________________ श्री सदेववत्स 53 तदपि क्षम्यतां भ्रात रहं भ्रातास्मि तेऽनघ // गोरंभोऽपि प्रसन्नः सन् प्राह तं तद्धितं वचः // 6 // मंत्रिवर पुना राजप्रसादाय तवोपरि // क्रियते कार्यते चाथ पश्य मे बुद्धिवैभवम् // 69 // स्तोकैरेव दिनै राजप्रसन्नता यथा भवेत् // तथाहं कारयिष्यामि श्रुत्वा मंत्री गृहं गतः // 7 // अथैकदा स गोरंभः पुनर्निद्राजुषोऽन्तिके // राज्ञोऽपवरके कुर्वन् मार्जनं सन्निदं जगौ // 71 // KE पुरीषोत्सर्गकालेऽपि भुक्तेऽयं चिर्भटान्नृपः // अविवेको महानस्ति खल्वस्मन्नृपते र्यतः // 72 // तच्छ्रुत्वोत्थाय गोरंभं सक्रोधं प्राह भूपतिः॥ रे मूर्ख किं त्वया मौढयाद् अथिलवद् विजल्पितम् // 73 // - त्वामेव सेवकं ज्ञात्वा केवलं चिरकालिनम् // नाहं व्यापादयाम्यद्य वद दृष्टः कदा त्वया // 4 // सोऽपि पूर्ववदेवाह तदा राज्ञा विचारितम् // नूनं मनोविकारोऽस्य जातोऽस्तीति विभाव्यते // 75 // यथा तेनाधुना मिथ्या मामुद्दिश्यैव जल्पितम् // पूर्व मपि तथैव स्यान् मन्त्रिणि जल्पितं ततः॥७६॥ राज्ञा तदादितो मन्त्री पूर्ववदेव मानितः // ब्रवीम्यहमतो वेश्या पूजनीया नृपाश्रया // 77 // अतो हे सोमदंताख्य वेश्योक्तं द्रव्यमानय // सदयोक्तं वचः श्रुत्वा वेश्या चित्तेऽतिहर्षिता // 7 //