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________________ चरित्रम् श्री सदैववत्स 27 | वाराणस्यां च पूर्व वै जिनंदत्ताभिधः पुरि // व्यवहारेषु मुख्यश्च वसतिस्म धनी महान् // 549 // | जिनधर्मेण वासितसप्तघातुः सुधीः स च // श्रीकान्ता खल्लु नाम्ना वै भार्यासीद्धर्मचारिणी // 55 // शीलादिगुणपंक्तिभिः संविभूषितमात्रिका // 551 // अथैकदा विना पुत्रं दुःखपूर्णां नताननाम् // दृष्टवोवाच धनी भायें श्यामाननं च दृश्यते // 552 // किमद्य ते च सा प्राह पुत्ररत्नं विनास्ति किम् // अपरं कारणं स्वामिन् श्रेष्ठी प्राह प्रिये च किम्॥५५३॥ दुःखकरणे न संसिद्धिरिष्टस्य पुण्यतः खलु // रम्येषु वस्तुषु मनोहरतां गतेषु रेचित्त रवेद मुपयासि // वृथा किमेवम् // पुण्यं कुरुष्व यदि तेषु तवास्ति वाञ्छा पुण्यं विना नहि नवंति समीहितार्थाः // 554 // तेन हि हे प्रिये पुण्यं कुरु चेति तत स्तथा // श्रेष्ठी स्वनार्यया साकं श्रीजिनपूजनादिकम् // 555 // ke नित्यं करोति तेनाथ क्षयं जगाम चोभयोः // अप्यन्तरायकर्मैव सा श्रीकान्तैकदा खलु // 556 // षोडशकलाभिः पूर्ण मृगांक शुद्धबिंबकम् // रात्रौ स्वप्ने ददर्शाथ प्रातस्तत् स्वप्नवृत्तकम् // 557 // श्रेष्ठिनेऽकथयद्धर्षात्तस्याः सोपि तदा खलु // 558 // पुत्रजन्मफलं वक्ति स्म सापि हृष्टा सती // पुण्याधिकं ततः कालाद् गर्भे तत्पुत्ररत्नकम् // 559 //
SR No.600423
Book TitleSadaivvatsakumar Charitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMatisagar, Manishankar Chaganlal Shastri
PublisherRatilal Keshavlal
Publication Year1932
Total Pages196
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size15 MB
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