SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 133
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ सवेश् अंता ससिह नरिआ ॥६॥ तो दीवुदहिसु इकि, क सरिसवं खीवि अ! निहिए पढमे ॥ पढमं व तदंतं चित्र,पुण नरिए तंमि तह खीणे ॥७॥ खिप्प। सिलाग पल्ले,गु सरिसवोश्य सिलाग खिवणेणं ॥ पुप्लो बी अ तर्ज, पुवंपि। व तंमि उ-हरिए ॥७॥ खीणे सिलागि तइए, एवं पढमेदि बीअयं नरसु ॥ते हिअ तश्शं तेहिअ, तुरिअंजा किरपुमा चनरो॥॥ पढमति पलुरिआ, दीवुददी पल्ल चन सरिस वाय ॥ सवो वि एस रासी,रूवृणो परमसंखिऊGy रूव जुअंतु परित्ता, ऽसंखं लहु अस्सरासि अग्नासे ॥ जुत्ता संखिऊं लह, आवलिआ समय परिमाणं ॥२॥ बिति चन पंचम गुणणे, कम्मासग संख खापढम चन सत्त॥णंता ते रूवजुआ, मद्यारूवृण गुरुपना॥॥श्य सुत्तुत्तं अन्ने, वग्गिअ मिकसि चन्बय मसंखं ॥ होइ असंखासंखं, लहुरूवजुअंतु तं मद्यं ॥७३॥ रूवृण माश्मं गुरु, तिवग्गि तबिमे दसकेवे ॥ लोगागासपए Jain Education For Personal and Private Use Only
SR No.600176
Book TitleLaghu Prakaran Sangraha
Original Sutra AuthorShravak Bhimsinh Manek
Author
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year
Total Pages222
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size19 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy