________________ अभिमानी नरः प्रायो गूढान्तर्बद्धवैरभाक् // सत्यं तद्वचनं जातं भाषितं सुजनैर्भुवि // 44 // अहो पूर्व मया प्रोक्तं बहुकालेन यद्वचः // स्मृतिपथे समानीतं तेनाद्य दीर्घरोषिणा // 45 // एतावदिनपर्यंतं धारितं तत् कथं हृदि // ईदृशं दीर्घरोषित्वं नृणां गूढं धिगस्तु तत् // 46 // ततो मानवती सापि तत्रावलम्ब्य साहसम् // स्वहृदि चिन्तयामास ह्यहंभावतया तदा // 47 // - स्वामी मे यदि राजास्ति तदाहमपि भक्तितः // गुरुप्रज्ञाभिमानेन स्वोन्नतिं साधयामि वै // 48 // इति विचिंत्य सा तत्र विधाय मृत्तिकामयीं // जिनमूर्ति प्रतिष्ठाप्य नमोमंत्रैरपूपुजत् // 49 // उपसर्गाः क्षयं यान्ति छिद्यन्ते विघ्नवल्लयः // मनः प्रसन्नतामेति पूज्यमाने सुरेश्वरे // 50 // शुचि भूत्वा स्तुतिं कृत्वा सैकध्यानपरऽभवत् / / भत्तया पुष्पैः फलैश्चापि जगवन्तं समार्चयत् // 51 // प्रत्यहं पूजयित्वा सा चिन्तयन्ती स्वकर्मणाम् // विपाकं निजपापं च निर्जरयति धर्मतः // 52 / / - सागरान्तरटन्नौस्थजनज्ञापनसिद्धये // तृणानां पूलकं बद्धवा वंशाग्रे सा ततः स्वयम् // 53 // वंशमुत्तंभयामास रात्रौ श्वापदभयेन च // वृक्षाने मालकं कृत्वा स्वपिति तत्र जाग्रती // 54 // दिनानि सा फलाहारात् प्रत्यहं प्रत्यवाहयत् // ततः कर्मवशात्तस्याः सिंहलद्वीपमध्यतः // 55 //