________________ अंग प्रत्ये तथा श्रावकनी श्रगीबार प्रतिमा प्रत्ये श्राराधे // 7 // // चतुर्दशीने श्रा राधतो ते दिवसें तप करतो थको प्राणी चौदराज लोकने उपरला जे मोक्षरूप स्था नक बे, ते प्रत्यें तथा चौद पूर्व प्रत्ये पामे // ए॥ ॥ए पांच पर्वना दिवस ने ते निश्चे एकेक थकी चडता चमता फलनां देवावाला बे, ते माटे ए दिवसें धर्म करणी स्तथा।ाचतुर्दशानामुपरिवासमासादयत्यहो।चतुर्दश्यामाराधयेत्, पूर्वाणि च / चतुर्दश // // पंच पर्वाण्यमूनीह, फलदानि यथोत्तरम्॥तदत्र विहितं श्रेयो,ह्य धिकं फलदं भवेत् // 2 // धर्मक्रियाः प्रकुर्वति, विशेषात् पर्ववासरे॥ आराध नुत्तरगुणान्, वर्जयेत्स्नानमैथुनम् // 11 // विदध्यात्पौषधं धीमान्, मुक्तिवश्यौ || करवाथी अधिकुं अधिकुं फल पामे // 10 // // माटे विशेषथी पर्वने दिवसें धर्मनी | क्रिया प्रत्ये करे, उत्तर गुण जे पोसह पमिकमणादिक ते प्रत्ये श्राराधतो स्नान तथा मै Malथुन प्रत्ये वऊँ // 11 // ॥बुद्धिवंत पर्वना दिवसें पोसह करे, ए मुक्तिने वश कर Jain Education Lana For Personal and Private Use Only jainelibrary.org