________________ तैरुक्तं हे नराधिप नः सति स्वामिनि त्वयि // कः पराभवितुं शक्तः कुतःभास्वति संतमः // 670 // परं नाथ निवासाय नःस्थानं देहि चापरम् // विस्मितःसन् नृपःप्राह किं यूयमनवस्थिताः // 671 // केनापि पीड्यमाना न यदि यूयं महाजनाः // तदान्यत्र निवासाय मार्गयथ कथं स्थलम् // 672 // केनापि पीड्यमानाःस्थ यदि चेदुचितं परम् // कथयत ततो यूयं सम्यक् स्वागमकारणम् // 673 // | तदा समश्यया श्रेष्ठी रामदेवोऽवदन्नुपम् // कृषिकैः पात्यते क्षेत्रे चौरेस्तन्नगरे कृतम् // 674 // ततो बुद्धिप्रभावेण कल्पयित्वा महामतिः // पतितमस्ति क्षात्रं किं कापीत्युवाच भूपतिः // 675 // उक्तं महाजनेनैवमेव स्वामिन् भवत्पुरे // चौरोपद्रवतः स्थातुमस्माभिः शक्यते नहि // 676 // भूपो वृक्षः स्वप्रजास्तस्य मूलं भृत्याःपर्णा मंत्रिण स्तस्य शाखाः // तस्माद्राज्ञा स्वप्रजा रक्षणीया- मूले गुप्ते नास्ति वृक्षस्य नाशः // 77 // विचिंत्येति तदा राजा प्रजानां रक्षणे हितम् // तलारक्षकमाकार्य प्रोवाच भीतिदं वचः // 7 // || रे रे निस्त्रप रक्षकाधम मम प्राणप्रिया या प्रजा, प्रेतेशप्रतिमेन सेयमानशं स्तेनेन निःपीड्यते // स्वं चादाय मदीयवेतनधनं खार्थीव बुब्धः सदा, त्यक्त्वा नागररक्षणव्यतिकरं निद्रायसे रे सुखम्॥७९॥