि // 51 // - अर्थेकदा स गोरंभो ह्यल्पनिद्राप्तभूतृतः // संनिधौ मार्जयन् प्राह दंतिलोऽस्ति महाखलः // 52 // गुप्तं राजगृहे गत्वा ह्यालिंगति नृपप्रियाम् // तच्छृत्वा सत्वरं प्राह गोरंभं प्रति भूपतिः // 53 // सत्यं वदसि गोरंभ दंतिलेन प्रिया मम // आलिंगिता कदा कुत्र त्वया दृष्टा मनस्विनी // 54 // गोरंभेण तदा प्रोक्तं जागरणवशादिदम् // राजन्नुक्तं न जाने किं निद्रालुना मयाधुना // 55 //