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कर्म०
॥ ६६ ॥
त्ता || || पढम तिगुणेसु मित्रं, नियमा प्रजयाइ ठगे न ॥ सासाणे ख लु सम्मं, सत्तं मिचाइ दसगेवा ॥१०॥ सासण मीसेसु धुवं, मीसं मिठाइ नव सुजयाए ॥ आइ डुगण नियमा, नइया मीसाइ नवगम्मि ॥ ११॥ प्रा दार सत्तगं वा, सब गुणे वि ति गुणे विणा तिचं ॥ नो जय संते मित्रो, अंत मुहुत्तं नवेति ॥ १२॥ केवल जुमला वरणा, पण निद्दा वारसाइम कसाया ॥ मिचंति सब घाई, चन नाण ति दंसणा वरणा ॥ १३ ॥ संजल नो कसाया, | विग्धं इ देस धाइ घाइ ॥ पते तणु ठाऊ, तस वीसा गो डुंग व मा ॥ १४ ॥ सुर नर तिगुच्च सायं, तस दस तणु वंग वइर चनरंसं ॥ परघासग तिरियाऊ, वस चन पणिदि सुनखगई ॥ १५॥ बायाल पुस पग, अपढम संगण खगइ संघयणा ॥ तिरि डुग असाय नीर्ज, वघाय इग विगल निरय तिगं ॥ १६ ॥ यावर दस वन्न चक्क घाय पणयाल सदिय बासीई ॥ पाव पय
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ग्रंथ ५
॥ ६६ ॥
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