________________ श्री सदैववत्स 77 ME अतीवोद्धं स्थितः स्वामी प्रलंबितकराप्यहम् // तन्मुखे भोजनं दातुं समर्था न भवाम्यतः // 23 // | करोमि रुदनं चाहं श्रुत्वा वृत्तांत मेव तत् // तेन दयालुना प्रोक्तं सुंदरि शृणु मद्वचः // 24 // मम स्कंधं समारुह्य पतिं सुखेन भोजय // स्कंधोपरि समारूढा तच्छृत्वा सा द्रुतं तदा // 25 // | वणिकपुत्रस्य तस्यैकः कियत्कालादनंतरम् // पतितो मांसखंडश्च स्कंधे तेन चमत्कृतः // 26 // | उद्धं पश्यत्यसौ यावत् तावत्तच्चौरदेहतः // छित्वा मांसस्य खंडांश्च दृष्टा सा भक्षयंत्यपि // 27 // | भुमावास्फालयामास रुष्टो सौ तां वणिक्सुतः // उत्थाय भुमितः सापि द्रुतं लग्ना पलायितुम् // 28 // | तस्याश्च छेदितो हस्त स्तेनैकः स्वासिना तदा // भुमिगतं करं हस्ते गृहीत्वा पश्यति स्वयम् // 29 // | तावददर्श तं रत्नसुवर्णकंकणान्वितम् // चिंतित मप्ययं नूनं महर्धिकस्त्रियः करः // 30 // | वालुकायां करं छिन्नं संगोप्य स पुनः स्थितः // स्वस्थाने मृतकं मुक्तं तेनोत्तार्य पुनश्च कौ // 31 // | द्वितीयप्रहरे विप्रो जागृतोऽथ वणिकसुतः // सुप्तस्तावत्समायातो राक्षसः श्यामदेहकः // 32 // तस्याग्रे सप्ततालोच्चो भूत्वाथ चलितः पुरम् // गच्छन्तं तेन दृष्ट्वा तं ब्राह्मणेन विचिंतितम् // 33 // पश्यामि क्वैष यातीति सोऽपि साहसिकस्ततः // स्वपृष्टे मृतकं बद्धवाऽनुजगाम च राक्षसम्॥३४॥