________________ दिम, पात्र, वस्त्र, औषधि प्रमुख, जो पण पूरण थापवानी संपदा न होय, तो पण शक्तिमाफक श्रापे॥१०॥ // उत्तम पात्रने विषे दान दीधुं थकुं हाणी न पामे, तथा || IN|| कूवो, तलाव, वावडी, बगीचा अने गाय प्रमुखनुं नित्यप्रत्ये दान करे, तो तेथी तेनी संपदा वधे // 1 // ॥दी, अने खाधु ए बेमांहे महोटुं अंतर देखाय बे; केमके, ka // 17 // सत्पात्रे दीयते दानं, दीयमानं न दीयते // कूपारामगवां दानाद्दद। तामेव संपदः // 10 // प्रदत्तस्य च जुक्तस्य, दृश्यते महदन्तरम् // प्रजुक्तं जा यते वर्ची, दत्तं नवति चादयम्॥॥आयासशतलब्धस्य, प्राणेच्योपि ग रीयसः॥ दानमेकैव वित्तस्य, गतिरन्या विपत्तये ॥२॥देत्रेषु सप्तसु ददत्, खाधं ते विष्टा थाय, अने दीधुं ते श्रदय थाय ने // // // सेंकमा गमे प्रयासेंकरी जे पाम्यु, पोताना प्राणथकी पण अधिक एवं जे धन तेनी दानगति बे, अने बीजी ते विपत्ति // 1 // न्यायें कमावेला पोताना धन प्रत्ये सात देने वावतो दान Jain Educational For Personal and Private Use Only Mainelibrary.org