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| जिला विंति ॥ १९२॥ पंचसुजिण कल्लाणे, सु चेव महरिसि तवाणु जावा ॥ जम्मंतरनेदेण य, आगचंति सुरा इदयं ॥ १०२ ॥ संकंति दिवपेमा, विसय पस त्ता समत्त कत्तवा ॥ प्रादीण मणुय कजा, नरजव मसुदं न इंति सुरा ॥ १०३ ॥ | चत्तारि पंचजोयण, सयाइ गंधोय मणुयलोगस्स ॥टुं वच्चइ जेणं, नतु देवा तेण आवंति ॥ १९४॥ दो कप्प पढम पुढवी, दो दो दो बीय तइयगं चथिं ॥ चन न वरिम दीए, पासंती पंचमं पुढविं ॥ १८॥ बडी बग्गेविका, सत्तमीयरे अणु त्तर सुराजं ॥ किंचू लोगनालिं, असंखदी बुद्धि तिरियं तु ॥ १९६॥ बहुपर गं नवरिमगा, उङ्कं सविमाण चूलिय धयाइ ॥ कण६ सागरे सं, ख जोयणा तप्पर मसंखा ॥ १७ ॥ पण वीस जोया लहु नारय जवणवण जोइ कप्पा गेवि णुत्तराणय, जदसंखं उदियागारा ॥ १८ ॥ तप्पागारे पल्लग, पमदगऊ वरि मुहंग पुप्फजवे ॥ तिरिय मणुएसु उहि, नाणाविद संविजे मणि ॥ १एगा
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