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________________ दंगक० || 0 || ववाय चव विई ॥ पत्ति किमाहारे, समि गई आगई वे ॥ ४ ॥ चन ग न तिरिय वासु, मणुणं पंचसेस ति सरीरा ॥ थावर चनगे उदर्ज, अंगु लप्रसंखनाग तणु ॥ ५॥ सधेसि पि जहन्ना, सादाविय अंगुलस्स संखं सो नक्कोस पणसय धणु, नेरइया सत्त दव सुरा ॥ ६ ॥ नतिरि सदस जोयण, वसई दिय जोयण सदस्सं ॥ नर तेइंदि तिगाऊ, बेइंदिय जोयणे बार ॥ ७ ॥ जोयण मेगं चरिं, दि देह मुच्चत्तणं सुयेए नयिं ॥ वेनविय देहं पुए, अंगुल संखं समारं ॥ ८ ॥ देव नर दिय लकं, तिरियाणं न वय जोयण |सयाई ॥ डुगुणं तु नारयाणं, नणियं विधिय सरीरं ॥ [ ॥ अंत मुहुत्तं निरए, मुहुत्त चत्तारि तिरिय मणुसु ॥ देवेसु मासो, नक्कोस विजवणा | कालो ॥१०॥ थावर सुर नेरड्या, अस्संघयणा य विगल बेवा ॥ संघयण बगं गन्नय, नर तिरिए मुणेयवं ॥ ११ ॥ सवेसिं चन दह वा, समा स Jain Educationanal For Personal and Private Use Only प्रकरण. ॥ ८ ॥ jainelibrary.org
SR No.600176
Book TitleLaghu Prakaran Sangraha
Original Sutra AuthorShravak Bhimsinh Manek
Author
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year
Total Pages222
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size19 MB
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