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________________ तयोरेका स्वरूपस्य परावृत्तिविधायिनी // द्वितीयाऽपि तथैवासीदिष्टार्थसिद्धिदायिनी // 89 // अदृश्यीकरणं तेन तथैवांजनमर्पितम् // अंगुलीयं ततो दत्तं तस्यै विघ्नहरं शुभम् // 9 // अथैकदा तया तस्मै कथितं शुद्धभावतः॥ पतिमोचनकर्मादि मुलतः स्वस्वरूपकम // 9 // विज्ञप्तं चाथ भो तात मुञ्च मां सिंहलाध्वनि // तत्र स्वस्वामिनो बुद्धिवैभवं दर्शयाम्यहम् // 92 // | तच्छ्रुत्वा तेन सा मुक्ता सुसुमारपुरे ततः // औषध्या नररूपं स्वं कृत्वा च प्राविशत् पुरम् // 13 // स दिव्यरूपनेपथ्यधरोऽसौ हट्टमार्गगः // श्रेष्ठिनः कस्यचिद्धटे गत्वा चोपाविशत्तदा // 9 // | वार्तालापैश्च हृष्टेन तेन स व्यवहारिणा // सत्कृत्य तं पुनश्चापि भोजनाय निमन्त्रितः॥९५॥ तदोक्तं तेन हे श्रेष्ठिन्नहं कार्यप्रसंगतः॥ कियत्कालं समाश्रित्य स्थातु मिच्छामि सांप्रतम् // 16 // तस्माद्रसवतीकाः गृहं दर्शय मे स्त्रियः // कियत्कालं सुखेनैव तत्र तिष्ठाम्यहं यथा // 97 // श्रेणिना तत् कृतं कार्य तत्र गत्वा स तांप्रोत // ऊचे रसवतीकर्ती भोमातः प्रणमाम्यहम् // 18 // यतः शीलवता पुंसा स्त्रियं दृष्ट्वा तया सह // वाक्सम्बन्धस्त्रिधा तत्र कर्तव्यः क्षेम मिच्छता // 99 // वृक्षां प्रति तु मातेति समानां भगिनीति च // लध्वी प्रति सुतेत्येवं प्रोक्तव्यं धर्मतः सदा // 10 //
SR No.600423
Book TitleSadaivvatsakumar Charitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMatisagar, Manishankar Chaganlal Shastri
PublisherRatilal Keshavlal
Publication Year1932
Total Pages196
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size15 MB
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