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________________ चरित्रम् श्री सदैववस 76 श्रेष्ठी जगाद हे वत्स प्रज्वालनेन किं भवेत् // यावत्सोऽयं मया वर्ष प्रज्वालितो बहु बईः // 1100 // प्रज्वालितः पुनश्चायं गृहे मे नागमिष्यति // सुवर्णस्य द्विलक्षी स्वां सुतां दास्याम्यहं तदा // 1 // वरमुक्त्वा कुमारस्तं शवं लात्वा दिनान्तगे // रवौ मित्रैः समं गच्छन् श्रेष्ठिनं प्रत्युवाच भोः // 2 // पितुरन्तिमसंस्कारान् कर्तुं त्वं चंदनादिकम् // कर्पूरागुरुयुक्तं च समानय शुभेच्छया // 3 // श्रेष्ठिनोक्तमरे थाह मानयनेन सर्वथा // भग्नोऽस्मीति वचः श्रुत्वा तेनोक्तं शृणु मद्वचः // 4 // | पूर्वेषां सदृशो नाहं ज्वालकानां कदाचन // तच्छ्रुत्वा श्रेष्ठिनानीय द्विगुणं तत् समर्पितम् // 5 // कथितं च कुमाराय श्रेष्ठिना भोनरोत्तम // प्रज्वाल्य कथमप्येनं नागच्छेच्च तथा कुरु // 6 // ज्वालं ज्वाल महं त्वेनं निर्विण्णोऽस्मि भृशं खलु // तेनोक्तं कुरु मा चिंतां समीचिनं भविष्यति // 7 // कुमारोऽथ स्वमित्रैः स गृहीत्वा तं शवं ततः // श्मशानस्य गतो भूमौ संध्या च तावताऽभवत् // 8 // कुमारश्च ततः स्वस्य प्राह मित्रत्रयं प्रति // श्मशानेऽत्र वसंत्येव प्रबला व्यंतरादयः // 9 // संभाव्यते विदं नूनं व्यंतराधिष्ठितं शवम् // अस्य समीचिनं नास्ति प्रज्वालनं ततोऽधुना // 10 //
SR No.600423
Book TitleSadaivvatsakumar Charitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMatisagar, Manishankar Chaganlal Shastri
PublisherRatilal Keshavlal
Publication Year1932
Total Pages196
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size15 MB
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