Book Title: Laghu Prakaran Sangraha
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek, 
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek
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JAIN EDUCATION INTERNATIONAL FOR PRIVATE AND PERSONAL USE ONLY
Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Educationa International 93 ॥ अथ लघु-प्रकरण-संग्रहः प्रारंभः ॥ 10000068066666666 For Personal and Private Use Only Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education international For Personal and Private Use Only Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पृष्ठांक. - ६० ४२ ecomew.. अस्य ग्रंथस्यानुक्रमणिका. ग्रंथनाम. गाथासंख्यांक. जीव विचार प्रकरण. नवतत्त्व प्रकरण. इंमक प्रकरण. लघुसंघयणी प्रकरण. ३० वृहत्संघयणी त्रैलोक्यदीपिका. लघुदात्र समास प्रकरण, २६३ पटकर्मग्रंथ. ४०१ श्रीरत्नाकर पंचविंशतिका. २५ श्राचारोपदेश ग्रंथ षड्वर्ग रूप. २६४ ३४ए aasa Jain Education international For Personal and Private Use Only Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Educationa international For Personal and Private Use Only Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ MEIn 3 नमः सि॥ अथ श्रीजीवविचारप्रकरणप्रारंजः॥ आर्याटत्तं ॥ जुवर्णपश्चा वीर, नमिळण' नणामि' अबुढबोदई॥ जीवसरूवं किंचि वि, जह"जणियों में । पुर्वसूरीहि ॥ १॥ जीवा मुंत्ता"संसा, रिणो"य"स"थावरा"यु संसारी॥ पुढवि । जलजलण"वाऊ, वुणस्सई यांवरा नेया॥२॥ फखिंद' मणि रयण"विहुमः ।। हिंगुख हरियाल मणसिल' रसिंदा॥ कणगाइ धान सेढी, वन्निय"अरणेट्टय पलेवा ॥३॥ अग्नय तरी कसं, मट्टी पाहाण जाणेगा॥ सोवीरंजण व णा, ३ पुढविनेया य श्चाइ ॥४॥ नोमंतरिकमुदगं, उसाहिमकरग हरि । लणू मदिया॥ हुँति घणोददिमाई, नेआ णेगा य आनस्स ॥५॥इंगाल जा ल मुम्मुर, नक्कासणि कणग विजुमाईया ॥ अगणिजियाणं नेया, नाय || IN वा निजणबुडीए॥६॥ ननामग नक्कलिया, मंमलि मद सुक्ष गुंजवाया य॥ _049905" [email protected] Jain Education international For Personal and Private Use Only Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकरण. जीववि० घण तणु वायाश्या, नेया खलु वानकायस्स ॥७॥ सादारण पत्तेया, वण सजीवा ज्दा सुए नणिया॥ जेसिमणंताणं तणु, एगा सादारणा तेक॥Gulal ॥१ ॥ ॥ कंदा अंकुर किसलय, पणगा सेवाल नमि फोमा य॥ अल्लयतिय गजर मो, ब वबुला थेग पल्लंका ॥ए॥ कोमलफलं च सवं, गूढसिराइं सिणाश्पत्ता ॥ थोहरि कुआरि गुग्गुलि, गलोइपमुहा य बिन्नरुदा ॥ १० ॥ श्चाश्णो | अणेगे, दवंति नेया अणंतकायाणं । तेसि परिजाणण, लकणमेयं सुए | नणियं ॥११॥ गूढसिरसंधिपत्वं, समन्नंगमदीरुगं च बिन्नरुदं ॥ साहारणं । सरीरं, तविवरीयं च पत्तेयं ॥१२॥ एगसरीरे एगो, जीवो जेसिं तु तेय पत्ते ॥ || या ॥ फल फूल लि कहा, मूला पत्ताणि बीयाणि ॥ १३ ॥ पत्तेयं तरुमुत्तं, पंचवि पुढवाश्णो सयललोए ॥ सुहुमा दवंति नियमा, अंतमुहुत्तान अहि ॥ १॥ स्सा ॥२४॥ संख कवड्डय गंमुल, जलो य चंदणग अलस सदगाई। मेद Jain Educationa l For Personal and Private Use Only |RAMainelibrary.org Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कारि किमि पूयरगा, बेइंदियमा वाहाई॥ १५॥ गोमी मंकण जूआ, पिपी लि उद्देहिया य मक्कोडा ॥इल्लिय घयमिल्ली, सावय गोकीड जाई ॥१६॥ गद्ददय चोर कीमा, गोमयकीडा य धन्नकीडा य ॥ कुंथु गुवालिय इलिया, तेइंदिय इंदगोवाई॥ १७॥ चरिंदिया य विलू, ढिंकुण नमरा य नमरिया तिड्डा ॥ मबिय मंसा मसगा, कंसारी कविलडोलाई॥२॥ पंचिंदिया य च ॥ उहा, नारय तिरिया मणुस्स देवा य॥नेरश्या सत्तविदा, नायवा पुढवि ने एणं ॥१॥ जलयर थलयर खयरा, तिविदा पंचिंदिया य तिरिखा य ॥ सु । सुमार मन कबव, गाढा मगरा य जलचारी ॥२०॥ चनपय नरपरिसप्पा, नुयपरिसप्पा य थलयरा तिविदा ॥गो सप्प ननल पमुहा, बोधवा ते समा ४॥ सेणं ॥॥ खयरा रोमयपरकी, चम्मयपरकी य पायडा चेव ॥ नरखोगा बाहिं, समुग्गपरकी वियय पकी ॥ २२ ॥ सवे जल थल खयरा, समुचि Jain Educational For Personal and Private Use Only M ainelibrary.org Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जीववि० ॥ २ ॥ Jain Educationa मा गनया उहा हुंति ॥ कम्मा कम्मगं भूमी, अंतरदीवा मणुस्सा य ॥ २३ ॥ दसदा जवणादिवई, विदा वाणमंतरा हुंति ॥ जोइसिया पंचविदा, | विदा वेमा शिया देवा ॥ २४ ॥ सिद्धा पनरस नेया, तिचा तिचा सिने ॥ एए संखेवेणं, जीवविगप्पा समकाया ॥ २५ ॥ एएसिं जीवाणं, सरीर | माउं हिई सकायम्मि | पाणा जोणि पमाणं, जेसिं जं प्रति तं नणिमो ॥ २६ ॥ अंगुलप्रसंखनागो, सरीरमेगिंदियाण सवेसिं ॥ जोयण सदस्स मदियं, नवरं पत्तेयरुकाणं ॥ २७ ॥ बारस जोयण तिन्नी, गाऊच्या जोयणं च प्रणुकमसो ॥ बेइंदिय तेइंदिय, चरिंदिय देह मुच्चत्तं ॥ २८ ॥ धणुसयपं च पमाणा, नेरइया सत्तमाइ पुढवीए ॥ तत्तो भूणा, नेया रयणप्पदा | जाव ॥ २९ ॥ जोयण सदस्स माणा, मच्छा जरगा य गनया हुंति ॥ धणुद पुहुत्तं पंखी, जुप्रचार गाउ पुहुत्तं ॥ ३० ॥ खयरा धणुदपुहुत्तं, मुच्प्रगा For Personal and Private Use Only प्रकरण ॥ २ ॥ jainelibrary.org Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उरगा य जोयापुहुत्तं ॥ गाच्य पुहुत्त मित्ता, समुचिमा चपया मणिया ॥ ३१ ॥ बच्चैव गाजआइ, चनप्पया गज्नया मुणेयब्वा ॥ कोसतिगं च मणुस्सा, नक्कोस सरीरमाणें ॥ ३२ ॥ इसाणंत सुराणं, रयणी सत्त देद मुच्चत्तं ॥ डुगडुग डुग चनगेवि, ऊ गुत्तरे क्किक्कपरिदाणी ॥ ३३ ॥ बावीसा पुढवीए, सत्तय प्राजस्स तिन्नि वास्स ॥ वाससदस्सादस तरु, गणाण तेऊ तिरित्ता | ॥ ३४ ॥ वासाण बारसाऊ, बिइंदियाणं तिइंदियाणं तु ॥ ऊणपन्नदि गाणं, चरिंदीणं तु बम्मासा ॥ ३५ ॥ सुरनेरझ्याण विई, नकोसा साग |राणि तित्तीसं ॥ चनपय तिरिय मणुस्सा, तिन्निय पलिवमा हुंति ॥ ३६ ॥ जलयर नरनुअगाणं, परमाऊ होइ पुनक्कोमी ॥ परकीणं पुण जर्जि संखनागोय पलियस्स ॥ ३७ ॥ सबे सुडुमा साहा, रणा य सम्मुचिमा | माणुस्सा य ॥ नकोस जन्नेणं, अंतमुहुत्तं चियजियंति ॥ ३८ ॥ गादगाउ Jain Educationaonal For Personal and Private Use Only Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जीववि० ॥ ३॥ Jain Educationa f माणं, एवं संखेवर्ड समस्कायं ॥ जे पुण व विसेसा, विसेससुत्तान ते ने प्रकरण. या ॥ ३९ ॥ एगिंदिया य सबे, प्रसंख उस्सप्पिणी सकायम्मि ॥ नवव ति चयंति य, प्रांतकाया अता ॥ ४० ॥ संखिक समा विगला, सत्तठ नवा पणिदि तिरि मणुआ ॥ नववऊंति सकाए, नारयदेवा य नो चेव ॥४२॥ दसदा जियाण पाणा, इंदिय ऊसास आज बल रूवा ॥ एगिदिए चरो, | विगलेसु बसत ठेव ॥ ४२ ॥ सन्निसन्नीपंचिं, दिएसु नवदस कमेण बोधवा || ते हि सद् विप्पगो, जीवाणं जन्नए मरणं ॥ ४३ ॥ एवं अणोर पारे, संसारे सायरम्मि श्रीमम्मि ॥ पत्तो अणंतखुत्तो, जीवेहिं अपत्तधम्मेहिं ॥ ४४ ॥ तद चउरासी लका, संखा जोगीण होइ जीवाणं ॥ पुढवाईण च उपहं, पत्तेयं सत्त सत्तेव ॥ ४५ ॥ दस पत्तेय तरूणं, चउदस लका हवंति इयरेसु ॥ विगलिंदिए दो दो, चउरो पंचिंदि तिरियाणं ॥ ४६ ॥ चरो चन For Personal and Private Use Only ॥ ३ ॥ jainelibrary.org Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लारो नारय, सुराण मणुाण चनदस हवंति ॥ संपिंडिआन सत्वे, चुलसी लाल स्कान जोणीणं ॥४७॥ सिक्षण नवि देहो, न आन कम्मं न पाण जोणी॥ साइ अणंता तेसिं, लिई जिणंदागमे नणिया ॥ ४ ॥ काले अणाशनिद णे, जोणि गहमम्मि नीसणे श्व ॥ नमिया नमिदंति चिरं, जीवा जिणव । यण मलहंता ॥४ए॥ता संप संपत्ते, मणुअत्ते उल्लहे वि संमत्ते॥ सिरिसं तिसूरि सिहे, करेद नो उऊमं धम्मे ॥ ५० ॥ एसो जीववियारो, संखेवरु । भाईण जाणणादेऊ ॥ संखित्तो नहरि, रुद्दा सुयसमुद्दा ॥५१॥इति जीवन सं० ॥ अथ श्रीनवतत्त्वप्रकरणप्रारंनः ॥ जीवाऽजीवा पुस्मं, पावाऽसव । संवरो य निकरणा ॥ बंधो मुरको य तदा, नव तत्ता हुंति नायवा ॥१॥ चउदस चनदस बाया, लीसा बासीय हुँति बायाला ॥ सत्तावन्नं बारस, चन नव नेया कमेणेसिं ॥ २॥ एगविद उविद तिविदा, चनविदा पंच नविदा Jain Educationa l a For Personal and Private Use Only Dainelibrary.org Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नवत० ॥४॥ Jain Educationa जीवा ॥ चेयण तस इयरेहिं, वेय गई करण काएहिं ॥ ३ ॥ एगिंदिय सुदुमि यरा, सन्नियर पििदया य स बि ति चन ॥ अपजत्ता पत्ता, कमेण चन दस जियठाणा ॥ ४ ॥ नाणं च दंसणं चेव, चरितं च तवो तहा ॥ वीरियं ज वर्जगो य, एयं जीवस्स लरकरणं ॥ ५ ॥ आदार सरीरेंदिय, पत्ती आण पाण जास मणे ॥ चन पंच पंच बप्पिय, इग विगला सन्नि सन्नीणं ॥ ६ ॥ प सिंदिय त्तिबलूसा, साऊदसपाण चन व सग अठ ॥ इग डु ति चरिंदीणं, प्रसन्नि सन्नी नव दस य ॥ ७ ॥ इति जीवतत्वम् ॥ धम्माऽधम्मा ऽगासा, तिय तिय नेया तदेव प्रधाय ॥ खंधा देसपरसा, परमाणु प्रजीव चन्दस दा ॥ ८ ॥ धम्माऽधम्मा पुग्गल, नह कालो पंच हुंति प्रीवा ॥ चलणस दावो धम्मो, थिरसंठाणो अहम्मो य ॥ ए ॥ अवगादो आगासं, पुग्गल जीवाण पुग्गला चन्दा ॥ खंधा देसपएसा, परमाणू चेव नायव्वा ॥ १० ॥ सद्दं For Personal and Private Use Only प्रकरण. ॥५॥ jainelibrary.org Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धयार नजोय, पत्ना गया तवेदिआ॥ वन्न गंध रसा फासा, पुग्गलाणं तु, लकणं ॥११॥एगाकोडिसतसहि, लका सत्तहुत्तरी सहस्सा य॥ दोयस या सोलहिया, आवलिया ग मुहुत्तम्मि ॥ १२ ॥ समयाऽवली मुहुत्ता, दीदा परका य मास वरिसा य॥नणि पलिआ सागर, नसप्पिणी सप्पिणी कालो॥ १३॥ परिणामि जीव मुत्ता, सपएसा एग खित्त किरिआए॥ निचं कारण कत्ता, सबगद मिदि रदिअपवेसे ॥१४॥ इत्यजीवतत्वम् ॥ सा उच्च लागो य मणु उग, सुर उग पंचिंदिजाइपणदेहा ॥ आश् ति तणू णु वंगा, आज श्म संघयण संगणा ॥१५॥ वन्नचनका गुरु लहु, परघा ऊसास आय वु| जोयं ॥ सुलखगइ नमिण तस दस, सुर नर तिरियान तिबयरं ॥१६॥त । स बायर पजत्तं, पत्तेयथिरं सुन्नं च सुन्नगं च ॥ सुस्सर आइज जसं, त साइ दसगं श्मं हो॥१७॥इति पुण्यतत्वम् ॥ नाणंतराय दसगं, नवबीये Jain Educatio n al For Personal and Private Use Only M ainelibrary.org Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकरण. नवतानीय साय मिबत्तं ॥ थावर दस निरयतिगं, कसाय पणवीसतिरियगं॥२७॥all ग बिति चन जाई, कुखगइ नवघाय हुंति पावस्स ॥ अपसबं वन्न चऊ, अपढम संघयण संगणा ॥१॥ थावर सुहुम अपजा, साहारण मथिर ।। मसुन उनगाणि ॥ उस्सर णाश्ज जसं, थावरदसगं तु विस्मेयं ॥ २०॥ इति पापतत्वम् ॥ इंदिश कसाय अन्वय, जोगा पंच चन पंच तिमि कमा ॥ किरिआ पणवीसं, इमान ता अणुकमसो ॥२१॥ काश्य अदिगरणीआ, || पानसिा पारितावणी किरिया ॥ पाणाश्वा रंनिअ, परिगदिया मायवत्ती अ॥३२॥ मिना दंसण वत्ती, अपच्चखाणाय दिहि पुहीअ ॥ पाडुच्चि सामंतो, वणीअ नेसबि साहबी॥ २३ ॥आणवणि विारणीआ, अण all लोगा अणवकंखपच्चश् ॥ अन्नापउँग समुदा, ण पिङ दोसे रिआवदि आ॥२४॥ इत्याश्रवतत्वम् ॥ समई गुत्ति परीसह, जश्वम्मो नावणा च । Jain Educational For Personal and Private Use Only lokllinelibrary.org Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ IN|| रित्ताणि ॥ पण ति ज्वीस दस बार, स पंचन्नेएहि सगवामा ॥२५॥श्य्या नासे सणा दाणे, उच्चारे सुमई सुअ॥मणगुत्ति वयगुत्ति, कायगुत्ति तदेव य Malus६॥ खुदा पिवासा सी जगहें, दंसा चेला र बि॥ चरिआ निसिआ सि झा, अक्कोस वद जायणा ॥२॥अलान रोग तण फासा, मल सकार प। रीसदा ॥ पन्नाअम्माण सम्मत्तं, इत्र बावीसं परीसदा ॥२॥खंती मद्दव अM लाजव, मुत्ती तव संजमे अबोध ॥ सच्चं सोनं आकिं, चणं च बंनं च जश्वना म्मो॥श्॥ पढम मणिच्च मसरणं, संसारो एगया य अमत्तं ॥ असुश्त्तं आ सव सं, वरो अ तह निजरा नवमी ॥३०॥ लोगसदावो बोदी, उलहा धम्म । स्स सादगा अरिदा ॥ एन नावणा, नावे अवा पयत्तेणं ॥३२॥ सामा) अब पढम, वझावणं नवेबीअं ॥परिदारविसुहीयं, सुहमं तद संपरायं च । ॥३॥ तत्तोष अदरकायं, खायं सबम्मि जीवलोगम्मि ॥ जं चरिऊण सुवि Jain Educational For Personal and Private Use Only Mainelibrary.org Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नवत० ॥ ६॥ दिया, वचंति प्रयरामरं ठाणं ॥ ३३ ॥ इति संवरतत्वं ॥ सण मूणोयरिया, व त्तीसं खेवणं रसच्चार्ज ॥ काय किलेसो संली, प्रायवद्योतवो दोइ ॥ ३४॥ पाय चि तं विणर्ज, वेयावच्चं तदेव सद्या ॥ काणं नस्सग्गो वि, निंतर तवो होइ | ॥ ३५ ॥ बारस विदं तवो नि, ज्जराय बंधो चनविगप्पो ॥ पयई विअणु नाग, पएस एदि नायवो ॥ ३६ ॥ इति निर्जरातत्वम् ॥ पयइ सहावोबुत्ता, | विइ कालावदारणं ॥ अनागो रसो नेर्ज, परसो दलसंच ॥ ३७ ॥ पड | पडिदार सि मऊ, हडचित्तकुलाल जंगगारीणं ॥ जद ए एसिंजावा, कम्मा एवि जाण तद जावा ॥ ३८ ॥ इह नाण दंसणावर, एए वेय मोदान नाम गो आणी ॥ विग्धं च पण नव डु प्र, छवीस चन ति सय 5 पणविदं ॥ ३९५ ॥ नाणे य दंसणे य, वेणिए चेव अंतराईए ॥ तीसं कोडाकोडी, प्रयराणं वि | इय नक्कोसा ॥ ४० ॥ सत्तरि कोडाकोडी, मोहणिए वीस नाम गोएसु ॥ ति Jain Educationaal For Personal and Private Use Only प्रकरण. ॥ ६॥ ainelibrary.org Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तीसं अयराइं, आनहि बंध नकोसा ॥ ४२ ॥ बारस मुहत जहन्ना, वेय || णिए अह नाम गोएसु ॥ सेसाणंतमुहुत्तं, लहुहिई सनायवा ॥ ४॥इति । बंधतत्त्वं ॥ संतपय परूवणया, दवपमाणं च खित्तफुसणाय ॥ कालो अ अंत रं ना, गन्नावअप्पा बहु चेव ॥४३॥ संतं सुइ पयत्ता, वित्तं खकुसुमं व न ।। असंतं ॥ मुस्कत्ति पयं तस्सन, परूवणा मग्गणाईहिं॥४४॥ गई इंदीए || काये, जोए वेए कसाय नाणे य ॥ संजम दंसण लेसा, नव सम्मे सन्निा हारे॥४५॥ नरगइ पणिंदि तसन्नव, समि अहकाय खश्अ सम्मत्ते ॥ मु कोणाहार केवल, दंसण नाणे न सेसेसु ॥४६॥ दवपमाणे सिहा, णं जीव । दवाणि हुंति णंताणि॥ लोगस्स असंखिजे, नागे इक्को य सवे वि ॥४॥ || फुसणा अहिआ कालो, गसि पडुच्च साढणंतो ॥ पडिवाया जावा, सिणं अंतरं नजि॥४॥ सव्व जियाण मणंते, नागे तेतेसि दंसणं नाणं॥ Jain Education allonal For Personal and Private Use Only an.jainelibrary.org Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नवत० ॥ ७ ॥ खइए नावे परिणा, मि ए पुण होइ जीवत्तं ॥ ४९ ॥ थोवा नपुंस सि -, यी नर सिद्धा कमेण संखगुणा ॥ इ मुख तत्तमेत्र्यं, नव तत्ता लेस मणि ॥ ५० ॥ जीवा नव पयचे, जो जाएगई तस्स होइ सम्मत्तं ॥ जावेण सद्दढंतो, प्रयाणमाणेवि सम्मत्तं ॥ ५१ ॥ सवाई जिणेसर जा, सिया इं वयणाई नन्नदा हुंति ॥ इह बुद्धी जस्स मणे, सम्मत्तं निञ्चलं तस्स ॥ ५२ ॥ तो मुहुत्त मित्तं, पि फासि जेहिं हुन सम्मत्तं ॥ तेसिं व डूपुग्गल, परिट्टो चेव संसारो ॥ ५३ ॥ नस्सप्पिणी प्रांता, पुग्गल परि |दृर्ज मुणेवो ॥ तेांताती प्रदा, प्रणाया प्रांत गुणा ॥ २४ ॥ जिए जिण तिच तिचा, गिहि अन्न सलिंग थी नर नपुंसा ॥ पत्ते सयंबु झा, | बुधबोहि कणिक्काय ॥ ५५ ॥ जिसिद्धा अरिहंता, अजिए सिन्धाय पुंमरि | या पमुदा ॥ गणहारि तिवसिया, प्रतिच्च सिधा य मरुदेवी ॥ ५६ ॥ गिदिलिं Jain Educationanal For Personal and Private Use Only प्रकरण. ॥ ५ ॥ jainelibrary.org Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ग सि६ नरहो, वलकलचीरीय अन्न लिंगम्मि ॥ साहू सलिंग सिन् हा, श्री सि | चंदा मुदा ॥ ५७ ॥ पुंसिद्धा गोयमाई, गांगेयाई नपुंसया सिद्धा ॥ पत्ते य सयंबुझा, जलिया करकं कविलाई ॥ ५८ ॥ तद बुहबो हिगुरुबो, दिया इग | समय एग सिद्धाय ॥ इग समए वि योगा, सिद्धा ते रोगसिद्धाय ॥ ५ ॥ जयाइ होइ पुच्चा, जिला मग्गंमि उत्तरं तश्या ॥ इक्कस निग्गोयस्स, अ | त जागो य सिदिगर्ज ॥ ६०॥ इति मोहतत्त्वं ॥ इतिश्रीनवतत्त्वं समाप्तं ॥ अथ श्रीकप्रकरणं लिख्यते ॥ नमिनं चनवीस जिणे, तस्सुत्तवियारलेसदे |सप | दंडगपएहिं ते च्चिय, योसामि सुणेह जो नवा ॥ १ ॥ नेरइया असुरा ई, पुढवाइ बेंदियाद चेव ॥ गज्जय तिरिय मणुस्सा, वंतर जोइसिय वेमा | ॥ २ ॥ संखित्तयरीन इमा, सरीरमोगाहणा य संघयणा ॥ सन्ना संगण कसा य लेस इंदीय 5 समुघाया ॥ ३ ॥ दिट्ठी दंसण नाणे, जोगुवगो Jain Educationanal For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दंगक० || 0 || ववाय चव विई ॥ पत्ति किमाहारे, समि गई आगई वे ॥ ४ ॥ चन ग न तिरिय वासु, मणुणं पंचसेस ति सरीरा ॥ थावर चनगे उदर्ज, अंगु लप्रसंखनाग तणु ॥ ५॥ सधेसि पि जहन्ना, सादाविय अंगुलस्स संखं सो नक्कोस पणसय धणु, नेरइया सत्त दव सुरा ॥ ६ ॥ नतिरि सदस जोयण, वसई दिय जोयण सदस्सं ॥ नर तेइंदि तिगाऊ, बेइंदिय जोयणे बार ॥ ७ ॥ जोयण मेगं चरिं, दि देह मुच्चत्तणं सुयेए नयिं ॥ वेनविय देहं पुए, अंगुल संखं समारं ॥ ८ ॥ देव नर दिय लकं, तिरियाणं न वय जोयण |सयाई ॥ डुगुणं तु नारयाणं, नणियं विधिय सरीरं ॥ [ ॥ अंत मुहुत्तं निरए, मुहुत्त चत्तारि तिरिय मणुसु ॥ देवेसु मासो, नक्कोस विजवणा | कालो ॥१०॥ थावर सुर नेरड्या, अस्संघयणा य विगल बेवा ॥ संघयण बगं गन्नय, नर तिरिए मुणेयवं ॥ ११ ॥ सवेसिं चन दह वा, समा स Jain Educationanal For Personal and Private Use Only प्रकरण. ॥ ८ ॥ jainelibrary.org Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वे सुरा य चनरसा ॥ नर तिरिय बसगणा, हुंडा विगलिंदि नेरझ्या ॥१२॥ नाणाविद धय सूई, बुब्बुय वण वान तेज अपकाया ॥ पुहवी मसूर चंदा, कारा संगण नणिया ॥ १३ ॥ सवे वि चउकसाया, लेस बगं गन्न तिरिय मणुएसु ॥ नारय तेक वाऊ, विगला वेमाणिय तिलेसा ॥१४॥ जोसिय॥ तेन लेसा, सेसा सवे वि हुँति चनलेसा ॥ इंदियदारं सुगम, मणुाणं सत्त समुग्घाया ॥१५॥ वेयण कसाय मरणे, वेनविय तेय एय आहारे॥ केवलिय समुग्घाया, सत्त इमे हुँति सन्नीणं ॥ १६॥ एगिदियाण केवलि, तेयाहारग विणान चत्तारि ॥ ते वेनविय वजा, विगला सन्नीण ते चेव ॥२७॥ प्रापण गन्न तिरि सुरेसु, नारय वासु चनर तिय सेसे ॥ विगल उदिछी थावर, मिबत्ती सेस तिय दिछी ॥ १७ ॥ थावर बितिसु अचकु, चरिंदिसु त हुगं सुए नणियं ॥ मणुआ चन दंसणिणो, सेसेसु तिगं तिगं गणियं ।। Jain Education de For Personal and Private Use Only sinelibrary.org Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ inco ॥ ए॥ | ॥ १॥ अन्ना ना तिय तिय, सुर तिरि निरए थिरे ना ग ॥ नान्ना एडु विगले, मणुए पण ना तिच् नाणा ॥ २० ॥ इक्कारस सुर निरए, तिरि एसु तेर पनर मणुसु ॥ विगले चन पण वाए, जोगतियं थावरे होई ॥ २१ ॥ नवगा मणुए सु, बारस नव निरय तिरिय देवेसु ॥ विगलडगे पण बक्कं, चन रिं दिसु थावरे तियगं ॥ २२॥ संख मसंखा समए, गज्जय तिरि विगल नारय सु राय ॥ मणुच्या नियमा संखा, वण ांता यावर असंखा ॥ २३ ॥ सन्नि नर प्रसंखा, जद नववा तदेव चवणेवि ॥ बावीस सग ति दस वा, स सदस उ क्विक पुढवाई ॥ २४ ॥ तिदिए ग्गि ति पल्लाऊ, नर तिरि सुर निरय सागर ति तीसा ॥ वंतर पल्लं जोइस, वरिस लकादिच्यं पलियं ॥ २५॥ सुरा दिय प्रयरं, देसूण 5 पल्लयं नवनिकाए ॥ बारस वासुणु पण दिए, बम्मासु | कि विगला ॥२६॥ पुढवाइ दस पयाणं, अंत मुहुत्तं जन्न आई || Jain Educationaonal For Personal and Private Use Only प्रकरण. ॥ ए ॥ jainelibrary.org Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दस सहस वरिस विश्ा, नवणादिव निरयवंतरिया ॥२॥वेमाणिय जो सिआ, पल्लत यह साना हुंति ॥ सुर नर तिरि निरएसु, ब पऊत्ति थावरे चनगं॥ ॥ विगले पंच पजत्ति, दिसि आहार होइ सवसि ॥ पण गाइ पए जयणा, अह समितियं नणिस्सामि॥॥ चनविद सुर तिरिएसु, निरएसु अ दोहकालिगी सम्मा ॥ विगले देउवएसा, सन्नारहिया थिरा सवे । ॥३०॥ मणुआण दीद कालिञ, दिहीवाउँवएसिआ केवि ॥पज पण तिरि | मणुअ चिय, चनविद देवेसु गति ॥ ३१ ॥ संखान पङ पणिंदि, तिरिय नरेसू तहेव पऊत्ते ॥ नू दग पत्तेयवणे, एएसु च्चिय सुरागमणं ॥३२॥ पज त्त संख गन्नय, तिरिय नरा निरय सत्तगे जंति ॥ निरजवटा एएसु, नववडांति न सेसेसु ॥ ३३ ॥ पुढवी आज वणस्सइ, मख्ने नारय विवजि जीवा॥स वे उववति, निय निय कम्माणुमाणेणं ॥ ३४ ॥ पुढवाइ दस पएसु, पु Jain Education Bonal For Personal and Private Use Only RYu.jainelibrary.org Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ inso ॥ १० ॥ Jain Educationa ढवी आऊ वणस्सई जंति ॥ पुढवाइ दस पर हिय, तेऊ वाऊसु नववार्ड ॥३५॥ ते वाऊ गमणं, पुढवी पमुहम्मि होइ पय नवगे ॥ पुढवाइ वाणदसगा, विग | लाई तिय तहिं जंति ॥ ३६ ॥ गमणा गमणं गमय, तिरिच्याणं सयल जीव गणेसु ॥ सवच जंति मणुच्या, तेऊ वाकहिं नो इति ॥ ३७ ॥ वेय तिय ति रि नरेसु, इबी पुरिसो चनविद सुरेसु । थिर विगल नारएसु, नपुंस वेर्ज ह वइ एगो ॥ ३८ ॥ पऊ मणु बायरग्गी, वेमाणिय नवण निरय विंतरि ॥ जोइस च पण तिरिया, बेइदि तिइंदि नूयाऊ ॥ ३९ ॥ वाऊ वणस्सई चि यदि दिया कमेण मेहुंति ॥ सधेवि इमे जावा, जिणा मए तसो पत्ता ॥ ४० ॥ संपइ तुझ जत्तस्स, दंग पय जमण नग्ग दिययस्स ॥ दंड |तिय विरयसुलहं, बहु मम दिंतु मुकपयं ॥ ४१ ॥ सिरि जिाइंस मुणीस र, र सिरि धवलचंदसी सेणं ॥ गजसारेणं लिदिया, एसा विपत्ति For Personal and Private Use Only प्रकरण. ॥ १० ॥ chainelibrary.org Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अप्पहिआ॥४२॥ इतिश्री दंडकप्रकरणं संपूर्णम् ॥ ७ ॥ ७ ॥ ॥ अथ श्रीलघुसंघयणी प्रारभ्यते ॥ नमिय जिणं सवन्नु, जगपुऊं जगगुरूं महावीरं ॥ जंबुद्दीव पयजे, वुद्धं सुत्ता सपरदेऊ ॥ १ ॥संमा जोयण वासा, पवय कूडा य तिब सेढी ॥ विजय दह सलिलार्ड, पिंमेसि होइ संघयणी ॥२॥णय सयं खंमाणं, नरहपमाणेण नाइए लके॥ अहवा नअसय । गुणं, नरद पमाणं दव लकं ॥ ३ ॥ अहविग खंडे नरहे, दो दिमवंते अ हेमवश् चनरो॥अह महाहिमवंते, सोलस खंडाइ दरिवासे ॥४॥ बत्तीसं पुण निसढे, मिलिया तेसहि बीयपासे वि ॥ चनसहि विदेहे, तिरासि पिंमेशक असयं ॥५॥जोयण परिमाणाइं. सम चनरंसाइंश्च खंमाइं॥लकस्स Nय परिहीए, तप्पाय गुणेय हंतेव ॥६॥विकंन वग्ग दहगुण, करणी वहस्स। परिर होइ॥ विस्कंन पाय गुणिजे, परिर तस्स गणियपयं ॥ ७॥ परिही Jain Educationale For Personal and Private Use Only G ainelibrary.org Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लघुसं० ॥ ११ ॥ तिलक सोलस, सदस्स दोयसय सत्तवीस दिया ॥ कोस तिग अठावीसं, ध | सय तेरंगुल दियं ॥ ८ ॥ सत्तेवयको डिसया, नया बप्पन्न सय सदस्सा इं ॥ चणडयं च सहस्सा, सयं दिवङ्कं च साहीयं ॥ ए ॥ गाना मेगं पनरस, धणुसया तह धणि पनरस्स ॥ सीिं च अंगुलाई, जंबुद्दीवस्स गणियपयं | ॥ १० ॥ नरहाइ सत्त वासा, वियट्ठ चन चनरतिंस वट्टियरे ॥ सोलस व कार गिरि, दो चित्त विचित्त दो जमगा ॥ ११ ॥ दोसय कणय गिरीणं, चन गयदंता य तह सुमेरू य ॥ ब वासदरा पिंडे, एगुणसत्तरि सया न्नी ||१२|| सोलस वरकारेसु, चन चन कूडा य हुंति पत्तेयं ॥ सोमणस गंधमायण, सत्त हय रुप्पि महाहिमवे ॥ १३ ॥ चनतीस वियट्ठेसु, विकुप्पह निसढ नीलवं | तेसु ॥ तह मालवंत सुरगिरि, नव नव कूडाई पत्तेयं ॥ १४ ॥ हिमसिह रिसु | इक्कारस, इय इगसठी गिरीसु कूमाणं ॥ एगत्ते सवधणं, सयचनरो सत्तसठीयं Jain Educationonal For Personal and Private Use Only प्रकरण. ॥ ११ ॥ Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ MAnाचन सत्तअनवग,गारसकूमेहिं गुणद जदसंखं॥सोलस उगुणया लं,ज्वेयसगसहि सयचनरो॥१६॥चउतीसं विजएसु, उसहकूमा अमेरुजंबु माअध्य देवकुराइं, दरिकूम दरिस्सएसह॥रामागद वरदाम पना,सं तिब। विजयेसु एरवय नरदे॥चतीसा तिहिं गुणिया, उरुत्तरसयं तु तिवाणं॥१॥ विजादर अनिगिय, सेढी उन्नि उन्नि वेअद्वे ॥श्य चनगुण चनतीसा, न तीस सयं तु सेढीणं ॥१५॥ चक्की जेयत्वाइ, विजयाइंश्च हुँति चनतीसा॥म लाह दह बप्पनमाई, कुरूसु दसगंति सोलसगं ॥ २०॥ गंगा सिंधू रत्ता, रत्त ॥ वई चन नईन पत्तेयं ॥ चन्दसहिं सहसेटिं, समग्ग वच्चंति जलदिमि ॥२१॥ एवं अग्निंतरिया, चनरो पुण अहवीस सहसेटिं। पुणरवि उप्पन्नेहिं, सहसे । हिं जंति चन सलिला ॥२२॥कुरुमद्ये चनरासी, सहसाइं तहय विजय सो लससु ॥ बत्तीसाण नईणं, चउदस सहसाई पत्तेयं ॥ १३॥ चनदस सद Jain Educationa l For Personal and Private Use Only Mainelibrary.org Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बृहत्सं०स्स गुणिया, अडतिस ना विजय मधिल्ला ॥ सीयाए निवम्, ति तदय प्रकरण. सीयाइ एमेव ॥ २४ ॥सीया सीया वि य, बत्तीससहस्सपंचलकेहिं ॥स ॥१ ॥ वे चउदस लका, बप्पन्न सहस्स मेलविया ॥ २५ ॥ बोयणसकोसे, गंगा । सिंधूण विबरो मूले ॥ दसगुणि पङते, श्य ऽऽ गुणणेण सेसाणं ॥२६॥ जोयणसयमुच्चिछा, कणयमया सिदरिचुल्लदिमवंता ॥ रुप्पि महादिमवंता, उसुनच्चा रुप्पकणयमया ॥ २७ ॥ चत्तारि जोयण सए, चिहो निसढ नी लवंतो य॥निसढो तवणिजम, वेरुलियो नीलवंतो य ॥ ॥ सवे वि प|| दावयवरा, समयखित्तम्मि मंदर विहुणा ॥ धरणितले मुवगाढा, उस्सेय चनबन्ना || यम्मि ॥२॥ खंडाई गाहादि, दसहिं दारेहिं जंबुदीवस्स ॥ सघयणी सम्म । पत्ता, रश्या दरिनद्दसूरीहिं ॥ ३० ॥ इति श्रीलघुसंग्रहणीप्रकरणं संपूर्णम् ॥al 6 ॥ ॥ ॥ अथ बृहत्संग्रहणीसूत्राणि ॥ नमिलं अरिहंताई, विनवणो गादणा यप Jain Educationalisa For Personal and Private Use Only Swastinelibrary.org Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तेयं ॥ सुरनारयाण वुच्छं, नरतिरियाणं विणा जवणं ॥ १ ॥ उववाय चवण विरहं, संखं इगसमइ गमागमणे ॥ दसवाससदस्साई, नवणवईणं जहन्नवि | ई ॥ २ ॥ चमर बलि सार मदिच्यं तद्देवीणं तु तिमि चत्तारि ॥ पलियाई स ढाई, सेसा नवनिकायाणं ॥ ३ ॥ दा हि दिवपलियं, उत्तरन हुंति न्नि दे | सूणा ॥ तद्देवि मन्द पलियं, देणं आमुक्कोसं ॥ ४ ॥ वंतरि प्राण जहन्नं, | दसवास सदस्स पलिप्रमुक्कासं ॥ देवीगं पलिई, पलियं हियं ससिरवी णं ॥ ५ ॥ सरेकेण सदस्सेण य, वासाण गहाण पलिमेएसिं ॥ विइ प्रदे वीणं ॥ कमेण नरकत्ततारा ॥ ६ ॥ पलि चडनागो, चन मनागादिगा | देवी ॥ चजुले चनागो, जदन्नममनाग पंचमए ॥ ७ ॥ दोसादि स त्तसादिय, दस चनदस सतर यर जा सुक्को ॥ इक्किक्क महिय मित्तो, जा इ | गतीसुवरि गेविजे ॥ ८ ॥ तित्तीस गुत्तरेसु, सोहम्माइसु इमा विइ जिठा ॥ Jain Educationational For Personal and Private Use Only ww.jainelibrary.org Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥ १३ ॥ बृहत्सं० सोदम्मे ईसाणे, जदन्न विई पलि महियं च ॥ ९ ॥ दोसाहि सत दस चन्द स, सत्तर यराई जा सहस्सारो ॥ तप्पर इक्विकं, यदि जा गुत्तर चटक्के ॥ १० ॥ इगतीस सागराई, सबठे पुण जहन्नवि‍ नचि ॥ परिगदियाणि रा | यि, सोहम्मीसाणदेवीणं ॥ ११ ॥ पलियं यदि चकमा, विई ज | दन्ना इच्य नकोसा ॥ पलिया सत्त पला, स तदय नव पंचवन्ना य ॥ १२ ॥ पण बच्चन चना य, कमेण पत्ते मग्गम दिसी ॥ असुर नागाइ वंतर, जोइस कप्पडुगिंदणं ॥ १३ ॥ डुसुतेरस डुसुबारस, वप्पण च चन डुगे डु गे च ॥ गेवि पुत्तरे दस, बिसठि पयरा नवरि लोए || १४ || सोहम्मुक्को सहिइ, निप्रपयरविदत्त इचसंगुणि ॥ पयरुक्कोस ठि, सङ्घवजहन्न पलि यं ॥ १५ ॥ सुरकप्पविइविसेसो, सगपयरविदत्त इव संगुणि ॥ दिल्लि ठिइस | दिर्ज, इचियपहरम्मि नक्कोसा ॥ १६ ॥ सोमजमाणं स तिजा, ग पलिय वरुणस्स Jain Educationanal For Personal and Private Use Only प्रकरण. ॥ १३ ॥ w.jainelibrary.org Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ |देसूणा ॥वेसमणे दोपलिया, एसपिई लोगपालाणं॥ १७ ॥कप्पस्स अंतपयरे, निय कप्पवमिंसया विमाणा॥इंदनिवासातेसिं, चकदिसिंलोगपालाणं॥१०॥ (सुरेसु विश्दारं सम्मत्तं,एएसु चेव नवणदारं नामाइ) असुरा नाग सुवन्ना, विल। अग्गीह दीव दहीअ॥ दिसि पवण थणिय दसविद, लवणवई तेसु उछ| इंदा ॥॥ चमरे बलीअ धरणे, नूयाणं देअ वेणुदेवे य॥ तत्तो अ वेणु दा जाली, हरिकंत हरिस्सदे चेव ॥२०॥ अग्गिसिह अग्गिमाणव, पुस्मविसिहे त देव जलकंते ॥ जलपह तह अमिअगई, मिअवादण दादिणुत्तर ॥३॥वे। लंबेअ पनंजण, घोस महाघोस एसि मन्नयरो ॥ जंबुद्दीवं उत्तं, मेरुं दंम पद्ध कारशाचनतीसाचनचत्ता,अहत्तीसायचत्तपंचएहं॥पन्ना चत्ता कमसो,लका नवणाण दाहिण ॥१३॥ चनचनलकविहूणा, तावश्या चेव उत्तरदिसाए॥ शासचे वि सत्तकोडी, बावत्तरि हुँति लरका य॥२४॥ चत्तारियकोडी, लरक। Jain Education For Personal and Private Use Only aw.jainelibrary.org Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बृहत्सं ॥ १४ ॥ बच्चेव दाहिणे नवा ॥ तिमेव य कोडी, लरका बावठि उत्तर ॥ २५ ॥ रय गाए दिहुवरिं, जोयणसहसं विमुत्तु ते जवणा ॥ जंबुद्दी वसमा तह, संख म संखि विचारा ॥ २६ ॥ चूडामणिफणि गरुडे, वजे तद कलस सीह अस्से ॥ गय मयर व हमाणे, प्रसुराई मुसु चिंधे ॥ २७ ॥ असुरा काला ना गुद, हि पंकुरा तह सुवम दिसि यणिया ॥ कणगान विजु सिहि दी, व अ रुण वाऊ पिअंगुनिजा ॥ २८ ॥ असुराणवचरत्ता, नागो दहि विकु दीव सि हि नीला || दिसि यणि सुवन्नाणं, धवला वाऊण संऊरुई ॥ २९ ॥ चउस | हि सहि सुरे, बच्च सदस्साई धरणमाईणं ॥ सामाणिया इमेसिं, चउग्गुणा आयरकाय ॥३०॥ रयणाए पढमजोयण, सदसे हिहुवरिं सय सय विदू ॥ वंत रियाणं रम्मा, जोमा नगरा प्रसंखिता ॥ ३१ ॥ बादिंवा अंतो, चनरंस दो कलियायारा ॥ जवणवईणं तद वं, तराण इंदभवणान नायवा ॥ Jain Educationaal For Personal and Private Use Only प्रकरण. ॥ १४ ॥ jainelibrary.org Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥३२॥ तहिं देवा वंतरिया, वरतरुणीगीयवाश्यरवेणं ॥ निच्चं सुदिया पमुश। नया, गयंपि कालं न याणंति ॥३३॥ ते जंबुदीव नारद, विदेद सम गुरु जहन्न मधिमगा॥वंतर पुण अविदा, पिसायनूया तदा जरका ॥३४॥ रकस किं. नर किंपुरिसा, मदोरगा अम्मा य गंधवा ॥ दादिणउत्तरनेत्रा, सोलस तेसिं इमे इंदा ॥ ३५ ॥काले अ महाकाले, सुरूव पडिरूव पुस्मन्नद्देअ॥ तद चेव । माणिनद्दे, नीमे अ तदा महानीमे ॥३६॥ किंनर किंपुरिस सपुरिस, महापु रिस तदय अश्काए ॥ महकाए गीअरई, गीअजसे उन्नि उन्नि कमा ॥३॥ चिंधं कलंब सुलसे, वड खटुंगे असोग चंपयए ॥ नागे तुंबरुअद्यए, खढंगवि । वजिया रुरका ॥३॥जक पिसायमदोरग,गंधवासाम किंनरा नीलारकस किं पुरिसा वि अ, धवला नूत्रा पुणो काला ॥३॥ अणपन्नी पणपन्नी, इसिवा अ अवाइए चेव ॥ कंदी अ महाकंदी,कोहंमे चेव पयए अ॥४०॥ श्यपढम For Personal and Private Use Only SW ainelibrary.org Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बृहत्सं ॥१५॥ जोयणसए, रयणाए अहवंतरा अवरे ॥ तेसु श्ह सोलसिंदा, रुअग अहो । प्रकरण. दाहिणुत्तर ॥४१॥ संनिदिए सामाणे, हाई विदाए इसिय इसिवाले ॥ सर महेसरे विय, दवइ सुवने विसाले य ॥४२॥ दासे दास रईविय, सेएय न वे तदा महासेए॥ पयगे पयगवईविय, सोलसइंदाण नामाइं॥४३॥ सामाणि याण चनरो, सहस्स सोलसय आयरकाणं ॥ पत्तेयं सवेसिं, वंतरवइ ससि । रवीणं च॥४४॥इंद सम तायतीसा, परिसतिया रकलोगपाला य ॥ अणि य पश्मा अनिउँगा, किब्बिसं दस नवण वेमाणी ॥ ४५ ॥ गंधव नह हय ग. य, रद जड अणियाणि सव्व इंदाणं॥ वेमाणियाण वसहा, महिसा य अहोनि । वासीणं ॥ ४६॥ तित्तीस तायतीसा, परिसतिया लोगपाल चत्तारि ॥अणि आणि सत्त सत्तय, अणियादिव सबइंदाणं ॥४७॥ नवरं वंतर जोइस, इंश ॥ १५॥ दाण न हुंति लोगपालार्ड ॥ तायत्तीसनिहाणा, तियसावियतेर्सि नहु हुँति ॥ Jain Educational For Personal and Private Use Only Het ainelibrary.org Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ NAG॥ समनूतलान अहिं, दसूण जोयण सरहिं आरन ॥ जवरि दसुत्तर - जोयण, सयम्मि चिति जोसिया ॥४॥ तच रवी दस जोयण, असी त वरि ससी य रिकेसु ॥ अह नरणि साइ जवार, बदिमूलो जिंतरे अनि ॥५॥ तार रवि चंद रिका, बुह सुक्का जीव मंगल सणिया ॥ सगसय ननय दस असिइ, चन चन कमसो तिया चनसु॥५१॥ कारस जोयणसय, ग वीसि कारसादिया कमसो॥ मेरुअलोगाबाहिं, जोसचकं चरइ गइशा अकविठागारा, फलिदमया रम्म जोइस विमाणा ॥वंतरनयरेदिं तो, संखि जगुणा श्मे हुँति ॥५३॥ ताई विमाणाइं पुण, सवाई हुँति फालिहमयाइं॥ दगफालीहमया पुण, लवणे जे जोइस विमाणा ॥५४॥ जोयणिगसहि नागा, बप्पन्नडयाल गान गई ॥ चंदाइविमाणाया, म विबरा अ६ मुच्चत्तं॥५॥ पणयाल लरक जोयण, नरखित्तं तबिमे सया जमिरा ॥ नरखित्तान बदिं Jain Education.in Ionel For Personal and Private Use Only 2 .jainelibrary.org Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बहसं पुण, अपमाणा ग्ाि निच्चं ॥५६॥ ससिरविगदनकत्ता, तारा हुंति जहु प्रकरण. त्तरं सिग्घा ॥ विवरीयान महट्टीअ, विमाणवदगा कमेणेसिं ॥५॥ सोलस सोलस अड चन, दो सुरसहसा पुरोय दाहिण ॥ पत्रिम उत्तर सीहा, दबी वसहा हया कमसो ॥ ॥ गहअघासी नकत, अडवीसं तार कोडि || कोडीणं ॥ गसहिसहस नवसय, पणसत्तरि एगससि सिन्नं ॥ ५॥ कोडाना कोडी सन्नं, तरंतु मन्नंति खित्त थोवतया ॥ केई अन्ने उस्से, दंगुलमाणेण ता all राणं ॥६० ॥ किएहं राइविमाणं, निच्चं चंदेण होइ अविरहियं ॥ चनरंगुल मप्पत्तं, दिघा चंदस्स तं चर॥६॥ तारस्स य तारस्स य, जंबुद्दीवम्मि अं| तरं गुरुयं ॥ बारस जोयण सहसा, उन्निसया चेव बायाला ॥६॥ निसढो या नीलवंतो, चत्तारिसयउच्च पंचसय कूडा ॥ अइंजवरिं रिका, चरंति उन्नय ॥ १६॥ 5 बाहाए ॥६३॥ गवघा उन्निसया, जहन्नमेयं तु दोश् वाघाए ॥ निवाघा Jain Educational For Personal and Private Use Only nabrary.org Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ए गुरु लहु, दोगानय धणुसया पंच॥६४ ॥माणुसनगान बाहिं, चंदासूरस्स सूरचंदस्स ॥जोयणसहस्स पन्ना, स गुणगा अंतरं दिहं॥६५॥ ससिससि रविरवि सादिय, जोयण लकेण अंतरं दो॥ रविअंतरिया ससिणो, ससि । अंतरिया रवी दित्ता ॥६६॥ बहियान माणुसुत्तर, चंदा सूरा अवहिनजोया ॥ चंदा अन्नीयजुत्ता, सूरा पुण हुँति पुस्सेहिं ॥६५॥ नझार सागरगे, सो समएहिं तुल्ल दीवुदही ॥ गुणा उगुण पविबर, वलयागारा पढमवऊं ॥ d॥ ६७ ॥ पढमो जोयण लकं, वहो तं वेढि ठिया सेसा ॥ पढमो जंबुद्दीवो, सयंजुरमणोदही चरमो ॥६॥जंबू धाय पुरकर, वारुणिवर खीरघय खो। य नंदिसरा ॥ अरुण रुणवाय कुंमल, संख रुयग जुयग कुसकुंचा ॥ ७० ॥प ढमे लवणोजलहि, बीए कालो य पुरस्कराईसु ॥ दीवेसु ति जलही, दीवस माणेहिं नामेहिं ॥ २ ॥आनरण वत्र गंधे, उप्पल तिवएय पनम निहि रय । Jain Education a n al For Personal and Private Use Only P ww.jainelibrary.org Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकरण. णे॥ वासदर दह नई, विजया वकार कप्पिदा ॥॥ कुरु मंदर आवासा, कूडा नकत्त चंद सूरा य॥ अन्ने वि एवमाइ, पसब वब्रूण जे नामा ॥ ३ ॥ तं नामा दीवु दही, तिपडोयायार हुँति अरुणाई॥ जंबू लवणाईया, पत्तेयं ते असंखिजा ॥७॥ ताणं तिम सूरवरा, वनास जलदी परं तु इक्किका ॥ देवे नागे जके, नए य सयंजुरमणे य ॥३॥ वारुणिवर खीरवरो, घयवर लवणो । *य हुँति निन्नरसा ॥ कालो य पुरकरोददि, सयंजुरमणो य उदगरसा ॥ ६ ॥ इकुरस सेसजलही, लवणे कालो य चरिम बहुमबा॥ पण सग दस जोयण सय, तणु कमा थोवसेसेसु ॥७॥ दो ससि दो रवि पढमे, उगुणा लवणम्मि, धायईसंमे॥ बासससि बारस रवि, तप्पनि निदि ससिरविणो ॥ ॥ ति । गुणा पु विल्ल जुया, अणंतराणंतरंमि खित्तंम्मि ॥ कालोए बायाला, बिसत्तरी पुस्कर इंमि॥७॥ दो दो ससि रवि पंती, एगतंरिया बसहि संखाया। मेलं , Jain Educational For Personal and Private Use Only Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पयादिणंता, माणुसखित्ते परियडंति ॥ ७० ॥ बप्पमं पंती, नकत्ताणं तुमणु यलोगंमि ॥ गवही गवळी, होई इक्किकिया पंती ॥॥ एवं गहाणो विह, नवरं धुव पासवत्तिणो तारा ॥ तंचिय पयादिणंता, तवेव सया परिनमंति Auचनयाल सयं पढमि, लयाए पंतीए चंदसूराणं ॥ तेणपरं पंती, चन रुत्तरियाई वुट्टीणं ॥७३॥ बावत्तरि चंदाणं, बावत्तरि सूरियाण पंतीए ॥ पढमा ए अंतरं पुण, चंदाचंदस्स लक उगं ॥॥ जो जाव लकाई, विवर सा *गरो य दीवो वा ॥ तावश्आ य तहिं, चंदासूराण पंती ॥५॥ पनरस चुल सीइ सयं, श्द ससि रवि मंमलाइं तकित्तं ॥ जोयण पणसय दसहिय, नागा अडयाल गसहा ॥६६॥ तिसिगसहा चनरो, गगसहस्स सत्तनश्य। |स्स ॥ पणतीसं च छ जोयण, ससिरविणो मंमलं तरयं ॥७॥ पणसही न सदमिय, तत्तिय बादा 5 जोयणं तरिया ॥ एगुणवीसं च सयं, सूरस्स य मंग For Personal and Private Use Only Jain Educationa international Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥१७॥ इसाला लवणे ॥॥ मंमलदसगं लवणे, पणगं निसढम्मि होइ चंदस्स ॥ मंगल प्रकरण. अंतरमाणं, जाण पाणं पुरा कदियं ॥णा ससिरविणो लवणंमि य, जोयण सय तिमि तीसअदियाइं॥ असिई तु जोयणसयं, जंबुद्दीवम्मि पविसंतिाए। गद रिक तार संखं, जबसि नाउ मुददिदीवे वा ॥ तस्ससिदि एग ससिणो, गुणसंखं दोश् सबग्गं ॥ १ ॥ बत्तीसहावीसा, बारस अड चन विमाण ल | स्काइं॥पन्नास चत्त सहस, कमेण सोदम्म माईसु ॥ ए२ ॥उसु सयचन all उसु सयतिग, मिगारसहियं सयं तिगेदिहा ॥ मये सत्तुत्तरसय, मुवरि तिगे || सयमुवरि पंच ॥ ए३ ॥ चुलसी लरक सत्ता, णव सहस्सा विमाण तेवीसं ॥ सबग्ग मुडुलोगं, मिइंदया बिसहि पयरेसु ॥ ए४॥ चनदिसि चनपंती, बासहिविमाणिया पढमपयरे ॥ नवरि इक्किक्कहीणा, अणुत्तरे जाव शकिकं | GIRL ॥ इंदयवटा पंतिसु, तोकमसो तंस चनरसा वट्टा ॥ विविदा पुप्फवकि। ॥१७॥ Jain Educational For Personal and Private Use Only rebrary org Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मा, तयंतरे मुत्तुं पुवदिसि ॥ ए६॥ वटं वद्देसुवीर, तंसं तंसस्स उवरिमं दो॥ चतरंसे चनरंसं, नटुंतु विमाण सेढीए॥ ए ॥ सवे वट्टविमाणा, एगज्वारा हवंति नायवा॥ तिमिय तंस विमाणे, चत्तारि य हंति चनरंसे॥ए॥आवलि य विमाणाणं, अंतरं नियमसो असंखिऊं ॥ संखिजमसंखिङ, नणियं पु फावकिमाणं ॥ एए॥ एगं देवे दीवे, ज्वे य नागोदही सुबोधवे ॥ चत्तारि ज कदीवे, नूय समुद्देसु अहेव ॥ १० ॥ सोलस सयंजुरमणे, दीवेसु पहिया य सुरनवणा ॥ गतीसं च विमाणा, सयंजुरमणे समुद्दे य ॥ १०१॥ अञ्चंत सुरदिगंधा, फासे नवणीय मग्य सुद फासा ॥ निच्चुजोया रम्मा, सयंपहा ते विरायति ॥१०॥जे दकिणेण इंदा, दादिणजे आवली मुणेयवा ॥ जे पुण नत्तर इंदा, उत्तर आवली मुणे तेसिं॥१०३ ॥ पुत्वेण पत्रिमेण य, जे वट्टा | तेवि दादिणिल्लस्स ॥ तंस चनरंसगा पुण, साममा हुँति पुण्हंपि ॥२०४॥ पुवे | Jain Educationa l For Personal and Private Use Only EXPainelibrary.org Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बृहत्स० ॥ १९ ॥ Jain Educational | पश्चिमेण य, सामसा आवली मुणेयवा ॥ जेपुण वह विमाणा, मघिल्ला दा | दिवाणं ॥ १०५ ॥ पागारपरिरिकत्ता, वह विमाणा दवंति सवेवि ॥ चनरंस विमाणा, चनद्दिसिं वेश्या होइ ॥ १०६ ॥ जत्तो वट्टविमाणा, तत्तो तंसस्स वेश्या होइ ॥ पागारो बोधवो, अवसेसेरिंतु पासेसु ॥ १०७ ॥ पढमं तिम पयरा वलि, विमाण मुदभूमि तस्स मास ई ॥ पयरगुण मिठकप्पे, सवग्गं पुप्फकि | मयरे ॥ १०८ ॥ इदिसि पंति विमाणा, तिविजत्ता तंस चंजरसा वहा ॥ तंसे सुसेसमेगं, खिव सेस डुगस्स इक्किकं ॥ १०९ ॥ तंसेसु चनरंसेसु य, तो रासि तिगंपि चगुणं कां ॥ वट्टेसु इंदयं खिव, पयरधणं मीलियं कप्पे ॥ ११० ॥ कप्पेसुय मिय महिसो, वराद सीदाय बंगल सालूरा ॥ हय गय जुयंग खग्गी, | वसदा विकिमाई चिंधाई ॥ १११ ॥ चुलसी सिइ बावत्तरि, सत्तरि सही य पन्न चत्ताला ॥ तुलसुर तीस वीसा, दस सदस्सा आयरक चउगुणिया ॥ hat For Personal and Private Use Only प्रकरण. ॥ १५ ॥ jainelibrary.org Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥११॥ऽसु तिसु तिसु कप्पेसु, घणुदहि घणवाय तनयं च कमा ॥ सुरन । वणपश्हाणं, आगास पशघ्या जवरि ॥११३॥ सत्तावीस सया, पुढवीपिं ।। मो विमाण उच्चत्तं ॥ पंचसया कप्पज्ज्गे, पढमे तत्तोय शक्तिकं ॥ ११४॥ दाय पुढवीसु सयं, वमृइ जवणेसु उउउ कप्पेसु॥ चनगे नवगे पणगे, तदेव जाणु । त्तरेसु नवे ॥११५॥गवीस सया पुढवी, विमाण मिकारसेवय सया॥ब त्तीस जोयणसया, मिलिया सबब नायबा ॥ ११६ ॥ पण चन ति वाम वि मा, ण सधय उसु उसुय जा सहस्सारो॥नवरि सिय नवण वंतर, जोसि । याणं विविहवामा ॥ ११॥ रविणो उदयवंतर, चनणवइसहस पणसय | वीसा ॥ बायाल सहिनागा, कक्कड संकति दियहमि ॥१२॥ एयंमि पुणो गुणिए, तिपंच सग नवहि होइ कममाणं ॥ तिगुणमि य दोलका, तेसी स हस्स पंचसया ॥ ११॥ असिई सहिन्नागा, जोयण चनलक बिसतरि Jain Educati o nal For Personal and Private Use Only .allw.jainelibrary.org Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बृहत्सं० ॥ २० ॥ सहस्सा ॥ बच्चया तेत्तीसा, तीसकला पंचगुणियम्मि ॥ १२० ॥ सत्तगुणे ब |लका, इगसद्विसदस्स ब सय बासीया ॥ चउपन्न कला तह नव, गुणंमि प्र | डलरक सङ्घाई ॥ १२१ ॥ सत्तसया चत्ताला अठारसकला य इयकमा चन रो ॥ चंडा चवला जया, वेगाय तदा गइ चउरो ॥ १२२ ॥ श्वयगई चन चिं, जयणयरिं नाम केइ मन्नंति ॥ एहिं कमेहिं मिमाहिं, गईदिं चउरो सुरा | कमसो ॥ १२३ ॥ विकं यामं, परिदं अतिरिं च बाहिरियं ॥ जुगवं मि | ति बम्मा, स जाव न तदावि ते पारं ॥ १२४ ॥ पावंति विमाणाणं, केसिंपि | दुदव तिगुणियाईए ॥ कमचनगे पत्तेयं, चंमाईगईन जोइता ॥ १२५॥ जो यण लक परमाणं, निमेस मित्ते जाइ जो देवा ॥ बम्मासे णय गमणं, एगं रजू जिणा बिंति ॥ १२६ ॥ तिगुणेण कप्पचडगे, पंचगुणेणं तु अठसुमुणिता॥ गेविजे सत्तगुणेणं, नवगुणे गुत्तरचक्के ॥ १२७ ॥ पढमपयरम्मि पढमे, कप्पे Jain Educationantemnational For Personal and Private Use Only प्रकरण. 11 20 11 Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उडुनामइंदयविमाणं ॥ पणयाल लस्कजोयण, लकं सववरि सवठं ॥१२॥ उडु चंद रयणवग्घू,वीरिय वरुणे तदेव आणंदे।बने कंचण रुश्ने,चंद अरुणे य । वरुणे य॥१२॥ वेरुलिय रुयग रुश्रे, अंके फलिहे तदेव तवणिजे ॥ मेरे अग्घ दलिद्दे, नलिणे तहलोदियकेय ॥२३०॥ वरे अंजण वरमा, ल रिक देवेय सोम मंगलए ॥ बलनद्दे चक्क गया, सोवबिय मंदियावत्ते॥१३१॥आ। all करेय गिही, केक गरुले य होइ बोधवे ॥ बने बंनदिए पुण, बंजुत्तर खंत || ए चेव ॥१३॥ महसुक्क सदस्सारे, आणय तद पाणएय बोधवे॥ पुप्फे लंका र आरण, तदा विय अच्चुए चेव ॥१३३॥सुदंसण सुपडिबझे ॥ मणोरमे चे व होइ पढमतिगे॥ तत्तोय सबन्नद्दे, विसालए सोमणे चेव॥१३४॥ सोमणसे पीश्करे, आश्च्चे चेव होइ तश्य तिगे॥सवह सिद्धि नामे, इंदया ए व बासही ॥ १३५॥ पणयालीसं लका, सीमंतय माणुसं उडु सिवंच ॥ अपयमाणो Jain Education thermonal For Personal and Private Use Only L ainelibrary.org Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥११॥ वृहत्संग सब, जंबुद्दीवो इमं लकं ॥१३६॥ अह नागा सग पुढवी, सु रङ्गु शकिक प्रकरण. तह य सोहम्मे ॥ मादिंद संत सहसा, र अच्चुय गेविज लोगंते ॥ १३ ॥ Fan ॥सुरेसु नवण दारं सम्मत्तं ॥इण्डिं उगाहणा दारं नम॥ ॥ ॥ जवण वण जोइ सोद, म्मीसाणे सत्तहब तणुमाणं ॥ऽऽऽचनक्केगे वि, जणु त्तरे दाणि शकिकं ॥१३॥कप्पगऽऽऽचनगे, नवगे पणगे य जिवित्र यरा ॥ दो सत चनदहारस, बावीसिगतीस तित्तीसा ॥ १३॥ विवरे ताणि । कूणे,श्कारसगान पामिए सेसा ॥ दबिकारसनागा, अयरे अयरे समदियम्मि|| ॥१०॥चयपुवसरीराजे, कमेणएगुत्तराश् वुड्डीए॥एवंविविवेसा, सणंकुमारा ॥ तणुमाणं॥१४॥नवधारणिक एसा, उत्तरविनवि जोयणालकं ॥गेविका Kणुत्तरेसु, उत्तरवेनविश्रा नजि॥१४॥साहाविय वेनविय, तणू जहमा कमेण पारंने॥अंगुल असंख नागो, अंगुल संखिका नागोय॥१४३॥२॥ सुरेसु || ॥ १॥ Jain Educational For Personal and Private Use Only Lainelibrary.org Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गाहणा दारं सम्मत्तं, शमिदं विरहकालोववाय नवदृणाणं दारं नाम॥॥ सामन्नेणं चनविह, सुरेसु बारसमुहुत्त नक्कोसा॥उववायविरहकालो, अह नव णाईसु पत्तेयं ॥१४॥नवणवण जोइ सोह,म्मी साणेसू मुहुत्त चनवीसंतो नवदिण वीसमुद्र, बारसदिण दस मुहुत्ता य॥१४५॥बावीस सट्टदीदा, पणया । ल असी दिणसयंतत्तो॥संखिजा उसु मासा, उसु वासा तिसु तिगेसु कमा ॥ ॥ २४६॥ वासाणसया सहसा, खरका तह चनसु विजयमाईसु ॥ पलियाअसं खन्नागो, सब संखनागोय॥२४ासवेसिपिजहन्नो, समई एमेव चवणविरहो। वि॥गति संख मसंखा, ग समए हंति अचवंति॥१४॥नरपंचिंदिय तिरिया, णुप्पत्तीसुरनवे पजुत्ताणं॥अद्यवसाय विसेसा, तेसिं गई तारतम्मंतु : णानर तिरिअसंखजीवी, सवे नियमेण जंति देवेसु॥ निय आनअसम ही णा, नएसु ईसाण अंतेसु॥१५०॥जति समुचिम तिरिया, जवण वणेसु नजो N Jain Educational For Personal and Private Use Only h ainelibrary.org Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बृहत्सं ॥ २२ ॥ इमाईसु ॥ जं तेसिं नववार्ज, पलिया संखंस प्रासु ॥ १५१ ॥ बालतवे पबिधा, उक्कड रोसा तवेण गारविया ॥ वेरेय पडिबा, मरिनं सुरेस जायंति ॥ १५२ ॥ | रजगाद विस नरकण, जल जल पवेस तरह बुद दर्ज || गिरिसिर पडणा न मुया, सुदद्भावा हुंति वंतरिया ॥ १५३ ॥ तावस जा जोइसिया, चरग परिवा य बंजलोगो जा ॥ जा सहसारो पंचिं, दितिरिच्य जा अच्चु सड्ढा ॥ १५४ ॥ इ लिंग मिच्छदिधि, गेविका जाव जंति नक्कोसं ॥ पयमवि सदहंतो, सुत्तचं मिच्च दिट्ठी ॥ १५५॥ सुतं गणदररइयं तदेव पत्तेयबु-दरइयं च ॥ सुयकेवलि या रश्यं, अनिल दस पुत्रिणा रइयं ॥ १५६ ॥ बनमच संजयाणं, नववा नक्को सर्जा सबठे ॥ तेसिं सङ्काणं पित्र्य, जदम होइ सोहम्मे ॥ १५७ ॥ संतंमि चन्दपुविस, तावसाईण वंतरेसु तदा ॥ एसि नववाय विदी, नियकिरियविया | सोवि ॥ १५८ ॥ वरिसदनारायं, पढमं बीयं च रिसदनारायं ॥ नारायम Jain Educationonal For Personal and Private Use Only प्रकरण. ॥ १२ ॥ w.jainelibrary.org Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ इनारा, यक़ीलिया तहय वठं ॥ २५ ॥ एए उस्संघयणा, रिसहोपट्टोय की लिया वऊं॥ नन्नमक्कडबंधो, नाराऊ दोश विन्ने॥१६०॥ गन्नतिरीनराणं, समुचिम पणिंदि विगलवह ॥ सुरनेरश्या एगिं, दियाय सत्वे असंघयणा || ॥२६॥वहेण जगम्मश्, चनरोजा कप्प कीलियाईसु॥चनसु कप्पवुट्टी, पढमेणं जावसि-हीवि॥१६॥समचरंसे नग्गो,हसाश्वामणय खुज डंडे य॥ जीवाण व संगणा, सवब सुलकणं पढमं ॥१६३॥ नाहीए उवरि विगं, तई अमदो पिहि जयर नरवङ ॥ सिर गीव पाणी पाए, सुलकणं तं चनबं तु ॥ ॥१६॥विवरीयं पंचमगं, सब अलकणं नवे उहं ॥ गन्नय नर तिरिय बहा, सुरा समा ढुंम्या सेसा॥१६॥इतिदेवानां गतिघारं, अधुना आगतिधार माद Falnाजंति सुरा संखान य, गप्नय पजात्त मणुयतिरिएसु ॥ पङत्ते सुय बायर, नू । दग पत्तेयग वणेसु॥१६॥तवि सणं कुमार, प्पन्निई एगिदिएसु नो जंति॥ Jain Education a l For Personal and Private Use Only Jijainelibrary.org Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बृहत्सं० ॥ २३ ॥ Jain Educationa प्रणय पमुदा चविनं, मणुए सुचैव गचं ति ॥ १६७ ॥ दोकप्प कायसेवी, दो दो | दो फरिस रूवसदेदिं ॥ चउरो मणेणु वरिमा, अप्पवियारा प्रांतसुदा ॥ १६८ । जं च कामसुदं लोए, जं च दिव्वं महासुदं ॥ वीयराय सुदस्सेय, पंतनागं पि नग्घई ॥१६५॥ नववार्ड देवी, कप्पडगं जा परो सदस्सारा ॥ गमणागमणं न ची, अन्य परर्ज सुराणंपि ॥ १७० ॥ तिपलिय तिसार तेरस, साराकप्प डुग त इय संत हो ॥ किब्बिसिय नहु॑ति नवरिं, अन्य पर निर्जगाई ॥ १७२ ॥ अ परिग्गद देवी, विमाण लरका व हुंति सोहम्मे ॥ पलियाई समया हिय, वि | इजासिं जाव दसपलिया ॥ १७२ ॥ ता सां कुमारा, ऐवं वद्धंति पलिय दस | गेहिं ॥ जा वंज सुक्क प्रणय, आरण देवाण पन्नासा ॥१७३॥ ईसाणे चडलका, साहिय पलियाइ समय हियविई ॥ जा पनर पलिय जासिं, तार्ज माहिंददे वाणं ॥ १७४॥ एए कमेण नवे, समयाहिय पलिय दसग वुट्टीए ॥ संत सह For Personal and Private Use Only प्रकरण. ॥ २३ ॥ jainelibrary.org Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ |सार पाणय, प्रच्य देवाण पणपन्ना ॥ १७२॥ किएहा नीला काऊ, तेक पम्हा य सुकलेसा ॥ जवण वण पढम चडले, सजोइस कप्पडुगे ते ॥ १७६ ॥ क प्पतिय पम्हलेसा, संताइसु सुक्कलेस हुंति सुरा || कणगान पनमकेसर, वस्मा | डुसु तिसुनवरि धवला ॥ १७७॥ दसवास सदस्साई, जहन्नमानं धरंति जे देवा ॥ तेसिं चन्या दारो, सत्तदि योवेदि ऊसासो ॥ १७८ ॥ यदि वादि विमुक्कस्स, | नीसासूसास एगगो ॥ पाणू सत्तइमो थोवो, सोवि सत्तगुणो लवो ॥१७॥ ल वसत्तत्तरी ए, होइ मुदुत्तो इमम्मि ऊसासा ॥ सग तीस सय तिदुत्तर, तीसगुणा ते होरते ॥ १८० ॥ लकं तेरस सहसा, नन्यसयं यरसंखयादेवे ॥ परके हिं ऊसासे, वास सदस्सेदिं आहारो ॥ १८२ ॥ दसवास सदस्सु वरिं, ई जाव सागरं ऊणं दिवसमुहुत्त पहुत्ता, आहारूसास से साणं ॥ १८२॥ सरिरेणो जयादारो, तयाइफासेण लोमाहारो ॥ परकेवादारोपुण, कावलि होइ ना समया Jain Educationantematonal For Personal and Private Use Only Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकरण. बृहत्संग यवो॥२७॥याहारासबे, अपजत्त पजत्तलोमआहारो॥सुरनिरय इगिदिवि । MAINणा, सेसनवा सपकेवा ॥१४॥सच्चित्ता चित्तोन्नय, रूवो आहारसव तिरि आणं॥सवनराणं च तदा, सुरनेरझ्याण अञ्चित्तो॥१५॥ आन्नोगाणा नो गा, सवेसिं दो लोम आदारो ॥ निरयाणं अमणुन्नो, परिणम सुराण समणु मो॥१७॥तह विगल नारयाणं, अंतमुहुत्ता सहोइ नक्कोसो ॥ पंचिंदि तिरि INनराणं, सादाविन ह अहम ॥ १७ ॥विग्गदगइ मावन्ना, केवलिणो समु दया अजोगी य॥सिधा य अणादारा, सेसा आहारगा जीवा ॥ १७ ॥ केस मिंस नद रो,मरुदिर वसचम्म मुत्त पुरिसेहिं ॥ रहिया निम्मल देहा, सुगं । ध निस्सास गय लेवा ॥रना अंतमुहुत्तेणं चिय, पजत्ता तरुण पुरिस संका INसा ॥ सवंगनूषणधरा, अजरानिरुया समा देवा ॥ २०॥ अणि मिस नयणा || ॥२४॥ मणक,ऊ साहणा पुप्फदाम अमिलाणा ॥ चनरंगुलेण नूमि, न बिंति सुरा Jain Educati onal For Personal and Private Use Only Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | जिला विंति ॥ १९२॥ पंचसुजिण कल्लाणे, सु चेव महरिसि तवाणु जावा ॥ जम्मंतरनेदेण य, आगचंति सुरा इदयं ॥ १०२ ॥ संकंति दिवपेमा, विसय पस त्ता समत्त कत्तवा ॥ प्रादीण मणुय कजा, नरजव मसुदं न इंति सुरा ॥ १०३ ॥ | चत्तारि पंचजोयण, सयाइ गंधोय मणुयलोगस्स ॥टुं वच्चइ जेणं, नतु देवा तेण आवंति ॥ १९४॥ दो कप्प पढम पुढवी, दो दो दो बीय तइयगं चथिं ॥ चन न वरिम दीए, पासंती पंचमं पुढविं ॥ १८॥ बडी बग्गेविका, सत्तमीयरे अणु त्तर सुराजं ॥ किंचू लोगनालिं, असंखदी बुद्धि तिरियं तु ॥ १९६॥ बहुपर गं नवरिमगा, उङ्कं सविमाण चूलिय धयाइ ॥ कण६ सागरे सं, ख जोयणा तप्पर मसंखा ॥ १७ ॥ पण वीस जोया लहु नारय जवणवण जोइ कप्पा गेवि णुत्तराणय, जदसंखं उदियागारा ॥ १८ ॥ तप्पागारे पल्लग, पमदगऊ वरि मुहंग पुप्फजवे ॥ तिरिय मणुएसु उहि, नाणाविद संविजे मणि ॥ १एगा Jain Educational Coll For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्ररकण. बृहत्सं० नटुं जवण वणाणं, बहुगोवेमाणियाण होउँदो ॥ नारय जोइस तिरिय, नर ति ॥ रियाणं अणेगविदो ॥५०॥ श्यदेवाणं नणियं, विशपमुहं नारयाणवुनामि॥ गतिन्नि सतदससतर, अयर बावीस तित्तीसा॥२०॥सत्तसु पुढवीसुविई, जि. होवरिमा दिपुहवीए॥दोश्कमेणकणिछा, दसवास सहस्स पढमाए॥२०॥ नव सम सहस लरका, पुवाणं कोडि अयरदस नागा ॥ इकिक नाग वुट्ठी, जा अयरं तेरसे पयरे ॥२०३॥श्य जिह जहमा पुण, दसवास सहस्स लक प. || यर उगे॥सेसेसु जवरि जिछा, अहो कणिहान परं पुढवी ॥२०॥ नवरि खि विश विसेसो, सगपयर विदत्तु श्वसंगुणि ॥नवरिम खिश वि सदि, छिय पयरम्मि जक्कोसा ॥२०॥ सत्तसु खित्तज वेयणा, अन्नन्न कयावि पहरणे हिं विणा ॥ पहरण कया वि पंचसु, तिसु परमादम्मिय कयाविं ॥३०६॥ बंधण गइ संगणा, नेया वरमा य गंध रस फासा ॥ अगुरु लहु सद्द दसहा, असुहा ॥२५॥ Jain Education international For Personal and Private Use Only M.jainelibrary.org Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विय वुग्गला निरए॥२० जानरया दस विद वेयण,सी सिण खुह पिवास के हिं॥ परवस्सं जरदाहं, नय सोगं चेव वेयंति ॥२०॥ पण कोमि अहस ही, लका नव नव सहस पंचसया॥ चुलसी अदीयरोगा, बही तह सत्तमी नरए ॥२०॥ रयण प्पह सक्कर पद, वालुय पह पंक पहय धूमपदा ॥ तमप हा तम तमपहा, कमेण पुढवीण गोत्ताई॥१०॥धम्मा वंसा सेला, अंजण रिहा मघा य माघवई॥ नामेहिं पुढवी, बत्ताई बत्त संगणा॥२१॥असीय बत्तिस अडविस, वीसा अहार सोल अम सहसा ॥लकुवरि पुढवि पिंमो, लघणुदहि घणवाय तणुवाया ॥१॥ गयणंचपहाणं, वीस सहस्साइं घणुद ही पिंमो॥घणतणुवाया गासा, असंख जोयण जुया पिंडो॥ १३ ॥ न फुसं तिअलोगं चन, दिसंपि पुढवीय वलयसंगहिया ॥ रयणाए वलयाणं, ब |ध पंचम जोयणं सटुं॥ १४ ॥ विकंनो घणनदही, घणतणु बायाण होला Jain Education ||R amal For Personal and Private Use Only braryong Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकरण. __ बृहत्सं० जहसंखं ॥ सत्तिनाग गाळयं, गाऊयं तद गानय तिनागो ॥१५॥ पढमा मदीवलएसु, खिविङ एयं कमेण बीयाए॥ ति चन पंच व गुणं, तश्या , इसु तंपि खिव कमसो ॥१६॥ मचिय पुढवि अहे,घणुदहिपमुहाण पिंड प रिमाणं ॥ नणियं तवो कमेणं, दायजा वलय परिमाणं ॥१७॥ तीस पणवीस पणरस, दसतिमि पणूण एगलकाइं ॥ पंचय निरया कमसो, चुलसी लकाइ सत्तसु वि॥ १७ ॥ तेरिकारस नव सग, पण तिन्नि ग। पयर सवि गुणवन्ना ॥ सीमंताई अप्पर, गणंता इंदया मते ॥१॥सी मंतडपढमो, बी पुण रोरुय त्ति नामेण ॥रंनो य तब तल, दोश् चनबो य जनतो ॥२०॥ संनंतमसंनंतो, विनंतो चेव सत्तमो निर ॥ अहम नं तो पुण,नवमो सीउत्ति णायचो॥२२॥ चकंतणु वुक्कंतो, विकलो तह चेव रोरु |॥२६॥ निर ॥ पढमाए पुढवीए, इंदिया एएबोधवा ॥श्श्शाथणिए थणए य तदा, Jain Education allonal For Personal and Private Use Only Mriainelibrary.org Page #57 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मणए मणए य होइ नायवे ॥घढे तहसंघटे, जिग्ने अव जिन्नए चेव ॥२२३ ॥ लोले खोलावत्ते, तहेव घण लोलुए य बोधवे ॥ बीयाए पुढवीए, इक्कारस इंदि । IN या एए॥श्श्ातत्तो तवि तवणो, तावस्मो पंचमो य निद्दो॥हो पुण पज लि,नुप्पजलि यसत्तम ॥श्श्या संजलि अमर्ज, संपङलिउ यनवम नणितश्याए पुढवीए, नवदिय नारया ए ए॥२६॥आरे तारे मारे, बच्चे तमए य होइ नायवे ॥खाड खमे खंमखमे,इंदय नरया य चनडीए॥श्श्शाखा । || ए तमए य तहा,कसे कसंधए तहा तिमिसे ॥श्द पंचम पुढवीए, पंच निरइंद। या हुंति ॥२॥ हिमवद्दल लल्लके, तिणिननिर इंदयाय नहीए॥एगो य स । दत्तमाए, अपश्हाणो न नामेणं ॥श्शणा पुवेण होइ कालो, अवरेण पहिम हाकालोरोरो दाहिणपासे,उत्तर पासे महारोरो॥२३॥तेहिंतो दिसि विदिसिं, विणिग्गया अह निरय आवलिया ॥ पढमे पयरे दिसि गुण, वन्ना विदिसासु । Jain Education For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #58 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥ ७॥ बृहत्सं० अमयाला ॥२३१॥ बीयाइसु पयरेसु, ग ग हीणान हुंति पंतीजाजा सत्त प्रकरण. मि महि पयरे, दिसि इक्किको विदिसि नहि ॥२३॥छप्पयरे ग दिसि, संख|| अम्गुणा चन विण ग संखा ॥ जह सीमंतय पयरे, एगुणनगया सया तिन्नी । IN॥२३३ ॥अपयहाणे पंचन, पढमो मुहमंतिमो दवइनूमी॥ मुह नमि समास इं, पयरगुणं हो सवधणं॥२३४ामवर सय तिवमा, सत्तसु पुढवीसु आवY जाली निरया ॥ सेस तियासी लरका, तिसय सियाला नवश सहसा ॥ ३५॥ तिसहस्सुच्चा सत्वे, संखमसंखिऊ विमा यामा॥पणयाल लरक सीम, तय ल INo अपश्गणो॥३६॥दिछा घणो सदस्सा, उप्पिसे कुछडे सहस्सं तु॥ मले जा सहस्स सुसिरा, तिमि सदस्सुस्सिया निरया ॥२३॥ उसु दिछोवरि जोयण, सहस्स बावन्न सट्टचरिमाए ॥ पुढवीए निरय रहिय, निरया सेसम्मि सवासु H॥३॥ बिसहस्सूणा पुढवी, तिसहस गुणिएहिं नियय पयरेहिं ॥ कणा रुवु ॥ ७॥ Jain Educational For Personal and Private Use Only Mainelibrary.org Page #59 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Educationa | निय पयर, नाईयापचडंतरयं ॥ २३ ॥ | तेसीया पंचसया, इक्कारस चेव जो या सहस्सा ॥ रयणाय पचडंतर, मेगोचिय जोया तिनागो ॥ २४० ॥ सत्ताण वइ सयाई, बीयाए पचड़ंतरं होई || पणदत्तरि तिन्निसया, बारसहस्सा य तइ याए ॥ २४२॥ बावसयं सोलस, सहस्स पंका य दोति जागा य ॥ अट्ठाइस याई, पणवीस सहस्स धूमाए ॥ २४२॥ बावन्नसढ सहसा, तमप्पना पचमंतरं दोइ ॥ एगो चिप्रपच, अंतरर हि तमतमाए ॥ २४३ ॥ पठण्ड धणु व अं गुल, रयणाए देहमाणमुक्कासं ॥ सेसासु डुगुणा डुगुणं, पणधणु सय जावचरि माए ॥ २४४ ॥ रयणाय पढम पयरे, दचतियं देहमाणमणुपयरं ॥ बप्पसंगुल सड्ढा, बुढीजातेरसे पुष्पं ॥ २४२॥ जं देहपमाण वरि, माए पुढवीइ अंतिमे प यरे ॥ तं चिय दिद्धि म पुढवी, पढमं पयरम्मि बोधवं ॥ २४६ ॥ तं चेगूणग सगपय र, जश्यं बीयाइ पयर बुढिनवे ॥ तिकर ति अंगुल करसत, अंगुला सढि गु onal For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #60 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकरण. बृहत्संगण वीसं ॥२४॥ पणधणु अंगुलवीसं, पणरसधणु दूणिदब सट्टाय ॥ बासहि धणुदसट्टा, पण पुढवी पयर वुटिश्मा॥४॥श्य साहाविय देहो, उत्तर वेन ॥२ ॥ |वि य तहुगुणो॥उविहो वि जहम कमा,अंगुल असंख संखंसो॥४॥ स [त्तसु चनवीस मुहू, सग पनरदिणेग उचन बम्मासा ॥ नववाय चवणविरहो, उदे बारस मुहुत्त गुरू ॥श्य लहु उहावि समर्ड, संखा पुण सुरसमा मुणेय वा॥ संखान पजत्त पणिं,दि तिरि नरा जंति निरएसु ॥२५॥ मिबादिहि महा नारं, न परिगहो तिव्वकोद निस्सीलो॥ नरयाजयं निबंध, पावमई रुद्दपरिणामो almsu॥ असन्निसरिसिव परकी, ससीद नरगिं नि जंति जा हिं॥ कमसो न कोसेणं, सत्तम पुढवी मणुय मना ॥२५३॥ वाला दाढी परकी, जलयर नरया ||गया न अश्कूरा ॥ जंतिपुणो नरएसु,बाहल्लेणं न जण नियमो॥२५॥दो पढ म पुढवि गमणं, देव कीलियाई संघयणे ॥शक्किक्क पुढविवुट्टी, आइतिखेसा । ॥२ ॥ Jain Educationa l For Personal and Private Use Only Page #61 -------------------------------------------------------------------------- ________________ न नरएसु ॥३५॥ उसु काळ तश्याए, काऊ नीला य नील पंकाए॥धुमा य नीलकिण्हा, उसु किण्ह हुँति लेस्सा ॥५६॥ सुर नारयाण ता, दवल्लेस्सा अवघ्या नणिया॥नाव परावत्तीए, पुणएसिं हुंति बलेस्सा ॥३५॥ निरन बट्टा गप्नय, पजत्तसंखान लडिए पेसिं ॥ चक्कि हरिजुअल अरिहा, जिण जइ दिसि सम्मपुदविकमा ॥श्यनारयणाएदि गाजय, चत्तारि कुछ गुरु लहु क मेण ॥ पश् पुढवि गाउयई, हायर जा सत्तमि इग-इं॥२५॥(नरय दारं सम्म तं, मणुयदारं नमश्)॥७॥गननर ति पलियाक, ति गाऊ नकोस ते जदप्मेणं॥ मुचिम उदावि अंत मु, हु अंगुल असंख नागतणू॥२६॥बारस मुहुत्त गन्ने, श्यरे चनवीस विरह नक्कोसो ॥ जम्म मरणे सुसमर्ड, जहमसंखा सुरसमाणा ३६॥ सत्तमि महि नेरइए, तेक वाक असंख नर तिरिए॥ मुत्तण सेसजीवा नप्पङति नरनवम्मि॥२६शासुर नेर एहिंचिय, हवंति हरि अरिद चक्किबल Jain Education For Personal and Private Use Only V.jainelibrary.org Page #62 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बृहत्सं० ॥ २ए ॥ Jain Educationa | देवा ॥ चज विह सुर चक्किबला, वेमाणिय हुंति हरि रिहा ॥ २६३ ॥ दरिणो माणुस्स रयणा, इ हुंति नागुत्तरेहिं देवेहिं ॥ जद संभव मुववार्ड, दयगय एगिं | दि रयणा ॥ २६४ ॥ वामपमाणं चक्कं, बत्तं दमं डुवयं चम्मं ॥ बत्तीसंगुल ख ग्गो, सुवास का गिणि चजरंगुलिया ॥ २६५ ॥ चनरंगुलो अंगुल, पिहुलोय म |ी पुरोदि गय तुरया ॥ सेणावर गादावर, वढ्ढइ थी चक्कि रयणाई ॥ २६६ ॥ चनरो प्रायुज गेहे, जंगारे तिन्निन्नि वेवढे ॥ एगं रायगिहम्मिय, नियनयरे चैव चत्तारि ॥ २६७ ॥नो सप्पे पंडूए, पिंगलए सवरयण महपनमे ॥ कालेय म हाकाले, माणव गया महासंखे ॥ २६८ ॥ जंबुद्दीवे चउरो, सयाइ वीसुत्तराइ न कोसं ॥ रयणाइ जहां पुण, हुंति विदेदमि बप्पा ॥२६॥ चक्कं धणुदं खग्गो, मणी गया तहय होइ वणमाला ॥ संखो सत्तइमाई, रयणाई वासुदेवस्स ॥ | ॥२७०॥ संखनरा चनसुगर, सु जंति पंचसु वि पढम संघयणे । इग इति जा ग्रह For Personal and Private Use Only प्रकरण• ॥ २५ ॥ ainelibrary.org Page #63 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | सयं, इगसमए जंति ते सिद्धिं ॥ २७२ ॥ वीस चि दस नपुंसग, पुरिसठसयं तु एग समए । सिझइ गिहिन्न सलिं, ग चउदस ठाहिय सयं च ॥ २७२ गुरु बहु मशिम दोचन, सयं उदो तिरिय लोए ॥ चन बावीस सयं, | इस मुद्दे तिन्नि सेसजले ॥ २७३ ॥ नरय तिरिया गयादस, नरदेवगईन वीस इसयं ॥ दुसरया सक्कर वा, लुयान चन पंक नू दगर्ज || २७४ || बच्च वणस्सइ दस तिरि तिरिब दस मणुय वीस नारी ॥ सुराइ वंतरा दस, पण तद्देवी न पत्तेयं ॥ २७५॥ जोइ दस देविवीस, विमाणियठसय बीसदेवी ॥ तद पुढे एहिंतो, पुरिसो होऊण असयं ॥ १७६ ॥ सेस नंगएसु, दसदस सिति एग समए ॥ विरहो मास गुरुर्ज, लहु समर्ज चवणमिह न ||२|| स ग व पंच चनं ति न्निन्नि इक्कोय सिकमाणेसु ॥ बत्तीसाइसुसमया, निरंतरं अंतरं जवरिं ॥२७८॥ बत्तीसा अडयाला, सठी बावत्तरीय बोधवा ॥ चुलसीई Jain Educationa H For Personal and Private Use Only wjainelibrary.org Page #64 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बदसला नमवई, उरहियमत्तारसयं च ॥णा पणयाल लरकजोयण, विस्कंना सिद्धिप्रकरण. सिल फलिद विमला ॥ तज्वरि गजोयणंते, लोगंतो तब सिविई ॥ ॥ ३० ॥ वहुमजदेसन्नाए, अवय चोयणाबादिल्लं॥चरिमंते सुय तणुई,अंगुलसंखि|| साई नागं ॥३॥ तिन्निसया तित्तीसा, धणुत्ति नागोय कोसनागो॥ज पर मोगा दणाय, तंते कोसस्स बनागो॥श्नश॥ एगा य दोश्रयणी,अहेवय अं| गुलेहिं साहीया ॥ एसा खलु सिहाणं, जहम उगाहणा नणिया ॥३॥ मणुध शायदारं समत्ततिरियदारं जम्माबावीस सग ति दस वा, स सहस गिण ति दिण बेंदियाईसुबारस वासुण पण दिण,उम्मास तिपलिय ठिई जिहा॥४॥ सहाय सुझ वालुय, मणोसिला सक्कराय खर पुढवी ॥ग बार चन्दसोलस, हारस बावीस समसहसा ॥श्नया गन्न नुय जलयरो नय, गन्नोरग पुत्र को | ॥३० । डि नक्कोसा ॥गनचनप्पय परिकसु, तिपलिय पलियाअसंखंसो॥६॥पुवस्स Jain Education a l For Personal and Private Use Only Mainelibrary.org Page #65 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उपरिमाणं, सय्यरि खलु वास कोडि लरकाय ॥ उप्पलंच सहस्सा, बोधवा वा | सकोडी ॥ २८७ ॥ संमुनि पणिदि यल खयर नरग नूयगा जिन विइ कम सो ॥ वास सहस्सा चुलसी, बिसत्तरि तिपल बायाला ॥ २८८ ॥ एसा पुढवाई | णं, जव हिईसंपयंतु काय विई ॥ चन एगिंदि सु ऐया, उस प्पिणी असं खिजा, | ॥२८॥ तान वर्णमिणता, संखिका वास सहस विगलेसु ॥ पंचिंदि तिरि नरेसु, सत्त जवान डक्कोसा ॥ २९०॥ सबेसिंपि जहमा, अंतमुदुत्तं नवेय का एय । जोय सदस्स मदियं, एगिंदियदेद मुक्कोसं ॥ १०१ ॥ बिति चरिंदि सरीरं, बारस जोया तिकोस चनको संजोयण सदसपणिदिय, उदे बुळं विसेसं तु॥२॥ अंगुल असंखनागो, सुडुम निगोर्ड संख गुणबाऊ ॥ | तो अगणित आऊ, तत्तो मुदुमा नवे पुढव ॥ २३ ॥ तो बायर वान गणी, आऊ पुढवी निगोय अणुकमसो ॥ पत्तेयवणसरीरं, हियं जोयणसहस्सं तु ॥ २०४॥नस्सेदंगुल जोय Jain Educationaal For Personal and Private Use Only sinelibrary.org Page #66 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बृहत्संग ण,सहस्समाणे जलासए नेय।तं वल्लि पम पमुहं,अपरंपुढविरूवंतु॥vvm/N|| प्ररकण. बारस जोयण संखो, तिकोस गुम्मीय जोयणं नमरो॥ मुबिम चम्पयनुय गुर लग, गाळधणु जोयण पहुत्तं ॥५६॥गन चनप्पय बग्गा, उयाइं जुयगान गान य पहुत्तं ॥ जोयण सहस्स मुरगा, मला उन्नय विय सहस्सं ॥२॥परिक । ग धणुपत्तं, सवाणंगुल असंखन्नाग लहू ॥ विरहो विगला सन्नी, ण जम्म म रणे सुअंत मुहू ॥शनागने मुहृत्त बारस,गुरु लह समय संखसुर तुला ॥ अणुसमय मसंखिका, एगिदियहुँतिय चवंति॥शणणावणकाजे अणंता, शकि का विजं निगोयानिच्चमसंखो नागो, अणंतजीवो चयइ ए॥३०॥ गोलाय असंखिजा, असंख निग्गोय हव गोलो ॥ इक्किकंमि निगोए, अ लाएंत जीवा मुणेयवा ॥३०॥ अनि अणंता जीवा, जेहिं न पत्तो तसा परिणा मो॥नप्पङति चयंति य, पुणोवि तव तव्व॥३०शासवोवि किसलउँ खलु, Jain Educational onal For Personal and Private Use Only P ainelibrary.org Page #67 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जगाममाणो अणंत जणिजासोचेव विवढतो,दोश् परित्तो अणंतो वा॥३०॥ जया मोहोद तिवो, अन्नाणं खु महनयं॥पेमलं वेयणीयं तु, तया एगिदियत्त ॥३०॥तिरिएसु जति संखा, तिरिनराजाउ कप्पदेवा ॥ पङत्तसंख गन्न । य, बायर नूदगपरित्तेसु ॥३०॥ तो सहसारंत सुरा, निरया पङत्तसंखगनेसु॥ संखपणिंदिय तिरिया मरिलं चनसु विगश्सु जंति ॥३०॥थावर विगला निय मा, संखान य तिरि नरेसु गति ॥ विगला खनिजविरई, सम्मपि न तेन वान चुया॥३०॥पुढवी दग परितवणा,बायर पङत्त हुंति चनलेसा॥गनय तिरिय । नराणं,उल्लेसा तिमिसेसाणं॥३०॥अंतमुहुत्तंमि गए,अंतमुहुत्तमिसेसए चेव॥ वालेसादिपरिणयाहिं,जीवावचंतिपरलोयं ॥३०॥ तिरिनरआगामि नवे, खेस्साए । अगए सुरा निरया।पुवन्नव लेस्ससेसे,अंतमुहत्ते मरणमिति॥३१॥अंतमुह ।। तहि,तिरिय नराणं हवंति लेस्सा ॥चरिमा नराण पुण नव, वासूणा पुत्र || Jain Educational For Personal and Private Use Only Mainelibrary.org Page #68 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बृहत्संग कोडीवि ॥३११॥ तिरियाण वि विश्पमुहं, नणिय मसेसंपि संपई वुढ। अनि प्रकरण. ॥ ३२ ॥ हिय दारग्नदियं, चनगइ जीवाण साममं ॥३१॥ देवा असंख नर तिरि, श्वी पुं वेय गप्न नर तिरिया ॥ संखानया तिवेया, नपुंसगा नारयाश्या ॥ ३१३ ॥ IN|आयंगुलेण वतुं, सरीरमुस्सेद अंगुलेण तदा ॥ नग पुढवि विमाणाई, मिण| सु पमाणंगुलेणं तु॥३१४ासत्रेण सुतिकेण वि, बित्तुं नित्तुं च जं किर न सका। Malतं परमाणु सिझा, वयंतिभाई पमाणांणं॥३१॥परमाणु तसरेणू , रहरेणु वा लिअग्गलिका य ॥ जूय जवो अगुणो, कमेण जस्सेद अंगुलयं ॥३१६॥ अं। गुलबकं पा, सो उगुण विदबि सा गुण दबो॥चनहवं धणु उ सहस, को 1 सो तेजोयणं चनरो ॥३१॥ चनसयगुणं पमाणं, गुलमुस्सेदंगुलान बोधवं ॥ नस्सेहंगुलगुणं, वीरस्सायंगुलं नणियं ॥ ३१७ ॥ पुढवाइसु पत्तेयं, सग व ॥३२॥ णपत्तेय णंतदस चनद ॥ विगले उउ सुर नारय, तिरि चन चन चनदस नरेसु । Jain Educational na For Personal and Private Use Only iainelibrary.org Page #69 -------------------------------------------------------------------------- ________________ K णा जोणीण हंति लरका, सत्वे चुलसी देव घिप्पंति॥समवन्नाईनेया, ए गत्तेणेव सामन्ना ॥ ३०॥ एगिदिएसु पंचसु, बार सग तिसत्त अहवीसा य॥ पाविगलेसु सत्त अड नव, जल खह चनपय जरग जुयगे ॥ ३२ ॥अइत्तेरस IN बारस, दस दस नवगं नरामरे निरए ॥ बारस वीस पणविस, हुँति कुले को लाडि लरकाई॥३२॥ श्ग कोडि सत्तणवई, लरका सट्टा कुलाण कोडीणं ॥ संतु मजोणि सुरेगिं,दि नारया वियड विगल गनु जया ॥३३॥ अचित्त जोणि सु. रनिरय, मीसग्गने तिनेय सेसाणं ॥ सी सिण निरय सुर गन्न, मीसत्ते न सिण सेस तिदा ॥३२॥ दय गन संखवत्ता, जोणी कुम्मुन्नयाइं जायंति॥अ) रिद दरि चक्कि रामा, वंसी पत्ता सेस नरा ॥३श्या आनस्स बंधकालो, अबा ह कालोय अंत समजे या|अपवत्तण णपवत्तण,जवक्कम णुवकमा नणिया॥३२६ बंधंति देव नारय, असंख नर तिरि उमास सेसाक ॥ परनविया कसेसा, नि Jain Education For Personal and Private Use Only Page #70 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बृहत्सं० रुवकमतिनागसेसान ॥ ३२ ॥ सोवकमा नया पुण, सेसतिनागे अहव नव प्रकरण. मनागे॥ सत्तावीस श्मे वा, अंतमुहुत्तं तिमे वावि ॥३२॥ जश्मे जागे बंधो, ॥३३॥ आउस्स नवे अबाहकालो सो॥अंतेउजुगश्ग सम,य वक्क चन पंच समयंता| ॥३३णाउजु गइ पढम समए, परनवियं आनयं तदा दारो॥ वक्काइ बीय स। मए, परनविया उदयमेई॥३३॥ग उति चन वकासु, उगा समएसु प रनवादारो ॥ उग वकाइ सु समया, ग दो तिनी अणादारा ॥३३२॥ बहुका | हाल वेयणिऊ, कम्मं अप्पेण जमिद कालेणं॥वेश्जाइ जुगवंचिय, उन्न सवप्पए सग्गं ॥ ३३॥ अपवत्तणिजमेयं, आलं अहवा असेसकम्मंपि॥बंध समए वि बई, सिढिलं चिय तं जहाजोगं ॥ ३३३ ॥जं पुण गाढ निकायण, बंधेणं । पुत्वमेव किल बई॥ तं दो अणपवत्तण, जुग्गं कम वेयणिज फलं॥३३४॥ ॥३३॥ उत्तम चरम सरीरा, सुर नेरझ्या असंख नर तिरिया ॥ हुँति निरुवकमाउँ, Jain Eucalona For Personal and Private Use Only inelibrary.org Page #71 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Mal हावि सेसा मुणेयवा ॥३३॥ जेणान मुवकिमि जइ, अप्पसमण श्यर गेणा वि।सो अवसाणाई, उवक्कम गुवकमो श्यरो॥३३६॥अजवसाण निमित्ते, दारे वेयणा परागाए ॥ फासेआणापाणू, सत्तविहं फिजाए आलं ॥३३॥ आहार सरीरिंदिय, पजत्ती आणपाण नासमणे ॥चन पंच पंच बप्पिय, ग, विगला सन्नि सन्नीणं ॥३३॥ आहारसरीरिंदिय, ऊसास वऊ मणोनिनिव। ती॥ दोइ ज दलियाऊ, करणं पश्सान पजत्ती ॥३३णापण इंदिय तिबलू । सा, साक दस पाण चल बसग अ॥ग उति चनरिंदीणं, असन्नि सन्नी Kण नव दस य॥३४॥दारे जय मेहुण, परिगादा कोद माण माया य॥ लो, ने उदे लोगे, दस सस्मा हुँति सवेसि ॥ ३४॥ सुद उद मोदा सन्ना, वितिगि । बा चन्दमा मुणेयवा ॥ सोए तद धम्म सणा, सोल समा दवइ मणुएसु ॥ d॥३४॥ संखित्तासंघयणी, गुरुतर संघयणि मद्य एसा ॥ सिरि सिरि चंद मु Jain Educational final For Personal and Private Use Only anbrary.org Page #72 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लघुणिंदे,ण निम्मिया अप्प पढणहा ॥३४३॥ संखित्तयरी उश्मा, सरीरमोगोदणा प्रकरण. य संघयणा ॥ सन्ना संगण कसा, य लेसिदिय उसमुग्घाया ॥ ३४४॥ दिछी ।। ३४॥ दसण नाणे, जोगु वउँगो ववाय चवण विज्ञापऊत्ति किमादारे,सन्निगईरागई। वेए॥३४यातिरिया मणुया काया,तह गाबीया चनक्कगा चनरो ॥ देवा नेरश्या । वा, अहारस नावरासी ॥३४६॥ एगा कोडी सत सपि, लरका सतहुत्तरी स हस्साय ॥दोय सया सोलदिया, आवलियाणं मुहुत्तंमि ॥३४॥ पणसहि स. दस पणसय, बत्तीसा ग मुहुत्त खुड्डनवा ॥ दोय सया उप्परमा, आवलिया । जाएग खुड्डनवे ॥३४॥ मलदारि हेमसूरि,ण सीसलेसेण विरश्यं सम्मं ॥ संघ ॥३४॥ यणि रयण मेयं, नंदन जा वीरजिण तिवं ॥३४॥ इतिश्रीत्रैलोक्यदीपिकाना मसंग्रहणीसंपूर्णा ॥ ॥७॥ ॥ ॥ ॥ ॥ Nu श्रीजिनायनमः ॥ अथ श्रीरत्नशेखर सूरिकृत लघुक्षेत्रसमास प्रकरणं Jain Educational clonal For Personal and Private Use Only Talaainelibrary.org Page #73 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लिख्यते॥वीर जयसहरपय, पशघ्यं पणमिकण सुगुरुं चामउत्ति ससरणमा, खित्तवियाराणु मुबामि ॥१॥ तिरि एगरअखित्ते, असंखदीवो दहीन ते सवाना हार पलियपणविस, कोमा कोडी समयतुल्ला ॥२॥ कुरुसग दिणाविअंगुल, रो। मे सगवार विहिय अडखंडे ॥ बावामसयं सहसा, सगनवई वीस लकाणू ॥ IN|॥३॥ते थूला पल्लेविन, संखिजा चेव हुँति सवेवि ॥ ते इकिक असंखे, सुदमे खंडेपकप्पेह ॥४॥ सुहमाणु निचिय उस्से,हंगुलचनकोस पल्लि घणवढे॥पश्स | मय मणुग्गह निध्यिंमि नझारपल्लितियापढमो जंबू बीउ, धायश्संडो य । पुरकरो त ॥ वारुणिवरो चनचो,खीरवरो पंचमो दीवो ॥६॥ घयवर दीवोन हो॥इस्कुरसो सत्तमो य अहम ॥ नंदीसरो य अरुणो, नवमो इच्चाइअसं स्किजा ॥ सुपसबवबुनामा, तिपडोयारा तहा रुणाईया ॥गनामेवि असं खा, जाव य सूरावना सुत्ति ॥॥ तत्तो देवे नागे, जके नूए सयंजुरमणे य ॥ Jain Educational For Personal and Private Use Only Talu.jainelibrary.org Page #74 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकरण लघुले पाएए पंच वि दीवा, गेगनामा मुणेयवा ॥णा पढमे लवणो बीये, कालोददि से , ॥३५ सएसु सवेसु ॥ दीवसम नामया जा, सयंजुरमणो दहीचरमो ॥१०॥ बीउ त। चरमो, उदगरसा पढमचनथ पंचमगा ॥ छोवि सनामरसा, इस्कुरसामेस जलनिदिणो॥१२॥ जंबूद्दीवपमाणं, गुलकोयणलरकवट्ट विकंनो ॥ लवणाई या सेसा, वलयाना उगुणगुणा य ॥१॥ वयरामईदि निय निय, दीवोददि मजिगणियमूलाहिं, अहुचाहिं बारस, चनमूले नवरि रुंदादिं ॥१३॥ विबार। ग विसेसो, उस्सेहि विनत्तु खन चउँ हो ॥श्य चूलागिरि कूमा, तुल्ल विd कंन करणादिं ॥१४॥ गान गुच्चाइ तय, नाग रुंदाइ पनमवेईए ॥ देसूण 5 जोयणवर, वणादि परिमंमिय सिराहिं ॥१५॥ वेईसमेण महया, घवरक क डएण संपरित्ताहिं॥ अहारसूणचनन्न, त्त परिदिदारं तरादिं च ॥१६॥ अहच्च ॥३५॥ चनसु विचर, उपाससक्कोस कुट्टदारादिं॥पुवाइ महडियदे, व दारविजयाइ ना, Jain Education For Personal and Private Use Only A mjainelibrary.org Page #75 -------------------------------------------------------------------------- ________________ माहिं ॥१७॥ नाणामणिमयदेदलि, कवाड परिघाइ दार सोदाहिं ॥ जगईहिं। ते सत्वे, दीवोददिणो परिस्कित्ता ॥ २७ ॥ वरतिण तोरण कयन,त्तवाविपासाय सेलसिलवटे ॥ वेश्वणे वरमंमव, गिहा सणेसू रमंति सुरा ॥१॥ इह अदिगा | रो जेसिं, सुराण देवीण ताण मुप्पत्ति ॥ नियदीवोददि नामे, अस्संखश्मे स| नयरीसु॥२०॥ जंबुद्दीवो गहि कुल,गिरीदि सत्तहिं तदेव वासेहिं । पुवावरदी || देहिं, परिबिन्नो ते श्मे कमसो॥२२॥ हिमवं सिहरी महदिम, रुप्पी निसढो य नीलवंतो य॥ बाहिरज ऽगिरिणो, नन्न विसवेश्या सवे ॥२॥नरदेव यत्ति उगं, उगं च देमवयरमवयरूवं ॥ हरिवासरम्मयउगं, मजि विदेहुत्ति सग । वासा॥२३॥दो दीदा चन वद्या, वेयट्ठा खित्तकमसंमि। मेरू विदेहमसे, पमाण |मित्तोकुलगिरीणं ॥२४॥ग दो चन सय जच्चा, कणगमया कणगरायया कम सो॥ तवणिज सुवेरुलिया, बहि ममग्निंतरा दो दो॥३५॥ उग अड उतीस Jain Educational For Personal and Private Use Only N nelibrary.org Page #76 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लकेला अंका, लकगुणा कमिण नग्यसयनश्या ॥ मूलोवरि समरूवं, विचारं बिंता प्रकरण. जुयलतिगे॥२६॥बावमदिर्ज सहसो, बारकला बाहिराण विबारो॥ मसिमगा ॥३६॥ ण दसुत्तर, बायालसया दस कला य॥२॥अग्निंतराण उकला, सोलसहस्सा डसया सबायाला ॥ चनचत्त सहस दोसय, दसुत्तरा दसकला सवे ॥२७॥ लग चन सोलस अंका, पुवत्तविही खित्तजुयलतिगे॥ विचारं बिंति तहा, चन सहिं को विदेहस्स॥२॥पंचसया ब्बीसा, बच्च कलापढमखित्तजुयलम्मि, बीए गवीससया, पणुत्तरा पंच य कला य ॥३०॥ चुलसीसय गवीसा, श्क्ककला तश्यगे विदेहि पुणो ॥ तित्तीससहस बस्सय, चुलसीया तह कला चनरो ॥ Indu ३१) पणपरमसदससग सय, गुणनग्या नवकलासयलवासा॥गिरिखित्तं क समासे, जोयण लकं दव पुमं ॥ ३॥ परमास सुइ बाहिर, खित्ते दलियम्मि||॥ छ सय अडतीसा ॥ तिमि य कला य एसो, खंमचनक्करस विस्कंनो ॥३३॥ ॥३६॥ Jain Educational nal For Personal and Private Use Only ainelibrary.org Page #77 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गिरिजवरि सवेश्दहा,गिरिजच्चत्तान दसगुणा दीहा ॥ दीदत्ति अरुंदा, सवेदी सजोयणुवेदा॥३४॥ बदि पनमपुमरीया, मद्ये ते चेव हुँति महपुवा ॥ ते गिनि । केसरीया,अग्नितरिया कमेणेसु॥३॥सिरि लबी हिरि बुद्धी, धी कित्ती नामिया || न देवी ॥ नवणवई पलिज, वमान वरकमलनिलया ॥३६॥ जळुवार को सगुच्चं, ददविवरपणसयंस विचारं ॥ बाहिल्लिविवरई, कमलं देवीण मूलि al शाल्लं ॥३७॥ मूले कंदे नाले, तं वयरारिम्वेरुलियरूवं ॥ जंबूणयमद्यतवणि, जबदिदलं रत्तकेसरयं ॥ ३७॥ कमल पायपिहुलु, च कणगमयकमिगोवरिं । नवणं ॥ अझेग कोसपिडु दी, द चन्दसय चाल धणुदुच्चं ॥३॥ पनिमदिसि । विणुधणु पण, सउच्च ढाइज सयप्पिहु पवेसं ॥ दारतिगंश्द नवणे, मद्ये दहदे वि सयणि ॥४०॥ तं मूल कमलम, प्पमाण कमलाण अडहियसएणं॥प रिखित्तं तनवणे, सुनूसणाईणि देवीणं॥४॥मूलपनमाज पुविं,महयरियाणं च | Jain Educational Yoldal For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #78 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकरण. लघु ॥३७॥ नाह चउपनमा ॥ अवराई सत्त पनमा, अणिया दिवईण सत्तएहं ॥४२॥ वाय । वासु तिसु सिरि, सामन्नसुराण चन सहस पनमा ॥ अह दस बारसहसा, N अग्गेयाश्सु तिपरिसाणं ॥४३॥श्य बीयपरिकेवो, तइए चसु वि दिसासु दे वीणं ॥चन चन पनमसहस्सा, सोलसहस्साय रकाणं ॥४४॥ अनिउँगा तिवलए, उतीस चत्ताडयाललकाइं॥ गकोडि वीस लरका, परमाससहस्स। वीससयं ॥४५॥ पुत्वावरमेरुमुहं, उसु दार तिगंपि सदिसि दहमाणा ॥ असीइनागपमाणं, सतोरणं निग्गयनईयं ॥४६॥ जामुत्तरदारगं, सेसेसु ददे । सु ताण मेरुमुदा ॥ सदिसि दहासिय नागा, तयमाणा य बादिरिया ॥४॥ गंगा सिंधू रत्ता,रत्तवई बाहिरं नश्चजकंबदि ददपुत्वावरदार, विवरं वद गि लारिसिहरे ॥४॥ पंचसय गंतु नियगा, वत्तणकूमान बदिमुहं वलई॥ पणसया तेवीसेहिं, साहियतिकलाहिं सिहराउँ॥ ४॥ निवमझ मगरमुहोवम, वयराम Jain Education a nal For Personal and Private Use Only rebraryong Page #79 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Educationa | यजिनियादि वयरतले ॥ नियगे निवायकुंके, मुत्तावलि समप्पवादेण ॥५०॥ दद | दार विचरा, विचरपमास जागजढाई ॥ जट्टत्तार्ज चनगुण, दीदा सवजिनी जं ॥ ५१ ॥ कुंमंतो अडजोयण, पिठुलो जलनवरि कोसङगमुच्चो ॥ वेइजु नइ देवी, दीवो दहदे विसमजवणो ॥ ५२ ॥ जोयस ठिपिटुत्ता, सवाय प्पिदुल | वेइतिडवारा ॥ एए दसुं कुंमा, एवं अन्ने वि नवरं ते ॥ ५३ ॥ एसिं विचारतिगं, | पडुच्च सम गुण चनुगुणगुणा ॥ चनसहि सोल चन दो, कुंमा सधेवि इद नवई ॥ ५४ ॥ एयं च नश्चनकं, कुंडा बहिवार परिवृढं ॥ सगसदस नइसमे यं, वेय गिरिप्प जिंदेई ॥५५॥ तत्तो बाहिर खित्त, ६ मद्यर्ज वलइ पुत्रप्रवरमु दं ॥ नइसत्तसदससदियं, जगइतलेणं उददिमेइ ॥ ५६ ॥ धुरि कुंडवारसमा, पते दसगुणा य पिदुलत्ते ॥ संघच महनई, विचरपासनागुंडा ॥ ५७ ॥ प ए खित्तमहनई, सदार दिसि दहविसु - गिरि - || गंतू सजिनीहिं, निय For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #80 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लघुक्षेनियकुंडेसु निवडंति ॥५॥ नियजिनियपिढुलत्ता, पणवीसंसेणमुत्तमद्यगिरिं॥ प्रकरण ॥ जाममुहा पुबुदहिं, इयरा अवरोयदिमुर्विति ॥५॥ हेमवश् रोहियंसा, रोहीया गंगगुणपरिवारा ॥ एरमवय सुवाम, रुप्पकुला ताण समा ॥६॥ हरिवासे हरिकंता,हरिसलिला गंगचनगुणनईया॥ एसि समा रम्मवए, नरकं ता नारिकता य॥६॥सीया सीया, महाविदेहम्मि तासु पत्तेयं ॥ निवड पणलक, उतीस सहस अडतीस नश्सलिलं ॥६॥ कुरुन चुलसीसहसा, बच्चे वंतरनईन पश्विजयं ॥ दो दो महानई, चनदस सहसाउ पत्तेयं ॥६३॥ अडसयरि महानज, बारस अंतरनईन सेसा ॥ परियरनईज चनदस, ल का उप्पम सहसा य ॥६॥ एगारड नवकूडा, कुलगिरि जुयलत्तिगे वि पत्ते भयं॥श्य उप्परमा चन चन, वकारेसुत्ति चनसह॥६यासोमणसि गंधमायणि, ॥३०॥ सग सग विझुपनिमालवंति पुणो॥अहह सयवतीसं, अडनंदणि अ करि । Jain Educationall o nal For Personal and Private Use Only Nijainelibrary.org Page #81 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | कूडा ॥ ६६ ॥ इय पासउच्च बास, हि सब कुमा तेसु दीदर गिरीणं ॥ पुवनइमेरु दिसिद्धं, त सिकूमेसु जिणनवा ॥६७॥ ते सिरिगिदाउ दो सय, गुणप्पमा णा तदेव तिडवारा || नवरं अडवी साहिय, सयगुण दारप्पमाणमिह ॥६८॥ प वीसं कोससयं, समचरस विवडा डुगुणमुच्चा ॥ पासाया कूमेसु, पणसयन सुसेसेसु || ६ || बल दरिसद हरिकूडा, नंदनवणि मालवंति विपने ॥ ई सागुत्तरदादि, दिसासु ससुच्च कणगमया ॥७०॥ वेयट्ठेसु वि नव नव, कूडा पणवीसकोसच्चा ते ॥ सधे तिसय बडुत्तर, एसु वि पुवंति जिकूमा ॥ १२ ॥ | ताणूवरि चेहरा, दहदेवी नवणतुलपरिमाणा ॥ सेसेसु य पासाया, अधेग |कोसं पिहुचते ||२|| गिरिकरिकूडा उच्च, त्तणान समय हमूलुवरि रुंदा ॥ रयण | मया नवारिविय, मझिमा ति त्ति कणगरुवा ॥ ७३ ॥जंबूणयरययमया, जगइसमा जंबुसामली कूमा ॥ तेसुदहदे, वि गिदसमा चारुचेइहरा ॥ ७४ ॥ तेसि स Jain Educationaal nai For Personal and Private Use Only w.jainelibrary.org Page #82 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लघुदे० ॥ ३५ ॥ मोसदकूमा, चडतीसं चुल्लकुंडजुयलंतो ॥ जंबू एस तेसु य, वेयट्ठेसुध पासा या ॥७८॥ पंचसए पणवी से, कूडा सवे वि जंबुदीवंमि ॥ ते पत्तेयं वरवण, जुया दि वेईदि परि कित्ता ॥७६॥ ब सयरि कुंमेसु तहा, चूलाचडवणतरुसु जिन वा ॥ जलिया जंबूद्दीवे, सदेवया सेस वगणेसु ॥9॥ करिकूम कुंड नइ दह, कु रुकंचण जमलसमवियट्ठेसु ॥ जिणनवणविसंवार्ज, जो तं जाणंति गीयता ॥७८॥ पुवावरजलहिंता, दसुच्च दस पिहुल मेहल चक्का ॥ पणवीसुच्चा पसा, | स तीस दसजोया पित्ता || || वेई दिपरिकित्ता, सखयरपुर पास डिसेणि डुगा ॥ सदिसिंदलोगपालो, वनोगनवरिल्लमेहलया ॥ ८० ॥ डुडुखंमविदिय जरदे, रखया डुडु गुरु गुहा य रुप्पमया ॥ दो दीदा वेयड्ढा, तदा तीसं च वि | जयेसु ॥८१॥ नवरं ते विजयंता, सखयरपणपसपुर सेणीया ॥ एवं खयरपुरा इं, सगतीस सयाइ चालाई ||८|| गिरि विवर दीदा, अडुच्च च पिदुपवे Jain Educationanal For Personal and Private Use Only प्रकरण. ॥ ३५ ॥ jainelibrary.org Page #83 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Educationa | सदारा ॥ बारस पिढुलान प्रमुच्चयान वेयढङगुदान ॥८३॥ तंमधि जो याच्यं, तराज तिति विचरान नई ॥ नुम्मग्गनिमग्गाउँ, कडगाव महानइ गया ॥ ८४॥ इद पइनित्तिं गुणव, मंगले लिइ चक्विड समुदे ॥ पणसय धणुदपमाणे, बारेगडजोयणुकोए ॥८॥ सा तिमिस गुदा जीए, चक्की पविसेइ | मद्यखंडतो ॥ नसदं अंकिय सो जी, इ वलइ सा खंडगपवाया ॥ ८६ ॥ कयमाल | नहमालय, सुराज वढ्ढइ निब-इस लिला ॥ जा चक्की ता चिहड़, ताजे जग्घमि य दाराउं ॥ ८७ ॥ बहिखंमंतो बारस, दीदा नव विवडा अद्यपुरी ॥ सा लव णावेयट्ठा, चन्द हियसयं चिगारकला ॥८८॥ चक्किवसनइपवेसे, तिचडुगं माग दो पासो य ॥ तातो वरदामो, इद सबै बिडुत्तरस्यंति ॥८॥ नरदेव ब बर, मयवस प्पिणी उस प्पिणी रूवं ॥ परिनमइ कालचक्कं, ज्वालसारं सया वि |कमा ॥५०॥ सुसमसुसमा य सुसमा, सूसमसमाय समसुसमाय ॥ उसमा य For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #84 -------------------------------------------------------------------------- ________________ घुदे० ॥ ४० ॥ गहणा | समङसमा, कमुक्कमा सुवि परकं ॥ १॥ पुत्तपल्लिसमसय, | निठिए दवइ पलिये ॥ दस को डिको डिप लिए, हिं सागरो होइ कालस्स ॥ ए॥ | सागरचति कोडा, को मिमिए परतिगे नराण कमा ॥ आऊ तिऽइगपलि या, तिऽइगकोसा तच्चत्तं ॥ ३॥ तिङग दिदि तूरि, वयरामल मित्तमे सि | माहारो ॥ पिठकरंगा दोसय, बप्पन्ना तद्दलं च दलं ॥ ५४ ॥ गुणवदि तद प नर, पन्नरच्य दिया प्रवच्चपालया ॥ वि सयलजिया जुयला, सुमासरूवा | सुरगईया || || तेसि मत्तंग जिंगा, तुडियंगा जोइ दीवचित्तंगा ॥ चित्तरसा मणिगंगा, गेदागारा अयियरका ॥ २६ ॥ पाणं जायण पिचण, रविपद दीव | पद कुसुममाहारो ॥ नूसा गिद वच्चास, कप्पडमा दसविदा दिति ॥ ए ॥ मानसमगयाई, चयाइ चनरंस जाइ अहंसा | गोमहिसुखराई, पांस | सागाइ दसमंसा ॥८॥ इच्चाइ तिरछा वि, पायं संवारएस सारिचं ॥ तझ्या Jain Education national For Personal and Private Use Only प्रकरण. ॥ ४० ॥ ww.jainelibrary.org Page #85 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रसेस कुलगर, नयजिणधम्माश्नप्पत्ती ॥एण॥ कालउगे तिचनबा,रगेसु एगूण नवश्परकेसु ॥ सेसगएसु य सिद्यं,ति हुंति पढमंतिमजिणिंदा ॥१०॥ बायाल सहस वरसू, णिगकोडाकोमिअयरमाणाए ॥ तुरिए नरामपुवा, ण कोमितणु । N कोसचनरंसं ॥१०॥ वरिसेगवीससदस, प्पमाण पंचमरए सगकरुच्चा ॥ तीस। दियसयान नरा, तयंतधम्माश्याणंतो॥१०॥ सुयसूरिसंघधम्मो,पुवाहे बिक काही अगणि सायं ॥ निव विमलवादणो सुद,ममंति तहम्म मद्यपहे॥१०३॥ खा रग्गिविसाईहिं, दादानया कयाइ पुदवीए॥ खगबीय वियाट्ट सु, नराश्बीयं । बिलाईसु॥२०४॥ बहुमबचक्कवहन, चनक्कपासेसु नव नव बिलाइं॥वेयट्टो । |जयपासे, चन्यालसयं बिलाणेवं ॥१०॥ पंचमसमग्हारे, उकरुच्चा वीसव al रिसान नरा ॥ मनासिणो कुरूवा, कूरा बिलवासि कुगश्गमा ॥१०॥ निल्ल झा निवसणा, खरवयणा पियसुयाविरहिया ॥ थी ब्वरिसगना, अदिउ । Jain Education Illa For Personal and Povate Use Only brary.org Page #86 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥४१॥ लघुदे० हपसवा बहुसुया य॥१०॥श्य अरबक्केण वस,प्पिणित्ति नस्सप्पिणी वि विव प्रकरण. रीया ॥वीसं सागरकोमा, कोमी कालचकंमि॥१०॥ कुरुगि दरिरम्मयउ। गि, देमवएरमवयजगि विदेदे ॥ कमसो सया वसप्पिणि, अरयचनकाइसम कालो ॥१०॥ देमवएरमवए, हरिवासे रम्मए य रयणमया ॥ सदाव विद डावश्, गंधाव मालवंतरका ॥११॥ चन वट्टवियट्ठा सा, अरुण पनम प्पना । स सुरवासा ॥ मूलुवरि पिटुत्ते तह,उच्चत्ते जोयणं सहसं ॥११॥ मेरू वट्टो स हस्स, कंदो लस्कसि सहस नवरि ॥ दसगुण नुवि तं सनवइ, दसिगारंसं पिहलमूले ॥१२॥ पुढवुवल वयर सकर, मयकंदो नवरि जाव सोमणसं ॥ फलिहंक रयय कंचण, म य जंबूण सेसो ॥११३॥ तज्ज्वरि चालीसुच्चा, व हा मूलुवरि बार चन पिहुला ॥ वेलुरिया वरचूला, सिरिनवणपमाण चेहरा || ॥४१॥ IC॥१४॥ चूलातलान चनसय, चनणनए वलयरूवविस्कंन्नं ॥ बहुजलकुंमं पं Jain Education For Personal and Private Use Only Page #87 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मग, वणं च सिहरे सयेईयं ॥ ११८ ॥ पमासजोयणेहिं, चूलाउं चनदिसासु जि | नवा ॥ सविदिसि सक्कीसाणं, चडवाविजुया य पासाया ॥ ११६ ॥ कुलगिरि चेश्दराणं, पासायाणं चिमे समठगुणा ॥ पणवीस रुंद डुगुणा, यामान इमान वावी ॥११७॥ जिाहर बदिदिसि जोय, पणसय दीह-६ पिहुल चनच्चा ॥ इस सिसमा चउरो, सियकणग सिला सवेईया ॥ ११८ ॥ सिलमाण्ड सदस्सं, | समाणसींदास दि दोहिं जुया | सिलपंडु कंबलार, कंबला पुर्वपश्चिम ॥ | ॥ ११५ ॥ जामुत्तरान तार्ज, इगेगसींदासान पुत्रं ॥ चसु वि तासु निया सण, दिसिनवजिणमजणं होई ॥१२०॥ सिहरा बत्तीसेहिं, सहसेदिं मेहलाई पंचसए ॥ पिहुलं सोमण सवणं, सिलविणु पंडगवास रिचं ॥ १२२ ॥ तब्वादि रि विकंजो, बायालस्यादि इस रिजुयाई ॥ गारसनागा, मद्ये तं चैव सदसूणं ॥ १२२॥ तत्तो सङ्घ सही, सहसेहिं नंदपि तद चैव ॥ नवरि जव Jain Educationanal For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #88 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लघुदे० ॥ ४२ ॥ Jain Educationa पासायं, तरह दिसि कुमरि कूडा वि ॥ १२३ ॥ नवसदस नवसयाई, चनपमा | बच्चिगारनागा य ॥ नंदणबदिविकंनो, सदसूणो होइ मद्यंमि ॥ १२४॥ तदहो पंच सर्दि, महियलि तद चेव नसालवणं ॥ नवरं मिह दिग्गयच्चिय, कूडा विश्वरं तु इमं ॥ १२५॥ बावीससदस्साईं, मेरू पुव य पश्चिम ॥ तं चाम सीविदत्तं, वणमाणं दादिणुत्तर ॥ १२६ ॥ ब्वीस सदस चनसय, पणदत्तरि गं | तु कुरुनइपवाया | उन विनिग्गया गय, दंता मेरुम्मुदा चनरो ॥ १२१ ॥ अ ग्गेयाइसु पयादि, ऐण दिसासु सियरत पियनीला ॥ नासोमास विकुपद, | गंधमायण मालवंतरका ॥ १२८ ॥ प्रदलोगवा सिणी, दिसाकुमारीज् एए सि ॥ यदंत गिरिवराणं, दिठा चिति जवणेसु ॥ १२९ ॥ धुरि ते च पण सय, उच्च त्ति पिहुत्ति पणसया सिसमा | दीदत्ति इमे बकला, दुसयन वुत्तरस | दसतीसं ॥१३०॥ ताणं तो देवुत्तर, कुरान चंद संवियान 5वे || दससदस वि onal For Personal and Private Use Only प्रकरण. ॥ ४२ ॥ Page #89 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सुझमहा, विदेहदलमाणपिढुला॥१३॥ नश्पुवावरकूले, कणगमया बल सना मा गिरी दो दो ॥ उत्तरकुरान जमगा, विचित्तचित्ता य श्यरीए॥१३॥ नश्व कह दीदा पण पण, हरया उदारया श्मे कमसो॥निसहो तह देवकुरू, सूरो । सुलसो य विपिहो॥१३३॥तह नीलवंत उत्तर, कुरु चंदे रवय मालवंतो ति॥ पनमदहसमा नवरं, एएसु सुरा दहसमाना ॥१३४ ॥ अडसय चन्तीस जोय, जाणाइं तह सेगसत्तनागा॥श्कारसय कला,गिरिजमलदहाणमंतरयं ॥१३॥ दहपुवावर दसजो, यणेदि दस दस वियटकूडाणं ॥सोलसगुणप्पमाणा, कंच यणगिरिणो उसय सवे॥१३६॥ उत्तरकुरुपुत्व, जंबूणयजंबुपीढमतेसु॥कोस उगुच्चं कमि व,ट्टमाण चनवीसगुण मद्ये ॥१३॥ पणसयवपिहृत्तं, तं परिखि तं च पळमवेईए॥गाउ उगेगुच्चपिङ,त चारुचदारकलियाए॥१३॥तं मद्ये अडविचर, चनच्च मणिपीढियाइ जंबुतरू ॥ मूले कंदे खंधे, वरवयरारिम्वेरु Jain Education Bonal For Personal and Private Use Only M.jainelibrary.org Page #90 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लघुदे ॥४३॥ |लि ॥१३॥ तस्स य साद पसाहा, दला य विंटा य पल्लवा कमसो॥सोव || प्रकरण. मजायरूवा, वेरुलितवणिजाजंबुणया ॥ १४०॥ सो रययमयपवालो, राययवि डिमो य रयणपुप्फफलो। कोसगं जवेहो, थुमसाहा विडिमविरकंनो॥१४॥ थुडसादव डिमदीद, त्ति गानए अपनर चवीसं ॥ सादा सिरिसमनवणा, तम्माणस चेश्यं वमिमं ॥२४॥ पुविल्लि सिङ तिसुत्रा, सणाणि नवणेसुणा । ढियसुरस्स ॥ सा जंबू बारसवे,श्यादि कमसो परिस्कित्ता ॥२४३॥ दहपनमाणं जं वि,बरं तुतमिहावि जंबुरुकाणं ॥ नवरं महयरियाणं, गणे श्द अग्गमदि सी ॥४४॥ कोस उसएदि जंबू, चनदिसिं पुव्वसालसमन्नवणा ॥ विदिसासु । |सेस तिसमा, चनवाविजुया य पासाया॥१४५॥ ताणंतरेसु अड जिण, कूमा तद सुरकुराइ अवरझाराययपीढे सामलि,रुको एमेव गरुलस्स ॥१४६॥ बी ॥४३॥ तीस सोल बारस, विजया वकार अंतर नई ॥ मेरुवणार्ड पुवा, वरासुकुल Jain Educationa lonal For Personal and Private Use Only B rainelibrary.org Page #91 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गिरिमद नयंता॥१४॥ विजयाण पिहुत्ति सग, नाग बारुत्तरा ज्वीस सया सेलाणं पंचसए, सवेश् नइ परमवीससयं ॥ १४ ॥सोलससहस्स पणसय, बाणनया तह य दो कला य॥एएसिं सवेसिं,आयामो वणमुदाणं च॥२४॥ गयदंतगिरिबुच्चा, वस्कारा ताणमंतरनईणं ॥ विजयाणं च निदाणा, मालवं ता पयादिण ॥१५॥ चित्ते य बनकूडे, नलिणीकूमे य एगसेले य ॥ तिनमे वेसमणे वि य, अंजण मायंजणे चेव ॥१५॥ अंकावर पम्हावर, आसीविस तह सुहावहे चंदे ॥ सूरे नागे देवे, सोलस वकारगिरिनामा ॥१५॥गाहाव दादावश्, वेगवई तत्त मत्त जम्मत्ता ॥ खीरोय सीयसोया, तह अंतोवादि णी चेव ॥१५३॥ नम्मीमालिणि गंजी,रमालिणी फेणमालिणी चेव ॥ सवनवि । दसजोयण, उंडाकुंमुन्नवा एया ॥१५॥को सुकबो य महा, कबो कहावई त हा ॥ आवत्तो मंगलावत्तो, पुस्कलो पुरकलावई॥१५॥ वडो सुवडो य महा, - - Jain Education For Personal and Private Use Only Page #92 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥४ ॥ लघुदेवबो वनावई विया ॥रम्मो य रम्म चेव,रमणी मंगलावई॥१५॥पम्हो सुप प्रकरण. म्हो य महा, पम्हो पम्हावई तदा ॥ संखो नलिणनामा य, कुमुदो नलिणाव | ई॥१५॥ वप्पो सुवप्पो य महा,वप्पो वप्पावईविय ॥ वग्गू तहा सुवग्गू य,गं - धिलो गंधिलावई॥१५॥ एए पुवावरगय, वियमदलियत्तिनई दिसिदलेसु ॥ नर-पुरीसमाज, इमेहिं नामेहिं नयरी॥१।खेमा खेमपुरा विय, रिहा रिहावई य नायवा ॥खग्गी मंजूसा विय, नसहपुरी पुंमरिगिणी य ॥१६॥ सुसीमा कुंमला चेव, वराइ य पहंकरा ॥ अंकाव पम्हावर, सुन्ना रयणसं चया ॥१६॥ आसपुरा सींदपुरा, मदापुरा तह य चेव विजयपुरा ॥ अवरा । श्या य अवरा, असोग तह य वीयसोगा य ॥१६॥ विजया य वेजयंती, ज यंति अपराजिया य बोधवा ॥ चक्कपुरा खग्गपुरा, दोइ अवक्षा अक्षा यः॥ ॥१६३॥ कुंमुन्नवा न गंगा,सिंधू कलपम्हपमुहेसु ॥ अध्छएसु विजये,सु सेसे । ॥४४॥ Jain Education For Personal and Private Use Only Mainelibrary.org Page #93 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सुरत रत्तवई ॥१६४॥ अविवकिऊण जगई, सवेश्वणमुदचनक्क पिडुलत्तं॥गु तीससय डवीसा,न इंति गिरिच्यंति एगकला ॥१६५॥ पणती ससदस चउस य, बहुत्तरा सयल विजय विकंजो ॥ वणमुद डुग विस्रकंजो, प्रमवमसया य च प्राला ॥ १६६ ॥ सगसय पन्नासा नइ, पिहुत्ति चडवण सदस मेरुवणे ॥ गिरि विवर चसदसा, सवसमासो दवइ लकं ॥ १६७ ॥ जोयण सयदसगंते, सम धरणी हो हो गामा ॥ बायाली ससदसेहिं, गंतुं मेरुस्स पश्चिमर्ज ॥ १६८ ॥ चड चन्तीसं च जिएगा, जहममुक्कोसर्ज य हुंति कमा ॥ दरिचक्किबला चउरो, | तीसं पत्तेयमिह दीवे ॥१६॥ ससिङग रविडुंग चारो, इढ दीवे तेसिं चार खि तं तु ॥ पणसय दसुत्तराई, इगसविनागा य मयाला ॥ १७० ॥ पनरस चुल सीइसयं, बप्पन्न डयाल नागमाणाई ॥ ससिसूरमंडलाई, तयंतराणि गिगढ़ीणा इं ॥ १७२ ॥ पणतीस जोयणे जा, ग तीस चडरो य जाग सगनाया ॥ अंतरमा Jain Educationa international For Personal and Private Use Only Page #94 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लघुक्षेपणं ससिणो, रविणो पुण जोयणे उन्नि ॥१७शादीवंतो असियसए, पण पणस । प्रकरण. ॥४५॥ ही य मंडला तेसिं ॥ तीसदिय तिसय लवणे, दस गुणवीस सयं कमसो ॥ १७३॥ ससि ससि रवि रवि अंतरि, म गलस्कु तिसयसाणो ॥ साहिय उसयरि पणचय, बहिलको उसय सादिर्ज ॥१४॥ सादियपणसहस तिहु, तराइ ससिणो मुहुत्तगइ म॥ वावस्मदिया सा बहि, पश्मंमल पनणचबुट्ठी ॥२७॥ जा ससिणो सारविणो, अमसयरिसएण सीसएण दिया ॥ किंचणा राणं अहा, रसहिनागाणमिद वुट्टी ॥१७६॥ मले उदयबंतरि, चनणवश्सहस्स पणसय ग्वीसा ॥ बायालसहिनागा, दिणं च अधारसमुहुत्तं ॥१७॥ पश्मं । मल दिणदाणी, पुण्हमुहुत्तेगसहिन्नागाणं ॥अंते बारमुहुत्तं, दिणं निसा तस्स। विवरीया ॥२७॥ उदयबंतरि बाहिं, सहसा तेसहि सय तेसहि॥ तह ग ॥४५॥ ससिपरिवारो, रिकम वीसामसी गहा ॥ १७॥ गसहिसहस नवसय, पण Jain action ! For Personal and Private Use Only Harjainelibrary.org Page #95 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - हत्तरी तारकोमिकोमीणं ॥ समंतरेणमुस्से,हंगुलमाणेण वा हुँति ॥॥ गह रिक तारगाणं, संखं ससिसंखसंगुणं कालं ॥ इबियदीवुददिमिय, गदाश्माणं | वियाणिजा ॥२७॥चन चन बारस बारस, लवणे तदधाश्यंमि ससि सूरा ॥ परददिदीवेसु य, तिगुणा पुविल्लसंजुत्ता ॥२७॥ नरखित्तं जा समसे, णिचा नारिणो सिग्घसिग्यतरगणो॥ दिहिपदमिति खित्ता,णुमाण ते नराण जहा। ॥२३॥पणसय सत्तत्तीसा, चनतीससहस्स लक गवीसा ॥ पुरकरदीवरुन all रा, पुवेण वरेण पिति ॥२४॥ नरखित्तवहिं ससिरवि, संखाकरणंतरेदि वा । होई॥ तह तब य जोसिया, अचलपमाणसु विमाणा ॥२७॥ जंबूपरिदि। तिलका, सोलसहस उसय पनणअडवीसा॥ धणुअमवीस सयंगुल, तेरसस नाट्टासमदिया य॥१७६॥ सगसय ननया कोडी,लका उप्परम चनणवश सहसा allu सट्ठसयं पनणउको, स सढबासहि करगणियं ॥२७॥ पट्टपरिहिं च गणियं, Jain Education Illa For Personal and Private Use Only Wiainelibrary.org Page #96 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बघु० अंतिमखंडाइ नसुजियं च धणुं ॥ बादं पयरं च घणं, गणियवममेदि करणेदिं प्रकरण. रन॥ विस्कंनवग्गददगुण,मूलं वहस्स परिर होई॥ विकंलपाय गुणि, ॥४६॥ परिर तस्स गणीयपयं ॥१नए॥ उगाहु जसूसु च्चिय, जगणीसगुणो जसूक लाला दोई॥ विनसुपिटुत्ते चनगुण, इसुगुणिए मूलमिद जीवा ॥ १०॥ नसुव । गि गुणजीवा, वग्गजुए मूल दोइ धणुपिठं ॥ धणुउगविसेससेसं, दलियं । बादागं होई॥२॥ अंतिमखंडस्सुसुणा,जीवं संगुणि य चनदि नश्कणं॥ लमि वग्गिए दस,गुणंमि मूलं दवइ पयरो॥१॥ जीवा वग्गेण उगे, मि लिए दलिए य होइ जं मूलं ॥ वेयहाईण तयं, सपिहत्तगुणं दवा पयरो॥ रए३॥ एयं च पयरगुणियं, संववदारेण देसियं तेण ॥ किंचूणं दोइ फलं,अब इदंपि दवर सुहुमगणणा ॥ २०४॥पयरो सोस्सेदगुणो, होइ घणोपरिरया समा ॥४६॥ सवं वा ॥ करणगणणालसेहिं, जंतगलहियान दवं ॥ २५॥ इति श्री लघु All Jain Educational International For Personal and Private Use Only Page #97 -------------------------------------------------------------------------- ________________ देवसमासे प्रथम जंबूझीपाधिकारः समाप्तः॥ दीवोलवणसमुद्दादिगारो नम्म गोतिबं लवणोनय, जोयण पणनव सहस जा तब॥ समनूतला सग सय, जलवुड़ी सहसमो गाढो॥१०६ ॥ तेरासिएण मलि,ल्ल रासिणा संगुणि ज अंतिमगं ॥ तं पढमरासिन्नश्यं, नवेदं मुणसु लवणजले ॥७॥ दिवरिश सहसदसगं, पिडुलामूलान सतरसदसुच्चा ॥ लवणसिहा सा तज्ज्वरि, गाउ लागं वट्ठ ज्वेलं ॥रएन॥ बहुमले चनदिसि चन, पायाला वयरकलससंगणा॥ जोयणसहस्स जड्डा, तहसगुण दिछुवरि रुंदा ॥रणा लकं च मनि पिडुला, जोयणलकं च नूमिमो गाढा ॥ पुवाश्सु वडवामुद, केजुव जूवे सर निदाणा o०॥ अस्मे लहुपायाला, सगसहसा अडसया सचुलसीया ॥ पुवुत्त सयंस तापमा,णा तब तब प्पएसेसु ॥२०॥ कालो य महाकालो, वेलंब पत्नंजणोय च उसु सुरा ॥ पलिवमानणो तह, सेसेसु सुरा तयाक ॥२०॥ सव्वे सिमहो N Jain Education onal For Personal and Private Use Only u.jainelibrary.org Page #98 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लघुदे० ॥ ४७ ॥ Jain Educationa जागे, वाऊ मघिल्लंयमि जलवाऊ ॥ केवलजलमुवरिल्ले, नाग डुगे तब सासु वे ॥ २०३ ॥ बहवे नयारवाया, मुछंति खुदंति मि वाराजं ॥ एगप्रहोरत्तं तो, त या तया वेलपरिवुकी ॥ २०४ ॥ बायालसहि सयरि, सहसा नागाण मद्यवरि बादिं ॥ वेलं धरंति कमसो, चन्दत्तरुलक ते सवे ॥२०५॥ बायालसहस्सेदिं, | पुछेसाणाइदिसि विदिसि लवणे ॥ वेलंधराणवेलं, धरराई गिरिसु वासा ॥ २०६ ॥ गोथूने दगनासे, संखे दगसी मनामि दिसि सेले ॥ गोथूनो सिवदे वो, संखो य मणोसिलो राया ॥२०७॥ कक्कोमे विकुपदे, केलास रुणप्पदे वि | दिसि सेले ॥ कक्कोमग कद्दमर्ज, केलास रुणप्पदो सामी ॥ २०८ ॥ एए गिरिणो सधे, बावीस दिया य दससया मूले ॥ चनसय जनवीस दिया, विचिष्मा हुंति | सिहरतले ॥२०॥ सतरससय इगवीसे, नच्चत्ते ते सवेश्या सवे ॥ कणगंकरय यफा लिह, दिसासु विदिसासु रयणमया ॥११०॥ नवगुणदत्तरि जोयण, बहिज For Personal and Private Use Only प्रकरण • ॥ ४७ ॥ jainelibrary.org Page #99 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लुवरि चत्त पण नव नाया॥एए मझे नवसय,तेसहा नागसगसयर॥२१॥ IN हिमवंतंता विदिसी, साणाश्गयासु चनसु दाढासु ॥ सग सग अंतर दीवा, पढमचनकं च जगई॥१शाजोयणतिसएदि त, सयसयवुट्टी य उसु चन केसु॥अन्नुन्न जग अंतरि, अंतरसमविचरा सवे ॥१३॥ पढमचनक्कुच्चबहिं, अट्ठाइ य जोयण य वीसंसो॥सयारं सवुट्ठिपुरर्ज, मऊदिसिं सवि कोसगं । १४॥ सच्चे सवेश्यंता, पढमचनकंमि तेसि नामाइं ॥ एगोरुय आनासिय, वेसाणिय चेव लांगूले ॥१५॥ बीयचनक्के हयगय, गो सक्कुलि पुत्वकमनामा णो॥ आयंस मिंढग अर्ज, गोपुवमुदा य तश्यंमि ॥१६॥ दय गय हरि वग्घ । मुहा, चउजए आसकरम हरिकम्मो, अकरम करम प्पावर, ण दीव पंचमचनकंमि । ॥१॥ नक्कमुहो मेहमुहो, विजुमुदो विजुदंत उमि ॥ सत्तमगे दंतंता, घण सह निगूढ सुझाय ॥१॥ एमेव य सिहरिंमि वि, अडवीसं सवि डंति उप्प Jain Educational For Personal and Private Use Only Mainelibrary.org Page #100 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर्मयं ना॥ एएसु जुअलरूवा, पलिसंखंसान नरा ॥२१॥ जोयणदसमंस ll प्रकरण. ॥४॥ तणू, पिहिकरंडाणमेसि चनसही॥ असणं चननबा, गुणसीदिण वच्चपाल गया ॥२०॥पबिमदिसि सुध्यि लव,णसामिणो गोयमुत्ति श्गुदीवो ॥उन्न || INIवि जंबुलवणे, उसु रविदीवा य तेसिं च ॥॥ जग परुप्परि अंतरि, तह विबर बार जोयणसहस्साएमेव य पुवदिसि,चंदचनक्कस्स चल दीवा ॥श्श्शा al एवंचिय बाहिर, दीवा अहह पुवपबिम ॥ लवणे उधायश्संग स सीणं रवीणं च ॥२३॥ एए दीवा जलुवरि, बदि जोयण सट्ठअहसीइ तदा॥ नागावि य चालीसा, मके पुण कोसगमेव ॥ २४ ॥ कुलगिरिपासायसमा, पासाया एसु नियनियपदणं ॥ तद लवणे जोसिया, दगफालिद जट्टलेसागा ॥ २५॥ इति श्री लवणसमुजाधिकारोक्तिीयः समाप्तः ॥ ७॥ ॥२॥ ॥४ ॥ जामुत्तरदीदेणं, दससयसमपिहुल पणसय जच्चेण ॥ नसुयारगिरि उगेणं, IN Jain Education international For Personal and Private Use Only Page #101 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धायश्संडो उद विहत्तो॥२६॥ खंडगे उ उ गिरिणो, सग सग वासा य अजा रविवररूवा ॥धुरि अंति समा गिरिणो,वासा पुण पिढुलपिङलयरा ॥२॥ दहकुडंडत्तममे,रु मुस्सयं विबरं वियट्ठाणंवगिरीणं च सुमे,रुवऊमिद जाण IN पुवसमं ॥श्शन॥ मेरुगंपि तदच्चिय, नवरं सोमणसदिछुवरि देसे ॥ सगअड सहस्स कण,त्तिसहस पणसी उच्चत्ते ॥श्शणा तहपणनवश्चनम्मन, य अ६ चनम्मन य अ तीसाय ॥ दस य सया य कमेणं, पणहाणपिहुत्ति दिछाय ॥३०॥ न कुंडदीववणमुद, दददीदरसेलकमलविबारं ॥ नश्लंडत्तं च तदा, दद दीदत्तं च इद उगुणं ॥२३॥ गलक सत्तसहसा, अमसय गुणसीन | इसालवणं ॥ पुवावरदीदंतं, जामुत्तरअहसीनश्यं ॥२३॥ बदिगयदंता दी Jalहा, पणलरकण सयरिसहस गुणा ॥श्यर तिलक बप्प,मसदस सयजमि सगवीसा ॥३३॥ खित्ताणुमाण से, स सेलनईविजय वणमुदायामो ॥ चन Jain Educational For Personal and Private Use Only ne baryong Page #102 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लघुले० ॥४ ॥ लकु दीदवासा, वासविजयविबरो नमो ॥ २३४ ॥ खित्तंकगुणधुवंके, | प्रकरण. दोसय बारुत्तरेदि पविनत्ते ॥ सबब वासवासो, हवेश् इद पुण श्य धुवंका ॥३५॥ धुरि चनद लक सद, स दो सगनग्या धुवं तहा म॥ उसय अ डुत्तर सतस,हि सदसब्बीसलका य ॥२३६॥गुणवीस सयं बत्ती,स सहस गुणयाल लक धुवमते ॥ नगिरिवणमाण विसु, ६ खित्तसोलंसपिङ विजया । ॥३॥ नवसदसा बसय तिह, त्तरा य बच्चेव सोलनाया य ॥ विजयपिहुत्त नगिरि, वणविजयसमासचनलका ॥२३॥ पुवंव पुरी य तरू, परमुत्तरकुरु सुधाइ मदधाइ॥रुका तेसु सुदंसण, पियदंसणनामया देवा ॥२३॥ धुव । ||रासीसु य मिलिया, एगो लरको य अमसयरि सहसा॥ असया बायाला, परिदितिगंधायईसंडे ॥२४०॥ कालोददि सबबवि, सदसुंडो वेलविरदिन त ॥४ ॥ ॥सुबियसम कालमदा, कालसुरा पुवपछिम ॥२४१॥ लवणंमिव जदसं Jain Education For Personal and Private Use Only hd.jainelibrary.org Page #103 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नव, ससिरविदीवा इहंपि नायवा ॥ नवरं समंत ते, कोसगुच्चा जल स्सुवरि ॥२४॥ पुकरदलबहिजगइ, व संठिठ माणुसुत्तरो सेलो ॥ वेखंधरगि INरिमाणो, सींद निसाई निसढवस्मो ॥३४३॥ जद खित्तनगाईणं, संगणो धाय । लिए तदेव दं॥उगुणो य नहसालो, मेरुसुयारा तहा चेव ॥१४४॥श्द बादि। रगयदंता, चनरो दीदत्ति वीस सय सहसा ॥ तेयालीससहस्सा, गुणवीसहि या सया उन्नि ॥४५॥ अग्निंतर गयदंता, सोलसलका य सहसव्वीसा ॥ सोलहिय सयं चेगं, दीदत्ते हुँति चनरोवि ॥४६॥सेसा पमाण जह, जंबूदी । वान धाइए नणिया ॥ गुणा समा य ते तद, धायश्संडान श्द नेया॥१४॥ अडसीलका चउदस, सहसा तह नवसया य गवीसा ॥ अग्निंतर धुवरासी, पुवत्त विही गणियवो ॥३४नागकोडि तेरलका, सहसा चनचत्त सगसय तियाला ॥ पुरकरवरदीवडे,धुवरासी एस ममि ॥४॥ एगा कोमी अमती,.a Jain Education international For Personal and Private Use Only Page #104 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लघु० ॥ ५० ॥ सलक चनदत्तरीसहस्सा य ॥ पंचसया पणसठा, धुवरासी पुरकर ते ॥२५०णी गुणवीससदस सगसय, चंडणजय सवाय विजयविकंजो ॥ तद इद बहिवद | सलिला, पविसंति य नरनगरसादो ॥ २८२ ॥ इह पनममहापनमो, रुरका उत्त रकुरूसु पुवि । तेसु य वसंति देवा, पमो तह पुंगरीजं य ॥ २५२ ॥ पुरकरदल पुवादर, खंडतो सद्सङग पहुकुमा ॥ णियातद्वाणपुण, गीसच्चाचेव जाणंति ॥ दा गुणहत्तरि पढमे, उम लवणे बी यदी व तश्य दे। पहु पिहू पणसय चाला, य | नरखित्ते सयल गिरिणो ॥ २५३ ॥ तेरद सय सगवला, ते पामेरू हि विर दिया सवे ॥ उस्सेदपायकंदो, माणुससेलो वि एमेव ॥ २५४ ॥ धुवरासीसु तिलका, पण पासदस्स बसय चुलसीया ॥ मिलिया दवंति कमसो, परिदितिगं पुरकर इस्स | ॥२५८॥ नददघणथणियागणि, जिणाई नरजम्ममरणकालाई ॥ पणयालल कजोयण, नरखित्तंमुत्तु नो पुरजं ॥ २५६ ॥ चस्तुवि इसुयारेसु, इक्किं नरन Jain Educationa International For Personal and Private Use Only प्रकरण. 1120 11 Page #105 -------------------------------------------------------------------------- ________________ IN||गंमि चत्तारि॥ कूडोवरि जिणनवणा, कुलगिरिजिणनवणपरिमाणा ॥२५॥ तत्तो गुणपमाणा,चउदारा थुत्तवस्मियसुरूवानंदीसरबावमा, चन कुंमलि यगिचत्तारि ॥३५॥ वहुसंखविगप्पे रुय, गदीव उच्चत्ति सहस चुलसीईनर नगसमस्यगो पुण, विबरि सयगण सहसंको॥श्यणा तस्स सिदरंमि चनदि सि, बीयसदस्सि गिगु चनबि अ ॥ विदिसि चक श्य चत्ता, दिसिकुमरि। कूम सहस्सुच्चा ॥२६॥श्य कयवयदीवोददि, वियारलेसो मएविमरणावि ॥ मालिदि जिणगणदरगुरु, सुयसुयदेवीपसाएण ॥३६॥ सेसाण दीवाण तहो । वादहीणं, वियारविबारमणोरपारं॥सया सुया परिनावयंतु, सबंपि सर्वनुयश्क । चित्ता ॥३६॥ सूरिदि जं रयणसेदरनामएहिं, अप्पब मेव रश्यं नरखित्तविकं । तं सोदियं पयरणं सुयणादि लोए, पावेन तं कुसलरंगमयप्पसिटिं॥२६॥ इति श्री क्षेत्रसमासप्रकरणं संपूर्णम् ॥ श्यखित्त समास पकरणस्सनछो० ॥ JainEducationamlenalonal For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #106 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकरण. कर्म Man श्रीजिनायनमः ॥ अथ श्रीदेवेंसरिकृतकर्मग्रंथमूलगायाप्रारंनः ॥ आ पर्याटत्तम् ॥ सिरिवीरजिणं वंदित्र, कम्मविवागं समासवुद्धं ॥ कीर जिएण ॥५१॥ जा देनहिं, जेणंतो नम्मए कम्मं ॥२॥पयशविरस पएसा, तं चनदा मोअगस्सा दिलंता ॥ मूलपग उत्तर, पगई अडवन्न सयनेअं॥२॥श्व नाण दंसणा वर,ण वेअ मोहान नाम गोआणी॥ विग्धं च पण नव अ, वीस चन ति सय पण विहं॥३॥ म सुत्र उही मणके, वलाणि नाणाणि तब मश्ना Kण॥ वंजणवग्गद चनहा, मण नयण विणिंदिअ चनका ॥४॥ अजुग्गद ईहा , वा,यधारणा करण माणसेहिं बहा ॥श्अ अध्वीस नेअं,चनदसदा वीसहा च ॥ सुअं॥॥ अस्कर सन्नी सम्मं, साईयं खलु सुपजवसिअंच ॥गमिअं अंगप । विहं, सत्तवि एए सपमिवरका ॥६॥ पऊय अस्कर पय सं, घाया पडिवत्ति तद ॥१॥ य अणुउंगो॥ पाहुडपाहम पाहुड, वजू पुत्वाय ससमासा ॥ ७॥ अणुगामि । Jain Educational For Personal and Private Use Only Lallanelibrary.org Page #107 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Educationa वढमाणय, पडिवाई यर विदा बढ़ा दी || रिजम विलमई मण, नाणं के | वल मिगविदाणं ॥ ८ ॥ एसिंजं आवरणं, पडुच्च चकुरस तं तया वरणं ॥ दंसण चन पण निद्दा, वित्तिसमं दंसणावरणं ॥ ॥ चकु द्दिधि अचकू, सेसिंदिय नहिं केवलेहिं च ॥ दंसण मिद सामन्नं, तस्सावरणं तयं चन्दा ॥ १० ॥ सुद | पडिबोदा निद्दा, निद्दा निद्दा य डुकपर्डिबोदा ॥ पयला विजेवविध, स्स पयल पयला य चंकमर्ज ॥ १२ ॥ दिए चिंतित करणी, थीम दी प्रचक्कि ६ | बला ॥ महुलित्त खग्गधारा, लिहिणं व डुदान वे ॥ १२ ॥ सन्नं सु रमणुए, सायमसायं तु तिरि निरएसु ॥ मव मोदी, डुविदं दंसण च |रण मोदा ॥ १३ ॥ दंसणमोदं तिविदं, सम्मं मीसं तदेव मित्तं ॥ सुद्धं अ विसु, विसुधं तं दवइ कमसो ||१४|| जि अजि म पावा, सव संव र बंध मुरक निकरणा ॥ जेणं सद्ददइ तयं, सम्मं खइगाइ बहुनेछं ॥ १५॥ मी For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #108 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर्म सा न रागदोसो, जिणधम्मे अंतमुहु जहा अन्ने ॥ नालिअर दीवमणुणो, मिग्रंथ जिणधम्म विवरीअं ॥१६॥ सोलस कसाय नव नो, कसाय उविहं चरित्त ॥५ ॥ मोहणियं ॥ अण अप्पच्चरकाणा, पच्चरकाणाय संजलणा ॥१॥ जा जीव वरि। INस चनमा, स परकग्गा निरय तिरिय नर अमरा ॥ सम्माणु सवविरई, अ || दखाय चरित्त घायकरा ॥२॥जल रेणु पुढवि पन्वय, राईसरिसो चनविदो को , दो॥ तिणि सिलया कहन्धि, सेलबंनो वमोमाणो ॥१॥ माया वलेदि गो मु,त्तिमिंढसिंग घणवंसमूलसमा ॥ लोहो दलिद्द खंजण, कद्दम किमिराग सा माणो॥॥ जस्सुदया दो जिए, दास र अरइ सोग नय कुबा ॥ सनिमि। नात्त मन्नदा वा, तं इह हासाइ मोदणिअं॥॥ पुरिसिबि तनयं पश्, अदि लासो जव सा दवइ सोन ॥ थी नर नपुं वेदङ, फुफुम तण नगरदाहसमो ॥५ ॥३॥ सुर नर तिरि निरया, दडिसरिसं नामकम्म चित्तिसमं ॥ बायाल ति ॥ Jain Educationare a For Personal and Private Use Only www.janeDrary.org Page #109 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नवविहं, तिनत्तरसयं च सत्तही ॥२३॥ गइ जाइ तणु जवंगा, बंधण संघाय ! पाणि संघयणा ॥ संगण वम गंध र,स फास अणुपुवि विहगगई॥३४॥ पिं डपयडित्ति चन्दस,परघा जस्सास आय वुडोअं॥ अगुरुलहु तिब निमिणो, वघाय मिअ अपत्ते॥श्या तस बायर पजात्तं, पत्तेय थिरं सुन्नं च सुन्नगं च॥ सुसरां इक जसं तस, दसगं थावरदसं तु श्मं ॥२६॥थावर सुहम अ पऊ, साहारण अथिर असुन उन्नगाणि ॥सर अणाश्जा जस, मिअनामे | सेअरा वीसं ॥३॥ तसचन थिरकं अथि,रबक्क सुहमतिग थावरचनकं ॥ सु नगतिगाइ विनासा, तया संखादि पयडीहिं॥श्ना वनचन अगुरुवहु चन, |तसाइउति चनर बक्क मिच्चा॥श्अ अन्नावि विनासा, तयाइ संखाहि पय मीहिं॥शणागश्ाश्अणुक्कमसो, चन पण पण ति पण पंच व बकं ॥ पण छ। ग पण ह चन उग, श्अ उत्तरनेअ पणसही ॥३॥अम्वीस जुआ तिनवर, Jain Education in For Personal and Private Use Only inelibrary.org Page #110 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर्म ॥५३॥ संतेवा पनर बंधणे तिसयं ॥ बंधण संघाय गहो, तणूसु सामस्म वण चक | ग्रंथ ? ॥३१॥अ सत्त ही बंधो,दएअनय सम्म मीसया बंधे ॥ बंधद ए सत्ताए, वीस ज्वीसघ्वामसयं ॥ ३२॥ नरय तिरि नर सुरगई, इग बिअ तिअ चन पणिंदि जार्ज ॥ उराल विनवा हा, र तेअ कम्मण पण सरीरा ॥ ३३ ॥ बा। दूरु पिहि सिर उर, अरंऽग जवंग अंगुली पमुदा ॥ सेसा अंगोवंगा, पढ म तणुतिगस्सुवंगाणि ॥३४॥ उरलाइ पुग्गलाणं, निब६ बख्तयाण संबंधं ॥ जं कुणइ जन समंतं, बंधण मुरलाइ तणु नामा ॥३५॥ जं संघाय उरला, २ || पुग्गले तिणगणं वदंताली॥ तं संघायं बंधण,मिव तणु नामेण पंचविह॥३६॥ |उराल विनवा हा, र याण सग तेज कम्मजुत्ताणं ॥ नव बंधणाणि इअर, उ सहि आणि तिन्नि तेसिं च॥३॥संघयण महिनिच, तं बहा वजारिसह ना ॥५३॥ तियारिसह नारायं, नारायं अनारायं ॥ ३८ ॥ कीलिअ वह इह, राय तहयो For Personal and Private Use Only Le baryong Page #111 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Educational सिदो पट्टो की लिखावऊं ॥ उज्जन मक्कडबंधो, नारायं इममुरालंगे ॥ ३णा सम चनरंसं निग्गो, दा साइ खुजाइ वामणं हुं ॥ संठाणा वम किएह, नी ल लोदिय दलिद्द सिया ॥४०॥ सुरदी डुरदी रस पण, तित्त कडु कसाय अं |बिला मदुरा ॥ फासा गुरु लहु मिन खर, सी एह सिणि-६ रुकट्ठा ॥ ४१ ॥ नील कसिणं डुगंधं, तित्तं कडुग्रं गुरुं खरं रुकं ॥ सीयं च सुद नवगं, इक्का | रसगं सुनं सेसं ॥४२॥ चउद्गइवणुपुवी, गइ पुत्रि डुगं तिगं नियाजु ॥ पुर्वी उदर्ज वक्के, सुद प्रमुद वसु दृ विदग गई ॥ ४३ ॥ परघा उदया पाणी, | परेसि बलिपि दोइ रिसो ॥ ऊस सि लधिजुत्तो, हवेइ ऊसासनामवसा | ॥ ४४ ॥ र विबिंबेन जिच्प्रंगं, तावजुद्धं यवान नजलणे ॥ जमु सिण फास |स्स तदिं, जो दिच्प्रवमस्स उदत्ति ॥ ४२॥ अणु सिण पयासरूवं, जिच्यंगमुजो एइ हुको या ॥ जइ देवुत्तर विक्किम, जोइस खजो माइव ॥४६॥अंगं न For Personal and Private Use Only inelibrary.org Page #112 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर्म० ॥ ५४ ॥ Jain Educationa गुरु न बहु, जायइ जीवस्स अगुरु लहु उदया || तिढेण तिदुच्प्रणस्स वि, पुको से दर्ज के लिए ॥४७॥ अंगोवंग नियमि, निम्माणं कुणइ सुत्तदा | रसमं ॥ उवघाया नव दम्मइ, सतणु अवयवलंबि गाईहिं ॥ ४८ ॥ विति चन पणिदितस्सा, वायर बायरा जिच्या थूला ॥ नि नि पत्ति जुआ, प | आत्ता व किरणेहिं ॥४॥ पत्ते अ तणू पत्ते,उदरणं दंतव्य हिमाइ थिरं ॥ ना जुवरि सिराइ सुदं, सुनगाउं सवजाइो ॥२०॥ सुसरा महुर सुहझुणी, या इजा सघलो गिनवर्ड | जस जस कित्ती, यावर दसगं विवचं ॥ ॥ ५२ ॥ गो उच्च नी, कुलाल इव सुघड गुंजलाई ॥ विग्धं दाणे लाने, जोगु व जोगेसु विरिए ||२|| सिरि दरि समं एत्र्यं, जद पडिकूले ते | रायाई ॥ न कुणइ दाणाई अं, एवं विग्घेण जीवो वि॥५३॥ पडिणी प्रत्तण नि न्हव, उवघाय पर्जस अंतराएणं ॥ अच्चा सायणयाए, आवरण डुगं जिर्ज ज nal Psional For Personal and Private Use Only ग्रंथ १ ॥ ५५ ॥ Jainelibrary.org Page #113 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यई॥५४॥ गुरुनत्ति खंति करुणा, वय जोग कसायविजय दाण जुर्ज ॥ दढ । धम्माई अकाइ, सायमसायं विवजयजयानम्मग्ग देसणाम,ग्ग नासणा दे। वदत्वहरणेहिं ॥ दंसणमोहं जिण मुणि, चेश्अ संघाइ पडिणी ॥५६॥ विहं INप चरणमोदं, कसाय हासा विसय विव समणो॥बंध निरयान महा, रंनी परिग्गदर रुद्दो॥५॥ तिरिआन गूढदिअर्ज,सढो ससल्लो तदा मणुस्सा॥ पयई य तणुकसा, दाणरुई मसिमगुणो अ॥५॥अविरश्मा सुराज बालतवोऽकाम निरोऊयश्॥ सरखो अगार विल्लो, सुहनामं अन्नहा अ सुदं ॥णा गुण पेदीमय रहिर्ज, अनयण नावणा रुई निच्चं ॥ पकुण जि णाश्नत्तो, उच्चं नीअं अरदा ॥६० ॥ जिणपूआविग्घकरो, हिंसाइपराय णो जय विग्धं ॥श्य कम्मविवागोयं, लिदिउँ देविंदसूरीहिं॥६१॥ इति कर्मविपाकनामा प्रथमः कर्मग्रंथः समाप्तः॥१॥ ॥॥ ॥॥ Jain Educational For Personal and Private Use Only ne baryong Page #114 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कमा ग्रंथ ॥५५॥ ॥ श्री जिनाय नमः॥ अथ श्रीफितीयकर्मग्रंथप्रारंनः ॥ आर्याटत्तम् ॥ तह थुणिमो वीरजिणं, जह गुणगणेसु सयलकम्मा ॥ बंधुदयोदीरणया, सत्ता पत्ताणि खवित्राणि ॥२॥ मि सासणमीसे, अविरय देसे पमत्त अपम । |त्ते॥निअट्टि अनिअघि सुह,मुवसम खीण सजोगि अजोगि गुणा ॥२॥ निनव कम्मग्गदणं, बंधो उदेण तव वीस सयं ॥ तियरा दारग उग, वर्धा मिमि सतर सयं ॥३॥ नरय तिग जाइ थावर,चन हुँमा यव विवह नपु मि. ॥सोलं तो गहिअसय, सासणि तिरि थीण उग तिगं ॥४॥ अण मला गि संघय,ण चन नि नजोअ कुखगइ बित्ति ॥ पणवीसंतो मीसे, चनसयरि । उहागअ अबंधा॥५॥ सम्मे सग सयरि जिणा, जबंधि वश्र नर तिअ बित्र कसाया॥ उरल गंतो देसे, सत्तही तिय कसायं तो॥६॥ तेवहि पमत्ते सो, ग अरश् अथिर उग अजस अस्सायं ॥ वुबिऊ उच्च सत्तव, नेइ सुराजे जया ५५ ! Jain Educationale la For Personal and Private Use Only Mainelibrary.org Page #115 -------------------------------------------------------------------------- ________________ निहं ॥॥ गुणसहि अप्पमत्ते, सुरान बई तु जइश्हा गजे॥ अन्नद अहाव IN ना, जं आहारग उगं बंधे ॥॥ अमवन्न अपुवा शमि, निद्द गंतो उपन्न पण नागे॥ सुर उग पणिंदि सुखगइ, तस नव नरल विणु तणु वंगा ॥णा समच नर निमिण जिण वन्न अगुरु लहु चन बलंसि तीसंतो॥ चरमे वीस बंधो, दास रई कुच नय ने ॥१०॥ अनिअट्टिनाग पणगे, इगेगहीणोऽवीसविद ।। बंधो॥ पुम संजलण चनपहं, कमेण ले सतर सुहुमे ॥१॥ चन दंसणुच्च ज स ना,ण विग्घ दसगंति सोलसु ॥तिसु साय बंध , सजोगि बंधंत अ तो अ॥१२॥ बंधो संमत्तो ॥२॥ नद विवाग वेअण,मुदीरण मपत्ति इह उ वीस सयं ॥ सतर सयं मिने मी,स सम्म आहार जिणणुदया ॥१३॥ सुहुम तिगा यव मित्रं, मित्रत्तं सासणे गारसयं ॥ निरयाणु पुविणुदया, अण थाव र ग विगल अंतो॥४॥मीसे सय मणु पुवी,णुदया मीसो दएण मीसंतो॥al - Jain Education For Personal and Private Use Only Twiainelibrary.org Page #116 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर्मचसय मजए सम्मा,णु पुश्वि खेवा बिअ कसाया ॥१५॥ मणुतिरिणु पुछि। ॥५६॥ विउव, उहग अणाश्कग सतर उ ॥ सगसी देसि तिरि गइ, आन नि नजोअति कसाया ॥१६॥ अम्बे गसी, पमत्ति आदार जुअल परकेवा ॥ थीण तिगा दारग उग, उसयरि अपमत्ते॥१७॥ समत्तं तिमसंघय, ण तिअग ने बिसत्तरि अपुवे ॥ दासा बक्क अंतो,सहि अनिअट्टि वेअ तिगं | रना संजलण तिगंब ,सही सुहमम्मि तुरिअलोनंतो॥ नवसंत गुणे गुण स,6ि रिसह नाराय ग अंतो॥रणा सगवन्न खीण चरिमि, निद्द छ । गंतो अचरिमि पणवन्ना ॥ नाणंतराय दंसण, चन बेन सजोगि बायाला॥२०॥ तिबुदया नरला थिर, खगइ जुग परित्त तिग उ संगणा ॥ अगुरु लहु वन्न । चन निमि,ण तेअ कम्माग संघयण॥२॥सूसर दूसर साया, साए गयरं च तीस वुबे ॥ बारस अजोगि सुनगा, इज जसन्नयर वेअणिअं॥२२॥ तस Jain Educational nal For Personal and Private Use Only HS.M.jainelibrary.org Page #117 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तिग पणिंदि मणुआ,ज गइ जिणु चंति चरिम समयंतो।नद समत्तो॥शानद जबुदीरणया,परम पमत्ताइसग गुणेसु।पागंतापरम पमत्ताइसगतिगुणा॥२३॥ पागंतरगाथा ॥जं वेअणिादार, गयीणतिगनरामअम्पमत्तता॥गुणयाल सजोगिनदी, रणं तु अणुदीरगु अजोगी ॥४॥ एसा पयमी तिगुणा, वेअणि आदार जुअल थीण तिगं ॥ मणुआन पमत्ता, अजोगि अणुदीरगोनय वाश्यानदारणा सम्मत्ता॥३॥सत्ता कम्माण विई, बंधाश्त्र लक्ष अत्त लाना । णं ॥ संते अमयाल सयं, जा जवसमु विजिणु बिअ तइए ॥२६॥ अपूवाश्य चनक्के, अण तिरि निरयान विणु बिालसयं ॥ सम्माश् चनसु सत्तग, खयं । |मि ग चत्तसय महवा ॥राखवगंतु पप्प चनसुवि, पणयालं निरय तिरि सु राज विणा ॥ सत्तग विणु अडतीसं, जा अनिअट्टी पढम नागो॥श्न॥ थावर तिरि निरया यव, उग थीण तिगे ग विगल सादारं ॥ सोल खउँ उविस सयं, Jain Educational For Personal and Private Use Only ainelibrary.org Page #118 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥५॥ बिअंसि बिअ तिअ कसायंतो॥श्णा तश्ाश्सु चनदस ते,र बार ब पण च । ग्रंथ ३ न तिदिन सय कमसो ॥ नपु शनि दासग पुस, तुरिअ कोदो मय माय ख ॥३०॥ सुमि उसय लोहंतो, खीण मु चरिमेगसय ७ निद्द ख ॥ नवनव चरिम समए, चन देसण नाण विग्धंतो॥३२॥ पणसीइसजोगि अजो, गि चरिमे देव खगइ गंध उगं ॥ फासह वम रस तणु,बंधण संघाय पण निमि। णं ॥३॥ संघयण अथिर संग,ण बक्क अगुरुलह चन अपजात्तं ॥ सायं च असायं वा, परित्तुवंगातिग सुसर निकं ॥३३॥ बिसयरि खर्ड अचरिमे, तेरस मणुअ तस तिग जसाऊं ॥ सुन्नग जिणुच्च पणिंदिअ, सायासा एगयर ।। ॥३४॥ नर अणुपुचि विणा वा,बारस चरिम समयंमि जो खविन ॥ पत्तो सिडिं। देविंद वंदियं नमद तं वीरं ॥३५॥ सत्ता सम्मत्ता॥॥इति कर्मस्तवाख्यो किती ॥५॥ यः कर्मग्रंथः संपूर्णः॥बंधविदाणविमुक्कं, वंदिय सिरिवक्ष्माण जिणचंद।ग Jain Education 11 For Personal and Private Use Only Page #119 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आईसु वुढं, समास बंधसा मित्तं ॥ २॥ इदीए काए, जोए वेए कसाय नाणे य ॥ संजमदंसणलेसा, जवसम्म सन्निहारे ॥२॥ | जिण सुर विवादारग, | देवानिरय सुडुम विगल तिगं ॥ एगिंदि यावरा यव, नपुमिचं हुं देवीं ॥ ३ ॥ पण मद्यागिइ संघय, कुखगइ नि इचि दग थीण तिगं ॥ जो तिरि डुगं तिरि, नराज नर नरल डुग रिसदं ॥ ४॥ सुर इगुण वीस वऊं, इगसन उ |दे बंधदिं निरया ॥ ति विणा मिचि सयं, सासणि नपु चनविणा बनुइ॥५॥ विष्णु ण बवीस मीसे, बिसयरि सिम्मंमि जिण नरान जुच्या ॥ इ रयणाइ सुजंगो, पंकाइसु तिचरदीणो ॥ ६ ॥ जिण माणु आन उदे, सत्तमिए नर डुगुच्च विष्णु मिठे | इग नवई सासाणे, तिरियान नपुंस चनवज्रं ॥ ७ ॥ प्रण चवीस विरदिया, सनर डुगुच्चाय सयरि मीस डुगे ॥ सतरसन उदि मिचे, |पज तिरिच्या विष्णु जिणादारं ॥ ८॥ विष्णु निरय सोल सास णि, सुराज प्रण ए Jain Educationaal For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #120 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ग्रंथ ३ ॥५ ॥ कर्मगतीस विणु मीसे ॥ ससुरान सयरि सम्मे, बीअ कसाए विणा देसे॥॥ अ चगुणेसु वि नरा, परमजया सजिण उदु देसा॥ जिण इक्कारस हीणं, नव सय अपजत्त तिरिअ नरा ॥२॥ निरयव सुरा नवरं, उदे मि इगिदि जातिग सहिआ॥ कप्प उगे विअ एवं, जिणहीणो जोइनवण वणे॥॥रय । गुव सणं कुमारा, आणयाइ जजोअ चनरहिआ ॥ अपजा तिरिअव नव स|| य, मिगिदि पुढवि जल तरु विगले॥२शाउनवश् सासणि विणु सुहु,म तेर के ! पुण बिंति चलनवश्॥तिरिअ नरा ऊदि विणा, तणु पऊत्तिं न जंति जर्ज ॥ ॥१३॥ उहु पणिंदि तसेगइ, तसे जिणिकार नर तिगुच्च विणा ॥ मणवय जोगे उहो, उरले नरनंगु तम्मिस्से॥४॥आदार उग विणोदे, चउदससन मिनि जिण पणगहीणं ॥ सासणि चन नवशविणा, तिरिअ नरान सुहुम तेर॥२५॥ अण चवीसाइ विणा, जिणपण जुअ सम्मि जोगिणो सायं ॥ विणु तिरि न ॥५ ॥ Jain Education A nal For Personal and Private Use Only M M .jainelibrary.org Page #121 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Educationa | राज कम्मे, वि एवमादारङगि उदो ॥ १६ ॥ सुरदो वेवे, तिरिच्य नरान र हि तम्मिस्से | वे तिगा इम बिच तिच्य, कसाय नव डु चन पंच गुणा ॥ १७ ॥ संजलण तिगे नव दस, लोने चन अजइ 5 ति नाण तिगे ॥ बार स चकु चकुसु, पढमा अदखाइ चरिम चक्र ॥१८॥ मणनाणी सग जया इ, समइ बेच् चन पुन्नि परिहारो || केवल डुगि दो चरिमा, अजयाइ नवमइ सु उहि डुगे ॥ १२ ॥ प्रड जवस मि च वेगि, खइए इक्कार मित्र तिगि देसे ॥ सुदुमि साणं तेरस, आहारग नि नि गुणोहो ॥ २० ॥ परमुवसमि वहं ता, प्रान न बंधंति ते अजयगुणे ॥ देवमणुआन दीणो, देसाइसु पुण सुरा | विणा ||२२|| हे प्रहारसयं, आहार डुगूणमाइ बेसतिगे ॥ तं तिचोणं मि बे, साणासु सबहिं हो ॥२२॥ तेऊ निरय नवूणा, नको चन निरय बार विष्णु सुक्का | विष्णु निरय बार पम्हा, जिणाहारा इमा मिचे ॥ २३ ॥ सब गुण For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #122 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर्म० ॥ ५ ॥ Jain Educationa ॥ 11 ॥६॥ नवसन्निसु, उहु अनवा सन्निमिचिसमा ॥ सासन्निन्न, कम्म मंगो प्रणाहारे ॥२४॥ तिसु सु सुक्काइ गुणा, चन सग तेरत्ति बंधसामित्तं | देविंदसूरि रइयं, नेयं कम्मचयं सोनं ॥२५॥ इति बंधस्वामित्वाख्यस्तृतीयः | कर्मग्रंथः समाप्तः ॥३॥ नमि जिणं जित्र्यमग्गण, गुणवाणुवढंग जोग लेसा ॥ बंध प्पबहू जावे, सं खिजाई किमवि वुद्धं ॥१॥ नमि जिणं वत्तवा, चउदस जिवाणएसु गुणठा ा ॥ जोगुवर्उगो लेसा, बंधोदन दीरणा सत्ता ॥२॥ ( पाठांतरं ) चउदस जिया सु, चउदसगुणठाणगाणिजो गाय ॥ नवजंगलेसबंधो, दन्दीरणसंत प ए॥ ॥ तद मूल चन्द मग्गण, गणेसु बासहि उत्तरेसु यवि ॥ जिय गुण जोगुवर्ज गा, लेस प्पबहुं च बहाणा ॥३॥ पाठांतरं ॥ चउदस मग्गठाणे, सुमूलपरसु बिस हि इयरेसु ॥ जियगुणजोगुवउंगा, लेसप्पबहुत्ताणा ॥ ३ ॥ चउदस गुणेसु For Personal and Private Use Only ग्रंथ ४ ॥ एए ॥ 4ainelibrary.org Page #123 -------------------------------------------------------------------------- ________________ |जिअ जो,गु वांग लेसाय बंधहेक य॥ बंधाश्अ चन अप्पा, बहुं च तो नाव संखाई॥४॥ (पागंतरं ) चनदसगुणगणेसु, जियजोगुवढंग लेसबंधाय ॥ बंधुद दीरणा, संतप्पबहुत्तदसगणा ॥४॥ दार गाहा ॥ अथ जी वस्थानानि नच्यन्ते ॥ श्द सुहुम बायरेगिं, दि वि ति चन असन्नि सन्नि पं. चिंदी ॥ अपजत्ता पत्ता, कमेण चनदस जिअहाणा ॥ ५॥ बायर अस। नि विगले, अपजि पढम बिअसन्नि अपजत्ते ॥ अजय जुञ सन्निप, सत्वगुणा मित्र सेसेसु॥६॥ अपजत्त नक्कि कम्मु र, ल मीस जोगा अपऊ सन्नीसु ॥ ते सवि नवमीस एसु, तणु पसु उरलमन्ने ॥ ७॥ सवे सन्नि । पजत्ते, उरखं सुहुमे सनासु तं चनसु ॥ बायरि सविनवि उगं, पज सन्निसु बार उवगंगा ॥ ॥ पज चरिंदि असन्निसु, ७ दंसअनाण दससु चस्कु |विणा ॥ सनिअपले पण ना, चरकु केवल उग विहूणा ॥ ए॥ सन्नि Jain Educational For Personal and Private Use Only M ainelibrary.org Page #124 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥६०॥ कर्मगि उ लेस अप,ऊ बायरे पढम चन तिसेसेसु ॥ अथ बंधादीनि चत्वारि - ग्रंथ । धाराणि प्रारन्यन्ते ॥ सत्तठ बंधुदीरण, संतु दया अह तेरससु ॥ १० ॥ IN सत्तह बेग बंधा, संतु दया सत्त अह चत्तारि ॥ सत्त: उ पंच उगं, नदीरणा सन्निपजत्ते ॥ ११॥ गइ दिएअ काए, जोए वेए कसाय नाणे सु॥ संजम दंसण लेसा, नव सम्मे सन्नि आदारे॥१२॥ सुर नर तिरि निर जय गश्, ग बिअ तिअ चन पर्णिदि बकाया ॥जूजल जलणाडनिल वण, त। सा य मण वयण तणू जोगा ॥१३॥ वेअ नरि बिनपुंसग, कसाय कोद मय माय लोनित्ति ॥ मइ सुअवदि मण केवल, विनंग मश्सुअ नाण सागारा an४॥ सामाश्अ अ परिदा,र सुहुम अदखाय देस जय अजया ॥चरकु अ चरकू उदी, केवल दसण अणागारा ॥२५॥ किण्हा नीला काळ, तेक पम्हा Nय सुक्क नविअरा ॥ वेअग खश्गुवसम मि, मीस सासाण सन्निअरे॥१६॥ ॥६ ॥ JainEducation , For Personal and Private Use Only Pujainelibrary.org Page #125 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आदारे अर नेआ, सुर निरय विनंग मश्सु दि उगे॥ सम्मत्त तिगे पम्हा, सुक्का सन्नीसु सन्निगं ॥१७॥ तमसन्नि अपजाजुअं, नरे सबायर अपऊ ते कए॥थावर शर्गिदि पढमा, चन बार असन्नि छ विगले ॥२॥ दस चरिम । तसे अजया, दारग तिरि तणु कसाय अनाणे ॥ पढमति लेसा नविअर, अचरकु नपु मिबि सवेवि ॥१॥ पङ सन्नि केवल उग, संजम मणनाण देस | मण मीसे ॥ पण चरिम पज वयणे, तिय गवि पजिअर चकुंमि॥२॥थीन र पणिदि चरमा, चन अणदारे सन्नि उ अपजा ॥ ते सुहुम अपऊ विणा, सासणि इत्तो गुणे वुवं ॥२२॥ पण तिरि चन सुर निरए, नर सन्नि पणिंदिन व तसि सत्वे ॥ग विगत नूदगवणे, उ एगं गई तस अनवे॥॥ वे जाति कसाय नव दस, लोने चन अजश्ऽति अनाण तिगे॥ बारस अचस्कु चरकुसु, पढमा अदखाइ चरिम चऊ॥२३॥ मणनाणि सग जयाई, समश् । Jain Education intensional For Personal and Private Use Only Paw.jainelibrary.org Page #126 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर्म० ॥ ६१ ॥ Jain Educationa बेचन पुन्नि परिहारे || केवल पुगि दो चरिमा, जयाइ नव मइसु दि डुंगे | ॥२४॥ ड वसमि च वेगि, खइए इक्कार मित्र तिगि देसे ॥ सुदुमे रस ठा तेर, स जोग आहार सुक्काए ॥ २५ ॥ सन्निसु पढम डुगं, पढम तिले सासु बच्च सु सत्त ॥ पढमं तिम डुग अजया, अपहारे मग्गणासु गुणा ॥ ॥ २६ ॥ सच्चे पर मीस असच मोस मणवय विधि प्रदारा ॥ उरलं मीसा कम्मण, इ जोगा कम्म अणहारे ॥ २७ ॥ नर गइ पििद तस तणु, प्रचकु नर नपु कसाय सम्मडुगे ॥ सन्नि बलेसा दारग, जव मइ सुख उदि डुगि स वे ॥२८॥ तिरि विजय सासण, नाण उवसम व मिसु ॥ तेरादार डुगुणा, ते उरलडगूण सुर निरए ॥२॥ कम्मुरलगं यावर, ते सविधि डुग | पंच इग पवणे ॥ व प्रसन्नि चरिम वइजु, ते विधि गूण च विगले ॥३०॥ कम्मुरलमीस विष्णु मण, वय समइ बेच्य चरकु मणनाणे ॥ नरल डग कम्म For Personal and Private Use Only ग्रंथ ॥ ६१ ॥ Sanelibrary.org Page #127 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पढमं, तिम मण वय केवल डुगंमि ॥ ३२ ॥ मणवय उरला परिहा, र सुदुमि नव तेन मीसि सविधा || देसे सविधि डुगा, सकम्मुरल मीस प्रदखाए ॥ ३२ ॥ ति नाण नाण पण चन, दंसण बार जिप्रलकणु वर्जगा ॥ विष्णु मा नाण डु केवल, नव सुर तिरि निरय असु ॥ ३३॥ तस जो वे सुक्का, हार न र पििद सन्नि नवि सवे ॥ नय अरपण लेसा, कसाय दस केवल डुगूणा | ॥ ३४ ॥ चरिंदि सनि अना, उदंस इग बि ति यावरि प्रचकु ॥ ति अनाण दंसण डुगं, ना तिगि नवि मि डुगे || ३ || केवलडुगं निय डुगं, नव ति नाविणुं खइ प्रहखाए ॥ दंसण नाण तिगं दे, सि मीसि | अन्ना मी संतं ॥ ३६ ॥ मण नाण चरकु वजा, प्रणदारे तिन्नि स च नाणा ॥ चन नाण संजमो वस, म वेगे उदि दंसेा ॥ ३७ ॥ दो तेर तेर बारस, म | रोकमा डु च च वयणे ॥ चन डु पण तिन्नि काए, जिच्च गुण जोगोव Jain Educationtional For Personal and Private Use Only w.jainelibrary.org Page #128 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर्म उगन्ने ॥३०॥ उसु खेसासु सगणं, एगिदि असन्नि नूदगवणेसु ॥ पढमा चन- ग्रंथ ४ रो तिन्निन, नारय विगलग्गि पवणेसु ॥३॥ अदखाय सुहुम केवल, उगि सु का गवि सेस गणेसु ॥ नर निरय देव तिरिआ, थोवा ॐ असंखणंतगुणा Non पण चन ति छ एगिंदी, थोवा तिन्नि अदिआ अणंत गुणा ॥ तस थो । व असंखग्गी, न जला निल अदिअ अणंता॥४२॥ पण वयण काय जोगी, थोवा असंख गुणा अणंतगुणा ॥ पुरिसा थोवा श्री, संखगुणाणंतगुण कीवा । ॥४॥ माणी कोही माई, लोनी अदिअ मणनाणिणो थोवा ॥ उहि असंखा। म सुअ,अदिय सम असंख विनंगा ॥४३॥ केवलिणोणंतगुणा, म सुअर अन्नाणिणंतगुण तुल्ला।सुहमा थोवा परिदा,र संख अदखाय संखगुणा आ समश्अ संखा,देस असंखगुणडणंत गुण अजया॥थोव असंखजुर्णता, दि नयण केवल अचस्कू॥४यापाणु पुवि लेसा, थोवा दोसंखणंत दो अ lain Edition For Personal and Private Use Only M ainelibrary.org Page #129 -------------------------------------------------------------------------- ________________ हिआ।अन्नवि अर थोवमणंता, सासण थोवो वसमसंखा ॥४६॥ मीसा सं खा वेअग, असंख गुण खश्य मिब अणंता ॥ सन्नि अर थोवणंता,अण दार थोवेअर असंखा ॥४॥ सव्व जिअगण मिले, सग सासणि पण अपऊ । सन्नि उगं॥ सम्मे सन्नी उविदो, सेसेसु सन्नि पऊत्तो॥४नमिव उगि जसा जोगा, हार गूणा अपुत्व पण गेन ॥ मणवय उरख सविनवि, मीसी सविन Falवि जुग देसे॥णासादारदुग पमत्ते, ते विनवादार मीस विणुश्अरे ॥ कम्मुरल। दुगंता इम, मण वयण सजोगि न अजोगि ॥५०॥ ति अनाण दुदंसा इम, दुगे अजय देसि नाण दंस तिगं ॥ ते मीसि मीस समणा,जयाइ केवल दु अं त दुगे ॥५॥ सासण नावे नाणं, विनच गाहारगे जरस मिस्सं ॥ नगिदिसु, सासाणो, नेहादि गयं सुअ मयंपि॥५॥ उसु सवा तेन तिगं, इगि सु सुक्का । अजोगि अल्लेसा ॥बंधस्स मित्र अविर,कसाय जोगत्ति चन देऊ॥५३॥अM Jain Educational For Personal and Private Use Only Page #130 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ग्रंथ कर्म निगदिअ मणनिगहिआ, जिनिवेसिअ संसश्अ मणा नोगा ॥पण मिड बा ! ॥३॥ र अविर, मण करणानिअमु उजिअवदो॥५४॥ नव सोल कसाया पन, भारि जोग श्अ उत्तरा उसगवरमा॥ग चन पण ति गुणेसु, चन ति दुग पच्च बंधो५याचन मिब मिब अविरइ, पञ्चश्या साय सोल पणतीसा ॥ जो ग विणु ति पञ्चश्मा,हारग जिण वऊसेसा ॥५६॥पणपन्न पन्न तिअ बदि, || अचत्त गुणचत्त बचन दुगवीसा ॥ सोलस दस नव नव स,त्त देन णो न अा जोगम्मि ॥५॥ पणपन्न मिनि दारग, उगूण सासाणि पन्न मिडविणा ॥ मीस ग कम्म अण विणु, तिचत्त मीसे अदब चत्ता ॥ ५॥ समीस कम्म अज ए, अविर कम्मुरलमीस बिकसाए ॥ मुत्तु गुण चत्त देसे, वीस सादार | ॥ पमत्ते ॥णा अविर गार तिकसा,य व अपमत्ति मीस उग रहिआ॥ च||॥६३ ॥ वीस अपुवे पुण,ज्वीस अविनवि आदारा॥६० ॥ अ बदास सोल बायरि, Jain Education alonal For Personal and Private Use Only Mjainelibrary.org Page #131 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सुहुमे दस वेअ संजलण ति विणा ॥ खीणु वसंति अलोना, सजोगि पुवुत्त सग जोगा॥६॥ अपमत्तंता सत्त, म्मीस अपुत्व बायरा सत्त ॥बंध बस्सुम का दमो ए, ग मुवरिमाबंधगा जोगी॥ ६॥ आसुहुमं संतुदए, अहवि मोद वि। वाणु सत्त खीणंति ॥ चन चरिम उगे अहन, संते नवसंति संतुदए॥३॥ ति पमत्ता, सगह मीसह वेअ आज विणा ॥बग अपमत्ताइ त, उ पंच सु। । हुमो पणु वसंतो॥६॥ पण दो खीण उ जोगी, णुदीरगु अजोगि थोव जव । संता॥संख गुण खीण सुहमा, निअट्टि अपुत्व सम अदिशा॥६या जोगि अ पमत्त श्यरे,संख गुणादेस सासणा मीसा ॥ अविर अजोगि मिना,असंख चरोज्वेणंता॥६६॥ जवसम खय मीसोदय, परिणामा 3 नव गरगवीसा तिअनेअसन्नि वाश्य, सम्मं चरणं पढम नावे ॥६॥ बीए केवल जुअलं, al सम्मं दाणा लक्षिपण चरणं ॥ तइए सेसुव उंगा, पण लही सम्म विरइ छ Jain Educati o nal For Personal and Private Use Only A jainelibrary.org Page #132 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर्म० ॥ ६४ ॥ गं ॥ ६८ ॥ अन्ना मसित्ता, संजम लेसा कसाय गइ वेा ॥ मिचे तुरिए नवा, नवत्त जित्त परिणामे ॥ ६९ ॥ चन चन गईसु मीसग, परिणामुदए दि | चसु खइएहिं ॥ नवसम जुए दि वा चन, केवलि परिणामुदय खइए ॥ ७० ॥ | खय परिणामे सिन्हा, नराण पण जोगु वसम सेढीए ॥ इ पनर संनिवाइ, नेच्या वीसं असंजविणो ॥ ७१ ॥ मोदो वसमो मीसो, चनघासु अठ कम्मसु | सेसा ॥ धम्माइ पारिणामिच्ा, जावे खंधा उदइ एवि ॥ १२ ॥ सम्माइ च सु तिग चड, जावा च पणु वसामगुवसंते ॥ चजखीणा पुढे ति, न्निसेस गुण | गणगे गजिए ॥ ७३ ॥ संखिज्जेग मसंखं, परित्तजुत्त नि पय जुखं तिविदं ॥ एव मतंपि तिहा, जदन्न मधुकसा सवे ॥ ७४ ॥ बहु संखि डुच्चि, अर्ज परं मझिमंतु जागुरु ॥ जंबूदीवपमाणय, चपल परूवणाई इमं ॥ लावधि सिला, ग प डिसिलागा महासिलागरका ॥ जो सहसो गाढा, प Jain Education nonal For Personal and Private Use Only ग्रंथ ४ ॥ ६४ ॥ jainelibrary.org Page #133 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सवेश् अंता ससिह नरिआ ॥६॥ तो दीवुदहिसु इकि, क सरिसवं खीवि अ! निहिए पढमे ॥ पढमं व तदंतं चित्र,पुण नरिए तंमि तह खीणे ॥७॥ खिप्प। सिलाग पल्ले,गु सरिसवोश्य सिलाग खिवणेणं ॥ पुप्लो बी अ तर्ज, पुवंपि। व तंमि उ-हरिए ॥७॥ खीणे सिलागि तइए, एवं पढमेदि बीअयं नरसु ॥ते हिअ तश्शं तेहिअ, तुरिअंजा किरपुमा चनरो॥॥ पढमति पलुरिआ, दीवुददी पल्ल चन सरिस वाय ॥ सवो वि एस रासी,रूवृणो परमसंखिऊGy रूव जुअंतु परित्ता, ऽसंखं लहु अस्सरासि अग्नासे ॥ जुत्ता संखिऊं लह, आवलिआ समय परिमाणं ॥२॥ बिति चन पंचम गुणणे, कम्मासग संख खापढम चन सत्त॥णंता ते रूवजुआ, मद्यारूवृण गुरुपना॥॥श्य सुत्तुत्तं अन्ने, वग्गिअ मिकसि चन्बय मसंखं ॥ होइ असंखासंखं, लहुरूवजुअंतु तं मद्यं ॥७३॥ रूवृण माश्मं गुरु, तिवग्गि तबिमे दसकेवे ॥ लोगागासपए Jain Education For Personal and Private Use Only Page #134 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर्म सा, धम्माधम्मेगजिअ देसा ॥४॥ विश्बंधनवसाया, अणुनागा जोग अलग्रंथ ५ पमिनागा ॥उण्हय समाण समया, पत्तेअ निगोअए खिवसु ॥ ५॥ पुण तं | ॥६५॥ मिति वग्गिए, परित्तणंत लह तस्स रासीणं ॥ अग्नासे लहु जुत्ता, अंतं अनव जिप्रमाणं ॥६॥ तवग्गे पुण जायइ, एंता णंत बहु तंच तिरकुत्तो॥ वग्गमु तह विनतं दो, णंत खेवे खिवसु ब श्मे ॥७॥ सिधा निगोअ जीवा, IN|वणस्सई काल पुग्गला चेव ॥ सब मलोग नदं पुण, तिवग्गिलं केवल उगंमि | Gना खित्ते णंताणंतं, दवेश जिहं तु ववदर मसं॥श्य सुदमबविआरो, लि। दि देविंदसूरीहिं॥नए॥इति षडशीतिकाव्यश्चर्तुथः कर्मग्रंथः समाप्तः॥ ॥ ४ ॥ अथ शतकनामा पंचमः कर्मग्रंथः प्रारभ्यते ॥ नमिअ जिणं धुव बंधो, दय सत्ता धाइ पुरम परिअत्ता ॥ सेअर चनद विवागा, वुचं ॥६५॥ नबंधविद सामी अ॥१॥ वम चन तेअ कम्मा, गुरु लहु निमिणो वधाय Jain Education PIA International For Personal and Private Use Only wiww.jainelibrary.org Page #135 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जय कुबा ॥ मित्र कसाया वरणा, विग्धं धुवबंधि सगचत्ता॥शातणु वंगा गि संघय,ण जाइ गइ खग पुवि जिणु सासं ॥उजो आयव परघा, तसवीसा गोअ वेयणियं ॥३॥ दासा जुअल उग वे,अ आज तेउत्तरी अधुव बंधो॥ नंगा अणा साई, अणतं संतुत्तरा चनरो॥४॥ पढम बिआ धुव नदसु, धु वबंधिसु तश्श वज नंगतिगं॥ मिमि तिन्नि नंगा, उहावि अधुवा तुरिया नंगा॥५॥ निमिण थिर अथिर अगुरुज, सुद असुदं तेअ कम्म चनवन्ना ॥||| नाणंतराय दंसण, मिचं धुव उदय सगवीसा ॥६॥ थिर सुन्न अर विणु अछुव, बंधी मित्र विणु मोद धुवबंधी ॥ निदोव घाय मीसं, सम्मं पण नवइ अधुवुना दया ॥॥ तस वम वीस सगते,अ कम्म धुव बंधि सेस वेय तिगं ॥ आगि तिग वेअणिअं, छ जुअल सग उरल सास चक॥॥ खगई तिरिङ्ग नी, धुव सत्ता सम्ममी स मणुअ गं॥ विनविकार जिणा, दारस गुच्चा अधुवस Jain Education Lional For Personal and Private Use Only Marw.jainelibrary.org Page #136 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर्म० ॥ ६६ ॥ त्ता || || पढम तिगुणेसु मित्रं, नियमा प्रजयाइ ठगे न ॥ सासाणे ख लु सम्मं, सत्तं मिचाइ दसगेवा ॥१०॥ सासण मीसेसु धुवं, मीसं मिठाइ नव सुजयाए ॥ आइ डुगण नियमा, नइया मीसाइ नवगम्मि ॥ ११॥ प्रा दार सत्तगं वा, सब गुणे वि ति गुणे विणा तिचं ॥ नो जय संते मित्रो, अंत मुहुत्तं नवेति ॥ १२॥ केवल जुमला वरणा, पण निद्दा वारसाइम कसाया ॥ मिचंति सब घाई, चन नाण ति दंसणा वरणा ॥ १३ ॥ संजल नो कसाया, | विग्धं इ देस धाइ घाइ ॥ पते तणु ठाऊ, तस वीसा गो डुंग व मा ॥ १४ ॥ सुर नर तिगुच्च सायं, तस दस तणु वंग वइर चनरंसं ॥ परघासग तिरियाऊ, वस चन पणिदि सुनखगई ॥ १५॥ बायाल पुस पग, अपढम संगण खगइ संघयणा ॥ तिरि डुग असाय नीर्ज, वघाय इग विगल निरय तिगं ॥ १६ ॥ यावर दस वन्न चक्क घाय पणयाल सदिय बासीई ॥ पाव पय Jain Educationa International For Personal and Private Use Only ग्रंथ ५ ॥ ६६ ॥ Page #137 -------------------------------------------------------------------------- ________________ BER डित्ति दोसु वि, वस्माइगहा सुहा असुहा ॥१॥ नाम धुव बंधि नवगं, दंसण || मालण नाण विग्घपरघायं ॥नय कुब मिच सासं, जिण गुण तीसा अपरियत्ता| IHरना तणु अह वेअजुअल, कसाय नजोअ गोय उगे निदा॥ तस वासा। Nन परित्ता, खित्तविवागाणुपुवी ॥१५॥ घणघाइगोन जिणा, तसिअर || तिसुलग उन्नग चन सासं॥ जातिग जिअ विवागा, आऊ चनरो नव वि| वागा ॥२०॥ नाम धुवोदय चन तणु, वघाय साहारणियजोअतिगं॥ पु. ग्गल विवागि बंधो, पयहि रस पएसत्ति ॥२१॥ मूल पयडीण अड स, त्त बेग बंधेसु तिन्नि नूगारा ॥ अप्पतरा तिअ चनरो, अवाि नहु अवत्त बो ॥ एगाददिगे नूड, एगाई कणगम्मि अप्पतरो॥ तम्मत्ती अवाव्य ४॥ उ, पढमें समए अवत्तवो ॥३३॥ नव व चऊदंसे उछ, ति: मोदे उगवीस सत्तरस ॥ तेरस नव पण चन ति , इको नव अह दस फुन्नि ॥॥ ति पण १२ Jain Educational renal For Personal and Private Use Only Alinelibrary.org Page #138 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर्म० ॥ ६७ ॥ बलवदिया, वीसा तीसेगतीस इग नामे ॥ बस्सरा तिबंधो, सेसे सुहाएमेकिकं ॥ २५ ॥ वीसयर को मि कोडी, नामे गोए य सत्तरी मोदे ॥ ती सयर सु उद्दी, निरय सुरामि तित्तीसा ॥ २६ ॥ मुत्तू कसाय इि, बार मुहुत्त जन्न वेयणिए ॥ अ नाम गोए, सु सेसएस मृहुत्तं तो ॥२७॥ वि घावरण असाए, तीसं अहार सुदुम विगल तिगे ॥ पढना गिइ संघयणे, द स सु चरिमेसु डुग बुढी ॥२८॥ चालीस कसाएसु, मिन लेहु निहुएह सुरहि सि महुरे | दसदो सङ्घ समहिया, ते दाखिदं बिलाईग ॥ २॥ दस सुह विद गर उच्चे, सुरडुग थिर बक्क पुरिस र दासे ॥ मिचे सत्तर मणु डुग, इबी सा सु पमरस ॥३०॥ जय कुछ पर सोए, विधि तिरि नरज निरय डुग नीए । ते पण अथर बक्के, तस चन यावर इग पदि ॥ ३१ ॥ नपु कुखगइ सा सचन, गुरु करकडरुरक सीय डुग्गंधे॥ वीसं कोडा कोडी, एन बाद वाससया Jain Educationa International For Personal and Private Use Only ग्रंथ ॥ ६७ ॥ Page #139 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥३॥ गुरु कोडि कोमि अंतो, तिबाहाराण निन्न मुह बाहा ॥ बहु विसं । ख गुणूणा, नर तिरियाणान पल्ल तिगं॥३३॥ग विगल पुत्व कोडी, पलिया संखंस आन चन अमणा ॥ निरुवकमण उमासो, अबाद सेसाण नवंतंसो ॥ ॥३४॥ सह निबंधो संजल,ण लोह पण विग्घ नाण दंसेसु ॥ निन्न मुहुत्तं । तेअ, जसुच्चे बारसय साए ॥ ३५॥ दो ग मासो परको, संजलण तिगे पुम 5 वरिसाणि ॥ सेसाणुकोसान, मिबत्तहिए जलई ॥३६॥ अय मुक्कोसो गि दिसु, पलियाऽसंखं सहीण लहु बंधो॥ कमसो पणवीसाए, पन्नासय सहस संगुणि ॥३॥ विगल असन्निसु जिहो, कणि पक्षसंख नागूणो॥सुर नि । रयान समादस, सहस्स सेसान खुड नवं ॥३॥ सवाणवि खहु बंधे, निन्न मु हुअ बाद आज जिछेवि ॥ केश सुरान समजिण, मंत मुहु बिंति दारं ॥ IN|॥३॥ सत्तरस समदिा किर, गाणु पाणंमि हुँति खुड्डनवा ॥ सगतीस स| Jain Educationa l For Personal and Private Use Only Page #140 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर्मण्य तिहुत्तर, पाणू पुण इग्ग मुहुत्तंमि ॥४०॥पणसहिसहस पण सय, उत्तासा ग्रंथ नाग मुहुत्त खुड्डनवा ॥ आवलियाणं दोसय, बप्पन्ना एग खुड्डनवे ॥४२॥ अ विरय सम्मो तिलं, आदार उगा मराज अपमत्तो ॥ मिनादिही बंधश्, जिह हिसेस पयडीणं ॥४शा विगल सुहुमाग तिगं, तिरि मणुयाऽसुर विनविनि रय गं ॥ एगिदि थावरा यव, आईसाणा सुरुक्कोसं ॥४३॥ तिरिनरल उगु । जोअं, विछ सुरनिरय सेसचन गश्ा ॥ आहार जिण मपुवो, नियहि संजा लण पुरिस लहू ॥४४॥ सायजसु चावरणा, विग्धं सुहुमो विनवि असन्नि. सन्नीविषा न बायर, पजेगिंदीन सेसाणं ॥४५॥ नकोस जहरमीयर, नंगासा ई अणाइ धुव अधुवा ॥ चनहा सग अजहन्ना, सेसतिगे आज चनसु उदा. ॥४६॥ चनने अजहन्नो, संजलणा वरण नवग विग्घाणं ॥सेस तिगिसा अधुवो, तह चनहा सेस पयंडीणं ॥४७॥ साणा अपुवंतो, अयरतो कोडि Lain Education For Personal and Private Use Only M.jainelibrary.org Page #141 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कोमि नदिगो॥बंधो नहु हीणो नय, मिडे नवियरसन्निमि॥४॥ जइ खहु । बंधो बायर, पऊ असंख गुण सुहुम पजादिगो॥ एसि अपजाण सहू, सुहमे अर अपऊ पङ गुरु॥धणालहु बिअ पज अपजो,अपछि अर बित्र गुरु अदिगो एवं ॥ ति चन असन्निसु नवरं,संख गुणा बिअ अमण पजे ॥ould तो जव जिहो बंधो, संख गुणो देस विरय दस्सिअरो ॥ सम्म चन सन्नि, चनरो, विव बंधाणु कम संखगुणा ॥५१॥ सवाणवि जिनहिश, असुहा। जं साइ संकिलेसेणं ॥ श्रावि सोदिउँ पुण, मुत्तं नर अमर तिरिआन शासुहम निगोआइखण,प्पजोग बायरपविगल अमणमणा॥अपऊ लद पढम 3 गुरु, पजदस्सि अरो असंखगुणो ॥ ५३॥ असमत्त तमुक्कोसो, पज जदनिअर एव विगणा ॥ अपजेयर संख गुणा, परमपज बिए असंख गुणा ॥ ५४॥ पखिण मसंख गुणविरि, य अपज हि असंख Jain Educationa a l For Personal and Private Use Only Rimjainelibrary.org Page #142 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क ॥६ ॥ Halलोग समा ॥ अन्नवसाया अहिया, सत्तसु आजसु असंख गुणा ॥५५॥ ग्रंथ ५ अथोत्कृष्टस्थित्यंतरबंधमाद ॥ तिरि निरय तिजोयाणं, नरनवजुअ सच उपल्ल तेसहं॥ थावर चन ग विगला, यवेसु पणसीइ सय मयरा ॥५६॥ अपढम संघयणा गिइ, खगई अण मित्र उनग थीण तिगं॥निअ नपु शनि उतीसं, पणिंदि सुप्रबंध विश परमा ॥५॥ विजयाश्सु गेविजो, तमाश् दहि ।। सय उत्तीस तेसहं ॥ पणसीइ सयय बंधो, पल्लतिगं सुर विनवि उंगे ॥५॥ समया दसंख कालं, तिरि उग नीएसु आउ अंत मुद॥ नरलि असंख पर द्या, साय हिश पुत्व कोडूणा ॥ ५॥ जलदि सयं पणसीयं, परघुस्सासे पणिदि तस चनगे॥ बत्तीसं सुद विदगइ, पुम सुन्नग तिगुच्च चनरंसे ॥६॥असुदख । गइ जाइ आगिइ, संघयणा हारनिरयुजो य जुगं ॥ थिर सुन्न जस थावर द ॥६॥ N|स, नपुश्बी छ जुअल मसायं ॥६॥ समयादंत मुहुत्तं, मणु उग जिण वर Jain Educational For Personal and Private Use Only 11 nelibrary.org Page #143 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Nउरलवंगेसु ॥ तित्ती सयरा परमो, अंत मुह लह विान जिणा ॥६॥ इति । स्थितिबंधः॥ तिवो असुद सुदाणं, संकेत विसोदि उविवङय॥मंदरसोगि । र मदिरय, जल रेदा सरिस कसाएटिं।६३॥चन गणार असुदो, सुदन्नदा विग्घ देस आवरणा ॥ पुम संजलणिग उति चन, गण रसा सेस उगमाशा N६॥ निबुश्चरसो सहजो, उति चन नाग कढि इक्क नागं तो ॥ग गणा लाई असुदो, असुहाण सुदो सुदाणं तु ॥६॥ तिवमिग थावरायव, सुर मिला विगल सुहम निरय तिगं ॥ तिरि मणुाज तिरिनरा, तिरि उग बेवक सुर । निरया ॥६६॥ विनवि सुराहारग उग, सुख गइ वन्न चन तेय जिण सायं।स मचन परघा तस दस, पणिंदि सासु च खवगाज ॥६॥ तमतमगा नकोयं, सम्मसुरा मणुय उरख दुग वरं ॥ अपमत्तो अमरान, चन गइ मिबान से साणं ॥६॥ थीण तिगं अण मिबं, मंद रसं संजमुम्मुदो मिडो॥ बिय तिय। Jain Education For Personal and Private Use Only P w .jainelibrary.org Page #144 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर्म० ७० ॥ कसाय विरय, देस पमत्तो र सोए ॥ ६॥ अपमाइ दारग डुगं, निद्द असु | वन्न दासरइ कुच्छा ॥ जय सुवधाय मपुवो, अनियहि पुरिस संजलणे ॥ ७० ॥ विग्घावरणे सुदुमो, मणु तिरिच्या सुहुम विगल तिग प्रान ॥ वेवि बक्क म मरा, निरया नकोय नरल डुगं ॥ ७२ ॥ तिरि डुग नियं तमतमा, जिण मविर य निरय विगि थावरयं ॥ प्रासु मायवसम्मो, वसाय थिर सुह जसा सियरा ॥२॥ तस वन्न ते चन मणु, खगइ डुग पणिदि सास परघुच्चं ॥ संघयणा गि इ नपु थी, सुजगि चरति मित्र चन गइ ॥ १३ ॥ चन ते वन्न वेणि, अ नाम कोस सेस धुवबंधी ॥ घाई अजदन्नो, गोए डुविदो इमो चन्दा ॥ ७४ ॥ सेमि हुदा इग डुग, गुधाइ जानवांत गुणिआणू ॥ खंधा नरलो चि वग्गणान तदप्रगदातिरिया ||१२|| एमेव विजवाहा, र ते जासाणु पाए | म कम्मे ॥ सुदुमा कमावगाहो, ऊणूणं गुल असंखंसो ॥७६॥ इक्विक दिया Jain Educationa international For Personal and Private Use Only ग्रंथ ५ ॥ ७० ॥ Page #145 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सिक्षा, पंतंसो अंतरेसु अग्गहणा ॥ सबब जहन्नुचिया, नियणंतं साहिआ ! जिहा ॥७॥ अंतिम चन फास उगं,ध पंचवन्नरस कम्म खंध दलं ॥ सव्व जि यणंत गुण रस, अणुजुत्त मणंतय पएसं॥॥ एग पएसा गाढं, नि सब पएस गहेश जि ॥ थोवो आज तदंसो, नामे गोए समो अदि ॥ वि ग्यावरणे मोदे, सबोवरि वेणी जेणप्पे ॥ तस्स फुमतं न दवइ, हिई विसे । सेण सेसाणं ॥॥निअ जाइ लक्ष दलि, तंसो होई सव्व घाईणं ॥ बसं तीण विनाइ, सेसं सेसाण पइ समयं ॥१॥सम्मदेस सब विरइ, नअणं विसंजोअ दंस खवगेअ॥मोह सम संत खवगे, खीण सजोगि अर गुण से , ढीश गुणसेढी दल रयणा, णुसमयमुदया दसंख गुणणाए ॥ एअगुणा पुण कमसो, असंख गुण निजरा जीवा ॥७३॥ पलिआ संखंसमुहू, सासण अर गुण अंतरंहस्सं ॥ गुरु मिबि वे बसही,श्यरगुणे पुग्गल इंतो॥४॥ Jain Education llonai For Personal and Private Use Only Frjainelibrary.org Page #146 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर्मधार अ६ खित्तं, पलिय तिदा समय वाससय समए । केसव हारो दीवो, द ग्रंथ ५ दि आज तसाय परिमाणं ॥५॥ दवे खित्ते काले, नावे चनद उद बायरो सु । ॥१॥ हुमो॥ होइ अणंतुस्सप्पिणि, परिमाणो पुग्गल परहो ॥ ७६ ॥ उरलाइ सत्त । गणं, एग जि मुअ फुसिअ सव्व अणु॥ जित्तिकालिसथूलो, दवे सुहमो । सगन्नयरा ॥७॥ लोग पएसो सप्पिणि, समयाअणुनाग बंध गणा य॥ जह तह कम मरणेणं, पुछा खित्ताइं थूलियरा ॥ ॥ अप्पयर पयडिबंधी, न कड जोगी अ सन्नि पजत्तो॥ कुण पए सुक्कोसं, जदन्नयं तस्स वच्चासेना , मिब अजय चन आज, बि ति गुण विणुमोदि सत्त मिबा॥ बसहं सतरस सु। हुमो, अजया देसा बि ति कसाए ॥॥ पण अनिअट्टि सुखगई, नरान सुर सुलग तिग विवि उगं॥ सम चनरंस मसायं, वरं मिलो व सम्मोवा ॥malns१॥ निदा पयला छ जुअल, जय कुबा तिब संमगो सुजई॥आहार उगं सेसा, Jain Educational For Personal and Private Use Only Page #147 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नकोस पएस गामिनो ॥ए॥ सुमुणी उन्नि असन्नी, नरय तिग सुरान सुर वि। नवि गं ॥ सम्मो जिणो जहन्नं, सुहुम निगोइ खणि सेसा ॥५३॥ दसण बग नय कुबा, बि ति तुरिअ कसाय विग्घ नाणाणं ॥ मूल बगेणुकोसो, चन द उहा सेसि सवलं ॥४॥ सेढि असंखिऊसे, जोगहाणाणि पयमि लिने । ॥विश्बंधशवसाया, अणुनागगण असंख गुणाएातत्तो कम्म पएसा, अणंत गुणिया त रसबेया॥ जोगा पयडि पएसं, विश् अणुनागं कसाया || ॥५६॥ चनदस रङ्ग लोगो, बुद्धिकर्ज सत्त रजु माण घणो ॥ तद्दीदेग पए| सा, सेढी पयरो अ तवग्गो॥ए॥ अण दंस नपुंसि बी, वेअ बकं च पुरिस वेअं च ॥ दोदो एगं तिरिए, सरिसे सरिसं जवसमे॥एन॥ अण मि मीस। " सम्मं, तिान ग विगल थीण तिगु जोअं॥तिरि निरय थावर पुगं, सादा रायव अड नपुंसि बी॥ण्णा बग पुम संजवणा दो, निद्दा विग्घा वरण खए । Jain Education n al For Personal and Private Use Only Sr.jainelibrary.org Page #148 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ग्रंथ६ कर्म नाण॥देविंदसूरि लिहिअं,सयगमिणं आय सरणछा ॥ १० ॥ इति शतकना ॥ २॥ मा पंचमः कर्मग्रंथः समाप्तः॥श्रीरस्तु॥ ॥ ॥ ॥ ॥५॥ ॥अथ श्री सप्ततिकानामा षष्ठः कर्मग्रंथः प्रारभ्यते॥ सिपएहिं महवं, बंधोद Nय संत पयमि गणाणं ।। वुवं सुण संखेवं, नीसंदं दिहि वायरस ॥२॥ कइ बंधं । तो वेअइ, कश कश् वासंत पयडि गणाणि ॥ मूवुत्तर पगईसु, नंग विगप्पा मु| णेवा ॥॥ अह विद सत्त बब्बं, धएमु अ च उदय संतंसा॥ एग विदेति विगप्पा, एग विगप्पा अबंधंमि ॥३॥ सत्तठ बंध अछुद,यसंत तेरस सुजीव ग Nणेसु॥ एगंमि पंच नंगा, दो नंगा हुँति केवलिणो॥४॥ असु एग विगप्पो, लस्सु विगुण सन्निएसु उ विगप्पा॥ पत्तेयं पत्तेयं, बंधोदय संत कम्माणं ॥mal |पंच नव उमि अहा, वीसा चनरो तदेव बायाला ॥ऽस्मिय पंच य नणिया, प ॥७॥ यडी आणुपुबीए॥६॥बंधोदय संतंसा, नाणावरणं तराइए पंच ॥बंधो चरमे । Jain Educational Ilonal For Personal and Private Use Only B hujainelibrary.org Page #149 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वि उदय, संतंसा हुँति पंचेव॥॥बंधस्स य संतस्स य, पगइ हाणाइ तिन्नि तु बाइं॥ उदयहाणा ज्वे, चन पणग दंसणा वरणे ॥॥ बीयावरणे नव बं, ध एसु चन पंच उदय नव संता॥ बच्चन बंधे चेवं, चन बंधुदये उ संसाय ॥ नवरय बंधे चन पण, नवंस चल रुदय बच कसंता॥ वेयणियान अ गोए, वि नज मोदं परं वुद्धं ॥१॥गोअम्मि सत्त नंगा, अध्य नंगा हवंति वेयणिए ॥पण नव नव पण नंगा, आज चनकेवि कमसोज ॥११॥बावीस इकवीसा, सत्तरसं तेरसे व नव पंच॥चन तिग दुगं च इकं,बंधहाणाणिमोहस्स ॥१॥ एगं च दोव चनरो, एत्तो एगादिश्रा दसुक्कोसा ॥ देण मोहणि, उदए ग |णाणि नव हुँति॥१३॥ अज्य सत्तय बच्चन, तिग दुग एगादिश्रा नवे वीसा॥ शातेरस बारिकारस, इत्तो पंचाइ एगृणा ॥१४॥ संतस्स पयमिगणा, णि ताणि | मोहस्स हुँति पन्नरस ॥बंधोदय संते पुण, नंग विगप्पे बहू जाण ॥२॥बब्बा Jain Educational! For Personal and Private Use Only H Linelibrary.org Page #150 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर्म ० ॥ ७३ ॥ वीसे चन इग, वीसे सत्तरस तेरसे दोदो || नव बंधगे वि पुणिर्ड, इक्क्कि प्र परं गंगा || १६|| दस बावीसे नव इग, वीसे सत्ताइ उदय कम्मंसा ॥ गइ नव सत्तरसे, तेरं पंचाइ अठेव ॥ १७ ॥ चत्तारि आइ नव बंध, एसु नक्कोस स त मुदयंसा ॥ पंच विद बंधगे पुण, उदयो दुहं मुणेवो ॥ १८ ॥ इत्तो चन बं धाइ, इक्किकुदया दवंति सबै वि ॥ बंधो चरमे वि तहा, उदया जावे विवाहुका ॥१॥ इक्कग बक्किक्कारस, दस सत्त चक्क इक्कगं चेव ॥ एए चडवीस गया, बा र गिक्कम्मि इक्कारा ॥२०॥ नव तेसीइ सएहिं, उदय विगप्पेदि मोहिया जी वा ॥ अनुत्तरि सीच्याला, पयविंद सपदि विन्नेा ॥ २२ ॥ नव पंचाण उस ए, उदय विगप्पेदि मोहिया जीवा ॥ अनुत्तरि एगुत्तरि, पय विंद सहि वि नेा ॥ २२॥ तिन्नेवय बावीसे, इगवीसे वीस सत्तरसे ॥ बच्चैव तेर नव बं, धरसु पंचैव वाणाणि ॥ २३॥ पंचविद चनविदेसु, ब बक्क सेसेसु जाण पंचेव Jain Educationandional For Personal and Private Use Only ग्रंथ ६ ॥ १३ ॥ Dr.jainelibrary.org Page #151 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Educationa in पत्ते पत्ते, चत्तारि प्र बंधु बुंडे ॥२४॥ दस नव पन्नरसाई, बंधोदय संत पयडि गणाणि ॥ नणिणि मोहणिजे, इत्तो नामं परं वुद्धं ॥ २५॥ तेवीस प न्नवीसा, बंबीसा वीस गुणतीसा ॥ तीसेगतीस मेगं, बंध ठाणाणि नामस्स ॥२६॥ चड पणवीसा सोलस, नव बाण नई सयाय अडयाला ॥ एयालुत्तरबा या, लसयाइक्विक्कि बंध विदी ॥ २७ ॥ वी सिगवीसा चडवी, स गाउ एगाहियाय इगतीसा ॥ उदय ठाणाणि जवे, नव प्रय हुंति नामस्स ॥ २८ ॥ इक्क बयालि कारस, तित्तीसा बस्सयाणि तित्तीसा ॥ बारस सत्तरससया, एहि गाणि बिप |च सीईहिं ॥२॥ अनुत्ती सिक्कारस, सयापि दिय सतर पंच सठी हिं ॥ इक्कि क पंचवीसा, दहुदयंतेसु उदय विही ॥ ३० ॥ ति उनउई गुण नजई, अडसी व लसी सीइ गुणसीई ॥ य उप्पन्नत्तरि, नव अन्य नाम संताणि ॥ ३२ ॥ अन्य बारस बारस, बंधोदय संत पयमि ठाणाणि ॥ उदेणारसेणय, जब ज For Personal and Private Use Only anelibrary.org Page #152 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर्म० ॥ ७४ ॥ दा संभवं विभजे ॥ ३२ ॥ नव पणगोदय संता, तेवी से परमवीस बीसे ॥ ठ चउरहवीसे, नव सत्ति गुण तीस तीसंमि ॥३३॥ एगेगमेगती से, एगे एगुदय संतंमि ॥ नवरय बंधो दस दस, वेयग संतंमि गाणि ॥३४॥ तिविगप्प पगइ ठाणे, दिं जीव गुणसन्निएस ठाणेसु ॥ जंगाप जिया, जब जहा संत्र वो जवइ ||३५|| तेरस सुजीव संखे, वरसु नाणंतराय तिविगप्पो ॥ इक्कमिति 5 विगप्पो, करणं पड़ च विगप्पो ॥ ३६ ॥ तेरे नव चन पणगं, नव सत्ते ग |म्मि जंग मिक्कारा ॥ वेच्य प्रियान गोए, विजयमोदं परं वुद्धं ॥ ३७ ॥ पत्त ग सन्निप्ररे, अठ चनक्कं च वेयलिय गंगा ॥ सत्तय तिगं च गोए, पत्ते जीव गणेसु ॥ ३८ ॥ पत्ता पतत्तग, समणा पत्त प्रमण सेसेसु ॥ ठावीसं दस गं, नवगं पणगं च आस्स ॥ ३ ॥ सु पंचसु एगे, एग डुगं दसय मोह | बंध गए । तिग चन नव उदय गए, तिग तिग पन्नरस संतंमि ॥४०॥ पण डु Jain Educationa International For Personal and Private Use Only ग्रंथ ६ ॥ ७४ ॥ Page #153 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Kग पणगं पण चन, पणगं पणगा हवंति तिमेव ॥ पण उप्पणगं बन,प्पणगं अहह दसगंति ॥४२॥ सत्तेव अपऊत्ता, सामी सुहमा य बायरा चेव ॥विगि। लिंदिन तिन्निन, तदय असन्नी अ सन्नी अ॥४॥ नाणंतराय ति विदम, वि दससु दो हुँति दोसु गणेसु ॥ मिना साणे बीए, नव चन पण नवय संत सा॥४३॥ मिस्सा नियट्टी, उचनपण नवय संत कम्मंसा ॥चन बंध तिगे। चन पण, नवंसु उसु जुअल बस्संता॥४॥ नवसंते चनपण नव, खीणे चन। रुदय उच्च चनसत्ता ॥ वेअणिअ आज गोए, विनऊ मोदं परं वुवं ॥४५॥ च उ बस्सु उन्नि सत्तसु, एगे चन गुणिसुवेअणि अनंगा ॥गोए पण चन दो जतिसु, एगसु उन्निश्कंमि ॥४६॥अध्वादिगवीसा, सोलस वीसं च बारस दोसु॥दो चम्सु तीसु श्कं, मिबाइसु आनए नंगा ॥४७॥ गुणगणगेसु अह ग, शक्किकं मोद बंध गणं तु॥पंचानिअहि गणा,बंधोवरमो परं तत्तो॥४||| Jain Education inte For Personal and Private Use Only HODIEnelibrary.org Page #154 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर्म ० ॥ ७५ ॥ सत्ताइ दसन मिचे, सासायण मीसए नवुकोसो ॥ बाई नव न पंचाई ठेव ॥४॥विरए खर्जवस मिए, चडराई सत्त बच्च पुत्रं ॥ यरे पुण, इक्कोवडवेव उदयंसा ॥५०॥ एगं सुदुम सरागो, वेइ वे सेसा ॥ जंगाणं च पमाणं, पुबुद्दिठे नाय ॥ ५२ ॥ इक्कग बमिक्कियारि, का | रसइक्कारसेव नव तिन्नि ॥ एए चडवीस गया, बारडुगं पंच इक्कंमि ॥ ५२ ॥ बा | रस पास ठसया, उदय विगप्पेदिं मोहिया जीवा ॥ चुलसीई सत्तत्तरि, पय | विंद सपदि विन्नेा ॥ ५३ ॥ ग चन च चनर, ठगाय चनरो हुंति च नवीसा || मिचाइ पुवंता, बारस पणगंच निट्टी ॥५४॥ अट्ठी बत्तीसं, बत्तीसं सठि मेव बावन्ना ॥ चोयाल दोसुवीसा, मिच्छामासु सामन्नं ॥५॥ जो गोवरंग लेसा, इएदिं गुणिया दवंति कायद्वा ॥ जे जब गुणठाणे, दवंति ते तब गुणकारा ॥ ५६ ॥ तिन्नेगे एगेगं, तिगमी से पंच चउसु तिग पुढे ॥ इक्कार Jain Education national विरई, देसे नियट्टि बा वेगान For Personal and Private Use Only ग्रंथ ६ 114 11 w.jainelibrary.org Page #155 -------------------------------------------------------------------------- ________________ || बायरंमिज, सुहमो चन तिन्नि उवसंते ॥ ५ ॥ बन्नव बक्क तिग सत, उगं गं तिग जुगं तिअह चन ॥ उग उ चन उग पण चन,जग चल चक पणग एग च । Nउपना एगेग मह इगेग, मन उनमब केवल जिणाणं ॥ एगं चन एगं च । ज,अह चन बक्क मुदयंसा ॥५॥ चन पणवीसा सोलस, नव चत्तालासयाय बाणन ॥ बत्तीसुत्तर गया, लसया मिबस्स बंध विही ॥६॥ असया चन| सही, बत्तीस सयाई सासणे नेआ ॥ अहावीसाईसु, सवाणादि बनन ॥६॥ग चत्ति गार बत्ती, बसय गतिसिगार नव नन॥ सत्तरिगंसि गुत्ति । स, चनदगार चनसहि मिबदया ॥६॥ बत्तीस उन्नि अध्य, बासी सयाय पंच नव उदया ॥ बारहिआ तेवीसं, बावन्निकारससयाय ॥६३॥ दो बक्क ह च । नकं, पण नव इक्कार छक्कगं जदया॥ नेराश्सु सत्ता,ति पंच इकारस चनकं । ॥६॥ग विगलिंदिअ सगले, पण पंचय अह बंध गणाणपण किकारुद Jain Educational Tall For Personal and Private Use Only anbrary.org Page #156 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर्मया ,पण पण बारसय संताणि ॥६५॥श्य कम्मपगश्गणा,णि सुहुबंधुदय संत ग्रंथ कम्माणं॥गाएहिं अहसु, चनप्पयारेण नेआणि॥६६॥गईदिए अकाए, ॥ ६॥ जोए वेए कसाय नाणे अ॥संयम दंसण लेसा,नव संमे सन्नि आदारे ॥६॥ संतपयं परूवणया, दवपमाणं च खित्त फुसणा य॥ कालंतरं च नावो, अप्पा बहुयं च दारा॥६॥उदयस्सुदीरणाए, सामित्तान नविजा विसेसो।मुत्तूणय || गयालं, सेसाणं सब पयडीणं ॥णा नाणंतराय दसगं, दंसण नव वेयणिक IN मित्तं ॥ सम्मत्त लोन वेआ, आणि नव नाम उच्चं च ॥७॥ मणुयगर जा इ तस बा, यरं च पळत्त सुलग आश्॥ जसकित्ती तिबयरं, नामस्स हवंति। नव एया ॥७॥तिबयरा दारग विर, दिन अश्लेश सब पयडीमिबत्तवे । अगोसा, साणो गुणवीस सेसा ॥॥ गयाल सेस मीसो, अविरय सम्मो |॥ ६ ॥ तियाल परिसेसा ॥ तेवन्न देस विरज, विर सगवन्न सेसा ॥७३॥श्गु स] Jain Educationa l For Personal and Private Use Only Allainelibrary.org Page #157 -------------------------------------------------------------------------- ________________ हि मपमत्तो, बंधइ देवान अस्सइरोवि ॥ ठावन्न मपुवो, बप्पन्नं बावि वीसं ॥७४॥ बावीसा एगूणं, बंधइ अठारसंत निचट्ठी | सत्तर सुदुम स रागो, सायममोदो सजोगित्ती ||१५|| एसो बंध सामि, त उहु गइ आइए | सुवि तदेव ॥ उदा उसा दिइ, जब जहा पयमि सजावो ॥७६॥ तियर देव निरिच्या, उच्च तिसु तिसु गईसु बोधवं ॥ प्रवसेसा पयडीजे, हवंति सवासु | विगई || || पढम कसाय चनक्कं, दंसण तिग सत्तगा वि जवसंता ॥ प्रवि रय सम्मत्तार्ज, जाव नियठित्ति नायवा ॥७८॥ सत्तठ नवय पनरस, सोलस | प्रहारसे व इगुवीसा ॥ एगादि डु चडवीसा, पणवीसा बायरे जाण ॥ ७ ॥ सत्तावीसं सुदुमे, अठावीसं च मोहपयडी ॥ जवसंत वीरागे, नवसंता हुं ति नायवा ॥८०॥ पढम कसाय चक्कं इत्तो मित्त मीस सम्मत्तं ॥ विरय सम्मे देसे, पमत्ति पमत्ति खीयंति ॥२॥ अनि बायरेथी, गिन्धिति Jain Education Intentional For Personal and Private Use Only Page #158 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर्म० 11 99 11 ग निरय तिरि नामा ॥ संखि इमे सेसे, तप्पा गान खीयंति ॥८२॥ इ तो हाइ कसाय, ठगंपि पचा नपुंसगं इवी ॥ तो नोकसाय बक्कं, बुझइ संज कोहम्म ॥८३॥ पुरिसं कोढे कोहं, माणे माणं च बुदइ मायाए ॥ मायं च बुदइ लोहे, लोहं सुदुमंपि तो हाइ ॥ ८४॥ खीण कसाय 5 चरिमे, निदं प यलं च दिइ बनमो ॥ आवरणमंतराए, बनमचो चरम समयंमि ॥८॥ | देवगइ सहगया, डु चरिम समयम्मि नवि खीच्यंति ॥ सविवागे पर ना मा, नीच्या गोपि तचेव ॥८६॥ अन्नयर वेणिं, मणुन मुच्चगोय | नवनामे || वेइ जोगि जिणो, नक्कोस जहन्न मिक्कारे ॥८७॥ म गइ जा इ तस बा, यरं च पत्त सुनगइ ॥ जस कित्ती तियरं, नामस्स दवंति नव प्रा ||GG || तच्चाणुपुवि सदिया, तेरस व सिद्धिस्स चरमंमि ॥ सं तं सग मुकोसं, जहन्नयं बारस हवंति ॥ ॥ मणु गइ सहगयार्ज, जव खि Jain Educationanal For Personal and Private Use Only ग्रंथ ६ 11 99 || lainelibrary.org Page #159 -------------------------------------------------------------------------- ________________ त्त विवाग जिप्र विवागाउं ॥ वेणि अन्न रुचं, चरम समयंमि खीयंति || अह सुइ सयल जग सिह, र मरु निरुवम सदाव सिद्धि सुहं ॥ अनियण महाबाई, तिरयणसारं अवंति ॥२॥ डर दिगम निजण परम, च रुइर बहु जंग दिठि वाया || सरित्र्यवा, बंधोदय संत कम्मा ||२|| जो जच परिपुन्नो, अहो अप्पा गमेण बंधोति ॥ तं खमिळण व हुसुया, पूरेऊणं परि कदंतु ॥ ३ ॥ गाहग्गं सयरीए, चंद महत्तर मयाणु | सारीए || टीगाइ नियमिणं, एगूणा होइ नई ॥४॥ ॥ इति श्री | सप्ततिकानामा षष्ठः कर्मग्रंथः समाप्तः ॥ ६ ॥ 11 ॥ अथ श्रीरत्नाकरसूरिकृतरत्नाकरपंचविं शिकाप्रारंभः ॥ उपजातिछंदः ॥ श्रेयः श्रि यां मंगल के लिसद्म, नरेंदेवेंऽनतांघ्रिपद्म सर्वज्ञ सर्वातिशयप्रधान, चिरं जय | ज्ञानकला निधान ॥ १ ॥ जगत्रयाधार कृपावतार, डवरसंसार विकारवैद्य ॥ Jain Education Intional For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #160 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रत्ना० ॥3 ॥ श्रीवीतराग त्वयि मुग्धन्नावा, विज्ञ प्रनो विज्ञपयामि किंचित् ॥२॥ किं . पंच बाललीलाकलितो न बालः, पित्रोः पुरो जल्पति निर्विकल्पः ॥ तथा यथार्थ । कथयामि नाथ, निजाशयं सानुशयस्तवाग्रे॥३॥ दत्तं न दानं परिशीलितं च, न शालि शीलं न तपोऽनितप्तम् ॥ शुन्नो न नावोऽप्यनवनवेऽस्मिन्, विनो मया ब्रांतमहो मुधैव ॥४॥ दग्धोऽग्निना क्रोधमयेन दष्टो, उष्टेन लोनाख्यम दोरगेणायस्तोऽनिमानाजगरेण माया, जालेन ब-छोऽस्मि कथं नजे त्वाम् ॥ कृतं मयामुत्र हितं न चेद, लोकेऽपि लोकेश सुखं न मेऽनूत् ॥ अस्मादृशां । केवलमेव जन्म, जिनेश जझे नवपूरणाय ॥६॥ मन्ये मनो यन्न मनोझटत्तं, त्व दास्यपीयूषमयूखलानात् ॥ तं महानंदरसं कठोर, मस्मादृशां देव तदश्मतो पि॥॥ त्वत्तः सुऊप्रापमिदं मयाप्तं, रत्नत्रयं नरि नवन्त्रमेण ॥ प्रमादनिज ॥ ७ ॥ |वशतो गतं तत् कस्याग्रतो नायक पूत्करोमि ॥ ॥ वैराग्यरंगः परवंचनाय, ध] Jain Educational a For Personal and Private Use Only Mainelibrary.org Page #161 -------------------------------------------------------------------------- ________________ र्मोपदेशो जनरंजनाय ॥ वादाय विद्याध्ययनं च मेऽनूत, कियङवे हास्यक रं स्वमीश ॥॥ परापवादेन मुखं सदोषं, नेत्रं परस्त्रीजनवीक्षणेन ॥ चेतः परा | पायविचिन्तनेन, कृतं नविष्यामि कथं विनोऽहं॥२॥विमंबितं यत्स्मरघस्मरा | ति,दशावशात्स्वं विषयांधलेन ॥ प्रकाशितं तन्नवतो हियैव, सर्वज्ञ सर्वे स्वय मेव वेत्सि ॥११॥ ध्वस्तोऽन्यमंत्रैः परमेष्ठिमंत्रः, कुशास्त्रवाक्यैर्निहितागमोक्तिः॥ - कर्तुं तथा कर्म कुदेवसंगा, दवांबि दे नाथ मतित्रमो मे ॥१॥ विमुच्य दृग्ल दयगतं नवंतं, ध्याता मया मूढधिया हृदंतः॥ कटादवदोजगन्नीरनानि, कटी तटीयाः सुदृशां विलासाः॥१३॥लोखेदणावनिरीदाणेन,यो मानसे रागलवो |विलमः॥न शुसिशंतपयोधिमध्ये, धौतोऽप्यगात्तारक कारणं किम् ॥२४॥ |अंगं न चंगं न गणो गुणानां, न निर्मलः कोपि कलाविलासः॥ स्फुरत्प्रधान प्र। जुता च कापि, तथाप्यहंकारकदर्थितोऽहं ॥२५॥ आयुर्गवत्याशु न पापबुद्धि, Jain Education IL For Personal and Private Use Only e baryong Page #162 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रत्ना ॥ ए॥ र्गतं वयो नो विषयानिलाषः॥ यत्नश्च नैषज्यविधौ न धर्मे, स्वामिन्महामोहपंच विडंबना मे॥१६॥नाऽत्मा न पुण्यं न नवो न पापं, मया विटानां कटुगीरपी यं ॥ अधारि कर्णे त्वयि केवलार्के, परिस्फुटे सत्यपि देव धिङ् माम्॥१७॥ न दे । वपूजा न च पात्रपूजा, न श्राधर्मश्च न साधुधर्मः॥ लब्ध्वापि मानुष्यमिदं ॥ समस्तं, कृतं मयाऽरण्यविलापतुल्यम्॥२॥ चक्रे मया सत्स्वपिकामधेनु,कल्प सुचिंतामणिषु स्टहार्तिः॥न जैनधर्मे स्फुटशर्मदेऽपि, जिनेश मे पश्य विमूढ || नावं ॥ २५॥ सनोगलीला न च रोगकीला, धनागमो नो निधनागमश्च ॥ दारा न कारा नरकस्य चित्ते, व्यचिंति नित्यं मयकाऽधमेन॥॥स्थितं न सा) धोर्हदि साधुटत्तात्,परोपकारान्न यशोऽर्जितं च ॥ कृतं न तीर्थोरणादि कृत्यं, मया मुधा दारितमेव जन्म॥२१॥ वैराग्यरंगो न गुरूदितेषु, न उर्जानानां ॥ ॥ वचनेषु शांतिः॥ नाऽध्यात्मलेशो मम कोपि देव, तार्यः कथंकारमयं नवा || Jain E cation in For Personal and Private Use Only ainelibrary.org Page #163 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ब्धिः ॥ २२ ॥ पूर्वे नवेऽकारि मया न पुण्य, मागामिजन्मन्यपि नो करिष्ये॥ यदीहशोहं मम तेन नष्टा, भूतोनवनाविनवत्रयीश ॥२३॥ किंवा मुधाऽहं ब। दुधा सुधानुक, पूज्य त्वदने चरितं स्वकीयं ॥ जल्पामि यस्मात् त्रिजगत्स्वरूप, निरूपकस्त्वं कियदेतदत्र॥श्॥ शार्दूलविक्रीडितं बंदः॥ दीनोधारधुरंधरस्त्व दपरो नास्ते मदन्यः कृपा, पात्रं नात्रजने जिनेश्वर तथाप्येतां न याचे श्रियम्॥ किंत्वईन्निदमेव केवलमहो सबोधिरत्नं शिवं, श्रीरत्नाकरमंगलैकनिलयश्रेयस्करं । प्रार्थये ॥२५॥इति श्रीवीतरागस्तोत्रं समाप्तम् ॥इति श्रीरत्नाकरसूरिकृता रत्नाकरपंचविंशतिका समाप्ता ॥ ॥॥ ॥७॥ ॥७॥ Jain Educationa interest For Personal and Private Use Only Hainelibrary.org Page #164 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रा०ज० ॥ ८० ॥ ॥ अर्थ ॥ ज्ञान अने श्रानंद तेहिज स्वरूप बे जेनुं, वली श्रदारिकादिक रूपथकी रहि त बे, तथा रक्षक बे छाने सर्वथी उत्कृष्ट तेज बे जेनुं एवा श्रीपरमेश्वर परमात्माने महारो नमस्कार दो ॥ १ ॥ ॥ जेना खरूपने ध्यानरूपिणी दृष्टियें करीनें मन नी शुद्धिने धरता योगीश्वर देखे बे, ते परमेश्वरने हुं स्तनुं हुं ॥ २ ॥ ॥ सर्व प्राणी चिदानंदस्वरूपाय, रूपातीताय तायिने ॥ परमज्योतिषे तस्मै नमः श्रीपर मात्मने ॥ १ ॥ पश्यन्ति योगिनो यस्य, स्वरूपं ध्यानचक्षुषा ॥ दधाना म नसः शुद्धिं तं स्तुवे परमेश्वरम् ॥ २ ॥ जन्तवः सुखमिच्छन्ति, नुः सुखं त विवे जवेत् ॥ त ध्यानात्तन्मनः शुइया, कषाय विजयेन सा ॥ ३ ॥ सत्वियि मात्र सुखनी वांछा करे बे ते संपूर्ण सुख तो जीवने मोक्षमां बे, ते मोनी प्राप्ति ध्या नयी थाय बे, अने ध्यान मननी शुद्धिथी थाय बे, अने मनःशुद्धि कषाय जीतवाथी | थाय बे ॥ ३ ॥ ॥ ते कषायनुं जीतनुं पांच इंडियना जीतवाथी थाय बे, अने ते | इंद्रियजय रूडा श्राचारथी थाय बे, ते रूडो श्राचार जला उपदेशयी होय बे, ते उपदेश Jain Educationa International For Personal and Private Use Only वर्ग १ ॥ ८० ॥ Page #165 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मनुष्यने गुणनो कारणजूत होय ॥४॥ ॥ उपदेशथी रूडी बुद्धि थाय, रूमी बुद्धि थी सारा गुणोनो उदय थाय, ते माटे उपदेश सांजलवा संजलाववा माटे था श्राचा IN रोपदेशनामें ग्रंथ प्रारंजीयें यें ॥५॥ ॥ रूमा आचारना विचारें करीने जलो जयेन स्यात्, सदाचारादसौ नवेत् ॥ स जायते तूपदेशान्नृणां गुणनिबन्धन नम्॥४॥ सुबुद्धिश्योपदेशेन, ततोऽपि च गुणोदयः॥ इत्याचारोपदेशाख्य, ग्रन्थः प्रारभ्यते मया ॥ ५॥ सदाचारविचारेण, रुचिरश्वतुरोचितः॥ देवा नन्दकरो ग्रन्थः, श्रोतव्योऽयं शुन्नात्मनिः॥६॥ पुजलानां पराठत्त्या, पुर्खन्नं जन्म मानुषम् ॥ लब्ध्वा विवेकेन धर्मे, विधेयः परमादरः ॥७॥ अने पंमितने जणवा वांचवा योग्य तथा देवताने आनंदकारी एवो था ग्रंथ ते पुण्य भावंत मनुष्ये सांजलवो ॥६॥॥ पुल परावर्तेकरी पामवो पुर्खन एवो था मनुष्य । नो जव , ते पामी करीने विवेकेंकरी मनुष्ये धर्मने विषे घणो श्रादर करवो॥७॥ Jain Education For Personal and Private Use Only Marw.jainelibrary.org Page #166 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अ०ज० ॥ ८१ ॥ धर्म जे बे, ते सांजल्यो, पोतें जाएयो, पोतें कीधो, बीजाने कराव्यो, छाने अनु मोद्यो थको निवें सात कुलने पवित्र करे बे ॥ ८ ॥ ॥ धर्म, अर्थ, अने काम ए त्र | साध्या विना मनुष्यनो जन्म ते पशुनीपरें निःफल जाणवो, ते त्रणमां पण उत्त म धर्म बे, केमके, धर्म विना बीजा वे न पामीयें ॥ ए ॥ ॥ एक मनुष्यनो जव, बीजो धर्मः श्रुतोऽपि दृष्टोऽपि कृतोऽपि कारितोऽपि च ॥ अनुमोदितो नियतं, पुनात्या | सप्तमं कुलम् ॥ ८॥ विना त्रिवर्ग विफलं पुंसो जन्म पशोरिव ॥ तत्र स्याङत्तमो धर्मस्तं विना न यतः परौ ॥ ए ॥ मानुष्यमार्यदेशश्च जातिः सर्वाक्षपाटव म् ॥ आयुश्च प्राप्यते तत्र, कथं चित्कर्मलाघवात् ॥ १० ॥ प्राप्तेषु पुण्यतस्ते | श्रार्यदेश, त्रीजी उत्तमजाति, चोथी इंद्रियोनी सदृढता, पांचमुं महोटुं श्रायुष्य, एट | लांवानां केम पामीयें ! जो कांइक कर्म हलवां होय तो पामीयें ॥ १० ॥ ॥ ए स र्व वानां पुण्यथकी पामे थके पण श्रीवीतरागनां वचन उपर श्रद्धा श्राववी दुर्लन बे Jain Educationa inermaidne For Personal and Private Use Only वर्ग १ ॥ ८१ ॥ Page #167 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ते श्रझा श्राव्या पली रूडा गुरुनो योग जो मोहोर्से जाग्य होय तो पामीयें ॥११॥ Kाए सर्व वस्तु पामी, पण जेम राजा न्यायें करी शोने, फूल सुगंधे करी शोने, नोज | न घृतेंकरी शोने, तेम जला श्राचारें करी शोज एवी सामग्री पामवी उर्लन डे ॥१५॥ , अशा नवति उर्खन्ना ॥ ततः सजुरुसंयोगो, लन्यते गुरुनाग्यतः ॥ ११॥ पलब्धं हि सर्वमप्येतत्सदाचारेण शोनते ॥ न्यायेनेव नृपः पुष्पं, गन्धेना । ज्येन नोजनम् ॥ १॥ शास्त्रे दृष्टेन विधिना, सदाचारपरो नरः ॥ परस्परा विरोधेन, त्रिवर्ग साधयेन्मुदा॥ १३॥ तुर्ये यामे त्रियामाया, ब्राह्मे काले कृ तोद्यमः॥ मुञ्चे निशं सुधी पञ्च, परमेष्ठिस्तुतिं पठन्॥२४॥ ॥ ॥ ॥ | माटे जेवो विधि शास्त्रमा दीगो, तेवा विधियेकरी जे सदाचारमा तत्पर रहे, ते प्राणी || N|| मांहोमांहे विरोध विना त्रिवर्ग, हर्षे करी साधे ॥ १३ ॥ ॥ जे पंडित बे,ते रात्रिने || चोथे पोहोरे ब्राह्मकाले एटले बे घडी पाठली रात्रे उठवानो उद्यम करीने नवकारनी For Personal and Private Use Only Page #168 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अ०ज० ॥ ८२ ॥ | स्तुति जगतो थको निद्रानो त्याग करे ॥ १४ ॥ ॥ सदा सर्वदा शय्याथी उठतां डाबी | श्रथवा जमणी, जे नासिका वदेती होय, ते तरफनो पग उठती वखत प्रथम धरती उपर | आपे ॥ १५ ॥ ॥ पठी रात्रें सूतानां वस्त्र मूकीनें बीजां वस्त्र पढेरीने जला स्थानकें बेसीनें वामा तु दक्षिणा वापि, या नाडी वढ्ते सदा ॥ शय्योतिस्तमेवादौ पादं द द्यानुवस्तले ॥१५॥ मुक्त्वा शयनवस्त्राणि, परिधायापराणिच ॥ स्थित्वा सुस्था नके धीमान, ध्यायेत्पञ्चनमस्क्रियाम् ॥१३॥ उपविश्य च पूर्वाशाभिमुखो वाप्यु दङ्मुखः ॥ पवित्राङ्गः शुचिस्थाने, जपेन्मन्त्रं समादितः ॥ १७ ॥ अपवित्रः प वित्रो वा सुस्थितो दुःस्थितोऽपि वा ॥ ध्यायेत्पञ्चनमस्कारानू, सर्वपापैः प्र बुद्धिवंत जीव प्रथम नवकारनुं ध्यान करे ॥ १६ ॥ ॥ ते पूर्वदिशि सन्मुख अथवा उत्तर दिशि सन्मुख, पवित्र शरीरें पवित्र स्थानकें बेसी मन स्थिर राखीने श्रीनवकार मंत्रनो | जाप करे ॥ १७ ॥ ॥ अपवित्र अथवा पवित्रपणें सुखियो अथवा दुःखियो थको Jain Educationa international For Personal and Private Use Only वर्ग १ ॥ ८‍ ॥ Page #169 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पण जे प्राणी नवकार प्रत्ये ध्यावे, ते प्राणी सर्व पापथकी मूकाय ॥ १७॥ ॥ अंगु लीने टेरवे जे नवकारनो जाप करे, जे मेरु उलंधीने जाप करे, वली जे संख्यारहित । जाप करे, तेनुं प्राये अल्प फल होय ॥ १ए ॥ ॥ जाप त्रण प्रकारें थाय, एक उ IN त्कृष्टो, बीजो मध्यम अने त्रीजो श्रधम, ए त्रण नेद जाणवा. तेमां कमलादिकना al मुच्यते ॥१७॥ अङ्गट्यग्रेण यजप्तं, जप्तं यन्मेरुलङ्घनैः ॥ संख्यादीनं च य जप्त, तत्प्रायोऽल्पफलं नवेत् ॥१॥ जपो नवेत्रिधोत्कृष्ट, मध्यमाधमने । दतः॥पद्मादिविधिना मुख्यो, मध्यः स्याऊपमालया ॥ २० ॥ विना मौनं । विना संख्यां, विना चेतोनिरोधनम् ॥ विना स्थानं विना ध्यानं, जघन्यो | विधिये जे गुणे, ते प्रथम मुख्य एटले उत्कृष्ट जाप जणवो, तथा नोकरवासीय गुणे INIते बीजो मध्यम जाप जाणवो ॥२०॥ ॥ तथा मौन धारण कत्या विना, संख्या पला विना मन स्थिर राख्या विना, स्थानक विना अने ध्यान विना जे गुणे, ते त्रीजो ज Jain Educationa l inal For Personal and Private Use Only Enaw.jainelibrary.org Page #170 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रा०ड० ॥ ८३ ॥ धन्य जाप जाणवो ॥ २१ ॥ ॥ तेवार पक्षी उपाशरे अथवा पोताना घरने विषे ज ईने पोतानां पाप शुद्ध करवाने श्रर्थे पंक्ति पुरुष, पडिकमणुं करे ॥ २२ ॥ ॥ एक रात्रिपक्किम, बीजुं देवसिकपक्किम, त्रीजुं पाखी परिक्रमणं, चोथुं चौमासी पडिक जायते जपः ॥ २१ ॥ ततो गत्वा मुनिस्थान, मथवात्मनिकेतने ॥ निजपाप विशुध्यर्थं कुर्यादावश्यकं सुधीः ॥ २२ ॥ रात्रिकं स्याद्दैव सिकं, पादिकं चातु र्मासिकम् ॥ सांवत्सरं चेति जिनैः, पंचधावश्यकं कृतम् ॥ २३ ॥ कृतावश्यक कर्मा च स्मृतपूर्वकुलक्रमः ॥ प्रमोदमेङरस्वान्तः कीर्तयेन्मङ्गलस्तुतिम | ॥ २४ ॥ मङ्गलं भगवान् वीरो, मङ्गलं गौतमः प्रभुः ॥ मङ्गलं धूलिनाद्या, | मणुं ने पांचमुं संववरी पडिकमणुं, ए जगवंतें पांच प्रकारें पडिक्कमणुं करतुं कर्तुं बे ॥ २३ ॥ ॥ पडिक्कमणरूप कर्म करीनें पोतानो कुलक्रम संचारतो हर्षे करी पुष्ट बे चित्त जेनुं एवो जन ते मांगलिकनी स्तुति नणे ॥ २४ ॥ ॥ मंगलिक श्रीभगवंत महावीर " Jain Educationa Interadanal For Personal and Private Use Only वर्ग १ ॥ ८३ ॥ jainelibrary.org Page #171 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | स्वामीजी, मंगलिक श्री गौतमस्वामीजी, श्रीथूल जडादिक साधुजी, छाने मंगलिक जैनधर्म | मंगलिक करो ॥ २५ ॥ ॥ श्रीरुषजादिक चोवीश तीर्थकर, जरतादिक बार चक्रवर्त्ति तथा वासुदेव ने बलदेव, ए सर्वे मंगलिक करो ॥ २६ ॥ ॥ नाजिराजा, सिद्धार्थ राजा श्रादिक चोवीश जिनना पिता, जेमणें अखंड राज्य पाल्यां बे, ते मुकने जय जैनो धर्मोऽस्तु मङ्गलम् ॥ २५ ॥ नाज्ञेयाद्या जिनाः सर्वे, जरताद्याश्च च क्रिणः ॥ कुर्वन्तु मङ्गलं सर्वे, विष्णवः प्रतिविष्णवः ॥ २६ ॥ नानिसिदार्थ नूपाद्या, जिनानां पितरः समे ॥ पालिताखं साम्राज्या, जनयन्तु जयं मम | ॥ २७ ॥ मरुदेवी त्रिशलाद्या, विख्याता जिनमातरः ॥ त्रिजगजनितानन्दा, | मङ्गलाय जवन्तु मे ॥ २८ ॥ श्रीपुंमरी केन्द्रभूति, प्रमुख गणधारिणः ॥ श्रुत श्रापो ॥ २७ ॥ ॥ मरुदेवीजी त्रिशला प्रमुख जे जगतमां प्रसिद्ध, जेमणें त्रण जगतने श्रानंद थाप्यो एवी जिनजीनी चोवीश माता ते मुकने मंगलिक माटे हो ॥ २७ ॥ पुंडरीक गणधर, गौतम गणधर यादे देईनें चौदशें बावन गणधर बीजा पण श्रुतकेव Jain Educationa inc For Personal and Private Use Only ainelibrary.org Page #172 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रा०ज० ॥ ८४ ॥ ली साधु, चौद पूर्वधर ते मुकनें मंगलिक प्रत्यें श्रापो ॥ २५ ॥ ॥ ब्राह्मी, चंदनबाला दिक जे महोटी साधवीयो अखंड शीलनी लीला जेमनी बे एवी ते सर्व मुकने मंग लिक प्रत्यें आपो ॥ ३० ॥ ॥ चक्रेश्वरी देवी, सिद्धायिका प्रमुख चोवीश देवी जे स केवलिनोऽपीद, मङ्गलानि दिशन्तु मे ॥ २५ ॥ ब्राह्मी चन्दनबालाद्या, मा | सत्यो महत्तराः ॥ अखंमशीललीलाद्या, यचंतु मम मंगलम् ॥ ३० ॥ चक्रे श्वरी सिद्धायिकामुख्यः शासनदेवताः ॥ सम्यग्दृशां विघ्नदरा, रचयन्तु जय श्रियम् ॥ ३१ ॥ कपर्दिमातंग मुख्या, यक्षा विख्यातविक्रमाः ॥ जैनविघ्नदा नित्यं दिशन्तु मंगलानि मे ॥ ३२ ॥ यो मङ्गलाष्टकमिदं, पटुधीरधीते प्रातर्नर: म्यगदृष्टि जीवोना विघ्ननी दरनारी ते जयलक्ष्मी रचो अथवा करो ॥ ३१ ॥ ॥ कपर्दि, मातंग प्रमुख चोवीश यक्ष प्रसिद्ध पराक्रमना धणी जिनशासनना विमना इनार बे, ते मुकने सदा मंगलिक आपो ॥ ३१ ॥ ॥ जे जली बुझिनो धषी, पुण्यें जावित बे मननी Jain Educationa Imational For Personal and Private Use Only वर्ग १ ॥ ८४ ॥ www Page #173 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १५ वृत्ति जेनी, सौभाग्य जाग्य सहित एवो ने गयां बे सर्व विघ्न जेनां एवो पुरुष ए पूर्वे | कह्या जे मंगलिकना व श्लोक तेने प्रजाते जणे, ते मनुष्य जगतने विषे नित्यें घणां | मंगलिक पामे ॥ ३३ ॥ ॥ तेवार पढी देरासरें जाय, त्यां कीधी बे निसिद्दिीनी क्रिया जेणें सुकृतना वितचित्तवृत्तिः ॥ सौभाग्यभाग्यकलितो धुतसर्वविघ्नो नित्यं सम | इलमलं बनते जगत्याम् ॥३३॥ ततो देवालये यायात्, कृतनैषेधिकी क्रियः ॥ | त्यजन्नाशातनाः सर्वास्त्रिः प्रदक्षिणये जिनम् ॥ ३४ ॥ विलासदास निष्ठीवा, निद्रा कलह डुः कथाः ॥ जिनेंऽनवने जह्यादादारं च चतुर्विधम् ॥ ३८ ॥ नम | स्तुभ्यं जगन्नाथेत्यादिस्तुतिवदंवदः ॥ फलमतपूगं वा, ढौकये। जिनाग्रतः एवो ते समस्त देरासरनी श्राशातनाउने टालतो श्री जगवंतनें त्रण प्रदक्षिणा दीये ॥ ३४ ॥ ॥ स्त्री साथे विलास, हास्य, श्लेष्म, त्याग, निद्रा, कलह, माठी कथा अने चार प्रकारनो आहार जगवंतने देहेरे ढांडे ॥ ३५ ॥ ॥ 'नमो जिनाय' इत्यादिक स्तु Jain Educationa honal For Personal and Private Use Only Page #174 -------------------------------------------------------------------------- ________________ थानातिनां पद जणतो थको फल, अक्षत अथवा सोपारी श्रीनगवंतने बागल मूके ॥३६॥ वर्ग १ गले हाथें न जाय. राजाने, देवने, गुरुने, नैमित्तिक जे थायुष्य जाणे ते ज्योतिषीने : ॥ ५॥ गले हाथे न जोवा. फलें करीने फलनी प्राप्ति थाय ॥३७॥ ॥ जमणे पासे पुरुष, डाबे || पासें स्त्री ऊनी रहीने नगवंत प्रत्ये वांदे. जघन्य नव हाथथी मांडी साठ हाथ श्रव || ॥३६॥ रिक्तपाणिर्न पश्येत्तु, राजानं दैवतं गुरुम् ॥ नैमित्तिकं विशेषेण, फलेन । फलमादिशेत् ॥ ३७॥ ददवामांगन्नागस्थो, नरनारीजनो जिनम् ॥ वन्देता वग्रहं मुक्त्वा, षष्टिं नव करान्विनो॥३॥ ततः कृत्तोत्तरासंगः, स्थित्वा सद्योग मुज्या ॥ ततो मधुरया वाचा, कुरुते चैत्यवन्दनम् ॥ ३॥ उदरे कूर्परौ न्य। स्य, कृत्वा कोशाकृती करौ ॥ अन्योन्याङ्गलिसंश्लेषाद्योगमुश नवेदियम्।। ग्रह मूकी एटले नगवंतथी वेगला रहीने वांदे ॥३७॥ ॥ तेवार पली उत्तरासण करे, ते करीने जली योगमुपायें रहीने पनी मीठी वाणीयें करी चैत्यवंदन करे ॥३५॥॥ पे ट उपर बे कोणी मूकीने कमलना डोडाने श्राकारें मांहे मांहे दश थांगुली नेली कa ॥ ५ ॥ Jain Educational Lonal For Personal and Private Use Only PADainelibrary.org Page #175 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रीयें ते योगमुद्रा होय ॥ ४० ॥ ॥ पढी पोतानें घेर जईने प्रजात संमयनी क्रिया करे, पछी जोजन, वस्त्र तथा घरना माणसनी चिंता करे ॥ ४१ ॥ ॥ बांधवने तथा दास प्रमुखनें पोतपोताना कार्यने विषे थापीनें श्राव बुद्धिना गुर्णे सहित थको वली पोशालें एटले उपासरे जाय ॥ ४२ ॥ ॥ एक गुरुनी सेवा, बीजो धर्म सांजलवो, त्रीजो ॥ ४० ॥ पश्चान्निजालयं गत्वा, कुयात्प्रार्ना तिकीं क्रियाम् ॥ विदधीत गेदचि न्तां, जोजनाच्छादनादिकाम् ॥ ४१ ॥ अनादिस्वस्वकार्येषु, बंधून् कर्मकरान पि ॥ पुण्यशालां पुनर्यायादष्ट निधगुर्णयुतः ॥ ४२ ॥ शुश्रूषा श्रवणं चैव, ग्रहणं धारणं तथा ॥ ऊदापोदोऽर्थविज्ञानं तत्त्वज्ञानं च धीगुणाः ॥ ४३ ॥ श्रुत्वा धर्मे विजानाति, श्रुत्वा त्यजति कुर्मतिम् ॥ श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा ग्रहण करवो, चोथो धारवो, पांचमो “विचारवो”, बहो ऊहापोह करवो, सातमो अर्थ जावो, अने थाठमो तत्त्वज्ञान ए व बुद्धिना गुण जाणवा ॥ ४३ ॥ ॥ शास्त्र सांजल्या थकी धर्मनो जाए थाय, सांजलवाथी दुष्टमतिनुं बांडवुं थाय, सांजल्या थकी Jain Educationaeational For Personal and Private Use Only www.ainelibrary.org Page #176 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्राग्न शान पामे, सांजव्याथी वैराग्य पामे ॥ ४ ॥ ॥बे हाथ, बे पग श्रने मस्तक ए वर्ग ? पंचांग खमासमण गुरु अने वीजा साधुने देईने गुरुनी आशातना गंमतो थको धर्म ॥ज्द॥ * सांजलवा बेसे ॥४५॥ ॥ मस्तकें बे हाथ लगामीने बे ढिंचणे करी धरती प्रत्ये विधि वैराग्यमेव च ॥ ४४ ॥ पंचाङ्गप्रणिपातेन, गुरून साधून्परानपि ॥ उपावि शेन्नमस्कृत्य, त्यजन्नाशातना गुरोः॥ ४५ ॥ उत्तमाङ्गेन पाणिन्यां, जानुन्यां । INच नुवस्तले ॥ विधिना स्पृशतः सम्यक्पंचाङ्गप्रणतिर्नवेत् ॥ ४६॥ पर्यस्थि । कां न बनीयान्न च पादौ प्रसारयेत् ॥पादोपरि पदं नैव, दोर्मूलं न प्रदर्शयेत् | Lalu ॥न पृष्ठे न पुरो वापि, पार्श्वयोरुनयोरपि ॥ स्थेयान्नालापयेदन्य, मा। सहित सम्यक् प्रकारें फरसीयें, ते पंचांग नमस्कार कहीयें ॥४६॥ ॥ गुरुपासें बेग IN पग न बांधीयें, पग लांबा पसारीयें नही, पग उपर पग न चडावीयें, बे कांख उंची करीने नही देखाडीयें ॥ ४ ॥ ॥ गुरुनी पाउल बेसे नही, बागल बेसे नही, जमणे । ॥ ६॥ Jain Educational For Personal and Private Use Only Amjainelibrary.org Page #177 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तथा माबे ए बे पासे पण बेसे नही. बीजा श्राव्या माणसने गुरुना बोलाव्या विनाश प्रथम पोतें न बोलावे ॥४७॥ ॥ नावन्नेद जाणवामां निपुण एवो पंमित जे लेते गुरुना मुख उपर दृष्टि राखतो मन एकाग्र करीने धर्मशास्त्रने सांजले ॥धा पोताना मनना संदेह टाले, वखाण ऊठ्या पनी पंमित होय ते देव गुरुना गुण गानारने एटले । गतं पूर्वमात्मना ॥४॥ सुधीगुरुमुखन्यस्त, दृष्टिरेकाग्रमानसः ॥शृणुयाम | शास्त्राणि, नावनेदविचदाणः॥४॥अपाकुर्यात्स्वसंदेहान्, जाते व्याख्यानके ला सुधीः ॥गुवईकणगातृन्यो, दद्यादानं निजोचितम् ॥५०॥ अकृतावश्यको दत्ते, गुरूणां वन्दनानि च ॥ प्रत्याख्यानं यथाशक्ति, विदध्याधिरतिप्रियः ॥५॥ तिर्यग्योनिषु जायन्ते, विरतादानिनोऽपि द ॥गजाश्वादिलवे नोगान, नाट नोजकने यथाशक्तियें पोताने श्रापवा योग्य दान थापे ॥५०॥ ॥जेणे पनि कमणुं नथी कीg, ते गुरुने पगें वांदणा आपे, पडी जेने विरतिपणुं वाहावू , ते नो || कारसी प्रमुख यथाशक्तियें पञ्चखाण करे ॥५१॥ ॥ विरति विना जे दातार होय Jain Educationa l For Personal and Private Use Only WMainelibrary.org Page #178 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्राजते पण तिर्यंचनी योनिमां जश् ऊपजे. हाथी घोमानो जव पामे. त्यां नोग जोगवता वर्ग पण बंधनमां पड्या थका रहे ॥ ५५॥ ॥जे दातार होय ते नरकें न जाय, जे प । चरकाण सहित होय ते तिर्यंचमां न जाय, जे दयावंत होय ते श्रायुष्यहीन न होय, IN अने जे सत्यवादी होय तेनो माठो स्वर न होय ॥५३॥ ॥ तपस्या जे जे ते सर्व जुञ्जाना बन्धनान्वितान् ॥ ५५ ॥ न दाता नरकं याति, न तिर्यग् विरतो न वेत् ॥ दयालुर्नायुषा हीनः, सत्यवक्ता न उःस्वरः॥ ५३॥ तपः सर्वादसारंग, वशीकरणवागुरा ॥ कषायतापमहीका, कर्माजीर्णदरीतकी ॥५४ ॥ यद्रं य ॥ हुराराध्यं, यत्सुरैरपि पुष्करम् ॥ तत्सर्व तपसा साध्यं, तपो हि उरतिक्रमम् || प्रियरूप जे मृगलां तेने वश करवाने जालसमान , तथा कषायरूप ताप टाल वाने जादा समान , अने कर्मरूप अजीर्ण टालवाने हरडे समान २ ॥५४॥ ॥al जे वस्तु वेगली होय, पूर होय के फुःखें श्राराध्य होय, तथा जे देवताने पण उर्खन Jain Educational anal For Personal and Private Use Only Page #179 -------------------------------------------------------------------------- ________________ होय, ते सर्व तपस्यायें करी सधाय जे. ते तपने पोताना गुणे करी उबंधन करी जाय IN एवं बीजं साधन नथी ॥ ५५॥ ॥ हवे बजारमा जश् धर्मनो विधियें करीने पं मीत, अव्य कमावानो पोतपोतानो व्यापार करे ॥ ५६ ॥ ॥ मित्रना उपकारने अर्थे, बंधु एटले नाश्ना उदयने अर्थे, उत्तम पुरुष लक्ष्मी उपार्जन करे, केवल पो ॥ चतुष्पयं ततो यायात्, कृतधर्मविधिः सुधीः ॥ कुर्यादर्थार्जनोपाय, व्यवसायं निजं निजम् ॥५६॥ सुहृदामुपकाराय, बन्धूनामुदयाय च ॥ अय॑ते विनवः सन्निः, स्वोदरं को बिनर्ति न ॥५॥ व्यवसायनवा दृत्तिः, सोत्कृष्टा मध्यमा कृषिः॥ जघन्या जुवि सेवा तु, निदा स्यादधमाधमा ॥५॥ ॥ तानुं पेट तो कोण नथी जरतो? ॥५॥ ॥ व्यापारनी श्राजीविकायें पेट जराय, N ते उत्कृष्ट आजीविका जाणवी, खेतिवामी करी आजीविका चलाववी ते मध्यम जाणवी, पारकी सेवा करी श्राजीविका चलाववी, ते पृथिवीने विषे जघन्य जाणवी Jain Education II For Personal and Private Use Only iainelibrary.org Page #180 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्राजथने निदा मागी पेट नरवू ते अधमाधम श्राजीविका जाणवी ॥ ७ ॥ ॥ ते वर्ग १ माटे नीच व्यापार पोतें न करे, बीजा पासे न करावे, लक्ष्मी पुण्यथी प्राप्त थाय पण ॥1 ॥ पापथी क्यारे पण वधे नही॥ ५५॥ ॥घणा श्रारंजरूप महापाप जेमां बे, लोकमां || जेनी निंदा थाय , तथा जे उन्नयलोक विरुद्ध होय, ते कर्म आचरे नही ॥६०॥ ॥ व्यवसायमतोनीचं,न कुर्यान्नापिकारयेत्॥ पुण्यानुसारिणी संपत्, न पापाबईते । कचित् ॥ ५॥ बह्वारंनमहापापं, जने चेऊनगर्दितम् ॥ इहामुत्रविरुई यत्, तत्कर्म न समाचरेत् ॥ ६० ॥ लोहकारचर्मकारमद्यकृत्तैलिकादिन्निः ॥स | त्यप्यर्थागमे कामं, व्यवसायं परित्यजेत् ॥ ६॥ एवं चरन् प्रथमयामविधि लोहार साथें, मोची अथवा चमार साथें, मद्यना करनार साथें श्रने तेली श्रादिक साथें जो घणुं धन प्राप्त थतुं होय तोपण व्यापार न करे ॥ ६१॥ ॥ ए प्रकारें|| ॥ प्रथम पोहोरनो सर्व विधि प्रत्ये करतो, श्रद्धायुक्त, जला विनयनो धणी न्यायें करी Jain Education onal For Personal and Private Use Only janelibrary.org Page #181 -------------------------------------------------------------------------- ________________ शोजतो, विज्ञानने मान श्राप तथा लोकने रीजवनुं तेनेविषे सावधान, एवो श्रा वक इहलोक छाने परलोकसंबंधि पोताना बे जन्म सफल करे ॥ ६२ ॥ ॥ इति श्री रत्नसिंहसूरि, तत् शिष्य श्री चारित्र सुंदरगणिना विरचित श्राचारोपदेशग्रंथ मां प्रथमपो समग्रं श्रादो विशुद्ध विनयो नयराजमानः ॥ विज्ञानमानजनरंजनसावधा नो, जन्मइयं विरचयेत्सफलं स्वकीयम् ॥ ६२ ॥ इति श्रीरत्नसिंहसू रिशिष्य श्रीचारित्र सुन्दरगणिविरचिते आचारोपदेशे प्रथमप्रदरवर्गः ॥ १ ॥ अ य स्वमन्दिरे यायाद्, द्वितीये प्रहरे सुधीः ॥ निर्जन्तु जुवि पूर्वाशाभिमुखः स्ना नमाचरेत् ॥ २॥ सप्रणालं चतुष्पाद, स्नानार्थं कारयेद्वरम् ॥ तते जले य | दोरवर्गनो बालावबोध संपूर्ण ॥ १ ॥ ॥ दवे बीजे पोहोरें ते पंमित पोताने घरे ज‍ जीव रहित धरतीने विषे पूर्व दिशि सन्मुख बेशीने स्नान करे ॥ १ ॥ ॥जला परनाला सहित | बाजोठ स्नानने अर्थे करावे, ते उष्ण पाणी बाजोठमां रह्याथी जीवनी हिंसान थाय ॥ २ ॥ Jain Education honal For Personal and Private Use Only Tjainelibrary.org Page #182 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अ०ज० II GR II रजस्वला स्त्रीनो अथवा चंडालनो स्पर्श थयो होय अथवा घरमां सूतक थयुं दोय, तथा स्वजनादिकनुं मृत्यु थयुं होय तो मतस्कथी मांगीने सर्वांगें स्नान करे ॥ ३ ॥ अन्य श्रवसरें मस्तक वर्जीने बीजुं शरीर पखाले, एटलुं विशेष जाणवुं, तथा कांइक उष्ण एवा थोडे पाणी यें करी पुण्यवंत जीव देवपूजाने अर्थे स्नान करे ॥ ४ ॥ 11 | स्माऊंतुबाधा न जायते ॥ २ ॥ रजस्वलाया मलिनस्पर्शे जाते च सूतके मृतस्वजनकार्ये च सर्वाङ्गस्नानमाचरेत् ॥ ३ ॥ अन्यथा शीर्षवर्ज च, वपुः प्रकालयेत्परम् ॥ कवोष्णेनाल्पपयसा, देवपूजाकृते कृती ॥ ४ ॥ चन्द्रादि त्यकरस्पर्शात्पवित्रं जायते जगत् ॥ तदाधारं शिरो नित्यं पवित्रं योगिनो विदुः ॥ ५ ॥ दयासाराः सदाचारास्ते सर्वे धर्मदेतवे ॥ शिरः प्रक्षालनान्नि चंद्रमा अने सूर्यना किरण स्पर्शाथी सर्व जगत् पवित्र थाय बे, ते जगत्नो श्राधार | मस्तक ठे माटे ते मस्तक निरंतर पवित्र बे, एम योगीश्वर कड़े बे ॥५ ॥ ॥ जीवदया बे सारभूत जेमां एवा सर्व श्राचार धर्मनां कारण बे, ते माटे मस्तक धोवाथी नित्य Jain Educationaal For Personal and Private Use Only वर्ग २ ॥ ८‍ ॥ inelibrary.org Page #183 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | मस्तकना जीवने उपद्रव होय तेथी अधर्म थाय, माटे मस्तक स्नान नित्य करवुं वर्ज्य बे | ॥ ६ ॥ ॥ मस्तक क्यांहि पवित्र न होय. केमके ! सदा ते लुगडांथी वीटयुं रहे, वली निर्मल तेजनो धरनार एवो आत्मा जे जीव, तेनी स्थिति एटले रहेतुं ते निरंतर मस्तकें बे, माटे क्यारें पण मस्तक पवित्र यतुं नथी ॥ ७ ॥ ॥ स्नानने श्रर्थे पाणी नाख्या त्यं, तीवोपवो भवेत् ॥ ६ ॥ नापवित्रं नवेीर्ष, नित्यं वस्त्रेण वेष्टितम् ॥ प्यात्मनः स्थिते सत्वनिर्मलद्युतिधारिणः ॥ ७ ॥ स्नानायेति जलोत्सर्गाद् नंति जन्तून् बहिर्मुखान् ॥ मलिनं कुर्वते जीवं, शोधयंति वपुर्द ते ॥ ८ ॥ विहाय पोतकं वस्त्रं परिधाय जिनं स्मरन् ॥ यावजाला चरणौ, तावत्तत्राव तिष्ठते श्री जीव इणाय बे, एवा स्नान धर्मथी मिथ्यात्वी जनो पोताना जीवने मलीन करे बे अने शरीरने पवित्र करे बे ॥ ८ ॥ ॥ स्नान करेलुं पोतीयुं मूकीने बीजुं वस्त्र पहेरीने जिनेश्वरनुं स्मरण करतो बतो ज्यांसुधी जीना पग होय त्यांसुधी त्यांज उनो रहे || Jain Educationanal For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #184 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आज ॥ ए अन्यथा जीना पग उपर मल लागे, तेवारें वली पग अपवित्र थाय, तथा ते जीजेला पगे जीव लागे तेमनी घात थाय, तेथी महोटुं पाप लागे॥ १०॥ ॥ घरना देरा सर पासें जश्ने धरती पूंज्या पली धोयेलां पूजानां वस्त्र पहेरीने थाउ पडनो मुखको श बांधे ॥ ११॥ ॥ देवपूजाने अवसरें एक मन, बीजं वचन, त्रीजी काया, चो) ए॥ अन्यथा मलसंश्लेषादपवित्रौ पुनः पदौ ॥ तल्लीनजीवघातेन, नवे घा पातकं महत् ॥ १०॥ गृहचैत्यांतिकं गत्वा, नूमिसंमार्जनादनु ॥ परिधान य च वस्त्राणि, मुखकोशं दधात्यथ ॥११॥ मनोवाकायवस्त्रेषु, नपज्योपकर | स्थितौ॥शुद्धिःसप्तविधा कार्या, देवतापूजनदणे॥१शापुमान् परिदधेन्न स्त्रीवस्त्रं । वस्त्र, पांचमी नूमि, बहां पूजानां उपकरण श्रने सातमी स्थिति स्थैर्य, ए सात वानां देव पूजवाने अवसरे शुद्ध करवां ॥ १२ ॥ ॥ पूजा करती वखतें क्यारे पण पुरुचे ॥ स्त्रीनुं वस्त्र पहेर नही, अने स्त्रीयें पुरुष, वस्त्र न पहेरवं. जो पहेरे, तो कामनी त ॥ Jain Editional For Personal and Private Use Only Mallainelibrary.org Page #185 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १६ Jain Educationa in था रागनी वृद्धि थाय ॥ १३ ॥ ॥ कारीयें करी पाणी लावी ते पाणी यें करी जगवंतनी अंग पखाल करीने अंगलूहणे करी जगवंतनुं शरीर सूकुं करे. तेवार पढ़ी अष्ट प्रकारनी पूजा करे, ते कहे बे ॥ १४ ॥ ॥ कस्तूरी केशर कपूर तेणेकरी मिश्रित करेलुं एवं पूजाविधौ क्वचित् ॥ न नारी नरवस्त्रं तु, कामरागविवर्धनम् ॥ १३ ॥ भृंगा रानीतनीरेण, संस्नाप्यांगं जिनस्य तु ॥ रूक्षीकृत्य सुवस्त्रेण, पूजां कुर्यात्ततोऽष्ट धा ॥ १४ ॥ सच्चन्दनेन धनसारविमिश्रितेन, कस्तूरिकाजवयुतेन मनोहरेण ॥ | रागादिदोषरहितं महितं सुरेन्द्रैः, श्रीमतिनं त्रिजगतः पतिमचर्यामि ॥ १५ ॥ | जाती जपाबकुलचम्पकपाटलाद्यै, र्मन्दारकुन्दशतपत्रवरारविन्दैः ॥ संसारनाश | मनोहरचंदन तेणें करीने, राग द्वेषादिके रहित ने जेने चोस इंडे पूज्या एवा जे श्रीनग | वंत त्रण जगतना स्वामी तेने हुं चुं हुं ॥ १५ ॥ इति प्रथमा चंदनपूजा ॥ १ ॥ ॥ तेवा र पढी जाइनां फूल, जासूलनां फूल, बोलसिरि, चंपक, पामल, मंदार, मचकुंद, सो For Personal and Private Use Only nelibrary.org Page #186 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रानपाखडीनां कमल, तथा बीजां पण फूलें करी, संसारना नाश करनार, करुणायें करी प्रधान, एवा जगवंतने ढुं पूजु बु ॥ १६ ॥ इति द्वितीया पुष्पपूजा ॥५॥ ॥ १॥ | काला अगरनो करेसो साकर सहित घणा करें करी सहित घणा यत्ने कस्यो बहु हर्ष थापनारो एवो धूप नक्तियें करी महारा पोताना पापनो नाश करवाने श्रर्थे हुँ करणं करुणाप्रधानं, पुष्पैः परैरपि जिनेन्जमदं यजामि॥१६॥ कृष्णागुरुप्रचुना रितं सितया समेतं, कर्पूरपूरमहितं विहितं सुयत्नात् ॥ धूपं जिनेंपुरतो गुरु ना तोषपोषं, नत्त्योदिपामि निजउष्कृतनाशनाय ॥१७॥झानं च दर्शनमयो || चरणं विचिन्त्य, पुंजत्रयं च पुरतः प्रविधाय नत्त्या।चोदाढतैः कणगणैरपरै ।। नगवंत श्रागल उखेवं दुं ॥ १७॥ इति तृतीया धूप पूजा ॥३॥ ॥ ज्ञान, दर्शन श्रने । चारित्र ए त्रण नाव मनमां चिंतवी त्रण ढगला श्राखे खन चोखायेंकरी तथा वीजा || ॥ पण सारा कण धान्य तेणेकरी जगवंत पागल करीने ते जगवंत श्रीश्रादीश्वर प्रत्ये १ ॥ Jain Educational For Personal and Private Use Only Minelibrary.org Page #187 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Educationa in | तें करी हुं पूजुंनुं ॥ १८॥ इति चतुर्थी अत पूजा ॥४॥ ॥ जलां एवां ना बियेर, फनस, श्रामलां, बीजोरां, जंबीर, सोपारी ने थांबां प्रमुख फलेंकरीने स्वर्गादिक देवलोका| दिक घणा फलना देनार एवा श्रीदेवाधिदेव एटले सर्व देव थकी अधिक देव जे श्रीन रपीह, श्रीमन्तमादिपुरुषं जिनमर्चयामि ॥ १८ ॥ सन्नाखिकेरपन सामलबीज पूरजंबीरपूगसहकारमुखैः फलैस्तैः ॥ स्वर्गाद्यनल्पफलदं प्रमदाप्रमोद, दे वाधिदेवमशुनप्रशमं महामि ॥ १९ ॥ इति फलपूजा ॥ सन्मोदकैवर्टकमंडक शालिदालिमुख्यैरसंख्यरसशाखिभिरन्ननोज्यैः ॥ दुत्तइव्यथाविरहितं स्व हिताय नित्यं, तीर्थाधिराजमदमादरतो यजामि ॥ २० ॥ इति नैवेद्यपूजा ॥ ॥जला एवा गवंत ते प्रत्यें हर्षे करी हुं पूजुं हुं ॥१॥ इति पंचमी फल पूजा ॥५॥ लावा, वमां, मांडा, चोखा, दाल प्रमुख घणा रससहित शोजतां एवां नैवेद्य तेणेक रीने भूख ने तृषानी पीमा रहित एवा जगवंत तीर्थंकर ने पोताना हितने श्रर्थे नि For Personal and Private Use Only unelibrary.org Page #188 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्राग्न ॥ए ॥ त्य प्रत्ये टुं श्रादरेकरी पूजु ढुं ॥॥ ॥ इति षष्ठी नैवेद्य पूजा ॥ टाल्यो पापनो स मूह जेणे, नित्ये उदयवंत, त्रण विश्वने एटले त्रण जगतने जोवानी कला तेणेकरी सहित एवा नगवंत प्रत्ये नक्तियें करी महारुतम जे अज्ञान ते शमाववामाटे शमताना समुख एवा जगवंत प्रत्ये जक्तियें करी हुँ दीपक करुं हुं ॥१॥ ॥इति सप्तमी दीपक विध्वस्तपापपटलस्य सदोदितस्य, विश्वावलोकनकलाकलितस्य नक्त्या ॥ न ! Malयोतयामि पुरतो जिननायकस्य, दीपं तमःप्रशमनाय शमांबुराशेः॥२॥इति । दीपकपूजा ॥ तीर्थोदकै(तमलैरमलस्वन्नावं, शश्वन्नदीह्रदसरोवरसागरोत्थैः ॥ रिमारमदमोहमहाहिताय, संसारतापशमनाय जिनार्चयामि ॥॥ पूजा॥हे जिन! निरंतर निर्मल ने खनाव जेमनो, कंदर्प तथा श्राउ मद श्रने मोहरूप सर्प तेने हणवाने गरुम समान एवा तमने नदी, प्रह, सरोवर श्रने समुफ तेना निर्मल||| पाणीयें करी संसारनो ताप शमाववाने अर्थे हुँ पूनुं हुं ॥ ॥ ॥ इत्यष्टमी जल | Jain Education . onal For Personal and Private Use Only Page #189 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Educationa I पूजा ॥ए पूजानां महोटां श्राव काव्यनी स्तुति ते जणीने ए पूर्वे कह्यो जे जलो विधि, ते वि धियें करी जे पूजा करे, ते पुण्यवंत श्रावक देवताना तथा मनुष्यना अखंड सुख पूर्ण जोगवीने थोडा कालमां मोना सुख प्रत्यें पामे ॥ २३ ॥ ॥ इति पूजाष्टकम् ॥ इति जलपूजा ॥ पूजाष्टकस्तुतिमिमामसमामधीत्य, योऽनेन चारुविधिना वित नोति पूजाम् ॥ भुक्त्वा नरामरसुखान्यविखंमितानि, धन्यः सुवासमचिराल्ल ते शिवेऽपि ॥ २३ ॥ इति पूजाष्टकम् ॥ शुचिप्रदेशे निःशल्ये, कुर्यादेवालयं सु धीः ॥ सौधे यातां वामजागे, साईहस्तोच्च भूमिके ॥ २४ ॥ पूर्वाशानि मुखोऽ र्चासु, उत्तराभिमुखोऽथवा ॥ विदिशांसंमुखो नैव, दक्षिणां वर्जयेद्दिशम् ॥२५॥ घरमां जातां ते डावे हाथे दोढ हाथ उंची धरतीने विषे राज्य रहित एवा पवित्र स्था नकें पंडितजन देरासर करे ॥ २४ ॥ ॥ पूजानो करनार पूर्वदिशि साहामो अथवा उत्तरदिशि साहामो बेसे; पण विदिशिनी साहामो न बेसे; छाने दक्षणदिशि वर्जे ॥ For Personal and Private Use Only ainelibrary.org Page #190 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रा०ज० ॥ ए३ ॥ ॥ २५ ॥ ॥ पूर्वदिशि साहामो बेसी पूजा करे तो लक्ष्मी पामे, श्रनिखु संताप पामे, दक्षिण दिशियें मरण पामे, अने नैरुत्य खुणे उपद्रव उपजे ॥ २६ ॥ ॥ पश्चिम दिशियें पुत्रनुं दुःख होय, वायु खुणे संतान न होय, उत्तर दिशियें घणो लाज थाय, पूर्वस्यां लगते लक्ष्मी मग्नौ संतापसंजवः ॥ दक्षिणस्यां नवेन्मृत्युनैर्ऋते स्याङ | पवः ॥ २६ ॥ पश्चिमायां पुत्रःखं, वायव्यां स्यादसंततिः ॥ उत्तरस्यां महा लाज, ईशान्यां धानि नो वसेत् ॥ २७ ॥ अंध्रिजानुकरांसेषु, मस्तके च यथा क्रमम् ॥ विधेया प्रथमं पूजा, जिनेन्द्रस्य विवेकिनः ॥ २८ ॥ सचंदनं च काश्मी रं, विनार्चा न विरच्यते ॥ ललाटकंठहृदये, जठरे तिलकं पुनः ॥ २९ ॥ | ईशान खुणे घरने विषे न रहे ॥ २७ ॥ ॥ बेग, बेढीच, बे हाथ, बेखना अने एक मस्तक ए नवे अंगें अनुक्रमें डाबा पाश्वाथी विवेकी श्रावकें श्री जिनेंद्रनी प्रथम पूजा करवी ॥२८॥ ॥ जला चंदन ने सारा केशर विना पूजा न करवी, वली ल Jain Educationational For Personal and Private Use Only वर्ग २ ॥ ए३ ॥ jainelibrary.org Page #191 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Educationa लाटें, कंठें, हृदयें ने पेट ऊपर श्रीजगवंतने तिलक करे ॥ २ ॥ ॥ प्रजातें पवित्र वास करें, बे पोहोरें फूलन । पूजा करे, तेम सांजें धूप दीप करी पूजा करे एम पंकि तें त्रिकाल पूजा करवी ॥ ३० ॥ ॥ पूजा करतां एक फूलना बे कटका न करवा, क प्रजाते शुवासेन, मध्याह्ने कुसुमैस्तथा ॥ संध्यायां धूपदीपाच्यां विधेयार्चा | मनीषिभिः ॥३०॥ नैकं पुष्पं द्विधा कुर्यान्न विन्द्यात्कलिकामपि ॥ पत्रकुमलने | देन, हत्यावत्पातकं वेत् ॥ ३१ ॥ हस्तात्प्रस्खलितं पुष्पं, लग्ने पादेऽथवा जु वि ॥ शीर्षोपरि धृतं यच्च, तत्पूजा न कर्हिचित् ॥३२॥ निर्गन्धमुग्रगन्धं च, त्याज्यं कुसुमं समम् ।। स्पृष्टं नीचजनैर्दष्टं, कीटैः कुवसनैर्धृतम् ॥ ३३ ॥ ली पण बेदवी नदी, पत्री फूल जूडुं न करखुं. एम करवाथी हत्या सरखुं पाप लागे ॥ ३१ ॥ ॥ हाथ थी पी गयेलुं, जेने पग लाग्यो, जे भूमियें पड्युं, तथा जे मस्तक उपर आयुं, एवं जे फूल ते पूजायोग्य कद्देवाय नही ॥ ३२ ॥ ॥ गंध रहित, जय For Personal and Private Use Only inelibrary.org Page #192 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रा०ड० ॥ ए४ ॥ गंधवालुं, नीच मनुष्यें करश्युं, कीडे डंस्युं, माठे वस्त्रं लावेलुं, एवं फूल बांडवुं, पू जामां लेवुं नहीं ॥ ३३ ॥ ॥ जगवंतने डाबे पासें धूप देवो, जलनो कुंज सन्मुख ढोववो, नागरवेलनां पान फल ते जगवंतना हाथने विषे देवां ॥ ३४ ॥ ॥ १ स्नात्र २ चंदन, ३ दीवो, ४ धूप, २ फूल, ६ नैवेद्य, ७ जल, ध्वजा, ए वासदेप, १० वामांगे धूपदादः स्यादपात्रं तु संमुखे ॥ हस्ते दद्याजिनेन्द्रस्य, नागवल्लीदलं | फलम् ॥ ३४ ॥ स्नात्रैश्चन्दनदी पधूपकुसुमैर्नैवेद्यनीरध्वजै, र्वासैरक्षत पूगपत्रसहि तैः सत्कोशवृद्ध्या फलैः ॥ वादिध्वनिगीतनृत्यनुतिभिश्वत्रैर्वरैश्वामरे, पा निश्व किलैकविंशतिविधा पूजा नवेदताम् ॥ ३५ ॥ इत्येकविंशतिविधां रच दत, ११ सोपारी, १२ तांबूल, १३ देव जंगारमां वृद्धि करवी, १४ फल, १५ वाजित्रध्वनि, १६ गीतगान, १७ नाटक, १० स्तुति, १० बत्र, २० जलां चामर, २१ जलां आमरण, ए एकवीरा प्रकारें करीने श्रीश्ररिहंत देवनी पूजा होय ||३५|| ॥ एकवीश प्रकारें Jain Educationanal For Personal and Private Use Only वर्ग २ ॥ ए४ ॥ jainelibrary.org Page #193 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Educationa करी जे जगवंतनी पूजा बे तेने रूमा जीव जला पर्वने दिवसें करे, अथवा तीर्थे जइने करे ने प्रथम कही जे उत्तम या प्रकारनी पूजा ते नित्य करवी, तथा बीजी पण वली जे जे जली वस्तु होय ते जावें करी पूजामां जोडीयें ॥ ३६ ॥ ॥ |तेवार पटी विशेष थकी धर्म पामवानी इछाएं पवित्र मार्ग प्रत्यें मूकतो, धौतवस्त्र यन्ति पूजां, नव्याः सुपर्वदिवसेऽपि च तीर्थयोगे ॥ पूर्वोक्तचारुविधिनाष्टविधां च नित्यं, यद्यहरं तदिह नाववशेन योज्यम् ॥ ३६ ॥ ग्रामचैत्यं ततो यायाद्विशे षा-धर्म्मलिप्सया ॥ त्यजन्नशुचिमध्वानं, धौतवस्त्रेण शोभितः ॥ ३७ ॥ यास्या मीति हृदि ध्यायंश्चातुर्य फलमश्नुते ॥ उचितो बनते पाष्ठं, त्वाष्टमं पथि च |पहेरवे करी शोजतो गामना देरासरने विषे जाय ॥ ३७ ॥ ॥ देरासरें जश्शुं एम मनमां धरतो थको चोथनुं एटले एक उपवासनुं फल पामे, छाने जेवारें देरासरें जावाने ऊठे तेवारें बठनुं फल थाय, देरासरने मार्गे जातां श्रवम फलनो लाज थाय ॥ ३८ ॥ በ Wonal, For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #194 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्र०ज० ॥ एए ॥ Jain Educationa! | देरासरने दीठे थके दशमनो एटले चार उपवासनो लाज थाय, देरासरने बारणे गया थकां डुवादसनो लान थाय, देरासरनी मांदे प्रवेश करे त्यारें पन्नर उपवासनो लाज थाय, जगवानने पूजतां मासखमणनो लाज थाय ॥ ३५ ॥ ॥ पीत्रणवार निसि ही कहीने पंडित होय ते देरासरमां प्रवेश करे, तिहां देरासरनी चिंता प्रत्यें करी ने पढी व्रजन् ॥ ३८ ॥ दृष्टे चैत्ये च दशमं द्वारे द्वादशकं लभेत् ॥ मध्ये पदोपवास | स्य, मासस्य च जिनार्चने ॥ ३ ॥ तिस्रो नैषेधिकीः कृत्वा, चैत्यं तत्प्रविशेत्सु धीः ॥ चैत्यचिंतां विधायाथ, पूजयेत्री जिनं मुदा ॥ ४० ॥ मूलनायकमन्यर्च्य प्रष्टात्प्रतिमाः पराः ॥ पूजयेच्चारुपुष्पौघैः शिष्टाचांतर्बहिः स्थिताः ॥ ४१ ॥ प्रवग्रदाइ हिर्गत्वा, वन्देतार्हन्तमादरात् ॥ विधिना पुरतः स्थित्वा, रचयेच्चैत्य दर्षे करी श्री जगवंतने पूजे ॥ ४० ॥ ॥ प्रथम या प्रकारें जला फूलना समूहें श्रीमूलनायकजीनी प्रतिमा पूजीने पढी अनुक्रमें बीजी श्राव बाहिरनी प्रतिमा प्रत्यें पूजे ॥ ४१ ॥ ॥ पढी अवग्रहश्री वाहेर जश्ने यादरथी श्री अरिहंतने वांदे, पठी For Personal and Private Use Only वर्ग २ ॥ एए ॥ Wwwgainelibrary.org Page #195 -------------------------------------------------------------------------- ________________ || विधियें सहित आगल रहीने चैत्यवंदन करे ॥ ४५ ॥ ॥ एक नमुखुणेकरी प्रथम जघन्य चैत्यवंदन जाणवू, बे नमुहुणेकरी बीजुं मध्यम चैत्यवंदन जाणवं, पांच न । मुहुणेकरीत्रीजु उत्तम चैत्यवंदन जाणवू. बीजां पण त्रण प्रकारें चैत्यवंदन , ते कहे जे ॥४३॥ ॥ नमुहुणंनो पाठ योगमुजायें नणीजें, तथा जावंति चेश्थाई वन्दनम् ॥ ४२ ॥ एकशस्तु जघन्या स्याद्, घान्यां नवति मध्यमा॥ पञ्चन्नि | स्तूत्तमा ज्ञेया, जायते सा त्रिधा पुनः ॥४३॥ स्तुतिपाठे योगमुश, जिनमुज धातु वन्दने ॥ मुक्ताशुक्तिकमुज तु, प्रणिधाने प्रयुज्यते ॥४४॥ उदरे कूर्परी |न्यस्य, कृत्वा कोशाकृती करौ ॥ अन्योन्याङ्गलिसंश्लेषाद्योगमुश नवेदियम ४५॥ पुरोंगुलानि चत्वारि, पश्चादूनानि तानि तु॥ अवस्थितिः पादयोर्या, जाए पाठ जिनमुखायें नणवो, तथा जयवीयरायनो पाठ मुक्ताशुक्ति मुखायें नणीयें॥४॥ पेटने विषे कुणी थापीने कमलना डोडाने श्राकारें बे हाथ करीने मांहोमांदे श्रां गली नेलियें ए प्रथम योगमुखा होय ॥ ४५ ॥ ॥ चार अंगुल आगली आंगलीनी Jain Educational For Personal and Private Use Only ne baryong Page #196 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रानबाजुयें पग पोहोला राखीयें, श्रने पाळला पानीना जाग तरफ चार अंगुलथी कांश्कल वर्ग ५ काला पग पोहोला राखीयें, ए रीतें जे पगर्नु थापवं, ते बीजी जिनमुखा कहीयें ॥६॥ ॥ ए६॥ बे गोठणनी वच्चे रहेला तथा मोती पाकवानी बेबीपो जेम जोडेली होय | तेनी जेवा श्राकारवाला अने पोताना कपालने लगाडेला जेमां बे हाथ होय; ए| जिनमुज्यमीरिता ॥४६॥ मुक्ताशुक्तिसमाकारों, जानुगर्नस्थितौ समौ ॥ ल. लाटलग्नौ हस्तौ, यौ मुक्ताशुक्तिरियं मता ॥४७॥ नवा जिनवरं यायाजदन्ना वश्यकी गृहम् ॥ अश्नीयाबन्धुनिः साई, जदयानदयविचदणः ॥ ४ ॥ अ धौतपादः क्रोधान्धो, वदन्र्वचनानि यत्। दक्षिणानिमुखो जुंक्ते, तस्याजद मुक्ताशुक्ति नामक मुसा ज्ञानी पुरुषोयें मानेली ने ॥४॥ ॥ जगवंतने नमीने श्राव, ए६॥ INसहि कहेतो थको पोताना घर प्रत्ये जाय, त्यां जश्ने ते डाह्यो श्रावक जद अनदने | उलखतो थको पोताना बांधवो साथें जमे ॥॥ ॥पग धोया विना, रीसें अंध थको, Jain EducationalS nal For Personal and Private Use Only IAlainelibrary.org Page #197 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मुखमांथी मागं वचन बोलतो थको जे दक्षिण दिशिनी साहामो बेसी जमे ते राक्षस जोजन कहीयें ॥४॥ ॥ अंग पवित्र करी शुजस्थानकें, निश्चल श्रासने बेगे थको, IN देव गुरुने संजारतो थको जे जमे ते जोजनने मनुष्यनुं जोजन कहीयें ॥ ५० ॥ ॥ स्नान, तथा देवपूजा करीने,पूज्य जे पोताना माता पिता आदि तेने नमीने, हर्ष सहित । सनोजनम् ॥ ४॥ पवित्रांगः शुने स्थाने, निविष्टो निश्चलः शनैः ॥ स्मृत देवगुरुर्जुङ्क्ते, तत्स्यान्मानुषनोजनम् ॥ ५॥ स्नात्वा देवान् समच्यर्च्य, न त्वा पूज्यजनान्मुदा॥ दत्वा दानं सुपात्रेच्यो, हुंक्ते जुक्तं तउत्तमम्॥५॥नोज ने मैथुने स्थाने, वमने दन्तधावने ॥ विण्मूत्रोत्सर्गकाले च, मौनं कुर्यान्मदाम । सुपात्रने दान देने जे जमवु तेने उत्तम देवजोजन जाणवू ॥५१॥ ॥ महोटी बु छिना धणीयें एक जोजन करतां, बीजुं स्त्रीसेवा करतां, त्रीजा वमनने विषे, चो) दातण करतां, पांचमी वडीनीत करतां, नही लघुनीत करतां, एटले स्थानकें बोलवू Jain Educational Ilonal For Personal and Private Use Only B w.jainelibrary.org Page #198 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥ नही॥ ५५॥ ॥ अग्निखुण, नैझतखुण अने दक्षिणदिशि था त्रणदिशा जोजनमा | वर्ण्य , तथा रविना अस्तवेलायें, उदय वेलायें, ग्रहण पर्व होय त्यारें अथवा आप ॥ Mणा झाति बांधवमां शब ज्यांसुधी पड्युं होय त्यांसुधी जमवू नही ॥५३॥ ॥ जे । बतेऽव्ये जोजनादिकने विषे कृपणपणुं करे, तेमूर्खबुद्धिवालो जाणवो.ते देवने काजें धन कातिः॥५॥ आग्नेयीं नैतिं नुक्तौ, ददिणां वर्जयेदिशम् ॥ सांध्ये ग्रहणका भले च, स्वजनादेः शवस्थितौ ॥५३॥ कार्पयं कुरुते यो दि, नोजनादौ धने स। ति ॥ मन्ये मन्दमतिस्सोत्र, देवाय धनमर्जति ॥५४॥ अज्ञातनाजने नाद्यान, जातिव्रष्टरदेऽपि च ॥ अज्ञातानि निषिधानि, फलान्यन्नानि संत्यजेत् ॥ बालस्त्रीभ्रूणगोहत्याकृतामाचारलोपिनाम् ॥ स्वगोत्रनेदिनां पंक्तौ, जानन्नोपवि IN कमावे ? ॥५॥ ॥श्रजाणी थाली प्रमुख नाजनमां जमवू नही, जे शाति थकीए भ्रष्ट थयो होय तेने घेर जमवू नही. अजाण्यां, नगवंतें निषेध्यां एवां फल तथा अन्न। बगडे, त्याग करे ॥ ५५ ॥ ॥ जे पंडित होय ते, १ बाल, २ स्त्री, ३ गर्न, ४ गो, एनी ॥ Jain Education alltional For Personal and Private Use Only aw.jainelibrary.org Page #199 -------------------------------------------------------------------------- ________________ हत्याना करनार, श्राचारना लोपनार, अथवा पोताना कुलनो त्याग करनार एटला नी पंक्तिमां जाणतो थको जमवा बेसे नही ॥ ५६ ॥ ॥ मदिरा, मांस, माखण, मधु, पांच जातिनां नंबरनां काडनां फल, अनंतकाय, सर्व जातिनां श्रजायां फल त था रात्रें जोजन ए सर्वदा वर्ज्य बे ॥ ५७ ॥ ॥ काचो गोरस ते बास दहिं इत्यादि शेत्सुधीः ॥ ५६ ॥ मद्यं मांसं नवनीतं, मधूडुंबरपञ्चकम् ॥ अज्ञातकायमज्ञा तफलं रात्रौ च जोजनम् ॥१॥ आमगोरससंयुक्तं द्विदलं पुष्पितौदनम् ॥ द ध्यदोद्वितयातीतं, कुथितान्नं च वर्जयेत् ॥५८॥ जन्तुमिश्रं फलं पुष्पं, पत्रं चा न्यदपि त्यजेत् ॥ संधानमपि संसक्ति, जिनधर्मपरायणः ॥ ५० ॥ 11 | तेणें करी सहित कठोल चीज, सडी गयेलुं अन्न, बे दिवस उपरांतनुं दहीं तथा को ही गयेलुं कुत्सित अन्न ए सर्व वर्जन करे ॥ ५८ ॥ ॥ श्रीजिन धर्मने विषे रक्त थयेलो श्रावक फल, फूल तथा पान अने बीजा पण जे पदार्थ जीवादिसहित दोय ते सर्व Jain Educationalenal For Personal and Private Use Only jainlibrary.org Page #200 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आननत्यागे, न खाय; तथा अथाणां प्रमुख बावीश श्रजक्ष्य बांडे ॥ ॥ ५॥ ॥ नोज न करतां तथा वडीनीत करतां घणो वखत लगाडे नही, तथा पाणी पीवं, श्रने स्ना ॥ 9॥ INन करवू, ए बे वानां स्थिरतायें हलवे हलवे करीयें ॥६०॥ ॥ लोजननी श्रादिमां । पाणी पीतुं ते विष सरखं डे, तथा जोजननें अंतें पाणी पी, ते शिखा सर , अने । नोजनं विविमोदं च,कुर्यादतिचिरं नहि।वारिपानं तथास्नानं, पुनःस्थिरतया सृजेत् ॥६॥ जोजनादौ विषसमं, नोजनान्ते शिलोपमम् ॥मध्ये पीयूषसदृशं, वारिपानं नवेत्रिधा ॥६॥ अजीर्णी नोजनं जह्यात्, कालेऽश्नीयाच्च साम्यतः॥ नुक्तोनितो वक्रशुहिं, पत्रपूगादिनिः सृजेत् ॥ ६॥ विवेकवान्न ताम्बूलम नोजननी वचमां पाणी पीवु ते अमृत सरखं . ए रीते पाणी पीवानुं फल जाणवू , I. C६१॥ ॥अजीर्ण होय तेवारें जोजन न करवं, जेवू रुचे तेवू जोजन कालें करे. जमी || उव्या पली मुख धोश्ने पान सोपारीयें करी मुख शुरु करे ॥ ६॥ ॥विवेकी पुरुष । ॥ ॥ Jain Educational For Personal and Private Use Only Mainelibrary.org Page #201 -------------------------------------------------------------------------- ________________ IN मार्गे चालतो थको तंबोल न खाय, तथा पुण्यवंत होय ते श्राखी सोपारी वगेरेने दांतें । करी नांजे नही ॥६३॥ ॥जम्या पली जनालाविना निझा करे नही, केमके,दिवसें । सूवा थकी शरीरने विषे रोगोत्पत्ति थाय ॥ ६ ॥ ॥ इति श्रीश्राचारोपदेशे द्वितीय नीयाधिचरन्पथि ॥ पूगाद्यमदतं दंतैर्दलयेन्न तु पुण्यवित् ॥६३॥नोजनादनु INनो स्वप्यादिना ग्रीष्मं विचारवान् ॥ दिवा स्वपयतो देदे, जायते व्याधिसंभवः । d॥६४ ॥ इति श्रीआचारोपदेशे द्वितीयवर्गः समाप्तः ॥२॥ अथ तृतीयव भी प्रारंनः॥ ततो गेदे श्रियं पश्यन्, विजोष्ठीपरायणः॥सुतादिन्यो ददबिदा, सुखं तिष्ठेवटीयम् ॥१॥अत्मायत्ते गुणग्रामे, दैवायत्ते धनादिके ॥ वि वर्ग संपूर्ण॥शतेवार पड़ी घरनी शोजाप्रत्ये जोतो थको पंडितनी साथे वातचित कर तो, पुत्रोदकने शीखामण देतो सुखें समा बे घडी पर्यंत घरने विषे रहे ॥१॥ गुणनो समूह पोताने वश , श्रने धनादिक तो लाग्यने हाथें बे, एम समस्त । Jain Educational For Personal and Private Use Only Page #202 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रा०ज० ॥ एए ॥ तत्त्व जाण्यां वे जेणे एवा माणसने गुणनी दाणी न थाय ॥ २ ॥ ॥ कुलहीन मा एस पण गुणें करी उत्तमता पामे, जेम कचराथी उत्पन्न थयेलुं कमल मस्तकें चड़े बे, छाने कचरो बे ते पगें घसाय बे ॥ ३ ॥ ॥ उत्तम माणसनी कोइ खाण नथी, | संसारमां उत्तम माणसनुं कोइ कुल नथी, मनुष्य मात्र पोताने स्वजावें गुणेकरीज ज्ञाता खिलतत्त्वानां नृणां न स्याङ्गुणच्युतिः ॥ २ ॥ गुणैरुत्तमतां याति, वंशदी नोऽपि मानवः ॥ पंकजं ध्रियते मूर्ध्नि, पङ्कः पादेन घृष्यते ॥ ३॥ न काचिङत्तमा नां स्यात्, कुलं वान्यगतिः क्वचित् ॥ प्रकृत्या मानवा एव, गुणैर्याति जगन्नु तिम् ॥४॥ सत्वादिगुणसंपन्नो, राज्यार्दः स्याद्यथा नरः ॥ एकविंशतिगुणः स्या धर्मार्दो मानवस्तथा ॥ ५ ॥ प्रदुषहृदयः सौम्यो, रूपवान् जनवल्लनः ॥ अ जगतमां स्तववा योग्य थाय बे ॥ ४ ॥ ॥ सत्वादिक गुणें संपन्न पुरुष ते जेम रा ज्ययोग्य होय, तेम श्रावकना एकवीश गुणें सहित माणस ते धर्मयोग्य होय 112 11 ॥ जेनुं क्रुद्र हृदय न होय ते अक्क्षुद्र नामा प्रथम गुण, २ सौम्य होय, Jain Educationonal For Personal and Private Use Only वर्ग ३ ॥ एए ॥ jainelibrary.org Page #203 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३ रूपवंत होय, ४ सर्वलोकने वाहालो होय, ५ क्रूर न होय, ६ संसारथी बीये, मू र्ख न होय, ७ सदा दाक्षिण्यवंत होय ॥६॥ ॥ ए लजावंत होय, १० दया सहि त होय, ११ कोई ऊपर राग द्वेष न करे, १५ सौम्य नजर होय, १३ गुणनो रागी होय, १४ नली धर्मकथा सहित होय, १५ जला परिवारवालो होय, १६ दीर्घदृष्टि क्रूरो नवनीरुश्चाशगे दादिण्यवान् सदा ॥६॥ अपनपी च सदयो, मध्यस्थः । सौम्य एव च ॥गुणरागी सत्कथश्च, सुपदो दीर्घदर्यपि ॥ ७॥ दृानुगतो Maविनीतः, कृतज्ञः सुदितोऽपि च ॥ लब्धलदो धर्मरत्नयोग्य एनिर्गुणैनवेत् । Hind॥प्रायेण राजदेशस्त्रीनक्तवार्ता त्यजेत्सुधीः॥ ततो नार्थागमः कश्चित्, ते जंडो विचार करनार होय ॥७॥ ॥ १७ वृद्ध माणसने माननार होय, १० वि. नयवंत होय, रए करेला उपकारनो जाण होय, २० परम हितार्थ होय, २१ सर्व वातना नेदमां समजे, ए एकवीश गुणें करी सहित श्रावक धर्मरत्नने योग्य होय || जे पंडित ते प्रायें राजकथा, देशकथा, स्त्रीकथा अने जक्तकथानो त्याग करे, केमके, Jain Education For Personal and Private Use Only Page #204 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ग ३ आपन तेथी अर्थप्राप्ति कंश थती नथी, एटबुंज नही, परंतु सामो अनर्थ उपजे जे ॥॥ ॥ रूमा मित्र साथें नाश् साथें मांहोमांहे धर्मवार्ता करे, जे धर्मनां शास्त्र जाणतो होय । ॥ ९MIN|तेनी पासें बेसे, तत्त्वना जाव जाणे, विचारे ॥१०॥ ॥ जेथकी पापनी बुकि ऊप|| जे तेनी संगति न करे, कोई क्रोधने वचनें कहे तोपण पोतें न्यायमार्ग न मूके ॥११॥ प्रत्युतानर्थसंनवः ॥णा सुमित्रैर्बन्धुनिः साई, कुर्यामकथामपि ॥ तब्दिा सद शास्त्रार्थरहस्यानि विचारयेत् ॥ १० ॥ पापबुनिवेद्यस्मार्जयेत्तस्य सं गतिम् ॥ कोपेन वचनेनापि, न्यायं मुञ्चेन्न कर्दिचित् ॥११॥ अवर्णवादकस्या aपि, न वदेउत्तमाग्रणीः ॥ पित्रोर्गुरोः स्वामिनोऽपि, राजादिषु विशेषतः॥१२॥ मूर्खेऽष्टैरनाचार,मलिनैर्धर्मनिन्दकैः ॥ उःशीलैलोंजिनिश्चोरैः, संगतिं वर्जयेद जे उत्तम मनुष्य पंडित ते कोश्नो श्रवगुण कहे नही; माता, पिता, गुरु, शेव अने खामीना अवगुण बोले नही, वली विशेषे राजादिकनो अवगुण न बोले ॥ १५ ॥ मूर्खनी, पुष्टनी, अनाचारीनी, मलीननी, धर्मना निंदकनी, कुशीलवालानी, लोजी ॥१०॥ Jain Education I o nal For Personal and Private Use Only Jw.jainelibrary.org Page #205 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education नी, चोरनी एटलानी संगति वर्जन करे ॥ १३ ॥ ॥ अजाण्या माणसनी प्रशंसा क | रवी, अजाण्या माणसने पोताना घरमा रहेवा स्थानक आपकुं, अजाण्या कुलसायें सगाइ करवी, अजाण्या माणसने चाकर राखवो, पोताथी मोहोटा माणस उपर कोप करवो, पोताथी मोटा वैरी साथे मत्सर राखवो, गुणवान् साथै विवाद करवो, पोता थी मोहोटो चाकर राखवो, मायें देतुं करीने धर्म करवो, व्याजें उबीनुं उधारुं धन या लम् ॥ १३ ॥ प्रज्ञातस्योत्कीर्तनं यत्, स्थानदानं तथाविधम् ॥ ज्ञातकुल | संबन्धोऽज्ञातभृत्यस्य रक्षणम् ॥ १४ ॥ महत्सु कोपकरणं, मदता विग्रहस्त या ॥ विवादो गुणिनिः सार्धं, स्वोच्चनृत्यस्य संग्रहः ॥ १५ ॥ रुणं कृत्वा धर्म पी मागवुं नहीं, स्वजन साथै विरोध करवो, पारका माणस सायें स्नेह प्रीति राखवी, मोहने श्रर्थे उंचे चढवुं, चाकरने दंडीने धन जोगवनुं, दारिद्र श्रावे थके जाइ बांधवनो आश्रय करवो, पोते पोताना गुणनां वखाण करवां, पोतें वात कही पोते ज इसवुं, जे ते वस्तु खावी, ए सर्व श्रालोकमां तथा परलोकमां विरुद्ध एवां मूर्खनां For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #206 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्राग्जालक्षणनो तदन त्याग करवो ॥ १४ ॥ ॥१५॥ ॥१६॥ ॥१७॥ ॥१॥ वर्ग ३ न्यायें धन उपार्जे, चर्यायें चालतो थको देश विरुङ अने कालविरुष कार्यने गंडे, ॥१०॥ त्यागे; राजाना वैरीनी संगत न करे, घणा माणससाथें विरोध न करे ॥१॥ ॥ कुल कृत्यं, कुसीदस्याप्ययाचनम् ॥ विरोधः स्वजनैः सार्ध, मैत्री चापि परैर्नरैः ॥ ॥१६॥ ऊर्ध्वारोहणमोदार्थ, जुक्ति त्यस्य दंडनात् ॥ दौस्थ्ये बंधोराश्रयश्च, स्वयं स्वगुणवर्णनम्॥१७॥जक्त्वा स्वयं च दसनं, यस्य कस्यापि नदाणम्॥ एतानि च विरु हानि, मूर्खचिह्नानि संत्यजेत् ॥ १७ ॥ न्यायार्जितधनश्चर्या, मदेशकालको त्यजेत् ॥ राजविवेषिन्निः संगं, विरोधं च गणैःसमम् ॥रणा अ न्यगोत्रैर्विवादं च, शीलाचारकुलैः समैः॥ सुप्रातिवेश्मके स्थाने, कृतवेश्मान्वि ने श्राचार जे शील ते जेनां पोता सरखां होय एवा अन्यगोत्र साथें विवाह करे..॥१०॥ वली जला पाडोशीने स्थानके घर बनावीने बांधव सहित रहे॥२०॥ ॥ ॥ ॥ Jain Educational For Personal and Private Use Only Mainelibrary.org Page #207 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उपवना स्थानकनो त्याग करे, तथा श्रावक योग्य खरच करे, अव्यने अनुसारें वस्त्रा INदिक पहेरवां, लोक निंदा करे ते काममा प्रवर्ते नही ॥१॥ ॥ देशने थाचा रें चालतो पोतानो धर्म न मूके, जे पोताने श्राशरे रह्यो होय तेनुं हित करे, पोतानु बल अने निर्बलपणुं जाणे, वली हित अने श्रहितनी वातने विशेषे जाणे ॥ २५ ॥ तः स्वकैः॥२०॥ जपतस्य त्यजनं, यथायं च व्ययंचरेत् ॥ वेषं वित्तानुसारे । लणाप्रत्तो जनगर्दिते ॥२॥ देशाचारं चरन धर्मममुंचन्नाश्रिते दितः ॥बला दाबलं विजानन, स्वं विशेषाच्च हिताहितम् ॥ २२॥ वशीकृतेन्स्यिो देवे, गुरौ । च गुरुनक्तिमान ॥ यथावत्स्वजने दीनेऽतिथौ च प्रतिपत्तिकृत् ॥१३॥ एवं विचारचातुर्य, रचयंश्चतुरैः समम् ॥ कियती कामयेद् वेलां,शृण्वन् शास्त्राणि पांच इंजियने वश करे, देव गुरुने विषे घणी जक्ति राखे, यथायोग्यपणे खजननी, IN दीननी अने अतिथीनी सेवा करे॥३॥ एवा कह्या जे विचार तेनी चतुराई प्रत्ये करे, शास्त्रने सांजलतो अथवा नणतो थको, चतुर माणसनी साथे केटलोएक वखत गमा Jain Educationa a l For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #208 -------------------------------------------------------------------------- ________________ স্বান্ত वर्ग३ ॥१०॥ वे ॥२४॥ ॥ वलतो अव्य कमाववानो उपाय करे, परंतु जे जाग्यमां दशे ते मलशे एम कहीने बेसी न रहे, केमके, उद्यम कस्या विनालाग्यवंत पुरुषनुं जाग्य केवारें फले नही, माटे उद्यम करवो ॥२५॥ ॥ शुद्ध चोखे व्यवहारें करी व्यापार करतोसदै। व रहे; खोटां तोल, खोटां माप, खोटा लेख प्रत्ये वर्जे ॥ २६ ॥ ॥१ लीहालानुं वा नणन् ॥५४॥ कुर्वन्नर्थार्जनोपायं, न तिष्ठेदैवतत्परः॥ उपक्रमं विना लाग्यं, पुंसां फलति न क्वचित् ॥३॥शुझेन व्यवहारेण, व्यवसायं सृजन सदा॥कूट तोलं कूटमानं, कूटलेख्यं च वर्जयेत् ॥३६॥ अंगारवनशकटन्नाटकस्फोटजीवि . काम् ॥ दंतलादारसकेशविषवाणिज्यकानि च ॥२७॥ यंत्रपीडां निलाग्न कर्म, २ वन कर्म, ३ गाडानुं कर्म ४ लाडानुं कर्म, ५ धरती फोमवानुं कर्म, ६ दांत कुवाणिज्य, ७ लाख कुवाणिज्य, ७ घृत तेल मधादिकनुं कुवाणिज्य, ए केश कुवा || ॥१०॥ |णिज्य अने १० विष कुवाणिज्य एना व्यापारनोत्याग करे॥॥ ॥११ घाणीयंत्रप्रमुख Jain Educational Ronal For Personal and Private Use Only Tww.jainelibrary.org Page #209 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १२ बलद समारवा, कर्ण कंबल बेदवा, १३ असती ते उष्टदासी श्वान मार्जार प्रमुख पापीजीवोनुं पोषण करवू, १४ दव लगाडवा, अने १५ सर, अह तथा तलावादिकना शोषण करवा ए पन्नरे कर्मादान पाप जाणीने बांगवा ॥ ॥ ॥ लोखंड, महुडा नां फूल, मदिरा, मधु प्रत्ये पण तेमज वली कंदमूल पान प्रमुख वस्तु व्यापार कर न, मसतीपोषणं तथा ॥ दवदानं 'सरःशोष इति पंचदश त्यजेत् ॥ ॥ जालोदं मधुकपुष्पाणि, मदनं मादिकं तथा॥ वाणिज्याय न गृह्णीयात्, कंदान्प त्राणि वा सुधीः॥श्णान रदत्फाल्गुनादूर्व,न तिलानतसीमपि॥ गुडटुप्परका INIदीनि, जन्तुघ्नानि घनागमे ॥३०॥शकटं वा बलीवान, नैव प्रारषि वादयेत् ॥ वाने अर्थे ग्रहण करे नही ॥ ए॥ ॥ जे डाह्यो श्रावक ते फागुण मास उपरांत जातिल, अखशी, गोल, टोपरा प्रमुखने, घणा जीवोनो घात जाणीने चोमासे न राखे । ॥३०॥ गाडी अथवा पोठीया प्रमुख चोमासामां खेडावे नही, तथा जीवनी हिंसा १८ JainEducationanted For Personal and Private Use Only ww.jainelibrary.org Page #210 -------------------------------------------------------------------------- ________________ थाना WID प्रायें कारण एवं खेत्रवाडी- कर्म न करे ॥ ३१॥ ॥ व्याजबी मूल थावते व|| वर्ग ३ स्तु वेचवी, अधिको अधिको लाज वांडवो नहीं. केमके, घणुं मूल खावा जातां प्रायें ॥१०३॥ मूलगा नाणानो पण नाश थाय ॥ ३२ ॥ ॥ कोईने उधारें श्रापीयें नही. घणो लाज थाय तोपण घरेणा राख्या विना लोनेंकरी निश्चे थकी कोश्ने व्याजे नाj || प्राणिहिंसाकरं प्रायः, कृषिकर्म न कारयेत् ॥ ३१ ॥ विक्रीणीयात्प्राप्तमूल्यं, वां उन्नैवाधिकं ततः॥ अतिमूल्यकृतां प्रायो, मूलनाशः प्रजायते॥३शानधारकं न । प्रदद्यात्, सति लाने महत्यपि॥श्ते ग्रहणकालोनान्न प्रदद्यानं खलु॥३३॥ नाजानन्स्तेयाहृतं नैव, गृह्णीया इम्ममर्मवित् ॥ वर्जयेत्तत्प्रतीरूपं, व्यवहारं विवेक वान् ॥ ३४ ॥ तस्करैरंत्यजेधूर्ते, मलिनैः पतितैः समम् ॥ इहामुत्र हितं वांग श्रापियें नही ॥ ३३॥ ॥ चोरीनी वस्तु श्रावी जाणीने धर्मनो जाण पुरुष वों,al॥१०३॥ तथा सरस निरस वस्तु नेल सेल करवी ते तत्प्रतिरूप व्यापार कहीये, ते व्यापार प्रत्ये विचारवान् पुरुष वर्जे ॥ ३४ ॥ ॥ चोरसाथै, चांडालसाथें, धूर्तसाथे मलिन Jain Educationala For Personal and Private Use Only Mainelibrary.org Page #211 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अंतःकरणवाला साथे, पापोयें करी पतित थयेला साथें, श्रालोक श्रने परलोकनेविषे | हितनी श्छा करनार प्राणी कोई पण प्रकारना व्यवहारनो त्याग करवो ॥ ३५ ॥ पोतानी वस्तु वेचतो थको असत्य न बोले, सत्य बोले, बीजानी वस्तु सेतो थको । संचकार दीधो ते प्रत्ये लोपे नही ॥ ३६॥ ॥ जे डाह्यो होय ते अणदीवी वस्तुनो। न्, व्यवहारं परित्यजेत्॥३५॥ विचारवान् विक्रीणानो वदेत् कूटक्रयं नहि ॥ आददानोऽन्यसक्तानि, सत्यंकारं न लोपयेत् ॥ ३६ ॥ अदृष्टवस्तुनो नैव, साटकं दृढयत्सुधीः ॥ स्वर्णरत्नादिकं प्रायो, नाददीतापरीदितम् ॥ ३७॥ रा. जतेजो विना न स्यादनापन्निवारणम् ॥ नृपाननुसरेत्तस्मात्, पारवश्यमनाथ यन् ॥३७॥ तपस्विनं कविं वैद्य, मर्मज्ञं नोज्यकारकम् ॥ मंत्रकं निजपूज्यं च, साटो सहसा निश्चित नही करे. सोनु, रुघु अने रत्न ए प्रायें श्रणपरख्या सेवा नहि । |॥३७॥ ॥राजाना तेज विना अनर्थ श्रने आपदानो नाश न होय, माटे राजादि कनो श्रासरो सेवो, पण परवशपणुं बांडवू, पोताने वश रहेतुं ॥३७ ॥ जे पंडित Jain Educational For Personal and Private Use Only Page #212 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आग्न होय तेणे १ तपस्वी, कवीश्वर, वैद्य, मर्मना जाण, रसोइ करनार, मंत्रवादी श्रने पोताना पूजनीक एटलाने कोपावq नही ॥ ३७॥ ॥ऽव्यनो आर्थव्य पेदा की मारवामां तत्पर थको घणा क्वेश तथा धर्मर्नु अतिक्रमण करे नही, नीचनी सेवा प्रत्ये श्राचरे नही, तथा विश्वासघात करवो ते प्रत्ये आचरे नही ॥ ॥ ४ ॥ कोपयेजातु नो बुधः॥ ३५॥ अतिक्लेशं च धर्मातिक्रमणं नीचसेवनम् ॥ वि श्वस्तघातकरणं, नाचरेदर्थतत्परः॥४०॥ आदाने च प्रदाने च, न कुर्याउक्त लोपनम् ॥ प्रतिष्ठा मदतीं याति, नरः स्ववचने स्थिरः॥४॥ धीरः स्ववस्तुना शेऽपि, पालयेहि निजां गिरम् ॥ नाशयेत् स्वल्पलानार्थे, वसुवत्स्यात्स उखि बेवड देवड करतां थकां पोताना बोलनो लोप न करे, पण पोतानुं वचन । पाले. केमके, जे माणस पोताना वचने स्थिर होय, ते माणस घणी प्रतिष्ठा प्र कत्ये पामे ॥४१॥ ॥ पंडित होय ते सर्व वस्तुनो नाश थतां पण पोतानी वाचा ॥१४॥ Jain Education in allenal For Personal and Private Use Only Mainelibrary.org Page #213 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Educationa प्रत्यें पाले, थोडा लाजने श्रर्थे जे पोतानुं बोल्युं न पाले, ते वसुराजानी परें दुःख पामे ॥ ४२ ॥ ॥ एवा व्यवहारने विषे दिवसनो चोथो प्रहर गमावे, तेवार पढी सांजें वालु करवाने पोताना घर प्रत्यें जाय ॥ ४३ ॥ ॥ एकास, बिल, उप वासनुं जेणें पच्चरकाण कीधुं दोय ते पडिक्कमणुं करवाने संध्याकाले मुनि महाराजने तः ॥ ४२ ॥ एवं व्यवदारपरो, यामं तुर्ये च यापयेत् ॥ वैकालिककृते गच्छेदथो | मंदिरमात्मनः ॥ ४३ ॥ एकाशनादिकं येन, प्रत्याख्यानं कृतं जवेत् ॥ आवश्य ककृते सायं मुनिस्थानमसौ व्रजेत् ॥ ४४ ॥ दिवसस्याष्टमे जागे, कुर्याद्वैकालि कं सुधीः ॥ प्रदोषसमये नैव, निश्यद्यान्नैव कोविदः॥४५॥ चत्वारि खलु कर्माणि, संध्याकाले विवर्जयेत् ॥ आदारं मैथुनं निषां, स्वाध्यायं च विशेषतः ॥ ४६ ॥ स्थानकें जाय ॥ ४४ ॥ ॥ दिवस मे जागे एटले चार घडी दिवस बते वालु करे, पण संध्या वेलाये वालु करे नही, वली डाह्यो माणस रात्रे सर्वथा जमे नही ॥ ४५ ॥ ॥ १ व्याहार, २ स्त्रीसेवा. ३ निद्रा अने ४ विशेषे करी स्वाध्याय ए चार bnal For Personal and Private Use Only w.jainelibrary.org Page #214 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रान ॥१५॥ कर्म निश्चेकरी संध्याकाले वर्जन करे ॥ ४६ ॥ ॥ जो संध्याकाले थाहार करे तो वर्ग ३ व्याधि उपजे, मैथुन सेवा करे तो गर्न इष्ट थाय, निसा करे तो नूत प्रेत पिशाचनी पीडा थाय, अने जो सद्याय करे तो बुछिनी हीनता थाय ॥४॥ ॥ दिवस चरि। मनुं पञ्चरकाण वायु कीधा पनी करे. उविहार, तिविहार, चउविहार प्रत्ये वऊँ, पच्च आहाराजायते व्याधिर्मेथुनागउष्टता ॥ भूतपीडा निघ्या स्यात्, स्वाध्याया दुधिहीनता ॥४७॥ प्रत्याख्यानं मुश्चरिमं, कुर्याकालिकादनु ॥ विविधं त्रि विधं वापि, चादारं वर्जयेत्समम् ॥ ४॥ अहो मुखेऽवसाने च, यो के के घटि। के त्यजेत् ॥ निशानोजनदोषझो, विज्ञेयः पुण्यन्नाजनम् ॥४॥करोति वि| काण करे ॥४॥ ॥रात्रि जोजन संबंधि दोषना जाण होय ते प्रजातवेलानी तथा । १०५॥ सांज वेलानी बेबे घडी वर्जे. रात्रिनोजनना दोषनो जाण होय ते पवित्र पुण्यनु गम जाणवो ॥ ४ ॥ ॥जे सदा सर्वदा रात्रिनोजनने विषे विरति एटखे पञ्चका Jain Educationa l en For Personal and Private Use Only Jainelibrary.org Page #215 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ण करे, ते पुरुषने धन्य , कारण के ते पुरुष, अर्धं आयुष्य अवश्य उपवासमां जा य, अर्थात् ते पुरुषर्नु एक वर्षमा अधुं वर्ष उपवासमां जाय ॥५०॥ ॥ जे मनुष्य दिवसें तथा रात्रिने विषे खातो थको रहे, ते मनुष्य प्रगटपणे सींगमा पूबडा रहित एवा पशु एटले ढोरसमान जाणवो ॥५१॥ ॥रात्रिनोजनना करवाथी ते मनु । रतिं धन्यो, यः सदा निशि भोजनात् ॥ सोई पुरुषायुषस्य, स्यादवश्यमुपोषि तः॥५०॥ वासरे च रजन्यां च, यः खादन्नवतिष्ठते॥श्रृंगपुवपरित्रष्टः, स स्पष्टं पशुरेव हि ॥५१॥ उलूककाकमार्जारगृध्रशंबरशूकराः ॥ अदिश्चिक गोधाश्च, जायंते रात्रिनोजनात् ॥५॥ नैवाढतिर्न च स्नानं, न श्राई देवता प्य घूश्रम, काक, बिलाड मांजार, गृध, सांबर, सूअर, सर्प, विलु अने गिरोलीना श्रव तार पामे ॥ ५॥ ॥राजे होम न करवो, स्नान न करवू, श्राफ न करवं, देवपूजा न करवी, दान पण रात्रे दीधुं निःफल थाय, माटे न करवं, अने विशेष जोजन तो Jain Education a l For Personal and Private Use Only Wainelibrary.org Page #216 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अ०ज० २०६ ॥ Jain Educationa नज करवुं ॥५३॥ ॥ न्यायमार्गे शोजतो एवो पुरुष जो ए प्रकारें दिवसना चारे प्रहर पूरण करे, तो विनयें करीने डाह्यो ते पुरुष अक्षय मोक्षना सुखनो नजनार थाय ॥ ५४ ॥ इति श्राचारोपदेशे तृतीय वर्ग संपूर्ण ॥ ३ ॥ ॥ थोडे पाणी यें पग, हाथ | चनम् ॥ दानं वा विदितं रात्रौ, जोजनं तु विशेषतः ॥ ५३ ॥ एवं नयेद्यश्चतुरो ऽपि यामान्, नयाजिरामः पुरुषो दिनस्य ॥ नयेन युक्तो विनयेन ददो, नवे | दसावच्युतसौख्यनाग् वै ॥ ५४ ॥ इति आचारोपदेशे तृतीयवर्गः ॥ ३ ॥ ॥ अथ चतुर्थवर्गप्रारंभः ॥ प्राव्य स्वल्पनी रेण, पादौ दस्तौ तथा मुखम् ॥ धन्यंमन्यः पुनः सायं, पूजये। जिनं मुदा ॥ १ ॥ सक्रियासहितं ज्ञानं जायते | मोक्षसाधकम् ॥ जानन्निति पुनः सायं कुर्यादावश्यक क्रियाम् ॥ २ ॥ | तेमज मुखने पखालीने श्रात्माने धन्य मानतो वली श्रीजिनेश्वरनी हर्षेकरी पूजा ॥ जली क्रिया सहित जे ज्ञान ते मोनुं साधन थाय, एवं जाणतो य " करे ॥ १ ॥ For Personal and Private Use Only वर्ग ४ ॥ १०६ ॥ thanelibrary.org Page #217 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Educationa को सांजे पक्किमणानी क्रिया प्रत्यें करें ॥ २ ॥ ॥ जेम स्त्री ने जोजनना सुखनो | जाण होय ते स्त्रीने जोगव्या विना थाने जोजन खाधा विना मात्र जाणवाथीज सुखी न थाय, तेम क्रिया विना एकलुं ज्ञान फलदायक नथी. क्रिया लोकने विषे फलनी या | पनारी बे, माटे मात्र नाम जाण्याथीज सुखी न थाय जेवारें क्रिया करे तेवारें जोगवी क क्रियैव फलदा लोके, न ज्ञानं फलदं मतम् ॥ यतः स्त्रीजक्ष्यभेदज्ञो, न ज्ञानात् सुखितो भवेत् ॥३॥ गुर्वभावे निजगृहे, कुर्वीतावश्यकं सुधीः । विन्यस्य स्थापना | चार्य, नमस्कारावलीमथ ॥४॥ धर्मादि सर्वकार्याणि, सिध्यन्तीति विदन् हृदि । | देवाय, तेथी सुखी थाय ॥ ३ ॥ ॥ पंडित पुरुष जो गुरुनो योग न होय, तो पोताना | घरने विषे स्थापनाचार्य मांगीने, थापना न होय तो नोकरवाली थापीने पक्किम एं करे ॥ ४ ॥ ॥ धर्मथी सघला कार्यनी सिद्धि पामिये, एवं हृदयने विषे जाणतो थ को सदा सर्वदा धर्मने विषे चित्त वे जेनुं एवो ते पुरुष धर्मनी वेलाने उल्लंघे नही For Personal and Private Use Only Jainelibrary.org Page #218 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्र०ज० ॥ १०७ ॥ ॥ ५ ॥ ॥ ते वेला वोट्या पढी अथवा ते वेला श्राव्यानी पहेलांज जे जपादिक धर्म कर्म करीयें, ते सर्व ऊखर खेत्रने विषे धान्य वाव्यानी परे निःफल थाय ॥ ६ ॥ ॥ | पंकित बे ते सधली विधि प्रत्यें पूरण करीने धर्मनी क्रिया प्रत्यें करे; परंतु जे हीन ए |टले तुं श्रथवा श्रधिकुं करे ते मंत्रनी विधिनी परे दुःखीयो थाय, तेमज क्रिया श्राघी सर्वदा तजतस्वान्तो, धर्मवेलां न लंघयेत् ॥५॥ प्रतीतानागतं कर्म्म, क्रियते य ऊपादिकम् ॥ वापिते चोषरे देत्रे, धान्यवन्निष्फलं भवेत् ॥ ६ ॥ विधिं सम्यक् प्रयुञ्जित, कुर्वन्धर्मक्रियां सुधीः ॥ दीनाधिकं सृजन्मंत्रं, विधिवद् दूषितो नवेत् ॥ ७ ॥ धर्मानुष्ठानवैतथ्ये, प्रत्युतानर्थसंभवः ॥ रौरंध्रादिजनकाद्दुष्प्रयुक्ता पाठी करतां पण दुःखी थाय ॥ ७ ॥ ॥ धर्म करतां याधी पाठी क्रिया करतां सामो | अनर्थ ऊपजे, जेम माठी रीते कीधुं श्रौषधादिक ते उलटुं श्राकरा चांदा प्रमुख रो गने पेदा करे, तेम धर्म करतां जो क्रिया आधी पाठी करे तो सामो अनर्थ ऊपजे Jain Educationa Monal For Personal and Private Use Only वर्ग ४ ॥ १०७ ॥ Page #219 -------------------------------------------------------------------------- ________________ and॥ ॥वैयावच्च कीधाथी श्रदय श्रेय मंगलिक थाय, बाहुबली बाहुनुं बल पाम्यो, चक्रवर्ती सरखाने हराव्या, ते वैयावञ्चना प्रजावधीज थयु, एम जाणीने पंडित श्रावक पडिक्कमणुं करीने पनी गुरुनी विसामणा ते वैयावृत्त्य प्रत्ये करे ॥ ए || वस्त्रे करी मुखें मुखकोश बांधीने अणबोलतो, सर्व अंगना खेद प्रत्ये हरतो पोताना दिवौषधात् ॥॥ वैयारत्त्ये कृते श्रेयोऽदयं मत्वा विचदणः ॥ विदितावश्यकः श्राक्षः, कुर्यादिश्रामणां गुरोः ॥ ए॥ वस्त्रावृतमुखो मौनी, दरन् सर्वांगजं । श्रमम् ॥ गुरुं संवादयेद्यत्नात्, पादस्पर्श त्यजन्निजम्॥१०॥ग्रामचैत्ये जिनं ८ नत्वा, ततो गत्स्वमंदिरम् ॥ प्रदाखितपदः पंचपरमेष्ठिस्तुतिं स्मरेत्॥१२॥ अन्तः शरणं संतु, सिाश्च शरणं मम ॥ शरणं जिनधर्मो मे, साधवः शर पगनो फरस त्यजतो एटले गुरुने पग श्रण लगाडतो यत्नथी गुरुनी चरणसेवा करे ॥ १०॥ ॥ गाममां देरासरे जगवंतने नमीने वलतो पोताने घरे जाय, तिहां पग धोश्ने पंच परमेष्ठी नवकार प्रत्ये गणे ॥ ११॥ ॥ मुजने श्रीअरिहंत शरण हो । Jain Educational For Personal and Private Use Only Jiainelibrary.org Page #220 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रा०ड० ॥ १०८ ॥ नार, य, वली मुजने श्रीसिद्ध शरण होय, मुजने श्रीकेवलिजाषित जिनधर्म शरण होय, वली मुजने सदैव श्री साधु शरण होय ॥ १२ ॥ मंगलिकनो करनार, दुःखथी राख जे शील रूप संनाने पहेरीने कंदर्पने उतावलो वेगे करीने जीततो दवो, ते श्री युलिने नमस्कार हो ॥ १३ ॥ ॥ गृहस्थ थकां पण जेने महोटी शीलनी लीला | सदा ॥ १२ ॥ नमः श्रीधूलिनाय, कृतनाय तायिने ॥ शीलसन्नाहमा विद्, यो जिगाय स्मरं रयात् ॥ १३ ॥ गृहस्थस्यापि यस्यासन्, शीलली ला महत्तराः। नमः सुदर्शनायास्तु, दर्शनेन कृतश्रिये ॥ १४ ॥ धन्यास्ते कृतपु ण्यास्ते, मुनयो जितमन्मथाः ॥ याजन्मनिरतीचारं, ब्रह्मचर्यं चरंति ये ॥ १५॥ थइ, जलुं समकित तेणे करी कीधी बे शोजा जेणे एवा श्री सुदर्शन शेठने नमस्कार | हो ॥ १४ ॥ ॥ जेमणे कंदर्प जीत्यो बे, वली जन्मश्री मांगी अतिचारना दोष रहित जे शील प्रत्यें पाले बे, ते धन्य पुण्यना करनार यति जाणवा ॥ १५ ॥ " ॥ ॥ Jain Educationanal For Personal and Private Use Only वर्ग 1 ॥ १०८ ॥ lainelibrary.org Page #221 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अशक्त श्रने घणां अनवद्यकर्म करनारो, सर्व प्रकारे नथी जीती इंघिय जेणे एवो पुरुष, एक दिवस पण उत्तम एवा शीलने धारण करवाने समर्थ थातो नथी ॥ १६ ॥ ॥रे संसार समुज! मदयुक्त ने नेत्रो जेनां एवी स्त्रीयोरूप उस्तर खराबा जो वच्चे न आवे,तो | तारो पार पामवानो मार्ग बहु वेगलो नथी॥१७॥ ॥जूबोलवू, साहसपणुं, माया ते । निःसत्वो भूरिकर्मा हि, सर्वदाप्यजितेन्श्यिः ॥ नैकाहमपि यः शक्तः, शीलमाधा, तुमुत्तमम् ॥ १६ ॥ संसार तव निस्तारपदवी न दवीयसी ॥ अंतरा उस्तरा न स्युर्यदिरे मदिरेदाणाः॥२७॥ अनृतं साहसं माया, मूर्खत्वमतिलोनिता ॥ अशौचं निर्दयत्वं च, स्त्रीणां दोषाः स्वनावजाः॥२७॥ या रागिणि विरागिणी, कपट, मूर्खपणुं, घणो लोन, अपवित्रपणुं, दया रहितपणुं ए दोष स्त्रीना स्खला 1 वेज होय ॥ १७॥ ॥जे स्त्री रागी पुरुष उपर पण वैरागी थाय, ते स्त्रीने कोण शाजोगवे ? जे पंडित होय ते मुक्ति रूपिणि स्त्रीनेज जोगवे; केमके, मुक्ति रूपिणी स्त्रीजे| Jain Education international For Personal and Private Use Only Page #222 -------------------------------------------------------------------------- ________________ थान ||, ते वैरागी ऊपर रागिणी 2 // 15 // // एवं स्त्रीनु असारपणुं चिंतवतो थोडी || वर्ग 4 वेला तो समाधिवंत थको निला करे, पण बुद्धिवंत धर्मना पर्वने विषे मैथुन एटले ना ॥रणा / स्त्रीनो जोग न करे // 20 // // वली बुद्धिवंत होय ते घणी वेला पर्यंत निखानुं से - स्त्रियस्ताः कामयेत कः // सुधीस्तां कामयेन्मुक्तिं, या विरागिणि रागिणी // IN|| // 1 // एवं ध्यायन् नजेनिश, स्वल्पं कालं समाधिमान् // जेन्न मैथुनं / / धीमान, धर्मपर्वसु कर्दिचित् // 20 // नातिकालं निषेवेत, प्रमीलां जातु चित्सुना धीः // अत्युक्तिा नवेदेषा, धर्मार्थसुखनाशिनी // 1 // अत्याहारोऽल्पनि जश्व, अल्पारंपरिग्रहः॥ नवत्यल्पकषायी यो, झेयःसोऽल्पनवन्रमः // // वन न करे, केमके, घणी उघ करे तो धर्म, अर्थ श्रने सुख तेनो नाश करनारी थाय // 10 // // 1 // // जे खल्प आहार करे, खल्प निमा लीए, स्वल्प श्रारंन करे, जेने खट्प परिग्रह होय,अनेजेने क्रोध थोडोहोय, तेनुं संसारमा नमवू पण खट्पज जाणवू Jan Educatona For Personal and Povate Use Only l ainelibrary.org Page #223 -------------------------------------------------------------------------- ________________ an5 // निडा, थाहार, जय, स्नेह, लजा, काम, विषय, कलह, क्रोध, ए जेट ला वधारीयें, तेटला वधे बे, अने जेटला प्रमाणे घटामीयें तेटला घटी पण जाय। // 23 // // विघ्नरूप वेल बेदवाने कुहामा सरखा एवा श्रीनेमिनाथ जगवानने नि, जाने वखते मनमा स्मरतां पुरुष माठे स्वप्ने पराजव पामे नही // 24 // // अश्वसेन | निजहारनयस्नेहलजाकामकलिकधः॥ यावन्मात्रा विधीयन्ते, तावन्मात्रा न वन्त्यमी॥ 23 // विघ्नव्रातलतानेमि, श्रीनेमि मनसि स्मरन् // स्वापकाले न रो नैव, उःस्वप्नैः परिनूयते // 24 // अश्वसेनावनीपालवामादेवीतनूरुहम् // श्रीपार्श्व संस्मरन्नित्यं, स्वप्नान्नैष पश्यति॥२॥श्रीलक्ष्मणांगसंनूतं, महसेन नृपांगजं // चंप्रनं स्मरंश्चित्ते, सुखं निजलनेत वै॥३६॥ सर्वविघ्नादिगरुडं, राजा श्रने वामा राणीनो पुत्र श्रीपार्श्वनाथ स्वामी तेने नित्य स्मरतो मा स्वप्न न देखे // 5 // तेमज लक्ष्मणा राणीनो तथा महसेन राजानो पुत्र एवो श्रीचंप्रन स्वामी तेने चित्तमां स्मरतां सुखें निझा पामे // 26 // // सर्व विघ्न रूप सर्पने हणवाने Jain Educational For Personal and Private Use Only Mainelibrary.org Page #224 -------------------------------------------------------------------------- ________________ थान गरुड समान, सर्व सिजिना श्रापनार एवा श्रीशांतिनाथ प्रत्ये मनमां ध्यातो थको |मनुष्य चोर प्रमुखथी जय न पामे // 27 // ॥ए प्रकारे ए सर्व दिवस संबंधि करणी " " जाणीने श्रावकवर्गने कीधो डे उत्तम संतोष जेणे एवी करणी जे आदरे, ते पुरुष सर्वसिद्धिकरं परम् // ध्यायन् शांतिजिनं नैति, चौरादिन्यो नयं नरः // 27 // श्त्यवेत्य दिनकृत्यमशेष, श्राध्वर्गजनितोत्तमतोषम् // संचरन्निद परत्र च लो के, कीर्तिमेति पुरुषो धुतदोषः ॥श्न॥इति श्रीआचारोपदेशे चतुर्थवर्गः // 4 // M // अथ पंचमवर्गप्रारंनः // लब्ध्वा तन्मानुषं जन्म, सारं सर्वेषु जन्मसु // सुकृतेन सदा कुर्यात्, सकलं सफलं सुधीः // 1 // निरन्तरकृता धर्मात्, सुखं नि| सर्व दोष टालीने इहलोक अने परलोकें जस पामे // // इति श्रीश्राचारोपदेशे चतु। र्थवर्गः समाप्तः // 4 // सघला जन्मनो सार एवो ए मनुष्यनो जन्म पामीने ते पुरुष पुण्येंकरीने सदा सर्वदा सर्व कामनी सिद्धि करे // 1 // // निरंतर धर्म कस्याथी // 10 // Jain Education For Personal and Povate Use Only Liainelibrary.org Page #225 -------------------------------------------------------------------------- ________________ निश्चे सदा सुख होय, माटे दान, ध्यान, तप श्रने जण तेणे करी दिवसने वांजी न गमावे, एटले दिवसने वांजी न करे, परंतु दानादिक अवश्य प्रत्येक दिवसें करीने सफल दिवस करे॥२॥ // जीव पोताना आयुष्यना प्रायें त्रीजे जागे अथवा अंत समय शुज अने अशुल बेमांथी एक प्रकारनुं श्रागला नवनुं आयुष्य बांधे // 3 // त्यं भवेदिति // अवन्ध्यं दिवसं कुर्यात्, दानध्यानतपःश्रुतैः // 2 // आयुस्ट तीयत्नागेच, जीवोंत्यसमयेऽथवा // आयुः शुनाशुनं प्रायो, बध्नाति परजन्मसु ॥३॥आयुस्तृतीयन्नागस्थः, पर्वश्रेणीषु पंचसु ॥श्रेयः समाचरन् जन्तुर्ब धात्यायुर्निजं ध्रुवम् // 4 // जन्तुराराधयेम, द्वितीयायां विधा स्थितम् // सृ श्राउखाने त्रीजे नागे रह्यो थको प्राणी बीज, पांचम, श्रावम, श्रगीपारस श्रने चौ दश ए पांच पर्वना दिवसें धर्म थाचरतो थको पोतार्नु निश्चे थकी श्राखुं बांधे // 4 // IN बीज पाल्याची प्राणी यतिधर्म अने श्रावकधर्म ए बे प्रकारना धर्म प्रत्ये श्राराधे, ते / Jain Education i nal For Personal and Private Use Only W hrjainelibrary.org Page #226 -------------------------------------------------------------------------- ________________ // 11 // आजलाप्राणी घणा पुण्यनो समूह संपादन करतो राग अने केष ए बेने बीज तिथीयें जीते || तपाय जात वर्ग 5 // 5 // // पांचम पाख्याधी पांच ज्ञान प्रत्ये पामे, पांच चारित्र पामे, पांच महाव्रत al IN पामे, ए पांचम प्रत्ये पालतो अहंकार, विषय, कषाय, निमा श्रने विकथा ए पांच प्रमादने जीते // 6 // // श्रामि पाख्याथी मागं श्राप कर्म प्रत्ये नशाडे, तथा पांच जन् सुकृतसंघातं, रागद्वेषज्यं जयेत् // ५॥पंच ज्ञानानि खन्नते, चारित्राणि व्रतानि च // पंचमी पालयन् पंच,प्रमादाञ्जयति ध्रुवम् // 6 // उष्टाष्टकर्मनाशा Nयाष्टमी नवति रदिता॥ स्यात्प्रवचनमातृणां, शुध्येऽष्टमदान् जयेत् ॥७॥ए। कादशांगानि सुधीराराधयति निश्चितम् // एकादश्यां शुन्नस्तम्वावकप्रतिमा || Nसमिति अने त्रण गुप्ति ए श्राउ प्रवचन माता तेने शुरू करे, तथा जातिमद, कुलम द, रूपमद, बलमद, ज्ञानमद, तपमद, लालमद अने धनमदने जीते, एटले ए श्राप // 111 // मद तेना पूर जाय // 7 // // एकादशियें धर्म प्रत्ये करतो पंमित पुरुष अगीवार Jain Education & For Personal and Private Use Only W inbrary.org Page #227 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अंग प्रत्ये तथा श्रावकनी श्रगीबार प्रतिमा प्रत्ये श्राराधे // 7 // // चतुर्दशीने श्रा राधतो ते दिवसें तप करतो थको प्राणी चौदराज लोकने उपरला जे मोक्षरूप स्था नक बे, ते प्रत्यें तथा चौद पूर्व प्रत्ये पामे // ए॥ ॥ए पांच पर्वना दिवस ने ते निश्चे एकेक थकी चडता चमता फलनां देवावाला बे, ते माटे ए दिवसें धर्म करणी स्तथा।ाचतुर्दशानामुपरिवासमासादयत्यहो।चतुर्दश्यामाराधयेत्, पूर्वाणि च / चतुर्दश // // पंच पर्वाण्यमूनीह, फलदानि यथोत्तरम्॥तदत्र विहितं श्रेयो,ह्य धिकं फलदं भवेत् // 2 // धर्मक्रियाः प्रकुर्वति, विशेषात् पर्ववासरे॥ आराध नुत्तरगुणान्, वर्जयेत्स्नानमैथुनम् // 11 // विदध्यात्पौषधं धीमान्, मुक्तिवश्यौ || करवाथी अधिकुं अधिकुं फल पामे // 10 // // माटे विशेषथी पर्वने दिवसें धर्मनी | क्रिया प्रत्ये करे, उत्तर गुण जे पोसह पमिकमणादिक ते प्रत्ये श्राराधतो स्नान तथा मै Malथुन प्रत्ये वऊँ // 11 // ॥बुद्धिवंत पर्वना दिवसें पोसह करे, ए मुक्तिने वश कर Jain Education Lana For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #228 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ग 5 छान्न // 12 // वाने औषध बे, ते जो पोतानी शक्ति न होय, तो विशेषथी सामायिक व्रत श्राश्रय करे // 15 // ॥तेम 1 च्यवन, 2 जन्म, 3 दीक्षा, 4 केवल अने 5 मोद ए पांच | श्रीअरिहंतना कट्याणिकना दिवस , ते प्रत्ये पंमित श्राराधे // 13 // ॥एक कल्याणक होय ते दिवसें एकासणुं करे, बे कल्याणक होय ते दिवसें नीवी करे, त्रण, षधं परम् // तदशक्तौ विशेषेण, श्रयेत्सामायिकं व्रतम् // 12 // च्यवनं जन / नं दीदा, ज्ञानं निर्वाणमप्यहो // अर्हतां कल्याणकानि, सुधीराराधयेत्तथा // 13 // एकस्मिन्नेकाशनकं, योनिर्विकृतं तपः // त्रिष्वाचाम्लं सपूर्वाई, च Mal तुषूपोषितं सृजेत् // 14 // कुर्यादर्ध चोपवासमतः पञ्चसु तेष्वपि ॥पंचनिर्व। कल्याणक होय ते दिवसें आयंबिल पूर्वार्ध ते एकासणुं करे, चार कल्याणक होय ते दिवसें उपवास करे // 14 // // वली पांच कल्याणक होय, ते दिवसें एकासणा सहित उपवास करे, ते पंमित कल्याणक तप पांच वर्षे करी पूर्ण करे // 15 // // // // 11 // Jain Education A nal For Personal and Private Use Only wimmi.jainelibrary.org Page #229 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नमोअरिहंतादिक वीश पद ते वीश थानक तेनेजे विधि सहित एकासण प्रमुख तपें करीने alकरे,ते पुरुष धन्य जाणवो // 16 // ॥ते विधि श्रने ध्यानसहित जे ए वीशस्थानक था राधे, ते प्राणी फुःखनो हरनार एवं महोटं तीर्थंकर पदवीनुं नाम कर्म पामे // 17 // त्सरैः पूर्यात्, तेषु चोपोषिते सुधी॥१५॥ अदादिपदस्थानि, विंशतिः स्थान कानि च ॥प्रकुर्वीत विधिं धन्य, स्तपसैकाशनादिना // 16 // ततो विधिध्या नपरो, योऽमून्याराधयत्यहो // खन्नते तीर्थकृन्नामकर्माशर्महरं परम् // 17 // उपवासेन यः शुक्ला, माराधयति पञ्चमीम् // सार्धानि पञ्च वर्षाणि, लन्नते पंचमी गतिम् // 17 // उद्यापनं व्रते पूर्णे, कुर्यामा विगुणं व्रतम् // तपोदिन / साडा पांच वरस लगें उपवासें करीने जे उजवाली पांचम प्रत्ये श्राराधे ते पांचमी गति Kामोद प्रत्ये पामे // 17 // ॥व्रत पूरण थया पली उजमणुं करे, जो शक्ति न होय तो वमणुं तप करे, तपना दिवस प्रमाणे माणसोने जमाडे // 1 // // // // Jain Education For Personal and Private Use Only jainelibrary.org Page #230 -------------------------------------------------------------------------- ________________ थान पाटी,पोथी,कवली,ठवणी,नोकरवाली एपांच ज्ञाननांउपकरण पांचमने उजमणे करे,तेम | वर्ग 5 |वली देरासरनां उपकरण करे॥रातेम पाखीनुं पमिक्कमणुं करतो अने चौदशनो उपवा| स करतो श्रावक पन्नरे दिननो पक्ष श्रने कुटुंबनो पद ए बे पढ़नी शुद्धि करे॥३१॥श्रा ! प्रमणानि, नोजयेन्मानुषाणि च // 2 // कारयेत्पञ्च पंचोचे, निोपकरणानि | च॥पञ्चम्युद्यापने तम्च्चैत्योपकरणान्यपि // 20 ॥पादिकावश्यकं तत्त्वं, चतु श्यामुपोषितम् // पदं विशुई तनुते, विधापि श्रावको निजम् // 1 // त्रिall षु चातुर्मासिकेषु, कुर्यात्षष्ठं तपः सुधी॥ अष्टपर्वण्यष्टमीं च, तदावश्यकयुक्स जेत् // 12 // अष्टमिकासु सर्वासु, विशेषात् पर्ववासरे // आरंनान् वर्जये / पाढ चोमासो,कार्तिक चोमासो अने फागुण चोमासो ए त्रण चोमासानी बह करे तथा | महोटुंपर्व पर्युषण थावे, तेवारें तेनी अहम करे, श्रने संवत्सरीनु पमिक्कमणुं करे // // सघला अहाश्ने विषे विशेष पर्वने दहाडे पोताना घरने विषे खांमवं, दल, धोवूतथा // 913 // Jain Education For Personal and Private Use Only Jainelibrary.org Page #231 -------------------------------------------------------------------------- ________________ स्नान प्रमुख श्रारंज न करे // 53 // ॥महोटुं पर्व पर्युषण बे, तेने विषे शुझमने करी] ने जिनशासननी शोलामाटे उत्सव करतोनगरमांजीवदयापलावतो कल्पसूत्र सांजलेश्व ते श्रावक नला धर्मनी करणी प्रत्ये करीने पण संतोष पामी रहे नही. मनेंकरी तृप्तिश्र हे, खंडनापेषणादिकान ॥२३॥पर्वणि शृणुयाज्ज्येष्ठे, श्रीकल्पं स्वबमानसः॥ शासनोत्सर्पणं कुर्वन्न मारी कारयेत्पुरे॥२४॥श्राछो विधाय स्वं धर्म, नो त प्तिं तावता ब्रजेत् // अतृप्तमानसः कुर्या धर्मकर्माणि नित्यशः ॥२५॥ष / पर्वणि श्रीकल्पं, सावधानः शृणोति यः॥ अंतर्नवाष्टकं धन्यं, लनेतपरमं प दम् // 26 // सम्यक्त्तसेवनान्नित्यं, सब्रह्मव्रतपालनात् // यत्पुण्यं जायते लो ण पामतो धर्मनी करणी प्रत्ये सदा सर्वदा करे // 25 // // पर्युषण पर्वनें विषे श्री कल्पसूत्र सावधान थश्ने श्रावक सांजले, ते धन्य पुरुष पाउनव मांहे मोद पामे॥२६॥ नित्ये समकितनी सेवाथी तथा नित्ये रूडुं ब्रह्मचर्य व्रत पालवाथी लोकने विषे जे पुण्य | Jain Educational For Personal and Private Use Only Mainelibrary.org Page #232 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रानथाय, ते पुण्य कल्पसूत्र सांजलवाथी थाय // 2 // दानें करी, विविध प्रकारना तपेकरी, वर्ग 5 रूमा तीर्थनी सेवायें करी जे प्राणीउनां पाप दय पामे, ते पाप कल्पसूत्र सांजलतां थकां - // 14 // जाय॥२॥ मुक्ति उपरांत को पद नथी,शत्रुजय उपरांत को तीर्थ नश्री, रूडा समकित के, श्रीकल्पश्रवणेन तत् // 2 // दानैस्तपोनिर्विविधैः, सत्तीर्थोपासनैरदो॥ al यत्पापं दीयते जन्तो, स्तत्पापं श्रवणेन वै॥॥ मुक्तेः परं पदं नास्ति, ती अर्थशजयात्परम् // संदर्शनात्परं तत्त्वं, शास्त्रं कल्पात्परं नहि // 2 // IN मावस्याप्रतिपदो,र्दीपोत्सव दिनस्थयोः॥प्राप्तनिर्वाणसज्झानौ, स्मरेतीवीरगोत, मौ // 30 // उपवासव्यं कृत्वा, गौतमं दीपपर्वणि // स्मेरस बनते नून, मिहा उपरांत कोऽव्रत नथी,तेम कल्पसूत्र उपरांत बीजु कोइ शास्त्र नथी // 39 // ॥दीवालीना, दिवसनी अमावास्यायें श्रीमहावीर स्वामी मोक्ष गया बे,अने पडवाना दिवसें श्रीगोतम || स्वामी केवलझान पाम्या , तेनुं स्मरण करीयें // 3 // जे बे उपवास करीने श्रीगौतम // 14 // Jain Educationa l For Personal and Private Use Only Mainelibrary.org Page #233 -------------------------------------------------------------------------- ________________ स्वामी प्रत्ये दीवालीना दिवसे स्मरण करे, ते निश्चयथी इहलोकें श्रने परलोकें मोहोटो उदय पामे // 31 // // पोताना घरने देरासरे अथवा गामने देरासरें विधियें करी जग वंतने पूजीने मंगलदीवा प्रत्ये करीने पोताना बंधव साथें नोजन प्रत्ये करे // 3 // श्रीनगवंतना कल्याणकना महोटा पांच दिवसने विषे पोतानी शक्ति माफक यथायो मुत्र महोदयात् // 31 // स्वगृहे. ग्रामचैत्ये च, विधिनार्चा जिनेशितुः॥ कृत्वा / मङ्गलदीपं चाश्नीयात्साई स्वबंधुनिः॥३॥ कल्याणके जिनानां दि, परमे दिन पंचके // निजशक्त्या सदर्थिन्यो, दद्यादानं यथोचितम् // 33 ॥श्वं सुपर्ववि हितोत्तमकृत्यचार्वाचारप्रचारपिहिताश्रववर्गमार्गः // श्रा-६ः समृविधिवधि ग्य सद्याचकने दान प्रत्ये श्रापे // 33 // // एम रूडा पर्वना समयें करवा योग्य कृत्य लारूप जला श्राचारने पालवे करी ढाक्यो बेथाश्रवना वर्गनो मार्ग जेणे, समृफ जे विधि तेणें करी वृद्धि पामी ले नली बुद्धि जेनी एवो श्रावक ते देवताना सुख प्रत्ये जोगवीने || For Personal and Private Use Only Sw.jainelibrary.org Page #234 -------------------------------------------------------------------------- ________________ // 115 // आज शाश्वत एवां मोदनां सुख पामे // 34 // इत्याचारोपदेशे पंचमवर्गः समाप्तः // 5 // श्रावक रूडी धर्मनी करणी प्रत्ये करतो सम्यक्त्व निवृति पामी रहे, अतृप्त मने करी धर्मनी करणी प्रत्ये नित्य करे // 1 // // धर्मथी उकुरा पामी, जे प्राणी धर्म न करे, तशुबुदिर्जुक्तिं सुपर्वसुखमेति च मुक्तिसौख्यम् // 34 // इति श्रीआचारोप, देशे पंचमवर्गः // 5 // अथ षष्ठवर्गप्रारंन्नः॥ श्राशे विधाय सर्म, कर्मतो नित्तिं व्रजेत् // अतृप्तमानसः कुर्याधर्मकर्माणि नित्यशः ॥१॥धर्मादधि गतैश्चर्यो, धर्ममेव निदन्ति यः // कथं शुन्नायतियात्, स स्वामिशेदपातकी Adm2 // दानशीलतपोनाव,नेदैर्धर्म चतुर्विधम् // शुचिधीराराधयेद्यो, जुक्तिमुक्ति एवा पोताना स्वामित्रोही पापीनुं श्रागल नबुं केम थाय ? // 2 // ॥रूडी बुझिनो धणी जे होय ते निरंतर जुक्ति अने मुक्तिना फलनो देवावालोएवो दान, शील, तप अने जाव // 12 // Jain Educational For Personal and Private Use Only NYHainelibrary.org Page #235 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ए चार प्रकारनो धर्म थाराधे // 3 // // थोमामांथी थोडं श्रापीयें, महोटा उदयनी अपेक्षा न करवी; केमके, मननी इला सरखी संपदा केवारे कोश्ने होती नथी // 4 // ld प्राणी ते ज्ञानने दानेकरी ज्ञानवंत थाय, अजयदान देवाथी जयरहित थाय, अ फलप्रदम् // 3 // देयं स्तोकादपि स्तोकं, न चापेदयो महोदयः // श्वानुरूपो al विनवः, कदा कस्य नष्यिति ॥४॥झानवान् शानदानेन, निर्नयोऽनयदानं / तः // अन्नदानात् सुखी नित्यं, निर्व्याधिर्नेषजानवेत् // 5 // कीर्तिः संजायते // पुण्यात्, न दानादथ कीर्तये // कैश्चिरितीर्यते दानं, झेयं तद्यसनं बुधैः // 6 // व्याजैः स्याद्विगुणं वित्तं, व्यवसायैश्चतुर्गुणम् // देत्रे शतगुणं प्रोक्तं, पात्रेऽनंत / नना दानश्री सदा सुखी थाय, अने औषधिनुं दान देवाथी रोगरहित थाय // 5 // पुण्य थकी कीर्ति पामीयें,एकली मात्र कीर्तिने अर्थ केटलाएक दान थापे ,ते दान पंडि तोएं व्यसन जाणवू // 6 // // जे व्याजें धन थापीयें, ते बमणुं थाय, व्यापारें चो Jain Educationairat For Personal and Private Use Only Allainelibrary.org Page #236 -------------------------------------------------------------------------- ________________ थान || गुणुं धन थाय, क्षेत्रमा वावियें ते सोगुणुं थाय, अने सुपात्रने श्रापीये ते अनंतयु वर्ग 6 पाणुं थाय // 7 // // देरासर, प्रतिमा, पुस्तक, साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविकाए सात देत्रने विषे घणां फल पामवाने अर्थे धन वावरे // // // नगवंतनां नक्तिनाव श्री जे देरासर प्रत्ये करावे, ते पुरुष धन्य बे, ते देरासरना परमाणुनी जेटली संख्या गुणं नवेत् // 7 // चैत्यप्रतिमापुस्तकश्रीसंघनेदयुक्तेषु॥ देवेषु सप्तसु धनं, व्ययेनूरिफलाप्तये // // चैत्यं च कारयेऽन्यो, जिनानां नक्तिनावितः // तत्प रमाणुसंख्यानि, कल्पानेष सुरो नवेत् // ए॥ यत्कारितं चैत्यगृहं, तिष्ठेद्यावद्दिा नानि द // स तत्समयसंख्यानि, वर्षाणि त्रिदशो भवेत् // 20 // सुवर्णरूप्य Kले तेटला पठ्योपम सुधी ते पुरुष देवतानुं श्रायु जोगवे // ए॥ // जे देरासर करा allव्युं, ते देरासर जेटला दिवस सुधी रहे तेटला वर्ष पर्यंत ते पुरुष देवतापणे रहे // 10 // men सोनानी, रूपानी, पाषाणनी, रत्ननी, मृत्तिकानी एवी जगवंतनी प्रतिमा प्रत्ये जे पुरुष Jain Educational For Personal and Private Use Only Mainelibrary.org Page #237 -------------------------------------------------------------------------- ________________ करावे, ते निश्चे तीर्थंकर थाय // 11 // ॥जे पोतानी शक्तिमाफक मात्र एक अं गुष्ठ प्रमाणे परमेश्वरनी प्रतिमा करावे, ते मोक्षपद प्रत्त्यें पामे // 12 // // धर्मरूप / वृदनुं मूल ते नळु शास्त्र , तथा प्रत्यद मोद फलनुं दातार , एम जाणतो जे पु पाषाणरत्नलेपमयीमपि // कारयत्यर्हतां मूर्ति, स वै तीर्थकरो नवेत् // 11 // al अंगुष्ठमात्रामपि यः, प्रतिमा परमेष्टिनः॥ कारयेशा यथाशक्ति, सलनेत्पदमव्य यम् // 1 // धर्मजुमूलं स्याबास्त्रं, जानन मोदफलप्रदम् // लेखयेशाचयेद्यस्तु, शृणुयानावशुक्ष्कृित् // 13 // लेखयित्वा च शास्त्राणि, यो गुणिन्यः प्रयति॥ तन्मात्रादरसंख्यानि, वर्षाणि त्रिदशो नवेत् // 14 // ज्ञानन्नक्तिं विधत्ते यो, IN रूष शास्त्रने लखावे, वांचे, सांजले तेनी ते शास्त्रश्री नावशुद्धि थाय // 13 // ॥जे म. Malनुष्य सिद्धांतशास्त्र लखावीने गुणवंत पंडितने श्रापे ते मनुष्य, शास्त्रना जेटला अक्षर | होय तेटला अदर प्रमाण वरस देवता थश्ने रहे // 14 // ॥जे झाननी जक्तिप्रत्ये / / Jain Educational For Personal and Private Use Only nelibrary.org Page #238 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रा० न०करे, ते ज्ञान विज्ञाने करी शोने, वली सघला सुखनुं कारण अन्ननुं दान , एवं वर्ग 6 मनमा नावीने यथाशक्ति वर्ष प्रत्ये साहामीवात्सल्य करे // 15 // // बांधव कुटुंब // 17 // 17" ने जे जमाडे, ते संसारनुं हेतु बे, अने तेहिज जो सरखा धर्मिने जमाडे, साहामी ज्ञानविज्ञानशोनितः // निदानं सर्वसौख्याना, मन्नपानं विनावयन् // साधर्मि / काणां वात्सल्यं, कुर्यान्नक्त्या समां प्रति // 15 // वात्सल्यं बंधुमुख्यानां, संसा रार्णववर्धनं // तदेव समधर्माणां, संसारोदधितारकम् ॥१६॥प्रतिवर्ष संघपूजा, शक्त्या कुर्याद्विवेकवान् ॥प्राशुकानि श्रीगुरुन्यो, देयास्त्राणि नक्तितः॥॥ सत्पात्राशनयानानि, पात्रवस्त्रौषधानिच॥चैन्न पर्याप्तविनवो, देयात्तदपिशक्तितः || वात्सल्य करे, तो ते संसार समुज्नुं तारक // 16 // // वर्ष प्रत्ये श्रीसंघनी पधरा मणी नक्ति पोतानी शक्तिमाफक करे, तथा फाशु शुद्धमान एवां वस्त्रादिक गुरुने // 117 // निक्तियें करी आपे // 17 // // तथा उत्तम पात्रने विषे अशन, पान, खादिम, स्वा JainEducationalal For Personal and Private Use Only Page #239 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दिम, पात्र, वस्त्र, औषधि प्रमुख, जो पण पूरण थापवानी संपदा न होय, तो पण शक्तिमाफक श्रापे॥१०॥ // उत्तम पात्रने विषे दान दीधुं थकुं हाणी न पामे, तथा || IN|| कूवो, तलाव, वावडी, बगीचा अने गाय प्रमुखनुं नित्यप्रत्ये दान करे, तो तेथी तेनी संपदा वधे // 1 // ॥दी, अने खाधु ए बेमांहे महोटुं अंतर देखाय बे; केमके, ka // 17 // सत्पात्रे दीयते दानं, दीयमानं न दीयते // कूपारामगवां दानाद्दद। तामेव संपदः // 10 // प्रदत्तस्य च जुक्तस्य, दृश्यते महदन्तरम् // प्रजुक्तं जा यते वर्ची, दत्तं नवति चादयम्॥॥आयासशतलब्धस्य, प्राणेच्योपि ग रीयसः॥ दानमेकैव वित्तस्य, गतिरन्या विपत्तये ॥२॥देत्रेषु सप्तसु ददत्, खाधं ते विष्टा थाय, अने दीधुं ते श्रदय थाय ने // // // सेंकमा गमे प्रयासेंकरी जे पाम्यु, पोताना प्राणथकी पण अधिक एवं जे धन तेनी दानगति बे, अने बीजी ते विपत्ति // 1 // न्यायें कमावेला पोताना धन प्रत्ये सात देने वावतो दान Jain Educational For Personal and Private Use Only Mainelibrary.org Page #240 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ग 6 // 11 // देश्ने श्रावक पोताना धनने अने जन्मने सफल करे // 22 // इतिश्री रत्नसिंहसूरि न्यायोपात्तं निजं धनम् // साफल्यं कुरुते श्राछो, निजयोर्धनजन्मनोः // 2 // // इति श्रीरत्नसिंदसूरिशिष्यचारित्रसुंदरगणिविरचिते श्रीआचारोपदेशे षष्ठो / वर्गः संपूर्णः // 6 // इति श्रीआचारोपदेशः समाप्तः // // // // शिष्यचारित्रसुंदरगणिविरचिते श्रीश्राचारोपदेशे बालावबोधे षष्ठो वर्गः समाप्तः // 6 // इदं पुस्तकं मोहमय्यां निर्णयसागराख्यमुसालये श्रावक जीमसिंहमाणकेन मुसापितम्. संवत् १एएए. // 11 // Jain Educationa l hai For Personal and Private Use Only BRainelibrary.org Page #241 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Goo0150100500000.00000000000000031 मानक नजरmahar CAO TECH HTTED ॥इति लघु-प्रकरण-संग्रहः समाप्तः॥ D R1556600 ... .. SHA -- R 500 के Jain Education international For Personal and Private Use Only Page #242 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education international For Personal and Private Use Only