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________________ कर्म० ॥ ६१ ॥ Jain Educationa बेचन पुन्नि परिहारे || केवल पुगि दो चरिमा, जयाइ नव मइसु दि डुंगे | ॥२४॥ ड वसमि च वेगि, खइए इक्कार मित्र तिगि देसे ॥ सुदुमे रस ठा तेर, स जोग आहार सुक्काए ॥ २५ ॥ सन्निसु पढम डुगं, पढम तिले सासु बच्च सु सत्त ॥ पढमं तिम डुग अजया, अपहारे मग्गणासु गुणा ॥ ॥ २६ ॥ सच्चे पर मीस असच मोस मणवय विधि प्रदारा ॥ उरलं मीसा कम्मण, इ जोगा कम्म अणहारे ॥ २७ ॥ नर गइ पििद तस तणु, प्रचकु नर नपु कसाय सम्मडुगे ॥ सन्नि बलेसा दारग, जव मइ सुख उदि डुगि स वे ॥२८॥ तिरि विजय सासण, नाण उवसम व मिसु ॥ तेरादार डुगुणा, ते उरलडगूण सुर निरए ॥२॥ कम्मुरलगं यावर, ते सविधि डुग | पंच इग पवणे ॥ व प्रसन्नि चरिम वइजु, ते विधि गूण च विगले ॥३०॥ कम्मुरलमीस विष्णु मण, वय समइ बेच्य चरकु मणनाणे ॥ नरल डग कम्म For Personal and Private Use Only ग्रंथ ॥ ६१ ॥ Sanelibrary.org
SR No.600176
Book TitleLaghu Prakaran Sangraha
Original Sutra AuthorShravak Bhimsinh Manek
Author
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year
Total Pages222
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size19 MB
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