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यही है जिंदगी में सब कुछ दिख चुका है। अनंत काल पूर्व आज का हमारा वर्तमान दिखा हुआ है। उन्होंने पूर्ण ज्ञान में जो देखा था, जो जाना था, वही आज हम कर रहे हैं! __तब मुझे ज्ञात हुआ कि मैं जो आज लिख रहा हूँ, जो कुछ बोल रहा हूँ - कुछ भी नया नहीं है! अनंत काल पूर्व उस पूर्ण ज्ञान में यह दिखा हुआ है! यह बोला हुआ है! एक अक्षर भी नया नहीं... एक शब्द भी नया नहीं! अरे हाँ, मेरा चिंतन-मनन भी नया नहीं! आज मैं जो कुछ सोचता हूँ, मनन करता हूँ, वह भी अनंतकाल पूर्व उस पूर्ण ज्ञान में सोचा हुआ ही है, मनन किया हुआ ही है।
पूर्ण ज्ञान... अनंत ज्ञान... सिर्फ ज्ञातृत्व-सिर्फ दृष्टत्व! न कोई राग, न कोई द्वेष, न कोई मोह! चराचर विश्व को देखना व जानना! विश्व के सभी द्रव्य, द्रव्यों के सभी अतीत-अनागत और वर्तमान के पर्याय... एक-एक द्रव्य के अनंत-अनंत पर्याय! जानो और देखो! अनंतकाल तक जानते रहो, देखते रहो... कोई उद्वेग नहीं, कोई विषाद नहीं! संपूर्ण आनंद की सतत अनुभूति!
कब ऐसी आत्मदशा प्राप्त होगी? रागयुक्त दर्शन, रागयुक्त ज्ञान कब मिटेगा?
समग्र विश्व को जानना है, सभी द्रव्य और द्रव्यों के सभी पर्याय जानने हैं, देखने हैं... प्रत्यक्ष! कब ऐसी दुर्लभ... अद्भुत... अनुपम क्षण आएगी, नहीं जानता हूँ| कैसे जाने? रागदशा, द्वेषदशा जानने ही नहीं देती।
ऐसे पूर्ण ज्ञाता और पूर्ण दृष्टा परम पुरुषों को पुनः पुनः नमस्कार हो मेरे! नत मस्तक होकर, उनकी पूर्णानंदी आत्मा को नमन करता हूँ।
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