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________________ मनुष्यने गुणनो कारणजूत होय ॥४॥ ॥ उपदेशथी रूडी बुद्धि थाय, रूमी बुद्धि थी सारा गुणोनो उदय थाय, ते माटे उपदेश सांजलवा संजलाववा माटे था श्राचा IN रोपदेशनामें ग्रंथ प्रारंजीयें यें ॥५॥ ॥ रूमा आचारना विचारें करीने जलो जयेन स्यात्, सदाचारादसौ नवेत् ॥ स जायते तूपदेशान्नृणां गुणनिबन्धन नम्॥४॥ सुबुद्धिश्योपदेशेन, ततोऽपि च गुणोदयः॥ इत्याचारोपदेशाख्य, ग्रन्थः प्रारभ्यते मया ॥ ५॥ सदाचारविचारेण, रुचिरश्वतुरोचितः॥ देवा नन्दकरो ग्रन्थः, श्रोतव्योऽयं शुन्नात्मनिः॥६॥ पुजलानां पराठत्त्या, पुर्खन्नं जन्म मानुषम् ॥ लब्ध्वा विवेकेन धर्मे, विधेयः परमादरः ॥७॥ अने पंमितने जणवा वांचवा योग्य तथा देवताने आनंदकारी एवो था ग्रंथ ते पुण्य भावंत मनुष्ये सांजलवो ॥६॥॥ पुल परावर्तेकरी पामवो पुर्खन एवो था मनुष्य । नो जव , ते पामी करीने विवेकेंकरी मनुष्ये धर्मने विषे घणो श्रादर करवो॥७॥ Jain Education For Personal and Private Use Only Marw.jainelibrary.org
SR No.600176
Book TitleLaghu Prakaran Sangraha
Original Sutra AuthorShravak Bhimsinh Manek
Author
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year
Total Pages222
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size19 MB
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