________________ श्रीसदैववत्सम यामकं तेन तद्धृष्टं निष्टितं स्तोकमेव तत् // सहसांकोऽपि कापटयात् संजात इव निद्रितः // 17 // निद्रितं तं विलोक्याथ मृगांकः श्रममाश्रितः // शेषं घृतं स्वयं पातुं प्रवृत्तो बहुदुःखितः // 173 // | इतः कपटनिद्रातः प्रबुद्धेनेरितं वचः // रंक इव धृतं रात्रौ पिबंति व्यवहारिणः // 17 // मृगांकस्तर्जितस्तेन श्याममुखो बभूव ह // अथापवरके गत्वा सौषधीबलतः स्वयम् // 175 // स्त्रीरूपं पूर्ववत्कृत्वा स्वाभरणैः स्वलंकृतम् // सहसांको मृगांकस्य पार्श्वमागाद्बहिर्दुतम् // 176 // उक्तं तया मृगांक प्रत्युपलक्षयथाथ माम् // किं तदैव मृगांकन पद्मावत्युपलक्षिता // 177 // अहो संजातमेतत् किं सोऽचिंतयञ्चमत्कृतः स्वप्ने पश्यामि किं साक्षाद्वेमां पद्मावती महम् // 178 // अतीव विस्मितो यावत् स तां किमपि पृच्छति // तत्पादयोः पतित्वा साक्षामयामास तं तदा॥१७९॥ - प्रोक्तं तयाथ हे स्वामिन् बाढं मया विगोपितः॥ खेदितश्चासि तत्सर्व क्षन्तव्यं कृपया त्वया // 18 // मद्वचःपालनायैवं चैतत् सर्व मया कृतम् // गृहमध्येऽथ तं नीत्वा स्वकीया सकला तया // 18 // समृद्धिदर्शिता सोऽपि दृष्ट्वा ता मतिविस्मितः // मृगांकः स तदा तत्र परां लज्जा मवाप्तवान् // 182 // | तेन पृष्टा स्वकीयं सा वृत्तान्तमवदत्ततः॥ क्षमयित्वा मृगांकोऽपि प्रसन्नः सन्नुवाच ताम् // 183 //