SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 170
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ श्रा०ड० ॥ ८३ ॥ धन्य जाप जाणवो ॥ २१ ॥ ॥ तेवार पक्षी उपाशरे अथवा पोताना घरने विषे ज ईने पोतानां पाप शुद्ध करवाने श्रर्थे पंक्ति पुरुष, पडिकमणुं करे ॥ २२ ॥ ॥ एक रात्रिपक्किम, बीजुं देवसिकपक्किम, त्रीजुं पाखी परिक्रमणं, चोथुं चौमासी पडिक जायते जपः ॥ २१ ॥ ततो गत्वा मुनिस्थान, मथवात्मनिकेतने ॥ निजपाप विशुध्यर्थं कुर्यादावश्यकं सुधीः ॥ २२ ॥ रात्रिकं स्याद्दैव सिकं, पादिकं चातु र्मासिकम् ॥ सांवत्सरं चेति जिनैः, पंचधावश्यकं कृतम् ॥ २३ ॥ कृतावश्यक कर्मा च स्मृतपूर्वकुलक्रमः ॥ प्रमोदमेङरस्वान्तः कीर्तयेन्मङ्गलस्तुतिम | ॥ २४ ॥ मङ्गलं भगवान् वीरो, मङ्गलं गौतमः प्रभुः ॥ मङ्गलं धूलिनाद्या, | मणुं ने पांचमुं संववरी पडिकमणुं, ए जगवंतें पांच प्रकारें पडिक्कमणुं करतुं कर्तुं बे ॥ २३ ॥ ॥ पडिक्कमणरूप कर्म करीनें पोतानो कुलक्रम संचारतो हर्षे करी पुष्ट बे चित्त जेनुं एवो जन ते मांगलिकनी स्तुति नणे ॥ २४ ॥ ॥ मंगलिक श्रीभगवंत महावीर " Jain Educationa Interadanal For Personal and Private Use Only वर्ग १ ॥ ८३ ॥ jainelibrary.org
SR No.600176
Book TitleLaghu Prakaran Sangraha
Original Sutra AuthorShravak Bhimsinh Manek
Author
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year
Total Pages222
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size19 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy