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अध्याय ३६ : खिलाफतके बदलेमें गोरक्षा? ४८३ मान सचमुच ही गो-वध बंद कर देंगे।
कई लोगोंने तो यह भी सुझाया कि पंजाबके सवालको भी खिलाफतके साथ मिला देना चाहिए। मैंने इसका विरोध किया। मेरी दलील यह थी-- पंजाबका मसला स्थानिक है. पंजाब कष्टोंके कारण हम सरकारके संधि-उत्सवसे अलग नहीं रह सकते। इसलिए पंजाबके मामलेको खिलाफतके साथ जोड़ देनेसे हम नादानीके इल्जामके पात्र बन जायंगे। मेरी यह राय सबको पसंद आई।
इस सभामें मौलाना हसरत मोहानी भी थे। उनसे जान-पहचान तो हो ही गई थी। पर वह कैसे लड़वैया हैं, इस बातका अनुभव मैंने यहीं किया । मेरे उनके दरमियान यहींसे मत-भेद शुरू हुआ और वह अनेक बातोंमें अंततक कायम रहा ।
अनेक प्रस्तावोंमें एक यह भी था कि हिंदू-मुसलमान सब स्वदेशी-व्रतका पालन करें और उसके लिए विदेशी कपड़ेका बहिष्कार किया जाय। खादीका पुनर्जन्म अभी नहीं हो सका था। हसरत साहबको यह प्रस्ताव मंजूर नहीं हो सकता था। वह तो चाहते थे कि यदि अंग्रेजी सल्तनत खिलाफतके बारेमें इंसाफ न करे तो उसका मजा उसे चखाया जाय, अतएव उन्होंने तमाम ब्रिटिश मालका यथासंभव बहिष्कार सुझाया। मैंने समस्त ब्रिटिश मालके बहिष्कारकी अशक्यता और अनौचित्य के संबंधमें अपनी दलीलें पेश कीं, जो कि अब तो प्रसिद्ध हो चुकी हैं। अपनी अहिंसा-वृत्तिका प्रतिपादन मैंने किया । मैंने देखा कि सभापर मेरी बातोंका गहरा असर हुआ। हसरत मोहानीकी दलीलें सुनते हुए लोग इतना हर्षनाद करते थे कि मुझे प्रतीत हुआ कि यहां मेरी तूतीकी आवाज कौन सुनेगा ? पर यह समझकर कि मुझे अपने धर्मसे न चूकना चाहिए, अपनी बात छिपा न रखनी चाहिए, मैं बोलनेके लिए उठा । लोगोंने मेरे भाषणको खूब ध्यानसे सुना । सभा-मंचपर तो मेरा पूरा-पूरा समर्थन किया गया और मेरे समर्थन में एकके बाद एक भाषण होने लगे। अग्रणी लोग जान गये कि ब्रिटिश मालके बहिष्कारके प्रस्तावसे मतलब तो कुछ भी नहीं सधेगा, उलटे हंसी होकर रह जायगी। सारी सभामें शायद ही कोई ऐसा आदमी दिखाई पड़ता था, जिसके बदनपर कोई-न-कोई ब्रिटिश वस्तु न थी। सभामें उपस्थित रहनेवाले लोग भी जिस बातको करने में असमर्थ थे उसका प्रस्ताव करनेसे लाभके