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________________ श्रा०ड० ॥ ए४ ॥ गंधवालुं, नीच मनुष्यें करश्युं, कीडे डंस्युं, माठे वस्त्रं लावेलुं, एवं फूल बांडवुं, पू जामां लेवुं नहीं ॥ ३३ ॥ ॥ जगवंतने डाबे पासें धूप देवो, जलनो कुंज सन्मुख ढोववो, नागरवेलनां पान फल ते जगवंतना हाथने विषे देवां ॥ ३४ ॥ ॥ १ स्नात्र २ चंदन, ३ दीवो, ४ धूप, २ फूल, ६ नैवेद्य, ७ जल, ध्वजा, ए वासदेप, १० वामांगे धूपदादः स्यादपात्रं तु संमुखे ॥ हस्ते दद्याजिनेन्द्रस्य, नागवल्लीदलं | फलम् ॥ ३४ ॥ स्नात्रैश्चन्दनदी पधूपकुसुमैर्नैवेद्यनीरध्वजै, र्वासैरक्षत पूगपत्रसहि तैः सत्कोशवृद्ध्या फलैः ॥ वादिध्वनिगीतनृत्यनुतिभिश्वत्रैर्वरैश्वामरे, पा निश्व किलैकविंशतिविधा पूजा नवेदताम् ॥ ३५ ॥ इत्येकविंशतिविधां रच दत, ११ सोपारी, १२ तांबूल, १३ देव जंगारमां वृद्धि करवी, १४ फल, १५ वाजित्रध्वनि, १६ गीतगान, १७ नाटक, १० स्तुति, १० बत्र, २० जलां चामर, २१ जलां आमरण, ए एकवीरा प्रकारें करीने श्रीश्ररिहंत देवनी पूजा होय ||३५|| ॥ एकवीश प्रकारें Jain Educationanal For Personal and Private Use Only वर्ग २ ॥ ए४ ॥ jainelibrary.org
SR No.600176
Book TitleLaghu Prakaran Sangraha
Original Sutra AuthorShravak Bhimsinh Manek
Author
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year
Total Pages222
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size19 MB
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