________________ श्री सदववत्स चरित्रम् काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् // व्यसनेन हि मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा // 569 // आहारनिद्राभयमैथुनानि, सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् // ज्ञानं विशेषं खलु मानुषाणां, ज्ञानेन हीनाः पशवो मनुष्याः // 570 // रूपयौवनसंपन्ना विशाल कुलसंभवाः // विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः // 571 // विद्या ददाति विनयं विनयाद्यति पात्रताम् // पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मस्ततःसुखम् // 572 // तत्पित्रा प्रहिता प्रीत्या झुपाध्यायस्य पार्श्वतः॥ तौ द्वावप्येकशालायां पठतःस्म च तावुभौ // 573 // प्रज्ञायाश्च प्रकर्षेण याभ्यां खलु चमत्कृते // जनानां हृदये नूनं तो दावपि मिथः खलु // 574 // | मैत्रीभाजौ च संजातौ भक्ष्यादिकं भवेच्च यत्॥आनीतं खलु ताभ्यां च मिलित्वा सकलं च तौ // 575 // भक्षयतः क्रमेणैव मतीव प्रीतिभाजनौ // परस्परं सुसंजातौ पद्मावत्यथ सैकदा // 576 // मार्जनाय गृहे स्वस्य पट्टिकायाः समागता // तत्पित्राकारिता पृष्ठं तत्रस्थया च पुत्रि भोः // 577 // पठितं किं त्वया किं वै स्वपठनस्वरूपकम् // जगौ च सकलं सापि पित्रा हृष्टेन वै तदा // 578 //