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आत्म-कथा : भाग १ लाखों रुपये ऐसे स्वर्गीय मंदिरोंके बनाने में खर्च किये, उनके हृदयके अंतस्तलमें कुछ-न-कुछ ईश्वर-प्रेम जरूर रहा होगा ।
पेरिसका फैशन, वहांका स्वेच्छाचार और भोग-विलासका वर्णन खूब पड़ा था और उसकी प्रतीति वहांकी गली-गली में होती जाती थी। परंतु ये मंदिर उन भोग-सामग्रियोंसे अलग छटक जाते थे। उनके अंदर जाते ही बाहरको अशांति भूल जाती थी। लोगोंका बर्ताव ही बदल जाता था। वे अदबके साथ बरतने लग जाते थे। वहां शोर-गुल नहीं हो सकता। कुमारिका मरियमकी मूर्ति के सामने कोई-न-कोई जरूर प्रार्थना करता हुआ दिखाई देता। यह सब देखकर त्रितपर यही असर पड़ा कि यह सब वहम नहीं, हृदयका भाव है ; और यह भाव दिन-ब-दिन बराबर पुष्ट होता गया। कुमारिकाकी मूर्तिके सामने घुटने टेककर प्रार्थना करनेवाले वे उपासक संगमरमरके पत्थरको नहीं पूज रहे थे; बल्कि उसके अंदर निवास करनेवाली अपनी मनोगत शक्तिको पूजते थे। मुझे आज भी कुछ-कुछ याद है कि उस समय मेरे चित्तपर इस पूजाका ऐसा असर पड़ा कि वे पूजन-द्वारा ईश्वरकी महिमाको घटाते नहीं, बल्कि बढ़ाते ही हैं।
एफिल टॉवरके विषयमें एक-दो बातें लिख देना जरूरी है । मुझे पता नहीं कि एफिल टॉवर आज किस मतलबको पूरा कर रहा है । प्रदर्शिनीमें जानेपर उसके वर्णन तो जरूर ही पड़ने में आते थे। उनमें उसकी स्तुति थी और निंदा भी थी। मुझे याद है कि निंदा करनेवालोंमें टॉलस्टॉय मुख्य थे। उन्होंने लिखा था कि एफिल टॉवर मनुष्यकी मूर्खताका चिह्न है, उसके ज्ञानका परिणाम नहीं। उन्होंने अपने लेखमें बताया था कि संसारके अनेक प्रचलित नशोंमें तंबाकूका व्यसन संबसे खराब है। जो कुकर्म करनेकी हिम्मत शराबके पीनेसे नहीं होती, वह बीड़ी पीकर आदमीको हो जाती है । शराब आदमीको पागल बना देती है, परंतु बीड़ी से तो उसकी बुद्धि पर कोहरा छा जाता है और वह हवाई किले बांधने लग जाता है। टॉलस्टॉयने अपना यह मत प्रदर्शित किया था कि एफिल टॉवर ऐसे ही व्यसन का परिणाम है ।।
एफिल टॉवरमें सौंदर्यका तो नाम भी नहीं है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि उससे प्रदर्शिनीकी शोभा जरा भी बढ़ गई हो। एक नई भारी-भरकम चीज थी। और इसीलिए उसे देखने हजारों श्रादमी गये थे। यह टॉवर प्रदर्शिनी